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चीन की टेंशन बढ़ाएगा भारत का ‘ब्रह्मास्त्र’! वियतनाम बना ब्रह्मोस मिसाइल का खरीदार, अब इंडोनेशिया की बारी

Vietnam BrahMos Missile Deal
Brahmos WPN System passes through the Rajpath during the full dress rehearsal for the Republic Day Parade-2016, in New Delhi on January 23, 2016 (Photo- PIB)

Vietnam BrahMos Missile Deal: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब दुनिया के कई देशों की पसंद बनती जा रही है। फिलीपींस के बाद अब वियतनाम ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल खरीद समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। वहीं इंडोनेशिया के साथ भी डील अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस बात की पहली आधिकारिक पुष्टि सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने की।

रक्षा विशेषज्ञ इस डील को सिर्फ हथियार बिक्री नहीं बल्कि एशिया में बदलते सामरिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। खासकर दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत की यह रक्षा साझेदारी बेहद अहम मानी जा रही है। भारत अब केवल दुनिया का बड़ा हथियार आयातक देश नहीं रहा, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक बेचने वाला उभरता रक्षा निर्यातक बन चुका है।

Vietnam BrahMos Missile Deal: शांगरी-ला डायलॉग में हुआ बड़ा खुलासा

सिंगापुर में आयोजित 23वें शांगरी-ला डायलॉग में एशिया, यूरोप और पश्चिमी देशों के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी और रणनीतिक विशेषज्ञ मौजूद थे। इसी मंच पर भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस डील साइन हो चुकी है, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि वियतनाम और इंडोनेशिया दोनों के साथ बातचीत अंतिम चरण में थी और वियतनाम के मामले में समझौता पहले ही हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल उन्हीं मित्र देशों के साथ इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करता है, जिन पर भरोसा किया जा सके।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यही वजह है कि कई एशियाई देश अब इसे अपनी नौसैनिक सुरक्षा का अहम हिस्सा बनाना चाहते हैं।

कितनी बड़ी है वियतनाम डील

सूत्रों के मुताबिक वियतनाम के साथ हुई ब्रह्मोस डील की कीमत लगभग 5,800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस पैकेज में तटीय रक्षा के लिए मिसाइल बैटरियां, शुरुआती मिसाइल सप्लाई, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है।

बताया जा रहा है कि वियतनाम भविष्य में एयर लॉन्च वर्जन यानी लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइल में भी रूचि दिखाई है। इससे उसकी समुद्री मारक क्षमता में और इजाफा होगा।

भारत और वियतनाम के बीच पिछले कुछ महीनों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम भारत आए थे। इसके कुछ ही दिनों बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हनोई का दौरा किया। इसी दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की थी।

मार्च में भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स की एक टीम भी वियतनाम गई थी, जहां डिफेंस प्रोक्योरमेंट को लेकर बातचीत हुई थी।

इंडोनेशिया भी खरीदना चाहता है ब्रह्मोस

वियतनाम के बाद अब इंडोनेशिया को ब्रह्मोस का अगला बड़ा ग्राहक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। अनुमान है कि यह डील लगभग 450 मिलियन डॉलर की हो सकती है।

भारत और इंडोनेशिया ने इसके लिए जॉइंट डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन कमेटी भी बनाई है। इसके तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च, सप्लाई चेन और रक्षा उत्पादन सहयोग पर काम हो रहा है।

इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में चीन की गतिविधियों के कारण वह आधुनिक एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम चाहता है। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा कर सकती है।

फिलीपींस पहले ही इस्तेमाल कर रहा है ब्रह्मोस

फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना था। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच करीब 375 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,770 करोड़ रुपये की डील हुई थी।

फिलीपींस ने 2024 से इन मिसाइलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। वहां इन मिसाइलों को तटीय रक्षा के लिए तैनात किया गया है। फिलीपींस और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ऐसे में ब्रह्मोस को वहां गेम चेंजर हथियार माना जा रहा है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

आखिर इतनी खास क्यों है ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है।

एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज करीब 290 किलोमीटर है। यह जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से दागी जा सकती है। इसकी गति आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना ज्यादा है, जिससे दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

ब्रह्मोस बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के जहाज या सैन्य ठिकाने पर सटीक हमला कर सकती है। इसकी सटीकता और तेज गति ही इसे दूसरे मिसाइल सिस्टम से अलग बनाती है।

भारतीय सेना और नौसेना लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की मारक क्षमता चर्चा में रही थी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी मांग

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस को लेकर दुनिया का भरोसा और बढ़ा। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता ने कई देशों का ध्यान खींचा।

ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने बेहद सटीक तरीके से टारगेट्स को हिट किया और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव बनाया। इसके बाद कई देशों ने भारतीय रक्षा तकनीक में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

चीन की बढ़ती चिंता

दक्षिण चीन सागर में चीन लंबे समय से अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों का चीन के साथ समुद्री विवाद भी है। ऐसे में इन देशों के पास ब्रह्मोस जैसी तेज एंटी-शिप मिसाइलों का पहुंचना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक अगर दक्षिण चीन सागर के कई तटीय देशों के पास ब्रह्मोस तैनात हो जाती है तो चीन की समुद्री रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत भी इसे केवल रक्षा निर्यात नहीं बल्कि अपनी “एक्ट ईस्ट” नीति और क्षेत्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहा है।

इंर्पोटर से एक्सपोर्टर बना भारत

दशकों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश माना जाता था। लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइल सिस्टम तक के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 2.76 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार का लक्ष्य 2030 तक रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसी डील्स इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

केवल दोस्त देशों को मिलती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर एक खास शर्त भी है। क्योंकि यह भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है, इसलिए इसे केवल उन्हीं देशों को बेचा जा सकता है जो दोनों देशों के “फ्रेंडली फॉरेन कंट्री” माने जाते हों।

इसी वजह से हर देश को यह मिसाइल नहीं दी जाती। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी साफ कहा कि वियतनाम उन मित्र देशों में शामिल है जिनके साथ भारत ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करने को तैयार है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

मलेशिया और थाईलैंड भी संपर्क में

सूत्रों के मुताबिक मलेशिया और थाईलैंड भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अगर ये डील्स भी आगे बढ़ती हैं तो दक्षिण चीन सागर के आसपास कई देशों के पास भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम मौजूद होगा। इससे भारत की रक्षा कूटनीति और मजबूत होती दिखाई दे रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

भारत की डिफेंस डिप्लोमेसी को मिली नई पहचान

ब्रह्मोस डील्स को भारत की नई डिफेंस डिप्लोमेसी का हिस्सा माना जा रहा है। भारत अब केवल सैन्य अभ्यास या राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक के जरिए भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।

वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग यह दिखाता है कि एशिया में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ब्रह्मोस अब केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि भारत की सैन्य क्षमता, तकनीकी ताकत और रणनीतिक भरोसे का प्रतीक बनती जा रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति’ में नहीं पहुंचा बांग्लादेश, सैन्य अभ्यास से दूरी बनाकर क्या दे रहा संदेश?

Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya
Background Pic is from Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya and Ambassador Yao Wen Calls on Bangladeshi Prime Minister Tarique Rahman

Exercise Pragati 2026: भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति 2026’ इस समय मेघालय के उमरोई फील्ड ट्रेनिंग नोड में चल रही है। इस युद्धाभ्यास में एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों की सेनाएं हिस्सा ले रही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश की गैरमौजूदगी को लेकर हो रही है। बांग्लादेश को भी इस अभ्यास का न्योता भेजा गया था, लेकिन उसने इसमें भाग नहीं लिया।

वहीं बांग्लादेश के इस युद्धाभ्यास में नहीं शामिल होने को भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बढ़ती दूरी के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि यह एक्सरसाइज उसी मेघालय इलाके में हो रही है, जहां पहले भारत और बांग्लादेश की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज ‘सम्प्रिति’ आयोजित होती थी।

भारत समेत कुल 13 देशों के 400 से ज्यादा सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। इनमें भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, सेशेल्स, श्रीलंका और वियतनाम शामिल हैं। यह अभ्यास 20 मई से शुरू हुआ और 31 मई तक चलेगा। विदेशी सैन्य दलों का आना 18 मई से ही शुरू हो गया था।

Exercise Pragati 2026: क्या है एक्सरसाइज प्रगति

‘प्रगति’ का पूरा नाम “पार्टनरशिप ऑफ रीजनल आर्मीज फॉर ग्रोथ एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन द इंडियन ओशन रीजन” है। यह भारत की पहली ऐसी मल्टीनेशनल सैन्य एक्सरसाइज है, जिसमें कई देशों की सेनाएं एक साथ ट्रेनिंग ले रही हैं।

इस अभ्यास का मुख्य फोकस काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन है। सैनिकों को पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में आतंकवाद विरोधी कार्रवाई की ट्रेनिंग दी जा रही है। पूर्वोत्तर भारत का इलाका इसी तरह के कठिन भूभाग के लिए जाना जाता है, इसलिए उमरोई को इसके लिए चुना गया।

भारतीय सेना के अधिकारियों के मुताबिक अभ्यास का मकसद अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, आधुनिक युद्ध तकनीकों को साझा करना और संयुक्त ऑपरेशन क्षमता मजबूत करना है। (Exercise Pragati 2026)

अलग-अलग देशों के सैनिक एक साथ कर रहे ट्रेनिंग

इस सैन्य अभ्यास की एक खास बात यह है कि इसमें केवल अलग-अलग देशों की यूनिट्स नहीं बल्कि “मिक्स्ड टीम्स” बनाई गई हैं। यानी विभिन्न देशों के सैनिकों को मिलाकर टीम तैयार की गई है ताकि वे एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को समझ सकें।

अब तक सैनिकों ने जंगल वारफेयर, रॉक क्राफ्ट, एंबुश और काउंटर एंबुश ड्रिल, स्लिथरिंग और बस इंटरवेंशन ऑपरेशन जैसी ट्रेनिंग की है। इसके अलावा स्नाइपर फायरिंग और एके-203 राइफल शूटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।

सैनिकों के बीच आपसी तालमेल बढ़ाने के लिए बास्केटबॉल और वॉलीबॉल जैसी स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी कराई गईं। उद्घाटन समारोह में सभी विदेशी दलों का पारंपरिक भारतीय तरीके से स्वागत किया गया।

भारतीय सेना के एडिशनल डायरेक्टर जनरल इन्फैंट्री मेजर जनरल सुनील श्योराण ने उद्घाटन कार्यक्रम में कहा कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सेनाओं के बीच “कोहेशन”, “इंटरऑपरेबिलिटी” और “कलेक्टिव एंगेजमेंट” बेहद जरूरी हैं।

आखिर क्यों नहीं आया बांग्लादेश

बांग्लादेश की गैरमौजूदगी ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के सैन्य रिश्ते पहले काफी मजबूत माने जाते थे। दोनों देशों के बीच ‘सम्प्रिति’ नाम की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज कई बार हो चुकी है।

उमरोई ट्रेनिंग नोड का बांग्लादेश सीमा से काफी नजदीकी होना इस मुद्दे को और ज्यादा संवेदनशील बना देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ढाका का इस अभ्यास से दूर रहना केवल सैन्य फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव की शुरुआत अगस्त 2024 के बाद मानी जाती है। उसी दौरान बड़े जनआंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और वे भारत आ गईं। तब से दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी दिखाई नहीं दी। (Exercise Pragati 2026)

चीन दौरे में मोहम्मद यूनुस के बयान से बढ़ा विवाद

तनाव उस समय और बढ़ गया जब मार्च 2025 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस चीन दौरे पर गए। बीजिंग में एक बिजनेस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को “लैंडलॉक्ड” बताया और कहा कि बांग्लादेश इस पूरे क्षेत्र के लिए समुद्र तक पहुंच का “गार्डियन” है।

उन्होंने चीन से कहा कि वह इस स्थिति को आर्थिक अवसर के रूप में देख सकता है। इस बयान को भारत में काफी गंभीरता से लिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जवाब देते हुए कहा था कि भारत अपने पड़ोसी देशों को जोड़ने वाला मुख्य केंद्र है और क्षेत्रीय सहयोग किसी एक देश की पसंद के आधार पर नहीं चल सकता।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस बयान को “आपत्तिजनक” बताया था। (Exercise Pragati 2026)

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान पहले चीन जाएंगे

वहीं, बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने सत्ता संभालने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए चीन को चुना है। जून के आखिर में उनकी बीजिंग यात्रा होने वाली है। इस दौरान वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात करेंगे। बातचीत में इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार और तीस्ता नदी परियोजना जैसे मुद्दे शामिल रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस परियोजना के लिए चीन की एक्जिम बैंक फंडिंग भी दे सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने भी तारिक रहमान को यात्रा का न्योता दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले बधाई दी थी। इसके बावजूद बांग्लादेश ने चीन को पहली प्राथमिकता दी।

आमतौर पर बांग्लादेश समेत भारत के पड़ोसी देशों के नेता नई सरकार बनने के बाद सबसे पहले भारत आते रहे हैं। इसे भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति का हिस्सा माना जाता है। लेकिन इस बार यह परंपरा टूटती दिखाई दे रही है।

ढाका का कहना है कि चीन उसका बड़ा विकास साझेदार है और यह दौरा संतुलित विदेश नीति का हिस्सा है। वहीं भारत में इसे चीन की तरफ बढ़ते झुकाव के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी और तीस्ता परियोजना में चीन की भूमिका को लेकर भी नई दिल्ली नजर बनाए हुए है।

भारत ने वापस ली ट्रांसशिपमेंट सुविधा

बांग्लादेश के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत ने 2020 में दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा भी वापस ले ली। इस सुविधा के तहत बांग्लादेश को भारतीय एयरपोर्ट और बंदरगाहों का इस्तेमाल तीसरे देशों में निर्यात के लिए करने की अनुमति मिली थी।

2022 में इस व्यवस्था को और बढ़ाया गया था, लेकिन विवाद के बाद नई दिल्ली ने इसे खत्म कर दिया। इसे भारत की तरफ से मजबूत कूटनीतिक प्रतिक्रिया माना गया। (Exercise Pragati 2026)

पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती नजदीकी से चिंता

नई दिल्ली में चिंता का एक बड़ा कारण बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ता संपर्क भी माना जा रहा है। हाल के महीनों में ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में गर्मजोशी दिखाई दी है।

इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन की भूमिका पर भी भारत की नजर है। इस परियोजना में चीनी कंपनियों और विशेषज्ञों की भागीदारी की चर्चा हुई थी। भारतीय रणनीतिक हलकों में आशंका जताई गई कि इससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी मौजूदगी बढ़ सकती है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को “चिकन नेक” भी कहा जाता है। यह बेहद संवेदनशील इलाका है जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है।

भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी पर बढ़ाया फोकस

बांग्लादेश पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स की रफ्तार तेज कर दी है। सरकार ने करीब 22,864 करोड़ रुपये की लागत वाली शिलांग-सिलचर फोर लेन हाईवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाया है।

यह हाईवे म्यांमार के जरिए बनने वाले कलादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट से जुड़ने वाला है। इसका मकसद पूर्वोत्तर राज्यों को ऐसा वैकल्पिक समुद्री और जमीनी रास्ता देना है, जिसमें बांग्लादेश पर निर्भरता कम हो। (Exercise Pragati 2026)

कूटनीतिक स्तर पर भी बदलाव

भारत ने अप्रैल 2026 में बांग्लादेश में नए हाई कमिश्नर की नियुक्ति भी की। इस बार करियर डिप्लोमैट की जगह वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को ढाका भेजने का फैसला किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दोनों देशों के रिश्तों को राजनीतिक स्तर पर संभालने की कोशिश के तौर पर देखा गया।

क्रिकेट से लेकर सैन्य मंच तक दिख रही दूरी

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में दूरी केवल सैन्य मामलों तक सीमित नहीं रही। जनवरी 2026 में बांग्लादेश ने भारत में होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप मुकाबलों में खेलने से इनकार कर दिया था। उसने सुरक्षा और राजनीतिक तनाव का हवाला देते हुए मैच श्रीलंका में कराने की मांग की थी। हालांकि आईसीसी ने यह मांग स्वीकार नहीं की।

अब एक्सरसाइज प्रगति से दूरी को उसी बड़े पैटर्न का हिस्सा माना जा रहा है। (Exercise Pragati 2026)

सेना के साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रदर्शन भी

प्रगति एक्सरसाइज के साथ-साथ एक बड़ा डिफेंस इंडस्ट्री एक्सपो भी आयोजित किया गया है। फिक्की ने ईस्टर्न कमांड और आर्मी डिजाइन ब्यूरो के साथ मिलकर 30 और 31 मई को यह कार्यक्रम आयोजित किया।

इस दौरान आत्मनिर्भर भारत के तहत विकसित भारतीय सैन्य उपकरण, ड्रोन, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य डिफेंस टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया।

भारतीय सेना के अधिकारी और विदेशी सैन्य प्रतिनिधि इन स्वदेशी प्रणालियों को करीब से देख रहे हैं। एक्सपो का मकसद केवल तकनीक दिखाना नहीं बल्कि रक्षा सहयोग और इंडस्ट्री नेटवर्किंग को मजबूत करना भी बताया गया। (Exercise Pragati 2026)

अभ्यास के अंतिम चरण में पहुंची एक्सरसाइज

सूत्रों के मुताबिक प्रगति एक्सरसाइज अब अपने इंटेंसिव ऑपरेशनल फेज में पहुंच चुकी है। अंतिम दिनों में हाई इंटेंसिटी वैलिडेशन मिशन कराया जाएगा, जिसमें अलग-अलग देशों की मिश्रित टीमें मिलकर ऑपरेशन करेंगी।

इस दौरान सैनिकों की संयुक्त रणनीति, कम्युनिकेशन, फायरिंग और रेस्क्यू क्षमताओं का परीक्षण होगा। भारतीय सेना का मानना है कि इस तरह के अभ्यास आधुनिक युद्ध की बदलती चुनौतियों से निपटने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। (Exercise Pragati 2026)

Bangladesh has skipped India’s first multinational military exercise, Exercise Pragati 2026, currently underway in Meghalaya’s Umroi Field Training Node. The counter-terrorism exercise includes over 400 troops from 13 countries across South Asia, Southeast Asia, and the Indian Ocean region. Dhaka’s absence has drawn attention amid growing strategic tensions between India and Bangladesh since 2024. The exercise focuses on jungle warfare, joint tactical drills, sniper firing, and coordinated operations in semi-mountainous terrain. Analysts view Bangladesh’s decision as a diplomatic signal, especially as Dhaka deepens ties with China and Pakistan while India strengthens regional military cooperation and Northeast connectivity projects.

खड़कवासला से निकले 353 नए ‘वॉरियर’, NDA के 150वें कोर्स में 21 देशों के विदेशी कैडेट भी शामिल, सेना प्रमुख बोले- बदल चुका है युद्ध का तरीका

NDA Passing Out Parade 2026

NDA Passing Out Parade 2026: पुणे के खड़कवासला स्थित नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में शनिवार को पासिंग आउट परेड का आयोजन हुआ। एनडीए के 150वें कोर्स के 353 कैडेट्स ने अपनी ट्रेनिंग पूरी कर पासिंग आउट की। इनमें भारत के अलावा 21 मित्र देशों के कैडेट भी शामिल रहे। इस बार 18 महिला कैडेट्स ने भी परेड और ट्रेनिंग पूरी कर नई पहचान बनाई।

इस खास मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पासिंग आउट परेड की समीक्षा की और कैडेट्स को संबोधित किया। खास बात यह थी कि करीब 42 साल पहले वह खुद इसी परेड ग्राउंड से कैडेट के तौर पर निकले थे। वहीं, अब वह भारतीय सेना के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर उसी अकादमी में मुख्य अतिथि बने।

NDA Passing Out Parade 2026: सेना प्रमुख ने साझा किया अपना अनुभव

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कैडेट्स को संबोधित करते हुए कहा कि 42 साल पहले वह भी इसी परेड ग्राउंड पर खड़े थे और तब उनके मन में भी भविष्य को लेकर उत्साह और सवाल थे। उन्होंने कहा कि एनडीए सिर्फ एक ट्रेनिंग संस्थान नहीं है, बल्कि यह जीवनभर के लिए सोच, अनुशासन और नेतृत्व की नींव तैयार करता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब खतरे हमेशा पारंपरिक युद्ध की तरह सामने नहीं आते। कई बार दुश्मन सीमा के पार नहीं बल्कि साइबर, ड्रोन, इंफॉर्मेशन और टेक्नोलॉजी के जरिए भी चुनौती देता है। ऐसे माहौल में सैनिकों को केवल हथियार चलाना ही नहीं बल्कि तेजी से सोचने और सही फैसला लेने की क्षमता भी होनी चाहिए।

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि हालिया ऑपरेशंस ने दिखाया कि भारत किस तरह तेज, सटीक और निर्णायक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि आज के युवा अधिकारियों को इसी तरह की जिम्मेदारी निभानी होगी।

“सीखना कभी बंद मत करना”

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में कैडेट्स को लगातार सीखते रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अपने 40 साल से ज्यादा लंबे सैन्य जीवन में उन्होंने देखा कि सबसे अच्छे अधिकारी वही बने जो जीवनभर विद्यार्थी बने रहे।

उन्होंने कहा कि हर नई पोस्टिंग, हर नई जिम्मेदारी और हर ऑपरेशन से कुछ नया सीखने की कोशिश करनी चाहिए। केवल रैंक या मेडल ही अच्छे अधिकारी की पहचान नहीं होते, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में शांत रहना और सही नेतृत्व देना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उन्होंने तीन अहम गुणों पर जोर दिया – एटीट्यूड, एडैप्टेबिलिटी और एबिलिटी। उनके मुताबिक एटीट्यूड यानी सोच सबसे मजबूत आधार होता है। एडैप्टेबिलिटी यानी बदलती परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता और एबिलिटी यानी नेतृत्व व निर्णय लेने की ताकत। (NDA Passing Out Parade 2026)

महिला कैडेट्स को लेकर कही बड़ी बात

इस बार की पासिंग आउट परेड में 18 महिला कैडेट्स भी शामिल रहीं। सेना प्रमुख ने कहा कि महिला कैडेट्स ने हर ट्रेनिंग, हर ड्रिल और हर चुनौती में खुद को साबित किया। उन्होंने कहा कि परेड ग्राउंड पर उन्हें अलग पहचानना मुश्किल था क्योंकि उन्होंने सभी मानकों को बराबरी से पूरा किया।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि युद्धक्षेत्र में साहस, नेतृत्व और संकल्प का कोई जेंडर नहीं होता। सेना में जिम्मेदारी निभाने की क्षमता ही सबसे अहम होती है।

महिला कैडेट्स की मौजूदगी इस बार बेहद खास रही। क्योंकि एनडीए में महिलाओं की एंट्री के बाद यह तीसरा बैच है जिसने ट्रेनिंग पूरी की है। (NDA Passing Out Parade 2026)

21 देशों के विदेशी कैडेट भी हुए पास आउट

इस बार 21 मित्र देशों के कैडेट्स ने भी एनडीए से ट्रेनिंग पूरी की। इनमें 12 देशों के 24 फ्रेंडली फॉरेन कैडेट्स शामिल रहे। सेना प्रमुख ने अपने भाषण में इन विदेशी कैडेट्स का खास तौर पर स्वागत और सम्मान किया।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों से आए ये युवा अधिकारी अपने साथ दोस्ती, भरोसा और सैन्य सहयोग की भावना लेकर जाएंगे। भारत लंबे समय से कई मित्र देशों के सैन्य अधिकारियों को ट्रेनिंग देता रहा है और एनडीए इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

परिवारों का भी किया जिक्र

पासिंग आउट परेड के दौरान कैडेट्स के परिवार भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। कई माता-पिता अपने बच्चों को सैन्य वर्दी में देखकर भावुक नजर आए।

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में परिवारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कैडेट्स की सफलता के पीछे उनके परिवारों का त्याग और भरोसा भी शामिल है। कठिन ट्रेनिंग और लंबे समय तक परिवार से दूर रहने के दौरान परिवारों का समर्थन बेहद अहम होता है।

उन्होंने प्रशिक्षकों और स्टाफ की भी सराहना की जिन्होंने इन युवा कैडेट्स को सैन्य जीवन के लिए तैयार किया।

“सेवा परमो धर्म” का संदेश

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एनडीए के मूल मंत्र “सेवा परमो धर्म” का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सैन्य जीवन में कई बार आराम और कर्तव्य के बीच चुनाव करना पड़ता है, लेकिन एक सैनिक का सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र सेवा होता है।

उन्होंने कैडेट्स से कहा कि नेतृत्व कभी शब्दों से साबित नहीं होता, बल्कि सैनिकों का भरोसा ही किसी अधिकारी की असली पहचान बनता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

किरण बेदी ने कैडेट्स को बताया “स्कॉलर वॉरियर”

इस समारोह में पूर्व आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी भी मौजूद रहीं। उन्होंने कैडेट्स को संबोधित करते हुए उन्हें “स्कॉलर वॉरियर” बनने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में केवल शारीरिक ताकत काफी नहीं है। आधुनिक सैन्य अधिकारी को टेक्नोलॉजी, रणनीति, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय मामलों और नेतृत्व की भी गहरी समझ होनी चाहिए।

किरण बेदी ने कहा कि अनुशासन, ज्ञान और ईमानदारी किसी भी सैन्य अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत होती है।

236 कैडेट्स को मिली डिग्री

समारोह के दौरान जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने 236 कैडेट्स को बैचलर डिग्री भी प्रदान की। इनमें कंप्यूटर साइंस, साइंस और आर्ट्स स्ट्रीम के कैडेट्स शामिल रहे।

आंकड़ों के मुताबिक 112 कैडेट्स ने कंप्यूटर साइंस, 65 ने साइंस और 59 ने आर्ट्स स्ट्रीम में डिग्री हासिल की।

एनडीए में सैन्य ट्रेनिंग के साथ-साथ अकादमिक पढ़ाई पर भी बराबर जोर दिया जाता है। कैडेट्स तीन साल तक कठोर शारीरिक ट्रेनिंग के साथ नियमित शैक्षणिक पढ़ाई भी करते हैं। (NDA Passing Out Parade 2026)

इन कैडेट्स ने हासिल किए बड़े सम्मान

इस समारोह में कई कैडेट्स को उनकी शानदार अकादमिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित भी किया गया। ‘जे’ स्क्वाड्रन के कैडेट रणविजय त्यागी ने कंप्यूटर साइंस स्ट्रीम में सबसे ज्यादा ग्रेड हासिल किए। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और एडमिरल रोलिंग ट्रॉफी दी गई।

‘एम’ स्क्वाड्रन के कैडेट पीयूष रौतेला ने साइंस स्ट्रीम में टॉप किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीओएएस रोलिंग ट्रॉफी मिली।

‘पी’ स्क्वाड्रन के कैडेट सुशांत वर्मा ने सोशल साइंस स्ट्रीम में पहला स्थान हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीएएस ट्रॉफी प्रदान की गई।

वहीं बीटेक स्ट्रीम में ‘जी’ स्क्वाड्रन के कैडेट मन्नेला नितिन ने छह सेमेस्टर में सबसे ज्यादा सीजीपीए हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीआईएससी ट्रॉफी दी गई। (NDA Passing Out Parade 2026)

क्यों खास है एनडीए

1954 में स्थापित एनडीए एशिया की सबसे पुरानी ट्राई-सर्विस सैन्य अकादमियों में गिनी जाती है। यहां सेना, नौसेना और वायुसेना के कैडेट्स एक साथ ट्रेनिंग लेते हैं।

तीन साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद कैडेट्स अलग-अलग सैन्य अकादमियों में आगे की ट्रेनिंग के लिए जाते हैं। सेना के कैडेट्स इंडियन मिलिट्री अकादमी, नौसेना के कैडेट्स नेवल अकादमी और वायुसेना के कैडेट्स एयर फोर्स अकादमी में आगे की ट्रेनिंग लेते हैं।

एनडीए का 150वां कोर्स इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह अकादमी के लंबे सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां से निकले कई अधिकारी बाद में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख बने। (NDA Passing Out Parade 2026)

The National Defence Academy’s 150th course marked a major milestone as 353 cadets, including trainees from 21 friendly foreign nations, graduated from NDA Khadakwasla. The passing out ceremony also included 18 female cadets, reflecting the changing face of India’s armed forces. Chief of the Army Staff General Upendra Dwivedi reviewed the parade and delivered an emotional address, urging cadets to lead with courage, adaptability, and integrity. He highlighted the importance of jointness among the three services and referred to Operation Sindoor as an example of modern military preparedness. The ceremony was attended by senior military leaders and dignitaries.

जवानों को ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही भारतीय सेना, पहाड़ों पर 30 किलो वजन के साथ भी नहीं थकेंगे सैनिक

Indian Army Exoskeleton System
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Indian Army Exoskeleton System: भारतीय सेना अब अपने जवानों को अब ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसी तकनीक इस्तेमाल करने जा रही है, जो लंबे समय तक भारी वजन उठाकर चलने के दौरान उनकी थकान कम करेगी। रक्षा मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और भारतीय सेना ने 520 पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह सिस्टम सैनिकों को पहाड़ी इलाकों, बर्फीले मोर्चों और कठिन युद्ध क्षेत्रों में भारी सामान उठाने में मदद करेगा।

सेना को जरूरतों को पूरा करने वाले एक्सोस्केलेटन सिस्टम की खरीद का सबसे अहम हिस्सा यह है कि यह तकनीक बिना बैटरी और बिना बिजली के काम करेगी। यानी सैनिकों को किसी चार्जिंग सिस्टम या अतिरिक्त पावर सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

सेना को 90 दिनों के अंदर इसकी डिलीवरी पूरी करनी होगी। इन सिस्टम्स का इस्तेमाल उच्च हिमालयी इलाकों में किया जाएगा, जहां जवानों को रोजाना कई किलो वजन उठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं।

Indian Army Exoskeleton System: आखिर क्या होता है एक्सोस्केलेटन?

एक्सोस्केलेटन को आसान भाषा में समझें तो यह एक पहनने वाला मैकेनिकल सपोर्ट सिस्टम है। यह किसी रोबोटिक सूट जैसा दिखता है, लेकिन इसमें मोटर या बैटरी नहीं होती। सैनिक इसे शरीर पर पहनते हैं और यह उनकी कमर, पीठ, कंधों, हाथों और घुटनों को अतिरिक्त ताकत देता है।

सेना के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन डॉक्यूमेंट में इसे ऐसे सिस्टम के रूप में बताया गया है जो सैनिकों की स्ट्रेंथ, एंड्योरेंस और मोबिलिटी बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि यह कार्बन फाइबर जैसे हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल से तैयार किया जाता है और कठिन इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करता है।

भारतीय सेना के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि सियाचिन, लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों को कई किलो राशन, हथियार और गोला-बारूद लेकर घंटों चलना पड़ता है। लंबे समय तक वजन उठाने से रीढ़, घुटनों और कंधों पर दबाव बढ़ता है। एक्सोस्केलेटन इस दबाव को कम करेगा। (Indian Army Exoskeleton System)

बिना बिजली के काम करेगा पूरा सिस्टम

इस खरीद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सेना ने पूरी तरह पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम मांगा है। टेक्निकल स्पेसिफिकेशन में साफ लिखा गया है कि सिस्टम “विदाउट एनी एक्सटर्नल पावर” होना चाहिए। यानी यह बैटरी या इलेक्ट्रिक मोटर के बिना काम करेगा।

इसका फायदा यह होगा कि जवानों को ऑपरेशन के दौरान चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। ऊंचाई वाले इलाकों में अत्यधिक ठंड के कारण बैटरियां जल्दी खत्म हो जाती हैं, लेकिन यह सिस्टम मैकेनिकल सपोर्ट पर आधारित होगा।

सैनिक जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत ऑन या ऑफ भी कर सकेंगे। इसके लिए मैनुअल कंट्रोल स्विच दिया जाएगा। जवान बिना सूट उतारे इसे बंद या चालू कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सैनिकों को कितना सपोर्ट मिलेगा?

सेना ने इस सिस्टम के लिए काफी सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। दस्तावेज के मुताबिक एक्सोस्केलेटन सैनिक को कम से कम 30 किलो वजन उठाने और ले जाने में मदद करेगा।

कमर और रीढ़ वाले हिस्से में सिस्टम को ऐसा बनाया जाएगा कि जवान जब जमीन से वजन उठाए तो उसे कम से कम 20 किलो का अतिरिक्त सपोर्ट मिले। वहीं दोनों हाथों को मिलाकर 15 किलो तक अतिरिक्त सपोर्ट देने की शर्त रखी गई है।

इसका मतलब यह हुआ कि जवान का शरीर पूरा बोझ अकेले नहीं उठाएगा। सूट वजन का हिस्सा अपने ऊपर ले लेगा। इससे सैनिक की ऊर्जा कम खर्च होगी और थकान धीरे आएगी।

पहाड़ों और बर्फीले इलाकों के लिए खास डिजाइन

भारतीय सेना ने जो तापमान सीमा तय की है, उससे साफ है कि यह सिस्टम बेहद कठिन मौसम के लिए खरीदा जा रहा है। ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री से प्लस 50 डिग्री तक रखा गया है। वहीं स्टोरेज टेम्परेचर माइनस 40 डिग्री तक होना चाहिए। यानी यह सिस्टम सियाचिन जैसे ग्लेशियर क्षेत्र से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इसके अलावा पूरा सिस्टम वाटरप्रूफ कैरिंग केस में आएगा, ताकि बारिश, बर्फ या कीचड़ वाले इलाकों में भी इसे सुरक्षित रखा जा सके। (Indian Army Exoskeleton System)

केवल 5.5 किलो होगा वजन

दिलचस्प बात यह है कि सैनिकों को अतिरिक्त ताकत देने वाला यह पूरा सिस्टम खुद बहुत हल्का होगा। सेना ने इसकी अधिकतम वजन सीमा 5.5 किलो तय की है।

इसके लिए कार्बन फाइबर, हाई स्ट्रेंथ एल्यूमिनियम अलॉय, टफ नायलॉन और कुशन मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। ये सभी मटेरियल हल्के होने के साथ मजबूत भी होते हैं।

सेना ने यह भी कहा है कि सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे जवान आसानी से पहन और उतार सकें। किसी मुश्किल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। (Indian Army Exoskeleton System)

तीन हिस्सों में बंटा होगा एक्सोस्केलेटन

सेना ने 3-इन-1 मॉड्यूलर डिजाइन मांगा है। इसमें बैक मॉड्यूल, आर्म मॉड्यूल और नी मॉड्यूल शामिल होंगे। बैक मॉड्यूल सैनिक की कमर और रीढ़ को सपोर्ट देगा। आर्म मॉड्यूल हथियार या भारी उपकरण उठाने के दौरान हाथों पर दबाव कम करेगा। वहीं नी मॉड्यूल घुटनों को सहारा देगा ताकि ऊंचाई वाले इलाकों में चढ़ाई करते समय शरीर पर कम असर पड़े।

टेक्निकल डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त मॉड्यूल जोड़े जा सकेंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सेना को क्यों चााहिए यह सूट

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से हाई अल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों की फिजिकल स्ट्रेस कम करने वाली तकनीकों पर ध्यान दे रही है। पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सीमाओं पर लंबे समय तक तैनाती के दौरान जवानों को भारी उपकरण लेकर गश्त करनी पड़ती है।

एक सामान्य सैनिक कई बार 25 से 35 किलो तक वजन लेकर चलता है। इसमें हथियार, गोला-बारूद, राशन, रेडियो सेट और सर्वाइवल उपकरण शामिल होते हैं। ऐसे में कमर और घुटनों की चोटें बढ़ जाती हैं।

सेना का मानना है कि एक्सोस्केलेटन से जवान ज्यादा समय तक एक्टिव रह सकेंगे और तेजी से मूवमेंट कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

मेक इन इंडिया को प्रथमिकता

इस पूरी खरीद प्रक्रिया में “मेक इन इंडिया” को प्राथमिकता दी गई है। इसमें केवल क्लास-1 और क्लास-2 लोकल सप्लायर्स ही इसमें भाग ले सकेंगे। क्लास-1 सप्लायर के लिए कम से कम 50 प्रतिशत लोकल कंटेंट जरूरी है, जबकि क्लास-2 के लिए 20 प्रतिशत।

सरकार ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज को भी विशेष छूट दी है। एमएसई कंपनियों को प्राइस प्रेफरेंस और क्वांटिटी प्रेफरेंस दोनों मिलेंगे। इससे भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स और घरेलू कंपनियों को बड़ा मौका मिलेगा।

सेना ने सिस्टम खरीद के साथ ट्रेनिंग की शर्त भी जोड़ी है। सप्लायर के दो व्यक्तियों को एक सप्ताह की ट्रेनिंग देनी होगी। यह ट्रेनिंग यूजर लोकेशन पर होगी, ताकि जवान वास्तविक परिस्थितियों में सिस्टम इस्तेमाल करना सीख सकें।

सिस्टम की वारंटी तीन साल तय की गई है। इसके अलावा छह साल की शेल्फ लाइफ मांगी गई है। (Indian Army Exoskeleton System)

दुनियाभर की सेनाओं में तेजी से बढ़ रहा इस्तेमाल

अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी सेनाएं पिछले कई वर्षों से एक्सोस्केलेटन तकनीक पर काम कर रही हैं। अमेरिकी सेना ने लॉजिस्टिक्स और लोड कैरिंग के लिए कई प्रोटोटाइप तैयार किए हैं। चीन ने हाई अल्टीट्यूड सैनिकों के लिए हल्के एक्सोस्केलेटन का परीक्षण किया है।

वहीं अब भारतीय सेना भी सैनिकों की फिजिकल परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए नई तकनीक को तेजी से अपनाना चाहती है। खास बात यह है कि भारतीय सेना ने शुरुआत में पॉसिव सिस्टम चुना है क्योंकि यह कम मुश्लकिल, कम खर्चीला और फील्ड में ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। (Indian Army Exoskeleton System)

The Indian Army is set to procure 520 passive exoskeleton systems to enhance the physical endurance and operational efficiency of soldiers deployed in high-altitude and extreme terrain areas such as Ladakh and Siachen. These wearable assistive devices will help troops carry heavy loads of up to 30 kilograms with reduced fatigue and lower stress on the spine, knees, shoulders, and arms. Unlike powered robotic suits, the passive exoskeleton works without batteries or external power sources, making it ideal for harsh environments. The move is part of the Army’s modernisation drive and supports the government’s “Make in India” initiative in the defence sector.

‘FRCV प्रोग्राम’ में नए मेन बैटल टैंकों के साथ उड़ेंगे सर्विलांस और कामिकाजे ड्रोन, तैयार होंगे 590 हाईटेक कॉम्बैट सिस्टम

Indian Tank Drone System FRCV
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Indian Tank Drone System: भारतीय सेना अब फ्यूचर टैंकों को हमला और निगरानी करने वाले हाईटेक कॉम्बैट ड्रोन प्लेटफॉर्म से भी लैस करने की तैयारी कर रही है। आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) ने एक ऐसा प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिससे भारतीय टैंक दुश्मन पर कई किलोमीटर दूर से ड्रोन हमला कर सकेंगे। इसके साथ ही टैंक के अंदर बैठे जवान रियल टाइम वीडियो फीड देखकर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख पाएंगे।

एवीएनएल और हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री अवाडी ने भारतीय सेना के फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) प्रोग्राम के लिए एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम डेवलप करने का एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। यह सिस्टम एवीएनएल के नए 55 टन वाले मेन बैटल टैंक (एमबीटी) के लिए बनाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत तीन अलग-अलग तरह के ड्रोन तैयार किए जाएंगे, जिनमें लॉइटरिंग मुनिशन, अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन और टेदर्ड ड्रोन शामिल हैं।

यह पूरा प्रोजेक्ट रक्षा मंत्रालय की “बाय इंडियन-आईडीडीएम” कैटेगरी के तहत होगा, जिसमें बड़े स्तर पर स्वदेशी तकनीक और भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी। शुरुआती प्रोटोटाइप चरण में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट जरूरी रखा गया है, जबकि सीरीज प्रोडक्शन के अंतिम चरण में इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।

Indian Tank Drone System: क्या है AVNL का नया ड्रोन सिस्टम

एवीएनएल द्वारा तैयार किया जा रहा यह ड्रोन सिस्टम केवल एक ड्रोन नहीं बल्कि पूरा कॉम्बैट नेटवर्क होगा। इसमें तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म एक साथ काम करेंगे। इनका उद्देश्य टैंक को दूर से हमला करने, आसमान से निगरानी करने और युद्ध के दौरान लगातार कम्युनिकेशन बनाए रखने की क्षमता देना है।

इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि टैंक क्रू को दुश्मन के इलाके में बिना आगे बढ़े हमला करने की क्षमता मिलेगी। मौजूदा टैंक आमतौर पर अपनी गन की रेंज तक ही प्रभावी होते हैं, लेकिन नए ड्रोन सिस्टम के जरिए टैंक 15 से 20 किलोमीटर दूर तक दुश्मन को ट्रैक और निशाना बना सकेगा।

सूत्रों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य की लड़ाई में ड्रोन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब ड्रोन-इंटीग्रेटेड टैंक और आर्मर्ड सिस्टम डेवलप कर रही हैं।

लॉइटरिंग मुनिशन से सटीक हमला

इस पूरे सिस्टम का सबसे घातक हिस्सा लॉइटरिंग मुनिशन (एलएम) होगा। इसे आम भाषा में “कामीकाजे ड्रोन” भी कहा जाता है। यह ड्रोन टैंक से लॉन्च होगा और दुश्मन के इलाके के ऊपर काफी देर तक उड़ान भरते हुए टारगेट को खोज कर हमल करेगा।

एवीएनएल की तरफ से जारी तकनीकी जानकारी के अनुसार इस ड्रोन की न्यूनतम रेंज 15 किलोमीटर होगी। यह कम से कम 45 मिनट तक हवा में रह सकेगा और 30 मिनट तक टारगेट एरिया के ऊपर लॉइटर कर सकेगा। साथ ही, इसका वारहेड कम से कम 500 मिमी और बेहतर स्थिति में 600 मिमी तक आर्मर भेदने में सक्षम होना चाहिए।

यह ड्रोन एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर (ERA) को भी भेद सकेगा। आधुनिक युद्ध में कई देशों के टैंक ईआरए सिक्योरिटी से लैस होते हैं, जिन्हें नष्ट करना आसान नहीं होता। एवीएनएल चाहता है कि उसका ड्रोन ऊपर से हमला कर दुश्मन के सबसे कमजोर हिस्से को निशाना बनाए। इसे “टॉप अटैक” मोड कहा जाता है। आधुनिक टैंकों की छत बाकी हिस्सों की तुलना में कमजोर होती है, इसलिए ऊपर से हमला बेहद प्रभावी माना जाता है।

इस लॉइटरिंग म्यूनिशन को टैंक से कैनिस्टर या ट्यूब के जरिए लॉन्च किया जाएगा। लॉन्च के बाद यह 5 सेकंड के भीतर सक्रिय होकर उड़ान भर सकेगा। ड्रोन का कैनिस्टर पूरी तरह वाटरप्रूफ होगा और 5 मीटर गहरे पानी में भी सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा यह टैंक की तेज रफ्तार, झटकों और मुख्य तोप की फायरिंग के दौरान भी सुरक्षित रहना चाहिए। यह सिस्टम सिर्फ मैदानी इलाकों के लिए नहीं बल्कि रेगिस्तान, जंगल, शहरी इलाकों और पहाड़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

एलएम ड्रोन में एंटी-जैमिंग सिस्टम, फ्रीक्वेंसी हॉपिंग और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन जैसी तकनीकें भी होंगी। ताकि ताकि दुश्मन रेडियो सिग्नल जाम करके इसे गिरा न सके। ड्रोन को GNSS डिनाइड वातावरण में भी काम करना होगा। यानी यदि दुश्मन जीपीएस सिग्नल जाम कर दे तब भी यह अपना मिशन पूरा कर सके।

इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे चलते हुए टैंक या तेज रफ्तार से वाले टारगेट को भी ट्रैक किया जा सकेगा। जानकारी के अनुसार यह 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहे टारगेट पर भी हमला कर सकता है। ड्रोन की सटीकता इतनी ज्यादा रखी गई है कि इसका सर्कुलर एरर प्रॉबेबिलिटी (CEP) सिर्फ 1 मीटर से कम होना चाहिए।

इसमें EO/IR गिम्बल भी लगाया जाएगा। यानी दिन और रात दोनों समय दुश्मन को पहचानने वाले कैमरे। इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग की क्षमता भी होगी। एवीएनएल ने साफ कहा है कि यह ड्रोन केवल टैंक के आदेश पर ही अंतिम हमला करेगा। यानी इंसानी नियंत्रण हमेशा रहेगा।

अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन करेगा निगरानी

दूसरा सिस्टम अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन (यूएसडी) होगा। इसका मुख्य काम दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना और टैंक क्रू को लाइव वीडियो फीड देना होगा। यह ड्रोन टैंक को “बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट” क्षमता देगा। यानी टैंक चालक दल उन लक्ष्यों को भी देख सकेगा जो सीधे दिखाई नहीं देते। यह ड्रोन लगभग 20 किलोमीटर तक की दूरी से हाई क्वालिटी वीडियो भेज सकेगा। इसमें डे और नाइट ऑपरेशन क्षमता होगी, यानी दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकेगी।

यूएसडी में ईओ और आईआर सेंसर लगाए जाएंगे। ईओ यानी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर सामान्य विजुअल निगरानी करेंगे जबकि आईआर यानी इन्फ्रारेड सिस्टम अंधेरे में भी दुश्मन की गतिविधियां पकड़ सकेगा।

इस ड्रोन को मैनुअल और सेमी-ऑटोमैटिक दोनों मोड में उड़ाया जा सकेगा। अगर जीपीएस सिग्नल जाम हो जाएं तब भी यह विजन-बेस्ड नेविगेशन और आईएनएस सिस्टम के जरिए काम करता रहेगा। इस ड्रोन में AES-256 एन्क्रिप्शन या उससे बेहतर सुरक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि दुश्मन इसके डेटा को इंटरसेप्ट न कर सके।

इस सिस्टम की एक और खासियत यह है कि यह लॉइटरिंग मुनिशन के साथ मिलकर काम करेगा। यानी यूएसडी पहले टारगेट की पहचान करेगा और उसके बाद एलएम ड्रोन को टारगेट की लोकेशन भेजी जाएगी। एवीएनएल चाहता है कि सर्विलांस ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और टैंक एक ही C4ISR नेटवर्क में काम करें। (Indian Tank Drone System)

टेदर्ड ड्रोन करेगा लगातार हवाई निगरानी

तीसरा सिस्टम टेदर्ड ड्रोन (टीडी) होगा। यह सामान्य ड्रोन से काफी अलग होगा। इसे टैंक से केबल के जरिए जोड़ा जाएगा और उसी से पावर सप्लाई मिलेगी।

आमतौर पर ड्रोन की सबसे बड़ी समस्या बैटरी लाइफ होती है, लेकिन टेदर्ड ड्रोन घंटों तक लगातार उड़ान भर सकता है क्योंकि उसे बिजली सीधे टैंक से मिलती रहेगी। एवीएनएल ने कहा है कि टेदर्ड ड्रोन सिस्टम में ऑटोमैटिक विंच सिस्टम, पावर मॉड्यूल और हाई बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन होना चाहिए।

इसका इस्तेमाल लगातार हवाई निगरानी और कम्युनिकेशन रिले के लिए किया जाएगा। युद्ध के दौरान यह ड्रोन ऊंचाई पर रहकर आसपास के इलाके की निगरानी करेगा और टैंक यूनिट्स के बीच कम्युनिकेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा।

इसमें हाई-बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम होगा जिससे रियल टाइम वीडियो फीड तुरंत टैंक तक पहुंचेगी।

पूरे सिस्टम को -20 डिग्री से +45 डिग्री तापमान में काम करने योग्य बनाया जाएगा। ड्रोन सिस्टम को टैंक के साथ इस तरह इंटीग्रेट किया जाएगा कि वाहन की मोबिलिटी प्रभावित न हो।

एवीएनएल ने यह भी कहा है कि सभी ड्रोन सिस्टम MIL-STD-461E और MIL-STD-464C जैसे मिलिटरी स्टैंडर्ट्स पर आधारित होंगे।

एक ही कंट्रोल सिस्टम से चलेंगे तीनों ड्रोन

एवीएनएल की ईओआई में साफ कहा गया है कि तीनों ड्रोन सिस्टम के लिए एक ही इंटीग्रेटेड डिस्प्ले यूनिट बनाई जाएगी। यानी टैंक के अंदर बैठा क्रू एक ही कंट्रोल पैनल से एलएम, यूएसडी और टीडी तीनों को ऑपरेट कर सकेगा।

इस यूनिट में जॉयस्टिक, टच कंट्रोल और डिजिटल इंटरफेस दिए जाएंगे। रियल टाइम टेलीमेट्री, वीडियो फीड और टारगेट डेटा इसी सिस्टम पर दिखाई देगा। (Indian Tank Drone System)

3 प्रोटोटाइप और 590 यूनिट्स की योजना

एवीएनएल ने इस प्रोजेक्ट को दो फेज में बांटा है। पहले फेज में तीन प्रोटोटाइप सिस्टम विकसित किए जाएंगे। इनमें तीनों ड्रोन प्लेटफॉर्म शामिल होंगे। दूसरे चरण में कुल 590 सीरीज प्रोडक्शन यूनिट्स का टारगेट रखा गया है। हालांकि यह उत्पादन रक्षा मंत्रालय द्वारा एफआरसीवी प्रोग्राम में एवीएनएल के चयन पर निर्भर करेगा। अगर सेना एवीएनएल के टैंक को चुनती है, तभी बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होगा।

शुरुआत में तीन टैंकों पर यह तकनीक लगाकर उसका परीक्षण होगा। यदि सेना और रक्षा मंत्रालय परीक्षण में संतुष्ट रहते हैं तो बाद में 590 टैंक ड्रोन सिस्टम से लैस किए जाएंगे। हालांकि दस्तावेज में साफ कहा गया है कि यह संख्या भविष्य में सेना की जरूरत के हिसाब से बदल भी सकती है।

एवीएनएल ने साफ किया है कि सिस्टम को कई स्तर के ट्रायल से गुजरना होगा। पहले बेंच टेस्टिंग होगी, फिर डायनामिक स्टैंड टेस्ट और उसके बाद टैंक पर इंटीग्रेशन किया जाएगा। इसके अलावा ईएमआई-ईएमसी टेस्ट, पर्यावरणीय परीक्षण और लाइव फायरिंग ट्रायल भी होंगे। ड्रोन सिस्टम को स्थिर और गतिशील दोनों तरह के टारगेट के खिलाफ जांचा जाएगा।

इन परीक्षणों के बाद ही सिस्टम को बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए मंजूरी मिलेगी।

इस परियोजना के तहत पहला प्रोटोटाइप सप्लाई ऑर्डर मिलने के 12 महीने के भीतर तैयार करना होगा। इसके बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होगा। दस्तावेज के अनुसार सीरीज प्रोडक्शन चरण में 30 सिस्टम से शुरुआत होगी। इसके बाद अगले चरण में 45 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। तीसरे चरण में 85 सिस्टम का उत्पादन होगा।

इसके बाद चौथे और पांचवें चरण में 100-100 सिस्टम बनाए जाएंगे। उसके बाद छठे चरण में 110 और सातवें चरण में 120 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। इस तरह कुल संख्या 590 तक पहुंचेगी। (Indian Tank Drone System)

क्या है एफआरसीवी प्रोग्राम

एफआरसीवी यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का टैंक प्रोग्राम है। इसे “प्रोजेक्ट रंजीत” नाम से भी जाना जाता है।

इसका उद्देश्य पुराने टी-72 अजेय टैंकों को बदलना है। भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 टैंक मौजूद हैं, जिनमें से कई अब पुराने हो चुके हैं।

एफआरसीवी को लगभग 55 टन क्लास का मीडियम वेट टैंक बनाया जा रहा है। इसमें आधुनिक फायरपावर, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम, एआई आधारित टारगेट ट्रैकिंग और ड्रोन इंटीग्रेशन जैसी क्षमताएं होंगी। (Indian Tank Drone System)

एफआरसीवी टैंक की खासियतें

एफआरसीवी में 120 एमएम स्मूथबोर गन लगाए जाने की योजना है। यह टैंक एपीएफएसडीएस, हीट और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे आधुनिक गोला-बारूद इस्तेमाल कर सकेगा।

टैंक में ऑटोलोडर सिस्टम होगा जिससे फायरिंग की गति बढ़ेगी। इसकी अधिकतम स्पीड करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है।

टैंक में एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी होगा जो आने वाली मिसाइलों और ड्रोन हमलों को रोक सकेगा। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर आर्मर, सीबीआरएन प्रोटेक्शन और थर्मल सिग्नेचर मैनेजमेंट जैसी तकनीकें भी शामिल होंगी। (Indian Tank Drone System)

Exclusive: अमेरिका के सुपर कैरियर को टक्कर देगा चीन का 960 फीट लंबा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर, Type-004 की पहली साफ तस्वीर आई सामने!

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

China Type-004 Aircraft Carrier: चीन एक बार फिर अपनी नौसैनिक ताकत को तेजी से बढ़ाने में जुटा हुआ है। हाल ही में रक्षा समाचार ने जब जांच-पड़ताल की तो नई सैटेलाइट तस्वीरों में चौंकाने वाला खुलासा देखने को मिला। इन तस्वीरों में चीन का नया और बेहद विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर दिखाई दिया है, जिसे फिलहाल “टाइप-004” के नाम से जाना जा रहा है। सूत्रों का मानना है कि यह चीन का पहला न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हो सकता है।

रक्षा समाचार की खोजबीन में पता चला कि यह एयरक्राफ्ट कैरियर चीन के डालियान शिपयार्ड में बनाया जा रहा है। नई तस्वीरों से साफ संकेत मिले हैं कि इसका निर्माण तेजी से चल रहा है। यह जहाज आकार और क्षमता के मामले में अमेरिका के सुपरकैरीयर्स को चुनौती दे सकता है।

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

China Type-004 Aircraft Carrier: सैटेलाइट तस्वीरों में क्या दिखा

मई 2026 की गूगल अर्थ की सैटेलाइट तस्वीरों में चीन के डालियान शिपयार्ड में एक विशाल युद्धपोत का स्ट्रक्चर साफ दिखाई दिया। यह 960 फीट से ज्यादा लंबा और 155 फीट चौड़ा है। इसका साइज चीन के मौजूदा “फुजियान” एयरक्राफ्ट कैरियर से भी बड़ा माना जा रहा है।

तस्वीरों में जहाज का फ्लैट फ्लाइट डेक, आइलैंड सुपर स्ट्रक्चर, विशाल हुल सेक्शन और भारी क्रेन्स दिखाई दे रहे हैं। तस्वीरें देख कर लगा रहा है निर्माण की गति काफी तेज है। शुरुआती हुल सेक्शन 2025 की शुरुआत में दिखाई दिए थे और कुछ ही महीनों में पूरा स्ट्रक्चर स्पष्ट रूप से नजर आने लगा।

यह एयरक्राफ्ट कैरियर लियाओनिंग प्रांत के डालियान शिपयार्ड में तैयार किया जा रहा है। यही वह जगह है जहां चीन के पहले दो एयरक्राफ्ट कैरियर “लियाओनिंग” और “शानदोंग” भी बनाए गए थे। (China Type-004 Aircraft Carrier)

क्या होगा न्यूक्लियर पावर वाला कैरियर

सीएसआईएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि टाइप-004 के ऊपर दो बड़े पीले रंग हिस्से ऐसे दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए बनाया गया माना जा रहा है। इसी वजह से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीन पहली बार परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर बना रहा है।

अगर यह दावा सही साबित होता है तो चीन दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हैं।

न्यूक्लियर पावर वाले कैरियर की सबसे बड़ी ताकत उसकी लंबी दूरी तक बिना ईंधन भरे ऑपरेशन करने की क्षमता होती है। ऐसे जहाज महीनों तक समुद्र में रह सकते हैं और उन्हें बार-बार रुककर फ्यूल भरने की जरूरत नहीं पड़ती।

अमेरिका की नेवी लंबे समय से इसी तरह के न्यूक्लियर सुपरकैरीयर्स का इस्तेमाल करती आ रही है। अब चीन भी उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट से लैस होगा जहाज

टाइप-004 में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम लगाया जा सकता है। यह वही तकनीक है जिसका इस्तेमाल अमेरिका के आधुनिक “जेराल्ड आर. फोर्ड क्लास” एयरक्राफ्ट कैरियर में किया जाता है।

इस तकनीक की मदद से लड़ाकू विमानों को ज्यादा तेजी और कम समय में लॉन्च किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इस कैरियर में चार कैटापल्ट सिस्टम हो सकते हैं, जबकि चीन के मौजूदा फुजियान कैरियर में तीन कैटापल्ट हैं।

अगर चार कैटापल्ट लगाए जाते हैं तो चीन एक साथ ज्यादा लड़ाकू विमान लॉन्च कर सकेगा। इससे लंबी दूरी के एयर मिशन और बड़े हवाई ऑपरेशन करना आसान होगा। (China Type-004 Aircraft Carrier)

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

कैसे बढ़ी चीन की एयरक्राफ्ट कैरियर ताकत

चीन ने पिछले कुछ सालों में अपनी नौसैनिक ताकत तेजी से बढ़ाई है। शुरुआत में उसने सोवियत संघ के पुराने युद्धपोत “वारयाग” को खरीदकर उसे “लियाओनिंग” एयरक्राफ्ट कैरियर में बदला।

इसके बाद चीन ने “शानदोंग” नाम का अपना दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बनाया। यह स्की-जंप डिजाइन वाला जहाज था।

फिर चीन ने कुछ साल पहले “फुजियान” एयरक्राफ्ट कैरियर लॉन्च किया, जो पूरी तरह चीन में डिजाइन और विकसित किया गया पहला आधुनिक कैरियर माना जाता है।

अब टाइप-004 को चीन की अगली पीढ़ी का सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर माना जा रहा है।

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
Image Credit: Raksha Samachar/Google Earth

अमेरिका जैसी ब्लू-वॉटर नेवी बनाना चाहता है चीन

चीन अब केवल अपने तटीय इलाकों तक सीमित नौसेना नहीं रखना चाहता। वह ऐसी “ब्लू-वॉटर नेवी” बनाना चाहता है, जो दुनिया के किसी भी हिस्से में जाकर मिलिटरी पावर दिखा सके।

ब्लू-वॉटर नेवी का मतलब ऐसी नौसेना से है जो हजारों किलोमीटर दूर समुद्री इलाकों में लंबे समय तक ऑपरेशन चला सके।

चीन के बढ़ते एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका मकसद प्रशांत महासागर और हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी बढ़ाना बताया जा रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

टाइप-004 के साथ चलेंगे बड़े वॉरशिप

चीन केवल एयरक्राफ्ट कैरियर ही नहीं बना रहा, बल्कि उसके साथ चलने वाले पूरे “कैरियर स्ट्राइक ग्रुप” को भी मजबूत कर रहा है।

इन स्ट्राइक ग्रुप्स में बड़े डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और सप्लाई जहाज शामिल होंगे।

विशेषज्ञ डेनियल राइस की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपने कैरियर ग्रुप्स के लिए तीन स्तर की सुरक्षा प्रणाली तैयार कर रहा है।

बाहरी सुरक्षा घेरे में जे-15 लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां तैनात होंगी। मध्य सुरक्षा घेरे में टाइप-052डी डेस्ट्रॉयर और टाइप-054ए फ्रिगेट जैसे युद्धपोत रहेंगे। सबसे अंदरूनी सुरक्षा घेरे में छोटे रेंज वाले हथियार और डिफेंस सिस्टम लगाए जाएंगे। (China Type-004 Aircraft Carrier)

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
Image Credit: Raksha Samachar/Google Earth

“कैरियर किलर” मिसाइलों पर भी जोर

चीन केवल एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं बना रहा, बल्कि उन्हें सुरक्षा देने के लिए लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें भी डेवलप कर चुका है।

डीएफ-21डी और डीएफ-26बी मिसाइलों को अक्सर “कैरियर किलर” कहा जाता है। इन मिसाइलों का मकसद दुश्मन के एयरक्राफ्ट कैरियर को लंबी दूरी से निशाना बनाना है।

रिपोर्ट के अनुसार डीएफ-21डी करीब 900 मील दूर तक हमला कर सकती है, जबकि डीएफ-26बी की रेंज लगभग 2485 मील बताई जाती है।

इन मिसाइलों के जरिए चीन अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर पर नजर

चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत का सीधा असर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर की मदद से चीन लंबे समय तक समुद्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रख सकेगा।

इसी वजह से अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर लगातार नजर रख रहे हैं।

भारत के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी पिछले कुछ वर्षों से चिंता का विषय बनी हुई है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

चीन बना रहा है विशाल सप्लाई वॉरशिप

इसके अलावा चीन एक बहुत बड़ा नेवल सप्लाई जहाज भी तैयार कर रहा है। यह जहाज एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप्स को समुद्र में ईंधन, हथियार और भोजन उपलब्ध कराएगा। यह जहाज करीब 889 फीट लंबा और 121 फीट चौड़ा हो सकता है।

अगर ऐसा होता है तो चीन अपने कैरियर ग्रुप्स को चीन से हजारों किलोमीटर दूर भी लंबे समय तक ऑपरेट करा सकेगा।

हालांकि भौगोलिक स्थिति भी चीन के लिए चुनौती मानी जाती है। खुले प्रशांत महासागर तक पहुंचने के लिए चीनी जहाजों को मियाको स्ट्रेट और बाशी चैनल जैसे संवेदनशील समुद्री रास्तों से गुजरना पड़ता है, जिन पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की कड़ी नजर रहती है।

दुनिया की नजरें डालियान शिपयार्ड पर

चीन के डालियान शिपयार्ड पर सबकी नजरें हैं। दुनियाभर में यह जानने की कोशिश हो रही है कि टाइप-004 में कौन-कौन सी नई तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं।

सीएसआईएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह जहाज चीन की सैन्य आधुनिकीकरण योजना का बड़ा हिस्सा है। अमेरिकी रक्षा विभाग की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक चीन 2035 तक कुल नौ एयरक्राफ्ट कैरियर रखने का लक्ष्य बना सकता है।

अगर ऐसा होता है तो चीन दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक ताकतों में शामिल हो जाएगा। (China Type-004 Aircraft Carrier)

2030 तक लॉन्च होने की संभावना

मिलिटरी एक्सपर्ट एरिक वर्टहाइम ने मार्च 2026 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि चीन के फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर को निर्माण शुरू होने से लॉन्च होने तक करीब छह साल लगे थे।

अगर टाइप-004 का निर्माण भी उसी रफ्तार से चलता है तो यह 2027-28 तक लॉन्च किया जा सकता है। वहीं इसकी कमीशनिंग 2029-30 के आसपास तक की जा सकती है।

हालांकि इसके बाद भी जहाज को पूरी तरह ऑपरेशनल बनने में कई साल लग सकते हैं क्योंकि समुद्री परीक्षण, हथियार इंटीग्रेशन और फाइनल फिटिंग जैसी प्रक्रियाएं लंबी होती हैं। (China Type-004 Aircraft Carrier)

भारत के AMCA स्टेल्थ फाइटर प्रोजेक्ट के लिए रक्षा मंत्रालय ने जारी की RFP, दो इंजन, स्टेल्थ डिजाइन और AI सिस्टम से होगा लैस

AMCA Fighter Jet RFP

AMCA Fighter Jet RFP: भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्वाकांक्षी लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने आज इस स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर विमान प्रोजेक्ट के लिए आधिकारिक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी कर दी। यह आरएफपी तीन शॉर्टलिस्टेड कंपनियों और कंसोर्टियम को भेजा गया है।

यह विमान स्टेल्थ तकनीक, आधुनिक सेंसर, लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली से लैस होगा। यह विमान पूरी तरह मल्टी रोल होगा और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में सक्षम बनाया जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारतीय वायुसेना के भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। एएमसीए को भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर विमान माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यह विमान चीन के जे-20 और अमेरिका के एफ-35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट्स की श्रेणी में भारत की एंट्री कराएगा।

AMCA Fighter Jet RFP: क्या है एएमसीए प्रोजेक्ट

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एक ट्विन इंजन, मल्टी रोल और लो ऑब्जर्वेबल स्टेल्थ फाइटर जेट है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए द्वारा डिजाइन किया गया है। यह एजेंसी डीआरडीओ के तहत काम करती है।

इस विमान को भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों के हिसाब से विकसित किया जा रहा है। यह एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और इंटेलिजेंस सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशन को अंजाम देने में सक्षम होगा।

एएमसीए को स्टेल्थ तकनीक के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि दुश्मन के रडार इसे आसानी से पकड़ न सकें। इसमें इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और सुपरक्रूज जैसी आधुनिक क्षमताएं होंगी।

किन कंपनियों को भेजा गया आरएफपी

रक्षा मंत्रालय ने यह आरएफपी तीन शॉर्टलिस्टेड कंपनियों और कंसोर्टियम को जारी किया है। इनमें पहला नाम लार्सन एंड टुब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के कंसोर्टियम का है। दूसरा नाम टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का है और तीसरा नाम भारत फोर्ज और बीईएमएल के समूह का है।

इन कंपनियों को एएमसीए प्रोजेक्ट में इंडस्ट्री पार्टनर के तौर पर चुना जा सकता है। आरएफपी के अनुसार चुनी गई कंपनी को विमान के निर्माण, असेंबली, सिस्टम इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन में अहम भूमिका निभानी होगी। लेकिन कुल प्रोजेक्ट 7 साल यानी 84 महीने में पूरा करना है। वहीं, पूरा प्रोजेक्ट 2034 तक पूरा करना होगा।

एएमसीए की सबसे बड़ी खासियत क्या होगी

एएमसीए को पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कहा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि इसमें स्टेल्थ तकनीक के साथ आधुनिक डिजिटल युद्ध प्रणाली होगी।

इस विमान में रडार अब्जॉर्बिंग मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि इसका रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहे। विमान के अंदर ही हथियार रखने के लिए इंटरनल वेपन बे होगा, जिससे इसकी स्टेल्थ क्षमता और मजबूत होगी।

इसमें एडवांस्ड एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और बड़े डिजिटल कॉकपिट स्क्रीन लगाए जाएंगे।

एएमसीए में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट लगाया जाएगा। इसका काम दुश्मन के रडार और मिसाइल सिस्टम को भ्रमित करना होगा।

विमान में रडार वार्निंग रिसीवर, मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर्स जैसी तकनीकें होंगी। इससे दुश्मन की मिसाइलों से बचाव आसान होगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

पांच प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे

रक्षा समाचार को मिली आरएफपी के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के तहत पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे। इनके अलावा एक स्ट्रक्चरल टेस्ट स्पेसिमेन भी बनाया जाएगा।

इन प्रोटोटाइप्स का इस्तेमाल फ्लाइट टेस्टिंग, सिस्टम वैलिडेशन और अलग-अलग तकनीकी परीक्षणों में किया जाएगा। इसके साथ ही टेस्ट फैसिलिटीज, जिग्स, फिक्स्चर्स और ग्राउंड सपोर्ट सिस्टम भी तैयार किए जाएंगे।

विमान की टेस्टिंग लंबी और जटिल प्रक्रिया होगी। इसमें हजारों घंटे की उड़ान और अलग-अलग मौसम व ऑपरेशनल परिस्थितियों में परीक्षण शामिल होंगे।

ट्विन इंजन कॉन्फिगरेशन पर खास जोर

एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे। इसे ट्विन इंजन कॉन्फिगरेशन कहा जाता है। इससे विमान की ताकत और सुरक्षा दोनों बढ़ेंगी।

फिलहाल माना जा रहा है कि शुरुआती एएमसीए मार्क-1 में जीई एफ414 इंजन का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाद के संस्करण यानी एएमसीए मार्क-2 में ज्यादा ताकतवर और संभवतः स्वदेशी इंजन लगाने की योजना है। इसके लिए भारत अलग इंजन विकास कार्यक्रम पर भी काम कर रहा है।

आरएफपी में प्रोपल्शन सिस्टम के लिए अलग एननेक्सर दिया गया है, जिसमें इंजन इंटीग्रेशन, टेस्ट रिग्स और ग्राउंड टेस्टिंग की विस्तृत जानकारी शामिल है। (AMCA Fighter Jet RFP)

सुपरक्रूज और स्टेल्थ तकनीक

एएमसीए की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में सुपरक्रूज क्षमता भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि विमान आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल किए बिना भी सुपरसोनिक गति से उड़ सकेगा।

आमतौर पर लड़ाकू विमान तेज गति पाने के लिए आफ्टरबर्नर का इस्तेमाल करते हैं जिससे ईंधन की खपत बहुत बढ़ जाती है। लेकिन सुपरक्रूज क्षमता वाले विमान लंबे समय तक तेज गति बनाए रख सकते हैं और ईंधन भी कम खर्च होता है।

आरएफपी में इंफ्रारेड सिग्नेचर को कम करने पर भी विशेष जोर दिया गया है। आधुनिक मिसाइलें इंजन की गर्मी को ट्रैक करके हमला करती हैं। इसलिए एएमसीए में इंजन एग्जॉस्ट डिजाइन इस तरह तैयार किया जाएगा कि उसकी गर्मी कम दिखाई दे। विमान में रडार अब्जॉर्बिंग मटेरियल यानी विशेष कोटिंग का इस्तेमाल होगा जो रडार तरंगों को कम रिफ्लेक्ट करेगी। इससे विमान का रडार क्रॉस सेक्शन बहुत कम हो जाएगा।

एएमसीए में सेंसर फ्यूजन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि विमान के अलग-अलग सेंसर से मिलने वाली जानकारी एक साथ पायलट को दिखाई जाएगी। इसमें एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और सुरक्षित डेटा लिंक शामिल होंगे।

विमान में एडवांस्ड एईएसए यानी एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड अरे रडार पारंपरिक रडार की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली और तेज होगा। यह रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकेगा। इसके अलावा दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचने की क्षमता भी इसमें होगी।

आधुनिक एवियोनिक्स सिस्टम

एएमसीए का पूरा कॉकपिट डिजिटल होगा। आरएफपी में बड़े पैनोरमिक डिस्प्ले, हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर का जिक्र किया गया है।

पायलट को अलग-अलग स्क्रीन देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विमान के सेंसर और रडार से मिलने वाली जानकारी एक साथ प्रोसेस होकर पायलट को दिखाई जाएगी। इसे सेंसर फ्यूजन कहा जाता है। (AMCA Fighter Jet RFP)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड मदद

आरएफपी के अनुसार विमान में एआई आधारित सहायता प्रणाली भी होगी। इससे पायलट को युद्ध के दौरान तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

सिस्टम खुद खतरे की पहचान कर पायलट को चेतावनी देगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई के विकल्प भी सुझाएगा।

होगा इंटरनल वेपन बे

एएमसीए में हथियार विमान के अंदर रखे जाएंगे। इसे इंटरनल वेपन बे कहा जाता है। इससे विमान की स्टेल्थ क्षमता बनी रहती है क्योंकि बाहरी हिस्से पर हथियार लटकाने से रडार सिग्नेचर बढ़ जाता है।

एएमसीए को कई प्रकार की मिसाइलों और बमों से लैस किया जाएगा। इसमें हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मिसाइल, हवा से जमीन पर हमला करने वाले प्रिसिजन गाइडेड हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल की जा सकती हैं।

भविष्य में ब्रह्मोस-एनजी जैसी मिसाइलों को भी इसमें जोड़े जाने की संभावना बताई गई है।

एएमसीए में फ्लाई-बाय-वायर तकनीक का इस्तेमाल होगा। इसमें पायलट के कमांड को कंप्यूटर कंट्रोल्ड सिस्टम विमान तक पहुंचाते हैं।

इसके साथ एआई आधारित स्टेबिलिटी और फ्लाइट एनवेलप प्रोटेक्शन सिस्टम भी होगा। इससे विमान को संभालना आसान होगा और सुरक्षा बढ़ेगी।

लंबी टेस्टिंग प्रक्रिया होगी

आरएफपी में बताया गया है कि एएमसीए के प्रोटोटाइप्स पर करीब 1800 से ज्यादा फ्लाइट सॉर्टीज की जाएंगी।

इसके लिए अलग-अलग टेस्ट फैसिलिटीज बनाई जाएंगी। इनमें ग्राउंड टेस्ट रिग्स, ईएमआई-ईएमसी टेस्ट सेटअप, स्ट्रक्चरल टेस्ट फैसिलिटी और टेलीमेट्री सिस्टम शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक यह प्रक्रिया कई साल तक चल सकती है। (AMCA Fighter Jet RFP)

एडीए रखेगा डिजाइन कंट्रोल

आरएफपी के अनुसार एडीए इस पूरे प्रोजेक्ट का डिजाइन अथॉरिटी रहेगा। यानी विमान के डिजाइन और कॉन्फिगरेशन का पूरा नियंत्रण एडीए के पास रहेगा। इंडस्ट्री पार्टनर को डिजाइन डेटा और ड्रॉइंग्स के आधार पर मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन करना होगा।

आरएफपी में यह भी कहा गया है कि जो कंपनी या कंसोर्टियम यह प्रोजेक्ट जीतेगा, उसे तीन महीने के भीतर नई कंपनी बनानी होगी। इसी नई कंपनी के जरिए एएमसीए प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाएगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

माइलस्टोन आधारित पेमेंट सिस्टम

प्रोजेक्ट में भुगतान माइलस्टोन आधारित होगा। यानी अलग-अलग चरण पूरे होने पर भुगतान जारी किया जाएगा।
इन चरणों में टूलिंग, जिग्स, स्ट्रक्चरल मॉड्यूल, पहला प्रोटोटाइप, फर्स्ट फ्लाइट और आगे की टेस्टिंग शामिल हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है एएमसीए

भारतीय वायुसेना लंबे समय से पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर विमान की जरूरत महसूस कर रही है। चीन पहले ही जे-20 को अपनी वायुसेना में शामिल कर चुका है। वहीं अमेरिका के पास एफ-22 और एफ-35 जैसे आधुनिक विमान मौजूद हैं।

ऐसे में एएमसीए को भारत की सामरिक जरूरतों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट केवल एक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि भारत की एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण क्षमता की बड़ी परीक्षा भी है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर फोकस

इस प्रोजेक्ट के तहत बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसमें हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग, कंपोजिट स्ट्रक्चर निर्माण, टेस्ट फैसिलिटीज और डिजिटल इंजीनियरिंग शामिल हैं।

इसके साथ भारतीय कंपनियों को आधुनिक एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा।

कंपोजिट मटेरियल का इस्तेमाल

एएमसीए में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे विमान का वजन कम होगा और मजबूती बढ़ेगी।

कम वजन होने से विमान की गति, रेंज और हथियार ले जाने की क्षमता बेहतर होगी। (AMCA Fighter Jet RFP)

साइबर सिक्योरिटी पर खास फोकस

आरएफपी में साइबर सिक्योरिटी को अनिवार्य बनाया गया है। कंपनियों को रक्षा मंत्रालय की साइबर सुरक्षा गाइडलाइन का पालन करना होगा।

क्योंकि आधुनिक लड़ाकू विमान पूरी तरह नेटवर्क आधारित होते हैं, इसलिए साइबर हमलों से सुरक्षा बेहद जरूरी मानी जा रही है।

एएमसीए परियोजना में अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को लागू किया जाएगा। आरएफपी में एएस9100 जैसे एयरोस्पेस क्वालिटी स्टैंडर्ड का जिक्र किया गया है।

सभी निर्माण इकाइयों और सप्लाई चेन को इन मानकों का पालन करना होगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

लंबे समय तक रखरखाव की जिम्मेदारी

इंडस्ट्री पार्टनर को केवल विमान बनाना ही नहीं बल्कि उनके रखरखाव और सपोर्ट की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। आरएफपी में एलआरयू और दूसरे सिस्टम्स के लिए वारंटी और लॉन्ग टर्म सपोर्ट की व्यवस्था का भी जिक्र किया गया है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि एएमसीए प्रोजेक्ट भारत के रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका को भी नए स्तर पर ले जाएगा। (AMCA Fighter Jet RFP)

टैंक रिकवरी व्हीकल पर लगेगा रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम! AVNL के बड़े टेंडर में जेन टेक्नोलॉजीज ने लगाई सबसे कम बोली

Zen Technologies RCWS Tender
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Zen Technologies RCWS Tender: हैदराबाद की डिफेंस कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड ने आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के एक बड़े टेंडर में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी यानी एल-1 बिडर बनी है। यह टेंडर आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स के लिए रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम (RCWS) का है, जिसकी कुल कीमत करीब 85.21 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय सेना के आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स पर आधुनिक रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगाए जाएंगे। इन सिस्टम्स की मदद से सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हुए मशीन गन चला सकेंगे। इससे युद्ध के दौरान सैनिकों की सुरक्षा और फायरपावर दोनों बढ़ेंगी।

यह टेंडर अप्रैल में एवीएनएल की अवाडी स्थित हेवी व्हीकल फैक्ट्री की ओर से जारी किया गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत 81 रिमोट कंट्रोल वेपन स्टेशन सप्लाई किए जाने हैं। (Zen Technologies RCWS Tender)

Zen Technologies RCWS Tender: क्या होता है आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल

आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल (ARV) सेना के लिए बेहद अहम सपोर्ट प्लेटफॉर्म माना जाता है। इसका इस्तेमाल युद्ध के मैदान में खराब हो चुके टैंक या दूसरे भारी सैन्य वाहनों को खींचने, हटाने और रिपेयर करने के लिए किया जाता है।

भारतीय सेना के पास टी-72 और टी-90 जैसे मुख्य युद्धक टैंक मौजूद हैं। अगर किसी ऑपरेशन के दौरान इनमें तकनीकी खराबी आ जाए या दुश्मन की फायरिंग में नुकसान पहुंचे, तो एआरवी उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाने का काम करता है।

इन वाहनों में भारी शील्ड, क्रेन, विंच और रिपेयर उपकरण लगे होते हैं। लेकिन अब आधुनिक युद्ध में केवल रिकवरी क्षमता काफी नहीं मानी जाती। ड्रोन हमले, स्नाइपर और घात लगाकर किए जाने वाले हमलों के खतरे को देखते हुए इन वाहनों को भी हथियारों से लैस करना जरूरी माना जा रहा है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब एआरवी पर रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगाने जा रही है।

क्या है रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम

रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम यानी आरसीडब्ल्यूएस एक ऐसा हथियार प्लेटफॉर्म होता है, जिसे वाहन के अंदर बैठकर ऑपरेट किया जा सकता है।

पहले सैनिकों को मशीन गन चलाने के लिए वाहन के ऊपर निकलना पड़ता था। इससे वे दुश्मन की गोलीबारी और ड्रोन हमलों की जद में आ जाते थे। लेकिन नए सिस्टम में सैनिक पूरी तरह कवच के अंदर रहकर फायरिंग कर सकेंगे।

इस सिस्टम में कैमरा, थर्मल इमेजर, डे-नाइट विजन, ऑटो ट्रैकिंग और स्टेबलाइजेशन जैसी तकनीकें होती हैं। इससे चलते वाहन से भी सटीक निशाना लगाया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में ऐसे सिस्टम तेजी से जरूरी होते जा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में भी रिमोट वेपन सिस्टम का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर देखा गया है।

Zen Technologies RCWS Tender

जेन टेक्नोलॉजीज को क्यों मिली बढ़त

जेन टेक्नोलॉजीज पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रक्षा सेक्टर की तेजी से उभरती कंपनियों में शामिल हो चुकी है। कंपनी का मुख्यालय हैदराबाद में है और यह डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर, एंटी-ड्रोन सिस्टम और कॉम्बैट टेक्नोलॉजी डेवलप करती है।

जेन टेक्नोलॉजीज को पहले भी रक्षा मंत्रालय से कई बड़े ऑर्डर मिल चुके हैं। कंपनी को करीब 404 करोड़ रुपये का एंटी-ड्रोन सिस्टम और सिमुलेटर कॉन्ट्रैक्ट मिला था। इसके अलावा 289 करोड़ रुपये का एक बड़ा अपग्रेडेशन ऑर्डर भी कंपनी को मिला था।

एयरो इंडिया 2025 के दौरान जेन टेक्नोलॉजीज ने अपने नए रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम यानी आरसीडब्ल्यूएस मॉडल भी पेश किए थे। इन सिस्टम्स को खासतौर पर आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स के लिए डिजाइन किया गया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक एवीएनएल के इस टेंडर में कंपनी की तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धी कीमत दोनों ने अहम भूमिका निभाई।

जेन टेक्नोलॉजीज पहले ही अपने कई रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम मॉडल्स पेश कर चुकी है। इनमें “परशु” और “फणिश” जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। (Zen Technologies RCWS Tender)

कौन सा सिस्टम लगाया जा सकता है

हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर यह साफ नहीं किया गया है कि एआरवी पर कंपनी का कौन सा आरसीडब्ल्यूएस लगाया जाएगा, लेकिन सूत्रों का कहना है कि “फणिश” सिस्टम सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

फणिश को खासतौर पर टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें 12.7 मिमी हैवी मशीन गन लगाने की क्षमता है।

यह सिस्टम वाहन के अंदर बैठे ऑपरेटर द्वारा कंट्रोल किया जाता है। इसमें कूल्ड थर्मल कैमरा, डे कैमरा और ऑटो ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

बताया जाता है कि यह सिस्टम 14 किलोमीटर तक टारगेट पहचानने की क्षमता रखता है। इसके अलावा यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। (Zen Technologies RCWS Tender)

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सेना को क्या मिलेगा फायदा

इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा सैनिकों की सुरक्षा माना जा रहा है। युद्ध के दौरान रिकवरी वाहन अक्सर दुश्मन की नजर में रहते हैं क्योंकि वे युद्ध क्षेत्र के बीच जाकर खराब टैंकों को निकालते हैं।

अगर ऐसे समय पर दुश्मन की गोलीबारी या ड्रोन हमला हो जाए, तो वाहन के ऊपर मौजूद सैनिक सबसे पहले निशाने पर आते हैं। लेकिन आरसीडब्ल्यूएस लगने के बाद सैनिक कवच के अंदर रहकर ही जवाबी कार्रवाई कर सकेंगे।

इसके अलावा वाहन की फायरपावर भी बढ़ जाएगी। अगर किसी इलाके में घात लगाकर हमला हो या ड्रोन दिखाई दें, तो वाहन तुरंत जवाब दे सकेगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में सपोर्ट व्हीकल्स को भी “कॉम्बैट रेडी” बनाना जरूरी हो चुका है। (Zen Technologies RCWS Tender)

एआई और ऑटो ट्रैकिंग जैसी तकनीक

जेन टेक्नोलॉजीज के वेपन सिस्टम में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें एआई आधारित टारगेट पहचान, ऑटो ट्रैकिंग और फाइबर ऑप्टिक जायरो स्टेबलाइजेशन जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

इन तकनीकों की मदद से सिस्टम चलते वाहन पर भी लक्ष्य को लॉक कर सकता है। इससे निशाना ज्यादा सटीक होता है।

थर्मल कैमरे की वजह से रात या खराब मौसम में भी लक्ष्य दिखाई देता है। यही वजह है कि सेना अब पुराने मैनुअल सिस्टम की जगह स्मार्ट हथियार प्लेटफॉर्म पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

बता दें कि आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड भारत सरकार की डिफेंस पब्लिक सेक्टर की कंपनी है। इसका गठन 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के पुनर्गठन के बाद किया गया था।

एवीएनएल मुख्य रूप से भारतीय सेना के लिए आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स बनाता है। इसमें अर्जुन मेन बैटल टैंक, टी-90 टैंक, सारथ आईसीवी और आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल जैसे कई महत्वपूर्ण सैन्य प्लेटफॉर्म शामिल हैं। भारतीय सेना के कई आर्मर्ड सिस्टम की मरम्मत और अपग्रेडेशन का काम भी इसी नेटवर्क के जरिए होता है।

सूत्रों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में केवल टैंक ही नहीं, बल्कि उन्हें सपोर्ट करने वाले रिकवरी सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण हो चुके हैं। इसी वजह से एवीएनएल अब आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल्स को आधुनिक तकनीक से लैस करने पर जोर दे रहा है। (Zen Technologies RCWS Tender)

एआरवी पर आरसीडब्ल्यूएस लगाने का फैसला उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

आरसीडब्ल्यूएस यानी रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम लगने के बाद एआरवी की सुरक्षा और फायरपावर दोनों बढ़ जाएंगी। खासकर ऐसे इलाकों में जहां दुश्मन ड्रोन, स्नाइपर या घात लगाकर हमला कर सकता है, वहां यह सिस्टम काफी मददगार माना जा रहा है। (Zen Technologies RCWS Tender)

टेंडर की प्रक्रिया अब किस चरण में

जेन टेक्नोलॉजीज को फिलहाल एल-1 बिडर घोषित किया गया है। इसका मतलब यह है कि कंपनी ने सबसे कम बोली लगाई है और तकनीकी रूप से भी शर्तों को पूरा किया है।

अब आगे कॉन्ट्रैक्ट फाइनलाइजेशन, प्रोटोटाइप टेस्टिंग और सेना के ट्रायल की प्रक्रिया होगी। इसके बाद सप्लाई शुरू की जाएगी।

टेंडर दस्तावेजों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में डिजाइन, डेवलपमेंट, प्रोटोटाइप, टेस्टिंग और सप्लाई सभी शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि सेना अब ऐसे सिस्टम चाहती है जो पूरी तरह भारतीय जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं और भविष्य में आसानी से अपग्रेड भी किए जा सकें। (Zen Technologies RCWS Tender)

डिफेंस पेंशनर्स के लिए बड़ी राहत, खत्म हुई CSD कार्ड की सबसे बड़ी परेशानी, अब ऐसे करा सकेंगे रिन्यू

CSD Card Renewa
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CSD Card Renewal: देश के लाखों पूर्व सैनिकों और डिफेंस पेंशनर्स के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। रक्षा मंत्रालय ने नया सर्कुलर जारी कर साफ कर दिया है कि अब सीएसडी यानी कैंटीन सर्विसेज डिपार्टमेंट स्मार्ट कार्ड का रिन्यूअल देश के किसी भी हिस्से से कराया जा सकेगा। अब रिटायर सैनिकों और उनके परिवारों को अपने पुराने यूनिट या पैरेंट यूनिट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी इस आदेश के बाद उन बुजुर्ग पेंशनर्स को सबसे ज्यादा राहत मिलने वाली है, जो रिटायरमेंट के बाद दूसरे शहरों या राज्यों में जाकर बस गए हैं। कई पूर्व सैनिक लंबे समय से इस समस्या को उठा रहे थे कि कार्ड रिन्यू कराने के लिए उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने पुराने यूनिट तक जाना पड़ता था। अब सरकार ने इस प्रक्रिया को आसान बनाने का फैसला किया है।

हाल ही में रक्षा समाचार के संवाददाता को भी नए बने कतर्व्य भवन में एक ऐसे ही बुजुर्ग महावीर सिंह मिले थे, जिन्होंने इस प्रक्रिया की शिकायत की थी। आगरा से दिल्ली आए 90 साल के बुजुर्ग महावीर सिंह 30 साल पहले दिल्ली से डिफेंस सर्विसेज से रिटायर हुए थे। उन्होंने बताया था कि उन्हें भी कहा गया है वे जहां से वे रिटायर हुए हैं, उन्हें वहीं से दस्तखत कराने होंगे। उनका कहना था कि वे अपने पोतों के साथ दिल्ली आए हैं और वो दफ्तर खोज रहे हैं, जहां से वे रिटायर हुए थे। क्योंकि वो दफ्तर अब कहीं और शिफ्ट हो चुका है और अब उनका कोई संपर्क नहीं है। वे बस दफ्तरों की दौड़ लगा रहे हैं। कहीं कोई सही से बताने वाला नहीं है, जो जैसा बता देता है, वे वहां पहुंच जाते हैं। वे निराश हैं कि कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जिसके बाद रक्षा समाचार ने संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर इस आदेश के बारे में जानकारी दी थी। संबंधित अधिकारियों ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही इस समस्या का हल निकाला जाएगा।

CSD Card Renewal: 19 मई को जारी हुआ सर्कुलर

रक्षा मंत्रालय के डायरेक्टरेट ऑफ ऑर्डनेंस (कोऑर्डिनेशन एंड सर्विसेज) के वेलफेयर सेक्शन की ओर से 19 मई को यह सर्कुलर जारी किया गया। यह आदेश कोलकाता स्थित कार्यालय से जारी हुआ है।

सर्कुलर में कहा गया है कि मंत्रालय के पास लगातार ऐसी शिकायतें पहुंच रही थीं कि कई पेंशनर्स को सीएसडी कार्ड रिन्यू कराने में परेशानी हो रही है। कुछ अधिकारियों की तरफ से यह कहा जा रहा था कि पेंशनर पहले अपने पैरेंट यूनिट से अनुमति या एंडोर्समेंट लेकर आएं। इसी वजह से कई लोगों के कार्ड समय पर रिन्यू नहीं हो पा रहे थे।

रक्षा मंत्रालय ने साफ किया कि रिटायरमेंट के बाद कोई भी पूर्व सैनिक देश के किसी भी हिस्से में बस सकता है। ऐसे में उसका नया निवास स्थान सीएसडी कार्ड रिन्यू कराने में बाधा नहीं बनना चाहिए। मंत्रालय ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले योग्य पेंशनर्स के कार्ड रिन्यूअल आवेदन स्वीकार करें और जरूरी दस्तावेज जांचने के बाद प्रक्रिया पूरी करें। (CSD Card Renewal)

क्या होता है CSD कार्ड

सीएसडी यानी कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक विशेष सुविधा है। इसका फायदा सेना, नौसेना, वायु सेना, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को मिलता है।

इस कार्ड की मदद से लाभार्थी कैंटीन से कई सामान बाजार कीमत से कम दाम पर खरीद सकते हैं। इनमें राशन, किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू उपकरण, बाइक, कार और दूसरी जरूरी चीजें शामिल होती हैं।

पूर्व सैनिकों के लिए यह सुविधा काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि इससे उनका मासिक खर्च कम होता है। खासकर महंगाई के दौर में सीएसडी कैंटीन से मिलने वाली छूट बड़ी राहत देती है। (CSD Card Renewal)

रिटायरमेंट के बाद शुरू होती थी परेशानी

कई सैनिक रिटायरमेंट के बाद अपने गांव लौट जाते हैं। कुछ लोग बच्चों के पास दूसरे शहरों में रहने लगते हैं। ऐसे में उनका पुरानी यूनिट उनसे काफी दूर हो जाती है।

पहले जब सीएसडी कार्ड की वैधता खत्म होती थी, तब कई जगहों पर अधिकारियों की तरफ से कहा जाता था कि कार्ड रिन्यू कराने के लिए संबंधित व्यक्ति को अपने मूल यूनिट से सत्यापन कराना होगा।

इस वजह से बुजुर्ग पेंशनर्स को लंबी यात्रा करनी पड़ती थी। कई लोगों को ट्रेन टिकट, होटल और दूसरे खर्च उठाने पड़ते थे। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए जहां 75-80 साल के बुजुर्ग पूर्व सैनिक केवल कार्ड रिन्यू कराने के लिए दूसरे राज्यों तक गए।

पूर्व सैनिक संगठनों ने कई बार इस मुद्दे को उठाया था। सोशल मीडिया पर भी कई शिकायतें सामने आई थीं। कई पेंशनर्स का कहना था कि कार्ड एक्सपायर होने के बाद उन्हें कैंटीन सुविधा नहीं मिल रही थी। (CSD Card Renewal)

CSD Card Renewal
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मंत्रालय ने क्या निर्देश दिए

सर्कुलर में साफ शब्दों में कहा गया है कि किसी भी पेंशनर को केवल इसलिए रिन्यूअल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह अपने पैरेंट यूनिट से दूर रह रहा है।

यह आदेश सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद जारी किया गया है। दस्तावेज पर स्टाफ ऑफिसर वेलफेयर माधुपर्णा रॉय के हस्ताक्षर हैं।

सर्कुलर में रक्षा मंत्रालय ने सभी सीएमडी, यूनिट हेड्स, डीपीएसयू अधिकारियों और संबंधित प्रशासनिक प्रमुखों को निर्देश दिया है कि वे पेंशनर्स की मदद करें।

अब अगर कोई पूर्व सैनिक अपने इलाके में मौजूद किसी यूनिट, डिपो या कार्यालय में आवेदन देता है, तो वहां के अधिकारी जरूरी दस्तावेज देखकर कार्ड रिन्यू कर सकेंगे।

इसके लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर यानी पीपीओ, ई-पीपीओ और दूसरे जरूरी दस्तावेजों की जांच की जाएगी। सही पाए जाने पर आवेदन को काउंटर साइन और एंडोर्स किया जाएगा। (CSD Card Renewal)

अब क्या करना होगा पेंशनर्स को

रक्षा मंत्रालय के निर्देश के बाद अब पूर्व सैनिक अपने नजदीकी सीएसडी कार्यालय या संबंधित रक्षा यूनिट से संपर्क कर सकते हैं।

नई व्यवस्था के तहत पेंशनर अपने नजदीकी कार्यालय में जाकर आवेदन दे सकेंगे। इसके लिए उन्हें पुराना सीएसडी कार्ड, पीपीओ, पहचान पत्र, पता प्रमाण और जरूरी दस्तावेज दिखाने होंगे।

दस्तावेजों की जांच के बाद अधिकारी आवेदन को मंजूरी देंगे और कार्ड रिन्यू करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कई जगहों पर यह प्रक्रिया पहले से डिजिटल हो चुकी है। इसलिए अब पहले की तुलना में काम तेजी से होने की उम्मीद है।

अगर किसी का कार्ड एक्सपायर होने वाला है या पहले से समाप्त हो चुका है, तो वह जरूरी दस्तावेज लेकर आवेदन कर सकता है।

इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि लंबी दूरी की यात्रा और अनावश्यक देरी जैसी परेशानियां काफी कम हो जाएंगी। (CSD Card Renewal)

बुजुर्ग पेंशनर्स को सबसे ज्यादा राहत

इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन बुजुर्ग पूर्व सैनिकों को होगा जो स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई पूर्व सैनिक पहाड़ी इलाकों, गांवों और दूरदराज क्षेत्रों में रहते हैं। वहां से पुराने यूनिट तक पहुंचना काफी मुश्किल होता है। कई विधवा महिलाएं भी कार्ड रिन्यू कराने में परेशानी का सामना करती थीं।

अब उन्हें केवल अपने नजदीकी सीएसडी कार्यालय या संबंधित यूनिट तक जाना होगा। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी।

भारत में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और डिफेंस पेंशनर्स रहते हैं। इनमें सेना, नौसेना, वायु सेना और रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े लोग शामिल हैं।

सीएसडी सुविधा का इस्तेमाल लाखों परिवार करते हैं। ऐसे में यह फैसला काफी बड़े स्तर पर असर डालने वाला माना जा रहा है। क्योंकि लंबे समय से इस बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी। कई बार केवल प्रक्रिया की वजह से पेंशनर्स को परेशान होना पड़ता था। (CSD Card Renewal)

पूर्व सैनिक संगठनों ने जताई खुशी

सर्कुलर सामने आने के बाद पूर्व सैनिक संगठनों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। एक पूर्व सैनिक संगठन के प्रतिनिधि ने कहा कि यह फैसला लंबे समय से उठाई जा रही मांग को पूरा करता है। उन्होंने कहा कि कई बुजुर्ग सैनिक केवल प्रक्रिया की वजह से परेशान हो रहे थे। अब उन्हें राहत मिलेगी।

कुछ संगठनों ने यह भी कहा कि इसी तरह ईसीएचएस और दूसरी सैन्य सुविधाओं में भी प्रक्रियाएं आसान बनाई जानी चाहिए। (CSD Card Renewal)

भारतीय सेना की 105 मिमी गन अब हुई ‘स्मार्ट’, अब नहीं मिलेगा दुश्मन को संभलने का मौका

105mm Light Field Gun Upgrade
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105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना ने अपनी पुरानी लेकिन बेहद भरोसेमंद 105 मिमी लाइट फील्ड गन को नई डिजिटल तकनीक से लैस कर दिया है। सेना ने हाल ही में मध्य प्रदेश के इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट (CPE) में इस गन के ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी अपग्रेड का सफल फायरिंग ट्रायल और वैलिडेशन पूरा किया। यह अपग्रेडन 506 आर्मी बेस वर्कशॉप (506 ABW) ने किया है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक मई 2026 के मध्य में इस सिस्टम का ट्रायल किया गया था। इस अपग्रेड के बाद अब गन को निशाने पर सेट करने के लिए जवानों को हाथ से डायल घुमाने और लंबी कैलकुलेशंस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नया इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम कुछ ही सेकंड में गन को सही दिशा और एंगल पर सेट कर देगा। इससे गन की फायरिंग स्पीड, एक्यूरेसी और युद्ध के दौरान सर्वाइवल क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

105mm Light Field Gun Upgrade: भारतीय सेना की भरोसेमंद फील्ड गन

105 मिमी लाइट फील्ड गन लंबे समय से भारतीय सेना की आर्टिलरी ताकत का अहम हिस्सा रही है। यह गन खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान और कठिन युद्ध क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाती है। वजन में हल्की होने के कारण इसे हेलीकॉप्टर, ट्रक या खच्चरों की मदद से भी फॉरवर्ड पोस्ट्स तक पहुंचाया जा सकता है।

भारतीय सेना ने इस गन का इस्तेमाल कई दशकों से किया है। लाइन ऑफ कंट्रोल और ऊंचाई वाले इलाकों में यह गन काफी प्रभावी मानी जाती रही है। हालांकि समय के साथ आधुनिक युद्ध का तरीका बदल गया। अब युद्ध में गोले दागने के अलावा तेजी से निशाना साधना और तुरंत पोजिशन बदलना भी जरूरी हो गया है। इसी जरूरत को देखते हुए सेना ने पुरानी गन को नई तकनीक से अपग्रेड करने का फैसला किया।

पहले कैसे काम करती थी गन

पुराने सिस्टम में गन को टारगेट पर सेट करने का पूरा काम मैनुअली होता था। गन क्रू को हाथ से डायल घुमाकर दिशा और ऊंचाई सेट करनी पड़ती थी। इसके अलावा हवा की रफ्तार, तापमान, गोले के प्रकार और बैरल की स्थिति जैसी चीजों की गणना भी मैनुअली की जाती थी।

सूत्रों का कहना है कि जंग के दौरान यह प्रक्रिया समय लेती थी। कई बार दुश्मन की जवाबी फायरिंग शुरू होने से पहले गन पोजिशन बदलना मुश्किल हो जाता था। मॉडर्न काउंटर-बैटरी रडार कुछ ही सेकंड में पता लगा लेते हैं कि किस जगह से गोले दागे गए हैं। इसके बाद दुश्मन की तरफ से तुरंत जवाबी हमला हो सकता है। यही वजह थी कि भारतीय सेना अपनी पुरानी आर्टिलरी को ज्यादा तेज और डिजिटल बनाना चाहती थी।

क्या है ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी

ऑटो लेइंग टेक्नोलॉजी का मतलब है कि गन खुद इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मदद से निशाने पर सेट हो जाए। इसमें डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और मोटराइज्ड कंट्रोल लगाए गए हैं।

अब गन में मौजूद कंप्यूटर खुद यह तय करेगा कि टारगेट पर हमला करने के लिए गन को किस दिशा और एगंल पर सेट करना है। इसके लिए सिस्टम हवा की दिशा, तापमान, बैरल वियर और इस्तेमाल किए जा रहे गोले का डेटा खुद प्रोसेस करेगा।

इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मोटर गन को अपने आप सही दिशा में घुमा देगी। इससे समय भी बचेगा और गलती की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। (105mm Light Field Gun Upgrade)

कुछ सेकंड में रेडी होगी गन 

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पहले जहां गन को तैयार करने में दो से तीन मिनट तक लगते थे, वहीं नए सिस्टम के बाद यह काम कुछ ही सेकंड में हो जाएगा।

युद्ध के मैदान में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है। क्योंकि अब गन तेजी से फायर कर तुरंत दूसरी जगह शिफ्ट हो सकेगी। “शूट एंड स्कूट” क्षमता को मॉडर्न युद्ध में यह बहुत जरूरी माना जाता है। खासकर तब, जब दुश्मन के पास काउंटर-बैटरी रडार और लंबी दूरी की आर्टिलरी मौजूद हो।

इटारसी स्थित सेंट्रल प्रूफ एस्टेब्लिशमेंट में इस सिस्टम की टेस्टिंग ऑपरेशनल परिस्थितियों में की गई। अलग-अलग मौसम और फायरिंग स्थितियों में गन की परफॉर्मेंस जांची गई।

सूत्रों के मुताबिक ट्रायल के दौरान गन ने कम समय में ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट को हिट किया। गन क्रू का काम भी पहले की तुलना में काफी आसान हो गया। इस अपग्रेड के बाद फर्स्ट राउंड हिट प्रोबेबिलिटी यानी पहले गोले में टारगेट को हिट करने की संभावना भी बढ़ गई है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

506 आर्मी बेस वर्कशॉप की बड़ी भूमिका

इस अपग्रेड को 506 आर्मी बेस वर्कशॉप ने तैयार किया है। यह वर्कशॉप सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) नेटवर्क का हिस्सा है। सेना की ये वर्कशॉप्स पुराने हथियारों और सैन्य उपकरणों को अपग्रेड करने का काम करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन वर्कशॉप्स ने कई पुराने सिस्टम्स को डिजिटल तकनीक से जोड़ने का काम किया है।

रक्षा जानकारों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट “आत्मनिर्भर भारत” अभियान का भी हिस्सा है। क्योंकि इसमें इस्तेमाल की गई तकनीक और इंटीग्रेशन का बड़ा हिस्सा देश में ही विकसित किया गया है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

पुरानी गन को मिली नई लाइफ

भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में 105 मिमी फील्ड गन मौजूद हैं। नई गन खरीदने में काफी ज्यादा खर्च आता। इसलिए सेना ने पुरानी गन को ही आधुनिक तकनीक से अपग्रेड करने का रास्ता चुना।

सूत्रों के मुताबिक यह तरीका ज्यादा किफायती और व्यावहारिक माना जाता है। इससे सेना को नई क्षमता भी मिल जाती है और पुराने सिस्टम का उपयोग भी जारी रहता है। इस अपग्रेड के बाद गन की सर्विस लाइफ भी बढ़ जाएगी।

यह गन खास तौर पर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में इस्तेमाल होती है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) जैसे क्षेत्रों में इसकी तैनाती महत्वपूर्ण मानी जाती है। (105mm Light Field Gun Upgrade)

काउंटर-बैटरी फायर बड़ा खतरा

आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा खतरा काउंटर-बैटरी फायर होता है। जब कोई गन फायर करती है, तो दुश्मन का रडार तुरंत उसकी लोकेशन ट्रैक कर लेता है। इसके बाद उसी स्थान पर जवाबी हमला किया जाता है।

नई ऑटो लेइंग तकनीक से गन तेजी से फायर करके तुरंत अपनी पोजिशन बदल सकेगी। इससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचने की संभावना बढ़ जाएगी।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक यही तकनीक दुनिया के आधुनिक आर्टिलरी सिस्टम्स में इस्तेमाल हो रही है।

बता दें कि भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से अपने आर्टिलरी सिस्टम को तेजी से आधुनिक बना रही है। सेना ने धनुष, के-9 वज्र, एम-777 और एटीएजीएस जैसी नई तोपें शामिल की हैं।

इसके अलावा पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम और प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन पर भी जोर दिया जा रहा है। 105 मिमी लाइट फील्ड गन का यह अपग्रेड उसी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा माना जा रहा है। (105mm Light Field Gun Upgrade)