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Explainer: The Hero of Operation Sindoor will do with the Lieutenant General Rajiv Ghee NSA Ajit Dobal work, know what does NSCS Military Advisor?

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser
Appointed Military Adviser to NSCS (Photo: PIB)

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: The Prime Minister’s Office, Ministry of Defence, Army Headquarters, National Security Adviser or the Heads of the Three Forces in the minds of the people when it comes to major decisions related to the security of the country. But there is also an institution that often lives away from the headlines, while almost every big strategy associated with national security, every significant review and every sensitive decision has an important role. This institution is the National Security Council Secretariat i.e. NSCS.

In the past few years, NSCS’s importance is constantly enhanced. This is the biggest reason why many senior military officers working here have later reached the country’s largest defence positions. Recently Lt. General NS Raja Subramani was created Chief of Defence Staff i.e. CDS. Prior to that, General Anil Chauhan had also stayed the Military Advisor in this institution and later became CDS. At the same time, the Lt Gen Rajiv Ghee, a national identifiable as DGMO during the country’s first now operation shift has been appointed as the new Military Advisor of NSCS.

That’s why NSCS is now not only a secretariat but also to be seen as a national security leadership formulation institution.

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: How did NSCS start?

The discussion of creating an integration system for national security issues in India was accelerated in the 1990s. India’s nuclear test in May 1998 and then 1999’s Cargill War It clarified that the country needs an institution that is not limited to only military matters but also to add foreign policy, intelligence, economic security, technical development and military strategy to a platform.

On 19th November 1998, then Prime Minister Atal Bihari Vajpayee established National Security Council (NSC). Also designed the National Security Council Secretariat (NSCS) to institutionalize the functioning of the Council.

At that time, India’s first National Security Advisor was Brajesh Misra. NSCS was a primarily analysing and advising institution in early years. Its work was to raise information from various Ministries and Agencies, prepare reports and input the National Security Council. Ghai NSCS Military Adviser

How the strength of NSCS replaceable in 2018?

Sources that look closely at national security cases show that NSCS The biggest change in history came in 2018. NSCS was formally incorporated into the Allocation of Business Rules (AoB) and Transaction of Business Rules (ToB) that year. These are the rules on which the rights, responsibilities and decision process of the Ministries and Departments of the Government of India is decided.

NSCS primarily advised before this change. But after 2018 it was not only the advisory institution, but also became an active part of the government decision process. Under the Article 77(3) of the Constitution now it can cordinate between different ministries, work on files associated with security cases and play a role in advancing decisions associated with national security.

That’s why today it is called the "Never Centre" of India’s national security system.

How does NSC work with NSA?

NSCS works directly under National Security Advisor i.e. NSA. At present, this responsibility is near Ajit Dobal.

National Security Advisors recommend security to the Prime Minister and the Government. But it is not possible to handle so large security infrastructure alone. NSCS works in such a permanent institutional framework.

The security experts, military officers, intelligence officers, technical experts and policy analysts work together on various topics. China has activities, challenges associated with Pakistan, threaten cybersecurity, compete in space area or question of maritime security, NSCS on all these subjects consistently study and analyze.

How is it? Structure of NSCS?

NSCS is not a single institution but part of the National Security Council system.

It has the National Security Council headed by the Prime Minister. In addition Strategic Policy Group और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड जैसी संस्थाएं भी मौजूद हैं।

स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप में कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, गृह सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेनाओं के प्रमुख और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं।

वहीं नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड में सेवानिवृत्त राजनयिक, सैन्य अधिकारी, शिक्षाविद और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इन सभी के बीच कॉर्डिनेशन करने का काम एनएससीएस करता है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

कौन होता है मिलिट्री एडवाइजर?

एनएससीएस के भीतर सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक है मिलिट्री एडवाइजर यानी एमए। यह अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सैन्य मामलों पर सलाह देता है। वह सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों, सैन्य क्षमताओं और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में टॉप लेवल पर जानकारी उपलब्ध कराता है। मिलिट्री एडवाइजर एनएससीएस और भारतीय सेनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है।

एमए का सबसे बड़ा काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सीमा सुरक्षा, सैन्य तैयारियों, युद्धक क्षमताओं, रक्षा रणनीति और उभरते खतरों पर सलाह देना है। वह एनएससीएस के मिलिट्री विंग का नेतृत्व करता है और लोंग-टर्म डिफेंस प्लांस, थिएटर कमांड्स, जॉइंट मिलिटरी ऑपरेशंस और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह अधिकारी केवल सैन्य सलाहकार नहीं होता, बल्कि रक्षा मंत्रालय, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेना प्रमुखों और विभिन्न खुफिया एजेंसियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है। सैन्य खुफिया एजेंसियों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण कर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जोड़ना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

यह पद इसलिए भी चर्चा में रहता है क्योंकि हाल के सालों में यहां काम कर चुके अधिकारी देश के सर्वोच्च सैन्य पदों तक पहुंचे हैं। जनरल अनिल चौहान और जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि दोनों पहले एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर रहे और बाद में सीडीएस बने। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

अब तक कौन-कौन रहे हैं मिलिट्री एडवाइजर?

बहुत से लोग मानते हैं कि मिलिट्री एडवाइजर का पद 2018 में शुरू हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है।

इस पद पर सबसे पहले लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन नियुक्त हुए थे। वह 2011 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद 2012 में एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर बने। उन्होंने लगभग 2014 तक यह जिम्मेदारी निभाई। बाद में 2015 से 2017 तक वह एनएससीएस में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के तौर पर भी रहे।

इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल विनोद खंडारे ने यह जिम्मेदारी संभाली। वह मोदी सरकार के दौर में इस पद पर आने वाले पहले प्रमुख सैन्य सलाहकारों में गिने जाते हैं।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान इस पद पर आए। एनएससीएस में काम करने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक मुद्दों पर अनुभव हासिल किया और बाद में सितंबर 2022 में भारत के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने।

इसके बाद एयर मार्शल संदीप सिंह को मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया। वह भारतीय वायुसेना से इस पद पर पहुंचने वाले पहले अधिकारी थे।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने यह जिम्मेदारी संभाली। मई 2026 में उन्हें देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया।

वहीं, अब लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई इस पद पर आ रहे हैं। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

क्यों खास है लेफ्टिनेंट जनरल घई की नियुक्ति?

Lieutenant General Rajiv Ghee की नियुक्ति कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सबसे पहले, वह पहले ऐसे इन-सर्विस तीन-स्टार अधिकारी हैं जिन्हें मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया है। उनसे पहले इस पद पर आने वाले अधिकांश अधिकारी रिटायर होने के बाद एनएससीएस पहुंचे थे।

दूसरा, उनके पास अभी लगभग डेढ़ साल से अधिक की सेवा बची हुई है। उनका कार्यकाल दिसंबर 2027 तक है।
तीसरा, वह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ थे और पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में शामिल रहे।

मध्यप्रदेश में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने अपने सैन्य करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनके पिता भी सेना में वरिष्ठ अधिकारी रहे थे। दिसंबर 1989 में उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन मिला।

कुमाऊं रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित इन्फेंट्री रेजिमेंट्स में से एक है, जो अपनी बहादुरी और अनुशासन के लिए जानी जाती है। वे इस रेजिमेंट के कर्नल भी हैं।

उन्होंने वेस्टर्न सेक्टर में एक इन्फैंट्री बटालियन की कमान संभाली। इसके बाद मध्य क्षेत्र में स्वतंत्र ब्रिगेड का नेतृत्व किया। वह अरुणाचल प्रदेश में 56 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रहे।

बाद में उन्हें श्रीनगर स्थित 15 कोर की कमान सौंपी गई। यह वही कोर है जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों और नियंत्रण रेखा की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके बाद वह डीजीएमओ बने और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहम भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए उन्हें 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मनित किया गया। इसके बाद जून 2025 में उन्हें सेना मुख्यालय में उप सेनाध्यक्ष (रणनीति) नियुक्त किए गए। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

सीडीएस बनने की क्या है शर्त?

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ देश की तीनों सेनाओं थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल स्थापित करने वाला सबसे वरिष्ठ सैन्य पद है। दिसंबर 2019 में इस पद का गठन किया गया था और जनवरी 2020 में जनरल बिपिन रावत पहले सीडीएस बने थे।

सीडीएस बनने के लिए किसी अधिकारी का चार-स्टार रैंक का अधिकारी होना जरूरी नहीं है। सरकार के 2022 के संशोधित नियमों के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल रैंक के सेवारत अथवा सेवानिवृत्त अधिकारी भी सीडीएस नियुक्त किए जा सकते हैं। हालांकि अधिकारी की आयु नियुक्ति के समय 62 वर्ष से कम होनी चाहिए।

CDS के चयन के लिए केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मानदंड नहीं होती। सरकार अधिकारी के पूरे सैन्य अनुभव, नेतृत्व क्षमता, संयुक्त सैन्य अभियानों की समझ, रणनीतिक सोच, राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों की जानकारी और तीनों सेनाओं के साथ काम करने के अनुभव को भी देखती है। यही वजह है कि कई बार सबसे वरिष्ठ अधिकारी की बजाय उस अधिकारी को चुना जाता है जिसे सरकार भविष्य की सैन्य चुनौतियों के लिए अधिक उपयुक्त मानती है।

सीडीएस के लिए आमतौर पर ऐसे अधिकारी को प्राथमिकता मिलती है जिसने कोर, कमांड या समकक्ष स्तर पर नेतृत्व किया हो और राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक निर्णयों का अनुभव रखा हो। थिएटर कमांड, जॉइंटनेस, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा सुधारों की समझ भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

Explainer: Operation from Sindoor to Balakot; How to make the DRDO eye the ‘third eye’ of Indian Air Force, which failed every move of the enemy?

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

Netra AWACS Explained: The real edge in the modern war meets the same country that looked before the enemy, can make sense of his activities live time and use his arms in the right direction at the right time. That’s why every big Air Force of the world today considers its most important assets to the Airborne Early Warning and Control System. While India’s Eye Avox system has paved the DRDO, which allowed the iron of its capacity from Operation Sitter to Balakot Airstrike.

The Eye Eye Awax has been found to be the Final Operational Clearance (FOC) in the Centre for Airborne Systems (CABS) of the DRDO located on June 25, Bengaluru. This achievement is therefore also considered important as the eye with it will be fully formulated and certified systems for Combat Functions.

Netra AWACS Explained: What Is AEW&C System and Why Need It?

Usually people understand that radars are planted only on the ground, but radars present on the ground have their own limits. Earth rounding, mountains, buildings and other natural barriers limit their monitoring capacity. If an enemy plane is flying down very often in such a way, he can escape the radar’s eyes several times.

The role of the Avox system begins. It is a special aircraft, with a state-of-the-art radar, sensor, communication equipment and a combination management system. This aircraft can monitor the airspace for hundreds of kilometers away, flying at a height of thousands of feet. That’s why it’s often referred to as "radar station" or "comman’s command center".

The eye does not only work to find enemy planes, but also helps to operate the entire Aerial Combat. It works by connecting Indian fighter planes, ground control stations and air defense networks together.

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

How to Start a Eye Project?

India felt during the Cargill War of 1999 that the country needs to further strengthen its Aerial Surveillance capacity. At that time, Indian Air Force had limited Airborne Surveillance Resources.

India had earlier Israeli Folcon Avox based on the IL-76 platform, but DRDO launched the Eye Project to devlop indigenous capacity.

After this, DRDO decided to prepare the Indigenous Avox system. Several technical challenges came out in the early years. A project that is being developed earlier had to close after an accident. Though Indian scientists did not lose and started new.

Finally the Brazilian Embraer ERJ-145 jet was selected as the platform. On top of this, Indian scientists prepared eye by paving indigenous radars, mission systems and electronic warfare equipments.

The project was comprised of only Centre for Airborne Systems but several major laboratories of DRDO. Electronics and Radar Development Assessment (LRDE) created a radar then Defence Electronics Appliques Laboratory (DEAL) prepared data links and Defence Aviation Research Assessment (DARE) paved self protection suites to avoid electronic warfare systems and missiles. LRDE is the institution that has developed the AESA radar devlop. (Netra AWACS Explained)

Which technology is located inside the eye?

The greatest strength of the eye is its indigenous AESA radar. AESA i.e. Active Electronically Scanned Array Radar is today counted in the world’s most modern radar techniques.

This radar does not rotate like traditional radars. Instead it controls the beam in an electronic way and can simultaneously monitor in multiple directions.

Visually imposed radar fighters can detect planes, drones, helicopters and other aerial targets. Also it also has electronic support tables, communication support tables, satellite communications, identification Friend Or For Systems, data links and self protection systems.

Special workstations have been created for mission operators in the aircraft, where meetingrs they monitor the entire Battle Field and direct fighter planes. (Netra AWACS Explained)

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

How Does Eye Work?

When the eye is flying, his AESA radar constantly scans around the airspace. If any aircraft, drones or missile comes from a direction, its presence immediately appears on the radar screen.

After this the system tries to recognize that the target is friend or the enemy. If the target is found suspicious, the information is immediately sent to the network of Indian Air Force.

Then the command center on the ground and the flying fighter plane in the air can immediately take action.

Simply put, the eye sees the enemy first, shares his information and then works to direction his planes during the battle. (Netra AWACS Explained)

How much is the range and capacity of the eye?

AESA radar fighter jets like large aerial targets installed in the existing Mk-1 version of the eye can identify about 250 to 375 kilometers. While its instrumented range can reach 450 to 500 kilometres.

Two modern AESA radars are mounted above the eye. It can monitor around 240 degrees of area due to these. This means that it is monitored on the front, right and left large part of the plane. This coverage will be extended and extended in the upcoming advance version.

It can identify only fighter planes but also small drones and low radar signature targets. Also can monitor some targets present on the marine surface.

Flying at a height of about 35,000 feet it can cover a larger area than the radars on the ground.

वहीं, नेत्र में केवल रडार ही नहीं लगा है। बल्कि इसमें इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM) सिस्टम भी मौजूद है, जो दुश्मन के रडार, संचार उपकरणों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को पकड़ सकता है। यह सिस्टम लगभग 360 डिग्री क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

यानी यदि कोई दुश्मन का रडार एक्टिव होता है या कोई मिलिट्री कम्युनिकेशन नेटवर्क काम कर रहा है, तो नेत्र उसकी जानकारी भी जुटा सकता है।

नेत्र सामान्य तौर पर करीब 9 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है। हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा के जरिए यह और अधिक समय तक मिशन पर बना रह सकता है। इसका मतलब है कि किसी संकट की स्थिति में यह लंबे समय तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकता है। (Netra AWACS Explained)

Netra AWACS Explained
Netra AWACS (Image Source: DRDO)

ऑपरेशन सिंदूर में कैसे भारत की ‘उड़ती हुई आंख’ बना नेत्र?

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि ऑपरेशन सिंदूर में नेत्र भी शामिल हुआ था। मई 2025 में जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, तब भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र, मिसाइल गतिविधियों, ड्रोन उड़ानों और लड़ाकू विमानों की हर हरकत पर नजर रखनी थी। ऐसे समय में नेत्र ने एक ऐसे “फोर्स मल्टीप्लायर” की भूमिका निभाई जिसने पूरे ऑपरेशन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की।

हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए नेत्र लगातार पाकिस्तान की ओर से होने वाली हवाई गतिविधियों पर नजर रख रहा था। नेत्र का रडार लगातार बड़े इलाके को स्कैन करता रहा। यदि कोई लड़ाकू विमान उड़ान भरता, कोई ड्रोन एक्टिव होता या कोई अन्य हवाई गतिविधि दिखाई देती, तो उसकी जानकारी तुरंत नेटवर्क के जरिए साझा की जाती थी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके अंदर मौजूद मिशन ऑपरेटर लगातार बैटल फील्ड का विश्लेषण कर रहे थे। वे अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली जानकारी को जोड़कर एक बड़ी तस्वीर तैयार करते थे। इसके बाद यह जानकारी भारतीय वायुसेना के नेटवर्क में साझा की जाती थी।

इससे कमांडरों को यह समझने में मदद मिलती थी कि किस क्षेत्र में खतरा अधिक है, किस दिशा में विमान भेजने हैं और कहां अतिरिक्त निगरानी की जरूरत है। (Netra AWACS Explained)

ऑपरेशन सिंदूर में तैनात था Mk-1A टेस्टबेड

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक खास बात यह थी कि इसमें नेत्र Mk-1A टेस्टबेड को भी तैनात किया गया था। यह प्लेटफॉर्म उस समय अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के फेज में था, लेकिन उसे असल युद्ध हालात में इस्तेमाल किया गया।

भारतीय वायुसेना के अधिकारियों ने बाद में बताया कि इस सिस्टम ने बेहद प्रभावी प्रदर्शन किया और ऑपरेशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केवल नेत्र ही नहीं बल्कि भारतीय वायुसेना के फाल्कन अवॉक्स प्लेटफॉर्म भी एक्टिव थे।
फाल्कन बड़े साइज के एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम हैं जबकि नेत्र उससे छोटा प्लेटफॉर्म है। दोनों ने मिलकर भारतीय वायुसेना को मल्टी लेयर सर्विलांस उपलब्ध कराया।

जहां फाल्कन बड़े इलाके की निगरानी कर रहे थे, वहीं नेत्र खास इलाकों में डिटेल्ड एरियल फोटोग्राफ उपलब्ध करा रहा था।

ऑपरेशन सिंदूर में नहीं मिला था FOC

दिलचस्प बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के समय भी नेत्र को अभी फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस नहीं मिला था। उस समय यह इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस के तहत सर्विस में था और विभिन्न परीक्षणों से गुजर रहा था। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने इस पर भरोसा जताया और इसे अभियान में शामिल किया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके प्रदर्शन ने बाद में FOC प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भी मदद की। जिसके बाद जनवरी 2026 में भारतीय वायुसेना ने नेत्र को फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस दे दिया। (Netra AWACS Explained)

बालाकोट ऑपरेशन में नेत्र हुआ इस्तेमाल

फरवरी 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान नेत्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बालाकोट ऑपरेशन के दौरान नेत्र का काम बम गिराना या हमला करना नहीं था। इसकी जिम्मेदारी पूरे युद्धक्षेत्र की निगरानी करना और भारतीय वायुसेना को लगातार जानकारी उपलब्ध कराना था। भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र की गतिविधियों पर लगातार नजर रखनी थी और अपने लड़ाकू विमानों को रियल टाइम जानकारी उपलब्ध करानी थी।

नेत्र ने उस दौरान भारतीय वायुसेना को महत्वपूर्ण हवाई तस्वीर उपलब्ध कराई। उस दौरान जब मिराज-2000 विमान अपने टारगेट की ओर बढ़ रहे थे, तब नेत्र आसमान में उड़ते हुए उनकी “आंखों और दिमाग” की तरह काम कर रहा था। यह लगातार पाकिस्तान की ओर से होने वाली हवाई गतिविधियों पर नजर रख रहा था और भारतीय कमांडरों को रियल टाइम इनफॉरमेशन दे रहा था। यदि कोई एफ-16, जेएफ-17 या अन्य लड़ाकू विमान उड़ान भरता, तो उसकी जानकारी तुरंत भारतीय वायुसेना तक पहुंच जाती।

इससे भारतीय लड़ाकू विमानों को बेहतर स्थिति की जानकारी मिल सकी और पूरे ऑपरेशन की निगरानी आसान हुई। बालाकोट के बाद भारतीय सेनाओं अवॉक्स प्लेटफॉर्म की अहमियत और भी बढ़ गई।

हालांकि खास बात यह है कि उस समय नेत्र सिस्टम अभी शुरुआती ऑपरेशनल फेज में था और उसे फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC) नहीं मिला था। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने इस पर भरोसा जताया और इसे मिशन में शामिल किया।

FOC मिलने का क्या मतलब है?

किसी भी मिलिट्री प्लेटफॉर्म को सीधे युद्ध में इस्तेमाल नहीं किया जाता। सबसे पहले उसका डेवलपमेंट होता है, फिर परीक्षण होते हैं और उसके बाद सीमित इस्तेमाल की अनुमति मिलती है।

जब सभी परीक्षण पूरे हो जाते हैं और यूजर यानी भारतीय वायुसेना पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है, तब फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस दिया जाता है।

नेत्र को FOC मिलने का अर्थ है कि उसने भारतीय वायुसेना द्वारा तय सभी एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स को पूरा कर लिया है। अब इसे पूरी तरह कॉम्बैट मिशनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। (Netra AWACS Explained)

पाकिस्तान और चीन के मुकाबले भारत के पास कितने अवॉक्स प्लेटफॉर्म?

भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 3 इजरायली फाल्कन AWACS और 3 स्वदेशी नेत्र AEW&C सिस्टम मौजूद हैं। फाल्कन सिस्टम बड़े IL-76 विमान पर आधारित हैं और लंबी दूरी की निगरानी करते हैं। वहीं नेत्र अपेक्षाकृत छोटा और स्वदेशी प्लेटफॉर्म है। दोनों मिलकर भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत बनाते हैं।

वहीं, पाकिस्तान एयर फोर्स के पास लगभग 13 अवॉक्स हैं, जिनमें स्वीडन के साब-2000 एरीआई सिस्टम और चीन के ZDK-03 प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में काफी आगे है। उसके पास लगभग 60 से ज्यादा यूनिट KJ-500, KJ-200 और अन्य एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम की बड़ी संख्या मौजूद है। चीन ने पिछले सालों में इस क्षमता का तेजी से विस्तार किया है।

यही कारण है कि भारत भी अपने AEW&C बेड़े को मजबूत करने पर लगातार काम कर रहा है। वायुसेना को कम से कम 15-18 यूनिट्स चाहिए ताकि दोनों मोर्चों पर पर्याप्त कवरेज हो। (Netra AWACS Explained)

नेत्र Mk-1A और Mk-2 में क्या है अंतर

नेत्र की सफलता के बाद इसके एडवांस वर्जन पर भी काम चल रहा है। नेत्र Mk-1A मौजूदा प्लेटफॉर्म का बेहतर वर्जन होगा जिसमें एडवांस रडार, नए प्रोसेसर और आधुनिक सॉफ्टवेयर लगाए जाएंगे।

इसके अलावा AWACS इंडिया कार्यक्रम के तहत एयरबस A321 विमान पर आधारित नेत्र Mk-2 डेवलप किया जा रहा है। यह साइज में बड़ा होगा और अधिक दूरी तक निगरानी कर सकेगा।

मौजूदा नेत्र Mk-1 एम्ब्रेयर ERJ-145 विमान पर आधारित है। लेकिन भविष्य में आने वाला नेत्र Mk-2 एयरबस A321 विमान पर आधारित होगा। भारतीय वायुसेना के पास 6 एयरबस A321 विमान हैं, जिन्हें Mk-2 में बदला जाएगा। उनमें ज्यादा शक्तिशाली रडार, अधिक बिजली क्षमता और लंबी उड़ान अवधि होगी।

जहां मौजूदा नेत्र की रडार रेंज लगभग 250-375 किलोमीटर मानी जाती है, वहीं Mk-2 में यह क्षमता 500 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। इसके अलावा नया सिस्टम लगभग पूरे 360 डिग्री क्षेत्र की निगरानी कर सकेगा। (Netra AWACS Explained)

LAC will have India-US largest "warabhayas", the first-ever Apache helicopter

Yudh Abhyas 2026
Image for reference only.

Exercise Yudh Abhyas 2026: The forces of India and the U.S. will be seen in September this year once again under the joint military practice "war practice". This exercise is being conducted at a time when India has been continually vigilating on its northern borders and strengthening its preparations in line with the challenges of modern wars.

War exercises The 22nd edition of 2026 will begin from the first week of September and will last about three weeks. This time, it is one of the biggest specialities that it will be organized in two separate geographical areas. On the one hand, Uttarakhand will have the Auli area, which is located in the area with a height close to the China border, while on the other hand will be the Mahajan Field firing range of Rajasthan, known for the desert war exercises.

About 350-350 soldiers from the forces of both countries will participate in this exercise. Also for the first time AH-64 Apache attack helicopters are also being part of this exercise.

Exercise Yudh Abhyas 2026: Why is Auli so important?

The Auli of Uttarakhand is not only a tourist destination. It is quite high in military terms. This area is located at a height of about 2,500 meters and the actual control line with China i.e. LAC से करीब 95 किलोमीटर की दूरी पर है।

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच शुरू हुए लंबे सैन्य गतिरोध के बाद भारतीय सेना ने उच्च हिमालयी इलाकों में लड़ाई की तैयारियों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। इसी वजह से औली जैसे इलाके अब मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

हाई एल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों को कई अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यहां ऑक्सीजन का स्तर कम होता है, तापमान तेजी से गिरता है और मौसम कुछ ही घंटों में बदल सकता है। ऐसे वातावरण में सामान्य सैन्य अभ्यास भी कठिन हो जाता है।

युद्ध अभ्यास के दौरान भारतीय और अमेरिकी सैनिक इन परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने की ट्रेनिंग लेंगे। इसमें पैदल सेना की गतिविधियां, ऊंचाई वाले इलाकों में रसद व्यवस्था और कठिन भूभाग में सैनिकों की आवाजाही जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

कम ऑक्सीजन में युद्ध की तैयारी

हाई एल्टीट्यूड इलाकों में सबसे बड़ी चुनौती सैनिकों की शारीरिक क्षमता होती है। कम ऑक्सीजन के कारण सांस लेने में परेशानी होती है और सामान्य कार्य भी कठिन हो जाते हैं।

इसी वजह से औली में सैनिकों को एक्लाइमेटाइजेशन यानी ऊंचाई के अनुसार शरीर को ढालने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

सेना के विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सैन्य अभियान की सफलता केवल हथियारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सैनिकों की शारीरिक तैयारी और सहनशक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

इस अभ्यास में अमेरिकी सैनिकों को भी भारतीय सेना के उन अनुभवों से सीखने का मौका मिलेगा जो उसने सियाचिन, लद्दाख और अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में वर्षों की तैनाती के दौरान हासिल किए हैं।

राजस्थान में दिखेगी बिल्कुल अलग तस्वीर

जहां औली बर्फीले और पहाड़ी युद्धक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा, वहीं राजस्थान का महाजन फील्ड फायरिंग रेंज का वातावरण बिलकुल अलग होगा।

महाजन भारतीय सेना के सबसे बड़े फायरिंग और युद्धाभ्यास इलाकों में गिना जाता है। यहां टैंक, तोपखाना, बख्तरबंद वाहन और कई तरह के हथियारों का परीक्षण और प्रशिक्षण नियमित रूप से किया जाता है।

रेगिस्तानी इलाके में युद्ध की चुनौतियां अलग होती हैं। यहां की तेज गर्मी, धूल, लंबी दूरी और खुला इलाका सैनिकों की रणनीति पर असर डालते हैं।

महाजन में दोनों देशों की सेनाएं लाइव फायर ड्रिल, मैकेनाइज्ड ऑपरेशन और आर्टिलरी कोआर्डिनेशन जैसे अभ्यास किए जाएंगे। इससे दोनों देशों की सेनाओं को अलग-अलग युद्धइलाकों में ऑपरेशन करने का अनुभव मिलेगा।

पहली बार शामिल होंगे अपाचे हेलीकॉप्टर

युद्ध अभ्यास 2026 में एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर भी शामिल होंगे। अपाचे दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू हेलीकॉप्टरों में गिना जाता है। भारतीय सेना और वायुसेना दोनों इसे इस्तेमाल करती हैं।

इस हेलीकॉप्टर को एंटी टैंक मिशन, सटीक हमले और क्लोज एयर सपोर्ट के लिए डेवलप किया गया है।

पहली बार युद्ध अभ्यास में अपाचे हेलीकॉप्टरों को शामिल करने का उद्देश्य लैंड और एयर फोर्सेज के बीच बेहतर तालमेल विकसित करना है।

इससे सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अभ्यास करने का अवसर मिलेगा, जहां जमीन पर मौजूद सैनिकों को एय़र सपोर्ट भी मिलेगा।

क्या होता है कॉम्बाइंड आर्म्स ऑपरेशन?

आधुनिक युद्ध में केवल पैदल सेना या केवल टैंक पर्याप्त नहीं माने जाते। युद्ध में जीत के लिए विभिन्न मिलिट्री शाखाओं का कॉर्डिनेशन जरूरी होता है।

इसे कॉम्बाइंड आर्म्स ऑपरेशन कहा जाता है। इसमें पैदल सेना, टैंक, तोपखाना, हेलीकॉप्टर और सर्विलांस सिस्टम्स एक साथ काम करती हैं।

युद्ध अभ्यास 2026 के दौरान दोनों देशों की सेनाएं इसी तरह के अभ्यासों में शामिल होंगी। अपाचे हेलीकॉप्टरों की भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है क्योंकि इससे सैनिकों को एयर-ग्राउंड इंटीग्रेशन की असली समझ मिलेगी।

पिछले साल अलास्का में हुआ था अभ्यास

युद्ध अभ्यास का पिछला संस्करण सितंबर 2025 में अमेरिका के अलास्का राज्य में आयोजित किया गया था। अलास्का की अत्यधिक ठंडी और सब-आर्कटिक परिस्थितियों में दोनों देशों के सैनिकों ने संयुक्त प्रशिक्षण लिया था।
उस दौरान बर्फीले वातावरण में सैन्य अभियान, जीवित रहने की तकनीक और चरम मौसम में ऑपरेशन पर जोर दिया गया था।

इस बार अभ्यास का फोकस ऊंचाई वाले इलाकों और रेगिस्तानी युद्धक्षेत्र पर रहेगा। इस तरह हर संस्करण में अलग वातावरण चुनकर सैनिकों को विविध परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है।

2004 में हुई थी शुरुआत

युद्ध अभ्यास की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी। उस समय इसका दायरा काफी सीमित था और मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी तथा काउंटर-इंसर्जेंसी आपरेशंस पर ध्यान दिया जाता था। समय के साथ इसमें भी बदलाव हुए।

अब यह केवल काउंटर टेररिज्म अभ्यास नहीं रह गया है, बल्कि इसमें हाई एल्टीट्यूड वारफेयर, मैकेनाइज्ड ऑपरेशन, मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे विषय भी शामिल हो गए हैं। दो दशकों में यह भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच सबसे बड़े संयुक्त सैन्य अभ्यासों में शामिल हो चुका है।

युद्ध अभ्यास दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देशों ने कई रक्षा समझौते किए हैं, जिनके तहत तकनीकी जानकारी, लॉजिस्टिक सहायता और सैन्य सहयोग को बढ़ावा मिला है।

अपाचे हेलीकॉप्टर, पी-8आई मैरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण भारत द्वारा अमेरिका से खरीदे गए प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। संयुक्त अभ्यासों के जरिए दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की कार्यशैली, रणनीति और तकनीक को बेहतर तरीके से समझ पाती हैं।

मालाबार और कोप इंडिया जैसे अभ्यास भी अहम

युद्ध अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच होने वाले कई बड़े सैन्य अभ्यासों में से एक है। समुद्री क्षेत्र में मालाबार अभ्यास आयोजित किया जाता है, जिसमें जापान भी भाग लेता है और कई बार ऑस्ट्रेलिया भी शामिल होता है।

इसी तरह वायुसेना स्तर पर कोप इंडिया अभ्यास आयोजित किया जाता है। इसके अलावा क्वाड देशों के बीच भी विभिन्न स्तरों पर सैन्य सहयोग बढ़ रहा है। युद्ध अभ्यास इन सभी कार्यक्रमों में लैंड-बेस्ड मिलिटरी कोआपरेशन का सबसे प्रमुख उदाहरण माना जाता है।

The Indian Army meets 106 ‘Agniveg’! 180 km away from the enemy’s base will kill the Tahahah, the Russian lancet and Israeli harp.

Agniveg Kamikaze Drone
Agniveg Kamikaze Drone

Agniveg Kamikaze Drone: Modern battle format is changing rapidly. Now only tanks, cannons and fighters do not decide the outcome of the war, but also drones, artificial intelligence and precision strike systems are playing as important roles. Delhi-based Defence Technology Company SMPP Limited has assigned a total of 106 jet-based workforce drones including 100 operational and 6 training systems to the Indian Army.

Agniveg Kamikaze Drone: What is finally grinding?

The name of these drones is named after the grindingkeeper (Fireway). This is a jet engine running Loweringmission The system, also known as Worktable Drone in common language. Its uniqueness is that it can search for targets by going inside the enemy terrain and then destroy themselves by hitting the target.

General monitoring drones gather information through cameras or sensors and return back, but the worktable drone itself is a weapon.

It is prepared to identify the target, hover over it and destroy it directly when it comes to the right time. That’s why it’s also called lowering missions.

The use of such weapons is rapidly growing around the world. Russia-Ukraine war, West Asia’s struggle and recent military campaigns have proved that such systems can prove far more effective and economical than traditional weapons. Agniveg Kamikaze Drone

Completed delivery in only six months

एसएमपीपी लिमिटेड ने सेना के लिए यह पूरा ऑर्डर केवल छह महीनों में पूरा किया है। डिफेंस सेक्टर में इतने कम समय में किसी ऐसे वेपन सिस्टम की डिलीवरी को बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशीष कंसल ने कहा कि अग्निवेग की डिलीवरी केवल एसएमपीपी के लिए ही नहीं बल्कि पूरे इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनके अनुसार आधुनिक युद्ध में सटीकता, स्वायत्तता और किफायतीपन सबसे महत्वपूर्ण तत्व बन चुके हैं और ऐसे सिस्टम युद्धक्षेत्र में फोर्स मल्टीप्लायर की भूमिका निभाते हैं।

कंपनी के अनुसार 100 ड्रोन सीधे ऑपरेशनल यूनिट्स को दिए गए हैं, जबकि 6 सिस्टम सैनिकों की ट्रेनिंग के लिए उपलब्ध कराए गए हैं।

डिलीवरी से पहले इन ड्रोन का विस्तृत जांच की गई। परीक्षणों के दौरान इन्हें ऐसे माहौल में उड़ाया गया जहां भारी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और स्पूफिंग मौजूद थी। इसके बावजूद सिस्टम ने अपने टारगेट को सटीकता से भेदा।

जेट इंजन इसे बनाता है खास

अधिकांश छोटे ड्रोन प्रोपेलर बेस्ड होते हैं। उनकी गति सीमित होती है और लंबी दूरी पर उनके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ता है।

अग्निवेग की सबसे बड़ी ताकत इसका टर्बोजेट इंजन है। यही वजह है कि यह 450 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल कर सकता है।

इतनी तेज रफ्तार के चलते दुश्मन के लिए इसे पहचानना और रोकना अधिक कठिन हो जाता है। इसके अलावा यह कम समय में टारगेट तक पहुंच सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जेट आधारित लोइटरिंग म्यूनिशन भविष्य के युद्धक्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं क्योंकि वे ड्रोन और क्रूज मिसाइल के बीच की क्षमता प्रदान करते हैं।

जहां तोपों की मारक क्षमता सीमित होती है और लंबी दूरी की मिसाइलें महंगी होती हैं, वहीं यह ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत में सटीक हमला कर सकता है। (Agniveg Kamikaze Drone)

180 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता

अग्निवेग की ऑपरेशनल रेंज लगभग 180 किलोमीटर है। इसका मतलब है कि भारतीय सेना सीमा से काफी दूरी पर मौजूद महत्वपूर्ण टारगेट्स पर हमला कर सकती है।

सैन्य दृष्टि से यह दूरी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे दुश्मन के कमांड सेंटर, रसद केंद्र, गोला-बारूद डिपो, रडार स्टेशन और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है।

अब तक इस प्रकार के टारगेट्स पर हमला करने के लिए या तो लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता था या फिर लड़ाकू विमानों की मदद लेनी पड़ती थी। अग्निवेग इन दोनों के बीच एक नया बेहतरीन विकल्प है।

कितना सटीक है यह सिस्टम?

आधुनिक युद्ध में केवल दूरी और गति ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि सटीकता भी उतनी ही जरूरी होती है। एसएमपीपी के अनुसार यूजर ट्रायल्स के दौरान अग्निवेग ने पांच मीटर से कम का सर्कुलर एरर प्रोबेबल हासिल किया। सरल शब्दों में कहें तो यह ड्रोन अपने निर्धारित लक्ष्य के बेहद करीब जाकर हमला करने में सक्षम है।

यह क्षमता विशेष रूप से उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण होती है जहां किसी सैन्य ठिकाने के केवल एक हिस्से को निशाना बनाना हो या आसपास सिविलियन स्ट्रक्चर मौजूद हो। (Agniveg Kamikaze Drone)

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में भी प्रभावी

आज का युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम भी युद्ध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। दुश्मन अक्सर ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए जैमिंग और स्पूफिंग का सहारा लेते हैं।

जैमिंग में संचार और नेविगेशन सिग्नल बाधित किए जाते हैं, जबकि स्पूफिंग के जरिए हथियार को गलत दिशा में भेजने की कोशिश की जाती है। अग्निवेग को इसी चुनौती को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

कंपनी का दावा है कि यह सिस्टम भारी इलेक्ट्रॉनिक व्यवधान वाले वातावरण में भी अपना मिशन पूरा कर सकता है। इसकी स्वायत्त क्षमता इसे लगातार बदलती परिस्थितियों में भी प्रभावी बनाती है। (Agniveg Kamikaze Drone)

किन लक्ष्यों को बना सकता है निशाना?

अग्निवेग को विशेष रूप से हाई वैल्यू टारगेट्स के लिए तैयार किया गया है। यह दुश्मन के कमांड और कंट्रोल सेंटर, रडार स्टेशन, लॉजिस्टिक्स हब, कम्युनिकेशन सेंटर, मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है।

ऐसे टारगेट अक्सर युद्ध के परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि दुश्मन का कमांड नेटवर्क या रडार सिस्टम निष्क्रिय हो जाए तो उसकी सैन्य क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

पिछले कुछ सालों में कामिकेज ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और यूक्रेन दोनों ने बड़ी संख्या में लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया। इसी प्रकार अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-काराबाख संघर्ष में भी इन हथियारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इनकी लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहले इनकी लागत पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में कम होती है। दूसरा, इन्हें ऑपरेट करने में कम संसाधनों की जरूरत होती है। तीसरा, पायलट या सैनिक को सीधे खतरे में नहीं जाना पड़ता।

इसके अलावा ये लक्ष्य के ऊपर मंडराकर सही समय पर हमला करने की क्षमता रखते हैं, जो कई बार पारंपरिक हथियार नहीं कर पाते। (Agniveg Kamikaze Drone)

Increased focus after operation shifter

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि हाल के सैन्य अभियानों ने ड्रोन और प्रिसीजन स्ट्राइक सिस्टम की आवश्यकता को और स्पष्ट किया है।

इसी कारण भारतीय सेना ने तेजी से ऐसे सिस्टम्स को शामिल करना शुरू किया है जो कम लागत में अधिक प्रभावी हमला करने की क्षमता प्रदान करती हैं।

एसएमपीपी लिमिटेड लंबे समय तक बैलिस्टिक प्रोटेक्शन सिस्टम्स के लिए जानी जाती रही है। कंपनी ने भारतीय सैनिकों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, बख्तरबंद प्लेट और सुरक्षा समाधान तैयार किए हैं। इसके अलावा कंपनी ने गोला-बारूद और रक्षा सामग्री निर्माण के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है। वहीं, अब कंपनी ने ड्रोन, काउंटर ड्रोन सिस्टम और प्रिसीजन स्ट्राइक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाया है।

दुनिया में कई देश पहले से लोइटरिंग म्यूनिशन विकसित कर चुके हैं। इजराइल का हारोप, अमेरिका का स्विचब्लेड और रूस का लैंसेट इस श्रेणी के प्रमुख सिस्टम माने जाते हैं। अग्निवेग की विशेषता इसका जेट इंजन, लंबी दूरी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में काम करने की क्षमता है। भारतीय सेना को अब इस कैटेगरी में एक स्वदेशी विकल्प मिल गया है, जिससे विदेशी निर्भरता भी कम होगी। (Agniveg Kamikaze Drone)

Explainer: Why is India’s 5th generation fighter jet viral on AMCA’s satellite photos? Why should you understand in easy language?

AMCA Stealth Testing
Image Source: VERTEX/X

AMCA Stealth Testing: A photo of India’s indigenous fifth-generation fighter aircraft AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) is becoming extremely viral. A full-scale engineering airframe of AMCA in recent front satellite photographs has appeared in the special radar cross section testing camps located doubles of Hyderabad. This is being considered the same model that was first publicly displayed during the Aero India 2025.

The new debate has begun with the AMCA between defence experts, open source intelligence (OSINT) and those interested in military affairs after the photograph has come up. The reason is not only the picture, but the place where it appeared airframe. This place is considered one of India’s most important stakeholders.

AMCA Stealth Testing: What shows in satellite photos?

In front high-resolution satellite photos in recent times AMCA The engineering model with full size of double-based outdoor radar cross section appeared in the facility. The facility is located close to the Airforce Academy and the radar signature of several military platforms is examined here.

The photographs indicated that this model of AMCA is undergoing ground-based stalth trials. This is considered one of the most important stages in the development of any fifth-generation fighter plane.

Making a fighter plane not only fast, powerful or modern. The biggest challenge in the modern war is to avoid the enemy radar. That’s why Stealth technique is most essential for any fifth generation fighter aircraft.

What is AMCA and why is it being so important?

AMCA is India’s first indigenous fifth generation stalth multiroll fighter aircraft. it Aeronautical Development Agency (ADA) and DRDO are paved together.

This aircraft is being prepared by taking into account the future needs of the Indian Air Force. It is aimed at creating a fighter plane that appears less on the enemy radar, can mission a long distance and simultaneously carry out a number of battle campaigns.

AMCA is being designed for missions such as Air Superiority, Ground Attack, Electronic Warfare and Precision Strike. Its biggest feature will be its stalth capacity.

What Is Radar Cross Section Testing?

The biggest cause of the images of AMCA is its radar cross section i.e. RCS testing.

When a radar sends radio waves to an aircraft, the plane reflexes some part of those waves back to the radar. Radar detects aircraft based on corresponding reflect signals.

Depending on its radar cross section, how easily an aircraft will be identified on the radar.

If the RCS of an aircraft is high, it will appear quickly on the radar. It becomes difficult to identify if the RCS is too low.

The main objective of developing a stalth aircraft is to reduce corresponding RCS.

What is certain in the facility of doubled?

हैदराबाद के पास स्थित यह विशेष टेस्टिंग सेंटर भारत की सबसे एडवांस NCS मीजरमेंट फैसिलिटी में गिना जाता है। यहां विमान को एक विशेष प्लेटफॉर्म पर रखा जाता है। इसके बाद विभिन्न कोणों और अलग-अलग फ्रीक्वेंसी से रडार तरंगें भेजी जाती हैं।

इंजीनियर यह जांचते हैं कि विमान का कौन-सा हिस्सा सबसे ज्यादा रडार सिग्नल वापस भेज रहा है।

यदि किसी हिस्से से ज्यादा रिफ्लेक्शन मिलता है तो डिजाइन में बदलाव किए जाते हैं। कभी विमान के आकार में परिवर्तन किया जाता है, कभी विशेष रडार अब्जॉर्ब करने वाले मैटेरियल का इस्तेमाल किया जाता है।

यही प्रक्रिया एएमसीए जैसे स्टेल्थ विमान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

AMCA में RCS कम करने की पूरी तकनीक समझिए

जब किसी रडार से रेडियो तरंगें निकलती हैं और वे किसी विमान से टकराती हैं, तो उनका कुछ हिस्सा वापस रडार तक पहुंचता है। इसी लौटे हुए सिग्नल के आधार पर रडार विमान की मौजूदगी का पता लगाता है। यदि विमान ज्यादा सिग्नल वापस भेजता है तो वह आसानी से दिखाई देता है। यदि बहुत कम सिग्नल लौटते हैं तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।

सामान्य चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का आरसीएस लगभग 5 से 10 वर्ग मीटर तक हो सकता है, जबकि आधुनिक स्टेल्थ विमान जैसे एफ-22 और एफ-35 का आरसीएस हजारों गुना कम लगभग 0.001 से 0.01 वर्ग मीटर माना जाता है। जो रडार पर लगभग अदृश्य जैसा दिखता है। एएमसीए को भी इसी श्रेणी की स्टेल्थ क्षमता देने का प्रयास किया जा रहा है।

किसी भी Stealth विमान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसके आकार की होती है। यदि किसी विमान की सतह सपाट हो या उसमें तेज कोने हों, तो रडार तरंगें सीधे वापस लौट सकती हैं। इससे विमान आसानी से पकड़ में आ जाता है। इसी कारण आधुनिक स्टेल्थ फाइटर जेट्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि रडार तरंगें सीधे वापस लौटने के बजाय अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाएं।

एएमसीए के डिजाइन में भी इसी सिद्धांत का उपयोग किया गया है। इसे एज अलाइनमेंट कहा जाता है। इससे रडार सिग्नल का रिफ्लेक्शन और कम हो जाता है।

आधुनिक स्टेल्थ विमान विशेष प्रकार की रडार एब्जॉर्बिंग मैटेरियल (RAM) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। यह ऐसी सामग्री होती है जो रडार तरंगों को वापस लौटाने के बजाय उन्हें अपने अंदर अवशोषित कर लेती है। जब रडार ऊर्जा इस सामग्री से टकराती है तो उसका बड़ा हिस्सा गर्मी में बदल जाता है और वापस रडार तक नहीं पहुंचता।

एएमसीए में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मैटेरियल का उपयोग किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार एयरफ्रेम का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कंपोजिट सामग्री से तैयार किया जा रहा है।

वहीं, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में इंटरनल वेपन्स बे का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह है कि जब हथियारों के दरवाजे बंद रहते हैं तो विमान की बाहरी सतह पूरी तरह चिकनी दिखाई देती है, जिससे उसका आरसीएस काफी कम हो जाता है।

एएमसीए की कौन-कौन सी खूबियां इसे बनाती हैं खास?

एएमसीए को पूरी तरह आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है। यह ट्विन इंजन लड़ाकू विमान होगा। इसमें एडवांस सेंसर, आधुनिक एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन तकनीक और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल किए जाएंगे।

विमान के अंदर इंटरनल वेपन्स बे होगा, जहां मिसाइलें और बम रखे जाएंगे। इससे हथियार विमान के बाहर दिखाई नहीं देंगे और उसका रडार सिग्नेचर कम रहेगा।

इसमें बड़ी मात्रा में कंपोजिट मटेरियल का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा रडार एब्जॉर्बिंग मटेरियल भी लगाया जाएगा ताकि रडार तरंगों को सोखा जा सके।

तस्वीर में दिखा मॉडल फाइनल डिजाइन नहीं

सूत्रों का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई देने वाला एयरफ्रेम एएमसीए का फाइनल वर्जन नहीं है। एयरो इंडिया 2025 में प्रदर्शित मॉडल पुराने कॉन्फिगरेशन पर बेस्ड था। उस समय इसमें डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट यानी डीएसआई तकनीक शामिल नहीं थी।

बाद में एएमसीए के नए डिजाइन में डीएसआई इनलेट जोड़े गए हैं।

डीएसआई तकनीक आधुनिक स्टेल्थ विमानों में महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे रडार सिग्नेचर कम होता है और स्ट्रक्चर भी आसान बनती है।

एएमसीए के नए डिजाइन में डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट (DSI) तकनीक जोड़ी गई है। यह आधुनिक स्टेल्थ विमानों की महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है। पारंपरिक एयर इनटेक में अतिरिक्त डाइवर्टर प्लेटें होती थीं, जो रडार पर दिखाई दे सकती थीं। डीएसईआई तकनीक में इन अतिरिक्त हिस्सों की जरूरत नहीं पड़ती। इससे विमान का वजन कम होता है, रखरखाव आसान होता है और रडार सिग्नेचर भी घटता है। (AMCA Stealth Testing)

पुराने मॉडल से टेस्टिंग करना क्यों सामान्य प्रक्रिया है?

कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि यदि डिजाइन बदल चुका है तो पुराने मॉडल की टेस्टिंग क्यों की जा रही है। वास्तव में यह दुनिया के लगभग सभी बड़े फाइटर जेट कार्यक्रमों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है।

इंजीनियरिंग मॉडल का इस्तेमाल प्रारंभिक परीक्षणों के लिए किया जाता है। इस दौरान स्ट्रक्चर, स्टेल्थ क्षमता, सेंसर इंटीग्रेशन और रखरखाव से जुड़े कई पहलुओं की जांच होती है।

जब तक फाइनल डिजाइन तैयार होता है, तब तक परीक्षणों से मिली जानकारी के आधार पर कई बदलाव किए जा चुके होते हैं। (AMCA Stealth Testing)

कहां तक पहुंचा एएमसीए प्रोजेक्ट?

एएमसीए प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से विकास के चरण में है। 2024 में सरकार ने इसके प्रोटोटाइप विकास के लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी थी। इसके तहत पांच प्रोटोटाइप बनाए जाने हैं।

पहले तीन प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षणों के लिए उपयोग किए जाएंगे जबकि अन्य प्रोटोटाइप हथियार परीक्षण और सिस्टम मूल्यांकन में इस्तेमाल होंगे।

हाल के वर्षों में निजी उद्योग को भी परियोजना में शामिल किया गया है। कई भारतीय कंपनियां विमान के अलग-अलग हिस्सों के निर्माण में भागीदारी कर रही हैं। (AMCA Stealth Testing)

ग्राउंड टेस्ट एयरफ्रेम की क्या है भूमिका

जो एयरफ्रेम सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई दिया है, वह कभी उड़ान नहीं भरेगा। इसके बावजूद इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार के एयरफ्रेम का इस्तेमाल उपकरणों की स्थिति जांचने, वायरिंग लेआउट देखने, सेंसर फिटमेंट का मूल्यांकन करने और स्ट्रक्चरल इंटरफेस की जांच के लिए किया जाता है।

इसके अलावा मेंटनेंस की प्रक्रिया और विभिन्न सिस्टमों के इंटीग्रेशन का परीक्षण भी इन्हीं मॉडल्स पर किया जाता है। इससे वास्तविक उड़ान प्रोटोटाइप बनने से पहले कई तकनीकी जोखिम कम हो जाते हैं। (AMCA Stealth Testing)

भारत के लिए क्यों जरूरी है एएमसीए

भारतीय वायुसेना लंबे समय से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जरूरत महसूस कर रही है। दुनिया में अमेरिका का एफ-35, चीन का जे-20 और रूस का एसयू-57 जैसे विमान पहले से मौजूद हैं। खास तौर पर चीन के जे-20 के प्रोटोटाइप ने पहली उड़ान 2011 में भरी थी। आज चीन के पास 300 से ज्यादा जे-30 फाइटर जेट्स हैं। ऐसे में भारत का अपना स्टेल्थ फाइटर विकसित करना रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (AMCA Stealth Testing)

Will Russia Buy the World’s Fastest Missile Brahmaos? Indo-Russia Joint Venture Gives Big Signs

Russia BrahMos Missile
Image for reference only.

Russia BrahMos Missile: Brahmos Russia can also be supplied in the world’s most dangerous and fast supersonic cruise missiles. The Joint Venture Brahmaos Aerospace of India and Russia has said that the company is also ready to provide Brahmaos missiles if Russia officially requests.

This statement has come at a time when Russia has been raised in enhancing modern vanity systems to meet its military needs. The Russian Co-manage Director of the Brahmaos Aerospace Alexander McXichev spoke of the Russian news agency Tas during the International Marine Defense Exhibition "Fleet-2026" held in St. Petersburg.

He said that the company is fully ready to complete that order if the formal demand comes from the Russian side. According to their Brahmos missiles can be made available for both the Navy or the Ground Army and the company has sufficient production capacity.

Russia BrahMos Missile: First Time Russia To Open Front Offer

Brahmos Missile India and Russia have a joint project, but the interesting thing is that the largest buyer of India has been so far. Indian Army, Naval and Air Force uses three missiles. On the other hand, Russia has not yet included Brahmaos in its forces.

That’s why this statement of Brahmaos Aerospace is being considered quite important. Russia already has Onix and other cruise missiles, but Brahmaos is seen as their advanced version. This missile is the result of joint development and a number of technical improvements have been made in the past two decades.

Alexander McCheev said that the company understands the needs of Russia well and the production system is already prepared. So there is no possibility of a large barrier in the supply if the order gets. (Russia BrahMos Missile)

How started the Brahmaos project

The story of Brahmaos is Gini in the most successful stories of India and Russia’s defence cooperation. Brahmaos Aerospace was established after an inter-government agreement between the two countries in the year 1998.

This joint venture comprises of Defence Research and Development Organisation (DRDO) on behalf of India, while NPO is a Mashinostroyenia partner on behalf of Russia.

India’s share in the company is 50.5 percent and 49.5 percent of Russia. The name of the missile was also called the names of rivers of both countries. Created "Brahmos" in the name of the Brahmaputra river of India and the Moskova river of Russia.

Scientists from both countries combined with a supersonic cruise missile pavilion after the project began, which joined the world’s fastest operation missiles.

The greatest strength of Brahmos is its speed. It can fly around three times faster at the sound speed. Its speed reaches Mac 2.8 to Mac 3.

The time to respond against him is very important to prevent any missile according to military experts. The excessive speed of Brahmaos creates the challenge for the enemy’s air defense system.

यह मिसाइल उड़ान के दौरान बहुत कम ऊंचाई पर भी चल सकती है। समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ने की क्षमता के कारण रडार पर इसे देर से देखा जाता है। यही वजह है कि इसे रोकना और मुश्किल हो जाता है। (Russia BrahMos Missile)

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने कैसे दिखाई अपनी ताकत

मई 2025 में Initiatives आतंकी हमले के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस अभियान के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने आतंकवादी ठिकानों और पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने अहम भूमिका निभाई।

10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई प्रमुख एयरबेसों पर सटीक हमले किए। इनमें नूर खान (चकला), राफिकी, मुरीद, सरगोधा, सियालकोट और भोलारी जैसे महत्वपूर्ण एयरबेस शामिल बताए गए। इन हमलों में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से एयर-लॉन्च्ड 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस दौरान 15 से 19 ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

वहीं, ब्रह्मोस की तेज गति और सटीक निशाना लगाने की क्षमता के सामने पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम जवाब नहीं दे पाए। मिसाइलों ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को सटीकता से निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के बाद ब्रह्मोस की मारक क्षमता और विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा बढ़ गई।

कई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस की एक और बड़ी खासियत इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है। इसे जमीन से, समुद्र से, पनडुब्बी से और लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है।

भारतीय नौसेना के कई आधुनिक युद्धपोतों पर ब्रह्मोस तैनात है। भारतीय थल सेना की विशेष मिसाइल रेजिमेंटें इसका संचालन करती हैं। भारतीय वायुसेना ने इसे सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के साथ भी इंटीग्रेट किया है जो बेहद घातक कॉम्बिनेशन है।

इस वजह से ब्रह्मोस केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि तीनों सेनाओं के लिए एक साझा मारक क्षमता का हिस्सा बन चुकी है।

लगातार बढ़ाई गई ऑपरेशनल रेंज

शुरुआत में ब्रह्मोस की मारक दूरी लगभग 290 किलोमीटर थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियंत्रण नियमों के कारण इसकी सीमा सीमित थी।

बाद में भारत के मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का सदस्य बनने के बाद इसकी रेंज बढ़ाने का रास्ता खुला। हाल के सालों में परीक्षणों के दौरान इसकी मारक दूरी को 800 किलोमीटर से अधिक तक बढ़ाया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी दूरी और तेज रफ्तार ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। (Russia BrahMos Missile)

रूस को क्यों पड़ सकती है इसकी जरूरत

रूस के पास पहले से कई प्रकार की क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसकी सैन्य जरूरतों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धों में मिसाइलों की खपत बहुत अधिक होती है। ऐसे में उत्पादन क्षमता बढ़ाना और नए सिस्टम्स को शामिल करना किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

Brahmos की खूबी यह है कि यह पहले से परीक्षण की हुई और ऑपरेशनल है। भारतीय सेनाएं सालों से इसका इस्तेमाल कर रही हैं और कई अलग-अलग हालात में इसकी क्षमता को परखा जा चुका है। (Russia BrahMos Missile)

भारत में हो रहा है बड़े पैमाने पर उत्पादन

ब्रह्मोस परियोजना की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि आज इसका अधिकांश उत्पादन भारत में होता है। पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशीकरण का स्तर लगातार बढ़ाया गया है।

मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्से भारतीय कंपनियां तैयार कर रही हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिला है और बड़ी संख्या में कुशल रोजगार भी पैदा हुए हैं।

सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत ब्रह्मोस को एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। (Russia BrahMos Missile)

फिलीपींस बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत के रक्षा निर्यात इतिहास में ब्रह्मोस ने एक नया अध्याय तब लिखा जब फिलीपींस ने इसे खरीदने का फैसला किया। जनवरी 2022 में हुए समझौते के तहत फिलीपींस ने तटीय रक्षा के लिए ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदी। इसके बाद मिसाइलों की खेप वहां पहुंचाई गई।

यह पहली बार था जब भारत ने इतनी एडवांस मिसाइल किसी विदेशी देश को निर्यात की। फिलीपींस के अलावा इंडोनेशिया, वियतनाम और कई अन्य देशों ने भी इस प्रणाली में रुचि दिखाई है। वितयनाम के साथ डील साइन हो चुकी है लेकिन अभी दोनों देशों की तरफ से आधिकारिक रूप से सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 30-31 मई को सिंगापुर में शांगरी-ला डायलॉग (Shangri-La Dialogue) के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा था, “वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल डील पहले ही साइन हो चुकी है। हालांकि इसे अभी सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया गया है।” उन्होंने यह भी बताया कि इंडोनेशिया के साथ भी डील फाइनल स्टेज में है।

ब्रह्मोस-एनजी पर भी तेजी से काम

ब्रह्मोस एयरोस्पेस केवल मौजूदा संस्करण तक सीमित नहीं है। कंपनी मिसाइल के अगले संस्करण पर भी काम कर रही है, जिसे ब्रह्मोस-एनजी कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल की तुलना में हल्की और आकार में छोटी होगी। इसका लाभ यह होगा कि लड़ाकू विमान एक साथ अधिक संख्या में मिसाइलें ले जा सकेंगे। इस संस्करण को मॉडर्न एयर आपरेशंस की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। (Russia BrahMos Missile)

EXPLAINER: What is the Indian Navy got the Advance ECGNSS Jammer, how the enemy’s satellite signal, drone system and missiles will jam

ECGNSS Jammer Indian Navy
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ECGNSS Jammer Indian Navy: Ministry of Defence has contracted Rs 449 crore with Bengaluru’s Indian Company Accord Software and Systems Private Limited to strengthen the Indian Navy’s Electronic Warfare capacity. 20 Enhanced Capability Global Navigation Satellite System (ECGNSS) Jammers will be purchased for the Indian Navy under this Agreement.

According to the Ministry of Defence, this purchase has been made under the "Bi Indian-Indiginsally Designed, Developed and Manufactured" category. This means that the design, development and construction of this system is in India and at least 75 percent of indigenous materials have been used. This contract was signed in the presence of Defence Secretary Rajesh Kumar Singh in New Delhi. (ECGNSS Jammer Indian Navy)

ECGNSS Jammer Indian Navy: What Does GNSS?

Almost every modern military system of the world today is rough Satellite Based Navigation System Depending on. The ships, submarines, fighter planes, drones, missiles and many other military equipments get the right direction and location information from Satellite. The same is called Global Navigation Satellite System i.e. GNSS.

अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो, चीन का बेइदौ और भारत का नाविक इसी कैटेगरी के सिस्टम हैं।

ये सैटेलाइट लगातार पृथ्वी पर सिग्नल भेजते रहते हैं। इन सिग्नलों की मदद से कोई भी रिसीवर अपनी सटीक स्थिति, दिशा और समय की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

आधुनिक नौसैनिक युद्ध में इन सिग्नलों का महत्व बहुत अधिक है। बड़े युद्धपोतों से लेकर छोटे ड्रोन तक इन पर निर्भर रहते हैं।

ECGNSS Jammer Indian Navy
MoD Signs Rs 449 Crore Deal for 20 Advanced GNSS Jammers to Boost Indian Navy’s Electronic Warfare Capability

जीएनएसएस की सबसे बड़ी कमजोरी

सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल बहुत कमजोर होते हैं। यही वजह है कि दुश्मन इन्हें जाम करने की कोशिश करता है। यदि किसी युद्ध के दौरान दुश्मन किसी जहाज या मिसाइल को सही सैटेलाइट सिग्नल मिलने से रोक दे तो उसकी दिशा बदल सकती है या वह अपना टारगेट से भटक सकता है।

इसी कमजोरी को दूर करने और दुश्मन की इसी निर्भरता का फायदा उठाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम डेवलप की जाती हैं। ईसीजीएनएसएस जैमर इसी कैटेगरी का अत्याधुनिक सिस्टम है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

क्या करता है जैमर?

जैमर दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम को काम करने से रोक देता है। जब दुश्मन का ड्रोन, मिसाइल या जहाज सैटेलाइट सिग्नल प्राप्त करने की कोशिश करता है, तब जैमर उससे कहीं अधिक शक्तिशाली सिग्नल भेजता है।

इस वजह से रिसीवर असली सिग्नल नहीं पकड़ पाता और उसकी नेविगेशन क्षमता प्रभावित हो जाती है। नतीजतन दुश्मन का सिस्टम अपनी सही स्थिति नहीं जान पाता और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

क्या होती है स्पूफिंग?

आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध केवल सिग्नल रोकने तक सीमित नहीं है। आज कई देशों ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है जिसमें दुश्मन के सिस्टम को गलत जानकारी दी जाती है। इसे स्पूफिंग कहा जाता है। इस तकनीक में जैमर ऐसा नकली सिग्नल भेजता है जो बिल्कुल असली सैटेलाइट सिग्नल जैसा दिखाई देता है।

दुश्मन का रिसीवर उसे असली मान लेता है और गलत स्थान या दिशा की जानकारी प्राप्त करने लगता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि उसका ड्रोन गलत दिशा में चला जाएगा या मिसाइल टारगेट से भटक जाएगी या फिर उसका जहाज गलत रास्ते पर जाा सकता है। वहीं, एकॉर्ड सॉफ्टवेयर के नए सिस्टममें ऐसी क्षमताएं भी शामिल हैं।

नई प्रणाली को खास क्या बनाता है?

भारतीय नौसेना को मिलने वाले नए ईसीजीएनएसएस जैमर आम जैमर नहीं हैं। इनमें कई आधुनिक क्षमताएं शामिल की गई हैं। ये एक साथ कई सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम्स को प्रभावित कर सकते हैं। यानी केवल अमेरिकी जीपीएस ही नहीं बल्कि ग्लोनास, गैलीलियो, बेइदौ और भारतीय नाविक प्रणाली से जुड़े रिसीवरों पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।

इसके अलावा इनमें डायरेक्शन बेस्ड एंटीना लगाए गए हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर केवल दुश्मन के क्षेत्र में प्रभाव डाला जा सके और अपने प्लेटफॉर्म सुरक्षित रहें। ये सिस्टम रियल टाइम में स्थिति के अनुसार अपने काम करने के तरीके को भी बदल सकती है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

भारतीय नौसेना को इसकी जरूरत क्यों?

पिछले कुछ सालों में समुद्री सुरक्षा का माहौल तेजी से बदला है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई देशों की नौसैनिक गतिविधियां बढ़ी हैं। आधुनिक युद्धपोत, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और मानव रहित प्लेटफॉर्म लगातार इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में केवल हथियार होना काफी नहीं है।

दुश्मन के कम्यूनिकेशन और नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
भारतीय नौसेना के पास एयरक्राफ्ट कैरियर्स, डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और नौसैनिक हेलीकॉप्टर हैं। इन सभी को सुरक्षित ऑपरेशन के लिए मजबूत इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा की जरूरत होती है। नए सिस्टम नौसेना को मल्टी-हेजार्ड एन्वायर्नमेंट में अधिक सुरक्षित तरीके से काम करने में मदद करेगी।

ड्रोन और मिसाइलों के खिलाफ इस्तेमाल

हाल के सालों में दुनिया भर के संघर्षों ने दिखाया है कि ड्रोन युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में हजारों ड्रोन इस्तेमाल किए गए हैं। इनमें से अधिकांश किसी न किसी प्रकार की सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि उनका नेविगेशन ब्लॉक कर दिया जाए तो उनकी प्रभावशीलता काफी कम हो सकती है। नया भारतीय सिस्टम दुश्मन के ड्रोन और कुछ प्रकार की प्रिसिजन-गाइडेड वेपन सिस्टम्स को कन्फ्यूज करने में मदद कर सकता है। (ECGNSS Jammer Indian Navy)

Explainer: What are Integrated Battle Group, Electronic Warfare Brigades and Information Warfare Units? Understand the complete plan of the biggest change of Indian Army

Indian Army EW Brigades
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Indian Army EW Brigades: The Indian Army is undergoing a shift that is being considered to be the largest military restructuring of the last several decades. This change is not limited to just buying new guns, missiles or drones, but also to change the entire structure of the military, the way to fight war and the process of decision-making. The army now wants to create strengths that can react fast on any front, start attacking or responding actions in a short time and simultaneously keep the ability to fight in many areas.

According to the defence sources, the Indian Army is now working towards multi-domain operations by advancing the traditional war thinking. The army believes that the future war will not only be among soldiers on the ground, but will also be fought on the front of cyberspace, satellite network, drone, electronic spectrum and information.

Under this big change, the Army Integrated Battle Group is going to implement the IBG. Simultaneous special electronic warfare brigades are being created, which will have the ability to inactivate the enemy radar, communication network, and the drone system before the war begins.

Indian Army EW Brigades: What is Integrated Battle Group?

Indian Army Working on long-term division and core-based structure. The arrangement had to bring together different branches for a large operation. It took time and several times the challenge of chordination also appeared. Integrated Battle Group is the answer.

IBG is an Ace Combat structure that involves almost all the resources needed for the war. It has infantry, artillery, engineering, air defense, drone unit, electronic warfare team, logistics, field hospital and logistics arrangement work under the same command.

The important thing is that IBG does not have different brigade commanders. It operates directly under the leadership of Major General Rank Officer. It is aimed at giving a sharp response at the beginning of the war, reducing logistic delay and being prepared for multi-regional (multi-domain) war.

This structure with about five thousand soldiers is larger than the traditional brigade but smaller than the division. The biggest advantage of this is that it can be deployed immediately in the event of war or crisis.

The formulas say that the IBG has been prepared in such a way that it can run a military campaign by itself for a limited time without any additional help. Indian Army EW Brigades

General Bipin Rawat’s Thinking Now Landing

IBG The concept of the former Army chief General Bipin Rawat was revealed in the tenure. He started extensive studies to make the Army’s structure more agile and technology base.

There were two major challenges in front of the army at that time. First, the increasing tension on the northern border with China and second, the constant security challenges on the western front with Pakistan.

In these circumstances, the army felt the need for a structure that could act faster than traditional arrangements. The concept of the IBG model came up with this thinking. Indian Army EW Brigades

Trial for several years

IBG not directly applied. First it was tested in several steps. 9 cores i.e. Rising Star Corps, located on the Western border in the year 2019, were built a trial area. This model was then tested for the Hill War during the Snow Victory exercise in the eastern region in 2019. It participated in the Mountain Strike Core (17 Cores).

These exercises saw how effective the IBG can prove against the enemy, equipped with hard geography, height areas and modern technology.

The defence formulas say that during the tests IBG showed sharp responses, better coordination and low logistic delays. Then the army decided to pursue this model.

Drones, Real Time Data Sharing and Modern Communication Systems were also added in the following years according to the defence sources.

First replace Mountain Strike Core

In January 2026 the Army Chief General Byendra Dwivedi indicated that IBG The proposal has been approved and will now start the process of applying it. The 17 Mountain Strike Core, who first assumed the responsibility of China Border, will be replaced in IBG. Four IBGs will be created from two divisions of this core (59 division and 23 division). Each IBG will independently operate both aggressive and defensive.

यह प्रक्रिया 2027 के मध्य तक पूरी करने का लक्ष्य है। इसके बाद मथुरा स्थित 1 कोर, अंबाला स्थित 2 कोर और भोपाल स्थित 21 कोर जैसे अन्य स्ट्राइक कोर का भी पुनर्गठन किया जाएगा।

यह कोर चीन सीमा पर आक्रामक क्षमता बनाए रखने के लिए तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत आने वाली डिवीजनों को पुनर्गठित करके चार आईबीजी बनाए जाएंगे।

रक्षा सूत्रों के अनुसार ये आईबीजी पहाड़ी इलाकों की जरूरतों के अनुरूप तैयार किए जाएंगे। इनमें हल्के लेकिन हाईली मोबाइल वेपंस, ड्रोन नेटवर्क, एयर मोबिलिटी और विशेष लॉजिस्टिक की व्यवस्था शामिल होगी।

सेना का कहना है कि इस बदलाव का मकसद केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि ऐसी सैन्य ताकत तैयार करना है जो किसी भी स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दे सके। (Indian Army EW Brigades)

थिएटर कमांड की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

आईबीजी को केवल एक नई मिलिट्री यूनिट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। यह प्रस्तावित थिएटर कमांड सिस्टम की आधारशिला भी है।

भारत भविष्य में अपनी सैन्य ताकत को उत्तर, पश्चिम और समुद्री थिएटर कमांड में संगठित करना चाहता है। इन कमांडों के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के संसाधनों का संयुक्त इस्तेमाल होगा।

सूत्रों का कहना है कि आईबीजी भविष्य के थिएटर कमांड मॉडल की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल यूनिट होगी।

क्यों बनाई जा रही हैं EW Brigades?

चीन और पाकिस्तान लगातार अपनी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं। वे दुश्मन के संचार नेटवर्क को जाम कर सकते हैं, गलत सिग्नल भेजकर भ्रम पैदा कर सकते हैं और साइबर हमलों के साथ इलेक्ट्रॉनिक हमले भी कर सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने विशेष ईडब्ल्यू ब्रिगेड बनाने का फैसला किया है।

फिलहाल सेना में Electronic Warfare की जिम्मेदारी विशेष सिग्नल यूनिट्स संभालती हैं। लेकिन नई ईडब्ल्यू ब्रिगेड बनने के बाद मौजूदा उपकरणों और संसाधनों को एक साथ जोड़कर अधिक प्रभावी तरीके से काम किया जाएगा। इनका काम दुश्मन के संचार नेटवर्क को पकड़ना, उसकी गतिविधियों पर नजर रखना, रेडियो सिग्नलों को बाधित करना और ड्रोन तथा रडार सिस्टम को जाम करना होगा।

आज हर मिलिट्री सिस्टम किसी न किसी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल छोड़ता है। लड़ाकू विमान, मिसाइल, टैंक, रडार, ड्रोन और कम्युनिकेशन नेटवर्क लगातार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का उपयोग करते हैं।

ईडब्ल्यू ब्रिगेड दुश्मन के ड्रोन और हवाई खतरों की जानकारी तुरंत आर्टिलरी और एयर डिफेंस यूनिट्स तक पहुंचाएंगी, जिससे उन टारगेट्स को तेजी से निशाना बनाया जा सकेगा।

यही कारण है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर आधुनिक युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

भारतीय सेना ने अब विशेष ईडब्ल्यू यानी इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ब्रिगेड्स बनाने का फैसला किया है। इनका मुख्य काम दुश्मन के रडार, संचार नेटवर्क, ड्रोन और डेटा लिंक को पहचानना, ट्रैक करना और जरूरत पड़ने पर जाम करना होगा।

ये नई ब्रिगेड रुद्र ब्रिगेड्स का हिस्सा होंगी। रुद्र ब्रिगेड्स ऐसी आधुनिक मिलिट्री युनिट्स हैं जिनमें इन्फैंट्री, आर्मर्ड व्हीकल्स, आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और लॉजिस्टिक को एक साथ जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य युद्ध के दौरान सभी क्षमताओं को एक ही कमांड के तहत उपलब्ध कराना है। (Indian Army EW Brigades)

गोली चलने से पहले दुश्मन को अंधा करने की तैयारी

ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स यह भी सुनिश्चित करेंगी कि भारतीय सेना का अपना संचार नेटवर्क सुरक्षित और सुचारु रूप से काम करता रहे। इनका काम दुश्मन की “आंख और कान” को कमजोर करना और सेना के इनफॉरमेशन सिस्टम को सुरक्षित रखना होगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार नई ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स को पाकिस्तान और चीन सीमा के अलग-अलग सेक्टरों में तैनात किया जाएगा। इनका उद्देश्य युद्ध शुरू होने से पहले दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों का नक्शा तैयार करना होगा।

युद्ध की स्थिति में यही ब्रिगेड्स दुश्मन के रडार नेटवर्क को ब्लॉक कर सकती हैं, कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर सकती हैं और ड्रोन कंट्रोल लिंक को प्रभावित कर सकती हैं। ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स में एडवांस्ड जेमर्स, डायरेक्शन फाइंडर्स और सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) सिस्टम होंगे।

सूत्रों ने बताया कि आधुनिक युद्ध में कई बार जीत उस पक्ष की होती है जो दुश्मन को पहले देख ले और खुद दिखाई न दे। ईडब्ल्यू ब्रिगेड्स इसी सिद्धांत पर काम करेंगी। (Indian Army EW Brigades)

Operations Lessons Meet From the Sindoor

रक्षा सूत्रों का कहना है कि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने अपनी टेक्निकल स्ट्रक्चर की व्यापक समीक्षा की थी। उस समीक्षा में यह सामने आया कि भविष्य के संघर्षों में ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और डेटा आधारित युद्ध की भूमिका और बढ़ेगी। इसी के बाद नई टेक्नोलॉजी बेस्ड मिलिट्री स्ट्रक्चर्स को तेजी से आगे बढ़ाया गया।

करगिल विजय दिवस 2025 के अवसर पर सेना प्रमुख ने रुद्र ब्रिगेड्स, 30 से अधिक भैरव कमांडो बटालियनों, ड्रोन संचालन के लिए शक्तिबाण रेजिमेंट्स और दिव्यास्त्र बैटरियों के गठन को मंजूरी दी थी। नई इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ब्रिगेड्स इसी सैन्य आधुनिकीकरण अभियान का हिस्सा हैं और सेना की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेंगी।

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और डीआरडीओ की बड़ी भूमिका

सेना की नई इलेक्ट्रॉनिक क्षमता को मजबूत करने में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और डीआरडीओ की महत्वपूर्ण भूमिका है।

रक्षा मंत्रालय भी इस योजना को नई टेक्नोलॉजी के जरिए सपोर्ट कर रहा है। अक्टूबर 2025 में धाराशक्ति इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को अपग्रेड करने के लिए 5,150 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। यह सिस्टम डीआरडीओ ने डेवलप किया है और इसका निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), एलएंडटी और अन्य भारतीय कंपनियां कर रही हैं।

इन सिस्टम्स को इस तरह डेवलप किया गया है कि वे दुश्मन के ड्रोन, रडार और संचार नेटवर्क की पहचान कर सकें तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय भी कर सकें।

इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ 1,476 करोड़ रुपये का समझौता किया है। इसके तहत आधुनिक मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदे जा रहे हैं। ये सिस्टम संभव, सम्युक्त और हिमशक्ति जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों के तहत विकसित किए जा रहे हैं।

सितंबर 2025 में सेना और वायुसेना के संयुक्त अभ्यास के दौरान इस सिस्टम ने लगभग 150 किलोमीटर दूरी पर दुश्मन के ड्रोन को निष्क्रिय करने की क्षमता दिखाई थी। यह सिस्टम खतरे का तुरंत विश्लेषण कर जामिंग भी कर सकता है।

इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने बीईएल के साथ 1,476 करोड़ रुपये का समझौता भी किया है। इसके तहत पांच आधुनिक मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदे जाएंगे। ये सिस्टम कठिन इलाकों में आगे बढ़ रही सेना के साथ चल सकते हैं और चीन सीमा तथा पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किए जाएंगे। (Indian Army EW Brigades)

इनफॉरमेशन वॉरफेयर भी बन गया नया मोर्चा

भारतीय सेना केवल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तक सीमित नहीं रहना चाहती। अब सूचना युद्ध भी उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है। आज सोशल मीडिया, फेक न्यूज, साइबर हमले और मनोवैज्ञानिक अभियान किसी भी संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं।

इसीलिए सेना ने विशेष इंफॉर्मेशन वारफेयर संगठन तैयार किया है। यह संगठन साइबर एक्सपर्ट्स, साइकोलॉजिकल आपरेशंस यूनिट्स, और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन यूनिट्स को एक प्लेटफार्म पर लाता है।

इसके अलावा एक ट्राई-सर्विस इंफॉर्मेशन वारफेयर यूनिट भी बनाई जा रही है। यह यूनिट थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करेगी। यह संगठन इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) मुख्यालय के तहत काम करेगा और तीनों सेनाओं के सूचना एवं साइबर अभियानों को एक साथ चलाने में मदद करेगा।

इसका उद्देश्य दुश्मन द्वारा फैलाए जाने वाले भ्रामक प्रचार का मुकाबला करना और सही सूचना को तेजी से आगे पहुंचाना है।

एआई, ड्रोन और डेटा बनेंगे नई ताकत

सेना ने साल 2026 को नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिसिटी का वर्ष घोषित किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्मों को एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जोड़ना है। ड्रोन, रडार, सेंसर, निगरानी प्रणाली और अग्रिम चौकियों से आने वाली जानकारी एक ही नेटवर्क पर उपलब्ध होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-बेस्ड सिस्टम इस डेटा का विश्लेषण करेगी और कमांडरों को तेजी से फैसले लेने में मदद देगी। (Indian Army EW Brigades)

Will Indian Army Meet 300 New K9 Vajra Torp? Big decision on Mega Deal of 23,000 crores soon

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PIB)

300 K9 Vajra Deal: The Indian Army is preparing for the Government’s approval for the purchase of more than 300 additional K9 Vajra-T self-propelled cannons (Self-propelled) to further strengthen its long-distance killing capacity. The price of this proposed deal is about Rs 23,000 crore.

The formulas say that this proposal can soon be placed in front of the Defence Procurement Board. If it is approved, these cannons will be constructed by Larsen and Toubro (L&T), which produces K9 Vazra in India in collaboration with Hanvah Techvin, South Korea.

Sources say it can be one of the largest artillery purchases of the Indian Army in the last several decades. After this deal, the total number of K9 Vajra Torps that are formed for the Indian Army will be more than 500.

Let’s say Defence News On April 20, it was reported that K9 Vajra-T talks about the third phase.

300 K9 Vajra Deal: What is K-9 Vajra-T?

K9 Vazra-T is a modern self-propelled horizontal cannon. This is the Indian version of South Korea’s famous K9 Thunder Systems, designed as per Indian needs.

It is a cannon of 155 millimeters and 52 caliber. The biggest advantage of this is that it does not have to be pulled from a truck. It can walk itself on your track and quickly reach one place to another. it Shoot & Scoop The strategy specializes in and has proved to be effective in both Desert and High-aulted areas.

युद्ध में ऐसी तोपों को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वे फायरिंग करने के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकती हैं। इससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचना आसान हो जाता है। (300 K9 Vajra Deal)

40 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार

के9 वज्र की मारक क्षमता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह सामान्य गोला-बारूद के साथ 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकती है।

विशेष प्रकार के लॉन्ग रेंज दूरी वाले गोले और रॉकेट असिस्टेड गोला-बारूद के साथ इसकी रेंज लगभग 50 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। यह दुश्मन के ठिकानों, कमांड पोस्ट, गोला-बारूद भंडार और सैन्य जमावड़े को काफी दूर से निशाना बना सकती है। (300 K9 Vajra Deal)

कुछ सेकंड में कई गोले दागने की क्षमता

K9 Vajra को तेज फायरिंग के लिए डिजाइन किया गया है। यह मात्र 15 सेकंड में तीन गोले दाग सकती है। शुरुआती चरण में यह प्रति मिनट छह से आठ गोले तक दागने में सक्षम है। लंबे समय तक ऑपरेशन के दौरान भी यह लगातार दो से तीन गोले प्रति मिनट फायर कर सकती है।

इसमें मल्टीपल राउंड सिमल्टेनियस इम्पैक्ट तकनीक भी मौजूद है। इसका मतलब यह है कि अलग-अलग कोणों से छोड़े गए कई गोले एक ही समय पर लक्ष्य पर गिर सकते हैं। इस तकनीक से दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिल पाता।

रेगिस्तान से लेकर लद्दाख तक शानदार प्रदर्शन

भारतीय सेना ने के9 वज्र को केवल रेगिस्तानी इलाकों के लिए नहीं अपनाया है। शुरुआत में इन तोपों को पश्चिमी सीमा के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया था। बाद में चीन के साथ सीमा पर बढ़े तनाव के दौरान इन्हें लद्दाख में भी तैनात किया गया।

सूत्रों के अनुसार लद्दाख के कठिन मौसम और ऊंचाई वाले इलाकों में इन तोपों का विशेष परीक्षण किया गया था। वहां इसके इंजन, सस्पेंशन और अन्य प्रणालियों का प्रदर्शन शानदार रहा। यही वजह है कि अब सेना इनकी संख्या बढ़ाने की योजना बना रही है। (300 K9 Vajra Deal)

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PM Modi X Account)

पीएम मोदी ने की थी के9 वज्र की सवारी

19 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सूरत के पास हजीरा स्थित एल एंड टी के आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लैक्स का उद्घाटन किया था। यह भारत का पहला प्राइवेट सेक्टर प्लांट था, जहां के9 वज्र का उत्पादन शुरू हुआ।

उसके बाद उन्होंने हाल ही में 6 जून को फिर हजीरा प्लांट का दौरा किया। जहां उन्होंने जोरावर लाइट टैंक, के9 वज्र और अन्य स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का जायजा लिया। इस यात्रा में उन्होंने एल एंड टी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ में भूमिका की सराहना की। इस मौके पर पीएम मोदी ने खुद के9 वज्र पर सवार होकर इसकी मोबिलिटी और ताकत का अनुभव लिया।

इस साल अप्रैल में शुरू हुई थी बातचीत

20 अप्रैल को दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की भारत यात्रा के दौरान के9 वज्र-टी स्व-चालित हॉवित्जर को लेकर बातचीत हुई थी। दोनों देशों ने के9 वज्र प्रोजेक्ट को अगले चरण में ले जाने, स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और एडवांस टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण पर विस्तार से बातचीत की थी। इसके अलावा के9 वज्र-टी तोपों को और आधुनिक बनाने के लिए नई तकनीक लगाने की योजना को लेकर भी चर्चा हुई थी, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से काम करेगी।

इस अपग्रेड में रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम (आरसीडब्ल्यूएस) शामिल होगा, जो अपने आप ड्रोन को पहचान सकता है, उनका पीछा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बना सकता है।

इसके साथ ही इनमें जैमर और खास सेंसर भी जोड़े जाएंगे, जिससे ये दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों से बेहतर तरीके से निपट सकें। ऐसी सुविधाएं के9 के नए वर्जन, जैसे के9ए2 और के9ए3 में पहले से मौजूद हैं। (300 K9 Vajra Deal)

300 K9 Vajra Deal
K9 Vajra self-propelled howitzers. (Image Source: PM Modi X Account)

2017 में मिला था पहला ऑर्डर

के9 वज्र की कहानी भारत में साल 2017 से शुरू हुई। उस समय भारतीय सेना ने 100 तोपों के लिए लगभग 4,500 करोड़ रुपये का पहला कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस परियोजना की जिम्मेदारी एलएंडटी को दी गई थी। कंपनी ने गुजरात के हजीरा स्थित अपने आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लेक्स में इन तोपों का उत्पादन शुरू किया।

इन 100 तोपों की डिलीवरी तय समय से पहले पूरी कर दी गई थी। साल 2021 तक सभी तोपें सेना को सौंप दी गई थीं।

पहले अनुबंध के बाद सेना ने इन तोपों के प्रदर्शन की समीक्षा की। रक्षा सूत्रों के अनुसार सेना के9 वज्र के प्रदर्शन से संतुष्ट रही। इसके बाद 2023-24 में दूसरा लगभग 7,600 करोड़ रुपये की लागत से 100 और तोपों का अतिरिक्त ऑर्डर दिया गया। अब तीसरी बार 23,000 करोड़ रूपये की तीसरी डील में 300 से अधिक नई तोपों की खरीद का प्रस्ताव सामने आया है। यदि यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है तो के9 वज्र भारतीय सेना की सबसे बड़ी सेल्फ प्रोपेल्ड गन सिस्टम बन जाएगी।

स्वदेशीकरण बढ़ाने पर फोकस

के9 वज्र परियोजना की एक खास बात इसका बढ़ता स्वदेशीकरण है। पहले बैच के दौरान कई प्रमुख पुर्जे विदेश से आते थे। लेकिन धीरे-धीरे भारत में निर्माण बढ़ाया गया। रक्षा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अब इस प्लेटफॉर्म में 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसमें भारतीय उद्योग, छोटे और मध्यम उद्यमों तथा विभिन्न सप्लाई चेन कंपनियों की भी भागीदारी बढ़ी है। (300 K9 Vajra Deal)

दो मोर्चों की चुनौती के बीच बढ़ रही जरूरत

भारतीय सेना को एक साथ पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर तैयार रहना पड़ता है। पश्चिम में पाकिस्तान सीमा और उत्तर में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति को देखते हुए सेना लंबी दूरी की फायरपावर बढ़ाने पर जोर दे रही है।

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में केवल सैनिकों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि तेजी से प्रतिक्रिया देने वाली तोपें और सटीक मार करने वाले हथियार भी उतने ही जरूरी होते हैं। वहीं, के9 वज्र इसी जरूरत को पूरा करती है।

पुरानी तोपों की जगह ले रही नई प्रणाली

भारतीय सेना लंबे समय से अपनी आर्टिलरी को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में लगी हुई है। कई दशक पुरानी 105 मिलीमीटर और 130 मिलीमीटर तोपों को धीरे-धीरे नई 155 मिलीमीटर वाली गनों से बदला जा रहा है।

इस अभियान के तहत धनुष तोप, एटीएजीएस, एम-777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर और पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम भी शामिल की गई हैं।

सामान्य तोपों की तुलना में के9 वज्र में क्रू बेहतर सुरक्षा के भीतर काम करता है। इसमें विशेष कवच सुरक्षा, न्यूक्लियर-बायोलॉजिकल-केमिकल सुरक्षा प्रणाली और आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम लगे हुए हैं। युद्ध के दौरान चालक दल को खुले क्षेत्र में काम नहीं करना पड़ता, जिससे उनकी सुरक्षा बढ़ जाती है। (300 K9 Vajra Deal)

Larger order of ECHS: No referrals will be treated Reimbursement, new warnings for former troops

ECHS Reimbursement Rules
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ECHS Reimbursement Rules: The X-Serviceman Contributory Health Scheme (ECHS) providing health facilities to former troops and their families has issued an important instruction regarding the treatment rules. The Regional Centre ECHS, Kochi has clarified in a circular sent to all polyclinics that if a beneficiary undergoes a planned treatment directly at the Emptained Hospital without following the prescribed procedure, then its reimbursement claim may have severe impact.

This circular has been released at a time when in many cases saw that the beneficiary is first treating in private amptained hospitals without referrals and subsequently seeking reimbursement to compensate for expenses. ECHS says this process is not consistent with existing rules and guidelines.

ECHS Reimbursement Rules: What is said in the circular?

All polyclinics in the paper issued by the Kochi-based Regional Center ECHS have been directed to make them aware of the referral process to the beneficiaries of their terrain and inspire them to follow the rules.

The circular states that some of the beneficiary are treating the Empanelled Healthcare Organization i.e. listed hospitals for referrals. Later they are filing reimbursement claims to get back treatment expenses. This arrangement according to ECHS is against the basic rules of the scheme. (ECHS Reimbursement Rules)

Caching Cashless Hospital Responsibility

ECHS It has also reminded that Empanelled hospitals are responsible for providing cashless treatment to beneficiaries.

If a hospital refuses to provide cashless facility, it will be considered a violation of the terms of the agreement. Officers say that if such cases were not controlled, other hospitals can also avoid giving cashless facility. The direct bearing will be on former troops and their families, which may cost a large sum of money from their pockets.

What is the referral system?

The first beneficiary has to go their parent polyclinic for any planned treatment under ECHS. Doctors present there examine the patient and issue referrals to a specialist or hospital if needed.

Depending on this referral, the patient can get cashless treatment in the ampanal hospital.

In general this referral remains valid for 30 days. In cases of some serious illnesses, such as cancer, etc., it may be longer. (ECHS Reimbursement Rules)

Which treatment is required in referrals?

According to the rules surgery, specialist doctor's advice, special investigations, recruitment and referrals to other planned medical procedures are necessary.

Although the emergency situation is different. If the patient has a sudden severe health problem, he can go directly to the hospital. In such cases, the ECHS has to be informed within the time frame prescribed later. (ECHS Reimbursement Rules)

Why increased anxiety?

ECHS As per the authorities, in recent times, a number of cases appeared, in which the beneficiary arrived directly to the hospital, treated and then filed the Reimbursement Claim for the return of expenses.

This led to two kinds of problems. First, the purpose of the cashless arrangement was affected. Secondly, increasing the number of reimbursement claims caused additional pressure on the administrative process.

Due to this, Kochi Regional Center has issued strict instructions to all polyclinics reaffirming the rules. (ECHS Reimbursement Rules)

ECHS Reimbursement Rules
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What will happen now in cases with no referrals?

In accordance with the circular if a beneficiary makes a planned treatment without referrals and subsequently submits the claim, the written explanation will be taken from the concerned hospital.

The hospital must tell why he did not give the patient a cashless facility. This explanation will be mandatory to be uploaded with claim documents.

The purpose of this arrangement is to ensure that the hospital also adheres to its obligations and the beneficiaries do not have to bear unnecessary economic burden.

The Ministry of Defence started in 2003. It aims to provide better health services to retired soldiers, their dependents and war crescents.

Today, millions of former soldiers and their families are taking advantage of this scheme. Hundreds of polyclinic,military hospital,governmental hospital and thousands of private amptained hospitals are connected under the scheme.

The biggest feature of ECHS is the feature of cashless treatment, which does not cost the beneficiaries at the time of treatment.

Officers have advised that contact your nearest ECHS polyclinic before any planned treatment. Get referrals after the doctor’s advice and treat the hospital listed on the same basis.

This will benefit from the cashless facility and subsequently Reimbursement The troubles associated with you will not face.

This order of the Kochi Regional Centre is also sent to the Army, Navy and other concerned station headquarters to ensure adherence to a similar process in all place. (ECHS Reimbursement Rules)