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India is making ‘National Submarine’ Ecosystem, Nuclear and Diesel submarines will be the same as ‘Dimag’

The navy under the National Submarine Ecosystem wants to create a structure that includes sensors of submarines, vanity control systems, sonars, electronic warfares, optronic masts, training and maintenance systems...

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📍New Delhi | 25 Jun, 2026, 1:06 PM

Indian Navy Submarine Programme: Indian Navy is working on designing a kind of indigenous technology, sensor, Combat system and arms structure for two different category submarines to come. It includes the traditional diesel-electric submarines of Project-76 and Nuclear Attack Submarine of Project-77. The size of both, the engine and the operational roll will be different, but many of these important systems are planned to be placed as soon as possible.

According to the formulas, the navy wants to create a structure in which sensors of submarines, vanity control systems, sonars, electronic warfares, optronic masts, training and maintenance systems remain connected to each other. This will reduce dependence on the system of different foreign companies and spare parts, upgrades and repair work in the entire service period of the submarines.

This model Indian Navy It is therefore also important for as the submarine is considered the most complex military system of any country. It is the biggest challenge to keep the noise low in this platform working under the water, identify the enemy first and hide yourself. Developing the same kind of indigenous system in such will help keep the navy in its hands for a long time technology control.

Indian Navy Submarine Programme: Two different submarines, but many systems alike

India Nuclear Powered Attack Submarine under Project-77SSN) Developing. On the other side Project-76 Under the next generation of traditional submarines (SSKs) to be created. SSN has a nuclear reactor, while SSKs run on techniques such as diesel-electric and air-indipant proption.

Nuclear submersible can stay in the sea for a long time and reach the maritime areas of the faraway from the sharp speed. Traditional submarines are used in monitoring and attacking quietly in coastal areas, marine routes and narrow areas. While the role of the two is different, the Navy wants to keep the same several systems.

The formulas say this common system approach may include Combat Management System, Sonar, Optionic Mast, Electronic Support Majors, Communication System, Torpedo Control, Stellth Material and some Battery and Power Management Techniques. Indian Navy Submarine Programme

Combat management system will be submarine mind

The most important part of a submarine is its Combat Management System. It can also be called ‘Ndubbi’s mind. This system adds a place to information coming from sonar, radar, periscope, electronic sensors, navigation tools, and communication systems.

When Submarine There are several signs in front of the sea. The engine of a ship, propeller of another submarine, voice of marine organisms, radar signals or radio transmission, give all different types of information. The Combat Management System explains the signals to the operator by understanding how the front present target can be.

यही सिस्टम टारगेट को ट्रैक करने, टॉरपीडो लॉन्च करने, मिसाइल फायर करने और मिशन की प्राथमिकता तय करने में मदद करता है। नौसेना का सोचना है कि प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में एक जैसी मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और ऑपरेटर कंसोल लगाए जाएं। इससे एक पनडुब्बी पर तैनात कर्मी दूसरी पनडुब्बी पर भी जल्दी काम कर सकेंगे।

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कॉमन कॉम्बैट सिस्टम का दूसरा फायदा सॉफ्टवेयर अपग्रेड में होगा। किसी नए सेंसर या हथियार को जोड़ने के लिए अलग-अलग विदेशी सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। भारतीय कंपनियां और डिफेंस लैब्स जरूरत के अनुसार सिस्टम में बदलाव कर सकेंगी। (Indian Navy submarine programme)

पुराने पेरिस्कोप की जगह ऑप्ट्रॉनिक मास्ट

पनडुब्बी में पेरिस्कोप का इस्तेमाल समुद्र की सतह पर मौजूद गतिविधियों को देखने के लिए किया जाता है। पुराने पेरिस्कोप सीधे प्रेशर हल के अंदर तक आते थे। इससे पनडुब्बी के अंदर जगह और मैकेनिकल सिस्टम की जरूरत बढ़ती थी।

नई पनडुब्बियों में नॉन-पेनेट्रेटिंग ऑप्ट्रॉनिक मास्ट इस्तेमाल करने की योजना है। इसका मतलब है कि मास्ट का कैमरा और सेंसर ऊपर की तरफ होंगे, लेकिन वह सीधे प्रेशर हल के अंदर नहीं आएगा। इससे पनडुब्बी के डिजाइन में ज्यादा आसानी होगी।

सूत्रों के अनुसार, इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (आईआरडीई) के बनाए ऑप्ट्रॉनिक मास्ट में हाई-डेफिनिशन कैमरा, थर्मल इमेजिंग, इन्फ्रारेड सेंसर और डिजिटल जूम जैसी तकनीक शामिल हो सकती है। यह जानकारी फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क के जरिए कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम तक पहुंचेगी।

थर्मल इमेजिंग रात में या कम रोशनी में जहाज, नाव और अन्य गर्म वस्तुओं की पहचान में मदद करती है। इन्फ्रारेड सेंसर से सतह पर मौजूद लक्ष्य का तापमान आधारित संकेत मिल सकता है। इस तरह ऑपरेटर को केवल आंख से देखने के बजाय डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा जानकारी मिलती है। (Indian Navy submarine programme)

सोनार से मिलेगी पानी के नीचे की जानकारी

पनडुब्बी के लिए Sonar उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना लड़ाकू विमान के लिए रडार। समुद्र के अंदर रडार काम नहीं करता, इसलिए पानी के भीतर मौजूद जहाजों और पनडुब्बियों की पहचान ध्वनि तरंगों से की जाती है। इस काम के लिए सोनार सिस्टम लगाया जाता है।

नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी यानी एनपीओएल के अनुभव पर आधारित इंटीग्रेटेड सोनार सिस्टम दोनों प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल किए जाने की योजना है। इसमें बो-माउंटेड सोनार, फ्लैंक अरे, टोड अरे और पैसिव इंटरसेप्ट सिस्टम जैसे उपकरण शामिल हो सकते हैं।

बो-माउंटेड सोनार पनडुब्बी के आगे वाले हिस्से में लगा होता है। फ्लैंक अरे पनडुब्बी के दोनों किनारों पर लगे सेंसर होते हैं, जो आसपास की आवाजों को पकड़ते हैं। टोड अरे एक लंबी केबल के साथ पीछे छोड़ा जाने वाला सेंसर सिस्टम होता है। यह पनडुब्बी के अपने शोर से दूर जाकर समुद्र की आवाजों को बेहतर ढंग से सुन सकता है।

पैसिव सोनार किसी ध्वनि तरंग को भेजता नहीं है। वह केवल दूसरी पनडुब्बी, जहाज या टॉरपीडो से निकलने वाली आवाज सुनता है। इसका फायदा यह है कि पनडुब्बी की पहचान नहीं हो पाती। इसी कारण पानी के नीचे युद्ध में पैसिव सोनार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indian Navy submarine programme)

वरुणास्त्र और तक्षक टॉरपीडो पर जोर

नौसेना की योजना स्वदेशी हैवीवेट Torpedo को भी दोनों प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनाने की है। वरुणास्त्र टॉरपीडो भारतीय नौसेना के लिए विकसित स्वदेशी हैवीवेट टॉरपीडो है। इसे पनडुब्बी से लॉन्च कर दुश्मन के युद्धपोत या पनडुब्बी को निशाना बनाया जा सकता है।

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इसके अलावा डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (एनएसटीएल) तक्षक नाम का नया इलेक्ट्रिक हैवीवेट टॉरपीडो डेवलप कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, इसमें स्विम-आउट लॉन्च और फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस जैसी तकनीक हो सकती है। स्विम-आउट लॉन्च का अर्थ है कि टॉरपीडो ट्यूब से कम शोर के साथ बाहर निकलता है, जिससे लॉन्च के समय पनडुब्बी की पता लगाना कठिन हो जाता है।

फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस में टॉरपीडो और पनडुब्बी के बीच एक पतला तार जुड़ा रहता है। पनडुब्बी का ऑपरेटर टारगेट की स्थिति बदलने पर टॉरपीडो को नया निर्देश भेज सकता है। यह तकनीक खासतौर पर ऐसे समुद्री क्षेत्र में उपयोगी होती है जहां कई जहाज और पनडुब्बियां मौजूद हों। (Indian Navy submarine programme)

प्रोजेक्ट-77: न्यूक्लियर अटैक सबमरीन का अलग है रोल

प्रोजेक्ट-77 के तहत बनने वाली न्यूक्लियर अटैक सबमरीन आकार में काफी बड़ी होंगी। कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने अक्टूबर 2024 में शुरुआती दो एसएसएन के निर्माण को मंजूरी दी थी। इन दोनों पनडुब्बियों के लिए करीब 40 हजार करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। नौसेना के लिए कुल छह न्यूक्लियर अटैक सबमरीन बनाई जानी हैं।

इनका डिस्प्लेसमेंट करीब 10 हजार टन तक हो सकता है। इनमें भारत में डेवलप प्रेशराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया जाएगा। न्यूक्लियर रिएक्टर पनडुब्बी को लगातार ऊर्जा देता है, इसलिए उसे बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती।

एसएसएन का मुख्य काम दुश्मन की पनडुब्बियों का पीछा करना, कैरियर बैटल ग्रुप की सुरक्षा करना, समुद्री मार्गों पर निगरानी रखना और लंबी दूरी के समुद्री मिशन करना होता है। इनका निर्माण विशाखापत्तनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर में किया जाना है। इसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका भी रहेगी।

प्रोजेक्ट-76 में एआईपी और लिथियम-आयन बैटरी

प्रोजेक्ट-76 के तहत भारत अपनी नई पारंपरिक पनडुब्बी डिजाइन कर रहा है। यह प्रोजेक्ट डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, इसका डिजाइन लगभग 3,000 टन श्रेणी का हो सकता है और इसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन, लिथियम-आयन बैटरी तथा टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च होने वाली लैंड अटैक क्रूज मिसाइल की क्षमता शामिल की जा सकती है।

एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन से पनडुब्बी को बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह के पास आकर हवा लेने की जरूरत कम हो जाती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी को कुछ समय बाद स्नॉर्कल के जरिए हवा लेनी पड़ती है। यह समय उसकी पहचान का खतरा बढ़ा सकता है। एआईपी सिस्टम से पानी के नीचे लंबे समय तक रहा जा सकता है।

लिथियम-आयन बैटरी पारंपरिक बैटरियों की तुलना में ज्यादा ऊर्जा जमा कर सकती है। इससे पनडुब्बी अधिक समय तक चुपचाप चल सकती है। हालांकि समुद्री उपयोग के लिए ऐसी बैटरियों में सुरक्षा, तापमान नियंत्रण और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। (Indian Navy submarine programme)

स्टेल्थ के लिए एनिकॉइक टाइल और पंप-जेट पर काम

पनडुब्बी युद्ध में सबसे अहम बात यह है कि दुश्मन को आपकी पनडुब्बी की आवाज न मिले। इसी के लिए हल के ऊपर एनिकॉइक टाइल लगाई जाती हैं। ये विशेष रबर जैसी परतें होती हैं, जो दुश्मन के एक्टिव सोनार से आने वाली ध्वनि तरंगों को सोखने या बिखेरने में मदद करती हैं।

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इसके अलावा पंप-जेट प्रोपल्शन पर भी विचार किया जा रहा है। सामान्य प्रोपेलर पानी को घुमाकर पनडुब्बी को आगे बढ़ाता है, लेकिन तेज गति पर उससे कैविटेशन नाम का शोर पैदा हो सकता है। पंप-जेट में ब्लेड एक ढके हुए डक्ट के अंदर होते हैं। इससे शोर और कंपन कम करने में मदद मिलती है।

प्रोजेक्ट-77 में न्यूक्लियर प्रोपल्शन और प्रोजेक्ट-76 में डीजल-इलेक्ट्रिक तथा एआईपी सिस्टम अलग रहेंगे, लेकिन शोर कम करने वाली तकनीक, अकॉस्टिक मैनेजमेंट और स्टेल्थ मटेरियल को एक जैसा रखने की कोशिश की जा रही है। हाई-टेंसाइल स्टील जैसे महत्वपूर्ण मटेरियल में भी स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर ध्यान है। (Indian Navy submarine programme)

पुराने अनुभवों से ली सीख

भारतीय नौसेना के पास अलग-अलग देशों की पनडुब्बियां रही हैं। रूस की किलो क्लास, जर्मन डिजाइन की एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां और फ्रांसीसी स्कॉर्पीन डिजाइन पर बनी कलवरी क्लास की पनडुब्बियों में अलग-अलग सिस्टम, स्पेयर और अपग्रेड व्यवस्था रही है। इससे रखरखाव का स्ट्रक्चर जटिल हो जाता है।

सूत्रों का कहना है कि इससे विदेशी निर्भरता कम होगी। किसी विदेशी प्लेटफॉर्म के लिए स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी दस्तावेज या अपग्रेड मंजूरी पर निर्भर रहने से लंबे समय में समस्या पैदा हो सकती है। यदि सप्लायर देश की नीति बदले या उत्पादन लाइन बंद हो जाए तो नौसेना के सामने मेंटेनेंस का संकट खड़ा हो सकता है।

इसी वजह से प्रोजेक्ट-76 और प्रोजेक्ट-77 में स्वदेशी कॉम्बैट सिस्टम, सोनार, हथियार और सेंसर को प्राथमिकता दी जा रही है। दोनों प्रोजेक्टस में 90 से 95 फीसदी तक स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। (Indian Navy submarine programme)

एक जैसी तकनीक से ट्रेनिंग और रखरखाव आसान होगा

कॉमन सिस्टम का सीधा फायदा नौसेना के क्रू को मिलेगा। यदि दोनों पनडुब्बियों में डिस्प्ले, कंट्रोल कंसोल और सॉफ्टवेयर की मूल संरचना समान होगी तो प्रशिक्षण का समय कम हो सकता है। पनडुब्बी चालक दल को हर नई क्लास के लिए बिल्कुल अलग ऑपरेटिंग सिस्टम सीखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेंटेनेंस के स्तर पर भी एक जैसे टेस्ट उपकरण, सिमुलेटर, रिपेयर प्रक्रिया और स्पेयर सपोर्ट इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे नौसेना को अलग-अलग सप्लाई चेन बनाने की जरूरत कम होगी। रक्षा उद्योग के लिए भी यह बड़ा अवसर होगा क्योंकि डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी कंपनियों को लंबे समय तक एक ही तरह के सिस्टम के उत्पादन और अपग्रेड का काम मिल सकेगा। (Indian Navy submarine programme)

Author

  • Herry passport

    Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.

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Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.

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