Home Blog Page 17

GRSE got Navratna status on International Yoga Day, PM Modi will entrust the Navy on Sunday 3 Indigenous Ships

GRSE Navratna Status
Image Source: GRSE

GRSE Navratna Status: On the occasion of International Yoga Day, on June 21, being a major event for the Indian Navy in Kolkata. Prime Minister Narendra Modi will formally commission three indigenous naval ships made by GRSE, namely Garden Reach Shipbuilders and Engineers Limited in Kolkata. These three platforms include Advanced Stellth Frigate INS Dunagiri, Survey Vessel Large INS Modifier and Anti-Submarine Warfare Shalo Water Craft INS Agray.

Commissioning of the three ships is taking place at a time when the Government Shipbuilding Company of Kolkata making them GRSE The Navratna status is found. The Department of Public Enterprises of the Ministry of Finance granted the status of the newlywed Public Sector Enterprise to GRSE on June 20. This status has been given to the company’s past few years of financial performance, production capacity, and continually increasing shipbuilding achievements.

GRSE Navratna Status: What is Navratna status and why got GRSE?

Navratna The tailor-made central government gives companies in the public sector who have consistently performed better financial performance and whose operational cabability is strong. This gives the company more financial and administrative freedom to take decisions associated with investment, expansion, new projects and strategic partnerships.

जीआरएसई के मामले में पिछले पांच सालों के आंकड़े इस बदलाव की वजह बताते हैं। वित्त वर्ष 2021-22 में कंपनी का रेवेन्यू फ्रॉम ऑपरेशंस करीब 1,754 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर लगभग 7,002 करोड़ रुपये पहुंच गया। यानी पांच साल में कंपनी के कारोबार में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

इसी अवधि में कंपनी का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स भी 190 करोड़ रुपये से बढ़कर 748 करोड़ रुपये पहुंच गया। यह करीब 294 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। रक्षा शिपबिल्डिंग जैसे क्षेत्र में यह प्रदर्शन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यहां जहाज निर्माण में कई साल लगते हैं, बड़ी सप्लाई चेन की जरूरत होती है और हर प्लेटफॉर्म की तकनीकी जटिलता अलग होती है।

नवरत्न दर्जा मिलने के बाद जीआरएसई अब बड़े निवेश प्रस्तावों पर तेजी से फैसले ले सकेगा। सामान्य नियमों के तहत नवरत्न कंपनियों को एक परियोजना में 1,000 करोड़ रुपये या अपनी नेटवर्थ के 15 प्रतिशत तक निवेश करने की अनुमति होती है, हालांकि यह सीमा संबंधित नियमों और कंपनी की वित्तीय स्थिति के अनुसार लागू होती है। इससे शिपयार्ड को नई निर्माण सुविधाएं, आधुनिक मशीनरी, डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन क्षमता बढ़ाने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम करने में सुविधा मिलती है।

भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्त अधिकारी और जीआरएसई के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कमोडोर पीआर. हरि ने कहा कि नवरत्न दर्जा कंपनी की यात्रा का एक महत्वपूर्ण क्षण है। उनके अनुसार यह सम्मान जीआरएसई के वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों की मेहनत, प्रोफेशनलिज्म और समर्पण को मान्यता है। उन्होंने कहा कि इससे कंपनी को रणनीतिक अवसरों पर काम करने, रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा मजबूत करने में मदद मिलेगी।

21 जून को एक साथ कमीशन होंगे तीन स्वदेशी जहाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 जून को कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में तीनों प्लेटफॉर्म को नौसेना में शामिल करेंगे। यह कार्यक्रम इसलिए भी खास है क्योंकि तीनों जहाजों का काम अलग-अलग है। एक जहाज समुद्री युद्ध के लिए बनाया गया है, दूसरा समुद्र की गहराई और समुद्री क्षेत्र का सर्वे करेगा, जबकि तीसरा उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है।

इन तीनों प्लेटफॉर्म को एक साथ शामिल करने से नौसेना की ब्लू वॉटर ऑपरेशंस, समुद्री डोमेन अवेयरनेस और तटीय क्षेत्रों में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूती मिलेगी। तीनों जहाज भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किए गए और जीआरएसई ने उनका निर्माण किया है। (GRSE Navratna Status)

आईएनएस दुनागिरी फ्रिगेट: समुद्र में दुश्मन के जहाजों और मिसाइलों से करेगी मुकाबला

INS Dunagiri प्रोजेक्ट 17ए का स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। फ्रिगेट को नौसेना का ऐसा बहुउद्देश्यीय युद्धपोत माना जाता है, जो समुद्र में दुश्मन के जहाजों, मिसाइलों, विमानों और पनडुब्बियों से जुड़े खतरों के खिलाफ काम कर सकता है।

दुनागिरी इस श्रेणी के आधुनिक युद्धपोतों में शामिल है, जिसे कम रडार सिग्नेचर के साथ तैयार किया गया है। स्टेल्थ डिजाइन का मतलब यह नहीं कि जहाज पूरी तरह दिखाई नहीं देता, बल्कि इसका आकार, सतह और कई सिस्टम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि दुश्मन के रडार के लिए इसे पकड़ना कठिन हो सके।

दुनागिरी में ब्रह्मोस सरफेस टू सरफेस मिसाइल और मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम समेत आधुनिक हथियार और सेंसर लगाए गए हैं। ब्रह्मोस मिसाइल समुद्र में दुश्मन के युद्धपोतों या जमीन पर मौजूद महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता रखती है। वहीं एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम जहाज को दुश्मन के विमान, हेलीकॉप्टर और आने वाली मिसाइलों से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत कुल सात स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें कुछ जहाज मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स और कुछ कोलकाता के जीआरएसई में तैयार किए गए हैं। दुनागिरी इस परियोजना की पांचवीं फ्रिगेट है। जहाज के ढांचे, कई उपकरणों, सिस्टम और निर्माण में करीब 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

आईएनएस संशोधक: समुद्र की गहराई और रास्तों का नक्शा तैयार करने वाला जहाज

तीनों प्लेटफॉर्म में आईएनएस संशोधक का काम अलग है। यह सर्वे वेसल लार्ज श्रेणी का जहाज है। आम भाषा में समझें तो यह नौसेना का समुद्री सर्वे करने वाला जहाज है। इसका उपयोग समुद्र की गहराई मापने, समुद्र तल का नक्शा तैयार करने, तटीय इलाकों की जानकारी जुटाने और नौसैनिक अभियानों के लिए जरूरी हाइड्रोग्राफिक डेटा तैयार करने में किया जाएगा।

किसी भी नौसेना के लिए समुद्री नक्शे बेहद जरूरी होते हैं। जहाजों और पनडुब्बियों को किस रास्ते से गुजरना है, किस क्षेत्र में पानी कितना गहरा है, समुद्र तल पर कहां चट्टानें या अन्य रुकावटें हैं, यह जानकारी सैन्य और नागरिक दोनों तरह के नौवहन के लिए महत्वपूर्ण होती है।

आईएनएस संशोधक को तटीय और गहरे समुद्र दोनों क्षेत्रों में हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए तैयार किया गया है। इसमें समुद्री और भू-भौतिकीय डेटा जुटाने के लिए आधुनिक सर्वे सिस्टम लगाए गए हैं। जहाज में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल जैसे उपकरण भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ये उपकरण समुद्र के भीतर जाकर ऐसी जगहों की जानकारी जुटाने में मदद करते हैं, जहां सामान्य जहाज के सेंसर की पहुंच सीमित होती है।

इसके अलावा सर्वे जहाज बंदरगाहों की योजना, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आपदा के बाद समुद्री क्षेत्र का आकलन और वैज्ञानिक शोध से जुड़े काम भी करते हैं। जरूरत पड़ने पर ऐसे जहाज सीमित स्तर पर सर्च एंड रेस्क्यू, समुद्री शोध और मेडिकल सपोर्ट जैसे कार्यों में भी उपयोगी हो सकते हैं। (GRSE Navratna Status)

आईएनएस अग्रय: उथले समुद्र में पनडुब्बियों को खोजने वाला युद्धपोत

INS Agraha एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य काम समुद्र के उथले क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना है।

उथले समुद्र में पनडुब्बी रोधी युद्ध आसान नहीं होता। गहरे समुद्र की तुलना में यहां पानी की गहराई कम होती है, समुद्र तल की बनावट अलग होती है और ध्वनि तरंगों का व्यवहार भी बदल जाता है। पनडुब्बियों को खोजने के लिए इस्तेमाल होने वाले सोनार सिस्टम को ऐसे वातावरण में अधिक सटीक और संवेदनशील होना पड़ता है।

आईएनएस अग्रय अर्नाला क्लास की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसमें उथले पानी में काम करने वाले सोनार सिस्टम, हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर लगाए गए हैं। सोनार पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजकर किसी पनडुब्बी या अन्य वस्तु की स्थिति का पता लगाने में मदद करता है। टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर पनडुब्बी रोधी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

अग्रय को जीआरएसई ने बनाया है। यह अर्नाला क्लास का चौथा जहाज है, जिसे मार्च 2026 में नौसेना को सौंपा गया था। इस श्रेणी के कुल आठ जहाज जीआरएसई और लार्सन एंड टुब्रो द्वारा बनाए जा रहे हैं। (GRSE Navratna Status)

मार्च में एक ही दिन तीनों जहाज सौंपकर बनाया था रिकॉर्ड

जीआरएसई ने इस साल 30 मार्च को आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रय तीनों जहाज नौसेना को एक ही दिन सौंपे थे। डिफेंस शिपबिल्डिंग में एक ही दिन तीन अलग-अलग श्रेणी के प्लेटफॉर्म की डिलीवरी को महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था।

कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल आठ वॉरशिप और नेवल प्लेटफॉर्म डिलीवर किए। इनमें तीन प्लेटफॉर्म की एक ही दिन डिलीवरी भी शामिल थी। वहीं, जीआरएसई अब केवल छोटे जहाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि फ्रिगेट, सर्वे वेसल, एंटी-सबमरीन क्राफ्ट और अन्य जटिल प्लेटफॉर्म पर एक साथ काम कर रहा है। (GRSE Navratna Status)

भारत के पहले स्वदेशी युद्धपोत से शुरू हुआ था सफर

जीआरएसई का इतिहास भारतीय नौसैनिक शिपबिल्डिंग से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1961 में, डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग घोषित होने के लगभग एक साल बाद, इस शिपयार्ड ने भारत का पहला स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस अजय नौसेना को सौंपा था।

इसके बाद कंपनी ने भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और मित्र देशों के लिए कई तरह के जहाज तैयार किए। जीआरएसई ने मॉरीशस सरकार के लिए सीजीएस बराकुडा नाम का भारत का पहला एक्सपोर्ट वॉरशिप भी बनाया था। यह उपलब्धि इसलिए अहम थी क्योंकि इससे भारत ने केवल अपने लिए युद्धपोत बनाने के बजाय मित्र देशों के लिए भी रक्षा प्लेटफॉर्म तैयार करने की क्षमता दिखाई।

जीआरएसई अब तक 800 से अधिक मरीन प्लेटफॉर्म डिलीवर कर चुका है। इनमें वॉरशिप, गश्ती पोत, सर्वे जहाज, तटरक्षक पोत और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म शामिल हैं। कंपनी के अनुसार उसने भारतीय नौसेना, तटरक्षक बल और मित्र देशों को कुल 118 युद्धपोत दिए हैं, जिनमें 80 भारतीय नौसेना में शामिल किए गए हैं।

जर्मनी के लिए बन रहे हैं 12 जहाज

जीआरएसई डिफेंस शिप्स के साथ कमर्शियल शिपबिल्डिंग में भी सक्रिय है। कंपनी इस समय एक जर्मन ग्राहक के लिए 12 मल्टी पर्पज वेसल तैयार कर रही है। ये जहाज भारत में बन रहे हैं और इन्हें विदेशी ग्राहक को दिया जाना है। इस परियोजना को मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड मॉडल के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

कंपनी ग्रीन वेसल और ऑटोनॉमस वेसल के क्षेत्र में भी काम कर रही है। ग्रीन वेसल से मतलब ऐसे जहाजों से है, जिनमें ईंधन की खपत और पर्यावरणीय प्रभाव कम करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। ऑटोनॉमस वेसल ऐसे प्लेटफॉर्म होते हैं, जो कुछ कार्य सीमित मानव नियंत्रण या डिजिटल सिस्टम के जरिए कर सकते हैं।

जीआरएसई रिसर्च शिप निर्माण में भी विशेष क्षमता रखता है। समुद्री शोध, हाइड्रोग्राफी और समुद्र से जुड़े वैज्ञानिक डेटा जुटाने के लिए रिसर्च वेसल महत्वपूर्ण होते हैं। संशोधक जैसे सर्वे वेसल इसी क्षमता का उदाहरण हैं। (GRSE Navratna Status)

नवरत्न दर्जे के बाद योजनाओं को मिलेगा विस्तार

जीआरएसई इस समय ब्राउनफील्ड और ग्रीनफील्ड दोनों तरह की विस्तार योजनाओं पर काम कर रहा है। ब्राउनफील्ड विस्तार का मतलब मौजूदा शिपयार्ड, वर्कशॉप, डॉक और निर्माण सुविधाओं को बड़ा या आधुनिक बनाना होता है। वहीं ग्रीनफील्ड परियोजना में नई जगह पर नई निर्माण क्षमता विकसित की जाती है।

शिपबिल्डिंग में उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मतलब केवल ज्यादा जहाज बनाना नहीं होता। इसके लिए स्टील कटिंग सुविधा, ब्लॉक निर्माण, भारी क्रेन, डॉक, आउटफिटिंग जेटी, परीक्षण सुविधा, डिजाइन टीम, सप्लाई चेन और हजारों छोटे-बड़े उद्योगों का नेटवर्क भी जरूरी होता है।

नवरत्न दर्जा मिलने के बाद जीआरएसई के बोर्ड को निवेश और विस्तार से जुड़े फैसलों में अधिक अधिकार मिलेंगे। कंपनी के लिए यह बदलाव ऐसे समय आया है, जब नौसेना के लिए नए युद्धपोतों, सर्वे प्लेटफॉर्म, पनडुब्बी रोधी जहाजों और गश्ती पोतों की जरूरत लगातार बनी हुई है।

21 जून को दुनागिरी, संशोधक और अग्रय की कमीशनिंग के साथ जीआरएसई के बनाए तीन अलग-अलग समुद्री प्लेटफॉर्म औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल फ्लीट का हिस्सा बन जाएंगे। (GRSE Navratna Status)

114 Rafael and AMCA got the trapped air force, which is not given before any foreign fighter jet company!

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

Gripen F offers to IAF: Indian Air Force is undergoing a round of its most important changes at this time. On the one hand, he is facing a constantly growing challenges on two fronts like China and Pakistan, while the fall of his fighter jets on the other hand remains a constant concern. At the moment there are only 29 squadrons sanctioned for the Air Force. While China has about 100 aviation brigades, the number of aviation brigades of the fifth generation aircraft J-20 is about 13. While Pakistan has about 25 fighters/multi-roll squadrons and it will also begin to receive the delivery of J-35 aircraft of China’s fifth generation. The need for new fighter planes is being felt long enough to fill in such a air force.

In view of this need, India has 114 multi roll fighter aircraft i.e. MRFA The program has been pushed and sent formal Letter of Request for 114 Rafael fighter jets from France. Though the fine deal is expected to last this year as the prices are still ongoing. Meanwhile, Sweden’s defense company Saab has placed a very special offer in front of the Indian Air Force.

According to sources, the Swedish fighter jet company Saab has offered its latest Gripen F fighter aircraft to India. Interestingly, the company has emphasized the Twin Seater Gripen F instead of Single Seat Gripen E. In this offer, India has proposed to deliver mission systems, software developments and many important techniques.

Gripen F offers to IAF: Why is Grip between Raphael and AMCA

The biggest challenge in the face of the air force is the timeline. On one side 114 Raphael The purchase process of aircraft is not completed right now. On the other hand, the fifth generation indigenously advanced Medium Combat Aircraft, i.e. AMCA can take several years to come to service. The initial delivery of Rafael Fighter Jets is likely to begin from 2031 in the flyaway condition directly from France. While the first prototype rollout of AMCA is expected to be up to 2029, the Series Production may begin around 2035.

Formulas show that AMCA The process of incorporating private companies for prototype development has begun under the project. But making the state-of-the-art stallth fighter aircraft involves the world’s most difficult projects. It is considered natural to take time to reach the production level in such.

This is the gap that Saab is looking as a spot. Saab claims that the first aircraft delivery can be started within three years after the agreement with the Gripen F and after a few years, about 30 aircraft can be made every year through local production in India. (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

Fighter jet flying from highway

Gripen The biggest merit of F is considered its operational capacity. This aircraft is developed from the Military Docktrin of the Cold War period of Sweden. At that time, Sweden was suspected that in the event of the war, his large airbase could be first targeted.

On the same way, Gripen was designed to fly from normal roads and highways. This aircraft can takeoff and landing from about 800m long highway section according to the formulas.

In the past few years in India, emergency landing facility, new roads, tunnels and dual-use infrastructure have been built rapidly. Several places have been prepared in Ladakh, Rajasthan and the North Eastern regions where fighter aircraft can be operated when needed.

Sources say that if large airbases come to scars in a conflict, such a capacity can additionally benefit the air force. (Gripen F Offer to IAF)

Only five people and 15 minutes

It takes quite time and resources to prepare for the mission again after flying several large fighter jets of Indian Air Force. It requires special ground support equipment, trained technicians and large maintenance structure. Even the fighter jets like Jaguar and Mig-29 need a long maintenance time to make it worth flying again after a sort.

About Gripen F Home Claims that it can be operated with extremely low resources. Automated Health Monitoring System in the aircraft owns most technical checks.

The entire process of refueling, weaponling and preparing for the next flight can be completed in about 15 minutes according to the formulas. The team of only five people is quite mentioned for this, which requires a specialist technician.

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

This is the offer of Saab on source code

सूत्रों का कहना है कि ग्रिपेन प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी ओपन आर्किटेक्चर डिजाइन है। आमतौर पर जब कोई देश विदेशी लड़ाकू विमान खरीदता है तो उसके मिशन सिस्टम और सॉफ्टवेयर का पूरा कंट्रोल ऑरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर के पास रहता है। विमान में नया हथियार जोड़ना हो, रडार को अपग्रेड करना हो या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम में बदलाव करना हो, तो विदेशी कंपनी की अनुमति और सहायता जरूरी होती है।

सूत्रों के अनुसार साब का दावा है कि ग्रिपेन एफ में फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और मिशन सिस्टम को अलग-अलग रखा गया है। इसका मतलब यह है कि फ्लाइट सिक्योरिटी से जुड़े मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना मिशन सॉफ्टवेयर में बदलाव किए जा सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

ग्रिपेन ऑफर की यह है सबसे बड़ी ताकत

सूत्रों के अनुसार भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की फ्रांस के साथ चल रही बातचीत में एक बड़ा मुद्दा राफेल लड़ाकू विमान के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (आईसीडी) और महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर तक पहुंच का भी है। आईसीडी दरअसल वे तकनीकी दस्तावेज होते हैं, जो बताते हैं कि विमान के अलग-अलग सिस्टम आपस में कैसे काम करते हैं और किस तरह एक-दूसरे से डेटा शेयर करते हैं।

सूत्रों का कहना है कि भारत चाहता है कि भविष्य में वह अपने स्वदेशी हथियारों और सेंसरों को राफेल में स्वतंत्र रूप से जोड़ सके। लेकिन बिना आईसीडी एक्सेस के ऐसा करना नामुमकिन है। ऐसी स्थिति में किसी नए भारतीय हथियार को विमान में जोड़ने के लिए मूल निर्माता कंपनी की मंजूरी और तकनीकी मदद की जरूरत पड़ती है।

सूत्र बताते हैं कि यदि इन सिस्टम्स के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स तक पूरी पहुंच नहीं मिलती है, तो भविष्य में भारत के लिए अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल, रुद्रम एंटी रेडिएशन मिसाइल या ब्रह्मोस-एनजी जैसे स्वदेशी वेपन सिस्टम्स को पूरी तरह स्वतंत्र तरीके से प्रमाणित करना मुश्किल हो सकता है। हर बड़े इंटीग्रेशन के लिए फ्रांसीसी कंपनियों के साथ कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ सकती है।

सूत्रों का कहना है कि यह केवल भारत से जुड़ा मामला नहीं है। फ्रांस ने संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी और अन्य राफेल ग्राहकों के साथ भी यही नीति अपनाई है। फ्रांस का कहना है कि राफेल के आरबीई2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन कंप्यूटर के सोर्स कोड को डेवलप करने में दशकों का वक्त लगा है और उन पर उसका पूरा अधिकार है। फ्रेंच कंपनी का मानना है कि राफेल के मूल सोर्स कोड और संवेदनशील एवियोनिक्स तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और सुरक्षा से जुड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।

वहीं, फ्रांस को खास तौर इस बात की भी चिंता है कि अगर ब्रह्मोस-एनजी जैसी मिसाइल के इंटीग्रेशन से राफेल के कुछ संवेदनशील तकनीकी डेटा तक अप्रत्यक्ष पहुंच का जोखिम बन सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

क्यों है साब का प्रस्ताव सबसे खास

सूत्रों के मुताबिक ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खासियत उसका ओपन आर्किटेक्चर मॉडल है। साब भारत को मिशन सिस्टम लेयर पर कहीं अधिक तकनीकी भागीदारी देने की बात कर रहा है। कंपनी का दावा है कि विमान के फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर और मिशन सॉफ्टवेयर को अलग-अलग रखा गया है। इससे सुरक्षा से समझौता किए बिना भारतीय इंजीनियर मिशन सिस्टम, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एल्गोरिद्म और स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन पर ज्यादा आजादी के साथ काम कर सकते हैं।

बेंगलुरु में डिजाइन और एक्सीलेंस सेंटर बनाने का प्रस्ताव

साब ने भारत में एक विशेष एक्सीलेंस और डिजाइन सेंटर स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा है। सूत्रों के अनुसार इसका उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं बल्कि भारतीय इंजीनियरों और रिसर्च संस्थानों को सीधे डेवलपमेंट प्रोसेस में शामिल करना है। इससे भारतीय वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य स्ट्रैटेजिक सॉफ्टवेयर के डेवलपमेंट में शामिल हो सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

दूसरे पायलट की जगह वारफेयर मैनेजमेंट अफसर

ग्रिपेन एफ में दूसरा कॉकपिट भी है। आमतौर पर दो सीट वाले विमान ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन ग्रिपेन एफ में दूसरी सीट का इस्तेमाल वेपन सिस्टम्स अफसर कर सकता है।

यह अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सेंसर मैनेजमेंट, ड्रोन कंट्रोल और कॉम्बैट मिशनों का ऑपरेशन कर सकता है। आधुनिक युद्ध में जहां डेटा की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहां यह अतिरिक्त सीट मिशन की क्षमता बढ़ाने वाली मानी जाती है।

लेकिन एक बड़ा जोखिम यह भी है!

जहां ग्रिपेन का ओपन सॉफ्टवेयर सिस्टम चर्चा में है, वहीं इसमें सबसे बड़ी कमजोरी भी है। ग्रिपेन एफ में जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-414 टर्बोफैन इंजन लगाया गया है। यही इंजन भारत के तेजस एमके-2 और एएमसीए एमके-1 के लिए भी चुना गया है।

अगर किसी वजह से इंजन सप्लाई पर असर पड़ता है, तो उसका असर केवल ग्रिपेन पर नहीं बल्कि भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

एआई और नेटवर्क बेस्ड युद्ध पर फोकस

साब का कहना है कि ग्रिपेन ई और एफ को भविष्य के बैटलफील्ड को ध्यान में रखकर डेवलप किया गया है। विमान में एडवांस्ड एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट मौजूद हैं।

कंपनी का दावा है कि विमान बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से प्रोसेस कर सकता है और पायलट को फैसले लेने में मदद करता है। यही वजह है कि इसे नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर रेडी प्लेटफॉर्म के तौर पर भी देखा जा रहा है। (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

कहां तक पहुंची बात

हालांकि स्वीडन की डिफेंस कंपनी साब का दावा है कि वह भारतीय वायुसेना को अपने आधुनिक ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान देने के प्रस्ताव पर भारतीय वायुसेना और डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) के साथ गंभीरता से बातचीत कर रही है। हालांकि वायुसेना के सूत्रों ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि पिछले कुछ महीनों से साब उनके संपर्क में जरूर है।

साब का दावा है कि वह भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित क्षमताओं के अलावा भारत में ही विमान के डिजाइन, मेंटेनेंस और भविष्य में अपग्रेड की सुविधा देने की बात कर रही है।

कंपनी का दावा है कि समझौता होने के बाद पहला ग्रिपेन लड़ाकू विमान लगभग तीन साल के भीतर भारत को मिल सकता है। साब ग्रिपेन एफ को अपनी श्रेणी का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान बताती है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टी रोल और नेटवर्क बेस्ड फाइटर जेट है, जिसे आधुनिक खतरों का सामना करने के लिए डेवलप किया गया है। (Gripen F Offer to IAF)

क्या हैं ग्रिपेन एफ की खूबियां

ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को सप्रेस कर सकता है। कंपनी का दावा है कि यह विमान केवल 10 मिनट के भीतर अलग-अलग मिशनों के लिए तैयार किया जा सकता है।

इस विमान में रेवेन ईएस-05 एईएसए रडार लगा है, जिसे आधुनिक रडार तकनीकों में गिना जाता है। इसके अलावा इसमें इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सिक्योर कम्यूनिकेशन सिस्टम भी मौजूद है। अमेरिका के बेहतरीन ईए-18जी ग्राउलर और एफ-16वी ब्लॉक 70 फाइटर जेट की तुलना में, ग्रिपेन एक साथ दो तरह के एयरक्राफ्ट रोल निभा सकता है।

साब का कहना है कि ग्रिपेन एफ भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप है और इसे भारतीय जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा सकता है। कंपनी भारत में उत्पादन सुविधा स्थापित करने, स्थानीय सप्लाई चेन विकसित करने और भारतीय इंजीनियरों तथा तकनीशियनों को प्रशिक्षण देने की भी बात कर रही है।

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वीडन दौरे के दौरान स्वीडिश वायुसेना के ग्रिपेन लड़ाकू विमानों ने उनके विमान को स्वीडिश हवाई क्षेत्र में एस्कॉर्ट किया था। इसे दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग के प्रतीक के रूप में भी देखा गया था। (Gripen F Offer to IAF)

Explainer: Attack in 30 seconds, missing in 15 seconds! won’t find A chance to respond to the enemy! What is Garudas, which shocked the Indian army?

Nibe Garudastra Mortar System
Nibe Garudastra Mortar System (Image Source: NIBE)

Garudastra Mortar System: The weapons that kill only long distances in the modern war are not quite borne, but also necessarily how fast a weapon can attack, how quickly it can change its place and how safe it can protect itself from the retaliation of the enemy. Indian company Nibe Limited has demonstrated its new garland long range 120mm vehicle mounted mortar system in front of Indian Army.

During the Evaluation Trial at the Mahu-based Infantry School of Madhya Pradesh, Girudas demonstrated a number of abilities that are being considered the need for the modern war. The particular thing is that this test was carried out on the No Cost-No Commitment (NC-NC) basis, i.e. the army tested the system’s capacity but without any purchase commitment.

Recently Indian Army on June Five Mortar The Specialist Vehicle was released by the Request for Information (RFI). The news has taken a break. After which NIBE company has demonstrated its garland long range 120mm vehicle mounted mortar and bomb system in front of the Indian Army.

Garudastra Mortar System: What Is Vehicle Mounted Mortar?

Mortar is usually considered to be the most trusted indirect fire support weapon of infantry. It is used to attack such a condition of the enemy that does not appear directly.

The troops in the traditional mortar system have to first unload the mortar from the vehicle, the base plate has to be applied, the direction is fixed and then the firing begins. This whole process can take several minutes.

But this whole process is largely automated in systems like garland. The vehicle stops, the system performs the direction of the target and the calculation of the distance, fires the mortar and then immediately exits there.

That is why such systems are becoming increasingly important for modern forces. (Garudastra Mortar System)

What did Grudasra do in Muhu?

The beginning of the trial according to the defense formulas is a "Shoot & ScoopThe mission took place. This capacity is considered the most important in the modern war.

Girudastra reached the scheduled firing position and prepared for wars in less than 30 seconds. After that two rounds were fired within only 15 seconds.

The most important thing was that immediately after firing the system left its place in just 15 seconds and reach the second place and then target the target. Its purpose was to avoid enemy counter battery fire.

Shoot & Scoop is therefore essential because modern radar can detect the status of canop or mortar in a few seconds.

Why is the "shoot and scoop" so important

In the last few years, the form of war has changed rapidly. Now almost every modern army has radars that can detect his firing location by tracking the direction of the shells stained by any cannon or mortar.

It is called counter battery radar.

The enemy can attack the responsive in a few minutes if a mortar is stacked at the same place for a long time after either a cannon firing.

यूक्रेन युद्ध में यह बार-बार देखने को मिला कि जो आर्टिलरी सिस्टम तेजी से स्थान नहीं बदल सके, वे दुश्मन के ड्रोन और जवाबी गोलाबारी का शिकार बन गए।

इसी वजह से दुनिया भर की सेनाएं ऐसे हथियारों की तलाश कर रही हैं जो हमला करने के बाद तुरंत अपनी लोकेशन बदल सकें। (Garudastra Mortar System)

केवल दो सैनिकों ने एक मिनट में किए 12 राउंड फायर

ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र की फायरिंग क्षमता का भी प्रदर्शन किया गया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक केवल दो सैनिकों की टीम ने इस सिस्टम को ऑपरेट करते हुए एक मिनट में 12 राउंड फायर किए।

इतनी तेज फायरिंग के बावजूद सिस्टम ने लक्ष्य पर सटीकता बनाए रखी। आम तौर पर मोर्टार ऑपरेशन में ज्यादा सैनिकों की जरूरत होती है, लेकिन ऑटोमेशन और डिजिटल फायर कंट्रोल तकनीक की वजह से गरुड़ास्त्र कम मानव संसाधन के साथ भी ज्यादा फायरपावर दे सकता है।

युद्ध में यह एक बड़ा फायदा माना जाता है क्योंकि कम सैनिकों के साथ ज्यादा प्रभावी फायर सपोर्ट दिया जा सकता है।

एमआरएसआई क्षमता ने भी किया प्रदर्शन

महू में हुए प्रदर्शन में मल्टीपल राउंड्स सिमल्टेनियस इम्पैक्ट मिशन (एमआरएसआई) भी शामिल हुआ। यह आधुनिक आर्टिलरी की सबसे एडवांस तकनीकों में गिना जाता है।

आमतौर पर यदि तीन गोले दागे जाएं तो पहला गोला पहले और तीसरा गोला सबसे बाद में टारगेट तक पहुंचेगा। लेकिन एमआरएसआई तकनीक में अलग-अलग कोणों और अलग-अलग उड़ान समय का इस्तेमाल करके गोले इस तरह दागे जाते हैं कि वे एक ही समय पर टारगेट पर गिरें।

ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र ने तीन राउंड फायर किए और सभी गोले एक साथ टारगेट पर पहुंचे।

इससे दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिलता और एक ही क्षण में भारी मात्रा में फायरपावर टारगेट पर गिरती है।

3 मीटर × 3 मीटर के टारगेट पर सीधा वार

ट्रायल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन रहा। गरुड़ास्त्र से एक जीपीएस और लेजर गाइडेड राउंड दागा गया जिसने लंबी दूरी पर मौजूद केवल 3 मीटर × 3 मीटर साइज के टारगेट को सीधे निशाना बनाया।

यह क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पारंपरिक मोर्टार आमतौर पर किसी बड़े क्षेत्र पर फायरिंग करते हैं। लेकिन गाइडेड म्यूनिशन के साथ अब मोर्टार भी बेहद सटीक हमले कर सकते हैं। इससे गोला-बारूद की बचत होती है और टारगेट को कम राउंड में निष्क्रिय किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)

गरुड़ास्त्र की कितनी है रेंज

गरुड़ास्त्र की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोला-बारूद के प्रकार पर निर्भर करती है। ट्रायल के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान इसके जीपीएस और लेजर गाइडेड प्रिसीजन म्यूनिशन पर रहा। कंपनी ने प्रदर्शन के दौरान ऐसे गाइडेड राउंड का इस्तेमाल किया, जो करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट को बेहद सटीकता के साथ निशाना बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गाइडेड तकनीक की वजह से हवा, तापमान और अन्य मौसम संबंधी कारकों का असर काफी कम हो जाता है, जिससे सटीकता बढ़ जाती है।

वहीं अगर सामान्य 120 मिमी हाई एक्सप्लोसिव (एचई) मोर्टार गोला-बारूद की बात करें तो उसकी सटीक रेंज का आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस श्रेणी के आधुनिक 120 मिमी मोर्टार सिस्टम आमतौर पर 6 से 8 किलोमीटर तक प्रभावी फायरिंग कर सकते हैं। चूंकि गरुड़ास्त्र को लॉन्ग रेंज मोर्टार सिस्टम के रूप में पेश किया गया है, इसलिए इसकी वास्तविक क्षमता इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद और प्रोपेलेंट पर भी निर्भर करेगी।

ट्रायल के दौरान एक और महत्वपूर्ण क्षमता का प्रदर्शन किया गया। कंपनी के अनुसार गरुड़ास्त्र से दागा गया 17 किलोग्राम वॉरहेड वाला गाइडेड राउंड लगभग 20 सेंटीमीटर मोटी रीइन्फोर्स्ड कंक्रीट संरचना को भेदने में सक्षम है। ऐसे गोला-बारूद का उपयोग बंकर, मजबूत सैन्य ठिकानों और अन्य संरक्षित टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)

दुनिया में बढ़ी व्हीकल माउंटेड मोर्टार की बढ़ती मांग

पिछले दो दशकों में दुनिया की कई सेनाओं ने व्हीकल माउंटेड मोर्टार को अपनाया है। अमेरिका के पास अपने स्ट्राइकर प्लेटफॉर्म पर मोर्टार सिस्टम तैनात है। इजराइल के पास कार्डोम और स्पीयर जैसे सिस्टम हैं। यूरोप की कई सेनाएं भी इसी प्रकार की मोबाइल फायर सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर रही हैं।

इन सिस्टमों का उद्देश्य इन्फैंट्री यानी पैदल सेना को तेज और सटीक फायर पावर सर्पोट देना है।

इजरायली सिस्टम से क्यों हो रही तुलना?

सूत्रों का कहना है कि गरुड़ास्त्र जिस कैटेगरी का सिस्टम है, उसमें दुनिया के सबसे चर्चित प्लेटफॉर्म इजराइल की Albite सिस्टम्स के स्पीयर और कार्डोम मोर्टार सिस्टम हैं।

इनकी पहचान तेज तैनाती, डिजिटल फायर कंट्रोल, कम क्रू और सटीक निशाने की क्षमता है। गरुड़ास्त्र में भी इसी प्रकार की कई आधुनिक क्षमताएं दिखाई गईं। हालांकि निबे कंपनी ने अपने अंतरराष्ट्रीय तकनीकी साझेदार के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी साझा नहीं की है।

भारतीय सेना को क्यों है ऐसे सिस्टम की जरूरत

भारतीय सेना दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में तैनात रहती है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पारंपरिक तोपखाने को तैनात करना हमेशा आसान नहीं होता।

ऐसे इलाकों में मोबाइल मोर्टार सिस्टम तेजी से आगे बढ़ सकती पैदल सेना को तत्काल फायर सपोर्ट दे सकते हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार सेना पहले ही सीमित संख्या में व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम का उपयोग कर रही है। अब ज्यादा आधुनिक और अधिक ऑटोमेटेड सिस्टम का मूल्यांकन किया जा रहा है। (Garudastra Mortar System)

एमएसवी प्रोग्राम से क्या है कनेक्शन

हाल ही में भारतीय सेना ने मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल (एमएसवी) कार्यक्रम के लिए आरएफआई जारी की थी। सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों तरह के मोर्टार चला सकें, 20 सेकंड से कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं और कम क्रू के साथ ऑपरेट किए जा सकें।

एमएसवी कार्यक्रम की तकनीकी जरूरतों में भी तेज तैनाती, ऑटोमेशन, डिजिटल फायर कंट्रोल और “शूट एंड स्कूट” जैसी क्षमताओं पर विशेष जोर दिया गया है। (Garudastra Mortar System)

एमएसवी और वीएमआईएमएस में क्या है अंतर

एमएसवी (मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल) और वीएमआईएमएस (व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम) एक-दूसरे से जुड़े हुए कार्यक्रम हैं, लेकिन दोनों के बीच तकनीकी स्तर पर बड़ा अंतर भी है। भारतीय सेना ने पहले चरण में वीएमआईएमएस के तहत करीब 50 सिस्टम शामिल किए थे। इनमें महिंद्रा एएलएसवी 4×4 वाहन पर स्पेन की एनटीजीएस अलाकरान-एल 81 मिमी ऑटोमेटेड मोर्टार सिस्टम लगाया गया थी। इन सिस्टमों को तेजी से तैनाती और तुरंत फायर सपोर्ट देने के लिए बनाया गया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक इनमें से कुछ सिस्टम्स को एलएसी के पास भी तैनात किया गया है। यह अपेक्षाकृत हल्के और अत्यधिक मोबाइल प्लेटफॉर्म हैं, जो कम समय में फायरिंग कर सकते हैं और फिर अपनी जगह बदल सकते हैं।

अब सेना इससे एक कदम आगे बढ़ रही है। एमएसवी यानी मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल को वीएमआईएमएस का ज्यादा एडवांस और अगली पीढ़ी का वर्जन माना जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रूप से विकसित और निर्मित आधुनिक मोर्टार प्लेटफॉर्म हासिल करना है।

सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों मोर्टारों को ऑपरेट कर सकें, 20 सेकंड से भी कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं, केवल दो सैनिक ऑपरेट कर सके। इसमें एडवांस बैलिस्टिक कंप्यूटर, ऑटोमेटेड फायर कंट्रोल, डिजिटल कम्युनिकेशन और उच्च स्तर की मोबिलिटी जैसी क्षमताओं की भी मांग की गई है। (Garudastra Mortar System)

Hovercraft H-561, the first med-in-india air cushion vehicle included in the fleet of Indian Coast Guard

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: Indian Coast Guard to strengthen India’s maritime security capacity incorporated the first indigenous air cushion vehicle (ACV) H-561 i.e. hovercraft in its fleet on Thursday. This platform was formally incorporated into service during the ceremony held at Rusaiam Shipyard of Goa-based Chaugole and Co. Private Limited.

So far, the country had to rely on foreign companies for air cushion vehicle. H-561 is the first air cushion vehicle designed and manufactured in India, also known as Hovercraft in common language.

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: What Is Air Cushion Vehicle?

With H-561 India has first incorporated the platform in the country and is able to operate in both the sea and the ground areas. Air cushion vehicle or Hovercraft There is a vehicle that can easily operate in areas like water, swamp, sand, mud and beach. The usual ship or boat should have a certain depth of water to walk, but the air cushion is not the same with the vehicle.

A cushion of air under this vehicle is prepared. Powerful lift fan send air to the bottom, making the vehicle rise slightly above the ground or water surface. After this, the propellers put it forward.

That’s why this platform can also reach areas where common petrol boats or ships don’t reach.

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

Why did Indian Coast Guard need it?

The maritime range of India is about 7,500 kilometres long. Also the country has vast coastal areas, creeks, mangroves, swamp terrains and island areas.

According to the defence sources of Gujarat Cauda There are many places in areas such as the beautifulban of the region, West Bengal, the coastal areas of Odisha and the Andaman-Nicobar where access to normal ships remains limited.

Air cushion vehicle is highly useful for monitoring, anti-smuggling campaigns, search & rescue campaigns and disaster relief operations in such areas.

Hovercrafts previously purchased from abroad

Hovercraft was present even before the Indian Coast Guard, but they were all purchased from abroad.

According to formulas Coast Guard Long was using the Hovercraft of the UK’s Grifon Hoverwork Company. Six hovercrafts were purchased at the starting stage, while later additional units were included. A total of 18 foreign hovercrafts were present near the Indian Coast Guard.

These platforms served for years, but the challenges associated with their maintenance, spare parts and technical support began to come up over time.

That’s why the need for developing a long-term indigenous option was being felt. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

Project worth Rs 387 crore

About Rs 387.44 crore was contracted in October 2024 between Ministry of Defence and Chaugul & Co. Private Limited.

A total of six air cushion vehicles are to be prepared under this contract. H-561 is the first platform of this series now included in the fleet of Indian Coast Guard. The rest of the five platforms are also being prepared in a phased manner as per the formulas.

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

How to make this platform in India?

Special construction facilities were developed in Goa-based Chaugule Shipyard for the project, as per the officers connected to the defence industry.

Hovercraft construction is considered different from normal shipbuilding. It requires temperature control, special assembly process and high level of engineering.

Indian engineers and technicians worked on a number of new technologies during H-561 construction. That’s why this project is being seen not only as a platform construction program but also as a technical capacity building program.

How much is technically special H-561?

H-561 is made from marine grade aluminum according to the defense formulas. This reduces the weight of the vehicle and reduces the chances of rusting in the marine environment.

The total weight of this platform is reported around 30 tons. While it is capable of carrying additional payloads for several tonnes.

It has extremely powerful diesel engines that give it a quick speed. While there is no information on how much its correct speed is, the authorities say it is enough for coastal security campaigns and immediate accountable actions. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

What campaigns will use?

This platform will prove useful in a variety of missions for Indian Coast Guard. According to sources, it will be used in marine monitoring, anti-smuggling campaigns, illegal infiltration prevention, search and rescue campaigns and disaster relief operations.

This platform can help to deliver relief material and rescue team to increasingly affected areas during particularly cyclone, flood and marine disasters. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

Most Advantage in shallow water

Water with sufficient depth is required to operate normal vessels and petrol bots. But the air cushion vehicle does not need it. That’s the biggest strength.

It can be operated without any hassle in shallow water, beach, swamp, creak and mangrove areas. That is why Coast Guard and Military Force of many countries in the world use such a platform.

Increased need among marine security challenges

Responsibilities of the Indian Coast Guard have consistently grown over the past few years. The number of marine trafficking, illegal activities, fishermen’s safety, marine pollution control and search and rescue campaigns have been increased steadily.

The need for a platform was felt in a short time to reach challenging areas.

The defense formulas say that H-561 is prepared aimed at meeting the corresponding requirement. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

Joint Initiative of Coast Guard, Ministry of Defence and Industry

The project is being considered as an example of cooperation between the Indian Coast Guard, Ministry of Defence and the domestic industry.

Several government and private institutions worked together during the project as per the authorities. The purpose was not only to prepare a vehicle, but also to develop hovercraft construction capacity in the country. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

Another step towards marine self-sufficiency

Sources linked to the defence production sector say that India has been enhancing the indigenous construction of ship, patrol vessel, interceptor boat, offshore petrol Vessel and other marine platforms for the past few years. Now the construction of air cushion vehicle is also being considered to be an important achievement in the same direction.

This platform for Indian Coast Guard has joined new means strengthening coastal surveillance, security, and quick response capacity. Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

US trust on the MArG Cannon of India! The welfare and partnership of AM General can change the market of 155 MM Artillery

MARG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

MArG 155mm Artillery System: A big news from Paris for India’s defence industry has been revealed. India Forge’s Defense Unit Welfare Strategic Systems Limited (KSSL) and American Military Vehicle Manufacturer Company AM General has announced an important Strategic Partnership. Both companies have signed agreements during the Eurosatary 2026 Defense Expo. This partnership aims to deliver new generation mobile 155mm Mounted Artillery System for worldwide forces and introduce them to the global market.

According to the sources, Davelop in India is trying to connect an indigenous artillery platform with US military technology and global network. AAM General has also proposed to participate in the US Army’s Mobile Tactical Canon (MTC) program based on this partnership.

The Eurosatary held in Paris is Gini in the world’s largest defense agency. Companies around the world offer their new weapons and military platforms. Wellness Stratgeic and AM General on the same platform jointly allaned that they would pave light, fast, robust and mounted artillery systems working in every season, taking into account the needs of the modern war.

कंपनियों का कहना है कि आज के युद्धक्षेत्र में सिर्फ भारी मारक क्षमता काफी नहीं है। किसी भी आर्टिलरी सिस्टम को तेजी से तैनात होने, जल्दी स्थान बदलने और कठिन इलाकों में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए मल्टी टेरेन आर्टिलरी गन (MArG) प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाया जा रहा है।

MARG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

MArG 155mm Artillery System: क्या है MArG सिस्टम?

MArG एक ट्रक बेस्ड आर्टिलरी सिस्टम है जिसमें 155 मिमी की तोप को एक हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया गया है। पारंपरिक तोपों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में काफी समय लगता है। वहीं MArG को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह तेजी से किसी भी इलाके में पहुंच सके, फायरिंग कर सके और तुरंत अपनी जगह बदल सके, जिसे शूट एंड स्कूट भी कहा जाता है।

आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है क्योंकि दुश्मन का काउंटर बैटरी रडार सिस्टम कुछ ही मिनटों में तोप की लोकेशन का पता लगा सकता है। (MArG 155mm Artillery System)

अमेरिका की नजर भारतीय आर्टिलरी पर क्यों?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अमेरिकी सेना का मोबाइल टैक्टिकल कैनन प्रोग्राम माना जा रहा है। अमेरिकी सेना फिलहाल एम777 टोइड हॉवित्जर का इस्तेमाल करती है, लेकिन अब वह इससे भी ज्यादा मोबाइल और तुरंत रेस्पॉन्स देने वाले सिस्टम की तलाश में है।

एएम जनरल ने अमेरिकी सरकार को जो प्रस्ताव दिया है, उसमें कल्याणी स्ट्रैटेजिक के MArG प्लेटफॉर्म को आधार बनाया गया है। यदि यह प्रस्ताव चुना जाता है तो 2027 से इसकी डिलीवरी शुरू की जा सकती है।

India Forge के वाइस चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित कल्याणी के मुताबिक, एएम जनरल के साथ यह साझेदारी भारत की आर्टिलरी तकनीक और क्षमताओं पर उनके भरोसे को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि कल्याणी स्ट्रैटेजिक आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एडवांस और युद्ध में परखे जा चुके सिस्टम्स डेवलप कर रही है। यह समझौता दुनिया की सेनाओं को नई पीढ़ी के प्रभावी और भरोसेमंद आर्टिलरी समाधान उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

वहीं, एएम जनरल के प्रेसिडेंट और सीईओ जॉन चैडबोर्न ने कहा कि कल्याणी स्ट्रैटेजिक के साथ काम करना दोनों कंपनियों की अपने सहयोगी देशों और सैनिकों को बेहतर सैन्य क्षमता उपलब्ध कराने की साझा प्रतिबद्धता को दिखाता है। उन्होंने कहा कि एएम जनरल की पेटेंटेड सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी को कल्याणी स्ट्रैटेजिक के आधुनिक आर्टिलरी प्लेटफॉर्म के साथ जोड़कर ऐसी नई क्षमताएं डेवलप की जाएंगी, जो बदलते युद्धक्षेत्र में सेनाओं को महत्वपूर्ण बढ़त दे सकती हैं।

रक्षा उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि किसी भारतीय निजी कंपनी के डिजाइन पर आधारित आर्टिलरी सिस्टम का अमेरिकी सेना के कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

4×4 ट्रक पर लगी 155 मिमी की भारी तोप

MArG सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसका हल्का और कॉम्पैक्ट डिजाइन है। सामान्य तौर पर 155 मिमी की तोपों को 6×6 या 8×8 मिलिट्री व्हीकल्स पर लगाया जाता है। लेकिन कल्याणी स्ट्रैटेजिक ने इसे 4×4 हाई मोबिलिटी प्लेटफॉर्म पर डेवलप किया है।

MArG-39, MArG-45 और MArG-52 इसके प्रमुख वेरिएंट हैं। इनमें कैलिबर और मारक दूरी के अनुसार अंतर है, लेकिन मूल डिजाइन समान है। कंपनी का दावा है कि MArG-52 दुनिया का सबसे हल्का 155 मिमी/52 कैलिबर माउंटेड आर्टिलरी सिस्टम है। इसका वजन लगभग 24 टन है जबकि यह 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट पर हमला कर सकता है।

MARG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

कितनी है मारक क्षमता?

कंपनी के अनुसार MArG में लगी 155 मिमी/52 कैलिबर तोप 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हाई एक्सप्लोसिव प्रोजेक्टाइल दाग सकती है।

सिस्टम अपने साथ 20 से अधिक गोले और प्रोपेलेंट चार्ज लेकर चल सकता है। जिससे फायरिंग के लिए इसे बार-बार सप्लाई वाहन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक एक्सटेंडेड रेंज गोला-बारूद के साथ इसकी मारक दूरी और बढ़ सकती है। हालांकि सटीक आंकड़े इस्तेमाल किए जाने वाले एम्युनिशन पर निर्भर करते हैं। (MArG 155mm Artillery System)

क्या है सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी?

इस साझेदारी का सबसे तकनीकी पहलू एएम जनरल की पेटेंटेड सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी (SRT) है। सामान्य भाषा में समझें तो जब कोई बड़ी तोप फायर करती है तो पीछे की ओर बहुत तेज झटका लगता है। इसे रिकॉइल कहा जाता है। इसी वजह से भारी तोपों को मजबूत और भारी प्लेटफॉर्म की जरूरत पड़ती है।

सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी इस झटके को काफी हद तक कम कर देती है। इसका फायदा यह होता है कि हल्के वाहन पर भी बड़ी तोप लगाई जा सकती है। (MArG 155mm Artillery System)

पहाड़, रेगिस्तान और सीमावर्ती इलाकों के लिए उपयोगी

MArG सिस्टम को हर तरह के मौसम और इलाके में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। कंपनी का कहना है कि यह पहाड़ी क्षेत्रों, रेगिस्तानी इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

भारत जैसे देश के लिए यह महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी सीमा के कई इलाकों में भारी सैन्य वाहनों की तैनाती चुनौतीपूर्ण होती है।

MArG का हल्का डिजाइन और हाई मोबिलिटी इसे ऐसे इलाकों में उपयोगी बनाता है जहां बड़ी और भारी आर्टिलरी प्रणालियां आसानी से नहीं पहुंच पातीं। (MArG 155mm Artillery System)

शूट एंड स्कूट क्षमता क्यों है अहम?

यूक्रेन युद्ध और हाल के कई संघर्षों ने दिखाया है कि आर्टिलरी की लोकेशन बहुत जल्दी ट्रैक की जा सकती है।

इसी वजह से दुनिया की सेनाएं ऐसी तोपें चाहती हैं जो फायरिंग के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकें। इसे शूट एंड स्कूट क्षमता कहा जाता है।

MArG को इसी सिद्धांत पर डेवलप किया गया है। यह कम समय में फायरिंग कर सकती है और फिर तेजी से नई लोकेशन पर पहुंच सकती है। (MArG 155mm Artillery System)

भारतीय सेना के पास नहीं, लेकिन आर्मेनिया के पास है MArG

सूत्रों के मुताबिक MArG सिस्टम को भारतीय सेना के लिए आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत विकसित किया गया था। 2021 में लॉन्चिंग के बाद MArG 155-BR ने ladakh और अन्य हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में कई ट्रायल्स पूरे किए। सूत्रों का कहना है कि इन परीक्षणों के दौरान सिस्टम ने अपनी मोबिलिटी और फायरपावर का प्रदर्शन किया था।

दिलचस्प बात यह है कि भारत फोर्ज और कल्याणी समूह को भारतीय सेना से एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) के लिए बड़ा ऑर्डर मिल चुका है। करीब 184 ATAGS गन भारतीय सेना के लिए खरीदी जा रही हैं। लेकिन MArG, जो उसी तकनीकी परिवार का ट्रक-माउंटेड और ज्यादा मोबाइल वर्जन माना जाता है, अभी सेना में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुआ है।

फिलहाल MArG को ट्रायल, इवैल्यूएशन और एक्सपोर्ट मार्केट पर केंद्रित प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है। कंपनी को आर्मेनिया से 72 MArG 155-BR सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिल चुका है। रक्षा उद्योग के आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ सालों में कल्याणी स्ट्रैटेजिक भारत के सबसे सफल निजी रक्षा निर्यातकों में शामिल हो गई है।

रक्षा बाजार के जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में मोबाइल आर्टिलरी की मांग तेजी से बढ़ रही है। फ्रांस की सीजर, स्वीडन की आर्चर और दक्षिण कोरिया के कई सिस्टम्सपहले से इस बाजार में मौजूद हैं। अब कल्याणी स्ट्रैटेजिक और एएम जनरल की साझेदारी इसी बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। (MArG 155mm Artillery System)

Explainer: Great change in Brahmos! No longer Russia, India will make the most dangerous part of the missile, understand why it is milestone

Indigenous BrahMos Warhead

Indigenous BrahMos Warhead: A significant achievement today is being achieved by the Brahmaos Supersonic cruise missile involved in India’s most powerful weapons. Nagpur-based Solar Defence and Aerospace Limited (SDAL) will deliver a fully indigenous warhead for the Brahmaos missile for the first time. According to the sources, it is not only the delivery of a missile component, but a major step in India’s missile indigenization programme.

The SDAL will also deliver 100th Brahmaos booster built here under this programme. The company first mastered the system blowing the missile, is now building the most sensitive part destroying the target.

So far Brahmos Indigenization of many parts has occurred in the program, but Warhead was involved in select techniques where foreign dependence was not completely eliminated.

Let’s say the main supply of Warhead was still getting from Russia. Indigenous BrahMos Warhead

Indigenous BrahMos Warhead: What Is Warhead?

In general language, there are two most important parts of any missile. The first system that delivers him to the target and the other system destroying the target.

The booster and engine in the Brahmos missile delivers him from a sharp speed to the target. But the real destructive strength occurs in Warhead. That is the part that explodes after hitting the target and destroys enemy ships, bunkers, command centers or other military bases.

यदि मिसाइल को एक तेज रफ्तार व्हीकल माना जाए तो वारहेड उसका सबसे घातक हथियार होता है। यही वजह है कि वारहेड तकनीक को दुनिया के सबसे संवेदनशील रक्षा क्षेत्रों में गिना जाता है।

ब्रह्मोस की ताकत का असली राज

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है। इसकी गति मैक 2.8 से मैक 3.5 के बीच है। यानी यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भर सकती है।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित यह मिसाइल जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च की जा सकती है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इसकी अलग-अलग वेरिएंट का इस्तेमाल करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की क्षमताओं की चर्चा हुई थी। इसके बाद से इस मिसाइल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रुचि बढ़ी है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्यों महत्वपूर्ण है स्वदेशी वारहेड?

रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ सालों में भारत ने ब्रह्मोस के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण किया है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और कई अन्य सब-सिस्टम अब भारत में बनाए जा रहे हैं।

However वारहेड तकनीक सबसे मुश्किल मानी जाती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटकों, विशेष धातुओं, फ्यूजिंग सिस्टम, सुरक्षा तंत्र और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।

इसी कारण लंबे समय तक ब्रह्मोस कार्यक्रम में इस क्षेत्र में विदेशी सहयोग बना रहा। अब एसडीएएल के बनाए वारहेड को भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मिसाइल कार्यक्रम में पूर्ण आत्मनिर्भरता तभी मानी जाती है जब उसके सभी महत्वपूर्ण हिस्से देश के भीतर विकसित और निर्मित किए जा सकें। (Indigenous BrahMos Warhead)

भारत ने ब्रह्मोस का वारहेड देश में बनाने का फैसला क्यों लिया?

रक्षा सूत्रों के अनुसार ब्रह्मोस मिसाइल का वारहेड उन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है जो टारगेट को वास्तविक नुकसान पहुंचाते हैं। अब तक इस क्षेत्र में भारत को विदेशी तकनीक और सप्लाई पर कुछ हद तक निर्भर रहना पड़ता था। यही वजह है कि सरकार और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी एजेंसियों ने वारहेड के स्वदेशीकरण पर जोर दिया।

सूत्रों का कहना है कि किसी भी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में विदेशी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यदि मिसाइल के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए दूसरे देश पर निर्भरता हो, तो ऑपरेशनल जरूरतों पर असर पड़ सकता है। देश में वारहेड बनने से यह निर्भरता कम होगी और सप्लाई अधिक सुरक्षित बनेगी।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ब्रह्मोस मिसाइल के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण पहले ही किया जा चुका है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और बूस्टर जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट अब भारत में बनाए जा रहे हैं। हालांकि वारहेड सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सों में शामिल था। इसलिए इसका देश में विकसित होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

सूत्र बताते हैं कि वारहेड तकनीक में उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटक, विशेष धातुएं, फ्यूजिंग सिस्टम और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है। यही कारण है कि दुनिया के बहुत कम देश इस तकनीक में पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।

2018 में हुआ था ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी समझौता

नागपुर में सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल के मुताबिक, कंपनी ने साल 2018 में ब्रह्मोस मिसाइल के लिए आवश्यक तकनीक का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) हासिल किया था। इसके बाद कंपनी ने सिर्फ 14 महीनों के भीतर इस तकनीक को पूरी तरह समझ लिया और उत्पादन के लिए खुद को तैयार कर लिया।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का जाइंट प्रोजेक्ट है। इसी कारण वर्ष 2022 में रूस और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के वैज्ञानिक उनकी फैक्ट्री का निरीक्षण करने पहुंचे थे। वैज्ञानिकों ने उत्पादन प्रक्रिया, तकनीकी क्षमताओं और गुणवत्ता मानकों का अध्ययन किया। सभी परीक्षण और निरीक्षण पूरे होने के बाद सितंबर 2022 में कंपनी को अंतिम मंजूरी मिल गई।

नुवाल के मुताबिक, ब्रह्मोस कार्यक्रम की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए अब उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। अगस्त से कंपनी ने सालाना 12 यूनिट उत्पादन की क्षमता तैयार कर ली है और हर महीने उत्पादन क्षमता में और वृद्धि की जा रही है।

उन्होंने भरोसा जताया कि यदि इस वर्ष 150 यूनिट तक उत्पादन का लक्ष्य रखा जाता है, तो कंपनी उसे आसानी से पूरा कर सकेगी।

कैसे काम करता है ब्रह्मोस का वारहेड?

ब्रह्मोस के सामान्य संस्करण में लगभग 200 किलोग्राम का वारहेड लगाया जाता है। वहीं एयर लॉन्च वेरिएंट ब्रह्मोस-ए में यह क्षमता लगभग 300 किलोग्राम तक पहुंच जाती है।

सूत्रों के अनुसार यह सेमी-आर्मर पियर्सिंग हाई एक्सप्लोसिव डिजाइन पर बेस्ड है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल पहले टारगेट की बाहरी सुरक्षा या कवच को भेदती है और उसके बाद अंदर जाकर विस्फोट करती है।

यदि टारगेट कोई युद्धपोत हो तो वारहेड जहाज के डेक या स्ट्रक्चर को भेदकर अंदर विस्फोट कर सकता है। इसी तरह यदि टारगेट कोई मजबूत बंकर या कमांड सेंटर हो तो यह उसकी सुरक्षा परतों को पार करने के बाद अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।

यही तकनीक इसे सामान्य विस्फोटक हथियारों से अलग बनाती है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्या है एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन?

एसडीएएल के स्वदेशी वारहेड को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार इसमें एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन और बेहतर टारगेट एंगेजमेंट क्षमताओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।

सीकर किसी भी आधुनिक मिसाइल का वह हिस्सा होता है जो अंतिम चरण में टारगेट की पहचान करता है और मिसाइल को सही दिशा में मार्गदर्शन देता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक ब्रह्मोस में मिड-कोर्स गाइडेंस के लिए इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट आधारित सिस्टम का उपयोग किया जाता है। जबकि अंतिम चरण में एक्टिव रडार सीकर टारगेट को लॉक करता है।

नई स्वदेशी क्षमता का उद्देश्य मिसाइल की सटीकता और प्रभावशीलता को और मजबूत करना बताया जा रहा है।

टेस्टिंग के लिए नागपुर से जाएगा चंडीगढ़

सूत्रों के अनुसार डिलीवरी मिलने के बाद वारहेड को चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) भेजा जाएगा। टीबीआरएल देश की प्रमुख रक्षा अनुसंधान प्रयोगशालाओं में शामिल है। यहां वारहेड के विभिन्न तकनीकी परीक्षण किए जाएंगे।

इन परीक्षणों में सुरक्षा, विश्वसनीयता, विस्फोटक प्रदर्शन, टर्मिनल इफेक्ट और ऑपरेशनल इफेक्टिवनेस जैसे कई पहलुओं की जांच की जाएगी। जब तक यह सभी ट्रायल्स पूरे नहीं होते, तब तक किसी भी नए वारहेड को पूर्ण ऑपरेशनल मंजूरी नहीं दी जाती। (Indigenous BrahMos Warhead)

100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी

वहीं, एसडीएएल अपने यहां निर्मित 100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी कर रहा है। बूस्टर वह हिस्सा होता है जो लॉन्च के बाद मिसाइल को शुरुआती तेज रफ्तार देता है। इसके बाद मिसाइल का मुख्य इंजन सक्रिय होता है और वह टारगेट की ओर बढ़ती है।

रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 100 बूस्टर का निर्माण इस बात का संकेत है कि निजी क्षेत्र अब ब्रह्मोस जैसी रणनीतिक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका

एक समय ऐसा था जब देश के अधिकांश रणनीतिक हथियार कार्यक्रमों में सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का दबदबा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

एसडीएएल इसका प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। कंपनी पहले मिसाइल बूस्टर और अन्य रक्षा प्रणालियों के निर्माण में सक्रिय थी। अब वारहेड जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश करना इसकी तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

रक्षा मंत्रालय द्वारा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर दिए जा रहे जोर का असर अब कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों में दिखाई देने लगा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

ब्रह्मोस-एनजी और अन्य मिसाइल कार्यक्रमों को भी मिलेगा फायदा

ब्रह्मोस वारहेड कार्यक्रम में मिली सफलता का असर अन्य भारतीय मिसाइल कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। भारत इस समय ब्रह्मोस-एनजी, अस्त्र, प्रलय, रुद्रम और एलआर-एलएसीएम जैसी कई एडवांस मिसाइल परियोजनाओं पर काम कर रहा है।

इन कार्यक्रमों में भी उच्च तकनीक वाले वारहेड, गाइडेंस सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण सब-सिस्टम की जरूरत होती है। ऐसे में घरेलू उद्योग की बढ़ती क्षमता पूरे रक्षा इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वहीं, ब्रह्मोस अब केवल भारतीय सशस्त्र बलों तक सीमित नहीं है। फिलीपींस को इसकी आपूर्ति शुरू हो चुकी है, जबकि कई अन्य देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जब किसी हथियार प्रणाली के अधिक से अधिक हिस्से देश के भीतर बनते हैं तो उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन दोनों मजबूत होती हैं। इसी कारण स्वदेशी वारहेड का विकास ब्रह्मोस कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

Larger decision of the Ministry of Defence: 62 thousand OFB employees will be able to choose Common Applications Package or Central Staff status

Defence Ministry OFB employees
Website Content Managed by Ministry of Defence !

Defence Ministry OFB employees: The Central Government has taken a big decision for about 62 thousand employees working in the defence sector. Around five years after the corporateization of the former Ordnance Factory Board (OFB), the government has stepped towards eliminating the uncertainty that has long gone through the future of employees. The Defence Production Department (DDP) of the Ministry of Defence has released an Office Memorandum that the seven defence public sector undertakings (DPSUs) made from OFB will be implemented for the employees in the Undertakings (DPSUs).

The proposal was approved at the Ammaward Group of Ministers (EGM) meeting held on June 11, following which the Defence Production Department issued its formal order on June 15. Under this decision, two options will be given to the employees. First, they can permanently accept options in the respective DPSU. Second, if they don’t want to choose the option, they will be placed on a demised deputation until they are retired and they will continue to receive their existing facilities as a central government employee.

The decision is also being considered to be the solution of the biggest employee concern born after the OFB corporateization in 2021. For the last five years, the biggest demand for employee organizations, unions, and various employee forums was that employees should clearly state what their future will be and whether they will be able to maintain the status of the central government employee.

Defence Ministry OFB Employees: What was the employees concerned?

When in October 2021 Ordnance Factory Board को भंग कर उसकी 41 प्रोडक्शन युनिट्स को सात नए डिफेंस पीएसयू में बदला गया था, तब हजारों कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल उनकी सेवा शर्तों को लेकर था। उस समय कर्मचारियों को सामूहिक रूप से नए डीपीएसयू में डीम्ड डेपुटेशन पर भेजा गया था। शुरुआत में यह व्यवस्था दो साल के लिए थी, लेकिन बाद में इसे कई बार बढ़ाया गया।

सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों को सबसे ज्यादा चिंता पेंशन, मेडिकल सुविधाओं, करियर प्रोग्रेशन, सीएसडी कैंटीन, सेलरी स्ट्रक्चर और नौकरी की सुरक्षा को लेकर थी। कई यूनियनों ने आशंका जताई थी कि स्थायी एब्जॉर्प्शन की स्थिति में कर्मचारियों की कुछ केंद्रीय सरकारी सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह थी कि कॉर्पोरेटाइजेशन के पांच साल बाद भी बड़ी संख्या में कर्मचारी अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे थे।

अब जारी आदेश में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जो कर्मचारी एब्जॉर्प्शन नहीं चुनेंगे, वे रिटायरमेंट तक केंद्रीय सरकार के कर्मचारी बने रहेंगे और उन पर केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू सभी नियम, वेतनमान, भत्ते, छुट्टी, मेडिकल सुविधाएं और सेवा शर्तें लागू रहेंगी। (Defence Ministry OFB employees)

पांच साल पुरानी अनिश्चितता खत्म करने की कोशिश

Ministry of Defence के भीतर पिछले कई वर्षों से कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता उनकी सेवा शर्तों को लेकर थी। ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन के बाद कर्मचारियों को नई कंपनियों में भेज तो दिया गया था, लेकिन स्थायी एब्जॉर्प्शन और केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा बनाए रखने को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई थी।

कई कर्मचारी संगठनों और यूनियनों का कहना था कि जब तक सरकार स्पष्ट रूप से यह नहीं बताएगी कि कर्मचारियों को क्या विकल्प मिलेंगे, तब तक असमंजस बना रहेगा। अब जारी आदेश में पहली बार सरकार ने साफ कर दिया है कि कर्मचारियों को अपनी पसंद का विकल्प चुनने का अवसर दिया जाएगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें किसी कर्मचारी पर अनिवार्य एब्जॉर्प्शन नहीं थोपा गया है। कर्मचारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे नई डीपीएसयू कंपनी में स्थायी रूप से शामिल होना चाहते हैं या केंद्रीय सरकार के कर्मचारी के रूप में अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखना चाहते हैं। (Defence Ministry OFB employees)

246 साल पुरानी संस्था थी ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड

Ordnance Factory Board भारतीय डिफेंस प्रोडक्शन सिस्टम की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक था। इसकी शुरुआत वर्ष 1775 में कोलकाता के काशीपुर क्षेत्र में हुई थी। समय के साथ यह देश का सबसे बड़ा सरकारी रक्षा उत्पादन नेटवर्क बन गया।

ओएफबी के तहत 41 उत्पादन इकाइयां काम करती थीं, जहां छोटे हथियार, गोला-बारूद, टैंक, बख्तरबंद वाहन, तोपें, पैराशूट, ऑप्टिकल उपकरण, सैनिकों की वर्दियां और अन्य सैन्य सामग्री तैयार की जाती थी।

रक्षा उत्पादन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि दशकों तक ओएफबी भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने वाली मुख्य संस्था रही। हालांकि समय के साथ दक्षता, लागत, प्रतिस्पर्धा और आधुनिकीकरण को लेकर सवाल उठने लगे थे। इसी के बाद सरकार ने इसे कॉर्पोरेट मॉडल में बदलने का फैसला लिया। (Defence Ministry OFB employees)

सात नई कंपनियों में बांटी गई थीं 41 फैक्ट्रियां

1 अक्टूबर 2021 से ओएफबी की 41 प्रोडक्शन यूनिट्स को सात नई डिफेंस पीएसयू में ट्रांसफर कर दिया गया। म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड को गोला-बारूद और विस्फोटक उत्पादन की जिम्मेदारी मिली। आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड को टैंक और बख्तरबंद वाहन निर्माण का काम दिया गया।

इसी तरह एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड को आधुनिक हथियार प्रणालियों की जिम्मेदारी मिली, जबकि यंत्रा इंडिया लिमिटेड मशीन टूल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों पर केंद्रित हुई। वहीं, इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड को ऑप्टिकल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम मिले। ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड सैनिकों के कपड़े और उपकरण तैयार करने लगी, जबकि ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड को पैराशूट और एयरड्रॉप सिस्टम का काम सौंपा गया।

रक्षा मंत्रालय का उद्देश्य इन कंपनियों को अधिक स्वायत्तता देकर उन्हें प्रतिस्पर्धी और व्यावसायिक रूप से सक्षम बनाना था।

क्या कहा गया है नए आदेश में?

15 जून को जारी ऑफिस मेमोरेंडम में कहा गया है कि सातों नई डीपीएसयू द्वारा तैयार किया गया कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज सभी पात्र कर्मचारियों को पेश किया जाएगा। इसमें ओएफ स्कूल और ओएफ अस्पतालों के कर्मचारी शामिल नहीं होंगे।

आदेश के अनुसार पूर्ववर्ती ओएफबी के सभी कर्मचारियों से पूछा जाएगा कि वे नई डीपीएसयू में स्थायी एब्जॉर्प्शन चाहते हैं या नहीं। इसमें वे कर्मचारी भी शामिल होंगे जो फिलहाल अन्य मंत्रालयों या विभागों में प्रतिनियुक्ति पर काम कर रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि जो कर्मचारी एब्जॉर्प्शन का विकल्प नहीं चुनेंगे, उन्हें रिटायरमेंट तक डीम्ड डेपुटेशन पर रखा जाएगा। ऐसे कर्मचारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों पर लागू सभी नियमों, वेतनमान, भत्तों, छुट्टियों, मेडिकल सुविधाओं और करियर प्रोग्रेशन के अधिकारों के तहत काम करते रहेंगे। (Defence Ministry OFB employees)

डीम्ड डेपुटेशन का क्या मतलब है?

डीम्ड डेपुटेशन का अर्थ है कि कर्मचारी तकनीकी रूप से केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बना रहता है लेकिन उसका कार्यस्थल किसी अन्य संगठन में होता है।

रक्षा मंत्रालय के आदेश के मुताबिक ऐसे कर्मचारियों को केंद्रीय सरकारी सेवा नियमों के तहत मिलने वाली सुविधाएं जारी रहेंगी। इसका मतलब है कि उनकी सेवा शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी और वे सरकारी कर्मचारी के रूप में माने जाएंगे।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यही वह बिंदु है जिसकी मांग कर्मचारी संगठन लंबे समय से कर रहे थे। (Defence Ministry OFB employees)

अभी तक सामने नहीं आईं पैकेज की पूरी शर्तें

हालांकि सरकार ने कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज की घोषणा कर दी है, लेकिन इसकी विस्तृत शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं।

आधिकारिक आदेश में केवल इतना कहा गया है कि सातों डीपीएसयू ने मिलकर एक समान पैकेज तैयार किया है। लेकिन इसमें वेतन सुरक्षा, पेंशन व्यवस्था, मेडिकल सुविधाएं, प्रमोशन पॉलिसी और अन्य लाभों का विस्तृत विवरण शामिल नहीं है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार कर्मचारियों से विकल्प मांगने से पहले पैकेज का पूरा विवरण साझा किया जाएगा ताकि वे दोनों विकल्पों की तुलना कर सकें। (Defence Ministry OFB employees)

यूनियनों ने किया इस फैसले का स्वागत

कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (एआईडीईएफ) सहित कई संगठनों का कहना है कि यह लंबे समय से चल रही मांगों का परिणाम है।

यूनियन नेताओं का तर्क रहा है कि कर्मचारियों को अपनी पसंद का विकल्प मिलना चाहिए और किसी पर भी एब्जॉर्प्शन थोपा नहीं जाना चाहिए। कई संगठनों ने केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा बनाए रखने के विकल्प को महत्वपूर्ण बताया है।

हालांकि कुछ यूनियनें अब भी ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन को लेकर अपनी पुरानी आपत्तियां दोहरा रही हैं और इस विषय पर अलग रुख रखती हैं। (Defence Ministry OFB employees)

31 मार्च 2027 तक बढ़ाया गया ट्रांजिशन पीरियड

सरकार ने केवल विकल्प देने का फैसला ही नहीं किया है बल्कि ट्रांजिशन पीरियड भी बढ़ाया है। आदेश के अनुसार 1 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027 तक सभी कर्मचारियों का ट्रांसफर और डीम्ड डेपुटेशन पहले की शर्तों पर जारी रहेगा।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस अवधि के दौरान कर्मचारियों को पैकेज समझने, विकल्प चुनने और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा। (Defence Ministry OFB employees)

रक्षा उत्पादन व्यवस्था से भी जुड़ा है फैसला

रक्षा क्षेत्र के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल कर्मचारियों से जुड़ा फैसला नहीं है। ओएफबी से बनी कंपनियां आज भारतीय रक्षा उत्पादन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गोला-बारूद, हथियार, बख्तरबंद वाहन, ऑप्टिकल सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों के उत्पादन में इन कंपनियों की बड़ी भूमिका है।

इसी वजह से कर्मचारियों की स्थिति को लेकर स्पष्टता लाना जरूरी माना जा रहा था। पिछले कुछ सालों में इन कंपनियों ने कई बड़े डिफेंस ऑर्डर पूरे किए हैं और सेना, वायुसेना तथा नौसेना के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म और उपकरण तैयार किए हैं। (Defence Ministry OFB employees)

India’s new history! Defence production reached Rs 1.78 lakh crore, Indian arms buying the world

India Defence Production 2025-26
(Image for reference only. AI-Generated Image)

India Defence Production 2025-26: India has made a new record in the field of defence production. The total defence production of the country has increased to Rs 1.78 lakh crore in FY 2025-26. As per the Ministry of Defence data, it is the largest annual defence production ever. The figure was about Rs 1.54 lakh crore in the previous fiscal year 2024-25. i.e. a 15.6 percent increase in defense production within one year has been recorded.

Sources connected to the defence sector say that in the past few years, indigenous defence construction, private industry-leading partnership and government self-sufficient India policy has played an important role in rapidly enhancing production efficiency. That is why now India is not limited to only fulfilling the needs of its forces, but also exporting defence equipment to many countries in the world.

India Defence Production 2025-26: Minister of Defence congratulated

Defence Minister Rajnath Singh responded to the achievement that the country has Defence Production Reaching new heights. He credited the mass efforts of Prime Minister Narendra Modi’s leadership and Defence Production Department, Public Sector and Private Industries.

He said there is a sign of the extended defence industrial base of the country in the defence production continuously. Increasing indigenous production capacity has also strengthened India’s strategic freedom. (India Defence Production 2025-26)

Defence Production Over Doubling Over Five Years

India’s total defence production was Rs 84,643 crore in FY 2020-21. Over 110 percent of production has been increased from that time to now.

If you go back a decade, the picture looks more interesting. Indigenous defence production of the country was only Rs 43,746 crore in FY 2013-14. It has been around four times over the past 12 years to see the current figure.

This increase is not only due to large platforms, according to the information related to the defence industry. The network of thousands of small and medium industries behind it is also working, creating missiles, radars, electronics, sensors, ammunitions and various subsystems. (India Defence Production 2025-26)

government companies dominated, but private sector pounded fast

The share of Defence Public Sector Undertakings and other Government companies in total defence production during FY 2025-26 remained close to 76 percent. While the private sector contributed to 24 per cent.

This figure is therefore being considered important as the private sector share in the previous fiscal was about 22 percent. Now it has grown to the highest level of its so far.

According to formulas Private Sector The total output of about Rs.42,000 crore remained. Private companies working in the defence industry have made remarkable contributions to the construction of missile systems, drones, aerospace components, artillery systems, electronics and naval platforms.

This change is therefore important as most of the country’s defence production by a few years ago was dependent on government entities like Hindustan Aeronautics Limited (HAL), India Electronics Limited (BEL), India Dynamics Limited (BDL), Mazgaon Dock Shipbuilders (MDL), Garden Reach Shipbuilders and Engineers (GRSE) and Ordnance Factory Network. The role of the government sector was the largest in combat aircraft, missiles, warships, radars and ammunition production.

Although the picture has changed rapidly over the years. Now private companies such as Larson and Toubro (L&T), Tata Advanced Systems, Adani Defense, India Forge, Mahindra Defense and Aditya Birla Group have become part of large defence programs. These companies are not limited to supplying parts only, but also playing an active role in areas such as missile launcher, artillery system, drone, armored vehicles, aerospace structure, radar and naval platforms.

Sources say the increasing participation of the private sector has helped manifold defense production capacity. Also the complete supply chain network of the defence industry is strengthened. Presently more than 16,000 micro, small and medium industries (MSMEs) are part of Defence Production Ecosystem. These companies are manufacturing sensors, electronic modules, cabling systems, mechanical parts, composite structures, precision engineering components and various subsystems.

Thousands of small components are needed in the construction of any modern missile, radar, warship or fighter aircraft today according to defence experts. A large number of these is now being prepared within the country. This is why the private industry and MSME sector are being considered as a significant basis for India’s growing defence production. (India Defence Production 2025-26)

Defence Export also made new record

The rapid impact in defense production is also visible clean on export. India’s defence exports increased to Rs 38,424 crore in FY 2025-26. It is also the largest defence export figure of country history. The export in FY 2013-14 was only Rs. 686 crore, which has increased record 62.66 per cent in FY2025-26.

As per the Ministry of Defence, the Indian defence industry is now not only producing for domestic needs but also making its place in the international market.

Major products exported from India according to sources include missile systems, rockets, ammunitions, radars, electronic systems, naval equipment, drones and various defence platforms. (India Defence Production 2025-26)

Over Rs 16,000 crore defence deals with Armenia

India’s defence export has now reached over 80 countries. These also include small components in addition to full vibration systems. Over the past few years, Armenia, Philippines, Vietnam, Indonesia, America, France and many other countries have shown interest in Indian defence products.

Armenia इस समय भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण रक्षा ग्राहक बनकर उभरा है। वर्ष 2020 के बाद से दोनों देशों के बीच करीब 1.5 से 2 अरब डॉलर यानी लगभग 12,000 से 16,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदे हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आर्मेनिया लंबे समय तक रूसी हथियारों पर निर्भर रहा, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बाद उसने भारत की ओर रुख किया। (India Defence Production 2025-26)

आर्मेनिया भारत से पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना। वर्ष 2022 में लगभग 245 मिलियन डॉलर के इस सौदे ने भारतीय रक्षा निर्यात के लिए नया अध्याय खोला। आर्मेनिया में पिनाका को “शांत” नाम से जाना जाता है। इसकी लंबी मारक क्षमता और कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागने की क्षमता को वहां की सेना ने महत्वपूर्ण माना है।

इसके अलावा आकाश-1एस एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का पहला विदेशी ग्राहक भी आर्मेनिया ही बना। लगभग 25 किलोमीटर की इंटरसेप्शन रेंज वाला यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन को निशाना बनाने में सक्षम माना जाता है। इसके साथ ही एटीएजीएस 155 एमएम हॉवित्जर, एमएआरजी 155 ट्रक माउंटेड सेल्फ प्रोपेल्ड गन सिस्टम, स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार, जेडएडीएस काउंटर ड्रोन सिस्टम, एंटी टैंक मिसाइल, मोर्टार, आर्टिलरी शेल, बुलेटप्रूफ जैकेट और नाइट विजन उपकरण भी आर्मेनिया को निर्यात किए गए हैं। आर्मेनिया ने अपनी सैन्य परेड में इन भारतीय प्रणालियों को प्रमुखता से प्रदर्शित भी किया है। (India Defence Production 2025-26)

फिलीपींस-वियतनाम ने खरीदी ब्रह्मोस, इंडोनेशिया कतार में

दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच फिलीपींस भी भारत के प्रमुख रक्षा ग्राहकों में शामिल हो चुका है। फिलीपींस ने भारत से Brahmos सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया, जिसे भारतीय रक्षा उद्योग का अब तक का सबसे बड़ा मिसाइल निर्यात सौदा माना जाता है। जनवरी 2022 में करीब 375 मिलियन डॉलर के इस समझौते के तहत तीन मिसाइल बैटरियां, लॉन्चर और सपोर्ट उपकरण शामिल हैं। पहला बैच अप्रैल 2024 में भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए पहुंचाया गया था, जबकि दूसरा बैच अप्रैल 2025 में डिलीवर किया गया।

वियतनाम भी भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बनकर उभरा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार वियतनाम ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम के लिए भारत के साथ लगभग 620 से 629 मिलियन डॉलर का समझौता किया है। इससे पहले भारत वियतनाम को हाई स्पीड गार्ड बोट्स भी उपलब्ध करा चुका है।

इंडोनेशिया भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीद प्रक्रिया के अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके अलावा भारत पहले ही इंडोनेशिया को 40 एमएम नेवल गन सिस्टम उपलब्ध करा चुका है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भारतीय रक्षा उत्पादों को किफायती और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रहे हैं। (India Defence Production 2025-26)

अमेरिका एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का खरीदार

अमेरिका की बात करें तो वह भारत से पूर्ण हथियार प्रणालियों की तुलना में एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का बड़ा खरीदार है। हैदराबाद स्थित टाटा-बोइंग एयरोस्पेस फैसिलिटी में बने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर के फ्यूजलाज, विंग्स और अन्य संरचनात्मक हिस्से अमेरिका भेजे जाते हैं। इसके अलावा सी-130 और एफ-16 जैसे विमानों के कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स भी भारत में तैयार होकर वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बन रहे हैं।

फ्रांस भी भारत से हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और विभिन्न एयरोस्पेस कंपोनेंट्स प्राप्त करता है। वहीं म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और अन्य देशों को डोर्नियर-228 विमान, रडार, आर्टिलरी सिस्टम, आर्मर्ड व्हीकल्स, एम्युनिशन और अन्य सैन्य उपकरणों का निर्यात किया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय हथियार प्रणालियों की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं। भारतीय सिस्टम पश्चिमी देशों के समान प्लेटफॉर्म्स की तुलना में अधिक किफायती माने जाते हैं। इसके अलावा भारत तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और अपेक्षाकृत तेज डिलीवरी पर भी जोर दे रहा है। यही वजह है कि अब भारत केवल कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स का निर्यातक नहीं रहा, बल्कि ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे पूर्ण हथियार सिस्टम्स को भी वैश्विक बाजार में स्थापित कर चुका है। (India Defence Production 2025-26)

पिछले 12 सालों में इन नीतियों ने बदले हालात

रक्षा उत्पादन में आई इस रिकॉर्ड वृद्धि के पीछे केवल बढ़ती मांग नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में लागू की गई कई महत्वपूर्ण नीतियां भी हैं। रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सरकार ने पिछले 12 सालों के दौरान ऐसे कई फैसले लिए, जिन्होंने घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत आधार प्रदान किया। (India Defence Production 2025-26)

सबसे महत्वपूर्ण कदमों में सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची को माना जाता है। इसके तहत 4,500 से अधिक रक्षा उपकरणों, हथियार प्रणालियों और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स को आयात प्रतिबंधित सूची में शामिल किया गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि भारतीय सेनाओं की भविष्य की जरूरतों के लिए घरेलू उद्योग को उत्पादन के अवसर मिलने लगे। मिसाइल, रडार, गोला-बारूद, सेंसर, संचार प्रणाली और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में भारतीय कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी।

विदेशी निवेश नीति में किए गए बदलावों ने भी रक्षा क्षेत्र को रफ्तार दी। सरकार ने 74 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी, जबकि विशेष मामलों में सरकारी मंजूरी के जरिए 100 प्रतिशत तक एफडीआई का रास्ता खोला गया। रक्षा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार इससे विदेशी कंपनियों की तकनीक, पूंजी और विशेषज्ञता भारतीय उद्योग तक पहुंची, जिससे कई संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा मिला।

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं। अक्टूबर 2025 तक इन दोनों रक्षा औद्योगिक गलियारों में लगभग 9,145 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा चुका था। इसके अलावा 289 से अधिक समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए और करीब 66,423 करोड़ रुपये की संभावित औद्योगिक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम शुरू हुआ। इन कॉरिडोर में एयरोस्पेस, मिसाइल सिस्टम, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और विभिन्न सैन्य उपकरणों के निर्माण की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। (India Defence Production 2025-26)

वहीं, डिफेंस इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस यानी आईडेक्स कार्यक्रम भी शुरू किया गया। इस पहल ने स्टार्टअप्स, एमएसएमई और युवा उद्यमियों को रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक विकसित करने का अवसर दिया। सूत्रों के अनुसार आईडेक्स के तहत हजारों इनोवेशंस प्रोजेक्ट्स पर काम किया गया है, जिनमें ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस सिस्टम्स और एडवांस सेंसर टेक्नोलॉजी शामिल हैं।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई स्कीम और अन्य औद्योगिक योजनाओं ने भी रक्षा क्षेत्र को मजबूती दी। विशेष रूप से ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च तकनीक वाले उपकरणों के निर्माण में इन योजनाओं का प्रभाव दिखाई दिया है। इससे देश के भीतर विनिर्माण क्षमता बढ़ी और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिला।

खरीद प्रक्रिया में सुधार भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 और बाद में डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 के जरिए रक्षा खरीद प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और “इंडियन फर्स्ट” विजन के अनुरूप बनाया गया। इससे भारतीय कंपनियों को रक्षा परियोजनाओं में अधिक अवसर मिलने लगे।

रक्षा क्षेत्र में ऑफसेट नीति में किए गए बदलाव और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बढ़ते जोर ने भी घरेलू उद्योग की क्षमता बढ़ाई। कई विदेशी रक्षा कंपनियों को भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी करने और स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इसी के साथ डीआरडीओ और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग 500 करोड़ रुपये के इस कोष के माध्यम से नई तकनीकों के डेवलपमेंट, रिसर्च, और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सपोर्ट दिया गया। इससे निजी उद्योग, स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों को उन्नत रक्षा तकनीकों पर काम करने का अवसर मिला।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन सभी नीतिगत बदलावों का सबसे बड़ा असर स्वदेशी सामग्री यानी इंडिजिनस कंटेंट पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब भारत की रक्षा खरीद में 65 से 70 प्रतिशत तक निर्भरता आयात पर थी। अब स्थिति बदल रही है और घरेलू उत्पादन तथा स्थानीय सप्लाई चेन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। कई प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों में स्वदेशी सामग्री का स्तर 65 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुंच चुका है। (India Defence Production 2025-26)

कौन-कौन से प्रमुख स्वदेशी प्लेटफॉर्म बन रहे गेमचेंजर

डिफेंस प्रोडक्शन में वृद्धि के पीछे कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं। वायुसेना के लिए एलसीए तेजस एमके-1ए का निर्माण जारी है। इसके अलावा एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए कार्यक्रम भी आगे बढ़ रहा है।

मिसाइल क्षेत्र में आकाश, अस्त्र, नाग, रुद्रम और पिनाका जैसे सिस्टम्स का उत्पादन बढ़ा है। नौसेना के लिए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स और अन्य युद्धपोत कार्यक्रमों ने भी रक्षा उद्योग को गति दी है।

थलसेना के लिए विभिन्न आर्टिलरी सिस्टम, बख्तरबंद प्लेटफॉर्म और गोला-बारूद उत्पादन में भी लगातार वृद्धि हुई है। (India Defence Production 2025-26)

Rebound of NIBE on allegations with the ‘Screwdriver Assembly’ of the Sunset rocket system; responses to the trial, technique and purchase process

NIBE Suryastra Rocket System
NIBE Suryastra Rocket System (Photo: PIB)

NIBE Suryastra Rocket System: The long-distance guided rocket launcher system purchased for the Indian Army was questioned by some defence experts and media reports based on foreign technology. While now, NIB Limited, a company that manufactures this system has dismissed all the charges by releasing an official statement. The company says that Sunseter completely descends on the terms of fixed technical requirements, specifications and purchase contract of the Indian Army.

This dispute is not limited to only a rocket launcher system as per the defence sources, but also linked to large issues such as self-sufficient India, defence production, technical transfer and emergency purchase process. This is why Sunsetr program has been seen by the Army, Industry and Defense experts. (NBE Suryastra Rocket System)

NIBE Suryastra Rocket System: What is the complete case?

The case started when some defence experts and media reports claimed that the Indian Army was purchased by Sunset Universal Rocket Launcher is actually a platform based on foreign design (PULS of Israeli Albit Systems) and has extremely low indigenous content. It was said that the main technique came from abroad, but it was only worked to add or assemble in India.

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों ने उस समय यह भी सवाल उठाया कि जिस स्पीड से इस सिस्टम की खरीद हुई, वह असामान्य रूप से तेज थी। जनवरी 2026 में कॉन्ट्रैक्ट, मई में परीक्षण और उसके कुछ दिनों बाद पहली खेप की सप्लाई ने कई सवाल खड़े किए।

इन्हीं आरोपों के बाद नाइब लिमिटेड ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया और कहा कि रिपोर्टों में कई तथ्यात्मक त्रुटियां हैं तथा महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारियों को नजरअंदाज किया गया है। (NIBE Suryastra Rocket System)

नाइब ने आरोपों को बताया भ्रामक

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि सूर्यास्त्र को केवल विदेशी प्रोडक्ट की असेंबली बताना भारतीय इंजीनियरों, निजी रक्षा उद्योग और भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनलजरूरतों का अपमान है।

कंपनी का कहना है कि मार्च 2025 में टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन एग्रीमेंट के तहत कुछ वैश्विक भागीदारों के साथ सहयोग जरूर किया गया था, लेकिन सिस्टम का निर्माण, इंटीग्रेशन और उत्पादन भारत में ही किया गया है।

नाइब के अनुसार सूर्यास्त्र परियोजना केवल एक रॉकेट लॉन्चर नहीं है बल्कि देश में लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट तकनीक डेवलप करने की व्यापक पहल का हिस्सा है। (NIBE Suryastra Rocket System)

शिरडी में बनी 200 एकड़ की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी

कंपनी ने अपने बयान में महाराष्ट्र के शिरडी में स्थापित 200 एकड़ के इंटीग्रेटेड डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स का विशेष उल्लेख किया है।

इस परिसर में स्ट्रक्चरल इंटीग्रेशन, रॉकेट सिस्टम असेंबली, गोला-बारूद उत्पादन और विभिन्न रॉकेट कंपोनेंट्स के लोकेलाइजेशन की सुविधाएं डेवलप की गई हैं।

कंपनी का दावा है कि इस परिसर का उद्देश्य केवल एक उत्पाद तैयार करना नहीं, बल्कि रक्षा उत्पादन के लिए दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता तैयार करना है।

नाइब का कहना है कि यदि किसी सिस्टम के लिए शुरुआती चरण में वैश्विक तकनीकी सहयोग लिया गया है तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सिस्टम विदेशी है। कंपनी का तर्क है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक रक्षा परियोजनाएं बहुराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग के आधार पर आगे बढ़ती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सूर्यास्त्र क्या है?

रक्षा सूत्रों के अनुसार सूर्यास्त्र एक यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम है जिसे लंबी दूरी के सटीक हमलों के लिए डेवलप किया गया है।

यह सिस्टम दो अलग-अलग रेंज वाले गाइडेड रॉकेट के साथ आता है। पहला वर्जन लगभग 150 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट को हिट कर सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 300 किलोमीटर तक अंदर तक मार कर सकता है।

कंपनी के अनुसार यह सिस्टम भारतीय सेना की लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

परीक्षण को लेकर क्या दावा किया गया?

नाइब ने अपने बयान में कहा कि 18 और 19 मई को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में सूर्यास्त्र सिस्टम का तकनीकी मूल्यांकन किया गया। कंपनी के अनुसार दोनों संस्करणों ने परीक्षण के दौरान निर्धारित प्रदर्शन मानकों को पूरा किया।

नाइब ने दावा किया कि 150 किलोमीटर वाले संस्करण ने लगभग 1.5 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) हासिल किया। रक्षा तकनीक की भाषा में इसका मतलब यह है कि रॉकेट टारगेट के बेहद करीब जाकर गिरा।

कंपनी के अनुसार 300 किलोमीटर वाले डीप स्ट्राइक सिस्टम ने भी लगभग 2 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल दर्ज किया।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह आंकड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित होते हैं तो यह लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट सिस्टम के लिए हाई लेवल की सटीकता मानी जाती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

परीक्षण पर उठे सवाल

हालांकि दूसरी ओर कुछ रक्षा सूत्रों ने परीक्षणों को लेकर अलग दावे भी किए हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि मई में हुए परीक्षणों में एक उड़ान के दौरान रॉकेट ने अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। कुछ सूत्रों ने दावा किया कि परीक्षण उड़ानों में से एक रॉकेट अपने टारगेट तक पहुंचने से पहले टूट गया था।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नाइब ने अपने आधिकारिक बयान में किसी भी तकनीकी विफलता की बात से इनकार किया है और कहा है कि सिस्टम ने सफलतापूर्वक सभी मूल्यांकन पूरे किए। यही कारण है कि सूर्यास्त्र कार्यक्रम को लेकर दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं और बहस जारी है। (NIBE Suryastra Rocket System)

आपातकालीन खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

सूर्यास्त्र को लेकर दूसरा बड़ा विवाद इसकी खरीद प्रक्रिया में जल्दबाजी को लेकर है। सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना ने जनवरी 2026 में लगभग 293 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया था। यह खरीद Emergency Procurement नियमों के तहत की गई थी। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट, ट्रायल और सप्लाई के बीच समय काफी कम था। जिस पर सवाल उठाए गए।

लेकिन नाइब का कहना है कि पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) द्वारा स्वीकृत इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट फ्रेमवर्क के तहत की गई।

कंपनी के अनुसार इस सिस्टम का उद्देश्य युद्धक जरूरतों को तेजी से पूरा करना है। इसके तहत कानूनी, वित्तीय और प्रक्रियागत निगरानी की सभी शर्तें लागू रहती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सेना को क्यों चाहिए था सूर्यास्त्र?

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने कुछ ऐसे गैप्स की पहचान की थी जहां लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई।

इसी दौरान कई नए सिस्टम्स की तलाश शुरू हुई ताकि सेना की ऑपरेशनल क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा सके। इसी संदर्भ में कुछ खरीद प्रक्रियाओं को आपातकालीन श्रेणी में आगे बढ़ाया गया। (NIBE Suryastra Rocket System)

आत्मनिर्भरता बनाम विदेशी तकनीक

सूर्यास्त्र विवाद का सबसे बड़ा पहलू आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को केवल विदेशी डिजाइन वाले प्रोडक्ट्स की असेंबली नहीं करनी चाहिए, बल्कि मूल तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करनी चाहिए।

उनका कहना है कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी मानी जाएगी जब डिजाइन, सॉफ्टवेयर, मार्गदर्शन प्रणाली, रॉकेट मोटर और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें भारत में विकसित हों।

दूसरी ओर उद्योग जगत से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आधुनिक रक्षा उत्पादन में तकनीकी सहयोग सामान्य प्रक्रिया है। उनका तर्क है कि किसी भी वेपन सिस्टम में लोकल प्रोडक्शन, लोकल सप्लाई चेन और भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

France has taken a big decision after India was interested in Pinaca, this strategy also took HIMARS.

France Pinaka FLP-T Program
French Army Chief Gen Pierre Schill, witness Pinaka multi-barrel rocket system at Pokhran (Image Source: PIB)

France Pinaka FLP-T Program: In the last two years, the Indian media came out several times that France is showing interest in India’s indigenous multi-barrel rocket launcher system Pinaka and is possible to include it in its military fleet. At that time it was seen as a great achievement for India’s defence exports. However, the photograph has become quite clear after seeing the recent decisions of France and its long-distance marching capacity programs. France has chosen the way to develop a completely indigenous solution instead of relying on a foreign system for its future rocket artillery needs, according to sources and available documents associated with defence matters.

France has launched the FLP-T i.e. Frap Long Porte Terestra program to transform its old rocket artillery potential. The objective of this program is not only to buy a new rocket launcher but to develop a system that has a complete control of France. That is why many companies in the French defence industry have been involved in the event and have been given responsibility to develop solutions based on domestic technology.

France Pinaka FLP-T Program: Why was discussed by Pinaka?

Pinaca India’s indigenous multi barrel rocket launcher system developed by DRDO. It is counted in the most successful Artillery projects of the Indian Army. During the Kargil war, its capacity was revealed and the new version was continuously prepared.

जब फ्रांस की ओर से पिनाका का मूल्यांकन किए जाने की खबरें आईं तो इसे संभावित निर्यात सौदे के रूप में देखा गया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी सैन्य सिस्टम का मूल्यांकन किया जाना और उसे खरीदने का फैसला लेना दो अलग-अलग बातें हैं। दुनिया की अधिकांश सेनाएं समय-समय पर विभिन्न देशों के हथियारों और प्रणालियों का अध्ययन करती हैं ताकि उनकी तुलना की जा सके और अपनी जरूरतों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

सूत्रों का कहना है कि फ्रांस ने पिनाका की क्षमताओं का अध्ययन जरूर किया, लेकिन उसके रक्षा योजना दस्तावेज पहले से ही यह संकेत दे रहे थे कि वह अपनी अगली पीढ़ी की रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम घरेलू स्तर पर विकसित करना चाहता है।

अक्टूबर 2025 में भारत आए थे फ्रांसीसी सेना प्रमुख

अक्टूबर 2025 में फ्रांसीसी सेना प्रमुख जनरल पियरे शिल भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में भारतीय सेना के पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का प्रदर्शन देखा था। पिनाका की क्षमताओं, इसकी मारक दूरी और ऑपरेशनल प्रदर्शन से जुड़ी जानकारी उन्हें भारतीय सेना की ओर से दी गई थी। इसी दौरे के दौरान जनरल पियरे शिल ने भारतीय सेना के अधिकारियों और सैनिकों के साथ पिनाका सिस्टम के सामने समूह तस्वीर भी खिंचवाई थी, जिसकी तस्वीर बाद में काफी चर्चा में रही।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह दौरा फ्रांस द्वारा पिनाका सिस्टम के मूल्यांकन और तकनीकी अध्ययन का हिस्सा था। उस समय फ्रांसीसी पक्ष विशेष रूप से पिनाका के लंबी दूरी वाले संस्करणों में रुचि दिखा रहा था। फ्रांसीसी सेना यह समझना चाहती थी कि यह सिस्टम उसकी ऑपरेशनल जरूरतों के अनुरूप कितना उपयोगी हो सकता है।

इसी दौरान फ्रांसीसी ब्रिगेडियर जनरल स्टेफेन रिचो ने भी पिनाका को फ्रांस की कुछ आवश्यकताओं के अनुरूप बताया था। हालांकि सूत्रों का कहना है कि किसी सैन्य प्रणाली का मूल्यांकन किए जाने का मतलब यह नहीं होता कि उसे खरीदने का फैसला भी ले लिया गया है। फ्रांस की ओर से किया गया यह आकलन मुख्य रूप से बेंचमार्किंग, तकनीकी तुलना और क्षमता अध्ययन के उद्देश्य से था, ताकि वह अपनी भविष्य की लंबी दूरी की रॉकेट आर्टिलरी योजनाओं के लिए विभिन्न विकल्पों को समझ सके।

फ्रांस की रक्षा नीति में स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी सबसे ऊपर

फ्रांस लंबे समय से स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की नीति पर काम करता रहा है। उसके पास अपने लड़ाकू विमान, परमाणु हथियार, पनडुब्बियां, मिसाइलें, एयर डिफेंस सिस्टम और अंतरिक्ष कार्यक्रम मौजूद हैं। फ्रांस की सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वह महत्वपूर्ण सैन्य तकनीकों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर न रहे।

रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार यही कारण है कि फ्रांस ने अमेरिकी हिमार्स (HIMARS) जैसे सिस्टम को भी सीधे अपनाने का रास्ता नहीं चुना। इसके बजाय उसने अपनी जरूरतों के अनुरूप स्वदेशी कार्यक्रम शुरू किया।

सूत्रों का कहना है कि यदि फ्रांस अमेरिका जैसी करीबी साझेदार के सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचना चाहता था, तो किसी भारतीय सिस्टम को अपनी भविष्य की रॉकेट आर्टिलरी का आधार बनाना उसकी नीति के अनुरूप नहीं था।

क्या है एफएलपी-टी कार्यक्रम

फ्रांस ने अपनी पुराने एलआरयू रॉकेट सिस्टम को बदलने के लिए एफएलपी-टी कार्यक्रम शुरू किया है। यह कार्यक्रम 2030 के बाद फ्रांसीसी सेना को नई लंबी दूरी की मारक क्षमता देने के उद्देश्य से बनाया गया है।

इस कार्यक्रम के तहत कई फ्रांसीसी कंपनियां प्रतिस्पर्धा में हैं। एमबीडीए और साफ्रान मिलकर थंडार्ट नामक सिस्टम विकसित कर रहे हैं। वहीं थेल्स और एरियानग्रुप भी अपने सॉल्युशन पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा फूद्रे नामक एक अन्य सिस्टम भी डेवलप किया जा रहा है।

इन सभी परियोजनाओं का लक्ष्य फ्रांस को ऐसी रॉकेट आर्टिलरी देना है जिसकी तकनीक, उत्पादन, रखरखाव और अपग्रेड पर पूरा नियंत्रण फ्रांस के पास हो। (France Pinaka FLP-T Program)

पिनाका की क्षमता पर नहीं उठे सवाल

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रांस का फैसला पिनाका की क्षमता से जुड़ा नहीं है। पिनाका पहले ही युद्ध में अपनी प्रभावशीलता साबित कर चुका है।

पिनाका एमके-1 की मारक दूरी लगभग 45 किलोमीटर तक है। एमके-2 संस्करण 60 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट हिट कर सकता है। गाइडेड संस्करणों की रेंज 75 से 90 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसके अलावा विस्तारित रेंज वाले संस्करणों पर भी काम किया गया है।

एक लॉन्चर से 12 रॉकेट बेहद कम समय में दागे जा सकते हैं। पूरी बैटरी कुछ ही सेकंड में बड़े क्षेत्र को कवर कर सकती है। यही वजह है कि भारतीय सेना में इसकी बड़ी संख्या में तैनाती की जा रही है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार फ्रांस ने पिनाका को इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि वह कमजोर सिस्टम था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी प्राथमिकता फ्रांस में किसी सिस्टम को डेवलप करना है। (France Pinaka FLP-T Program)

फ्रांस की मौजूदा रॉकेट क्षमता की चुनौती

फ्रांस के पास इस समय एलआरयू सिस्टम है जो अमेरिकी एम-270 प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इनकी संख्या सीमित रह गई है और आने वाले वर्षों में इन्हें बदलना जरूरी हो गया है।

यूक्रेन युद्ध के बाद लंबी दूरी की आर्टिलरी और रॉकेट सिस्टम की अहमियत और बढ़ गई है। फ्रांस भी अपनी सेना की इस क्षमता को मजबूत करना चाहता है। हालांकि वह इस प्रक्रिया में विदेशी निर्भरता कम करने पर जोर दे रहा है।

सूत्रों का कहना है कि अमेरिका पर गोला-बारूद और तकनीक के लिए निर्भरता ने फ्रांस को यह एहसास कराया कि भविष्य में उसे अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित करनी होगी। इसी सोच ने एफएलपी-टी कार्यक्रम को गति दी।

राफेल और रक्षा सहयोग के बीच चर्चा में आया पिनाका

भारत और फ्रांस के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग काफी बढ़ा है। राफेल लड़ाकू विमान, नौसैनिक सहयोग और अन्य रक्षा परियोजनाओं पर दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत होती रही है।

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का मानना है कि इसी दौरान पिनाका को लेकर भी चर्चा सामने आई। फ्रांसीसी पक्ष द्वारा भारतीय रक्षा उत्पादों में रुचि दिखाना दोनों देशों के बीच संतुलित रक्षा संबंधों का संकेत माना गया।

इससे भारतीय रक्षा उद्योग को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और यह संदेश गया कि भारतीय हथियार प्रणालियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती हैं। (France Pinaka FLP-T Program)

निवेश के आंकड़े बताते हैं फ्रांस का असली इरादा

विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी देश की वास्तविक प्राथमिकता उसके निवेश पैटर्न से समझी जा सकती है। पिछले दो सालों में फ्रांस ने घरेलू रॉकेट आर्टिलरी कार्यक्रमों में लगातार निवेश बढ़ाया है।

फूद्रे, थंडार्ट और एफएलपी-टी 150 जैसी प्रोजेक्ट पर ट्रायल्स भी किए जा चुके हैं। फ्रांसीसी सरकार ने इन कार्यक्रमों के लिए बजट और संसाधन उपलब्ध कराए हैं।

सूत्रों के अनुसार यही संकेत देता है कि फ्रांस शुरू से ही घरेलू समाधान को आगे बढ़ाने के इरादे से काम कर रहा था। पिनाका सहित अन्य विदेशी प्रणालियों का अध्ययन केवल तुलना और मूल्यांकन की प्रक्रिया का हिस्सा था। (France Pinaka FLP-T Program)

रक्षा निर्यात के लिए महत्वपूर्ण सबक

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यह मामला इस बात का उदाहरण है कि किसी देश की रुचि और वास्तविक खरीद योजना में अंतर हो सकता है। किसी हथियार सिस्टम की तकनीकी क्षमता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन अंतिम फैसला अक्सर रणनीतिक नीति, औद्योगिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांतों के आधार पर लिया जाता है।

पिनाका आज भी भारत की सबसे सफल रक्षा परियोजनाओं में गिना जाता है और कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है। हालांकि फ्रांस का मामला यह दिखाता है कि हर संभावित ग्राहक की प्राथमिकताएं अलग होती हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार फ्रांस ने अपनी परंपरागत नीति के अनुरूप वही रास्ता चुना है, जिसे वह दशकों से अपनाता आया है। उसका लक्ष्य ऐसी सैन्य क्षमता विकसित करना है जिस पर तकनीकी, औद्योगिक और रणनीतिक स्तर पर उसका पूरा नियंत्रण बना रहे। (France Pinaka FLP-T Program)