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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर GRSE को मिला नवरत्न का दर्जा, रविवार को पीएम मोदी नौसेना को सौंपेंगे 3 स्वदेशी जहाज

GRSE Navratna Status
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GRSE Navratna Status: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर 21 जून को कोलकाता में भारतीय नौसेना के लिए एक बड़ा कार्यक्रम होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड यानी जीआरएसई द्वारा बनाए गए तीन स्वदेशी नौसैनिक जहाजों को भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से कमीशन करेंगे। इन तीन प्लेटफॉर्म में एडवांस्ड स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी, सर्वे वेसल लार्ज आईएनएस संशोधक और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस अग्रय शामिल हैं।

तीनों जहाजों की कमीशनिंग ऐसे समय हो रही है, जब इन्हें बनाने वाली कोलकाता की सरकारी शिपबिल्डिंग कंपनी जीआरएसई को नवरत्न का दर्जा मिल गया है। वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज ने 20 जून को जीआरएसई को नवरत्न पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज का दर्जा दिया। यह दर्जा कंपनी के पिछले कुछ वर्षों के वित्तीय प्रदर्शन, उत्पादन क्षमता और लगातार बढ़ती शिपबिल्डिंग उपलब्धियों को देखते हुए दिया गया है।

GRSE Navratna Status: क्या होता है नवरत्न दर्जा और जीआरएसई को क्यों मिला?

नवरत्न दर्जा केंद्र सरकार उन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को देती है, जिन्होंने लगातार बेहतर वित्तीय प्रदर्शन किया हो और जिनकी ऑपरेशनल कैबेबिलिटी मजबूत हो। इससे कंपनी को निवेश, विस्तार, नई परियोजनाओं और रणनीतिक साझेदारी से जुड़े फैसले लेने में पहले से अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता मिलती है।

जीआरएसई के मामले में पिछले पांच सालों के आंकड़े इस बदलाव की वजह बताते हैं। वित्त वर्ष 2021-22 में कंपनी का रेवेन्यू फ्रॉम ऑपरेशंस करीब 1,754 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर लगभग 7,002 करोड़ रुपये पहुंच गया। यानी पांच साल में कंपनी के कारोबार में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

इसी अवधि में कंपनी का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स भी 190 करोड़ रुपये से बढ़कर 748 करोड़ रुपये पहुंच गया। यह करीब 294 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। रक्षा शिपबिल्डिंग जैसे क्षेत्र में यह प्रदर्शन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यहां जहाज निर्माण में कई साल लगते हैं, बड़ी सप्लाई चेन की जरूरत होती है और हर प्लेटफॉर्म की तकनीकी जटिलता अलग होती है।

नवरत्न दर्जा मिलने के बाद जीआरएसई अब बड़े निवेश प्रस्तावों पर तेजी से फैसले ले सकेगा। सामान्य नियमों के तहत नवरत्न कंपनियों को एक परियोजना में 1,000 करोड़ रुपये या अपनी नेटवर्थ के 15 प्रतिशत तक निवेश करने की अनुमति होती है, हालांकि यह सीमा संबंधित नियमों और कंपनी की वित्तीय स्थिति के अनुसार लागू होती है। इससे शिपयार्ड को नई निर्माण सुविधाएं, आधुनिक मशीनरी, डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन क्षमता बढ़ाने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम करने में सुविधा मिलती है।

भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्त अधिकारी और जीआरएसई के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कमोडोर पीआर. हरि ने कहा कि नवरत्न दर्जा कंपनी की यात्रा का एक महत्वपूर्ण क्षण है। उनके अनुसार यह सम्मान जीआरएसई के वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों की मेहनत, प्रोफेशनलिज्म और समर्पण को मान्यता है। उन्होंने कहा कि इससे कंपनी को रणनीतिक अवसरों पर काम करने, रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा मजबूत करने में मदद मिलेगी।

21 जून को एक साथ कमीशन होंगे तीन स्वदेशी जहाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 जून को कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में तीनों प्लेटफॉर्म को नौसेना में शामिल करेंगे। यह कार्यक्रम इसलिए भी खास है क्योंकि तीनों जहाजों का काम अलग-अलग है। एक जहाज समुद्री युद्ध के लिए बनाया गया है, दूसरा समुद्र की गहराई और समुद्री क्षेत्र का सर्वे करेगा, जबकि तीसरा उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है।

इन तीनों प्लेटफॉर्म को एक साथ शामिल करने से नौसेना की ब्लू वॉटर ऑपरेशंस, समुद्री डोमेन अवेयरनेस और तटीय क्षेत्रों में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूती मिलेगी। तीनों जहाज भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किए गए और जीआरएसई ने उनका निर्माण किया है। (GRSE Navratna Status)

आईएनएस दुनागिरी फ्रिगेट: समुद्र में दुश्मन के जहाजों और मिसाइलों से करेगी मुकाबला

आईएनएस दुनागिरी प्रोजेक्ट 17ए का स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। फ्रिगेट को नौसेना का ऐसा बहुउद्देश्यीय युद्धपोत माना जाता है, जो समुद्र में दुश्मन के जहाजों, मिसाइलों, विमानों और पनडुब्बियों से जुड़े खतरों के खिलाफ काम कर सकता है।

दुनागिरी इस श्रेणी के आधुनिक युद्धपोतों में शामिल है, जिसे कम रडार सिग्नेचर के साथ तैयार किया गया है। स्टेल्थ डिजाइन का मतलब यह नहीं कि जहाज पूरी तरह दिखाई नहीं देता, बल्कि इसका आकार, सतह और कई सिस्टम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि दुश्मन के रडार के लिए इसे पकड़ना कठिन हो सके।

दुनागिरी में ब्रह्मोस सरफेस टू सरफेस मिसाइल और मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम समेत आधुनिक हथियार और सेंसर लगाए गए हैं। ब्रह्मोस मिसाइल समुद्र में दुश्मन के युद्धपोतों या जमीन पर मौजूद महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता रखती है। वहीं एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम जहाज को दुश्मन के विमान, हेलीकॉप्टर और आने वाली मिसाइलों से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत कुल सात स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें कुछ जहाज मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स और कुछ कोलकाता के जीआरएसई में तैयार किए गए हैं। दुनागिरी इस परियोजना की पांचवीं फ्रिगेट है। जहाज के ढांचे, कई उपकरणों, सिस्टम और निर्माण में करीब 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

आईएनएस संशोधक: समुद्र की गहराई और रास्तों का नक्शा तैयार करने वाला जहाज

तीनों प्लेटफॉर्म में आईएनएस संशोधक का काम अलग है। यह सर्वे वेसल लार्ज श्रेणी का जहाज है। आम भाषा में समझें तो यह नौसेना का समुद्री सर्वे करने वाला जहाज है। इसका उपयोग समुद्र की गहराई मापने, समुद्र तल का नक्शा तैयार करने, तटीय इलाकों की जानकारी जुटाने और नौसैनिक अभियानों के लिए जरूरी हाइड्रोग्राफिक डेटा तैयार करने में किया जाएगा।

किसी भी नौसेना के लिए समुद्री नक्शे बेहद जरूरी होते हैं। जहाजों और पनडुब्बियों को किस रास्ते से गुजरना है, किस क्षेत्र में पानी कितना गहरा है, समुद्र तल पर कहां चट्टानें या अन्य रुकावटें हैं, यह जानकारी सैन्य और नागरिक दोनों तरह के नौवहन के लिए महत्वपूर्ण होती है।

आईएनएस संशोधक को तटीय और गहरे समुद्र दोनों क्षेत्रों में हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए तैयार किया गया है। इसमें समुद्री और भू-भौतिकीय डेटा जुटाने के लिए आधुनिक सर्वे सिस्टम लगाए गए हैं। जहाज में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल जैसे उपकरण भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ये उपकरण समुद्र के भीतर जाकर ऐसी जगहों की जानकारी जुटाने में मदद करते हैं, जहां सामान्य जहाज के सेंसर की पहुंच सीमित होती है।

इसके अलावा सर्वे जहाज बंदरगाहों की योजना, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आपदा के बाद समुद्री क्षेत्र का आकलन और वैज्ञानिक शोध से जुड़े काम भी करते हैं। जरूरत पड़ने पर ऐसे जहाज सीमित स्तर पर सर्च एंड रेस्क्यू, समुद्री शोध और मेडिकल सपोर्ट जैसे कार्यों में भी उपयोगी हो सकते हैं। (GRSE Navratna Status)

आईएनएस अग्रय: उथले समुद्र में पनडुब्बियों को खोजने वाला युद्धपोत

आईएनएस अग्रय एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य काम समुद्र के उथले क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना है।

उथले समुद्र में पनडुब्बी रोधी युद्ध आसान नहीं होता। गहरे समुद्र की तुलना में यहां पानी की गहराई कम होती है, समुद्र तल की बनावट अलग होती है और ध्वनि तरंगों का व्यवहार भी बदल जाता है। पनडुब्बियों को खोजने के लिए इस्तेमाल होने वाले सोनार सिस्टम को ऐसे वातावरण में अधिक सटीक और संवेदनशील होना पड़ता है।

आईएनएस अग्रय अर्नाला क्लास की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसमें उथले पानी में काम करने वाले सोनार सिस्टम, हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर लगाए गए हैं। सोनार पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजकर किसी पनडुब्बी या अन्य वस्तु की स्थिति का पता लगाने में मदद करता है। टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर पनडुब्बी रोधी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

अग्रय को जीआरएसई ने बनाया है। यह अर्नाला क्लास का चौथा जहाज है, जिसे मार्च 2026 में नौसेना को सौंपा गया था। इस श्रेणी के कुल आठ जहाज जीआरएसई और लार्सन एंड टुब्रो द्वारा बनाए जा रहे हैं। (GRSE Navratna Status)

मार्च में एक ही दिन तीनों जहाज सौंपकर बनाया था रिकॉर्ड

जीआरएसई ने इस साल 30 मार्च को आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रय तीनों जहाज नौसेना को एक ही दिन सौंपे थे। डिफेंस शिपबिल्डिंग में एक ही दिन तीन अलग-अलग श्रेणी के प्लेटफॉर्म की डिलीवरी को महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था।

कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल आठ वॉरशिप और नेवल प्लेटफॉर्म डिलीवर किए। इनमें तीन प्लेटफॉर्म की एक ही दिन डिलीवरी भी शामिल थी। वहीं, जीआरएसई अब केवल छोटे जहाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि फ्रिगेट, सर्वे वेसल, एंटी-सबमरीन क्राफ्ट और अन्य जटिल प्लेटफॉर्म पर एक साथ काम कर रहा है। (GRSE Navratna Status)

भारत के पहले स्वदेशी युद्धपोत से शुरू हुआ था सफर

जीआरएसई का इतिहास भारतीय नौसैनिक शिपबिल्डिंग से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1961 में, डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग घोषित होने के लगभग एक साल बाद, इस शिपयार्ड ने भारत का पहला स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस अजय नौसेना को सौंपा था।

इसके बाद कंपनी ने भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और मित्र देशों के लिए कई तरह के जहाज तैयार किए। जीआरएसई ने मॉरीशस सरकार के लिए सीजीएस बराकुडा नाम का भारत का पहला एक्सपोर्ट वॉरशिप भी बनाया था। यह उपलब्धि इसलिए अहम थी क्योंकि इससे भारत ने केवल अपने लिए युद्धपोत बनाने के बजाय मित्र देशों के लिए भी रक्षा प्लेटफॉर्म तैयार करने की क्षमता दिखाई।

जीआरएसई अब तक 800 से अधिक मरीन प्लेटफॉर्म डिलीवर कर चुका है। इनमें वॉरशिप, गश्ती पोत, सर्वे जहाज, तटरक्षक पोत और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म शामिल हैं। कंपनी के अनुसार उसने भारतीय नौसेना, तटरक्षक बल और मित्र देशों को कुल 118 युद्धपोत दिए हैं, जिनमें 80 भारतीय नौसेना में शामिल किए गए हैं।

जर्मनी के लिए बन रहे हैं 12 जहाज

जीआरएसई डिफेंस शिप्स के साथ कमर्शियल शिपबिल्डिंग में भी सक्रिय है। कंपनी इस समय एक जर्मन ग्राहक के लिए 12 मल्टी पर्पज वेसल तैयार कर रही है। ये जहाज भारत में बन रहे हैं और इन्हें विदेशी ग्राहक को दिया जाना है। इस परियोजना को मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड मॉडल के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

कंपनी ग्रीन वेसल और ऑटोनॉमस वेसल के क्षेत्र में भी काम कर रही है। ग्रीन वेसल से मतलब ऐसे जहाजों से है, जिनमें ईंधन की खपत और पर्यावरणीय प्रभाव कम करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। ऑटोनॉमस वेसल ऐसे प्लेटफॉर्म होते हैं, जो कुछ कार्य सीमित मानव नियंत्रण या डिजिटल सिस्टम के जरिए कर सकते हैं।

जीआरएसई रिसर्च शिप निर्माण में भी विशेष क्षमता रखता है। समुद्री शोध, हाइड्रोग्राफी और समुद्र से जुड़े वैज्ञानिक डेटा जुटाने के लिए रिसर्च वेसल महत्वपूर्ण होते हैं। संशोधक जैसे सर्वे वेसल इसी क्षमता का उदाहरण हैं। (GRSE Navratna Status)

नवरत्न दर्जे के बाद योजनाओं को मिलेगा विस्तार

जीआरएसई इस समय ब्राउनफील्ड और ग्रीनफील्ड दोनों तरह की विस्तार योजनाओं पर काम कर रहा है। ब्राउनफील्ड विस्तार का मतलब मौजूदा शिपयार्ड, वर्कशॉप, डॉक और निर्माण सुविधाओं को बड़ा या आधुनिक बनाना होता है। वहीं ग्रीनफील्ड परियोजना में नई जगह पर नई निर्माण क्षमता विकसित की जाती है।

शिपबिल्डिंग में उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मतलब केवल ज्यादा जहाज बनाना नहीं होता। इसके लिए स्टील कटिंग सुविधा, ब्लॉक निर्माण, भारी क्रेन, डॉक, आउटफिटिंग जेटी, परीक्षण सुविधा, डिजाइन टीम, सप्लाई चेन और हजारों छोटे-बड़े उद्योगों का नेटवर्क भी जरूरी होता है।

नवरत्न दर्जा मिलने के बाद जीआरएसई के बोर्ड को निवेश और विस्तार से जुड़े फैसलों में अधिक अधिकार मिलेंगे। कंपनी के लिए यह बदलाव ऐसे समय आया है, जब नौसेना के लिए नए युद्धपोतों, सर्वे प्लेटफॉर्म, पनडुब्बी रोधी जहाजों और गश्ती पोतों की जरूरत लगातार बनी हुई है।

21 जून को दुनागिरी, संशोधक और अग्रय की कमीशनिंग के साथ जीआरएसई के बनाए तीन अलग-अलग समुद्री प्लेटफॉर्म औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल फ्लीट का हिस्सा बन जाएंगे। (GRSE Navratna Status)

114 राफेल और AMCA के बीच फंसी वायुसेना को मिला ये खास ऑफर, जो किसी विदेशी फाइटर जेट कंपनी ने पहले नहीं दिया!

Gripen F Offer to IAF
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Gripen F Offer to IAF: भारतीय वायुसेना इस समय अपने सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक दौर से गुजर रही है। एक तरफ उसे चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों पर लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके लड़ाकू विमानों की गिरती संख्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। वायुसेना के लिए स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में फिलहाल केवल 29 स्क्वाड्रन ही हैं। जबकि चीन के पास लगभग 100 एविएशन ब्रिगेड हैं, जिनमें पांचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट जे-20 की एविएशन ब्रिगेड की संख्या लगभग 13 है। जबकि पाकिस्तान के पास लगभग 25 फाइटर/मल्टी-रोल स्क्वाड्रंस हैं और उसे चीन के पांचवी पीढ़ी के जे-35 एयरक्राफ्ट्स की डिलीवरी मिलनी भी जल्द शुरू हो जाएगी। ऐसे में भरतीय वायुसेना को नए लड़ाकू विमानों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।

इसी जरूरत को देखते हुए भारत ने 114 मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी एमआरएफए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है और फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए औपचारिक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट भेजा है। हालांकि फाइन डील इस साल के आखिर तक होने की ही उम्मीद है क्योंकि कीमतों को लेकर बातचीत अभी भी जारी है। इसी बीच स्वीडन की डिफेंस कंपनी साब ने भारतीय वायुसेना के सामने बेहद खास प्रस्ताव रखा है।

सूत्रों के अनुसार स्वीडिश फाइटर जेट कंपनी साब ने भारत को अपने लेटेस्ट ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान का ऑफर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी ने सिंगल सीट ग्रिपेन ई के बजाय ट्विन सीटर ग्रिपेन एफ पर जोर दिया है। इस ऑफर में भारत को मिशन सिस्टम, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कई अहम तकनीकें देने का प्रस्ताव दिया है।

Gripen F Offer to IAF: राफेल और एएमसीए के बीच क्यों बना है गैप

वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती टाइमलाइन को लेकर है। एक तरफ 114 राफेल विमानों की खरीद प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। दूसरी तरफ पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए को सर्विस में आने में अभी कई साल लग सकते हैं। फ्रांस से सीधे फ्लाई अवे कंडीशन में राफेल फाइटर जेट्स की शुरुआती डिलीवरी 2031 से शुरू होने की संभावना है। जबकि एएमसीए का पहला प्रोटोटाइप रोलआउट ही 2029 तक होने की उम्मीद है, वहीं सीरीज प्रोडक्शन 2035 के आसपास शुरू हो सकता है।

सूत्र बताते हैं कि एएमसीए प्रोजेक्ट के तहत प्रोटोटाइप डेवलपमेंट के लिए निजी कंपनियों को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान बनाना दुनिया की सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं। ऐसे में प्रोडक्शन लेवल तक पहुंचने में समय लगना स्वाभाविक माना जाता है।

यही वह गैप है जिसे साब एक मौके के तौर पर देख रही है। साब का दावा है कि ग्रिपेन एफ को लेकर समझौता होने के बाद पहले विमान की डिलीवरी तीन साल के भीतर शुरू की जा सकती है और कुछ सालों बाद भारत में लोकल प्रोजक्शन के जरिए हर साल लगभग 30 विमान बनाए जा सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
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हाईवे से उड़ान भरने वाला फाइटर जेट

ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खूबी उसकी ऑपरेशनल क्षमता मानी जाती है। यह विमान स्वीडन के शीत युद्ध काल के मिलिट्री डॉक्ट्रिन से डेवलप हुआ है। उस समय स्वीडन को आशंका थी कि युद्ध की स्थिति में उसके बड़े एयरबेस सबसे पहले निशाना बनाए जा सकते हैं।

इसी के चलते ग्रिपेन को इस तरह डिजाइन किया गया कि वह सामान्य सड़कों और राजमार्गों से भी उड़ान भर सके। सूत्रों के अनुसार यह विमान लगभग 800 मीटर लंबे हाईवे सेक्शन से टेकऑफ और लैंडिंग कर सकता है।

भारत में पिछले कुछ सालों में सीमावर्ती इलाकों में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी, नई सड़कों, सुरंगों और डुअल यूज वाले इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से निर्माण हुआ है। लद्दाख, राजस्थान और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान तैयार किए गए हैं जहां जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान ऑपरेट किए जा सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि यदि किसी संघर्ष में बड़े एयरबेस निशाने पर आते हैं तो इस तरह की क्षमता वायुसेना को अतिरिक्त फायदा दे सकती है। (Gripen F Offer to IAF)

केवल पांच लोग और 15 मिनट

भारतीय वायुसेना के मौजूदा कई बड़े लड़ाकू विमानों को उड़ान के बाद फिर से मिशन के लिए तैयार करने में काफी समय और संसाधन लगते हैं। इसके लिए विशेष ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट, प्रशिक्षित तकनीशियन और बड़े मेंटेनेंस स्ट्रक्चर की जरूरत होती है। यहां तक कि जगुआर औऱ मिग-29 जैसे फाइटर जेट्स को एक सॉर्टी के बाद फिर से उड़ान लायक बनाने के लिए लंबे मेंटेनेंस टाइम की जरूरत होती है।

ग्रिपेन एफ के बारे में साब का दावा है कि यह बेहद कम संसाधनों के साथ ऑपरेट किया जा सकता है। विमान में लगा ऑटोमेटेड हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम अधिकांश तकनीकी जांच खुद करता है।

सूत्रों के अनुसार ईंधन भरने, हथियार लगाने और अगली उड़ान के लिए तैयार करने की पूरी प्रक्रिया लगभग 15 मिनट में पूरी की जा सकती है। इसके लिए केवल पांच लोगों की टीम काफी बताई जाती है, जिनमें एक विशेषज्ञ तकनीशियन होना जरूरी है।

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सोर्स कोड को लेकर साब का यह है ऑफर

सूत्रों का कहना है कि ग्रिपेन प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी ओपन आर्किटेक्चर डिजाइन है। आमतौर पर जब कोई देश विदेशी लड़ाकू विमान खरीदता है तो उसके मिशन सिस्टम और सॉफ्टवेयर का पूरा कंट्रोल ऑरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर के पास रहता है। विमान में नया हथियार जोड़ना हो, रडार को अपग्रेड करना हो या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम में बदलाव करना हो, तो विदेशी कंपनी की अनुमति और सहायता जरूरी होती है।

सूत्रों के अनुसार साब का दावा है कि ग्रिपेन एफ में फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और मिशन सिस्टम को अलग-अलग रखा गया है। इसका मतलब यह है कि फ्लाइट सिक्योरिटी से जुड़े मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना मिशन सॉफ्टवेयर में बदलाव किए जा सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

ग्रिपेन ऑफर की यह है सबसे बड़ी ताकत

सूत्रों के अनुसार भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की फ्रांस के साथ चल रही बातचीत में एक बड़ा मुद्दा राफेल लड़ाकू विमान के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (आईसीडी) और महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर तक पहुंच का भी है। आईसीडी दरअसल वे तकनीकी दस्तावेज होते हैं, जो बताते हैं कि विमान के अलग-अलग सिस्टम आपस में कैसे काम करते हैं और किस तरह एक-दूसरे से डेटा शेयर करते हैं।

सूत्रों का कहना है कि भारत चाहता है कि भविष्य में वह अपने स्वदेशी हथियारों और सेंसरों को राफेल में स्वतंत्र रूप से जोड़ सके। लेकिन बिना आईसीडी एक्सेस के ऐसा करना नामुमकिन है। ऐसी स्थिति में किसी नए भारतीय हथियार को विमान में जोड़ने के लिए मूल निर्माता कंपनी की मंजूरी और तकनीकी मदद की जरूरत पड़ती है।

सूत्र बताते हैं कि यदि इन सिस्टम्स के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स तक पूरी पहुंच नहीं मिलती है, तो भविष्य में भारत के लिए अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल, रुद्रम एंटी रेडिएशन मिसाइल या ब्रह्मोस-एनजी जैसे स्वदेशी वेपन सिस्टम्स को पूरी तरह स्वतंत्र तरीके से प्रमाणित करना मुश्किल हो सकता है। हर बड़े इंटीग्रेशन के लिए फ्रांसीसी कंपनियों के साथ कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ सकती है।

सूत्रों का कहना है कि यह केवल भारत से जुड़ा मामला नहीं है। फ्रांस ने संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी और अन्य राफेल ग्राहकों के साथ भी यही नीति अपनाई है। फ्रांस का कहना है कि राफेल के आरबीई2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन कंप्यूटर के सोर्स कोड को डेवलप करने में दशकों का वक्त लगा है और उन पर उसका पूरा अधिकार है। फ्रेंच कंपनी का मानना है कि राफेल के मूल सोर्स कोड और संवेदनशील एवियोनिक्स तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और सुरक्षा से जुड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।

वहीं, फ्रांस को खास तौर इस बात की भी चिंता है कि अगर ब्रह्मोस-एनजी जैसी मिसाइल के इंटीग्रेशन से राफेल के कुछ संवेदनशील तकनीकी डेटा तक अप्रत्यक्ष पहुंच का जोखिम बन सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

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क्यों है साब का प्रस्ताव सबसे खास

सूत्रों के मुताबिक ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खासियत उसका ओपन आर्किटेक्चर मॉडल है। साब भारत को मिशन सिस्टम लेयर पर कहीं अधिक तकनीकी भागीदारी देने की बात कर रहा है। कंपनी का दावा है कि विमान के फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर और मिशन सॉफ्टवेयर को अलग-अलग रखा गया है। इससे सुरक्षा से समझौता किए बिना भारतीय इंजीनियर मिशन सिस्टम, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एल्गोरिद्म और स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन पर ज्यादा आजादी के साथ काम कर सकते हैं।

बेंगलुरु में डिजाइन और एक्सीलेंस सेंटर बनाने का प्रस्ताव

साब ने भारत में एक विशेष एक्सीलेंस और डिजाइन सेंटर स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा है। सूत्रों के अनुसार इसका उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं बल्कि भारतीय इंजीनियरों और रिसर्च संस्थानों को सीधे डेवलपमेंट प्रोसेस में शामिल करना है। इससे भारतीय वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य स्ट्रैटेजिक सॉफ्टवेयर के डेवलपमेंट में शामिल हो सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

दूसरे पायलट की जगह वारफेयर मैनेजमेंट अफसर

ग्रिपेन एफ में दूसरा कॉकपिट भी है। आमतौर पर दो सीट वाले विमान ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन ग्रिपेन एफ में दूसरी सीट का इस्तेमाल वेपन सिस्टम्स अफसर कर सकता है।

यह अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सेंसर मैनेजमेंट, ड्रोन कंट्रोल और कॉम्बैट मिशनों का ऑपरेशन कर सकता है। आधुनिक युद्ध में जहां डेटा की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहां यह अतिरिक्त सीट मिशन की क्षमता बढ़ाने वाली मानी जाती है।

लेकिन एक बड़ा जोखिम यह भी है!

जहां ग्रिपेन का ओपन सॉफ्टवेयर सिस्टम चर्चा में है, वहीं इसमें सबसे बड़ी कमजोरी भी है। ग्रिपेन एफ में जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-414 टर्बोफैन इंजन लगाया गया है। यही इंजन भारत के तेजस एमके-2 और एएमसीए एमके-1 के लिए भी चुना गया है।

अगर किसी वजह से इंजन सप्लाई पर असर पड़ता है, तो उसका असर केवल ग्रिपेन पर नहीं बल्कि भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

एआई और नेटवर्क बेस्ड युद्ध पर फोकस

साब का कहना है कि ग्रिपेन ई और एफ को भविष्य के बैटलफील्ड को ध्यान में रखकर डेवलप किया गया है। विमान में एडवांस्ड एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट मौजूद हैं।

कंपनी का दावा है कि विमान बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से प्रोसेस कर सकता है और पायलट को फैसले लेने में मदद करता है। यही वजह है कि इसे नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर रेडी प्लेटफॉर्म के तौर पर भी देखा जा रहा है। (Gripen F Offer to IAF)

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कहां तक पहुंची बात

हालांकि स्वीडन की डिफेंस कंपनी साब का दावा है कि वह भारतीय वायुसेना को अपने आधुनिक ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान देने के प्रस्ताव पर भारतीय वायुसेना और डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) के साथ गंभीरता से बातचीत कर रही है। हालांकि वायुसेना के सूत्रों ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि पिछले कुछ महीनों से साब उनके संपर्क में जरूर है।

साब का दावा है कि वह भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित क्षमताओं के अलावा भारत में ही विमान के डिजाइन, मेंटेनेंस और भविष्य में अपग्रेड की सुविधा देने की बात कर रही है।

कंपनी का दावा है कि समझौता होने के बाद पहला ग्रिपेन लड़ाकू विमान लगभग तीन साल के भीतर भारत को मिल सकता है। साब ग्रिपेन एफ को अपनी श्रेणी का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान बताती है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टी रोल और नेटवर्क बेस्ड फाइटर जेट है, जिसे आधुनिक खतरों का सामना करने के लिए डेवलप किया गया है। (Gripen F Offer to IAF)

क्या हैं ग्रिपेन एफ की खूबियां

ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को सप्रेस कर सकता है। कंपनी का दावा है कि यह विमान केवल 10 मिनट के भीतर अलग-अलग मिशनों के लिए तैयार किया जा सकता है।

इस विमान में रेवेन ईएस-05 एईएसए रडार लगा है, जिसे आधुनिक रडार तकनीकों में गिना जाता है। इसके अलावा इसमें इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सिक्योर कम्यूनिकेशन सिस्टम भी मौजूद है। अमेरिका के बेहतरीन ईए-18जी ग्राउलर और एफ-16वी ब्लॉक 70 फाइटर जेट की तुलना में, ग्रिपेन एक साथ दो तरह के एयरक्राफ्ट रोल निभा सकता है।

साब का कहना है कि ग्रिपेन एफ भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप है और इसे भारतीय जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा सकता है। कंपनी भारत में उत्पादन सुविधा स्थापित करने, स्थानीय सप्लाई चेन विकसित करने और भारतीय इंजीनियरों तथा तकनीशियनों को प्रशिक्षण देने की भी बात कर रही है।

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वीडन दौरे के दौरान स्वीडिश वायुसेना के ग्रिपेन लड़ाकू विमानों ने उनके विमान को स्वीडिश हवाई क्षेत्र में एस्कॉर्ट किया था। इसे दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग के प्रतीक के रूप में भी देखा गया था। (Gripen F Offer to IAF)

Explainer: 30 सेकंड में हमला, 15 सेकंड में गायब! नहीं मिलेगा दुश्मन को जवाब का मौका! क्या है गरुड़ास्त्र, जिसने भारतीय सेना को चौंकाया?

Nibe Garudastra Mortar System
Nibe Garudastra Mortar System (Image Source: NIBE)

Garudastra Mortar System: आधुनिक युद्ध में केवल लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार ही काफी नहीं माने जाते, बल्कि यह भी जरूरी है कि कोई हथियार कितनी तेजी से हमला कर सकता है, कितनी जल्दी अपनी जगह बदल सकता है और दुश्मन के जवाबी हमले से खुद को कितना सुरक्षित रख सकता है। भारतीय कंपनी निबे लिमिटेड ने अपने नए गरुड़ास्त्र लॉन्ग रेंज 120 मिमी व्हीकल माउंटेड मोर्टार सिस्टम का प्रदर्शन भारतीय सेना के सामने किया है।

मध्य प्रदेश के महू स्थित इन्फैंट्री स्कूल में इवैल्यूशन ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र ने ऐसी कई क्षमताओं का प्रदर्शन किया, जिन्हें आधुनिक युद्ध की जरूरत माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह परीक्षण नो कॉस्ट-नो कमिटमेंट (एनसी-एनसी) आधार पर किया गया, यानी सेना ने सिस्टम की क्षमता को परखा लेकिन किसी खरीद प्रतिबद्धता के बिना।

हाल ही में भारतीय सेना ने पांच जून को मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल को लेकर रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (RFI) जारी की थी। इस खबर को रक्षा समाचार ने ही ब्रेक किया था। जिसके बाद निबे कंपनी अपने गरुड़ास्त्र लॉन्ग रेंज 120 मिमी व्हीकल माउंटेड मोर्टार एंड बॉम्ब सिस्टम का प्रदर्शन भारतीय सेना के सामने किया है।

Garudastra Mortar System: क्या होता है व्हीकल माउंटेड मोर्टार?

मोर्टार को आमतौर पर पैदल सेना का सबसे भरोसेमंद इनडायरेक्ट फायर सपोर्ट वेपन माना जाता है। इसका इस्तेमाल दुश्मन की ऐसी स्थिति पर हमला करने के लिए किया जाता है जो सीधे दिखाई नहीं देती।

पारंपरिक मोर्टार सिस्टम में सैनिकों को पहले मोर्टार को वाहन से उतारना पड़ता है, बेस प्लेट लगानी पड़ती है, दिशा तय करनी पड़ती है और उसके बाद फायरिंग शुरू होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कई मिनट लग सकते हैं।

लेकिन गरुड़ास्त्र जैसे सिस्टम में यह पूरी प्रक्रिया काफी हद तक ऑटोमेटेड है। वाहन रुकता है, सिस्टम टारगेट की दिशा और दूरी की कैल्कुलेशन करता है, मोर्टार फायर करता है और फिर तुरंत वहां से निकल जाता है।

यही वजह है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक सेनाओं के लिए तेजी से महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। (Garudastra Mortar System)

महू में गरुड़ास्त्र ने क्या किया ट्रायल में?

रक्षा सूत्रों के अनुसार ट्रायल की शुरुआत एक “शूट एंड स्कूट” मिशन से हुई। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

गरुड़ास्त्र निर्धारित फायरिंग पोजीशन पर पहुंचा और 30 सेकंड से भी कम समय में युद्ध के लिए तैयार हो गया। इसके बाद केवल 15 सेकंड के भीतर दो राउंड फायर किए गए।

सबसे खास बात यह रही कि फायरिंग के तुरंत बाद सिस्टम ने केवल 15 सेकंड में अपनी जगह छोड़ दी और दूसरी जगह पहुंचकर दोबारा टारगेट को निशाना बनाया। इसका उद्देश्य दुश्मन की काउंटर बैटरी फायर से बचना था।

शूट एंड स्कूट इसलिए जरूरी है क्योंकि आधुनिक रडार कुछ ही सेकंड में तोप या मोर्टार की स्थिति का पता लगा सकते हैं।

“शूट एंड स्कूट” क्यों है इतना जरूरी

पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब लगभग हर आधुनिक सेना के पास ऐसे रडार मौजूद हैं जो किसी भी तोप या मोर्टार द्वारा दागे गए गोले की दिशा को ट्रैक करके उसकी फायरिंग लोकेशन का पता लगा सकते हैं।

इसे काउंटर बैटरी रडार कहा जाता है।

यदि कोई मोर्टार या तोप फायरिंग के बाद लंबे समय तक एक ही स्थान पर खड़ी रहती है तो दुश्मन कुछ ही मिनटों में जवाबी हमला कर सकता है।

यूक्रेन युद्ध में यह बार-बार देखने को मिला कि जो आर्टिलरी सिस्टम तेजी से स्थान नहीं बदल सके, वे दुश्मन के ड्रोन और जवाबी गोलाबारी का शिकार बन गए।

इसी वजह से दुनिया भर की सेनाएं ऐसे हथियारों की तलाश कर रही हैं जो हमला करने के बाद तुरंत अपनी लोकेशन बदल सकें। (Garudastra Mortar System)

केवल दो सैनिकों ने एक मिनट में किए 12 राउंड फायर

ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र की फायरिंग क्षमता का भी प्रदर्शन किया गया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक केवल दो सैनिकों की टीम ने इस सिस्टम को ऑपरेट करते हुए एक मिनट में 12 राउंड फायर किए।

इतनी तेज फायरिंग के बावजूद सिस्टम ने लक्ष्य पर सटीकता बनाए रखी। आम तौर पर मोर्टार ऑपरेशन में ज्यादा सैनिकों की जरूरत होती है, लेकिन ऑटोमेशन और डिजिटल फायर कंट्रोल तकनीक की वजह से गरुड़ास्त्र कम मानव संसाधन के साथ भी ज्यादा फायरपावर दे सकता है।

युद्ध में यह एक बड़ा फायदा माना जाता है क्योंकि कम सैनिकों के साथ ज्यादा प्रभावी फायर सपोर्ट दिया जा सकता है।

एमआरएसआई क्षमता ने भी किया प्रदर्शन

महू में हुए प्रदर्शन में मल्टीपल राउंड्स सिमल्टेनियस इम्पैक्ट मिशन (एमआरएसआई) भी शामिल हुआ। यह आधुनिक आर्टिलरी की सबसे एडवांस तकनीकों में गिना जाता है।

आमतौर पर यदि तीन गोले दागे जाएं तो पहला गोला पहले और तीसरा गोला सबसे बाद में टारगेट तक पहुंचेगा। लेकिन एमआरएसआई तकनीक में अलग-अलग कोणों और अलग-अलग उड़ान समय का इस्तेमाल करके गोले इस तरह दागे जाते हैं कि वे एक ही समय पर टारगेट पर गिरें।

ट्रायल के दौरान गरुड़ास्त्र ने तीन राउंड फायर किए और सभी गोले एक साथ टारगेट पर पहुंचे।

इससे दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिलता और एक ही क्षण में भारी मात्रा में फायरपावर टारगेट पर गिरती है।

3 मीटर × 3 मीटर के टारगेट पर सीधा वार

ट्रायल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन रहा। गरुड़ास्त्र से एक जीपीएस और लेजर गाइडेड राउंड दागा गया जिसने लंबी दूरी पर मौजूद केवल 3 मीटर × 3 मीटर साइज के टारगेट को सीधे निशाना बनाया।

यह क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पारंपरिक मोर्टार आमतौर पर किसी बड़े क्षेत्र पर फायरिंग करते हैं। लेकिन गाइडेड म्यूनिशन के साथ अब मोर्टार भी बेहद सटीक हमले कर सकते हैं। इससे गोला-बारूद की बचत होती है और टारगेट को कम राउंड में निष्क्रिय किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)

गरुड़ास्त्र की कितनी है रेंज

गरुड़ास्त्र की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोला-बारूद के प्रकार पर निर्भर करती है। ट्रायल के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान इसके जीपीएस और लेजर गाइडेड प्रिसीजन म्यूनिशन पर रहा। कंपनी ने प्रदर्शन के दौरान ऐसे गाइडेड राउंड का इस्तेमाल किया, जो करीब 7 से 10 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट को बेहद सटीकता के साथ निशाना बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गाइडेड तकनीक की वजह से हवा, तापमान और अन्य मौसम संबंधी कारकों का असर काफी कम हो जाता है, जिससे सटीकता बढ़ जाती है।

वहीं अगर सामान्य 120 मिमी हाई एक्सप्लोसिव (एचई) मोर्टार गोला-बारूद की बात करें तो उसकी सटीक रेंज का आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस श्रेणी के आधुनिक 120 मिमी मोर्टार सिस्टम आमतौर पर 6 से 8 किलोमीटर तक प्रभावी फायरिंग कर सकते हैं। चूंकि गरुड़ास्त्र को लॉन्ग रेंज मोर्टार सिस्टम के रूप में पेश किया गया है, इसलिए इसकी वास्तविक क्षमता इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद और प्रोपेलेंट पर भी निर्भर करेगी।

ट्रायल के दौरान एक और महत्वपूर्ण क्षमता का प्रदर्शन किया गया। कंपनी के अनुसार गरुड़ास्त्र से दागा गया 17 किलोग्राम वॉरहेड वाला गाइडेड राउंड लगभग 20 सेंटीमीटर मोटी रीइन्फोर्स्ड कंक्रीट संरचना को भेदने में सक्षम है। ऐसे गोला-बारूद का उपयोग बंकर, मजबूत सैन्य ठिकानों और अन्य संरक्षित टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है। (Garudastra Mortar System)

दुनिया में बढ़ी व्हीकल माउंटेड मोर्टार की बढ़ती मांग

पिछले दो दशकों में दुनिया की कई सेनाओं ने व्हीकल माउंटेड मोर्टार को अपनाया है। अमेरिका के पास अपने स्ट्राइकर प्लेटफॉर्म पर मोर्टार सिस्टम तैनात है। इजराइल के पास कार्डोम और स्पीयर जैसे सिस्टम हैं। यूरोप की कई सेनाएं भी इसी प्रकार की मोबाइल फायर सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर रही हैं।

इन सिस्टमों का उद्देश्य इन्फैंट्री यानी पैदल सेना को तेज और सटीक फायर पावर सर्पोट देना है।

इजरायली सिस्टम से क्यों हो रही तुलना?

सूत्रों का कहना है कि गरुड़ास्त्र जिस कैटेगरी का सिस्टम है, उसमें दुनिया के सबसे चर्चित प्लेटफॉर्म इजराइल की एल्बिट सिस्टम्स के स्पीयर और कार्डोम मोर्टार सिस्टम हैं।

इनकी पहचान तेज तैनाती, डिजिटल फायर कंट्रोल, कम क्रू और सटीक निशाने की क्षमता है। गरुड़ास्त्र में भी इसी प्रकार की कई आधुनिक क्षमताएं दिखाई गईं। हालांकि निबे कंपनी ने अपने अंतरराष्ट्रीय तकनीकी साझेदार के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी साझा नहीं की है।

भारतीय सेना को क्यों है ऐसे सिस्टम की जरूरत

भारतीय सेना दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में तैनात रहती है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पारंपरिक तोपखाने को तैनात करना हमेशा आसान नहीं होता।

ऐसे इलाकों में मोबाइल मोर्टार सिस्टम तेजी से आगे बढ़ सकती पैदल सेना को तत्काल फायर सपोर्ट दे सकते हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार सेना पहले ही सीमित संख्या में व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम का उपयोग कर रही है। अब ज्यादा आधुनिक और अधिक ऑटोमेटेड सिस्टम का मूल्यांकन किया जा रहा है। (Garudastra Mortar System)

एमएसवी प्रोग्राम से क्या है कनेक्शन

हाल ही में भारतीय सेना ने मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल (एमएसवी) कार्यक्रम के लिए आरएफआई जारी की थी। सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों तरह के मोर्टार चला सकें, 20 सेकंड से कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं और कम क्रू के साथ ऑपरेट किए जा सकें।

एमएसवी कार्यक्रम की तकनीकी जरूरतों में भी तेज तैनाती, ऑटोमेशन, डिजिटल फायर कंट्रोल और “शूट एंड स्कूट” जैसी क्षमताओं पर विशेष जोर दिया गया है। (Garudastra Mortar System)

एमएसवी और वीएमआईएमएस में क्या है अंतर

एमएसवी (मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल) और वीएमआईएमएस (व्हीकल माउंटेड इन्फैंट्री मोर्टार सिस्टम) एक-दूसरे से जुड़े हुए कार्यक्रम हैं, लेकिन दोनों के बीच तकनीकी स्तर पर बड़ा अंतर भी है। भारतीय सेना ने पहले चरण में वीएमआईएमएस के तहत करीब 50 सिस्टम शामिल किए थे। इनमें महिंद्रा एएलएसवी 4×4 वाहन पर स्पेन की एनटीजीएस अलाकरान-एल 81 मिमी ऑटोमेटेड मोर्टार सिस्टम लगाया गया थी। इन सिस्टमों को तेजी से तैनाती और तुरंत फायर सपोर्ट देने के लिए बनाया गया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक इनमें से कुछ सिस्टम्स को एलएसी के पास भी तैनात किया गया है। यह अपेक्षाकृत हल्के और अत्यधिक मोबाइल प्लेटफॉर्म हैं, जो कम समय में फायरिंग कर सकते हैं और फिर अपनी जगह बदल सकते हैं।

अब सेना इससे एक कदम आगे बढ़ रही है। एमएसवी यानी मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल को वीएमआईएमएस का ज्यादा एडवांस और अगली पीढ़ी का वर्जन माना जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रूप से विकसित और निर्मित आधुनिक मोर्टार प्लेटफॉर्म हासिल करना है।

सेना ऐसे सिस्टम चाहती है जो 81 मिमी और 120 मिमी दोनों मोर्टारों को ऑपरेट कर सकें, 20 सेकंड से भी कम समय में फायरिंग के लिए तैयार हो जाएं, केवल दो सैनिक ऑपरेट कर सके। इसमें एडवांस बैलिस्टिक कंप्यूटर, ऑटोमेटेड फायर कंट्रोल, डिजिटल कम्युनिकेशन और उच्च स्तर की मोबिलिटी जैसी क्षमताओं की भी मांग की गई है। (Garudastra Mortar System)

समुद्र से लेकर दलदल तक दौड़ेगा होवरक्राफ्ट H-561, भारतीय तटरक्षक के बेड़े में शामिल हुआ पहला मेड-इन-इंडिया एयर कुशन व्हीकल

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए भारतीय तटरक्षक बल ने गुरुवार को अपने बेड़े में पहला स्वदेशी एयर कुशन व्हीकल (एसीवी) H-561 यानी होवरक्राफ्ट को शामिल कर लिया। गोवा स्थित चौगुले एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के रस्साईम शिपयार्ड में आयोजित समारोह के दौरान इस प्लेटफॉर्म को औपचारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया।

अब तक देश को एयर कुशन व्हीकल के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। H-561 भारत में डिजाइन और निर्मित पहला एयर कुशन व्हीकल है, जिसे आम भाषा में हॉवरक्राफ्ट भी कहा जाता है।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: क्या होता है एयर कुशन व्हीकल?

H-561 के साथ भारत ने पहली बार ऐसे प्लेटफॉर्म को देश में तैयार कर सेवा में शामिल किया है, जो समुद्र और जमीन दोनों प्रकार के इलाकों में संचालन करने में सक्षम है। एयर कुशन व्हीकल या हॉवरक्राफ्ट एक ऐसा वाहन होता है जो पानी, दलदल, रेत, कीचड़ और समुद्र तट जैसे इलाकों में आसानी से चल सकता है। सामान्य जहाज या नाव को चलने के लिए पानी की एक निश्चित गहराई चाहिए होती है, लेकिन एयर कुशन व्हीकल के साथ ऐसा नहीं है।

इस वाहन के नीचे हवा का एक कुशन तैयार किया जाता है। शक्तिशाली लिफ्ट फैन नीचे की ओर हवा भेजते हैं, जिससे वाहन जमीन या पानी की सतह से थोड़ा ऊपर उठ जाता है। इसके बाद पीछे लगे प्रोपेलर इसे आगे बढ़ाते हैं।

यही वजह है कि यह प्लेटफॉर्म उन इलाकों में भी पहुंच सकता है जहां सामान्य पेट्रोल बोट या जहाज नहीं पहुंच पाते।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

भारतीय तटरक्षक को क्यों थी इसकी जरूरत?

भारत की समुद्री सीमा लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी है। इसके अलावा देश के पास विशाल तटीय क्षेत्र, क्रीक, मैंग्रोव, दलदली इलाके और द्वीपीय क्षेत्र भी हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार गुजरात के कच्छ क्षेत्र, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन, ओडिशा के तटीय इलाकों और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान हैं जहां सामान्य जहाजों की पहुंच सीमित रहती है।

ऐसे क्षेत्रों में निगरानी, तस्करी विरोधी अभियान, खोज एवं बचाव अभियान और आपदा राहत कार्यों के लिए एयर कुशन व्हीकल बेहद उपयोगी माना जाता है।

पहले विदेश से खरीदे जाते थे हॉवरक्राफ्ट

भारतीय तटरक्षक के पास पहले भी हॉवरक्राफ्ट मौजूद थे, लेकिन वे सभी विदेश से खरीदे गए थे।

सूत्रों के मुताबिक तटरक्षक बल लंबे समय से ब्रिटेन की ग्रिफॉन हॉवरवर्क कंपनी के हॉवरक्राफ्ट का इस्तेमाल कर रहा था। शुरुआती चरण में छह हॉवरक्राफ्ट खरीदे गए थे, जबकि बाद में अतिरिक्त यूनिट्स को शामिल किया गया। कुल मिलाकर भारतीय तटरक्षक के पास 18 विदेशी हॉवरक्राफ्ट मौजूद रहे।

इन प्लेटफॉर्म्स ने वर्षों तक सेवा दी, लेकिन समय के साथ उनके रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सपोर्ट से जुड़ी चुनौतियां सामने आने लगीं।

इसी कारण लंबे समय से एक स्वदेशी विकल्प विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

387 करोड़ रुपये की परियोजना

रक्षा मंत्रालय और चौगुले एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के बीच अक्टूबर 2024 में लगभग 387.44 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया था।

इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कुल छह एयर कुशन व्हीकल तैयार किए जाने हैं। H-561 इस सीरीज का पहला प्लेटफॉर्म है जिसे अब भारतीय तटरक्षक के बेड़े में शामिल किया गया है। सूत्रों के अनुसार बाकी पांच प्लेटफॉर्म भी चरणबद्ध तरीके से तैयार किए जा रहे हैं।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

भारत में कैसे बना यह प्लेटफॉर्म?

रक्षा उद्योग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इस परियोजना के लिए गोवा स्थित चौगुले शिपयार्ड में विशेष निर्माण सुविधाएं विकसित की गईं।

हॉवरक्राफ्ट निर्माण सामान्य जहाज निर्माण से अलग माना जाता है। इसके लिए तापमान नियंत्रण, विशेष असेंबली प्रक्रिया और उच्च स्तर की इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।

H-561 के निर्माण के दौरान भारतीय इंजीनियरों और तकनीशियनों ने कई नई तकनीकों पर काम किया। यही कारण है कि इस परियोजना को केवल एक प्लेटफॉर्म निर्माण कार्यक्रम नहीं बल्कि तकनीकी क्षमता निर्माण कार्यक्रम के रूप में भी देखा जा रहा है।

तकनीकी रूप से कितना खास है H-561?

रक्षा सूत्रों के अनुसार H-561 को मरीन ग्रेड एल्युमिनियम से बनाया गया है। इससे वाहन का वजन कम रहता है और समुद्री वातावरण में जंग लगने की संभावना भी कम होती है।

इस प्लेटफॉर्म का कुल वजन लगभग 30 टन के आसपास बताया जाता है। वहीं यह कई टन तक अतिरिक्त पेलोड ले जाने में सक्षम है।

इसमें बेहद ताकतवर डीजल इंजन लगाए गए हैं जो इसे तेज रफ्तार देते हैं। हालांकि इसकी सही सही रफ्तार कितनी है, इसकी जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि यह तटीय सुरक्षा अभियानों और तुरंत जवाबी कार्रवाई के लिए पर्याप्त है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

किन अभियानों में होगा इस्तेमाल?

भारतीय तटरक्षक बल के लिए यह प्लेटफॉर्म कई प्रकार के मिशनों में उपयोगी साबित होगा। सूत्रों के मुताबिक इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, तस्करी विरोधी अभियान, अवैध घुसपैठ की रोकथाम, खोज एवं बचाव अभियान और आपदा राहत कार्यों में किया जाएगा।

विशेष रूप से चक्रवात, बाढ़ और समुद्री आपदाओं के दौरान यह प्लेटफॉर्म राहत सामग्री और बचाव दल को तेजी से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

उथले पानी में सबसे ज्यादा फायदा

सामान्य जहाजों और पेट्रोल बोट्स को ऑपरेट करने के लिए पर्याप्त गहराई वाले पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन एयर कुशन व्हीकल को इसकी जरूरत नहीं होती। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

उथले पानी, समुद्र तट, दलदल, क्रीक और मैंग्रोव क्षेत्रों में यह बिना किसी परेशानी के ऑपरेट हो सकता है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों की कोस्ट गार्ड और सैन्य बल ऐसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।

समुद्री सुरक्षा चुनौतियों के बीच बढ़ी जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय तटरक्षक की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ी हैं। समुद्री तस्करी, अवैध गतिविधियां, मछुआरों की सुरक्षा, समुद्री प्रदूषण नियंत्रण और खोज एवं बचाव अभियानों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।

ऐसे में ऐसे प्लेटफॉर्म की जरूरत महसूस की जा रही थी जो कम समय में चुनौतीपूर्ण इलाकों तक पहुंच सके।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि H-561 इसी आवश्यकता को पूरा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

तटरक्षक, रक्षा मंत्रालय और उद्योग की संयुक्त पहल

इस परियोजना को भारतीय तटरक्षक, रक्षा मंत्रालय और घरेलू उद्योग के बीच सहयोग का उदाहरण माना जा रहा है।

अधिकारियों के मुताबिक परियोजना के दौरान कई सरकारी और निजी संस्थानों ने मिलकर काम किया। इसका उद्देश्य केवल एक वाहन तैयार करना नहीं था, बल्कि देश में हॉवरक्राफ्ट निर्माण क्षमता विकसित करना भी था। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

समुद्री आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम

रक्षा उत्पादन क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारत पिछले कुछ वर्षों से जहाज, गश्ती पोत, इंटरसेप्टर बोट, ऑफशोर पेट्रोल वेसल और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म का स्वदेशी निर्माण बढ़ा रहा है। अब एयर कुशन व्हीकल का निर्माण भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय तटरक्षक के लिए यह प्लेटफॉर्म तटीय निगरानी, सुरक्षा और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करने वाले नए साधनों में शामिल हो गया है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

भारत की MArG तोप पर अमेरिका का भरोसा! कल्याणी और एएम जनरल की साझेदारी से बदल सकता है 155 एमएम आर्टिलरी का बाजार

MArG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

MArG 155mm Artillery System: भारत के रक्षा उद्योग के लिए पेरिस से एक बड़ी खबर सामने आई है। भारत फोर्ज की डिफेंस युनिट कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (KSSL) और अमेरिकी सैन्य वाहन निर्माता कंपनी एएम जनरल ने एक महत्वपूर्ण स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप की घोषणा की है। दोनों कंपनियों ने यूरोसैटरी 2026 डिफेंस एक्सपो के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी का उद्देश्य दुनिया भर की सेनाओं के लिए नई पीढ़ी के मोबाइल 155 मिमी माउंटेड आर्टिलरी सिस्टम डेवलप करना और उन्हें वैश्विक बाजार में पेश करना है।

सूत्रों के मुताबिक यह समझौता भारत में डेवलप एक स्वदेशी आर्टिलरी प्लेटफॉर्म को अमेरिकी सैन्य तकनीक और वैश्विक नेटवर्क के साथ जोड़ने की कोशिश है। खास बात यह है कि इसी साझेदारी के आधार पर एएम जनरल ने अमेरिकी सेना के मोबाइल टैक्टिकल कैनन (MTC) प्रोग्राम में भी हिस्सा लेने का प्रस्ताव दिया है।

पेरिस में आयोजित यूरोसैटरी दुनिया की सबसे बड़ी डिफेंस एग्जिबिशन में गिनी जाती है। यहां दुनिया भर की कंपनियां अपने नए हथियार और सैन्य प्लेटफॉर्म पेश करती हैं। इसी मंच पर कल्याणी स्ट्रैटेजिक और एएम जनरल ने संयुक्त रूप से एलान किया कि वे आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हल्के, तेज, मजबूत और हर मौसम में काम करने वाले माउंटेड आर्टिलरी सिस्टम डेवलप करेंगे।

कंपनियों का कहना है कि आज के युद्धक्षेत्र में सिर्फ भारी मारक क्षमता काफी नहीं है। किसी भी आर्टिलरी सिस्टम को तेजी से तैनात होने, जल्दी स्थान बदलने और कठिन इलाकों में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए मल्टी टेरेन आर्टिलरी गन (MArG) प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाया जा रहा है।

MArG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

MArG 155mm Artillery System: क्या है MArG सिस्टम?

MArG एक ट्रक बेस्ड आर्टिलरी सिस्टम है जिसमें 155 मिमी की तोप को एक हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया गया है। पारंपरिक तोपों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में काफी समय लगता है। वहीं MArG को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह तेजी से किसी भी इलाके में पहुंच सके, फायरिंग कर सके और तुरंत अपनी जगह बदल सके, जिसे शूट एंड स्कूट भी कहा जाता है।

आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है क्योंकि दुश्मन का काउंटर बैटरी रडार सिस्टम कुछ ही मिनटों में तोप की लोकेशन का पता लगा सकता है। (MArG 155mm Artillery System)

अमेरिका की नजर भारतीय आर्टिलरी पर क्यों?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अमेरिकी सेना का मोबाइल टैक्टिकल कैनन प्रोग्राम माना जा रहा है। अमेरिकी सेना फिलहाल एम777 टोइड हॉवित्जर का इस्तेमाल करती है, लेकिन अब वह इससे भी ज्यादा मोबाइल और तुरंत रेस्पॉन्स देने वाले सिस्टम की तलाश में है।

एएम जनरल ने अमेरिकी सरकार को जो प्रस्ताव दिया है, उसमें कल्याणी स्ट्रैटेजिक के MArG प्लेटफॉर्म को आधार बनाया गया है। यदि यह प्रस्ताव चुना जाता है तो 2027 से इसकी डिलीवरी शुरू की जा सकती है।

भारत फोर्ज के वाइस चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित कल्याणी के मुताबिक, एएम जनरल के साथ यह साझेदारी भारत की आर्टिलरी तकनीक और क्षमताओं पर उनके भरोसे को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि कल्याणी स्ट्रैटेजिक आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एडवांस और युद्ध में परखे जा चुके सिस्टम्स डेवलप कर रही है। यह समझौता दुनिया की सेनाओं को नई पीढ़ी के प्रभावी और भरोसेमंद आर्टिलरी समाधान उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

वहीं, एएम जनरल के प्रेसिडेंट और सीईओ जॉन चैडबोर्न ने कहा कि कल्याणी स्ट्रैटेजिक के साथ काम करना दोनों कंपनियों की अपने सहयोगी देशों और सैनिकों को बेहतर सैन्य क्षमता उपलब्ध कराने की साझा प्रतिबद्धता को दिखाता है। उन्होंने कहा कि एएम जनरल की पेटेंटेड सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी को कल्याणी स्ट्रैटेजिक के आधुनिक आर्टिलरी प्लेटफॉर्म के साथ जोड़कर ऐसी नई क्षमताएं डेवलप की जाएंगी, जो बदलते युद्धक्षेत्र में सेनाओं को महत्वपूर्ण बढ़त दे सकती हैं।

रक्षा उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि किसी भारतीय निजी कंपनी के डिजाइन पर आधारित आर्टिलरी सिस्टम का अमेरिकी सेना के कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

4×4 ट्रक पर लगी 155 मिमी की भारी तोप

MArG सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसका हल्का और कॉम्पैक्ट डिजाइन है। सामान्य तौर पर 155 मिमी की तोपों को 6×6 या 8×8 मिलिट्री व्हीकल्स पर लगाया जाता है। लेकिन कल्याणी स्ट्रैटेजिक ने इसे 4×4 हाई मोबिलिटी प्लेटफॉर्म पर डेवलप किया है।

MArG-39, MArG-45 और MArG-52 इसके प्रमुख वेरिएंट हैं। इनमें कैलिबर और मारक दूरी के अनुसार अंतर है, लेकिन मूल डिजाइन समान है। कंपनी का दावा है कि MArG-52 दुनिया का सबसे हल्का 155 मिमी/52 कैलिबर माउंटेड आर्टिलरी सिस्टम है। इसका वजन लगभग 24 टन है जबकि यह 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट पर हमला कर सकता है।

MArG 155mm Artillery System
MArG 155mm Artillery System (Image Source: KSSL)

कितनी है मारक क्षमता?

कंपनी के अनुसार MArG में लगी 155 मिमी/52 कैलिबर तोप 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हाई एक्सप्लोसिव प्रोजेक्टाइल दाग सकती है।

सिस्टम अपने साथ 20 से अधिक गोले और प्रोपेलेंट चार्ज लेकर चल सकता है। जिससे फायरिंग के लिए इसे बार-बार सप्लाई वाहन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक एक्सटेंडेड रेंज गोला-बारूद के साथ इसकी मारक दूरी और बढ़ सकती है। हालांकि सटीक आंकड़े इस्तेमाल किए जाने वाले एम्युनिशन पर निर्भर करते हैं। (MArG 155mm Artillery System)

क्या है सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी?

इस साझेदारी का सबसे तकनीकी पहलू एएम जनरल की पेटेंटेड सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी (SRT) है। सामान्य भाषा में समझें तो जब कोई बड़ी तोप फायर करती है तो पीछे की ओर बहुत तेज झटका लगता है। इसे रिकॉइल कहा जाता है। इसी वजह से भारी तोपों को मजबूत और भारी प्लेटफॉर्म की जरूरत पड़ती है।

सॉफ्ट रिकॉइल टेक्नोलॉजी इस झटके को काफी हद तक कम कर देती है। इसका फायदा यह होता है कि हल्के वाहन पर भी बड़ी तोप लगाई जा सकती है। (MArG 155mm Artillery System)

पहाड़, रेगिस्तान और सीमावर्ती इलाकों के लिए उपयोगी

MArG सिस्टम को हर तरह के मौसम और इलाके में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। कंपनी का कहना है कि यह पहाड़ी क्षेत्रों, रेगिस्तानी इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

भारत जैसे देश के लिए यह महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी सीमा के कई इलाकों में भारी सैन्य वाहनों की तैनाती चुनौतीपूर्ण होती है।

MArG का हल्का डिजाइन और हाई मोबिलिटी इसे ऐसे इलाकों में उपयोगी बनाता है जहां बड़ी और भारी आर्टिलरी प्रणालियां आसानी से नहीं पहुंच पातीं। (MArG 155mm Artillery System)

शूट एंड स्कूट क्षमता क्यों है अहम?

यूक्रेन युद्ध और हाल के कई संघर्षों ने दिखाया है कि आर्टिलरी की लोकेशन बहुत जल्दी ट्रैक की जा सकती है।

इसी वजह से दुनिया की सेनाएं ऐसी तोपें चाहती हैं जो फायरिंग के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकें। इसे शूट एंड स्कूट क्षमता कहा जाता है।

MArG को इसी सिद्धांत पर डेवलप किया गया है। यह कम समय में फायरिंग कर सकती है और फिर तेजी से नई लोकेशन पर पहुंच सकती है। (MArG 155mm Artillery System)

भारतीय सेना के पास नहीं, लेकिन आर्मेनिया के पास है MArG

सूत्रों के मुताबिक MArG सिस्टम को भारतीय सेना के लिए आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत विकसित किया गया था। 2021 में लॉन्चिंग के बाद MArG 155-BR ने लद्दाख और अन्य हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में कई ट्रायल्स पूरे किए। सूत्रों का कहना है कि इन परीक्षणों के दौरान सिस्टम ने अपनी मोबिलिटी और फायरपावर का प्रदर्शन किया था।

दिलचस्प बात यह है कि भारत फोर्ज और कल्याणी समूह को भारतीय सेना से एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) के लिए बड़ा ऑर्डर मिल चुका है। करीब 184 ATAGS गन भारतीय सेना के लिए खरीदी जा रही हैं। लेकिन MArG, जो उसी तकनीकी परिवार का ट्रक-माउंटेड और ज्यादा मोबाइल वर्जन माना जाता है, अभी सेना में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुआ है।

फिलहाल MArG को ट्रायल, इवैल्यूएशन और एक्सपोर्ट मार्केट पर केंद्रित प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है। कंपनी को आर्मेनिया से 72 MArG 155-BR सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिल चुका है। रक्षा उद्योग के आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ सालों में कल्याणी स्ट्रैटेजिक भारत के सबसे सफल निजी रक्षा निर्यातकों में शामिल हो गई है।

रक्षा बाजार के जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में मोबाइल आर्टिलरी की मांग तेजी से बढ़ रही है। फ्रांस की सीजर, स्वीडन की आर्चर और दक्षिण कोरिया के कई सिस्टम्सपहले से इस बाजार में मौजूद हैं। अब कल्याणी स्ट्रैटेजिक और एएम जनरल की साझेदारी इसी बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। (MArG 155mm Artillery System)

Explainer: ब्रह्मोस में बड़ा बदलाव! अब रूस नहीं, भारत बनाएगा मिसाइल का सबसे खतरनाक हिस्सा, समझिए क्यों है यह मील का पत्थर

Indigenous BrahMos Warhead

Indigenous BrahMos Warhead: भारत के सबसे ताकतवर हथियारों में शामिल ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को लेकर आज एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल होने जा रही है। नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (एसडीएएल) पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल के लिए पूरी तरह स्वदेशी वारहेड की डिलीवरी करेगी। सूत्रों के मुताबिक यह केवल एक मिसाइल कंपोनेंट की डिलीवरी नहीं है, बल्कि भारत के मिसाइल स्वदेशीकरण कार्यक्रम में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

खास बात यह है कि एसडीएएल इसी कार्यक्रम के तहत अपने यहां निर्मित 100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी करेगा। कंपनी ने पहले मिसाइल को उड़ाने वाले सिस्टम में महारत हासिल की, वही अब टारगेट को नष्ट करने वाले सबसे संवेदनशील हिस्से का निर्माण भी कर रही है।

अब तक ब्रह्मोस कार्यक्रम में कई हिस्सों का स्वदेशीकरण हो चुका है, लेकिन वारहेड उन चुनिंदा तकनीकों में शामिल था जहां विदेशी निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

बता दें कि अभी तक वारहेड की मुख्य सप्लाई अभी भी रूस से हो रही थी। (Indigenous BrahMos Warhead)

Indigenous BrahMos Warhead: क्या होता है वारहेड?

आम भाषा में समझें तो किसी भी मिसाइल के दो सबसे महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। पहला उसे टारगेट तक पहुंचाने वाला सिस्टम और दूसरा टारगेट को नष्ट करने वाला सिस्टम।

ब्रह्मोस मिसाइल में बूस्टर और इंजन उसे तेज रफ्तार से टारगेट तक पहुंचाते हैं। लेकिन असली विनाशकारी ताकत वारहेड में होती है। यही वह हिस्सा है जो टारगेट से टकराने के बाद विस्फोट करता है और दुश्मन के जहाज, बंकर, कमांड सेंटर या अन्य सैन्य ठिकानों को नष्ट करता है।

यदि मिसाइल को एक तेज रफ्तार व्हीकल माना जाए तो वारहेड उसका सबसे घातक हथियार होता है। यही वजह है कि वारहेड तकनीक को दुनिया के सबसे संवेदनशील रक्षा क्षेत्रों में गिना जाता है।

ब्रह्मोस की ताकत का असली राज

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है। इसकी गति मैक 2.8 से मैक 3.5 के बीच है। यानी यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भर सकती है।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित यह मिसाइल जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च की जा सकती है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इसकी अलग-अलग वेरिएंट का इस्तेमाल करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की क्षमताओं की चर्चा हुई थी। इसके बाद से इस मिसाइल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रुचि बढ़ी है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्यों महत्वपूर्ण है स्वदेशी वारहेड?

रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ सालों में भारत ने ब्रह्मोस के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण किया है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और कई अन्य सब-सिस्टम अब भारत में बनाए जा रहे हैं।

हालांकि वारहेड तकनीक सबसे मुश्किल मानी जाती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटकों, विशेष धातुओं, फ्यूजिंग सिस्टम, सुरक्षा तंत्र और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।

इसी कारण लंबे समय तक ब्रह्मोस कार्यक्रम में इस क्षेत्र में विदेशी सहयोग बना रहा। अब एसडीएएल के बनाए वारहेड को भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मिसाइल कार्यक्रम में पूर्ण आत्मनिर्भरता तभी मानी जाती है जब उसके सभी महत्वपूर्ण हिस्से देश के भीतर विकसित और निर्मित किए जा सकें। (Indigenous BrahMos Warhead)

भारत ने ब्रह्मोस का वारहेड देश में बनाने का फैसला क्यों लिया?

रक्षा सूत्रों के अनुसार ब्रह्मोस मिसाइल का वारहेड उन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है जो टारगेट को वास्तविक नुकसान पहुंचाते हैं। अब तक इस क्षेत्र में भारत को विदेशी तकनीक और सप्लाई पर कुछ हद तक निर्भर रहना पड़ता था। यही वजह है कि सरकार और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी एजेंसियों ने वारहेड के स्वदेशीकरण पर जोर दिया।

सूत्रों का कहना है कि किसी भी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में विदेशी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यदि मिसाइल के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए दूसरे देश पर निर्भरता हो, तो ऑपरेशनल जरूरतों पर असर पड़ सकता है। देश में वारहेड बनने से यह निर्भरता कम होगी और सप्लाई अधिक सुरक्षित बनेगी।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ब्रह्मोस मिसाइल के कई हिस्सों का स्वदेशीकरण पहले ही किया जा चुका है। लॉन्चर, एयरफ्रेम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और बूस्टर जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट अब भारत में बनाए जा रहे हैं। हालांकि वारहेड सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सों में शामिल था। इसलिए इसका देश में विकसित होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

सूत्र बताते हैं कि वारहेड तकनीक में उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटक, विशेष धातुएं, फ्यूजिंग सिस्टम और सटीक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है। यही कारण है कि दुनिया के बहुत कम देश इस तकनीक में पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।

2018 में हुआ था ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी समझौता

नागपुर में सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल के मुताबिक, कंपनी ने साल 2018 में ब्रह्मोस मिसाइल के लिए आवश्यक तकनीक का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) हासिल किया था। इसके बाद कंपनी ने सिर्फ 14 महीनों के भीतर इस तकनीक को पूरी तरह समझ लिया और उत्पादन के लिए खुद को तैयार कर लिया।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का जाइंट प्रोजेक्ट है। इसी कारण वर्ष 2022 में रूस और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के वैज्ञानिक उनकी फैक्ट्री का निरीक्षण करने पहुंचे थे। वैज्ञानिकों ने उत्पादन प्रक्रिया, तकनीकी क्षमताओं और गुणवत्ता मानकों का अध्ययन किया। सभी परीक्षण और निरीक्षण पूरे होने के बाद सितंबर 2022 में कंपनी को अंतिम मंजूरी मिल गई।

नुवाल के मुताबिक, ब्रह्मोस कार्यक्रम की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए अब उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। अगस्त से कंपनी ने सालाना 12 यूनिट उत्पादन की क्षमता तैयार कर ली है और हर महीने उत्पादन क्षमता में और वृद्धि की जा रही है।

उन्होंने भरोसा जताया कि यदि इस वर्ष 150 यूनिट तक उत्पादन का लक्ष्य रखा जाता है, तो कंपनी उसे आसानी से पूरा कर सकेगी।

कैसे काम करता है ब्रह्मोस का वारहेड?

ब्रह्मोस के सामान्य संस्करण में लगभग 200 किलोग्राम का वारहेड लगाया जाता है। वहीं एयर लॉन्च वेरिएंट ब्रह्मोस-ए में यह क्षमता लगभग 300 किलोग्राम तक पहुंच जाती है।

सूत्रों के अनुसार यह सेमी-आर्मर पियर्सिंग हाई एक्सप्लोसिव डिजाइन पर बेस्ड है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल पहले टारगेट की बाहरी सुरक्षा या कवच को भेदती है और उसके बाद अंदर जाकर विस्फोट करती है।

यदि टारगेट कोई युद्धपोत हो तो वारहेड जहाज के डेक या स्ट्रक्चर को भेदकर अंदर विस्फोट कर सकता है। इसी तरह यदि टारगेट कोई मजबूत बंकर या कमांड सेंटर हो तो यह उसकी सुरक्षा परतों को पार करने के बाद अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।

यही तकनीक इसे सामान्य विस्फोटक हथियारों से अलग बनाती है। (Indigenous BrahMos Warhead)

क्या है एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन?

एसडीएएल के स्वदेशी वारहेड को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार इसमें एडवांस्ड सीकर इंटीग्रेशन और बेहतर टारगेट एंगेजमेंट क्षमताओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।

सीकर किसी भी आधुनिक मिसाइल का वह हिस्सा होता है जो अंतिम चरण में टारगेट की पहचान करता है और मिसाइल को सही दिशा में मार्गदर्शन देता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक ब्रह्मोस में मिड-कोर्स गाइडेंस के लिए इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट आधारित सिस्टम का उपयोग किया जाता है। जबकि अंतिम चरण में एक्टिव रडार सीकर टारगेट को लॉक करता है।

नई स्वदेशी क्षमता का उद्देश्य मिसाइल की सटीकता और प्रभावशीलता को और मजबूत करना बताया जा रहा है।

टेस्टिंग के लिए नागपुर से जाएगा चंडीगढ़

सूत्रों के अनुसार डिलीवरी मिलने के बाद वारहेड को चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) भेजा जाएगा। टीबीआरएल देश की प्रमुख रक्षा अनुसंधान प्रयोगशालाओं में शामिल है। यहां वारहेड के विभिन्न तकनीकी परीक्षण किए जाएंगे।

इन परीक्षणों में सुरक्षा, विश्वसनीयता, विस्फोटक प्रदर्शन, टर्मिनल इफेक्ट और ऑपरेशनल इफेक्टिवनेस जैसे कई पहलुओं की जांच की जाएगी। जब तक यह सभी ट्रायल्स पूरे नहीं होते, तब तक किसी भी नए वारहेड को पूर्ण ऑपरेशनल मंजूरी नहीं दी जाती। (Indigenous BrahMos Warhead)

100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी

वहीं, एसडीएएल अपने यहां निर्मित 100वें ब्रह्मोस बूस्टर की भी डिलीवरी कर रहा है। बूस्टर वह हिस्सा होता है जो लॉन्च के बाद मिसाइल को शुरुआती तेज रफ्तार देता है। इसके बाद मिसाइल का मुख्य इंजन सक्रिय होता है और वह टारगेट की ओर बढ़ती है।

रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 100 बूस्टर का निर्माण इस बात का संकेत है कि निजी क्षेत्र अब ब्रह्मोस जैसी रणनीतिक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका

एक समय ऐसा था जब देश के अधिकांश रणनीतिक हथियार कार्यक्रमों में सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का दबदबा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

एसडीएएल इसका प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। कंपनी पहले मिसाइल बूस्टर और अन्य रक्षा प्रणालियों के निर्माण में सक्रिय थी। अब वारहेड जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश करना इसकी तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

रक्षा मंत्रालय द्वारा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर दिए जा रहे जोर का असर अब कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों में दिखाई देने लगा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

ब्रह्मोस-एनजी और अन्य मिसाइल कार्यक्रमों को भी मिलेगा फायदा

ब्रह्मोस वारहेड कार्यक्रम में मिली सफलता का असर अन्य भारतीय मिसाइल कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। भारत इस समय ब्रह्मोस-एनजी, अस्त्र, प्रलय, रुद्रम और एलआर-एलएसीएम जैसी कई एडवांस मिसाइल परियोजनाओं पर काम कर रहा है।

इन कार्यक्रमों में भी उच्च तकनीक वाले वारहेड, गाइडेंस सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण सब-सिस्टम की जरूरत होती है। ऐसे में घरेलू उद्योग की बढ़ती क्षमता पूरे रक्षा इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वहीं, ब्रह्मोस अब केवल भारतीय सशस्त्र बलों तक सीमित नहीं है। फिलीपींस को इसकी आपूर्ति शुरू हो चुकी है, जबकि कई अन्य देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जब किसी हथियार प्रणाली के अधिक से अधिक हिस्से देश के भीतर बनते हैं तो उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन दोनों मजबूत होती हैं। इसी कारण स्वदेशी वारहेड का विकास ब्रह्मोस कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। (Indigenous BrahMos Warhead)

रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला: 62 हजार OFB कर्मचारी चुन सकेंगे कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज या केंद्रीय कर्मचारी का दर्जा

Defence Ministry OFB employees
Image Source: Ministry of Defence

Defence Ministry OFB employees: रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे करीब 62 हजार कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। पूर्व ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) के कॉर्पोरेटाइजेशन के लगभग पांच साल बाद आखिरकार सरकार ने कर्मचारियों के भविष्य को लेकर लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता को खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग (डीडीपी) ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर बताया है कि ओएफबी से बनी सातों डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (डीपीएसयू) में कर्मचारियों के लिए कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज लागू किया जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक 11 जून को हुई एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (ईजीओएम) की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसके बाद 15 जून को डिफेंस प्रोडक्शन डिपार्टमेंट ने इसका औपचारिक आदेश जारी किया। इस फैसले के तहत कर्मचारियों को दो विकल्प दिए जाएंगे। पहला, वे संबंधित डीपीएसयू में स्थायी रूप से एब्जॉर्प्शन स्वीकार कर सकते हैं। दूसरा, यदि वे एब्जॉर्प्शन नहीं चुनना चाहते तो उन्हें रिटायर होने तक डीम्ड डेपुटेशन पर रखा जाएगा और वे केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के रूप में अपनी मौजूदा सुविधाएं प्राप्त करते रहेंगे।

इस फैसले को 2021 में हुए ओएफबी कॉर्पोरेटाइजेशन के बाद पैदा हुई सबसे बड़ी कर्मचारी चिंता का समाधान भी माना जा रहा है। पिछले पांच सालों से कर्मचारी संगठनों, यूनियनों और विभिन्न कर्मचारी मंचों की सबसे बड़ी मांग यही थी कि कर्मचारियों को स्पष्ट रूप से यह बताया जाए कि उनका भविष्य क्या होगा और क्या वे केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा बनाए रख पाएंगे।

Defence Ministry OFB employees: क्या थी कर्मचारियों की चिंता की वजह?

जब अक्टूबर 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड को भंग कर उसकी 41 प्रोडक्शन युनिट्स को सात नए डिफेंस पीएसयू में बदला गया था, तब हजारों कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल उनकी सेवा शर्तों को लेकर था। उस समय कर्मचारियों को सामूहिक रूप से नए डीपीएसयू में डीम्ड डेपुटेशन पर भेजा गया था। शुरुआत में यह व्यवस्था दो साल के लिए थी, लेकिन बाद में इसे कई बार बढ़ाया गया।

सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों को सबसे ज्यादा चिंता पेंशन, मेडिकल सुविधाओं, करियर प्रोग्रेशन, सीएसडी कैंटीन, सेलरी स्ट्रक्चर और नौकरी की सुरक्षा को लेकर थी। कई यूनियनों ने आशंका जताई थी कि स्थायी एब्जॉर्प्शन की स्थिति में कर्मचारियों की कुछ केंद्रीय सरकारी सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह थी कि कॉर्पोरेटाइजेशन के पांच साल बाद भी बड़ी संख्या में कर्मचारी अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे थे।

अब जारी आदेश में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जो कर्मचारी एब्जॉर्प्शन नहीं चुनेंगे, वे रिटायरमेंट तक केंद्रीय सरकार के कर्मचारी बने रहेंगे और उन पर केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू सभी नियम, वेतनमान, भत्ते, छुट्टी, मेडिकल सुविधाएं और सेवा शर्तें लागू रहेंगी। (Defence Ministry OFB employees)

पांच साल पुरानी अनिश्चितता खत्म करने की कोशिश

रक्षा मंत्रालय के भीतर पिछले कई वर्षों से कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता उनकी सेवा शर्तों को लेकर थी। ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन के बाद कर्मचारियों को नई कंपनियों में भेज तो दिया गया था, लेकिन स्थायी एब्जॉर्प्शन और केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा बनाए रखने को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई थी।

कई कर्मचारी संगठनों और यूनियनों का कहना था कि जब तक सरकार स्पष्ट रूप से यह नहीं बताएगी कि कर्मचारियों को क्या विकल्प मिलेंगे, तब तक असमंजस बना रहेगा। अब जारी आदेश में पहली बार सरकार ने साफ कर दिया है कि कर्मचारियों को अपनी पसंद का विकल्प चुनने का अवसर दिया जाएगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें किसी कर्मचारी पर अनिवार्य एब्जॉर्प्शन नहीं थोपा गया है। कर्मचारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे नई डीपीएसयू कंपनी में स्थायी रूप से शामिल होना चाहते हैं या केंद्रीय सरकार के कर्मचारी के रूप में अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखना चाहते हैं। (Defence Ministry OFB employees)

246 साल पुरानी संस्था थी ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड

ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड भारतीय डिफेंस प्रोडक्शन सिस्टम की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक था। इसकी शुरुआत वर्ष 1775 में कोलकाता के काशीपुर क्षेत्र में हुई थी। समय के साथ यह देश का सबसे बड़ा सरकारी रक्षा उत्पादन नेटवर्क बन गया।

ओएफबी के तहत 41 उत्पादन इकाइयां काम करती थीं, जहां छोटे हथियार, गोला-बारूद, टैंक, बख्तरबंद वाहन, तोपें, पैराशूट, ऑप्टिकल उपकरण, सैनिकों की वर्दियां और अन्य सैन्य सामग्री तैयार की जाती थी।

रक्षा उत्पादन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि दशकों तक ओएफबी भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने वाली मुख्य संस्था रही। हालांकि समय के साथ दक्षता, लागत, प्रतिस्पर्धा और आधुनिकीकरण को लेकर सवाल उठने लगे थे। इसी के बाद सरकार ने इसे कॉर्पोरेट मॉडल में बदलने का फैसला लिया। (Defence Ministry OFB employees)

सात नई कंपनियों में बांटी गई थीं 41 फैक्ट्रियां

1 अक्टूबर 2021 से ओएफबी की 41 प्रोडक्शन यूनिट्स को सात नई डिफेंस पीएसयू में ट्रांसफर कर दिया गया। म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड को गोला-बारूद और विस्फोटक उत्पादन की जिम्मेदारी मिली। आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड को टैंक और बख्तरबंद वाहन निर्माण का काम दिया गया।

इसी तरह एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड को आधुनिक हथियार प्रणालियों की जिम्मेदारी मिली, जबकि यंत्रा इंडिया लिमिटेड मशीन टूल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों पर केंद्रित हुई। वहीं, इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड को ऑप्टिकल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम मिले। ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड सैनिकों के कपड़े और उपकरण तैयार करने लगी, जबकि ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड को पैराशूट और एयरड्रॉप सिस्टम का काम सौंपा गया।

रक्षा मंत्रालय का उद्देश्य इन कंपनियों को अधिक स्वायत्तता देकर उन्हें प्रतिस्पर्धी और व्यावसायिक रूप से सक्षम बनाना था।

क्या कहा गया है नए आदेश में?

15 जून को जारी ऑफिस मेमोरेंडम में कहा गया है कि सातों नई डीपीएसयू द्वारा तैयार किया गया कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज सभी पात्र कर्मचारियों को पेश किया जाएगा। इसमें ओएफ स्कूल और ओएफ अस्पतालों के कर्मचारी शामिल नहीं होंगे।

आदेश के अनुसार पूर्ववर्ती ओएफबी के सभी कर्मचारियों से पूछा जाएगा कि वे नई डीपीएसयू में स्थायी एब्जॉर्प्शन चाहते हैं या नहीं। इसमें वे कर्मचारी भी शामिल होंगे जो फिलहाल अन्य मंत्रालयों या विभागों में प्रतिनियुक्ति पर काम कर रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि जो कर्मचारी एब्जॉर्प्शन का विकल्प नहीं चुनेंगे, उन्हें रिटायरमेंट तक डीम्ड डेपुटेशन पर रखा जाएगा। ऐसे कर्मचारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों पर लागू सभी नियमों, वेतनमान, भत्तों, छुट्टियों, मेडिकल सुविधाओं और करियर प्रोग्रेशन के अधिकारों के तहत काम करते रहेंगे। (Defence Ministry OFB employees)

डीम्ड डेपुटेशन का क्या मतलब है?

डीम्ड डेपुटेशन का अर्थ है कि कर्मचारी तकनीकी रूप से केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बना रहता है लेकिन उसका कार्यस्थल किसी अन्य संगठन में होता है।

रक्षा मंत्रालय के आदेश के मुताबिक ऐसे कर्मचारियों को केंद्रीय सरकारी सेवा नियमों के तहत मिलने वाली सुविधाएं जारी रहेंगी। इसका मतलब है कि उनकी सेवा शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी और वे सरकारी कर्मचारी के रूप में माने जाएंगे।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यही वह बिंदु है जिसकी मांग कर्मचारी संगठन लंबे समय से कर रहे थे। (Defence Ministry OFB employees)

अभी तक सामने नहीं आईं पैकेज की पूरी शर्तें

हालांकि सरकार ने कॉमन एब्जॉर्प्शन पैकेज की घोषणा कर दी है, लेकिन इसकी विस्तृत शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं।

आधिकारिक आदेश में केवल इतना कहा गया है कि सातों डीपीएसयू ने मिलकर एक समान पैकेज तैयार किया है। लेकिन इसमें वेतन सुरक्षा, पेंशन व्यवस्था, मेडिकल सुविधाएं, प्रमोशन पॉलिसी और अन्य लाभों का विस्तृत विवरण शामिल नहीं है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार कर्मचारियों से विकल्प मांगने से पहले पैकेज का पूरा विवरण साझा किया जाएगा ताकि वे दोनों विकल्पों की तुलना कर सकें। (Defence Ministry OFB employees)

यूनियनों ने किया इस फैसले का स्वागत

कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (एआईडीईएफ) सहित कई संगठनों का कहना है कि यह लंबे समय से चल रही मांगों का परिणाम है।

यूनियन नेताओं का तर्क रहा है कि कर्मचारियों को अपनी पसंद का विकल्प मिलना चाहिए और किसी पर भी एब्जॉर्प्शन थोपा नहीं जाना चाहिए। कई संगठनों ने केंद्रीय सरकारी कर्मचारी का दर्जा बनाए रखने के विकल्प को महत्वपूर्ण बताया है।

हालांकि कुछ यूनियनें अब भी ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन को लेकर अपनी पुरानी आपत्तियां दोहरा रही हैं और इस विषय पर अलग रुख रखती हैं। (Defence Ministry OFB employees)

31 मार्च 2027 तक बढ़ाया गया ट्रांजिशन पीरियड

सरकार ने केवल विकल्प देने का फैसला ही नहीं किया है बल्कि ट्रांजिशन पीरियड भी बढ़ाया है। आदेश के अनुसार 1 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027 तक सभी कर्मचारियों का ट्रांसफर और डीम्ड डेपुटेशन पहले की शर्तों पर जारी रहेगा।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस अवधि के दौरान कर्मचारियों को पैकेज समझने, विकल्प चुनने और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा। (Defence Ministry OFB employees)

रक्षा उत्पादन व्यवस्था से भी जुड़ा है फैसला

रक्षा क्षेत्र के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल कर्मचारियों से जुड़ा फैसला नहीं है। ओएफबी से बनी कंपनियां आज भारतीय रक्षा उत्पादन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गोला-बारूद, हथियार, बख्तरबंद वाहन, ऑप्टिकल सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों के उत्पादन में इन कंपनियों की बड़ी भूमिका है।

इसी वजह से कर्मचारियों की स्थिति को लेकर स्पष्टता लाना जरूरी माना जा रहा था। पिछले कुछ सालों में इन कंपनियों ने कई बड़े डिफेंस ऑर्डर पूरे किए हैं और सेना, वायुसेना तथा नौसेना के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म और उपकरण तैयार किए हैं। (Defence Ministry OFB employees)

भारत ने रचा नया इतिहास! डिफेंस प्रोडक्शन पहुंचा 1.78 लाख करोड़ रुपये के पार, दुनिया खरीद रही भारतीय हथियार

India Defence Production 2025-26
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

India Defence Production 2025-26: भारत ने डिफेंस प्रोडक्शन के क्षेत्र में एक नया रिकॉर्ड बना दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल डिफेंस प्रोडक्शन बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक रक्षा उत्पादन है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा करीब 1.54 लाख करोड़ रुपये था। यानी एक साल के भीतर डिफेंस प्रोडक्शन में 15.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में स्वदेशी रक्षा निर्माण, निजी उद्योग की बढ़ती भागीदारी और सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति ने उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि अब भारत केवल अपनी सेनाओं की जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों को रक्षा उपकरण भी निर्यात कर रहा है।

India Defence Production 2025-26: रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश का डिफेंस प्रोडक्शन नई ऊंचाइयों पर पहुंचा है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और डिफेंस प्रोडक्शन विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी उद्योगों के सामूहिक प्रयासों को श्रेय दिया।

उन्होंने कहा कि डिफेंस प्रोडक्शन में लगातार बढ़ोतरी देश के विस्तारित रक्षा औद्योगिक आधार का संकेत है। उनके अनुसार स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ने से भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता भी मजबूत हुई है। (India Defence Production 2025-26)

पांच साल में दोगुने से ज्यादा हुआ डिफेंस प्रोडक्शन

रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का कुल डिफेंस प्रोडक्शन 84,643 करोड़ रुपये था। उस समय से लेकर अब तक उत्पादन में 110 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

अगर एक दशक पीछे जाएं तो तस्वीर और भी दिलचस्प नजर आती है। वित्त वर्ष 2013-14 में देश का स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्शन केवल 43,746 करोड़ रुपये था। वर्तमान आंकड़े को देखें तो पिछले 12 सालों में यह लगभग चार गुना बढ़ चुका है।

रक्षा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार यह वृद्धि केवल बड़े प्लेटफॉर्म्स की वजह से नहीं हुई है। इसके पीछे हजारों छोटे और मध्यम उद्योगों का नेटवर्क भी काम कर रहा है, जो मिसाइल, रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, गोला-बारूद और विभिन्न सब-सिस्टम्स का निर्माण कर रहे हैं। (India Defence Production 2025-26)

सरकारी कंपनियों का दबदबा, लेकिन निजी क्षेत्र तेजी से बढ़ा

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल डिफेंस प्रोडक्शन में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों और अन्य सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत रही। वहीं निजी क्षेत्र का योगदान 24 फीसदी तक पहुंच गया।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले वित्त वर्ष में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत थी। अब यह बढ़कर अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।

सूत्रों के मुताबिक निजी क्षेत्र का कुल उत्पादन लगभग 42,000 करोड़ रुपये रहा। रक्षा उद्योग में काम कर रही निजी कंपनियों ने मिसाइल सिस्टम, ड्रोन, एयरोस्पेस कंपोनेंट्स, आर्टिलरी सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ वर्ष पहले तक देश का अधिकांश रक्षा उत्पादन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल), मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (एमडीएल), गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) और आयुध निर्माणी नेटवर्क जैसी सरकारी संस्थाओं पर निर्भर था। लड़ाकू विमान, मिसाइल, युद्धपोत, रडार और गोला-बारूद उत्पादन में सरकारी क्षेत्र की भूमिका सबसे बड़ी थी।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है। अब लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अदाणी डिफेंस, भारत फोर्ज, महिंद्रा डिफेंस और आदित्य बिड़ला समूह जैसी निजी कंपनियां बड़े रक्षा कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी हैं। ये कंपनियां केवल पार्ट्स सप्लाई करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मिसाइल लॉन्चर, आर्टिलरी सिस्टम, ड्रोन, बख्तरबंद वाहन, एयरोस्पेस स्ट्रक्चर, रडार और नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

सूत्रों का कहना है कि निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने रक्षा उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने में मदद की है। इसके साथ ही रक्षा उद्योग का पूरा सप्लाई चेन नेटवर्क भी मजबूत हुआ है। वर्तमान में 16,000 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) डिफेंस प्रोडक्शन इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। ये कंपनियां सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल, केबलिंग सिस्टम, मैकेनिकल पार्ट्स, कंपोजिट स्ट्रक्चर, प्रिसिजन इंजीनियरिंग कंपोनेंट्स और विभिन्न सब-सिस्टम्स का निर्माण कर रही हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आज किसी भी आधुनिक मिसाइल, रडार, युद्धपोत या लड़ाकू विमान के निर्माण में हजारों छोटे-बड़े कंपोनेंट्स की जरूरत होती है। इनमें से बड़ी संख्या अब देश के भीतर ही तैयार की जा रही है। यही कारण है कि निजी उद्योग और एमएसएमई सेक्टर को भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। (India Defence Production 2025-26)

रक्षा निर्यात ने भी बनाया नया रिकॉर्ड

डिफेंस प्रोडक्शन में आई तेजी का असर निर्यात पर भी साफ दिखाई दे रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह भी देश के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात आंकड़ा है। वित्त वर्ष 2013-14 में निर्यात मात्र 686 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 62.66 फीसदी बढ़ा है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारतीय रक्षा उद्योग अब केवल घरेलू जरूरतों के लिए उत्पादन नहीं कर रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना रहा है।

सूत्रों के मुताबिक भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पादों में मिसाइल सिस्टम, रॉकेट, गोला-बारूद, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, नौसैनिक उपकरण, ड्रोन और विभिन्न रक्षा प्लेटफॉर्म शामिल हैं। (India Defence Production 2025-26)

आर्मेनिया के साथ 16,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदे

भारत का रक्षा निर्यात अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच चुका है। इनमें फुल वेपन सिस्टम्स के अलावा छोटे कंपोनेंट्स भी शामिल हैं। पिछले कुछ सालों में आर्मेनिया, फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया, अमेरिका, फ्रांस और कई अन्य देशों ने भारतीय डिफेंस प्रोडक्ट्स में रुचि दिखाई है।

आर्मेनिया इस समय भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण रक्षा ग्राहक बनकर उभरा है। वर्ष 2020 के बाद से दोनों देशों के बीच करीब 1.5 से 2 अरब डॉलर यानी लगभग 12,000 से 16,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदे हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आर्मेनिया लंबे समय तक रूसी हथियारों पर निर्भर रहा, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बाद उसने भारत की ओर रुख किया। (India Defence Production 2025-26)

आर्मेनिया भारत से पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना। वर्ष 2022 में लगभग 245 मिलियन डॉलर के इस सौदे ने भारतीय रक्षा निर्यात के लिए नया अध्याय खोला। आर्मेनिया में पिनाका को “शांत” नाम से जाना जाता है। इसकी लंबी मारक क्षमता और कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागने की क्षमता को वहां की सेना ने महत्वपूर्ण माना है।

इसके अलावा आकाश-1एस एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का पहला विदेशी ग्राहक भी आर्मेनिया ही बना। लगभग 25 किलोमीटर की इंटरसेप्शन रेंज वाला यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन को निशाना बनाने में सक्षम माना जाता है। इसके साथ ही एटीएजीएस 155 एमएम हॉवित्जर, एमएआरजी 155 ट्रक माउंटेड सेल्फ प्रोपेल्ड गन सिस्टम, स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार, जेडएडीएस काउंटर ड्रोन सिस्टम, एंटी टैंक मिसाइल, मोर्टार, आर्टिलरी शेल, बुलेटप्रूफ जैकेट और नाइट विजन उपकरण भी आर्मेनिया को निर्यात किए गए हैं। आर्मेनिया ने अपनी सैन्य परेड में इन भारतीय प्रणालियों को प्रमुखता से प्रदर्शित भी किया है। (India Defence Production 2025-26)

फिलीपींस-वियतनाम ने खरीदी ब्रह्मोस, इंडोनेशिया कतार में

दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच फिलीपींस भी भारत के प्रमुख रक्षा ग्राहकों में शामिल हो चुका है। फिलीपींस ने भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया, जिसे भारतीय रक्षा उद्योग का अब तक का सबसे बड़ा मिसाइल निर्यात सौदा माना जाता है। जनवरी 2022 में करीब 375 मिलियन डॉलर के इस समझौते के तहत तीन मिसाइल बैटरियां, लॉन्चर और सपोर्ट उपकरण शामिल हैं। पहला बैच अप्रैल 2024 में भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए पहुंचाया गया था, जबकि दूसरा बैच अप्रैल 2025 में डिलीवर किया गया।

वियतनाम भी भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बनकर उभरा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार वियतनाम ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम के लिए भारत के साथ लगभग 620 से 629 मिलियन डॉलर का समझौता किया है। इससे पहले भारत वियतनाम को हाई स्पीड गार्ड बोट्स भी उपलब्ध करा चुका है।

इंडोनेशिया भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीद प्रक्रिया के अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके अलावा भारत पहले ही इंडोनेशिया को 40 एमएम नेवल गन सिस्टम उपलब्ध करा चुका है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भारतीय रक्षा उत्पादों को किफायती और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रहे हैं। (India Defence Production 2025-26)

अमेरिका एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का खरीदार

अमेरिका की बात करें तो वह भारत से पूर्ण हथियार प्रणालियों की तुलना में एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का बड़ा खरीदार है। हैदराबाद स्थित टाटा-बोइंग एयरोस्पेस फैसिलिटी में बने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर के फ्यूजलाज, विंग्स और अन्य संरचनात्मक हिस्से अमेरिका भेजे जाते हैं। इसके अलावा सी-130 और एफ-16 जैसे विमानों के कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स भी भारत में तैयार होकर वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बन रहे हैं।

फ्रांस भी भारत से हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और विभिन्न एयरोस्पेस कंपोनेंट्स प्राप्त करता है। वहीं म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और अन्य देशों को डोर्नियर-228 विमान, रडार, आर्टिलरी सिस्टम, आर्मर्ड व्हीकल्स, एम्युनिशन और अन्य सैन्य उपकरणों का निर्यात किया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय हथियार प्रणालियों की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं। भारतीय सिस्टम पश्चिमी देशों के समान प्लेटफॉर्म्स की तुलना में अधिक किफायती माने जाते हैं। इसके अलावा भारत तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और अपेक्षाकृत तेज डिलीवरी पर भी जोर दे रहा है। यही वजह है कि अब भारत केवल कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स का निर्यातक नहीं रहा, बल्कि ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे पूर्ण हथियार सिस्टम्स को भी वैश्विक बाजार में स्थापित कर चुका है। (India Defence Production 2025-26)

पिछले 12 सालों में इन नीतियों ने बदले हालात

रक्षा उत्पादन में आई इस रिकॉर्ड वृद्धि के पीछे केवल बढ़ती मांग नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में लागू की गई कई महत्वपूर्ण नीतियां भी हैं। रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सरकार ने पिछले 12 सालों के दौरान ऐसे कई फैसले लिए, जिन्होंने घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत आधार प्रदान किया। (India Defence Production 2025-26)

सबसे महत्वपूर्ण कदमों में सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची को माना जाता है। इसके तहत 4,500 से अधिक रक्षा उपकरणों, हथियार प्रणालियों और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स को आयात प्रतिबंधित सूची में शामिल किया गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि भारतीय सेनाओं की भविष्य की जरूरतों के लिए घरेलू उद्योग को उत्पादन के अवसर मिलने लगे। मिसाइल, रडार, गोला-बारूद, सेंसर, संचार प्रणाली और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में भारतीय कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी।

विदेशी निवेश नीति में किए गए बदलावों ने भी रक्षा क्षेत्र को रफ्तार दी। सरकार ने 74 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी, जबकि विशेष मामलों में सरकारी मंजूरी के जरिए 100 प्रतिशत तक एफडीआई का रास्ता खोला गया। रक्षा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार इससे विदेशी कंपनियों की तकनीक, पूंजी और विशेषज्ञता भारतीय उद्योग तक पहुंची, जिससे कई संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा मिला।

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं। अक्टूबर 2025 तक इन दोनों रक्षा औद्योगिक गलियारों में लगभग 9,145 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा चुका था। इसके अलावा 289 से अधिक समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए और करीब 66,423 करोड़ रुपये की संभावित औद्योगिक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम शुरू हुआ। इन कॉरिडोर में एयरोस्पेस, मिसाइल सिस्टम, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और विभिन्न सैन्य उपकरणों के निर्माण की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। (India Defence Production 2025-26)

वहीं, डिफेंस इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस यानी आईडेक्स कार्यक्रम भी शुरू किया गया। इस पहल ने स्टार्टअप्स, एमएसएमई और युवा उद्यमियों को रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक विकसित करने का अवसर दिया। सूत्रों के अनुसार आईडेक्स के तहत हजारों इनोवेशंस प्रोजेक्ट्स पर काम किया गया है, जिनमें ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस सिस्टम्स और एडवांस सेंसर टेक्नोलॉजी शामिल हैं।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई स्कीम और अन्य औद्योगिक योजनाओं ने भी रक्षा क्षेत्र को मजबूती दी। विशेष रूप से ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च तकनीक वाले उपकरणों के निर्माण में इन योजनाओं का प्रभाव दिखाई दिया है। इससे देश के भीतर विनिर्माण क्षमता बढ़ी और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिला।

खरीद प्रक्रिया में सुधार भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 और बाद में डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 के जरिए रक्षा खरीद प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और “इंडियन फर्स्ट” विजन के अनुरूप बनाया गया। इससे भारतीय कंपनियों को रक्षा परियोजनाओं में अधिक अवसर मिलने लगे।

रक्षा क्षेत्र में ऑफसेट नीति में किए गए बदलाव और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बढ़ते जोर ने भी घरेलू उद्योग की क्षमता बढ़ाई। कई विदेशी रक्षा कंपनियों को भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी करने और स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इसी के साथ डीआरडीओ और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग 500 करोड़ रुपये के इस कोष के माध्यम से नई तकनीकों के डेवलपमेंट, रिसर्च, और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सपोर्ट दिया गया। इससे निजी उद्योग, स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों को उन्नत रक्षा तकनीकों पर काम करने का अवसर मिला।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन सभी नीतिगत बदलावों का सबसे बड़ा असर स्वदेशी सामग्री यानी इंडिजिनस कंटेंट पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब भारत की रक्षा खरीद में 65 से 70 प्रतिशत तक निर्भरता आयात पर थी। अब स्थिति बदल रही है और घरेलू उत्पादन तथा स्थानीय सप्लाई चेन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। कई प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों में स्वदेशी सामग्री का स्तर 65 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुंच चुका है। (India Defence Production 2025-26)

कौन-कौन से प्रमुख स्वदेशी प्लेटफॉर्म बन रहे गेमचेंजर 

डिफेंस प्रोडक्शन में वृद्धि के पीछे कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं। वायुसेना के लिए एलसीए तेजस एमके-1ए का निर्माण जारी है। इसके अलावा एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए कार्यक्रम भी आगे बढ़ रहा है।

मिसाइल क्षेत्र में आकाश, अस्त्र, नाग, रुद्रम और पिनाका जैसे सिस्टम्स का उत्पादन बढ़ा है। नौसेना के लिए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स और अन्य युद्धपोत कार्यक्रमों ने भी रक्षा उद्योग को गति दी है।

थलसेना के लिए विभिन्न आर्टिलरी सिस्टम, बख्तरबंद प्लेटफॉर्म और गोला-बारूद उत्पादन में भी लगातार वृद्धि हुई है। (India Defence Production 2025-26)

सूर्यास्त्र रॉकेट सिस्टम के ‘स्क्रूड्राइवर असेंबली’ वाले आरोपों पर NIBE का पलटवार; ट्रायल, तकनीक और खरीद प्रक्रिया पर दिया जवाब

NIBE Suryastra Rocket System
NIBE Suryastra Rocket System (Photo: PIB)

NIBE Suryastra Rocket System: भारतीय सेना के लिए खरीदे गए लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट लॉन्चर सिस्टम ‘सूर्यास्त्र’ को लेकर कुछ रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स में इस सिस्टम को विदेशी तकनीक पर आधारित बताते हुए सवाल उठाए गए थे। वहीं अब इस सिस्टम का निर्माण करने वाली कंपनी नाइब लिमिटेड ने एक आधिकारिक बयान जारी कर सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि सूर्यास्त्र पूरी तरह भारतीय सेना की तय तकनीकी आवश्यकताओं, स्पेसिफिकेशंस और खरीद अनुबंध की शर्तों पर खरा उतरता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह विवाद केवल एक रॉकेट लॉन्चर सिस्टम तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, रक्षा उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और आपातकालीन खरीद प्रक्रिया जैसे बड़े मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। इसी वजह से सूर्यास्त्र कार्यक्रम पर सेना, उद्योग और रक्षा विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है। (NIBE Suryastra Rocket System)

NIBE Suryastra Rocket System: क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत तब हुई जब कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि भारतीय सेना द्वारा खरीदा गया सूर्यास्त्र यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर वास्तव में विदेशी डिजाइन (इजरायली एल्बिट सिस्टम्स का PULS)) पर आधारित प्लेटफॉर्म है और इसमें स्वदेशी कंटेंट बेहद कम है। इसे “स्क्रूड्राइवर असेंबली” बताते हुए कहा गया कि मुख्य तकनीक को विदेश से आई लेकिन भारत में केवल जोड़ने या असेंबल करने का काम किया गय।

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों ने उस समय यह भी सवाल उठाया कि जिस स्पीड से इस सिस्टम की खरीद हुई, वह असामान्य रूप से तेज थी। जनवरी 2026 में कॉन्ट्रैक्ट, मई में परीक्षण और उसके कुछ दिनों बाद पहली खेप की सप्लाई ने कई सवाल खड़े किए।

इन्हीं आरोपों के बाद नाइब लिमिटेड ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया और कहा कि रिपोर्टों में कई तथ्यात्मक त्रुटियां हैं तथा महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारियों को नजरअंदाज किया गया है। (NIBE Suryastra Rocket System)

नाइब ने आरोपों को बताया भ्रामक

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि सूर्यास्त्र को केवल विदेशी प्रोडक्ट की असेंबली बताना भारतीय इंजीनियरों, निजी रक्षा उद्योग और भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनलजरूरतों का अपमान है।

कंपनी का कहना है कि मार्च 2025 में टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन एग्रीमेंट के तहत कुछ वैश्विक भागीदारों के साथ सहयोग जरूर किया गया था, लेकिन सिस्टम का निर्माण, इंटीग्रेशन और उत्पादन भारत में ही किया गया है।

नाइब के अनुसार सूर्यास्त्र परियोजना केवल एक रॉकेट लॉन्चर नहीं है बल्कि देश में लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट तकनीक डेवलप करने की व्यापक पहल का हिस्सा है। (NIBE Suryastra Rocket System)

शिरडी में बनी 200 एकड़ की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी

कंपनी ने अपने बयान में महाराष्ट्र के शिरडी में स्थापित 200 एकड़ के इंटीग्रेटेड डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स का विशेष उल्लेख किया है।

इस परिसर में स्ट्रक्चरल इंटीग्रेशन, रॉकेट सिस्टम असेंबली, गोला-बारूद उत्पादन और विभिन्न रॉकेट कंपोनेंट्स के लोकेलाइजेशन की सुविधाएं डेवलप की गई हैं।

कंपनी का दावा है कि इस परिसर का उद्देश्य केवल एक उत्पाद तैयार करना नहीं, बल्कि रक्षा उत्पादन के लिए दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता तैयार करना है।

नाइब का कहना है कि यदि किसी सिस्टम के लिए शुरुआती चरण में वैश्विक तकनीकी सहयोग लिया गया है तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सिस्टम विदेशी है। कंपनी का तर्क है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक रक्षा परियोजनाएं बहुराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग के आधार पर आगे बढ़ती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सूर्यास्त्र क्या है?

रक्षा सूत्रों के अनुसार सूर्यास्त्र एक यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम है जिसे लंबी दूरी के सटीक हमलों के लिए डेवलप किया गया है।

यह सिस्टम दो अलग-अलग रेंज वाले गाइडेड रॉकेट के साथ आता है। पहला वर्जन लगभग 150 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट को हिट कर सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 300 किलोमीटर तक अंदर तक मार कर सकता है।

कंपनी के अनुसार यह सिस्टम भारतीय सेना की लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

परीक्षण को लेकर क्या दावा किया गया?

नाइब ने अपने बयान में कहा कि 18 और 19 मई को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में सूर्यास्त्र सिस्टम का तकनीकी मूल्यांकन किया गया। कंपनी के अनुसार दोनों संस्करणों ने परीक्षण के दौरान निर्धारित प्रदर्शन मानकों को पूरा किया।

नाइब ने दावा किया कि 150 किलोमीटर वाले संस्करण ने लगभग 1.5 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) हासिल किया। रक्षा तकनीक की भाषा में इसका मतलब यह है कि रॉकेट टारगेट के बेहद करीब जाकर गिरा।

कंपनी के अनुसार 300 किलोमीटर वाले डीप स्ट्राइक सिस्टम ने भी लगभग 2 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल दर्ज किया।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह आंकड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित होते हैं तो यह लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट सिस्टम के लिए हाई लेवल की सटीकता मानी जाती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

परीक्षण पर उठे सवाल

हालांकि दूसरी ओर कुछ रक्षा सूत्रों ने परीक्षणों को लेकर अलग दावे भी किए हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि मई में हुए परीक्षणों में एक उड़ान के दौरान रॉकेट ने अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। कुछ सूत्रों ने दावा किया कि परीक्षण उड़ानों में से एक रॉकेट अपने टारगेट तक पहुंचने से पहले टूट गया था।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नाइब ने अपने आधिकारिक बयान में किसी भी तकनीकी विफलता की बात से इनकार किया है और कहा है कि सिस्टम ने सफलतापूर्वक सभी मूल्यांकन पूरे किए। यही कारण है कि सूर्यास्त्र कार्यक्रम को लेकर दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं और बहस जारी है। (NIBE Suryastra Rocket System)

आपातकालीन खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

सूर्यास्त्र को लेकर दूसरा बड़ा विवाद इसकी खरीद प्रक्रिया में जल्दबाजी को लेकर है। सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना ने जनवरी 2026 में लगभग 293 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया था। यह खरीद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट नियमों के तहत की गई थी। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट, ट्रायल और सप्लाई के बीच समय काफी कम था। जिस पर सवाल उठाए गए।

लेकिन नाइब का कहना है कि पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) द्वारा स्वीकृत इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट फ्रेमवर्क के तहत की गई।

कंपनी के अनुसार इस सिस्टम का उद्देश्य युद्धक जरूरतों को तेजी से पूरा करना है। इसके तहत कानूनी, वित्तीय और प्रक्रियागत निगरानी की सभी शर्तें लागू रहती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सेना को क्यों चाहिए था सूर्यास्त्र?

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने कुछ ऐसे गैप्स की पहचान की थी जहां लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई।

इसी दौरान कई नए सिस्टम्स की तलाश शुरू हुई ताकि सेना की ऑपरेशनल क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा सके। इसी संदर्भ में कुछ खरीद प्रक्रियाओं को आपातकालीन श्रेणी में आगे बढ़ाया गया। (NIBE Suryastra Rocket System)

आत्मनिर्भरता बनाम विदेशी तकनीक

सूर्यास्त्र विवाद का सबसे बड़ा पहलू आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को केवल विदेशी डिजाइन वाले प्रोडक्ट्स की असेंबली नहीं करनी चाहिए, बल्कि मूल तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करनी चाहिए।

उनका कहना है कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी मानी जाएगी जब डिजाइन, सॉफ्टवेयर, मार्गदर्शन प्रणाली, रॉकेट मोटर और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें भारत में विकसित हों।

दूसरी ओर उद्योग जगत से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आधुनिक रक्षा उत्पादन में तकनीकी सहयोग सामान्य प्रक्रिया है। उनका तर्क है कि किसी भी वेपन सिस्टम में लोकल प्रोडक्शन, लोकल सप्लाई चेन और भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

भारत के पिनाका में दिलचस्पी दिखाने के बाद फ्रांस ने लिया बड़ा फैसला, इस रणनीति के चलते HIMARS को भी किया रिजेक्ट

France Pinaka FLP-T Program
French Army chief Gen Pierre Schill, witness Pinaka multi-barrel rocket launch system at Pokhran (Image Source: PIB)

France Pinaka FLP-T Program: पिछले दो सालों में भारतीय मीडिया में कई बार ऐसी खबरें सामने आईं कि फ्रांस भारत के स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पिनाका में दिलचस्पी दिखा रहा है और संभव है कि वह इसे अपने सैन्य बेड़े में शामिल करे। उस समय इसे भारत के रक्षा निर्यात के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया था। हालांकि अब फ्रांस के हालिया फैसलों और उसके लंबी दूरी की मारक क्षमता वाले कार्यक्रमों को देखने के बाद तस्वीर काफी स्पष्ट हो गई है। रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार फ्रांस ने अपनी भविष्य की रॉकेट आर्टिलरी जरूरतों के लिए किसी विदेशी सिस्टम पर निर्भर रहने के बजाय पूरी तरह स्वदेशी समाधान विकसित करने का रास्ता चुना है।

फ्रांस ने अपनी पुरानी रॉकेट आर्टिलरी क्षमता को बदलने के लिए एफएलपी-टी यानी फ्रैप लॉन्ग पोर्टे टेरेस्त्रे कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल नया रॉकेट लॉन्चर खरीदना नहीं बल्कि ऐसा सिस्टम डेवलप करना है जिस पर फ्रांस का पूर्ण कंट्रोल हो। यही वजह है कि फ्रांसीसी रक्षा उद्योग की कई कंपनियों को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है और उन्हें घरेलू तकनीक पर आधारित समाधान विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है।

France Pinaka FLP-T Program: पिनाका को लेकर क्यों हुई थी चर्चा

पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है। यह भारतीय सेना की सबसे सफल आर्टिलरी परियोजनाओं में गिना जाता है। कारगिल युद्ध के दौरान इसकी क्षमता सामने आई थी और इसके बाद लगातार नए वर्जन तैयार किए गए।

जब फ्रांस की ओर से पिनाका का मूल्यांकन किए जाने की खबरें आईं तो इसे संभावित निर्यात सौदे के रूप में देखा गया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी सैन्य सिस्टम का मूल्यांकन किया जाना और उसे खरीदने का फैसला लेना दो अलग-अलग बातें हैं। दुनिया की अधिकांश सेनाएं समय-समय पर विभिन्न देशों के हथियारों और प्रणालियों का अध्ययन करती हैं ताकि उनकी तुलना की जा सके और अपनी जरूरतों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

सूत्रों का कहना है कि फ्रांस ने पिनाका की क्षमताओं का अध्ययन जरूर किया, लेकिन उसके रक्षा योजना दस्तावेज पहले से ही यह संकेत दे रहे थे कि वह अपनी अगली पीढ़ी की रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम घरेलू स्तर पर विकसित करना चाहता है।

अक्टूबर 2025 में भारत आए थे फ्रांसीसी सेना प्रमुख

अक्टूबर 2025 में फ्रांसीसी सेना प्रमुख जनरल पियरे शिल भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में भारतीय सेना के पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का प्रदर्शन देखा था। पिनाका की क्षमताओं, इसकी मारक दूरी और ऑपरेशनल प्रदर्शन से जुड़ी जानकारी उन्हें भारतीय सेना की ओर से दी गई थी। इसी दौरे के दौरान जनरल पियरे शिल ने भारतीय सेना के अधिकारियों और सैनिकों के साथ पिनाका सिस्टम के सामने समूह तस्वीर भी खिंचवाई थी, जिसकी तस्वीर बाद में काफी चर्चा में रही।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह दौरा फ्रांस द्वारा पिनाका सिस्टम के मूल्यांकन और तकनीकी अध्ययन का हिस्सा था। उस समय फ्रांसीसी पक्ष विशेष रूप से पिनाका के लंबी दूरी वाले संस्करणों में रुचि दिखा रहा था। फ्रांसीसी सेना यह समझना चाहती थी कि यह सिस्टम उसकी ऑपरेशनल जरूरतों के अनुरूप कितना उपयोगी हो सकता है।

इसी दौरान फ्रांसीसी ब्रिगेडियर जनरल स्टेफेन रिचो ने भी पिनाका को फ्रांस की कुछ आवश्यकताओं के अनुरूप बताया था। हालांकि सूत्रों का कहना है कि किसी सैन्य प्रणाली का मूल्यांकन किए जाने का मतलब यह नहीं होता कि उसे खरीदने का फैसला भी ले लिया गया है। फ्रांस की ओर से किया गया यह आकलन मुख्य रूप से बेंचमार्किंग, तकनीकी तुलना और क्षमता अध्ययन के उद्देश्य से था, ताकि वह अपनी भविष्य की लंबी दूरी की रॉकेट आर्टिलरी योजनाओं के लिए विभिन्न विकल्पों को समझ सके।

फ्रांस की रक्षा नीति में स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी सबसे ऊपर

फ्रांस लंबे समय से स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की नीति पर काम करता रहा है। उसके पास अपने लड़ाकू विमान, परमाणु हथियार, पनडुब्बियां, मिसाइलें, एयर डिफेंस सिस्टम और अंतरिक्ष कार्यक्रम मौजूद हैं। फ्रांस की सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वह महत्वपूर्ण सैन्य तकनीकों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर न रहे।

रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार यही कारण है कि फ्रांस ने अमेरिकी हिमार्स (HIMARS) जैसे सिस्टम को भी सीधे अपनाने का रास्ता नहीं चुना। इसके बजाय उसने अपनी जरूरतों के अनुरूप स्वदेशी कार्यक्रम शुरू किया।

सूत्रों का कहना है कि यदि फ्रांस अमेरिका जैसी करीबी साझेदार के सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचना चाहता था, तो किसी भारतीय सिस्टम को अपनी भविष्य की रॉकेट आर्टिलरी का आधार बनाना उसकी नीति के अनुरूप नहीं था।

क्या है एफएलपी-टी कार्यक्रम

फ्रांस ने अपनी पुराने एलआरयू रॉकेट सिस्टम को बदलने के लिए एफएलपी-टी कार्यक्रम शुरू किया है। यह कार्यक्रम 2030 के बाद फ्रांसीसी सेना को नई लंबी दूरी की मारक क्षमता देने के उद्देश्य से बनाया गया है।

इस कार्यक्रम के तहत कई फ्रांसीसी कंपनियां प्रतिस्पर्धा में हैं। एमबीडीए और साफ्रान मिलकर थंडार्ट नामक सिस्टम विकसित कर रहे हैं। वहीं थेल्स और एरियानग्रुप भी अपने सॉल्युशन पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा फूद्रे नामक एक अन्य सिस्टम भी डेवलप किया जा रहा है।

इन सभी परियोजनाओं का लक्ष्य फ्रांस को ऐसी रॉकेट आर्टिलरी देना है जिसकी तकनीक, उत्पादन, रखरखाव और अपग्रेड पर पूरा नियंत्रण फ्रांस के पास हो। (France Pinaka FLP-T Program)

पिनाका की क्षमता पर नहीं उठे सवाल

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रांस का फैसला पिनाका की क्षमता से जुड़ा नहीं है। पिनाका पहले ही युद्ध में अपनी प्रभावशीलता साबित कर चुका है।

पिनाका एमके-1 की मारक दूरी लगभग 45 किलोमीटर तक है। एमके-2 संस्करण 60 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट हिट कर सकता है। गाइडेड संस्करणों की रेंज 75 से 90 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसके अलावा विस्तारित रेंज वाले संस्करणों पर भी काम किया गया है।

एक लॉन्चर से 12 रॉकेट बेहद कम समय में दागे जा सकते हैं। पूरी बैटरी कुछ ही सेकंड में बड़े क्षेत्र को कवर कर सकती है। यही वजह है कि भारतीय सेना में इसकी बड़ी संख्या में तैनाती की जा रही है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार फ्रांस ने पिनाका को इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि वह कमजोर सिस्टम था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी प्राथमिकता फ्रांस में किसी सिस्टम को डेवलप करना है। (France Pinaka FLP-T Program)

फ्रांस की मौजूदा रॉकेट क्षमता की चुनौती

फ्रांस के पास इस समय एलआरयू सिस्टम है जो अमेरिकी एम-270 प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इनकी संख्या सीमित रह गई है और आने वाले वर्षों में इन्हें बदलना जरूरी हो गया है।

यूक्रेन युद्ध के बाद लंबी दूरी की आर्टिलरी और रॉकेट सिस्टम की अहमियत और बढ़ गई है। फ्रांस भी अपनी सेना की इस क्षमता को मजबूत करना चाहता है। हालांकि वह इस प्रक्रिया में विदेशी निर्भरता कम करने पर जोर दे रहा है।

सूत्रों का कहना है कि अमेरिका पर गोला-बारूद और तकनीक के लिए निर्भरता ने फ्रांस को यह एहसास कराया कि भविष्य में उसे अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित करनी होगी। इसी सोच ने एफएलपी-टी कार्यक्रम को गति दी।

राफेल और रक्षा सहयोग के बीच चर्चा में आया पिनाका

भारत और फ्रांस के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग काफी बढ़ा है। राफेल लड़ाकू विमान, नौसैनिक सहयोग और अन्य रक्षा परियोजनाओं पर दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत होती रही है।

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का मानना है कि इसी दौरान पिनाका को लेकर भी चर्चा सामने आई। फ्रांसीसी पक्ष द्वारा भारतीय रक्षा उत्पादों में रुचि दिखाना दोनों देशों के बीच संतुलित रक्षा संबंधों का संकेत माना गया।

इससे भारतीय रक्षा उद्योग को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और यह संदेश गया कि भारतीय हथियार प्रणालियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती हैं। (France Pinaka FLP-T Program)

निवेश के आंकड़े बताते हैं फ्रांस का असली इरादा

विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी देश की वास्तविक प्राथमिकता उसके निवेश पैटर्न से समझी जा सकती है। पिछले दो सालों में फ्रांस ने घरेलू रॉकेट आर्टिलरी कार्यक्रमों में लगातार निवेश बढ़ाया है।

फूद्रे, थंडार्ट और एफएलपी-टी 150 जैसी प्रोजेक्ट पर ट्रायल्स भी किए जा चुके हैं। फ्रांसीसी सरकार ने इन कार्यक्रमों के लिए बजट और संसाधन उपलब्ध कराए हैं।

सूत्रों के अनुसार यही संकेत देता है कि फ्रांस शुरू से ही घरेलू समाधान को आगे बढ़ाने के इरादे से काम कर रहा था। पिनाका सहित अन्य विदेशी प्रणालियों का अध्ययन केवल तुलना और मूल्यांकन की प्रक्रिया का हिस्सा था। (France Pinaka FLP-T Program)

रक्षा निर्यात के लिए महत्वपूर्ण सबक

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यह मामला इस बात का उदाहरण है कि किसी देश की रुचि और वास्तविक खरीद योजना में अंतर हो सकता है। किसी हथियार सिस्टम की तकनीकी क्षमता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन अंतिम फैसला अक्सर रणनीतिक नीति, औद्योगिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांतों के आधार पर लिया जाता है।

पिनाका आज भी भारत की सबसे सफल रक्षा परियोजनाओं में गिना जाता है और कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है। हालांकि फ्रांस का मामला यह दिखाता है कि हर संभावित ग्राहक की प्राथमिकताएं अलग होती हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार फ्रांस ने अपनी परंपरागत नीति के अनुरूप वही रास्ता चुना है, जिसे वह दशकों से अपनाता आया है। उसका लक्ष्य ऐसी सैन्य क्षमता विकसित करना है जिस पर तकनीकी, औद्योगिक और रणनीतिक स्तर पर उसका पूरा नियंत्रण बना रहे। (France Pinaka FLP-T Program)