Home Blog Page 19

Explainer: ऑपरेशन सिंदूर के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई NSA अजीत डोभाल के साथ करेंगे काम, जानें आखिर क्या करता है NSCS का मिलिट्री एडवाइजर?

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser
Lt Gen Rajiv Ghai Appointed Military Adviser to NSCS (Photo: PIB)

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: जब देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों की बात होती है तो लोगों के दिमाग में प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या फिर तीनों सेनाओं के प्रमुखों का नाम आता है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी संस्था भी है जो अक्सर सुर्खियों से दूर रहती है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी लगभग हर बड़ी रणनीति, हर महत्वपूर्ण समीक्षा और हर संवेदनशील फैसले में उसकी अहम भूमिका होती है। यह संस्था है राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय यानी एनएससीएस।

पिछले कुछ सालों में एनएससीएस का महत्व लगातार बढ़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां काम कर चुके कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी बाद में देश के सबसे बड़े रक्षा पदों तक पहुंचे हैं। हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस बनाया गया। उससे पहले जनरल अनिल चौहान भी इसी संस्था में मिलिट्री एडवाइजर रह चुके थे और बाद में सीडीएस बने। वहीं, देश के पहले अब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ के रूप में राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को एनएससीएस का नया मिलिट्री एडवाइजर नियुक्त किया गया है।

यही वजह है कि अब एनएससीएस को केवल एक सचिवालय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नेतृत्व तैयार करने वाली संस्था के तौर पर देखा जाने लगा है।

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: कैसे हुई एनएससीएस की शुरुआत?

भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए एक इंटीग्रेशन सिस्टम बनाने की चर्चा 1990 के दशक में तेज हुई थी। मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण और फिर 1999 के कारगिल युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश को एक ऐसी संस्था की जरूरत है जो केवल सैन्य मामलों तक सीमित न हो बल्कि विदेश नीति, खुफिया जानकारी, आर्थिक सुरक्षा, तकनीकी विकास और सैन्य रणनीति को एक मंच पर जोड़ सके।

इसी सोच के तहत 19 नवंबर 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की स्थापना की। इसके साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) को भी बनाया गया ताकि परिषद के कामकाज को संस्थागत रूप दिया जा सके।

उस समय भारत के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा थे। शुरुआती सालों में एनएससीएस मुख्य रूप से विश्लेषण और सलाह देने वाली संस्था थी। इसका काम विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों से जानकारी जुटाना, रिपोर्ट तैयार करना और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को इनपुट देना था। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

2018 में कैसे बदली एनएससीएस की ताकत?

राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों को करीब से देखने वाले सूत्र बताते हैं कि एनएससीएस के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव 2018 में आया। उस साल एनएससीएस को औपचारिक रूप से अलोकेशन ऑफ बिजनेस रूल्स (AoB) और ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स (ToB) में शामिल किया गया। ये वही नियम हैं जिनके आधार पर भारत सरकार के मंत्रालयों और विभागों के अधिकार, जिम्मेदारियां और निर्णय प्रक्रिया तय होती है।

इस बदलाव से पहले एनएससीएस मुख्य रूप से सलाह देता था। लेकिन 2018 के बाद यह केवल सलाहकार संस्था नहीं रहा, बल्कि सरकारी निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बन गया। संविधान के आर्टिकल 77(3) के तहत अब यह विभिन्न मंत्रालयों के बीच कॉर्डिनेट कर सकता है, सुरक्षा मामलों से जुड़ी फाइलों पर काम कर सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

यही वजह है कि आज इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का “नर्व सेंटर” कहा जाता है।

एनएसए के साथ कैसे काम करता है एनएससीएस?

एनएससीएस सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए के अधीन काम करता है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी अजीत डोभाल के पास है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री और सरकार को सुरक्षा संबंधी सलाह देते हैं। लेकिन इतने बड़े सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर को अकेले संभालना संभव नहीं होता। ऐसे में एनएससीएस एक स्थायी संस्थागत ढांचे के तौर पर काम करता है।

यहीं पर सुरक्षा विशेषज्ञ, सैन्य अधिकारी, खुफिया अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और नीति विश्लेषक मिलकर विभिन्न विषयों पर काम करते हैं। चीन की गतिविधियां हों, पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियां हों, साइबर सुरक्षा का खतरा हो, अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा हो या समुद्री सुरक्षा का प्रश्न, इन सभी विषयों पर एनएससीएस लगातार अध्ययन और विश्लेषण करता है।

कैसा है एनएससीएस का स्ट्रक्चर?

एनएससीएस अकेली संस्था नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद प्रणाली का हिस्सा है।

इसके ऊपर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद होती है। इसके अलावा स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड जैसी संस्थाएं भी मौजूद हैं।

स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप में कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, गृह सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेनाओं के प्रमुख और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं।

वहीं नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड में सेवानिवृत्त राजनयिक, सैन्य अधिकारी, शिक्षाविद और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इन सभी के बीच कॉर्डिनेशन करने का काम एनएससीएस करता है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

कौन होता है मिलिट्री एडवाइजर?

एनएससीएस के भीतर सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक है मिलिट्री एडवाइजर यानी एमए। यह अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सैन्य मामलों पर सलाह देता है। वह सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों, सैन्य क्षमताओं और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में टॉप लेवल पर जानकारी उपलब्ध कराता है। मिलिट्री एडवाइजर एनएससीएस और भारतीय सेनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है।

एमए का सबसे बड़ा काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सीमा सुरक्षा, सैन्य तैयारियों, युद्धक क्षमताओं, रक्षा रणनीति और उभरते खतरों पर सलाह देना है। वह एनएससीएस के मिलिट्री विंग का नेतृत्व करता है और लोंग-टर्म डिफेंस प्लांस, थिएटर कमांड्स, जॉइंट मिलिटरी ऑपरेशंस और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह अधिकारी केवल सैन्य सलाहकार नहीं होता, बल्कि रक्षा मंत्रालय, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेना प्रमुखों और विभिन्न खुफिया एजेंसियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है। सैन्य खुफिया एजेंसियों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण कर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जोड़ना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

यह पद इसलिए भी चर्चा में रहता है क्योंकि हाल के सालों में यहां काम कर चुके अधिकारी देश के सर्वोच्च सैन्य पदों तक पहुंचे हैं। जनरल अनिल चौहान और जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि दोनों पहले एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर रहे और बाद में सीडीएस बने। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

अब तक कौन-कौन रहे हैं मिलिट्री एडवाइजर?

बहुत से लोग मानते हैं कि मिलिट्री एडवाइजर का पद 2018 में शुरू हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है।

इस पद पर सबसे पहले लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन नियुक्त हुए थे। वह 2011 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद 2012 में एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर बने। उन्होंने लगभग 2014 तक यह जिम्मेदारी निभाई। बाद में 2015 से 2017 तक वह एनएससीएस में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के तौर पर भी रहे।

इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल विनोद खंडारे ने यह जिम्मेदारी संभाली। वह मोदी सरकार के दौर में इस पद पर आने वाले पहले प्रमुख सैन्य सलाहकारों में गिने जाते हैं।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान इस पद पर आए। एनएससीएस में काम करने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक मुद्दों पर अनुभव हासिल किया और बाद में सितंबर 2022 में भारत के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने।

इसके बाद एयर मार्शल संदीप सिंह को मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया। वह भारतीय वायुसेना से इस पद पर पहुंचने वाले पहले अधिकारी थे।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने यह जिम्मेदारी संभाली। मई 2026 में उन्हें देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया।

वहीं, अब लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई इस पद पर आ रहे हैं। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

क्यों खास है लेफ्टिनेंट जनरल घई की नियुक्ति?

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई की नियुक्ति कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सबसे पहले, वह पहले ऐसे इन-सर्विस तीन-स्टार अधिकारी हैं जिन्हें मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया है। उनसे पहले इस पद पर आने वाले अधिकांश अधिकारी रिटायर होने के बाद एनएससीएस पहुंचे थे।

दूसरा, उनके पास अभी लगभग डेढ़ साल से अधिक की सेवा बची हुई है। उनका कार्यकाल दिसंबर 2027 तक है।
तीसरा, वह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ थे और पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में शामिल रहे।

मध्यप्रदेश में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने अपने सैन्य करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनके पिता भी सेना में वरिष्ठ अधिकारी रहे थे। दिसंबर 1989 में उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन मिला।

कुमाऊं रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित इन्फेंट्री रेजिमेंट्स में से एक है, जो अपनी बहादुरी और अनुशासन के लिए जानी जाती है। वे इस रेजिमेंट के कर्नल भी हैं।

उन्होंने वेस्टर्न सेक्टर में एक इन्फैंट्री बटालियन की कमान संभाली। इसके बाद मध्य क्षेत्र में स्वतंत्र ब्रिगेड का नेतृत्व किया। वह अरुणाचल प्रदेश में 56 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रहे।

बाद में उन्हें श्रीनगर स्थित 15 कोर की कमान सौंपी गई। यह वही कोर है जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों और नियंत्रण रेखा की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके बाद वह डीजीएमओ बने और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहम भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए उन्हें 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मनित किया गया। इसके बाद जून 2025 में उन्हें सेना मुख्यालय में उप सेनाध्यक्ष (रणनीति) नियुक्त किए गए। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

सीडीएस बनने की क्या है शर्त?

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ देश की तीनों सेनाओं थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल स्थापित करने वाला सबसे वरिष्ठ सैन्य पद है। दिसंबर 2019 में इस पद का गठन किया गया था और जनवरी 2020 में जनरल बिपिन रावत पहले सीडीएस बने थे।

सीडीएस बनने के लिए किसी अधिकारी का चार-स्टार रैंक का अधिकारी होना जरूरी नहीं है। सरकार के 2022 के संशोधित नियमों के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल रैंक के सेवारत अथवा सेवानिवृत्त अधिकारी भी सीडीएस नियुक्त किए जा सकते हैं। हालांकि अधिकारी की आयु नियुक्ति के समय 62 वर्ष से कम होनी चाहिए।

सीडीएस के चयन के लिए केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मानदंड नहीं होती। सरकार अधिकारी के पूरे सैन्य अनुभव, नेतृत्व क्षमता, संयुक्त सैन्य अभियानों की समझ, रणनीतिक सोच, राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों की जानकारी और तीनों सेनाओं के साथ काम करने के अनुभव को भी देखती है। यही वजह है कि कई बार सबसे वरिष्ठ अधिकारी की बजाय उस अधिकारी को चुना जाता है जिसे सरकार भविष्य की सैन्य चुनौतियों के लिए अधिक उपयुक्त मानती है।

सीडीएस के लिए आमतौर पर ऐसे अधिकारी को प्राथमिकता मिलती है जिसने कोर, कमांड या समकक्ष स्तर पर नेतृत्व किया हो और राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक निर्णयों का अनुभव रखा हो। थिएटर कमांड, जॉइंटनेस, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा सुधारों की समझ भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

Explainer: ऑपरेशन सिंदूर से बालाकोट तक; कैसे DRDO नेत्र बना भारतीय वायुसेना की ‘तीसरी आंख’, जिसने दुश्मन की हर चाल की नाकामयाब?

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

Netra AWACS Explained: आधुनिक युद्ध में असली बढ़त उसी देश को मिलती है जो दुश्मन को पहले देख ले, उसकी गतिविधियों को समय रहते समझ सके और अपने हथियारों को सही समय पर सही दिशा में इस्तेमाल कर सके। यही वजह है कि आज दुनिया की हर बड़ी वायुसेना एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम को अपना सबसे अहम एसेट्स मानती हैं। वहीं, भारत के नेत्र अवॉक्स सिस्टम को डीआरडीओ ने डेवलप किया है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर से लेकर बालाकोट एयरस्ट्राइक तक अपनी क्षमता का लोहा मनवाया।

25 जून बेंगलुरु स्थित डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS) में नेत्र नेत्र अवाक्स को फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC) मिल गया है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसके साथ नेत्र को पूरी तरह कॉम्बैट आपरेशंस के लिए तैयार और सर्टिफाइड सिस्टम माना जाएगा।

Netra AWACS Explained: क्या होता है AEW&C सिस्टम और क्यों है इसकी जरूरत?

आम तौर पर लोग समझते हैं कि रडार केवल जमीन पर लगाए जाते हैं, लेकिन जमीन पर मौजूद रडार की अपनी सीमाएं होती हैं। पृथ्वी की गोलाई, पहाड़, इमारतें और अन्य प्राकृतिक बाधाएं उनकी निगरानी क्षमता को सीमित कर देती हैं। ऐसे में यदि कोई दुश्मन का विमान बहुत नीचे उड़ रहा हो, तो वह कई बार रडार की नजर से बच सकता है।

यहीं अवॉक्स सिस्टम की भूमिका शुरू होती है। यह एक ऐसा विशेष विमान होता है, जिसके ऊपर अत्याधुनिक रडार, सेंसर, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट्स और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगा होता है। हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए यह विमान सैकड़ों किलोमीटर दूर तक हवाई क्षेत्र की निगरानी कर सकता है। यही कारण है कि इसे अक्सर “उड़ता हुआ रडार स्टेशन” या “आसमान का कमांड सेंटर” कहा जाता है।

नेत्र केवल दुश्मन के विमानों को खोजने का काम नहीं करता, बल्कि वह पूरे एरियल कॉम्बैट को ऑपरेट करने में भी मदद करता है। यह भारतीय लड़ाकू विमानों, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों और एयर डिफेंस नेटवर्क को एक साथ जोड़कर काम करता है।

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

कैसे शुरू हआ नेत्र प्रोजेक्ट?

भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान महसूस किया था कि देश को अपने एरियल सर्विलांस क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत है। उस समय भारतीय वायुसेना के पास सीमित एयरबोर्न सर्विलांस रिसोर्सेज थे।

भारत के पास पहले इजरायली फॉल्कन अवॉक्स थे जो आईएल-76 प्लेटफॉर्म पर बेस्ड थे, लेकिन स्वदेशी क्षमता डेवलप करने के लिए डीआरडीओ ने नेत्र प्रोजेक्ट शुरू किया।

इसके बाद डीआरडीओ ने स्वदेशी अवॉक्स सिस्टम तैयार करने का फैसला किया। शुरुआती वर्षों में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं। पहले डेवलप किया जा रहा एक प्रोजेक्ट दुर्घटना के बाद बंद करना पड़ा। हालांकि भारतीय वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी और नई शुरुआत की।

आखिरकार ब्राजील के एम्ब्रेयर ERJ-145 जेट को प्लेटफॉर्म के रूप में चुना गया। इसके ऊपर भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी रडार, मिशन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर इक्विपमेंट्स डेवलप करके नेत्र तैयार किया।

इस प्रोजेक्ट में केवल सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स ही नहीं बल्कि डीआरडीओ की कई प्रमुख प्रयोगशालाएं शामिल थीं। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (LRDE) ने रडार बनाया तो डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स एप्लिकेशंस लेबोरेटरी (DEAL) ने डेटा लिंक तैयार किए और डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (DARE) ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और मिसाइल से बचने के लिए सेल्फ प्रोटेक्शन सूट डेवलप किए। बता दें कि LRDE ही वह संस्था है जिसने AESA रडार डेवलप किया है। (Netra AWACS Explained)

नेत्र के अंदर लगी हैं कौन-कौन सी टेक्नोलॉजी?

नेत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका स्वदेशी AESA रडार है। AESA यानी एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैनड एरे रडार आज दुनिया की सबसे आधुनिक रडार तकनीकों में गिना जाता है।

यह रडार पारंपरिक रडारों की तरह घूमता नहीं है। इसके बजाय यह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बीम को कंट्रोल करता है और एक साथ कई दिशाओं में निगरानी कर सकता है।

नेत्र में लगा रडार लड़ाकू विमानों, ड्रोन, हेलीकॉप्टरों और अन्य एरियल टारगेट्स का पता लगा सकता है। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स, कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो सिस्टम, डेटा लिंक और सेल्फ प्रोटेक्शन सिस्टम भी लगाए गए हैं।

विमान में मिशन ऑपरेटरों के लिए विशेष वर्कस्टेशन बनाए गए हैं, जहां बैठकर वे पूरे बैटल फील्ड की निगरानी करते हैं और लड़ाकू विमानों को निर्देश देते हैं। (Netra AWACS Explained)

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

कैसे काम करता है नेत्र?

जब नेत्र उड़ान भरता है तो उसका AESA रडार लगातार चारों ओर के हवाई क्षेत्र को स्कैन करता रहता है। यदि किसी दिशा से कोई विमान, ड्रोन या मिसाइल आती है तो उसकी मौजूदगी तुरंत रडार स्क्रीन पर दिखाई देती है।

इसके बाद सिस्टम यह पहचानने की कोशिश करता है कि टारगेट मित्र है या दुश्मन। यदि टारगेट संदिग्ध पाया जाता है तो उसकी जानकारी तुरंत भारतीय वायुसेना के नेटवर्क में भेज दी जाती है।

इसके बाद जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर और हवा में उड़ रहे लड़ाकू विमान तुरंत कार्रवाई कर सकते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो नेत्र दुश्मन को पहले देखता है, उसकी जानकारी साझा करता है और फिर लड़ाई के दौरान अपने विमानों को दिशा देने का काम करता है। (Netra AWACS Explained)

कितनी है नेत्र की रेंज और क्षमता?

नेत्र के मौजूदा Mk-1 वर्जन में लगा AESA रडार लड़ाकू विमानों जैसे बड़े एरियल टारगेट्स को लगभग 250 से 375 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकता है। वहीं, इसकी इंस्ट्रुमेंटेड रेंज 450 से 500 किलोमीटर तक भी पहुंच सकती है।

नेत्र के ऊपर दो आधुनिक AESA रडार लगे हैं। इनके कारण यह अपने आसपास लगभग 240 डिग्री क्षेत्र की निगरानी कर सकता है। मतलब यह कि विमान के आगे, दाएं और बाएं बड़े हिस्से पर इसकी नजर रहती है। आने वाले एडवांस वर्जन में यह कवरेज और बढ़ाई जाएगी।

यह केवल लड़ाकू विमानों को ही नहीं बल्कि छोटे ड्रोन और कम रडार सिग्नेचर वाले टारगेट्स को भी पहचान सकता है। इसके अलावा समुद्री सतह पर मौजूद कुछ टारगेट्स की निगरानी भी कर सकता है।

लगभग 35,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए यह जमीन पर मौजूद रडारों की तुलना में कहीं अधिक बड़े क्षेत्र को कवर कर सकता है।

वहीं, नेत्र में केवल रडार ही नहीं लगा है। बल्कि इसमें इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM) सिस्टम भी मौजूद है, जो दुश्मन के रडार, संचार उपकरणों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को पकड़ सकता है। यह सिस्टम लगभग 360 डिग्री क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

यानी यदि कोई दुश्मन का रडार एक्टिव होता है या कोई मिलिट्री कम्युनिकेशन नेटवर्क काम कर रहा है, तो नेत्र उसकी जानकारी भी जुटा सकता है।

नेत्र सामान्य तौर पर करीब 9 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है। हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा के जरिए यह और अधिक समय तक मिशन पर बना रह सकता है। इसका मतलब है कि किसी संकट की स्थिति में यह लंबे समय तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकता है। (Netra AWACS Explained)

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

ऑपरेशन सिंदूर में कैसे भारत की ‘उड़ती हुई आंख’ बना नेत्र?

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि ऑपरेशन सिंदूर में नेत्र भी शामिल हुआ था। मई 2025 में जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, तब भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र, मिसाइल गतिविधियों, ड्रोन उड़ानों और लड़ाकू विमानों की हर हरकत पर नजर रखनी थी। ऐसे समय में नेत्र ने एक ऐसे “फोर्स मल्टीप्लायर” की भूमिका निभाई जिसने पूरे ऑपरेशन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की।

हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए नेत्र लगातार पाकिस्तान की ओर से होने वाली हवाई गतिविधियों पर नजर रख रहा था। नेत्र का रडार लगातार बड़े इलाके को स्कैन करता रहा। यदि कोई लड़ाकू विमान उड़ान भरता, कोई ड्रोन एक्टिव होता या कोई अन्य हवाई गतिविधि दिखाई देती, तो उसकी जानकारी तुरंत नेटवर्क के जरिए साझा की जाती थी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके अंदर मौजूद मिशन ऑपरेटर लगातार बैटल फील्ड का विश्लेषण कर रहे थे। वे अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली जानकारी को जोड़कर एक बड़ी तस्वीर तैयार करते थे। इसके बाद यह जानकारी भारतीय वायुसेना के नेटवर्क में साझा की जाती थी।

इससे कमांडरों को यह समझने में मदद मिलती थी कि किस क्षेत्र में खतरा अधिक है, किस दिशा में विमान भेजने हैं और कहां अतिरिक्त निगरानी की जरूरत है। (Netra AWACS Explained)

ऑपरेशन सिंदूर में तैनात था Mk-1A टेस्टबेड

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक खास बात यह थी कि इसमें नेत्र Mk-1A टेस्टबेड को भी तैनात किया गया था। यह प्लेटफॉर्म उस समय अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के फेज में था, लेकिन उसे असल युद्ध हालात में इस्तेमाल किया गया।

भारतीय वायुसेना के अधिकारियों ने बाद में बताया कि इस सिस्टम ने बेहद प्रभावी प्रदर्शन किया और ऑपरेशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केवल नेत्र ही नहीं बल्कि भारतीय वायुसेना के फाल्कन अवॉक्स प्लेटफॉर्म भी एक्टिव थे।
फाल्कन बड़े साइज के एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम हैं जबकि नेत्र उससे छोटा प्लेटफॉर्म है। दोनों ने मिलकर भारतीय वायुसेना को मल्टी लेयर सर्विलांस उपलब्ध कराया।

जहां फाल्कन बड़े इलाके की निगरानी कर रहे थे, वहीं नेत्र खास इलाकों में डिटेल्ड एरियल फोटोग्राफ उपलब्ध करा रहा था।

ऑपरेशन सिंदूर में नहीं मिला था FOC

दिलचस्प बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के समय भी नेत्र को अभी फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस नहीं मिला था। उस समय यह इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस के तहत सर्विस में था और विभिन्न परीक्षणों से गुजर रहा था। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने इस पर भरोसा जताया और इसे अभियान में शामिल किया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके प्रदर्शन ने बाद में FOC प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भी मदद की। जिसके बाद जनवरी 2026 में भारतीय वायुसेना ने नेत्र को फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस दे दिया। (Netra AWACS Explained)

बालाकोट ऑपरेशन में नेत्र हुआ इस्तेमाल

फरवरी 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान नेत्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बालाकोट ऑपरेशन के दौरान नेत्र का काम बम गिराना या हमला करना नहीं था। इसकी जिम्मेदारी पूरे युद्धक्षेत्र की निगरानी करना और भारतीय वायुसेना को लगातार जानकारी उपलब्ध कराना था। भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र की गतिविधियों पर लगातार नजर रखनी थी और अपने लड़ाकू विमानों को रियल टाइम जानकारी उपलब्ध करानी थी।

नेत्र ने उस दौरान भारतीय वायुसेना को महत्वपूर्ण हवाई तस्वीर उपलब्ध कराई। उस दौरान जब मिराज-2000 विमान अपने टारगेट की ओर बढ़ रहे थे, तब नेत्र आसमान में उड़ते हुए उनकी “आंखों और दिमाग” की तरह काम कर रहा था। यह लगातार पाकिस्तान की ओर से होने वाली हवाई गतिविधियों पर नजर रख रहा था और भारतीय कमांडरों को रियल टाइम इनफॉरमेशन दे रहा था। यदि कोई एफ-16, जेएफ-17 या अन्य लड़ाकू विमान उड़ान भरता, तो उसकी जानकारी तुरंत भारतीय वायुसेना तक पहुंच जाती।

इससे भारतीय लड़ाकू विमानों को बेहतर स्थिति की जानकारी मिल सकी और पूरे ऑपरेशन की निगरानी आसान हुई। बालाकोट के बाद भारतीय सेनाओं अवॉक्स प्लेटफॉर्म की अहमियत और भी बढ़ गई।

हालांकि खास बात यह है कि उस समय नेत्र सिस्टम अभी शुरुआती ऑपरेशनल फेज में था और उसे फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC) नहीं मिला था। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने इस पर भरोसा जताया और इसे मिशन में शामिल किया।

FOC मिलने का क्या मतलब है?

किसी भी मिलिट्री प्लेटफॉर्म को सीधे युद्ध में इस्तेमाल नहीं किया जाता। सबसे पहले उसका डेवलपमेंट होता है, फिर परीक्षण होते हैं और उसके बाद सीमित इस्तेमाल की अनुमति मिलती है।

जब सभी परीक्षण पूरे हो जाते हैं और यूजर यानी भारतीय वायुसेना पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है, तब फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस दिया जाता है।

नेत्र को FOC मिलने का अर्थ है कि उसने भारतीय वायुसेना द्वारा तय सभी एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स को पूरा कर लिया है। अब इसे पूरी तरह कॉम्बैट मिशनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। (Netra AWACS Explained)

पाकिस्तान और चीन के मुकाबले भारत के पास कितने अवॉक्स प्लेटफॉर्म?

भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 3 इजरायली फाल्कन AWACS और 3 स्वदेशी नेत्र AEW&C सिस्टम मौजूद हैं। फाल्कन सिस्टम बड़े IL-76 विमान पर आधारित हैं और लंबी दूरी की निगरानी करते हैं। वहीं नेत्र अपेक्षाकृत छोटा और स्वदेशी प्लेटफॉर्म है। दोनों मिलकर भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत बनाते हैं।

वहीं, पाकिस्तान एयर फोर्स के पास लगभग 13 अवॉक्स हैं, जिनमें स्वीडन के साब-2000 एरीआई सिस्टम और चीन के ZDK-03 प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में काफी आगे है। उसके पास लगभग 60 से ज्यादा यूनिट KJ-500, KJ-200 और अन्य एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम की बड़ी संख्या मौजूद है। चीन ने पिछले सालों में इस क्षमता का तेजी से विस्तार किया है।

यही कारण है कि भारत भी अपने AEW&C बेड़े को मजबूत करने पर लगातार काम कर रहा है। वायुसेना को कम से कम 15-18 यूनिट्स चाहिए ताकि दोनों मोर्चों पर पर्याप्त कवरेज हो। (Netra AWACS Explained)

नेत्र Mk-1A और Mk-2 में क्या है अंतर

नेत्र की सफलता के बाद इसके एडवांस वर्जन पर भी काम चल रहा है। नेत्र Mk-1A मौजूदा प्लेटफॉर्म का बेहतर वर्जन होगा जिसमें एडवांस रडार, नए प्रोसेसर और आधुनिक सॉफ्टवेयर लगाए जाएंगे।

इसके अलावा AWACS इंडिया कार्यक्रम के तहत एयरबस A321 विमान पर आधारित नेत्र Mk-2 डेवलप किया जा रहा है। यह साइज में बड़ा होगा और अधिक दूरी तक निगरानी कर सकेगा।

मौजूदा नेत्र Mk-1 एम्ब्रेयर ERJ-145 विमान पर आधारित है। लेकिन भविष्य में आने वाला नेत्र Mk-2 एयरबस A321 विमान पर आधारित होगा। भारतीय वायुसेना के पास 6 एयरबस A321 विमान हैं, जिन्हें Mk-2 में बदला जाएगा। उनमें ज्यादा शक्तिशाली रडार, अधिक बिजली क्षमता और लंबी उड़ान अवधि होगी।

जहां मौजूदा नेत्र की रडार रेंज लगभग 250-375 किलोमीटर मानी जाती है, वहीं Mk-2 में यह क्षमता 500 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। इसके अलावा नया सिस्टम लगभग पूरे 360 डिग्री क्षेत्र की निगरानी कर सकेगा। (Netra AWACS Explained)

LAC के पास भारत-अमेरिका का सबसे बड़ा “युद्धाभ्यास”, पहली बार अपाचे हेलीकॉप्टर भी होंगे शामिल

Exercise Yudh Abhyas 2026
Image for reference only. AI-Generated Image

Exercise Yudh Abhyas 2026: भारत और अमेरिका की सेनाएं इस साल सितंबर में एक बार फिर संयुक्त सैन्य अभ्यास “युद्ध अभ्यास” के तहत साथ नजर आएंगी। यह अभ्यास ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब भारत अपनी उत्तरी सीमाओं पर लगातार सतर्कता बनाए हुए है और आधुनिक युद्ध की चुनौतियों के अनुरूप अपनी तैयारियों को मजबूत कर रहा है।

युद्ध अभ्यास 2026 का 22वां संस्करण सितंबर के पहले सप्ताह से शुरू होगा और लगभग तीन सप्ताह तक चलेगा। इस बार इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका आयोजन दो बिल्कुल अलग भौगोलिक इलाकों में किया जाएगा। एक तरफ उत्तराखंड का औली क्षेत्र होगा, जो चीन सीमा के करीब ऊंचाई वाले इलाके में स्थित है, जबकि दूसरी तरफ राजस्थान का महाजन फील्ड फायरिंग रेंज होगा, जो रेगिस्तानी युद्धाभ्यास के लिए जाना जाता है।

दोनों देशों की सेनाओं से लगभग 350-350 सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा लेंगे। इसके अलावा पहली बार एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टरों को भी इस अभ्यास का हिस्सा बनाया जा रहा है।

Exercise Yudh Abhyas 2026: औली क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

उत्तराखंड का औली केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है। सैन्य दृष्टि से इसकी अहमियत काफी ज्यादा है। यह क्षेत्र लगभग 2,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से करीब 95 किलोमीटर की दूरी पर है।

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच शुरू हुए लंबे सैन्य गतिरोध के बाद भारतीय सेना ने उच्च हिमालयी इलाकों में लड़ाई की तैयारियों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। इसी वजह से औली जैसे इलाके अब मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

हाई एल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों को कई अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यहां ऑक्सीजन का स्तर कम होता है, तापमान तेजी से गिरता है और मौसम कुछ ही घंटों में बदल सकता है। ऐसे वातावरण में सामान्य सैन्य अभ्यास भी कठिन हो जाता है।

युद्ध अभ्यास के दौरान भारतीय और अमेरिकी सैनिक इन परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने की ट्रेनिंग लेंगे। इसमें पैदल सेना की गतिविधियां, ऊंचाई वाले इलाकों में रसद व्यवस्था और कठिन भूभाग में सैनिकों की आवाजाही जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

कम ऑक्सीजन में युद्ध की तैयारी

हाई एल्टीट्यूड इलाकों में सबसे बड़ी चुनौती सैनिकों की शारीरिक क्षमता होती है। कम ऑक्सीजन के कारण सांस लेने में परेशानी होती है और सामान्य कार्य भी कठिन हो जाते हैं।

इसी वजह से औली में सैनिकों को एक्लाइमेटाइजेशन यानी ऊंचाई के अनुसार शरीर को ढालने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

सेना के विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सैन्य अभियान की सफलता केवल हथियारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सैनिकों की शारीरिक तैयारी और सहनशक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

इस अभ्यास में अमेरिकी सैनिकों को भी भारतीय सेना के उन अनुभवों से सीखने का मौका मिलेगा जो उसने सियाचिन, लद्दाख और अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में वर्षों की तैनाती के दौरान हासिल किए हैं।

राजस्थान में दिखेगी बिल्कुल अलग तस्वीर

जहां औली बर्फीले और पहाड़ी युद्धक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा, वहीं राजस्थान का महाजन फील्ड फायरिंग रेंज का वातावरण बिलकुल अलग होगा।

महाजन भारतीय सेना के सबसे बड़े फायरिंग और युद्धाभ्यास इलाकों में गिना जाता है। यहां टैंक, तोपखाना, बख्तरबंद वाहन और कई तरह के हथियारों का परीक्षण और प्रशिक्षण नियमित रूप से किया जाता है।

रेगिस्तानी इलाके में युद्ध की चुनौतियां अलग होती हैं। यहां की तेज गर्मी, धूल, लंबी दूरी और खुला इलाका सैनिकों की रणनीति पर असर डालते हैं।

महाजन में दोनों देशों की सेनाएं लाइव फायर ड्रिल, मैकेनाइज्ड ऑपरेशन और आर्टिलरी कोआर्डिनेशन जैसे अभ्यास किए जाएंगे। इससे दोनों देशों की सेनाओं को अलग-अलग युद्धइलाकों में ऑपरेशन करने का अनुभव मिलेगा।

पहली बार शामिल होंगे अपाचे हेलीकॉप्टर

युद्ध अभ्यास 2026 में एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर भी शामिल होंगे। अपाचे दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू हेलीकॉप्टरों में गिना जाता है। भारतीय सेना और वायुसेना दोनों इसे इस्तेमाल करती हैं।

इस हेलीकॉप्टर को एंटी टैंक मिशन, सटीक हमले और क्लोज एयर सपोर्ट के लिए डेवलप किया गया है।

पहली बार युद्ध अभ्यास में अपाचे हेलीकॉप्टरों को शामिल करने का उद्देश्य लैंड और एयर फोर्सेज के बीच बेहतर तालमेल विकसित करना है।

इससे सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अभ्यास करने का अवसर मिलेगा, जहां जमीन पर मौजूद सैनिकों को एय़र सपोर्ट भी मिलेगा।

क्या होता है कॉम्बाइंड आर्म्स ऑपरेशन?

आधुनिक युद्ध में केवल पैदल सेना या केवल टैंक पर्याप्त नहीं माने जाते। युद्ध में जीत के लिए विभिन्न मिलिट्री शाखाओं का कॉर्डिनेशन जरूरी होता है।

इसे कॉम्बाइंड आर्म्स ऑपरेशन कहा जाता है। इसमें पैदल सेना, टैंक, तोपखाना, हेलीकॉप्टर और सर्विलांस सिस्टम्स एक साथ काम करती हैं।

युद्ध अभ्यास 2026 के दौरान दोनों देशों की सेनाएं इसी तरह के अभ्यासों में शामिल होंगी। अपाचे हेलीकॉप्टरों की भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है क्योंकि इससे सैनिकों को एयर-ग्राउंड इंटीग्रेशन की असली समझ मिलेगी।

पिछले साल अलास्का में हुआ था अभ्यास

युद्ध अभ्यास का पिछला संस्करण सितंबर 2025 में अमेरिका के अलास्का राज्य में आयोजित किया गया था। अलास्का की अत्यधिक ठंडी और सब-आर्कटिक परिस्थितियों में दोनों देशों के सैनिकों ने संयुक्त प्रशिक्षण लिया था।
उस दौरान बर्फीले वातावरण में सैन्य अभियान, जीवित रहने की तकनीक और चरम मौसम में ऑपरेशन पर जोर दिया गया था।

इस बार अभ्यास का फोकस ऊंचाई वाले इलाकों और रेगिस्तानी युद्धक्षेत्र पर रहेगा। इस तरह हर संस्करण में अलग वातावरण चुनकर सैनिकों को विविध परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है।

2004 में हुई थी शुरुआत

युद्ध अभ्यास की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी। उस समय इसका दायरा काफी सीमित था और मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी तथा काउंटर-इंसर्जेंसी आपरेशंस पर ध्यान दिया जाता था। समय के साथ इसमें भी बदलाव हुए।

अब यह केवल काउंटर टेररिज्म अभ्यास नहीं रह गया है, बल्कि इसमें हाई एल्टीट्यूड वारफेयर, मैकेनाइज्ड ऑपरेशन, मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे विषय भी शामिल हो गए हैं। दो दशकों में यह भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच सबसे बड़े संयुक्त सैन्य अभ्यासों में शामिल हो चुका है।

युद्ध अभ्यास दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देशों ने कई रक्षा समझौते किए हैं, जिनके तहत तकनीकी जानकारी, लॉजिस्टिक सहायता और सैन्य सहयोग को बढ़ावा मिला है।

अपाचे हेलीकॉप्टर, पी-8आई मैरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण भारत द्वारा अमेरिका से खरीदे गए प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। संयुक्त अभ्यासों के जरिए दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की कार्यशैली, रणनीति और तकनीक को बेहतर तरीके से समझ पाती हैं।

मालाबार और कोप इंडिया जैसे अभ्यास भी अहम

युद्ध अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच होने वाले कई बड़े सैन्य अभ्यासों में से एक है। समुद्री क्षेत्र में मालाबार अभ्यास आयोजित किया जाता है, जिसमें जापान भी भाग लेता है और कई बार ऑस्ट्रेलिया भी शामिल होता है।

इसी तरह वायुसेना स्तर पर कोप इंडिया अभ्यास आयोजित किया जाता है। इसके अलावा क्वाड देशों के बीच भी विभिन्न स्तरों पर सैन्य सहयोग बढ़ रहा है। युद्ध अभ्यास इन सभी कार्यक्रमों में लैंड-बेस्ड मिलिटरी कोआपरेशन का सबसे प्रमुख उदाहरण माना जाता है।

भारतीय सेना को मिले 106 ‘अग्निवेग’! 180 किमी दूर दुश्मन के ठिकाने होंगे तबाह, रूसी लेंसेट और इजराइली हारोप को देगा टक्कर!

Agniveg Kamikaze Drone
Agniveg Kamikaze Drone

Agniveg Kamikaze Drone: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल टैंक, तोप और लड़ाकू विमान ही युद्ध का परिणाम तय नहीं करते, बल्कि ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसीजन स्ट्राइक सिस्टम भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दिल्ली स्थित डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी एसएमपीपी लिमिटेड ने भारतीय सेना को 100 ऑपरेशनल और 6 ट्रेनिंग सिस्टम समेत कुल 106 जेट बेस्ड कामिकेज ड्रोन सौंपे हैं।

Agniveg Kamikaze Drone: आखिर क्या है पीसकीपर (अग्निवेग)?

इन ड्रोन का नाम पीसकीपर (अग्निवेग) रखा गया है। यह एक जेट इंजन से चलने वाला लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम है, जिसे आम भाषा में कामिकेज ड्रोन भी कहा जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह दुश्मन के इलाके में अंदर जाकर टारगेट की खोज कर सकता है और फिर खुद को टारगेट से टकराकर उसे नष्ट कर सकता है।

सामान्य निगरानी ड्रोन कैमरे या सेंसर के जरिए जानकारी जुटाते हैं और वापस लौट आते हैं, लेकिन कामिकेज ड्रोन खुद एक हथियार होता है।

इसे टारगेट की पहचान करने, उसके ऊपर मंडराने और सही समय आने पर सीधे टकराकर उसे नष्ट करने के लिए तैयार किया जाता है। इसी वजह से इसे लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है।

दुनिया भर में इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और हालिया सैन्य अभियानों ने साबित किया है कि ऐसे सिस्टम पारंपरिक हथियारों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और किफायती साबित हो सकते हैं। (Agniveg Kamikaze Drone)

केवल छह महीने में पूरी हुई डिलीवरी

एसएमपीपी लिमिटेड ने सेना के लिए यह पूरा ऑर्डर केवल छह महीनों में पूरा किया है। डिफेंस सेक्टर में इतने कम समय में किसी ऐसे वेपन सिस्टम की डिलीवरी को बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशीष कंसल ने कहा कि अग्निवेग की डिलीवरी केवल एसएमपीपी के लिए ही नहीं बल्कि पूरे इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनके अनुसार आधुनिक युद्ध में सटीकता, स्वायत्तता और किफायतीपन सबसे महत्वपूर्ण तत्व बन चुके हैं और ऐसे सिस्टम युद्धक्षेत्र में फोर्स मल्टीप्लायर की भूमिका निभाते हैं।

कंपनी के अनुसार 100 ड्रोन सीधे ऑपरेशनल यूनिट्स को दिए गए हैं, जबकि 6 सिस्टम सैनिकों की ट्रेनिंग के लिए उपलब्ध कराए गए हैं।

डिलीवरी से पहले इन ड्रोन का विस्तृत जांच की गई। परीक्षणों के दौरान इन्हें ऐसे माहौल में उड़ाया गया जहां भारी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और स्पूफिंग मौजूद थी। इसके बावजूद सिस्टम ने अपने टारगेट को सटीकता से भेदा।

जेट इंजन इसे बनाता है खास

अधिकांश छोटे ड्रोन प्रोपेलर बेस्ड होते हैं। उनकी गति सीमित होती है और लंबी दूरी पर उनके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ता है।

अग्निवेग की सबसे बड़ी ताकत इसका टर्बोजेट इंजन है। यही वजह है कि यह 450 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल कर सकता है।

इतनी तेज रफ्तार के चलते दुश्मन के लिए इसे पहचानना और रोकना अधिक कठिन हो जाता है। इसके अलावा यह कम समय में टारगेट तक पहुंच सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जेट आधारित लोइटरिंग म्यूनिशन भविष्य के युद्धक्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं क्योंकि वे ड्रोन और क्रूज मिसाइल के बीच की क्षमता प्रदान करते हैं।

जहां तोपों की मारक क्षमता सीमित होती है और लंबी दूरी की मिसाइलें महंगी होती हैं, वहीं यह ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत में सटीक हमला कर सकता है। (Agniveg Kamikaze Drone)

180 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता

अग्निवेग की ऑपरेशनल रेंज लगभग 180 किलोमीटर है। इसका मतलब है कि भारतीय सेना सीमा से काफी दूरी पर मौजूद महत्वपूर्ण टारगेट्स पर हमला कर सकती है।

सैन्य दृष्टि से यह दूरी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे दुश्मन के कमांड सेंटर, रसद केंद्र, गोला-बारूद डिपो, रडार स्टेशन और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है।

अब तक इस प्रकार के टारगेट्स पर हमला करने के लिए या तो लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता था या फिर लड़ाकू विमानों की मदद लेनी पड़ती थी। अग्निवेग इन दोनों के बीच एक नया बेहतरीन विकल्प है।

कितना सटीक है यह सिस्टम?

आधुनिक युद्ध में केवल दूरी और गति ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि सटीकता भी उतनी ही जरूरी होती है। एसएमपीपी के अनुसार यूजर ट्रायल्स के दौरान अग्निवेग ने पांच मीटर से कम का सर्कुलर एरर प्रोबेबल हासिल किया। सरल शब्दों में कहें तो यह ड्रोन अपने निर्धारित लक्ष्य के बेहद करीब जाकर हमला करने में सक्षम है।

यह क्षमता विशेष रूप से उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण होती है जहां किसी सैन्य ठिकाने के केवल एक हिस्से को निशाना बनाना हो या आसपास सिविलियन स्ट्रक्चर मौजूद हो। (Agniveg Kamikaze Drone)

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में भी प्रभावी

आज का युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम भी युद्ध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। दुश्मन अक्सर ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए जैमिंग और स्पूफिंग का सहारा लेते हैं।

जैमिंग में संचार और नेविगेशन सिग्नल बाधित किए जाते हैं, जबकि स्पूफिंग के जरिए हथियार को गलत दिशा में भेजने की कोशिश की जाती है। अग्निवेग को इसी चुनौती को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

कंपनी का दावा है कि यह सिस्टम भारी इलेक्ट्रॉनिक व्यवधान वाले वातावरण में भी अपना मिशन पूरा कर सकता है। इसकी स्वायत्त क्षमता इसे लगातार बदलती परिस्थितियों में भी प्रभावी बनाती है। (Agniveg Kamikaze Drone)

किन लक्ष्यों को बना सकता है निशाना?

अग्निवेग को विशेष रूप से हाई वैल्यू टारगेट्स के लिए तैयार किया गया है। यह दुश्मन के कमांड और कंट्रोल सेंटर, रडार स्टेशन, लॉजिस्टिक्स हब, कम्युनिकेशन सेंटर, मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है।

ऐसे टारगेट अक्सर युद्ध के परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि दुश्मन का कमांड नेटवर्क या रडार सिस्टम निष्क्रिय हो जाए तो उसकी सैन्य क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

पिछले कुछ सालों में कामिकेज ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और यूक्रेन दोनों ने बड़ी संख्या में लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया। इसी प्रकार अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-काराबाख संघर्ष में भी इन हथियारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इनकी लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहले इनकी लागत पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में कम होती है। दूसरा, इन्हें ऑपरेट करने में कम संसाधनों की जरूरत होती है। तीसरा, पायलट या सैनिक को सीधे खतरे में नहीं जाना पड़ता।

इसके अलावा ये लक्ष्य के ऊपर मंडराकर सही समय पर हमला करने की क्षमता रखते हैं, जो कई बार पारंपरिक हथियार नहीं कर पाते। (Agniveg Kamikaze Drone)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा फोकस

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि हाल के सैन्य अभियानों ने ड्रोन और प्रिसीजन स्ट्राइक सिस्टम की आवश्यकता को और स्पष्ट किया है।

इसी कारण भारतीय सेना ने तेजी से ऐसे सिस्टम्स को शामिल करना शुरू किया है जो कम लागत में अधिक प्रभावी हमला करने की क्षमता प्रदान करती हैं।

एसएमपीपी लिमिटेड लंबे समय तक बैलिस्टिक प्रोटेक्शन सिस्टम्स के लिए जानी जाती रही है। कंपनी ने भारतीय सैनिकों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, बख्तरबंद प्लेट और सुरक्षा समाधान तैयार किए हैं। इसके अलावा कंपनी ने गोला-बारूद और रक्षा सामग्री निर्माण के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है। वहीं, अब कंपनी ने ड्रोन, काउंटर ड्रोन सिस्टम और प्रिसीजन स्ट्राइक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाया है।

दुनिया में कई देश पहले से लोइटरिंग म्यूनिशन विकसित कर चुके हैं। इजराइल का हारोप, अमेरिका का स्विचब्लेड और रूस का लैंसेट इस श्रेणी के प्रमुख सिस्टम माने जाते हैं। अग्निवेग की विशेषता इसका जेट इंजन, लंबी दूरी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में काम करने की क्षमता है। भारतीय सेना को अब इस कैटेगरी में एक स्वदेशी विकल्प मिल गया है, जिससे विदेशी निर्भरता भी कम होगी। (Agniveg Kamikaze Drone)

Explainer: भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA की सैटेलाइट तस्वीरें क्यों हो रहीं वायरल? आसान भाषा में समझें स्टेल्थ टेस्टिंग क्यों है जरूरी?

AMCA Stealth Testing
AMCA at Stealth Testing Facility (Image Source: VERTEX/X)

AMCA Stealth Testing: भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) की एक तस्वीर बेहद वायरल हो रही है। हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में एएमसीए का एक फुल-स्केल इंजीनियरिंग एयरफ्रेम हैदराबाद के दुंडीगल स्थित विशेष रडार क्रॉस सेक्शन टेस्टिंग कैंपस में दिखाई दिया है। यह वही मॉडल माना जा रहा है जिसे एयरो इंडिया 2025 के दौरान पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था।

तस्वीर सामने आने के बाद रक्षा विशेषज्ञों, ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (ओएसआईएनटी) और सैन्य मामलों में रुचि रखने वाले लोगों के बीच एएमसीए को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। वजह केवल तस्वीर नहीं है, बल्कि वह जगह है जहां यह एयरफ्रेम दिखाई दिया है। यह जगह भारत की सबसे महत्वपूर्ण स्टेल्थ टेस्टिंग फैसिलिटी में से एक मानी जाती है।

AMCA Stealth Testing: क्या दिखा सैटेलाइट तस्वीरों में?

हाल के दिनों में सामने आई हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों में एएमसीए का फुल साइज वाला इंजीनियरिंग मॉडल दुंडीगल स्थित आउटडोर रडार क्रॉस सेक्शन फैसिलिटी में दिखाई दिया। यह सुविधा एयरफोर्स अकादमी के नजदीक स्थित है और यहां कई मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स की रडार सिग्नेचर की जांच की जाती है।

तस्वीरों से संकेत मिला कि एएमसीए का यह मॉडल ग्राउंड-बेस्ड स्टेल्थ ट्रायल्स से गुजर रहा है। किसी भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास में यह सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक माना जाता है।

किसी लड़ाकू विमान को केवल तेज, शक्तिशाली या आधुनिक बनाना काफी नहीं होता। बल्कि आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती दुश्मन के रडार से बचना है। इसी वजह से स्टेल्थ तकनीक किसी भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।

एएमसीए क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?

एएमसीए भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) और डीआरडीओ मिलकर डेवलप कर रहे हैं।

यह विमान भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य एक ऐसा लड़ाकू विमान बनाना है जो दुश्मन के रडार पर कम दिखाई दे, लंबी दूरी तक मिशन कर सके और एक साथ कई प्रकार के युद्ध अभियानों को अंजाम दे सके।

एएमसीए को एयर सुपीरियोरिटी, ग्राउंड अटैक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और प्रिसिजन स्ट्राइक जैसे मिशनों के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्टेल्थ क्षमता होगी।

क्या होती है रडार क्रॉस सेक्शन टेस्टिंग?

एएमसीए की तस्वीरों के वायरल होने का सबसे बड़ा कारण इसकी रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस टेस्टिंग है।

जब कोई रडार किसी विमान पर रेडियो तरंगें भेजता है, तो विमान उन तरंगों का कुछ हिस्सा वापस रडार की तरफ रिफ्लेक्ट करता है। रडार इसी रिफ्लेक्ट सिग्नल्स के आधार पर विमान का पता लगाता है।

रडार पर किसी विमान की पहचान कितनी आसानी से होगी, यह उसके रडार क्रॉस सेक्शन पर निर्भर करता है।

यदि किसी विमान का आरसीएस अधिक है तो वह रडार पर जल्दी दिखाई देगा। यदि आरसीएस बहुत कम है तो उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है।

स्टेल्थ विमान विकसित करने का मुख्य उद्देश्य इसी आरसीएस को कम करना होता है।

दुंडीगल की सुविधा में क्या है खास?

हैदराबाद के पास स्थित यह विशेष टेस्टिंग सेंटर भारत की सबसे एडवांस आरसीएस मीजरमेंट फैसिलिटी में गिना जाता है। यहां विमान को एक विशेष प्लेटफॉर्म पर रखा जाता है। इसके बाद विभिन्न कोणों और अलग-अलग फ्रीक्वेंसी से रडार तरंगें भेजी जाती हैं।

इंजीनियर यह जांचते हैं कि विमान का कौन-सा हिस्सा सबसे ज्यादा रडार सिग्नल वापस भेज रहा है।

यदि किसी हिस्से से ज्यादा रिफ्लेक्शन मिलता है तो डिजाइन में बदलाव किए जाते हैं। कभी विमान के आकार में परिवर्तन किया जाता है, कभी विशेष रडार अब्जॉर्ब करने वाले मैटेरियल का इस्तेमाल किया जाता है।

यही प्रक्रिया एएमसीए जैसे स्टेल्थ विमान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

AMCA में RCS कम करने की पूरी तकनीक समझिए

जब किसी रडार से रेडियो तरंगें निकलती हैं और वे किसी विमान से टकराती हैं, तो उनका कुछ हिस्सा वापस रडार तक पहुंचता है। इसी लौटे हुए सिग्नल के आधार पर रडार विमान की मौजूदगी का पता लगाता है। यदि विमान ज्यादा सिग्नल वापस भेजता है तो वह आसानी से दिखाई देता है। यदि बहुत कम सिग्नल लौटते हैं तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।

सामान्य चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का आरसीएस लगभग 5 से 10 वर्ग मीटर तक हो सकता है, जबकि आधुनिक स्टेल्थ विमान जैसे एफ-22 और एफ-35 का आरसीएस हजारों गुना कम लगभग 0.001 से 0.01 वर्ग मीटर माना जाता है। जो रडार पर लगभग अदृश्य जैसा दिखता है। एएमसीए को भी इसी श्रेणी की स्टेल्थ क्षमता देने का प्रयास किया जा रहा है।

किसी भी स्टेल्थ विमान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसके आकार की होती है। यदि किसी विमान की सतह सपाट हो या उसमें तेज कोने हों, तो रडार तरंगें सीधे वापस लौट सकती हैं। इससे विमान आसानी से पकड़ में आ जाता है। इसी कारण आधुनिक स्टेल्थ फाइटर जेट्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि रडार तरंगें सीधे वापस लौटने के बजाय अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाएं।

एएमसीए के डिजाइन में भी इसी सिद्धांत का उपयोग किया गया है। इसे एज अलाइनमेंट कहा जाता है। इससे रडार सिग्नल का रिफ्लेक्शन और कम हो जाता है।

आधुनिक स्टेल्थ विमान विशेष प्रकार की रडार एब्जॉर्बिंग मैटेरियल (RAM) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। यह ऐसी सामग्री होती है जो रडार तरंगों को वापस लौटाने के बजाय उन्हें अपने अंदर अवशोषित कर लेती है। जब रडार ऊर्जा इस सामग्री से टकराती है तो उसका बड़ा हिस्सा गर्मी में बदल जाता है और वापस रडार तक नहीं पहुंचता।

एएमसीए में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मैटेरियल का उपयोग किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार एयरफ्रेम का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कंपोजिट सामग्री से तैयार किया जा रहा है।

वहीं, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में इंटरनल वेपन्स बे का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह है कि जब हथियारों के दरवाजे बंद रहते हैं तो विमान की बाहरी सतह पूरी तरह चिकनी दिखाई देती है, जिससे उसका आरसीएस काफी कम हो जाता है।

एएमसीए की कौन-कौन सी खूबियां इसे बनाती हैं खास?

एएमसीए को पूरी तरह आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है। यह ट्विन इंजन लड़ाकू विमान होगा। इसमें एडवांस सेंसर, आधुनिक एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन तकनीक और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल किए जाएंगे।

विमान के अंदर इंटरनल वेपन्स बे होगा, जहां मिसाइलें और बम रखे जाएंगे। इससे हथियार विमान के बाहर दिखाई नहीं देंगे और उसका रडार सिग्नेचर कम रहेगा।

इसमें बड़ी मात्रा में कंपोजिट मटेरियल का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा रडार एब्जॉर्बिंग मटेरियल भी लगाया जाएगा ताकि रडार तरंगों को सोखा जा सके।

तस्वीर में दिखा मॉडल फाइनल डिजाइन नहीं

सूत्रों का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई देने वाला एयरफ्रेम एएमसीए का फाइनल वर्जन नहीं है। एयरो इंडिया 2025 में प्रदर्शित मॉडल पुराने कॉन्फिगरेशन पर बेस्ड था। उस समय इसमें डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट यानी डीएसआई तकनीक शामिल नहीं थी।

बाद में एएमसीए के नए डिजाइन में डीएसआई इनलेट जोड़े गए हैं।

डीएसआई तकनीक आधुनिक स्टेल्थ विमानों में महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे रडार सिग्नेचर कम होता है और स्ट्रक्चर भी आसान बनती है।

एएमसीए के नए डिजाइन में डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट (DSI) तकनीक जोड़ी गई है। यह आधुनिक स्टेल्थ विमानों की महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है। पारंपरिक एयर इनटेक में अतिरिक्त डाइवर्टर प्लेटें होती थीं, जो रडार पर दिखाई दे सकती थीं। डीएसईआई तकनीक में इन अतिरिक्त हिस्सों की जरूरत नहीं पड़ती। इससे विमान का वजन कम होता है, रखरखाव आसान होता है और रडार सिग्नेचर भी घटता है। (AMCA Stealth Testing)

पुराने मॉडल से टेस्टिंग करना क्यों सामान्य प्रक्रिया है?

कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि यदि डिजाइन बदल चुका है तो पुराने मॉडल की टेस्टिंग क्यों की जा रही है। वास्तव में यह दुनिया के लगभग सभी बड़े फाइटर जेट कार्यक्रमों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है।

इंजीनियरिंग मॉडल का इस्तेमाल प्रारंभिक परीक्षणों के लिए किया जाता है। इस दौरान स्ट्रक्चर, स्टेल्थ क्षमता, सेंसर इंटीग्रेशन और रखरखाव से जुड़े कई पहलुओं की जांच होती है।

जब तक फाइनल डिजाइन तैयार होता है, तब तक परीक्षणों से मिली जानकारी के आधार पर कई बदलाव किए जा चुके होते हैं। (AMCA Stealth Testing)

कहां तक पहुंचा एएमसीए प्रोजेक्ट?

एएमसीए प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से विकास के चरण में है। 2024 में सरकार ने इसके प्रोटोटाइप विकास के लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी थी। इसके तहत पांच प्रोटोटाइप बनाए जाने हैं।

पहले तीन प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षणों के लिए उपयोग किए जाएंगे जबकि अन्य प्रोटोटाइप हथियार परीक्षण और सिस्टम मूल्यांकन में इस्तेमाल होंगे।

हाल के वर्षों में निजी उद्योग को भी परियोजना में शामिल किया गया है। कई भारतीय कंपनियां विमान के अलग-अलग हिस्सों के निर्माण में भागीदारी कर रही हैं। (AMCA Stealth Testing)

ग्राउंड टेस्ट एयरफ्रेम की क्या है भूमिका

जो एयरफ्रेम सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई दिया है, वह कभी उड़ान नहीं भरेगा। इसके बावजूद इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार के एयरफ्रेम का इस्तेमाल उपकरणों की स्थिति जांचने, वायरिंग लेआउट देखने, सेंसर फिटमेंट का मूल्यांकन करने और स्ट्रक्चरल इंटरफेस की जांच के लिए किया जाता है।

इसके अलावा मेंटनेंस की प्रक्रिया और विभिन्न सिस्टमों के इंटीग्रेशन का परीक्षण भी इन्हीं मॉडल्स पर किया जाता है। इससे वास्तविक उड़ान प्रोटोटाइप बनने से पहले कई तकनीकी जोखिम कम हो जाते हैं। (AMCA Stealth Testing)

भारत के लिए क्यों जरूरी है एएमसीए

भारतीय वायुसेना लंबे समय से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जरूरत महसूस कर रही है। दुनिया में अमेरिका का एफ-35, चीन का जे-20 और रूस का एसयू-57 जैसे विमान पहले से मौजूद हैं। खास तौर पर चीन के जे-20 के प्रोटोटाइप ने पहली उड़ान 2011 में भरी थी। आज चीन के पास 300 से ज्यादा जे-30 फाइटर जेट्स हैं। ऐसे में भारत का अपना स्टेल्थ फाइटर विकसित करना रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (AMCA Stealth Testing)

क्या रूस खरीदेगा दुनिया की सबसे तेज मिसाइल ब्रह्मोस? इंडो-रशिया जॉइंट वेंचर ने दिया बड़ा संकेत

Russia BrahMos Missile
Image for reference only. AI-Generated Image

Russia BrahMos Missile: दुनिया की सबसे खतरनाक और तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाने वाली ब्रह्मोस रूस को भी सप्लाई की जा सकती है। भारत और रूस के जॉइंट वेंचर ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने कहा है कि यदि रूस आधिकारिक तौर पर अनुरोध करता है तो कंपनी रूसी आर्म्ड फोर्सेज को भी ब्रह्मोस मिसाइलें उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए आधुनिक वेपन सिस्टम्स बढ़ाने में जुटा हुआ है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के रूसी सह-प्रबंध निदेशक अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समुद्री रक्षा प्रदर्शनी “फ्लीट-2026” के दौरान रूसी समाचार एजेंसी तास से बातचीत में यह बात कही।

उन्होंने कहा कि यदि रूसी की ओर से औपचारिक मांग आती है तो कंपनी उस ऑर्डर को पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार ब्रह्मोस मिसाइलें नौसेना या जमीनी सेना, दोनों के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं और कंपनी के पास पर्याप्त उत्पादन क्षमता मौजूद है।

Russia BrahMos Missile: पहली बार रूस के लिए खुलकर सामने आई पेशकश

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अब तक इसका सबसे बड़ा खरीदार भारत ही रहा है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस मिसाइल का इस्तेमाल करती हैं। दूसरी ओर रूस ने अभी तक अपनी सेनाओं में ब्रह्मोस को शामिल नहीं किया है।

यही वजह है कि ब्रह्मोस एयरोस्पेस का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रूस के पास पहले से ओनिक्स और अन्य क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन ब्रह्मोस को उनके एडवांस वर्जन के तौर पर देखा जाता है। यह मिसाइल जॉइंट डेवलपमेंट का परिणाम है और पिछले दो दशकों में इसमें कई तकनीकी सुधार किए जा चुके हैं।

अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने कहा कि कंपनी रूस की जरूरतों को अच्छी तरह समझती है और उत्पादन व्यवस्था पहले से तैयार है। इसलिए यदि ऑर्डर मिलता है तो सप्लाई में किसी बड़ी बाधा की संभावना नहीं है। (Russia BrahMos Missile)

कैसे शुरू हुई थी ब्रह्मोस परियोजना

ब्रह्मोस की कहानी भारत और रूस के रक्षा सहयोग की सबसे सफल कहानियों में गिनी जाती है। वर्ष 1998 में दोनों देशों के बीच एक अंतर-सरकारी समझौते के बाद ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना की गई थी।

इस संयुक्त उद्यम में भारत की ओर से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ शामिल है, जबकि रूस की ओर से एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया भागीदार है।

कंपनी में भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की 49.5 प्रतिशत है। मिसाइल का नाम भी दोनों देशों की नदियों के नामों को जोड़कर रखा गया था। भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम से “ब्रह्मोस” बना।

यह परियोजना शुरू होने के बाद दोनों देशों के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल डेवलप की, जो दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशन वाली मिसाइलों में शामिल हो गई।

ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्पीड है। यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भर सकती है। इसकी गति मैक 2.8 से मैक 3 तक पहुंचती है।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी मिसाइल को रोकने के लिए उसके खिलाफ प्रतिक्रिया देने का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। ब्रह्मोस की अत्यधिक गति दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती पैदा करती है।

यह मिसाइल उड़ान के दौरान बहुत कम ऊंचाई पर भी चल सकती है। समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ने की क्षमता के कारण रडार पर इसे देर से देखा जाता है। यही वजह है कि इसे रोकना और मुश्किल हो जाता है। (Russia BrahMos Missile)

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने कैसे दिखाई अपनी ताकत

मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस अभियान के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने आतंकवादी ठिकानों और पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने अहम भूमिका निभाई।

10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई प्रमुख एयरबेसों पर सटीक हमले किए। इनमें नूर खान (चकला), राफिकी, मुरीद, सरगोधा, सियालकोट और भोलारी जैसे महत्वपूर्ण एयरबेस शामिल बताए गए। इन हमलों में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से एयर-लॉन्च्ड 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस दौरान 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

वहीं, ब्रह्मोस की तेज गति और सटीक निशाना लगाने की क्षमता के सामने पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम जवाब नहीं दे पाए। मिसाइलों ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को सटीकता से निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के बाद ब्रह्मोस की मारक क्षमता और विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा बढ़ गई।

कई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस की एक और बड़ी खासियत इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है। इसे जमीन से, समुद्र से, पनडुब्बी से और लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है।

भारतीय नौसेना के कई आधुनिक युद्धपोतों पर ब्रह्मोस तैनात है। भारतीय थल सेना की विशेष मिसाइल रेजिमेंटें इसका संचालन करती हैं। भारतीय वायुसेना ने इसे सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के साथ भी इंटीग्रेट किया है जो बेहद घातक कॉम्बिनेशन है।

इस वजह से ब्रह्मोस केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि तीनों सेनाओं के लिए एक साझा मारक क्षमता का हिस्सा बन चुकी है।

लगातार बढ़ाई गई ऑपरेशनल रेंज

शुरुआत में ब्रह्मोस की मारक दूरी लगभग 290 किलोमीटर थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियंत्रण नियमों के कारण इसकी सीमा सीमित थी।

बाद में भारत के मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का सदस्य बनने के बाद इसकी रेंज बढ़ाने का रास्ता खुला। हाल के सालों में परीक्षणों के दौरान इसकी मारक दूरी को 800 किलोमीटर से अधिक तक बढ़ाया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी दूरी और तेज रफ्तार ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। (Russia BrahMos Missile)

रूस को क्यों पड़ सकती है इसकी जरूरत

रूस के पास पहले से कई प्रकार की क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसकी सैन्य जरूरतों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धों में मिसाइलों की खपत बहुत अधिक होती है। ऐसे में उत्पादन क्षमता बढ़ाना और नए सिस्टम्स को शामिल करना किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

ब्रह्मोस की खूबी यह है कि यह पहले से परीक्षण की हुई और ऑपरेशनल है। भारतीय सेनाएं सालों से इसका इस्तेमाल कर रही हैं और कई अलग-अलग हालात में इसकी क्षमता को परखा जा चुका है। (Russia BrahMos Missile)

भारत में हो रहा है बड़े पैमाने पर उत्पादन

ब्रह्मोस परियोजना की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि आज इसका अधिकांश उत्पादन भारत में होता है। पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशीकरण का स्तर लगातार बढ़ाया गया है।

मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्से भारतीय कंपनियां तैयार कर रही हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिला है और बड़ी संख्या में कुशल रोजगार भी पैदा हुए हैं।

सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत ब्रह्मोस को एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। (Russia BrahMos Missile)

फिलीपींस बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत के रक्षा निर्यात इतिहास में ब्रह्मोस ने एक नया अध्याय तब लिखा जब फिलीपींस ने इसे खरीदने का फैसला किया। जनवरी 2022 में हुए समझौते के तहत फिलीपींस ने तटीय रक्षा के लिए ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदी। इसके बाद मिसाइलों की खेप वहां पहुंचाई गई।

यह पहली बार था जब भारत ने इतनी एडवांस मिसाइल किसी विदेशी देश को निर्यात की। फिलीपींस के अलावा इंडोनेशिया, वियतनाम और कई अन्य देशों ने भी इस प्रणाली में रुचि दिखाई है। वितयनाम के साथ डील साइन हो चुकी है लेकिन अभी दोनों देशों की तरफ से आधिकारिक रूप से सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 30-31 मई को सिंगापुर में शांगरी-ला डायलॉग (Shangri-La Dialogue) के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा था, “वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल डील पहले ही साइन हो चुकी है। हालांकि इसे अभी सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।” उन्होंने यह भी बताया कि इंडोनेशिया के साथ भी डील फाइनल स्टेज में है।

ब्रह्मोस-एनजी पर भी तेजी से काम

ब्रह्मोस एयरोस्पेस केवल मौजूदा संस्करण तक सीमित नहीं है। कंपनी मिसाइल के अगले संस्करण पर भी काम कर रही है, जिसे ब्रह्मोस-एनजी कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल की तुलना में हल्की और आकार में छोटी होगी। इसका लाभ यह होगा कि लड़ाकू विमान एक साथ अधिक संख्या में मिसाइलें ले जा सकेंगे। इस संस्करण को मॉडर्न एयर आपरेशंस की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। (Russia BrahMos Missile)

EXPLAINER: क्या है भारतीय नौसेना को मिला एडवांस ECGNSS जैमर, कैसे दुश्मन के सैटेलाइट सिग्नल, ड्रोन सिस्टम और मिसाइलों को करेगा जाम

ECGNSS Jammer Indian Navy
Image for reference only. AI-Generated Image

ECGNSS Jammer Indian Navy: भारतीय नौसेना की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बेंगलुरु की भारतीय कंपनी एकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 449 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया है। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए 20 एन्हांस्ड कैपेबिलिटी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (ECGNSS) जैमर खरीदे जाएंगे।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह खरीद “बाय इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड” कैटेगरी के तहत की गई है। इसका मतलब है कि इस सिस्टम का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में हुआ है और इसमें कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में इस कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए गए। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

ECGNSS Jammer Indian Navy: क्या होता है जीएनएसएस?

आज दुनिया के लगभग हर आधुनिक मिलिट्री सिस्टम किसी न किसी सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं। जहाजों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, मिसाइलों और कई अन्य सैन्य उपकरणों को सही दिशा और स्थान की जानकारी सैटेलाइट से ही मिलती है। इसी को ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी जीएनएसएस कहा जाता है।

अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो, चीन का बेइदौ और भारत का नाविक इसी कैटेगरी के सिस्टम हैं।

ये सैटेलाइट लगातार पृथ्वी पर सिग्नल भेजते रहते हैं। इन सिग्नलों की मदद से कोई भी रिसीवर अपनी सटीक स्थिति, दिशा और समय की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

आधुनिक नौसैनिक युद्ध में इन सिग्नलों का महत्व बहुत अधिक है। बड़े युद्धपोतों से लेकर छोटे ड्रोन तक इन पर निर्भर रहते हैं।

ECGNSS Jammer Indian Navy
MoD Signs Rs 449 Crore Deal for 20 Advanced GNSS Jammers to Boost Indian Navy’s Electronic Warfare Capability

जीएनएसएस की सबसे बड़ी कमजोरी

सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल बहुत कमजोर होते हैं। यही वजह है कि दुश्मन इन्हें जाम करने की कोशिश करता है। यदि किसी युद्ध के दौरान दुश्मन किसी जहाज या मिसाइल को सही सैटेलाइट सिग्नल मिलने से रोक दे तो उसकी दिशा बदल सकती है या वह अपना टारगेट से भटक सकता है।

इसी कमजोरी को दूर करने और दुश्मन की इसी निर्भरता का फायदा उठाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम डेवलप की जाती हैं। ईसीजीएनएसएस जैमर इसी कैटेगरी का अत्याधुनिक सिस्टम है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

क्या करता है जैमर?

जैमर दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम को काम करने से रोक देता है। जब दुश्मन का ड्रोन, मिसाइल या जहाज सैटेलाइट सिग्नल प्राप्त करने की कोशिश करता है, तब जैमर उससे कहीं अधिक शक्तिशाली सिग्नल भेजता है।

इस वजह से रिसीवर असली सिग्नल नहीं पकड़ पाता और उसकी नेविगेशन क्षमता प्रभावित हो जाती है। नतीजतन दुश्मन का सिस्टम अपनी सही स्थिति नहीं जान पाता और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

क्या होती है स्पूफिंग?

आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध केवल सिग्नल रोकने तक सीमित नहीं है। आज कई देशों ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है जिसमें दुश्मन के सिस्टम को गलत जानकारी दी जाती है। इसे स्पूफिंग कहा जाता है। इस तकनीक में जैमर ऐसा नकली सिग्नल भेजता है जो बिल्कुल असली सैटेलाइट सिग्नल जैसा दिखाई देता है।

दुश्मन का रिसीवर उसे असली मान लेता है और गलत स्थान या दिशा की जानकारी प्राप्त करने लगता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि उसका ड्रोन गलत दिशा में चला जाएगा या मिसाइल टारगेट से भटक जाएगी या फिर उसका जहाज गलत रास्ते पर जाा सकता है। वहीं, एकॉर्ड सॉफ्टवेयर के नए सिस्टममें ऐसी क्षमताएं भी शामिल हैं।

नई प्रणाली को खास क्या बनाता है?

भारतीय नौसेना को मिलने वाले नए ईसीजीएनएसएस जैमर आम जैमर नहीं हैं। इनमें कई आधुनिक क्षमताएं शामिल की गई हैं। ये एक साथ कई सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम्स को प्रभावित कर सकते हैं। यानी केवल अमेरिकी जीपीएस ही नहीं बल्कि ग्लोनास, गैलीलियो, बेइदौ और भारतीय नाविक प्रणाली से जुड़े रिसीवरों पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।

इसके अलावा इनमें डायरेक्शन बेस्ड एंटीना लगाए गए हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर केवल दुश्मन के क्षेत्र में प्रभाव डाला जा सके और अपने प्लेटफॉर्म सुरक्षित रहें। ये सिस्टम रियल टाइम में स्थिति के अनुसार अपने काम करने के तरीके को भी बदल सकती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

भारतीय नौसेना को इसकी जरूरत क्यों?

पिछले कुछ सालों में समुद्री सुरक्षा का माहौल तेजी से बदला है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई देशों की नौसैनिक गतिविधियां बढ़ी हैं। आधुनिक युद्धपोत, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और मानव रहित प्लेटफॉर्म लगातार इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में केवल हथियार होना काफी नहीं है।

दुश्मन के कम्यूनिकेशन और नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
भारतीय नौसेना के पास एयरक्राफ्ट कैरियर्स, डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और नौसैनिक हेलीकॉप्टर हैं। इन सभी को सुरक्षित ऑपरेशन के लिए मजबूत इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा की जरूरत होती है। नए सिस्टम नौसेना को मल्टी-हेजार्ड एन्वायर्नमेंट में अधिक सुरक्षित तरीके से काम करने में मदद करेगी।

ड्रोन और मिसाइलों के खिलाफ इस्तेमाल

हाल के सालों में दुनिया भर के संघर्षों ने दिखाया है कि ड्रोन युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में हजारों ड्रोन इस्तेमाल किए गए हैं। इनमें से अधिकांश किसी न किसी प्रकार की सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि उनका नेविगेशन ब्लॉक कर दिया जाए तो उनकी प्रभावशीलता काफी कम हो सकती है। नया भारतीय सिस्टम दुश्मन के ड्रोन और कुछ प्रकार की प्रिसिजन-गाइडेड वेपन सिस्टम्स को कन्फ्यूज करने में मदद कर सकता है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

Explainer: क्या हैं इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ब्रिगेड्स और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर यूनिट्स? समझें भारतीय सेना के सबसे बड़े बदलाव का पूरा प्लान

Indian Army EW Brigades
Image for reference only. AI-Generated Image

Indian Army EW Brigades: भारतीय सेना एक ऐसे बदलाव के दौर से गुजर रही है जिसे पिछले कई दशकों की सबसे बड़ी मिलिट्री रिस्ट्रक्चरिंग माना जा रहा है। यह बदलाव सिर्फ नई बंदूकें, मिसाइलें या ड्रोन खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि सेना के पूरे स्ट्रक्चर, युद्ध लड़ने के तरीके और फैसले लेने की प्रक्रिया को बदलने से जुड़ा हुआ है। सेना अब ऐसी ताकत बनाना चाहती है जो किसी भी मोर्चे पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सके, कम समय में हमला या जवाबी कार्रवाई शुरू कर सके और एक साथ कई क्षेत्रों में लड़ाई लड़ने की क्षमता रखे।

रक्षा सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना अब पारंपरिक युद्ध की सोच से आगे बढ़कर मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस की दिशा में काम कर रही है। सेना का मानना है कि भविष्य का युद्ध केवल जमीन पर सैनिकों के बीच नहीं होगा, बल्कि साइबर स्पेस, सैटेलाइट नेटवर्क, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम और सूचना के मोर्चे पर भी लड़ा जाएगा।

इसी बड़े परिवर्तन के तहत सेना इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी आईबीजी को लागू करने जा रही है। इसके साथ ही विशेष इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ब्रिगेड्स बनाई जा रही हैं, जो दुश्मन के रडार, कम्युनिकेशन नेटवर्क और ड्रोन सिस्टम को युद्ध शुरू होने से पहले ही निष्क्रिय करने की क्षमता रखेंगी।

Indian Army EW Brigades: क्या है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप?

भारतीय सेना लंबे समय तक डिवीजन और कोर बेस्ड स्ट्रक्चर पर काम करती रही है। इस व्यवस्था में किसी बड़े ऑपरेशन के लिए अलग-अलग ब्रांचों को एक साथ लाना पड़ता था। इसमें समय लगता था और कई बार कॉर्डिनेशन की चुनौती भी सामने आती थी। इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप इसका जवाब है।

आईबीजी एक ऐस कॉम्बैट स्ट्रक्चर है जिसमें युद्ध के लिए जरूरी लगभग सभी संसाधन पहले से शामिल रहते हैं। इसमें इन्फैंट्री, आर्टिलरी, इंजीनियरिंग, एयर डिफेंस, ड्रोन यूनिट, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर टीम, लॉजिस्टिक्स, फील्ड हॉस्पिटल और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था एक ही कमांड के तहत काम करती है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि आईबीजी में अलग-अलग ब्रिगेड कमांडर नहीं होते। बल्कि मेजर जनरल रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में यह सीधे ऑपरेट करता है। इसका उद्देश्य युद्ध की शुरुआत में ही तेज प्रतिक्रिया देना, लॉजिस्टिकल देरी को कम करना और बहु-क्षेत्रीय (मल्टी-डोमेन) युद्ध के लिए तैयार रहना है।

करीब पांच हजार सैनिकों वाला यह स्ट्रक्चर पारंपरिक ब्रिगेड से बड़ा लेकिन डिवीजन से छोटा होता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि युद्ध या संकट की स्थिति में इसे तुरंत तैनात किया जा सकता है।

सूत्रों का कहना है कि आईबीजी को इस तरह तैयार किया गया है कि वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के सीमित समय तक खुद से सैन्य अभियान चला सके। (Indian Army EW Brigades)

जनरल बिपिन रावत की सोच अब जमीन पर उतर रही

आईबीजी का कॉन्सैप्ट पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के कार्यकाल में सामने आया था। उन्होंने सेना के स्ट्रक्चर को अधिक चुस्त और टेक्नोलॉजी बेस्ड बनाने के लिए व्यापक अध्ययन शुरू कराया था।

उस समय सेना के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, चीन के साथ उत्तरी सीमा पर बढ़ता तनाव और दूसरी, पाकिस्तान के साथ पश्चिमी मोर्चे पर लगातार सुरक्षा चुनौतियां।

इन परिस्थितियों में सेना को ऐसे स्ट्रक्चर की जरूरत महसूस हुई जो पारंपरिक व्यवस्था की तुलना में तेजी से कार्रवाई कर सके। इसी सोच से आईबीजी मॉडल का कॉन्सैप्ट सामने आया। (Indian Army EW Brigades)

कई साल तक चले ट्रायल

आईबीजी को सीधे लागू नहीं किया गया। पहले इसे कई चरणों में परखा गया। साल 2019 में पश्चिमी सीमा पर स्थित 9 कोर यानी राइजिंग स्टार कॉर्प्स को ट्रायल एरिया बनाया गया। इसके बाद 2019 में ही पूर्वी क्षेत्र में हिम विजय अभ्यास के दौरान इस मॉडल को पहाड़ी युद्ध के लिए परखा गया। इसमें माउंटेन स्ट्राइक कोर (17 कोर) ने इसमें भाग लिया।

इन अभ्यासों में यह देखा गया कि कठिन भूगोल, ऊंचाई वाले क्षेत्रों और आधुनिक तकनीक से लैस दुश्मन के खिलाफ आईबीजी कितना प्रभावी साबित हो सकता है।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि परीक्षणों के दौरान आईबीजी ने तेज प्रतिक्रिया, बेहतर समन्वय और कम लॉजिस्टिक देरी जैसी खूबियां दिखाई। इसके बाद सेना ने इस मॉडल को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक बाद के वर्षों में ड्रोन, रियल टाइम डेटा शेयरिंग और आधुनिक कम्युनिकेशंस सिस्टम्स को भी इसमें जोड़ा गया।

सबसे पहले बदलेगा माउंटेन स्ट्राइक कोर

जनवरी 2026 में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने संकेत दिया था कि आईबीजी प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू होगी। सबसे पहले चीन सीमा की जिम्मेदारी संभालने वाले 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर को आईबीजी में बदला जाएगा। इस कोर की दो डिवीजनों (59 डिवीजन और 23 डिवीजन) से चार आईबीजी बनाए जाएंगे। प्रत्येक आईबीजी स्वतंत्र रूप से आक्रामक और रक्षात्मक दोनों ऑपरेशंस कर सकेगा।

यह प्रक्रिया 2027 के मध्य तक पूरी करने का लक्ष्य है। इसके बाद मथुरा स्थित 1 कोर, अंबाला स्थित 2 कोर और भोपाल स्थित 21 कोर जैसे अन्य स्ट्राइक कोर का भी पुनर्गठन किया जाएगा।

यह कोर चीन सीमा पर आक्रामक क्षमता बनाए रखने के लिए तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत आने वाली डिवीजनों को पुनर्गठित करके चार आईबीजी बनाए जाएंगे।

रक्षा सूत्रों के अनुसार ये आईबीजी पहाड़ी इलाकों की जरूरतों के अनुरूप तैयार किए जाएंगे। इनमें हल्के लेकिन हाईली मोबाइल वेपंस, ड्रोन नेटवर्क, एयर मोबिलिटी और विशेष लॉजिस्टिक की व्यवस्था शामिल होगी।

सेना का कहना है कि इस बदलाव का मकसद केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि ऐसी सैन्य ताकत तैयार करना है जो किसी भी स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दे सके। (Indian Army EW Brigades)

थिएटर कमांड की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

आईबीजी को केवल एक नई मिलिट्री यूनिट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। यह प्रस्तावित थिएटर कमांड सिस्टम की आधारशिला भी है।

भारत भविष्य में अपनी सैन्य ताकत को उत्तर, पश्चिम और समुद्री थिएटर कमांड में संगठित करना चाहता है। इन कमांडों के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के संसाधनों का संयुक्त इस्तेमाल होगा।

सूत्रों का कहना है कि आईबीजी भविष्य के थिएटर कमांड मॉडल की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल यूनिट होगी।

क्यों बनाई जा रही हैं EW Brigades?

चीन और पाकिस्तान लगातार अपनी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं। वे दुश्मन के संचार नेटवर्क को जाम कर सकते हैं, गलत सिग्नल भेजकर भ्रम पैदा कर सकते हैं और साइबर हमलों के साथ इलेक्ट्रॉनिक हमले भी कर सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने विशेष ईडब्ल्यू ब्रिगेड बनाने का फैसला किया है।

फिलहाल सेना में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की जिम्मेदारी विशेष सिग्नल यूनिट्स संभालती हैं। लेकिन नई ईडब्ल्यू ब्रिगेड बनने के बाद मौजूदा उपकरणों और संसाधनों को एक साथ जोड़कर अधिक प्रभावी तरीके से काम किया जाएगा। इनका काम दुश्मन के संचार नेटवर्क को पकड़ना, उसकी गतिविधियों पर नजर रखना, रेडियो सिग्नलों को बाधित करना और ड्रोन तथा रडार सिस्टम को जाम करना होगा।

आज हर मिलिट्री सिस्टम किसी न किसी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल छोड़ता है। लड़ाकू विमान, मिसाइल, टैंक, रडार, ड्रोन और कम्युनिकेशन नेटवर्क लगातार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का उपयोग करते हैं।

ईडब्ल्यू ब्रिगेड दुश्मन के ड्रोन और हवाई खतरों की जानकारी तुरंत आर्टिलरी और एयर डिफेंस यूनिट्स तक पहुंचाएंगी, जिससे उन टारगेट्स को तेजी से निशाना बनाया जा सकेगा।

यही कारण है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर आधुनिक युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

भारतीय सेना ने अब विशेष ईडब्ल्यू यानी इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ब्रिगेड्स बनाने का फैसला किया है। इनका मुख्य काम दुश्मन के रडार, संचार नेटवर्क, ड्रोन और डेटा लिंक को पहचानना, ट्रैक करना और जरूरत पड़ने पर जाम करना होगा।

ये नई ब्रिगेड रुद्र ब्रिगेड्स का हिस्सा होंगी। रुद्र ब्रिगेड्स ऐसी आधुनिक मिलिट्री युनिट्स हैं जिनमें इन्फैंट्री, आर्मर्ड व्हीकल्स, आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और लॉजिस्टिक को एक साथ जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य युद्ध के दौरान सभी क्षमताओं को एक ही कमांड के तहत उपलब्ध कराना है। (Indian Army EW Brigades)

गोली चलने से पहले दुश्मन को अंधा करने की तैयारी

ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स यह भी सुनिश्चित करेंगी कि भारतीय सेना का अपना संचार नेटवर्क सुरक्षित और सुचारु रूप से काम करता रहे। इनका काम दुश्मन की “आंख और कान” को कमजोर करना और सेना के इनफॉरमेशन सिस्टम को सुरक्षित रखना होगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार नई ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स को पाकिस्तान और चीन सीमा के अलग-अलग सेक्टरों में तैनात किया जाएगा। इनका उद्देश्य युद्ध शुरू होने से पहले दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों का नक्शा तैयार करना होगा।

युद्ध की स्थिति में यही ब्रिगेड्स दुश्मन के रडार नेटवर्क को ब्लॉक कर सकती हैं, कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर सकती हैं और ड्रोन कंट्रोल लिंक को प्रभावित कर सकती हैं। ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स में एडवांस्ड जेमर्स, डायरेक्शन फाइंडर्स और सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) सिस्टम होंगे।

सूत्रों ने बताया कि आधुनिक युद्ध में कई बार जीत उस पक्ष की होती है जो दुश्मन को पहले देख ले और खुद दिखाई न दे। ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स इसी सिद्धांत पर काम करेंगी। (Indian Army EW Brigades)

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

रक्षा सूत्रों का कहना है कि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने अपनी टेक्निकल स्ट्रक्चर की व्यापक समीक्षा की थी। उस समीक्षा में यह सामने आया कि भविष्य के संघर्षों में ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और डेटा आधारित युद्ध की भूमिका और बढ़ेगी। इसी के बाद नई टेक्नोलॉजी बेस्ड मिलिट्री स्ट्रक्चर्स को तेजी से आगे बढ़ाया गया।

करगिल विजय दिवस 2025 के अवसर पर सेना प्रमुख ने रुद्र ब्रिगेड्स, 30 से अधिक भैरव कमांडो बटालियनों, ड्रोन संचालन के लिए शक्तिबाण रेजिमेंट्स और दिव्यास्त्र बैटरियों के गठन को मंजूरी दी थी। नई इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ब्रिगेड्स इसी सैन्य आधुनिकीकरण अभियान का हिस्सा हैं और सेना की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेंगी।

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और डीआरडीओ की बड़ी भूमिका

सेना की नई इलेक्ट्रॉनिक क्षमता को मजबूत करने में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और डीआरडीओ की महत्वपूर्ण भूमिका है।

रक्षा मंत्रालय भी इस योजना को नई टेक्नोलॉजी के जरिए सपोर्ट कर रहा है। अक्टूबर 2025 में धाराशक्ति इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को अपग्रेड करने के लिए 5,150 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। यह सिस्टम डीआरडीओ ने डेवलप किया है और इसका निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), एलएंडटी और अन्य भारतीय कंपनियां कर रही हैं।

इन सिस्टम्स को इस तरह डेवलप किया गया है कि वे दुश्मन के ड्रोन, रडार और संचार नेटवर्क की पहचान कर सकें तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय भी कर सकें।

इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ 1,476 करोड़ रुपये का समझौता किया है। इसके तहत आधुनिक मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदे जा रहे हैं। ये सिस्टम संभव, सम्युक्त और हिमशक्ति जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों के तहत विकसित किए जा रहे हैं।

सितंबर 2025 में सेना और वायुसेना के संयुक्त अभ्यास के दौरान इस सिस्टम ने लगभग 150 किलोमीटर दूरी पर दुश्मन के ड्रोन को निष्क्रिय करने की क्षमता दिखाई थी। यह सिस्टम खतरे का तुरंत विश्लेषण कर जामिंग भी कर सकता है।

इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने बीईएल के साथ 1,476 करोड़ रुपये का समझौता भी किया है। इसके तहत पांच आधुनिक मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदे जाएंगे। ये सिस्टम कठिन इलाकों में आगे बढ़ रही सेना के साथ चल सकते हैं और चीन सीमा तथा पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किए जाएंगे। (Indian Army EW Brigades)

इनफॉरमेशन वॉरफेयर भी बन गया नया मोर्चा

भारतीय सेना केवल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तक सीमित नहीं रहना चाहती। अब सूचना युद्ध भी उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है। आज सोशल मीडिया, फेक न्यूज, साइबर हमले और मनोवैज्ञानिक अभियान किसी भी संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं।

इसीलिए सेना ने विशेष इंफॉर्मेशन वारफेयर संगठन तैयार किया है। यह संगठन साइबर एक्सपर्ट्स, साइकोलॉजिकल आपरेशंस यूनिट्स, और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन यूनिट्स को एक प्लेटफार्म पर लाता है।

इसके अलावा एक ट्राई-सर्विस इंफॉर्मेशन वारफेयर यूनिट भी बनाई जा रही है। यह यूनिट थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करेगी। यह संगठन इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) मुख्यालय के तहत काम करेगा और तीनों सेनाओं के सूचना एवं साइबर अभियानों को एक साथ चलाने में मदद करेगा।

इसका उद्देश्य दुश्मन द्वारा फैलाए जाने वाले भ्रामक प्रचार का मुकाबला करना और सही सूचना को तेजी से आगे पहुंचाना है।

एआई, ड्रोन और डेटा बनेंगे नई ताकत

सेना ने साल 2026 को नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिसिटी का वर्ष घोषित किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्मों को एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जोड़ना है। ड्रोन, रडार, सेंसर, निगरानी प्रणाली और अग्रिम चौकियों से आने वाली जानकारी एक ही नेटवर्क पर उपलब्ध होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड सिस्टम इस डेटा का विश्लेषण करेगी और कमांडरों को तेजी से फैसले लेने में मदद देगी। (Indian Army EW Brigades)

भारतीय सेना को मिलेंगी 300 नई K9 वज्र तोपें? 23,000 करोड़ की मेगा डील पर बड़ा फैसला जल्द

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PIB)

300 K9 Vajra Deal: भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 300 से अधिक अतिरिक्त के9 वज्र-टी स्व-चालित तोपों (सेल्फ प्रोपेल्ड) की खरीद के लिए सरकार की मंजूरी लेने की तैयारी कर रही है। इस प्रस्तावित सौदे की कीमत लगभग 23,000 करोड़ रुपये है।

सूत्रों का कहना है कि यह प्रस्ताव जल्द ही डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड के सामने रखा जा सकता है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो इन तोपों का निर्माण लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) द्वारा किया जाएगा, जो दक्षिण कोरिया की हनव्हा टेकविन के सहयोग से भारत में के9 वज्र का प्रोडक्शन करती है।

सूत्रों का कहना है कि यह पिछले कई दशकों में भारतीय सेना की सबसे बड़ी आर्टिलरी खरीद में से एक हो सकती है। इस सौदे के बाद भारतीय सेना के लिए बनने वाली के9 वज्र तोपों की कुल संख्या 500 से भी अधिक हो जाएगी।

बता दें कि रक्षा समाचार ने 20 अप्रैल को बताया था कि के9 वज्र-टी के तीसरे फेज को लेकर बातचीत चल रही है।

300 K9 Vajra Deal: क्या है के-9 वज्र-टी?

के9 वज्र-टी एक आधुनिक सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोप है। यह दक्षिण कोरिया की प्रसिद्ध के9 थंडर सिस्टम्स का भारतीय वर्जन संस्करण है, जिसे भारतीय जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है।

यह 155 मिलीमीटर और 52 कैलिबर की तोप है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे किसी ट्रक से खींचने की जरूरत नहीं होती। यह खुद अपने ट्रैक पर चल सकती है और तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच सकती है। यह शूट एंड स्कूट रणनीति में माहिर है और डेजर्ट व हाई-ऑल्टीट्यूड दोनों इलाकों में कारगर साबित हुई है।

युद्ध में ऐसी तोपों को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वे फायरिंग करने के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकती हैं। इससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचना आसान हो जाता है। (300 K9 Vajra Deal)

40 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार

के9 वज्र की मारक क्षमता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह सामान्य गोला-बारूद के साथ 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकती है।

विशेष प्रकार के लॉन्ग रेंज दूरी वाले गोले और रॉकेट असिस्टेड गोला-बारूद के साथ इसकी रेंज लगभग 50 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। यह दुश्मन के ठिकानों, कमांड पोस्ट, गोला-बारूद भंडार और सैन्य जमावड़े को काफी दूर से निशाना बना सकती है। (300 K9 Vajra Deal)

कुछ सेकंड में कई गोले दागने की क्षमता

के9 वज्र को तेज फायरिंग के लिए डिजाइन किया गया है। यह मात्र 15 सेकंड में तीन गोले दाग सकती है। शुरुआती चरण में यह प्रति मिनट छह से आठ गोले तक दागने में सक्षम है। लंबे समय तक ऑपरेशन के दौरान भी यह लगातार दो से तीन गोले प्रति मिनट फायर कर सकती है।

इसमें मल्टीपल राउंड सिमल्टेनियस इम्पैक्ट तकनीक भी मौजूद है। इसका मतलब यह है कि अलग-अलग कोणों से छोड़े गए कई गोले एक ही समय पर लक्ष्य पर गिर सकते हैं। इस तकनीक से दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिल पाता।

रेगिस्तान से लेकर लद्दाख तक शानदार प्रदर्शन

भारतीय सेना ने के9 वज्र को केवल रेगिस्तानी इलाकों के लिए नहीं अपनाया है। शुरुआत में इन तोपों को पश्चिमी सीमा के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया था। बाद में चीन के साथ सीमा पर बढ़े तनाव के दौरान इन्हें लद्दाख में भी तैनात किया गया।

सूत्रों के अनुसार लद्दाख के कठिन मौसम और ऊंचाई वाले इलाकों में इन तोपों का विशेष परीक्षण किया गया था। वहां इसके इंजन, सस्पेंशन और अन्य प्रणालियों का प्रदर्शन शानदार रहा। यही वजह है कि अब सेना इनकी संख्या बढ़ाने की योजना बना रही है। (300 K9 Vajra Deal)

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PM Modi X Account)

पीएम मोदी ने की थी के9 वज्र की सवारी

19 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सूरत के पास हजीरा स्थित एल एंड टी के आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लैक्स का उद्घाटन किया था। यह भारत का पहला प्राइवेट सेक्टर प्लांट था, जहां के9 वज्र का उत्पादन शुरू हुआ।

उसके बाद उन्होंने हाल ही में 6 जून को फिर हजीरा प्लांट का दौरा किया। जहां उन्होंने जोरावर लाइट टैंक, के9 वज्र और अन्य स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का जायजा लिया। इस यात्रा में उन्होंने एल एंड टी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ में भूमिका की सराहना की। इस मौके पर पीएम मोदी ने खुद के9 वज्र पर सवार होकर इसकी मोबिलिटी और ताकत का अनुभव लिया।

इस साल अप्रैल में शुरू हुई थी बातचीत

20 अप्रैल को दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की भारत यात्रा के दौरान के9 वज्र-टी स्व-चालित हॉवित्जर को लेकर बातचीत हुई थी। दोनों देशों ने के9 वज्र प्रोजेक्ट को अगले चरण में ले जाने, स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और एडवांस टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण पर विस्तार से बातचीत की थी। इसके अलावा के9 वज्र-टी तोपों को और आधुनिक बनाने के लिए नई तकनीक लगाने की योजना को लेकर भी चर्चा हुई थी, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से काम करेगी।

इस अपग्रेड में रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम (आरसीडब्ल्यूएस) शामिल होगा, जो अपने आप ड्रोन को पहचान सकता है, उनका पीछा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बना सकता है।

इसके साथ ही इनमें जैमर और खास सेंसर भी जोड़े जाएंगे, जिससे ये दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों से बेहतर तरीके से निपट सकें। ऐसी सुविधाएं के9 के नए वर्जन, जैसे के9ए2 और के9ए3 में पहले से मौजूद हैं। (300 K9 Vajra Deal)

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PM Modi X Account)

2017 में मिला था पहला ऑर्डर

के9 वज्र की कहानी भारत में साल 2017 से शुरू हुई। उस समय भारतीय सेना ने 100 तोपों के लिए लगभग 4,500 करोड़ रुपये का पहला कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस परियोजना की जिम्मेदारी एलएंडटी को दी गई थी। कंपनी ने गुजरात के हजीरा स्थित अपने आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लेक्स में इन तोपों का उत्पादन शुरू किया।

इन 100 तोपों की डिलीवरी तय समय से पहले पूरी कर दी गई थी। साल 2021 तक सभी तोपें सेना को सौंप दी गई थीं।

पहले अनुबंध के बाद सेना ने इन तोपों के प्रदर्शन की समीक्षा की। रक्षा सूत्रों के अनुसार सेना के9 वज्र के प्रदर्शन से संतुष्ट रही। इसके बाद 2023-24 में दूसरा लगभग 7,600 करोड़ रुपये की लागत से 100 और तोपों का अतिरिक्त ऑर्डर दिया गया। अब तीसरी बार 23,000 करोड़ रूपये की तीसरी डील में 300 से अधिक नई तोपों की खरीद का प्रस्ताव सामने आया है। यदि यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है तो के9 वज्र भारतीय सेना की सबसे बड़ी सेल्फ प्रोपेल्ड गन सिस्टम बन जाएगी।

स्वदेशीकरण बढ़ाने पर फोकस 

के9 वज्र परियोजना की एक खास बात इसका बढ़ता स्वदेशीकरण है। पहले बैच के दौरान कई प्रमुख पुर्जे विदेश से आते थे। लेकिन धीरे-धीरे भारत में निर्माण बढ़ाया गया। रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अब इस प्लेटफॉर्म में 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसमें भारतीय उद्योग, छोटे और मध्यम उद्यमों तथा विभिन्न सप्लाई चेन कंपनियों की भी भागीदारी बढ़ी है। (300 K9 Vajra Deal)

दो मोर्चों की चुनौती के बीच बढ़ रही जरूरत

भारतीय सेना को एक साथ पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर तैयार रहना पड़ता है। पश्चिम में पाकिस्तान सीमा और उत्तर में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति को देखते हुए सेना लंबी दूरी की फायरपावर बढ़ाने पर जोर दे रही है।

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में केवल सैनिकों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि तेजी से प्रतिक्रिया देने वाली तोपें और सटीक मार करने वाले हथियार भी उतने ही जरूरी होते हैं। वहीं, के9 वज्र इसी जरूरत को पूरा करती है।

पुरानी तोपों की जगह ले रही नई प्रणाली

भारतीय सेना लंबे समय से अपनी आर्टिलरी को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में लगी हुई है। कई दशक पुरानी 105 मिलीमीटर और 130 मिलीमीटर तोपों को धीरे-धीरे नई 155 मिलीमीटर वाली गनों से बदला जा रहा है।

इस अभियान के तहत धनुष तोप, एटीएजीएस, एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर और पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम भी शामिल की गई हैं।

सामान्य तोपों की तुलना में के9 वज्र में क्रू बेहतर सुरक्षा के भीतर काम करता है। इसमें विशेष कवच सुरक्षा, न्यूक्लियर-बायोलॉजिकल-केमिकल सुरक्षा प्रणाली और आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम लगे हुए हैं। युद्ध के दौरान चालक दल को खुले क्षेत्र में काम नहीं करना पड़ता, जिससे उनकी सुरक्षा बढ़ जाती है। (300 K9 Vajra Deal)

ECHS का बड़ा आदेश: बिना रेफरल इलाज कराया तो नहीं मिलेगा रीइंबर्समेंट, पूर्व सैनिकों के लिए नई चेतावनी

ECHS Reimbursement Rules
Image for reference only. AI-Generated Image

ECHS Reimbursement Rules: पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली एक्स-सर्विसमैन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) ने इलाज से जुड़े नियमों को लेकर एक अहम निर्देश जारी किया है। रीजनल सेंटर ईसीएचएस, कोच्चि ने सभी पॉलीक्लिनिकों को भेजे गए एक सर्कुलर में स्पष्ट कहा है कि यदि कोई लाभार्थी निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे एम्पैनल्ड अस्पताल में योजनाबद्ध इलाज कराता है, तो उसके रीइंबर्समेंट क्लेम पर गंभीर असर पड़ सकता है।

यह सर्कुलर ऐसे समय जारी किया गया है जब कई मामलों में देखा गया कि लाभार्थी पहले रेफरल लिए बिना निजी एम्पैनल्ड अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं और बाद में खर्च की भरपाई के लिए रीइंबर्समेंट की मांग कर रहे हैं। ईसीएचएस का कहना है कि यह प्रक्रिया मौजूदा नियमों और दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं है।

ECHS Reimbursement Rules: क्या कहा गया है सर्कुलर में?

कोच्चि स्थित रीजनल सेंटर ईसीएचएस द्वारा जारी पत्र में सभी पॉलीक्लिनिकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने इलाके के लाभार्थियों को रेफरल प्रक्रिया के बारे में जागरूक करें और उन्हें नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करें।

सर्कुलर में कहा गया है कि कुछ लाभार्थी बिना रेफरल लिए एम्पैनल्ड हेल्थकेयर ऑर्गेनाइजेशन यानी सूचीबद्ध अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं। बाद में वे इलाज का खर्च वापस पाने के लिए रीइंबर्समेंट क्लेम दाखिल कर रहे हैं। ईसीएचएस के अनुसार यह व्यवस्था योजना के मूल नियमों के खिलाफ है। (ECHS Reimbursement Rules)

कैशलेस इलाज देना अस्पतालों की जिम्मेदारी

ईसीएचएस ने अपने पत्र में यह भी याद दिलाया है कि एम्पैनल्ड अस्पतालों की जिम्मेदारी है कि वे लाभार्थियों को कैशलेस इलाज उपलब्ध कराएं।

यदि कोई अस्पताल कैशलेस सुविधा देने से मना करता है तो इसे समझौते की शर्तों का उल्लंघन माना जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो अन्य अस्पताल भी कैशलेस सुविधा देने से बच सकते हैं। इसका सीधा असर पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ेगा, जिन्हें अपनी जेब से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ सकती है।

आखिर क्या है रेफरल सिस्टम?

ईसीएचएस के तहत किसी भी योजनाबद्ध इलाज के लिए सबसे पहले लाभार्थी को अपने पैरेंट पॉलीक्लिनिक जाना होता है। वहां मौजूद डॉक्टर मरीज की जांच करते हैं और जरूरत होने पर किसी विशेषज्ञ या अस्पताल के लिए रेफरल जारी करते हैं।

इसी रेफरल के आधार पर मरीज एम्पैनल्ड अस्पताल में कैशलेस इलाज प्राप्त कर सकता है।

सामान्य तौर पर यह रेफरल 30 दिन तक वैध रहता है। कुछ गंभीर बीमारियों, जैसे कैंसर आदि के मामलों में इसकी अवधि अधिक हो सकती है। (ECHS Reimbursement Rules)

कौन से इलाज में जरूरी है रेफरल?

नियमों के अनुसार सर्जरी, विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह, विशेष जांच, भर्ती होकर इलाज और अन्य योजनाबद्ध चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए रेफरल जरूरी होता है।

हालांकि आपातकालीन स्थिति अलग होती है। यदि मरीज को अचानक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो जाती है तो वह सीधे अस्पताल जा सकता है। ऐसे मामलों में बाद में निर्धारित समय सीमा के भीतर ईसीएचएस को सूचित करना होता है। (ECHS Reimbursement Rules)

क्यों बढ़ी चिंता?

ईसीएचएस अधिकारियों के अनुसार हाल के समय में ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें लाभार्थी सीधे अस्पताल पहुंचे, इलाज कराया और फिर खर्च के वापसी के लिए रीइंबर्समेंट क्लेम दाखिल किया।

इससे दो तरह की समस्याएं पैदा हुईं। पहली, कैशलेस व्यवस्था का उद्देश्य प्रभावित हुआ। दूसरी, रीइंबर्समेंट क्लेम की संख्या बढ़ने से प्रशासनिक प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।

इसी वजह से कोच्चि रीजनल सेंटर ने नियमों को दोबारा स्पष्ट करते हुए सभी पॉलीक्लिनिकों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। (ECHS Reimbursement Rules)

ECHS Reimbursement Rules
AI-Generated Image with original Circular.

बिना रेफरल वाले मामलों में अब क्या होगा?

सर्कुलर के अनुसार यदि कोई लाभार्थी बिना रेफरल के योजनाबद्ध इलाज कराता है और बाद में क्लेम जमा करता है, तो संबंधित अस्पताल से लिखित स्पष्टीकरण लिया जाएगा।

अस्पताल को बताना होगा कि उसने मरीज को कैशलेस सुविधा क्यों नहीं दी। इस स्पष्टीकरण को क्लेम दस्तावेजों के साथ अपलोड करना अनिवार्य होगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पताल भी अपने दायित्वों का पालन करें और लाभार्थियों को अनावश्यक आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।

ईसीएचएस की शुरुआत रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2003 में की थी। इसका उद्देश्य सेवानिवृत्त सैनिकों, उनके आश्रितों और युद्ध वीरांगनाओं को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।

आज देशभर में लाखों पूर्व सैनिक और उनके परिवार इस योजना का लाभ ले रहे हैं। योजना के तहत सैकड़ों पॉलीक्लिनिक, सैन्य अस्पताल, सरकारी अस्पताल और हजारों निजी एम्पैनल्ड अस्पताल जुड़े हुए हैं।

ईसीएचएस की सबसे बड़ी विशेषता कैशलेस इलाज की सुविधा मानी जाती है, जिससे लाभार्थियों को इलाज के समय बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती।

अधिकारियों ने सलाह दी है कि किसी भी योजनाबद्ध इलाज से पहले अपने नजदीकी ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक से संपर्क करें। डॉक्टर की सलाह के बाद रेफरल प्राप्त करें और उसी के आधार पर सूचीबद्ध अस्पताल में इलाज कराएं।

इससे कैशलेस सुविधा का लाभ मिलेगा और बाद में रीइंबर्समेंट से जुड़ी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

कोच्चि रीजनल सेंटर का यह आदेश आर्मी, नेवी और अन्य संबंधित स्टेशन मुख्यालयों को भी भेजा गया है ताकि सभी जगह एक जैसी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जा सके। (ECHS Reimbursement Rules)