📍नई दिल्ली | 2 Jul, 2026, 2:52 PM
54 Years After Shimla Agreement: भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता (इंडस वाटर्स ट्रीटी) छह दशक से अधिक समय तक दोनों देशों के बीच सबसे स्थिर समझौतों में गिना जाता रहा। युद्ध, सीमा पर तनाव और कूटनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद यह समझौता लागू रहा। लेकिन अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इस समझौते को स्थगित रखने का फैसला लिया। भारत सरकार ने साफ किया कि यह कदम पानी को हथियार बनाने के लिए नहीं, बल्कि सीमा पार आतंकवाद को लेकर अपनी नीति में बदलाव का संकेत देने के लिए उठाया गया है।
2 जुलाई 1972 को हुए शिमला समझौते के 54 वर्ष पूरे हो रहे हैं। रक्षा और कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि भारत अब आतंकवाद, द्विपक्षीय समझौतों और दोनों देशों के बीच सहयोग को अलग-अलग विषय मानकर नहीं चल रहा है। नई दिल्ली का कहना है कि यदि कोई देश लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता है और द्विपक्षीय समझौतों की भावना का पालन नहीं करता, तो सामान्य सहयोग जारी रखना संभव नहीं है।
54 Years After Shimla Agreement: सिंधु जल समझौता क्या है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण
India and pakistan के बीच सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते में विश्व बैंक ने भी मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच स्पष्ट व्यवस्था बनाना था।
समझौते के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान के हिस्से में गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का अधिकार भारत को मिला। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित स्तर पर सिंचाई, जलविद्युत परियोजनाएं और घरेलू उपयोग की अनुमति भी दी गई।
करीब छह दशक तक यह समझौता दोनों देशों के बीच सबसे स्थिर व्यवस्था माना जाता रहा। वर्ष 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के दौरान भी इस समझौते को समाप्त नहीं किया गया। (54 Years After Shimla Agreement)
पहलगाम हमला बना बड़ा मोड़
22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन इलाके में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी। इसे वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद आम नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला माना गया।
जांच एजेंसियों के अनुसार हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों का संबंध पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क से था। शुरुआती दौर में इस हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट नाम के संगठन ने ली थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां और कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस संगठन को लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी संगठन मानते हैं।
रक्षा सूत्रों के अनुसार, हमले के अगले ही दिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक हुई। इसी बैठक में कई अहम फैसलों के साथ सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित रखने का फैसला लिया गया। सूत्रों का कहना है कि यह फैसला किसी अचानक प्रतिक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि लंबे समय से चल रही सुरक्षा समीक्षा के बाद लिया गया कदम था। (54 Years After Shimla Agreement)
केवल एक घटना नहीं, लंबा रिकॉर्ड बना आधार
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत ने केवल पहलगाम हमले को आधार बनाकर यह फैसला नहीं लिया। पिछले दो दशकों में मुंबई हमला, उरी हमला, पुलवामा हमला और जम्मू-कश्मीर में लगातार होने वाली आतंकी घटनाओं को भी सुरक्षा एजेंसियों ने समीक्षा का हिस्सा बनाया।
भारत का कहना है कि इन अधिकांश हमलों की जांच में ऐसे आतंकी संगठनों का नाम सामने आया, जिनकी गतिविधियां पाकिस्तान की जमीन से चलती रही हैं। भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि सीमा पार मौजूद आतंकी ढांचे को खत्म करने के बजाय उन्हें संरक्षण मिलता रहा है।
रक्षा सूत्रों के अनुसार, लगातार ऐसे माहौल में सहयोग की पुरानी व्यवस्था बनाए रखना भारत के लिए मुश्किल होता जा रहा था। यही वजह है कि पहली बार आतंकवाद और जल सहयोग को एक साथ देखा गया। (54 Years After Shimla Agreement)
भारत ने समझौता रद्द नहीं, बल्कि स्थगित क्यों किया
विदेश मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारत ने सिंधु जल समझौते को समाप्त करने की घोषणा नहीं की है, बल्कि उसे “एबेयंस” यानी स्थगित रखने का फैसला लिया है।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्पष्ट कहा है कि सिंधु जल समझौता तब तक स्थगित रहेगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता।
कूटनीतिक जानकारों के अनुसार दोनों शब्दों में बड़ा अंतर है। समझौता समाप्त करने का मतलब पूरी संधि खत्म करना होता है, जबकि स्थगित करने का अर्थ है कि उसकी प्रक्रिया फिलहाल लागू नहीं रहेगी। यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो उसी समझौते को दोबारा लागू भी किया जा सकता है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत ने यही रास्ता इसलिए चुना ताकि यह संदेश जाए कि सहयोग पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है, लेकिन सहयोग अब बिना शर्त नहीं होगा। (54 Years After Shimla Agreement)
शिमला समझौते का मूल उद्देश्य क्या था
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 2 जुलाई 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे।
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य दोनों देशों के बीच विवादों का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से करना था। इसके साथ ही दोनों देशों ने यह भी स्वीकार किया था कि वे ऐसे किसी कदम से बचेंगे जिससे आपसी संबंध खराब हों।
समझौते में यह भी कहा गया था कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे और शांतिपूर्ण संबंध बनाने का प्रयास करेंगे। नियंत्रण रेखा यानी लाइन ऑफ कंट्रोल का सम्मान करना भी इस समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
विदेश नीति से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शिमला समझौते का आधार केवल सीमा विवाद का समाधान नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे का माहौल तैयार करना भी था। (54 Years After Shimla Agreement)
भारत का आरोप, पाकिस्तान ने समझौते की भावना का पालन नहीं किया
सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत का मानना है कि पिछले कई दशकों में पाकिस्तान ने शिमला समझौते की मूल भावना का पालन नहीं किया। भारत का आरोप है कि एक तरफ पाकिस्तान द्विपक्षीय समझौते का हवाला देता रहा, वहीं दूसरी तरफ वह लगातार जम्मू-कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा।
भारत यह भी कहता है कि यदि किसी समझौते में विवादों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से हल करने की बात कही गई है, तो बार-बार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की मांग उसी समझौते की भावना के विपरीत है।
हाल के महीनों में पाकिस्तान के कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयानों ने भी इस बहस को और तेज किया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से शिमला समझौते को अप्रासंगिक बताया था, हालांकि बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस बयान से दूरी बनाने की कोशिश की। (54 Years After Shimla Agreement)
आतंकवाद और दुष्प्रचार पर भी उठे सवाल
भारतीय एजेंसियों के अनुसार सीमा पार आतंकवाद के साथ-साथ दुष्प्रचार अभियान भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का बड़ा कारण रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाया कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फर्जी सूचनाएं फैलाने वाले कई हजार डिजिटल लिंक पाकिस्तान से संचालित हो रहे थे। इनमें भारतीय लड़ाकू विमान गिराने, सैन्य ठिकानों पर हमले और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने जैसे दावे शामिल थे, जिन्हें बाद में गलत पाया गया।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इस तरह का दुष्प्रचार केवल सूचना युद्ध का हिस्सा नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसा कमजोर करने का भी माध्यम बनता है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार शिमला समझौते में दोनों देशों ने ऐसे प्रचार से बचने पर भी सहमति जताई थी, जिससे आपसी संबंध प्रभावित हों। इसलिए भारत इन घटनाओं को भी समझौते की भावना से जोड़कर देख रहा है। (54 Years After Shimla Agreement)
Author
Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.





