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Why is ATV model being considered for AMCA project Game Changer? What will I learn from the success of INS Arihant?

AMCA ATV Model
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AMCA ATV Model: India’s most ambitious five-generation fighter jet program will have an important role in the prototype development of advanced medium combat aircraft (AMCA). Companies like Tata Advanced Systems, L&T, India Forge, India Electronics Limited (BEL), Dynamic Technologies and Data Patterns are in the run to join the project. But the larger the project, the bigger the challenges are. There are many challenges such as engine, stalth technology, avionics, rapports between different agencies and deadlines that are not only associated with technology but also better project management.

But the way to increase three times in GE-414 engine prices for AMCA (This news was first broken by Defence News) As the news is coming out, the concern has increased inside the government. People sitting inside the government say that in such a time, some can be learned from the Advanced Technology Vessel (ATV) model counting in the country’s most successful defence projects. Under this project, India had launched its first indigenous Nuclear Powered Ballistic Missile Submarine INS Arihant Development.

The project went several decades, but despite the goal reached and today it is counted in the most successful defense projects completed in mission mode.

AMCA ATV Model: Why is ATV model so successful

एटीवी यानी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोजेक्ट भारत के सबसे गोपनीय और सबसे सफल डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जब भारत ने पहली बार स्वदेशी परमाणु शक्ति चालित Submarine विकसित करने का फैसला किया।

उस समय भारत के पास परमाणु रिएक्टर आधारित पनडुब्बी बनाने का अनुभव नहीं था। परमाणु रिएक्टर, विशेष स्टील, सोनार, हथियार, पनडुब्बी डिजाइन और निर्माण जैसी लगभग हर तकनीक चुनौती थी। इसके बावजूद प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखा गया। इसके लिए सरकार ने अलग प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम तैयार किया।

सरकार ने इस प्रोजेक्ट को सामान्य सरकारी प्रक्रिया की तरह नहीं चलाया। इसे राष्ट्रीय मिशन का दर्जा दिया गया। प्रोजेक्ट के लिए अलग नेतृत्व बनाया गया और उसे सीधे शीर्ष स्तर तक पहुंच दी गई। डीआरडीओ, परमाणु ऊर्जा विभाग, बार्क, भारतीय नौसेना और उद्योग जगत को एक जॉइंट स्ट्रक्चर में काम कराया गया। यही वजह रही कि अलग-अलग विभाग होने के बावजूद सभी का लक्ष्य एक ही रहा और फैसले लेने में बेवजह देरी नहीं हुई।

एक मिशन, एक नेतृत्व और एक जवाबदेही

सरकार के सूत्रों का कहना है कि एटीवी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत उसका मिशन मोड मैनेजमेंट था। प्रोजेक्ट के लिए एक ऐसी लीडरशिप तैयार की गई, जिसे फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी गई।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि किसी तकनीकी या प्रशासनिक समस्या के आने पर अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के बीच फाइलें महीनों तक नहीं घूमती थीं। समस्याओं का समाधान सीधे प्रोजेक्ट स्तर पर किया जाता था।

यही कारण था कि अत्यंत जटिल तकनीकों, परमाणु रिएक्टर, प्रोपल्शन सिस्टम, सोनार, हथियार और पनडुब्बी डिजाइन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली कई एजेंसियां एक साथ आगे बढ़ सकीं।

सूत्रों का मानना है कि AMCA प्रोजेक्ट की मुश्किलें भी अब लगभग इसी स्तर की हो चुकी है। इसलिए केवल तकनीकी क्षमता ही नहीं, बल्कि उसी तरह के प्रोजेक्ट मैनेजमेंट मॉडल की भी जरूरत महसूस की जा रही है।

एएमसीए प्रोजेक्ट क्यों है भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण?

एएमसीए केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं है। यह भारतीय वायुसेना की भविष्य की लड़ाकू क्षमता की रीढ़ माना जा रहा है। यह विमान पांचवीं पीढ़ी की स्टेल्थ तकनीक, कम रडार पहचान, सुपरक्रूज क्षमता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मिशन सिस्टम, अत्याधुनिक सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट सिस्टम से लैस होगा।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना सुखोई-30 एमकेआई, राफेल, तेजस और मिराज-2000 जैसे विमानों को ऑपरेट कर रही है। आने वाले वर्षों में पुराने मिग-29 और जगुआर जैसे विमानों की जगह लेने के लिए एएमसीए को सबसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

वहीं, यह विमान पूरी एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नई दिशा भी देगा। क्य़ोंकि इसमें हजारों छोटे और बड़े उपकरण, अत्याधुनिक कंप्यूटर सिस्टम, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, सेंसर और हथियार इंटीग्रेट किए जाएंगे। (AMCA ATV Model)

सभी एजेंसियों को एक मंच पर लाने की जरूरत

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक लड़ाकू विमान डेवलप करना केवल एयरफ्रेम तैयार करने तक सीमित नहीं होता। असली चुनौती दर्जनों एजेंसियों, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों को एक साथ जोड़कर तय समय पर काम पूरा कराना होती है।

एएमसीए प्रोजेक्ट में एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) डिजाइन की जिम्मेदारी संभाल रही है, जबकि डीआरडीओ विभिन्न तकनीकों का डेवलपमेंट कर रहा है। भारतीय वायुसेना ऑपरेशनल जरूरतें तय कर रही है। दूसरी ओर निजी कंपनियां प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। इंजन के लिए विदेशी कंपनी से बातचीत चल रही है। भविष्य में एचएएल भी उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है। इसके अलावा एवियोनिक्स, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, स्टेल्थ मैटेरियल और वेपन इंटीग्रेशन के लिए कई अलग-अलग संस्थानों की भूमिका होगी।

सूत्रों का कहना है कि यदि ये सभी संस्थाएं अलग-अलग काम करेंगी तो फैसले लेने में समय लगेगा। इसलिए एटीवी की तरह एक इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस बनाया जा सकता है, जहां सभी एजेंसियों के अधिकारी एक साथ बैठकर काम करें। इस व्यवस्था से डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और उत्पादन के बीच तालमेल बेहतर बना रहेगा।

सूत्रों का कहना है कि अगर इन सभी एजेंसियों के बीच समय पर तालमेल नहीं बन पाया तो प्रोजेक्ट की समय सीमा प्रभावित हो सकती है। (AMCA ATV Model)

सबसे पहले बने एक मिशन डायरेक्टर

सूत्रों के मुताबिक एटीवी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सफलता उसका स्पष्ट नेतृत्व था। पूरे कार्यक्रम के लिए एक केंद्रीय नेतृत्व मौजूद था, जिसके पास फैसले लेने की पर्याप्त शक्ति थी।

वहीं, एएमसीए के लिए भी इसी तरह एक मिशन डायरेक्टर नियुक्त किया जा सकता है। यह अधिकारी केवल प्रशासनिक भूमिका तक सीमित न रहकर पूरे कार्यक्रम पर नजर रखे। उसका काम एडीए, डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना, निजी उद्योग, एचएएल और इंजन से जुड़े सभी भागीदारों के बीच तालमेल बनाए रखना हो।

सूत्रों का कहना है कि यदि हर एजेंसी अलग-अलग प्राथमिकताओं के साथ काम करेगी तो निर्णय लेने में समय लगेगा। लेकिन एक केंद्रीय नेतृत्व होने पर तकनीकी और प्रशासनिक फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे। (AMCA ATV Model)

इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस क्यों जरूरी?

एएमसीए जैसे कार्यक्रम में सबसे बड़ी जरूरत एक इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस की है। इस कार्यालय में एडीए के डिजाइन विशेषज्ञ, डीआरडीओ के वैज्ञानिक, भारतीय वायुसेना के ऑपरेशनल अधिकारी, एचएएल के उत्पादन विशेषज्ञ, निजी उद्योग के इंजीनियर और इंजन विकास से जुड़े विशेषज्ञ एक साथ काम करें।

सूत्रों के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में अलग-अलग एजेंसियां अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन एटीवी मॉडल की तरह यदि सभी एक ही कमांड स्ट्रक्चर के तहत काम करें तो डिजाइन में बदलाव, परीक्षण और उत्पादन से जुड़े निर्णय तेजी से लिए जा सकते हैं। (AMCA ATV Model)

इंजन कार्यक्रम पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत

सूत्रों के मुताबिक एएमसीए की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती इंजन मानी जा रही है। शुरुआती विमानों में जीई F-414 इंजन लगाए जाने की योजना है। दूसरी ओर भविष्य के लिए पूरी तरह स्वदेशी इंजन विकसित करने पर भी काम चल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एटीवी परियोजना में भी विदेशी तकनीकी सहयोग लिया गया था, लेकिन साथ ही भारत ने अपनी क्षमता भी विकसित की। यही मॉडल एएमसीए में भी अपनाया जा सकता है।

इसका मतलब यह होगा कि विदेशी इंजन के साथ परियोजना आगे बढ़ती रहे और समानांतर रूप से स्वदेशी इंजन पर भी लगातार काम चलता रहे।

इस तरह विमान कार्यक्रम और इंजन कार्यक्रम एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहेंगे। (AMCA ATV Model)

समय सीमा की निगरानी भी एटीवी मॉडल जैसी हो

एएमसीए परियोजना के लिए पहली उड़ान और बाद के परीक्षणों की समयसीमा पहले से तय है। लेकिन डिफेंस प्रोजेक्ट्स में अक्सर समय बढ़ता जाता है और लागत भी बढ़ जाती है।

एटीवी मॉडल में हर स्टेज की नियमित समीक्षा होती थी। यदि कहीं देरी होती थी तो तुरंत वजहों का पता किया जाता था और समाधान निकाला जाता था।

सूत्रों का कहना है कि एएमसीए में भी हर तीन या छह महीने पर उच्चस्तरीय समीक्षा होनी चाहिए ताकि छोटी समस्या आगे चलकर बड़ी बाधा न बन जाए। (AMCA ATV Model)

निजी क्षेत्र और सरकारी संस्थानों का बेहतर तालमेल

पहली बार एएमसीए जैसे बड़े लड़ाकू विमान कार्यक्रम में निजी उद्योग को इतनी बड़ी भूमिका मिली है। यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

लेकिन निजी कंपनियों के पास लड़ाकू विमान विकसित करने का प्रत्यक्ष अनुभव सीमित है। वहीं डीआरडीओ, एडीए और एचएएल के पास वर्षों का तकनीकी अनुभव मौजूद है।

सूत्रों का मानना है कि एटीवी मॉडल की तरह यहां भी अनुभव और नई क्षमता का मेल होना चाहिए। सरकारी संस्थानों का तकनीकी अनुभव और निजी क्षेत्र की उत्पादन क्षमता साथ आए तो परियोजना तेजी से आगे बढ़ सकती है।

फंडिंग में नहीं आए रुकावट

एटीवी प्रोजेक्ट कई दशकों तक चला, लेकिन उसकी फंडिंग बीच में नहीं रुकी। इससे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को लगातार काम करने का अवसर मिला।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि एएमसीए भी लंबी अवधि का प्रोजेक्ट है। इसमें डिजाइन, टेस्टिंग, प्रोडक्शन और अपग्रेडेशन के लिए लगातार निवेश की जरूरत होगी। यदि बजट या प्रशासनिक कारणों से बीच-बीच में रुकावट आती है तो पूरी समयसीमा प्रभावित हो सकती है। (AMCA ATV Model)

गोपनीयता भी होगी बड़ी चुनौती

एएमसीए में स्टेल्थ तकनीक, मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और भविष्य का स्वदेशी इंजन जैसी कई संवेदनशील तकनीक शामिल हैं।

एटीवी प्रोजेक्ट की तरह ही इस कार्यक्रम में भी जानकारी की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजाइन डेटा, सॉफ्टवेयर और उत्पादन प्रक्रिया को सुरक्षित रखने के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होगी। (AMCA ATV Model)

एटीवी मॉडल से क्या मिल सकता है फायदा

सूत्रों का कहना है कि यदि एएमसीए में ATV जैसी वर्किंग सिस्टम अपनाया जाता है तो फैसले लेने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है। समयसीमा पर ज्यादा प्रभावी निगरानी रखी जा सकती है। तकनीकी जोखिमों का समय रहते समाधान निकाला जा सकता है और निजी तथा सरकारी क्षेत्र की क्षमता का बेहतर उपयोग हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक भारत के लिए एएमसीए केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं है, बल्कि देश एयरोस्पेस उद्योग की अगली पीढ़ी की तकनीकों का आधार बनने जा रहा है। ऐसे में प्रोजेक्ट का मैनेजमेंट भी उसी स्तर का होना चाहिए।

एटीवी प्रोजेक्ट ने यह दिखाया कि यदि राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट को मिशन मोड में चलाया जाए, स्पष्ट नेतृत्व हो, सभी एजेंसियां एक साथ काम करें और लगातार राजनीतिक व प्रशासनिक समर्थन मिलता रहे, तो बेहद मुश्किल डिफेंस प्रोग्राम भी सफलतापूर्वक पूरे किए जा सकते हैं। (AMCA ATV Model)

For the first time India-Japan will make the defence system, what is NORA-50 and why is it special?

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NORA-50 Stealth Antenna System: India and Japan have stepped down towards co-development and co-production for the first time in the field of defence technology. During the India-Japan Summit on Thursday, Unicorn (UNIted COnbined Radio aNtenna) project was agreed to pursue as the first defense co-development program of both countries. Under this project, Japan’s state-of-the-art NORA-50 stalth antenna mast technology will be paved and manufactured in India. While India Electronics Limited (BEL) will play a major role in the project on behalf of India.

NORA-50 Stealth Antenna System: What is NORA-50 and why is it special?

NORA-50 really according to formulas Unicorn (UNIted is the Japanese name of COnbined Radio aNtenna) system. This is an integrated stalth antenna mast, which Japan has paved for the modern warships of its Navy.

Different antennas are mounted for communications, radars, data links and various sensors in traditional warships. This makes the upper part of the ship quite complex and its radar cross section (RCS) increases. The higher the radar cross section, the easier it will be to detect the ship for the enemy radar.

NORA-50 replaces this whole system. All major antennas and sensors are integrated within the same mast. The outer part of the ship remains neat and its stalth capacity increases significantly.

First Project between India and Japan

The project was signed in Tokyo in November 2024. Now India-Japan Summit It has been formally pursued as the first joint defence development programme of both countries.

India Electronics Limited (BEL) on behalf of the Indian side will play a major role in the project. The Company will develop and produce this system in India. The Japanese side will provide its technical expertise and design. According to the formulas, it will also develop high-level naval electronics manufacturing capability in India.

Japan’s three big companies have devlop technology

NORA-50 The system has been developed by Japan’s NEC Corporation. Sampa Cogyo K.K. and The Yokohama Rubber Co. Ltd. has also been technical cooperation in the project.

This system is currently being used on Japan’s state-of-the-art Mogri Class (30FFM) Stellth Frigate. Now this technique is being shared with India.

Why is it important for Indian Navy?

Sources say modern Naval Warfare The only weapons are not decisive, but also the ability to hide the identity of the ship, maintain safe communication and quickly share information that meets various sensors is equally important.

NORA-50 meets all these needs together. That’s why it’s counted in the most important techniques of modern stalth warships.

Fiber Reinforced Plastic Made Of Full Mast

The outer part of NORA-50 is prepared from fiber reinforced plastic (FRP) redome according to formulas. It is able to withstand light as well as sea seasons.

It remains durable even longer in marine air, moisture and fast temperature. Also its maintenance is easier than traditional metal structures.

Spur Shape grows from design Stellth Capacity

The design of NORA-50 is not as common antenna mast. Its size is placed as a spay shape or bar shape dome. The purpose of this special design is to reduce the refluence of radar waves. When the radar cross section of a warship is lower, it becomes more difficult to identify her right for the enemy.

NORA-50 is not only the communication antenna according to the formulas, but it is an integrated electronic system.
It consists of Tactical Data Link, Link-16, Tactical Air Navigation System (TACAN), various communication antennas and many other sensors mounted together.

The same systems during the war work to share safe data between ships, helicopters, sea patrol aircraft and other naval platforms.

What is Link-16?

Link-16 is a safe military data network used by Western countries and NATO forces, according to sources. Through this, various platforms during the war can share information of targets in real-time, enemy status and data associated with operation. This is why it is considered to be the important part of the modern network-based war system.

Changes to TACAN System

The formulas say the Tactical Air Navigation System (TACAN) in NORA-50 is also included with new design. The TACAN antenna in traditional vessels was mounted on the uppermost part of the mast. But in NORA-50 it is installed downwards.

Also the place of the traditional disk Hallo Donut size has been adopted. This reduces the possibility of identification from the radar while there is no effect on the functionality of the system.

How does the electronic system of the whole warship change?

The problem of electromagnetic interference between them was also due to different antennas on a warship before formulas. All antennas in NORA-50 are mounted in a scientific manner. This improves the quality of the signal and various systems do not affect each other.

While NORA-50 has many advantages. Shipment Radar Cross Section Reduces, thereby increasing the stalth capacity. Communication and radio reception are strong due to the better condition of the antenna. Many different antenna removal reduces ship weight and saves place. Maintenance becomes easier and protection is also better for natural reasons like power falls. Also this system is able to communicate on multiple frequency bands simultaneously.

This technique already exists in the modern warships of Japan

The Unicorn system is being used in advance on Japan’s modern Mouging Class Stellth Frigate. Within this mast are integrated tactical data link, Tactical air navigation system, various communication antenna and many other electronic equipment. It doesn’t need to put different antennas onboard.

Sources say that this technique now Indian Navy Will be developed to suit the needs of.
Sources say that this technique can be used in the future on Indian Navy’s new frigates, distroers and other major warships. This will lead the Indian Navy to secure communication, superior sensor integration, low radar signature and modern network based battle capacity.

Discussion on the Summit

The bilateral talks between Prime Minister Narendra Modi and the Japanese Prime Minister Sanae Taqichi discussed a number of topics such as defence, maritime security, economic security, artificial intelligence, semiconductor, critical Minerals, energy and cooperation in the Indo-Pacific region.

During the meeting, both countries emphasized that India and Japan’s strategic partnership has become more important in the changing global security environment. In this order, the joint development in the field of defence technology agreed to give a new direction.

Explainer: Indian army moving towards MUM-T, the full blueprint of Special Drone Force Baj Battalion came front!

Indian Army
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Baaz Battalion Indian Army: Indian Army is not only buying new drones but also working towards paving the entire drone ecosystem. The Indian Army is on Mand-Unmand Teaming (MUM-T). Under this strategy, the Army has started the process of creating new ‘Baj Battalion’. This special battalion will strengthen the remotely piloted aircraft (RPA) capacity of the Indian Army, according to sources. It will have large drones of High Altitude Long Endurance (HALE) and Medium Altitude Long Endurance (MALE) category. The objective of the Army is to manifold the ability to monitor, raise intelligence, identify the target, keep a constant eye for a long distance and give a sharp response during the war.

Baaz Battalion Indian Army: The role of drone completely changed in the modern war

Sources say Baj Battalion Indian Army Dicked of Transformation is part of the program. Under this programme, the Army is also working on Rudra Brigade, Bhairav Battalion, Shaktiban Artillery regiment and network based battle system.

Russia-Ukraine War, West Asia’s Clash and the recent operation Cindoor cleaned that modern wars are no longer only fighted by tanks, canops and fighter planes. Drones have now become part of almost every stage of the war. They have been playing a number of responsibilities from overlooking the enemy’s activities to accurate attacking, ammunitioning, assessing losses after operation and protecting the soldiers.

Former Army Chief General Dyendra Dwivedi has also recently clarified that the drones are no longer only for surveillance, but they are being used in many areas such as Intelligence, Target Identification, Precision Strike, Logistic Support, Battle Damage Assessment and Safety of Soldiers. So the army is only preparing a system instead of increasing the number of drones that have trained human resources, maintenance, operational principal, anti-drone capacity and indigenous construction all together are pavilion.

What is Baj Battalion?

According to Defence Formulas Baj Battalion The first of the Indian Army will be a special drone unit, whose entire focus will be only on unmanned aerial systems. Yet the drones in the army were associated with infantry, artillery and other formulations as small detachment. Their main work was to monitor for limited distances and to give the artillery to the target information.

Now the battalion will be different from it. It will be a specially trained officer and young man only for drone operation. These units will handle responsibilities such as large drones, long distance monitoring, Intelligence Surveillance and Reconciliation i.e. ISR missions, loteringmissions, electronic warfare and precise attacks.

Defence sources say that these battalions are being formed based on existing remotely piloted aircraft flights. There will also be better use of resources available before and new expert capacity will develop. Indian Army

Army Aviation Corps Will Work

Indian Army’s new Baj Battalion mainly according to sources Army Aviation Corps Work subject to. This unit is being prepared based on existing remotely piloted aircraft (RPA) flights. The large drone platform operating in different formulations so far will be brought under an argenized structure, where specially trained officers and young will take responsibility for their operation, maintenance and mission management.

Sources say that Army Aviation Corps is the key branch of helicopter operation in the Indian Army. At present, there are three major Army Aviation Brigades deployed in Leh, Misamari and Jodhpur. Many squadrons and flights work under these Brigades. Each squadron usually has two flights, while the flight is considered the smallest operational unit. Helicopters such as Chita, Pole, Rudra and Prachand are performed through the same structure.

According to sources, the Army Aviation Corps has also continuously expanded the drone capacity over the past few years. The new Army Aviation Brigade, built in Misamari in 2021, was also included in the Unmanaged Aerial Vehicles of Heron Categorie with helicopters.

This battalion Army Aviation Corps will serve as a special drone formation. The focus will be on the operation of large drones of Medium Altitude Long Endurance (MALE) and High Altitude Long Endurance (HALE) category. These can also include MQ-9B, Heron, other advanced platform and indigenously developed large unmanaged aerial systems involving the fleet of the Army in the present and future.

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना के पास इस समय 50 हजार से अधिक ड्रोन हैं, जबकि दो-तीन साल पहले यह संख्या केवल कुछ सौ ही थी। सेना का लक्ष्य अगले दो से तीन वर्षों में इस क्षमता को और बढ़ाना है।

ये ड्रोन न केवल लंबी दूरी तक निगरानी कर सकते हैं, बल्कि लगातार कई घंटों तक उड़ान भी भर सकते हैं। ये ड्रोन, इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (आईएसआर) मिशन के अलावा जरूरत पड़ने पर प्रिसिजन स्ट्राइक में भी मदद करेंगे।

होगी एक्सपर्ट बेस्ड फॉरमेशन

सूत्रों का कहना है कि बाज बटालियन में केवल ड्रोन ऑपरेटर ही नहीं होंगे, बल्कि तकनीकी विशेषज्ञ, मेंटेनेंस स्टाफ, इंटेलिजेंस एनालिस्ट, मिशन प्लानर, डेटा प्रोसेसिंग एक्सपर्ट और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम ऑपरेट करने वाले प्रशिक्षित अधिकारी और जवान भी शामिल होंगे।

हालांकि यह पारंपरिक इन्फैंट्री बटालियन की तरह बड़ी संख्या वाली यूनिट नहीं होगी, बल्कि एक अत्यधिक तकनीकी और विशेषज्ञ कैडर पर आधारित फॉरमेशन होगी, जहां संख्या से अधिक महत्व स्पेशल ट्रेनिंग और टेक्निकल प्रोफिशिएंसी को दिया जाएगा।

सूत्रों का कहना है कि हर मिशन से मिलने वाला वीडियो, तस्वीरें और सेंसर डेटा भी यहीं प्रोसेस किया जाएगा। इसके बाद यह जानकारी सीधे फील्ड कमांडरों तक पहुंचेगी ताकि वे वास्तविक समय में निर्णय ले सकें।

सूत्रों के अनुसार सेना एक से अधिक बाज बटालियन तैयार कर रही है और भविष्य में जरूरत के अनुसार इनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। प्रत्येक बटालियन को अलग-अलग ऑपरेशनल थिएटर और सैन्य जरूरतों के मुताबिक ड्रोन और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक बाज बटालियन का सीधा कॉर्डिनेशन फ्रंटलाइन इन्फैंट्री, आर्टिलरी और आर्मर्ड फॉर्मेशन के साथ भी रहेगा। ड्रोन से मिलने वाली रीयल-टाइम खुफिया जानकारी और टारगेट डेटा सीधे बैटलफील्ड में मौजूद कमांडरों तक पहुंचेगा, जिससे आर्टिलरी, मिसाइल यूनिट और अन्य मिलिट्री प्लेटफॉर्म तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे। इससे सेना की इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (आईएसआर) क्षमता और बैटलफील्ड की सिचुएशनल अवेयरनेस दोनों मजबूत होंगी।

क्या है एमयूएम-टी और क्यों बदल देगा युद्ध का तरीका?

सूत्रों का कहना है कि बाज बटालियन केवल ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग (एमयूएम-टी) कॉन्सैप्ट की भी महत्वपूर्ण कड़ी होगी। इसके तहत मानव चालित प्लेटफॉर्म, जैसे अपाचे एएच-64ई अटैक हेलिकॉप्टर, एएलएच ध्रुव, इन ड्रोनों के साथ मिलकर जॉइंट ऑपरेशन कर सकेंगे।

उदाहरण के तौर पर किसी ऑपरेशन के दौरान कोई अटैक हेलिकॉप्टर दुश्मन की सीमा के पास पहुंचता है। पहले उसे खुद आगे बढ़कर जानकारी जुटानी पड़ती थी। लेकिन एमयूएम-टी में हेलिकॉप्टर सुरक्षित दूरी पर रहेगा और अपने साथ जुड़े ड्रोन को आगे भेज देगा। ड्रोन दुश्मन की स्थिति, हथियारों की तैनाती और गतिविधियों की लाइव जानकारी भेजेगा। इसके बाद पायलट उसी आधार पर हमला करेगा या जरूरत पड़ने पर ड्रोन को ही टारगेट पर भेज सकता है।

इस तकनीक से सैनिकों और पायलटों का जोखिम काफी कम हो जाता है और ऑपरेशन की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। (Baaz Battalion Indian Army)

भारतीय सेना क्यों दे रही है एमयूएम-टी पर इतना जोर?

रक्षा सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण चीज केवल हथियार नहीं, बल्कि इनफॉरमेशन होगी। जो सेना दुश्मन की गतिविधियों की सही जानकारी पहले हासिल कर लेगी, वही तेजी से फैसले ले सकेगी।

MUM-T इसी सोच पर आधारित है। इसमें ड्रोन लगातार निगरानी करते रहते हैं जबकि हेलिकॉप्टर, लड़ाकू विमान या ग्राउंड फोर्स सुरक्षित रहते हुए कार्रवाई करते हैं। इससे सैनिकों की सुरक्षा बढ़ती है और ऑपरेशन की गति भी तेज होती है।

भारतीय सेना पहले ही कई अभ्यासों में इस तकनीक का परीक्षण कर चुकी है। वर्ष 2025 में त्रिशक्ति कोर द्वारा आयोजित एक्सरसाइज सर्वशक्ति के दौरान भी इस कॉन्सैप्ट को परखा गया था। इसमें हेलिकॉप्टर, ड्रोन और जमीनी सैनिकों के बीच कॉर्डिनेशन का सफल प्रदर्शन किया गया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक बाज बटालियन सीधे आर्टिलरी और मिसाइल यूनिटों के साथ भी कॉर्डिनेशन करेगी।

यदि ड्रोन किसी दुश्मन के कमांड पोस्ट, बंकर, तोप या मिसाइल लॉन्चर की पहचान करता है तो उसकी लोकेशन तुरंत संबंधित आर्टिलरी यूनिट तक भेजी जा सकेगी। इससे टारगेट पर सटीक और तेज कार्रवाई संभव होगी। (Baaz Battalion Indian Army)

अश्नि प्लाटून और बाज बटालियन में क्या है अंतर?

सूत्रों का कहना है कि कई लोग अश्नि प्लाटून और बाज बटालियन को एक जैसा मान रहे हैं, जबकि दोनों की भूमिका पूरी तरह अलग है।

अश्नि पहल के तहत इन्फैंट्री बटालियनों को छोटे स्ट्रेटेजिक ड्रोन दिए गए हैं। इनका इस्तेमाल फ्रंटलाइन सैनिक अपने आसपास के कुछ किलोमीटर क्षेत्र की निगरानी के लिए करते हैं। इन्हें सैनिकों की “आसमान में आंखें” भी कहा जाता है।

वहीं बाज बटालियन एक स्वतंत्र और कहीं बड़ा मिलिटरी स्ट्रक्चर होगा। इसका ऑपरेशन अलग कमांड के तहत होगा और यह पूरे ऑपरेशनल थिएटर में लंबी दूरी के मिशन, रणनीतिक निगरानी, प्रिसिजन स्ट्राइक, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और अन्य जटिल अभियानों को संभालेगी। (Baaz Battalion Indian Army)

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के साथ कॉर्डिनेशन

रक्षा सूत्रों का कहना है कि बाज बटालियन केवल ड्रोन नहीं उड़ाएगी बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के साथ भी काम करेगी।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का उद्देश्य दुश्मन के संचार नेटवर्क, रडार और डेटा लिंक की पहचान करना, जरूरत पड़ने पर उन्हें बाधित करना और अपने संचार नेटवर्क को सुरक्षित बनाए रखना होता है।

जब ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम एक साथ काम करेंगे तो दुश्मन की गतिविधियों की अधिक सटीक जानकारी मिल सकेगी। (Baaz Battalion Indian Army)

Did Sindhu come to Pakistan by postpone water agreement? Why Not Canceled, Know The Absolute Strategy Behind

5 Years After Shimla Agreement
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54 Years After Shimla Agreement: भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता (इंडस वाटर्स ट्रीटी) छह दशक से अधिक समय तक दोनों देशों के बीच सबसे स्थिर समझौतों में गिना जाता रहा। युद्ध, सीमा पर तनाव और कूटनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद यह समझौता लागू रहा। लेकिन अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इस समझौते को स्थगित रखने का फैसला लिया। भारत सरकार ने साफ किया कि यह कदम पानी को हथियार बनाने के लिए नहीं, बल्कि सीमा पार आतंकवाद को लेकर अपनी नीति में बदलाव का संकेत देने के लिए उठाया गया है।

2 जुलाई 1972 को हुए शिमला समझौते के 54 वर्ष पूरे हो रहे हैं। रक्षा और कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि भारत अब आतंकवाद, द्विपक्षीय समझौतों और दोनों देशों के बीच सहयोग को अलग-अलग विषय मानकर नहीं चल रहा है। नई दिल्ली का कहना है कि यदि कोई देश लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता है और द्विपक्षीय समझौतों की भावना का पालन नहीं करता, तो सामान्य सहयोग जारी रखना संभव नहीं है।

54 Years After Shimla Agreement: सिंधु जल समझौता क्या है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण

India and pakistan के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते में विश्व बैंक ने भी मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच स्पष्ट व्यवस्था बनाना था।

समझौते के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान के हिस्से में गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का अधिकार भारत को मिला। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित स्तर पर सिंचाई, जलविद्युत परियोजनाएं और घरेलू उपयोग की अनुमति भी दी गई।

करीब छह दशक तक यह समझौता दोनों देशों के बीच सबसे स्थिर व्यवस्था माना जाता रहा। वर्ष 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के दौरान भी इस समझौते को समाप्त नहीं किया गया। (54 Years After Shimla Agreement)

पहलगाम हमला बना बड़ा मोड़

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन इलाके में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी। इसे वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद आम नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला माना गया।

जांच एजेंसियों के अनुसार हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों का संबंध पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क से था। शुरुआती दौर में इस हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट नाम के संगठन ने ली थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां और कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस संगठन को लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी संगठन मानते हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, हमले के अगले ही दिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक हुई। इसी बैठक में कई अहम फैसलों के साथ सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित रखने का फैसला लिया गया। सूत्रों का कहना है कि यह फैसला किसी अचानक प्रतिक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि लंबे समय से चल रही सुरक्षा समीक्षा के बाद लिया गया कदम था। (54 Years After Shimla Agreement)

केवल एक घटना नहीं, लंबा रिकॉर्ड बना आधार

सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत ने केवल पहलगाम हमले को आधार बनाकर यह फैसला नहीं लिया। पिछले दो दशकों में मुंबई हमला, उरी हमला, पुलवामा हमला और जम्मू-कश्मीर में लगातार होने वाली आतंकी घटनाओं को भी सुरक्षा एजेंसियों ने समीक्षा का हिस्सा बनाया।

भारत का कहना है कि इन अधिकांश हमलों की जांच में ऐसे आतंकी संगठनों का नाम सामने आया, जिनकी गतिविधियां पाकिस्तान की जमीन से चलती रही हैं। भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि सीमा पार मौजूद आतंकी ढांचे को खत्म करने के बजाय उन्हें संरक्षण मिलता रहा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, लगातार ऐसे माहौल में सहयोग की पुरानी व्यवस्था बनाए रखना भारत के लिए मुश्किल होता जा रहा था। यही वजह है कि पहली बार आतंकवाद और जल सहयोग को एक साथ देखा गया। (54 Years After Shimla Agreement)

भारत ने समझौता रद्द नहीं, बल्कि स्थगित क्यों किया

विदेश मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारत ने सिंधु जल समझौते को समाप्त करने की घोषणा नहीं की है, बल्कि उसे “एबेयंस” यानी स्थगित रखने का फैसला लिया है।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्पष्ट कहा है कि सिंधु जल समझौता तब तक स्थगित रहेगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता।

कूटनीतिक जानकारों के अनुसार दोनों शब्दों में बड़ा अंतर है। समझौता समाप्त करने का मतलब पूरी संधि खत्म करना होता है, जबकि स्थगित करने का अर्थ है कि उसकी प्रक्रिया फिलहाल लागू नहीं रहेगी। यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो उसी समझौते को दोबारा लागू भी किया जा सकता है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत ने यही रास्ता इसलिए चुना ताकि यह संदेश जाए कि सहयोग पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है, लेकिन सहयोग अब बिना शर्त नहीं होगा। (54 Years After Shimla Agreement)

शिमला समझौते का मूल उद्देश्य क्या था

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 2 जुलाई 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे।

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य दोनों देशों के बीच विवादों का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से करना था। इसके साथ ही दोनों देशों ने यह भी स्वीकार किया था कि वे ऐसे किसी कदम से बचेंगे जिससे आपसी संबंध खराब हों।

समझौते में यह भी कहा गया था कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे और शांतिपूर्ण संबंध बनाने का प्रयास करेंगे। नियंत्रण रेखा यानी लाइन ऑफ कंट्रोल का सम्मान करना भी इस समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

विदेश नीति से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शिमला समझौते का आधार केवल सीमा विवाद का समाधान नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे का माहौल तैयार करना भी था। (54 Years After Shimla Agreement)

भारत का आरोप, पाकिस्तान ने समझौते की भावना का पालन नहीं किया

सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत का मानना है कि पिछले कई दशकों में पाकिस्तान ने शिमला समझौते की मूल भावना का पालन नहीं किया। भारत का आरोप है कि एक तरफ पाकिस्तान द्विपक्षीय समझौते का हवाला देता रहा, वहीं दूसरी तरफ वह लगातार जम्मू-कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा।

भारत यह भी कहता है कि यदि किसी समझौते में विवादों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से हल करने की बात कही गई है, तो बार-बार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की मांग उसी समझौते की भावना के विपरीत है।

हाल के महीनों में पाकिस्तान के कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयानों ने भी इस बहस को और तेज किया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से शिमला समझौते को अप्रासंगिक बताया था, हालांकि बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस बयान से दूरी बनाने की कोशिश की। (54 Years After Shimla Agreement)

आतंकवाद और दुष्प्रचार पर भी उठे सवाल

भारतीय एजेंसियों के अनुसार सीमा पार आतंकवाद के साथ-साथ दुष्प्रचार अभियान भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का बड़ा कारण रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाया कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फर्जी सूचनाएं फैलाने वाले कई हजार डिजिटल लिंक पाकिस्तान से संचालित हो रहे थे। इनमें भारतीय लड़ाकू विमान गिराने, सैन्य ठिकानों पर हमले और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने जैसे दावे शामिल थे, जिन्हें बाद में गलत पाया गया।

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इस तरह का दुष्प्रचार केवल सूचना युद्ध का हिस्सा नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसा कमजोर करने का भी माध्यम बनता है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार शिमला समझौते में दोनों देशों ने ऐसे प्रचार से बचने पर भी सहमति जताई थी, जिससे आपसी संबंध प्रभावित हों। इसलिए भारत इन घटनाओं को भी समझौते की भावना से जोड़कर देख रहा है। (54 Years After Shimla Agreement)

New Army Chief thinks of the replaceable army! Appointment of Women ADC Officer for the first time in the team of General Endurance Seth

Indian Army Chief Dhiraj Seth Woman ADC
Raksha Samachar

General Dhiraj Seth Woman ADC: General Endurance Seth took over June 30 as the 31st Army chief of the Indian Army. While they are the first Chief of the Army, whose staff is also a female officer in the officers. While the Naval and Air Force chief staff officers have been appointed as Ad-D-Camp (ADC) female officers in the officers.

General Dhiraj Seth Woman ADC: Two ADCs in Army Head Team

According to the sources, two ADCs of General Endurance Seth have a female captain, possessing the signal core of the army. Signal Core is the branch of the Indian Army that handles the responsibility of Secure Communication, Digital Network, Data Transmission and Command and Control System. They of female bikers on January 26 Deer Deville The team has also been part of.

The communication system in the modern war is considered the backbone of any military campaign. The army is rapidly moving towards the network-based battle system. The importance of signal cores in such is constantly increased. Sources say that the presence of the officer of this core in the team of the Army Head also reflects modern military needs.

while, second ADC The first horse of the army i.e. skinrs are Major in horses. This is one of the oldest, prestigious and glorious armored regiments of the Indian Army, famous as the name of One H. The regiment was established in the British period and today is the important part of the Armored Corps of the Indian Army.

Over time this regiment took the form of modern tank regiment from the mounted unit and played an important role in many wars and military operations. Skinners horses are counted in the most respected regiments of the Indian Army due to their professional competence, discipline and rich military traditions.

The Army sources say that this arrangement is not limited to protocols only, but also reflects the direction of changing workculture in the Indian Army, increasing participation of women and joint military reforms.

Sources say that women were deploying ADC in their team even when he was a division commander. There is no new point for the presence of a female officer in their staff team, even after the Army becomes dominant.

Let’s say that both ADC’s name is not written for security reasons. General Dhiraj Seth Woman ADC

Women are constantly new opportunities

The role of women in the Indian Army has grown rapidly over the past few years. First women were only limited branches, but now they signal, engineers, artillery, air defense, military police, Army Aviation And there are also responsibilities in many other areas.

The Lieutenant Gynevi Lalji was the first woman ADC of an Army Commander in 2013, which opened a new way for women in the army. Subsequently, the Squadron Leader Manisha Padhi of Indian Air Force in 2023 took responsibility as the ADC of the Governor of Mizoram, Dr. Hari Babu Kanbhampati, while witnessing history. He was the first female officer of the Indian armed forces to become the ADC of a Governor. While the Lieutenant Commander of the Indian Navy Logistics Branch in 2025, Yashswi Solanki became the first female officer of the country, appointed as the ADC of the President and the Supreme President of the three forces. General Dhiraj Seth Woman ADC

What Does ADC Work?

Ad-D-Camp is considered to be the most trusted staff officer of a senior military officer. ADC residing with the Army chief is not limited to formal programs only.

According to the formulas, ADC coordinates the entire daily program of the Army Head. Determining the timing of the meetings, maintaining contact with various commands and headquarters, the chordination of official documents, the travel program, the preparation of military gatherings and the work associated with the protocol are also included in its responsibility.

Also meeting foreign military delegations, ADC plays an important role in guard of Honour, military parade and other formal events. General Dhiraj Seth Woman ADC

Cross-Service ADC Policy implemented from 2025

The ADC system was shifted from 1st January 2025 to Indian forces. Chief of Defence Staff General decided to give ADC from the second service to the head of the three forces for the first time under the joint military reforms initiated under the leadership of Anil Chauhan.

नई व्यवस्था के तहत सेना प्रमुख को भारतीय वायुसेना, वायुसेना प्रमुख को भारतीय नौसेना और नौसेना प्रमुख को भारतीय सेना से एडीसी दिया जाने लगा। इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल विकसित करना और संयुक्त सैन्य संस्कृति को मजबूत करना है।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यह बदलाव प्रस्तावित थिएटर कमांड व्यवस्था और संयुक्त सैन्य अभियानों की तैयारी का भी हिस्सा है।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि एडीसी व्यवस्था में बदलाव केवल प्रशासनिक फैसला नहीं है। इसका उद्देश्य सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली समझने का अवसर देना भी है।

नई नीति के तहत अधिकारी अपने मूल सेवा क्षेत्र से बाहर भी काम कर रहे हैं। इससे संयुक्त योजना, बेहतर समन्वय और एकीकृत सैन्य सोच को बढ़ावा मिल रहा है। यही सोच भविष्य की थिएटर कमांड व्यवस्था की भी आधारशिला मानी जा रही है। (General Dhiraj Seth Woman ADC)

भारतीय सेना में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

वर्ष 1992 में महिलाओं को पहली बार गैर-चिकित्सा शाखाओं में अधिकारी के रूप में शामिल किया गया था। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी भूमिका बढ़ती गई। आज महिलाएं केवल मेडिकल या प्रशासनिक सेवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर्मी एविएशन, सिग्नल्स, इंजीनियर्स, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई), आर्मी सर्विस कोर, ऑर्डिनेंस, जज एडवोकेट जनरल (जेएजी), एजुकेशन और मिलिट्री पुलिस जैसी कई महत्वपूर्ण शाखाओं में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महिलाओं को कई शाखाओं में परमानेंट कमीशन मिला। इसके बाद 2021 में पहली बार महिलाओं की भर्ती मिलिट्री पुलिस में सैनिक के रूप में हुई। वर्ष 2023 में महिलाओं के लिए आर्टिलरी रेजिमेंट के दरवाजे भी खुले। वहीं 2025 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) से पहली महिला कैडेट्स पासआउट हुईं और भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में भी पहली बार महिला कैडेट्स का प्रशिक्षण शुरू हुआ। टेरिटोरियल आर्मी ने भी 2025-26 में महिला सैनिकों की भर्ती का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया।

जुलाई 2026 तक भारतीय सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों की संख्या 11 हजार से अधिक हो चुकी है, जबकि भारतीय सेना में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग चार प्रतिशत है। हालांकि अभी महिलाओं को इन्फैंट्री, आर्मर्ड कोर और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री जैसी मुख्य लड़ाकू शाखाओं में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन कॉम्बैट सपोर्ट भूमिकाओं में उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं। (General Dhiraj Seth Woman ADC)

Top-10 Challenges in front of the General Endurance Seth after the command of the Indian Army, know which fronts will be on real exams?

Indian Army Chief Dhiraj Seth Challenges
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General Dhiraj Seth Challenges: As the 31st Army chief of the Indian Army, General Endurance Seth has commanded in such a time, when the goal of the Army is to fully prepare itself for self-sufficient and future wars. Also, the security challenges associated with China and Pakistan are constantly facing. So on the other hand, organisational changes are being made at large levels. The biggest challenge in front of the General Endurance Seth will further strengthen the operational preparation of the Army with timely implementation of all these changes.

General Dhiraj Seth Challenges: The Biggest Responsibility to Proceed Theatre Command

The most important challenge in front of General Endurance Seth proposed Theater Command The system must be pushed forward. For the past several years, three forces have been prepared to be brought under the Integrated Command. The objective is to establish better synergy between the Army, the Navy and the Air Force, so that it takes less time to make decisions and take action during any military campaign.

This process still continues to discuss several technical and organizational issues. Operational needs of different forces, the use of resources and the command structure are not considered easy to balance. In this way, the new Army chief will have to move this process together with Chief of Defence Staff (CDS), Naval and Air Force.

Making the permanent part of the Army to learn from operation shifter

पहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना की नई युद्ध क्षमता की झलक दिखाई। अब सबसे बड़ी चुनौती इस अभियान के मिले अनुभवों को परमानेंट मिलिटरी स्ट्रक्चर्स का हिस्सा बनाना है। सैन्य हलकों में इसे अनौपचारिक रूप से “ऑपरेशन सिंदूर 2.0” की तैयारी भी कहा जा रहा है। इसमें सेना की ट्रेनिंग, ऑपरेशनल डॉक्ट्रिन, कमांड सिस्टम और हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े अनुभव भी शामिल हैं। नए सेना प्रमुख के सामने इन बदलावों को संस्थागत रूप देना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी। (General Dhiraj Seth Challenges)

नई तकनीक के अनुसार सेना को बनाना होगा और मजबूत

आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब केवल टैंक, तोप और सैनिक ही किसी युद्ध का फैसला नहीं करते। ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल नेटवर्क और रियल टाइम इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।

इसी वजह से भारतीय सेना भी तेजी से नई तकनीकों को अपना रही है। General Endurance Seth के सामने इन सभी नई क्षमताओं को पूरी सेना में प्रभावी तरीके से लागू करना बड़ी जिम्मेदारी होगी। (General Dhiraj Seth Challenges)

चीन और पाकिस्तान के खिलाफ दो मोर्चों पर तैयारी बनाए रखना

भारतीय सेना को एक साथ उत्तरी सीमा पर चीन और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की सैन्य गतिविधियां लगातार निगरानी की मांग करती हैं। वहीं पाकिस्तान की ओर से सीमा पार आतंकवाद, घुसपैठ और ड्रोन गतिविधियां भी सेना के लिए लगातार चुनौती बनी हुई हैं।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, नए सेना प्रमुख के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक दोनों मोर्चों पर सैन्य संसाधनों का संतुलित उपयोग बनाए रखना होगा। इसके लिए सैनिकों की तैनाती, निगरानी प्रणाली, सड़क और अन्य सैन्य ढांचे, संचार व्यवस्था और लॉजिस्टिक नेटवर्क को लगातार मजबूत रखना जरूरी होगा।

अभी पूरी नहीं हुई है आधुनिकीकरण की प्रक्रिया

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सेना ने कई बड़े सुधार शुरू किए हैं। बड़ी संख्या में ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अश्नि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ब्रिगेड, शौर्य स्क्वाड्रन और इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी) जैसे नए मिलिट्री स्ट्रक्चर्स पर काम शुरू हुआ है।

हालांकि यह पूरी प्रक्रिया अभी जारी है। कई महत्वपूर्ण रक्षा खरीद परियोजनाएं अभी अलग-अलग चरणों में हैं। टैंकों के आधुनिकीकरण, नई आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम, सामरिक वाहनों और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरणों की कई योजनाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं। इन परियोजनाओं को तय समय के भीतर पूरा कराना नए सेना प्रमुख की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। (General Dhiraj Seth Challenges)

Indian Army Chief Dhiraj Seth Challenges
General Dhiraj Seth, PVSM, UYSM, AVSM takes over as the 31st Chief of the Army Staff (COAS) of the Indian Army from General Upendra Dwivedi, PVSM, AVSM. (Image: PIB)

इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप मॉडल का विस्तार

भारतीय सेना ने 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर के तहत पहली बार इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी IBG मॉडल को ऑपरेशनल रूप दिया है। यह फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया गया है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, IBG का उद्देश्य भारी-भरकम डिवीजन आधारित व्यवस्था की जगह छोटी, तेज और आत्मनिर्भर लड़ाकू फॉर्मेशन तैयार करना है। प्रत्येक आईबीजी में पैदल सेना, आर्टिलरी, इंजीनियर, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर, कम्यूनिकेशन सिस्टम और चिकित्सा सहायता जैसी सभी आवश्यक क्षमताएं पहले से मौजूद रहती हैं।

यदि यह मॉडल सफल रहता है तो इसे सेना की अन्य कोर में भी लागू किया जाएगा। ऐसे में इसकी समीक्षा, सुधार और विस्तार की जिम्मेदारी भी नए सेना प्रमुख के सामने होगी। (General Dhiraj Seth Top-10 Challenges)

ड्रोन और काउंटर ड्रोन क्षमता को और मजबूत करना

आज का युद्ध तेजी से बदल रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन भी बड़े सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से भारतीय सेना ने ड्रोन और काउंटर ड्रोन तकनीक पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है।

अब केवल ड्रोन खरीदना काफी नहीं है। बल्कि उन्हें हर स्तर की सैन्य फॉर्मेशन के साथ जोड़ना, सैनिकों को प्रशिक्षण देना, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और एयर डिफेंस सिस्टम के साथ उनका तालमेल बनाना भी उतना ही जरूरी है। जनरल धीरज सेठ के सामने इन सभी प्रणालियों को बड़े स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी होगी।

स्वदेशी हथियारों और रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना

भारतीय सेना अब तेजी से स्वदेशी रक्षा उपकरणों की ओर बढ़ रही है। ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, कम्यूनिकेशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण, आर्टिलरी सिस्टम और अन्य कई क्षेत्रों में भारतीय उद्योग की भागीदारी बढ़ रही है।

सेना की जरूरतों और रक्षा उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाना भी नए सेना प्रमुख की प्राथमिकताओं में रहेगा। समय पर परीक्षण, गुणवत्ता सुनिश्चित करना और सैनिकों तक आधुनिक उपकरण पहुंचाना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। (General Dhiraj Seth Challenges)

नेटवर्क बेस्ड बैटल सिस्टम को मजबूत करना

आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता। सिक्योर कम्यूनिकेशन, तेज डेटा शेयरिंग, डिजिटल कमांड सिस्टम, एआई बेस्ड एनालिसिस और रियल टाइम फैसले भी उतने ही महत्वपूर्ण हो चुके हैं।

भारतीय सेना पहले से नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर मॉडल पर काम कर रही है। सेना के भीतर डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया, सिक्योर कम्यूनिकेशन नेटवर्क और अलग-अलग वेपन सिस्टम्स को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ने का काम जारी है। इन प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करना भी नए सेना प्रमुख की अहम जिम्मेदारी होगी।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी की विरासत को आगे बढ़ाना भी बड़ी जिम्मेदारी

जनरल धीरज सेठ के सामने एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी General Deputy Director के कार्यकाल में शुरू हुए सैन्य बदलावों को अगले स्तर तक पहुंचाना होगा। पिछले दो वर्षों में सेना ने कई बड़े सुधारों की शुरुआत की। सेना ने “फ्यूचर रेडी फोर्स” और “स्वदेशीकरण से सशक्तिकरण” के विजन के तहत संगठनात्मक और तकनीकी बदलावों को गति दी।

अब इन पहलों को पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर में प्रभावी तरीके से लागू करना, आधुनिकीकरण की गति बनाए रखना, स्वदेशी तकनीकों को तेजी से शामिल करना और सेना की नई युद्धक जरूरतों को देखते हुए तैयार करना जनरल धीरज सेठ की प्रमुख चुनौतियों में शामिल रहेगा। (General Dhiraj Seth Challenges)

New War Model in Indian Army from 1st July! 6 Major General commands new Combat IBG and Fire Support Group

Indian Army IBG
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Indian Army IBG: 1st July for the Indian Army has brought several major changes. On the same day where General Endurance Seth took responsibility as the new Army chief and the new Deputy Army chief also took over, while the military’s most ambitious military reform program is also considered to be extremely important for the Integrated Battle Group (IBG).

Several Combat IBGs are being operationalized for the first time under the 17 Mountain Strike Core (Brahmastra Core) given the challenge of China on the eastern front, according to sources. Also, 6 new Major General Level Officers are also being appointed to handle the command of these new formulations.

IBG is an important stage of the largest organizational change in the Indian Army for the past seven years. IBG The Army is moving towards a sharp, flexible and self-sufficient fighter formation by the heavy-duty division base structure through the model.

Indian Army IBG: Sheetgarh is becoming in 17 Mountain Strike Core New IBG

Five Combat IBG and a Fire Support Group (FSG) is being prepared under the 17 Mountain Strike Core, located in Patgarh, West Bengal. This core was specially designed for operation in mountainous areas against China.

According to the formulas, at the moment this entire system has been implemented as a pilot project.

सूत्रों का कहना है कि इन पांच आईबीजी का गठन 23 डिवीजन और 59 डिवीजन से किया जा रहा है। इसके अलावा एक अलग फायर सपोर्ट ग्रुप भी बनाया गया है, जो इन सभी कॉम्बैट आईबीजी को लंबी दूरी की मारक क्षमता के साथ आर्टिलरी सपोर्ट उपलब्ध कराएगा।

एक जुलाई से मिले नए मेजर जनरल

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, प्रत्येक आईबीजी और फायर सपोर्ट ग्रुप की कमान मेजर जनरल स्तर का अधिकारी संभालेगा। एक जुलाई से इनमें से दो आईबीजी और फायर सपोर्ट ग्रुप को नए मेजर जनरल मिल रहे हैं। बाकी फॉर्मेशंस में पहले से ही वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती हो चुकी है।

इस तरह नए Integrated Battle Group (आईबीजी) और एक फायर सपोर्ट ग्रुप (एफएसजी) की कमान छह मेजर जनरल स्तर के अधिकारियों ने संभाल ली है।

सूत्रों का कहना है कि नए कमांडरों की नियुक्ति के साथ इन फॉर्मेशनों को ऑपरेशनल फॉर्म देने की प्रक्रिया तेज हो गई है। (Indian Army IBG)

चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर की तैनाती

आईबीजी के साथ सेना ने एक नई जिम्मेदारी भी बनाई है, जिसे चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर (सीओओ) कहा जाएगा। यह जिम्मेदारी ब्रिगेडियर रैंक के अधिकारी संभालेंगे। जो पहले डिप्टी जीओसी जैसी भूमिका के बजाय ऑपरेशनल कॉर्डिनेशन संभालेंगे।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, सीओओ का काम पूरे ऑपरेशन का कॉर्डिनेशन करना होगा। इसमें ऑपरेशन की योजना बनाना, खुफिया जानकारी का विश्लेषण, लॉजिस्टिक व्यवस्था, फायर सपोर्ट और युद्ध के दौरान अलग-अलग युनिट्स के बीच तालमेल बनाए रखना शामिल रहेगा।

इस व्यवस्था से आईबीजी की कमान संभाल रहे मेजर जनरल को बड़े रणनीतिक फैसलों पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा। (Indian Army IBG)

क्या है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप

इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी आईबीजी भारतीय सेना की नई कॉम्बैट फॉर्मेशन है। इसे इस तरह से तैयार किया गया है कि किसी ऑपरेशन के दौरान अलग-अलग यूनिटों को जोड़ने की जरूरत न पड़े। पूरी फॉर्मेशन पहले से ही सभी जरूरी हथियारों, इंजीनियरिंग सपोर्ट, लॉजिस्टिक सिस्टम और चिकित्सा सुविधाओं के साथ तैयार रहती है।

सूत्रों के अनुसार, एक आईबीजी में लगभग 5,500 सैनिक होंगे। इसमें पैदल सेना, आर्टिलरी, इंजीनियर, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई), आर्मी सर्विस कोर, कम्युनिकेशन सिस्टम और फील्ड अस्पताल जैसी सभी जरूरी युनिट्स शामिल रहेंगी।

यही वजह है कि इसे एक सेल्फ-कंटेंड फाइटिंग फॉर्मेशन कहा जा रहा है। (Indian Army IBG)

भारी डिवीजन की जगह छोटी लेकिन ज्यादा ताकतवर फॉर्मेशन

सूत्रों का कहना है कि पहले किसी बड़े ऑपरेशन के लिए पूरी कोर या पूरी डिवीजन को एक्टिव करना पड़ता था। इसमें काफी समय लगता था क्योंकि एक कोर में हजारों सैनिक और भारी सैन्य संसाधन शामिल होते हैं।

नई आईबीजी सिस्टम में जरूरत के मुताबिक केवल एक Formation को बहुत कम समय में आगे भेजा जा सकता है। इससे प्रतिक्रिया देने का समय कम होगा और ऑपरेशन तेजी से शुरू किया जा सकेगा।

इसी वजह से सेना अब बड़ी लेकिन धीमी फॉर्मेशन की जगह छोटी, तेज और अधिक घातक फॉर्मेशंस पर जोर दे रही है। (Indian Army IBG)

क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब केवल सैनिकों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं रही, बल्कि तेज निर्णय, डिजिटल नेटवर्क, ड्रोन, सटीक फायरपावर और जॉइंट ऑपरेशन ज्यादा अहम हो गए हैं।

इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए आईबीजी मॉडल तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य ऐसी फॉर्मेशन बनाना है जो कम समय में किसी भी क्षेत्र में पहुंचकर स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर सके। (Indian Army IBG)

चीन की सैन्य रणनीति से मिला सबक

सूत्रों के मुताबिक, पूर्वी लद्दाख और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की सैन्य गतिविधियों ने भी भारतीय सेना को अपने स्ट्रक्चर पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित किया।

पिछले एक दशक में चीन ने अपने पुराने डिवीजन सिस्टम की जगह कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड मॉडल अपनाया है। इन ब्रिगेड में टैंक, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, ड्रोन और अन्य सपोर्ट युनिट्स को एक साथ रखा गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।

भारतीय सेना की नई आईबीजी भी इसी तरह तेज और बहु-क्षमता वाली फॉर्मेशन के रूप में तैयार की जा रही हैं। हालांकि सेना के सूत्रों का कहना है कि भारतीय मॉडल पूरी तरह अपनी ऑपरेशनल जरूरतों और पर्वतीय इलाकों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। (Indian Army IBG)

फायर सपोर्ट ग्रुप की क्या होगी भूमिका

सूत्रों के मुताबिक, पांच कॉम्बैट आईबीजी के अलावा एक अलग फायर सपोर्ट ग्रुप भी बनाया गया है। इसमें दो आर्टिलरी बटालियन शामिल की गई हैं।

इस फॉर्मेशन में लंबी दूरी की तोपें, रॉकेट सिस्टम और अन्य आर्टिलरी हथियार रहेंगे। जरूरत पड़ने पर यही फायर सपोर्ट ग्रुप सभी आईबीजी को दूर से मार करने वाली फायरपावर उपलब्ध कराएगा। पहले ऐसी क्षमता अलग-अलग आर्टिलरी यूनिटों में बंटी रहती थी।

सूत्रों का कहना है कि सेना की नई दिव्यास्त्र बैटरियां भी इसी फायर सपोर्ट ग्रुप के साथ जोड़ी जा सकती हैं। इन बैटरियों में पारंपरिक आर्टिलरी के साथ ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन जैसी आधुनिक क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है।

लॉजिस्टिक सिस्टम पर चल रहा काम

सूत्रों ने बताया कि आईबीजी का गठन लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन अभी इसकी लॉजिस्टिक व्यवस्था को अंतिम रूप दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सैनिकों, वाहनों, हथियारों, उपकरणों और मुख्यालयों का रिऑर्गेनाइजेशन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ट्रूप्स, वाहन, हथियार और अन्य संसाधनों की री-एलोकेशन के कारण पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा।

फिलहाल नई फॉर्मेशन ऑपरेशनल स्थिति में हैं, लेकिन सभी सपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह से इंटीग्रेशन होने में लगभग दो महीने का समय और लग सकता है। इस दौरान ट्रांसपोर्टेशन, गाड़ियों की व्यवस्था, गोला-बारूद, संचार, मरम्मत और चिकित्सा सहायता जैसी व्यवस्थाओं को नए स्ट्रक्चर के अनुसार व्यवस्थित किया जा रहा है। (Indian Army IBG)

सात साल पुराने सैन्य सुधार को मिला नया रूप

आईबीजी का कॉन्सैप्ट पहली बार साल 2018 में सेना के पुनर्गठन के दौरान सामने आया था। इससे पहले तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल Bipin Rawat ने सेना के स्ट्रक्चर में बदलाव को लेकर कई अध्ययन शुरू कराए थे। उसी प्रक्रिया में आईबीजी मॉडल तैयार किया गया।

इसके बाद पश्चिमी मोर्चे पर 9 कोर में इसका परीक्षण किया गया। वर्ष 2019 में एक्सरसाइज हिमविजय सहित पूर्वी क्षेत्र के कई सैन्य अभ्यासों में भी इसे परखा गया। अब पहली बार इसे स्थायी रूप से ऑपरेशनल स्वरूप दिया जा रहा है। (Indian Army IBG)

माउंटेन स्ट्राइक कोर की जगह नया मॉडल

सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2013 में चीन को ध्यान में रखकर लगभग 90 हजार सैनिकों वाली 17 Mountain Strike Core बनाने की योजना स्वीकृत हुई थी। बाद में सेना ने महसूस किया कि इतनी बड़ी फॉर्मेशन को तेजी से तैनात करना और संचालित करना कठिन होगा।

इसी वजह से अब उसी स्ट्रक्चर को छोटे लेकिन अधिक सक्षम आईबीजी मॉडल में बदला जा रहा है। प्रत्येक आईबीजी इलाके, दुश्मन की तैनाती और ऑपरेशन की जरूरत के अनुसार तैयार की गई है। (Indian Army IBG)

सेना के बड़े ट्रांसफॉर्मेशन का हिस्सा

सूत्रों का कहना है कि आईबीजी केवल एक नई फॉर्मेशन नहीं है, बल्कि सेना के व्यापक संगठनात्मक बदलाव का हिस्सा है। इसी कार्यक्रम के तहत रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, दिव्यास्त्र बैटरी और शक्तिबाण यूनिट जैसी नई स्ट्रक्चर भी बनाए जा रहे हैं।

सेना का उद्देश्य अलग-अलग वेपन सिस्टम्स, ड्रोन, आर्टिलरी, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और लॉजिस्टिक संसाधनों को इंटीग्रेट करके ऐसी फॉर्मेशन तैयार करना है, जो कम समय में किसी भी मोर्चे पर स्वतंत्र रूप से ऑपरेशन चला सके। (Indian Army IBG)

After 29 years, separate identification made from the command of the Indian Army in the hands of the tank Officer General Endurance Seth, Operation Sitter and Saurya Squadron

New Army Chief General Dhiraj Seth
Army Chief General Dhiraj Seth

Army Chief General Dhiraj Seth: Indian Army has got the new head. General Endurance Seth took over as the 31st Army chief of the Indian Army on Tuesday. He succeeded General Upendra Dwivedi who retired after completing his tenure on June 30. The Army chief of the Lieutenant General Endurance Seth, as well as an officer of the Armored Corps after about 29 years has commanded the Indian Army. His tenure will last 31st August 2028.

Lieutenant General Endurance Seth On 1st April 2026, the Deputy Army chief was held. He was then handed over the responsibility of the operational preparations of the Army, modernization programs and strategic plans.

Army Chief General Dhiraj Seth: Military Travel Starting From Tank Regiment

Lieutenant General Endurance Seth is an alumnus of the National Defence Academy (NDA), Khadakwasla. He had received commissions in the Armoured Core through the prestigious 2 Lancers (Gardner Horse) regiment of the Indian Army in December 1986.

He started his military life as a tank officer. Then handle different responsibilities in desert areas, western borders, J&K and many strategic areas of the country. Sources say that their experience at both field commands and HQrs incorporates them into the most experienced officers of the Army.

After 29 years, the command of the armored core then found the army

Indian Army Armoured Core टैंक और मैकेनाइज्ड युद्ध अभियानों के लिए जानी जाती है। आधुनिक युद्ध में यह सेना की आक्रमण क्षमता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ से पहले आर्मर्ड कोर से सेना प्रमुख बनने वाले अंतिम अधिकारी जनरल शंकर रॉय चौधरी थे, जिन्होंने वर्ष 1994 से 1997 तक भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। उनके बाद लगभग तीन दशक तक इस कोर का कोई अधिकारी सेना प्रमुख नहीं बन पाया।

ऐसे समय में जब युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और टैंक, ड्रोन, सेंसर, नेटवर्क आधारित युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का महत्व बढ़ रहा है, तब आर्मर्ड पृष्ठभूमि वाले अधिकारी का सेना प्रमुख बनना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Army Chief General Dhiraj Seth)

जमीनी स्तर से लेकर सबसे बड़ी स्ट्राइक फॉर्मेशन तक संभाली कमान

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने अपने करियर में हर स्तर पर नेतृत्व किया है। उन्होंने सबसे पहले एक आर्मर्ड रेजिमेंट की कमान संभाली। इसके बाद पश्चिमी क्षेत्र में 98 आर्मर्ड ब्रिगेड का नेतृत्व किया।

बाद में उन्हें जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों से जुड़ी यूनिफॉर्म फोर्स की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद उन्होंने भारतीय सेना की प्रमुख स्ट्राइक फॉर्मेशन 21 कोर (सुदर्शन चक्र कोर) की कमान संभाली। इसके अलावा वह दिल्ली एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रहे और साल 2023 की गणतंत्र दिवस परेड का नेतृत्व किया।

Army Chief General Dhiraj Seth
Army Chief General Dhiraj Seth (Photo: PIB)

दो ऑपरेशनल कमांड का नेतृत्व करने वाले चुनिंदा अधिकारी

भारतीय सेना में बहुत कम अधिकारियों को दो अलग-अलग ऑपरेशनल कमांड का नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं।

उन्होंने नवंबर 2023 से जून 2024 तक दक्षिण पश्चिमी कमांड की कमान संभाली। इसके बाद जुलाई 2024 से मार्च 2026 तक सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहे। इस दौरान उन्होंने पश्चिमी मोर्चे की तैयारियों, प्रशिक्षण और ऑपरेशनल योजनाओं की निगरानी की। (Army Chief General Dhiraj Seth)

ऑपरेशन सिंदूर में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

रक्षा सूत्रों के अनुसार, Command के प्रमुख रहते हुए लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अभियान में विभिन्न सैन्य कमांडों के बीच समन्वय, ऑपरेशनल प्लानिंग और खतरे के आकलन में उनका योगदान अहम रहा।

सूत्रों का कहना है कि इसी दौरान आधुनिक तकनीक, नेटवर्क आधारित ऑपरेशन और विभिन्न सैन्य संसाधनों के बेहतर उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2026 में उत्तम युद्ध सेवा पदक (यूवाईएसएम) से सम्मानित किया गया। (Army Chief General Dhiraj Seth)

सेना के आधुनिकीकरण से जुड़े रहे महत्वपूर्ण पदों पर

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को भारतीय सेना में आधुनिकीकरण और क्षमता विकास का विशेषज्ञ माना जाता है।

उन्होंने सेना मुख्यालय में मैकेनाइज्ड फोर्सेज की क्षमता विकास शाखा में काम किया, जहां टैंक और आर्मर्ड फॉर्मेशन की युद्ध क्षमता बढ़ाने की योजनाओं पर काम हुआ। इसके अलावा उन्होंने पर्सपेक्टिव प्लान्स, हथियार एवं उपकरण और लॉन्ग टर्म इंटीग्रेटेड पर्सपेक्टिव प्लान जैसी महत्वपूर्ण शाखाओं में भी जिम्मेदारियां निभाईं।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इन नियुक्तियों के दौरान उन्होंने आधुनिक हथियार प्रणालियों, डिजिटल नेटवर्क, नई तकनीकों और भविष्य की सैन्य आवश्यकताओं से जुड़ी योजनाओं पर काम किया। (Army Chief General Dhiraj Seth)

शौर्य स्क्वाड्रन के जरिए टैंक और ड्रोन का तालमेल

सदर्न कमांड के प्रमुख रहते हुए लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने शौर्य स्क्वाड्रन की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह विशेष ड्रोन स्क्वाड्रन आर्मर्ड फॉर्मेशन के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार किया गया है।

सूत्रों के मुताबिक, इसका उद्देश्य टैंक यूनिटों को रियल टाइम निगरानी, लक्ष्य की पहचान, प्रिसीजन स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसी क्षमताएं उपलब्ध कराना है।

मार्च 2026 में झांसी के पास बबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित बड़े मैकेनाइज्ड अभ्यास के दौरान टैंक, ड्रोन और डिजिटल कमांड सिस्टम के बीच तालमेल का प्रदर्शन भी किया गया था। (Army Chief General Dhiraj Seth)

तीनों सेनाओं के बीच समन्वय को दिया बढ़ावा

सदर्न कमांड का कार्यकाल पूरा होने पर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को सेना, नौसेना और वायुसेना की ओर से संयुक्त गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया था।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, उनके नेतृत्व में कई संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित किए गए, जिनमें तीनों सेनाओं ने एक साथ हिस्सा लिया। इन अभ्यासों का उद्देश्य युद्ध के समय बेहतर समन्वय और संयुक्त अभियान क्षमता को मजबूत करना था। (Army Chief General Dhiraj Seth)

सेना से जुड़ी है पारिवारिक विरासत

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ऐसे परिवार से आते हैं, जिसका भारतीय सशस्त्र बलों से गहरा संबंध रहा है। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल के. एम. सेठ भारतीय सेना के एडजुटेंट जनरल रह चुके हैं और उन्होंने भी प्रतिष्ठित 21 स्ट्राइक कोर की कमान संभाली थी। भारतीय सेना के इतिहास में पिता और पुत्र दोनों का एक ही स्ट्राइक कोर का नेतृत्व करना दुर्लभ उपलब्धियों में गिना जाता है। उनके ससुर भी भारतीय सेना की आर्टिलरी में अफसर रहे हैं।

उनके छोटे भाई रियर एडमिरल रवनीश सेठ भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी हैं। (Army Chief General Dhiraj Seth)

अंतरराष्ट्रीय मिशन और सैन्य शिक्षा में भी रहे अव्वल

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने वर्ष 1995-96 में अंगोला में संयुक्त राष्ट्र मिशन के साथ ऑपरेशन ऑफिसर के रूप में भी काम किया। इससे उन्हें बहुराष्ट्रीय सैन्य अभियानों का अनुभव मिला।

सैन्य शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका रिकॉर्ड शानदार रहा है। उन्होंने जूनियर कमांड कोर्स में पहला स्थान हासिल किया। डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में उन्हें बेस्ट ऑल राउंड स्टूडेंट ऑफिसर चुना गया, जबकि यंग ऑफिसर्स कोर्स में सिल्वर सेंटूरियन सम्मान मिला। उन्होंने नेशनल डिफेंस कॉलेज, फ्रांस के कमांड एंड स्टाफ कोर्स और अमेरिका के नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। (Army Chief General Dhiraj Seth)

कई सैन्य सम्मान से हो चुके हैं सम्मानित

अपने लंबे सैन्य करियर के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को परम विशिष्ट सेवा पदक (पीवीएसएम), उत्तम युद्ध सेवा पदक (यूवाईएसएम) और अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम) सहित कई प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान मिल चुके हैं। इसके अलावा उन्हें सेना प्रमुख और आर्मी कमांडर स्तर की कई प्रशस्तियां भी प्राप्त हुई हैं।

लगभग दो साल दो महीने रहेगा कार्यकाल

जनरल धीरज सेठ ने 1 अप्रैल 2026 को उप सेना प्रमुख का पद संभाला था। इसके बाद उन्हें सेना की ऑपरेशनल तैयारियों और आधुनिकीकरण कार्यक्रमों की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब 30 जून 2026 से उन्होंने भारतीय सेना के 31वें सेना प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाल लिया है। उनकी सेवानिवृत्ति की निर्धारित तिथि 31 अगस्त 2028 है। इस आधार पर उनका कार्यकाल लगभग दो वर्ष और दो महीने का रहेगा। (Army Chief General Dhiraj Seth)

From the drone to the data war...How General Byendra Dwivedi created the Indian Army in 2 years Future-Radi Force?

Achievements of General Upendra Dwivedi
Army Chief General Upendra Dwivedi (Photo: PIB)

Achievements of General Upendra Dwivedi: The famous ancient military strategist, philosopher and militaryman Sun Tju wrote in the Art of War, "There is no permanent position in the war, in the same way as the water changes its shape according to the ground. "The Chief General of the Indian Army Dwivedi did exactly. He understood that the form of war has changed, so he changed the size, structure and thinking of the army according to the same.

General Upendra Dwivedi is completing his tenure on June 30. Their two-year term is being seen as a round of the fastest technical changes in the army. That is why they are also being addressed with names like "Drone General" or "Drone Chief of India". This is not only because of the number of drones in the army, but also the big change in the whole military thinking, organization, training and how to fight war.

When General Deputy Director The Indian Army had a limited number of drones. This number is increased by more than 50 thousand. But this change was not limited to data only. In his tenure, the Army created separate units for the drone operation, prepared new Combat Requirements, implemented new military policies and made the drone base warfare part of the routine military operations.

Achievements of General Upendra Dwivedi: The Speed of the "Diced of Transformation"

Running in the Indian Army "Dicked of Transformation"It was the beginning of the decade of change before the Army chief of General Upendra Dwivedi. It was started in the year 2023, when the Indian Army declared 2023 as "Ear of Transformation" and 2024 as "Ear of Technology Absorption".

When the General Upendra Dwivedi took charge of the head of the Army, he turned it up. His two-year term worked fast on drones, artificial intelligence, network-based wars, indigenous weapons, and new Combat Requirements. Meanwhile, the new first such as Ashny Drone Platoon, Baj Battalion, Rudra All Arms Brigade, Bhairav Battalion, and Divine Batters began to land. Achievements of General Upendra Dwivedi

The robustness of the five Pillars

General Dwivedi pursued this campaign on five major areas of change. These included better synergy between the three forces, preparing the new structure of the army, promoting modern technology and indigenization, improving military processes and preparing human resources for the future war.

About 25 new military doctrine, policy documents and operation guidelines were also issued in their tenure. The year 2026-27 was declared "Ear of Networking and Data Centricity" to further strengthen data-druvan decision-making systems and modern networking in the military. Achievements of General Upendra Dwivedi

to "Selectrification"

General Deputy Director के कार्यकाल में भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की सबसे बड़ी पहचान उनकी स्पष्ट सोच और दीर्घकालिक विजन रहा। उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं जीते जाएंगे, बल्कि तकनीक, डेटा, नेटवर्किंग और स्वदेशी क्षमता निर्णायक भूमिका निभाएगी। इसी सोच के आधार पर उन्होंने “स्वदेशीकरण से सशक्तिकरण” को सेना के आधुनिकीकरण का प्रमुख मंत्र बनाया। उनका मानना था कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही भारतीय सेना को लंबे समय तक मजबूत और सक्षम बनाएगी। इसलिए उनके कार्यकाल में स्वदेशी हथियारों, ड्रोन, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम और नई सैन्य तकनीकों को तेजी से अपनाने पर विशेष जोर दिया गया।

उन्होंने भारतीय सेना के लिए विजन-2047 भी सामने रखा। इस विजन का उद्देश्य सेना को एक ऐसी आधुनिक, चुस्त, तकनीक-सक्षम, आत्मनिर्भर और भविष्य के हर प्रकार के युद्ध के लिए तैयार सैन्य शक्ति में बदलना है, जो मल्टी डोमेन ऑपरेशंस जैसे जमीन, हवा, साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सभी क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से काम कर सके। इस विजन में अन्य सेनाओं के साथ बेहतर तालमेल और राष्ट्रीय हितों की रक्षा को भी प्राथमिकता दी गई।

Achievements of General Upendra Dwivedi
Indian Army Chief General Upendra Dwivedi (Photo: PIB)

फ्यूचर-रेडी फोर्स पर रहा फोकस

अपने लगभग हर महत्वपूर्ण संबोधन में जनरल द्विवेदी ने “फ्यूचर-रेडी फोर्स” यानी भविष्य के युद्ध के लिए तैयार सेना बनाने की बात दोहराई। उनका कहना था कि भारतीय सेना इस समय “डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन” यानी परिवर्तन के दशक के तहत खुद को पूरी तरह बदल रही है। इस परिवर्तन का उद्देश्य केवल नए हथियार खरीदना नहीं, बल्कि पूरी सैन्य संरचना, प्रशिक्षण, युद्ध सिद्धांत और ऑपरेशन के तरीके को आधुनिक बनाना है। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

ऑपरेशन सिंदूर ने बदली सेना की सोच

ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना के लिए केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि आधुनिक युद्ध की नई चुनौतियों को समझने और उनके अनुसार खुद को ढालने का महत्वपूर्ण अनुभव भी साबित हुआ। इस अभियान ने दिखाया कि भविष्य के युद्ध में केवल सैनिकों की संख्या या पारंपरिक हथियार पर्याप्त नहीं होंगे। अब ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रियल टाइम इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का समन्वित इस्तेमाल निर्णायक भूमिका निभाएगा।

Operation Shifter के बाद जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना के आधुनिकीकरण को नई गति दी। इस अभियान से मिले अनुभवों के आधार पर उनका पूरा फोकस ड्रोन युद्ध, काउंटर-ड्रोन क्षमता, रियल टाइम इंटेलिजेंस, सेंसर-टू-शूटर सिस्टम और नेटवर्क आधारित युद्ध पर रहा।

पिछले साल कारगिल विजय दिवस पर उन्होंने अश्नि ड्रोन प्लाटून, बाज बटालियन, दिव्यास्त्र बैटरियां और रूद्र ब्रिगेड बनाने का एलान किया। साथ ही स्वदेशी तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंट्रिक ऑपरेशन और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर को सेना के आधुनिकीकरण का प्रमुख आधार बनाया गया। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

“ईगल ऑन द आर्म” कॉन्सैप्ट

ड्रोन युद्ध को लेकर भी उन्होंने एक नया कॉन्सैप्ट सामने रखा, जिसे “ईगल ऑन द आर्म” के कॉन्सैप्ट के तौर पर जाना जाता है। इसका अर्थ है कि भविष्य में हर सैनिक के पास ऐसी ड्रोन क्षमता हो, जिससे वह खुद निगरानी कर सके, लक्ष्य की पहचान कर सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई भी कर सके। इसी सोच के तहत सेना में अश्नी ड्रोन प्लाटून, बाज बटालियन और अन्य ड्रोन आधारित संरचनाओं का विकास किया गया।

इसी के तहत हाल ही में भारतीय सेना में “बाज बटालियन” का गठन किया गया है। यह केवल ड्रोन उड़ाने वाली यूनिट नहीं होगी। इसे मौजूदा रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट फ्लाइट्स के आधार पर तैयार किया जा रहा है। इसमें ऐसे विशेषज्ञ सैनिक होंगे जिन्हें ड्रोन ऑपरेशन, मेंटेनेंस, रिपेयरिंग, मिशन प्लानिंग, डेटा एनालिसिस और पूरे ड्रोन नेटवर्क के ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जाएगी।

बाज बटालियन का उद्देश्य केवल ड्रोन उड़ाना नहीं बल्कि पूरे युद्धक्षेत्र में ड्रोन आधारित निगरानी और सूचना प्रणाली को लगातार सक्रिय रखना है। इससे कमांडरों को वास्तविक समय में जानकारी मिलेगी और निर्णय लेने की रफ्तार बढ़ेगी।

अश्नि ड्रोन प्लाटून ने बदली इन्फैंट्री की ताकत

ड्रोन क्रांति का दूसरा बड़ा कदम अश्नी ड्रोन प्लाटून हैं। अब लगभग हर इन्फैंट्री बटालियन में विशेष ड्रोन प्लाटून बनाई जा रही है। इनमें लगभग 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक होंगे जो निगरानी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन दोनों को ऑपरेट करेंगे।

पहले ड्रोन केवल विशेष यूनिटों तक सीमित थे, लेकिन अब पैदल सेना की अग्रिम टुकड़ियां भी स्वयं टारगेट की पहचान कर सकेंगी और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला भी कर सकेंगी।

इस बदलाव से बटालियन स्तर पर ही वास्तविक समय की निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता विकसित हुई है। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

दिव्यास्त्र बैटरियों से बदला आर्टिलरी की भूमिका

जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में आर्टिलरी की भूमिका भी बदलनी शुरू हुई। अब केवल तोपों से गोले दागना ही उद्देश्य नहीं है। आर्टिलरी रेजीमेंट में दिव्यास्त्र बैटरियां बनाई जा रही हैं, जिनमें पारंपरिक तोपों के साथ ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन को जोड़ा जा रहा है।

इस व्यवस्था में सबसे पहले ड्रोन लक्ष्य की पहचान करता है। इसके बाद वही जानकारी सीधे फायर कंट्रोल सिस्टम तक पहुंचती है और कुछ ही समय में तोप से सटीक हमला किया जाता है। सेना इसे “सेंसर टू शूटर” सिस्टम कहती है। इससे टारगेट खोजने और हमला करने के बीच लगने वाला समय काफी कम हो जाता है।

रुद्र ब्रिगेड और भैरव बटालियन से बदला मिलिट्री स्ट्रक्चर

ड्रोन के साथ-साथ जनरल द्विवेदी ने सेना की कई कॉम्बैट फॉर्मेशंस में भी बदलाव शुरू किए। रुद्र ऑल आर्म्स ब्रिगेड ऐसी नई फॉरमेशन है, जिसमें इन्फैंट्री, ऑर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी, सेना की एविएशन युनिट्स और ड्रोन क्षमता को एक साथ जोड़ा गया है।

इसी तरह भैरव बटालियन हल्की और तेज कार्रवाई करने वाली युनिट के तौर पर तैयार की जा रही है। इनका उद्देश्य कम समय में तेज ऑपरेशन करना और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार काम करना है। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

केवल ड्रोन नहीं, काउंटर ड्रोन पर भी पूरा जोर

जनरल द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि विरोधी के पास कितने ड्रोन हैं, बल्कि यह है कि भारतीय सेना उन्हें पहचान सके, उनका पीछा कर सके, उन्हें निष्क्रिय कर सके और पूरे ड्रोन युद्धक्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रख सके।

इसी सोच के तहत सेना में काउंटर ड्रोन तकनीक पर भी तेजी से काम किया गया है। इसमें रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक जैमर, हार्ड किल सिस्टम और भौतिक सुरक्षा उपायों को एक साथ विकसित किया जा रहा है।

इसके अलावाा सेना ने देशभर में 25 से अधिक ड्रोन और काउंटर ड्रोन हब स्थापित किए हैं। इनका उद्देश्य प्रशिक्षण, रखरखाव, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और ऑपरेशन के दौरान तकनीकी मदद देना है।

इन केंद्रों में सैनिकों को अलग-अलग प्रकार के ड्रोन उड़ाने, डेटा पढ़ने और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौरान काम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

Achievements of General Upendra Dwivedi
Indian Army Chief General Upendra Dwivedi (Photo: PIB)

सेना की सोच हुई डेटा आधारित

जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में केवल हथियार ही नहीं बदले बल्कि निर्णय लेने का तरीका भी बदला। सेना ने “नेटवर्किंग एंड डेटा सेंट्रिसिटी” को प्राथमिकता दी। इसका उद्देश्य अलग-अलग प्लेटफॉर्म से मिलने वाली जानकारी को एक नेटवर्क में जोड़ना है ताकि कमांडरों को तुरंत पूरी स्थिति दिखाई दे सके।

इसमें ड्रोन, सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और कम्युनिकेशन से मिलने वाले डेटा को एक साथ इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

JAI पर फोकस

जनरल द्विवेदी की पूरी रणनीति सरकार के जेएआई (जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन) विजन के अनुरूप रही। उनके नेतृत्व में सेना ने जॉइंट मिलिट्री ऑपरेशन, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और नई तकनीकों को अपनाने पर विशेष जोर दिया। यही कारण है कि उनके कार्यकाल को केवल नए हथियारों के शामिल होने का दौर नहीं, बल्कि भारतीय सेना की सोच, संरचना और युद्ध क्षमता में व्यापक बदलाव के दौर के रूप में देखा जा रहा है। (Achievements of General Upendra Dwivedi)

How IAF’s thinking after the operation shifter wants to air after the eye AEW&C which is equipped with a range of 700 km and AI system

IAF AEWCS Requirements
(Image for reference only. AI-Generated Image)

IAF AEWCS Requirements: Recently Indian Air Force has received the Final Operational Clearance (FOC) of the Indigenous Eye Airborne Early Warning and Control (AEW&C) system of DRDO. The formulas say that the eye will play an important role in meeting the existing needs, but the needs of the Indian Air Force have now turned out to be far ahead of this.

According to the formulas, the experiences found during the operation shifter cleaned that only the traditional aerial surveys will not be enough in the future war. Air Force now needs an airborne platform that can stay in the air for a longer period of time, monitor with greater altitudes, also detect hypersonic weapons and ballistic missiles, analyze Artificial Intelligence based data and work with the entire air defense network in real time.

Which is why Indian Air Force first in July 2024 six new AEW एंड सी (AEW&C) विमानों के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की थी। लेकिन उसके बाद मई 2026 में हुए ऑपरेशन सिंदूर और बदलते सुरक्षा माहौल ने वायुसेना को अपनी जरूरतों का फिर से आकलन करने के लिए मजबूर किया। इसके बाद जनवरी 2026 में पहले से कहीं अधिक एडवांस और सख्त तकनीकी मानकों वाली नई आरएफआई जारी की गई।

सूत्रों के अनुसार, पिछले डेढ़ साल में हवाई युद्ध की प्रकृति तेजी से बदली है। अब केवल लड़ाकू विमानों पर नजर रखना ही काफी नहीं माना जा रहा। बल्कि छोटे ड्रोन, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें, बैलिस्टिक मिसाइलें, हाइपरसोनिक हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और नेटवर्क आधारित युद्ध ने वायुसेना की जरूरतों को पूरी तरह बदल दिया है। यही वजह है कि जनवरी 2026 की नई आरएफआई में लगभग हर प्रमुख तकनीकी पैरामीटर को पहले से अधिक एडवांस बनाया गया।

IAF AEWCS Requirements: क्या होता है AEW&C

एईडब्ल्यू एंड सी यानी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम को आम भाषा में उड़ता हुआ कमांड सेंटर कहा जाता है। यह केवल एक रडार विमान नहीं होता बल्कि हवा में मौजूद ऐसा प्लेटफॉर्म होता है जो सैकड़ों किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

यह विमान हवा में उड़ते हुए लड़ाकू विमान, ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और कई अन्य टारगेट्स का पता लगाता है। इसके बाद यह जानकारी सीधे लड़ाकू विमानों, ग्राउंड कंट्रोल सेंटर और भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम तक पहुंचाई जाती है।

युद्ध के दौरान यही प्लेटफॉर्म तय करता है कि किस दिशा से खतरा आ रहा है, किस लड़ाकू विमान को किस टारगेट की तरफ भेजना है और किस सेक्टर में एयर डिफेंस को एक्टिव करना है। (IAF AEWCS Requirements)

जुलाई 2024 में क्या थीं वायुसेना की जरूरतें

भारतीय वायुसेना ने 19 जुलाई 2024 को छह नए एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) विमानों की खरीद के लिए पहली रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की थी। उस समय वायुसेना का मुख्य उद्देश्य अपनी मौजूदा हवाई निगरानी क्षमता को बढ़ाना और पुराने प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर एक मजबूत एयर सर्विलांस नेटवर्क तैयार करना था। उस दौर में फोकस ऐसे प्लेटफॉर्म पर था, जो लंबी दूरी तक दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य हवाई लक्ष्यों की पहचान कर सके और भारतीय वायुसेना के कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क को लगातार जानकारी उपलब्ध कराता रहे।

सूत्रों के मुताबिक, 2024 की आरएफआई में सबसे ज्यादा जोर प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता और लंबे समय तक ऑपरेशन करने की क्षमता पर दिया गया था। वायुसेना चाहती थी कि विमान कम से कम आठ घंटे तक लगातार मिशन पर उड़ान भर सके। यदि जरूरत पड़े तो उसमें हवा में ईंधन भरने यानी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की क्षमता भी हो, ताकि मिशन की अवधि और बढ़ाई जा सके। उस समय इसे लंबी दूरी की निगरानी के लिए पर्याप्त माना जा रहा था।

उस RFI में विमान की ऑपरेशनल ऊंचाई 40 हजार फीट से अधिक रखने की शर्त भी रखी गई थी। इतनी ऊंचाई से उड़ने वाला एईडब्ल्यू एंड सी विमान जमीन पर लगे रडार की तुलना में कहीं बड़े इलाके की निगरानी कर सकता है। ऊंचाई बढ़ने से रडार का कवरेज भी बढ़ जाता है और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों या ड्रोन का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

उस समय वायुसेना की मांग यह भी थी कि विमान में 360 डिग्री कवरेज देने वाला एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार हो, जो कम से कम 550 किलोमीटर तक बड़े एरियल टारगेट्स का पता लगा सके। साथ ही वह कम रडार सिग्नेचर वाले टारगेट्स, जैसे छोटे ड्रोन और हेलीकॉप्टर, को भी ट्रैक करने में सक्षम हो। हालांकि उस समय हाइपरसोनिक हथियारों या बैलिस्टिक मिसाइलों की पहचान को लेकर कोई अलग और स्पष्ट तकनीकी शर्त नहीं रखी गई थी।

सूत्रों का कहना है कि , 2024 की आरएफआई में इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम), आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (आईएफएफ), सुरक्षित डेटा लिंक और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम जैसी क्षमताएं जरूर मांगी गई थीं, लेकिन इन सिस्टमों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग या ऑटोमैटिक डेटा एनालिसिस जैसी नई तकनीकों को जरूरी नहीं बनाया गया था। मिशन सिस्टम का उद्देश्य मुख्य रूप से रडार, आईएफएफ और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर से मिलने वाली जानकारी को जोड़कर ऑपरेटर तक पहुंचाना था, ताकि वह हालात के मुताबिक फैसले ले सके।

उस समय नेटवर्क आधारित युद्ध (नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर) को ध्यान में रखते हुए डेटा लिंक और भारतीय वायुसेना के कमांड नेटवर्क से जुड़ने की व्यवस्था तो मांगी गई थी, लेकिन भारतीय नेविगेशन सिस्टम नाविक, भारतीय क्रिप्टो मॉड्यूल, सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो या जीएनएसएस उपलब्ध न होने की स्थिति में भी काम करने जैसी विस्तृत जरूरतें उसमें शामिल नहीं थीं।

विमान की सुरक्षा के लिए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सेल्फ प्रोटेक्शन उपकरणों की मांग जरूर की गई थी, लेकिन मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम, डायरेक्टेड इंफ्रारेड काउंटर मेजर, एडवांस्ड जैमर और एआई आधारित इलेक्ट्रॉनिक थ्रेट एनालिसिस जैसी क्षमताओं पर उस समय उतना जोर नहीं था।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई 2024 की आरएफआई उस समय के ऑपरेशनल माहौल के हिसाब से तैयार की गई थी। उसका मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी, एयर डिफेंस कंट्रोल और नेटवर्क आधारित ऑपरेशन को मजबूत करना था।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदल दी तस्वीर

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने लंबी दूरी की हवाई निगरानी, लगातार एयरस्पेस मॉनिटरिंग और नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट ऑपरेशन संचालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण अनुभव हासिल किए। इन्हीं अनुभवों के बाद वायुसेना ने अपनी भविष्य की जरूरतों का दोबारा आकलन किया और जनवरी 2026 में पहले के मुकाबले कहीं अधिक एडवांस तकनीकी जरूरतों वाली नई आरएफआई जारी की। (IAF AEWCS Requirements)

एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के साथ बढ़ाई उड़ान क्षमता

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती लंबे समय तक लगातार हवाई निगरानी बनाए रखने की रही। मौजूदा एईडब्ल्यू एंड सी और Awax प्लेटफॉर्म सीमित संख्या में होने के कारण लगातार 24 घंटे कवरेज देना आसान नहीं था।

पहली आरएफआई में विमान से कम से कम आठ घंटे हवा में रहने की क्षमता मांगी गई थी। नई आरएफआई में इसे बढ़ाकर कम से कम दस घंटे कर दिया गया है। अगर कोई प्लेटफॉर्म इतनी देर लगातार नहीं उड़ सकता तो उसमें हवा में ईंधन भरने यानी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की सुविधा जरूरी होगी।

लंबे समय तक हवा में रहने वाला एईडब्ल्यू एंड सी विमान किसी सीमा क्षेत्र पर लगातार निगरानी बनाए रख सकता है। इससे बार-बार विमान बदलने की जरूरत कम होती है और पूरे ऑपरेशन के दौरान एक ही कमांड प्लेटफॉर्म सक्रिय रह सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग हुए शामिल

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान अलग-अलग प्लेटफॉर्म से आने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर तुरंत निर्णय लेने की जरूरत भी महसूस हुई। इसी अनुभव के आधार पर नई आरएफआई में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और सेंसर डेटा फ्यूजन जैसी क्षमताओं को शामिल किया गया है। इससे रडार, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और दूसरे स्रोतों से मिलने वाली जानकारी का विश्लेषण पहले से कहीं तेजी से किया जा सकेगा। (IAF AEWCS Requirements)

ऊंचाई भी बढ़ा दी गई

एक और महत्वपूर्ण बदलाव विमान की उड़ान ऊंचाई को लेकर किया गया है। नई आरएफआई में ऑपरेशनल सीलिंग 40 हजार फीट से बढ़ाकर 45 हजार फीट कर दी गई है। साथ ही यह भी जरूरी किया गया है कि विमान लगभग 3,300 मीटर यानी लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई वाले एयरफील्ड से भी उड़ान भर सके। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह आवश्यकता उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से ऑपरेशन चलाने की जरूरत को ध्यान में रखकर जोड़ी गई है।

सूत्रों का कहना है कि जितनी अधिक ऊंचाई पर रडार होगा, उतना बड़ा क्षेत्र उसकी निगरानी में आएगा। अधिक ऊंचाई से जमीन की वक्रता का असर कम होता है और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को भी पहले देखा जा सकता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह जरूरत ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन को ध्यान में रखकर रखी गई है, जहां कम हवा, कम इंजन प्रदर्शन और लंबी टेकऑफ दूरी जैसी चुनौतियां होती हैं।

ऐसे एयरफील्ड से ऑपरेशन करने के लिए विमान के इंजन, ब्रेकिंग सिस्टम, लैंडिंग गियर और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है।

रडार अब पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर

नई आरएफआई का सबसे बड़ा बदलाव रडार से जुड़ा रहा। पहले जहां लगभग 550 किलोमीटर तक टारगेट खोजने की क्षमता पर्याप्त मानी जा रही थी, वहीं ऑपरेशन सिंदूर के बाद जरूरतें बदल गईं और 700 किलोमीटर से अधिक दूरी पर टारगेट पहचानने वाला फोर-डी एईएसए रडार मांगा गया।

सूत्रों के मुताबिक, फोर-डी एईएसए रडार केवल टारगेट की दिशा और दूरी ही नहीं बताता बल्कि उसकी ऊंचाई, गति और लगातार बदलती स्थिति की भी सटीक जानकारी देता है। इससे एक साथ बड़ी संख्या में टारगेट्स पर नजर रखना आसान हो जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई आरएफआई में पहली बार सी सरफेस मोड को अनिवार्य जरूरत के तौर पर शामिल किया गया। जिसमें नया एईडब्ल्यू एंड सी विमान केवल आसमान में उड़ रहे लड़ाकू विमान, ड्रोन या मिसाइलों पर ही नजर नहीं रखेगा, बल्कि समुद्र में होने वाली गतिविधियों की भी निगरानी कर सकेगा। (IAF AEWCS Requirements)

नेटवर्क से पूरी तरह जुड़ने की तैयारी

नेटवर्क आधारित युद्ध अब भारतीय वायुसेना की प्राथमिकता बन चुका है। इसी कारण नई आरएफआई में आईएसीसीएस, सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो, नाविक नेविगेशन सिस्टम, भारतीय क्रिप्टो सिस्टम और का-बैंड सैटकॉम के साथ पूरी तरह जुड़ने की क्षमता अनिवार्य की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एईडब्ल्यू एंड सी विमान केवल हवाई रडार प्लेटफॉर्म न रहकर पूरे एयर ऑपरेशन का उड़ता हुआ कमांड सेंटर बन सके।

मिशन सिस्टम भी पहले से ज्यादा स्मार्ट

नई आरएफआई में मिशन सॉफ्टवेयर को भी पूरी तरह बदला गया है। अब सेंसर डेटा फ्यूजन, ऑटोमैटिक एनालिसिस, मिशन सपोर्ट और निर्णय लेने में मदद करने वाले एआई आधारित टूल्स मांगे गए हैं।

कम्युनिकेशन सपोर्ट सिस्टम में भी मशीन लर्निंग और बड़े भाषा मॉडल आधारित निर्णय सहायता प्रणाली की मांग की गई है। इसका उद्देश्य बड़ी मात्रा में आने वाली जानकारी को तेजी से समझना और सही ऑपरेटर तक पहुंचाना है।

सुरक्षा प्रणाली भी हुई मजबूत

विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के बढ़ते खतरे को देखते हुए सेल्फ प्रोटेक्शन सिस्टम को भी पहले से काफी मजबूत बनाया गया है। नई आरएफआई में मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम, डायरेक्टेड इंफ्रारेड काउंटर मेजर, सेल्फ प्रोटेक्शन जैमर और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम जैसी क्षमताओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार, आधुनिक युद्ध में एईडब्ल्यू एंड सी विमान स्वयं भी दुश्मन का प्रमुख टारगेट होता है। इसलिए उसकी सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। (IAF AEWCS Requirements)

नेत्र के अनुभवों में भी दिख रहा असर

नेत्र में डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (सीएबीएस) द्वारा विकसित स्वदेशी एईएसए (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट्स की निगरानी और ट्रैकिंग कर सकता है।

इसका रडार लगभग 240 डिग्री क्षेत्र में लगातार निगरानी करता है, जिससे दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन और अन्य हवाई लक्ष्यों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

वहीं, टारगेट के साइज के अनुसार यह सिस्टम लगभग 250 से 375 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों का पता लगाने में सक्षम है। साथ ही, नेत्र एक समय में 200 से ज्यादा एरियल टारगेट्स पर नजर रख सकता है और उनकी गतिविधियों पर लगातार निगरानी बनाए रख सकता है।

इसमें रडार के साथ आईएफएफ (आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो), ईएसएम (इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स) और सीएसएम (कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स) जैसे सिस्टम लगे हैं। इससे दुश्मन के रडार और संचार संकेतों का भी पता लगाया जा सकता है।

इसके अलावा नेत्र भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) से जुड़कर लड़ाकू विमानों और ग्राउंड कंट्रोल सेंटर तक वास्तविक समय में जानकारी भेज सकता है।

वहीं, नेत्र करीब 8 से 9 घंटे तक लगातार मिशन पर रह सकता है। कुछ कॉन्फिगरेशन में हवा में ईंधन भरने की क्षमता के साथ इसकी मिशन अवधि और बढ़ाई जा सकती है।

नेत्र मॉडिफाइड एम्ब्रेयर ईआरजे-145 ट्विन इंजन जेट पर बेस्ड है। छोटा प्लेटफॉर्म होने के बावजूद यह भारतीय वायुसेना को मध्यम दूरी की हवाई निगरानी और नेटवर्क आधारित युद्ध संचालन में महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान करता है। (IAF AEWCS Requirements)

नेत्र एमके-2: ज्यादा ताकतवर और लंबी दूरी तक निगरानी करने वाला स्वदेशी सिस्टम

नेत्र एमके-1 को ऑपरेशनल मंजूरी मिलने के बाद अब डीआरडीओ का फोकस उसके अगले और ज्यादा एडवांस वर्जन नेत्र एमके-2 पर है। यह सिस्टम मौजूदा एम्ब्रेयर ईआरजे-145 प्लेटफॉर्म की जगह बड़े एयरबस ए321 विमान पर तैयार किया जाएगा। भारतीय वायुसेना के पास एयर इंडिया से खरीदे हुए एयरबस ए321 विमान हैं, जिन्हें मिशन प्लेटफॉर्म में बदला जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े एयरफ्रेम की वजह से नेत्र एमके-2 में ज्यादा ईंधन, अधिक बिजली उत्पादन और बेहतर कूलिंग सिस्टम उपलब्ध होगा। इससे बड़े और ज्यादा शक्तिशाली सेंसर लगाने के साथ-साथ विमान की उड़ान अवधि भी बढ़ाई जा सकेगी। अनुमान है कि यह विमान 10 घंटे से अधिक समय तक लगातार मिशन पर रह सकेगा, जबकि नेत्र एमके-1 की उड़ान क्षमता करीब 8 से 9 घंटे है।

नेत्र एमके-2 में नई पीढ़ी का एईएसए रडार लगाया जाएगा, जो डीआरडीओ के उत्तम रडार से विकसित तकनीक और गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) आधारित ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल का उपयोग करेगा। यह रडार मौजूदा सिस्टम की तुलना में अधिक ताकतवर होगा और लगभग 300 डिग्री तक निगरानी करने में सक्षम माना जा रहा है। इसकी टारगेट पहचानने की क्षमता भी बढ़कर 500 किलोमीटर से अधिक होने का अनुमान है, जबकि नेत्र एमके-1 की रेंज लगभग 250 से 375 किलोमीटर तक है।

सूत्रों के अनुसार, इस नए सिस्टम में कम रडार सिग्नेचर वाले टारगेट्स, जैसे छोटे ड्रोन और स्टेल्थ विमानों का पता लगाने की क्षमता भी बेहतर होगी। साथ ही यह एक साथ ज्यादा हवाई लक्ष्यों की निगरानी और ट्रैकिंग कर सकेगा।

नेत्र एमके-2 में केवल रडार ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम), कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स (सीएसएम), सेल्फ प्रोटेक्शन सिस्टम और सुरक्षित डेटा लिंक को भी पहले से अधिक एडवांस बनाया जाएगा। यह भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) के साथ बेहतर तरीके से जुड़कर रियल टाइम में जानकारी साझा कर सकेगा।

बड़े प्लेटफॉर्म की वजह से विमान में अधिक मिशन ऑपरेटरों के लिए जगह होगी, जिससे लंबी अवधि के अभियानों के दौरान अलग-अलग टीमों के बीच काम का बेहतर बंटवारा किया जा सकेगा। इसके अलावा अतिरिक्त स्थान मिलने से भविष्य में नए सेंसर और अन्य उपकरण जोड़ना भी आसान होगा।

सूत्रों का कहना है कि नेत्र एमके-2 को इस तरह डेवलप किया जा रहा है कि यह लंबी दूरी के एरियल सर्विलांस, नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट ऑपरेशंस, फाइटर कंट्रोल और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की जरूरतों को पहले से अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सके। हालांकि, भारतीय वायुसेना ने 2026 की नई आरएफआई में 360 डिग्री रडार कवरेज और 700 किलोमीटर से अधिक की टारगेट आइडेंटिफिकेशन क्षमता जैसी और भी एडवांस जरूरतें शामिल की हैं, जो भविष्य के बड़े एईडब्ल्यू एंड सी प्लेटफॉर्म के लिए तय की गई हैं। (IAF AEWCS Requirements)