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ड्रोन अटैक से बचेंगी भारतीय सेना की तोपें! फॉरवर्ड एरिया में तैनात पहली बार टोड आर्टिलरी गनों पर लगाया ये खास ‘जुगाड़’, देखें वीडियो

Towed Artillery Guns Anti Drone Cages
Towed Artillery Guns (Image Source: Rising Star Corps)

Towed Artillery Guns Anti Drone Cages: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी यूनिट्स की सुरक्षा के लिए एक नया कदम उठाया है। पश्चिमी मोर्चे पर तैनात राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) ने पहली बार फॉरवर्ड एरिया में तैनात टोड आर्टिलरी गनों (खींची जाने वाली तोपखाना बंदूक सिस्टम) पर एंटी-ड्रोन केज लगाए हैं। सेना की किसी ऑपरेशनल फॉर्मेशन द्वारा इस तरह की व्यवस्था पहली बार अपनाई गई है।

Indian Army Anti Drone Cages: क्या हैं एंटी-ड्रोन केज

एंटी-ड्रोन केज धातु की मजबूत जाली और हल्के फ्रेम से बना एक सिक्योरिटी फ्रेमवर्क होता है, जिसे वेपन सिस्टम के ऊपर लगाया जाता है। इसे कई देशों में “कोप केज” के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ड्रोन सीधे हथियार या उसके क्रू पर हमला करने की कोशिश करे तो वह पहले इस जाली से टकराए।

यदि ड्रोन इस जाली में फंस जाता है या उससे टकरा जाता है तो उसका वारहेड टारगेट तक पहुंचने से पहले ही फट सकता है या उसका संतुलन बिगड़ सकता है। इससे मेन वेपन सिस्टम और उसके आसपास मौजूद सैनिकों को होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इन केजों में स्टील की जाली और मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल किया जाता है। बड़े ड्रोन मेटल की जाली से टकराते हैं, जबकि छोटे एफपीवी ड्रोन और क्वाडकॉप्टर नेट में उलझ सकते हैं। इससे उनका हमला सीधे गन तक नहीं पहुंच पाता।

इन केजों का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि जरूरत पड़ने पर इन्हें कुछ ही मिनटों में लगाया या हटाया जा सकता है। फायरिंग के समय भी इनकी बनावट ऐसी रखी जाती है कि तोप की बैरल की मूवमेंट और ऊंचाई पर ज्यादा असर न पड़े।

टोड आर्टिलरी गनों को क्यों मिली यह सुरक्षा

भारतीय सेना के पास कई तरह की टोड 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गनें हैं, जिन्हें ट्रकों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। इन गनों में सेल्फ-प्रोपेल्ड गनों की तरह आर्मर्ड सिक्युरिटी नहीं होती। ऐसे में यदि किसी ड्रोन का हमला होता है तो गन और उसके चालक दल दोनों को ज्यादा खतरा रहता है।

सूत्रों का कहना है कि इसी वजह से सबसे पहले फॉरवर्ड एरिया में तैनात टो आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला किया गया। इससे वेपन सिस्टम की सुरक्षा बढ़ेगी और गन क्रू को भी अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। (Indian Army Anti Drone Cages)

क्या है वीडियो में

भारतीय सेना की राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) की तरफ से जारी वीडियो में दिखाया है कि सेना कैसे अपनी आर्टिलरी यूनिट्स को आधुनिक तकनीक से लैस कर रही है, ताकि दुश्मन का पता लगाने से लेकर उस पर हमला करने तक का समय बहुत कम किया जा सके। सेना इसे “सेंसर-टू-शूटर किल चेन” कहती है। यानी जैसे ही सेंसर किसी टाारगेट का पता लगाएं, उसी जानकारी के आधार पर कुछ ही समय में आर्टिलरी गन सटीक हमला कर सके।

वीडियो में एक ऊंचा मेटल मास्ट दिखाई देता है। यह ऑब्जर्वेशन पोस्ट, रडार या किसी आधुनिक सेंसर सिस्टम का हिस्सा हो सकता है। इसका काम दूर स्थित टारगेट की निगरानी करना और उसकी जानकारी कमांड पोस्ट तक पहुंचाना होता है।

इसके बाद सैनिकों को आधुनिक हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है। वीडियो में दिन और रात दोनों समय निगरानी की क्षमता पर जोर दिया गया है। रात वाले हिस्से में ऊंचे पोल पर लगे कैमरे और सेंसर दिखाई देते हैं, जिनकी मदद से अंधेरे में भी इलाके पर नजर रखी जा सकती है।

वीडियो का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थर्मल इमेजिंग का है। इसमें स्क्रीन पर थर्मल कैमरे की मदद से टारगेट दिखाई देता है और उस पर क्रॉसहेयर लगा होता है। पास में बैठे सैनिक और अधिकारी हेडसेट पहनकर उसी फीड की निगरानी करते हुए सेंसर से मिलने वाली जानकारी सीधे फायर कंट्रोल सिस्टम तक दे रहे हैं, ताकि टारगेट पर तेजी से कार्रवाई की जा सकती है।

वीडियो में रात के समय आर्टिलरी फायरिंग दिखाई गई है। इससे यह बताने की कोशिश की गई है कि आधुनिक सेंसर, थर्मल कैमरे, सुरक्षित संचार प्रणाली और एंटी-ड्रोन सुरक्षा के साथ भारतीय सेना अब दिन और रात दोनों समय तेजी से और अधिक सटीक तरीके से फायर मिशन पूरा करने की क्षमता विकसित कर रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

राइजिंग स्टार कोर ने उठाया पहला कदम

राइजिंग स्टार कोर का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के योल मिलिट्री स्टेशन में स्थित है। यह पश्चिमी कमांड के अधीन काम करती है और इसके जिम्मे पंजाब, जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ संवेदनशील इलाके आते हैं।

इस कोर की जिम्मेदारी वाले इलाकों में सीमा के करीब कई महत्वपूर्ण सैन्य तैनातियां हैं। ऐसे में ड्रोन से होने वाले संभावित हमलों को देखते हुए आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला लिया गया। (Indian Army Anti Drone Cages)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा ड्रोन पर फोकस

हाल के सैन्य अभियानों और सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने भारतीय सेना का ध्यान इस खतरे की ओर और अधिक बढ़ाया है। अब केवल निगरानी करने वाले ड्रोन ही नहीं, बल्कि विस्फोटक लेकर हमला करने वाले एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसी स्थिति में केवल इलेक्ट्रॉनिक जैमर या एयर डिफेंस सिस्टम पर्याप्त नहीं माने जा रहे। सेना अब हथियार प्रणालियों की फिजिकल सेफ्टी को भी समान महत्व दे रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले अहम सबक

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखाया कि छोटे ड्रोन भी टैंक, आर्टिलरी गन और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई मामलों में कुछ लाख रुपये के ड्रोन ने करोड़ों रुपये की सैन्य संपत्ति को नष्ट कर दिया।

इसी तरह नागोर्नो-कराबाख और पश्चिम एशिया के संघर्षों में भी ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल हुआ। इन युद्धों के बाद दुनिया की कई सेनाओं ने अपनी सैन्य प्रणालियों पर अतिरिक्त सिक्योरिटी स्ट्रक्चर लगाने शुरू किए।

भारतीय सेना की मल्टी लेयर काउंटर-ड्रोन स्ट्रेटेजी

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना ड्रोन से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। सबसे पहले रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर के जरिए ड्रोन की पहचान की जाती है। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक जैमर से ड्रोन का नियंत्रण बाधित करने की कोशिश होती है। जरूरत पड़ने पर एंटी-ड्रोन हथियारों से उसे मार गिराया जाता है।

अब इन सभी उपायों के साथ एंटी-ड्रोन केज को भी शामिल किया जा रहा है। जो “लेयर्ड डिफेंस” यानी बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। (Indian Army Anti Drone Cages)

पहले टैंकों पर भी लगाए जा चुके हैं ऐसे केज

रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना इससे पहले टी-90 भीष्म टैंक, अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक और कुछ अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म पर भी ऐसे सिक्योरिटी स्ट्रक्चर का ट्रायल और इस्तेमाल कर चुकी है। अब पहली बार टोड आर्टिलरी गनों पर इस तरह का सिस्टम लगाया गया है। एंटी-ड्रोन केज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी लागत अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इससे हथियार प्रणाली की सुरक्षा काफी बढ़ जाती है। इसे स्थानीय स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग हथियारों पर लगाया जा सकता है।

इसके अलावा यदि किसी केज को नुकसान पहुंचता है तो उसे बदलना भी आसान होता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं अब इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था को तेजी से अपना रही हैं। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

बदलते युद्ध के मुताबिक बदल रही सेना

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना लगातार बदलते बैटलफील्ड के अनुभवों का अध्ययन कर रही है और उसी के अनुसार अपने हथियारों तथा सैन्य प्लेटफॉर्म में जरूरी बदलाव कर रही है। राइजिंग स्टार कोर द्वारा टो की गई आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

सेना के अनुसार, इसका उद्देश्य फॉरवर्ड एरिया में तैनात महत्वपूर्ण हथियारों की सुरक्षा बढ़ाना, गन क्रू को अतिरिक्त संरक्षण देना और ड्रोन जैसे नए खतरों के खिलाफ ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत करना है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग सेक्टर में चीनी सेना की घुसपैठ! PLA ने बनाई सड़क, पुल और मिलिट्री कैंप, देखें एक्सक्लूसिव फोटो

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment:
Image Source: All Images Raksha Samachar Exclusive

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment: अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताकसिंग सेक्टर से सटे कुछ इलाकों में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने ‘कब्जा’ कर लिया है। स्थानीय सामाजिक संगठन नाह वेलफेयर सोसायटी (एनडब्ल्यूएस) ने जिला प्रशासन को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि चीन सीमा से लगे कई इलाकों में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है। संगठन का कहना है कि जिन इलाकों का इस्तेमाल स्थानीय लोग वर्षों से चराई, शिकार और जंगल से वन उपज इकट्ठा करने के लिए करते रहे हैं, वहां अब पीएलए ने सड़कें, पुल और सैन्य शिविर बना लिए हैं। वहीं, भारतीय सेना ने चीनी सेना के घुसपैठ करने और सैन्य शिविर बनाने संबंधी मीडिया रिपोर्टों को खारिज किया है।

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment: जिला प्रशासन को भेजा पत्र

रक्षा समाचार को मिली जानकारी के मुताबिक नाह वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष केरू चादेर ने 25 जून को अपर सुबनसिरी के डिप्टी कमिश्नर को एक पत्र भेजा है। इस पत्र का विषय भारतीय सीमा के भीतर कथित चीनी सैन्य शिविरों की स्थापना बताया गया है।

रक्षा समाचार के पास उस पत्र की कापी मौजूद है। साथ ही चीनी कब्जे वाले इलाकों के फोटोग्राफ भी मौजूद हैं।

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

पत्र में कहा गया है कि ताकसिंग सर्कल के सीमावर्ती इलाकों में पिछले कई सालों से पीएलए अपनी गतिविधियां लगातार बढ़ा रही है। संगठन का आरोप है कि चीन केवल सीमा के पास गश्त तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने कई रणनीतिक स्थानों पर सड़कें, पुल और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार कर लिया है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन जगहों पर कुछ साल पहले तक हमारे लोग शिकार करते थे, जंगल से वन उपज इकट्ठा करते थे और अपने पशु चराते थे, वे इलाके अब चीनी पीएलए के कब्जे में बताए जा रहे हैं। संगठन ने इसे स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। वेलफेयर सोसाइटी ने लिखा है कि हमारा मानना है कि उनका उद्देश्य सीमा के पास ज्यादा से ज्यादा जमीन पर अपनी मौजूदगी बढ़ाना है। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

किन इलाकों का किया गया जिक्र

पत्र में कुछ विशेष स्थानों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें स्थानीय संगठन ने संवेदनशील बताया है। इनमें आसाफिला क्षेत्र का ओयिंग (2445), चुजार्टा क्षेत्र का पनियार, मरनाफे का मरपान, पोत्रांग झील और टिंगडिंगटांग जैसे इलाके शामिल हैं।

नाह वेलफेयर सोसायटी का दावा है कि ये सभी स्थान ताकसिंग मुख्यालय के काफी करीब हैं। संगठन का आरोप है कि इन इलाकों में पीएलए ने सैन्य शिविर स्थापित किए हैं और वहां तक पहुंचने के लिए सड़क तथा अन्य बुनियादी ढांचा भी तैयार किया गया है।

सूत्रों के मुताबिक, संगठन ने यह भी दावा किया है कि इनमें से कुछ इलाके वर्ष 2020 से पहले भारतीय नियंत्रण में थे और स्थानीय लोग वहां नियमित रूप से जाते थे। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

चरागाह और पारंपरिक जमीन को लेकर चिंता

पत्र में सबसे ज्यादा चिंता स्थानीय लोगों की पारंपरिक जमीन को लेकर जताई गई है। संगठन का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग सालों से इन इलाकों का इस्तेमाल पशुओं की चराई, जंगल से लकड़ी और अन्य वन उत्पाद इकट्ठा करने तथा पारंपरिक गतिविधियों के लिए करते रहे हैं।

पत्र के अनुसार, अब इन क्षेत्रों में पीएलए की मौजूदगी बढ़ने से स्थानीय लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई है। संगठन ने दावा किया है कि कई चरागाह अब उनके उपयोग में नहीं रह गए हैं।

इसके अलावा पत्र में कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले स्थलों का भी उल्लेख किया गया है। संगठन का कहना है कि इन क्षेत्रों का स्थानीय समुदाय के लिए विशेष महत्व है। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

पिछले 10 से 15 सालों की गतिविधियों का जिक्र

नाह वेलफेयर सोसायटी ने अपने पत्र में कहा है कि ताकसिंग सेक्टर में पिछले 10 से 15 वर्षों के दौरान चीन की गतिविधियों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। संगठन के मुताबिक, पहले जहां सीमावर्ती इलाकों में केवल सीमित गतिविधियां दिखाई देती थीं, वहीं अब सड़क निर्माण, पुलों का निर्माण और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि इन गतिविधियों की रफ्तार हाल के सालों में और बढ़ी है। इसी वजह से संगठन ने जिला प्रशासन से इस मामले को राज्य सरकार और केंद्र सरकार तक पहुंचाने का अनुरोध किया है। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

भारत सरकार से की ये मांग

सूत्रों के अनुसार, नाह वेलफेयर सोसायटी ने डिप्टी कमिश्नर से अनुरोध किया है कि इस पूरे मामले को अरुणाचल प्रदेश सरकार और भारत सरकार के सामने रखा जाए।

संगठन ने पत्र में कहा है कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की चिंताओं पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए। पत्र में यह भी लिखा गया है कि स्थानीय लोगों का भारतीय सेना पर पूरा भरोसा है, लेकिन स्थिति को देखते हुए सरकार के स्तर पर भी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।

संगठन ने यह भी कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा और स्थानीय समुदाय के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की जरूरत है। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

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ताकसिंग सेक्टर क्यों है रणनीतिक रूप से अहम

ताकसिंग अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले का एक दूरस्थ सीमावर्ती इलाका है। यह वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के करीब स्थित है और पूर्वी सेक्टर के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है।

खास बात यह है कि यह इलाका उन छह इलाकों में शामिल है जहां से 1962 में चीनी सेना ने घुसपैठ की थी। यह इलाका पहाड़ी भूभाग, घने जंगलों और सीमित सड़क संपर्क के कारण रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी क्षेत्र के पास आसाफिला पॉकेट भी स्थित है, जिसका कई सालों से सीमा विवाद के संदर्भ में उल्लेख होता रहा है।

भारत मैकमोहन रेखा को अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताता रहा है। इसी कारण पूर्वी सेक्टर में समय-समय पर अलग-अलग तरह के दावे और विवाद सामने आते रहे हैं। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

सीमा पर दोनों देशों का बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर

पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन दोनों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास अपने-अपने क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे का तेजी से विस्तार किया है।

चीन ने सीमा के निकट सड़कें, पुल, गांव और अन्य सैन्य सुविधाएं विकसित की हैं। दूसरी ओर भारत ने भी सीमा सड़क संगठन के जरिए सड़कों, पुलों और अन्य सैन्य संपर्क मार्गों का तेजी से निर्माण किया है। साथ ही सीमावर्ती गांवों को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न सरकारी योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है।

इसी कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी भी स्थानीय दावे या शिकायत को सुरक्षा के नजरिए से गंभीर माना जाता है और संबंधित एजेंसियां अपने स्तर पर उसका आकलन करती हैं। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

ताकसिंग के पास के इलाके का चीन ने बदला नाम

दरअसल, चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों के पहाड़ों, दर्रों, नदियों और छोटी बस्तियों के नाम बदलकर नई सूची जारी करता है। इसे वह “मानकीकृत भौगोलिक नाम” (स्टैंडर्डाइज्ड जियोग्राफिकल नेम्स) बताता है। विशेषज्ञ इसे चीन की “कार्टोग्राफिक एग्रेसन” यानी नक्शों के जरिए अपने दावे को मजबूत करने की रणनीति मानते हैं।

चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश को “जांगनान” यानी “दक्षिण तिब्बत” कहता है। उसका दावा है कि यह इलाका ऐतिहासिक रूप से तिब्बत का हिस्सा रहा है, जबकि भारत इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा मानता है।

हालांकि चीन ने अभी तक अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग का नाम आधिकारिक तौर पर नहीं बदला है। लेकिन ताकसिंग के आसपास के कुछ इलाकों के नाम वह पहले बदल चुका है। वर्ष 2023 में चीन ने अपनी तीसरी सूची जारी करते समय अपर सुबनसिरी जिले के पास स्थित चकमुत्से गांगरी नाम की एक चोटी का चीनी नाम घोषित किया था। यह इलाका ताकसिंग के काफी करीब माना जाता है।

चीन ने पहली बार अप्रैल 2017 में अरुणाचल प्रदेश के छह स्थानों के नाम बदले थे। इसके बाद दिसंबर 2021 में 15, अप्रैल 2023 में 11, मार्च 2024 में 30, मई 2025 में 27 और अप्रैल 2026 में 23 स्थानों के नए नाम जारी किए। इस तरह अब तक चीन अरुणाचल प्रदेश के कुल 112 स्थानों के नाम बदलने का दावा कर चुका है।

इन सूचियों में ज्यादातर नाम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास स्थित पहाड़ों, दर्रों, नदियों और छोटी बस्तियों के हैं। वर्ष 2023 की सूची में ताकसिंग के नजदीक स्थित चकमुत्से गांगरी का नाम भी शामिल था, लेकिन ताकसिंग का नाम अब तक किसी भी सूची में नहीं बदला गया है।

भारत हर बार चीन के इस कदम का विरोध करता है। विदेश मंत्रालय का कहना है कि केवल नाम बदल देने से जमीनी सच्चाई नहीं बदलती। भारत का स्पष्ट रुख है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। (Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment)

अपडेट (29-06-2026)

अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ को लेकर मीडिया में चल रही खबरों पर भारतीय सेना ने आधिकारिक तौर पर जवाब दिया है। भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी पीएलए द्वारा हाल में घुसपैठ करने और सैन्य शिविर बनाने संबंधी मीडिया रिपोर्टों को खारिज कर दिया है। सेना का कहना है कि मीडिया में प्रकाशित ये खबरें गलत हैं और इनमें कोई तथ्य नहीं है।

भारतीय सेना में बड़ा फेरबदल: नए VCOAS से लेकर सदर्न और साउथ वेस्टर्न कमांड को मिले नए कमांडर, LAC और स्ट्राइक कोर की कमान नए अधिकारियों के पास

Indian Army Leadership Reshuffle 2026
Lt Gen Sandeep Jain, Lt Gen Rajesh Pushkar, Lt Gen Mohit Malhotra and Lt Gen Manish Luthra

Indian Army Leadership Reshuffle 2026: एक जुलाई से भारतीय सेना में कई बड़े बदलाव होने जा रहे हैं। एक तरफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी के रिटायर होने के बाद जनरल धीरज सेठ नए आर्मी चीफ की जिम्मेदारी संभालेंगे। तो वहीं, सेना की दो महत्वपूर्ण ऑपरेशनल कमांड, सदर्न कमांड और साउथ वेस्टर्न कमांड को नए जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी-इन-सी) मिल रहे हैं। इसके अलावा सेना को नया वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ भी मिलेगा, जिसकी जिम्मेदारी भी तक जनरल धीरज सेठ के पास थी।

इसके साथ ही पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सुरक्षा संभालने वाली 14 कोर यानी फायर एंड फ्यूरी कोर और भारतीय सेन की 2 स्ट्राइक कोर का नेतृत्व भी बदल रहा है।

Indian Army Leadership Reshuffle 2026: सदर्न कमांड की जिम्मेदारी संभालेंगे लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर

लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर फिलहाल अंबाला स्थित 2 कोर यानी खड़गा कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग हैं। करीब 35 सालों का सैन्य अनुभव रखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल पुष्कर भारतीय सेना की आर्मर्ड कोर से आते हैं। वह 74 आर्मर्ड रेजिमेंट, जिसे “डेजर्ट हॉक्स” के नाम से भी जाना जाता है, उसके कर्नल भी हैं। यह रेजिमेंट टी-90 मुख्य युद्धक टैंकों से लैस है।

सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अपने सैन्य करियर में ऑपरेशनल क्षेत्र में आर्मर्ड रेजिमेंट की कमान संभाली, एक स्ट्रैटेजिक इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड का नेतृत्व किया और पश्चिमी क्षेत्र में एक इन्फैंट्री डिवीजन की भी कमान संभाली। आर्मर्ड कोर के अधिकारी द्वारा इन्फैंट्री डिवीजन की कमान संभालना सेना में महत्वपूर्ण अनुभव माना जाता है क्योंकि इससे अलग-अलग प्रकार के युद्ध संचालन का व्यावहारिक अनुभव मिलता है।

विदेशों में भी निभा चुके हैं अहम जिम्मेदारी

रक्षा सूत्रों के अनुसार, लेफ्टिनेंट जनरल पुष्कर केवल फील्ड कमांड तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने भूटान में भारतीय सैन्य प्रशिक्षण दल में भी सेवा दी है। इसके अलावा वह मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास में डिफेंस अटैची भी रहे, जहां उनके पास आर्मेनिया और बेलारूस की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी थी।

उन्होंने सेना मुख्यालय में डायरेक्टर जनरल टेरिटोरियल आर्मी के रूप में भी कार्य किया। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट और नेशनल डिफेंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उन्होंने उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

सदर्न कमांड क्यों है इतनी महत्वपूर्ण

पुणे स्थित सदर्न कमांड भारतीय सेना की सबसे बड़े भौगोलिक इलाके वाली कमांड मानी जाती है। इसके अधीन महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात के कई हिस्से और केंद्र शासित प्रदेश आते हैं।

सूत्रों के अनुसार, यह कमांड केवल शांति क्षेत्र की जिम्मेदारी नहीं संभालती। बल्कि ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक सपोर्ट, सैन्य अभ्यास, तटीय सुरक्षा में सहयोग, आपदा राहत अभियान और स्ट्राइक फॉर्मेशन की तैयारी भी इसी कमांड की अहम जिम्मेदारी होती है।

युद्ध की स्थिति में दक्षिण भारत से सैनिकों, हथियारों और सैन्य उपकरणों की आवाजाही का बड़ा हिस्सा भी इसी कमांड के जरिए ऑपरेट किया जाता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

जयपुर स्थित साउथ वेस्टर्न कमांड को मिले नए कमांडर

भारतीय सेना की साउथ वेस्टर्न कमांड की जिम्मेदारी अब लेफ्टिनेंट जनरल मोहित मल्होत्रा संभालेंगे। वह फिलहाल कोलकाता स्थित ईस्टर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर कार्यरत हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल मल्होत्रा वर्ष 1989 में भारतीय सैन्य अकादमी से पास आउट होकर 47 आर्मर्ड रेजिमेंट में कमीशन हुए थे। अपने लंबे सैन्य करियर में उन्होंने आर्मर्ड रेजिमेंट, इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड, पटियाला स्थित पहली आर्मर्ड डिवीजन और जोधपुर स्थित 12 कोर की कमान संभाली है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल और सेना मेडल सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्होंने ब्रिटेन में एडवांस्ड कमांड एंड स्टाफ कोर्स भी किया है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा में अहम भूमिका

जयपुर स्थित साउथ वेस्टर्न कमांड भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल कमांड में गिनी जाती है। इसका जिम्मा राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों और गुजरात के कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा करना है।

यह इलाका खुले रेगिस्तान, लंबी सीमा और तेज गति से आर्मर्ड कॉम्बैट ऑपरेशंस के लिए जाना जाता है। इसलिए यहां आर्मर्ड फॉर्मेशन और मैकेनाइज्ड यूनिट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आर्मर्ड कोर के अधिकारी का इस कमांड का नेतृत्व संभालना रेगिस्तानी युद्ध संचालन के अनुभव के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

दोनों प्रमुख कमांड अब आर्मर्ड कोर अधिकारियों के पास

रक्षा सूत्रों के अनुसार, सदर्न कमांड और साउथ वेस्टर्न कमांड दोनों की जिम्मेदारी अब आर्मर्ड कोर के वरिष्ठ अधिकारियों के पास होगी। इससे पहले इन दोनों कमांड की जिम्मेदारी इन्फैंट्री पृष्ठभूमि के अधिकारी संभाल रहे थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय सेना में अलग-अलग हथियार शाखाओं के अधिकारियों को समय-समय पर विभिन्न कमांड देने की परंपरा रही है। इससे नेतृत्व का अनुभव व्यापक होता है और अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

पूर्वी लद्दाख में बदलेगा 14 कोर का नेतृत्व

इसी बीच भारतीय सेना की 14 कोर में भी नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है। लेह स्थित इस कोर का मुख्यालय दुनिया के सबसे ऊंचे सैन्य मुख्यालयों में गिना जाता है।

इसी कोर के जिम्मे पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा, सियाचिन ग्लेशियर और पूरे उच्च हिमालयी क्षेत्र में सैन्य संचालन की जिम्मेदारी होती है। इसी वजह से इसे “फायर एंड फ्यूरी कोर” के नाम से भी जाना जाता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, मौजूदा कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला अब नॉर्दर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ बनेंगे। उनकी जगह मेजर जनरल मदनराज पांडे पदोन्नति के बाद कोर कमांडर का पद संभालेंगे।

सबसे लंबे समय तक रहे 14 कोर कमांडर

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने करीब 24 महीने तक 14 कोर की कमान संभाली। यह सामान्य अवधि से काफी अधिक है।

आमतौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात कोर कमांडरों का कार्यकाल 13 से 15 महीने के बीच रहता है। कठिन मौसम, लगातार ऑपरेशनल दबाव और विशेष परिस्थितियों के कारण यहां लंबे समय तक एक ही अधिकारी की तैनाती कम देखने को मिलती है।

उनके कार्यकाल के दौरान भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

नए कोर कमांडर की भूमिका क्यों अहम होगी

सूत्रों के अनुसार, अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति बनी थी। इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं ने तय प्रक्रिया के तहत पीछे हटने का काम पूरा किया।

अब देपसांग के पांच और डेमचोक के दो पेट्रोलिंग प्वाइंट पर अप्रैल 2020 से पहले की तरह गश्त फिर शुरू हो चुकी है। हालांकि जिन इलाकों में पहले सैनिक पीछे हटे थे, वहां कुछ बफर जोन अभी भी बने हुए हैं।

पिछले महीने भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर बातचीत और समन्वय के लिए बने वर्किंग मैकेनिज्म यानी डब्ल्यूएमसीसी की बैठक भी हुई थी। सूत्रों का कहना है कि इसके बाद कोर कमांडर स्तर की अगली बैठक होने की संभावना है।

ऐसी स्थिति में भारतीय पक्ष का नेतृत्व नए कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मदनराज पांडे कर सकते हैं।

कोर कमांडर स्तर की इन बैठकों में सीमा पर सैनिकों की तैनाती, गश्त, आपसी समन्वय और तनाव कम करने से जुड़े सैन्य मुद्दों पर चर्चा होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन बने नए वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को भारतीय सेना का नया वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (वीसीओएएस) नियुक्त किया गया है। वह अब तक पुणे स्थित सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी-इन-सी) के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने 1 अप्रैल 2026 को सदर्न कमांड की कमान संभाली थी। इससे पहले इसी पद पर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ थे, जिन्हें बाद में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया गया और अब वे 30 जून से भारतीय सेना के नए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) का पद संभालेंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन भारतीय सेना की 13 महार रेजिमेंट से हैं। उन्हें 11 जून 1988 को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद सेना में कमीशन मिला था। करीब 38 वर्षों के सैन्य करियर में उन्होंने ऑपरेशनल, प्रशिक्षण और स्टाफ नियुक्तियों सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वह 1 अगस्त 2024 से महार रेजिमेंट के कर्नल भी हैं। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें साल 2022 में सेना मेडल (एसएम) और 2025 में अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) से सम्मानित किया गया।

उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला, भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून, डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन और केन्या के नेशनल डिफेंस कॉलेज से उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की है।

अपने लंबे सैन्य करियर के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने वर्ष 2022 में नॉर्दर्न कमांड की 16 कोर (पिवट कोर) की कमान संभाली। इसके बाद फरवरी 2024 से जून 2025 तक वह इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए), देहरादून के कमांडेंट रहे, जहां भविष्य के सैन्य अधिकारियों के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी उनके पास थी। जून 2025 से मार्च 2026 तक उन्होंने सदर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में काम किया और सेना की क्षमता बढ़ाने तथा फोर्स री-स्ट्रक्चरिंग से जुड़े कार्यों में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद 1 अप्रैल 2026 को उन्हें सदर्न कमांड का जीओसी-इन-सी नियुक्त किया गया।

लेफ्टिनेंट जनरल जैन ने ऑपरेशनल क्षेत्र में इन्फैंट्री बटालियन की कमान संभाली, स्ट्राइक कोर के तहत इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व किया और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स की कमान भी संभाली। इसके अलावा वह दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन के दौरान सेक्टर कमांडर रहे और इथियोपिया में मिलिट्री ऑब्जर्वर के रूप में भी सेवा दे चुके हैं। सेना मुख्यालय में उन्होंने मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट, मिलिट्री सेक्रेटरी ब्रांच और डायरेक्टर जनरल (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट) जैसे महत्वपूर्ण स्टाफ पदों पर भी काम किया। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

खड़गा कोर की कमान संभालेंगे लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा

लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा जल्द ही अंबाला स्थित भारतीय सेना की 2 कोर (खड़गा कोर) के नए जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) की जिम्मेदारी संभालेंगे। 2 कोर भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित स्ट्राइक कोर में से एक मानी जाती है। यह पश्चिमी मोर्चे पर जरूरत पड़ने पर तेज गति से सैन्य कार्रवाई करने वाली प्रमुख फॉर्मेशन है।

लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा इन्फैंट्री के वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह फिलहाल सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अक्टूबर 2025 में यह जिम्मेदारी संभाली थी। डीजीएमओ के तौर पर उनके पास देशभर में सेना के ऑपरेशनल प्लान, सैन्य अभियानों की निगरानी और रणनीतिक स्तर पर फैसलों से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य रहे हैं। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) से सम्मानित किया जा चुका है।

करीब 38 सालों के सैन्य करियर में लेफ्टिनेंट जनरल लूथरा ने फील्ड और सेना मुख्यालय दोनों जगह कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र में इंजीनियर ब्रिगेड की कमान संभाली, सीमा क्षेत्र में इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व किया और मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट में असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस के रूप में भी काम किया। डीजीएमओ बनने से पहले भी वह सैन्य अभियानों की योजना बनाने और ऑपरेशनल रणनीति तैयार करने से जुड़े रहे हैं।

रक्षा मामलों और भविष्य के युद्ध पर उनका अच्छा अनुभव माना जाता है। उन्होंने आधुनिक युद्ध, नई सैन्य तकनीक और भारतीय सेना की भविष्य की रणनीति जैसे विषयों पर कई महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिए हैं।

अंबाला स्थित 2 कोर (खड़गा कोर) भारतीय सेना की सबसे पुरानी और प्रमुख स्ट्राइक कोर में से एक है। यह वेस्टर्न कमांड के तहत काम करती है और जरूरत पड़ने पर पश्चिमी सीमा पर बड़े सैन्य अभियान चलाने की क्षमता रखती है। इस कोर में आर्मर्ड, मैकेनाइज्ड और अन्य लड़ाकू फॉर्मेशन शामिल हैं, जिन्हें तेजी से कार्रवाई के लिए तैयार रखा जाता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा की यह नियुक्ति हाल में हुए सेना के बड़े नेतृत्व बदलाव का हिस्सा है। वह लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर की जगह लेंगे, जिन्हें सदर्न कमांड का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ बनाया गया है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

चाहे चीन हो या पाकिस्तान, बैकचैनल बातचीत में क्यों आता है संघ के राम माधव का नाम? कोलंबो ट्रैक-2 मीटिंग में ISI की एंट्री!

India-Pakistan Track-2 Talks
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India-Pakistan Track-2 Talks: भारत और पाकिस्तान के बीच सरकारी स्तर पर औपचारिक बातचीत भले ही लंबे समय से रुकी हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच बैकचैनल संपर्क पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। इस सप्ताह श्रीलंका की राजधानी कोलंबो और थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 स्तर की बातचीत हुई। खास बात यह रही कि इन बैठकों भारत फाउंडेशन के अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे और पूर्व राजनयिक रुचि घनश्याम शामिल थीं। इन बैठकों में आतंकवाद, सिंधु जल संधि, संकट के समय दोनों देशों के बीच कम्युनिकेशन बनाए रखने की व्यवस्था और तनाव बढ़ने से रोकने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।

सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों का सबसे बड़ा उद्देश्य किसी नए समझौते पर पहुंचना नहीं था, बल्कि ऐसे संवाद के रास्ते खुले रखना था जिनका इस्तेमाल भविष्य में किसी संकट के दौरान किया जा सके। दोनों देशों के बीच आधिकारिक वार्ता अभी भी शुरू नहीं हुई है, लेकिन बैकचैनल स्तर पर बातचीत जारी रहने को दोनों पक्षों के बीच संपर्क बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

India-Pakistan Track-2 Talks: पाकिस्तान ही नहीं, चीन के साथ वार्ता में भी आया था राम माधव का नाम

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। यह एक थिंक-टैंक है, जो चीन के साथ ट्रैक-2 यानी अनौपचारिक संवाद के कई कार्यक्रम आयोजित करता रहा है। इस मंच के जरिए भारतीय और चीनी विशेषज्ञ, पूर्व अधिकारी और रणनीतिक मामलों के जानकार कई बार बातचीत कर चुके हैं। इसके तहत भारतीय प्रतिनिधिमंडल शंघाई और ल्हासा जैसे शहरों का भी दौरा कर चुका है।

राम माधव ने भारत-चीन संबंधों, सीमा विवाद और गलवान जैसी घटनाओं पर कई लेख भी लिखे हैं। उनका मानना रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर सख्त रुख बनाए रखते हुए भी बातचीत के रास्ते खुले रहने चाहिए।

इसी वजह से जब भी चीन या पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2 या बैकचैनल बातचीत की खबर आती है, तो राम माधव का नाम अक्सर चर्चा में रहता है। पाकिस्तान के मामले में वह हाल में कोलंबो में हुई ट्रैक-2 बैठक में शामिल हुए थे, जबकि चीन से जुड़े कई अनौपचारिक संवादों में भी वह पहले हिस्सा ले चुके हैं। (India-Pakistan Track-2 Talks)

सरकारी बातचीत बंद, लेकिन बैकचैनल संपर्क जारी

भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद और अधिक तनावपूर्ण हो गए थे। उस हमले में 20 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें अधिकांश पर्यटक थे। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की। 10 मई 2025 को संघर्ष विराम लागू होने के बाद सीमा पर हालात को शांत हो गए, लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते सामान्य नहीं हो सके।

भारत पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर या अन्य औपचारिक सरकारी वार्ताएं अभी भी शुरू नहीं हुई हैं। व्यापार सीमित है, दोनों देशों के उच्चायोग कम स्टाफ के साथ काम कर रहे हैं और लोगों के बीच आवाजाही भी पहले की तुलना में काफी कम है।

इसी माहौल में ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 जैसी अनौपचारिक बातचीत दोनों देशों के बीच संवाद का एकमात्र सक्रिय माध्यम बनी हुई है। (India-Pakistan Track-2 Talks)

क्या होती है ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 बातचीत

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ट्रैक-1 बातचीत वह होती है जिसमें दोनों देशों के मौजूदा सरकारी अधिकारी सीधे बातचीत करते हैं। इसमें विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय या अन्य सरकारी एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

इसके विपरीत ट्रैक-2 संवाद पूरी तरह अनौपचारिक होता है। रिटायर्ड डिप्लोमेट्स पूर्व सैन्य अधिकारी, रणनीतिक मामलों के जानकार, शिक्षाविद, पत्रकार और थिंक टैंक से जुड़े लोग हिस्सा लेते हैं। इन बैठकों में कोई आधिकारिक समझौता नहीं होता, लेकिन संवेदनशील मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है।

ट्रैक-1.5 को दोनों के बीच का मॉडल माना जाता है। इसमें गैर-सरकारी विशेषज्ञों के साथ कुछ मौजूदा सरकारी अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि वे आधिकारिक वार्ताकार की भूमिका में नहीं होते। (India-Pakistan Track-2 Talks)

कोलंबो बैठक में किन लोगों ने लिया हिस्सा

सूत्रों के अनुसार, कोलंबो में आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने अलग से डेढ़ दिन तक बातचीत की। यह सम्मेलन लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) की ओर से आयोजित किया गया था।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में भारत फाउंडेशन के अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे और पूर्व राजनयिक रुचि घनश्याम शामिल थीं।

सूत्रों के मुताबिक, 21 से 24 जून के बीच श्रीलंका दौरे पर रहे अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री एस. पॉल कपूर ने आईआईएसएस की ओर से आयोजित सम्मेलन के प्रतिभागियों के लिए रखे गए रात्रिभोज में हिस्सा लिया। इस सीमित आमंत्रण वाले कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान के कुछ प्रतिनिधि भी मौजूद थे।

पाकिस्तान की ओर से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व राजदूत शेरी रहमान, बॉलिवुड एक्टर सैफ अली खान के चाचा रिटायर्ड मेजर जनरल इस्फंदियार अली खान पटौदी और विदेश मंत्रालय के दक्षिण एशिया एवं सार्क प्रभाग के महानिदेशक सज्जाद हैदर खान मौजूद थे।

बता दें कि शेरी रहमान 2011 से 2013 के बीच अमेरिका में पाकिस्तान की राजदूत भी रह चुकी हैं। वहीं, मेजर जनरल पटौदी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई में भी सेवाएं दे चुके हैं और सेना में एक मैकेनाइज्ड डिवीजन की कमान संभाल चुके हैं। पीपीपी, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की ओर से एक मौजूदा अधिकारी की मौजूदगी के कारण कुछ हलकों में इसे ट्रैक-1.5 संवाद भी कहा गया, हालांकि भारती की तरफ से कोई मौजूदा सरकारी अधिकारी बैठक में शामिल नहीं था।

आतंकवाद और जल विवाद पर हुई खुल कर चर्चा

बैठक में आतंकवाद सबसे महत्वपूर्ण विषयों में रहा। दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार रखे। इसके अलावा सीमा पार नदियों के जल बंटवारे और सिंधु जल संधि से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

सूत्रों के अनुसार, संकट के समय दोनों देशों के बीच संवाद व्यवस्था को मजबूत करने और सैन्य तनाव को बढ़ने से रोकने के तरीकों पर भी विस्तार से विचार हुआ।

बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि इन अनौपचारिक बैठकों से निकलने वाले विचारों को भविष्य में औपचारिक ट्रैक-1 स्तर तक किस तरह पहुंचाया जा सकता है। हालांकि इस विषय पर कोई औपचारिक निर्णय सामने नहीं आया।

बैठक से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस दौर की बातचीत से कोई बड़ा या ठोस परिणाम सामने नहीं आया। इसे मुख्य रूप से संपर्क बनाए रखने और दोनों पक्षों की सोच समझने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया।

पाकिस्तानी मीडिया में ऐसी खबरें भी सामने आईं कि भारत ने सिंधु जल संधि बहाल करने के बदले पाकिस्तान से अपना हवाई क्षेत्र खोलने की बात कही थी। हालांकि बैठक में शामिल एक पाकिस्तानी प्रतिभागी ने इन दावों से इनकार किया और कहा कि ऐसी कोई पेशकश नहीं की गई। (India-Pakistan Track-2 Talks)

बैंकॉक में भी हुई थी बातचीत

सूत्रों के अनुसार, कोलंबो के अलावा बैंकॉक में भी इसी सप्ताह भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच ट्रैक-2 स्तर की चर्चा हुई। वहां भी क्राइसिस मैनेजमेंट, आतंकवाद, जल विवाद और संवाद के चैनल खुले रखने पर चर्चा हुई।

इन बैठकों में दोनों पक्षों ने मौजूदा हालात पर अपने-अपने दृष्टिकोण रखे। साथ ही यह भी चर्चा हुई कि यदि भविष्य में किसी तरह का तनाव पैदा होता है तो संचार व्यवस्था किस प्रकार सक्रिय रखी जा सकती है। (India-Pakistan Track-2 Talks)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का है सपोर्ट

बैठक में जो चेहरा बार-बार सामने आ रहा है वह है संघ के पूर्व प्रचारक राम माधव का। खास बात यह है कि वे इससे पहले चीन से वार्ता शुरू होने से पहले उन्होंने ही ट्रैक-2 की डिप्लोमेसी को लीड किया था। रक्षा समाचार ने इसकी खबर भी प्रकाशित की थी। “China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात।” यह दौरा देशों के नेताओं और विशेष प्रतिनिधियों डोभाल और वांग यी के बीच हुई बैठक से पहले हुआ था, जिसमें पूर्वी लद्दाख में तनाव को कम करने और डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत की गई थी।

इससे पहले मई और जून में संघ के दो बड़े नेताओं ने पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर अहम बातें कही थीं। संघ का मानना है कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए।

संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने मई 2026 में कहा था कि अगर पाकिस्तान पुलवामा जैसे आतंकी हमलों की कोशिश करता है, तो भारत को उसका कड़ा जवाब देना चाहिए। देश की सुरक्षा और सम्मान सबसे पहले हैं।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि बातचीत के सभी रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच हमेशा संवाद का कोई न कोई माध्यम खुला रहना चाहिए। इसी वजह से राजनयिक संबंध, व्यापार और वीजा जैसी व्यवस्थाएं पूरी तरह खत्म नहीं की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच आपसी संपर्क बढ़ने से तनाव कम हो सकता है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्ते हैं और कभी दोनों एक ही देश का हिस्सा थे। उनका मानना है कि लोगों के बीच बातचीत भविष्य में रिश्ते सामान्य बनाने में मदद कर सकती है।

वहीं, जून 2026 में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने होसबोले के बयान का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि भारत का बंटवारा गलत था। वहां कुछ पत्रकार और बुद्धिजीवी भी हैं जो संघ के काम की सराहना करते हैं। उनका कहना था कि पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग भी है जो दो-राष्ट्र सिद्धांत से सहमत नहीं है और मानता है कि दोनों देशों का साथ रहना बेहतर होता।

भागवत ने कहा कि अगर भविष्य में कभी भारत किसी युद्ध में पाकिस्तान पर बड़ी जीत हासिल करता है, तो वहां के लोगों के साथ शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए बातचीत जरूरी होगी। इसलिए संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि “हम हिटलर जैसे नहीं हैं।” उनका मतलब था कि भारत की सोच बदले की नहीं, बल्कि न्याय और शांति की है। इसलिए जहां जरूरी हो, वहां बातचीत के लिए कुछ रास्ते खुले रखने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा था कि संघ की अपनी अलग विदेश नीति नहीं है। पाकिस्तान के मामले में संगठन केंद्र सरकार की नीति का ही समर्थन करता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि होसबोले की बातें पाकिस्तान की सरकार या सेना के बारे में नहीं थीं, बल्कि वहां के आम लोगों के संदर्भ में थीं। (India-Pakistan Track-2 Talks)

राम माधव ने किया इनकार

हालांकि राम माधव का कहना है कि इस पूरे मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनके मुताबिक, यह भारत और पाकिस्तान के बीच कोई अलग ट्रैक-2 वार्ता नहीं थी, बल्कि इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) का हर साल होने वाला दक्षिण एशिया सुरक्षा सम्मेलन था। इसमें भारत, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान समेत कई देशों के विशेषज्ञ और प्रतिनिधि शामिल हुए थे। पहले भी इस सम्मेलन में विभिन्न देशों के सरकारी अधिकारी हिस्सा लेते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ट्रैक-2 वार्ता सिर्फ दो देशों के बीच होती है, जबकि इस सम्मेलन में कई देशों के प्रतिभागी मौजूद थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पूरे दो दिन चली बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। उन्हें केवल एक सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। अपना संबोधन देने के बाद वह वहां से लौट आए। उनके अनुसार, इस पूरे मामले को बेवजह सनसनीखेज बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तव में इसमें कोई नई या विशेष कहानी नहीं है। (India-Pakistan Track-2 Talks)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़े बैकचैनल संपर्क

सूत्रों के अनुसार, मई 2025 के सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच कई बैकचैनल बैठकें हो चुकी हैं। इनमें लंदन, दोहा, पश्चिम एशिया के कुछ अन्य शहर और अब कोलंबो तथा बैंकॉक शामिल हैं।

इन बैठकों में हर बार प्रतिभागियों की सूची अलग रही है। कभी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी शामिल हुए तो कभी पूर्व राजनयिक, सांसद, रणनीतिक विशेषज्ञ और थिंक टैंक से जुड़े लोग भी बातचीत का हिस्सा बने।

इन बैठकों का मकसद औपचारिक वार्ता की जगह लेना नहीं बल्कि ऐसे संवाद को जारी रखना है जिससे दोनों देशों के बीच पूरी तरह संपर्क समाप्त न हो। (India-Pakistan Track-2 Talks)

भारत का रुख पहले जैसा

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इन बैकचैनल संपर्कों को किसी भी तरह औपचारिक सरकारी वार्ता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का रुख पहले जैसा ही है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद जारी रहेगा, तब तक औपचारिक बातचीत संभव नहीं है।

सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच इस समय केवल सैन्य स्तर पर डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ हॉटलाइन जैसे सिस्टम एक्टिव हैं। दोनों देशों के डीजीएमओ नियमित रूप से हर बुधवार को तय प्रक्रिया के तहत संपर्क बनाए रखते हैं ताकि सीमा पर किसी गलतफहमी की स्थिति न बने। (India-Pakistan Track-2 Talks)

संवाद के लिए न्यूट्रल देशों का चयन

भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली अधिकांश ट्रैक-2 बैठकों के लिए ऐसे देशों का चयन किया जाता है जो दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य हों। श्रीलंका, कतर, थाईलैंड और कुछ पश्चिम एशियाई देशों में पहले भी ऐसी बैठकें होती रही हैं।

ऐसी बैठकों का आयोजन आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, शोध संस्थान या सुरक्षा सम्मेलन आयोजित करने वाले संगठन करते हैं। सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग से मुलाकात कर संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते हैं।

इस बार भी कोलंबो में आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने अलग बैठकें कीं। इसमें किसी संयुक्त बयान या आधिकारिक दस्तावेज की जानकारी सामने नहीं आई। (India-Pakistan Track-2 Talks)

सार्वजनिक पुष्टि से दोनों पक्षों ने बनाई दूरी

दिलचस्प बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान, दोनों सरकारों ने इन बैठकों पर सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के एक अधिकारी ने मीडिया से कहा कि उन्हें ट्रैक-1 के अलावा किसी बैठक की जानकारी नहीं है। वहीं भारत सरकार की ओर से भी इस विषय पर कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया।

सूत्रों का कहना है कि ट्रैक-2 या ट्रैक-1.5 बैठकों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि उन्हें आमतौर पर सार्वजनिक प्रचार से दूर रखा जाता है। यही वजह है कि प्रतिभागियों के नाम और चर्चा के पूरे विवरण भी सीमित स्तर पर ही सामने आते हैं। (India-Pakistan Track-2 Talks)

भारत बना रहा ‘नेशनल सबमरीन’ इकोसिस्टम, न्यूक्लियर और डीजल पनडुब्बियों में होगा एक जैसा ही ‘दिमाग’

Indian Navy submarine programme
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Indian Navy submarine programme: भारतीय नौसेना आने वाली दो अलग श्रेणी की पनडुब्बियों के लिए एक जैसी स्वदेशी तकनीक, सेंसर, कॉम्बैट सिस्टम और हथियारों का स्ट्रक्चर तैयार करने पर काम कर रही है। इसमें प्रोजेक्ट-76 की पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां और प्रोजेक्ट-77 की न्यूक्लियर अटैक सबमरीन शामिल हैं। दोनों का साइज, इंजन और ऑपरेशनल रोल तो अलग होगा, लेकिन इनके कई अहम सिस्टम एक जैसे ही रखे जाने की योजना है।

सूत्रों के अनुसार, नौसेना ऐसा स्ट्रक्चर बनाना चाहती है जिसमें पनडुब्बियों के सेंसर, वेपन कंट्रोल सिस्टम, सोनार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, ऑप्ट्रॉनिक मास्ट, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े रहें। इससे अलग-अलग विदेशी कंपनियों के सिस्टम पर निर्भरता घटेगी और पनडुब्बियों के पूरे सर्विस पीरियड में स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड तथा मरम्मत का काम आसान होगा।

यह मॉडल भारतीय नौसेना के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पनडुब्बी किसी भी देश की सबसे जटिल सैन्य प्रणाली मानी जाती है। पानी के नीचे काम करने वाले इस प्लेटफॉर्म में शोर कम रखना, दुश्मन को पहले पहचानना और खुद को छिपाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में एक ही तरह के स्वदेशी सिस्टम डेवलप करने से नौसेना को लंबे समय तक टेक्नोलॉजी कंट्रोल अपने हाथ में रखने में मदद मिलेगी।

Indian Navy submarine programme: दो अलग पनडुब्बियां, लेकिन कई सिस्टम एक जैसे

प्रोजेक्ट-77 के तहत भारत न्यूक्लियर पावर्ड अटैक सबमरीन (एसएसएन) डेवलप कर रहा है। दूसरी तरफ प्रोजेक्ट-76 के तहत अगली पीढ़ी की पारंपरिक पनडुब्बियां (एसएसके) बनाई जानी हैं। एसएसएन में न्यूक्लियर रिएक्टर होता है, जबकि एसएसके डीजल-इलेक्ट्रिक और एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन जैसी तकनीकों पर चलती हैं।

न्यूक्लियर पनडुब्बी लंबे समय तक समुद्र में रह सकती है और तेज रफ्तार से दूरदराज के समुद्री क्षेत्रों तक पहुंच सकती है। पारंपरिक पनडुब्बियां तटीय इलाकों, समुद्री मार्गों और संकरे क्षेत्रों में चुपचाप निगरानी तथा हमला करने में इस्तेमाल की जाती हैं। दोनों की भूमिका अलग होने के बावजूद नौसेना इनमें लगे कई सिस्टम समान रखना चाहती है।

सूत्रों का कहना है कि इस कॉमन सिस्टम अप्रोच में कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, सोनार, ऑप्ट्रॉनिक मास्ट, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स, कम्युनिकेशन सिस्टम, टॉरपीडो कंट्रोल, स्टेल्थ मटेरियल और कुछ बैटरी तथा पावर मैनेजमेंट तकनीक शामिल हो सकती हैं। (Indian Navy submarine programme)

कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम होगा पनडुब्बी का दिमाग

किसी पनडुब्बी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम होता है। इसे ‘पनडुब्बी का दिमाग’ भी कहा जा सकता है। यह सिस्टम सोनार, रडार, पेरिस्कोप, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर, नेविगेशन उपकरण और कम्युनिकेशन सिस्टम से आने वाली जानकारी को एक जगह जोड़ता है।

जब पनडुब्बी समुद्र के अंदर होती है तो उसके सामने कई तरह के संकेत आते हैं। किसी जहाज का इंजन, दूसरे पनडुब्बी का प्रोपेलर, समुद्री जीवों की आवाज, रडार सिग्नल या रेडियो ट्रांसमिशन, सभी अलग-अलग प्रकार की जानकारी देते हैं। कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम इन संकेतों को समझकर ऑपरेटर को बताता है कि सामने मौजूद टारगेट किस तरह का हो सकता है।

यही सिस्टम टारगेट को ट्रैक करने, टॉरपीडो लॉन्च करने, मिसाइल फायर करने और मिशन की प्राथमिकता तय करने में मदद करता है। नौसेना का सोचना है कि प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में एक जैसी मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और ऑपरेटर कंसोल लगाए जाएं। इससे एक पनडुब्बी पर तैनात कर्मी दूसरी पनडुब्बी पर भी जल्दी काम कर सकेंगे।

कॉमन कॉम्बैट सिस्टम का दूसरा फायदा सॉफ्टवेयर अपग्रेड में होगा। किसी नए सेंसर या हथियार को जोड़ने के लिए अलग-अलग विदेशी सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। भारतीय कंपनियां और डिफेंस लैब्स जरूरत के अनुसार सिस्टम में बदलाव कर सकेंगी। (Indian Navy submarine programme)

पुराने पेरिस्कोप की जगह ऑप्ट्रॉनिक मास्ट

पनडुब्बी में पेरिस्कोप का इस्तेमाल समुद्र की सतह पर मौजूद गतिविधियों को देखने के लिए किया जाता है। पुराने पेरिस्कोप सीधे प्रेशर हल के अंदर तक आते थे। इससे पनडुब्बी के अंदर जगह और मैकेनिकल सिस्टम की जरूरत बढ़ती थी।

नई पनडुब्बियों में नॉन-पेनेट्रेटिंग ऑप्ट्रॉनिक मास्ट इस्तेमाल करने की योजना है। इसका मतलब है कि मास्ट का कैमरा और सेंसर ऊपर की तरफ होंगे, लेकिन वह सीधे प्रेशर हल के अंदर नहीं आएगा। इससे पनडुब्बी के डिजाइन में ज्यादा आसानी होगी।

सूत्रों के अनुसार, इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (आईआरडीई) के बनाए ऑप्ट्रॉनिक मास्ट में हाई-डेफिनिशन कैमरा, थर्मल इमेजिंग, इन्फ्रारेड सेंसर और डिजिटल जूम जैसी तकनीक शामिल हो सकती है। यह जानकारी फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क के जरिए कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम तक पहुंचेगी।

थर्मल इमेजिंग रात में या कम रोशनी में जहाज, नाव और अन्य गर्म वस्तुओं की पहचान में मदद करती है। इन्फ्रारेड सेंसर से सतह पर मौजूद लक्ष्य का तापमान आधारित संकेत मिल सकता है। इस तरह ऑपरेटर को केवल आंख से देखने के बजाय डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा जानकारी मिलती है। (Indian Navy submarine programme)

सोनार से मिलेगी पानी के नीचे की जानकारी

पनडुब्बी के लिए सोनार उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना लड़ाकू विमान के लिए रडार। समुद्र के अंदर रडार काम नहीं करता, इसलिए पानी के भीतर मौजूद जहाजों और पनडुब्बियों की पहचान ध्वनि तरंगों से की जाती है। इस काम के लिए सोनार सिस्टम लगाया जाता है।

नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी यानी एनपीओएल के अनुभव पर आधारित इंटीग्रेटेड सोनार सिस्टम दोनों प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल किए जाने की योजना है। इसमें बो-माउंटेड सोनार, फ्लैंक अरे, टोड अरे और पैसिव इंटरसेप्ट सिस्टम जैसे उपकरण शामिल हो सकते हैं।

बो-माउंटेड सोनार पनडुब्बी के आगे वाले हिस्से में लगा होता है। फ्लैंक अरे पनडुब्बी के दोनों किनारों पर लगे सेंसर होते हैं, जो आसपास की आवाजों को पकड़ते हैं। टोड अरे एक लंबी केबल के साथ पीछे छोड़ा जाने वाला सेंसर सिस्टम होता है। यह पनडुब्बी के अपने शोर से दूर जाकर समुद्र की आवाजों को बेहतर ढंग से सुन सकता है।

पैसिव सोनार किसी ध्वनि तरंग को भेजता नहीं है। वह केवल दूसरी पनडुब्बी, जहाज या टॉरपीडो से निकलने वाली आवाज सुनता है। इसका फायदा यह है कि पनडुब्बी की पहचान नहीं हो पाती। इसी कारण पानी के नीचे युद्ध में पैसिव सोनार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indian Navy submarine programme)

वरुणास्त्र और तक्षक टॉरपीडो पर जोर

नौसेना की योजना स्वदेशी हैवीवेट टॉरपीडो को भी दोनों प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनाने की है। वरुणास्त्र टॉरपीडो भारतीय नौसेना के लिए विकसित स्वदेशी हैवीवेट टॉरपीडो है। इसे पनडुब्बी से लॉन्च कर दुश्मन के युद्धपोत या पनडुब्बी को निशाना बनाया जा सकता है।

इसके अलावा डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (एनएसटीएल) तक्षक नाम का नया इलेक्ट्रिक हैवीवेट टॉरपीडो डेवलप कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, इसमें स्विम-आउट लॉन्च और फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस जैसी तकनीक हो सकती है। स्विम-आउट लॉन्च का अर्थ है कि टॉरपीडो ट्यूब से कम शोर के साथ बाहर निकलता है, जिससे लॉन्च के समय पनडुब्बी की पता लगाना कठिन हो जाता है।

फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस में टॉरपीडो और पनडुब्बी के बीच एक पतला तार जुड़ा रहता है। पनडुब्बी का ऑपरेटर टारगेट की स्थिति बदलने पर टॉरपीडो को नया निर्देश भेज सकता है। यह तकनीक खासतौर पर ऐसे समुद्री क्षेत्र में उपयोगी होती है जहां कई जहाज और पनडुब्बियां मौजूद हों। (Indian Navy submarine programme)

प्रोजेक्ट-77: न्यूक्लियर अटैक सबमरीन का अलग है रोल

प्रोजेक्ट-77 के तहत बनने वाली न्यूक्लियर अटैक सबमरीन आकार में काफी बड़ी होंगी। कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने अक्टूबर 2024 में शुरुआती दो एसएसएन के निर्माण को मंजूरी दी थी। इन दोनों पनडुब्बियों के लिए करीब 40 हजार करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। नौसेना के लिए कुल छह न्यूक्लियर अटैक सबमरीन बनाई जानी हैं।

इनका डिस्प्लेसमेंट करीब 10 हजार टन तक हो सकता है। इनमें भारत में डेवलप प्रेशराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया जाएगा। न्यूक्लियर रिएक्टर पनडुब्बी को लगातार ऊर्जा देता है, इसलिए उसे बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती।

एसएसएन का मुख्य काम दुश्मन की पनडुब्बियों का पीछा करना, कैरियर बैटल ग्रुप की सुरक्षा करना, समुद्री मार्गों पर निगरानी रखना और लंबी दूरी के समुद्री मिशन करना होता है। इनका निर्माण विशाखापत्तनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर में किया जाना है। इसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका भी रहेगी।

प्रोजेक्ट-76 में एआईपी और लिथियम-आयन बैटरी

प्रोजेक्ट-76 के तहत भारत अपनी नई पारंपरिक पनडुब्बी डिजाइन कर रहा है। यह प्रोजेक्ट डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, इसका डिजाइन लगभग 3,000 टन श्रेणी का हो सकता है और इसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन, लिथियम-आयन बैटरी तथा टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च होने वाली लैंड अटैक क्रूज मिसाइल की क्षमता शामिल की जा सकती है।

एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन से पनडुब्बी को बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आकर हवा लेने की जरूरत कम हो जाती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी को कुछ समय बाद स्नॉर्कल के जरिए हवा लेनी पड़ती है। यह समय उसकी पहचान का खतरा बढ़ा सकता है। एआईपी सिस्टम से पानी के नीचे लंबे समय तक रहा जा सकता है।

लिथियम-आयन बैटरी पारंपरिक बैटरियों की तुलना में ज्यादा ऊर्जा जमा कर सकती है। इससे पनडुब्बी अधिक समय तक चुपचाप चल सकती है। हालांकि समुद्री उपयोग के लिए ऐसी बैटरियों में सुरक्षा, तापमान नियंत्रण और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। (Indian Navy submarine programme)

स्टेल्थ के लिए एनिकॉइक टाइल और पंप-जेट पर काम

पनडुब्बी युद्ध में सबसे अहम बात यह है कि दुश्मन को आपकी पनडुब्बी की आवाज न मिले। इसी के लिए हल के ऊपर एनिकॉइक टाइल लगाई जाती हैं। ये विशेष रबर जैसी परतें होती हैं, जो दुश्मन के एक्टिव सोनार से आने वाली ध्वनि तरंगों को सोखने या बिखेरने में मदद करती हैं।

इसके अलावा पंप-जेट प्रोपल्शन पर भी विचार किया जा रहा है। सामान्य प्रोपेलर पानी को घुमाकर पनडुब्बी को आगे बढ़ाता है, लेकिन तेज गति पर उससे कैविटेशन नाम का शोर पैदा हो सकता है। पंप-जेट में ब्लेड एक ढके हुए डक्ट के अंदर होते हैं। इससे शोर और कंपन कम करने में मदद मिलती है।

प्रोजेक्ट-77 में न्यूक्लियर प्रोपल्शन और प्रोजेक्ट-76 में डीजल-इलेक्ट्रिक तथा एआईपी सिस्टम अलग रहेंगे, लेकिन शोर कम करने वाली तकनीक, अकॉस्टिक मैनेजमेंट और स्टेल्थ मटेरियल को एक जैसा रखने की कोशिश की जा रही है। हाई-टेंसाइल स्टील जैसे महत्वपूर्ण मटेरियल में भी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर ध्यान है। (Indian Navy submarine programme)

पुराने अनुभवों से ली सीख

भारतीय नौसेना के पास अलग-अलग देशों की पनडुब्बियां रही हैं। रूस की किलो क्लास, जर्मन डिजाइन की एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां और फ्रांसीसी स्कॉर्पीन डिजाइन पर बनी कलवरी क्लास की पनडुब्बियों में अलग-अलग सिस्टम, स्पेयर और अपग्रेड व्यवस्था रही है। इससे रखरखाव का स्ट्रक्चर जटिल हो जाता है।

सूत्रों का कहना है कि इससे विदेशी निर्भरता कम होगी। किसी विदेशी प्लेटफॉर्म के लिए स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी दस्तावेज या अपग्रेड मंजूरी पर निर्भर रहने से लंबे समय में समस्या पैदा हो सकती है। यदि सप्लायर देश की नीति बदले या उत्पादन लाइन बंद हो जाए तो नौसेना के सामने मेंटेनेंस का संकट खड़ा हो सकता है।

इसी वजह से प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में स्वदेशी कॉम्बैट सिस्टम, सोनार, हथियार और सेंसर को प्राथमिकता दी जा रही है। दोनों प्रोजेक्टस में 90 से 95 फीसदी तक स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। (Indian Navy submarine programme)

एक जैसी तकनीक से ट्रेनिंग और रखरखाव आसान होगा

कॉमन सिस्टम का सीधा फायदा नौसेना के क्रू को मिलेगा। यदि दोनों पनडुब्बियों में डिस्प्ले, कंट्रोल कंसोल और सॉफ्टवेयर की मूल संरचना समान होगी तो प्रशिक्षण का समय कम हो सकता है। पनडुब्बी चालक दल को हर नई क्लास के लिए बिल्कुल अलग ऑपरेटिंग सिस्टम सीखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेंटेनेंस के स्तर पर भी एक जैसे टेस्ट उपकरण, सिमुलेटर, रिपेयर प्रक्रिया और स्पेयर सपोर्ट इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे नौसेना को अलग-अलग सप्लाई चेन बनाने की जरूरत कम होगी। रक्षा उद्योग के लिए भी यह बड़ा अवसर होगा क्योंकि डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी कंपनियों को लंबे समय तक एक ही तरह के सिस्टम के उत्पादन और अपग्रेड का काम मिल सकेगा। (Indian Navy submarine programme)

Exclusive: तेजस की तरह AMCA के इंजन पर भी बड़ा संकट! तीन गुना बढ़ी F-414 की कीमत, दूसरे विकल्प की तलाश शुरू!

AMCA MK1 GE F414 Engine
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

AMCA MK1 GE F414 Engine: लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस एमके-1ए की तरह भारत के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के इंजन को लेकर जबरदस्त पेंच फंस गया है। इस मामले से जुड़े सूत्रों ने रक्षा समाचार को बताया, अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस ने एएमसीए एमके-1 (AMCA MK1) में लगाए जाने वाले एफ-414 (F414-INS6) इंजन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी कर दी है। वहीं, जीई एयरस्पेस की इस मनमानी के बाद नए इंजन की तलाश शुरू हो गई है। अगर ऐसा होता है कि तेजस प्रोजेक्ट की तरह AMCA के प्रोटोटाइप बनाने में ही दो से तीन साल तक की देरी हो सकती है।

AMCA MK1 GE F414 Engine: टेक्निकल नेगोशिएशन पूरा, कमर्शियल नेगोशिएशन अटका!

जीई एयरोस्पेस और डीआरडीओ के बीच भारत में एफ-414 इंजन के निर्माण को लेकर टेक्निकल नेगोशिएशन पर अप्रैल में सहमति बन चुकी है। वहीं, मई से कमर्शियल नेगोशिएशन पर बातचीत शुरू हुई है।

रक्षा समाचार को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक, मई में नई दिल्ली में जीई अधिकारियों के साथ हुई इस बैठक में कॉस्टिंग को लेकर बातचीत की गई थी। इस दौरान जीई एयरोस्पेस ने एफ-414 की कीमतों में तीन गुना तक का इजाफा कर दिया है। यहां यह बात जाननी बेहद जरूरी है कि एफ-414 इंजन के लिए एचएएल और एडीए अलग-अलग नेगोशिएशन कर रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि पहले एफ-414 इंजन की अनुमानित कीमत करीब 70 से 80 करोड़ रुपये के बीच थी, लेकिन अब जीई एयरोस्पेस ने प्रति इंजन की लागत में लगभग तीन गुना तक बढ़ोतरी कर दी है।

कमर्शियल नेगोशिएशन में इंजन की प्रति यूनिट के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लाइसेंस मैन्युफैक्चरिंग, भारतीय प्रोडक्शन लाइन, क्वॉलिटी स्टैंडर्ड, स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर, ओवरहॉल, वारंटी, डिलीवरी शेड्यूल और कीमत बढ़ने का फॉर्मूला भी शामिल होता है। (AMCA MK1 F414 Engine)

पांच प्रोटोटाइप के लिए 15 इंजन की जरूरत

एएमसीए प्रोग्राम के प्रोटोटाइप फेज में पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप बनाने की योजना है। सूत्रों के अनुसार, ट्विन इंजन विमान होने के चलते प्रत्येक प्रोटोटाइप के लिए दो ऑपरेशनल इंजन और एक अतिरिक्त इंजन की जरूरत मानी गई है। इस तरह पांच प्रोटोटाइप के लिए कुल 15 इंजन की जरूरत है।

रक्षा समाचार को सूत्रों ने बताया कि कर्मशियल नेगोशिएशन के दौरान जब जीई ने बढ़ी हुई कीमतों का खुलासा किया तो डीआरडीओ-एडीए की नेगोशिएशन टीम को भी हैरानी हुई। जिसके बाद उन्होंने जीई से प्रोटोटाइप के लिए 15 के बजाए केवल 8 इंजन खरीदने की बात भी कही। लेकिन जीई एयरोस्पेस की टीम कीमतों को लेकर टस से मस भी नहीं हुई।

इस साल 27 मई को एएमसीए प्रोटोटाइप के लिए जारी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल में लिखा है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 30 महीने के भीतर पहली उड़ान का टारगेट रखा गया है। पांचों प्रोटोटाइप के साथ 84 महीनों में लगभग 1,800 टेस्ट सॉर्टी पूरी की जानी हैं। इन उड़ानों में एयरोडायनामिक्स, फ्लाइट कंट्रोल, इंजन परफॉरमेंस, रडार, सेंसर, वेपन और स्टेल्थ से जुड़े कई टेस्ट किए जाएंगे। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

असेंबली लाइन के लिए मांगे 6000 करोड़ रुपये

सूत्रों ने बताया कि जीई एयरोस्पेस ने एफ-414 इंजन के लिए भारत में एक डेडिकेटेड असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग लाइन बनाने का प्रस्ताव भी दिया है। लेकिन इसके बदले में जीई एयरोस्पेस ने 800 मिलियन डॉलर यानी 6000 करोड़ रुपये की मांग की है। इस असेंबली लाइन के जरिए एएमसीए एमके-1 के लिए इंजन बनाए जाएंगे।

सूत्रों ने बताया कि इस असेंबली लाइन के जरिए एफ-414 इंजन के साथ वायुसेना की तुरंत जरूरतों को पूरा करने के लिए एएमसीए एमके-1 के लगभग चार स्क्वॉड्रन बनाए जा सकते हैं। इन स्क्वाड्रनों में करीब 80 फाइटर जेट्स शामिल होंगे। इस तरह अकेले एएमसीए प्रोजेक्ट के लिए ही लगभग 200+ इंजन की जरूरत पड़ सकती है। वहीं यही इंजन फ्यूचर फाइटर जेट्स तेजस एमके-2 और TEDBF के लिए भी इस्तेमाल किए जाने हैं।

सूत्रों का कहना है कि असेंबली लाइन का सेटअप दो साल में पूरा करने की बात कही है। भारत में एफ-414 इंजन का निर्माण एचएएल की बेंगलुरु स्थित फैसिलिटी में लाइसेंस प्रोडक्शन सिस्टम के तहत किया जा सकता है। यह काम लगभग 1 अरब डॉलर (लगभग 9,470 करोड़ रुपये) के लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन एग्रीमेंट के तहत होगा।

हालांकि लाइसेंस प्रोडक्शन में इंजन का मूल डिजाइन जीई के पास रहेगा, लेकिन एचएएल को तय शर्तों के तहत भारत में इंजन बनाने की अनुमति मिलेगी। इसमें कुछ पार्ट्स भारत में बनाए जा सकते हैं, कुछ पार्ट्स विदेश से आ सकते हैं और अंतिम असेंबली भारत में की जा सकती है। भारत में बने पहले एफ-414 इंजन को साल 2029 के मध्य तक तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

इसमें प्रोडक्शन इक्विपमेंट्स, टेक्निकल डॉक्यूमेंट्स, ट्रेनिंग, सप्लाई चेन, क्वालिटी कंट्रोल और लाइसेंस शामिल है। एफ-414 के लिए पहले करीब 80 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात कही थी।

बता दें कि सरकार ने एएमसीए प्रोजेक्ट के तहत प्रोटोटाइप डेवलपमेंट फेज के लिए 15,803 रुपये की राशि तय की है। जिसे मार्च 2024 में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने मंजूरी दी थी। इसमें 5 फ्लाइंग प्रोटोटाइप बनाना, स्ट्रक्चरल टेस्टिंग, फ्लाइट टेस्टिंग, इंटीग्रेशन आदि शामिल है। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

एएमसीए के लिए दूसरे इंजन की तलाश!

सूत्रों के मुताबिक, एफ-414 की लागत बढ़ने के बाद डीआरडीओ एएमसीए एमके-1 के इंजन के लिए दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहा है। हालांकि इंजन बदलने का फैसला इतना आसान नहीं होता। क्योंकि यह विमान के डिजाइन, एयर इनटेक, वेट रेशियो, थ्रस्ट, इलेक्ट्रिकल पावर, फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन से जुड़ा होता है।

अगर ऐसा होता है तो क्या एएमसीए के डिजाइन में बदलाव होगा। तो इस पर सूत्रों ने बताया कि एएमसीए को डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह फ्रीज हो चुका है। दूसरे वेंडर से एएमसीए के डिजाइन के मुताबिक इंजन बनाने के लिए कहा जाएगा और ऐसा करना पॉसिबल है। इंजन बदलने से एयरक्राफ्ट के स्ट्रक्चर पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

फ्रांस की साफरान, ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस और जीई एयरोस्पेस ने भारत के सामने इंजन सहयोग को लेकर प्रस्ताव रखे हैं। साफरान और रोल्स-रॉयस की ओर से आईपीआर और 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की भी की गई है।

एएमसीए एमके-1 में एफ-414 इंजन का इस्तेमाल किया जाना है। यह शुरुआती प्रोटोटाइप, फ्लाइट टेस्ट और शुरुआती प्रोडक्शन बैच के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

इसके बाद एएमसीए एमके-2 के लिए अधिक ताकतवर 110 से 120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन की जरूरत है। इस इंजन को भारत और किसी विदेशी इंजन निर्माता के सहयोग से बनाने की योजना है। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

AMCA MK1 GE F414 Engine
Image Credit: Aero India 2025

एएमसीए एमके-1 के लिए क्यों चुना गया था एफ-414 इंजन

फिफ्थ जनरेशन एएमसीए भारत का प्रस्तावित ट्विन इंजन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री के सहयोग से डेवलप किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने मई 2025 में एएमसीए के लिए इंडस्ट्री पार्टनरशिप आधारित एक्जीक्यूशन मॉडल को मंजूरी दी थी। इस मॉडल में निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों की भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग लेने का मौका दिया गया है।

एएमसीए एमके-1 (AMCA MK1) के लिए दो जीई एफ-414-जीई-आईएनएस6 (F-414-GE-INS6) आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन लगाने की योजना बनाई गई थी। यही इंजन तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर प्रोग्राम (TEDBF) के लिए इस्तेमाल किया जाना है।

एएमसीए के शुरुआती एमके-1 वर्जन को दो एफ-414 इंजन के साथ डेवलप किया जाएगा। एफ-414 एक आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन है। आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल फाइटर जेट को तेज रफ्तार और अतिरिक्त थ्रस्ट देने के लिए किया जाता है।

एफ-414-आईएनएस6 लगभग 98 किलो न्यूटन थ्रस्ट देता है। चूंकि एएमसीए में दो इंजन होंगे, इसलिए विमान को कुल मिलाकर लगभग 196 किलो न्यूटन के आसपास आफ्टरबर्निंग थ्रस्ट मिल सकता है। यह थ्रस्ट विमान के वजन, हथियार, ईंधन, स्टेल्थ डिजाइन और फ्लाइट प्रोफाइल के हिसाब से महत्वपूर्ण होता है।

एफ-414 को शुरुआती चरण के लिए चुनने की एक वजह यह भी है कि यह आजमाया हुआ इंजन है। इस इंजन का इस्तेमाल अमेरिकी एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट, ईए-18जी ग्राउलर और साब ग्रिपेन-एफ जैसे फाइटर जेटों में किया जा चुका है। वहीं, भारत के लिए इसका आईएनएस6 वर्जन अलग कॉन्फिगरेशन के साथ आएगा। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

जीई ने क्यों बढ़ाई कीमतें

सूत्रों के अनुसार, जीई ने एफ-414 इंजन की कीमत बढ़ने के पीछे एयरोस्पेस ग्रेड मटेरियल्स, टाइटेनियम, कंपोजिट मटेरियल और इंजन में इस्तेमाल होने वाले विशेष कंपोनेंट्स की कीमतों में बढ़ोतरी को वजह बताया है। फाइटर जेट इंजन में सामान्य मेटल या साधारण पार्ट्स इस्तेमाल नहीं होते। इसके लिए बहुत उच्च तापमान सहने वाले टरबाइन ब्लेड, विशेष कोटिंग, प्रिसाइज मशीनिंग और महंगे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जरूरत होती है।

जीई एयरोस्पेस ने साल 2025 में अमेरिका में अपनी सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत करने के लिए करीब एक अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी।

सूत्रों का कहना है कि जीई एयरोस्पेस इंजन की कीमत के साथ उसकी पूरी सर्विस लाइफ का खर्च भी कॉन्ट्रैक्ट में शामिल करना चाहती है। एक फाइटर जेट इंजन करीब 20 से 30 साल तक सेवा में रह सकता है। इस दौरान स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर, ओवरहॉल, मेंटेनेंस, तकनीकी सहायता और भारतीय इंजीनियरों की ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती रहती है। कंपनी चाहती है कि इन सभी खर्चों को पहले से कमर्शियल डील में ध्यान में रखा जाए।

सूत्रों ने बताया कि जीई सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम और करेंसी फ्लक्चुएशन का असर भी कीमत में शामिल करना चाहती है। इंजन के कई महत्वपूर्ण पार्ट्स अलग-अलग देशों से आते हैं। यदि किसी देश में प्रोडक्शन रुकता है, कच्चे माल की कमी होती है या डॉलर-रुपये एक्सचेंज रेट में बड़ा बदलाव आता है, तो इंजन की लागत बढ़ सकती है। जीई इस जोखिम को अपने प्रॉफिट मार्जिन के साथ कवर करना चाहती है।

इसी वजह से प्राइस एस्केलेशन फॉर्मूला भी बातचीत का अहम हिस्सा बना हुआ है। इसका मतलब है कि अगर आने वाले वर्षों में महंगाई, कच्चे माल की कीमत या उत्पादन लागत बढ़ती है, तो इंजन की कीमत भी तय फॉर्मूले के अनुसार बढ़ सके। (AMCA MK1 F414 Engine)

प्राइवेट सेक्टर को मिली बड़ी भूमिका

एएमसीए प्रोग्राम में प्राइवेट सेक्टर की भी भूमिका होगी। रक्षा मंत्रालय के स्वीकृत एक्जीक्यूशन मॉडल के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) इंडस्ट्री पार्टनरशिप के साथ प्रोग्राम को आगे बढ़ाएगी। पांच प्रोटोटाइप के निर्माण के लिए तीन कंसोर्टिया पहले से शॉर्टलिस्ट हो चुके हैं। इनमें लार्सन एंड टुब्रो के साथ भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज के साथ बीईएमएल जैसे नाम शामिल हैं। इनमें से सबसे सस्ती और टेक्निकली योग्य बिड वाले कंसोर्टियम को ही चुना जाएगा।

इस मॉडल में एडीए विमान की डिजाइन अथॉरिटी बनी रहेगी, जबकि चुनी गई निजी कंपनी प्रोटोटाइप निर्माण, उत्पादन व्यवस्था, सप्लाई चेन और आगे की निर्माण क्षमता में अहम भूमिका निभाएगी। इसमें कंपनी आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी में नई ग्रीनफील्ड फैसिलिटी में एडीए के साथ मिल कर 5 प्रोटोटाइप और एक स्ट्रक्चरल टेस्ट आर्टिकल बनाएगी। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

कब से शुरू होगा एएमसीए का प्रोडक्शन

योजना के मुताबिक साल 2027 के आखिर तक एएमसीए के पहले प्रोटोटाइप की असेंबली शुरू करने का लक्ष्य है। पहला एएमसीए प्रोटोटाइप साल 2028 के आखिर तक रोलआउट करने का टारगेट रखा गया है। वहीं, एएमसीए की पहली उड़ान साल 2029 में कराने की योजना है। पहली उड़ान को मेडन फ्लाइट कहा जाता है।

पहले प्रोटोटाइप के बाद बाकी चार प्रोटोटाइप भी चरणबद्ध तरीके से तैयार किए जाएंगे। शुरुआती प्रोटोटाइप मुख्य रूप से विमान की उड़ान क्षमता, एयरफ्रेम, इंजन और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम की जांच के लिए होंगे। बाद के प्रोटोटाइप में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, हथियार, मिसाइल, सेंसर और दूसरे मिशन सिस्टम की टेस्टिंग की जा सकती है।

योजना के अनुसार वर्ष 2029 से 2031 के बीच पांचों प्रोटोटाइप तैयार किए जाने हैं। इनके साथ हजारों घंटे की टेस्टिंग होगी। वहीं, साल 2032 तक एएमसीए के शुरुआती सर्टिफिकेशन का लक्ष्य रखा गया है। शुरुआती सर्टिफिकेशन को इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस यानी आईओसी कहा जाता है। आईओसी मिलने के बाद एएमसीए एमके-1 का लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन शुरू हो सकता है।

मौजूदा योजना के मुताबिक एएमसीए एमके-1 के शुरुआती विमान साल 2033 से 2034 के बीच तैयार हो सकते हैं। जबकि साल 2035 के आसपास एएमसीए एमके-1 का फुल रेट प्रोडक्शन शुरू करने का लक्ष्य है। इसके बाद धीरे-धीरे स्क्वाड्रन बनाए जाएंगे। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

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Pakistan-China weapons deal
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Pakistan-China weapons deal: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सार्वजनिक मंचों पर अमेरिका के साथ बेहतरीन रिश्तों की बात करते रहे हैं। दोनों अमेरिका की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते। वहीं ट्रंप भी खुद को पाकिस्तान का सच्चा दोस्त बताते हैं। यहां तक कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका की जम कर तारीफ की थी। यहां तक कि शहबाज और मुनीर ने ट्रंप को नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित कर दिया था। लेकिन यह पाकिस्तान का दोगलापन है, जहां वो तरीफों के पुल बांध कर अमेरिका और ट्रंप का उल्लू बनाता है, तो वहीं जब हथियार खरीदने की बात आती है, तो उसे सिर्फ चीन ही याद आता है।

दरअसल पाकिस्तान की असली हथियार निर्भरता चीन पर टिकी हुई है, जबकि तुर्किएदूसरा महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार बनकर उभरा है। पाकिस्तान की रक्षा खरीद का रिकॉर्ड कुछ दूसरी ही तस्वीर दिखाता है। उसके लड़ाकू विमान, मिसाइल, एयर डिफेंस, ड्रोन, पनडुब्बी और गोला-बारूद से जुड़ी बड़ी जरूरतें चीन और तुर्किएसे पूरी हो रही हैं।

Pakistan-China weapons deal: सिपरी की रिपोर्ट ने खोली पोल

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी की मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के हथियार आयात में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस अवधि में पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का 80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। साल 2016 से 2020 के दौरान यह आंकड़ा पिछले पांच वर्ष की अवधि में 73 प्रतिशत था। सिपरी के मुताबिक पाकिस्तान दुनिया के बड़े हथियार आयातकों में शामिल रहा है और चीन उसका सबसे बड़ा डिफेंस सप्लायर बना हुआ है।

सिपरी के मार्च 2026 के आंकड़ों में पाकिस्तान दुनिया के प्रमुख हथियार आयातकों में पांचवे नंबर पर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की आयातित सैन्य क्षमता में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत तक पहुंच गई। जिसके बाद तुर्किए और नीदरलैंड का नंबर है। पाकिस्तान वायुसेना के जेएफ-17 लड़ाकू विमान, नौसेना की हंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार, मिसाइल और ड्रोन परियोजनाओं में चीन लंबे समय से मुख्य भागीदार है।

वहीं, तुर्किए भी 7 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे नंबर पर पाकिस्तान का दूसरा महत्वपूर्ण सप्लायर बनकर उभरा है। तुर्किए से ड्रोन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, गोला-बारूद और एयर डिफेंस से जुड़े उपकरणों पर सहयोग बढ़ा है। जिसके बाद 4.6 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ नीदरलैंड तीसरा देश है।

वहीं चौंकाने वाली वाली बात यह है कि ट्रंप के साथ गहरी दोस्ती का दंभ भरने वाला पाकिस्तान अपने दोस्त अमेरिका से बेहद कम हथियार खरीदता है। वहीं, पाकिस्तान चीन और तुर्किएके साथ संयुक्त उत्पादन, स्थानीय असेंबली, तकनीकी सहायता तथा गोला-बारूद उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दे रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद एयर डिफेंस पर जोर

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन नेटवर्क और लंबी दूरी की मारक क्षमता पर विशेष ध्यान दिया। इस दौरान चीन से एचक्यू सीरीज के एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और संबंधित मिसाइल उपकरणों की जरूरतों की समीक्षा की गई।

पाकिस्तान के पास पहले से चीनी एचक्यू-9/पी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है। यह लंबी दूरी का सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल लड़ाकू विमान, बड़े ड्रोन और कुछ प्रकार की मिसाइलों के खिलाफ किया जा सकता है। इसके साथ मध्यम और कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए जाते हैं, ताकि अलग-अलग ऊंचाई और दूरी पर आने वाले लक्ष्यों को ट्रैक किया जा सके।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने चीन से अतिरिक्त एचक्यू सीरीज की 12 एयर डिफेंस बैटरियों, एचक्यू-19 एयर डिफेंस सिस्टम, तथा एचक्यू-17 से संबंधित उपकरणों की खरीद पर काम तेज किया है। एचक्यू-17 को कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों के खिलाफ किया जाता है। लंबी दूरी के एचक्यू-9 जैसे सिस्टम के साथ छोटे रेंज के एयर डिफेंस सिस्टम लगाए जाते हैं, ताकि बड़े रडार और मिसाइल बैटरियों को ड्रोन या लो-फ्लाइंग हथियारों से सुरक्षा मिल सके। हालांकि इनमें से कुछ डिलीवर हो गई है, तो कुछ की डिलीवरी 2027 तक होनी है। (Pakistan-China weapons deal)

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तुर्किए से हिसार CUAS सिस्टम

पाकिस्तान और तुर्किए के बीच एयर डिफेंस सहयोग भी बढ़ा है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की तुर्किए के हिसार-1 सिस्टम और उससे जुड़े कमांड तथा रडार उपकरण खरीदे हैं। हिसार-1 काउंटर अनमैन्ड एरियर सिस्टम (C-UAS) है। इन्हें ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों जैसे टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए डेवलप किया गया है।

तुर्किए के एयर डिफेंस सिस्टमों में मोबाइल लॉन्चर, रडार और कमांड वाहन शामिल होते हैं। इनका एक लाभ यह है कि इन्हें सड़क मार्ग से तेजी से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। युद्ध के दौरान एयर डिफेंस यूनिट को एक ही जगह लंबे समय तक रखने से उसके निशाने पर आने का खतरा बढ़ता है। इसलिए मोबाइल सिस्टमों को तैनाती के बाद स्थान बदलने की क्षमता के हिसाब से डिजाइन किया जाता है।

पाकिस्तान के लिए तुर्किए से सहयोग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि दोनों देश ड्रोन, नौसेना और गोला-बारूद क्षेत्र में पहले से साथ काम कर रहे हैं। तुर्किए की रक्षा कंपनियां पाकिस्तान को केवल प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, रखरखाव और स्थानीय उत्पादन में भी मदद करती हैं। (Pakistan-China weapons deal)

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Sarforash Drone

लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन खरीदने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने हाल ही में विंग्ड इनोवेटिव सॉल्यूशंस से सरफरोश और यलगार नाम के दो ड्रोन खरीदे हैं। ये दोनों कैनिस्टर लॉन्च वाले कामिकेज ड्रोन और अलग-अलग रेंज के यूएवी हैं। इनकी रेंज 200 किलोमीटर, 340 किलोमीटर, 500 किलोमीटर और 1,000 किलोमीटर तक है। पाकिस्तान लंबे समय से सर्विलांस और स्ट्राइक ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

कैनिस्टर लॉन्च सिस्टम का मतलब है कि ड्रोन को एक बंद कंटेनर या ट्यूब में रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर उसे जमीन से, वाहन से या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। इसमें ड्रोन को खुले रनवे या बड़े लॉन्च क्षेत्र की जरूरत कम होती है। सैन्य इस्तेमाल में ऐसे सिस्टम का फायदा यह होता है कि उन्हें छिपाकर रखा जा सकता है और तेजी से तैनात किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान अलग-अलग वजन और वारहेड क्षमता वाले तीन से चार प्रकार के ड्रोन विकल्पों पर काम कर रहा है। इनमें फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता, जीपीएस बेस्ड नेविगेशन, जैसे फीचर हैं। (Pakistan-China weapons deal)

चीन से हाई एनर्जी लेजर सिस्टम

पाकिस्तान चीन से हाई एनर्जी लेजर वेपन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। इसकी रेंज 7 से 8 किलोमीटर बताई गई है। इस तरह के सिस्टम को डायरेक्टेड एनर्जी वेपन कहा जाता है। इसमें पारंपरिक मिसाइल या गोला-बारूद की जगह बहुत शक्तिशाली लेजर बीम का इस्तेमाल किया जाता है।

लेजर सिस्टम का इस्तेमाल खासकर छोटे ड्रोन, क्वाडकॉप्टर, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्य और कुछ हल्के हथियारों के खिलाफ किया जा सकता है। लेजर बीम लक्ष्य के किसी संवेदनशील हिस्से को गर्म करके उसे नुकसान पहुंचाती है। ड्रोन के कैमरे, बैटरी, मोटर, कंट्रोल सिस्टम या वारहेड को निशाना बनाया जा सकता है।

लेकिन लेजर वेपन की अपनी सीमाएं भी होती हैं। धूल, धुआं, बारिश, कोहरा और खराब मौसम इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकते हैं। इसके लिए लगातार बिजली सप्लाई, टारगेट को सटीक ट्रैक करने वाला सेंसर और स्टेबल बीम कंट्रोल जरूरी होता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आमतौर पर पारंपरिक मिसाइल आधारित एयर डिफेंस के साथ मिलकर काम करते हैं। (Pakistan-China weapons deal)

जेएफ-17 का नया बैच

पाकिस्तान वायुसेना का जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसका इस्तेमाल एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक और सीमित समुद्री मिशनों में किया जा सकता है। यह विमान पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स और चीन की एवीआईसी के सहयोग से डेवलप किया गया था।

जेएफ-17 के नए वर्जन में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइल एकीकरण और कॉकपिट डिस्प्ले में सुधार किया गया है। ब्लॉक-3 वर्जन में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए रडार लगा है। एईएसए रडार में कई छोटे ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होते हैं, जिससे रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच काम करने की क्षमता बेहतर होती है।

इसके अलावा पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स जे-35 की डिलीवरी भी इसी साल शुरू होने वाली है। पाकिस्तान ने 40 जे-35AE (एक्सपोर्ट वेरिएंट) खरीदने की योजना बनाई है। यह चीन का J-35 का पहला एक्सपोर्ट ऑर्डर होगा। सूत्रों के मुताबिक पहला छोटा बैच 2026 के अंत तक आ सकता है। हालांकि पायलट ट्रेनिंग पहले से चीन में शुरू हो चुकी है। (Pakistan-China weapons deal)

हंगोर क्लास पनडुब्बी

पाकिस्तान नौसेना का सबसे बड़ा चीन समर्थित कार्यक्रम हंगोर क्लास की पनडुब्बियां हैं। पाकिस्तान ने चीन से आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का समझौता किया था। इनमें से कुछ पनडुब्बियां चीन में बनाई जानी हैं और कुछ पाकिस्तान में कराची शिपयार्ड में असेंबल की जानी हैं। इनमें से चीन से एक पनडुब्बी पाकिस्तान को डिलीवर भी हो चुकी है। जिसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं।

आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन जैसी तकनीक भी है, जिससे वे बिना सतह पर आए अधिक समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं। डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां समुद्री निगरानी, समुद्री रास्तों की सुरक्षा, टॉरपीडो हमले और एंटी-शिप मिसाइल ऑपरेशन के लिए उपयोग की जाती हैं। पनडुब्बी कार्यक्रम पाकिस्तान की समुद्री रणनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि अरब सागर में उसकी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। (Pakistan-China weapons deal)

तुर्की और चीन के साथ गोला-बारूद, आर्टिलरी का प्रोडक्शन

सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने गोला-बारूद के स्थानीय उत्पादन को बढ़ाने के लिए तुर्की और चीन के साथ दो अलग-अलग परियोजनाओं पर काम शुरू किया है। इनमें पहली परियोजना 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले से जुड़ी है, जबकि दूसरी 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद उत्पादन से संबंधित है।

155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले के लिए पाकिस्तान की वाह इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने तुर्की की कंपनी रेपकॉन के साथ समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान में एक ऑटोमेटेड प्रोडक्शन लाइन और एक्सप्लोसिव फिलिंग लाइन लगाई जानी है। इस लाइन की सालाना क्षमता करीब 1 लाख 20 हजार 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल बनाने की बताई गई है। वाह इंडस्ट्रीज, पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों से जुड़ी कंपनी है और सेना के लिए हथियार तथा गोला-बारूद तैयार करती है। 155 मिलीमीटर गोले लंबी दूरी की तोपों में इस्तेमाल होते हैं। इन्हें हाई एक्सप्लोसिव, स्मोक और अन्य प्रकार के मिशनों में उपयोग किया जा सकता है।

दूसरी परियोजना 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद से जुड़ी है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान इसमें चीन की नोरिन्को की तकनीकी मदद ले रहा है। 125 मिलीमीटर गोला-बारूद पाकिस्तान के अल-खालिद और अल-जरार जैसे टैंकों की मुख्य जरूरत है। इसमें आर्मर पियर्सिंग, हाई एक्सप्लोसिव और हीट श्रेणी के राउंड शामिल हैं।

पाकिस्तान के पास चीन निर्मित विंग लूंग श्रेणी के आर्मर्ड ड्रोन पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा चीन के साथ सेंसर, डेटा लिंक और ड्रोन नियंत्रण तकनीक में भी सहयोग रहा है। पाकिस्तान ने चीन की मदद से शाहपर, बुर्राक और अन्य यूएवी प्लेटफॉर्म भी डेवलप किए हैं। (Pakistan-China weapons deal)

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चीन से 28 मिलियन के ड्रोन खरीदे

वहीं पाकिस्तान ने चीन के साथ 1000 ड्रोन सिस्टम की खरीद के लिए करीब 20 करोड़ युआन का सौदा किया है। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 230 से 240 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह खरीद रावलपिंडी स्थित जीडब्ल्यूअल्फा टेक प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से की जा रही है। कंपनी रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और एयरोस्पेस सिस्टम इंटीग्रेशन के क्षेत्र में काम करती है तथा नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क से जुड़ी हुई है।

इस सौदे के तहत चीन से ड्रोन प्लेटफॉर्म, सेंसर, कम्युनिकेशन उपकरण, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और अन्य सहायक सिस्टम लिए जाएंगे। इन ड्रोन की रेंज 40 किमी, 200 किमी औऱ 500 किमी तक होगी। इन ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल सीमा निगरानी, वीडियो सर्विलांस, जीपीएस आधारित टारगेट पहचान और सैन्य यूनिटों तक रियल टाइम जानकारी पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान चीन से मिलने वाले सिस्टम और कंपोनेंट्स को स्थानीय स्तर पर इंटीग्रेट करने की दिशा में भी काम कर रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान निजी कंपनियों के जरिए ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और एयरोस्पेस उपकरणों की स्थानीय क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान 300-400 मल्टीकॉप्टर की भी खरीद कर रहा है। साथ ही, पाकिस्तान चीन से एंटी ड्रोन गन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। (Pakistan-China weapons deal)

अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी

पाकिस्तान नेवी समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी कर रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव अमेरिकी क्लियरेंस प्रक्रिया में भेजा गया है। हालांकि खरीद की अंतिम मंजूरी, कीमत और डिलीवरी शेड्यूल पर अभी कोई सार्वजनिक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

एमएच-60आर को रोमियो हेलीकॉप्टर भी कहा जाता है। यह अमेरिकी नौसेना का मल्टी-रोल समुद्री हेलीकॉप्टर है। इसका मुख्य उपयोग पनडुब्बी रोधी युद्ध, सतह पर मौजूद जहाजों की पहचान, समुद्री गश्त, लक्ष्य की निगरानी और खोज-बचाव मिशन में होता है।

इस हेलीकॉप्टर में समुद्र की सतह और हवा में मौजूद लक्ष्यों को खोजने के लिए रडार लगाया जाता है। पनडुब्बी की तलाश के लिए इसमें डिपिंग सोनार और सोनाबॉय जैसे उपकरण लगाए जा सकते हैं। डिपिंग सोनार को हेलीकॉप्टर से समुद्र में नीचे उतारा जाता है। यह पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजकर पनडुब्बी की मौजूदगी का पता लगाने में मदद करता है। सोनाबॉय छोटे सेंसर होते हैं, जिन्हें समुद्र में गिराया जाता है और वे पानी के भीतर की आवाजों का डेटा भेजते हैं।

एमएच-60आर को टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल, रॉकेट और मशीन गन जैसे हथियारों के साथ भी कॉन्फिगर किया जा सकता है। किसी भी देश को मिलने वाला हथियार पैकेज अमेरिकी मंजूरी और खरीदार देश की जरूरत के अनुसार अलग होता है।

पाकिस्तान नेवी के लिए ऐसे हेलीकॉप्टरों का उपयोग फ्रिगेट, कोरवेट और अन्य युद्धपोतों के साथ समुद्री मिशन में किया जा सकता है। अरब सागर में पनडुब्बी गतिविधियों पर नजर रखने, जहाजों की सुरक्षा और समुद्री गश्त में इनकी भूमिका अहम होती है। (Pakistan-China weapons deal)

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान का राफेल गिराने वाला झूठ फिर बेनकाब! IAF ने 36 विमानों के लिए मांगा ब्रिज सपोर्ट

IAF Rafale Bridge Support RFP
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IAF Rafale Bridge Support RFP: पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों को मार गिराने के दावे किए गए थे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, पाकिस्तानी टीवी चैनलों और कुछ विदेशी अखबारों ने अलग-अलग संख्या में राफेल विमानों के नुकसान का दावा किया। लेकिन एक बार फिर पाकिस्तान का झूठ बेनकाब हो गया है। अब भारतीय वायुसेना ने हाल में एक आरएफपी जारी की है जिसमें 36 राफेल विमानों के लिए ब्रिज सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट का प्रपोजल मांगा गया है।

एयर हेडक्वार्टर्स की डायरेक्टोरेट ऑफ इंजीनियरिंग ने फ्रांस की साफरान एयरक्राफ्ट इंजंस को राफेल के इंजनों को लेकर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। डॉक्यूमेंट में भारतीय वायुसेना के 36 राफेल विमानों के ऑपरेशन के लिए पांच महीने का ब्रिज सपोर्ट मांगा है। आरएफपी में साफ लिखा गया है कि प्रपोजल 36 राफेल विमानों के लिए तैयार किया जाए।

डॉक्यूमेंट में राफेल फ्लीट की संख्या 36 दर्ज होना पाकिस्तान के उन दावों के बीच महत्वपूर्ण है, जिनमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय राफेल विमानों के नुकसान की बातें कही गई थीं। इससे पहले 26 जनवरी को भी गणतंत्र दिवस परेड के एरियल फ्लाईपास्ट में भारतीय वायुसेना ने राफेल बीएस-022 को उड़ान भरते हुए दिखाया था, जिसे पाकिस्तान ने गिराने का दावा किया था।

IAF Rafale Bridge Support RFP: वायुसेना मुख्यालय से जारी हुआ आरएफपी

राफेल बेड़े के लिए यह आरएफपी एयर हेडक्वार्टर्स के डायरेक्टोरेट ऑफ इंजीनियरिंग राफेल की ओर से जारी किया गया है। आरएफपी फ्रांस की साफरान एयरक्राफ्ट इंजन्स को भेजा गया है। डॉक्यूमेंट लिखा गया है कि भारतीय वायुसेना 36 राफेल विमानों को ऑपरेट कर रही है। इन विमानों के लिए पहले से मौजूद सपोर्ट पैकेज 18 सितंबर 2026 तक लागू है। इसके बाद सपोर्ट में कोई अंतर न आए, इसके लिए वायुसेना ने पांच महीने की ब्रिज सपोर्ट व्यवस्था मांगी है।

डॉक्यूमेंट का शीर्षक है, “रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल फॉर ब्रिज सपोर्ट फॉर राफेल फ्लीट ऑफ इंडियन एयर फोर्स ऑन पीएसी बेसिस।” जिसमें पीएसी का मतलब प्रोप्राइटरी आर्टिकल सर्टिफिकेट होता है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी इक्विपमेंट, स्पेयर या टेक्निकल सर्विस की मूल निर्माता केवल एक कंपनी हो। राफेल में लगे एम88 इंजन और उससे जुड़े महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरणों के लिए साफरान मूल निर्माता है। इसलिए वायुसेना ने उसी कंपनी से प्रपोजल मांगा है।

2016 के भारत-फ्रांस समझौते के तहत आए थे 36 राफेल

भारत 2016 के इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत फ्रांस की दसा एविएशन से खरीदे गए 36 राफेल विमानों को ऑपरेट कर रहा है। भारतीय वायुसेना में 36 राफेल विमान के दो स्क्वाड्रन हैं। इनमें नंबर 17 स्क्वाड्रन गोल्डन एरोज और नंबर 101 स्क्वाड्रन शामिल हैं।

राफेल का इस्तेमाल एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक, समुद्री मिशन, लंबी दूरी के स्ट्राइक मिशन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से जुड़े कार्यों में किया जा सकता है। राफेल में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, एयर-टू-एयर मिसाइल और एयर-टू-ग्राउंड हथियारों को ले जाने की क्षमता है। यह अलग-अलग मिशनों के लिए कॉन्फिगर किया जा सकता है।

डॉक्यूमेंट के अनुसार, प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट में 36 विमान, उनसे जुड़े उपकरण और पांच साल का सपोर्ट पैकेज शामिल था। इस सपोर्ट में मेंटेनेंस, रिपेयर और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, कंज्यूमेबल्स, स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट और ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट की जरूरतें शामिल थीं। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

खत्म हुआ पांच साल का सपोर्ट

वायुसेना ने नए ब्रिज सपोर्ट प्रपोजल में भी 36 राफेल विमानों के ऑपरेशन की बात कही है। प्रपोजल के मुताबिक, यह सपोर्ट 18 सितंबर 2026 के बाद पांच महीने के लिए होगा।

इस अवधि में सभी 36 राफेल विमानों को प्रति विमान औसतन 150 फ्लाइंग आवर्स प्रति वर्ष की दर से ऑपरेट करने का प्रावधान रखा गया है। पांच महीने के लिए कुल 2250 फ्लाइंग आवर्स का अनुमान लगाया गया है।

यह कैलकुलेशन 36 विमान, प्रति विमान प्रति माह 12.5 फ्लाइंग आवर्स और पांच महीने की अवधि के आधार पर की गई है।

राफेल के लिए मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट क्यों जरूरी

राफेल एक ट्विन-इंजन, मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है। इसमें दो Snecma M88-2 आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन लगे हैं। हर इंजन का थ्रस्ट ड्राई (बिना आफ्टरबर्नर) लगभग 50 केएन और आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 75 केएन है। इस तरह राफेल का कुल थ्रस्ट 150 केएन है।

टर्बोफैन इंजन में हवा को अंदर लेकर उसे दबाया जाता है। इसके बाद उसमें ईंधन मिलाकर कंबस्शन किया जाता है। गर्म गैसें पीछे की तरफ निकलती हैं और विमान को आगे बढ़ाने के लिए थ्रस्ट पैदा करती हैं।

इंजन की सर्विसिंग में कई तरह के काम होते हैं। इसमें फिल्टर, पाइप, सेंसर, फ्यूल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट और इंजन के अंदर के हिस्सों की जांच शामिल हो सकती है। इंजन से जुड़ी तकनीकी जांच और ओवरहॉल के लिए विशेष उपकरण तथा प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत होती है।

राफेल में एवियोनिक्स सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। एवियोनिक्स का मतलब विमान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से है। इसमें रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम, नेविगेशन सिस्टम, कंप्यूटर, सेंसर और मिशन सिस्टम शामिल होते हैं। इनकी मेंटेनेंस के लिए विशेष टेस्ट उपकरण और सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

क्या होते हैं एमआरएलएस, जीएसई और जीएचई 

डॉक्यूमेंट में एमआरएलएस का का जिक्र किया गया है। इसका पूरा नाम मेंटेनेंस, रिपेयर एंड लॉजिस्टिक्स सपोर्ट है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें विमान को उड़ान योग्य बनाए रखने के लिए स्पेयर, मरम्मत सहायता, तकनीकी जानकारी और लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराए जाते हैं।

इसमें कंज्यूमेबल्स भी शामिल होते हैं। कंज्यूमेबल्स वे सामग्री होती हैं जिनका इस्तेमाल मेंटेनेंस के दौरान होता है और जिन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर फिल्टर, सील, लुब्रिकेंट, कुछ इलेक्ट्रिकल पार्ट्स और अन्य छोटे उपकरण शामिल हो सकते हैं।

जीएसई का अर्थ ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट है। यह वह उपकरण होता है जिसका उपयोग विमान को जमीन पर जांचने, सर्विस करने और उड़ान के लिए तैयार करने में किया जाता है। इसमें पावर सप्लाई यूनिट, टेस्टिंग उपकरण, टोइंग वाहन और हाइड्रोलिक जांच उपकरण शामिल हो सकते हैं।

जीएचई का अर्थ ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट है। इसका इस्तेमाल विमान को पार्किंग एरिया में खींचने, सही स्थान पर लगाने, लोडिंग और अन्य ग्राउंड गतिविधियों के लिए किया जाता है।

डॉक्यूमेंट में ओ-लेवल मेंटेनेंस का भी जिक्र है। ओ-लेवल का मतलब ऑपरेशनल लेवल मेंटेनेंस है। यह वह शुरुआती स्तर का रखरखाव है जो स्क्वाड्रन या एयरबेस स्तर पर किया जाता है। इसमें रोजाना जांच, छोटे पुर्जों की बदलने की प्रक्रिया, सामान्य तकनीकी सुधार और विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार करना शामिल होता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

मॉड्यूलर डिजाइन वाला है राफेल

राफेल एक आधुनिक लड़ाकू विमान है। इसे इस तरह बनाया गया है कि उड़ान के बाद इसकी जांच और मरम्मत में बहुत अधिक समय न लगे। किसी भी लड़ाकू विमान को उड़ाने के बाद ग्राउंड क्रू उसकी जांच करता है। राफेल में यह काम काफी हद तक आसान बनाया गया है।

राफेल में कई सिस्टम ऐसे हैं जो विमान की तकनीकी स्थिति की जानकारी खुद देते हैं। इसे बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट कहा जाता है। यदि इंजन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर या किसी दूसरे हिस्से में कोई गड़बड़ी हो, तो तकनीकी टीम को संकेत मिल जाता है। इससे हर हिस्से को बार-बार खोलकर जांचने की जरूरत कम होती है।

उड़ान के बाद टेकनीशियन विमान के टायर, फ्यूल, हाइड्रोलिक ऑयल, बाहरी ढांचे, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच करते हैं। सामान्य उड़ान के बाद यह शुरुआती जांच लगभग 30 मिनट से एक घंटे में पूरी हो सकती है। अगर कोई खराबी नहीं मिलती, तो विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार किया जाता है। इसे टर्नअराउंड कहा जाता है।

लंबी दूरी या युद्धक मिशन के बाद यह जांच ज्यादा लंबी होती है। ऐसे समय हथियारों की स्थिति, इंजन, रडार, सेंसर और विमान के दूसरे सिस्टम की गहराई से जांच की जाती है। इसमें दो से चार घंटे तक लग सकते हैं।

राफेल में एम88 इंजन लगा है। इसका डिजाइन कई अलग-अलग हिस्सों या मॉड्यूल में किया गया है। यदि इंजन के किसी एक हिस्से में समस्या आती है, तो हर बार पूरा इंजन बदलना जरूरी नहीं होता। तकनीकी टीम जरूरत के अनुसार खराब हिस्से को बदल सकती है। इससे समय और मेंटेनेंस का काम कम हो सकता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

एक दिन में कितनी सॉर्टी कर सकता है राफेल

लड़ाकू विमान की एक बार की मिशन उड़ान को सॉर्टी कहा जाता है। जब राफेल एयरबेस से उड़ान भरता है, तय मिशन पूरा करता है और वापस बेस पर उतरता है, तो उसे एक सॉर्टी माना जाता है।

राफेल को तेज सॉर्टी जनरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसका मतलब है कि एक उड़ान के बाद तकनीकी जांच, ईंधन भरने और जरूरत पड़ने पर हथियार लगाने के बाद इसे कम समय में अगली उड़ान के लिए तैयार किया जा सकता है।

सामान्य प्रशिक्षण या शांति के समय एक राफेल विमान एक दिन में आमतौर पर दो से चार सॉर्टी कर सकता है। वहीं, बड़े सैन्य अभ्यास वाले समय में एक राफेल चार से पांच सॉर्टी तक कर सकता है। इसके लिए ग्राउंड क्रू, ईंधन, हथियार, स्पेयर पार्ट्स और रनवे की पूरी व्यवस्था जरूरी होती है। एक ही विमान को बार-बार उड़ाने के बजाय वायुसेना आमतौर पर पूरे बेड़े के अलग-अलग विमानों का उपयोग करती है।

युद्ध या सर्ज ऑपरेशन की स्थिति में राफेल की सॉर्टी संख्या कुछ समय के लिए और बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में मिशन छोटे रखे जा सकते हैं और अलग-अलग पायलट एक ही विमान को उड़ा सकते हैं। फिर भी हर उड़ान के बाद फ्यूल, इंजन, टायर, हाइड्रोलिक सिस्टम, रडार, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच जरूरी होती है।

राफेल की तेज सॉर्टी क्षमता का एक कारण इसका डिजिटल डायग्नोस्टिक सिस्टम है। विमान अपने कई सिस्टम की स्थिति रिकॉर्ड करता है। ग्राउंड क्रू को पहले से पता चल सकता है कि किस हिस्से की जांच करनी है। इससे विमान को लंबे समय तक जमीन पर रखने की जरूरत कम होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने किए थे कई दावे

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ से भारतीय वायुसेना को नुकसान पहुंचाने के दावे किए गए थे। इनमें राफेल लड़ाकू विमान को लेकर भी कई दावे सामने आए। अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट्स पर विमान के मलबे, कथित सीरियल नंबर और पायलटों से जुड़ी अपुष्ट बातें प्रसारित की गईं।

भारत की ओर से पाकिस्तान के इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक विमान-वार जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। ऐसे मामलों में मिलिट्री ऑपरेशंस से जुड़ी जानकारी अक्सर ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण सीमित रखी जाती है।
(IAF Rafale Bridge Support RFP)

सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे पूर्व सैनिकों के लिए जरूरी खबर, ये डिटेल्स गलत लिखीं तो दो साल तक नहीं दे पाएंगे एग्जाम

Ex-Servicemen Government Exam Rules
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

Ex-Servicemen Government Exam Rules: सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे पूर्व सैनिकों के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। विभाग ने साफ कहा है कि सरकारी परीक्षाओं के आवेदन फॉर्म में रिटायरमेंट, डिस्चार्ज, पेंशन या सैन्य सेवा से जुड़ी गलत, झूठी अथवा भ्रामक जानकारी देने वाले पूर्व सैनिक उम्मीदवारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसे उम्मीदवार को सभी सरकारी परीक्षाओं में बैठने से दो वर्ष के लिए रोक लगाई जा सकती है।

डीओपीटी की ओर से जारी ‘लेटर ऑफ इंस्ट्रक्शन’ में कहा गया है कि सरकार के संज्ञान में आया है कि कुछ पूर्व सैनिक उम्मीदवार अलग-अलग सरकारी परीक्षाओं के आवेदन फॉर्म में गलत जानकारी दे रहे हैं। इसके बाद विभाग को सभी पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को निर्देश जारी करने पड़े।

यह निर्देश पत्र 17 जून 2026 को जारी किया गया है। पत्र भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, नॉर्थ ब्लॉक, नई दिल्ली की ओर से सभी केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों, अधीनस्थ कार्यालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को भेजा गया है।

Ex-Servicemen Government Exam Rules: किन जानकारियों में गलती पर होगी कार्रवाई

डीओपीटी के पत्र में पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को अपनी सेवा से संबंधित हर जानकारी सही देने को कहा गया है। इसमें सेवा से रिटायरमेंट या डिस्चार्ज की तारीख, पेंशन से जुड़ी जानकारी, सेवा अवधि, रैंक और अन्य आवश्यक सर्विस डिटेल्स शामिल हैं।

सरकारी भर्ती फॉर्म भरते समय पूर्व सैनिक को अक्सर यह बताना होता है कि वह किस तारीख को सेना, नौसेना या वायुसेना से रिटायर या डिस्चार्ज हुआ। कई भर्तियों में पेंशन की स्थिति, सेवा का कुल समय, पूर्व सैनिक का दर्जा और संबंधित प्रमाणपत्र की जानकारी भी मांगी जाती है। विभाग ने कहा है कि इन सभी कॉलम में सही और सटीक जानकारी भरना जरूरी है।

पत्र के अनुसार, यदि कोई उम्मीदवार अपनी रिटायरमेंट या सर्विस डिटेल्स के संबंध में गलत, फर्जी या गुमराह करने वाली जानकारी देता पाया गया, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जिसके बाद संबंधित उम्मीदवार दो वर्ष तक किसी भी सरकारी परीक्षा में शामिल नहीं हो सकेगा। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

दो साल की रोक किन परीक्षाओं पर होगी लागू

डीओपीटी ने अपने निर्देश में डिबारमेंट का दायरा काफी व्यापक रखा है। गलत जानकारी देने पर उम्मीदवार केवल एक भर्ती परीक्षा से बाहर नहीं होगा। कार्रवाई होने की तारीख से अगले दो साल तक वह भारत सरकार, राज्य सरकारों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा आयोजित सरकारी परीक्षाओं में बैठने से रोका जा सकता है।

इस दायरे में केंद्रीय मंत्रालयों की भर्ती, राज्य सरकारों की भर्ती, सरकारी विभागों की परीक्षाएं और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की भर्ती प्रक्रियाएं आ सकती हैं। ऐसे में किसी पूर्व सैनिक उम्मीदवार के लिए आवेदन फॉर्म में छोटी-सी लापरवाही भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।

सूत्रों के अनुसार, सरकारी भर्ती एजेंसियां पूर्व सैनिक कोटे और उम्र में छूट से जुड़े मामलों में दस्तावेजों का मिलान करती हैं। आवेदन में दर्ज रिटायरमेंट तिथि, डिस्चार्ज सर्टिफिकेट, पेंशन रिकॉर्ड और सर्विस सर्टिफिकेट के बीच अंतर मिलने पर उम्मीदवार से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। रिकॉर्ड में गलत जानकारी साबित होने पर विभागीय कार्रवाई का रास्ता खुलता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

डीओपीटी ने क्यों जारी किया यह निर्देश

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पत्र में कहा गया है कि कुछ पूर्व सैनिक उम्मीदवारों द्वारा विभिन्न सरकारी परीक्षाओं के आवेदन फॉर्म में रिटायरमेंट डिटेल्स से जुड़ी गलत या फर्जी जानकारी दिए जाने के मामले सामने आए हैं। इसी कारण विभाग ने सभी उम्मीदवारों के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किया है।

पूर्व सैनिकों को सरकारी नौकरियों में कुछ विशेष प्रावधानों का लाभ मिलता है। अलग-अलग भर्ती नियमों के अनुसार पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को आरक्षण, उम्र सीमा में छूट या अन्य पात्रता संबंधी लाभ मिल सकते हैं। इन सुविधाओं का लाभ लेने के लिए उम्मीदवार का पूर्व सैनिक दर्जा और उसकी सेवा से संबंधित रिकॉर्ड सही होना जरूरी है।

किसी उम्मीदवार द्वारा रिटायरमेंट की तारीख बदलकर लिखना, सेवा अवधि में गलत जानकारी देना या पेंशन की स्थिति के बारे में भ्रामक विवरण देना भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। विभाग का निर्देश इसी तरह की गलतियों और कथित हेरफेर को रोकने के लिए जारी किया गया है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

आवेदन फॉर्म में किन दस्तावेजों से करें मिलान

पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को सरकारी परीक्षा का फॉर्म भरने से पहले अपने आधिकारिक दस्तावेजों को ध्यान से देखना चाहिए। रिटायरमेंट या डिस्चार्ज की तारीख वही लिखनी चाहिए जो डिस्चार्ज बुक, रिलीज ऑर्डर या सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज हो। पेंशन से संबंधित जानकारी पेंशन पेमेंट ऑर्डर यानी पीपीओ और बैंक रिकॉर्ड के आधार पर भरना जरूरी है।

सेवा अवधि, रैंक, यूनिट या कोर से संबंधित जानकारी भी आधिकारिक दस्तावेजों से मिलाकर ही दर्ज की जानी चाहिए। कई उम्मीदवार पुराने कागजात, याददाश्त या किसी अनौपचारिक जानकारी के आधार पर फॉर्म भर देते हैं। ऐसी स्थिति में तारीख या सेवा विवरण में अंतर आ सकता है।

यदि किसी दस्तावेज में नाम, जन्मतिथि, सेवा संख्या या रिटायरमेंट तिथि को लेकर कोई भ्रम है, तो उम्मीदवार को आवेदन से पहले संबंधित रिकॉर्ड ऑफिस, जिला सैनिक बोर्ड या पूर्व सैनिक कल्याण से जुड़े कार्यालय से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

उम्र में छूट और पूर्व सैनिक कोटे से जुड़ा मामला

सरकारी भर्ती में पूर्व सैनिक उम्मीदवारों के लिए पात्रता का निर्धारण संबंधित भर्ती नियमों के आधार पर होता है। कई भर्तियों में पूर्व सैनिकों के लिए अलग सीटें निर्धारित रहती हैं, जबकि कुछ में उम्र सीमा से जुड़ी छूट का प्रावधान होता है। इन लाभों के लिए उम्मीदवार का सही पूर्व सैनिक दर्जा होना आवश्यक है।

रिटायरमेंट या डिस्चार्ज की तारीख कई मामलों में पात्रता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भर्ती की कट-ऑफ तारीख पर उम्मीदवार पूर्व सैनिक की श्रेणी में आता है या नहीं, यह उसके आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड से तय होता है। इसलिए गलत तारीख दर्ज होने पर उम्मीदवार की पात्रता पर सवाल उठ सकता है।

उदाहरण के तौर पर, यदि कोई उम्मीदवार अपने वास्तविक डिस्चार्ज की तारीख से अलग तारीख लिख देता है, तो उसकी उम्र में छूट, पूर्व सैनिक आरक्षण या अन्य लाभों की गणना प्रभावित हो सकती है। दस्तावेज जांच के दौरान ऐसी जानकारी का मिलान किया जाता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

पेंशन डिटेल्स भरते समय भी सावधानी जरूरी

डीओपीटी के पत्र में पेंशन डिटेल्स का विशेष उल्लेख किया गया है। पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को आवेदन फॉर्म में यदि पेंशन से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है तो उसे भी सही भरना होगा। पेंशन की श्रेणी, पीपीओ से जुड़ी जानकारी या सेवा के बाद मिलने वाले लाभों का विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाकर दर्ज करना चाहिए।

कई सरकारी भर्ती फॉर्म में उम्मीदवार से यह पूछा जा सकता है कि वह पूर्व सैनिक है या नहीं, उसे पेंशन मिल रही है या नहीं और उसका डिस्चार्ज किस आधार पर हुआ था। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देते समय किसी भी कॉलम को अनुमान के आधार पर नहीं भरना चाहिए।

पेंशन रिकॉर्ड और सर्विस रिकॉर्ड में अंतर होने की स्थिति में उम्मीदवार को पहले संबंधित विभाग से स्पष्टीकरण लेना चाहिए। आवेदन जमा करने के बाद गलत जानकारी सामने आने पर उम्मीदवार को भर्ती प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

कोलकाता में नौसेना की ट्राई-कमीशनिंग पर बोले पीएम मोदी, समुद्री ताकत के बिना नहीं बन सकता कोई देश बड़ी शक्ति

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: PIB)

Indian Navy Tri-Commissioning: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर कोलकाता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) में बने तीन स्वदेशी नौसैनिक जहाजों को भारतीय नौसेना में कमीशन किया। इनमें एडवांस्ड स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी, सर्वे वेसल लार्ज आईएनएस संशोधक और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस अग्रेय शामिल हैं।

तीनों जहाजों के एक साथ नौसेना में शामिल होने को ट्राई-कमीशनिंग कहा जाता है। इससे पहले 2025 में 17 महीने पहले मुंबई में पहली ट्राई-कमीशनिंग हुई थी, वहीं कोलकाता में यह दूसरी ट्राई-कमीशनिंग है।

यह कार्यक्रम इसलिए भी खास रहा क्योंकि 21 जून को विश्व हाइड्रोग्राफी दिवस भी मनाया जाता है। इसी दिन भारत के सबसे आधुनिक हाइड्रोग्राफिक सर्वे जहाजों में शामिल आईएनएस संशोधक को नौसेना में शामिल किया गया।

Indian Navy Tri-Commissioning: समुद्री क्षमता बेहद जरूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में कहा कि कोलकाता और बंगाल की धरती ने भारत के विचारों को नई दिशा दी है और सदियों से भारत को समुद्र के जरिए दुनिया से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि इसी धरती पर आत्मनिर्भर भारत, सुरक्षित भारत और विकसित भारत से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित हुआ है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि समुद्री क्षमता के बिना कोई देश बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। उनके अनुसार विकास, सुरक्षा और समृद्धि समुद्र से जुड़े हैं। दुनिया का अधिकांश व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और देशों को जोड़ने वाले बड़े डेटा नेटवर्क भी समुद्र के नीचे से गुजरते हैं। उन्होंने कहा कि समुद्र के साथ भविष्य के क्रिटिकल मिनरल्स, डीप सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी जुड़े हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: PIB)

तीन अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बने हैं ये तीनों जहाज

प्रधानमंत्री ने कहा कि ये तीनों जहाज भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों का प्रतीक हैं। इन्हें भारत में डिजाइन किया गया, भारत में बनाया गया और इनके पीछे भारतीय इंजीनियरों, कामगारों तथा उद्योगों की मेहनत है।

उन्होंने कहा कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार बने रहने की स्थिति में नहीं रहना चाहता। प्रधानमंत्री के अनुसार देश की सैन्य ताकत को दुनिया के लिए बाजार नहीं बनना चाहिए, बल्कि ताकत की परिभाषा आत्मनिर्भरता से तय होनी चाहिए।

आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रेय तीनों अलग-अलग मिशन के लिए बनाए गए हैं। इन तीनों जहाजों का निर्माण भारत में हुआ है और इनके डिजाइन में भी भारतीय संस्थानों तथा उद्योगों की भूमिका रही है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

200 से ज्यादा एमएसएमई ने निभाई भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इन तीनों जहाजों के निर्माण में 200 से ज्यादा एमएसएमई ने योगदान दिया है। एमएसएमई यानी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज देश की छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयां होती हैं। युद्धपोत निर्माण में केवल बड़ा शिपयार्ड काम नहीं करता, बल्कि हजारों उपकरण और पुर्जे अलग-अलग कंपनियां बनाती हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि एक आधुनिक जहाज में सैकड़ों टन स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और हजारों कंपोनेंट्स लगते हैं। इनके पीछे हजारों कंपनियां काम करती हैं और इससे बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिलता है। उन्होंने समुद्री क्षेत्र को विकसित भारत के लिए एम्प्लॉयमेंट इंजन बताया।

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: PIB)

आईएनएस विक्रांत का किया जिक्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब आईएनएस विक्रांत को राष्ट्र को समर्पित किया गया था, तब भारत ने अपनी समुद्री शक्ति का नया अध्याय शुरू किया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आईएनएस विक्रांत से लेकर आईएनएस अग्रेय, आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस संशोधक तक की यात्रा केवल नए युद्धपोतों की यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता की यात्रा भी है।

आईएनएस विक्रांत भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। एयरक्राफ्ट कैरियर ऐसा बड़ा युद्धपोत होता है, जिस पर लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और कई तरह के सैन्य उपकरण संचालित किए जा सकते हैं। वहीं आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रेय जैसे जहाज अलग-अलग समुद्री मिशनों के लिए तैयार किए गए हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

40 से ज्यादा स्वदेशी युद्धपोत और पनडुब्बियां नौसेना में शामिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में 40 से ज्यादा मेड इन इंडिया युद्धपोत और पनडुब्बियां भारतीय नौसेना में शामिल हुई हैं। उनके अनुसार इसका मतलब है कि भारतीय नौसेना को लगभग हर कुछ सप्ताह में नई ताकत मिल रही है।

उन्होंने कहा कि इस समय 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि भारत की औद्योगिक क्षमता और समुद्री शक्ति निर्माण की दिशा को दिखाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर, शिप रिसाइक्लिंग और एमआरओ को राष्ट्रीय मिशन के रूप में देख रहा है। एमआरओ का मतलब मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल है। यानी जहाजों की नियमित देखभाल, खराब उपकरणों की मरम्मत और लंबे समय बाद बड़े स्तर पर होने वाली तकनीकी जांच।

उन्होंने शिपिंग सेक्टर के लिए घोषित 70 हजार करोड़ रुपये के इंसेंटिव पैकेज का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह केवल आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि भारत के समुद्री भविष्य में निवेश है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

रक्षा निर्यात पहुंचा 40 हजार करोड़ रुपये के पार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक समय भारत की पहचान दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातक देशों में होती थी। विदेशों से हथियार, सैन्य उपकरण और रक्षा तकनीक खरीदने पर अधिक निर्भरता के कारण देश के सामने रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी पैदा होती थीं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में सरकार बनने के बाद इस स्थिति को बदलने का संकल्प लिया गया और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी गई।

प्रधानमंत्री के अनुसार, इसके लिए कई बड़े नीतिगत सुधार किए गए। रक्षा क्षेत्र में डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट के लिए नए अवसर तैयार किए गए। इसका असर देश के रक्षा उत्पादन में साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 तक भारत का कुल रक्षा उत्पादन करीब 40 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि केवल रक्षा उत्पादन ही नहीं बढ़ा है, बल्कि रक्षा निर्यात में भी तेज वृद्धि हुई है। वर्ष 2014 तक भारत करीब 700 करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादों का निर्यात करता था। अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: Shabd)

पश्चिम बंगाल की भूमिका बेहद अहम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत जिस नए समुद्री दौर की ओर बढ़ रहा है, उसमें पश्चिम बंगाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है। राज्य के पास बंदरगाहों की क्षमता है, उद्योगों के लिए मजबूत आधार है और कुशल मानव संसाधन भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई तक ले जाने की पूरी क्षमता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले वर्षों में पश्चिम बंगाल भारत की ब्लू इकोनॉमी, मैरिटाइम मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और तटीय विकास का एक अहम केंद्र बन सकता है। भारत ने हमेशा समुद्र को सहयोग और संपर्क के माध्यम के रूप में देखा है, लेकिन शांति बनाए रखने के लिए ताकत भी उतनी ही जरूरी है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा जरूरी है और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आईएनएस अग्रेय, आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस संशोधक का भारतीय नौसेना में शामिल होना इसी सोच का प्रतीक है। ये तीनों जहाज उस भारत की तस्वीर पेश करते हैं जो 21वीं सदी में अपनी क्षमता को पहचानता है, अपनी ताकत पर भरोसा करता है और तेज गति, नई ऊर्जा तथा मजबूत संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

बंदरगाहों को बनाया जा रहा है आधुनिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत अब अपने पूरे मैरिटाइम इकोसिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसके तहत बंदरगाहों को आधुनिक बनाया जा रहा है, नई क्षमता तैयार की जा रही है और समुद्री तथा तटीय क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़ा जा रहा है। देश में नदी जलमार्गों का विस्तार किया जा रहा है और सड़क, रेल, बंदरगाह तथा जलमार्गों को जोड़ने वाला मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि सागरमाला जैसी पहल इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य व्यापार की लागत कम करना, उद्योगों को गति देना और तटीय इलाकों में रोजगार व विकास के नए अवसर तैयार करना है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में बने रक्षा उपकरण अब दुनिया के 80 से ज्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि आत्मनिर्भरता की दिशा में अभी बहुत काम बाकी है, लेकिन पिछले 12 वर्षों में हुई प्रगति यह दिखाती है कि स्पष्ट नीति, सही दिशा और सामूहिक प्रयासों से देश में बड़े बदलाव किए जा सकते हैं।

नौसेना प्रमुख बोले- ट्राई-कमीशनिंग से दिखी नई गति

भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने इस अवसर पर जीआरएसई की टीम, उद्योग साझेदारों, एमएसएमई, नौसेना मुख्यालय, कमांड मुख्यालय, वॉरशिप ओवरसीइंग टीम और ट्रायल एजेंसियों को बधाई दी।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि कोलकाता में यह ट्राई-कमीशनिंग उपलब्धि भारत के युद्धपोत निर्माण क्षेत्र में आधुनिकता, आत्मनिर्भरता और भरोसे की नई गति को दिखाती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री द्वारा पिछले वर्ष मुंबई में हुई पहली ट्राई-कमीशनिंग के 17 महीने बाद कोलकाता में दूसरी ट्राई-कमीशनिंग हुई है।

उन्होंने कहा कि इन तीनों परियोजनाओं ने निर्माण के दौरान कई नए माइलस्टोन हासिल किए हैं। नौसेना प्रमुख के अनुसार जहाजों के निर्माण में शुरुआत से लेकर ट्रायल तक अलग-अलग एजेंसियों और उद्योग भागीदारों की भूमिका रही है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

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PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: PIB)

स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी 

आईएनएस दुनागिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाया गया एडवांस्ड स्टील्थ फ्रिगेट है। यह उन आधुनिक युद्धपोतों में शामिल है जिन्हें दुश्मन के रडार पर कम दिखाई देने के उद्देश्य से डिजाइन किया जाता है। स्टील्थ फ्रिगेट की बाहरी बनावट, रडार सिग्नेचर, इंफ्रारेड सिग्नेचर और ध्वनि स्तर को कम रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

फ्रिगेट ऐसा युद्धपोत होता है जो लंबी दूरी तक समुद्र में रहकर कई प्रकार के मिशन कर सकता है। इसमें एंटी-एयर वॉरफेयर, एंटी-सर्फेस वॉरफेयर और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर की क्षमता होती है। यानी यह हवा से आने वाले मिसाइल और विमान के खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाज और पानी के नीचे मौजूद पनडुब्बी तीनों से निपटने में भूमिका निभा सकता है।

आईएनएस दुनागिरी में आधुनिक रडार, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और हथियार प्रणाली लगाई गई है। यह जहाज भारतीय नौसेना के लिए समुद्री क्षेत्र में निगरानी, युद्धक गश्त और टास्क ग्रुप ऑपरेशन में उपयोगी होगा।

प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स को भारतीय नौसेना के मौजूदा फ्रिगेट बेड़े की तुलना में ज्यादा एडवांस माना जाता है। इन जहाजों में ऑटोमेशन पर भी जोर दिया गया है, जिससे कई सिस्टम डिजिटल तरीके से नियंत्रित किए जा सकते हैं। इससे जहाज को चलाने और युद्धक सिस्टम संचालित करने में कम क्रू के साथ भी काम किया जा सकता है।

आईएनएस दुनागिरी का नाम हिमालय की दुनागिरी पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखा गया है। यह नाम भारतीय नौसेना की उस परंपरा को भी आगे बढ़ाता है जिसमें युद्धपोतों को भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े नाम दिए जाते हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आईएनएस संशोधक: समुद्र की गहराई और रास्तों की जानकारी जुटाने वाला जहाज

आईएनएस संशोधक सर्वे वेसल लार्ज श्रेणी का जहाज है। इसका मुख्य काम समुद्र की गहराई, समुद्री तल, तटीय क्षेत्र, बंदरगाहों के आसपास के रास्तों और पानी के नीचे मौजूद प्राकृतिक या मानव निर्मित संरचनाओं की जानकारी जुटाना है।

किसी भी नौसेना के लिए हाइड्रोग्राफी बहुत महत्वपूर्ण होती है। हाइड्रोग्राफी का मतलब समुद्र, नदी, बंदरगाह और तटीय जल क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वे है। इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि किसी इलाके में पानी कितना गहरा है, समुद्र तल की बनावट कैसी है, जहाज किस रास्ते से सुरक्षित गुजर सकते हैं और किन जगहों पर खतरा हो सकता है।

आईएनएस संशोधक आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरणों से लैस है। इसमें मल्टी-बीम इको साउंडर, साइड स्कैन सोनार, सर्वे बोट, डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम और समुद्री मैपिंग के लिए जरूरी डिजिटल उपकरण लगाए गए हैं। मल्टी-बीम इको साउंडर समुद्र तल का विस्तृत नक्शा तैयार करने में मदद करता है। यह पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजता है और वापस आने वाली तरंगों के आधार पर समुद्र की गहराई और तल की जानकारी जुटाता है।

इस तरह के जहाज नौसेना के ऑपरेशन के साथ-साथ सुरक्षित समुद्री व्यापार, बंदरगाह विकास, तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर और आपदा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। समुद्री नक्शे तैयार करने से नौसैनिक जहाजों, पनडुब्बियों और व्यापारी जहाजों को सुरक्षित रूट तय करने में मदद मिलती है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आईएनएस अग्रेय: उथले समुद्र में पनडुब्बियों का दुश्मन

आईएनएस अग्रेय एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य काम उथले समुद्री इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बनाना है।

भारत के समुद्री क्षेत्र में कई ऐसे इलाके हैं जहां पानी अपेक्षाकृत कम गहरा है। तटीय क्षेत्र, बंदरगाहों के आसपास के इलाके और कुछ समुद्री रास्तों में पनडुब्बियों की गतिविधि पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण होता है। उथले पानी में सोनार की ध्वनि तरंगें अलग तरीके से काम करती हैं और समुद्र तल की बनावट भी पनडुब्बी को छिपने में मदद कर सकती है।

इसी कारण शैलो वॉटर क्राफ्ट को खास तौर पर ऐसे क्षेत्रों के लिए डिजाइन किया जाता है। आईएनएस अग्रेय में आधुनिक सोनार सिस्टम, अंडरवाटर सेंसर और पनडुब्बी रोधी हथियार लगाए गए हैं। सोनार सिस्टम पानी के भीतर ध्वनि तरंगों के जरिए पनडुब्बी या अन्य वस्तु की मौजूदगी का पता लगाता है। (Indian Navy Tri-Commissioning)