Home Blog Page 20

NEET के पेपर मुफ्त में नहीं पहुंचाएगी वायुसेना! जानें Mi-17 हेलीकॉप्टरों पर चुकानी होगी कितनी रकम?

NEET UG 2026 Paper Airlift IAF
Image for reference only. AI-Generated Image

NEET UG 2026 Paper Airlift: नीट-यूजी 2026 की दोबारा परीक्षा को लेकर इस बार केंद्र सरकार कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं है। पिछले महीने पेपर लीक विवाद के बाद नीट की सुरक्षा को लेकर अभूतपूर्व इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके तहत पहली बार बड़े पैमाने पर भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर परीक्षा के प्रश्नपत्र देशभर में पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे। हालांकि यह पूरा अभियान मुफ्त नहीं होगा। सूत्रों के मुताबिक प्रश्नपत्रों की एयरलिफ्टिंग के लिए संबंधित एजेंसियों को भारतीय वायुसेना को रक्षा मंत्रालय द्वारा तय किए गए निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा।

सूत्रों ने बताया कि 21 जून को होने वाली नीट-यूजी परीक्षा के लिए प्रश्नपत्रों को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में वायुसेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों और अन्य सैन्य विमानों की मदद ली जाएगी। इन प्रश्नपत्रों को पहले चुनिंदा वायुसेना स्टेशनों तक पहुंचाया जाएगा और वहां से कड़ी सुरक्षा के बीच परीक्षा केंद्रों तक भेजा जाएगा।

NEET UG 2026 Paper Airlift: पेपर लीक विवाद के बाद बदली रणनीति

पिछले वर्ष नीट परीक्षा को लेकर सामने आए पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने देशभर में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। मामले ने राजनीतिक रंग भी लिया और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। इसके बाद केंद्र सरकार, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और सुरक्षा एजेंसियों ने परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए नई रणनीति तैयार की है।

सूत्रों के अनुसार इस बार प्रश्नपत्रों के ट्रांसपोर्टेशन को सबसे संवेदनशील चरण माना गया है। इसी वजह से सड़क और सामान्य लॉजिस्टिक नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल करने का फैसला लिया गया।

डिफेंस सूत्रों ने बताया कि प्रश्नपत्रों को 18 वायुसेना स्टेशनों तक विशेष सुरक्षा व्यवस्था के तहत पहुंचाया जाएगा। इसके लिए एमआई-17 हेलीकॉप्टरों के अलावा जरूरत पड़ने पर अन्य सैन्य परिवहन विमानों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

मुफ्त में नहीं मिलता वायुसेना का हेलीकॉप्टर

अक्सर लोगों को लगता है कि सरकारी कार्यों में सेना या वायुसेना के संसाधनों का इस्तेमाल बिना किसी शुल्क के किया जाता है, लेकिन असलियत कुछ और है।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना अपने हेलीकॉप्टर या विमान किसी भी राज्य या सरकारी विभाग को मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराती। रक्षा मंत्रालय द्वारा निर्धारित रिकवरी रेट के आधार पर उपयोग करने वाली एजेंसी को भुगतान करना पड़ता है।

यह भुगतान फ्लाइंग ऑवर यानी उड़ान के कुल समय के आधार पर किया जाता है। टेक-ऑफ से लेकर लैंडिंग तक का समय रिकॉर्ड किया जाता है और उसी के आधार पर बिल तैयार किया जाता है।

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि यह व्यवस्था वर्षों से लागू है और चुनाव ड्यूटी, आपदा राहत, वीवीआईपी मूवमेंट तथा अन्य सरकारी अभियानों में भी इसी प्रक्रिया का पालन किया जाता है। (NEET UG 2026 Paper Airlift)

कितना हो सकता है खर्च?

हालांकि रक्षा मंत्रालय ने वर्तमान दरें सार्वजनिक नहीं की हैं। ये दरें केवल अधिकृत सरकारी विभागों और एजेंसियों के लिए उपलब्ध रहती हैं।

एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर की लागत का हिसाब प्रति उड़ान घंटे के आधार पर लगाया जाता है। फ्लाइंग ऑवर का मतलब हेलीकॉप्टर के टेक-ऑफ से लेकर लैंडिंग तक का वास्तविक समय होता है, जिसे लॉग बुक में दर्ज किया जाता है।

हालांकि सूत्रों का कहना है कि एमआई-17 या एमआई-17वी5 जैसे मीडियम लिफ्ट हेलीकॉप्टर की रिकवरी कॉस्ट कई लाख रुपये प्रति फ्लाइंग ऑवर तक हो सकती है। हालांकि इसका पेमेंट सीधे वायुसेना के पास नहीं जाएगा, बल्कि रक्षा मंत्रालय के अधीन एक खास अकाउंट में जमा किया जाएगा।

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पुराने सरकारी दस्तावेजों, आपदा प्रबंधन रिकॉर्ड और निजी हेलीकॉप्टर ऑपरेटरों की दरों के आधार पर सूत्रों का कहना है कि साल 2026 में भारतीय वायुसेना के एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर की कुल रिकवरी या ऑपरेटिंग लागत लगभग 2.8 लाख रुपये से 5.5 लाख रुपये प्रति फ्लाइंग ऑवर के बीच हो सकती है।

तुलना करें तो बेल-412 या एडब्ल्यू-139 जैसे निजी हेलीकॉप्टरों की चार्टर दरें भी आमतौर पर 2.5 लाख से 4 लाख रुपये प्रति घंटे के बीच रहती हैं।

पुराने आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2020 के दौरान कुछ सरकारी दस्तावेजों में एमआई-17 श्रेणी के हेलीकॉप्टरों की लागत लगभग 1.8 लाख से 2.5 लाख रुपये प्रति घंटे थी। लेकिन उसके बाद ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी, स्पेयर पार्ट्स की लागत, रखरखाव खर्च और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर अपग्रेड कार्यक्रमों के कारण इन दरों में बढ़ोतरी हुई है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह आंकड़े अनुमानित हैं क्योंकि रक्षा मंत्रालय की वास्तविक “प्रिस्क्राइब्ड हायरिंग रेट” लिस्ट सार्वजनिक नहीं होती। यह लिस्ट केवल अधिकृत सरकारी विभागों और एजेंसियों को उपलब्ध कराई जाती है।

इसमें केवल ईंधन ही नहीं बल्कि मेंटनेंस, स्पेयर पार्ट्स, क्रू, बीमा, ओवरहॉल और ऑपरेशनल खर्च भी शामिल होते हैं।

क्यों चुना गया एमआई-17?

भारतीय वायुसेना का एमआई-17 हेलीकॉप्टर देश के सबसे भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट प्लेटफॉर्मों में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल सियाचिन से लेकर पूर्वोत्तर और आपदा राहत अभियानों तक में किया जाता है।

यह हेलीकॉप्टर भारी वजन ले जाने की क्षमता रखता है और कठिन मौसम में भी उड़ान भर सकता है। इसी वजह से परीक्षा सामग्री जैसी संवेदनशील सामान को सुरक्षित और समय पर पहुंचाने के लिए इसे उपयुक्त माना गया।

वायुसेना के बेड़े में मौजूद एमआई-17वी5 संस्करण आधुनिक नेविगेशन, संचार और सुरक्षा प्रणालियों से लैस है। यही कारण है कि राष्ट्रीय महत्व के अभियानों में इसका उपयोग लगातार बढ़ा है। (NEET UG 2026 Paper Airlift)

एक घंटे की उड़ान में खर्च होता है कितना ईंधन?

सूत्रों के मुताबिक एमआई-17वी5 में लगे टीवी3-117वीएम इंजन हर घंटे लगभग 800 से 1000 लीटर एविएशन टर्बाइन फ्यूल (जेट ईंधन) की खपत करते हैं। मौजूदा ईंधन कीमतों के आधार पर केवल ईंधन का खर्च ही लगभग 60 हजार से 90 हजार रुपये प्रति घंटे तक पहुंच सकता है।

केवल ईंधन की लागत ही एक घंटे में हजारों नहीं बल्कि कई दसियों हजार रुपये तक पहुंच सकती है। इसके अलावा इंजन मेंटेनेंस, टेक्निकल इंस्पेक्शन और क्रू की तैनाती जैसे खर्च अलग होते हैं।

इसी वजह से वायुसेना किसी भी नागरिक या सरकारी कार्य के लिए अपने संसाधन निर्धारित शुल्क पर ही उपलब्ध कराती है।

वायुसेना स्टेशनों से परीक्षा केंद्र तक पहुंचेगा पेपर

जानकारी के अनुसार प्रश्नपत्रों को पहले देशभर के 18 वायुसेना स्टेशनों तक पहुंचाया जाएगा। वहां से उन्हें अलग-अलग राज्यों और शहरों के परीक्षा केंद्रों तक भेजा जाएगा।

पूरी प्रक्रिया में समयबद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा ताकि किसी भी केंद्र पर प्रश्नपत्र देर से पहुंचने की स्थिति पैदा न हो। सुरक्षा एजेंसियां और स्थानीय प्रशासन भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

सूत्रों के अनुसार इस बार परीक्षा से जुड़े सभी संवेदनशील चरणों की लगातार निगरानी की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त सैन्य संसाधनों का भी उपयोग किया जा सकता है। (NEET UG 2026 Paper Airlift)

सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी?

सूत्रों के मुताबिक प्रश्नपत्रों को प्रिंटिंग और पैकेजिंग के बाद अत्यधिक सुरक्षित कंटेनरों में रखा जाएगा। इसके बाद उन्हें सैन्य सुरक्षा के बीच एयरफोर्स स्टेशनों तक पहुंचाया जाएगा।

हर स्टेज पर डिजिटल ट्रैकिंग और मल्टी-लेयर मॉनिटरिंग की व्यवस्था की गई है। प्रश्नपत्रों तक सीमित संख्या में अधिकृत अधिकारियों की ही पहुंच होगी।

एयरफोर्स स्टेशन पहुंचने के बाद राज्य प्रशासन, पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की निगरानी में इन्हें परीक्षा केंद्रों तक भेजा जाएगा।

अधिकारियों का कहना है कि इस बार सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल पेपर लीक रोकना नहीं बल्कि किसी भी प्रकार की लॉजिस्टिक गड़बड़ी की संभावना को भी खत्म करना है। (NEET UG 2026 Paper Airlift)

सरकार क्यों नहीं लेना चाहती कोई जोखिम?

नीट परीक्षा देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा मानी जाती है। इसमें हर साल लाखों छात्र हिस्सा लेते हैं और उनके भविष्य का फैसला इसी परीक्षा से होता है।

पिछले महीने सामने आए विवादों के बाद सरकार और परीक्षा एजेंसियों पर पारदर्शी परीक्षा कराने का भारी दबाव है। यही वजह है कि इस बार प्रश्नपत्रों के परिवहन से लेकर वितरण तक हर स्तर पर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। (NEET UG 2026 Paper Airlift)

राहुल गांधी के सवालों पर रक्षा मंत्रालय ने बताया INS Baaz की जगह गैलेथिया बे में क्यों बनाया जाएगा 13,000 करोड़ रुपये का नया एयरपोर्ट?

INS Baaz Great Nicobar Airport Project
Image Source: PIB/Rahul Gandhi

Great Nicobar Airport Project: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रस्तावित ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक तरफ विपक्ष इस प्रोजेक्ट को पर्यावरण और आदिवासी समुदायों के लिए खतरा बता रहा है, वहीं केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारत की समुद्री सुरक्षा, सामरिक मौजूदगी और आर्थिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

इसी बहस के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है कि जब भारतीय नौसेना का आईएनएस बाज एयरबेस पहले से मौजूद है तो फिर सरकार ग्रेट निकोबार में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट क्यों बना रही है। रक्षा मंत्रालय ने अब इस पर विस्तार से अपना पक्ष रखा है और बताया है कि आखिर क्यों आईएनएस बाज के विस्तार की योजना को छोड़कर गैलेथिया बे के पास नया एयरपोर्ट बनाने का फैसला लिया गया।

Great Nicobar Airport Project: क्या है पूरा मामला?

ग्रेट निकोबार द्वीप में केंद्र सरकार चार बड़े प्रोजेक्ट डेवलपकरना चाहती है। इनमें इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और नौसैनिक एयर स्टेशन, नया टाउनशिप तथा पावर प्लांट शामिल हैं।

इस पूरी प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक मजबूत रणनीतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में डेवलप करना है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को एक बड़ा सामरिक लाभ देती है।

हाल ही में रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने साफ कर दिया कि नया एयरपोर्ट गैलेथिया बे के पास चिंगेन क्षेत्र में बनाया जाएगा और आईएनएस बाज के रनवे को बड़ा करने का विचार छोड़ दिया गया है।

राहुल गांधी ने उठाए थे सवाल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 5 जून को एक वीडियो मैसेज में सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अगर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है, तो सरकार को सबसे पहले आईएनएस बाज का विस्तार करना चाहिए।

राहुल गांधी ने कहा था कि नौसेना पिछले कई सालों से आईएनएस बाज के विस्तार की मांग कर रही है। उनके अनुसार यदि सरकार रक्षा जरूरतों को प्राथमिकता देना चाहती है, तो मौजूदा सैन्य ठिकाने को डेवलप करना ज्यादा आसान और पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक विकल्प हो सकता है।

उन्होंने आरोप लगाया था कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को डिफेंस प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि असल उद्देश्य कुछ और है। उनके बयान के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। (Great Nicobar Airport Project)

रक्षा मंत्रालय ने क्या जवाब दिया?

रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का फैसला किसी राजनीतिक वजह से नहीं बल्कि विस्तृत तकनीकी और सामरिक आकलन के आधार पर लिया गया है।

सूत्रों के मुताबिक पांच अलग-अलग स्थानों का मूल्यांकन किया गया था। इनमें आईएनएस बाज का मौजूदा एयरबेस भी शामिल था। सभी स्थानों की भौगोलिक स्थिति, विमान संचालन की सुरक्षा, आदिवासी आबादी पर प्रभाव, पर्यावरणीय असर और भविष्य में विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया गया।

इन सभी पहलुओं को देखने के बाद गैलेथिया बे को सबसे उपयुक्त स्थान माना गया। (Great Nicobar Airport Project)

आखिर आईएनएस बाज में क्या दिक्कत थी?

आईएनएस बाज ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे क्षेत्र में स्थित है। यह भारत का सबसे दक्षिणी सैन्य एयरबेस माना जाता है।

फिलहाल यहां लगभग 4,500 फीट लंबा रनवे है, जो छोटे और मध्यम आकार के विमानों के लिए पर्याप्त है। लेकिन बड़े सैन्य और नागरिक विमानों के संचालन के लिए इसे काफी बढ़ाना पड़ता।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार रनवे विस्तार में कई गंभीर चुनौतियां थीं।

एयरबेस के उत्तरी हिस्से में 80 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ी मौजूद हैं। बड़े विमानों के सुरक्षित ऑपरेशन के लिए इस पहाड़ी को बड़े पैमाने पर काटना पड़ता।

इसके अलावा तटीय क्षेत्र उथला है। ऐसे में समुद्र की ड्रेजिंग करनी पड़ती और बड़े स्तर पर भूमि पुनर्निर्माण का काम करना पड़ता।

गांवों और आबादी पर भी पड़ता असर

मंत्रालय का कहना है कि यदि आईएनएस बाज का विस्तार किया जाता तो रनवे आसपास की बस्तियों के बीच से गुजर सकता था। इससे स्थानीय आबादी दो हिस्सों में बंट सकती थी और लोगों को स्थानांतरित करने की जरूरत भी पड़ सकती थी।

साथ ही एयरबेस के आसपास पहले से मौजूद नौसेना के कई स्ट्रक्चर भी प्रभावित होते। अंतरराष्ट्रीय स्तर के एयरपोर्ट के लिए जरूरी सुविधाओं के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं थी।

यही वजह थी कि विस्तार की योजना व्यवहारिक नहीं मानी गई। (Great Nicobar Airport Project)

पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने का दावा

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पर्यावरण को लेकर उठाए जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों कादावा है कि आईएनएस बाज का विस्तार करने से पक्षियों, समुद्री जीवों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को कहीं अधिक नुकसान पहुंचता।

इसके मुकाबले गैलेथिया बे में नया एयरपोर्ट बनाना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना गया।

मंत्रालय का कहना है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन पूरी तरह निर्धारित नियमों के तहत किया गया। इस प्रक्रिया में कई प्रतिष्ठित संस्थानों की मदद ली गई।

इनमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री जैसी संस्थाएं शामिल थीं। (Great Nicobar Airport Project)

क्यों महत्वपूर्ण है ग्रेट निकोबार?

ग्रेट निकोबार की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है। यह इलाका मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। मलक्का दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और कंटेनर यातायात इसी मार्ग से गुजरता है। चीन के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उसके ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में मजबूत सैन्य और लॉजिस्टिक ढांचा भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अतिरिक्त सामरिक बढ़त देता है। (Great Nicobar Airport Project)

नया एयरपोर्ट कितना बड़ा होगा?

सरकार के अनुसार यह संयुक्त उपयोग वाला एयरपोर्ट होगा। इसका इस्तेमाल नागरिक उड्डयन मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय दोनों करेंगे। इस प्रोजेक्ट पर लगभग 13,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने शुरुआती चरण में इसे वर्ष 2040 तक 13.5 लाख यात्रियों की वार्षिक क्षमता वाला एयरपोर्ट बनाने की योजना तैयार की है। इसके साथ नौसेना को भी लंबी दूरी के विमान, निगरानी विमान और अन्य सैन्य संसाधन तैनात करने की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। (Great Nicobar Airport Project)

क्या खत्म होगी आईएनएस बाज की भूमिका

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि आईएनएस बाज को बंद नहीं किया जा रहा है। यह एयरबेस पहले की तरह काम करता रहेगा और भारतीय नौसेना की फॉरवर्ड आउटपोस्ट बना रहेगा।

नया एयरपोर्ट आईएनएस बाज का विकल्प नहीं बल्कि पूरक सुविधा होगा। दोनों मिलकर इस क्षेत्र में भारत की समुद्री और हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत करेंगे।

आदिवासी समुदायों को लेकर क्या कहा गया?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में आदिवासी अधिकारों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। मंत्रालय का कहना है कि किसी भी आदिवासी समुदाय को शारीरिक रूप से विस्थापित करने की योजना नहीं है।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार आदिवासी रिजर्व क्षेत्र में जितनी भूमि अधिसूचना से बाहर की गई है, उससे अधिक भूमि नए रिजर्व क्षेत्र के रूप में जोड़ी गई है।

प्रोजेक्ट से जुड़ी प्रक्रियाओं में स्थानीय निकोबारी परिषद, आदिवासी कल्याण विभाग और अन्य संबंधित संस्थाओं से परामर्श किया गया। (Great Nicobar Airport Project)

रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर जोर

सरकार का दावा है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल रक्षा से जुड़ा कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक बड़े आर्थिक विकास मॉडल का हिस्सा भी है।

अधिकारियों के अनुसार प्रोजेक्ट के विभिन्न चरणों में एक लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा हो सकते हैं।

इसके साथ पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, समुद्री व्यापार, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में भी गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद जताई गई है। (Great Nicobar Airport Project)

क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है यह फैसला?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस जारी है, लेकिन रक्षा मंत्रालय का कहना है कि गैलेथिया बे में नया एयरपोर्ट बनाने का फैसला विस्तृत तकनीकी अध्ययन और सामरिक जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

मंत्रालय का तर्क है कि आईएनएस बाज का विस्तार कई भौगोलिक और परिचालन बाधाओं से घिरा था, जबकि नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भविष्य की जरूरतों के अनुरूप अधिक उपयुक्त पाया गया। इसी वजह से अब सरकार ग्रेट निकोबार में नए एयरपोर्ट, बंदरगाह, टाउनशिप और ऊर्जा प्रोजेक्ट के साथ आगे बढ़ रही है। (Great Nicobar Airport Project)

तेजस Mk1A में देरी पर एक्शन मोड में सरकार, HAL पर लटक रही पेनल्टी की तलवार, इसी हफ्ते होगी IAF के साथ रिव्यू मीटिंग!

HAL Tejas Mk1A Delay
Defence Minister Rajnath Singh today reviewed the progress of key ongoing projects of Hindustan Aeronautics Limited. (Image Source: Defence Ministry)

HAL Tejas Mk1A Delay: भारत के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में शामिल तेजस एमके-1ए को बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। रक्षा मंत्रालय अब हिंदुस्तान एचएएल पर पैनल्टी लगाने की संभावना पर विचार कर रहा है, क्योंकि भारतीय वायुसेना को अब तक एक भी ऑपरेशनल तेजस एमके-1ए विमान नहीं मिला है।

सोमवार सुबह को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एचएएल की प्रमुख परियोजनाओं की समीक्षा बैठक की। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी मौजूद थे। बैठक में बाकी प्रोजेट्स के अलावा तेजस एमके-1ए कार्यक्रम की प्रगति, इंजन सप्लाई की स्थिति और उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

सूत्रों का कहना है कि इसी सप्ताह भारतीय वायुसेना और एचएएल के बीच अलग से एक समीक्षा बैठक भी हो सकती है, जिसमें विमान की वास्तविक स्थिति और लंबित तकनीकी कार्यों की समीक्षा की जाएगी।

HAL Tejas Mk1A Delay: 2021 में हुआ था 45,696 करोड़ रुपये का बड़ा सौदा

भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने साल 2021 में एचएएल के साथ 83 तेजस एमके-1ए विमानों का कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस सौदे की कुल कीमत 45,696 करोड़ रुपये थी।

इस ऑर्डर में 73 सिंगल-सीटर लड़ाकू विमान और 10 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल हैं। समझौते के अनुसार फरवरी 2024 से विमान की डिलीवरी शुरू हो जानी चाहिए थी।

योजना के मुताबिक एचएएल को हर साल लगभग आठ विमान भारतीय वायुसेना को सौंपने थे। लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बावजूद अब तक एक भी तेजस एमके-1ए औपचारिक रूप से वायुसेना को नहीं सौंपा गया है।

यही वजह है कि अब रक्षा मंत्रालय इस मामले को गंभीरता से देख रहा है। (HAL Tejas Mk1A Delay)

देरी की सबसे बड़ी वजह क्या है?

तेजस एमके-1ए कार्यक्रम में देरी की सबसे बड़ी वजह इंजन सप्लाई को माना जा रहा है। इस विमान में अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-404 आईएन-20 इंजन लगाया जाना है। एचएएल ने वर्ष 2021 में 99 इंजनों के लिए लगभग 716 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट किया था।

मूल योजना के अनुसार अप्रैल 2023 से इंजन मिलने शुरू हो जाने चाहिए थे। लेकिन सप्लाई समय पर नहीं हो सकी।

सूत्रों के मुताबिक अप्रैल 2026 तक एचएएल को केवल छह इंजन ही प्राप्त हुए हैं। जबकि दर्जनों विमान प्रोडक्शन लाइन में तैयार खड़े हैं और केवल इंजन का इंतजार कर रहे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी इस मुद्दे को लेकर कई बार अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत करनी पड़ी थी।

एचएएल ने भी जीई पर लगाया जुर्माना

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि एचएएल ने केवल देरी का हवाला नहीं दिया, बल्कि उसने इंजन सप्लाई में देरी के लिए जनरल इलेक्ट्रिक पर कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार पैनल्टी भी लगाई है।

सूत्रों के अनुसार देरी से मिलने वाले इंजनों पर लिक्विडेटेड डैमेज क्लॉज के तहत जुर्माना लगाया गया है। यानी एचएएल को भी समय पर इंजन न मिलने से नुकसान हुआ है और उसने इसकी भरपाई के लिए कॉन्ट्रैक्ट संबंधी प्रावधानों का इस्तेमाल किया है।

जानकारी के मुताबिक जीई ने अब जून से दिसंबर 2026 के बीच करीब 20 इंजन देने का भरोसा दिया है। एचएएल को उम्मीद है कि मार्च 2027 तक पर्याप्त संख्या में इंजन मिल जाएंगे। (HAL Tejas Mk1A Delay)

तैयार हैं विमान, लेकिन नहीं हैं इंजन

दिलचस्प बात यह है कि विमान निर्माण का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है। एचएएल पहले ही पांच ऐसे तेजस एमके-1ए विमान तैयार कर चुका है जिनमें कॉन्ट्रैक्ट के तहत तय अधिकांश क्षमताएं मौजूद हैं। इसके अलावा कई अन्य विमान भी निर्माण चरण पूरा कर चुके हैं।

सूत्रों के मुताबिक लगभग 18 से 20 एयरफ्रेम प्रोडक्शन लाइन में तैयार खड़े हैं। इन विमानों की असेंबली पूरी हो चुकी है, लेकिन इंजन उपलब्ध नहीं होने के कारण इन्हें उड़ान योग्य नहीं बनाया जा सका है।

एईएसए रडार इंटीग्रेशन भी बना चुनौती

इसके अलावा इसी हफ्ते भारतीय वायुसेना के साथ होने वाली रिव्यू बैठक में एईएसए रडार इंटीग्रेशन को लेकर बातचीत हो सकती है। सूत्रों के अनुसार केवल रडार लगाना ही चुनौती नहीं है, बल्कि उसे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिशन कंप्यूटर और वेपन कंट्रोल सिस्टम के साथ पूरी तरह जोड़ना भी जरूरी है।

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक लड़ाकू विमान में रडार, सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक-दूसरे के साथ लगातार डेटा साझा करते हैं। यदि इन सभी के बीच सही तालमेल न हो तो विमान की पूरी क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से एचएएल और संबंधित एजेंसियां इस इंटीग्रेशन प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में लगी हुई हैं। (HAL Tejas Mk1A Delay)

पिछले महीने होनी थी बैठक

इससे पहले मई महीने के दूसरे हफ्ते में भारतीय वायुसेना के साथ एचएएल की रिव्यू बैठक होनी प्रस्तावित थी। लेकिन एचएएल चीफ रवि कोटा ने वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह से मुलाकात कर कुछ वक्त मांगा था।

इस बैठक में एचएएल और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों को नई दिल्ली में मिलकर तेजस मार्क-1ए कार्यक्रम की प्रगति की समीक्षा करनी थी। साथ ही यह भी तय किया जाना था कि विमान को वायुसेना में शामिल करने से पहले जिन अनिवार्य तकनीकी और ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना है, उनकी स्थिति क्या है और विमानों की डिलीवरी का नया कार्यक्रम क्या होगा।

सूत्रों के मुताबिक, समीक्षा बैठक तभी हो सकती है जब एचएएल वायुसेना को यह बताए कि लंबित तकनीकी समस्याओं को दूर करने में कितनी प्रगति हुई है। लेकिन अभी तक इस संबंध में पूरी जानकारी वायुसेना को नहीं दी गई है।

वायुसेना ने विमान को सेवा में शामिल करने के लिए कुछ जरूरी शर्तें तय की हैं। इनमें मिसाइल परीक्षणों का पूरा होना, एईएसए रडार को इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के साथ सफलतापूर्वक जोड़ना और विमान के सभी हथियारों की क्षमता का पूर्ण परीक्षण शामिल है। वायुसेना ने कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी कुछ शर्तों में पहले ही छूट दी हुई है। यदि सभी अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं तो पहला विमान जल्द से जल्द स्वीकार कर लिया जाएगा। (HAL Tejas Mk1A Delay)

वायुसेना क्यों है चिंतित?

भारतीय वायुसेना इस कार्यक्रम पर विशेष नजर रख रही है क्योंकि उसके लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या पहले से दबाव में है। पुराने मिग-21 जैसे विमान सेवा से बाहर हो चुके हैं। वहीं कई अन्य पुराने प्लेटफॉर्म भी धीरे-धीरे रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे हैं।

ऐसे में तेजस एमके-1ए को वायुसेना के भविष्य की रीढ़ माना जा रहा है। वायुसेना पहले ही 83 विमानों का ऑर्डर दे चुकी है। इसके अलावा 97 और तेजस एमके-1ए विमानों की मांग भी की जा चुकी है।

इस तरह कुल 180 विमानों का संभावित कार्यक्रम भारतीय सैन्य विमानन इतिहास की सबसे बड़ी स्वदेशी परियोजनाओं में शामिल हो चुका है।

वायुसेना के पास वर्तमान में केवल 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42.5 स्क्वाड्रन है। ऐसे में तेजस मार्क-1ए की समय पर डिलीवरी वायुसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

क्या कुछ शर्तों के साथ विमान स्वीकार कर सकती है वायुसेना?

सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना इस बात पर भी विचार कर रही है कि यदि विमान बुनियादी रूप से लड़ाकू भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं, तो कुछ क्षमताओं को बाद में जोड़ने की अनुमति दी जा सकती है।

इसका मतलब यह नहीं होगा कि स्टैंडर्ड्स में कमी की जाएगी, बल्कि कुछ गैर-आवश्यक सुधारों को बाद के चरण में शामिल किया जा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला तकनीकी मूल्यांकन और समीक्षा बैठकों के बाद ही लिया जाएगा।

वायुसेना की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि जो विमान शामिल किए जाएं वे सुरक्षित, विश्वसनीय और युद्धक भूमिका निभाने में सक्षम हों। (HAL Tejas Mk1A Delay)

रक्षा मंत्रालय अब क्यों सख्त हुआ?

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि किसी भी बड़े रक्षा कॉन्ट्रैक्ट में समय सीमा का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालांकि मंत्रालय इंजन आपूर्ति में आई बाहरी बाधाओं से भी अवगत है, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार अंतिम जिम्मेदारी मुख्य निर्माता की होती है।

यही कारण है कि देरी के लिए आर्थिक दंड लगाने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि समीक्षा बैठकों के बाद यह तय किया जाएगा कि दंड लगाया जाए या नहीं और यदि लगाया जाए तो उसका स्वरूप क्या होगा।

फरवरी 2026 में एचएएल ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि तेजस मार्क-1ए के पांच विमान डिलीवरी के लिए तैयार हैं। कंपनी का दावा था कि इन विमानों में कॉन्ट्रैक्ट के तहत तय की गई प्रमुख क्षमताएं शामिल कर दी गई हैं। हालांकि रक्षा सूत्रों का कहना है कि भले ही इन विमानों में कई महत्वपूर्ण प्रणालियां लग चुकी हैं, लेकिन अभी सभी क्षमताओं को अंतिम सर्टिफिकेशन नहीं मिला है और कुछ जरूरी मंजूरियां अभी बाकी हैं।

एचएएल ने पिछले साल अक्टूबर में नासिक में हुए विमान की पहली उड़ान के दौरान मार्च 2026 तक डिलीवरी शुरू करने का लक्ष्य बताया था। इससे पहले कंपनी ने कहा था कि पहले दो विमान अक्टूबर तक वायुसेना को सौंप दिए जाएंगे, लेकिन यह टारगेट पूरा नहीं हो सका। (HAL Tejas Mk1A Delay)

परमाणु हमले में भी काम करेगा भारत का फ्यूचरिस्टिक टैंक! FRCV में होगी बेहद खास ‘न्यूक्लियर शील्ड’

FRCV CBRN Protection System
Image for reference only. AI-Generated Image

FRCV CBRN Protection System: भारतीय सेना के लिए अगली पीढ़ी का अत्याधुनिक टैंक तैयार करने की दिशा में तैयारियां तेज हो गई हैं। सेना के महत्वाकांक्षी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) प्रोग्राम के तहत अब ऐसे सिस्टम डेवलप किए जा रहे हैं जो टैंक को सिर्फ दुश्मन की गोलाबारी से ही नहीं, बल्कि रासायनिक, जैविक, रेडियोधर्मी और परमाणु हमलों से भी बचाएंगे। सेना के एफआरसीवी प्रोग्राम के तहत बनाए जा रहे नए मेन बैटल टैंक के लिए एक अत्याधुनिक सीबीआरएन प्रोटेक्शन सिस्टम तैयार किया जाएगा। जो भविष्य के बैटलफील्ड में टैंक और उसके क्रू को सबसे खतरनाक खतरों से बचाने का काम करेगा।

क्या है FRCV CBRN Protection System?

आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (एवीएनएल) ने एक महत्वपूर्ण एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। जिसमें भारतीय सेना के प्रस्तावित प्रोजेक्ट रणजीत के तहत बन रहे फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) के लिए अत्याधुनिक सीबीआरएन प्रोटेक्शन सिस्टम बनाया जाएगा।

सीबीआरएन का मतलब है केमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर। युद्ध के दौरान दुश्मन जहरीली गैसों, जैविक एजेंट्स, रेडियोधर्मी पदार्थों या परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे हालात में सबसे बड़ी चुनौती सैनिकों की सुरक्षा होती है। यदि कोई टैंक इन खतरों से सुरक्षित नहीं है, तो उसके अंदर मौजूद चालक दल कुछ ही मिनटों में इससे प्रभावित हो सकता है। जहरीली गैसें सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकती हैं, रेडियोधर्मी कण लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकते हैं और जैविक एजेंट गंभीर बीमारियां फैला सकते हैं।

भारतीय सेना चाहती है कि उसका भविष्य का मुख्य युद्धक टैंक ऐसे माहौल में भी काम करता रहे, जहां सामान्य मिलिट्री प्लेटफॉर्म काम करने में असमर्थ हो जाएं।

क्या होगा एफआरसीवी?

एफआरसीवी यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का मुख्य युद्धक टैंक होगा। यह वही टैंक है जिसे भविष्य में टी-72 अजेया बेड़े का उत्तराधिकारी माना जा रहा है। लगभग 55 टन वजन वाले इस टैंक में आधुनिक कवच, एडवांस सेंसर, डिजिटल नेटवर्किंग, बेहतर मारक क्षमता और हाई मोबिलिटी जैसी खूबियां होंगी।

एफआरसीवी प्रोजेक्ट भारतीय सेना के सबसे बड़े आर्मर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम्स में शामिल है। सेना आने वाले सालों में सैकड़ों पुराने टी-72 टैंकों को बदलना चाहती है। ऐसे में इस नए प्लेटफॉर्म की सुरक्षा क्षमता भी विश्वस्तरीय रखने पर जोर दिया जा रहा है।

परमाणु विस्फोट के बाद भी काम करेगा सिस्टम

एवीएनएल की तरफ से जारी तकनीकी जरूरतों के मुताबिक यह सिस्टम दो प्रमुख मोड में काम करेग।

पहला एंटी-एटॉमिक मोड होगा। यदि किसी क्षेत्र में परमाणु विस्फोट होता है और उससे पैदा होने वाला प्रारंभिक रेडिएशन टैंक के सेंसर पकड़ लेते हैं, तो यह सिस्टम अपने आप एक्टिव हो जाएगा।

दूसरा मोड सीबीआर और फॉलआउट मोड होगा। इसमें जहरीली गैस, रेडियोधर्मी प्रदूषण या अन्य खतरनाक तत्वों की पहचान होते ही प्रोटेक्शन सिस्टम टैंक के अंदर का वातावरण सुरक्षित करना शुरू कर देगा।

इस पूरी प्रक्रिया में चालक दल को किसी प्रकार की मैन्युअल कार्रवाई करने की जरूरत नहीं होगी। सिस्टम ऑटोमैटिकली ही खतरे को पहचानकर रेस्पॉन्स देगा। (FRCV CBRN Protection System)

कौन-कौन सी जहरीली गैसों का पता लगाएगा सिस्टम?

एवीएनएल ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम कई प्रकार के रासायनिक युद्धक एजेंटों की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए।

इनमें सारिन, सोमन, टैबुन और वीएक्स जैसे घातक नर्व एजेंट शामिल हैं। ये एजेंट मानव तंत्रिका तंत्र को कुछ ही मिनटों में निष्क्रिय कर सकते हैं।

इसके अलावा सल्फर मस्टर्ड और लुईसाइट जैसे ब्लिस्टर एजेंट भी पहचानने की क्षमता जरूरी होगी। ये त्वचा और रेस्पिरेटरी सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।

हाइड्रोजन साइनाइड जैसे ब्लड एजेंट और फॉस्जीन जैसी चोकिंग गैसों का पता लगाना भी इस सिस्टम की जिम्मेदारी होगी।

सूत्रों के मुताबिक यह क्षमता मॉडर्न बेटलफील्ड में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि कई कैमिकल एजेंट रंग और गंध रहित होते हैं। (FRCV CBRN Protection System)

फॉल्स अलार्म से बचाने की भी तैयारी

युद्धक्षेत्र में अक्सर धुआं, ईंधन की गंध और इंजन से निकलने वाली गैसें मौजूद रहती हैं। यदि प्रोटेक्शन सिस्टम हर बार इन्हें खतरा मानकर अलार्म बजाने लगे तो सैनिकों के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा।

इसी वजह से एवीएनएल ने शर्त रखी है कि डीजल, पेट्रोल, केरोसिन, वाहन के धुएं, जलते टायरों के धुएं और डी-कंटैमिनेशन केमिकल्स के चलते सिस्टम झूठा अलार्म नहीं देगा। इससे वास्तविक खतरे की स्थिति में ही चेतावनी जारी होगी। (FRCV CBRN Protection System)

गैसों से कैसे सुरक्षित रहेगा टैंक के अंदर का सिस्टम?

इस सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका फिल्ट्रेशन और ओवरप्रेशर सिस्टम होगा। जब कोई रासायनिक या जैविक खतरा सामने आएगा तो विशेष फिल्टर हवा को साफ करेंगे। इन फिल्टरों में एचईपीए तकनीक और एक्टिवेटेड कार्बन आधारित फिल्ट्रेशन का उपयोग किया जाएगा।

इसके साथ ब्लोअर सिस्टम टैंक के अंदर सकारात्मक दबाव बनाए रखेगा। इसका फायदा यह होगा कि बाहर की दूषित हवा अंदर प्रवेश नहीं कर पाएगी।

सरल शब्दों में कहें तो टैंक के भीतर एक सुरक्षित ‘बंद वातावरण’ तैयार हो जाएगा, जहां चालक दल बिना गैस मास्क पहने भी काम कर सकेगा। (FRCV CBRN Protection System)

छह घंटे तक दूषित इलाके में ऑपरेशन

यह सिस्टम कम से कम छह घंटे तक लगातार काम करने में सक्षम होना चाहिए। यदि कोई क्षेत्र रासायनिक, जैविक या रेडियोधर्मी प्रदूषण से प्रभावित है, तब भी एफआरसीवी टैंक वहां लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकेगा।

साथ ही यह सिस्टम दस सेकंड से कम समय में रेस्पॉन्स देने में सक्षम होगा। (FRCV CBRN Protection System)

रेडिएशन का तुरंत पता लगाएंगे सेंसर

नई सिस्टम में रेडिएशन सेंसर भी लगाए जाएंगे। ये सेंसर बहुत कम स्तर से लेकर अत्यधिक खतरनाक स्तर तक के रेडिएशन को पहचान सकेंगे। जैसे ही रेडिएशन तय सीमा से ऊपर जाएगा, चालक दल को तुरंत चेतावनी मिल जाएगी।

सिस्टम की रेस्पॉन्स टाइम भी बेहद कम रखा गया है ताकि सैनिकों को खतरे की सूचना तुरंत मिल सके।

इसके साथ ऑडियो और विजुअल अलर्ट की व्यवस्था होगी। यानी चालक दल को आवाज और डिस्प्ले दोनों माध्यमों से खतरे की जानकारी मिलेगी।

एफआरसीवी के लिए प्रस्तावित सीबीआरएन सिस्टम केवल सेंसर और फिल्टर तक सीमित नहीं होगा। इसमें बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट भी होगा जो लगातार सिस्टम की स्थिति पर नजर रखेगा। यदि किसी हिस्से में खराबी आती है तो उसका पता तुरंत चल जाएगा।

सिस्टम पिछले 100 घटनाक्रमों का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रख सकेगा। जरूरत पड़ने पर यह डेटा विश्लेषण के लिए निकाला जा सकेगा। रिमोट हेल्थ मॉनिटरिंग, फॉल्ट लॉगिंग और डिजिटल डायग्नोस्टिक्स जैसी सुविधाएं भी इसमें शामिल होंगी। (FRCV CBRN Protection System)

रेगिस्तान से लेकर हाई एल्टीट्यूड तक काम करेगा

भारतीय सेना की जरूरतों को देखते हुए इस सिस्टम को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने लायक बनाया जा रहा है। इसे माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 55 डिग्री सेल्सियस तापमान तक प्रभावी रहना होगा।
यानी लद्दाख की कड़ाके की ठंड हो या राजस्थान का तपता रेगिस्तान, दोनों जगह यह समान रूप से काम करेगा।
इसके अलावा पांच मीटर से अधिक गहरे पानी में टैंक की फोर्डिंग क्षमता भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

इस प्रोजेक्ट की एक और खास बात इसका स्वदेशीकरण है।

एवीएनएल ने इसे बाय इंडियन-आईडीडीएम कैटेगरी के तहत जारी किया है। जिसका मतलब है कि डिजाइन और विकास का बड़ा हिस्सा भारत में होना चाहिए। प्रोटोटाइप स्तर पर 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री अनिवार्य होगी, जबकि सीरियल प्रोडक्शन के अंतिम चरण में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए। इससे देश के रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में विदेशी निर्भरता कम होगी।

590 टैंकों के लिए बन सकता है सिस्टम

एवीएनएल ने कहा है कि शुरुआती चरण में तीन प्रोटोटाइप डेवलप किए जाएंगे। इसके बाद एफआरसीवी प्रोजेक्ट आगे बढ़ने पर लगभग 590 सीबीआरएन सिस्टम की जरूरत पड़ सकती है। कंपनियों को डिजाइन, डेवलपमेंट, ट्रायल, इंटीग्रेशन और तकनीकी दस्तावेज तैयार करने होंगे। बाद में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी एवीएनएल को किया जाएगा। (FRCV CBRN Protection System)

सेना की नई जरूरतों के मुताबिक तैयार हो रहा सुरक्षा कवच

सूत्रों का कहना है कि बैटलफील्ड लगातार बदल रहा है और नए खतरे सामने आ रहे हैं। इसी वजह से एफआरसीवी के लिए डेवलप किया जा रहा सीबीआरएन सिस्टम टैंक के चालक दल, उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पूरे प्लेटफॉर्म को ऐसे खतरों से सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह सिस्टम खतरे की पहचान, चेतावनी, फिल्ट्रेशन, प्रेशर कंट्रोल और डिजिटल सर्विलांस जैसे कई काम एक साथ करेगी। यही वजह है कि भारतीय सेना के भविष्य के मुख्य युद्धक टैंक के लिए इस प्रोजेक्ट को सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है। (FRCV CBRN Protection System)

T-72 और T-90 टैंकों के दौर में आज भी भारतीय सेना के साथ है 1971 का हीरो T-55, आखिर क्यों खास है यह पुराना टैंक?

T-55 Tank Indian Army
Image Source: Vajra Corps Indian Army

T-55 Tank Indian Army: हाल ही में भारतीय सेना की वज्र कोर ने एक तस्वीर जारी की। तस्वीर में सैनिकों के पीछे तीन टैंक दिखाई दे रहे हैं। पहली नजर में यह आम मिलिट्री फोटोग्राफ लग सकता है, लेकिन खास बात यह है कि दशकों पुराने टी-55 टैंक आज भी सेना के साथ क्यों नजर आ रहे हैं।

भारतीय सेना ने सालों पहले टी-55 को अपनी फॉरवर्ड कॉम्बैट रोल से हटा दिया था। इसके बाद टी-72 अजेय और टी-90 भीष्म जैसे आधुनिक टैंकों ने उनकी जगह ले ली। इसके बावजूद कुछ स्थानों पर टी-55 आज भी दिखाई देते हैं।

T-55 Tank Indian Army: पुराना सोवियत डिजाइन

तस्वीर में पीछे दिखाई दे रहे टैंकों की गोलाकार टरेट, पांच बड़े रोड व्हील, लंबी मुख्य तोप और पुराना सोवियत डिजाइन साफ संकेत देता है कि ये टी-55 टैंक हैं।

टी-72 और टी-90 की तुलना में टी-55 का डिजाइन काफी अलग दिखाई देता है। इसका वजन मात्र 36 टन था और इसकी टरेट ज्यादा गोल होती है और इसमें मॉडर्न एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर या एडवांस सेंसर सिस्टम नजर नहीं आते। यही वजह है कि इन टैंकों की पहचान आसानी से हो जाती है।

भारत ने लगभग रूस, चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड से लगभग 1800 टी-54/टी-55 खरीदे थे, जिन्हें साल 1964 से लेकर 1971 तक कई चरणों में खरीदा गया था। (T-55 Tank Indian Army)

टी-55 ने 1971 की जंग में दिखाया था जलवा

टी-55 टैंक कोल्ड वॉर के दौर का सबसे सफल टैंक माना जाता है। 1950-60 के दशक में सोवियत संघ ने इसे बनाया था और दुनिया के कई देशों ने इसका इस्तेमाल किया।

भारत ने भी बड़ी संख्या में टी-55 टैंक खरीदे थे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इन टैंकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस युद्ध में भारतीय टी-55 ने पाकिस्तानी टैंकों एम-24 शाफी, चीनी टी-59 एम-47/एम-48 पैटन को भारी नुकसान पहुंचाया था। गरिबपुर, नैनाकोट, बसंतर जैसे युद्धों में टी-55 ने दुश्मन की लाइनों को तोड़ा था और 58 से ज्यादा पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए थे।

ये टैंक भारतीय सेना के मुख्य युद्ध टैंक थे और पश्चिमी मोर्चे (पंजाब-राजस्थान) पर निर्णायक भूमिका निभाई। खास बात यह थी कि इन टैंकों में इंफ्रारेड नाइट विजन लगा था, जिसका पाकिस्तान के पास कोई जवाब नहीं था, जिसके चलते रात के युद्ध में कई पाकिस्तानी टैंक “सिटिंग डक्स” की तरह नष्ट हुए।

खास बात यह थी कि चीन ने टी-55 का चीनी वर्जन टी-59 तैयार किया था। जो दिखने में टी-55 जैसा था। भारतीय सेना के लिए उन्हें पहचानना बड़ा चैलेंज था। जिसके लिए भारतीय सेना ने अपने टैंकों पर फेक बोर इवैक्यूएटर लगाए थे ताकि पाकिस्तानी टी-59 से अलग पहचाना जा सके।

उस समय टी-55 भारतीय आर्मर कोर की रीढ़ माना जाता था। उस दौर में इसकी मारक क्षमता, विश्वसनीयता और आसान रखरखाव ने इसे सेना के लिए बेहद उपयोगी बना दिया था। (T-55 Tank Indian Army)

एके-47 की तरह था टी-55

अक्सर इसकी तुलना एके-47 राइफल से की जाती है, क्योंकि यह कठिन मौसम, रेगिस्तान और धूल भरे इलाकों में भी आसानी से काम करता था। रखरखाव की जरूरत कम होने के कारण भारतीय सेना ने इसे चार दशकों से अधिक समय तक सेवा में रखा।

टी-55 की एक और बड़ी विशेषता इसकी मोबिलिटी थी। इसमें 580 हॉर्सपावर का वी-55 इंजन लगाया गया था, जिसकी मदद से यह सड़क पर लगभग 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता था। स्नॉर्कल सिस्टम की मदद से यह गहरे पानी वाले हिस्सों को भी पार कर सकता था। राजस्थान और पंजाब के रेतीले क्षेत्रों में इसकी प्रदर्शन क्षमता ने इसे भारतीय सेना के लिए एक भरोसेमंद प्लेटफॉर्म बना दिया।

टी-55 की पहचान उसकी 100 मिमी डी-10टी राइफल्ड गन से भी जुड़ी रही है। यह उस दौर के लिए बेहद प्रभावी हथियार माना जाता था। टैंक में 43 राउंड तक गोला-बारूद ले जाने की क्षमता थी और इसका फायरिंग रेट भी अच्छा थी। प्रोजेक्ट गुलमोहर के तहत इसी प्लेटफॉर्म पर 105 मिमी एल-7ए1 गन लगाई गई, जिससे इसकी मारक क्षमता और बढ़ गई।

मूल टी-55 टैंक की प्रभावी मारक दूरी लगभग 1,500 मीटर मानी जाती थी, जबकि अधिकतम टारगेटेड दूरी 2 से 2.5 किलोमीटर तक पहुंच सकती थी। वहीं, गुलमोहर अपग्रेड के बाद नई 105 मिमी गन और आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम के कारण इसकी प्रभावी दूरी 2 से 3 किलोमीटर तक पहुंच गई।

टी-55 का एक बड़ा फायद इसका छोटाा साइज था। लगभग 2.4 मीटर ऊंचाई और 36 टन वजन वाले इस टैंक का सिल्हूट अपेक्षाकृत छोटा था। युद्धक्षेत्र में इसका मतलब यह था कि दुश्मन के लिए इसे पहचानना और निशाना बनाना कठिन हो जाता था। कम ऊंचाई के कारण यह प्राकृतिक आवरण का बेहतर उपयोग कर सकता था।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि टी-55 दुनिया के शुरुआती टैंकों में शामिल था, जिसमें परमाणु, जैविक और रासायनिक हमलों से सुरक्षा देने वाली एनबीसी सिस्टम लगाया गया था। यही वजह थी कि कठिन युद्ध परिस्थितियों में भी चालक दल की सुरक्षा बेहतर बनी रहती थी। (T-55 Tank Indian Army)

T-55 Tank Indian Army
T-55 Tank

समय के साथ क्यों कम हो गई उपयोगिता?

तकनीक के तेजी से विकास के साथ टैंकों की भूमिका भी बदलती गई। नए बैटलफील्ड में बेहतर सुरक्षा, अधिक मारक क्षमता, डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक सेंसर की जरूरत बढ़ गई। आधुनिक युद्ध में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, थर्मल साइट्स, लंबी रेंज जैसे फीचर नहीं थे। जिसके चलते यह पूरी तरह आउटक्लास हो चुका था।

टी-55 की मूल 100 मिमी तोप और पुरानी फायर कंट्रोल तकनीक आधुनिक टैंकों की तुलना में कमजोर पड़ने लगी। इसके अलावा इसकी सुरक्षा भी नए एंटी-टैंक हथियारों के सामने सीमित मानी जाने लगी।

इसी वजह से भारतीय सेना ने धीरे-धीरे टी-72 अजेय और बाद में टी-90 भीष्म टैंकों को अपनाया। (T-55 Tank Indian Army)

प्रोजेक्ट गुलमोहर से मिली नई जिंदगी

टी-55 को पूरी तरह हटाने से पहले भारतीय सेना ने उसे आधुनिक बनाने का फैसला किया। इसी उद्देश्य से प्रोजेक्ट गुलमोहर शुरू किया गया। इसमें पौलेंड से तकनीकी मदद ली गई। पुणे के खडकी स्थित 512 आर्मी बेस वर्कशॉप में इस ओवरहॉल को अंजाम दिया गया।

प्रोजेक्ट गुलमोहर 1987 में लॉन्च किया गया। इसका मकसद टी-55 टैंकों की सेवा अवधि 15-20 साल बढ़ाना और उनकी युद्धक क्षमता में सुधार करना था। क्योंकि नए टैंक खरीदना महंगा था, जिनकी कीमत लगभग 1800 करोड़ रुपये थी, जबकि अपग्रेड करना सस्ता और प्रभावी था।

इस प्रोजेक्ट पर कुल लगभग 232 करोड़ रुपये खर्च किए गए। दिलचस्प बात यह रही कि प्रति टैंक ओवरहॉल की लागत लगभग 10 लाख रुपये के आसपास रही, जो नए टैंक खरीदने की तुलना में काफी कम थी। शुरुआत में करीब 800 टैंकों के आधुनिकीकरण का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन परियोजना की सफलता के बाद यह संख्या बढ़ती चली गई। वर्ष 1998 तक 900 से अधिक टी-55 टैंकों का ओवरहॉल और अपग्रेड पूरा किया जा चुका था। इसके बाद 2001 तक यह आंकड़ा 1,000 से भी अधिक टैंकों तक पहुंच गया।

इस प्रोजेक्ट के तहत टैंकों को पूरी तरह खोलकर दोबारा तैयार किया गया। कई महत्वपूर्ण हिस्सों को बदला गया और नई तकनीक जोड़ी गई।

गुलमोहर कार्यक्रम के दौरान सबसे बड़ा बदलाव मुख्य हथियार में किया गया। पुराने 100 मिमी गन सिस्टम की जगह अधिक प्रभावी 105 मिमी गन लगाई गई।

इसके साथ आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल बैलिस्टिक कंप्यूटर और बेहतर टारगेट साधने वाले उपकरण भी लगाए गए।

कुछ टैंकों में नाइट विजन और थर्मल इमेजिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गईं ताकि रात में भी उनका इस्तेमाल किया जा सके। साथ ही, इंजन, ट्रांसमिशन और अन्य मैकेनिकल सिस्टम की भी व्यापक मरम्मत की गई। (T-55 Tank Indian Army)

सेना ने कब हटाया टी-55 को?

हालांकि समय के साथ सेना का ध्यान अधिक आधुनिक टी-72 और टी-90 टैंकों की ओर बढ़ने लगा। साल 2001 में भारतीय सेना ने फैसला किया कि आने वाले सालों में टी-55 बेड़े को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उसकी जगह टी-72एम1 अजेया टैंकों को दिया जाएगा। इसके बावजूद प्रोजेक्ट गुलमोहर के तहत ओवरहॉल और रखरखाव का काम जारी रहा और 2008 में अंतिम टी-55 टैंक का ओवरहॉल पूरा किया गया।

इसके बाद अगले कुछ वर्षों में टी-55 की सक्रिय तैनाती समाप्त हो गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार साल 2006 में भारतीय सेना के पास लगभग 715 अपग्रेडेड टी-55 टैंक सर्विस में थे, जबकि 67 टैंक रिजर्व स्टोरेज में रखे गए थे। संख्या कम होने की वजह यह थी कि प्रोजेक्ट के दौरान 900 से अधिक टैंकों का आधुनिकीकरण जरूर किया गया था, लेकिन कई पुराने और तकनीकी रूप से खराब हो चुके टैंक समय के साथ सेवा से बाहर कर दिए गए थे।

टी-55 को सक्रिय युद्धक भूमिका से हटाने की प्रक्रिया 24 फरवरी 2009 से शुरू हुई। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इन्हें यूनिटों से बाहर किया गया और मई 2011 तक टी-55 पूरी तरह सक्रिय सैन्य सेवा से हट चुका था।

2011 तक अधिकांश टी-55 टैंक रेगुलर आर्मर्र युनिट से बाहर हो चुके थे। (T-55 Tank Indian Army)

आज ये टैंक कहां हो रहे हैं इस्तेमाल?

हालांकि टी-55 अब फ्रंट लाइन का मुख्य बैटल टैंक नहीं हैं, लेकिन पूरी तरह गायब भी नहीं हुए हैं। कितने टैंक अभी मौजूद हैं इनकी कोई आधिकारिक लिस्ट उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन माना जा रहा है, जो टैंक रिजर्व रखे गए थे, ये उनमें से ही कुछ टैंक हैं।

सूत्रों ने बताया कि इनका इस्तेमाल कई तरह की सैन्य गतिविधियों में किया जाता है। कुछ टैंक ट्रेनिंग सेंटर्स में सैनिकों को बख्तरबंद युद्ध की बुनियादी जानकारी देने के लिए रखे गए हैं।

सूत्रों ने बताया कि 2024 में पैंथर डिवीजन (वेस्टर्न कमांड) के इंटीग्रेटेड कॉम्बैट ट्रेनिंग एक्सरसाइज में टी-55 इस्तेमाल हुए थे। वहीं, कुछ टैंक अभी भी ट्रेनिंग, ड्राइवर ट्रेनिंग या सपोर्ट वाहन के रूप में रखे गए हैं।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जगहों पर इन्हें स्टैटिक डिफेंस स्ट्रक्चर या एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए 2017 के बाद एलओसी के कुछ संवेदनशील इलाकों में टी-55 टैंकों को स्टैटिक डिफेंस प्लेटफॉर्म के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। इन टैंकों को बंकर और पिलबॉक्स जैसे स्ट्रक्चर में बदल दिया गया, ताकि उनकी 105 मिमी गन का इस्तेमाल फायर सपोर्ट देने के लिए किया जा सके। कई टैंक तकनीकी प्रशिक्षण और रखरखाव से जुड़े पाठ्यक्रमों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं, कुछ टी-55 संग्रहालयों और सैन्य स्मारकों का हिस्सा भी बन चुके हैं। (T-55 Tank Indian Army)

जोरावर टैंक के नए अवतार में दिखे कई बदलाव, क्या सेना को मिलने वाला है और ज्यादा ताकतवर प्लेटफॉर्म?

Zorawar Tank Upgrades
Image Source: PMO Tweet

Zorawar Tank Upgrades: भारतीय सेना के लिए बनाए जा रहे स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक में कई बदलाव किए गए हैं। हाल ही में गुजरात के हजीरा स्थित एलएंडटी प्लांट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोरावर टैंक का निरीक्षण किया। इस दौरान सामने आईं तस्वीरों की तुलना यदि 2024 और 2025 के शुरुआती प्रोटोटाइप से की जाए, तो कई महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि डेवलपमेंट और ट्रायल्स के दौरान सामने आईं खामियों को दूर किया जा रहा है और जोरावर टैंक को 2028-29 के दौरान सेना में शामिल किए जाने की संभावना है।

Zorawar Tank Upgrades: 2020 में गलवान के बाद पड़ी जोरावर प्रोजेक्ट की नींव

पूर्वी लद्दाख में 2020 के बाद भारत और चीन के बीच बढ़े सैन्य तनाव ने भारतीय सेना को एक ऐसे हल्के लेकिन ताकतवर टैंक की जरूरत का अहसास कराया, जो ऊंचे पहाड़ी इलाकों में आसानी से काम कर सके।

भारतीय सेना के पास मौजूद टी-72 और टी-90 टैंक रेगिस्तान और मैदानी इलाकों के लिए डिजाइन किए गए थे। इन्हें लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात तो किया गया, लेकिन वहां के हालात में उनकी कुछ सीमाएं भी सामने आईं।

इसी जरूरत को देखते हुए डीआरडीओ और एलएंडटी ने मिलकर प्रोजेक्ट जोरावर शुरू किया। लगभग 25 टन वजनी यह टैंक खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों के लिए डेवलप किया जा रहा है। (Zorawar Tank Upgrades)

Zorawar Tank Upgrades
Image Source: DRDO

नई तस्वीरों में सबसे बड़ा बदलाव आर्मर का

पुराने और नए प्रोटोटाइप की तस्वीरों की तुलना करने पर सबसे बड़ा अंतर टैंक के सामने वाले हिस्से में दिखाई देता है।

पहले प्रोटोटाइप में फ्रंट प्लेट अपेक्षाकृत पतली नजर आती थी। वहीं नई तस्वीरों में सामने की आर्मर प्लेटें कहीं अधिक मोटी और कई परतों वाली दिखाई दे रही हैं। सूत्रों का कहना है कि यह बदलाव परीक्षणों से मिले अनुभवों के बाद किया गया हो सकता है।

हालांकि आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन तस्वीरों में लोअर फ्रंट प्लेट पर लगी अतिरिक्त लेयर्स साफ दिखाई दे रही हैं। ऐसा टैंक की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए किया गया है।

सूत्रों का कहना है कि जोरावर को 30 मिमी एपीएफएसडीएस गोले जैसे खतरों से बचाने के लिए नाटो लेवल (STANAG लेवल 4) का सिक्योरिटी लेवल देने की कोशिश की जा रही है। यदि ऐसा है तो यह हल्के टैंक की कैटेगरी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी। (Zorawar Tank Upgrades)

Zorawar Tank Upgrades
Image Source: DRDO

पहली बार दिखा फ्यूल पोर्ट आर्मर

नई तस्वीरों में एक और महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिया है। टैंक के फ्यूल पोर्ट के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा कवच नजर आ रहा है।

पुराने प्रोटोटाइप में यह हिस्सा खुला दिखाई देता था, लेकिन अब वहां अतिरिक्त आर्मर लगाया गया है। युद्ध के दौरान फ्यूल सिस्टम पर हमला किसी भी आर्मर्ड व्हीकल के लिए बड़ा खतरा होता है। ऐसे में इस हिस्से की सुरक्षा बढ़ाना व्यावहारिक सुधार माना जा रहा है। (Zorawar Tank Upgrades)

ट्रैक आर्मर में भी बदलाव

पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करने पर साफ दिखाई देता है कि टैंक के ट्रैक सेक्शन के ऊपर लगे साइड आर्मर में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। जोरावर टैंक के शुरुआती प्रोटोटाइप की तस्वीरों में ट्रैक के ऊपर लगे साइड स्कर्ट कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे हुए दिखाई देते थे। इन पर बोल्ट, जोड़ और अलग-अलग मॉड्यूल साफ नजर आते थे।

लेकिन नए प्रोटोटाइप में ट्रैक के ऊपर लगी आर्मर प्लेटें पहले की तुलना में अधिक बड़ी, मोटी और इंटीग्रेटेड दिखाई दे रही हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब अलग-अलग मॉड्यूल की जगह एक लंबी और प्लेन प्लेट दिखाई दे रही है। पहले जहां कई जोड़ और बोल्ट नजर आते थे, वहीं नए डिजाइन में पूरा हिस्सा अधिक साफ और मजबूत दिख रहा है।

किसी भी टैंक में ट्रैक, रोड व्हील्स और सस्पेंशन सिस्टम बेहद अहम होते हैं। यदि दुश्मन इन हिस्सों को नुकसान पहुंचा दे तो टैंक अपनी जगह पर रुक सकता है, चाहे उसकी मुख्य तोप और अन्य हथियार पूरी तरह काम कर रहे हों। इसी वजह से ट्रैक के ऊपर अतिरिक्त सुरक्षा कवच लगाया जाता है। इसे साइड स्कर्ट कहा जाता है। इसका काम छोटे हथियारों की गोलियों, छर्रों, रॉकेट चालित हथियारों और ड्रोन से होने वाले हमलों से सुरक्षा प्रदान करना होता है। (Zorawar Tank Upgrades)

कैमोफ्लाज पैटर्न में भी बदलाव

नई तस्वीरों में टैंक का रंग और कैमोफ्लाज पैटर्न भी अलग दिखाई दे रहा है। पुराने प्रोटोटाइप में अपेक्षाकृत हल्के रंगों का इस्तेमाल किया गया था। नई तस्वीरों में गहरे भूरे, हरे और टैन रंगों का कॉम्बिनेशन है। यह पैटर्न पहड़ी और रेगिस्तानी दोनों इलाकों के लिए बेहतर माना जाता है। बता दें कि कैमोफ्लाज केवल रंग भर नहीं होता, बल्कि यह थर्मल और विजुअल सिग्नेचर कम करने की रणनीति का हिस्सा भी होता है।

Zorawar Tank Upgrades
Image Source: DRDO

टरेट और सेंसर सिस्टम में दिखाई दिए सुधार

नई तस्वीरों में टरेट के ऊपर लगे सेंसर और ऑप्टिकल सिस्टम में कुछ बदलाव दिखाई दे रहा है। जोरावर में आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम, थर्मल साइट, लेजर रेंज फाइंडर और रिमोट वेपन स्टेशन जैसी क्षमताएं शामिल की गई हैं। नए प्रोटोटाइप वर्जन में इन सभी सिस्टम्स का इंटीग्रेशन पहले से बेहतर नजर आ रहा है। इससे क्रू को बैटलफील्ड की बेहतर जानकारी मिलती है और टारगेट पर तेजी से कार्रवाई की जा सकती है। (Zorawar Tank Upgrades)

हाई-एल्टीट्यूड युद्ध के लिए तैयार किया जा रहा प्लेटफॉर्म

जोरावर को भारतीय भूभाग की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है। यह एक हल्का, फुर्तीला और तकनीकी रूप से एडवांस आर्मर्ड प्लेटफॉर्म होगा, जिसे विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए तैयार किया जा रहा है।

लगभग 25 टन वजन वाला यह टैंक बड़े मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स के जरिए तेजी से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पहुंचाया जा सकता है। इसके अलावा यह ऊंचे इलाकों में तेजी से तैनाती के लिए भी उपयुक्त माना जा रहा है।

सेना के लिए यह क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहाड़ी इलाकों में समय पर भारी हथियार पहुंचाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

वहीं, जोरावर को केवल पहाड़ों के लिए नहीं बनाया जा रहा है। इस प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह पानी में भी लिमिटेड फ्लोट कर सकता। हाई एलीवेशन पर फायरिंग करने की क्षमता भी इसमें शामिल की गई है, जिससे यह जरूरत पड़ने पर सीमित आर्टिलरी भूमिका भी निभा सकता है। (Zorawar Tank Upgrades)

सेना को नए प्रोटोटाइप का है इंतजार

सेना को अभी तक यूजर ट्रायल्स के लिए दूसरा प्रोटोटाइप औपचारिक रूप से नहीं मिला है। जोरावर टैंक का पहला प्रोटोटाइप पहले ही हाई एल्टीट्यूड इलाके में तैनात किया जा चुका है, जहां इसके शुरुआती परीक्षण किए गए थे। हाई एल्टीट्यूड में तैनाती के दौरान कुछ तकनीकी कमियां सामने आईं, क्योंकि ऊंचाई पर मौसम, ऑक्सीजन की कमी और तापमान जैसे नए फैक्टर्स काम करते हैं। इसी वजह से जोरावर टैंक का दूसरा प्रोटोटाइप तैयार किया है। यह दूसरा प्रोटोटाइप गुजरात के हजीरा में बनाया गया है।

सूत्रों का कहना है कि इस साल विंटर में भारतीय सेना के यूजर ट्रायल्स शुरू होने की उम्मीद है। ये ट्रायल्स 12-18 महीने तक चल सकते हैं, जिसमें समर, विंटर, हाई-एल्टीट्यूड और विभिन्न टेरेंस में टैंक की परफॉर्मेंस टेस्ट की जाएगी। अगर यूजर ट्रायल्स सफल रहे, तो टैंक का इंडक्शन शुरू किया जा सकता है। (Zorawar Tank Upgrades)

354 टैंकों की जरूरत

भारतीय सेना ने ऐसे 354 लाइट टैंकों की आवश्यकता जताई है। मौजूदा योजना के अनुसार डीआरडीओ और एलएंडटी शुरुआती 59 टैंक उपलब्ध कराएंगे। बाकी टैंकों के लिए अलग प्रक्रिया अपनाई जाएगी, जिसमें अन्य कंपनियां भी भाग ले सकती हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट लगभग 17,500 करोड़ रुपये का है।

हाल ही में एक इंटरव्यू में जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा था कि मौजूदा समय-सीमा के अनुसार जोरावर को 2028-29 में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अपनी चुनौतियों के लिए भारतीय समाधान चाहिए, क्योंकि देश की भौगोलिक परिस्थितियां और सुरक्षा चुनौतियां अलग हैं।

सेना प्रमुख ने कहा कि भारत में पहाड़, रेगिस्तान, जंगल, मैदानी क्षेत्र, नदी क्षेत्र और लंबे विवादित सीमावर्ती इलाके हैं। ऐसे माहौल में सेना को पारंपरिक युद्ध से लेकर तकनीक आधारित आधुनिक युद्ध तक हर स्थिति के लिए तैयार रहना पड़ता है। (Zorawar Tank Upgrades)

सेना ला रही है खास ‘मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल’, पहाड़ों से रेगिस्तान तक केवल 20 सेकंड में दुश्मन पर बरसेगा कहर

Mortar Specialist Vehicle
Image for reference only. AI-Generated Image

Mortar Specialist Vehicle: भारतीय सेना अपनी फायरपावर और युद्धक क्षमता को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। रक्षा मंत्रालय ने पहली बार एक ऐसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है, जो पारंपरिक मोर्टार सिस्टम को पूरी तरह बदल सकता है। इस नए सिस्टम का नाम “मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल” (एमएसवी) है। इसका उद्देश्य बैटलग्राउंड में मोर्टार की मारक क्षमता, सटीकता और रेस्पॉन्स टाइम को बेहतर बनाना है।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह प्रोजेक्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर-2020 के तहत आगे बढ़ाया जाएगा। इसे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के अनुरूप विकसित करने की योजना बनाई गई है। सेना चाहती है कि भारतीय कंपनियां इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लें और देश में ही इसका निर्माण हो।

आखिर क्या है Mortar Specialist Vehicle?

भारतीय सेना की इन्फैंट्री बटालियनों में वर्तमान समय में 81 मिमी और 120 मिमी मोर्टार फायर सपोर्ट हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन मोर्टारों को चलाने की पूरी प्रक्रिया मैनुअल होती है। टारगेट की दिशा, दूरी और एंगल तय करने में सैनिकों की दक्षता पर काफी कुछ निर्भर करता है।

रक्षा मंत्रालय ने अपने डॉक्यूमेंट में माना है कि मानव गलतियों के चलते कई बार फायरिंग की सटीकता पर असर पड़ता है। इससे गोला-बारूद की खपत बढ़ जाती है और दुश्मन पर पहला जोरदार हमला करने का अवसर भी कम हो जाता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल का कॉन्सैप्ट लाया गया है।

एमएसवी एक व्हील्ड मिलिट्री व्हीकल होगा, जिस पर मोर्टार सिस्टम लगाया जाएगा। इसे केवल दो सैनिक ऑपरेट कर सकेंगे। मोर्टार फायर कंट्रोलर या ऑब्जर्वेशन पोस्ट से टारगेट की जानकारी मिलने के बाद यह सिस्टम आटोमैटिक कैल्कुलेशन करेगा और मोर्टार को सही दिशा में सेट कर देगा। इससे फायरिंग की रफ्तार और सटीकता दोनों बढ़ेंगी।

कम होगी मानवीय गलतियां

सेना के लिए इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मोर्टार ऑपरेशन में मानवीय हस्तक्षेप बहुत कम हो जाएगा। अभी किसी टारगेट पर फायर करने से पहले कई कैल्कुलेशंस करनी पड़ती हैं। युद्ध जैसे हालात में समय की कमी और दबाव के चलते गलती की संभावनाएं बनी रहती हैं।

नए सिस्टम में बैलिस्टिक कंप्यूटर, डिजिटल डेटा प्रोसेसिंग और ऑटोमैटिक लेइंग मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया जाएगा। टारगेट की जानकारी मिलने के बाद व्हीकल खुद मोर्टार की दिशा और ऊंचाई तय करेगा। इससे पहली ही फायरिंग में टारगेट को निशाना बनाने की संभावना बढ़ जाएगी। (Mortar Specialist Vehicle)

पहाड़ों से रेगिस्तान तक हर जगह तैनाती

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि एमएसवी को भारत की विविध भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाएगा। यह जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी काम करने में सक्षम होगा।

डॉक्यूमेंट के अनुसार व्हीकल को 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने योग्य होना चाहिए। इसके अलावा यह मैदानी क्षेत्रों, चट्टानी इलाकों, रेगिस्तान और बर्फ से ढके क्षेत्रों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा।

सेना ने यह भी तय किया है कि व्हीकल माइनस 25 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में बिना किसी बाधा के काम कर सके। (Mortar Specialist Vehicle)

Mortar Specialist Vehicle
Vehicle-mounted mortar systems for infantry use.

बेहद तेज और दमदार होगा व्हीकल

तकनीकी जरूरतों के अनुसार एमएसवी की अधिकतम रफ्तार राजमार्ग पर कम से कम 80 किलोमीटर प्रति घंटा और कच्ची सड़कों पर 40 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। व्हीकल को 12 सेकंड में शून्य से 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार हासिल करनी होगी।

इसकी ऑपरेशनल लिमिट भी काफी बड़ी रखी गई है। व्हीकल पूरी क्षमता के साथ राजमार्ग पर कम से कम 400 किलोमीटर और मुश्किल इलाकों में लगभग 250 किलोमीटर तक चल सकेगा।

डॉक्यूमेंट के अनुसार व्हीकल में प्रति टन कम से कम 30 हॉर्सपावर की शक्ति होनी चाहिए। यह 30 डिग्री तक की चढ़ाई चढ़ सकेगा और 17 डिग्री तक के ढलान पर संतुलन बनाए रख सकेगा।

दुश्मन के ड्रोन से भी सुरक्षा

यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि छोटे कामिकाजे ड्रोन भी मिलिट्री व्हीकलों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने एमएसवी में एंटी-ड्रोन कोप केज लगाने की भी मांग की है।

यह सिक्योरिटी स्ट्रक्चर व्हीकल को ऊपर से आने वाले ड्रोन हमलों से बचाने में मदद करेगी। जिसे आधुनिक युद्धक्षेत्र की नई जरूरत माना जा रहा है। (Mortar Specialist Vehicle)

मोर्टार तैनात करने में लगेगा सिर्फ कुछ सेकंड

एमएसवी की सबसे बड़ी विशेषता इसका फास्ट रेस्पॉन्स टाइम होगा। डॉक्यूमेंट के अनुसार मोर्टार को फायरिंग के लिए तैयार करने में 20 सेकंड से कम समय लगना चाहिए। टारगेट पर निशाना साधने में भी 20 सेकंड से कम समय लगेगा।

यदि फायरिंग के बाद दोबारा टारगेट बदलना हो तो सिस्टम पांच सेकंड के भीतर मोर्टार को नई दिशा में घुमा सकेगा। दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचने के लिए फायरिंग के बाद व्हीकल को तुरंत जगह बदलने की क्षमता भी दी जा रही है। इसके लिए 20 सेकंड से कम समय का मानक तय किया गया है।

81 मिमी और 120 मिमी दोनों मोर्टारों के साथ काम करेगा

सेना चाहती है कि यह प्लेटफॉर्म पूरी तरह मॉड्यूलर हो। एक ही व्हीकल पर 81 मिमी और 120 मिमी दोनों प्रकार के मोर्टार लगाए जा सकें। भविष्य में यदि बड़े कैलिबर के मोर्टारों की जरूरत पड़े तो उन्हें भी इसमें जोड़ा जा सके।

व्हीकल में लगभग 54 राउंड गोला-बारूद ले जाने की क्षमता रखने की भी योजना है। अलग-अलग प्रकार के हाई एक्सप्लोसिव, स्मोक और इल्यूमिनेशन राउंड के लिए विशेष स्टोरेज सिस्टम उपलब्ध होगा। (Mortar Specialist Vehicle)

हेलीकॉप्टर से भी ले जाया जा सकेगा

भारतीय सेना ने इस व्हीकल को अत्यधिक मोबाइल बनाने पर जोर दिया है। इसलिए इसे रेल के अलावा चिनूक सीएच-47 और एमआई-17 हेलीकॉप्टरों के जरिए भी ले जाने योग्य बनाने की मांग की गई है। डॉक्यूमेंट में इसे पैरा ड्रॉप योग्य बनाने का भी उल्लेख है। ताकि जरूरत पड़ने पर सेना इसे दूरदराज के इलाकों में हवाई मार्ग से भी तेजी से पहुंचा सके।

चालक दल की सुरक्षा पर विशेष ध्यान

एमएसवी में स्टैनैग लेवल-1 बैलिस्टिक सुरक्षा की मांग की गई है। व्हीकल में फायर डिटेक्शन सिस्टम, अग्निशमन उपकरण, फर्स्ट एड किट, रिकवरी सिस्टम और अन्य सुरक्षा सुविधाएं भी होंगी।

इसके अलावा रग्डाइज्ड मिलिट्री ग्रेड टचस्क्रीन बेस्ड व्हीकल इंफॉर्मेशन सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे ड्राइवर को व्हीकल की स्थिति और अन्य जरूरी जानकारियां मिलती रहेंगी। (Mortar Specialist Vehicle)

स्वदेशी कंपनियों के लिए बड़ा मौका

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया कार्यक्रमों के तहत आगे बढ़ेगी। कंपनियों को स्वदेशीकरण की विस्तृत योजना प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही महत्वपूर्ण तकनीकों को भारत में विकसित करने का रोडमैप भी बताना होगा।

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि कॉन्ट्रैक्ट मिलने के दो साल के भीतर व्हीकल की सप्लाई शुरू होनी चाहिए। कंपनियों को तकनीकी क्षमता, उत्पादन क्षमता, वित्तीय स्थिति और स्वदेशी सामग्री के स्तर की जानकारी भी देनी होगी।

सेना क्यों मान रही है इसे अहम परियोजना?

भारतीय सेना लंबे समय से फायर सपोर्ट सिस्टम को अधिक मोबाइल और प्रिसाइज बनाने पर काम कर रही है। आधुनिक युद्धों में दुश्मन की स्थिति का पता लगते ही तुरंत जवाब देना जरूरी होता है। ऐसे में पारंपरिक मोर्टारों की तुलना में एक ऑटोमेटेड प्लेटफॉर्म सैनिकों को बड़ा फायदा दे सकता है।

रक्षा मंत्रालय के डॉक्यूमेंट में भी कहा गया है कि मोर्टार स्पेशलिस्ट व्हीकल का उद्देश्य सटीकता बढ़ाना, प्रतिक्रिया समय कम करना और इन्फैंट्री यूनिट्स को अधिक प्रभावी फायर सपोर्ट उपलब्ध कराना है। यही वजह है कि सेना इसे अपनी युद्धक क्षमता में महत्वपूर्ण सुधार के तौर पर देख रही है। (Mortar Specialist Vehicle)

Explained: आर्मी चीफ ने जारी किया भारतीय सेना का मास्टर प्लान 2047! अगले 21 साल में ‘फ्यूचर रेडी फोर्स’ बनने की तैयारी

Indian Army Strategic Guidelines 2047 Explained
Image Source: ADGPI/X

Indian Army Strategic Guidelines 2047: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक ऐसा डॉक्यूमेंट जारी किया है, जिसे आने वाले दो दशकों के लिए सेना का रणनीतिक रोडमैप माना जा रहा है। इसका नाम है “इंडियन आर्मी स्ट्रैटेजिक गाइडलाइंस 2047″। इस डॉक्यूमेंट सैन्य सुधारों के साथ इस बात का भी जिक्र है कि 2047 तक भारतीय सेना किस तरह की सेना बनना चाहती है और बदलती दुनिया में अपनी भूमिका को कैसे देख रही है।

सूत्रों के मुताबिक यह डॉक्यूमेंट “डिफेंस फोर्सेज विजन 2047” के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य सेना को ऐसी ताकत में बदलना है जो भविष्य के युद्धों, नई तकनीकों और बदलते सुरक्षा माहौल का सामना करने में सक्षम हो।

Indian Army Strategic Guidelines 2047: क्यों पड़ी नए रणनीतिक डॉक्यूमेंट की जरूरत?

एडीजीपीआई के एक्स हेंडल पर जारी ट्वीट में कहा गया है, “भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने “इंडियन आर्मी स्ट्रैटेजिक गाइडलाइंस 2047” का अनावरण किया है। यह महत्वपूर्ण दस्तावेज “डिफेंस फोर्सेज विजन 2047” के स्ट्रक्चर पर आधारित है और भारतीय सेना को भविष्य के लिए तैयार फोर्स में बदलने की दिशा तय करता है।
यह दस्तावेज रणनीतिक सोच को स्पष्ट और क्रियान्वित किए जा सकने वाले प्रयासों में बदलता है, ताकि भारतीय सेना की क्षमताएं, संरचना और कार्रवाईयां “विकसित भारत 2047″ के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप आगे बढ़ सकें।”

पिछले कुछ सालों में तेजी से दुनिया के हालात बदले हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष, ड्रोन बेस्ड अटैक, साइबर अटैक और स्पेस बेस्ड सर्विलांस ने युद्ध का स्वरूप बदल दिया है।

आज किसी भी देश की सेना केवल टैंक, तोप और लड़ाकू विमानों के भरोसे नहीं रह सकती। मल्टी डोमेन ऑपरेशंस जैसे डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और अंतरिक्ष तकनीक भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी हैं।

भारतीय सेना का मानना है कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है। इसी सोच के तहत यह नया रोडमैप तैयार किया गया है।

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 का आर्मी स्पेशल एडिशन

मार्च 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 जारी किया था। उस डॉक्यूमेंट में तीनों सेनाओं के लिए व्यापक दिशा तय की गई थी।

इंडियन आर्मी स्ट्रैटेजिक गाइडलाइंस 2047 उसी विजन का आर्मी स्पेशल एडिशन है। यह नया डॉक्यूमेंट बताता है कि भारतीय सेना उस लक्ष्य तक कैसे पहुंचेगी।

इसमें क्षमता निर्माण, आधुनिकीकरण, संगठनात्मक बदलाव, तकनीकी विकास और युद्ध तैयारी जैसे विषयों को विस्तार से शामिल किया गया है।

तीन चरणों में बदलेगी सेना

डॉक्यूमेंट के मुताबिक भारतीय सेना का परिवर्तन एक दिन में नहीं होगा। इसके लिए तीन बड़े चरण तय किए गए हैं।

पहला चरण 2032 तक चलेगा। इसे ट्रांसफॉर्मेशन का दशक कहा गया है। इस दौरान सेना के स्ट्रक्चर, हथियारों, तकनीक और ऑपरेटिंग सिस्टम में बड़े बदलाव किए जाएंगे।

दूसरा चरण 2037 तक का होगा। इसमें पहले चरण में किए गए सुधारों को मजबूत किया जाएगा और संयुक्त सैन्य क्षमता को और बेहतर बनाया जाएगा।

तीसरा चरण 2047 तक चलेगा। इसमें भारतीय सेना को पूरी तरह भविष्य के युद्धों के लिए तैयार बल के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।

क्या है मल्टी डोमेन ऑपरेशन?

इस डॉक्यूमेंट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मल्टी डोमेन ऑपरेशन की अवधारणा है।

पहले युद्ध मुख्य रूप से जमीन, समुद्र और हवा में लड़े जाते थे। अब साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, सूचना युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

मल्टी डोमेन ऑपरेशन का मतलब है कि सेना एक साथ कई क्षेत्रों में काम करेगी और सभी क्षेत्रों से मिलने वाली जानकारी का उपयोग करेगी।

उदाहरण के लिए यदि सीमा पर कोई गतिविधि होती है तो उपग्रह, ड्रोन, रडार, साइबर नेटवर्क और जमीनी सैनिक एक साथ काम करेंगे। इससे फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।

2026 को क्यों बनाया गया डेटा सेंट्रिसिटी का वर्ष?

भारतीय सेना ने 2026 को “ईयर ऑफ नेटवर्किंग एंड डेटा सेंट्रिसिटी” घोषित किया है। इसका मतलब है कि सेना अब डेटा बेस्ड डिसिजन सिस्टम की ओर बढ़ रही है। भविष्य के युद्ध में जानकारी सबसे बड़ा हथियार मानी जा रही है। जिस सेना के पास अधिक और सटीक जानकारी होगी, उसे बढ़त मिलेगी। सेना का लक्ष्य है कि विभिन्न वेपन सिस्टम्स, कमांड सेंटर, निगरानी उपकरण और सैनिक एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जुड़े रहें।

इस रणनीतिक डॉक्यूमेंट में कई नई तकनीकों का उल्लेख किया गया है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, क्वांटम टेक्नोलॉजी, ब्लॉकचेन, ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, साइबर वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले सालों में तकनीक आधारित युद्ध का महत्व लगातार बढ़ेगा। इसलिए सेना केवल हथियार खरीदने पर नहीं बल्कि तकनीक विकसित करने पर भी ध्यान दे रही है।

सेना के स्ट्रक्चर में भी होंगे बदलाव

डॉक्यूमेंट में संगठनात्मक परिवर्तन को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने के लिए जॉइंट स्ट्रक्चर डेवलप किया जाएगा।

थिएटर कमांड का कॉन्सैप्ट भी इसी हिस्सा है। जिसका उद्देश्य अलग-अलग सेनाओं की क्षमताओं को एक साथ उपयोग करना है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और युद्ध के समय फैसले लेने की प्रक्रिया तेज होगी।

इसके अलावा भारतीय सेना अपने कई पुराने प्लेटफॉर्म को बदलने की प्रक्रिया में पहले से ही लगी हुई है। नए डॉक्यूमेंट में मैकेनाइज्ड फोर्सेज, आर्टिलरी, कॉम्बैट एविएशन, एयर डिफेंस और इन्फैंट्री के आधुनिकीकरण पर विशेष जोर दिया गया है।

सेना का उद्देश्य ऐसे वेपंस और सिस्टम्स हासिल करना है जो भविष्य के युद्धों में भी प्रभावी साबित हों। इस डॉक्यूमेंट में आत्मनिर्भरता को भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। स्वदेशी तोपें, मिसाइलें, ड्रोन, रडार और संचार प्रणालियां विकसित की गई हैं।

सेना चाहती है कि भविष्य में विदेशी हथियारों पर निर्भरता और कम हो। इसी कारण भारतीय उद्योग, स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों और रक्षा कंपनियों को सेना की जरूरतों से जोड़ा जा रहा है।

सैनिकों के स्किल्स डेवलपमेंट पर भी फोकस

रणनीतिक दिशानिर्देश केवल हथियारों और तकनीक तक सीमित नहीं हैं। डॉक्यूमेंट में मानव संसाधन विकास को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। भविष्य के सैनिक को केवल शारीरिक रूप से मजबूत होना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे तकनीक, डेटा और आधुनिक प्रणालियों को समझने की क्षमता भी होनी चाहिए।

इसी कारण प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कौशल विकास योजनाओं और करियर प्रबंधन प्रणाली को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है।

पूरे राष्ट्र को जोड़ने की सोच

इस डॉक्यूमेंट में “होल ऑफ नेशन अप्रोच” की अवधारणा भी शामिल की गई है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें सरकार, उद्योग, शिक्षा संस्थान, तकनीकी क्षेत्र और नागरिक समाज की भी भूमिका होती है।

गतिशक्ति जैसी राष्ट्रीय परियोजनाओं, दोहरे उपयोग वाले बुनियादी ढांचे, पूर्व सैनिक कल्याण और रक्षा कूटनीति को भी इस व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा माना गया है।

विकसित भारत 2047 से क्या है संबंध?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है। भारतीय सेना का मानना है कि आर्थिक विकास, निवेश, उद्योग और सामाजिक प्रगति तभी संभव है जब देश सुरक्षित हो।

इसी वजह से यह रणनीतिक डॉक्यूमेंट विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के साथ सीधे जुड़ा हुआ है।

सेना के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। इसी सोच के तहत 2047 तक की पूरी योजना तैयार की गई है।

सड़क हादसे ने छीन लिया था देश के जांबाज मार्कोस कमांडो का सपना, कोर्ट ने दिलाया 2.46 करोड़ रुपये का मुआवजा

MARCOS Commando Compensation
Image for reference only. AI-Generated Image

MARCOS Commando Compensation: देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए सबसे कठिन और जोखिम भरे अभियानों में हिस्सा लेने वाले भारतीय नौसेना के मार्कोस कमांडो लखपत सिंह को दिल्ली की मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए कमांडो को 1.65 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। ब्याज जोड़ने के बाद यह राशि 2.46 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है।

अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कोई भी आर्थिक मुआवजा उस दर्द, संघर्ष और टूटे हुए सपनों की भरपाई नहीं कर सकता, जो एक युवा सैनिक ने इस हादसे के बाद झेले हैं। अदालत ने माना कि यह दुर्घटना केवल एक शारीरिक चोट नहीं थी, बल्कि इसने एक होनहार सैनिक के पूरे मिलिट्री करियर को प्रभावित कर दिया।

MARCOS Commando Compensation: क्रिसमस के दिन हुआ था दर्दनाक हादसा

यह मामला 25 दिसंबर 2018 का है। उस समय लखपत सिंह विशाखापट्टनम स्थित आईएनएस कर्णा यूनिट में तैनात थे। वह अपने साथी सैनिक के साथ मोटरसाइकिल पर शहर की ओर जा रहे थे। जब उनकी बाइक तेलुगु थल्ली फ्लाईओवर के पास पहुंची, तभी पीछे से तेज रफ्तार में आ रही एक स्विफ्ट कार ने उनकी मोटरसाइकिल को जोरदार टक्कर मार दी।

टक्कर इतनी भीषण थी कि दोनों सड़क पर गिर पड़े। लखपत सिंह को शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। उन्हें तुरंत आईएनएस कल्याणी अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी हालत बेहद नाजुक बताई गई। चिकित्सकों ने उन्हें “डेंजर इन लिस्ट” कैटेगरी में रखा। बाद में बेहतर इलाज के लिए उन्हें हवाई मार्ग से पुणे के सैन्य अस्पताल पहुंचाया गया।

छह महीने तक चला इलाज, कई ऑपरेशन हुए

अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक लखपत सिंह को कूल्हे, हाथ, कोहनी, पसलियों और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर फ्रैक्चर हुए थे। पुणे के मिलिट्री अस्पताल में उनका लगभग छह महीने तक इलाज चला। इस दौरान कई बड़े ऑपरेशन किए गए।

इलाज के बाद भी वे पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके। मेडिकल बोर्ड ने उन्हें पहले अस्थायी और बाद में स्थायी रूप से मार्कोस ड्यूटी तथा अंडरवाटर डाइविंग के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

कौन हैं मार्कोस कमांडो?

मार्कोस यानी मरीन कमांडो फोर्स भारतीय नौसेना की स्पेशल ऑपरेशन यूनिट है। इसे दुनिया की सबसे कठिन मिलिट्री ट्रेनिंग्स में से एक माना जाता है। इन कमांडो को समुद्र, नदी और तटीय क्षेत्रों में स्पेशल ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है।

मार्कोस बनने के लिए सैनिकों को बेहद कठिन शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। लखपत सिंह ने भी वर्षों की मेहनत के बाद यह उपलब्धि हासिल की थी। लेकिन सड़क दुर्घटना के बाद वह दोबारा कभी मार्कोस की भूमिका में नहीं लौट सके। (MARCOS Commando Compensation)

88 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता

मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली कैंट स्थित बेस अस्पताल द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र अदालत में पेश किया गया। मेडिकल बोर्ड ने लखपत सिंह की स्थायी दिव्यांगता 88 प्रतिशत निर्धारित की।

रिकॉर्ड के अनुसार उनके शरीर के दाहिने हिस्से पर सबसे अधिक असर पड़ा। हाथ, पैर, कोहनी, पीठ और कूल्हे की सामान्य कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने माना कि इतनी गंभीर स्थिति में वह पहले की तरह एक्टिव ड्यूटी नहीं कर सकते।

कमांडो से डेस्क जॉब पर हुए शिफ्ट

दुर्घटना से पहले लखपत सिंह पानी के भीतर स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशंस में हिस्सा लेने वाले प्रशिक्षित डाइवर थे। लेकिन हादसे के बाद उन्हें डेस्क जॉब पर शिफ्ट होना पड़ा।

उन्होंने अदालत को बताया कि अब उन्हें कई रोजमर्रा के कामों में भी मदद की जरूरत पड़ती है। उनके अनुसार वह स्नाइपर और बम डिस्पोजल जैसे एडवांस कोर्स भी नहीं कर पाएंगे, ताकि भविष्य में प्रमोशन के बेहतर मौके मिल सकें।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि यदि दुर्घटना नहीं होती तो लखपत सिंह लंबे समय तक नौसेना में सेवा कर सकते थे। लेकिन मेडिकल कैटेगरी बदलने के कारण उनका करियर प्रभावित हो गया।

नौसेना के रिकॉर्ड पेश करने वाले गवाहों ने अदालत को बताया कि वह भविष्य में अधिकारी स्तर तक पहुंच सकते थे। दुर्घटना के कारण प्रमोशन के अवसर सीमित हो गए और आगे के कई ट्रेनिंग प्रोग्राम्स में शामिल होना भी संभव नहीं रहा। (MARCOS Commando Compensation)

पेंशन में भी हुआ भारी नुकसान

अदालत के सामने पेश नौसेना मुख्यालय के दस्तावेजों में बताया गया कि यदि लखपत सिंह सामान्य रूप से सेवा पूरी करते तो उन्हें रिटायर होने के बाद लगभग 69,509 रुपये मासिक पेंशन मिल सकती थी।

लेकिन वर्तमान मेडिकल कंडीशंस में उनकी अनुमानित पेंशन लगभग 14,484 रुपये प्रतिमाह रह जाएगी। यानी हर महीने हजारों रुपये की कमी होगी। अदालत ने इसे भी आर्थिक नुकसान का महत्वपूर्ण आधार माना।

हालांकि मेडिकल बोर्ड ने दिव्यांगता 88 प्रतिशत बताई, लेकिन अदालत ने उनके प्रोफेशन को देखते हुए कमाई क्षमता का नुकसान 100 प्रतिशत माना।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि एक मरीन कमांडो और अंडरवाटर डाइवर के तौर पर जो स्किल्स उनके पास थी, उसका इस्तेमाल अब नहीं हो सकता। इसलिए उनकी प्रोफेशनल क्षमता लगभग पूरी तरह प्रभावित हुई है। (MARCOS Commando Compensation)

कैसे तय हुई मुआवजे की राशि

अदालत ने विभिन्न मदों के तहत मुआवजा निर्धारित किया। इसमें भविष्य की आय का नुकसान, प्रमोशन न मिलने से होने वाला आर्थिक नुकसान, विशेष आहार, आने-जाने का खर्च, सहायक कर्मचारी की आवश्यकता, मानसिक पीड़ा और जीवन की सुविधाओं में कमी जैसे पहलुओं को शामिल किया गया।

ट्रिब्यूनल ने कुल 1,65,69,404 रुपये का मुआवजा तय किया। इसके साथ 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया गया। दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से ब्याज जोड़ने के बाद कुल राशि 2,46,46,988 रुपये पहुंच गई है।

फैसले के अंत में ट्रिब्यूनल ने लखपत सिंह के बारे में विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला केवल एक सड़क दुर्घटना का नहीं है, बल्कि एक ऐसे सैनिक का है जिसने देश की सेवा के लिए कठिन प्रशिक्षण लिया था और जिसके सपने एक लापरवाह ड्राइविंग की वजह से प्रभावित हो गए।

अदालत ने कहा कि लखपत सिंह अब शायद कभी तैराकी और मरीन कमांडो की जिम्मेदारियां नहीं निभा पाएंगे। उन्होंने वर्षों की कठिन ट्रेनिंग के बाद यह मुकाम हासिल किया था, लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि सड़क पर थोड़ी सी लापरवाही किसी व्यक्ति का जीवन बदल सकती है और देश को ऐसे मूल्यवान सैन्य संसाधनों से वंचित कर सकती है।

बीमा कंपनी को भुगतान का आदेश

ट्रिब्यूनल ने वाहन के बीमाकर्ता को पूरी मुआवजा राशि जमा करने का आदेश दिया। फैसले के अनुसार 50 लाख रुपये तुरंत लखपत सिंह को जारी किए जाएंगे, जबकि शेष राशि लंबी अवधि की सावधि जमा योजनाओं में रखी जाएगी ताकि भविष्य में उन्हें नियमित आर्थिक सुरक्षा मिलती रहे। (MARCOS Commando Compensation)

तेजस Mk2 और स्टेल्थ फाइटर AMCA को मिली रफ्तार, ADA ने शुरू की हाई-टेक सिस्टम इंटीग्रेशन की तैयारी

Tejas MK2-AMCA Development
Image for reference only. AI-Generated Image

Tejas MK2-AMCA Development: भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों ने रफ्तार पकड़ ली है। एक तरफ भारतीय वायुसेना के लिए तेजस मार्क-2 डेवलप किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ देश का पहला पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। इन दोनों महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को लेकर डीआरडीओ के विंग एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग टेंडर जारी किए हैं।

एडीए न केवल नए विमान डेवलप कर रही है, बल्कि उनके लिए स्टेट-ऑफ-द-आर्ट सर्विलांस सिस्टम, फ्लाइट डेटा नेटवर्क और कॉम्प्लेक्स इंटरनल सिस्टम्स इंटीग्रेशन की तैयारी भी कर रही है।

Tejas MK2-AMCA Development: तेजस मार्क-2 और एएमसीए क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?

भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने फाइटर जेट के मॉडर्नाइजेशन पर काम कर रही है। तेजस मार्क-1 के बाद अब तेजस मार्क-2 को अधिक ताकतवर इंजन, लॉन्ग रेंज और मॉडर्न वेपन सिस्टम्स के साथ डेवलप किया जा रहा है।

तेजस एमके-2 को मिराज-2000, जगुआर और कुछ मिग-29 विमानों के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ एएमसीए डेवलप करने का उद्देश्य ऐसी क्षमता हासिल करना है, जो वर्तमान में केवल अमेरिका, चीन और कुछ हद तक रूस के पास मौजूद है।

वहीं एएमसीए भारत का पहला स्वदेशी पांचवी पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान होगा। यह ऐसा विमान होगा जो दुश्मन के रडार से बचते हुए लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम होगा।

इन दोनों कार्यक्रमों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं और इन्हें भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में गिना जाता है।

दोनों ही प्रोजेक्ट आत्मनिर्भर भारत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। यही कारण है कि सरकार और रक्षा अनुसंधान संस्थान इन प्रोग्राम को तेज गति से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। (Tejas MK2-AMCA Development)

फाइबर ऑप्टिक सेंसिंग सिस्टम पर बड़ा फोकस

एडीए की तरफ से जारी सबसे महत्वपूर्ण टेंडरों में से एक फाइबर ऑप्टिक ऑप्टिकल सेंसिंग सिस्टम सूट से जुड़ा है। इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसे उपकरण खरीदे जाएंगे जो उड़ान के दौरान विमान की स्थिति पर लगातार नजर रख सकें।

सरल भाषा में समझें तो यह सिस्टम विमान के भीतर एक तरह का डिजिटल डॉक्टर होगा। विमान के अंदर लगे विशेष फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से इंजीनियर रियल टाइम में यह देख सकते हैं कि उड़ान के दौरान विमान पर कितना दबाव पड़ रहा है, किस हिस्से में कंपन बढ़ रहा है, तापमान कितना बदल रहा है और स्ट्रक्चर पर कितना तनाव आ रहा है।

आधुनिक लड़ाकू विमान लगातार तेज रफ्तार, तीखे मोड़ और कठिन युद्धाभ्यास करते हैं। ऐसी स्थिति में विमान के स्ट्रक्चर की मजबूती पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी होता है। इसी उद्देश्य से एडीए यह नई सिस्टम डेवलप कर रहा है।

फाइबर ऑप्टिक टेक्नोलॉजी कैसे करेगी काम?

इस टेक्नोलॉजी में विमान के भीतर विशेष प्रकार की ऑप्टिकल केबल लगाई जाती हैं। इन केबलों के भीतर प्रकाश की तरंगें भेजी जाती हैं।

जब विमान तेज रफ्तार से उड़ता है या उस पर अधिक दबाव पड़ता है तो स्ट्रक्चर में बहुत छोटे स्तर पर बदलाव होते हैं। ये बदलाव लाइट वेव्स पर असर डालतेहैं।

सिस्टम तुरंत इन बदलावों को रिकॉर्ड कर लेता है और इंजीनियरों को जानकारी मिल जाती है कि विमान के किस हिस्से पर कितना दबाव पड़ रहा है।

इससे विमान के स्ट्रक्चर में होने वाले संभावित नुकसान का पता समय रहते लगाया जा सकता है।

आधुनिक फाइटर जेट्स के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम?

तेजस मार्क-2 और एएमसीए दोनों में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मैटेरियल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कंपोजिट मैटेरियल पारंपरिक धातु से हल्का होता है और यह विमान का वजन कम करने में मदद करत है। लेकिन इनकी निगरानी के लिए पुराने तरीकों से काम नहीं चलता।

विशेषज्ञों के अनुसार स्टेल्थ विमानों और नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में रियल टाइम सर्विलांस बेहद जरूरी होता है क्योंकि उनका स्ट्रक्चर ज्यादा मुश्किल होता है। यही वजह है कि एडीए इन एडवांस सिस्टम्स को फ्लाइट ट्रायल्स से पहले तैयार करना चाहता है।

विशेषज्ञों के अनुसार एएमसीए और तेजस एमके-2 के आगामी फ्लाइट ट्रायल्स के दौरान यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित होगी। (Tejas MK2-AMCA Development)

फ्लाइट डेटा मैनेजमेंट सिस्टम पर भी काम तेज

एडीए ने एक और महत्वपूर्ण टेंडर फ्लाइट डेटा मैनेजमेंट सिस्टम (एफडीएमएस) के डेवलपमेंट के लिए जारी किया है। यह प्रोजेक्ट मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर बेस्ड है। इसका उद्देश्य फ्लाइट ट्रायल्स से मिलने वाले विशाल डेटा को व्यवस्थित करना, प्रोसेस करना और उसका विश्लेषण करना है।

आज के लड़ाकू विमान हजारों सेंसरों से लैस होते हैं। उड़ान के दौरान इंजन, एवियोनिक्स, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, रडार और स्ट्रक्चरल सेंसर लगातार डेटा भेजते रहते हैं।

एक फ्लाइट ट्रायल के दौरान लाखों डेटा पॉइंट्स जनरेट हो सकते हैं। यदि इस डेटा को सही तरीके से समझा और विश्लेषित नहीं किया जाए, तो जेट के डेवलपमेंट प्रोग्राम की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। (Tejas MK2-AMCA Development)

तेजस एमके-2 के लिए क्यों महत्वपूर्ण है एफडीएमएस?

तेजस एमके-2 को लेकर उम्मीद है कि इसका पहला फ्लाइट ट्रायल अगले साल साल की शुरुआत में होगा। इसके बाद डेवलपमेंट्ल ट्रायल्स का लंबा चरण आएगा।

हर परीक्षण के बाद इंजीनियरों को यह समझना होगा कि विमान ने कैसा प्रदर्शन किया, कौन से सिस्टम अपेक्षा के अनुसार काम कर रहे हैं और किसमें में सुधार की जरूरत है।

एफडीएमएस इसी काम को आसान बनाएगा। इससे डेटा विश्लेषण की प्रक्रिया तेज होगी और डेवलपमेंट प्रोग्राम में समय की बचत होगी। सूत्रों का कहना है कि एडीए इस सिस्टम को बड़े फ्लाइट टेस्ट कैम्पेन शुरू होने से पहले पूरी तरह तैयार करना चाहती है। (Tejas MK2-AMCA Development)

एएमसीए में यह खास पैकेज

हाल ही में एएमसीए सिस्टम इंस्टॉलेशन डिटेल डिजाइन पैकेज का भी टेंडर जारी किया गया है। यह दो साल तक चलने वाला प्रोजेक्ट है और इसका संबंध सीधे एएमसीए के इंटरनल डिजाइन से है। इस स्टेज में इंजीनियर तय करते हैं कि विमान के भीतर कौन सा सिस्टम कहां लगेगा।

इसमें वायरिंग, हाइड्रोलिक लाइनें, ईंधन पाइपलाइन, कूलिंग सिस्टम, एवियोनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों का पूरा लेआउट तैयार किया जाता है। (Tejas MK2-AMCA Development)

स्टेल्थ विमान बनाना इतना मुश्किल क्यों?

सामान्य लड़ाकू विमान और स्टेल्थ विमान में सबसे बड़ा अंतर उनके डिजाइन में होता है। स्टेल्थ विमान को इस तरह बनाया जाता है कि उसका रडार सिग्नेचर बहुत कम दिखाई दे। इसके लिए विमान के भीतर उपलब्ध जगह का बेहद सावधानी से इस्तेमाल करना पड़ता है।

एएमसीए में हथियारों को बाहरी हिस्से पर लटकाने के बजाय इंटरनल वेपन में रखा जाएगा। इससे रडार को उसके सिग्नेचर नहीं मिलेंगे। इंजीनियरों को यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी सिस्टम विमान की स्टेल्थ विशेषताओं को प्रभावित न करे।

इसके अलावा मेंटेनेंस, सेफ्टी, टेंपरेचर कंट्रोल, और कॉम्बैट सर्ववाइबेलिटी को भी ध्यान में रखन पड़ता है। इसी वजह से सिस्टम इंस्टॉलेशन डिजाइन को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकास का सबसे मुश्किल फेज माना जाता है।

सरकार पहले ही एएमसीए के डेवलपमेंट को मंजूरी दे चुकी है। इसके बाद आरएफपी जारी करके निजी क्षेत्र की तीन कंपनियों को भी इस कार्यक्रम में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। ताकि प्रोटोटाइप तैयार करने का काम तेज रफ्तार से आगे बढ़ सके। करीब 15,000 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट को भारत के सबसे बड़े रक्षा अनुसंधान कार्यक्रमों में गिना जा रहा है। (Tejas MK2-AMCA Development)