Home Blog Page 16

Drone attack will avoid the Indian Army’s Cannon! The first time deployed in the Forward Area was applied on Tod Artillery Guns, see video

Towed Artillery Guns Anti Drone Cages
Towed Artillery Guns (Image Source: Rising Star Corps)

Towed Artillery Guns Anti Drone Cages: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी यूनिट्स की सुरक्षा के लिए एक नया कदम उठाया है। पश्चिमी मोर्चे पर तैनात राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) ने पहली बार फॉरवर्ड एरिया में तैनात टोड आर्टिलरी गनों (खींची जाने वाली तोपखाना बंदूक सिस्टम) पर एंटी-ड्रोन केज लगाए हैं। सेना की किसी ऑपरेशनल फॉर्मेशन द्वारा इस तरह की व्यवस्था पहली बार अपनाई गई है।

Indian Army Anti Drone Cages: क्या हैं एंटी-ड्रोन केज

एंटी-ड्रोन केज धातु की मजबूत जाली और हल्के फ्रेम से बना एक सिक्योरिटी फ्रेमवर्क होता है, जिसे वेपन सिस्टम के ऊपर लगाया जाता है। इसे कई देशों में “कोप केज” के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ड्रोन सीधे हथियार या उसके क्रू पर हमला करने की कोशिश करे तो वह पहले इस जाली से टकराए।

यदि ड्रोन इस जाली में फंस जाता है या उससे टकरा जाता है तो उसका वारहेड टारगेट तक पहुंचने से पहले ही फट सकता है या उसका संतुलन बिगड़ सकता है। इससे मेन वेपन सिस्टम और उसके आसपास मौजूद सैनिकों को होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इन केजों में स्टील की जाली और मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल किया जाता है। बड़े ड्रोन मेटल की जाली से टकराते हैं, जबकि छोटे एफपीवी ड्रोन और क्वाडकॉप्टर नेट में उलझ सकते हैं। इससे उनका हमला सीधे गन तक नहीं पहुंच पाता।

इन केजों का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि जरूरत पड़ने पर इन्हें कुछ ही मिनटों में लगाया या हटाया जा सकता है। फायरिंग के समय भी इनकी बनावट ऐसी रखी जाती है कि तोप की बैरल की मूवमेंट और ऊंचाई पर ज्यादा असर न पड़े।

टोड आर्टिलरी गनों को क्यों मिली यह सुरक्षा

भारतीय सेना के पास कई तरह की टोड 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गनें हैं, जिन्हें ट्रकों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। इन गनों में सेल्फ-प्रोपेल्ड गनों की तरह आर्मर्ड सिक्युरिटी नहीं होती। ऐसे में यदि किसी ड्रोन का हमला होता है तो गन और उसके चालक दल दोनों को ज्यादा खतरा रहता है।

सूत्रों का कहना है कि इसी वजह से सबसे पहले फॉरवर्ड एरिया में तैनात टो आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला किया गया। इससे वेपन सिस्टम की सुरक्षा बढ़ेगी और गन क्रू को भी अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। (Indian Army Anti Drone Cages)

क्या है वीडियो में

भारतीय सेना की राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) की तरफ से जारी वीडियो में दिखाया है कि सेना कैसे अपनी आर्टिलरी यूनिट्स को आधुनिक तकनीक से लैस कर रही है, ताकि दुश्मन का पता लगाने से लेकर उस पर हमला करने तक का समय बहुत कम किया जा सके। सेना इसे “सेंसर-टू-शूटर किल चेन” कहती है। यानी जैसे ही सेंसर किसी टाारगेट का पता लगाएं, उसी जानकारी के आधार पर कुछ ही समय में आर्टिलरी गन सटीक हमला कर सके।

वीडियो में एक ऊंचा मेटल मास्ट दिखाई देता है। यह ऑब्जर्वेशन पोस्ट, रडार या किसी आधुनिक सेंसर सिस्टम का हिस्सा हो सकता है। इसका काम दूर स्थित टारगेट की निगरानी करना और उसकी जानकारी कमांड पोस्ट तक पहुंचाना होता है।

इसके बाद सैनिकों को आधुनिक हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है। वीडियो में दिन और रात दोनों समय निगरानी की क्षमता पर जोर दिया गया है। रात वाले हिस्से में ऊंचे पोल पर लगे कैमरे और सेंसर दिखाई देते हैं, जिनकी मदद से अंधेरे में भी इलाके पर नजर रखी जा सकती है।

वीडियो का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थर्मल इमेजिंग का है। इसमें स्क्रीन पर थर्मल कैमरे की मदद से टारगेट दिखाई देता है और उस पर क्रॉसहेयर लगा होता है। पास में बैठे सैनिक और अधिकारी हेडसेट पहनकर उसी फीड की निगरानी करते हुए सेंसर से मिलने वाली जानकारी सीधे फायर कंट्रोल सिस्टम तक दे रहे हैं, ताकि टारगेट पर तेजी से कार्रवाई की जा सकती है।

वीडियो में रात के समय आर्टिलरी फायरिंग दिखाई गई है। इससे यह बताने की कोशिश की गई है कि आधुनिक सेंसर, थर्मल कैमरे, सुरक्षित संचार प्रणाली और एंटी-ड्रोन सुरक्षा के साथ भारतीय सेना अब दिन और रात दोनों समय तेजी से और अधिक सटीक तरीके से फायर मिशन पूरा करने की क्षमता विकसित कर रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

राइजिंग स्टार कोर ने उठाया पहला कदम

राइजिंग स्टार कोर का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के योल मिलिट्री स्टेशन में स्थित है। यह पश्चिमी कमांड के अधीन काम करती है और इसके जिम्मे पंजाब, जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ संवेदनशील इलाके आते हैं।

इस कोर की जिम्मेदारी वाले इलाकों में सीमा के करीब कई महत्वपूर्ण सैन्य तैनातियां हैं। ऐसे में ड्रोन से होने वाले संभावित हमलों को देखते हुए आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला लिया गया। (Indian Army Anti Drone Cages)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा ड्रोन पर फोकस

हाल के सैन्य अभियानों और सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने भारतीय सेना का ध्यान इस खतरे की ओर और अधिक बढ़ाया है। अब केवल निगरानी करने वाले ड्रोन ही नहीं, बल्कि विस्फोटक लेकर हमला करने वाले एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसी स्थिति में केवल इलेक्ट्रॉनिक जैमर या एयर डिफेंस सिस्टम पर्याप्त नहीं माने जा रहे। सेना अब हथियार प्रणालियों की फिजिकल सेफ्टी को भी समान महत्व दे रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले अहम सबक

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखाया कि छोटे ड्रोन भी टैंक, आर्टिलरी गन और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई मामलों में कुछ लाख रुपये के ड्रोन ने करोड़ों रुपये की सैन्य संपत्ति को नष्ट कर दिया।

इसी तरह नागोर्नो-कराबाख और पश्चिम एशिया के संघर्षों में भी ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल हुआ। इन युद्धों के बाद दुनिया की कई सेनाओं ने अपनी सैन्य प्रणालियों पर अतिरिक्त सिक्योरिटी स्ट्रक्चर लगाने शुरू किए।

भारतीय सेना की मल्टी लेयर काउंटर-ड्रोन स्ट्रेटेजी

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना ड्रोन से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। सबसे पहले रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर के जरिए ड्रोन की पहचान की जाती है। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक जैमर से ड्रोन का नियंत्रण बाधित करने की कोशिश होती है। जरूरत पड़ने पर एंटी-ड्रोन हथियारों से उसे मार गिराया जाता है।

अब इन सभी उपायों के साथ एंटी-ड्रोन केज को भी शामिल किया जा रहा है। जो “लेयर्ड डिफेंस” यानी बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। (Indian Army Anti Drone Cages)

पहले टैंकों पर भी लगाए जा चुके हैं ऐसे केज

रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना इससे पहले टी-90 भीष्म टैंक, अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक और कुछ अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म पर भी ऐसे सिक्योरिटी स्ट्रक्चर का ट्रायल और इस्तेमाल कर चुकी है। अब पहली बार टोड आर्टिलरी गनों पर इस तरह का सिस्टम लगाया गया है। एंटी-ड्रोन केज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी लागत अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इससे हथियार प्रणाली की सुरक्षा काफी बढ़ जाती है। इसे स्थानीय स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग हथियारों पर लगाया जा सकता है।

इसके अलावा यदि किसी केज को नुकसान पहुंचता है तो उसे बदलना भी आसान होता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं अब इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था को तेजी से अपना रही हैं। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

बदलते युद्ध के मुताबिक बदल रही सेना

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना लगातार बदलते बैटलफील्ड के अनुभवों का अध्ययन कर रही है और उसी के अनुसार अपने हथियारों तथा सैन्य प्लेटफॉर्म में जरूरी बदलाव कर रही है। राइजिंग स्टार कोर द्वारा टो की गई आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

सेना के अनुसार, इसका उद्देश्य फॉरवर्ड एरिया में तैनात महत्वपूर्ण हथियारों की सुरक्षा बढ़ाना, गन क्रू को अतिरिक्त संरक्षण देना और ड्रोन जैसे नए खतरों के खिलाफ ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत करना है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

Infiltration of Chinese army in the Taksing Sector of Arunachal Pradesh! PLA created streets, bridges and military camps, see exclusive photo

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment:
Copyright © 2019 Raksha Samachar. All rights reserved.

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment: China’s People’s Liberation Army (PLA) has taken the ‘Kabja’ in some areas adjacent to the Taksing Sector of the Upper Subbanciary District of Arunachal Pradesh. The local social organisation NAH Welfare Society (NWS) has accused the District Administration by writing papers that China continues to increase its presence in many areas engaged in the border. Organizations say that locals have been used to collect grazing, hunting and forest yields from the forest for years now PLAs have made roads, bridges and military camps. While the Indian Army has dismissed media reports on infiltration of the Chinese Army and creating military camps.

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment: Letters sent to District Administration

According to the information found to the Defence News, the President of the NAH Welfare Society, Caru Chadeer has sent a letter to the Deputy Commissioner of Upper Subbansiri on June 25. The subject of this paper has been described as the establishment of alleged Chinese military camps within the Indian border.

The Defence News has a copy of the paper. As well as photographs of Chinese occupied areas are present.

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

The letter states that in the border areas of the Taksing Circle for the past several years PLAY Its activities are constantly increasing. The organization is alleged that China is not limited to patrols only near the border, but has also prepared roads, bridges and military infrastructure in many strategic locations.

The letter also stated that the places in which our people were hunting for a few years ago gathered forest yields from the forest and cultivated their cattle are now being described in the possession of the Chinese PLA. The organization has described it as a serious concern for locals. The Welfare Society has written that we believe that they are aimed at increasing their presence on the ground over the border. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

What are the areas of

The letter also mentions some of the special places that the local organization has reported sensitive. These include the Oying (2445) of the Asafila region, the Paniyar of the Chuzarta region, the Marafa’s Marpan, the terrain such as the Shipping Lake and Tingdingtang.

NAH Welfare Society claims that all these locations are quite close to Taksing Headquarters. The organization is alleged that PLA has established military camps in these areas and has also been prepared for road and other infrastructure to reach there.

According to the sources, the organization has also claimed that some of these terrains were under Indian control before the year 2020 and locals went there regularly. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Anxiety regarding pasture and traditional ground

The most concern in the paper is the traditional land of the locals. Organizations say that people living in border areas have been using these areas for years of pasture of animals, collecting wood and other forest products from the forest and for traditional activities.

According to the letter, now increasing the presence of PLAs in these areas affects the movement of locals. The organization has claimed that many pastures have no longer lived in their use.

Also, some religious and cultural significance sites have been mentioned in the letter. Organizations say that these areas have special significance for the local community. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Last 10 to 15 years of activity

NAH Welfare Society has said in its letter that China’s activities have been continuously seen during the last 10 to 15 years in the Taksing Sector. According to the organization, where only limited activities appeared in border areas, now road construction, construction of bridges and expansion of military infrastructure is more clearly visible.

The letter also stated that the speed of these activities has grown more in recent years. That is why the organization has requested the District Administration to extend the matter to the State Government and the Central Government. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Government of India

As per the sources, NAH Welfare Society has requested the deputy Commissioner to place the entire matter in front of the Government of Arunachal Pradesh and Government of India.

The organization has said in the letter that the concerns of people living in border areas should be seriously noted. The letter has also written that local people have full confidence in the Indian Army, but the government should also take necessary steps on the level of view of the situation.

The organization also said that administrative level of action is needed to protect border areas and protect the traditional rights of the local community. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment 7

Why Tacking Sector Is Strategically Important

Tacking arunachal pradesh The Upper Subbansiri district has a remote bordering Ilaka. It is located close to the actual control line i.e. LAC and is counted in the most sensitive areas of the Eastern Sector.

It is especially that it is included in six areas from which the Chinese army had infiltrated in 1962. It is considered strategically important due to the Ilaka hill terrain, dense forests and limited road contact. Azafila is also located near the same area, which has been mentioned in terms of border dispute for many years.

India considers the McMohan line its international border, while China continues its claim on the entire Arunachal Pradesh. This is why different claims and disputes have been revealed from time to time in the Eastern Sector. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Increased infrastructure of both countries on the border

In the past few years, both India and China have rapidly expanded the infrastructure in their own areas near the real control line.

China has developed roads, bridges, villages and other military facilities near the border. On the other hand, India has increasingly built roads, bridges and other military contact routes through the Border Road Organization. Also working on various government schemes to strengthen border villages.

This is why any local claims or complaints in the border areas are treated severely with the security perspective and the related agencies assess it at their level. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

China renames near Taksing

Actually, China from time to time arunachal pradesh The range of territories release new lists by changing the names of mountains, rivers, rivers and small settlements. It explains the "Standardized Geographic Name" (Standardized Geographical Names). Experts consider it a strategy for strengthening their claims through the Chinese "Cartographic Agrason."

China calls the whole Arunachal Pradesh "Janganaan" i.e. "South Tibet". It claims that it has been historically part of the Tibet, while India completely dismisss this claim and Arunachal Pradesh considers an integral and inseparable part of the country.

Although China has not officially renamed the Taksing of Arunachal Pradesh. But the name of some areas around Taksing has changed before. In the year 2023, China had declared a peak Chinese name named Chakmutse Gangri, located near Upper Subbansiri district, while releasing its third list. It is considered quite close to Ilaka Taksing.

China changed the name of six places of Arunachal Pradesh in April 2017 for the first time. Subsequently released new names of 23 locations in 27 and April 2026 in May 2025, 30 in March 2024, April 2023 in 15, 2023. So far, China has claimed to rename a total of 112 locations in Arunachal Pradesh.

Most names in these lists are of mountains, rivers, rivers and small settlements located near the real control line (LAC). The list of the year 2023 included the name of Chakmutse Gangri, close to Taksing, but the name of Taksing has not been changed to any list so far.

India resists this step of China every time. The Ministry of External Affairs says that only changing the name does not change the ground truth. It is clear that Arunachal Pradesh was an integral and inseparable part of India and will always remain. Arunachal Pradesh Taksing PLA Encroachment

Update (29-06-2026)

The Indian Army has officially responded to the ongoing news in the media regarding sugar infiltration in Arunachal Pradesh. The Indian Army has dismissed media reports on recent infiltration by Chinese PLA in Arunachal Pradesh and creating military camps. The military says that the news published in the media are wrong and there is no fact.

Large Ferrule in Indian Army: New Commander from New VCOAS to Southern and South Western Command, Command of LAC and Strike Core Near New Officers

Indian Army Leadership Reshuffle 2026
Lt Gen Rajesh Pushkar

Indian Army Leadership Reshuffle 2026: There are several major changes in the Indian Army from one July. The General Endurance Seth will handle the responsibility of the new Army Chief after the retirement of General Upendra Dwivedi on one side. So, the two important operational commands of the Army, the Southern Command and the South Western Command are getting the new General Officer Commanding-in-Chief (GOC-in-C). In addition, the army will also get the new Vice Chief of Army Staff, which also had the responsibility of General Endurance Seth.

It is also changing the lead of 14 cores i.e. fire and fury cores and 2 strike cores of Indian Sen, handling the security of real control line (LAC) with China in East Ladakh.

Indian Army Leadership Reshuffle 2026: Laftinant General Rajesh Pushkar will handle the responsibility of the Southern Command

Lieutenant General Rajesh Pushkar Philhaal Ambala based 2 cores i.e. Khadga Core The General Officers are commanding. The Lieutenant General Pushkar who has a military experience of about 35 years comes from the armored core of the Indian Army. He is also the 74 Armored Regiment, also known as the "Dezart Haux" has a colonel. This regiment is equipped with T-90 main combat tanks.

According to the sources, he took the command of the Armored Regiment in the operational area in his military career, led a Strategic Independent Armored Brigade and also commanded an Infantry Division in the Western region. Handle the command of the Infantry Division by the officer of the armored core is considered to be an important experience in the army as it gives practical experience of different types of war operation.

Our responsibility has also been played abroad

According to the defence formulas, the Lieutenant General Pushker remained not limited to the field command only. He has also served in the Indian Military Training Team in Bhutan. In addition, he also stayed in the Moscow-based Indian embassy, where he had additional responsibility for Armenia and Belarus.

He also served as Director General Territorial Army at the Army Headquarters. From reputed institutes such as National Defence Academy, College of Defence Management and National Defence College, he has gained higher military education. Indian Army Leadership

Why is the command so important

Pune-based Command The command with the largest geographical location of the Indian Army is considered. Subject to Maharashtra, Karnataka, Goa, Tamil Nadu, Kerala, Telangana, Andhra Pradesh, many parts of Gujarat and Union Territories.

According to the formulas, this command does not handle only the responsibility of the peace zone. Rather training, logistic support, military practice, cooperation in coastal security, preparation of disaster relief campaigns and strike formulations are also the key responsibility of the same command.

युद्ध की स्थिति में दक्षिण भारत से सैनिकों, हथियारों और सैन्य उपकरणों की आवाजाही का बड़ा हिस्सा भी इसी कमांड के जरिए ऑपरेट किया जाता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

जयपुर स्थित साउथ वेस्टर्न कमांड को मिले नए कमांडर

Indian Army साउथ वेस्टर्न कमांड की जिम्मेदारी अब लेफ्टिनेंट जनरल मोहित मल्होत्रा संभालेंगे। वह फिलहाल कोलकाता स्थित ईस्टर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर कार्यरत हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल मल्होत्रा वर्ष 1989 में भारतीय सैन्य अकादमी से पास आउट होकर 47 आर्मर्ड रेजिमेंट में कमीशन हुए थे। अपने लंबे सैन्य करियर में उन्होंने आर्मर्ड रेजिमेंट, इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड, पटियाला स्थित पहली आर्मर्ड डिवीजन और जोधपुर स्थित 12 कोर की कमान संभाली है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल और सेना मेडल सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्होंने ब्रिटेन में एडवांस्ड कमांड एंड स्टाफ कोर्स भी किया है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा में अहम भूमिका

जयपुर स्थित साउथ वेस्टर्न कमांड भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल कमांड में गिनी जाती है। इसका जिम्मा राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों और गुजरात के कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा करना है।

यह इलाका खुले रेगिस्तान, लंबी सीमा और तेज गति से आर्मर्ड कॉम्बैट ऑपरेशंस के लिए जाना जाता है। इसलिए यहां आर्मर्ड फॉर्मेशन और मैकेनाइज्ड यूनिट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आर्मर्ड कोर के अधिकारी का इस कमांड का नेतृत्व संभालना रेगिस्तानी युद्ध संचालन के अनुभव के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

दोनों प्रमुख कमांड अब आर्मर्ड कोर अधिकारियों के पास

रक्षा सूत्रों के अनुसार, सदर्न कमांड और साउथ वेस्टर्न कमांड दोनों की जिम्मेदारी अब Armoured Core के वरिष्ठ अधिकारियों के पास होगी। इससे पहले इन दोनों कमांड की जिम्मेदारी इन्फैंट्री पृष्ठभूमि के अधिकारी संभाल रहे थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय सेना में अलग-अलग हथियार शाखाओं के अधिकारियों को समय-समय पर विभिन्न कमांड देने की परंपरा रही है। इससे नेतृत्व का अनुभव व्यापक होता है और अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलता है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

पूर्वी लद्दाख में बदलेगा 14 कोर का नेतृत्व

इसी बीच भारतीय सेना की 14 कोर में भी नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है। लेह स्थित इस कोर का मुख्यालय दुनिया के सबसे ऊंचे सैन्य मुख्यालयों में गिना जाता है।

इसी कोर के जिम्मे पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा, सियाचिन ग्लेशियर और पूरे उच्च हिमालयी क्षेत्र में सैन्य संचालन की जिम्मेदारी होती है। इसी वजह से इसे “फायर एंड फ्यूरी कोर” के नाम से भी जाना जाता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, मौजूदा कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला अब नॉर्दर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ बनेंगे। उनकी जगह मेजर जनरल मदनराज पांडे पदोन्नति के बाद कोर कमांडर का पद संभालेंगे।

सबसे लंबे समय तक रहे 14 कोर कमांडर

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने करीब 24 महीने तक 14 कोर की कमान संभाली। यह सामान्य अवधि से काफी अधिक है।

आमतौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात कोर कमांडरों का कार्यकाल 13 से 15 महीने के बीच रहता है। कठिन मौसम, लगातार ऑपरेशनल दबाव और विशेष परिस्थितियों के कारण यहां लंबे समय तक एक ही अधिकारी की तैनाती कम देखने को मिलती है।

उनके कार्यकाल के दौरान भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

नए कोर कमांडर की भूमिका क्यों अहम होगी

सूत्रों के अनुसार, अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति बनी थी। इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं ने तय प्रक्रिया के तहत पीछे हटने का काम पूरा किया।

अब देपसांग के पांच और डेमचोक के दो पेट्रोलिंग प्वाइंट पर अप्रैल 2020 से पहले की तरह गश्त फिर शुरू हो चुकी है। हालांकि जिन इलाकों में पहले सैनिक पीछे हटे थे, वहां कुछ बफर जोन अभी भी बने हुए हैं।

पिछले महीने भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर बातचीत और समन्वय के लिए बने वर्किंग मैकेनिज्म यानी डब्ल्यूएमसीसी की बैठक भी हुई थी। सूत्रों का कहना है कि इसके बाद कोर कमांडर स्तर की अगली बैठक होने की संभावना है।

ऐसी स्थिति में भारतीय पक्ष का नेतृत्व नए कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मदनराज पांडे कर सकते हैं।

कोर कमांडर स्तर की इन बैठकों में सीमा पर सैनिकों की तैनाती, गश्त, आपसी समन्वय और तनाव कम करने से जुड़े सैन्य मुद्दों पर चर्चा होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन बने नए वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को भारतीय सेना का नया वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (वीसीओएएस) नियुक्त किया गया है। वह अब तक पुणे स्थित सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी-इन-सी) के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने 1 अप्रैल 2026 को सदर्न कमांड की कमान संभाली थी। इससे पहले इसी पद पर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ थे, जिन्हें बाद में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया गया और अब वे 30 जून से भारतीय सेना के नए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) का पद संभालेंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन भारतीय सेना की 13 महार रेजिमेंट से हैं। उन्हें 11 जून 1988 को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद सेना में कमीशन मिला था। करीब 38 वर्षों के सैन्य करियर में उन्होंने ऑपरेशनल, प्रशिक्षण और स्टाफ नियुक्तियों सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वह 1 अगस्त 2024 से महार रेजिमेंट के कर्नल भी हैं। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें साल 2022 में सेना मेडल (एसएम) और 2025 में अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) से सम्मानित किया गया।

उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला, भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून, डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन और केन्या के नेशनल डिफेंस कॉलेज से उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की है।

अपने लंबे सैन्य करियर के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने वर्ष 2022 में नॉर्दर्न कमांड की 16 कोर (पिवट कोर) की कमान संभाली। इसके बाद फरवरी 2024 से जून 2025 तक वह इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए), देहरादून के कमांडेंट रहे, जहां भविष्य के सैन्य अधिकारियों के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी उनके पास थी। जून 2025 से मार्च 2026 तक उन्होंने सदर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में काम किया और सेना की क्षमता बढ़ाने तथा फोर्स री-स्ट्रक्चरिंग से जुड़े कार्यों में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद 1 अप्रैल 2026 को उन्हें सदर्न कमांड का जीओसी-इन-सी नियुक्त किया गया।

लेफ्टिनेंट जनरल जैन ने ऑपरेशनल क्षेत्र में इन्फैंट्री बटालियन की कमान संभाली, स्ट्राइक कोर के तहत इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व किया और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स की कमान भी संभाली। इसके अलावा वह दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन के दौरान सेक्टर कमांडर रहे और इथियोपिया में मिलिट्री ऑब्जर्वर के रूप में भी सेवा दे चुके हैं। सेना मुख्यालय में उन्होंने मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट, मिलिट्री सेक्रेटरी ब्रांच और डायरेक्टर जनरल (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट) जैसे महत्वपूर्ण स्टाफ पदों पर भी काम किया। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

खड़गा कोर की कमान संभालेंगे लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा

लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा जल्द ही अंबाला स्थित भारतीय सेना की 2 कोर (खड़गा कोर) के नए जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) की जिम्मेदारी संभालेंगे। 2 कोर भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित स्ट्राइक कोर में से एक मानी जाती है। यह पश्चिमी मोर्चे पर जरूरत पड़ने पर तेज गति से सैन्य कार्रवाई करने वाली प्रमुख फॉर्मेशन है।

लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा इन्फैंट्री के वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह फिलहाल सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अक्टूबर 2025 में यह जिम्मेदारी संभाली थी। डीजीएमओ के तौर पर उनके पास देशभर में सेना के ऑपरेशनल प्लान, सैन्य अभियानों की निगरानी और रणनीतिक स्तर पर फैसलों से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य रहे हैं। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) से सम्मानित किया जा चुका है।

करीब 38 सालों के सैन्य करियर में लेफ्टिनेंट जनरल लूथरा ने फील्ड और सेना मुख्यालय दोनों जगह कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र में इंजीनियर ब्रिगेड की कमान संभाली, सीमा क्षेत्र में इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व किया और मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट में असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस के रूप में भी काम किया। डीजीएमओ बनने से पहले भी वह सैन्य अभियानों की योजना बनाने और ऑपरेशनल रणनीति तैयार करने से जुड़े रहे हैं।

रक्षा मामलों और भविष्य के युद्ध पर उनका अच्छा अनुभव माना जाता है। उन्होंने आधुनिक युद्ध, नई सैन्य तकनीक और भारतीय सेना की भविष्य की रणनीति जैसे विषयों पर कई महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिए हैं।

अंबाला स्थित 2 कोर (खड़गा कोर) भारतीय सेना की सबसे पुरानी और प्रमुख स्ट्राइक कोर में से एक है। यह वेस्टर्न कमांड के तहत काम करती है और जरूरत पड़ने पर पश्चिमी सीमा पर बड़े सैन्य अभियान चलाने की क्षमता रखती है। इस कोर में आर्मर्ड, मैकेनाइज्ड और अन्य लड़ाकू फॉर्मेशन शामिल हैं, जिन्हें तेजी से कार्रवाई के लिए तैयार रखा जाता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, लेफ्टिनेंट जनरल मनीष लूथरा की यह नियुक्ति हाल में हुए सेना के बड़े नेतृत्व बदलाव का हिस्सा है। वह लेफ्टिनेंट जनरल राजेश पुष्कर की जगह लेंगे, जिन्हें सदर्न कमांड का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ बनाया गया है। (Indian Army Leadership Reshuffle 2026)

Whether China or Pakistan, why does the backchannel interaction come in the name of the Union’s Ram Madhav? Entry of ISI in Colombo Track-2 Meeting!

India-Pakistan Track-2 Talks
(Image for reference only. AI-Generated Image)

India-Pakistan Track-2 Talks: Formal interaction between India and Pakistan even if long-term stops, backchannel contacts between the two countries are not completely closed. This week the track-2 and track-1.5 level interaction between the representatives of both the countries in Colombo and the capital Bangkok of Thailand. It was said that these meetings were the Chairman of the Bharat Foundation and the former National Secretary General of the BJP Ram Madhav, former Army chief General M. M. Narvane and former diplomatic interest Ghanshyam. These meetings discuss issues such as terrorism, Indus Water Treaty, maintaining communication between the two countries at the time of crisis and preventing stresses.

According to the formulas, the biggest objective of these meetings was not to reach a new agreement, but to open the way to a dialogue that could be used during a crisis in the future. The official negotiations between the two countries have not yet begun, but continue the conversation at the backchannel level are being seen as trying to maintain contact between the two sides.

India-Pakistan Track-2 Talks: Pakistan not only came into negotiations with China Ram Madhav’s name

It’s a big reason that it’s India Foundation The Chairperson is. It is a think-tank, which has been organizing several programs of track-2 i.e. informal dialogue with China. Through this platform, Indian and Chinese experts, former officers and strategic affairs have been negotiated several times. Under this, Indian delegation has also visited cities like Shanghai and Lhasa.

Ram Madhav has also written several articles on events like India-China relations, border dispute, and Gallwan. He believes that the path of interaction should remain open even while maintaining a strict stance on national security.

China or China pakistan When it comes to track-2 or backchannel conversations with, the name of Ram Madhav often lives in discussion. In the case of Pakistan he recently joined the track-2 meeting in Colombo, while in many informal dialogues connected to China, he has taken the first part. (India-Pakistan Track-2 Talks)

Off Government Negotiations, But Backchannel Contacts Released

The relations between India and Pakistan had become more stressful after April 2025’s wrestling terror attack. More than 20 people were killed in the attack, most of which were tourists. After this, India took action on the terrorist bases present in Pakistan under the Operation Sindoor. The situation calmed down on the border after the conflict stops on May 10, 2025, but political and diplomatic relationships could not be normal.

India has already clarified that terrorism and interactions cannot be held as well. This is why foreign secretary level or other formal government negotiations between the two countries have still not started. Business is limited, the high commissions of both countries are working with low staff and the movement between people is much lower than even earlier.

The informal interactions such as Track-2 and Track-1.5 in the same environment remains the only active medium of dialogue between the two countries. (India-Pakistan Track-2 Talks)

What Is Track-2 And Track-1.5 Negotiation

Track-1 interaction in international diplomacy is the one in which the existing government officials of both countries interact directly. It includes representatives of the Ministry of External Affairs, Ministry of Defence or other Government agencies.

The opposite track-2 dialog is completely informal. Retired deplomets take part of former military officers, knowledgeable, academics, journalists and think tanks of strategic matters. These meetings have no official agreement, but the views are exchanged on sensitive issues.

Track-1.5 is considered a model between both. It may also include some existing government officials with non-governmental experts. Though they are not in the role of the official interlocutor. (India-Pakistan Track-2 Talks)

What people took part in the Colombo meeting

According to the sources, the representatives of India and Pakistan interacted for a different and a half day during the regional security conference held in Colombo. The conference was held on behalf of London-based International Institute for Strategic Studies (IISS).

The Indian delegation included the Chairman of the Foundation of India and former National Secretary General of the Indian Public Party Ram Madhav, former Army Chief General M. M. Narvane and former diplomatic interest Ghanshyam.

सूत्रों के मुताबिक, 21 से 24 जून के बीच श्रीलंका दौरे पर रहे अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री एस. पॉल कपूर ने आईआईएसएस की ओर से आयोजित सम्मेलन के प्रतिभागियों के लिए रखे गए रात्रिभोज में हिस्सा लिया। इस सीमित आमंत्रण वाले कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान के कुछ प्रतिनिधि भी मौजूद थे।

pakistan की ओर से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व राजदूत शेरी रहमान, बॉलिवुड एक्टर सैफ अली खान के चाचा रिटायर्ड मेजर जनरल इस्फंदियार अली खान पटौदी और विदेश मंत्रालय के दक्षिण एशिया एवं सार्क प्रभाग के महानिदेशक सज्जाद हैदर खान मौजूद थे।

बता दें कि शेरी रहमान 2011 से 2013 के बीच अमेरिका में पाकिस्तान की राजदूत भी रह चुकी हैं। वहीं, मेजर जनरल पटौदी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई में भी सेवाएं दे चुके हैं और सेना में एक मैकेनाइज्ड डिवीजन की कमान संभाल चुके हैं। पीपीपी, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की ओर से एक मौजूदा अधिकारी की मौजूदगी के कारण कुछ हलकों में इसे ट्रैक-1.5 संवाद भी कहा गया, हालांकि भारती की तरफ से कोई मौजूदा सरकारी अधिकारी बैठक में शामिल नहीं था।

आतंकवाद और जल विवाद पर हुई खुल कर चर्चा

बैठक में आतंकवाद सबसे महत्वपूर्ण विषयों में रहा। दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार रखे। इसके अलावा सीमा पार नदियों के जल बंटवारे और सिंधु जल संधि से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

सूत्रों के अनुसार, संकट के समय दोनों देशों के बीच संवाद व्यवस्था को मजबूत करने और सैन्य तनाव को बढ़ने से रोकने के तरीकों पर भी विस्तार से विचार हुआ।

बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि इन अनौपचारिक बैठकों से निकलने वाले विचारों को भविष्य में औपचारिक ट्रैक-1 स्तर तक किस तरह पहुंचाया जा सकता है। हालांकि इस विषय पर कोई औपचारिक निर्णय सामने नहीं आया।

बैठक से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस दौर की बातचीत से कोई बड़ा या ठोस परिणाम सामने नहीं आया। इसे मुख्य रूप से संपर्क बनाए रखने और दोनों पक्षों की सोच समझने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया।

पाकिस्तानी मीडिया में ऐसी खबरें भी सामने आईं कि भारत ने सिंधु जल संधि बहाल करने के बदले पाकिस्तान से अपना हवाई क्षेत्र खोलने की बात कही थी। हालांकि बैठक में शामिल एक पाकिस्तानी प्रतिभागी ने इन दावों से इनकार किया और कहा कि ऐसी कोई पेशकश नहीं की गई। (India-Pakistan Track-2 Talks)

बैंकॉक में भी हुई थी बातचीत

सूत्रों के अनुसार, कोलंबो के अलावा बैंकॉक में भी इसी सप्ताह भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच ट्रैक-2 स्तर की चर्चा हुई। वहां भी क्राइसिस मैनेजमेंट, आतंकवाद, जल विवाद और संवाद के चैनल खुले रखने पर चर्चा हुई।

इन बैठकों में दोनों पक्षों ने मौजूदा हालात पर अपने-अपने दृष्टिकोण रखे। साथ ही यह भी चर्चा हुई कि यदि भविष्य में किसी तरह का तनाव पैदा होता है तो संचार व्यवस्था किस प्रकार सक्रिय रखी जा सकती है। (India-Pakistan Track-2 Talks)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का है सपोर्ट

बैठक में जो चेहरा बार-बार सामने आ रहा है वह है संघ के पूर्व प्रचारक राम माधव का। खास बात यह है कि वे इससे पहले चीन से वार्ता शुरू होने से पहले उन्होंने ही ट्रैक-2 की डिप्लोमेसी को लीड किया था। रक्षा समाचार ने इसकी खबर भी प्रकाशित की थी। “China-India Talks: Big Disclosure! BJP’s ThinkTank had done before the India-China talks about Beijing’s Secret Tour, Restoration of Diplomatic Relations।” यह दौरा देशों के नेताओं और विशेष प्रतिनिधियों डोभाल और वांग यी के बीच हुई बैठक से पहले हुआ था, जिसमें पूर्वी लद्दाख में तनाव को कम करने और डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत की गई थी।

इससे पहले मई और जून में संघ के दो बड़े नेताओं ने पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर अहम बातें कही थीं। संघ का मानना है कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए।

संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने मई 2026 में कहा था कि अगर पाकिस्तान पुलवामा जैसे आतंकी हमलों की कोशिश करता है, तो भारत को उसका कड़ा जवाब देना चाहिए। देश की सुरक्षा और सम्मान सबसे पहले हैं।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि बातचीत के सभी रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच हमेशा संवाद का कोई न कोई माध्यम खुला रहना चाहिए। इसी वजह से राजनयिक संबंध, व्यापार और वीजा जैसी व्यवस्थाएं पूरी तरह खत्म नहीं की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच आपसी संपर्क बढ़ने से तनाव कम हो सकता है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्ते हैं और कभी दोनों एक ही देश का हिस्सा थे। उनका मानना है कि लोगों के बीच बातचीत भविष्य में रिश्ते सामान्य बनाने में मदद कर सकती है।

वहीं, जून 2026 में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने होसबोले के बयान का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि भारत का बंटवारा गलत था। वहां कुछ पत्रकार और बुद्धिजीवी भी हैं जो संघ के काम की सराहना करते हैं। उनका कहना था कि पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग भी है जो दो-राष्ट्र सिद्धांत से सहमत नहीं है और मानता है कि दोनों देशों का साथ रहना बेहतर होता।

भागवत ने कहा कि अगर भविष्य में कभी भारत किसी युद्ध में पाकिस्तान पर बड़ी जीत हासिल करता है, तो वहां के लोगों के साथ शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए बातचीत जरूरी होगी। इसलिए संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि “हम हिटलर जैसे नहीं हैं।” उनका मतलब था कि भारत की सोच बदले की नहीं, बल्कि न्याय और शांति की है। इसलिए जहां जरूरी हो, वहां बातचीत के लिए कुछ रास्ते खुले रखने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा था कि संघ की अपनी अलग विदेश नीति नहीं है। पाकिस्तान के मामले में संगठन केंद्र सरकार की नीति का ही समर्थन करता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि होसबोले की बातें पाकिस्तान की सरकार या सेना के बारे में नहीं थीं, बल्कि वहां के आम लोगों के संदर्भ में थीं। (India-Pakistan Track-2 Talks)

राम माधव ने किया इनकार

हालांकि राम माधव का कहना है कि इस पूरे मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनके मुताबिक, यह भारत और पाकिस्तान के बीच कोई अलग ट्रैक-2 वार्ता नहीं थी, बल्कि इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) का हर साल होने वाला दक्षिण एशिया सुरक्षा सम्मेलन था। इसमें भारत, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान समेत कई देशों के विशेषज्ञ और प्रतिनिधि शामिल हुए थे। पहले भी इस सम्मेलन में विभिन्न देशों के सरकारी अधिकारी हिस्सा लेते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ट्रैक-2 वार्ता सिर्फ दो देशों के बीच होती है, जबकि इस सम्मेलन में कई देशों के प्रतिभागी मौजूद थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पूरे दो दिन चली बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। उन्हें केवल एक सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। अपना संबोधन देने के बाद वह वहां से लौट आए। उनके अनुसार, इस पूरे मामले को बेवजह सनसनीखेज बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तव में इसमें कोई नई या विशेष कहानी नहीं है। (India-Pakistan Track-2 Talks)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़े बैकचैनल संपर्क

सूत्रों के अनुसार, मई 2025 के सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच कई बैकचैनल बैठकें हो चुकी हैं। इनमें लंदन, दोहा, पश्चिम एशिया के कुछ अन्य शहर और अब कोलंबो तथा बैंकॉक शामिल हैं।

इन बैठकों में हर बार प्रतिभागियों की सूची अलग रही है। कभी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी शामिल हुए तो कभी पूर्व राजनयिक, सांसद, रणनीतिक विशेषज्ञ और थिंक टैंक से जुड़े लोग भी बातचीत का हिस्सा बने।

इन बैठकों का मकसद औपचारिक वार्ता की जगह लेना नहीं बल्कि ऐसे संवाद को जारी रखना है जिससे दोनों देशों के बीच पूरी तरह संपर्क समाप्त न हो। (India-Pakistan Track-2 Talks)

भारत का रुख पहले जैसा

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इन बैकचैनल संपर्कों को किसी भी तरह औपचारिक सरकारी वार्ता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का रुख पहले जैसा ही है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद जारी रहेगा, तब तक औपचारिक बातचीत संभव नहीं है।

सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच इस समय केवल सैन्य स्तर पर डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ हॉटलाइन जैसे सिस्टम एक्टिव हैं। दोनों देशों के डीजीएमओ नियमित रूप से हर बुधवार को तय प्रक्रिया के तहत संपर्क बनाए रखते हैं ताकि सीमा पर किसी गलतफहमी की स्थिति न बने। (India-Pakistan Track-2 Talks)

संवाद के लिए न्यूट्रल देशों का चयन

भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली अधिकांश ट्रैक-2 बैठकों के लिए ऐसे देशों का चयन किया जाता है जो दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य हों। श्रीलंका, कतर, थाईलैंड और कुछ पश्चिम एशियाई देशों में पहले भी ऐसी बैठकें होती रही हैं।

ऐसी बैठकों का आयोजन आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, शोध संस्थान या सुरक्षा सम्मेलन आयोजित करने वाले संगठन करते हैं। सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग से मुलाकात कर संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते हैं।

इस बार भी कोलंबो में आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने अलग बैठकें कीं। इसमें किसी संयुक्त बयान या आधिकारिक दस्तावेज की जानकारी सामने नहीं आई। (India-Pakistan Track-2 Talks)

सार्वजनिक पुष्टि से दोनों पक्षों ने बनाई दूरी

दिलचस्प बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान, दोनों सरकारों ने इन बैठकों पर सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के एक अधिकारी ने मीडिया से कहा कि उन्हें ट्रैक-1 के अलावा किसी बैठक की जानकारी नहीं है। वहीं भारत सरकार की ओर से भी इस विषय पर कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया।

सूत्रों का कहना है कि ट्रैक-2 या ट्रैक-1.5 बैठकों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि उन्हें आमतौर पर सार्वजनिक प्रचार से दूर रखा जाता है। यही वजह है कि प्रतिभागियों के नाम और चर्चा के पूरे विवरण भी सीमित स्तर पर ही सामने आते हैं। (India-Pakistan Track-2 Talks)

India is making ‘National Submarine’ Ecosystem, Nuclear and Diesel submarines will be the same as ‘Dimag’

Indian Navy submarine programme
(Image for reference only. AI-Generated Image)

Indian Navy Submarine Programme: Indian Navy is working on designing a kind of indigenous technology, sensor, Combat system and arms structure for two different category submarines to come. It includes the traditional diesel-electric submarines of Project-76 and Nuclear Attack Submarine of Project-77. The size of both, the engine and the operational roll will be different, but many of these important systems are planned to be placed as soon as possible.

According to the formulas, the navy wants to create a structure in which sensors of submarines, vanity control systems, sonars, electronic warfares, optronic masts, training and maintenance systems remain connected to each other. This will reduce dependence on the system of different foreign companies and spare parts, upgrades and repair work in the entire service period of the submarines.

This model Indian Navy It is therefore also important for as the submarine is considered the most complex military system of any country. It is the biggest challenge to keep the noise low in this platform working under the water, identify the enemy first and hide yourself. Developing the same kind of indigenous system in such will help keep the navy in its hands for a long time technology control.

Indian Navy Submarine Programme: Two different submarines, but many systems alike

India Nuclear Powered Attack Submarine under Project-77SSN) Developing. On the other side Project-76 Under the next generation of traditional submarines (SSKs) to be created. SSN has a nuclear reactor, while SSKs run on techniques such as diesel-electric and air-indipant proption.

Nuclear submersible can stay in the sea for a long time and reach the maritime areas of the faraway from the sharp speed. Traditional submarines are used in monitoring and attacking quietly in coastal areas, marine routes and narrow areas. While the role of the two is different, the Navy wants to keep the same several systems.

The formulas say this common system approach may include Combat Management System, Sonar, Optionic Mast, Electronic Support Majors, Communication System, Torpedo Control, Stellth Material and some Battery and Power Management Techniques. Indian Navy Submarine Programme

Combat management system will be submarine mind

The most important part of a submarine is its Combat Management System. It can also be called ‘Ndubbi’s mind. This system adds a place to information coming from sonar, radar, periscope, electronic sensors, navigation tools, and communication systems.

When Submarine There are several signs in front of the sea. The engine of a ship, propeller of another submarine, voice of marine organisms, radar signals or radio transmission, give all different types of information. The Combat Management System explains the signals to the operator by understanding how the front present target can be.

यही सिस्टम टारगेट को ट्रैक करने, टॉरपीडो लॉन्च करने, मिसाइल फायर करने और मिशन की प्राथमिकता तय करने में मदद करता है। नौसेना का सोचना है कि प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में एक जैसी मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और ऑपरेटर कंसोल लगाए जाएं। इससे एक पनडुब्बी पर तैनात कर्मी दूसरी पनडुब्बी पर भी जल्दी काम कर सकेंगे।

कॉमन कॉम्बैट सिस्टम का दूसरा फायदा सॉफ्टवेयर अपग्रेड में होगा। किसी नए सेंसर या हथियार को जोड़ने के लिए अलग-अलग विदेशी सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। भारतीय कंपनियां और डिफेंस लैब्स जरूरत के अनुसार सिस्टम में बदलाव कर सकेंगी। (Indian Navy submarine programme)

पुराने पेरिस्कोप की जगह ऑप्ट्रॉनिक मास्ट

पनडुब्बी में पेरिस्कोप का इस्तेमाल समुद्र की सतह पर मौजूद गतिविधियों को देखने के लिए किया जाता है। पुराने पेरिस्कोप सीधे प्रेशर हल के अंदर तक आते थे। इससे पनडुब्बी के अंदर जगह और मैकेनिकल सिस्टम की जरूरत बढ़ती थी।

नई पनडुब्बियों में नॉन-पेनेट्रेटिंग ऑप्ट्रॉनिक मास्ट इस्तेमाल करने की योजना है। इसका मतलब है कि मास्ट का कैमरा और सेंसर ऊपर की तरफ होंगे, लेकिन वह सीधे प्रेशर हल के अंदर नहीं आएगा। इससे पनडुब्बी के डिजाइन में ज्यादा आसानी होगी।

सूत्रों के अनुसार, इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (आईआरडीई) के बनाए ऑप्ट्रॉनिक मास्ट में हाई-डेफिनिशन कैमरा, थर्मल इमेजिंग, इन्फ्रारेड सेंसर और डिजिटल जूम जैसी तकनीक शामिल हो सकती है। यह जानकारी फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क के जरिए कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम तक पहुंचेगी।

थर्मल इमेजिंग रात में या कम रोशनी में जहाज, नाव और अन्य गर्म वस्तुओं की पहचान में मदद करती है। इन्फ्रारेड सेंसर से सतह पर मौजूद लक्ष्य का तापमान आधारित संकेत मिल सकता है। इस तरह ऑपरेटर को केवल आंख से देखने के बजाय डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा जानकारी मिलती है। (Indian Navy submarine programme)

सोनार से मिलेगी पानी के नीचे की जानकारी

पनडुब्बी के लिए Sonar उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना लड़ाकू विमान के लिए रडार। समुद्र के अंदर रडार काम नहीं करता, इसलिए पानी के भीतर मौजूद जहाजों और पनडुब्बियों की पहचान ध्वनि तरंगों से की जाती है। इस काम के लिए सोनार सिस्टम लगाया जाता है।

नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी यानी एनपीओएल के अनुभव पर आधारित इंटीग्रेटेड सोनार सिस्टम दोनों प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल किए जाने की योजना है। इसमें बो-माउंटेड सोनार, फ्लैंक अरे, टोड अरे और पैसिव इंटरसेप्ट सिस्टम जैसे उपकरण शामिल हो सकते हैं।

बो-माउंटेड सोनार पनडुब्बी के आगे वाले हिस्से में लगा होता है। फ्लैंक अरे पनडुब्बी के दोनों किनारों पर लगे सेंसर होते हैं, जो आसपास की आवाजों को पकड़ते हैं। टोड अरे एक लंबी केबल के साथ पीछे छोड़ा जाने वाला सेंसर सिस्टम होता है। यह पनडुब्बी के अपने शोर से दूर जाकर समुद्र की आवाजों को बेहतर ढंग से सुन सकता है।

पैसिव सोनार किसी ध्वनि तरंग को भेजता नहीं है। वह केवल दूसरी पनडुब्बी, जहाज या टॉरपीडो से निकलने वाली आवाज सुनता है। इसका फायदा यह है कि पनडुब्बी की पहचान नहीं हो पाती। इसी कारण पानी के नीचे युद्ध में पैसिव सोनार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indian Navy submarine programme)

वरुणास्त्र और तक्षक टॉरपीडो पर जोर

नौसेना की योजना स्वदेशी हैवीवेट Torpedo को भी दोनों प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनाने की है। वरुणास्त्र टॉरपीडो भारतीय नौसेना के लिए विकसित स्वदेशी हैवीवेट टॉरपीडो है। इसे पनडुब्बी से लॉन्च कर दुश्मन के युद्धपोत या पनडुब्बी को निशाना बनाया जा सकता है।

इसके अलावा डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (एनएसटीएल) तक्षक नाम का नया इलेक्ट्रिक हैवीवेट टॉरपीडो डेवलप कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, इसमें स्विम-आउट लॉन्च और फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस जैसी तकनीक हो सकती है। स्विम-आउट लॉन्च का अर्थ है कि टॉरपीडो ट्यूब से कम शोर के साथ बाहर निकलता है, जिससे लॉन्च के समय पनडुब्बी की पता लगाना कठिन हो जाता है।

फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस में टॉरपीडो और पनडुब्बी के बीच एक पतला तार जुड़ा रहता है। पनडुब्बी का ऑपरेटर टारगेट की स्थिति बदलने पर टॉरपीडो को नया निर्देश भेज सकता है। यह तकनीक खासतौर पर ऐसे समुद्री क्षेत्र में उपयोगी होती है जहां कई जहाज और पनडुब्बियां मौजूद हों। (Indian Navy submarine programme)

प्रोजेक्ट-77: न्यूक्लियर अटैक सबमरीन का अलग है रोल

प्रोजेक्ट-77 के तहत बनने वाली न्यूक्लियर अटैक सबमरीन आकार में काफी बड़ी होंगी। कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने अक्टूबर 2024 में शुरुआती दो एसएसएन के निर्माण को मंजूरी दी थी। इन दोनों पनडुब्बियों के लिए करीब 40 हजार करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। नौसेना के लिए कुल छह न्यूक्लियर अटैक सबमरीन बनाई जानी हैं।

इनका डिस्प्लेसमेंट करीब 10 हजार टन तक हो सकता है। इनमें भारत में डेवलप प्रेशराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया जाएगा। न्यूक्लियर रिएक्टर पनडुब्बी को लगातार ऊर्जा देता है, इसलिए उसे बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती।

एसएसएन का मुख्य काम दुश्मन की पनडुब्बियों का पीछा करना, कैरियर बैटल ग्रुप की सुरक्षा करना, समुद्री मार्गों पर निगरानी रखना और लंबी दूरी के समुद्री मिशन करना होता है। इनका निर्माण विशाखापत्तनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर में किया जाना है। इसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका भी रहेगी।

प्रोजेक्ट-76 में एआईपी और लिथियम-आयन बैटरी

प्रोजेक्ट-76 के तहत भारत अपनी नई पारंपरिक पनडुब्बी डिजाइन कर रहा है। यह प्रोजेक्ट डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, इसका डिजाइन लगभग 3,000 टन श्रेणी का हो सकता है और इसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन, लिथियम-आयन बैटरी तथा टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च होने वाली लैंड अटैक क्रूज मिसाइल की क्षमता शामिल की जा सकती है।

एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन से पनडुब्बी को बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आकर हवा लेने की जरूरत कम हो जाती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी को कुछ समय बाद स्नॉर्कल के जरिए हवा लेनी पड़ती है। यह समय उसकी पहचान का खतरा बढ़ा सकता है। एआईपी सिस्टम से पानी के नीचे लंबे समय तक रहा जा सकता है।

लिथियम-आयन बैटरी पारंपरिक बैटरियों की तुलना में ज्यादा ऊर्जा जमा कर सकती है। इससे पनडुब्बी अधिक समय तक चुपचाप चल सकती है। हालांकि समुद्री उपयोग के लिए ऐसी बैटरियों में सुरक्षा, तापमान नियंत्रण और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। (Indian Navy submarine programme)

स्टेल्थ के लिए एनिकॉइक टाइल और पंप-जेट पर काम

पनडुब्बी युद्ध में सबसे अहम बात यह है कि दुश्मन को आपकी पनडुब्बी की आवाज न मिले। इसी के लिए हल के ऊपर एनिकॉइक टाइल लगाई जाती हैं। ये विशेष रबर जैसी परतें होती हैं, जो दुश्मन के एक्टिव सोनार से आने वाली ध्वनि तरंगों को सोखने या बिखेरने में मदद करती हैं।

इसके अलावा पंप-जेट प्रोपल्शन पर भी विचार किया जा रहा है। सामान्य प्रोपेलर पानी को घुमाकर पनडुब्बी को आगे बढ़ाता है, लेकिन तेज गति पर उससे कैविटेशन नाम का शोर पैदा हो सकता है। पंप-जेट में ब्लेड एक ढके हुए डक्ट के अंदर होते हैं। इससे शोर और कंपन कम करने में मदद मिलती है।

प्रोजेक्ट-77 में न्यूक्लियर प्रोपल्शन और प्रोजेक्ट-76 में डीजल-इलेक्ट्रिक तथा एआईपी सिस्टम अलग रहेंगे, लेकिन शोर कम करने वाली तकनीक, अकॉस्टिक मैनेजमेंट और स्टेल्थ मटेरियल को एक जैसा रखने की कोशिश की जा रही है। हाई-टेंसाइल स्टील जैसे महत्वपूर्ण मटेरियल में भी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर ध्यान है। (Indian Navy submarine programme)

पुराने अनुभवों से ली सीख

भारतीय नौसेना के पास अलग-अलग देशों की पनडुब्बियां रही हैं। रूस की किलो क्लास, जर्मन डिजाइन की एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां और फ्रांसीसी स्कॉर्पीन डिजाइन पर बनी कलवरी क्लास की पनडुब्बियों में अलग-अलग सिस्टम, स्पेयर और अपग्रेड व्यवस्था रही है। इससे रखरखाव का स्ट्रक्चर जटिल हो जाता है।

सूत्रों का कहना है कि इससे विदेशी निर्भरता कम होगी। किसी विदेशी प्लेटफॉर्म के लिए स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी दस्तावेज या अपग्रेड मंजूरी पर निर्भर रहने से लंबे समय में समस्या पैदा हो सकती है। यदि सप्लायर देश की नीति बदले या उत्पादन लाइन बंद हो जाए तो नौसेना के सामने मेंटेनेंस का संकट खड़ा हो सकता है।

इसी वजह से प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में स्वदेशी कॉम्बैट सिस्टम, सोनार, हथियार और सेंसर को प्राथमिकता दी जा रही है। दोनों प्रोजेक्टस में 90 से 95 फीसदी तक स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। (Indian Navy submarine programme)

एक जैसी तकनीक से ट्रेनिंग और रखरखाव आसान होगा

कॉमन सिस्टम का सीधा फायदा नौसेना के क्रू को मिलेगा। यदि दोनों पनडुब्बियों में डिस्प्ले, कंट्रोल कंसोल और सॉफ्टवेयर की मूल संरचना समान होगी तो प्रशिक्षण का समय कम हो सकता है। पनडुब्बी चालक दल को हर नई क्लास के लिए बिल्कुल अलग ऑपरेटिंग सिस्टम सीखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेंटेनेंस के स्तर पर भी एक जैसे टेस्ट उपकरण, सिमुलेटर, रिपेयर प्रक्रिया और स्पेयर सपोर्ट इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे नौसेना को अलग-अलग सप्लाई चेन बनाने की जरूरत कम होगी। रक्षा उद्योग के लिए भी यह बड़ा अवसर होगा क्योंकि डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी कंपनियों को लंबे समय तक एक ही तरह के सिस्टम के उत्पादन और अपग्रेड का काम मिल सकेगा। (Indian Navy submarine programme)

Exclusive: A big crisis even on AMCA’s engine like Tejas! The price of three times increased F-414, starting to seek another option!

AMCA MK1 GE F414 Engine
(Image for reference only. AI-Generated Image)

AMCA MK1 GE F414 Engine: Light Combat Aircraft Tejas MK-1A is a tremendous screw trapped by India’s fifth generation fighter jet advanced medium Combat Aircraft (AMCA) engine. Sources related to this matter Defence News The U.S. company GE Aerospace has grown heavily in F-414 (F414-INS6) engine prices to be planted in AMCA MK-1 (AMCA MK1). While looking for new engines has begun following this arbitrary of GE Airspace. If it happens that the prototype of AMCA, like the Tejas project can be delayed for two to three years.

AMCA MK1 GE F414 Engine: Technical Negotiation Complete, Commercial Negotiation Attka!

GE Aerospace And between DRDO, India has become agreed in April on Technical Negotiation with the creation of F-414 engine. While the interaction on commercial negotiation has started from May.

According to the exclusive information of the defence news, the costing was negotiated in this meeting with GE officials in New Delhi in May. Meanwhile, GE Aerospace has released up to three times in F-414 prices. It is extremely important to know that HAL and ADA are different negotiation for the F-414 engine.

Sources say that the first F-414 engine’s approximate price was between around 70 to 80 crore, but now the GE Aerospace has increased to about three times per engine cost.

Commercial Negotiation also includes technology transfer, license manufacturing, Indian production line, quality standard, spare parts, repair, overhaul, warranty, delivery schedule and price growing formula. (AMCA MK1 F414 Engine)

15 engine needs for five prototypes

AMCA The prototype phase of the program plans to create five flying prototypes. According to the formulas, there are two operational engines and an additional engine needed for each prototype, having a twin engine plane. Total 15 engines need for five prototypes like this.

The sources of defence news reported that the Negotiation team of DRDO-ADA was also surprised when the GE has revealed increased prices during the Karmic Negotiation. After which he also said to buy only 8 engines instead of 15 for prototypes from GE. But the team of GE Aerospace did not even miss the price.

On May 27, this year, the Request for Prototype issued for the AMCA prototype is written in the proposal that the first flight target has been placed within 30 months after the contract is signed. Around 1,800 test sortings are to be completed in 84 months with five prototypes. Aerodynamics, Flight Controls, Engine Performance, Radar, Sensors, Weapon and Stealth will be tested in these flights. (AMCA MK1 GE F414 Engine)

For assembly line Rs 6000 crore

Sources reported that GE Aerospace F-414 इंजन के लिए भारत में एक डेडिकेटेड असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग लाइन बनाने का प्रस्ताव भी दिया है। लेकिन इसके बदले में जीई एयरोस्पेस ने 800 मिलियन डॉलर यानी 6000 करोड़ रुपये की मांग की है। इस असेंबली लाइन के जरिए एएमसीए एमके-1 के लिए इंजन बनाए जाएंगे।

सूत्रों ने बताया कि इस असेंबली लाइन के जरिए एफ-414 इंजन के साथ वायुसेना की तुरंत जरूरतों को पूरा करने के लिए एएमसीए एमके-1 के लगभग चार स्क्वॉड्रन बनाए जा सकते हैं। इन स्क्वाड्रनों में करीब 80 फाइटर जेट्स शामिल होंगे। इस तरह अकेले एएमसीए प्रोजेक्ट के लिए ही लगभग 200+ इंजन की जरूरत पड़ सकती है। वहीं यही इंजन फ्यूचर फाइटर जेट्स तेजस एमके-2 और TEDBF के लिए भी इस्तेमाल किए जाने हैं।

सूत्रों का कहना है कि असेंबली लाइन का सेटअप दो साल में पूरा करने की बात कही है। भारत में F-414 इंजन का निर्माण एचएएल की बेंगलुरु स्थित फैसिलिटी में लाइसेंस प्रोडक्शन सिस्टम के तहत किया जा सकता है। यह काम लगभग 1 अरब डॉलर (लगभग 9,470 करोड़ रुपये) के लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन एग्रीमेंट के तहत होगा।

हालांकि लाइसेंस प्रोडक्शन में इंजन का मूल डिजाइन जीई के पास रहेगा, लेकिन एचएएल को तय शर्तों के तहत भारत में इंजन बनाने की अनुमति मिलेगी। इसमें कुछ पार्ट्स भारत में बनाए जा सकते हैं, कुछ पार्ट्स विदेश से आ सकते हैं और अंतिम असेंबली भारत में की जा सकती है। भारत में बने पहले एफ-414 इंजन को साल 2029 के मध्य तक तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

इसमें प्रोडक्शन इक्विपमेंट्स, टेक्निकल डॉक्यूमेंट्स, ट्रेनिंग, सप्लाई चेन, क्वालिटी कंट्रोल और लाइसेंस शामिल है। एफ-414 के लिए पहले करीब 80 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात कही थी।

बता दें कि सरकार ने एएमसीए प्रोजेक्ट के तहत प्रोटोटाइप डेवलपमेंट फेज के लिए 15,803 रुपये की राशि तय की है। जिसे मार्च 2024 में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने मंजूरी दी थी। इसमें 5 फ्लाइंग प्रोटोटाइप बनाना, स्ट्रक्चरल टेस्टिंग, फ्लाइट टेस्टिंग, इंटीग्रेशन आदि शामिल है। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

एएमसीए के लिए दूसरे इंजन की तलाश!

सूत्रों के मुताबिक, एफ-414 की लागत बढ़ने के बाद DRDO एएमसीए एमके-1 के इंजन के लिए दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहा है। हालांकि इंजन बदलने का फैसला इतना आसान नहीं होता। क्योंकि यह विमान के डिजाइन, एयर इनटेक, वेट रेशियो, थ्रस्ट, इलेक्ट्रिकल पावर, फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन से जुड़ा होता है।

अगर ऐसा होता है तो क्या एएमसीए के डिजाइन में बदलाव होगा। तो इस पर सूत्रों ने बताया कि एएमसीए को डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह फ्रीज हो चुका है। दूसरे वेंडर से एएमसीए के डिजाइन के मुताबिक इंजन बनाने के लिए कहा जाएगा और ऐसा करना पॉसिबल है। इंजन बदलने से एयरक्राफ्ट के स्ट्रक्चर पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

फ्रांस की साफरान, ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस और जीई एयरोस्पेस ने भारत के सामने इंजन सहयोग को लेकर प्रस्ताव रखे हैं। साफरान और रोल्स-रॉयस की ओर से आईपीआर और 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की भी की गई है।

एएमसीए एमके-1 में एफ-414 इंजन का इस्तेमाल किया जाना है। यह शुरुआती प्रोटोटाइप, फ्लाइट टेस्ट और शुरुआती प्रोडक्शन बैच के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

इसके बाद एएमसीए एमके-2 के लिए अधिक ताकतवर 110 से 120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन की जरूरत है। इस इंजन को भारत और किसी विदेशी इंजन निर्माता के सहयोग से बनाने की योजना है। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

AMCA MK1 GE F414 Engine
Image Credit: Aero India 2025

एएमसीए एमके-1 के लिए क्यों चुना गया था एफ-414 इंजन

फिफ्थ जनरेशन AMCA भारत का प्रस्तावित ट्विन इंजन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री के सहयोग से डेवलप किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने मई 2025 में एएमसीए के लिए इंडस्ट्री पार्टनरशिप आधारित एक्जीक्यूशन मॉडल को मंजूरी दी थी। इस मॉडल में निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों की भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग लेने का मौका दिया गया है।

एएमसीए एमके-1 (AMCA MK1) के लिए दो जीई एफ-414-जीई-आईएनएस6 (F-414-GE-INS6) आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन लगाने की योजना बनाई गई थी। यही इंजन तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर प्रोग्राम (TEDBF) के लिए इस्तेमाल किया जाना है।

एएमसीए के शुरुआती एमके-1 वर्जन को दो एफ-414 इंजन के साथ डेवलप किया जाएगा। एफ-414 एक आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन है। आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल फाइटर जेट को तेज रफ्तार और अतिरिक्त थ्रस्ट देने के लिए किया जाता है।

एफ-414-आईएनएस6 लगभग 98 किलो न्यूटन थ्रस्ट देता है। चूंकि एएमसीए में दो इंजन होंगे, इसलिए विमान को कुल मिलाकर लगभग 196 किलो न्यूटन के आसपास आफ्टरबर्निंग थ्रस्ट मिल सकता है। यह थ्रस्ट विमान के वजन, हथियार, ईंधन, स्टेल्थ डिजाइन और फ्लाइट प्रोफाइल के हिसाब से महत्वपूर्ण होता है।

एफ-414 को शुरुआती चरण के लिए चुनने की एक वजह यह भी है कि यह आजमाया हुआ इंजन है। इस इंजन का इस्तेमाल अमेरिकी एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट, ईए-18जी ग्राउलर और साब ग्रिपेन-एफ जैसे फाइटर जेटों में किया जा चुका है। वहीं, भारत के लिए इसका आईएनएस6 वर्जन अलग कॉन्फिगरेशन के साथ आएगा। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

जीई ने क्यों बढ़ाई कीमतें

सूत्रों के अनुसार, जीई ने एफ-414 इंजन की कीमत बढ़ने के पीछे एयरोस्पेस ग्रेड मटेरियल्स, टाइटेनियम, कंपोजिट मटेरियल और इंजन में इस्तेमाल होने वाले विशेष कंपोनेंट्स की कीमतों में बढ़ोतरी को वजह बताया है। फाइटर जेट इंजन में सामान्य मेटल या साधारण पार्ट्स इस्तेमाल नहीं होते। इसके लिए बहुत उच्च तापमान सहने वाले टरबाइन ब्लेड, विशेष कोटिंग, प्रिसाइज मशीनिंग और महंगे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जरूरत होती है।

जीई एयरोस्पेस ने साल 2025 में अमेरिका में अपनी सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत करने के लिए करीब एक अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी।

सूत्रों का कहना है कि GE Aerospace इंजन की कीमत के साथ उसकी पूरी सर्विस लाइफ का खर्च भी कॉन्ट्रैक्ट में शामिल करना चाहती है। एक फाइटर जेट इंजन करीब 20 से 30 साल तक सेवा में रह सकता है। इस दौरान स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर, ओवरहॉल, मेंटेनेंस, तकनीकी सहायता और भारतीय इंजीनियरों की ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती रहती है। कंपनी चाहती है कि इन सभी खर्चों को पहले से कमर्शियल डील में ध्यान में रखा जाए।

सूत्रों ने बताया कि जीई सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम और करेंसी फ्लक्चुएशन का असर भी कीमत में शामिल करना चाहती है। इंजन के कई महत्वपूर्ण पार्ट्स अलग-अलग देशों से आते हैं। यदि किसी देश में प्रोडक्शन रुकता है, कच्चे माल की कमी होती है या डॉलर-रुपये एक्सचेंज रेट में बड़ा बदलाव आता है, तो इंजन की लागत बढ़ सकती है। जीई इस जोखिम को अपने प्रॉफिट मार्जिन के साथ कवर करना चाहती है।

इसी वजह से प्राइस एस्केलेशन फॉर्मूला भी बातचीत का अहम हिस्सा बना हुआ है। इसका मतलब है कि अगर आने वाले वर्षों में महंगाई, कच्चे माल की कीमत या उत्पादन लागत बढ़ती है, तो इंजन की कीमत भी तय फॉर्मूले के अनुसार बढ़ सके। (AMCA MK1 F414 Engine)

प्राइवेट सेक्टर को मिली बड़ी भूमिका

एएमसीए प्रोग्राम में प्राइवेट सेक्टर की भी भूमिका होगी। रक्षा मंत्रालय के स्वीकृत एक्जीक्यूशन मॉडल के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) इंडस्ट्री पार्टनरशिप के साथ प्रोग्राम को आगे बढ़ाएगी। पांच प्रोटोटाइप के निर्माण के लिए तीन कंसोर्टिया पहले से शॉर्टलिस्ट हो चुके हैं। इनमें लार्सन एंड टुब्रो के साथ भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज के साथ बीईएमएल जैसे नाम शामिल हैं। इनमें से सबसे सस्ती और टेक्निकली योग्य बिड वाले कंसोर्टियम को ही चुना जाएगा।

इस मॉडल में एडीए विमान की डिजाइन अथॉरिटी बनी रहेगी, जबकि चुनी गई निजी कंपनी प्रोटोटाइप निर्माण, उत्पादन व्यवस्था, सप्लाई चेन और आगे की निर्माण क्षमता में अहम भूमिका निभाएगी। इसमें कंपनी आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी में नई ग्रीनफील्ड फैसिलिटी में एडीए के साथ मिल कर 5 प्रोटोटाइप और एक स्ट्रक्चरल टेस्ट आर्टिकल बनाएगी। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

कब से शुरू होगा एएमसीए का प्रोडक्शन

योजना के मुताबिक साल 2027 के आखिर तक एएमसीए के पहले प्रोटोटाइप की असेंबली शुरू करने का लक्ष्य है। पहला एएमसीए प्रोटोटाइप साल 2028 के आखिर तक रोलआउट करने का टारगेट रखा गया है। वहीं, एएमसीए की पहली उड़ान साल 2029 में कराने की योजना है। पहली उड़ान को मेडन फ्लाइट कहा जाता है।

पहले प्रोटोटाइप के बाद बाकी चार प्रोटोटाइप भी चरणबद्ध तरीके से तैयार किए जाएंगे। शुरुआती प्रोटोटाइप मुख्य रूप से विमान की उड़ान क्षमता, एयरफ्रेम, इंजन और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम की जांच के लिए होंगे। बाद के प्रोटोटाइप में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, हथियार, मिसाइल, सेंसर और दूसरे मिशन सिस्टम की टेस्टिंग की जा सकती है।

योजना के अनुसार वर्ष 2029 से 2031 के बीच पांचों प्रोटोटाइप तैयार किए जाने हैं। इनके साथ हजारों घंटे की टेस्टिंग होगी। वहीं, साल 2032 तक एएमसीए के शुरुआती सर्टिफिकेशन का लक्ष्य रखा गया है। शुरुआती सर्टिफिकेशन को इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस यानी आईओसी कहा जाता है। आईओसी मिलने के बाद एएमसीए एमके-1 का लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन शुरू हो सकता है।

मौजूदा योजना के मुताबिक एएमसीए एमके-1 के शुरुआती विमान साल 2033 से 2034 के बीच तैयार हो सकते हैं। जबकि साल 2035 के आसपास एएमसीए एमके-1 का फुल रेट प्रोडक्शन शुरू करने का लक्ष्य है। इसके बाद धीरे-धीरे स्क्वाड्रन बनाए जाएंगे। (AMCA MK1 GE F414 Engine)

On the one hand, Trump’s compliments, then on the other hand heals the arms from China! After the operation shift, Pakistan is buying these weapons

Pakistan-China weapons deal
(Image for reference only. AI-Generated Image)

Pakistan-China weapons deal: Pakistan’s Prime Minister Shahbaj Sharif and the Army Chief Field Marshal Aim Monir talks about the best relationships with the US on public forums. Do not sneeze the bridge of both US compliments. While Trump also tells himself the true friend of Pakistan. Even after the operation shift, Pakistan had left the role of the US President Donald Trump. Even Shahbaz and Munier had nominated the Trump for the Noble Prize. But it is Pakistan’s doubleness, where it makes the U.S. and Trump owl by tying the Tarief’s bridge, while it comes to buying arms, it’s just China.

Indeed, Pakistan’s real weapon dependence is hinged on China, while Turkidura has emerged by becoming a significant defence partner. The record of Pakistan’s defence purchase shows a few other photographs. The major needs associated with its fighter aircraft, missiles, air defenses, drones, submarines and ammunition are met by China and Turkis.

Pakistan-China weapons deal: Cipari report opened pole

Stockholm International Peace Research Institute i.e. English According to the report released in March 2026, an increase of 66 per cent in Pakistan’s arms imports between 2021 to 2025. In this period, 80 percent of Pakistan’s total arms import came from China. The figure during the year 2016 to 2020 was 73 percent over the last five-year period. Pakistan has been involved in the world’s large arms importers according to SIPRI and China has become its largest defense supplier.

Pakistan has been on the fifth number in the world’s major arms importers in the data of March 2026 of Sipari. According to the report, China’s share in Pakistan’s imported military capacity reached 80 percent. Following which is the number of Turki and the Netherlands. Pakistan Air Force’s JF-17 fighter aircraft is China long-main partner in Naval Hungor category submarines, air defense systems, radars, missiles and drone projects.

At the same time, Turki has also emerged as the second important supplier of Pakistan with 7 percent stake. The collaboration is enhanced on devices connected with drones, naval platforms, electronic systems, ammunitions and air defenses from Turkey. After which the Netherlands is the third country with a share of 4.6 per cent.

While the shocking thing is that Pakistan with a trembling deep friendship buys extremely low arms from the US. While Pakistan is also focusing on producing combined with China and Turki, local assembly, technical support and enhancing the ammunition production capacity.

Thrust air defense after operation shifter

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन नेटवर्क और लंबी दूरी की मारक क्षमता पर विशेष ध्यान दिया। इस दौरान चीन से एचक्यू सीरीज के एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और संबंधित मिसाइल उपकरणों की जरूरतों की समीक्षा की गई।

पाकिस्तान के पास पहले से चीनी एचक्यू-9/पी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है। यह लंबी दूरी का सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल लड़ाकू विमान, बड़े ड्रोन और कुछ प्रकार की मिसाइलों के खिलाफ किया जा सकता है। इसके साथ मध्यम और कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए जाते हैं, ताकि अलग-अलग ऊंचाई और दूरी पर आने वाले लक्ष्यों को ट्रैक किया जा सके।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने चीन से अतिरिक्त एचक्यू सीरीज की 12 एयर डिफेंस बैटरियों, एचक्यू-19 एयर डिफेंस सिस्टम, तथा एचक्यू-17 से संबंधित उपकरणों की खरीद पर काम तेज किया है। एचक्यू-17 को कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों के खिलाफ किया जाता है। लंबी दूरी के एचक्यू-9 जैसे सिस्टम के साथ छोटे रेंज के एयर डिफेंस सिस्टम लगाए जाते हैं, ताकि बड़े रडार और मिसाइल बैटरियों को ड्रोन या लो-फ्लाइंग हथियारों से सुरक्षा मिल सके। हालांकि इनमें से कुछ डिलीवर हो गई है, तो कुछ की डिलीवरी 2027 तक होनी है। (Pakistan-China weapons deal)

Pakistan-China weapons deal

तुर्किए से हिसार CUAS सिस्टम

Pakistan and तुर्किए के बीच एयर डिफेंस सहयोग भी बढ़ा है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की तुर्किए के हिसार-1 सिस्टम और उससे जुड़े कमांड तथा रडार उपकरण खरीदे हैं। हिसार-1 काउंटर अनमैन्ड एरियर सिस्टम (C-UAS) है। इन्हें ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों जैसे टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए डेवलप किया गया है।

तुर्किए के एयर डिफेंस सिस्टमों में मोबाइल लॉन्चर, रडार और कमांड वाहन शामिल होते हैं। इनका एक लाभ यह है कि इन्हें सड़क मार्ग से तेजी से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। युद्ध के दौरान एयर डिफेंस यूनिट को एक ही जगह लंबे समय तक रखने से उसके निशाने पर आने का खतरा बढ़ता है। इसलिए मोबाइल सिस्टमों को तैनाती के बाद स्थान बदलने की क्षमता के हिसाब से डिजाइन किया जाता है।

पाकिस्तान के लिए तुर्किए से सहयोग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि दोनों देश ड्रोन, नौसेना और गोला-बारूद क्षेत्र में पहले से साथ काम कर रहे हैं। तुर्किए की रक्षा कंपनियां पाकिस्तान को केवल प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, रखरखाव और स्थानीय उत्पादन में भी मदद करती हैं। (Pakistan-China weapons deal)

Pakistan-China weapons deal
Sarforash Drone

लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन खरीदने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने हाल ही में विंग्ड इनोवेटिव सॉल्यूशंस से सरफरोश और यलगार नाम के दो ड्रोन खरीदे हैं। ये दोनों कैनिस्टर लॉन्च वाले कामिकेज ड्रोन और अलग-अलग रेंज के यूएवी हैं। इनकी रेंज 200 किलोमीटर, 340 किलोमीटर, 500 किलोमीटर और 1,000 किलोमीटर तक है। पाकिस्तान लंबे समय से सर्विलांस और स्ट्राइक ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

कैनिस्टर लॉन्च सिस्टम का मतलब है कि ड्रोन को एक बंद कंटेनर या ट्यूब में रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर उसे जमीन से, वाहन से या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। इसमें ड्रोन को खुले रनवे या बड़े लॉन्च क्षेत्र की जरूरत कम होती है। सैन्य इस्तेमाल में ऐसे सिस्टम का फायदा यह होता है कि उन्हें छिपाकर रखा जा सकता है और तेजी से तैनात किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान अलग-अलग वजन और वारहेड क्षमता वाले तीन से चार प्रकार के ड्रोन विकल्पों पर काम कर रहा है। इनमें फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता, जीपीएस बेस्ड नेविगेशन, जैसे फीचर हैं। (Pakistan-China weapons deal)

चीन से हाई एनर्जी लेजर सिस्टम

पाकिस्तान चीन से हाई एनर्जी लेजर वेपन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। इसकी रेंज 7 से 8 किलोमीटर बताई गई है। इस तरह के सिस्टम को डायरेक्टेड एनर्जी वेपन कहा जाता है। इसमें पारंपरिक मिसाइल या गोला-बारूद की जगह बहुत शक्तिशाली लेजर बीम का इस्तेमाल किया जाता है।

लेजर सिस्टम का इस्तेमाल खासकर छोटे ड्रोन, क्वाडकॉप्टर, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्य और कुछ हल्के हथियारों के खिलाफ किया जा सकता है। लेजर बीम लक्ष्य के किसी संवेदनशील हिस्से को गर्म करके उसे नुकसान पहुंचाती है। ड्रोन के कैमरे, बैटरी, मोटर, कंट्रोल सिस्टम या वारहेड को निशाना बनाया जा सकता है।

लेकिन लेजर वेपन की अपनी सीमाएं भी होती हैं। धूल, धुआं, बारिश, कोहरा और खराब मौसम इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकते हैं। इसके लिए लगातार बिजली सप्लाई, टारगेट को सटीक ट्रैक करने वाला सेंसर और स्टेबल बीम कंट्रोल जरूरी होता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आमतौर पर पारंपरिक मिसाइल आधारित एयर डिफेंस के साथ मिलकर काम करते हैं। (Pakistan-China weapons deal)

जेएफ-17 का नया बैच

पाकिस्तान वायुसेना का जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसका इस्तेमाल एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक और सीमित समुद्री मिशनों में किया जा सकता है। यह विमान पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स और चीन की एवीआईसी के सहयोग से डेवलप किया गया था।

जेएफ-17 के नए वर्जन में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइल एकीकरण और कॉकपिट डिस्प्ले में सुधार किया गया है। ब्लॉक-3 वर्जन में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए रडार लगा है। एईएसए रडार में कई छोटे ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होते हैं, जिससे रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच काम करने की क्षमता बेहतर होती है।

इसके अलावा पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स जे-35 की डिलीवरी भी इसी साल शुरू होने वाली है। पाकिस्तान ने 40 जे-35AE (एक्सपोर्ट वेरिएंट) खरीदने की योजना बनाई है। यह चीन का J-35 का पहला एक्सपोर्ट ऑर्डर होगा। सूत्रों के मुताबिक पहला छोटा बैच 2026 के अंत तक आ सकता है। हालांकि पायलट ट्रेनिंग पहले से चीन में शुरू हो चुकी है। (Pakistan-China weapons deal)

हंगोर क्लास पनडुब्बी

पाकिस्तान नौसेना का सबसे बड़ा चीन समर्थित कार्यक्रम हंगोर क्लास की पनडुब्बियां हैं। पाकिस्तान ने चीन से आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का समझौता किया था। इनमें से कुछ पनडुब्बियां चीन में बनाई जानी हैं और कुछ पाकिस्तान में कराची शिपयार्ड में असेंबल की जानी हैं। इनमें से चीन से एक पनडुब्बी पाकिस्तान को डिलीवर भी हो चुकी है। जिसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं।

आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन जैसी तकनीक भी है, जिससे वे बिना सतह पर आए अधिक समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं। डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां समुद्री निगरानी, समुद्री रास्तों की सुरक्षा, टॉरपीडो हमले और एंटी-शिप मिसाइल ऑपरेशन के लिए उपयोग की जाती हैं। पनडुब्बी कार्यक्रम पाकिस्तान की समुद्री रणनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि अरब सागर में उसकी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। (Pakistan-China weapons deal)

तुर्की और चीन के साथ गोला-बारूद, आर्टिलरी का प्रोडक्शन

सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने गोला-बारूद के स्थानीय उत्पादन को बढ़ाने के लिए तुर्की और चीन के साथ दो अलग-अलग परियोजनाओं पर काम शुरू किया है। इनमें पहली परियोजना 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले से जुड़ी है, जबकि दूसरी 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद उत्पादन से संबंधित है।

155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले के लिए पाकिस्तान की वाह इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने तुर्की की कंपनी रेपकॉन के साथ समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान में एक ऑटोमेटेड प्रोडक्शन लाइन और एक्सप्लोसिव फिलिंग लाइन लगाई जानी है। इस लाइन की सालाना क्षमता करीब 1 लाख 20 हजार 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल बनाने की बताई गई है। वाह इंडस्ट्रीज, पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों से जुड़ी कंपनी है और सेना के लिए हथियार तथा गोला-बारूद तैयार करती है। 155 मिलीमीटर गोले लंबी दूरी की तोपों में इस्तेमाल होते हैं। इन्हें हाई एक्सप्लोसिव, स्मोक और अन्य प्रकार के मिशनों में उपयोग किया जा सकता है।

दूसरी परियोजना 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद से जुड़ी है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान इसमें चीन की नोरिन्को की तकनीकी मदद ले रहा है। 125 मिलीमीटर गोला-बारूद पाकिस्तान के अल-खालिद और अल-जरार जैसे टैंकों की मुख्य जरूरत है। इसमें आर्मर पियर्सिंग, हाई एक्सप्लोसिव और हीट श्रेणी के राउंड शामिल हैं।

पाकिस्तान के पास चीन निर्मित विंग लूंग श्रेणी के आर्मर्ड ड्रोन पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा चीन के साथ सेंसर, डेटा लिंक और ड्रोन नियंत्रण तकनीक में भी सहयोग रहा है। पाकिस्तान ने चीन की मदद से शाहपर, बुर्राक और अन्य यूएवी प्लेटफॉर्म भी डेवलप किए हैं। (Pakistan-China weapons deal)

Pakistan-China weapons deal

चीन से 28 मिलियन के ड्रोन खरीदे

वहीं पाकिस्तान ने चीन के साथ 1000 ड्रोन सिस्टम की खरीद के लिए करीब 20 करोड़ युआन का सौदा किया है। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 230 से 240 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह खरीद रावलपिंडी स्थित जीडब्ल्यूअल्फा टेक प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से की जा रही है। कंपनी रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और एयरोस्पेस सिस्टम इंटीग्रेशन के क्षेत्र में काम करती है तथा नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क से जुड़ी हुई है।

इस सौदे के तहत चीन से ड्रोन प्लेटफॉर्म, सेंसर, कम्युनिकेशन उपकरण, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और अन्य सहायक सिस्टम लिए जाएंगे। इन ड्रोन की रेंज 40 किमी, 200 किमी औऱ 500 किमी तक होगी। इन ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल सीमा निगरानी, वीडियो सर्विलांस, जीपीएस आधारित टारगेट पहचान और सैन्य यूनिटों तक रियल टाइम जानकारी पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान चीन से मिलने वाले सिस्टम और कंपोनेंट्स को स्थानीय स्तर पर इंटीग्रेट करने की दिशा में भी काम कर रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान निजी कंपनियों के जरिए ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और एयरोस्पेस उपकरणों की स्थानीय क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान 300-400 मल्टीकॉप्टर की भी खरीद कर रहा है। साथ ही, पाकिस्तान चीन से एंटी ड्रोन गन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। (Pakistan-China weapons deal)

अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी

पाकिस्तान नेवी समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी कर रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव अमेरिकी क्लियरेंस प्रक्रिया में भेजा गया है। हालांकि खरीद की अंतिम मंजूरी, कीमत और डिलीवरी शेड्यूल पर अभी कोई सार्वजनिक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

एमएच-60आर को रोमियो हेलीकॉप्टर भी कहा जाता है। यह अमेरिकी नौसेना का मल्टी-रोल समुद्री हेलीकॉप्टर है। इसका मुख्य उपयोग पनडुब्बी रोधी युद्ध, सतह पर मौजूद जहाजों की पहचान, समुद्री गश्त, लक्ष्य की निगरानी और खोज-बचाव मिशन में होता है।

इस हेलीकॉप्टर में समुद्र की सतह और हवा में मौजूद लक्ष्यों को खोजने के लिए रडार लगाया जाता है। पनडुब्बी की तलाश के लिए इसमें डिपिंग सोनार और सोनाबॉय जैसे उपकरण लगाए जा सकते हैं। डिपिंग सोनार को हेलीकॉप्टर से समुद्र में नीचे उतारा जाता है। यह पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजकर पनडुब्बी की मौजूदगी का पता लगाने में मदद करता है। सोनाबॉय छोटे सेंसर होते हैं, जिन्हें समुद्र में गिराया जाता है और वे पानी के भीतर की आवाजों का डेटा भेजते हैं।

एमएच-60आर को टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल, रॉकेट और मशीन गन जैसे हथियारों के साथ भी कॉन्फिगर किया जा सकता है। किसी भी देश को मिलने वाला हथियार पैकेज अमेरिकी मंजूरी और खरीदार देश की जरूरत के अनुसार अलग होता है।

पाकिस्तान नेवी के लिए ऐसे हेलीकॉप्टरों का उपयोग फ्रिगेट, कोरवेट और अन्य युद्धपोतों के साथ समुद्री मिशन में किया जा सकता है। अरब सागर में पनडुब्बी गतिविधियों पर नजर रखने, जहाजों की सुरक्षा और समुद्री गश्त में इनकी भूमिका अहम होती है। (Pakistan-China weapons deal)

Pakistan’s Rafale Falling Lie in Operation Sindoor then Benqab! IAF sought Bridge Support for 36 aircraft

IAF Rafale Bridge Support RFP
(Image for reference only. AI-Generated Image)

IAF Rafale Bridge Support RFP: Pakistan had claimed to kill Rafale fighter jets of Indian Air Force during operation shift. Social media platforms, Pakistani TV channels and some foreign newspapers claimed the loss of different number of rafale planes. But once again the lying of Pakistan has been exposed. Now the Indian Air Force has recently released a RFP in which the bridge support contract has been demanded for 36 Rafale aircraft.

The Directorate of Engineering of Air Headquarters has released France’s neuraan aircraft injns with Rafel’s engines to Rifel’s investment for proposal. The document has demanded five-month bridge support for the operation of 36 Rafale Aircraft of Indian Air Force. The RFP has been written clean that the proposal should be prepared for 36 Raphael aircraft.

In Documents Raphael The number of Fleet 36 is important among those claims of Pakistan, in which the loss of Indian Rafael aircraft was said during operation shifts. Earlier on January 26, the Indian Air Force in the Ariel Flypaste of the Republic Day Parade had been flying on Raphael BS-022, which Pakistan claimed to fall.

IAF Rafale Bridge Support RFP: RFP released from Air Force Headquarters

This RFP for Raphael fleet is released on behalf of the Director of Engineering Rafael of the Air Headquarters. RFP is sent to France’s neuraan aircraft engines. Documents that have been written Indian Air Force 36 Raphael is operating aircraft. The already existing support package for these planes is applicable upto 18 September 2026. Thereafter, there is no difference in support, the Air Force has sought a five-month bridge support system.

The title of the document is, "Request for Proposal for Bridge Support for Rafael Fleet of Indian Air Force on Pac Basis." In which Pac stands for Proprietary Artical Certificate. It is used when the original manufacturer of an equipment, spare or technical service is only a company. Raphael is the neuraan original manufacturer for M88 engine and important technical equipment connected to it. So, Air Force has demanded the same company.

2016’s India-France Agreement came under 36 Rafael

India is operating 36 Rafael aircraft purchased from France’s tenth Aviation under the Intergovernmental Agreement of 2016. Indian Air Force has two squadrons of 36 Rafale Aircraft. Number 17 Squadron Golden Arrows And the number 101 includes squadron.

Rafael can be used in air defenses, ground attack, marine missions, long-distance strike missions and electronic warfare-connected functions. Raphael has the ability to carry Active Electronically Scanned Array Radar, Electronic Warfare System, Air-to-Air Missile and Air-to-Ground weapons. It can be configured for different missions.

According to the document, the Procurement Contract included 36 aircraft, equipment connected to them and five-year support package. This support included maintenance, repair and logistics support, consumables, spare parts, ground support equipment and ground handling equipment needs. Rafale Bridge Support RFP

खत्म हुआ पांच साल का सपोर्ट

वायुसेना ने नए ब्रिज सपोर्ट प्रपोजल में भी 36 राफेल विमानों के ऑपरेशन की बात कही है। प्रपोजल के मुताबिक, यह सपोर्ट 18 सितंबर 2026 के बाद पांच महीने के लिए होगा।

इस अवधि में सभी 36 राफेल विमानों को प्रति विमान औसतन 150 फ्लाइंग आवर्स प्रति वर्ष की दर से ऑपरेट करने का प्रावधान रखा गया है। पांच महीने के लिए कुल 2250 फ्लाइंग आवर्स का अनुमान लगाया गया है।

यह कैलकुलेशन 36 विमान, प्रति विमान प्रति माह 12.5 फ्लाइंग आवर्स और पांच महीने की अवधि के आधार पर की गई है।

राफेल के लिए मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट क्यों जरूरी

राफेल एक ट्विन-इंजन, मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है। इसमें दो Snecma M88-2 आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन लगे हैं। हर इंजन का थ्रस्ट ड्राई (बिना आफ्टरबर्नर) लगभग 50 केएन और आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 75 केएन है। इस तरह राफेल का कुल थ्रस्ट 150 केएन है।

टर्बोफैन इंजन में हवा को अंदर लेकर उसे दबाया जाता है। इसके बाद उसमें ईंधन मिलाकर कंबस्शन किया जाता है। गर्म गैसें पीछे की तरफ निकलती हैं और विमान को आगे बढ़ाने के लिए थ्रस्ट पैदा करती हैं।

इंजन की सर्विसिंग में कई तरह के काम होते हैं। इसमें फिल्टर, पाइप, सेंसर, फ्यूल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट और इंजन के अंदर के हिस्सों की जांच शामिल हो सकती है। इंजन से जुड़ी तकनीकी जांच और ओवरहॉल के लिए विशेष उपकरण तथा प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत होती है।

राफेल में एवियोनिक्स सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। एवियोनिक्स का मतलब विमान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से है। इसमें रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम, नेविगेशन सिस्टम, कंप्यूटर, सेंसर और मिशन सिस्टम शामिल होते हैं। इनकी मेंटेनेंस के लिए विशेष टेस्ट उपकरण और सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

क्या होते हैं एमआरएलएस, जीएसई और जीएचई

डॉक्यूमेंट में एमआरएलएस का का जिक्र किया गया है। इसका पूरा नाम मेंटेनेंस, रिपेयर एंड लॉजिस्टिक्स सपोर्ट है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें विमान को उड़ान योग्य बनाए रखने के लिए स्पेयर, मरम्मत सहायता, तकनीकी जानकारी और लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराए जाते हैं।

इसमें कंज्यूमेबल्स भी शामिल होते हैं। कंज्यूमेबल्स वे सामग्री होती हैं जिनका इस्तेमाल मेंटेनेंस के दौरान होता है और जिन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर फिल्टर, सील, लुब्रिकेंट, कुछ इलेक्ट्रिकल पार्ट्स और अन्य छोटे उपकरण शामिल हो सकते हैं।

जीएसई का अर्थ ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट है। यह वह उपकरण होता है जिसका उपयोग विमान को जमीन पर जांचने, सर्विस करने और उड़ान के लिए तैयार करने में किया जाता है। इसमें पावर सप्लाई यूनिट, टेस्टिंग उपकरण, टोइंग वाहन और हाइड्रोलिक जांच उपकरण शामिल हो सकते हैं।

जीएचई का अर्थ ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट है। इसका इस्तेमाल विमान को पार्किंग एरिया में खींचने, सही स्थान पर लगाने, लोडिंग और अन्य ग्राउंड गतिविधियों के लिए किया जाता है।

डॉक्यूमेंट में ओ-लेवल मेंटेनेंस का भी जिक्र है। ओ-लेवल का मतलब ऑपरेशनल लेवल मेंटेनेंस है। यह वह शुरुआती स्तर का रखरखाव है जो स्क्वाड्रन या एयरबेस स्तर पर किया जाता है। इसमें रोजाना जांच, छोटे पुर्जों की बदलने की प्रक्रिया, सामान्य तकनीकी सुधार और विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार करना शामिल होता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

मॉड्यूलर डिजाइन वाला है राफेल

राफेल एक आधुनिक लड़ाकू विमान है। इसे इस तरह बनाया गया है कि उड़ान के बाद इसकी जांच और मरम्मत में बहुत अधिक समय न लगे। किसी भी लड़ाकू विमान को उड़ाने के बाद ग्राउंड क्रू उसकी जांच करता है। राफेल में यह काम काफी हद तक आसान बनाया गया है।

राफेल में कई सिस्टम ऐसे हैं जो विमान की तकनीकी स्थिति की जानकारी खुद देते हैं। इसे बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट कहा जाता है। यदि इंजन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर या किसी दूसरे हिस्से में कोई गड़बड़ी हो, तो तकनीकी टीम को संकेत मिल जाता है। इससे हर हिस्से को बार-बार खोलकर जांचने की जरूरत कम होती है।

उड़ान के बाद टेकनीशियन विमान के टायर, फ्यूल, हाइड्रोलिक ऑयल, बाहरी ढांचे, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच करते हैं। सामान्य उड़ान के बाद यह शुरुआती जांच लगभग 30 मिनट से एक घंटे में पूरी हो सकती है। अगर कोई खराबी नहीं मिलती, तो विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार किया जाता है। इसे टर्नअराउंड कहा जाता है।

लंबी दूरी या युद्धक मिशन के बाद यह जांच ज्यादा लंबी होती है। ऐसे समय हथियारों की स्थिति, इंजन, रडार, सेंसर और विमान के दूसरे सिस्टम की गहराई से जांच की जाती है। इसमें दो से चार घंटे तक लग सकते हैं।

राफेल में एम88 इंजन लगा है। इसका डिजाइन कई अलग-अलग हिस्सों या मॉड्यूल में किया गया है। यदि इंजन के किसी एक हिस्से में समस्या आती है, तो हर बार पूरा इंजन बदलना जरूरी नहीं होता। तकनीकी टीम जरूरत के अनुसार खराब हिस्से को बदल सकती है। इससे समय और मेंटेनेंस का काम कम हो सकता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

एक दिन में कितनी सॉर्टी कर सकता है राफेल

लड़ाकू विमान की एक बार की मिशन उड़ान को सॉर्टी कहा जाता है। जब राफेल एयरबेस से उड़ान भरता है, तय मिशन पूरा करता है और वापस बेस पर उतरता है, तो उसे एक सॉर्टी माना जाता है।

राफेल को तेज सॉर्टी जनरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसका मतलब है कि एक उड़ान के बाद तकनीकी जांच, ईंधन भरने और जरूरत पड़ने पर हथियार लगाने के बाद इसे कम समय में अगली उड़ान के लिए तैयार किया जा सकता है।

सामान्य प्रशिक्षण या शांति के समय एक राफेल विमान एक दिन में आमतौर पर दो से चार सॉर्टी कर सकता है। वहीं, बड़े सैन्य अभ्यास वाले समय में एक राफेल चार से पांच सॉर्टी तक कर सकता है। इसके लिए ग्राउंड क्रू, ईंधन, हथियार, स्पेयर पार्ट्स और रनवे की पूरी व्यवस्था जरूरी होती है। एक ही विमान को बार-बार उड़ाने के बजाय वायुसेना आमतौर पर पूरे बेड़े के अलग-अलग विमानों का उपयोग करती है।

युद्ध या सर्ज ऑपरेशन की स्थिति में राफेल की सॉर्टी संख्या कुछ समय के लिए और बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में मिशन छोटे रखे जा सकते हैं और अलग-अलग पायलट एक ही विमान को उड़ा सकते हैं। फिर भी हर उड़ान के बाद फ्यूल, इंजन, टायर, हाइड्रोलिक सिस्टम, रडार, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच जरूरी होती है।

राफेल की तेज सॉर्टी क्षमता का एक कारण इसका डिजिटल डायग्नोस्टिक सिस्टम है। विमान अपने कई सिस्टम की स्थिति रिकॉर्ड करता है। ग्राउंड क्रू को पहले से पता चल सकता है कि किस हिस्से की जांच करनी है। इससे विमान को लंबे समय तक जमीन पर रखने की जरूरत कम होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने किए थे कई दावे

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ से भारतीय वायुसेना को नुकसान पहुंचाने के दावे किए गए थे। इनमें राफेल लड़ाकू विमान को लेकर भी कई दावे सामने आए। अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट्स पर विमान के मलबे, कथित सीरियल नंबर और पायलटों से जुड़ी अपुष्ट बातें प्रसारित की गईं।

भारत की ओर से पाकिस्तान के इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक विमान-वार जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। ऐसे मामलों में मिलिट्री ऑपरेशंस से जुड़ी जानकारी अक्सर ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण सीमित रखी जाती है।
(IAF Rafale Bridge Support RFP)

The news required for the former soldiers preparing government job, these details will not be written wrong for two years.

Ex-Servicemen Government Exam Rules
(Image for reference only. AI-Generated Image)

Ex-Servicemen Government Exam Rules: The Department of Personnel and Training (DOPT) has issued significant instructions for the former soldiers preparing government job. The department has said that the application form of government examinations will be taken strict action against former soldier candidates who provide false, false or misleading information associated with retirement, discharge, pension or military service. Such candidates can be banned for two years from sitting in all government examinations.

The letter of Instruction issued on the part of the DOPT states that some former soldier candidates have been misinformation in the application form of different government examinations that have come into cognizance of the government. Subsequently, the department has to issue directives to all ex-servicemen candidates.

This instruction letter has been issued on 17 June 2026. The letter has been sent to all Central Ministries, Departments, Subordinate Offices and Public Sector Undertakings on behalf of the Department of Personnel and Training of Government of India, North Block, New Delhi.

Ex-Servicemen Government Exam Rules: What information will be mistaken in action

DOPT The letter of the former soldier candidates has been asked to give correct all the information related to their service. It includes retirement or discharge date, pension related information, service term, rank and other essential service details from service.

The former soldiers are often required to tell when filling up the government recruitment form on which date he retires or discharged from the Army, Navy or Air Force. Pension status in multiple periods, total time of service, pre-service status and related certificate information are also sought. The department has said that all these columns have to fill the correct and accurate information.

According to the letter, if a candidate was found to provide incorrect, fake or misleading information regarding his retirement or service details, then action can be taken against him. After which the concerned candidates cannot join any government examination for two years. (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

Two-year stop on which examinations will apply

DOPT has kept the scope of the debarment in its instructions quite extensive. The candidate will not be out of a recruitment examination only if misinformation is given. For the next two years from the date of action, it can be prevented from sitting in government examinations conducted by Government of India, State Governments and Public Sector Undertakings.

The scope may include recruitment of Central Ministries, Recruitment of State Governments, Examinations of Government Departments and Recruitment Procedures of Public Sector Undertakings. Small negligence in the application form for any pre-service candidate in such form can also lead to severe condition.

As per the formulas, government recruitment agencies match documents in cases involving pre-service quotas and age relaxation. Enter the application Retirement तिथि, डिस्चार्ज सर्टिफिकेट, पेंशन रिकॉर्ड और सर्विस सर्टिफिकेट के बीच अंतर मिलने पर उम्मीदवार से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। रिकॉर्ड में गलत जानकारी साबित होने पर विभागीय कार्रवाई का रास्ता खुलता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

डीओपीटी ने क्यों जारी किया यह निर्देश

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पत्र में कहा गया है कि कुछ पूर्व सैनिक उम्मीदवारों द्वारा विभिन्न सरकारी परीक्षाओं के आवेदन फॉर्म में रिटायरमेंट डिटेल्स से जुड़ी गलत या फर्जी जानकारी दिए जाने के मामले सामने आए हैं। इसी कारण विभाग ने सभी उम्मीदवारों के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किया है।

पूर्व सैनिकों को सरकारी नौकरियों में कुछ विशेष प्रावधानों का लाभ मिलता है। अलग-अलग भर्ती नियमों के अनुसार पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को आरक्षण, उम्र सीमा में छूट या अन्य पात्रता संबंधी लाभ मिल सकते हैं। इन सुविधाओं का लाभ लेने के लिए उम्मीदवार का पूर्व सैनिक दर्जा और उसकी सेवा से संबंधित रिकॉर्ड सही होना जरूरी है।

किसी उम्मीदवार द्वारा रिटायरमेंट की तारीख बदलकर लिखना, सेवा अवधि में गलत जानकारी देना या पेंशन की स्थिति के बारे में भ्रामक विवरण देना भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। विभाग का निर्देश इसी तरह की गलतियों और कथित हेरफेर को रोकने के लिए जारी किया गया है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

आवेदन फॉर्म में किन दस्तावेजों से करें मिलान

पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को सरकारी परीक्षा का फॉर्म भरने से पहले अपने आधिकारिक दस्तावेजों को ध्यान से देखना चाहिए। रिटायरमेंट या डिस्चार्ज की तारीख वही लिखनी चाहिए जो डिस्चार्ज बुक, रिलीज ऑर्डर या सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज हो। पेंशन से संबंधित जानकारी पेंशन पेमेंट ऑर्डर यानी पीपीओ और बैंक रिकॉर्ड के आधार पर भरना जरूरी है।

सेवा अवधि, रैंक, यूनिट या कोर से संबंधित जानकारी भी आधिकारिक दस्तावेजों से मिलाकर ही दर्ज की जानी चाहिए। कई उम्मीदवार पुराने कागजात, याददाश्त या किसी अनौपचारिक जानकारी के आधार पर फॉर्म भर देते हैं। ऐसी स्थिति में तारीख या सेवा विवरण में अंतर आ सकता है।

यदि किसी दस्तावेज में नाम, जन्मतिथि, सेवा संख्या या रिटायरमेंट तिथि को लेकर कोई भ्रम है, तो उम्मीदवार को आवेदन से पहले संबंधित रिकॉर्ड ऑफिस, जिला सैनिक बोर्ड या पूर्व सैनिक कल्याण से जुड़े कार्यालय से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

उम्र में छूट और पूर्व सैनिक कोटे से जुड़ा मामला

सरकारी भर्ती में पूर्व सैनिक उम्मीदवारों के लिए पात्रता का निर्धारण संबंधित भर्ती नियमों के आधार पर होता है। कई भर्तियों में पूर्व सैनिकों के लिए अलग सीटें निर्धारित रहती हैं, जबकि कुछ में उम्र सीमा से जुड़ी छूट का प्रावधान होता है। इन लाभों के लिए उम्मीदवार का सही पूर्व सैनिक दर्जा होना आवश्यक है।

रिटायरमेंट या डिस्चार्ज की तारीख कई मामलों में पात्रता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भर्ती की कट-ऑफ तारीख पर उम्मीदवार पूर्व सैनिक की श्रेणी में आता है या नहीं, यह उसके आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड से तय होता है। इसलिए गलत तारीख दर्ज होने पर उम्मीदवार की पात्रता पर सवाल उठ सकता है।

उदाहरण के तौर पर, यदि कोई उम्मीदवार अपने वास्तविक डिस्चार्ज की तारीख से अलग तारीख लिख देता है, तो उसकी उम्र में छूट, पूर्व सैनिक आरक्षण या अन्य लाभों की गणना प्रभावित हो सकती है। दस्तावेज जांच के दौरान ऐसी जानकारी का मिलान किया जाता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

पेंशन डिटेल्स भरते समय भी सावधानी जरूरी

डीओपीटी के पत्र में पेंशन डिटेल्स का विशेष उल्लेख किया गया है। पूर्व सैनिक उम्मीदवारों को आवेदन फॉर्म में यदि पेंशन से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है तो उसे भी सही भरना होगा। पेंशन की श्रेणी, पीपीओ से जुड़ी जानकारी या सेवा के बाद मिलने वाले लाभों का विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाकर दर्ज करना चाहिए।

कई सरकारी भर्ती फॉर्म में उम्मीदवार से यह पूछा जा सकता है कि वह पूर्व सैनिक है या नहीं, उसे पेंशन मिल रही है या नहीं और उसका डिस्चार्ज किस आधार पर हुआ था। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देते समय किसी भी कॉलम को अनुमान के आधार पर नहीं भरना चाहिए।

पेंशन रिकॉर्ड और सर्विस रिकॉर्ड में अंतर होने की स्थिति में उम्मीदवार को पहले संबंधित विभाग से स्पष्टीकरण लेना चाहिए। आवेदन जमा करने के बाद गलत जानकारी सामने आने पर उम्मीदवार को भर्ती प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है। (Ex-Servicemen Government Exam Rules)

PM Modi, speaking on navy tri-commissioning in Kolkata, can’t become without maritime strength.

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata

Indian Navy Tri-Commissioning: Prime Minister Narendra Modi in Kolkata on the occasion of International Yoga Day Garden Reach Shipbuilders and Engineers (Indian Navy Tri-Commissioning)GRSEThree indigenous naval ships made in ) commissioned in Indian Navy. These include Advanced Steelth Frigate INS Dunagiri, Survey Vessel Large INS Modifier and Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft INS Forward.

Joining the navy together with the three vessels is called tri-commissioning. Earlier in 2025, 17 months ago Mumbai had the first tri-commissioning, while in Kolkata it was the second Tri-Commissioning is.

The program was so special as the World Hydrography Day is also celebrated on June 21. On the same day INS modifiers involved in the most modern hydrographic survey ships of India were incorporated into the Navy.

Indian Navy Tri-Commissioning

Prime Minister Narendra Modi said that the land of Kolkata and Bengal has given a new direction to India’s views and has been linked to the world through the sea for centuries. He said that India, India, India, India and India have been a key event on this earth.

प्रधानमंत्री ने कहा कि समुद्री क्षमता के बिना कोई देश बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। उनके अनुसार विकास, सुरक्षा और समृद्धि समुद्र से जुड़े हैं। दुनिया का अधिकांश व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और देशों को जोड़ने वाले बड़े डेटा नेटवर्क भी समुद्र के नीचे से गुजरते हैं। उन्होंने कहा कि समुद्र के साथ भविष्य के क्रिटिकल मिनरल्स, डीप सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी जुड़े हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata

तीन अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बने हैं ये तीनों जहाज

प्रधानमंत्री ने कहा कि ये तीनों जहाज भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों का प्रतीक हैं। इन्हें भारत में डिजाइन किया गया, भारत में बनाया गया और इनके पीछे भारतीय इंजीनियरों, कामगारों तथा उद्योगों की मेहनत है।

उन्होंने कहा कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार बने रहने की स्थिति में नहीं रहना चाहता। प्रधानमंत्री के अनुसार देश की सैन्य ताकत को दुनिया के लिए बाजार नहीं बनना चाहिए, बल्कि ताकत की परिभाषा आत्मनिर्भरता से तय होनी चाहिए।

INS Dunagiri, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रेय तीनों अलग-अलग मिशन के लिए बनाए गए हैं। इन तीनों जहाजों का निर्माण भारत में हुआ है और इनके डिजाइन में भी भारतीय संस्थानों तथा उद्योगों की भूमिका रही है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

200 से ज्यादा एमएसएमई ने निभाई भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इन तीनों जहाजों के निर्माण में 200 से ज्यादा एमएसएमई ने योगदान दिया है। एमएसएमई यानी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज देश की छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयां होती हैं। युद्धपोत निर्माण में केवल बड़ा शिपयार्ड काम नहीं करता, बल्कि हजारों उपकरण और पुर्जे अलग-अलग कंपनियां बनाती हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि एक आधुनिक जहाज में सैकड़ों टन स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और हजारों कंपोनेंट्स लगते हैं। इनके पीछे हजारों कंपनियां काम करती हैं और इससे बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिलता है। उन्होंने समुद्री क्षेत्र को विकसित भारत के लिए एम्प्लॉयमेंट इंजन बताया।

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata

आईएनएस विक्रांत का किया जिक्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर INS Vikrant का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब आईएनएस विक्रांत को राष्ट्र को समर्पित किया गया था, तब भारत ने अपनी समुद्री शक्ति का नया अध्याय शुरू किया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आईएनएस विक्रांत से लेकर आईएनएस अग्रेय, आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस संशोधक तक की यात्रा केवल नए युद्धपोतों की यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता की यात्रा भी है।

आईएनएस विक्रांत भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। एयरक्राफ्ट कैरियर ऐसा बड़ा युद्धपोत होता है, जिस पर लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और कई तरह के सैन्य उपकरण संचालित किए जा सकते हैं। वहीं आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रेय जैसे जहाज अलग-अलग समुद्री मिशनों के लिए तैयार किए गए हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

40 से ज्यादा स्वदेशी युद्धपोत और पनडुब्बियां नौसेना में शामिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में 40 से ज्यादा मेड इन इंडिया युद्धपोत और Latest News भारतीय नौसेना में शामिल हुई हैं। उनके अनुसार इसका मतलब है कि भारतीय नौसेना को लगभग हर कुछ सप्ताह में नई ताकत मिल रही है।

उन्होंने कहा कि इस समय 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि भारत की औद्योगिक क्षमता और समुद्री शक्ति निर्माण की दिशा को दिखाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर, शिप रिसाइक्लिंग और एमआरओ को राष्ट्रीय मिशन के रूप में देख रहा है। एमआरओ का मतलब मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल है। यानी जहाजों की नियमित देखभाल, खराब उपकरणों की मरम्मत और लंबे समय बाद बड़े स्तर पर होने वाली तकनीकी जांच।

उन्होंने शिपिंग सेक्टर के लिए घोषित 70 हजार करोड़ रुपये के इंसेंटिव पैकेज का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह केवल आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि भारत के समुद्री भविष्य में निवेश है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

रक्षा निर्यात पहुंचा 40 हजार करोड़ रुपये के पार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक समय भारत की पहचान दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातक देशों में होती थी। विदेशों से हथियार, सैन्य उपकरण और रक्षा तकनीक खरीदने पर अधिक निर्भरता के कारण देश के सामने रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी पैदा होती थीं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में सरकार बनने के बाद इस स्थिति को बदलने का संकल्प लिया गया और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी गई।

प्रधानमंत्री के अनुसार, इसके लिए कई बड़े नीतिगत सुधार किए गए। रक्षा क्षेत्र में डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट के लिए नए अवसर तैयार किए गए। इसका असर देश के रक्षा उत्पादन में साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 तक भारत का कुल रक्षा उत्पादन करीब 40 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि केवल रक्षा उत्पादन ही नहीं बढ़ा है, बल्कि रक्षा निर्यात में भी तेज वृद्धि हुई है। वर्ष 2014 तक भारत करीब 700 करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादों का निर्यात करता था। अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata (Image: Shabd)

पश्चिम बंगाल की भूमिका बेहद अहम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत जिस नए समुद्री दौर की ओर बढ़ रहा है, उसमें पश्चिम बंगाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है। राज्य के पास बंदरगाहों की क्षमता है, उद्योगों के लिए मजबूत आधार है और कुशल मानव संसाधन भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई तक ले जाने की पूरी क्षमता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले वर्षों में पश्चिम बंगाल भारत की ब्लू इकोनॉमी, मैरिटाइम मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और तटीय विकास का एक अहम केंद्र बन सकता है। भारत ने हमेशा समुद्र को सहयोग और संपर्क के माध्यम के रूप में देखा है, लेकिन शांति बनाए रखने के लिए ताकत भी उतनी ही जरूरी है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा जरूरी है और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आईएनएस अग्रेय, आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस संशोधक का भारतीय नौसेना में शामिल होना इसी सोच का प्रतीक है। ये तीनों जहाज उस भारत की तस्वीर पेश करते हैं जो 21वीं सदी में अपनी क्षमता को पहचानता है, अपनी ताकत पर भरोसा करता है और तेज गति, नई ऊर्जा तथा मजबूत संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

बंदरगाहों को बनाया जा रहा है आधुनिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत अब अपने पूरे मैरिटाइम इकोसिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसके तहत बंदरगाहों को आधुनिक बनाया जा रहा है, नई क्षमता तैयार की जा रही है और समुद्री तथा तटीय क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़ा जा रहा है। देश में नदी जलमार्गों का विस्तार किया जा रहा है और सड़क, रेल, बंदरगाह तथा जलमार्गों को जोड़ने वाला मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि सागरमाला जैसी पहल इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य व्यापार की लागत कम करना, उद्योगों को गति देना और तटीय इलाकों में रोजगार व विकास के नए अवसर तैयार करना है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में बने रक्षा उपकरण अब दुनिया के 80 से ज्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि आत्मनिर्भरता की दिशा में अभी बहुत काम बाकी है, लेकिन पिछले 12 वर्षों में हुई प्रगति यह दिखाती है कि स्पष्ट नीति, सही दिशा और सामूहिक प्रयासों से देश में बड़े बदलाव किए जा सकते हैं।

नौसेना प्रमुख बोले- ट्राई-कमीशनिंग से दिखी नई गति

भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने इस अवसर पर जीआरएसई की टीम, उद्योग साझेदारों, एमएसएमई, नौसेना मुख्यालय, कमांड मुख्यालय, वॉरशिप ओवरसीइंग टीम और ट्रायल एजेंसियों को बधाई दी।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि कोलकाता में यह ट्राई-कमीशनिंग उपलब्धि भारत के युद्धपोत निर्माण क्षेत्र में आधुनिकता, आत्मनिर्भरता और भरोसे की नई गति को दिखाती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री द्वारा पिछले वर्ष मुंबई में हुई पहली ट्राई-कमीशनिंग के 17 महीने बाद कोलकाता में दूसरी ट्राई-कमीशनिंग हुई है।

उन्होंने कहा कि इन तीनों परियोजनाओं ने निर्माण के दौरान कई नए माइलस्टोन हासिल किए हैं। नौसेना प्रमुख के अनुसार जहाजों के निर्माण में शुरुआत से लेकर ट्रायल तक अलग-अलग एजेंसियों और उद्योग भागीदारों की भूमिका रही है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

PM Modi Indian Navy Tri-Commissioning
PM Modi Commissions INS Dunagiri, INS Sanshodhak and INS Agray in Kolkata

स्टील्थ फ्रिगेट INS Dunagiri

आईएनएस दुनागिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाया गया एडवांस्ड स्टील्थ फ्रिगेट है। यह उन आधुनिक युद्धपोतों में शामिल है जिन्हें दुश्मन के रडार पर कम दिखाई देने के उद्देश्य से डिजाइन किया जाता है। स्टील्थ फ्रिगेट की बाहरी बनावट, रडार सिग्नेचर, इंफ्रारेड सिग्नेचर और ध्वनि स्तर को कम रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

फ्रिगेट ऐसा युद्धपोत होता है जो लंबी दूरी तक समुद्र में रहकर कई प्रकार के मिशन कर सकता है। इसमें एंटी-एयर वॉरफेयर, एंटी-सर्फेस वॉरफेयर और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर की क्षमता होती है। यानी यह हवा से आने वाले मिसाइल और विमान के खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाज और पानी के नीचे मौजूद पनडुब्बी तीनों से निपटने में भूमिका निभा सकता है।

आईएनएस दुनागिरी में आधुनिक रडार, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और हथियार प्रणाली लगाई गई है। यह जहाज भारतीय नौसेना के लिए समुद्री क्षेत्र में निगरानी, युद्धक गश्त और टास्क ग्रुप ऑपरेशन में उपयोगी होगा।

प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स को भारतीय नौसेना के मौजूदा फ्रिगेट बेड़े की तुलना में ज्यादा एडवांस माना जाता है। इन जहाजों में ऑटोमेशन पर भी जोर दिया गया है, जिससे कई सिस्टम डिजिटल तरीके से नियंत्रित किए जा सकते हैं। इससे जहाज को चलाने और युद्धक सिस्टम संचालित करने में कम क्रू के साथ भी काम किया जा सकता है।

आईएनएस दुनागिरी का नाम हिमालय की दुनागिरी पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखा गया है। यह नाम भारतीय नौसेना की उस परंपरा को भी आगे बढ़ाता है जिसमें युद्धपोतों को भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े नाम दिए जाते हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आईएनएस संशोधक: समुद्र की गहराई और रास्तों की जानकारी जुटाने वाला जहाज

आईएनएस संशोधक सर्वे वेसल लार्ज श्रेणी का जहाज है। इसका मुख्य काम समुद्र की गहराई, समुद्री तल, तटीय क्षेत्र, बंदरगाहों के आसपास के रास्तों और पानी के नीचे मौजूद प्राकृतिक या मानव निर्मित संरचनाओं की जानकारी जुटाना है।

किसी भी नौसेना के लिए हाइड्रोग्राफी बहुत महत्वपूर्ण होती है। हाइड्रोग्राफी का मतलब समुद्र, नदी, बंदरगाह और तटीय जल क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वे है। इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि किसी इलाके में पानी कितना गहरा है, समुद्र तल की बनावट कैसी है, जहाज किस रास्ते से सुरक्षित गुजर सकते हैं और किन जगहों पर खतरा हो सकता है।

आईएनएस संशोधक आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरणों से लैस है। इसमें मल्टी-बीम इको साउंडर, साइड स्कैन सोनार, सर्वे बोट, डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम और समुद्री मैपिंग के लिए जरूरी डिजिटल उपकरण लगाए गए हैं। मल्टी-बीम इको साउंडर समुद्र तल का विस्तृत नक्शा तैयार करने में मदद करता है। यह पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजता है और वापस आने वाली तरंगों के आधार पर समुद्र की गहराई और तल की जानकारी जुटाता है।

इस तरह के जहाज नौसेना के ऑपरेशन के साथ-साथ सुरक्षित समुद्री व्यापार, बंदरगाह विकास, तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर और आपदा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। समुद्री नक्शे तैयार करने से नौसैनिक जहाजों, पनडुब्बियों और व्यापारी जहाजों को सुरक्षित रूट तय करने में मदद मिलती है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आईएनएस अग्रेय: उथले समुद्र में पनडुब्बियों का दुश्मन

आईएनएस अग्रेय एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य काम उथले समुद्री इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बनाना है।

भारत के समुद्री क्षेत्र में कई ऐसे इलाके हैं जहां पानी अपेक्षाकृत कम गहरा है। तटीय क्षेत्र, बंदरगाहों के आसपास के इलाके और कुछ समुद्री रास्तों में पनडुब्बियों की गतिविधि पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण होता है। उथले पानी में सोनार की ध्वनि तरंगें अलग तरीके से काम करती हैं और समुद्र तल की बनावट भी पनडुब्बी को छिपने में मदद कर सकती है।

इसी कारण शैलो वॉटर क्राफ्ट को खास तौर पर ऐसे क्षेत्रों के लिए डिजाइन किया जाता है। आईएनएस अग्रेय में आधुनिक सोनार सिस्टम, अंडरवाटर सेंसर और पनडुब्बी रोधी हथियार लगाए गए हैं। सोनार सिस्टम पानी के भीतर ध्वनि तरंगों के जरिए पनडुब्बी या अन्य वस्तु की मौजूदगी का पता लगाता है। (Indian Navy Tri-Commissioning)