📍नई दिल्ली | 3 Sep, 2026, 11:26 AM
Khagantak-243 Glide Bomb: भारतीय वायुसेना ने हाल ही में स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम खगंतक-243 का सफल परीक्षण किया। वायुसेना ने बताया कि इस परीक्षण के दौरान सभी निर्धारित टारगेट हासिल किए गए। यह हथियार भारत के प्रिसिजन स्ट्राइक वेपंस प्रोग्राम की एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी से है, जिसे लंबी दूरी से सटीक हमला करने के लिए तैयार किया गया है। इस हथियार का उद्देश्य लड़ाकू विमानों को दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में घुसे बिना दूर से हमला करने की क्षमता देना है।
Khagantak-243 Glide Bomb: क्या होता है ग्लाइड बम?
सामान्य बम विमान से गिराए जाने के बाद गुरुत्वाकर्षण के सहारे नीचे गिरते हैं। ऐसे बमों की मारक दूरी सीमित होती है और विमान को टारगेट के काफी करीब जाना पड़ता है।
लेकिन ग्लाइड बम इससे अलग होते हैं। इनमें विशेष पंख और कंट्रोल सरफेस लगे होते हैं। विमान से छोड़े जाने के बाद ये हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंचते हैं। इनमें इंजन नहीं होता, इसलिए इनकी लागत क्रूज मिसाइल की तुलना में काफी कम रहती है।
यही वजह है कि आधुनिक वायु सेनाएं ग्लाइड बमों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही हैं। ये रनवे, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, गोला-बारूद डिपो और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों पर सटीक हमला कर सकते हैं। (Khagantak-243 Glide Bomb)
300 किलोग्राम कैटेगरी का ग्लाइड म्यूनिशन
खगंतक-243 लगभग 300 किलोग्राम कैटेगरी का स्टैंड-ऑफ ग्लाइड म्यूनिशन है। इसे जेएसआर डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने मिल कर बनाया है।
इस हथियार में लगभग 125 किलोग्राम वजन वाला एमके-81 कैटेगरी का वारहेड लगाया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी मारक क्षमता है।
अगर इसे लगभग 12 किलोमीटर की ऊंचाई से छोड़ा जाए तो यह 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकता है। कुछ टेस्टिंग प्रोफाइल में इसकी रेंज इससे भी अधिक हो सकती है।
खगंतक-243 को इस तरह बनाया गया है कि विमान से अलग होने के बाद इसके पंख खुल जाते हैं और यह नियंत्रित उड़ान भरते हुए टारगेट की ओर बढ़ता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)
कैसे काम करता है गाइडेंस सिस्टम?
खगंतक-243 में आधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके शुरुआती चरण में आईएनएस यानी इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन का इस्तेमाल होता है।
टर्मिनल फेज यानी टारगेट के अंतिम हिस्से में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सीकर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा पैसिव होमिंग हेड का विकल्प भी उपलब्ध है।
सिर्फ नेविगेशन आधारित मोड में इसकी सटीकता लगभग 10 मीटर के भीतर बताई जाती है। वहीं सीकर के इस्तेमाल पर यह सटीकता 5 मीटर से भी कम हो सकती है। जिससे यह किसी विशेष भवन, बंकर, रडार या अन्य छोटे टारगेट को भी सटीकता के साथ निशाना बना सकता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)
✈️🇮🇳 Major Boost for India’s Precision Strike Capability
The Indian Air Force has successfully conducted the trial of the indigenously designed and developed Long Range Glide Bomb (Khagantak-243), marking a significant milestone for both the IAF and Indian defence industry.… pic.twitter.com/DIai9orEzn— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 3, 2026
सु-30एमकेआई से हुआ परीक्षण
भारतीय वायुसेना ने अपने आधिकारिक बयान में लॉन्च प्लेटफॉर्म का नाम सार्वजनिक नहीं किया है। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक खगंतक-243 को सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान के साथ जोड़ा गया है।
फरवरी 2025 में बीईएल ने बताया था कि खगंतक-243 का पहला फ्लाइट टेस्ट सु-30एमकेआई से किया जाएगा।
सु-30एमकेआई भारतीय वायुसेना का सबसे ताकतवर मल्टीरोल फाइटर जेट है। यह भारी हथियार ले जाने में सक्षम है और इसमें ब्रह्मोस, रुद्रम तथा कई अन्य स्वदेशी हथियार लगाए जाा सकते हैं। भविष्य में इस हथियार को मिग-29के जैसे अन्य प्लेटफॉर्म पर भी लगाया जा सकता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)
2019 में एरो इंडिया में हुआ था समझौता
खगंतक-243 प्रोजेक्ट को शुरू करने का श्रेय भारतीय वायुसेना के पूर्व उप प्रमुख एयर मार्शल शिरीष बबन देव को जाता है। वायुसेना में सेवा के दौरान उन्होंने जोधपुर में अपनी एक छोटी रिसर्च लैब में इस तकनीक पर काम शुरू किया था। उस समय डीआरडीओ के प्रमुख रहे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इस पहल को देखा और लैब को 10 लाख रुपये की मदद भी दी थी। इसके बाद इस प्रोजेक्ट पर लगातार 12 साल से अधिक समय तक काम चलता रहा।
बाद में वर्ष 2018 के आसपास नागपुर में जेएसआर डायनेमिक्स की स्थापना हुई और 2019 के एरो इंडिया शो में कंपनी ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ साझेदारी की। इस साझेदारी के तहत जेएसआर डायनेमिक्स बम की बॉडी और कंट्रोल सिस्टम तैयार करती है, जबकि बीईएल गाइडेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण सब-सिस्टम उपलब्ध कराती है। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में 90 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।
फरवरी 2025 में एरो इंडिया के दौरान बीईएल ने बताया था कि भारतीय वायुसेना ने खगंतक-243 की सीमित संख्या के लिए शुरुआती ऑर्डर दिया है।
खगंतक के कई अलग-अलग वर्जन भी डेवलप किए जा रहे हैं। खगंतक-225 एलडब्ल्यू इसका हल्का वर्जन माना जाता है, जिसकी रेंज 180 किलोमीटर तक है। वहीं खगंतक-306 को अधिक एडवांस गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। इसके अलावा 450 किलोग्राम, 720 किलोग्राम और 1260 किलोग्राम कैटेगरी के बड़े वर्जन पर भी काम जारी है। (Khagantak-243 Glide Bomb)
दूसरे ग्लाइड बमों से कितना अलग?
भारतीय वायुसेना के पास पहले से कई तरह के प्रिसिजन स्ट्राइक हथियार मौजूद हैं। इजरायल का स्पाइस-2000 बम बालाकोट ऑपरेशन के बाद काफी चर्चित हुआ था। इसकी ग्लाइड रेंज लगभग 60 किलोमीटर मानी जाती है और इसका लक्ष्य पहचान सिस्टम काफी परिपक्व माना जाता है। फ्रांस का हैमर हथियार भी स्टैंड-ऑफ अटैक क्षमता देता है। वहीं डीआरडीओ का स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (साव) करीब 125 किलोग्राम श्रेणी का हथियार है, जिसे रनवे और हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाने के लिए विकसित किया गया है। इसकी रेंज लगभग 100 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसके अलावा 2025 में डीआरडीओ ने गौरव नामक 1,000 किलोग्राम श्रेणी के भारी ग्लाइड बम का भी परीक्षण किया था।
हालांकि खगंतक-243 गौरव की तुलना में काफी हल्का है, इसलिए एक लड़ाकू विमान एक साथ अधिक संख्या में ऐसे हथियार ले जा सकता है।
साथ ही यह पूरी तरह स्वदेशी सप्लाई चेन पर आधारित है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होती है।
जहां ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें अत्यधिक महंगी और सीमित संख्या में उपलब्ध होती हैं, वहीं खगंतक-243 जैसे ग्लाइड बम अपेक्षाकृत कम लागत में बड़ी संख्या में तैयार किए जा सकते हैं। (Khagantak-243 Glide Bomb)
लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता
आधुनिक युद्ध में एयर डिफेंस सिस्टम लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू विमान के लिए टारगेट के बहुत करीब जाना जोखिम भरा हो सकता है।
खगंतक-243 की 140 किलोमीटर से अधिक की स्टैंड-ऑफ क्षमता विमान को अपेक्षाकृत सुरक्षित दूरी से हमला करने का विकल्प देती है।
इससे पायलट और विमान दोनों के जोखिम में कमी आती है। साथ ही दुश्मन के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर तेज और सटीक हमला संभव होता है।
इस हथियार में मल्टी-जीएनएसएस बेस्ड नेविगेशन का इस्तेमाल किया गया है, जिससे विभिन्न सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम्स का फायदा मिलता है। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी यह सिस्टम कारगर है। (Khagantak-243 Glide Bomb)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





