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Explainer: Why is Rafael’s new ‘silent killer’ missile MICA NG special? Why is China’s Stellthfighter J-20 and a big threat to cruise missiles?

MICA NG Missile
Image Source: Mbda-systems

MICA NG Missile: फ्रांस ने राफेल लड़ाकू विमान से मीका एनजी (MICA-NG) एयर-टू-एयर मिसाइल का सफल सुपरसोनिक परीक्षण किया है। यह पहली बार था जब इस नई पीढ़ी की मिसाइल को सुपरसोनिक उड़ान के दौरान दागकर उसकी क्षमता परखी गई।

फ्रांसीसी मिसाइल निर्माता एमबीडीए और फ्रांसीसी रक्षा खरीद एजेंसी डीजीए ने इसे भविष्य के हवाई युद्ध की दिशा में बड़ा कदम बताया है। खास बात यह है कि यह मिसाइल केवल सामान्य लड़ाकू विमानों को ही नहीं बल्कि स्टेल्थ फाइटर जेट, ड्रोन और अत्यधिक तेज क्रूज मिसाइलों को भी निशाना बनाने के लिए तैयार की गई है।

भारत के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से राफेल लड़ाकू विमान ऑपरेशनल हैं और फ्रांस से बड़ी संख्या में अतिरिक्त 114 राफेल खरीदने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

क्या है MICA NG Missile?

Mecca (MICA) का पूरा नाम “मिसाइल डी इंटरसेप्शन, डी कॉम्बैट एट डी ऑटोडिफेंस” है। यह फ्रांस की बनाई हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। इसका नया संस्करण एमआईसीए एनजी यानी न्यू जेनरेशन मिसाइल है। इसे मूल एमआईसीए मिसाइल की जगह लेने के लिए डेवलप किया गया है।

एमआईसीए फैमिली की मिसाइलें 1990 के दशक से फ्रांसीसी वायुसेना का हिस्सा रही हैं। इन्हें राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाया जाता है।

नई एमआईसीए एनजी बाहर से देखने पर लगभग पुरानी मिसाइल जैसी लगती है, लेकिन इसके अंदर की तकनीक पूरी तरह बदल दी गई है। नई मिसाइल में ज्यादा ताकतवर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके सेंसर ज्यादा संवेदनशील हैं और इसकी रॉकेट मोटर भी पहले की तुलना में अधिक एडवांस है।

एमबीडीए के अनुसार नई मिसाइल पुरानी एमआईसीए की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम है। जहां पुरानी एयर-लॉन्च्ड मीका मिसाइल की रेंज लगभग 60 से 80 किलोमीटर तक थी, वहीं नई पीढ़ी की मीका एनजी मिसाइल की रेंज करीब 84 से 112 किलोमीटर तक मानी जा रही है। यानी नई मिसाइल पुराने वर्जन की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। हालांकि कंपनी ने आधिकारिक रेंज नहीं बताई है।

एमबीडीए का कहना है कि यह मिसाइल भविष्य के उन खतरों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जो मौजूदा मिसाइलों के लिए चुनौती बन सकते हैं।

सुपरसोनिक परीक्षण क्यों था इतना महत्वपूर्ण?

साधारण भाषा में समझें तो जब कोई लड़ाकू विमान ध्वनि की गति से तेज उड़ता है तो उसके आसपास का तापमान काफी बढ़ जाता है। हवा के घर्षण से मिसाइल और विमान दोनों के आसपास गर्मी पैदा होती है।

ऐसी स्थिति में किसी टारगेट को पहचानना और उसका पीछा करना काफी कठिन हो जाता है। विशेष रूप से तब जब सामने वाला टारगेट स्टेल्थ तकनीक से लैस हो और उसकी गर्मी भी बहुत कम हो।

इसी चुनौती को देखते हुए फ्रांस ने एमआईसीए एनजी का सुपरसोनिक परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान मिसाइल ने उच्च तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी टारगेट को सफलतापूर्वक ट्रैक किया। इससे साबित हुआ कि इसका नया इंफ्रारेड सीकर वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में भी प्रभावी रहेगा। (MICA NG Missile)

स्टेल्थ विमान क्यों होते हैं इतने खतरनाक

स्टेल्थ विमान ऐसे लड़ाकू जेट होते हैं जिन्हें रडार पर पकड़ना कठिन होता है। चीन का जे-20 और अमेरिका का एफ-35 ऐसे ही विमानों की श्रेणी में आते हैं।

इन विमानों का डिजाइन इस तरह बनाया जाता है कि वे दुश्मन के रडार पर कम दिखाई दें। साथ ही उनकी गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर भी कम करने की कोशिश की जाती है।

यही कारण है कि स्टेल्थ विमान आधुनिक वायु युद्ध में सबसे खतरनाक हथियारों में गिने जाते हैं।

एमआईसीए एनजी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे ऐसे ही कम सिग्नेचर वाले टारगेट्स को खोजने और मार गिराने के लिए विकसित किया गया है। (MICA NG Missile)

Rafale Source Code India

मिसाइल का नया इंफ्रारेड सीकर क्यों खास है?

एमआईसीए एनजी के इंफ्रारेड वर्जन में नया मैट्रिक्स सेंसर लगाया गया है। यह सेंसर टारगेट से निकलने वाली बेहद कम गर्मी को भी पहचान सकता है। पुरानी पीढ़ी की मिसाइलों के लिए कम थर्मल सिग्नेचर वाले टारगेट चुनौती होते थे, लेकिन नई मिसाइल को खासतौर पर इसी समस्या को हल करने के लिए बनाया गया है।

इसका इंफ्रारेड सीकर किसी प्रकार का रडार सिग्नल नहीं भेजता। इसका मतलब है कि दुश्मन को यह पता ही नहीं चलता कि मिसाइल उसे ट्रैक कर रही है। इसीलिए इसे “साइलेंट किलर” भी कहा जा रहा है।

मिसाइल की नई ताकत: डुअल पल्स मोटर

एमआईसीए एनजी में डुअल पल्स रॉकेट मोटर दी गई है। पुरानी मिसाइलों में मोटर एक बार पूरी ताकत के साथ जलती थी और फिर उसका ईंधन समाप्त हो जाता था। नई मिसाइल में दो चरणों वाली मोटर लगाई गई है।

पहला चरण मिसाइल को तेजी से टारगेट की ओर बढ़ाता है। दूसरा चरण जरूरत पड़ने पर सक्रिय होता है और अंतिम समय में अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है।

इसका फायदा यह है कि अंतिम क्षणों में भी मिसाइल तेजी से दिशा बदल सकती है और तेज उड़ते हुए विमान या टारगेट का पीछा कर सकती है।

एमबीडीए के अनुसार यह मिसाइल 50 जी तक का मोड़ लेने में सक्षम है, जिससे बच निकलना दुश्मन के लिए मुश्किल हो जाता है। (MICA NG Missile)

केवल लड़ाकू विमान ही नहीं, ड्रोन भी होंगे निशाने पर

यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखा दिया है कि ड्रोन अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। छोटे ड्रोन रडार पर कम दिखाई देते हैं और बड़ी संख्या में हमला कर सकते हैं। एमआईसीए एनजी को ऐसे ही खतरों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

कंपनी का कहना है कि मिसाइल बहुत कम इंफ्रारेड और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर वाले टारगेटों को भी पहचान सकती है। इसका मतलब है कि भविष्य में ड्रोन स्वार्म जैसी चुनौतियों से निपटने में भी इसका उपयोग हो सकेगा।

फ्रांस का दावा है कि यह मिसाइल पारंपरिक लड़ाकू विमान के साथ-साथ ड्रोन और अत्यधिक फुर्तीली क्रूज मिसाइलों के खिलाफ भी प्रभावी रहेगी। (MICA NG Missile)

राफेल और एमआईसीए एनजी की जोड़ी क्यों है घातक

Raphael दुनिया के सबसे आधुनिक 4.5 जेनरेशन लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसमें आरबीई-2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और अत्याधुनिक सेंसर लगे हुए हैं। जब राफेल और एमआईसीए एनजी एक साथ काम करते हैं तो दोनों की क्षमता और बढ़ जाती है।

राफेल अपने सेंसरों से टारगेट की जानकारी मिसाइल को भेज सकता है। इसके बाद मिसाइल उड़ान के दौरान भी अपडेट लेती रहती है और रास्ता भी बदल सकती है। युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। (MICA NG Missile)

चीन के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

फ्रांस ने आधिकारिक रूप से किसी देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मीका-एनजी जैसी मिसाइलें चीन के जे-20 जैसे स्टेल्थ विमानों को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। चीन के पास आज दुनिया का सबसे बड़ा स्टेल्थ लड़ाकू विमान बेड़ा माना जाता है।

जे-20 को चीन अपनी वायु शक्ति का सबसे अहम हथियार मानता है। लेकिन स्टेल्थ का मतलब पूरी तरह अदृश्य होना नहीं होता। हर विमान किसी न किसी रूप में गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक संकेत छोड़ता है। एमआईसीए एनजी का नया इंफ्रारेड सीकर ऐसे ही संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। (MICA NG Missile)

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परीक्षण?

भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल लड़ाकू विमान हैं। ये विमान अंबाला और हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं। लद्दाख से लेकर पूर्वी क्षेत्र तक कई संवेदनशील मोर्चों पर राफेल को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

इसी बीच भारत ने फ्रांस को 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए अनुरोध पत्र भेजा है। इस प्रस्ताव के तहत बड़ी संख्या में विमान भारत में ही बनाए जाने की योजना है। यदि यह कार्यक्रम आगे बढ़ता है तो भारतीय वायुसेना के पास राफेल का बहुत बड़ा बेड़ा हो सकता है। यदि भविष्य में मीका-एनजी भारतीय राफेल बेड़े का हिस्सा बनती है तो वायुसेना को छोटी और मध्यम दूरी के हवाई मुकाबलों में एक नई क्षमता मिलेगी।

फ्रांस ने वर्ष 2018 में एमआईसीए एनजी कार्यक्रम की शुरुआत की थी। उस समय दुनिया भर में स्टेल्थ विमान, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा था। फ्रांसीसी वायुसेना चाहती थी कि उसके पास ऐसी मिसाइल हो जो आने वाले कई दशकों तक सर्विस में बनी रहे।

फ्रांस पहले ही 500 से अधिक एमआईसीए एनजी मिसाइलों का ऑर्डर दे चुका है। इन मिसाइलों का उपयोग केवल वायुसेना तक सीमित नहीं रहेगा। इसका एक अलग वर्जन जहाजों और जमीन पर तैनात एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए भी तैयार किया जा रहा है। (MICA NG Missile)

Larger changes in air force: Air Marshal Ashutosh will be awaited. New Vice Chief, what can become the next Air Chief?

Air Marshal Ashutosh Dixit next IAF Vice Chief
PIC Source: PIB/IAF

Air Marshal Ashutosh Dixit: भारतीय वायुसेना को 1 जुलाई से नया 51वां वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ मिलने जा रहा है। सरकार ने अनुभवी फाइटर पायलट और टेस्ट पायलट एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित को इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया है। वह मौजूदा वाइस चीफ एयर मार्शल नागेश कपूर की जगह लेंगे, जो 30 जून को रिटायर हो रहे हैं।

भारतीय वायुसेना में वाइस चीफ का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। एयर चीफ मार्शल के बाद यह दूसरा सबसे वरिष्ठ पद होता है। वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारियों, आधुनिकीकरण, भविष्य की योजनाओं और संसाधनों के प्रबंधन में वाइस चीफ की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति को वायुसेना के लिए एक अहम बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

Air Marshal Ashutosh Dixit: फाइटर पायलट से वायुसेना के शीर्ष नेतृत्व तक का सफर

Air Marshall Ashutosh Dixit का सैन्य सफर लगभग चार दशक पुराना है। उन्हें 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन मिला था। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र हैं। इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेश स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और नई दिल्ली के नेशनल डिफेंस कॉलेज से भी उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की।

अपने करियर के दौरान उन्होंने केवल लड़ाकू विमान उड़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण, परीक्षण, योजना निर्माण और रणनीतिक नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

3300 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव

एयर मार्शल दीक्षित भारतीय वायुसेना के उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फाइटर पायलट होने के साथ-साथ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट का भी दर्जा हासिल है।

उन्होंने 20 से अधिक प्रकार के विमानों पर 3300 घंटे से ज्यादा उड़ान भरी है। इनमें मिराज-2000, मिग-21, जगुआर और कई अन्य लड़ाकू तथा परीक्षण विमान शामिल हैं।

टेस्ट पायलट की जिम्मेदारी सामान्य फाइटर पायलट से कहीं अधिक मुश्किल होती है। ऐसे पायलट नए विमान, नए हथियार और नई तकनीकों का परीक्षण करते हैं। किसी भी विमान के अपग्रेड या नए सिस्टम को सर्विस में शामिल करने से पहले इन्हीं अधिकारियों की भूमिका सबसे अहम होती है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

कारगिल युद्ध के दौर की पीढ़ी के अधिकारी

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित उस पीढ़ी के अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना के बड़े बदलावों को करीब से देखा और उनमें योगदान दिया।

कारगिल संघर्ष के बाद भारत ने अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए। आधुनिक लड़ाकू विमान, सटीक हथियार, बेहतर रडार और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता विकसित की गई। एयर मार्शल दीक्षित इस पूरे परिवर्तन का हिस्सा रहे।

इसी वजह से उन्हें ऑपरेशनल अनुभव के साथ-साथ तकनीकी और रणनीतिक समझ रखने वाले अधिकारियों में गिना जाता है।

स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में बड़ी भूमिका

एयर मार्शल दीक्षित का नाम उन अधिकारियों में शामिल है, जिन्होंने भारतीय वायुसेना में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

वायुसेना मुख्यालय में विभिन्न जिम्मेदारियों के दौरान उन्होंने एलसीए मार्क-1ए, एलसीए मार्क-2 और एएमसीए जैसी परियोजनाओं को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एलसीए यानी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान है। वहीं एएमसीए भारत का प्रस्तावित पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान कार्यक्रम है।

सूत्रों का मानना है कि एयर मार्शल दीक्षित लगातार आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी सैन्य तकनीक के समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण से जुड़ा हुआ माना जाता है।

जगुआर और मिग-27 अपग्रेड कार्यक्रम में योगदान

टेस्ट पायलट के रूप में एयर मार्शल दीक्षित ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में काम किया। बेंगलुरु स्थित एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट में उन्होंने फ्लाइट टेस्ट स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। इस दौरान जगुआर और मिग-27 विमानों के एवियोनिक्स अपग्रेड कार्यक्रम में उनकी अहम भूमिका रही।

एवियोनिक्स किसी भी आधुनिक विमान का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग माना जाता है। रडार, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और वेपन कंट्रोल जैसे सिस्टम्स इसी का हिस्सा होती हैं।

इन अपग्रेड्स ने भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों की क्षमता बढ़ाने में मदद की।

मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट ट्रायल्स से भी जुड़े

भारतीय वायुसेना के इतिहास में मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एमएमआरसीए कार्यक्रम सबसे चर्चित रक्षा खरीद परियोजनाओं में से एक रहा है।

जब एयर मार्शल दीक्षित एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स के निदेशक थे, तब उन्होंने इस परियोजना से जुड़े परीक्षणों और योजना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही वह कार्यक्रम था जिसके बाद भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों को चुना था। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

सर्वश्रेष्ठ फाइटर ट्रेनिंग बेस का नेतृत्व

एयर मार्शल दीक्षित ने दक्षिण भारत में स्थित एक प्रमुख फाइटर ट्रेनिंग बेस की कमान भी संभाली।

उनके नेतृत्व के दौरान इस बेस को कमांड का बेस्ट ट्रेनिंग सेंटर घोषित किया गया। वायुसेना में प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भविष्य के फाइटर पायलट यहीं से तैयार होते हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार उनके नेतृत्व की खासियत केवल ऑपरेशनल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास पर भी विशेष ध्यान दिया।

थिएटराइजेशन और जॉइंट मिलिटरी स्ट्रक्चर्स में भूमिका

वर्तमान में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के पद पर कार्यरत हैं। यह पद तीनों सेनाओं के बीच बेहतर जॉइंटनेंस स्थापित करने के लिए बनाया गया है। भारत थिएटर कमांड मॉडल की दिशा में काम कर रहा है, जिसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर संयुक्त अभियान चला सकें।

सूत्रों के अनुसार एयर मार्शल दीक्षित ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी भूमिका तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाने और संयुक्त सैन्य योजना को आगे बढ़ाने में रही है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल नागेश कपूर होंगे रिटायर

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ऐसे समय वाइस चीफ का पद संभालेंगे जब एयर मार्शल नागेश कपूर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।

एयर मार्शल नागेश कपूर ने 1 जनवरी 2026 को वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभाला था। इससे पहले वे दक्षिण-पश्चिमी एयर कमांड और ट्रेनिंग कमांड जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।

उन्होंने मिग-21 और मिग-29 के लगभग सभी वर्जन उड़ाए हैं और उनके पास 3400 घंटे से अधिक उड़ान अनुभव है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं।

क्या भविष्य में बन सकते हैं एयर चीफ?

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति के बाद एक सवाल पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वे भविष्य में भारतीय वायुसेना के प्रमुख बन सकते हैं।

भारतीय सैन्य व्यवस्था में वाइस चीफ का पद अक्सर टॉप लीडरशिप की दौड़ में महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि एयर चीफ की नियुक्ति वरिष्ठता, सेवा अवधि, अनुभव और सरकार के निर्णय सहित कई कारकों पर निर्भर करती है। माना जा रहा है कि वे अगले चीफ ऑफ एयर स्टाफ की इस रेस में शामिल हैं।

फिलहाल एयर मार्शल दीक्षित की नई जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना के दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी के रूप में होगी। उनके सामने वायुसेना के आधुनिकीकरण, स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों, जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर और भविष्य की वायु युद्ध क्षमताओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषय होंगे। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह बन सकते हैं अगले CISC

रक्षा सूत्रों के अनुसार, दक्षिण पश्चिमी एयर कमांड (SWAC) के प्रमुख एयर मार्शल तेजिंदर सिंह को हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) का अगला चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (CISC) नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। एयर मार्शल तेजिंदर सिंह इससे पहले डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पद पर भी रह चुके हैं।

मौजूदा CISC एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 1 जुलाई को भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभालेंगे। उनके नए पद पर जाने के बाद CISC का पद खाली होगा, जिसके लिए एयर मार्शल तेजिंदर सिंह का नाम सबसे आगे माना जा रहा है।

जून 1987 में वायुसेना में कमीशन प्राप्त एयर मार्शल तेजिंदर सिंह एक अनुभवी फाइटर पायलट हैं और उनके पास 4500 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव है। अपने लंबे सैन्य करियर में उन्होंने फाइटर स्क्वाड्रन, रडार स्टेशन, बड़े एयरबेस और जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण कमांड जिम्मेदारियां संभाली हैं। उन्होंने वायुसेना मुख्यालय में भी कई अहम पदों पर काम किया है।

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह पहले हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में भी जिम्मेदारी निभा चुके हैं, जिससे उन्हें तीनों सेनाओं के जॉइंट ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन का अच्छा अनुभव है। वर्तमान में वे पश्चिमी सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

CISC का पद सीडीएस के अधीन काम करता है और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल, थिएटराइजेशन और संयुक्त सैन्य क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। रक्षा सूत्रों का मानना है कि उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए वे इस पद के मजबूत दावेदार हैं। (Air Marshal Ashutosh Dixit)

Indian Navy’s MiG-29K will get indigenous strength, fatal foreign 80mm aero rocket preparation in the country

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Indian Navy

Indian Navy 80mm Aero Rocket: Indian forces are constantly focusing on reducing their dependence on arms from abroad in the defence sector. Indian Navy has released the Expression of Interest (EOI) for indigenous design and development of 80 MM Aero Rocket. The aim is to fully develop and build this rocket in the country so that it does not have to rely on foreign companies in the future.

This rocket is stained by Indian Navy’s Mig-29K and Mig-29KUB fighter planes. So far, its supply is from foreign companies, but the navy wants its full production in India. This will not only meet the military needs in time but also strengthen the self-sufficient India campaign.

Indian Navy 80mm Aero Rocket: What is 80mm Aero Rocket?

80MM Aero Rocket With One Without Guidance Air-to-ground is rocket. This means it is stained towards the goal and it reaches the target based on its speed and ballistic root. It is not a guided missile, but its utility is considered extremely important in the battlefield.

Indian Navy This rocket is used against enemy bases, military vehicles, radar stations, vapor systems, and troops present on the ground. It is unique that it is capable of harming both armored and common targets.

Attacking enemy tanks and radar can

This rocket has a holo-charge fragmentation warhead. In simple terms, it attacks two ways. First, it can distinguish the armor of the tank or armored vehicle. Second, its metal pieces after explosion damage the surrounding targets by spreading to the large area.

It can be used against rocket tank, armard personal carrier, radar installation, launcher, parked plane and enemy troops, according to the EOI document issued on behalf of the Naval Armament Inspectorate of the Goa-based Navy. That’s why it’s considered a multipurpose weapon for navy fighter planes. Indian Navy 80mm Aero Rocket

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Indian Navy

The important part of the strike capacity of Mig-29K

Deployed on Indian Naval Aircraft Carriers MIG-29K Combat aircraft have the ability to attack in the sea and coastal areas. 80 MM Aero Rocket is stained through the B8M-1 launcher from the same planes.

The fighter aircraft in any war condition have to destroy a greater number of targets in a short time. Such rockets are the best choice of precise and low cost weapons.

Size Small but Marak Capacity Large

The caliber of this rocket is 80MM and its length is more than about one and a half meters. Its total weight is about 11.3 kg, while the weight of the warhead is 3.6 kg.

The maximum speed of the rocket can reach about 600 meters per second. Its effective march distance ranges from 1300m to 4000m. i.e. the fighter plane can hit the enemy’s target by safe distance.

Armor piercing capacity up to 400mm

The greatest strength of this rocket is its holo-charge technique. It can distinguish the armor up to 400mm in the ideal condition according to the document.

This ability is important during the war as the armored vehicle of the enemy and the military platform are equipped with strong security armor. To destroy such targets requires special types of weapons. Indian Navy 80mm Aero Rocket

Hundreds of fatal fragments formed after eruption

The fragmentation jacket of the rocket is designed in such a way that at the time of eruption it breaks into hundreds of metal pieces. According to the technical document, it consists of at least 400 fragments, weighing about 3 grams each.

These pieces spread around rapidly and cause damage to the larger terrain. That is why it is also considered effective against the group of rocket troops, light military bases and open-existing targets.

How does it work rocket?

An electrical signal from the plane reaches the rocket when the pilot orders to stain. This makes the rocket motor active and solid fuel burning. Then the rocket exits the launcher and the fins behind it open, which maintains the flight stable.

The fuse becomes active after about one and a half seconds of the flight. An explosion occurs when the target is hit and the Holo-Charge and Fragmentation effect is created. Indian Navy 80mm Aero Rocket

Hard weather can also work

नौसेना के लिए विकसित इस रॉकेट को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए बनाया गया है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे माइनस 60 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा यह उच्च आर्द्रता और समुद्री वातावरण को भी झेल सकता है। नौसेना के लिए यह जरूरी है क्योंकि समुद्र में तैनाती के दौरान हथियारों को नमक और नमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

15 साल तक सुरक्षित रह सकता है स्टॉक

रॉकेट की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे 15 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसकी उम्र बढ़ाने की व्यवस्था भी मौजूद है।

यह किसी भी सैन्य बल के लिए अहम है क्योंकि हथियारों का बड़ा भंडार लंबे समय तक स्टोर करके रखना पड़ता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

नौसेना को कितने रॉकेट चाहिए?

ईओआई डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि सफल प्रोटोटाइप विकास के बाद नौसेना शुरुआती चरण में 273 हाई एक्सप्लोसिव रॉकेट और 2400 प्रैक्टिस या इनर्ट रॉकेट खरीद सकती है।

प्रैक्टिस रॉकेट ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि हाई एक्सप्लोसिव संस्करण एक्चुअल ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

स्वदेशीकरण पर है फोकस

नौसेना ने साफ कहा है कि वर्तमान में 80 एमएम एयरो रॉकेट के लिए कोई स्वदेशी सोर्स उपलब्ध नहीं है और मौजूदा स्टॉक विदेशी ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) से खरीदा गया था।

यही वजह है कि अब इस पूरे सिस्टम को देश में डेवलप करने की योजना बनाई गई है। डॉक्यूमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी सब-असेंबली स्वदेशी रूप से डेवलप की जानी चाहिए और किसी विदेशी कंपनी पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए।

नौसेना ने केवल उन्हीं भारतीय कंपनियों को आवेदन करने के लिए कहा है जिनके पास सैन्य स्तर के रॉकेट बनाने का अनुभव हो। चयनित कंपनियों को डिजाइन, अनुसंधान, परीक्षण, प्रमाणन और उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इसके लिए एयरवर्थीनेस सर्टिफिकेशन, गुणवत्ता परीक्षण और कई तकनीकी मानकों को पूरा करना होगा। सफल विकास के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता खुलेगा। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

DFPDS 2026 Explained: Why does the field commanders get doubled financial rights? Learn what will the Indian Army benefit?

DFPDS 2026 Explained
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DFPDS 2026 Explained: Wars are not only won by tanks, missiles and fighter planes. The real strength of any army is in the matter of how fast it is necessary to find tools, spare parts, weapons, fuels and technical resources when needed. If a commander posted on the limit has to send files to Delhi for months to buy the necessary goods, this may affect the operational preparation.

Minister of Defence taking into account the need Rajnath Singh New rules of financial powers have been issued for Defence Services on June 4. It is called the Delegation of Financial Powers for Defence Services (DFPDS-2026). Under the new rules, the field commanders of the Army, Navy and Air Force have been given far more financial rights than before.

Financial rights have been extended up to 100 per cent in many cases as per the Ministry of Defence, while in some categories it is more than doubled. The government believes that the purchase process will be faster, the time will be shorter in decision making and the forces will be able to get the resources in time as needed.

DFPDS 2026 Explained: What are the financial rights?

इसे बहुत आसान भाषा में समझा जाए तो वित्तीय अधिकार का मतलब है कि कोई अधिकारी कितनी राशि तक का खर्च या खरीदारी अपने स्तर पर मंजूर कर सकता है।

मान लीजिए किसी मिलिट्री यूनिट को अचानक स्पेयर पार्ट्स, विशेष उपकरण, संचार प्रणाली या अन्य जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ जाती है। अगर कमांडर के पास पर्याप्त वित्तीय अधिकार हैं, तो वह सीधे खरीद की मंजूरी दे सकता है। लेकिन अगर अधिकार सीमित हैं तो फाइल को कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।

यही कारण है कि युद्ध या तनावपूर्ण परिस्थितियों में अधिक वित्तीय अधिकार तेजी से फैसले लेने में मदद करते हैं।

सरकार ने क्यों किया यह बदलाव?

Ministry of Defence ने स्पष्ट किया है कि पिछली बार वित्तीय शक्तियों में बड़ा संशोधन 2021 में किया गया था। उसके बाद सेनाओं का आकार बढ़ा है, ऑपरेशनल जिम्मेदारियां बढ़ी हैं और रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी हुई है।

सीमा पर लगातार बदलते सुरक्षा माहौल, आधुनिक वेपन सिस्टम्स के रखरखाव और नई तकनीकों के इस्तेमाल के कारण खर्च भी बढ़ा है। ऐसे में 2021 के नियम कई जगहों पर पर्याप्त नहीं रह गए थे।

इसी वजह से नए सिरे से समीक्षा कर वित्तीय अधिकारों को बढ़ाने का फैसला लिया गया। (DFPDS 2026 Explained)

फील्ड कमांडरों को क्या फायदा मिलेगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन अधिकारियों को मिलेगा जो सीधे ऑपरेशनल क्षेत्रों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
पहले कई मामलों में छोटी-छोटी खरीद के लिए भी हेड क्वॉर्टर की मंजूरी लेनी पड़ती थी। अब फील्ड कमांडर अपने स्तर पर अधिक राशि तक खरीदारी कर सकेंगे।

इसका मतलब यह है कि सीमा पर तैनात सैनिकों को जरूरी उपकरण, वाहन स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सामग्री या अन्य संसाधन जल्दी मिल सकेंगे।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होता है। अगर फैसले लेने में देरी होती है तो उसका असर ऑपरेशनल क्षमता पर पड़ता है।

1.25 लाख करोड़ रुपये की खरीद का क्या मतलब है?

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि नए वित्तीय अधिकारों के जरिए चालू वित्तीय वर्ष के बजट के अनुसार 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

यह राशि रेवेन्यू रूट के तहत खर्च की जाएगी। रेवेन्यू रूट का मतलब उन खर्चों से है जो रोजमर्रा की सैन्य जरूरतों, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत, गोला-बारूद और अन्य संचालन संबंधी जरूरतों पर किए जाते हैं।

इस फैसले से बड़ी संख्या में खरीद प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। (DFPDS 2026 Explained)

आत्मनिर्भर भारत को कैसे मिलेगा फायदा?

नए नियमों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वदेशीकरण और अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय शक्तियों को दोगुना कर दिया गया है। इसका सीधा संबंध आत्मनिर्भर भारत अभियान से है।

पिछले कुछ सालों से सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि भारतीय सेनाएं विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करें और अधिक से अधिक उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए जाएं।

अब मिलिट्री यूनिट्स और कमांडरों के पास स्वदेशी उत्पादों और तकनीकों की खरीद के लिए अधिक अधिकार होंगे।

इससे रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे स्टार्टअप, एमएसएमई, निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है।

विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों के लिए भारत अभी भी विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं पर निर्भर है। जब कोई उपकरण विदेश से आता है तो उसके स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और तकनीकी सहायता के लिए भी उसी देश या कंपनी पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार चाहती है कि ऐसी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो।

नए वित्तीय अधिकार इसी दिशा में एक कदम माने जा रहे हैं क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर विकसित तकनीकों और उत्पादों की खरीद आसान होगी। (DFPDS 2026 Explained)

जॉइंट प्रोक्योरमेंट सिस्टम को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय ने इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त खरीद को बढ़ावा देने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को कुछ समान प्रकार के उपकरणों की जरूरत होती है। पहले कई बार अलग-अलग खरीद प्रक्रिया चलती थी।

अब जिस सेवा को लीड सर्विस बनाया जाएगा, उसे ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे ताकि वह सभी के लिए संयुक्त खरीद कर सके। इससे समय की बचत होगी और लागत भी कम हो सकती है। (DFPDS 2026 Explained)

2021 में क्या हुए थे बदलाव?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इससे पहले सितंबर 2021 में रक्षा सेवाओं के वित्तीय अधिकारों में बड़ा बदलाव किया था। उस समय भी सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को पहले के मुकाबले ज्यादा वित्तीय शक्तियां दी गई थीं।

2021 में ज्यादातर कंपीटेंट फाइनेंशियल अथॉरिटीज (सीएफए) के अधिकार दोगुने कर दिए गए थे। यानी जो अधिकारी पहले एक निश्चित सीमा तक खरीदारी या खर्च की मंजूरी दे सकते थे, उन्हें उससे दोगुनी राशि तक फैसला लेने का अधिकार मिल गया था।

इसके अलावा, कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के फील्ड कमांडरों को कुछ मामलों में पांच से दस गुना तक अधिक वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, ताकि ऑपरेशनल जरूरतों को तेजी से पूरा किया जा सके।

उसी दौरान स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय अधिकारों को तीन गुना तक बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना और देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना था।

वहीं, वाइस चीफ स्तर के अधिकारियों की वित्तीय सीमा भी बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। (DFPDS 2026 Explained)

2021 और 2026 के नियमों में क्या अंतर है?

2021 में ज्यादातर अधिकारियों के वित्तीय अधिकार दोगुने किए गए थे। अब 2026 में इन्हें फिर से 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी दो गुने से भी ज्यादा है। इससे अधिकारी पहले की तुलना में अधिक राशि की खरीद और मंजूरी खुद दे सकेंगे।

2021 में कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के कमांडरों को ऑपरेशनल जरूरतों के लिए 5 से 10 गुना तक अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए थे।

अब 2026 में इन शक्तियों को और बढ़ा दिया गया है। सीमा पर तैनात कमांडर आपात जरूरतों के लिए पहले से ज्यादा तेजी से खरीदारी कर सकेंगे।

वहीं, 2021 में स्वदेशी रक्षा उपकरणों और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) परियोजनाओं के लिए वित्तीय सीमा तीन गुना तक बढ़ाई गई थी।

2026 में इन अधिकारों को फिर से दोगुना कर दिया गया है। इसका मतलब है कि 2016 की तुलना में अब स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान के लिए उपलब्ध वित्तीय शक्तियां कई गुना बढ़ चुकी हैं। इससे भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स और रक्षा उद्योग को फायदा मिलेगा।

2021 में सेना, नौसेना और वायुसेना के वाइस चीफ की वित्तीय सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। 2026 के दस्तावेज में अलग से नई सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन कुल वित्तीय अधिकारों में हुई बढ़ोतरी का लाभ इस स्तर के अधिकारियों को भी मिलेगा।

2021 में नौसेना और वायुसेना को भी वे विशेष वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, जो पहले मुख्य रूप से सेना के पास थीं। 2026 में तीनों सेनाओं के कमांडरों के लिए इन विशेष अधिकारों को और बढ़ा दिया गया है। आपातकालीन और ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कुल वित्तीय सीमा भी दोगुनी कर दी गई है।

2021 में संयुक्त खरीद की व्यवस्था सीमित स्तर पर मौजूद थी। वहीं, अब 2026 में नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत यदि किसी उपकरण की खरीद तीनों सेनाओं के लिए एक साथ करनी हो तो जिस सेवा को लीड एजेंसी बनाया जाएगा, उसे सामान्य से अधिक वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे। इससे संयुक्त खरीद प्रक्रिया तेज होगी और समय की बचत होगी।

2021 में कुछ नए अधिकारियों को वित्तीय अधिकार दिए गए थे। 2026 में और अधिक अधिकारियों को सक्षम वित्तीय प्राधिकरण (सीएफए) बनाया गया है। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा विकेंद्रीकृत होगी और छोटे-छोटे मामलों के लिए फाइलें ऊपर नहीं भेजनी पड़ेंगी।

2021 में फील्ड कमांडरों को सीमित स्तर पर तुरंत खरीद की सुविधा मिली थी। 2026 में सरकार का अनुमान है कि 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया को फील्ड स्तर पर ही गति मिल सकेगी। इससे सेनाओं को जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और सेवाएं समय पर मिल पाएंगी। (DFPDS 2026 Explained)

क्या इससे युद्धकालीन तैयारी बेहतर होगी?

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी सैन्य बल की तैयारी केवल हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। महत्वपूर्ण यह भी होता है कि जरूरत पड़ने पर मरम्मत, रखरखाव और पुनः आपूर्ति कितनी तेजी से हो सकती है।

यदि फील्ड कमांडरों को पर्याप्त अधिकार हों तो वे तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक सेनाएं निर्णय प्रक्रिया को अधिक डिसेंट्रलाइजेशन बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। (DFPDS 2026 Explained)

डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 से क्या है संबंध?

रक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2025 में संशोधित Defence Procurement Manual जारी किया था। उसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना था। अब वित्तीय अधिकारों में यह नया संशोधन उसी प्रक्रिया को और मजबूत बनाता है।

एक तरफ खरीद के नियमों को आसान बनाया गया है और दूसरी तरफ खरीद को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की शक्तियां बढ़ाई गई हैं। दोनों कदम मिलकर रक्षा खरीद प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम करेंगे। (DFPDS 2026 Explained)

Who is the bodyguard of the world’s most dangerous air defense system S-400? Learn why India needs

S-400 Bodyguard Pantsir System
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S-400 Bodyguard Pantsir System: India has got its fourth air defense system S-400. The purchase of five S-400 air defense systems was compromised in 2018 between India and Russia. Under this agreement, India gets a total of five squadrons. The Indian Air Force has named the Russia-made S-400 Trimph Air Defense System as the "Suggestion Cycle". It is counted in air defense systems that hit the world’s most modern and long distance. Its capacity is so much that it can target hundreds of kilometres of flying fighter aircraft, cruise missiles, ballistic missiles and surveillance aircraft.

But no matter how powerful a weapon is, a safety armor is needed for protection. That is why Russia does not deploy its S-400 batteries alone. With these always a special short range air defense system is applied, namely Paintsir-S1 or Paintsir-S1M.

Due to this, the military analyst from around the world is called the "bodyguard" of the S-400.

S-400 Bodyguard Pantsir System: Why does S-400 need bodyguard?

At first glance this question may seem strange when S-400 If you can hit the target for 400 kilometres away, then what is the need for protection.

The danger in the modern war does not only come from fighter jets or large missiles. In the last few years, the form of war has changed rapidly. Ukraine war, Middle East conflicts and recent military campaigns have shown that small drones, Kamikaje drones, lootingmunition and low altitude fly cruise missiles can also be challenged for large air defense systems.

Such weapons fly at a very low altitude and try to avoid the grip of the radar several times. If any of these weapons reach the battery of S-400, its radar or command center, the entire air defense network may damage. S-400 Bodyguard Pantsir System

What is the painthead system?

A short range of paintsir Russia created only Air Defense System is. It has been prepared by the KBP Instrument Design Bureau. The biggest feature of this system is that both missiles and guns are engaged. That is, it can attack two ways.

At the same time, Paintsir is not a large air defense system like any S-400. This is a small but extremely fast short range air defense system, commonly used as a Combat Vehicle. i. The whole system is mounted on a truck and can start the action in a few minutes as needed.

A painthead unit has 12 missiles that are always ready for launch. These missiles can kill targets such as airplanes, helicopters, drones, cruise missiles, and looting munuitions. Its marching capacity is about 20 kilometres.

In addition to the missiles, two powerful 30mm automatic guns are also engaged in the paintsir. These guns can fire about 5,000 rounds per minute and hit the targets of about 4 kilometres. These guns are immediately activated when they are very close to a drone or missile.

पेंटसिर की एक और खासियत यह है कि यह एक समय में कई हवाई खतरों पर नजर रख सकता है और लगभग 4 टारगेट्स को एक साथ निशाना बना सकता है। पूरे सिस्टम को चलाने के लिए आमतौर पर तीन लोगों की जरूरत होती है, जिनमें एक ड्राइवर और दो ऑपरेटर शामिल होते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 में जहां “स्क्वाड्रन” शब्द इस्तेमाल होता है, वहीं पेंटसिर के लिए आमतौर पर “बैटरी” शब्द इस्तेमाल किया जाता है। एक बैटरी में आमतौर पर 4 से 6 पेंटसिर व्हीकल्स होते हैं। इनके साथ एक कमांड वाहन, मिसाइल री-लोडिंग वाहन और अन्य सहायक उपकरण भी तैनात किए जाते हैं।

अगर किसी बैटरी में 6 पेंटसिर वाहन हों, तो उसके पास कुल 72 मिसाइलें और 12 ऑटोमैटिक गन उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि यह छोटी दूरी की हवाई सुरक्षा के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है।

भारत में पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए देखा जा रहा है। इसका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चरों को ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और अन्य नजदीकी हवाई खतरों से बचाना होगा। इसी कारण इसे अक्सर एस-400 का “बॉडीगार्ड” कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो एस-400 दूर बैठे दुश्मन को मारता है, जबकि पेंटसिर उन खतरों को खत्म करता है जो एस-400 के बहुत करीब पहुंच जाते हैं। दोनों मिलकर एक मजबूत और बहुस्तरीय हवाई सुरक्षा कवच तैयार करते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

DAC S-400 India Approval
IAF Disha

ड्रोन वॉरफेयर में बढ़ी जरूरत

कुछ साल पहले तक एयर डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों और बड़ी मिसाइलों के खिलाफ बनाए जाते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज हजारों डॉलर की कीमत वाला एक छोटा ड्रोन करोड़ों रुपये के मिलिट्री सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें सस्ते एफपीवी ड्रोन ने टैंक, रडार और सैन्य वाहनों को निशाना बनाया। यही कारण है कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टमों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा परत की जरूरत महसूस की जाने लगी। वहीं, पेंटसिर इसी जरूरत को पूरा करता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 और पेंटसिर मिलकर कैसे बनाते हैं सुरक्षा कवच?

सैन्य भाषा में इसे “लेयर्ड एयर डिफेंस” कहा जाता है। इसका मतलब है कि दुश्मन के हमले को रोकने के लिए सुरक्षा की कई परतें बनाई जाएं। सबसे बाहरी परत एस-400 की होती है।

यह 40 किलोमीटर से लेकर 400 किलोमीटर तक की दूरी पर दुश्मन के बड़े टारगेटों को निशाना बनाता है।

इसके बाद मध्यम दूरी वाले सिस्टम काम करते हैं। सबसे अंदर की सुरक्षा परत पेंटसिर संभालता है। यदि कोई ड्रोन, क्रूज मिसाइल या अन्य हथियार सभी परतों को पार करके अंदर तक पहुंच जाए तो पेंटसिर उसे लास्ट फेज में नष्ट करने का प्रयास करता है। इसलिए इसे एस-400 का निजी सुरक्षा गार्ड भी कहा जाता है।

रूस कैसे करता है अपनी एस-400 साइटों की सुरक्षा?

रूस लंबे समय से इस रणनीति का उपयोग कर रहा है। सीरिया में रूसी एयरबेसों की सुरक्षा के दौरान एस-400 और पेंटसिर को एक साथ तैनात किया गया था। यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कई एस-400 बैटरियों के आसपास पेंटसिर सिस्टम देखे गए।

इनका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चर वाहनों को छोटे लेकिन खतरनाक हवाई खतरों से बचाना था। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

S-400 Bodyguard Pantsir System
Pantsir S1M Air Defence System

भारत ने पेंटसिर खरीदने में दिखाई रुचि

भारत ने 2018 में रूस के साथ S-400 की खरीद का समझौता किया था। इसके तहत पांच स्क्वाड्रन भारत को मिलने थे। इनमें से तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारतीय वायुसेना को मिल चुके हैं। वहीं, चौथा स्क्वाड्रन हाल ही में भारत पहुंचा है। इसके पांच और अतिरिक्त स्क्वाड्रन भारत ने ऑर्डर किए हैं, जिन्हें रक्षा मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है।

वहीं, हाल के सालों में ड्रोन खतरों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पश्चिमी सीमा और उत्तरी सीमा दोनों क्षेत्रों में ड्रोन, स्वार्म अटैक और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हथियारों का खतरा बढ़ा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इसी वजह से भारतीय वायुसेना ने एस-400 बैटरियों की नजदीकी सुरक्षा के लिए पेंटसिर जैसे सिस्टम में रुचि दिखाई है। भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए रूस से 13 पेंटसिर-एस1 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का प्रस्ताव रखा है। इनमें से 10 सिस्टम भारतीय वायुसेना को दिए जाने की योजना है, जिनका मुख्य काम एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की सुरक्षा करना होगा। वहीं 3 सिस्टम भारतीय थलसेना को मिल सकते हैं, जिन्हें सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों से निपटने के लिए तैनात किया जाएगा।

इस प्रस्ताव को मार्च 2026 में रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) ने मंजूरी दी थी। इसके बाद रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भी इसके लिए “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी आवश्यकता की औपचारिक स्वीकृति दे दी। इसी दौरान एस-400 के लिए अतिरिक्त 288 मिसाइलों की खरीद के प्रस्ताव के साथ पेंटसिर सिस्टम को भी शामिल किया गया। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

इस परियोजना पर काम पहले से चल रहा था। साल 2024 में भारत की भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और रूस की रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत किए थे।

खरीद प्रक्रिया को तेज करने के लिए फास्ट-ट्रैक रूट अपनाया गया है, ताकि सिस्टम जल्द से जल्द भारतीय सेनाओं को मिल सकें। योजना के अनुसार शुरुआती कुछ पेंटसिर सिस्टम सीधे रूस से आयात किए जाएंगे। इसके बाद आने वाले सिस्टम भारत में ही “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम के तहत बीडीएल और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों की भागीदारी से बनाए जा सकते हैं।

फिलहाल अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर और सिस्टम की डिलीवरी का इंतजार किया जा रहा है। पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा परत माना जा रहा है, क्योंकि यह ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अन्य हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन और कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों ने एयर डिफेंस की नई चुनौतियों को सामने रखा। लंबी दूरी वाले सिस्टम अपने काम में सफल रहे, लेकिन छोटे और तेजी से बदलते टारगेटों के खिलाफ एक अतिरिक्त सिक्योरिटी लेयर की जरूरत महसूस की गई।

इसी के चलते पेंटसिर की खरीद को लेकर चर्चा शुरू हुई। हालांकि भारत पहले से ही मल्टीलेवल एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रहा है। इसमें एस-400, आकाश, एमआरएसएएम, क्यूआरएसएएम और दूसरे सिस्टम्स भी शामिल हैं।

वहीं, पेंटसिर को इस नेटवर्क की सबसे अंदरूनी सुरक्षा परत के रूप में देखा जा रहा है। यह उन टारगेटों को रोकने का काम करेगा जो अन्य परतों को पार करके बेहद करीब पहुंच जाएं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 के एक स्क्वाड्रन में कितने लॉन्चर

Indian Air Force S-400 System की एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर होते हैं। यह स्क्वाड्रन दो बैटरियों में बंटी होती है और हर बैटरी में 6-6 लॉन्चर लगाए जाते हैं। इस तरह एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर तैनात रहते हैं।

हर लॉन्चर में एक समय पर 4 मिसाइलें तैयार रखी जा सकती हैं। यानी 12 लॉन्चरों में कुल 48 मिसाइलें तुरंत दागने के लिए तैयार रहती हैं।

एक एस-400 स्क्वाड्रन के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें होती हैं। इसमें करीब 256 मिसाइलों का स्टॉक रखा जाता है। इनमें अलग-अलग दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल होती हैं। 40N6E मिसाइल लगभग 400 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है, 48N6E3 की मारक क्षमता करीब 240 किलोमीटर है, जबकि 9M96E2 मिसाइल करीब 120 किलोमीटर तक के हवाई खतरों को नष्ट कर सकती है। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

रडार नेटवर्क है एस-400 की ताकत

एस-400 की ताकत सिर्फ उसकी मिसाइलें नहीं हैं, बल्कि उसका रडार नेटवर्क भी है। इसका 92N6E “ग्रेव स्टोन” रडार लगभग 600 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इसके अलावा 30K6E कमांड पोस्ट पूरे सिस्टम का दिमाग होता है, जो रडार से मिली जानकारी का विश्लेषण करके लॉन्चरों को निर्देश देता है। इसके साथ सर्च रडार, एंगेजमेंट रडार और कई सपोर्ट वाहन भी तैनात रहते हैं।

एक पूरे एस-400 स्क्वाड्रन में लॉन्चर, रडार, कमांड वाहन और रीलोडिंग ट्रकों सहित लगभग 16 प्रमुख वाहन होते हैं। यह पूरी यूनिट बहुत तेजी से काम शुरू कर सकती है और आमतौर पर 5 से 10 मिनट के भीतर ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक एस-400 स्क्वाड्रन एक साथ 36 अलग-अलग एरियल टारगेट्स पर नजर रखकर उन्हें निशाना बना सकती है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली एयर डिफेंस सिस्टमों में गिना जाता है।

भारत ने रूस से कुल 5 एस-400 स्क्वाड्रन खरीदी हैं। इसका मतलब है कि पूरी डील के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 60 लॉन्चर मिलने हैं। ताकि इन्हें जरूरत के अनुसार पाकिस्तान या चीन सीमा के अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से तैनात किया जा सके। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

Explainer: Is Captain in uniforms against the rules for the merger of Bharat Bharadwaj? Know what the Army Act 1950

Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy
Social Media

Captain Bharat Bhardwaj: A young officer of the Indian Army has made the subject of a discussion throughout the country these days. On one hand, millions of people on social media are telling it a beautiful moment associated with love and emotions, on the other hand the debate has begun with military traditions and discipline.

The case is linked to the Nasik-based Combat Army Aviation Training School (CAATS), where Captain Bharat Bharadwaj, after the passing out parade, paved his dynasty Arushhi on the knees in front of the helicopter. The video of the entire events has been viral on social media in a few hours.

The sources pointed out that the Indian Army has taken the cognizance of the matter and clarification has been sought from the officer. However, no formal public statement has been issued on behalf of the Army yet nor any disciplinary action has been confirmed.

What was Captain Bharat Bhardwaj?

Nasik-based Combat on June 2 Army Aviation Passing out parade was held at the Training School. During this time, trainees are declared ready for new responsibilities after completing difficult training.

After the same ceremony, Captain India Bharadwaj proposed his dynasty for marriage. The video shows that the officers are in the uniform and the military helicopter stands behind them. Family members, partner officers and others appear there.

जैसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा, यह तेजी से वायरल हो गया। लाखों लोगों ने इसे देखा और हजारों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी।

सोशल मीडिया पर लोगों ने इस वीडियो को एक इमोशनल मोमेंट के तौर पर देखा। कई लोगों ने लिखा कि वर्षों की मेहनत के बाद जब एक अफसर ने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की, तो उसने उसी दिन अपने जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण फैसले को भी सार्वजनिक कर दिया।

सेना को आपत्ति किस बात पर है?

सूत्रों के अनुसार सेना को विवाह प्रस्ताव से नहीं, बल्कि उसके तरीके और स्थान से आपत्ति है। भारतीय सेना में यूनिफॉर्म संस्था की प्रतिष्ठा, जिम्मेदारी और अनुशासन का प्रतीक होती है। इसी तरह पासिंग आउट परेड भी एक औपचारिक सैन्य समारोह माना जाता है, जिसके अपने नियम और परंपराएं होती हैं।

सेना का मानना है कि किसी आधिकारिक सैन्य कार्यक्रम और सैन्य उपकरणों को निजी आयोजन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। सूत्रों के अनुसार समय, स्थान और सैन्य परंपराओं के देखते हुए इस घटना को उचित नहीं माना जा रहा है। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

ऐसे मामलों में क्या हैं सेना के नियम?

भारतीय सेना का पूरा स्ट्रक्चर अनुशासन पर आधारित है। सेना के अधिकारी और जवान सिर्फ ड्यूटी के समय ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यही वजह है कि यूनिफॉर्म पहनकर सार्वजनिक गतिविधियों, सोशल मीडिया पोस्ट, विज्ञापन, राजनीतिक गतिविधियों और निजी प्रचार से जुड़े कई नियम मौजूद हैं। भारतीय सेना का अनुशासन आर्मी एक्ट 1950 और आर्मी रूल्स 1954 के अंतर्गत आता है। इनमें ऑफिशियल मिलिट्री समारोह, डिफेंस इंस्टॉलेशन और यूनिफॉर्म में पर्सनल इवेंट करने पर सख्ती है।

हालांकि शादी का प्रपोजल देने जैसे कोई अलग नियम सार्वजनिक रूप से उल्लेखित नहीं है, लेकिन सैन्य प्रतिष्ठानों और आधिकारिक समारोहों के उपयोग को लेकर स्पष्ट परंपराएं हैं।

इसी वजह से इस मामले को सीधे अपराध की बजाय प्रोटोकॉल और सैन्य मर्यादा के नजरिए से देखा जा रहा है।

क्या कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है?

अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार कोई एफआईआर, पुलिस मामला या आपराधिक जांच नहीं हुई है। यह पूरी तरह सेना का आंतरिक मामला है।

हालांकि शो-कॉज नोटिस की संभावना जताई गई है। सेना के सूत्रों का कहना है कि अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया है और वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की जानकारी दी गई है। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

क्या है सेक्शन 63?

इस मामले के सामने आने के बाद आर्मी एक्ट 1950 के सेक्शन 63 को लेकर चर्चा हो रही है। सेक्शन 63 का संबंध “गुड ऑर्डर एंड मिलिट्री डिसिप्लिन” यानी सैन्य अनुशासन और व्यवस्था से जुड़ा है।

सरल भाषा में समझें तो यदि कोई ऐसा कार्य किया जाता ,है जो सेना के अनुशासन, परंपरा या प्रतिष्ठा के खिलाफ माना जाए और जिसके लिए कोई अलग विशेष प्रावधान मौजूद न हो, तो इस सेक्शन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यदि सेना इसे अनुशासनात्मक मामला मानती है, तो सैद्धांतिक रूप से सेक्शन 63 का संदर्भ सामने आ सकता है। हालांकि अभी तक सेना ने अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी भी सेक्शन का उल्लेख नहीं किया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा या सैन्य गोपनीयता से जोड़ना उचित नहीं

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन ने इस मामले पर युवा अधिकारी का समर्थन करते हुए कहा कि देश अपने सैनिकों से राष्ट्र के लिए जान तक न्योछावर करने की उम्मीद करता है, लेकिन जब वही सैनिक अपनी मंगेतर के प्रति प्रेम जाहिर करता है तो उस पर सवाल उठने लगते हैं।

उन्होंने कहा कि सेना में एक कहावत है- “अगर युवा अधिकारी नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा?” उनके अनुसार जवान और अधिकारी भी इंसान होते हैं, जिनकी अपनी भावनाएं और निजी जिंदगी होती है।

जनरल ढिल्लन का मानना है कि यदि किसी अधिकारी की पेशेवर क्षमता, प्रशिक्षण या सैन्य प्रदर्शन में कोई कमी नहीं है, तो केवल एक भावनात्मक और सम्मानजनक प्रेम प्रस्ताव को लेकर अनावश्यक आलोचना नहीं की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य उपकरणों को पहले भी देशभर में आयोजित “नो योर आर्मी” जैसे कार्यक्रमों में आम लोगों के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ऐसे आयोजनों में छात्र और नागरिक सेना के टैंकों, हेलीकॉप्टरों और अन्य उपकरणों के साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं, जो सेना के प्रति गर्व और सम्मान की भावना का प्रतीक होता है।

इसलिए उनके मुताबिक इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा या सैन्य गोपनीयता से जोड़ना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि युवा अधिकारी को गर्व और सम्मान के साथ देश की सेवा करने दीजिए। एक भावनात्मक पल को जरूरत से ज्यादा विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

क्या कोर्ट मार्शल हो सकता है?

सूत्रों का कहना है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि यह मामला अधिकतम परामर्श, चेतावनी या औपचारिक समझाइश तक सीमित रह सकता है।

सेना और वायुसेना के कई रिटायर्ड अधिकारियों का मानना है कि युवा अधिकारी भावनाओं में बह गया और उसने अपने जीवन के महत्वपूर्ण दिन को यादगार बनाने की कोशिश की। वहीं कुछ अधिकारियों का कहना है कि सैन्य परंपराओं का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि यही संस्थाओं की पहचान होती है।

सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत का कहना है कि कैप्टन भारत भारद्वाज ने शायद भावनाओं में आकर प्रोटोकॉल की सीमा थोड़ी पार कर दी, लेकिन इसे बहुत बड़ा मुद्दा बनाने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि युवा अधिकारी ने अभी-अभी कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके कॉम्बैट हेलीकॉप्टर पायलट के तौर पर अपनी “विंग्स” हासिल की थीं। पासिंग आउट परेड के बाद भावुक होकर उन्होंने अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज कर दिया। वह यूनिफॉर्म में थे, पीछे हेलीकॉप्टर खड़ा था और परिवार व साथी अधिकारी उनके लिए खुशी जता रहे थे।

अहलावत के अनुसार यह एक मानवीय और रोमांटिक पल था, लेकिन सैन्य प्रोटोकॉल और अनुशासन के लिहाज से इसे पूरी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। सेना की नाराजगी अपनी जगह सही है।

हालांकि उनका मानना है कि मामला संभवतः वरिष्ठ अधिकारी की समझाइश और हल्की फटकार तक ही सीमित रहेगा। कैप्टन को नियमों की याद दिलाई जाएगी और बात वहीं खत्म हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि देश अपने युवा सैनिकों और अधिकारियों को बिना हिचक कठिन और खतरनाक मिशनों पर भेजता है। ऐसे में अगर कोई युवा अधिकारी भावनाओं में बहकर छोटी सी गलती कर देता है, तो उसे भी मानवीय नजरिए से देखा जाना चाहिए।

अहलावत ने कहा कि अनुशासन सेना की रीढ़ है, लेकिन मानवीय भावनाएं उसकी आत्मा हैं। केवल नियमों से नहीं, बल्कि जज्बे और भावना से भी सैनिक कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं।

उनके मुताबिक किसी अधिकारी के व्यक्तित्व और भावनाओं की छोटी सी झलक सेना को कमजोर नहीं बनाती। उन्होंने यह भी कहा कि वायुसेना में अतीत में युवा अधिकारियों से इससे बड़ी गलतियां भी हुई हैं और वे आगे चलकर बेहतरीन अधिकारी साबित हुए।

उन्होंने विश्वास जताया कि कैप्टन भारत भारद्वाज इस घटना से सीख लेंगे, अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे और एक अच्छे सैन्य पायलट के रूप में आगे बढ़ेंगे।

अंत में उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले पर जरूरत से ज्यादा हंगामा करने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय सेना इतनी मजबूत संस्था है कि वह एक भावनात्मक और रोमांटिक पल को संभाल सकती है।

विवाद या स्कैंडल का रूप देना ठीक नहीं

भारतीय सेना में मिलिट्री लॉ और सेना के नियमों के जानकार पूर्व मेजर राहुल सिंह इस पूरे मामले को लेकर अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि उन्हें इस घटना में कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल उल्लंघन नजर नहीं आता।

मेजर राहुल सिंह के मुताबिक उन्होंने सेना के कानून, आदेशों और नियमों का विस्तार से अध्ययन किया है और उनके अनुसार इस तरह की घटनाएं न तो पहली बार हुई हैं और न ही सेना में बिल्कुल असामान्य हैं।

उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि कई लोग सैन्य जीवन को एक सामान्य कॉर्पोरेट नौकरी की तरह देखते हैं, जबकि सेना सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि एक जीवनशैली है। सैनिक और अधिकारी भी भावनाएं रखते हैं और उनके जीवन में भी ऐसे खास पल आते हैं, जो उनके परिवारों के लिए यादगार बन जाते हैं।

मेजर सिंह का मानना है कि जिस घटना को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह वास्तव में एक युवा अधिकारी और उसके परिवार के लिए खुशी और गर्व का क्षण था। इसे अनावश्यक रूप से विवाद या स्कैंडल का रूप दिया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी समारोह की तस्वीर या वीडियो देखकर तुरंत यह मान लेना सही नहीं है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है। उनके अनुसार यह एक युवा अधिकारी की उपलब्धि से जुड़ा व्यक्तिगत और यादगार पल था, जिसे सैन्य परिवार लंबे समय तक याद रख सकते हैं।

राहुल सिंह ने विश्वास जताया कि सेना की यूनिट के अधिकारियों ने भी इस घटना को एक रेजिमेंटल याद के तौर पर दर्ज किया होगा, न कि किसी बड़े अनुशासनात्मक मामले के रूप में। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

सोशल मीडिया पर क्या है लोगों की राय

कैप्टन भारत भारद्वाज के प्रपोजल वाले वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी हुई नजर आ रही है। 3 जून को किए गए रक्षा समाचार के एक पोस्ट में सेना के सूत्रों के हवाले से इसे प्रोटोकॉल से जुड़ा मामला बताया गया था, जिसके बाद इस पर बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी।

कई लोगों ने कैप्टन भारद्वाज का समर्थन किया। उनका कहना है कि यह एक भावनात्मक और खुशी का पल था, जिसे बेवजह विवाद का विषय बना दिया गया। कुछ यूजर्स ने लिखा कि सेना के जवान और अधिकारी भी इंसान हैं, उनके जीवन में भी खास मौके आते हैं और उन्हें अपनी खुशियां मनाने का अधिकार है। कई लोगों का मानना है कि यह एक पारिवारिक और निजी पल था, जिसे सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।

कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों और सैन्य मामलों पर लिखने वाले लोगों ने भी कहा कि यह एक युवा अधिकारी की बड़ी उपलब्धि का दिन था। लंबे समय की कठिन ट्रेनिंग के बाद उसने अपने जीवन के एक खास पल को अपनी मंगेतर के साथ साझा किया। उनके मुताबिक इसे अनुशासन के बड़े संकट की तरह देखना उचित नहीं है।

दूसरी ओर, कई लोगों ने इस घटना की आलोचना भी की। उनका कहना है कि सेना की यूनिफॉर्म, सैन्य समारोह और रक्षा प्रतिष्ठानों की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है। ऐसे स्थानों और अवसरों का इस्तेमाल निजी कार्यक्रमों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों ने लिखा कि अनुशासन सेना की सबसे बड़ी ताकत है और इस मामले में नियमों का पालन होना चाहिए।

आलोचकों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया के दौर में यूनिफॉर्म को व्यक्तिगत प्रचार या दिखावे का माध्यम नहीं बनना चाहिए। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि यदि इसी तरह का काम कोई जवान करता तो उसके साथ क्या व्यवहार किया जाता। (Captain Bharat Bhardwaj Proposal Controversy)

Explained: Not tanks from drones, will paint defense! Why Russia made military trucks move-that JBR?

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: Now the Artificial Intelligence, Drone and Smart Surveillance System in the Russia-Ukraine War have replaced tanks, missiles and fighter planes. Low Costs are all failed next to the drone. When drones, which are scared. Even ground-based wastage systems and logistics vehicles are facing difficult to protect against drone eyes. Meanwhile Russia has adopted a new and unique strategy to save their Military Logistics Vehicles.

On social media in recent times, many of Russia’s military trucks have appeared. Black and white stripes are made on these trucks, which look exactly like Jebra’s skins in view. At first sight this color-rogan will look like an experiment or artistic design, but a serious reason behind it is hidden.

Russia believes that this special paint pattern drone of Ukraine and Artificial Intelligence-Based target can confuse the resignation system. That’s why it’s being seen as a new kind of camouflage used in the modern war.

Russian Zebra Camouflage Trucks

Russian Zebra Camouflage Trucks: Increased attacks on supply lines Anxiety

russia And the supply lines of each other are now being targeted in the struggle released between Ukraine.
The Ukrainian army and its intelligence agency are constantly attacking those trucks, fuel tankers and ammunition vehicles in Russia that deliver necessary goods to the troops on the front. Such attacks have risen in Ukrainian terrains occupied by Western Russia, Crimea and Russia.

किसी भी सेना के लिए लॉजिस्टिक्स उसकी लाइफलाइन मानी जाती है। यदि सैनिकों तक समय पर गोला-बारूद, ईंधन, भोजन और उपकरण नहीं पहुंचते, तो ऑपरेशन पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि रूस अब इन वाहनों की सुरक्षा के लिए नए-नए उपाय अपना रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

आखिर क्या है ‘जेब्रा पैटर्न’?

रूस द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा यह पैटर्न सामान्य सैन्य रंगों से बिल्कुल अलग है। इसमें ट्रकों के पूरे ढांचे पर सफेद और काले रंग की मोटी धारियां बनाई जाती हैं।

कुछ ट्रकों पर सीधी धारियां दिखाई देती हैं, जबकि कुछ पर पत्तियों या घुमावदार आकृतियों जैसी डिजाइन बनाई गई है। खास बात यह है कि यह पैटर्न केवल वाहन के बॉडी हिस्से तक सीमित नहीं है। पहियों, टायरों और कई बाहरी हिस्सों पर भी यही रंग किया गया है। इनका उद्देश्य वाहन को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी ऑरिजनल शेप को तोड़ना है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

Russian Zebra Camouflage Trucks

प्रथम विश्व युद्ध से मिली प्रेरणा

हालांकि यह रणनीति पूरी तरह नई नहीं है। लगभग एक सदी पहले प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इसी तरह का कैमोफ्लाज इस्तेमाल किया था।

उस समय जर्मन पनडुब्बियां समुद्र में ब्रिटिश जहाजों को निशाना बना रही थीं। जहाजों को पूरी तरह छिपाना संभव नहीं था, इसलिए एक अलग तरीका अपनाया गया। जहाजों पर काले और सफेद रंग के बड़े-बड़े जियोमेट्रिक पैटर्न बनाए गए।

इस तकनीक को डैजल कैमोफ्लाज कहा गया। इसका मकसद जहाज को अदृश्य बनाना नहीं था, बल्कि दुश्मन को उसकी दिशा, गति और दूरी का सही अनुमान लगाने से रोकना था। आज रूस उसी रणनीति का युद्ध में फिर से इस्तेमाल कर रहा है।

Russian Zebra Camouflage Trucks

AI बेस्ड ड्रोन को कैसे कन्फ्यूज करता है यह पेंट?

आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल होने वाले कई ड्रोन अब केवल कैमरे पर निर्भर नहीं रहते। उनमें मशीन विजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक भी लगी होती है।

यह तकनीक ड्रोन को वाहन, टैंक, रडार, तोप और अन्य मिलिटरी टारगेट्स की पहचान करने में मदद करती है। ड्रोन का सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों के आधार पर सीखता है कि किसी टारगेट को कैसे पहचाना जाए।

जब किसी ट्रक पर असामान्य पैटर्न बना दिया जाता है, तो उसकी सामान्य आकृति टूट जाती है। वाहन के किनारे, छत और पहियों की पहचान करना कठिन हो जाता है।

ऐसी स्थिति में एआई बेस्ड सिस्टम कभी-कभी लक्ष्य को सही ढंग से क्लासिफाइड नहीं कर पाता। इससे टारगेट पहचानने में अधिक समय लग सकता है या ड्रोन को दोबारा पुष्टि करनी पड़ सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

मशीन विजन के लिए क्यों चुनौती है यह डिजाइन?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम वस्तुओं की रूपरेखा, आकार और किनारों के आधार पर काम करती है।

जेब्रा जैसी धारियां वाहन के वास्तविक आकार को छिपा देती हैं। कैमरे को कई अतिरिक्त रेखाएं और नकली किनारे दिखाई देते हैं। इससे सॉफ्टवेयर के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने वास्तव में ट्रक है या कुछ और।

जानकारों के मुताबिक तरीका टारगेट रिकॉग्निशन सिस्टम को धीमा कर सकता है। कई बार ड्रोन को टारगेट की पुष्टि करने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

ऑपरेटरों के लिए भी पैदा हो सकती है परेशानी

सिर्फ एआई ही नहीं, ड्रोन उड़ाने वाले ह्यूमन ऑपरेटरों को भी इस तरह के पैटर्न से दिक्कत हो सकती है।

जब कोई ट्रक तेज रफ्तार से चल रहा हो और उसके आसपास पेड़, झाड़ियां या अन्य वाहन मौजूद हों, तब उसकी दिशा और रफ्तार का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

रूस पहले भी आजमा चुका है कई अनोखे उपाय

यह पहली बार नहीं है जब रूस ने ड्रोन हमलों से बचने के लिए असामान्य उपाय अपनाए हों।

युद्ध के शुरुआती चरण में कई रूसी ट्रकों पर लकड़ियों का अस्थायी कवच लगाया गया था। इसका उद्देश्य छोटे ड्रोन और गोलियों से कुछ अतिरिक्त सुरक्षा प्राप्त करना था।

इसके बाद रूसी टैंकों पर लोहे की जालीदार संरचनाएं लगाई गईं, जिन्हें बाद में कोप केज और टर्टल टैंक जैसे नाम मिले। जिसे पूरी दुनिया की सेनाओं ने फॉलो किया।

कई वाहनों पर जाल, अतिरिक्त प्लेटें और स्पाइक जैसे स्ट्रक्चर भी लगाए गए ताकि ड्रोन सीधे वाहन से टकराने से पहले ही रूक जाएं। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

विमानों पर भी अपनाई गई थी ऐसी रणनीति

साल 2023 में सैटेलाइट तस्वीरों में रूस के कुछ बॉम्बर्स पर पुराने टायर रखे हुए दिखाई दिए थे। उस समय कई विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि यह यूक्रेनी ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की इमेज-मैचिंग टेक्नोलॉजी को कन्फ्यूज्ड करने की कोशिश भी हो सकती है।

बाद में अमेरिकी सैन्य तकनीकी विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया कि किसी विमान के आइडेंटिफिकेशन सिस्टम कन्फ्यूज करने के लिए ऐसा किया जा सकता है।

क्योंकि टायरों के कारण विमान का सामान्य आकार बदल जाता है और कंप्यूटर विजन मॉडल को लक्ष्य पहचानने में परेशानी हो सकती है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

क्या सफल है यह रणनीति?

सैन्य विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि यदि ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में टारगेट खोज रहा हो, तो इस तरह का कैमोफ्लाज उसके आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक ड्रोन केवल कैमरों पर निर्भर नहीं रहते। कई सिस्टम्स में थर्मल सेंसर, इन्फ्रारेड कैमरे और दूसरे एडवांस उपकरण भी होते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल रंग बदल देने से हर प्रकार के सेंसर को धोखा देना संभव नहीं होगा। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

ड्रोन युद्ध ने बदल दी सैन्य सोच

रूस-यूक्रेन युद्ध को दुनिया का पहला बड़े पैमाने का ड्रोन युद्ध भी कहा जा रहा है।

दोनों देश हजारों ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाले कामिकाजे ड्रोन तक, सब हमलों में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन ड्रोन की वजह से टैंक, ट्रक, रडार और गोला-बारूद डिपो पहले की तुलना में अधिक असुरक्षित हो गए हैं।

वहीं, युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों तक जरूरी सामग्री पहुंचाना किसी भी सेना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। रूस के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। लंबी दूरी तक फैले मोर्चों पर लगातार ईंधन, गोला-बारूद और अन्य सामग्री भेजनी पड़ती है।

यूक्रेनी ड्रोन इन्हीं सप्लाई मार्गों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जेब्रा पैटर्न वाले ट्रकों को रूस की एक कम लागत वाली लेकिन सुरक्षा रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। (Russian Zebra Camouflage Trucks)

Now will not crash the drone! The Ministry of Defence launched the new indigenous initiative, opens the parachute and will secure the UAV

Drone Recovery Parachute System
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Drone Recovery Parachute System: Using drones in India is growing rapidly. In such a technical malfunction, battery failure or accident during operation, it has become a huge challenge to protect expensive drones and their payloads.

The Unit Ordnance Parachute Factory (OPF) of Gliders India Limited under the Ministry of Defence, taking into account the need, has released the Expression of Interest (EOI) for the development of the Drone Recovery Parachute System. The initiative is aimed at creating indigenous recovery systems consisting of Indian Drone Industry, Defence Organizations, Research Organizations and Technical Companies, which can safely land the drone in an emergency and avoid damage to expensive equipment.

Drone Recovery Parachute System: Enhanced security needs with increased use of drones

Over the last few years, drones have been used in India. Drones are playing a key role in areas such as Defence Sector, Border Surveillance, Policeing, Agriculture, Disaster Management, Medical Supplies, Logistics and Industrial Surveys.

Although the risks associated with drone technology are as severe as possible. During the flight the battery is bad, the motor fail, the drone can suddenly fall on the ground due to the GPS signal lost or any technical malfunction. In such cases, not only millions of drones can be destroyed, but also cameras, sensors, or other expensive devices that may be spoiled.

The drone recovery parachute system is being considered necessary to deal with this challenge. This system controls the speed of the drone immediately in an emergency and helps it to land safely.

Depending on the imported recovery system

Kanpur-based Ordnance Parachute Factory has been associated with long-term defense production. Founded in 1941 this factory manufactures a variety of parachutes, aerospace textiles and special safety equipment for the Army.

OPF prepares systems with parachutes, cargo parachutes, brake parachutes and other special use of troops in advance. Now the factory wants to use its corresponding experience in developing a drone recovery parachute.

Sources say that currently many Indian drone manufacturers depend on foreign technology or imported recovery systems. The cost will be lower if this technology develops in the country and will also strengthen the domestic industry. Drone Recovery Parachute System

Kin-Kin will be built for drone systems

OPF said he is looking for the possibility of developing recovery solutions for every categorie drone.

It consists of small nano drones to large military UAVs. Factory has divided the drone into different categories depending on their maximum take-off weight. These include nano drones of up to 250 grams, micro drones up to 2 kg, small drones up to 25 kg, medium UAVs up to 150 kg, large UAVs up to 600 kg, and the drones of the categorie above it.

OPF has sought detailed information about their drone platform from companies and institutions participating under EOI.

कंपनियों को अपने ड्रोन का मॉडल, प्रकार, वजन, पेलोड क्षमता, उड़ान ऊंचाई, गति और वर्तमान रिकवरी सिस्टम की जानकारी देनी होगी। इसके अलावा यह भी बताना होगा कि उन्हें किस प्रकार के पैराशूट सिस्टम की जरूरत है।

ओपीएफ यह जानना चाहती है कि ड्रोन के लिए इमरजेंसी रिकवरी सिस्टम चाहिए या मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित लैंडिंग के लिए अलग पैराशूट चाहिए। इसके अलावा पेलोड रिकवरी, नाइट रिकवरी, समुद्र में रिकवरी और फ्लोटेशन जैसी विशेष जरूरतों पर भी सुझाव मांगे गए हैं। (Drone Recovery Parachute System)

तकनीकी मानकों पर रहेगा विशेष फोकस

ईओआई में रिकवरी सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं का भी जिक्र किया गया है। इसमें ड्रोन का वजन, पैराशूट खुलने की न्यूनतम ऊंचाई, अधिकतम गति, सुरक्षित अवतरण दर, सिस्टम की विश्वसनीयता और पैकिंग आकार जैसी जानकारियां शामिल हैं।

ओपीएफ यह भी जानना चाहती है कि अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में सिस्टम को कैसे काम करना चाहिए। इसमें अत्यधिक गर्मी, ठंड, बारिश, नमी और समुद्री वातावरण जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

मिलिटरी और सिविल दोनों क्षेत्रों के लिए समाधान

ओपीएफ ने स्पष्ट किया है कि वह केवल रक्षा उपयोग तक सीमित नहीं रहना चाहती। ड्रोन रिकवरी पैराशूट सिस्टम का उपयोग मेडिकल सप्लाई ड्रोन, कृषि ड्रोन, सर्विलांस प्लेटफॉर्म, मैपिंग ड्रोन, लॉजिस्टिक्स ड्रोन और समुद्री निगरानी ड्रोन में भी किया जा सकता है।

डिफेंस सेक्टर में इनका इस्तेमाल टोही मिशन, सीमा निगरानी और अन्य संवेदनशील अभियानों में किया जा सकता है। वहीं नागरिक क्षेत्र में यह तकनीक महंगे उपकरणों और संवेदनशील पेलोड की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

उद्योग के साथ मिलकर होगा विकास

ओपीएफ ने इस परियोजना के लिए कई प्रकार के सहयोग का प्रस्ताव रखा है। इसमें संयुक्त अनुसंधान, प्रोटोटाइप विकास, तकनीकी हस्तांतरण, दीर्घकालिक उत्पादन समझौते और निर्यात केंद्रित विनिर्माण शामिल हैं।

फैक्टरी का मानना है कि निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और रक्षा उद्योग के साथ साझेदारी करके बेहतर और व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। (Drone Recovery Parachute System)

ओपीएफ के पास मौजूद हैं आधुनिक सुविधाएं

ड्रोन रिकवरी सिस्टम डेवलप करने के लिए ओपीएफ के पास पहले से मजबूत तकनीकी आधार मौजूद है। फैक्टरी में पैराशूट डिजाइन, एयरोस्पेस टेक्सटाइल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आधारित डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड टेस्टिंग और फ्लाइट टेस्टिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

इसके अलावा क्वॉलिटी कंट्रोल, एन्वायरनमेंटल टेस्टिंग और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी मौजूद है। यही कारण है कि ओपीएफ खुद को इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार मान रही है।

ड्रोन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित रिकवरी सिस्टम किसी भी ड्रोन इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे सिस्टम न केवल महंगे प्लेटफॉर्म को बचाते हैं बल्कि मिशन की सफलता और ऑपरेशनल सेफ्टी को भी बढ़ाते हैं। भारत में इस तकनीक का विकास रक्षा और नागरिक दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Drone Recovery Parachute System)

Preparation of war in the doing space of the Indian army! Space Warfare will take a look at the big study, China-Pakistan

Indian Army Space Warfare Study
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Indian Army Space Warfare Study: Modern war is no longer limited to just land, sea and sky. But the world’s large military forces are now considered the most important part of the future war, the space i.e. space. The Government of India has now included Space Warfare in Multi-Domain Operations (MDO), including Land, C, Air, Space, Cyber and Cognitive. Given which the Indian Army has started making large preparations about Space Warfare.

According to the RFP documents found to the Defence News, the Indian Army is preparing a large study on "Space Warfare: New High Ground of Conflict". This study will be made under Army Management Studies Board (AMSB) as per the document.

The Indian Army believes that the role of space-based technology is extremely important in future conflicts. That’s why the army is now Space Wants to study deeply on technology, satellite network, missile tracking, surveillance systems, and space-based military capabilities.

Indian Army Space Warfare Study: Why is Important Space Warfare

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों ने अंतरिक्ष को रणनीतिक सैन्य क्षेत्र के रूप में विकसित करना शुरू कर दिया है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश पहले से ही एंटी-सैटेलाइट हथियार, स्पेस सर्विलांस सिस्टम और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर काम कर रहे हैं।

आधुनिक सेना अब संचार, नेविगेशन, ड्रोन ऑपरेशन, मिसाइल गाइडेंस और रियल टाइम इंटेलिजेंस के लिए सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है। किसी युद्ध की स्थिति में अगर दुश्मन देश के सैटेलाइट सिस्टम को नुकसान पहुंचा दे, तो उसकी संचार और सैन्य क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब स्पेस डोमेन को केवल वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र मान रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

एमसीटीई करेगा स्टडी और सेमिनार

इस प्रोजेक्ट का समन्वय मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग करेगा, जो भारतीय सेना की प्रमुख तकनीकी संस्थाओं में गिना जाता है। यह संस्थान संचार, नेटवर्किंग, साइबर और आधुनिक युद्ध तकनीकों पर काम करता है।

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी का विषय “स्पेस वॉरफेयर: न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” रखा गया है और इसके तहत अंतरिक्ष आधारित युद्ध की बदलती चुनौतियों का स्टडी किया जाएगा।

सेना इस स्टडी के जरिए यह समझना चाहती है कि आने वाले समय में स्पेस आधारित सैन्य क्षमताएं युद्ध की दिशा को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

क्या-क्या शामिल होगा स्टडी में

डॉक्यूमेंट के अनुसार यह स्टडी केवल टेक्निकल रिसर्च तक सीमित नहीं होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा रणनीति, जियोपॉलिटिक्स और आर्थिक प्रभाव जैसे कई पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

स्टडी में यह देखा जाएगा कि स्पेस टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध को किस तरह बदल रही है। इसमें निगरानी, इंटेलिजेंस, संचार, मिसाइल ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे विषय शामिल रहेंगे।

इसके अलावा अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं का भारत की रक्षा तैयारी और रणनीतिक ताकत पर क्या असर पड़ सकता है, इसका भी विश्लेषण किया जाएगा। (Indian Army Space Warfare Study)

अंतरिक्ष से जुड़े खतरों पर रहेगा फोकस

सूत्रों के मुताबिक आज का युद्ध तेजी से नेटवर्क सेंट्रिक होता जा रहा है। किसी भी सेना की ताकत अब केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं, बल्कि उसके डेटा नेटवर्क और सैटेलाइट सिस्टम से भी तय होती है।

अगर युद्ध के दौरान किसी देश का सैटेलाइट नेटवर्क जाम या नष्ट हो जाए, तो उसकी मिसाइल गाइडेंस, जीपीएस, संचार और निगरानी क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से दुनिया की कई सेनाएं अब एंटी-सैटेलाइट सिस्टम, स्पेस सर्विलांस और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक पर काम कर रही हैं।

भारतीय सेना की इस स्टडी में भी ऐसे खतरों और उनसे निपटने की रणनीति पर फोकस रहने की संभावना है।

एआई और आधुनिक तकनीक पर भी चर्चा

डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि स्टडी के दौरान आधुनिक तकनीक, आर्थिक विकास और जियोपॉलिटिकल प्रभावों को भी शामिल किया जाएगा।

अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, सैटेलाइट इमेजिंग और ऑटोमेटेड सिस्टम मॉडर्न वॉरफेयर का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

स्पेस बेस्ड डेटा की मदद से अब रियल टाइम में दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। मिसाइल लॉन्च, सैनिकों की तैनाती और सैन्य गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकती है।

इसी वजह से भारतीय सेना भविष्य के युद्ध में एआई और स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को गंभीरता से समझना चाहती है।

भारत की सैन्य रणनीति में बढ़ रहा स्पेस का महत्व

भारत पहले ही डिफेंस सेक्टर में स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ा चुका है। भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना अब संचार और निगरानी के लिए कई सैन्य सैटेलाइट का इस्तेमाल कर रही हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भी कई रक्षा आधारित स्पेस परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।

2019 में भारत ने मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट भी किया था। इसके बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया था जिनके पास एंटी-सैटेलाइट क्षमता मौजूद है।

सूत्रों का कहना है कि इसी बदलती स्थिति को देखते हुए भारतीय सेना अब स्पेस वॉरफेयर पर गहराई से स्टडी करना चाहती है। (Indian Army Space Warfare Study)

विशेषज्ञ संस्थानों से मांगे गए प्रस्ताव

वहीं, सेना ऐसे संस्थानों, थिंक टैंक और रिसर्च एजेंसियों से प्रस्ताव मांग रही है, जिन्हें स्पेस रिसर्च और रक्षा स्टडी का अनुभव हो।

स्टडी करने वाले संस्थानों के पास अनुभवी विशेषज्ञों की टीम होना जरूरी है। डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी टीम में कम से कम पांच सदस्य होने चाहिए। इसमें मेजर जनरल स्तर के विशेषज्ञ, ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी और रक्षा स्टडी से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा भारतीय सशस्त्र बलों के साथ पहले किए गए स्टडी और अकादमिक संस्थानों से सहयोग को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया गया है। (Indian Army Space Warfare Study)

सेमिनार में होगी बड़ी चर्चा

इस प्रोजेक्ट के तहत केवल रिसर्च रिपोर्ट ही तैयार नहीं की जाएगी, बल्कि एक बड़ा सेमिनार भी आयोजित किया जाएगा।

डॉक्यूमेंट के अनुसार स्टडी पूरा होने के बाद विशेषज्ञों, सैन्य अधिकारियों और रणनीतिक मामलों के जानकारों के बीच विस्तृत चर्चा होगी। इसमें स्पेस आधारित युद्ध की चुनौतियों और भारत की तैयारी पर विचार किया जाएगा।

सेमिनार में मिलिट्री कम्यूनिकेशन, स्पेस सिक्योरिटी, सैटेलाइट सुरक्षा, साइबर खतरों और आधुनिक युद्ध में अंतरिक्ष की भूमिका जैसे विषय शामिल रह सकते हैं। (Indian Army Space Warfare Study)

दस महीने में पूरी करनी होगी स्टडी

डॉक्यूमेंट के मुताबिक संस्था को स्टडी और सेमिनार का काम समझौते पर हस्ताक्षर होने के दस महीने के भीतर पूरा करना होगा।

स्टडी पूरा होने के बाद संस्था को विस्तृत रिपोर्ट, प्रेजेंटेशन और हाई क्वालिटी प्रिंटेड कॉपी सेना को सौंपनी होगी। डॉक्यूमेंट में डिजिटल और हार्ड कॉपी दोनों जमा करने की बात कही गई है। (Indian Army Space Warfare Study)

राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर का होगा विश्लेषण

स्टडी के दौरान यह भी देखा जाएगा कि स्पेस वॉरफेयर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अब युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। दुश्मन देश साइबर अटैक, सैटेलाइट जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए भी हमला कर सकते हैं।

अगर किसी देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क जाम हो जाए, तो उसकी सेना के ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सेना अब स्पेस और साइबर दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चल रही है। (Indian Army Space Warfare Study)

भारत के लिए क्यों अहम है यह स्टडी

भारत के सामने चीन और पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौती मौजूद है। चीन पहले से ही स्पेस टेक्नोलॉजी और मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है।

चीनी सेना स्पेस आधारित निगरानी, एंटी-सैटेलाइट वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम विकसित कर चुकी है। वहीं पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपनी सैन्य तकनीक मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

ऐसे में भारतीय सेना भविष्य के युद्ध की तैयारी के लिए स्पेस डोमेन को लेकर अपनी रणनीति मजबूत करना चाहती है।

स्पेस को माना जा रहा नया युद्धक्षेत्र

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में स्पेस को “न्यू हाई ग्राउंड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट” यानी संघर्ष का नया बड़ा मोर्चा माना जा रहा है। जिस देश के पास मजबूत स्पेस नेटवर्क और सैटेलाइट सिक्योरिटी होगी, उसे युद्ध के दौरान रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब जमीन और समुद्र के साथ-साथ अंतरिक्ष को भी युद्ध का नया क्षेत्र मान रही हैं। भारतीय सेना का यह स्टडी भी उसी बदलते वैश्विक सैन्य माहौल का हिस्सा माना जा रहा है। (Indian Army Space Warfare Study)

The Indian Army is undertaking a major study on space warfare, reflecting the growing importance of satellites, space-based surveillance, missile tracking, and secure communications in modern military operations. As future conflicts expand beyond traditional battlefields, the study will examine emerging threats, space security challenges, and the role of advanced technologies in national defence. The initiative highlights India’s increasing focus on multi-domain warfare and strategic preparedness in the space domain.

Indian Army will purchase Portable Counter Drone System, 1.5km away from GPS, Beidou and GLONASS signal will jam

Indian Army Counter UAS System
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Indian Army Counter UAS System: Modern war format is changing rapidly. Sometimes tanks, artillery and fighter planes were considered the largest weapons in the battlefield, but now small-sized drones have also become a huge challenge. From the Ukraine-Russia war to the conflicts of West Asia, the drone has changed the picture of the war. Drone activities are constantly growing on the borders of India. The drone has been used several times to drop weapons and intoxicants from Pakistan, while the drone monitoring remains a great concern even at the northern borders.

The Indian Army has launched the purchase process of a new counter-UAS system, considering the same challenges. The army wants a portable system that can neutralize the enemy drones without being shot. The equipment with modern jamming technology has been demanded.

Indian Army Counter UAS System: Why Increased Counter Drone System Needs

The use of drone technology in the past few years is rapidly enhanced. Earlier where the drones were only near the forces, there are now small organisations and terrorist groups to use them. A few kilos of weight drones can monitor through the camera, weapons can drop and even be used for suicidal attacks.

Indian security agencies have caught drones coming from across multiple times. In many cases, weapons, ammunition and narcotics were dropped in the Indian border through these drones. It is not only enough to buy a drone in such a way, but the technique that prevents them has become the same.

That is why the army is now emphasizing such systems, which make the enemy drones useless before reaching its target. Indian Army Counter UAS System

What happens Counter-UAS system

Counter-UAS means counter unmanaged aerial system. it Anti Drone System is. Its work is to identify the enemy drone, jam his control and prevent him from completing the mission.

The system where the Indian army is purchasing is based primarily on the jamming technique. It jams the communication between the drone and its operator. Also it also prevents satellite signals that help the drone get a direction.

When the drone does not get the right signal he either stops in his place, tries to return or then wanders from the target. That is why such systems are considered extremely effective in modern wars. Indian Army Counter UAS System

Will jam multiple satellite systems together

The Army wants a system that can simultaneously access multiple global navigation satellite systems. It includes major satellite networks like GPS, Galileo, Glonass and Bedu.

Most drones today depend on the same navigation system. The direction and control of the drone is affected if these signals are jamed. That is why the jamming technique is considered to be an important part of the anti-drone defense.

360 Degree Security Will System

This system should be omni-directional according to the demand of the army. This means that it will work not only in one direction but in the four direction.

तकनीकी शर्तों के अनुसार सिस्टम को 360 डिग्री तक जेमिंग कवरेज देना होगा। यानी सैनिक को यह अनुमान लगाने की जरूरत नहीं होगी कि ड्रोन किस दिशा से आ रहा है। यदि कोई ड्रोन उसके आसपास के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो सिस्टम उसे प्रभावित कर सकेगा।

युद्ध क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि ड्रोन किसी भी दिशा से अचानक दिखाई दे सकते हैं।

डेढ़ किलोमीटर तक असरदार

सेना ने इस सिस्टम के लिए न्यूनतम 1.5 किलोमीटर की जेमिंग रेंज तय की है। इसका मतलब है कि सैनिक अपने स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर तक उड़ रहे ड्रोन को भी प्रभावित कर सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम चौकियों, संवेदनशील ठिकानों और अस्थायी सैन्य शिविरों की सुरक्षा के लिए यह दूरी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे सैनिकों को ड्रोन खतरे का पहले से जवाब देने का अवसर मिलेगा।

वजन तीन किलो से कम

किसी भी सैन्य उपकरण के लिए उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषकर पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिक अतिरिक्त भार नहीं उठा सकते।

इसी को ध्यान में रखते हुए सेना ने शर्त रखी है कि पूरा सिस्टम तीन किलो से कम वजन का होना चाहिए। इसका मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ आसानी से लेकर चल सकेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल कर सकेगा।

हल्का होने के बावजूद सिस्टम को मजबूत और भरोसेमंद भी होना होगा ताकि मुश्किल हालात में भी उसका परफॉरमेंस प्रभावित न हो। (Indian Army Counter UAS System)

हर मौसम में काम करने की क्षमता

भारतीय सेना रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और बर्फीले इलाकों सहित विभिन्न परिस्थितियों में तैनात रहती है। इसलिए किसी भी उपकरण को हर तरह के मौसम में काम करने योग्य होना जरूरी है।

दस्तावेज के अनुसार यह सिस्टम माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह हिमालयी क्षेत्रों की ठंड और पश्चिमी भारत की गर्मी दोनों में उपयोग किया जा सकेगा।

इसके अलावा इसे आईपी-67 सुरक्षा मानक के अनुरूप भी होना होगा। ताकि यह धूल और पानी से भी सुरक्षित रहे।

आठ घंटे लगातार ऑपरेशनल

सैन्य अभियानों में लगातार ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए सेना ने मांग की है कि यह सिस्टम बैटरी के सहारे कम से कम आठ घंटे तक लगातार काम कर सके।

इससे सैनिकों को बार-बार बैटरी बदलने या चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। लंबी गश्त, सीमा सुरक्षा और महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियों के दौरान यह विशेष रूप से उपयोगी होगा।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सिस्टम के सभी मोड चौबीसों घंटे संचालन के लिए सक्षम होने चाहिए।

वहीं, सेना केवल काउंटर ड्रोन सिस्टम ही नहीं खरीद रही, बल्कि ड्रोन प्रशिक्षण से जुड़ी सुविधाओं पर भी ध्यान दे रही है।

तकनीकी दस्तावेज में ड्रोन सॉकर एरीना, डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर और अवरोधक प्रशिक्षण क्षेत्र जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। सेना ड्रोन ऑपरेशन और एंटी ड्रोन दोनों क्षमताओं को साथ-साथ विकसित करना चाहती है।

ड्रोन सॉकर एरीना में सैनिक सुरक्षित वातावरण में ड्रोन ऑपरेशन का अभ्यास कर सकेंगे। वहीं सिमुलेटर के जरिए वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग दी जा सकेगी। (Indian Army Counter UAS System)

एफपीवी ड्रोन भी होंगे ट्रेनिंग का हिस्सा

दस्तावेज में आठ इंच और दस इंच कैटेगरी के एफपीवी ड्रोन का भी उल्लेख किया गया है। एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन, जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए वास्तविक समय में कंट्रोल करता है।

इन ड्रोन की उड़ान अवधि, गति और पेलोड क्षमता को देखते हुए स्पष्ट है कि सेना ड्रोन ऑपरेशन की नई तकनीकों पर भी काम कर रही है। कुछ ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार हासिल कर सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं।

मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा

इस प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है। केवल क्लास-1 और क्लास-2 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भाग लेने की अनुमति दी गई है।

डिलीवरी की समयसीमा 20 दिन तय की गई है। साथ ही चयनित विक्रेता को प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। सेना ने अनुभव, प्रदर्शन और तकनीकी क्षमता से जुड़े कई मानदंड भी निर्धारित किए हैं ताकि केवल सक्षम कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकें। (Indian Army Counter UAS System)

The Indian Army has initiated the procurement of a portable Counter-Unmanned Aerial System (Counter-UAS) to strengthen its ability to detect and neutralize hostile drones. Designed for modern battlefield requirements, the system will be capable of disrupting enemy drone operations at ranges of up to 1.5 kilometers through advanced signal jamming technology. The lightweight and portable solution will help troops counter surveillance, reconnaissance, and weaponized drones in sensitive border areas and operational zones. This move reflects the Army’s growing focus on anti-drone warfare capabilities as unmanned aerial threats continue to evolve, posing significant security challenges across multiple theatres.