Home Blog Page 21

Explainer: राफेल की नई ‘साइलेंट किलर’ मिसाइल MICA NG क्यों है खास? चीन के स्टेल्थ फाइटर J-20 और क्रूज मिसाइलों के लिए क्यों बनी बड़ा खतरा?

MICA NG Missile
Image Source: Mbda-systems

MICA NG Missile: फ्रांस ने राफेल लड़ाकू विमान से मीका एनजी (MICA-NG) एयर-टू-एयर मिसाइल का सफल सुपरसोनिक परीक्षण किया है। यह पहली बार था जब इस नई पीढ़ी की मिसाइल को सुपरसोनिक उड़ान के दौरान दागकर उसकी क्षमता परखी गई।

फ्रांसीसी मिसाइल निर्माता एमबीडीए और फ्रांसीसी रक्षा खरीद एजेंसी डीजीए ने इसे भविष्य के हवाई युद्ध की दिशा में बड़ा कदम बताया है। खास बात यह है कि यह मिसाइल केवल सामान्य लड़ाकू विमानों को ही नहीं बल्कि स्टेल्थ फाइटर जेट, ड्रोन और अत्यधिक तेज क्रूज मिसाइलों को भी निशाना बनाने के लिए तैयार की गई है।

भारत के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से राफेल लड़ाकू विमान ऑपरेशनल हैं और फ्रांस से बड़ी संख्या में अतिरिक्त 114 राफेल खरीदने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

क्या है MICA NG Missile?

मीका (MICA) का पूरा नाम “मिसाइल डी इंटरसेप्शन, डी कॉम्बैट एट डी ऑटोडिफेंस” है। यह फ्रांस की बनाई हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। इसका नया संस्करण एमआईसीए एनजी यानी न्यू जेनरेशन मिसाइल है। इसे मूल एमआईसीए मिसाइल की जगह लेने के लिए डेवलप किया गया है।

एमआईसीए फैमिली की मिसाइलें 1990 के दशक से फ्रांसीसी वायुसेना का हिस्सा रही हैं। इन्हें राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाया जाता है।

नई एमआईसीए एनजी बाहर से देखने पर लगभग पुरानी मिसाइल जैसी लगती है, लेकिन इसके अंदर की तकनीक पूरी तरह बदल दी गई है। नई मिसाइल में ज्यादा ताकतवर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके सेंसर ज्यादा संवेदनशील हैं और इसकी रॉकेट मोटर भी पहले की तुलना में अधिक एडवांस है।

एमबीडीए के अनुसार नई मिसाइल पुरानी एमआईसीए की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम है। जहां पुरानी एयर-लॉन्च्ड मीका मिसाइल की रेंज लगभग 60 से 80 किलोमीटर तक थी, वहीं नई पीढ़ी की मीका एनजी मिसाइल की रेंज करीब 84 से 112 किलोमीटर तक मानी जा रही है। यानी नई मिसाइल पुराने वर्जन की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। हालांकि कंपनी ने आधिकारिक रेंज नहीं बताई है।

एमबीडीए का कहना है कि यह मिसाइल भविष्य के उन खतरों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जो मौजूदा मिसाइलों के लिए चुनौती बन सकते हैं।

सुपरसोनिक परीक्षण क्यों था इतना महत्वपूर्ण?

साधारण भाषा में समझें तो जब कोई लड़ाकू विमान ध्वनि की गति से तेज उड़ता है तो उसके आसपास का तापमान काफी बढ़ जाता है। हवा के घर्षण से मिसाइल और विमान दोनों के आसपास गर्मी पैदा होती है।

ऐसी स्थिति में किसी टारगेट को पहचानना और उसका पीछा करना काफी कठिन हो जाता है। विशेष रूप से तब जब सामने वाला टारगेट स्टेल्थ तकनीक से लैस हो और उसकी गर्मी भी बहुत कम हो।

इसी चुनौती को देखते हुए फ्रांस ने एमआईसीए एनजी का सुपरसोनिक परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान मिसाइल ने उच्च तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी टारगेट को सफलतापूर्वक ट्रैक किया। इससे साबित हुआ कि इसका नया इंफ्रारेड सीकर वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में भी प्रभावी रहेगा। (MICA NG Missile)

स्टेल्थ विमान क्यों होते हैं इतने खतरनाक

स्टेल्थ विमान ऐसे लड़ाकू जेट होते हैं जिन्हें रडार पर पकड़ना कठिन होता है। चीन का जे-20 और अमेरिका का एफ-35 ऐसे ही विमानों की श्रेणी में आते हैं।

इन विमानों का डिजाइन इस तरह बनाया जाता है कि वे दुश्मन के रडार पर कम दिखाई दें। साथ ही उनकी गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर भी कम करने की कोशिश की जाती है।

यही कारण है कि स्टेल्थ विमान आधुनिक वायु युद्ध में सबसे खतरनाक हथियारों में गिने जाते हैं।

एमआईसीए एनजी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे ऐसे ही कम सिग्नेचर वाले टारगेट्स को खोजने और मार गिराने के लिए विकसित किया गया है। (MICA NG Missile)

Rafale Source Code India

मिसाइल का नया इंफ्रारेड सीकर क्यों खास है?

एमआईसीए एनजी के इंफ्रारेड वर्जन में नया मैट्रिक्स सेंसर लगाया गया है। यह सेंसर टारगेट से निकलने वाली बेहद कम गर्मी को भी पहचान सकता है। पुरानी पीढ़ी की मिसाइलों के लिए कम थर्मल सिग्नेचर वाले टारगेट चुनौती होते थे, लेकिन नई मिसाइल को खासतौर पर इसी समस्या को हल करने के लिए बनाया गया है।

इसका इंफ्रारेड सीकर किसी प्रकार का रडार सिग्नल नहीं भेजता। इसका मतलब है कि दुश्मन को यह पता ही नहीं चलता कि मिसाइल उसे ट्रैक कर रही है। इसीलिए इसे “साइलेंट किलर” भी कहा जा रहा है।

मिसाइल की नई ताकत: डुअल पल्स मोटर

एमआईसीए एनजी में डुअल पल्स रॉकेट मोटर दी गई है। पुरानी मिसाइलों में मोटर एक बार पूरी ताकत के साथ जलती थी और फिर उसका ईंधन समाप्त हो जाता था। नई मिसाइल में दो चरणों वाली मोटर लगाई गई है।

पहला चरण मिसाइल को तेजी से टारगेट की ओर बढ़ाता है। दूसरा चरण जरूरत पड़ने पर सक्रिय होता है और अंतिम समय में अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है।

इसका फायदा यह है कि अंतिम क्षणों में भी मिसाइल तेजी से दिशा बदल सकती है और तेज उड़ते हुए विमान या टारगेट का पीछा कर सकती है।

एमबीडीए के अनुसार यह मिसाइल 50 जी तक का मोड़ लेने में सक्षम है, जिससे बच निकलना दुश्मन के लिए मुश्किल हो जाता है। (MICA NG Missile)

केवल लड़ाकू विमान ही नहीं, ड्रोन भी होंगे निशाने पर

यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखा दिया है कि ड्रोन अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। छोटे ड्रोन रडार पर कम दिखाई देते हैं और बड़ी संख्या में हमला कर सकते हैं। एमआईसीए एनजी को ऐसे ही खतरों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

कंपनी का कहना है कि मिसाइल बहुत कम इंफ्रारेड और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर वाले टारगेटों को भी पहचान सकती है। इसका मतलब है कि भविष्य में ड्रोन स्वार्म जैसी चुनौतियों से निपटने में भी इसका उपयोग हो सकेगा।

फ्रांस का दावा है कि यह मिसाइल पारंपरिक लड़ाकू विमान के साथ-साथ ड्रोन और अत्यधिक फुर्तीली क्रूज मिसाइलों के खिलाफ भी प्रभावी रहेगी। (MICA NG Missile)

राफेल और एमआईसीए एनजी की जोड़ी क्यों है घातक

राफेल दुनिया के सबसे आधुनिक 4.5 जेनरेशन लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसमें आरबीई-2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और अत्याधुनिक सेंसर लगे हुए हैं। जब राफेल और एमआईसीए एनजी एक साथ काम करते हैं तो दोनों की क्षमता और बढ़ जाती है।

राफेल अपने सेंसरों से टारगेट की जानकारी मिसाइल को भेज सकता है। इसके बाद मिसाइल उड़ान के दौरान भी अपडेट लेती रहती है और रास्ता भी बदल सकती है। युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। (MICA NG Missile)

चीन के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

फ्रांस ने आधिकारिक रूप से किसी देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मीका-एनजी जैसी मिसाइलें चीन के जे-20 जैसे स्टेल्थ विमानों को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। चीन के पास आज दुनिया का सबसे बड़ा स्टेल्थ लड़ाकू विमान बेड़ा माना जाता है।

जे-20 को चीन अपनी वायु शक्ति का सबसे अहम हथियार मानता है। लेकिन स्टेल्थ का मतलब पूरी तरह अदृश्य होना नहीं होता। हर विमान किसी न किसी रूप में गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक संकेत छोड़ता है। एमआईसीए एनजी का नया इंफ्रारेड सीकर ऐसे ही संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। (MICA NG Missile)

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परीक्षण?

भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल लड़ाकू विमान हैं। ये विमान अंबाला और हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं। लद्दाख से लेकर पूर्वी क्षेत्र तक कई संवेदनशील मोर्चों पर राफेल को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

इसी बीच भारत ने फ्रांस को 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए अनुरोध पत्र भेजा है। इस प्रस्ताव के तहत बड़ी संख्या में विमान भारत में ही बनाए जाने की योजना है। यदि यह कार्यक्रम आगे बढ़ता है तो भारतीय वायुसेना के पास राफेल का बहुत बड़ा बेड़ा हो सकता है। यदि भविष्य में मीका-एनजी भारतीय राफेल बेड़े का हिस्सा बनती है तो वायुसेना को छोटी और मध्यम दूरी के हवाई मुकाबलों में एक नई क्षमता मिलेगी।

फ्रांस ने वर्ष 2018 में एमआईसीए एनजी कार्यक्रम की शुरुआत की थी। उस समय दुनिया भर में स्टेल्थ विमान, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा था। फ्रांसीसी वायुसेना चाहती थी कि उसके पास ऐसी मिसाइल हो जो आने वाले कई दशकों तक सर्विस में बनी रहे।

फ्रांस पहले ही 500 से अधिक एमआईसीए एनजी मिसाइलों का ऑर्डर दे चुका है। इन मिसाइलों का उपयोग केवल वायुसेना तक सीमित नहीं रहेगा। इसका एक अलग वर्जन जहाजों और जमीन पर तैनात एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए भी तैयार किया जा रहा है। (MICA NG Missile)

वायुसेना में बड़ा बदलाव: एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित होंगे नए वाइस चीफ, क्या बन सकते हैं अगले एयर चीफ?

Air Marshal Ashutosh Dixit next IAF Vice Chief
PIC Source: PIB/IAF

Air Marshal Ashutosh Dixit: भारतीय वायुसेना को 1 जुलाई से नया 51वां वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ मिलने जा रहा है। सरकार ने अनुभवी फाइटर पायलट और टेस्ट पायलट एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित को इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया है। वह मौजूदा वाइस चीफ एयर मार्शल नागेश कपूर की जगह लेंगे, जो 30 जून को रिटायर हो रहे हैं।

भारतीय वायुसेना में वाइस चीफ का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। एयर चीफ मार्शल के बाद यह दूसरा सबसे वरिष्ठ पद होता है। वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारियों, आधुनिकीकरण, भविष्य की योजनाओं और संसाधनों के प्रबंधन में वाइस चीफ की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति को वायुसेना के लिए एक अहम बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

Air Marshal Ashutosh Dixit: फाइटर पायलट से वायुसेना के शीर्ष नेतृत्व तक का सफर

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का सैन्य सफर लगभग चार दशक पुराना है। उन्हें 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन मिला था। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र हैं। इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेश स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और नई दिल्ली के नेशनल डिफेंस कॉलेज से भी उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की।

अपने करियर के दौरान उन्होंने केवल लड़ाकू विमान उड़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण, परीक्षण, योजना निर्माण और रणनीतिक नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

3300 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव

एयर मार्शल दीक्षित भारतीय वायुसेना के उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फाइटर पायलट होने के साथ-साथ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट का भी दर्जा हासिल है।

उन्होंने 20 से अधिक प्रकार के विमानों पर 3300 घंटे से ज्यादा उड़ान भरी है। इनमें मिराज-2000, मिग-21, जगुआर और कई अन्य लड़ाकू तथा परीक्षण विमान शामिल हैं।

टेस्ट पायलट की जिम्मेदारी सामान्य फाइटर पायलट से कहीं अधिक मुश्किल होती है। ऐसे पायलट नए विमान, नए हथियार और नई तकनीकों का परीक्षण करते हैं। किसी भी विमान के अपग्रेड या नए सिस्टम को सर्विस में शामिल करने से पहले इन्हीं अधिकारियों की भूमिका सबसे अहम होती है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

कारगिल युद्ध के दौर की पीढ़ी के अधिकारी

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित उस पीढ़ी के अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना के बड़े बदलावों को करीब से देखा और उनमें योगदान दिया।

कारगिल संघर्ष के बाद भारत ने अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए। आधुनिक लड़ाकू विमान, सटीक हथियार, बेहतर रडार और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता विकसित की गई। एयर मार्शल दीक्षित इस पूरे परिवर्तन का हिस्सा रहे।

इसी वजह से उन्हें ऑपरेशनल अनुभव के साथ-साथ तकनीकी और रणनीतिक समझ रखने वाले अधिकारियों में गिना जाता है।

स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में बड़ी भूमिका

एयर मार्शल दीक्षित का नाम उन अधिकारियों में शामिल है, जिन्होंने भारतीय वायुसेना में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

वायुसेना मुख्यालय में विभिन्न जिम्मेदारियों के दौरान उन्होंने एलसीए मार्क-1ए, एलसीए मार्क-2 और एएमसीए जैसी परियोजनाओं को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एलसीए यानी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान है। वहीं एएमसीए भारत का प्रस्तावित पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान कार्यक्रम है।

सूत्रों का मानना है कि एयर मार्शल दीक्षित लगातार आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी सैन्य तकनीक के समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण से जुड़ा हुआ माना जाता है।

जगुआर और मिग-27 अपग्रेड कार्यक्रम में योगदान

टेस्ट पायलट के रूप में एयर मार्शल दीक्षित ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में काम किया। बेंगलुरु स्थित एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट में उन्होंने फ्लाइट टेस्ट स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। इस दौरान जगुआर और मिग-27 विमानों के एवियोनिक्स अपग्रेड कार्यक्रम में उनकी अहम भूमिका रही।

एवियोनिक्स किसी भी आधुनिक विमान का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग माना जाता है। रडार, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और वेपन कंट्रोल जैसे सिस्टम्स इसी का हिस्सा होती हैं।

इन अपग्रेड्स ने भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों की क्षमता बढ़ाने में मदद की।

मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट ट्रायल्स से भी जुड़े

भारतीय वायुसेना के इतिहास में मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एमएमआरसीए कार्यक्रम सबसे चर्चित रक्षा खरीद परियोजनाओं में से एक रहा है।

जब एयर मार्शल दीक्षित एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स के निदेशक थे, तब उन्होंने इस परियोजना से जुड़े परीक्षणों और योजना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही वह कार्यक्रम था जिसके बाद भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों को चुना था। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

सर्वश्रेष्ठ फाइटर ट्रेनिंग बेस का नेतृत्व

एयर मार्शल दीक्षित ने दक्षिण भारत में स्थित एक प्रमुख फाइटर ट्रेनिंग बेस की कमान भी संभाली।

उनके नेतृत्व के दौरान इस बेस को कमांड का बेस्ट ट्रेनिंग सेंटर घोषित किया गया। वायुसेना में प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भविष्य के फाइटर पायलट यहीं से तैयार होते हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार उनके नेतृत्व की खासियत केवल ऑपरेशनल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास पर भी विशेष ध्यान दिया।

थिएटराइजेशन और जॉइंट मिलिटरी स्ट्रक्चर्स में भूमिका

वर्तमान में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के पद पर कार्यरत हैं। यह पद तीनों सेनाओं के बीच बेहतर जॉइंटनेंस स्थापित करने के लिए बनाया गया है। भारत थिएटर कमांड मॉडल की दिशा में काम कर रहा है, जिसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर संयुक्त अभियान चला सकें।

सूत्रों के अनुसार एयर मार्शल दीक्षित ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी भूमिका तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाने और संयुक्त सैन्य योजना को आगे बढ़ाने में रही है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल नागेश कपूर होंगे रिटायर

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ऐसे समय वाइस चीफ का पद संभालेंगे जब एयर मार्शल नागेश कपूर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।

एयर मार्शल नागेश कपूर ने 1 जनवरी 2026 को वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभाला था। इससे पहले वे दक्षिण-पश्चिमी एयर कमांड और ट्रेनिंग कमांड जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।

उन्होंने मिग-21 और मिग-29 के लगभग सभी वर्जन उड़ाए हैं और उनके पास 3400 घंटे से अधिक उड़ान अनुभव है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं।

क्या भविष्य में बन सकते हैं एयर चीफ?

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति के बाद एक सवाल पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वे भविष्य में भारतीय वायुसेना के प्रमुख बन सकते हैं।

भारतीय सैन्य व्यवस्था में वाइस चीफ का पद अक्सर टॉप लीडरशिप की दौड़ में महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि एयर चीफ की नियुक्ति वरिष्ठता, सेवा अवधि, अनुभव और सरकार के निर्णय सहित कई कारकों पर निर्भर करती है। माना जा रहा है कि वे अगले चीफ ऑफ एयर स्टाफ की इस रेस में शामिल हैं।

फिलहाल एयर मार्शल दीक्षित की नई जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना के दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी के रूप में होगी। उनके सामने वायुसेना के आधुनिकीकरण, स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों, जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर और भविष्य की वायु युद्ध क्षमताओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषय होंगे। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह बन सकते हैं अगले CISC

रक्षा सूत्रों के अनुसार, दक्षिण पश्चिमी एयर कमांड (SWAC) के प्रमुख एयर मार्शल तेजिंदर सिंह को हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) का अगला चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (CISC) नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। एयर मार्शल तेजिंदर सिंह इससे पहले डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पद पर भी रह चुके हैं।

मौजूदा CISC एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 1 जुलाई को भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभालेंगे। उनके नए पद पर जाने के बाद CISC का पद खाली होगा, जिसके लिए एयर मार्शल तेजिंदर सिंह का नाम सबसे आगे माना जा रहा है।

जून 1987 में वायुसेना में कमीशन प्राप्त एयर मार्शल तेजिंदर सिंह एक अनुभवी फाइटर पायलट हैं और उनके पास 4500 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव है। अपने लंबे सैन्य करियर में उन्होंने फाइटर स्क्वाड्रन, रडार स्टेशन, बड़े एयरबेस और जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण कमांड जिम्मेदारियां संभाली हैं। उन्होंने वायुसेना मुख्यालय में भी कई अहम पदों पर काम किया है।

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह पहले हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में भी जिम्मेदारी निभा चुके हैं, जिससे उन्हें तीनों सेनाओं के जॉइंट ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन का अच्छा अनुभव है। वर्तमान में वे पश्चिमी सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

CISC का पद सीडीएस के अधीन काम करता है और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल, थिएटराइजेशन और संयुक्त सैन्य क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। रक्षा सूत्रों का मानना है कि उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए वे इस पद के मजबूत दावेदार हैं। (Air Marshal Ashutosh Dixit)

भारतीय नौसेना के MiG-29K को मिलेगी स्वदेशी ताकत, घातक विदेशी 80mm एयरो रॉकेट को देश में बनाने की तैयारी

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Image Source: PIB/Indian Navy

Indian Navy 80mm Aero Rocket: भारतीय सेनाएं लगातार डिफेंस सेक्टर में विदेश से आने वाले हथियारों पर से अपनी निर्भरता कम करने पर फोकस कर रही हैं। भारतीय नौसेना ने 80 एमएम एयरो रॉकेट के स्वदेशी डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य इस रॉकेट को पूरी तरह देश में डेवलप करना और निर्मित करना है ताकि भविष्य में इसके लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।

यह रॉकेट भारतीय नौसेना के मिग-29के और मिग-29केयूबी लड़ाकू विमानों से दागा जाता है। अब तक इसकी आपूर्ति विदेशी कंपनियों से होती रही है, लेकिन नौसेना चाहती है कि इसका पूरा उत्पादन भारत में ही हो। इससे न केवल सैन्य जरूरतें समय पर पूरी होंगी बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

Indian Navy 80mm Aero Rocket: क्या है 80 एमएम एयरो रॉकेट?

80 एमएम एयरो रॉकेट एक बिना गाइडेंस वाला एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट है। इसका मतलब है कि इसे लक्ष्य की दिशा में दागा जाता है और यह अपने रफ्तार और बैलिस्टिक रूट के आधार पर टारगेट तक पहुंचता है। यह कोई गाइडेड मिसाइल नहीं है, लेकिन युद्ध के मैदान में इसकी उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भारतीय नौसेना इस रॉकेट का इस्तेमाल जमीन पर मौजूद दुश्मन के ठिकानों, सैन्य वाहनों, रडार स्टेशनों, वेपंस सिस्टम्स और सैनिकों के खिलाफ करती है। इसकी खासियत यह है कि यह आर्मर्ड और सामान्य दोनों तरह के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाने में सक्षम है।

दुश्मन के टैंक और रडार पर कर सकता है हमला

इस रॉकेट में होलो-चार्ज फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड लगा होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह दो तरह से हमला करता है। पहला, यह टैंक या आर्मर्ड व्हीकल के कवच को भेद सकता है। दूसरा, विस्फोट के बाद इसकी धातु के टुकड़े बड़े इलाके में फैलकर आसपास के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाते हैं।

गोवा स्थित नौसेना के नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टरेट की तरफ से जारी ईओआई डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह रॉकेट टैंक, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, रडार इंस्टॉलेशन, लॉन्चर, पार्क किए गए विमान और दुश्मन के सैनिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि इसे नौसेना के लड़ाकू विमानों के लिए एक मल्टीपर्पज हथियार माना जाता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Image Source: PIB/Indian Navy

मिग-29के की स्ट्राइक क्षमता का अहम हिस्सा

भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर तैनात मिग-29के लड़ाकू विमान समुद्र और तटीय इलाकों में हमले की क्षमता रखते हैं। 80 एमएम एयरो रॉकेट इन्हीं विमानों से बी8एम-1 लॉन्चर के जरिए दागा जाता है।

किसी भी युद्ध की स्थिति में लड़ाकू विमान को कम समय में अधिक संख्या में टारगेट नष्ट करने होते हैं। ऐसे में इस तरह के रॉकेट सटीक और कम लागत वाले हथियार का बेहतरीन विकल्प हैं।

आकार छोटा लेकिन मारक क्षमता बड़ी

इस रॉकेट का कैलिबर 80 एमएम है और इसकी लंबाई करीब डेढ़ मीटर से अधिक है। इसका कुल वजन लगभग 11.3 किलोग्राम है, जबकि वॉरहेड का वजन 3.6 किलोग्राम है।

रॉकेट की अधिकतम रफ्तार लगभग 600 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है। इसकी प्रभावी मारक दूरी 1300 मीटर से लेकर 4000 मीटर तक है। यानी लड़ाकू विमान सुरक्षित दूरी से दुश्मन के टारगेट को हिट कर सकता है।

400 मिमी तक कवच भेदने की क्षमता

इस रॉकेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी होलो-चार्ज तकनीक है। डॉक्यूमेंट के अनुसार यह आदर्श स्थिति में 400 मिमी तक के कवच को भेद सकता है।

युद्ध के दौरान यह क्षमता महत्वपूर्ण होती है क्योंकि दुश्मन के आर्मर्ड व्हीकल और मिलिट्री प्लेटफॉर्म मजबूत सुरक्षा कवच से लैस होते हैं। ऐसे टारगेट्स को नष्ट करने के लिए विशेष प्रकार के हथियारों की आवश्यकता होती है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

विस्फोट के बाद बनते हैं सैकड़ों घातक टुकड़े

रॉकेट के फ्रैगमेंटेशन जैकेट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि विस्फोट के समय यह सैकड़ों धातु के टुकड़ों में टूट जाए। तकनीकी डॉक्यूमेंट के अनुसार इसमें कम से कम 400 फ्रैगमेंट बनते हैं, जिनमें प्रत्येक का वजन लगभग 3 ग्राम होता है।

ये टुकड़े तेजी से से चारों ओर फैलते हैं और बड़े इलाके में नुकसान पहुंचाते हैं। इसी वजह से यह रॉकेट सैनिकों के समूह, हल्के सैन्य ठिकानों और खुले में मौजूद टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी माना जाता है।

कैसे काम करता है यह रॉकेट?

जब पायलट रॉकेट दागने का आदेश देता है तो विमान से एक इलेक्ट्रिकल सिग्नल रॉकेट तक पहुंचता है। इससे रॉकेट मोटर एक्टिव हो जाती है और सॉलिड फ्यूल जलने लगता है। इसके बाद रॉकेट लॉन्चर से बाहर निकलता है और उसके पीछे लगे फिन खुल जाते हैं, जो उड़ान को स्टेबल बनाए रखते हैं।

उड़ान के लगभग एक से डेढ़ सेकंड बाद इसका फ्यूज एक्टिव हो जाता है। टारगेट से टकराने पर विस्फोट होता है और होलो-चार्ज तथा फ्रैगमेंटेशन प्रभाव पैदा होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

कठिन मौसम में भी कर सकता है काम

नौसेना के लिए विकसित इस रॉकेट को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए बनाया गया है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे माइनस 60 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा यह उच्च आर्द्रता और समुद्री वातावरण को भी झेल सकता है। नौसेना के लिए यह जरूरी है क्योंकि समुद्र में तैनाती के दौरान हथियारों को नमक और नमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

15 साल तक सुरक्षित रह सकता है स्टॉक

रॉकेट की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे 15 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसकी उम्र बढ़ाने की व्यवस्था भी मौजूद है।

यह किसी भी सैन्य बल के लिए अहम है क्योंकि हथियारों का बड़ा भंडार लंबे समय तक स्टोर करके रखना पड़ता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

नौसेना को कितने रॉकेट चाहिए?

ईओआई डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि सफल प्रोटोटाइप विकास के बाद नौसेना शुरुआती चरण में 273 हाई एक्सप्लोसिव रॉकेट और 2400 प्रैक्टिस या इनर्ट रॉकेट खरीद सकती है।

प्रैक्टिस रॉकेट ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि हाई एक्सप्लोसिव संस्करण एक्चुअल ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

स्वदेशीकरण पर है फोकस

नौसेना ने साफ कहा है कि वर्तमान में 80 एमएम एयरो रॉकेट के लिए कोई स्वदेशी सोर्स उपलब्ध नहीं है और मौजूदा स्टॉक विदेशी ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) से खरीदा गया था।

यही वजह है कि अब इस पूरे सिस्टम को देश में डेवलप करने की योजना बनाई गई है। डॉक्यूमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी सब-असेंबली स्वदेशी रूप से डेवलप की जानी चाहिए और किसी विदेशी कंपनी पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए।

नौसेना ने केवल उन्हीं भारतीय कंपनियों को आवेदन करने के लिए कहा है जिनके पास सैन्य स्तर के रॉकेट बनाने का अनुभव हो। चयनित कंपनियों को डिजाइन, अनुसंधान, परीक्षण, प्रमाणन और उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इसके लिए एयरवर्थीनेस सर्टिफिकेशन, गुणवत्ता परीक्षण और कई तकनीकी मानकों को पूरा करना होगा। सफल विकास के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता खुलेगा। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

DFPDS 2026 Explained: आखिर फील्ड कमांडर्स को क्यों मिले दोगुने वित्तीय अधिकार? जानें इससे भारतीय सेना को क्या होगा फायदा?

DFPDS 2026 Explained
Photo Source: Ministry of Defence

DFPDS 2026 Explained: युद्ध केवल टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से नहीं जीते जाते। किसी भी सेना की असली ताकत इस बात में होती है कि जरूरत पड़ने पर उसे जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, हथियार, ईंधन और तकनीकी संसाधन कितनी तेजी से मिल पाते हैं। अगर सीमा पर तैनात किसी कमांडर को जरूरी सामान खरीदने के लिए महीनों तक फाइलें दिल्ली भेजनी पड़ें, तो इससे ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 4 जून को डिफेंस सर्विसेज के लिए वित्तीय शक्तियों के नए नियम जारी किए हैं। इसे डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स फॉर डिफेंस सर्विसेज (DFPDS-2026) कहा जाता है। नए नियमों के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के फील्ड कमांडरों को पहले के मुकाबले कहीं अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कई मामलों में वित्तीय अधिकारों को 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है, जबकि कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी दोगुने से भी अधिक है। सरकार का मानना है कि इससे खरीद प्रक्रिया तेज होगी, निर्णय लेने में समय कम लगेगा और सेनाओं को जरूरत के मुताबिक संसाधन समय पर मिल सकेंगे।

DFPDS 2026 Explained: क्या होते हैं वित्तीय अधिकार?

इसे बहुत आसान भाषा में समझा जाए तो वित्तीय अधिकार का मतलब है कि कोई अधिकारी कितनी राशि तक का खर्च या खरीदारी अपने स्तर पर मंजूर कर सकता है।

मान लीजिए किसी मिलिट्री यूनिट को अचानक स्पेयर पार्ट्स, विशेष उपकरण, संचार प्रणाली या अन्य जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ जाती है। अगर कमांडर के पास पर्याप्त वित्तीय अधिकार हैं, तो वह सीधे खरीद की मंजूरी दे सकता है। लेकिन अगर अधिकार सीमित हैं तो फाइल को कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।

यही कारण है कि युद्ध या तनावपूर्ण परिस्थितियों में अधिक वित्तीय अधिकार तेजी से फैसले लेने में मदद करते हैं।

सरकार ने क्यों किया यह बदलाव?

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पिछली बार वित्तीय शक्तियों में बड़ा संशोधन 2021 में किया गया था। उसके बाद सेनाओं का आकार बढ़ा है, ऑपरेशनल जिम्मेदारियां बढ़ी हैं और रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी हुई है।

सीमा पर लगातार बदलते सुरक्षा माहौल, आधुनिक वेपन सिस्टम्स के रखरखाव और नई तकनीकों के इस्तेमाल के कारण खर्च भी बढ़ा है। ऐसे में 2021 के नियम कई जगहों पर पर्याप्त नहीं रह गए थे।

इसी वजह से नए सिरे से समीक्षा कर वित्तीय अधिकारों को बढ़ाने का फैसला लिया गया। (DFPDS 2026 Explained)

फील्ड कमांडरों को क्या फायदा मिलेगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन अधिकारियों को मिलेगा जो सीधे ऑपरेशनल क्षेत्रों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
पहले कई मामलों में छोटी-छोटी खरीद के लिए भी हेड क्वॉर्टर की मंजूरी लेनी पड़ती थी। अब फील्ड कमांडर अपने स्तर पर अधिक राशि तक खरीदारी कर सकेंगे।

इसका मतलब यह है कि सीमा पर तैनात सैनिकों को जरूरी उपकरण, वाहन स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सामग्री या अन्य संसाधन जल्दी मिल सकेंगे।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होता है। अगर फैसले लेने में देरी होती है तो उसका असर ऑपरेशनल क्षमता पर पड़ता है।

1.25 लाख करोड़ रुपये की खरीद का क्या मतलब है?

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि नए वित्तीय अधिकारों के जरिए चालू वित्तीय वर्ष के बजट के अनुसार 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

यह राशि रेवेन्यू रूट के तहत खर्च की जाएगी। रेवेन्यू रूट का मतलब उन खर्चों से है जो रोजमर्रा की सैन्य जरूरतों, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत, गोला-बारूद और अन्य संचालन संबंधी जरूरतों पर किए जाते हैं।

इस फैसले से बड़ी संख्या में खरीद प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। (DFPDS 2026 Explained)

आत्मनिर्भर भारत को कैसे मिलेगा फायदा?

नए नियमों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वदेशीकरण और अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय शक्तियों को दोगुना कर दिया गया है। इसका सीधा संबंध आत्मनिर्भर भारत अभियान से है।

पिछले कुछ सालों से सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि भारतीय सेनाएं विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करें और अधिक से अधिक उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए जाएं।

अब मिलिट्री यूनिट्स और कमांडरों के पास स्वदेशी उत्पादों और तकनीकों की खरीद के लिए अधिक अधिकार होंगे।

इससे रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे स्टार्टअप, एमएसएमई, निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है।

विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों के लिए भारत अभी भी विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं पर निर्भर है। जब कोई उपकरण विदेश से आता है तो उसके स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और तकनीकी सहायता के लिए भी उसी देश या कंपनी पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार चाहती है कि ऐसी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो।

नए वित्तीय अधिकार इसी दिशा में एक कदम माने जा रहे हैं क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर विकसित तकनीकों और उत्पादों की खरीद आसान होगी। (DFPDS 2026 Explained)

जॉइंट प्रोक्योरमेंट सिस्टम को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय ने इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त खरीद को बढ़ावा देने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को कुछ समान प्रकार के उपकरणों की जरूरत होती है। पहले कई बार अलग-अलग खरीद प्रक्रिया चलती थी।

अब जिस सेवा को लीड सर्विस बनाया जाएगा, उसे ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे ताकि वह सभी के लिए संयुक्त खरीद कर सके। इससे समय की बचत होगी और लागत भी कम हो सकती है। (DFPDS 2026 Explained)

2021 में क्या हुए थे बदलाव?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इससे पहले सितंबर 2021 में रक्षा सेवाओं के वित्तीय अधिकारों में बड़ा बदलाव किया था। उस समय भी सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को पहले के मुकाबले ज्यादा वित्तीय शक्तियां दी गई थीं।

2021 में ज्यादातर कंपीटेंट फाइनेंशियल अथॉरिटीज (सीएफए) के अधिकार दोगुने कर दिए गए थे। यानी जो अधिकारी पहले एक निश्चित सीमा तक खरीदारी या खर्च की मंजूरी दे सकते थे, उन्हें उससे दोगुनी राशि तक फैसला लेने का अधिकार मिल गया था।

इसके अलावा, कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के फील्ड कमांडरों को कुछ मामलों में पांच से दस गुना तक अधिक वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, ताकि ऑपरेशनल जरूरतों को तेजी से पूरा किया जा सके।

उसी दौरान स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय अधिकारों को तीन गुना तक बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना और देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना था।

वहीं, वाइस चीफ स्तर के अधिकारियों की वित्तीय सीमा भी बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। (DFPDS 2026 Explained)

2021 और 2026 के नियमों में क्या अंतर है?

2021 में ज्यादातर अधिकारियों के वित्तीय अधिकार दोगुने किए गए थे। अब 2026 में इन्हें फिर से 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी दो गुने से भी ज्यादा है। इससे अधिकारी पहले की तुलना में अधिक राशि की खरीद और मंजूरी खुद दे सकेंगे।

2021 में कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के कमांडरों को ऑपरेशनल जरूरतों के लिए 5 से 10 गुना तक अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए थे।

अब 2026 में इन शक्तियों को और बढ़ा दिया गया है। सीमा पर तैनात कमांडर आपात जरूरतों के लिए पहले से ज्यादा तेजी से खरीदारी कर सकेंगे।

वहीं, 2021 में स्वदेशी रक्षा उपकरणों और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) परियोजनाओं के लिए वित्तीय सीमा तीन गुना तक बढ़ाई गई थी।

2026 में इन अधिकारों को फिर से दोगुना कर दिया गया है। इसका मतलब है कि 2016 की तुलना में अब स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान के लिए उपलब्ध वित्तीय शक्तियां कई गुना बढ़ चुकी हैं। इससे भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स और रक्षा उद्योग को फायदा मिलेगा।

2021 में सेना, नौसेना और वायुसेना के वाइस चीफ की वित्तीय सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। 2026 के दस्तावेज में अलग से नई सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन कुल वित्तीय अधिकारों में हुई बढ़ोतरी का लाभ इस स्तर के अधिकारियों को भी मिलेगा।

2021 में नौसेना और वायुसेना को भी वे विशेष वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, जो पहले मुख्य रूप से सेना के पास थीं। 2026 में तीनों सेनाओं के कमांडरों के लिए इन विशेष अधिकारों को और बढ़ा दिया गया है। आपातकालीन और ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कुल वित्तीय सीमा भी दोगुनी कर दी गई है।

2021 में संयुक्त खरीद की व्यवस्था सीमित स्तर पर मौजूद थी। वहीं, अब 2026 में नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत यदि किसी उपकरण की खरीद तीनों सेनाओं के लिए एक साथ करनी हो तो जिस सेवा को लीड एजेंसी बनाया जाएगा, उसे सामान्य से अधिक वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे। इससे संयुक्त खरीद प्रक्रिया तेज होगी और समय की बचत होगी।

2021 में कुछ नए अधिकारियों को वित्तीय अधिकार दिए गए थे। 2026 में और अधिक अधिकारियों को सक्षम वित्तीय प्राधिकरण (सीएफए) बनाया गया है। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा विकेंद्रीकृत होगी और छोटे-छोटे मामलों के लिए फाइलें ऊपर नहीं भेजनी पड़ेंगी।

2021 में फील्ड कमांडरों को सीमित स्तर पर तुरंत खरीद की सुविधा मिली थी। 2026 में सरकार का अनुमान है कि 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया को फील्ड स्तर पर ही गति मिल सकेगी। इससे सेनाओं को जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और सेवाएं समय पर मिल पाएंगी। (DFPDS 2026 Explained)

क्या इससे युद्धकालीन तैयारी बेहतर होगी?

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी सैन्य बल की तैयारी केवल हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। महत्वपूर्ण यह भी होता है कि जरूरत पड़ने पर मरम्मत, रखरखाव और पुनः आपूर्ति कितनी तेजी से हो सकती है।

यदि फील्ड कमांडरों को पर्याप्त अधिकार हों तो वे तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक सेनाएं निर्णय प्रक्रिया को अधिक डिसेंट्रलाइजेशन बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। (DFPDS 2026 Explained)

डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 से क्या है संबंध?

रक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2025 में संशोधित डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल जारी किया था। उसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना था। अब वित्तीय अधिकारों में यह नया संशोधन उसी प्रक्रिया को और मजबूत बनाता है।

एक तरफ खरीद के नियमों को आसान बनाया गया है और दूसरी तरफ खरीद को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की शक्तियां बढ़ाई गई हैं। दोनों कदम मिलकर रक्षा खरीद प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम करेंगे। (DFPDS 2026 Explained)

कौन है दुनिया के सबसे खतरनाक एयर डिफेंस सिस्टम S-400 का बॉडीगार्ड? जानें भारत को क्यों है जरूरत

S-400 Bodyguard Pantsir System
AI-Generated Image

S-400 Bodyguard Pantsir System: भारत को अपना चौथा एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 मिल गया है। भारत और रूस के बीच साल 2018 में पांच एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत को कुल पांच स्क्वाड्रन मिलने हैं। भारतीय वायुसेना ने रूस निर्मित एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को “सुदर्शन चक्र” नाम दिया है। यह दुनिया के सबसे आधुनिक और लंबी दूरी तक मार करने वाले एयर डिफेंस सिस्टमों में गिना जाता है। इसकी क्षमता इतनी ज्यादा है कि यह सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ रहे लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल और निगरानी विमानों को निशाना बना सकता है।

लेकिन चाहे कोई भी हथियार कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसकी सुरक्षा के लिए भी एक सुरक्षा कवच की जरूरत होती है। यही वजह है कि रूस अपनी एस-400 बैटरियों को अकेले तैनात नहीं करता। इनके साथ हमेशा एक विशेष शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम लगाया जाता है, जिसका नाम है पेंटसिर-एस1 या पेंटसिर-एस1एम।

इसी वजह से दुनिया भर के सैन्य विश्लेषक पेंटसिर को एस-400 का “बॉडीगार्ड” कहते हैं।

S-400 Bodyguard Pantsir System: आखिर एस-400 को क्यों पड़ती है बॉडीगार्ड की जरूरत?

पहली नजर में यह सवाल अजीब लग सकता है कि जब एस-400 खुद 400 किलोमीटर दूर तक टारगेट को मार सकता है, तो उसे सुरक्षा की क्या जरूरत है।

दरअसल आधुनिक युद्ध में खतरे केवल लड़ाकू विमानों या बड़ी मिसाइलों से नहीं आते। पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष और हाल के सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलें भी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बन सकते हैं।

ऐसे हथियार बहुत कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और कई बार रडार की पकड़ से बचने की कोशिश करते हैं। यदि इनमें से कोई हथियार एस-400 की बैटरी, उसके रडार या कमांड सेंटर तक पहुंच जाए तो पूरे एयर डिफेंस नेटवर्क को नुकसान हो सकता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

क्या है पेंटसिर सिस्टम?

पेंटसिर रूस का ही बनाया हुआ एक शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे केबीपी इंस्ट्रूमेंट डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मिसाइल और गन दोनों लगे होते हैं। यानी यह दो तरह से हमला कर सकता है।

वहींस, पेंटसिर कोई एस-400 की तरह बड़ा एयर डिफेंस सिस्टम नहीं है। यह एक छोटा लेकिन बेहद तेज शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे आमतौर पर एक कॉम्बैट व्हीकल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यानी पूरा सिस्टम एक ट्रक पर लगा होता है और जरूरत पड़ते ही कुछ मिनटों में कार्रवाई शुरू कर सकता है।

एक पेंटसिर यूनिट में 12 मिसाइलें लगी होती हैं, जो लॉन्च के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। ये मिसाइलें हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लॉयटरिंग म्यूनिशन जैसे लक्ष्यों को मार सकती हैं। इसकी मारक क्षमता लगभग 20 किलोमीटर तक होती है।

मिसाइलों के अलावा पेंटसिर में दो शक्तिशाली 30 मिमी ऑटोमैटिक गन भी लगी होती हैं। ये गन प्रति मिनट लगभग 5,000 राउंड फायर कर सकती हैं और करीब 4 किलोमीटर तक के टारगेट्स को हिट कर सकती हैं। किसी ड्रोन या मिसाइल के बहुत करीब आने पर ये गन तुरंत एक्टिव हो जाती हैं।

पेंटसिर की एक और खासियत यह है कि यह एक समय में कई हवाई खतरों पर नजर रख सकता है और लगभग 4 टारगेट्स को एक साथ निशाना बना सकता है। पूरे सिस्टम को चलाने के लिए आमतौर पर तीन लोगों की जरूरत होती है, जिनमें एक ड्राइवर और दो ऑपरेटर शामिल होते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 में जहां “स्क्वाड्रन” शब्द इस्तेमाल होता है, वहीं पेंटसिर के लिए आमतौर पर “बैटरी” शब्द इस्तेमाल किया जाता है। एक बैटरी में आमतौर पर 4 से 6 पेंटसिर व्हीकल्स होते हैं। इनके साथ एक कमांड वाहन, मिसाइल री-लोडिंग वाहन और अन्य सहायक उपकरण भी तैनात किए जाते हैं।

अगर किसी बैटरी में 6 पेंटसिर वाहन हों, तो उसके पास कुल 72 मिसाइलें और 12 ऑटोमैटिक गन उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि यह छोटी दूरी की हवाई सुरक्षा के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है।

भारत में पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए देखा जा रहा है। इसका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चरों को ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और अन्य नजदीकी हवाई खतरों से बचाना होगा। इसी कारण इसे अक्सर एस-400 का “बॉडीगार्ड” कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो एस-400 दूर बैठे दुश्मन को मारता है, जबकि पेंटसिर उन खतरों को खत्म करता है जो एस-400 के बहुत करीब पहुंच जाते हैं। दोनों मिलकर एक मजबूत और बहुस्तरीय हवाई सुरक्षा कवच तैयार करते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

DAC S-400 India Approval
Pic Source- IAF Disha

ड्रोन वॉरफेयर में बढ़ी जरूरत

कुछ साल पहले तक एयर डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों और बड़ी मिसाइलों के खिलाफ बनाए जाते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज हजारों डॉलर की कीमत वाला एक छोटा ड्रोन करोड़ों रुपये के मिलिट्री सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें सस्ते एफपीवी ड्रोन ने टैंक, रडार और सैन्य वाहनों को निशाना बनाया। यही कारण है कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टमों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा परत की जरूरत महसूस की जाने लगी। वहीं, पेंटसिर इसी जरूरत को पूरा करता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 और पेंटसिर मिलकर कैसे बनाते हैं सुरक्षा कवच?

सैन्य भाषा में इसे “लेयर्ड एयर डिफेंस” कहा जाता है। इसका मतलब है कि दुश्मन के हमले को रोकने के लिए सुरक्षा की कई परतें बनाई जाएं। सबसे बाहरी परत एस-400 की होती है।

यह 40 किलोमीटर से लेकर 400 किलोमीटर तक की दूरी पर दुश्मन के बड़े टारगेटों को निशाना बनाता है।

इसके बाद मध्यम दूरी वाले सिस्टम काम करते हैं। सबसे अंदर की सुरक्षा परत पेंटसिर संभालता है। यदि कोई ड्रोन, क्रूज मिसाइल या अन्य हथियार सभी परतों को पार करके अंदर तक पहुंच जाए तो पेंटसिर उसे लास्ट फेज में नष्ट करने का प्रयास करता है। इसलिए इसे एस-400 का निजी सुरक्षा गार्ड भी कहा जाता है।

रूस कैसे करता है अपनी एस-400 साइटों की सुरक्षा?

रूस लंबे समय से इस रणनीति का उपयोग कर रहा है। सीरिया में रूसी एयरबेसों की सुरक्षा के दौरान एस-400 और पेंटसिर को एक साथ तैनात किया गया था। यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कई एस-400 बैटरियों के आसपास पेंटसिर सिस्टम देखे गए।

इनका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चर वाहनों को छोटे लेकिन खतरनाक हवाई खतरों से बचाना था। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

S-400 Bodyguard Pantsir System
Pantsir S1M Air Defence System

भारत ने पेंटसिर खरीदने में दिखाई रुचि

भारत ने 2018 में रूस के साथ एस-400 की खरीद का समझौता किया था। इसके तहत पांच स्क्वाड्रन भारत को मिलने थे। इनमें से तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारतीय वायुसेना को मिल चुके हैं। वहीं, चौथा स्क्वाड्रन हाल ही में भारत पहुंचा है। इसके पांच और अतिरिक्त स्क्वाड्रन भारत ने ऑर्डर किए हैं, जिन्हें रक्षा मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है।

वहीं, हाल के सालों में ड्रोन खतरों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पश्चिमी सीमा और उत्तरी सीमा दोनों क्षेत्रों में ड्रोन, स्वार्म अटैक और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हथियारों का खतरा बढ़ा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इसी वजह से भारतीय वायुसेना ने एस-400 बैटरियों की नजदीकी सुरक्षा के लिए पेंटसिर जैसे सिस्टम में रुचि दिखाई है। भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए रूस से 13 पेंटसिर-एस1 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का प्रस्ताव रखा है। इनमें से 10 सिस्टम भारतीय वायुसेना को दिए जाने की योजना है, जिनका मुख्य काम एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की सुरक्षा करना होगा। वहीं 3 सिस्टम भारतीय थलसेना को मिल सकते हैं, जिन्हें सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों से निपटने के लिए तैनात किया जाएगा।

इस प्रस्ताव को मार्च 2026 में रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) ने मंजूरी दी थी। इसके बाद रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भी इसके लिए “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी आवश्यकता की औपचारिक स्वीकृति दे दी। इसी दौरान एस-400 के लिए अतिरिक्त 288 मिसाइलों की खरीद के प्रस्ताव के साथ पेंटसिर सिस्टम को भी शामिल किया गया। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

इस परियोजना पर काम पहले से चल रहा था। साल 2024 में भारत की भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और रूस की रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत किए थे।

खरीद प्रक्रिया को तेज करने के लिए फास्ट-ट्रैक रूट अपनाया गया है, ताकि सिस्टम जल्द से जल्द भारतीय सेनाओं को मिल सकें। योजना के अनुसार शुरुआती कुछ पेंटसिर सिस्टम सीधे रूस से आयात किए जाएंगे। इसके बाद आने वाले सिस्टम भारत में ही “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम के तहत बीडीएल और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों की भागीदारी से बनाए जा सकते हैं।

फिलहाल अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर और सिस्टम की डिलीवरी का इंतजार किया जा रहा है। पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा परत माना जा रहा है, क्योंकि यह ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अन्य हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन और कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों ने एयर डिफेंस की नई चुनौतियों को सामने रखा। लंबी दूरी वाले सिस्टम अपने काम में सफल रहे, लेकिन छोटे और तेजी से बदलते टारगेटों के खिलाफ एक अतिरिक्त सिक्योरिटी लेयर की जरूरत महसूस की गई।

इसी के चलते पेंटसिर की खरीद को लेकर चर्चा शुरू हुई। हालांकि भारत पहले से ही मल्टीलेवल एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रहा है। इसमें एस-400, आकाश, एमआरएसएएम, क्यूआरएसएएम और दूसरे सिस्टम्स भी शामिल हैं।

वहीं, पेंटसिर को इस नेटवर्क की सबसे अंदरूनी सुरक्षा परत के रूप में देखा जा रहा है। यह उन टारगेटों को रोकने का काम करेगा जो अन्य परतों को पार करके बेहद करीब पहुंच जाएं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 के एक स्क्वाड्रन में कितने लॉन्चर

भारतीय वायुसेना के एस-400 सिस्टम की एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर होते हैं। यह स्क्वाड्रन दो बैटरियों में बंटी होती है और हर बैटरी में 6-6 लॉन्चर लगाए जाते हैं। इस तरह एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर तैनात रहते हैं।

हर लॉन्चर में एक समय पर 4 मिसाइलें तैयार रखी जा सकती हैं। यानी 12 लॉन्चरों में कुल 48 मिसाइलें तुरंत दागने के लिए तैयार रहती हैं।

एक एस-400 स्क्वाड्रन के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें होती हैं। इसमें करीब 256 मिसाइलों का स्टॉक रखा जाता है। इनमें अलग-अलग दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल होती हैं। 40N6E मिसाइल लगभग 400 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है, 48N6E3 की मारक क्षमता करीब 240 किलोमीटर है, जबकि 9M96E2 मिसाइल करीब 120 किलोमीटर तक के हवाई खतरों को नष्ट कर सकती है। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

रडार नेटवर्क है एस-400 की ताकत

एस-400 की ताकत सिर्फ उसकी मिसाइलें नहीं हैं, बल्कि उसका रडार नेटवर्क भी है। इसका 92N6E “ग्रेव स्टोन” रडार लगभग 600 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इसके अलावा 30K6E कमांड पोस्ट पूरे सिस्टम का दिमाग होता है, जो रडार से मिली जानकारी का विश्लेषण करके लॉन्चरों को निर्देश देता है। इसके साथ सर्च रडार, एंगेजमेंट रडार और कई सपोर्ट वाहन भी तैनात रहते हैं।

एक पूरे एस-400 स्क्वाड्रन में लॉन्चर, रडार, कमांड वाहन और रीलोडिंग ट्रकों सहित लगभग 16 प्रमुख वाहन होते हैं। यह पूरी यूनिट बहुत तेजी से काम शुरू कर सकती है और आमतौर पर 5 से 10 मिनट के भीतर ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक एस-400 स्क्वाड्रन एक साथ 36 अलग-अलग एरियल टारगेट्स पर नजर रखकर उन्हें निशाना बना सकती है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली एयर डिफेंस सिस्टमों में गिना जाता है।

भारत ने रूस से कुल 5 एस-400 स्क्वाड्रन खरीदी हैं। इसका मतलब है कि पूरी डील के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 60 लॉन्चर मिलने हैं। ताकि इन्हें जरूरत के अनुसार पाकिस्तान या चीन सीमा के अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से तैनात किया जा सके। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

Explainer: क्या यूनिफॉर्म में कैप्टन भारत भारद्वाज का मैरिज प्रपोजल देना नियमों के खिलाफ है? जानिए क्या कहता है आर्मी एक्ट 1950

Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy
Photo Source: Social Media

Captain Bharat Bhardwaj: भारतीय सेना के एक युवा अधिकारी का अपनी मंगेतर को किया गया विवाह प्रस्ताव इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ सोशल मीडिया पर लाखों लोग इसे प्यार और भावनाओं से जुड़ा खूबसूरत पल बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ सैन्य परंपराओं और अनुशासन को लेकर बहस शुरू हो गई है।

मामला नासिक स्थित कॉम्बैट आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल (सीएएटीएस) से जुड़ा है, जहां पासिंग आउट परेड के बाद कैप्टन भारत भारद्वाज ने अपनी मंगेतर आरुषि को हेलीकॉप्टर के सामने घुटनों पर बैठकर प्रपोज किया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना ने मामले का संज्ञान लिया है और अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया है। हालांकि अभी तक सेना की ओर से कोई औपचारिक सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है और न ही किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की पुष्टि हुई है।

Captain Bharat Bhardwaj: आखिर हुआ क्या था?

2 जून को नासिक स्थित कॉम्बैट आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल में पासिंग आउट परेड आयोजित की गई थी। इस दौरान ट्रेनी अफसरों को कठिन प्रशिक्षण पूरा करने के बाद नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार घोषित किया जाता है।

इसी समारोह के बाद कैप्टन भारत भारद्वाज ने अपनी मंगेतर को शादी के लिए प्रपोज किया। वीडियो में दिखाई देता है कि अधिकारी यूनिफॉर्म में हैं और उनके पीछे सेना का हेलीकॉप्टर खड़ा है। परिवार के सदस्य, साथी अधिकारी और अन्य लोग भी वहां मौजूद दिखाई देते हैं।

जैसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा, यह तेजी से वायरल हो गया। लाखों लोगों ने इसे देखा और हजारों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी।

सोशल मीडिया पर लोगों ने इस वीडियो को एक इमोशनल मोमेंट के तौर पर देखा। कई लोगों ने लिखा कि वर्षों की मेहनत के बाद जब एक अफसर ने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की, तो उसने उसी दिन अपने जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण फैसले को भी सार्वजनिक कर दिया।

सेना को आपत्ति किस बात पर है?

सूत्रों के अनुसार सेना को विवाह प्रस्ताव से नहीं, बल्कि उसके तरीके और स्थान से आपत्ति है। भारतीय सेना में यूनिफॉर्म संस्था की प्रतिष्ठा, जिम्मेदारी और अनुशासन का प्रतीक होती है। इसी तरह पासिंग आउट परेड भी एक औपचारिक सैन्य समारोह माना जाता है, जिसके अपने नियम और परंपराएं होती हैं।

सेना का मानना है कि किसी आधिकारिक सैन्य कार्यक्रम और सैन्य उपकरणों को निजी आयोजन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। सूत्रों के अनुसार समय, स्थान और सैन्य परंपराओं के देखते हुए इस घटना को उचित नहीं माना जा रहा है। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

ऐसे मामलों में क्या हैं सेना के नियम?

भारतीय सेना का पूरा स्ट्रक्चर अनुशासन पर आधारित है। सेना के अधिकारी और जवान सिर्फ ड्यूटी के समय ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यही वजह है कि यूनिफॉर्म पहनकर सार्वजनिक गतिविधियों, सोशल मीडिया पोस्ट, विज्ञापन, राजनीतिक गतिविधियों और निजी प्रचार से जुड़े कई नियम मौजूद हैं। भारतीय सेना का अनुशासन आर्मी एक्ट 1950 और आर्मी रूल्स 1954 के अंतर्गत आता है। इनमें ऑफिशियल मिलिट्री समारोह, डिफेंस इंस्टॉलेशन और यूनिफॉर्म में पर्सनल इवेंट करने पर सख्ती है।

हालांकि शादी का प्रपोजल देने जैसे कोई अलग नियम सार्वजनिक रूप से उल्लेखित नहीं है, लेकिन सैन्य प्रतिष्ठानों और आधिकारिक समारोहों के उपयोग को लेकर स्पष्ट परंपराएं हैं।

इसी वजह से इस मामले को सीधे अपराध की बजाय प्रोटोकॉल और सैन्य मर्यादा के नजरिए से देखा जा रहा है।

क्या कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है?

अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार कोई एफआईआर, पुलिस मामला या आपराधिक जांच नहीं हुई है। यह पूरी तरह सेना का आंतरिक मामला है।

हालांकि शो-कॉज नोटिस की संभावना जताई गई है। सेना के सूत्रों का कहना है कि अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया है और वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की जानकारी दी गई है। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

क्या है सेक्शन 63?

इस मामले के सामने आने के बाद आर्मी एक्ट 1950 के सेक्शन 63 को लेकर चर्चा हो रही है। सेक्शन 63 का संबंध “गुड ऑर्डर एंड मिलिट्री डिसिप्लिन” यानी सैन्य अनुशासन और व्यवस्था से जुड़ा है।

सरल भाषा में समझें तो यदि कोई ऐसा कार्य किया जाता ,है जो सेना के अनुशासन, परंपरा या प्रतिष्ठा के खिलाफ माना जाए और जिसके लिए कोई अलग विशेष प्रावधान मौजूद न हो, तो इस सेक्शन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यदि सेना इसे अनुशासनात्मक मामला मानती है, तो सैद्धांतिक रूप से सेक्शन 63 का संदर्भ सामने आ सकता है। हालांकि अभी तक सेना ने अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी भी सेक्शन का उल्लेख नहीं किया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा या सैन्य गोपनीयता से जोड़ना उचित नहीं

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन ने इस मामले पर युवा अधिकारी का समर्थन करते हुए कहा कि देश अपने सैनिकों से राष्ट्र के लिए जान तक न्योछावर करने की उम्मीद करता है, लेकिन जब वही सैनिक अपनी मंगेतर के प्रति प्रेम जाहिर करता है तो उस पर सवाल उठने लगते हैं।

उन्होंने कहा कि सेना में एक कहावत है- “अगर युवा अधिकारी नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा?” उनके अनुसार जवान और अधिकारी भी इंसान होते हैं, जिनकी अपनी भावनाएं और निजी जिंदगी होती है।

जनरल ढिल्लन का मानना है कि यदि किसी अधिकारी की पेशेवर क्षमता, प्रशिक्षण या सैन्य प्रदर्शन में कोई कमी नहीं है, तो केवल एक भावनात्मक और सम्मानजनक प्रेम प्रस्ताव को लेकर अनावश्यक आलोचना नहीं की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य उपकरणों को पहले भी देशभर में आयोजित “नो योर आर्मी” जैसे कार्यक्रमों में आम लोगों के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ऐसे आयोजनों में छात्र और नागरिक सेना के टैंकों, हेलीकॉप्टरों और अन्य उपकरणों के साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं, जो सेना के प्रति गर्व और सम्मान की भावना का प्रतीक होता है।

इसलिए उनके मुताबिक इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा या सैन्य गोपनीयता से जोड़ना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि युवा अधिकारी को गर्व और सम्मान के साथ देश की सेवा करने दीजिए। एक भावनात्मक पल को जरूरत से ज्यादा विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

क्या कोर्ट मार्शल हो सकता है?

सूत्रों का कहना है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि यह मामला अधिकतम परामर्श, चेतावनी या औपचारिक समझाइश तक सीमित रह सकता है।

सेना और वायुसेना के कई रिटायर्ड अधिकारियों का मानना है कि युवा अधिकारी भावनाओं में बह गया और उसने अपने जीवन के महत्वपूर्ण दिन को यादगार बनाने की कोशिश की। वहीं कुछ अधिकारियों का कहना है कि सैन्य परंपराओं का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि यही संस्थाओं की पहचान होती है।

सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत का कहना है कि कैप्टन भारत भारद्वाज ने शायद भावनाओं में आकर प्रोटोकॉल की सीमा थोड़ी पार कर दी, लेकिन इसे बहुत बड़ा मुद्दा बनाने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि युवा अधिकारी ने अभी-अभी कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके कॉम्बैट हेलीकॉप्टर पायलट के तौर पर अपनी “विंग्स” हासिल की थीं। पासिंग आउट परेड के बाद भावुक होकर उन्होंने अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज कर दिया। वह यूनिफॉर्म में थे, पीछे हेलीकॉप्टर खड़ा था और परिवार व साथी अधिकारी उनके लिए खुशी जता रहे थे।

अहलावत के अनुसार यह एक मानवीय और रोमांटिक पल था, लेकिन सैन्य प्रोटोकॉल और अनुशासन के लिहाज से इसे पूरी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। सेना की नाराजगी अपनी जगह सही है।

हालांकि उनका मानना है कि मामला संभवतः वरिष्ठ अधिकारी की समझाइश और हल्की फटकार तक ही सीमित रहेगा। कैप्टन को नियमों की याद दिलाई जाएगी और बात वहीं खत्म हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि देश अपने युवा सैनिकों और अधिकारियों को बिना हिचक कठिन और खतरनाक मिशनों पर भेजता है। ऐसे में अगर कोई युवा अधिकारी भावनाओं में बहकर छोटी सी गलती कर देता है, तो उसे भी मानवीय नजरिए से देखा जाना चाहिए।

अहलावत ने कहा कि अनुशासन सेना की रीढ़ है, लेकिन मानवीय भावनाएं उसकी आत्मा हैं। केवल नियमों से नहीं, बल्कि जज्बे और भावना से भी सैनिक कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं।

उनके मुताबिक किसी अधिकारी के व्यक्तित्व और भावनाओं की छोटी सी झलक सेना को कमजोर नहीं बनाती। उन्होंने यह भी कहा कि वायुसेना में अतीत में युवा अधिकारियों से इससे बड़ी गलतियां भी हुई हैं और वे आगे चलकर बेहतरीन अधिकारी साबित हुए।

उन्होंने विश्वास जताया कि कैप्टन भारत भारद्वाज इस घटना से सीख लेंगे, अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे और एक अच्छे सैन्य पायलट के रूप में आगे बढ़ेंगे।

अंत में उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले पर जरूरत से ज्यादा हंगामा करने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय सेना इतनी मजबूत संस्था है कि वह एक भावनात्मक और रोमांटिक पल को संभाल सकती है।

विवाद या स्कैंडल का रूप देना ठीक नहीं

भारतीय सेना में मिलिट्री लॉ और सेना के नियमों के जानकार पूर्व मेजर राहुल सिंह इस पूरे मामले को लेकर अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि उन्हें इस घटना में कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल उल्लंघन नजर नहीं आता।

मेजर राहुल सिंह के मुताबिक उन्होंने सेना के कानून, आदेशों और नियमों का विस्तार से अध्ययन किया है और उनके अनुसार इस तरह की घटनाएं न तो पहली बार हुई हैं और न ही सेना में बिल्कुल असामान्य हैं।

उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि कई लोग सैन्य जीवन को एक सामान्य कॉर्पोरेट नौकरी की तरह देखते हैं, जबकि सेना सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि एक जीवनशैली है। सैनिक और अधिकारी भी भावनाएं रखते हैं और उनके जीवन में भी ऐसे खास पल आते हैं, जो उनके परिवारों के लिए यादगार बन जाते हैं।

मेजर सिंह का मानना है कि जिस घटना को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह वास्तव में एक युवा अधिकारी और उसके परिवार के लिए खुशी और गर्व का क्षण था। इसे अनावश्यक रूप से विवाद या स्कैंडल का रूप दिया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी समारोह की तस्वीर या वीडियो देखकर तुरंत यह मान लेना सही नहीं है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है। उनके अनुसार यह एक युवा अधिकारी की उपलब्धि से जुड़ा व्यक्तिगत और यादगार पल था, जिसे सैन्य परिवार लंबे समय तक याद रख सकते हैं।

राहुल सिंह ने विश्वास जताया कि सेना की यूनिट के अधिकारियों ने भी इस घटना को एक रेजिमेंटल याद के तौर पर दर्ज किया होगा, न कि किसी बड़े अनुशासनात्मक मामले के रूप में। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

सोशल मीडिया पर क्या है लोगों की राय

कैप्टन भारत भारद्वाज के प्रपोजल वाले वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी हुई नजर आ रही है। 3 जून को किए गए रक्षा समाचार के एक पोस्ट में सेना के सूत्रों के हवाले से इसे प्रोटोकॉल से जुड़ा मामला बताया गया था, जिसके बाद इस पर बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी।

कई लोगों ने कैप्टन भारद्वाज का समर्थन किया। उनका कहना है कि यह एक भावनात्मक और खुशी का पल था, जिसे बेवजह विवाद का विषय बना दिया गया। कुछ यूजर्स ने लिखा कि सेना के जवान और अधिकारी भी इंसान हैं, उनके जीवन में भी खास मौके आते हैं और उन्हें अपनी खुशियां मनाने का अधिकार है। कई लोगों का मानना है कि यह एक पारिवारिक और निजी पल था, जिसे सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।

कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों और सैन्य मामलों पर लिखने वाले लोगों ने भी कहा कि यह एक युवा अधिकारी की बड़ी उपलब्धि का दिन था। लंबे समय की कठिन ट्रेनिंग के बाद उसने अपने जीवन के एक खास पल को अपनी मंगेतर के साथ साझा किया। उनके मुताबिक इसे अनुशासन के बड़े संकट की तरह देखना उचित नहीं है।

दूसरी ओर, कई लोगों ने इस घटना की आलोचना भी की। उनका कहना है कि सेना की यूनिफॉर्म, सैन्य समारोह और रक्षा प्रतिष्ठानों की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है। ऐसे स्थानों और अवसरों का इस्तेमाल निजी कार्यक्रमों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों ने लिखा कि अनुशासन सेना की सबसे बड़ी ताकत है और इस मामले में नियमों का पालन होना चाहिए।

आलोचकों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया के दौर में यूनिफॉर्म को व्यक्तिगत प्रचार या दिखावे का माध्यम नहीं बनना चाहिए। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि यदि इसी तरह का काम कोई जवान करता तो उसके साथ क्या व्यवहार किया जाता। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

Explained: ड्रोन से टैंक नहीं, पेंट करेगा रक्षा! रूस ने मिलिटरी ट्रकों को क्यों बना दिया चलता-फिरता जेब्रा?

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: रूस-यूक्रेन युद्ध में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम ने टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की जगह ले ली है। लो कॉस्ट ड्रोन के आगे सब फेल हैं। ड्रोन जब चाहे, जिसे चाहे निशाना बना लेते हैं। यहां तक कि ग्राउंड बेस्ड वेपन सिस्टम और लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को ड्रोन की नजरों से बचाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसी बीच रूस ने अपने मिलिटरी लॉजिस्टिक्स व्हीकल्स को बचाने के लिए एक नई और अनोखी रणनीति अपनाई है।

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रूस के कई सैन्य ट्रकों की तस्वीरें सामने आई हैं। इन ट्रकों पर काले और सफेद रंग की धारियां बनाई गई हैं, जो देखने में बिल्कुल जेब्रा की खाल जैसी लगती हैं। पहली नजर में यह रंग-रोगन किसी प्रयोग या कलात्मक डिजाइन जैसा दिखेगा, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर वजह छिपी हुई है।

रूस का मानना है कि यह विशेष पेंट पैटर्न यूक्रेन के ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को कन्फ्यूज कर सकता है। इसी वजह से इसे आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले नए तरह के कैमोफ्लाज के रूप में देखा जा रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: सप्लाई लाइनों पर बढ़े हमलों ने बढ़ाई चिंता

रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में अब एक-दूसरे की सप्लाई लाइनों को भी निशाना बनाया जा रहा रहा है।
यूक्रेनी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी लगातार रूस के उन ट्रकों, ईंधन टैंकरों और गोला-बारूद वाहनों पर हमले कर रही हैं जो मोर्चे पर सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं। पश्चिमी रूस, क्रीमिया और रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में ऐसे हमले बढ़े हैं।

किसी भी सेना के लिए लॉजिस्टिक्स उसकी लाइफलाइन मानी जाती है। यदि सैनिकों तक समय पर गोला-बारूद, ईंधन, भोजन और उपकरण नहीं पहुंचते, तो ऑपरेशन पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि रूस अब इन वाहनों की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय अपना रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

आखिर क्या है ‘जेब्रा पैटर्न’?

रूस द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा यह पैटर्न सामान्य सैन्य रंगों से बिल्कुल अलग है। इसमें ट्रकों के पूरे ढांचे पर सफेद और काले रंग की मोटी धारियां बनाई जाती हैं।

कुछ ट्रकों पर सीधी धारियां दिखाई देती हैं, जबकि कुछ पर पत्तियों या घुमावदार आकृतियों जैसी डिजाइन बनाई गई है। खास बात यह है कि यह पैटर्न केवल वाहन के बॉडी हिस्से तक सीमित नहीं है। पहियों, टायरों और कई बाहरी हिस्सों पर भी यही रंग किया गया है। इनका उद्देश्य वाहन को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी ऑरिजनल शेप को तोड़ना है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

Russian Zebra Camouflage Trucks

प्रथम विश्व युद्ध से मिली प्रेरणा

हालांकि यह रणनीति पूरी तरह नई नहीं है। लगभग एक सदी पहले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इसी तरह का कैमोफ्लाज इस्तेमाल किया था।

उस समय जर्मन पनडुब्बियां समुद्र में ब्रिटिश जहाजों को निशाना बना रही थीं। जहाजों को पूरी तरह छिपाना संभव नहीं था, इसलिए एक अलग तरीका अपनाया गया। जहाजों पर काले और सफेद रंग के बड़े-बड़े जियोमेट्रिक पैटर्न बनाए गए।

इस तकनीक को डैजल कैमोफ्लाज कहा गया। इसका मकसद जहाज को अदृश्य बनाना नहीं था, बल्कि दुश्मन को उसकी दिशा, गति और दूरी का सही अनुमान लगाने से रोकना था। आज रूस उसी रणनीति का युद्ध में फिर से इस्तेमाल कर रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

AI बेस्ड ड्रोन को कैसे कन्फ्यूज करता है यह पेंट?

आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले कई ड्रोन अब केवल कैमरे पर निर्भर नहीं रहते। उनमें मशीन विजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक भी लगी होती है।

यह तकनीक ड्रोन को वाहन, टैंक, रडार, तोप और अन्य मिलिटरी टारगेट्स की पहचान करने में मदद करती है। ड्रोन का सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों के आधार पर सीखता है कि किसी टारगेट को कैसे पहचाना जाए।

जब किसी ट्रक पर असामान्य पैटर्न बना दिया जाता है, तो उसकी सामान्य आकृति टूट जाती है। वाहन के किनारे, छत और पहियों की पहचान करना कठिन हो जाता है।

ऐसी स्थिति में एआई बेस्ड सिस्टम कभी-कभी लक्ष्य को सही ढंग से क्लासिफाइड नहीं कर पाता। इससे टारगेट पहचानने में अधिक समय लग सकता है या ड्रोन को दोबारा पुष्टि करनी पड़ सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

मशीन विजन के लिए क्यों चुनौती है यह डिजाइन?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम वस्तुओं की रूपरेखा, आकार और किनारों के आधार पर काम करती है।

जेब्रा जैसी धारियां वाहन के वास्तविक आकार को छिपा देती हैं। कैमरे को कई अतिरिक्त रेखाएं और नकली किनारे दिखाई देते हैं। इससे सॉफ्टवेयर के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने वास्तव में ट्रक है या कुछ और।

जानकारों के मुताबिक तरीका टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को धीमा कर सकता है। कई बार ड्रोन को टारगेट की पुष्टि करने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

ऑपरेटरों के लिए भी पैदा हो सकती है परेशानी

सिर्फ एआई ही नहीं, ड्रोन उड़ाने वाले ह्यूमन ऑपरेटरों को भी इस तरह के पैटर्न से दिक्कत हो सकती है।

जब कोई ट्रक तेज रफ्तार से चल रहा हो और उसके आसपास पेड़, झाड़ियां या अन्य वाहन मौजूद हों, तब उसकी दिशा और रफ्तार का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

रूस पहले भी आजमा चुका है कई अनोखे उपाय

यह पहली बार नहीं है जब रूस ने ड्रोन हमलों से बचने के लिए असामान्य उपाय अपनाए हों।

युद्ध के शुरुआती चरण में कई रूसी ट्रकों पर लकड़ियों का अस्थायी कवच लगाया गया था। इसका उद्देश्य छोटे ड्रोन और गोलियों से कुछ अतिरिक्त सुरक्षा प्राप्त करना था।

इसके बाद रूसी टैंकों पर लोहे की जालीदार संरचनाएं लगाई गईं, जिन्हें बाद में कोप केज और टर्टल टैंक जैसे नाम मिले। जिसे पूरी दुनिया की सेनाओं ने फॉलो किया।

कई वाहनों पर जाल, अतिरिक्त प्लेटें और स्पाइक जैसे स्ट्रक्चर भी लगाए गए ताकि ड्रोन सीधे वाहन से टकराने से पहले ही रूक जाएं। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

विमानों पर भी अपनाई गई थी ऐसी रणनीति

साल 2023 में सैटेलाइट तस्वीरों में रूस के कुछ बॉम्बर्स पर पुराने टायर रखे हुए दिखाई दिए थे। उस समय कई विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि यह यूक्रेनी ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की इमेज-मैचिंग टेक्नोलॉजी को कन्फ्यूज्ड करने की कोशिश भी हो सकती है।

बाद में अमेरिकी सैन्य तकनीकी विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया कि किसी विमान के आइडेंटिफिकेशन सिस्टम कन्फ्यूज करने के लिए ऐसा किया जा सकता है।

क्योंकि टायरों के कारण विमान का सामान्य आकार बदल जाता है और कंप्यूटर विजन मॉडल को लक्ष्य पहचानने में परेशानी हो सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

क्या सफल है यह रणनीति?

सैन्य विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि यदि ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में टारगेट खोज रहा हो, तो इस तरह का कैमोफ्लाज उसके आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक ड्रोन केवल कैमरों पर निर्भर नहीं रहते। कई सिस्टम्स में थर्मल सेंसर, इन्फ्रारेड कैमरे और दूसरे एडवांस उपकरण भी होते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल रंग बदल देने से हर प्रकार के सेंसर को धोखा देना संभव नहीं होगा। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

ड्रोन युद्ध ने बदल दी सैन्य सोच

रूस-यूक्रेन युद्ध को दुनिया का पहला बड़े पैमाने का ड्रोन युद्ध भी कहा जा रहा है।

दोनों देश हजारों ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाले कामिकाजे ड्रोन तक, सब हमलों में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन ड्रोन की वजह से टैंक, ट्रक, रडार और गोला-बारूद डिपो पहले की तुलना में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।

वहीं, युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों तक जरूरी सामग्री पहुंचाना किसी भी सेना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। रूस के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। लंबी दूरी तक फैले मोर्चों पर लगातार ईंधन, गोला-बारूद और अन्य सामग्री भेजनी पड़ती है।

यूक्रेनी ड्रोन इन्हीं सप्लाई मार्गों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जेब्रा पैटर्न वाले ट्रकों को रूस की एक कम लागत वाली लेकिन सुरक्षा रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

अब नहीं होंगे ड्रोन क्रैश! रक्षा मंत्रालय ने शुरू की नई स्वदेशी पहल, पैराशूट खोलकर सुरक्षित उतरेंगे UAV

Drone Recovery Parachute System
AI-Generated Image

Drone Recovery Parachute System: भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में किसी तकनीकी खराबी, बैटरी फेल होने या ऑपरेशन के दौरान दुर्घटना की स्थिति में महंगे ड्रोन और उनके पेलोड को सुरक्षित बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्रालय के अधीन ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड की कानपुर स्थित यूनिट ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी (ओपीएफ) ने ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम के डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इस पहल का उद्देश्य भारतीय ड्रोन उद्योग, डिफेंस आर्गेनाइजेशंस, रिसर्च आर्गेनाइजेशंस और टेक्निकल कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे स्वदेशी रिकवरी सिस्टम तैयार करना है, जो किसी आपात स्थिति में ड्रोन को सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतार सकें और महंगे उपकरणों को नुकसान से बचा सकें।

Drone Recovery Parachute System: ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ बढ़ी सुरक्षा की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारत में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। रक्षा क्षेत्र, सीमा निगरानी, पुलिसिंग, कृषि, आपदा प्रबंधन, मेडिकल सप्लाई, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक सर्वेक्षण जैसे क्षेत्रों में ड्रोन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

हालांकि ड्रोन तकनीक जितनी उपयोगी है, उससे जुड़े जोखिम भी उतने ही गंभीर हैं। उड़ान के दौरान बैटरी खराब होना, मोटर फेल होना, जीपीएस सिग्नल खोना या किसी तकनीकी खराबी के कारण ड्रोन अचानक जमीन पर गिर सकता है। ऐसे मामलों में न केवल लाखों रुपये का ड्रोन नष्ट हो सकता है, बल्कि उसमें लगे कैमरे, सेंसर या अन्य महंगे उपकरण भी खराब हो सकते हैं।

इसी चुनौती से निपटने के लिए ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम जरूरी माना जा रहा है। यह सिस्टम किसी आपात स्थिति में तुरंत एक्टिव होकर ड्रोन की स्पीड को कंट्रोल करता है और उसे सुरक्षित तरीके से जमीन पर उतारने में मदद करता है।

आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर

कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्टरी लंबे समय से डिफेंस प्रोडक्शन से जुड़ी रही है। साल 1941 में स्थापित यह फैक्टरी सेना के लिए विभिन्न प्रकार के पैराशूट, एयरोस्पेस टेक्सटाइल और विशेष सुरक्षा उपकरण बनाती रही है।

ओपीएफ पहले से सैनिकों के पैराशूट, कार्गो पैराशूट, ब्रेक पैराशूट और अन्य विशेष उपयोग वाले सिस्टम तैयार करती है। अब फैक्टरी अपने इसी अनुभव का उपयोग ड्रोन रिकवरी पैराशूट विकसित करने में करना चाहती है।

सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में कई भारतीय ड्रोन निर्माता विदेशी तकनीक या आयातित रिकवरी सिस्टम पर निर्भर हैं। यदि यह तकनीक देश में विकसित होती है तो लागत कम होगी और घरेलू उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। (Drone Recovery Parachute System)

किन-किन ड्रोन के लिए बनेगा सिस्टम

ओपीएफ ने कहा है कि वह हर कैटेगरी के ड्रोन के लिए रिकवरी सॉल्युशन डेवलप करने की संभावनाएं तलाश रही है।

इसमें छोटे नैनो ड्रोन से लेकर बड़े मिलिटरी यूएवी तक शामिल हैं। फैक्टरी ने ड्रोन को उनके अधिकतम टेक-ऑफ वजन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। इनमें 250 ग्राम तक के नैनो ड्रोन, 2 किलोग्राम तक के माइक्रो ड्रोन, 25 किलोग्राम तक के स्मॉल ड्रोन, 150 किलोग्राम तक के मीडियम यूएवी, 600 किलोग्राम तक के बड़े यूएवी और उससे ऊपर की कैटेगरी के ड्रोन शामिल हैं।

ओपीएफ ने ईओआई के तहत हिस्सा लेने वाली कंपनियों और संस्थानों से उनके ड्रोन प्लेटफॉर्म से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है।

कंपनियों को अपने ड्रोन का मॉडल, प्रकार, वजन, पेलोड क्षमता, उड़ान ऊंचाई, गति और वर्तमान रिकवरी सिस्टम की जानकारी देनी होगी। इसके अलावा यह भी बताना होगा कि उन्हें किस प्रकार के पैराशूट सिस्टम की जरूरत है।

ओपीएफ यह जानना चाहती है कि ड्रोन के लिए इमरजेंसी रिकवरी सिस्टम चाहिए या मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित लैंडिंग के लिए अलग पैराशूट चाहिए। इसके अलावा पेलोड रिकवरी, नाइट रिकवरी, समुद्र में रिकवरी और फ्लोटेशन जैसी विशेष जरूरतों पर भी सुझाव मांगे गए हैं। (Drone Recovery Parachute System)

तकनीकी मानकों पर रहेगा विशेष फोकस

ईओआई में रिकवरी सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं का भी जिक्र किया गया है। इसमें ड्रोन का वजन, पैराशूट खुलने की न्यूनतम ऊंचाई, अधिकतम गति, सुरक्षित अवतरण दर, सिस्टम की विश्वसनीयता और पैकिंग आकार जैसी जानकारियां शामिल हैं।

ओपीएफ यह भी जानना चाहती है कि अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में सिस्टम को कैसे काम करना चाहिए। इसमें अत्यधिक गर्मी, ठंड, बारिश, नमी और समुद्री वातावरण जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

मिलिटरी और सिविल दोनों क्षेत्रों के लिए समाधान

ओपीएफ ने स्पष्ट किया है कि वह केवल रक्षा उपयोग तक सीमित नहीं रहना चाहती। ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम का उपयोग मेडिकल सप्लाई ड्रोन, कृषि ड्रोन, सर्विलांस प्लेटफॉर्म, मैपिंग ड्रोन, लॉजिस्टिक्स ड्रोन और समुद्री निगरानी ड्रोन में भी किया जा सकता है।

डिफेंस सेक्टर में इनका इस्तेमाल टोही मिशन, सीमा निगरानी और अन्य संवेदनशील अभियानों में किया जा सकता है। वहीं नागरिक क्षेत्र में यह तकनीक महंगे उपकरणों और संवेदनशील पेलोड की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

उद्योग के साथ मिलकर होगा विकास

ओपीएफ ने इस परियोजना के लिए कई प्रकार के सहयोग का प्रस्ताव रखा है। इसमें संयुक्त अनुसंधान, प्रोटोटाइप विकास, तकनीकी हस्तांतरण, दीर्घकालिक उत्पादन समझौते और निर्यात केंद्रित विनिर्माण शामिल हैं।

फैक्टरी का मानना है कि निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और रक्षा उद्योग के साथ साझेदारी करके बेहतर और व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। (Drone Recovery Parachute System)

ओपीएफ के पास मौजूद हैं आधुनिक सुविधाएं

ड्रोन रिकवरी सिस्टम डेवलप करने के लिए ओपीएफ के पास पहले से मजबूत तकनीकी आधार मौजूद है। फैक्टरी में पैराशूट डिजाइन, एयरोस्पेस टेक्सटाइल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आधारित डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड टेस्टिंग और फ्लाइट टेस्टिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

इसके अलावा क्वॉलिटी कंट्रोल, एन्वायरनमेंटल टेस्टिंग और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी मौजूद है। यही कारण है कि ओपीएफ खुद को इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार मान रही है।

ड्रोन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित रिकवरी सिस्टम किसी भी ड्रोन इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे सिस्टम न केवल महंगे प्लेटफॉर्म को बचाते हैं बल्कि मिशन की सफलता और ऑपरेशनल सेफ्टी को भी बढ़ाते हैं। भारत में इस तकनीक का विकास रक्षा और नागरिक दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Drone Recovery Parachute System)

भारतीय सेना कर रही अंतरिक्ष में युद्ध की तैयारी! स्पेस वॉरफेयर पर करेगी बड़ी स्टडी, चीन-पाकिस्तान पर नजर

Indian Army Space Warfare Study
AI-Generated Image

Indian Army Space Warfare Study: आधुनिक युद्ध अब सिर्फ जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें अब अंतरिक्ष यानी स्पेस को भी भविष्य के युद्ध का सबसे अहम हिस्सा मान रही हैं। भारत सरकार ने भी स्पेस वॉरफेयर को अब मल्टी डॉमेन ऑपरेशंस (MDO) में शामिल किया है, जिसमें लैंड, सी, एयर, स्पेस, साइबर और कॉग्निटिव शामिल हैं। जिसे देखते हुए भारतीय सेना ने स्पेस वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी शुरू कर दी है।

रक्षा समाचार को मिले आरएफपी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक भारतीय सेना “स्पेस वॉरफेयर: न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” को लेकर बड़ी स्टडी की तैयारी कर रही है। डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह स्टडी आर्मी मैनेजमेंट स्टडीज बोर्ड (AMSB) के तहत कराई जाएगी।

भारतीय सेना का मानना है कि भविष्य के संघर्षों में स्पेस आधारित तकनीक की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। इसी वजह से सेना अब स्पेस टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट नेटवर्क, मिसाइल ट्रैकिंग, सर्विलांस सिस्टम और अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं पर गहराई से स्टडी करना चाहती है।

Indian Army Space Warfare Study: क्यों महत्वपूर्ण हो गया है स्पेस वॉरफेयर

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों ने अंतरिक्ष को रणनीतिक सैन्य क्षेत्र के रूप में विकसित करना शुरू कर दिया है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश पहले से ही एंटी-सैटेलाइट हथियार, स्पेस सर्विलांस सिस्टम और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर काम कर रहे हैं।

आधुनिक सेना अब संचार, नेविगेशन, ड्रोन ऑपरेशन, मिसाइल गाइडेंस और रियल टाइम इंटेलिजेंस के लिए सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है। किसी युद्ध की स्थिति में अगर दुश्मन देश के सैटेलाइट सिस्टम को नुकसान पहुंचा दे, तो उसकी संचार और सैन्य क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब स्पेस डोमेन को केवल वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र मान रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

एमसीटीई करेगा स्टडी और सेमिनार

इस प्रोजेक्ट का समन्वय मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग करेगा, जो भारतीय सेना की प्रमुख तकनीकी संस्थाओं में गिना जाता है। यह संस्थान संचार, नेटवर्किंग, साइबर और आधुनिक युद्ध तकनीकों पर काम करता है।

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी का विषय “स्पेस वॉरफेयर: न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” रखा गया है और इसके तहत अंतरिक्ष आधारित युद्ध की बदलती चुनौतियों का स्टडी किया जाएगा।

सेना इस स्टडी के जरिए यह समझना चाहती है कि आने वाले समय में स्पेस आधारित सैन्य क्षमताएं युद्ध की दिशा को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

क्या-क्या शामिल होगा स्टडी में

डॉक्यूमेंट के अनुसार यह स्टडी केवल टेक्निकल रिसर्च तक सीमित नहीं होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा रणनीति, जियोपॉलिटिक्स और आर्थिक प्रभाव जैसे कई पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

स्टडी में यह देखा जाएगा कि स्पेस टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध को किस तरह बदल रही है। इसमें निगरानी, इंटेलिजेंस, संचार, मिसाइल ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे विषय शामिल रहेंगे।

इसके अलावा अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं का भारत की रक्षा तैयारी और रणनीतिक ताकत पर क्या असर पड़ सकता है, इसका भी विश्लेषण किया जाएगा। (Indian Army Space Warfare Study)

अंतरिक्ष से जुड़े खतरों पर रहेगा फोकस

सूत्रों के मुताबिक आज का युद्ध तेजी से नेटवर्क सेंट्रिक होता जा रहा है। किसी भी सेना की ताकत अब केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं, बल्कि उसके डेटा नेटवर्क और सैटेलाइट सिस्टम से भी तय होती है।

अगर युद्ध के दौरान किसी देश का सैटेलाइट नेटवर्क जाम या नष्ट हो जाए, तो उसकी मिसाइल गाइडेंस, जीपीएस, संचार और निगरानी क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से दुनिया की कई सेनाएं अब एंटी-सैटेलाइट सिस्टम, स्पेस सर्विलांस और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक पर काम कर रही हैं।

भारतीय सेना की इस स्टडी में भी ऐसे खतरों और उनसे निपटने की रणनीति पर फोकस रहने की संभावना है।

एआई और आधुनिक तकनीक पर भी चर्चा

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी के दौरान आधुनिक तकनीक, आर्थिक विकास और जियोपॉलिटिकल प्रभावों को भी शामिल किया जाएगा।

अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, सैटेलाइट इमेजिंग और ऑटोमेटेड सिस्टम मॉडर्न वॉरफेयर का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

स्पेस बेस्ड डेटा की मदद से अब रियल टाइम में दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। मिसाइल लॉन्च, सैनिकों की तैनाती और सैन्य गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना भविष्य के युद्ध में एआई और स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को गंभीरता से समझना चाहती है।

भारत की सैन्य रणनीति में बढ़ रहा स्पेस का महत्व

भारत पहले ही डिफेंस सेक्टर में स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ा चुका है। भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना अब संचार और निगरानी के लिए कई सैन्य सैटेलाइट का इस्तेमाल कर रही हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भी कई रक्षा आधारित स्पेस परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।

2019 में भारत ने मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट भी किया था। इसके बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया था जिनके पास एंटी-सैटेलाइट क्षमता मौजूद है।

सूत्रों का कहना है कि इसी बदलती स्थिति को देखते हुए भारतीय सेना अब स्पेस वॉरफेयर पर गहराई से स्टडी करना चाहती है। (Indian Army Space Warfare Study)

विशेषज्ञ संस्थानों से मांगे गए प्रस्ताव

वहीं, सेना ऐसे संस्थानों, थिंक टैंक और रिसर्च एजेंसियों से प्रस्ताव मांग रही है, जिन्हें स्पेस रिसर्च और रक्षा स्टडी का अनुभव हो।

स्टडी करने वाले संस्थानों के पास अनुभवी विशेषज्ञों की टीम होना जरूरी है। डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी टीम में कम से कम पांच सदस्य होने चाहिए। इसमें मेजर जनरल स्तर के विशेषज्ञ, ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी और रक्षा स्टडी से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा भारतीय सशस्त्र बलों के साथ पहले किए गए स्टडी और अकादमिक संस्थानों से सहयोग को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया गया है। (Indian Army Space Warfare Study)

सेमिनार में होगी बड़ी चर्चा

इस प्रोजेक्ट के तहत केवल रिसर्च रिपोर्ट ही तैयार नहीं की जाएगी, बल्कि एक बड़ा सेमिनार भी आयोजित किया जाएगा।

डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी पूरा होने के बाद विशेषज्ञों, सैन्य अधिकारियों और रणनीतिक मामलों के जानकारों के बीच विस्तृत चर्चा होगी। इसमें स्पेस आधारित युद्ध की चुनौतियों और भारत की तैयारी पर विचार किया जाएगा।

सेमिनार में मिलिट्री कम्यूनिकेशन, स्पेस सिक्योरिटी, सैटेलाइट सुरक्षा, साइबर खतरों और आधुनिक युद्ध में अंतरिक्ष की भूमिका जैसे विषय शामिल रह सकते हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

दस महीने में पूरी करनी होगी स्टडी

डॉक्यूमेंट के मुताबिक संस्था को स्टडी और सेमिनार का काम समझौते पर हस्ताक्षर होने के दस महीने के भीतर पूरा करना होगा।

स्टडी पूरा होने के बाद संस्था को विस्तृत रिपोर्ट, प्रेजेंटेशन और हाई क्वालिटी प्रिंटेड कॉपी सेना को सौंपनी होगी। डॉक्यूमेंट में डिजिटल और हार्ड कॉपी दोनों जमा करने की बात कही गई है। (Indian Army Space Warfare Study)

राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर का होगा विश्लेषण

स्टडी के दौरान यह भी देखा जाएगा कि स्पेस वॉरफेयर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अब युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। दुश्मन देश साइबर अटैक, सैटेलाइट जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए भी हमला कर सकते हैं।

अगर किसी देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क जाम हो जाए, तो उसकी सेना के ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सेना अब स्पेस और साइबर दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चल रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

भारत के लिए क्यों अहम है यह स्टडी

भारत के सामने चीन और पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौती मौजूद है। चीन पहले से ही स्पेस टेक्नोलॉजी और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है।

चीनी सेना स्पेस आधारित निगरानी, एंटी-सैटेलाइट वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम विकसित कर चुकी है। वहीं पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपनी सैन्य तकनीक मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

ऐसे में भारतीय सेना भविष्य के युद्ध की तैयारी के लिए स्पेस डोमेन को लेकर अपनी रणनीति मजबूत करना चाहती है।

स्पेस को माना जा रहा नया युद्धक्षेत्र

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में स्पेस को “न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” यानी संघर्ष का नया बड़ा मोर्चा माना जा रहा है। जिस देश के पास मजबूत स्पेस नेटवर्क और सैटेलाइट सिक्योरिटी होगी, उसे युद्ध के दौरान रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब जमीन और समुद्र के साथ-साथ अंतरिक्ष को भी युद्ध का नया क्षेत्र मान रही हैं। भारतीय सेना का यह स्टडी भी उसी बदलते वैश्विक सैन्य माहौल का हिस्सा माना जा रहा है। (Indian Army Space Warfare Study)

The Indian Army is undertaking a major study on space warfare, reflecting the growing importance of satellites, space-based surveillance, missile tracking, and secure communications in modern military operations. As future conflicts expand beyond traditional battlefields, the study will examine emerging threats, space security challenges, and the role of advanced technologies in national defence. The initiative highlights India’s increasing focus on multi-domain warfare and strategic preparedness in the space domain.

भारतीय सेना खरीदेगी पोर्टेबल काउंटर ड्रोन सिस्टम, 1.5 किमी दूर से GPS, Beidou और GLONASS सिग्नल करेगा जाम

Indian Army Counter UAS System
AI-Generated Image

Indian Army Counter UAS System: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी युद्ध के मैदान में टैंक, तोप और लड़ाकू विमान सबसे बड़े हथियार माने जाते थे, लेकिन अब छोटे आकार के ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक, ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। भारत की सीमाओं पर भी ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। पाकिस्तान की ओर से हथियार और नशीले पदार्थ गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कई बार सामने आ चुका है, जबकि उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन निगरानी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना ने एक नए काउंटर-यूएएस सिस्टम की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। सेना ऐसा पोर्टेबल सिस्टम चाहती है जो दुश्मन के ड्रोन को बिना गोली चलाए बेअसर कर सके। इसमें आधुनिक जेमिंग तकनीक वाले उपकरण की मांग की गई है।

Indian Army Counter UAS System: क्यों बढ़ी काउंटर ड्रोन सिस्टम की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पहले जहां ड्रोन केवल सेनाओं के पास होते थे, वहीं अब छोटे संगठन और आतंकवादी समूह भी उनका इस्तेमाल करने लगे हैं। कुछ किलो वजन वाले ड्रोन कैमरे के जरिए निगरानी कर सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं और यहां तक कि आत्मघाती हमलों के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार सीमा पार से आने वाले ड्रोन पकड़े हैं। कई मामलों में इन ड्रोन के जरिए हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थ भारतीय सीमा में गिराए गए। ऐसे में केवल ड्रोन खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें रोकने वाली तकनीक भी उतनी ही जरूरी हो गई है।

इसी वजह से सेना अब ऐसे सिस्टम पर जोर दे रही है, जो दुश्मन के ड्रोन को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही बेकार कर दे। (Indian Army Counter UAS System)

क्या होता है काउंटर-यूएएस सिस्टम

काउंटर-यूएएस का मतलब है काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम। यह एंटी ड्रोन सिस्टम है। इसका काम दुश्मन के ड्रोन को पहचानना, उसके कंट्रोल को जाम करना और उसे मिशन पूरा करने से रोकना होता है।

भारतीय सेना जिस सिस्टम की खरीद कर रही है, वह मुख्य रूप से जेमिंग तकनीक पर आधारित है। यह ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच मौजूद कम्यूनिकेशन को जाम कर देता है। इसके अलावा यह उन सैटेलाइट सिग्नलों को भी रोकता करता है जिनकी मदद से ड्रोन को डायरेक्शन मिलता है।

जब ड्रोन को सही सिग्नल नहीं मिलते तो वह या तो अपनी जगह पर रुक जाता है, वापस लौटने की कोशिश करता है या फिर टारगेट से भटक जाता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद प्रभावी माने जाते हैं। (Indian Army Counter UAS System)

एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को करेगा जाम

सेना ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को जाम कर सके। इसमें जीपीएस, गैलीलियो, ग्लोनास और बीडू जैसे प्रमुख सैटेलाइट नेटवर्क शामिल हैं।

आज अधिकांश ड्रोन इन्हीं नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि ये सिग्नल जाम हो जाएं तो ड्रोन की दिशा और कंट्रोल प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि जेमिंग तकनीक को एंटी-ड्रोन डिफेंस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

360 डिग्री सुरक्षा देगा सिस्टम

सेना की मांग के अनुसार यह सिस्टम ओम्नी-डायरेक्शनल होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह केवल एक दिशा में नहीं बल्कि चारों डायरेक्शन में काम करेगा।

तकनीकी शर्तों के अनुसार सिस्टम को 360 डिग्री तक जेमिंग कवरेज देना होगा। यानी सैनिक को यह अनुमान लगाने की जरूरत नहीं होगी कि ड्रोन किस दिशा से आ रहा है। यदि कोई ड्रोन उसके आसपास के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो सिस्टम उसे प्रभावित कर सकेगा।

युद्ध क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि ड्रोन किसी भी दिशा से अचानक दिखाई दे सकते हैं।

डेढ़ किलोमीटर तक असरदार

सेना ने इस सिस्टम के लिए न्यूनतम 1.5 किलोमीटर की जेमिंग रेंज तय की है। इसका मतलब है कि सैनिक अपने स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर तक उड़ रहे ड्रोन को भी प्रभावित कर सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम चौकियों, संवेदनशील ठिकानों और अस्थायी सैन्य शिविरों की सुरक्षा के लिए यह दूरी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे सैनिकों को ड्रोन खतरे का पहले से जवाब देने का अवसर मिलेगा।

वजन तीन किलो से कम

किसी भी सैन्य उपकरण के लिए उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषकर पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिक अतिरिक्त भार नहीं उठा सकते।

इसी को ध्यान में रखते हुए सेना ने शर्त रखी है कि पूरा सिस्टम तीन किलो से कम वजन का होना चाहिए। इसका मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ आसानी से लेकर चल सकेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल कर सकेगा।

हल्का होने के बावजूद सिस्टम को मजबूत और भरोसेमंद भी होना होगा ताकि मुश्किल हालात में भी उसका परफॉरमेंस प्रभावित न हो। (Indian Army Counter UAS System)

हर मौसम में काम करने की क्षमता

भारतीय सेना रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और बर्फीले इलाकों सहित विभिन्न परिस्थितियों में तैनात रहती है। इसलिए किसी भी उपकरण को हर तरह के मौसम में काम करने योग्य होना जरूरी है।

दस्तावेज के अनुसार यह सिस्टम माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह हिमालयी क्षेत्रों की ठंड और पश्चिमी भारत की गर्मी दोनों में उपयोग किया जा सकेगा।

इसके अलावा इसे आईपी-67 सुरक्षा मानक के अनुरूप भी होना होगा। ताकि यह धूल और पानी से भी सुरक्षित रहे।

आठ घंटे लगातार ऑपरेशनल

सैन्य अभियानों में लगातार ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए सेना ने मांग की है कि यह सिस्टम बैटरी के सहारे कम से कम आठ घंटे तक लगातार काम कर सके।

इससे सैनिकों को बार-बार बैटरी बदलने या चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। लंबी गश्त, सीमा सुरक्षा और महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियों के दौरान यह विशेष रूप से उपयोगी होगा।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सिस्टम के सभी मोड चौबीसों घंटे संचालन के लिए सक्षम होने चाहिए।

वहीं, सेना केवल काउंटर ड्रोन सिस्टम ही नहीं खरीद रही, बल्कि ड्रोन प्रशिक्षण से जुड़ी सुविधाओं पर भी ध्यान दे रही है।

तकनीकी दस्तावेज में ड्रोन सॉकर एरीना, डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर और अवरोधक प्रशिक्षण क्षेत्र जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। सेना ड्रोन ऑपरेशन और एंटी ड्रोन दोनों क्षमताओं को साथ-साथ विकसित करना चाहती है।

ड्रोन सॉकर एरीना में सैनिक सुरक्षित वातावरण में ड्रोन ऑपरेशन का अभ्यास कर सकेंगे। वहीं सिमुलेटर के जरिए वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग दी जा सकेगी। (Indian Army Counter UAS System)

एफपीवी ड्रोन भी होंगे ट्रेनिंग का हिस्सा

दस्तावेज में आठ इंच और दस इंच कैटेगरी के एफपीवी ड्रोन का भी उल्लेख किया गया है। एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन, जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए वास्तविक समय में कंट्रोल करता है।

इन ड्रोन की उड़ान अवधि, गति और पेलोड क्षमता को देखते हुए स्पष्ट है कि सेना ड्रोन ऑपरेशन की नई तकनीकों पर भी काम कर रही है। कुछ ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार हासिल कर सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं।

मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा

इस प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है। केवल क्लास-1 और क्लास-2 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भाग लेने की अनुमति दी गई है।

डिलीवरी की समयसीमा 20 दिन तय की गई है। साथ ही चयनित विक्रेता को प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। सेना ने अनुभव, प्रदर्शन और तकनीकी क्षमता से जुड़े कई मानदंड भी निर्धारित किए हैं ताकि केवल सक्षम कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकें। (Indian Army Counter UAS System)

The Indian Army has initiated the procurement of a portable Counter-Unmanned Aerial System (Counter-UAS) to strengthen its ability to detect and neutralize hostile drones. Designed for modern battlefield requirements, the system will be capable of disrupting enemy drone operations at ranges of up to 1.5 kilometers through advanced signal jamming technology. The lightweight and portable solution will help troops counter surveillance, reconnaissance, and weaponized drones in sensitive border areas and operational zones. This move reflects the Army’s growing focus on anti-drone warfare capabilities as unmanned aerial threats continue to evolve, posing significant security challenges across multiple theatres.