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सेना की एयर डिफेंस ट्रेनिंग में बड़ा बदलाव! मल्टीरोटर कॉप्टर, स्वॉर्म ड्रोन और रॉकेट पर प्रैक्टिस करेंगे जवान

Indian Army Air Defence Training
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

Indian Army Air Defence Training: आज बैटलफील्ड में ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल, स्मार्ट बम और हीट सीकिंग हथियारों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इन खतरों से ग्राउंड पर निपटने वाली भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स को भी उसी स्तर की ट्रेनिंग की जरूरत है, जैसी उन्हें असली युद्ध के दौरान मिल सकती है।

भारतीय सेना के आर्मी एयर डिफेंस महानिदेशालय ने तीन अलग-अलग रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की हैं। इनमें मल्टीरोटर कॉप्टर बेस्ड बेसिक टारगेट सिस्टम, स्वॉर्म ड्रोन बेस्ड बेसिक टारगेट सिस्टम और इंटरमीडिएट टारगेट सिस्टम रॉकेट शामिल हैं।

भारतीय सेना अब एयर डिफेंस ट्रेनिंग को केवल पारंपरिक टारगेट्स तक सीमित नहीं रखना चाहती। बदलते युद्धक्षेत्र में ड्रोन, स्वॉर्म और हीट सिग्नेचर आधारित खतरों को ध्यान में रखते हुए ट्रेनिंग स्ट्रक्चर को उसी स्तर पर ढालने की तैयारी की जा रही है, ताकि सैनिकों को अभ्यास के दौरान वास्तविक परिस्थितियों के सबसे करीब अनुभव मिल सके।

Indian Army Air Defence Training: क्यों बदल रही है एयर डिफेंस ट्रेनिंग

दुनिया भर के सैन्य अभियानों ने यह साबित किया है कि केवल बड़े लड़ाकू विमान ही खतरा नहीं हैं। छोटे ड्रोन भी अब निगरानी, लक्ष्य निर्धारण और सीधे हमले करने में सक्षम हो चुके हैं। कई देशों ने स्वॉर्म ड्रोन तकनीक विकसित कर ली है, जिसमें दर्जनों ड्रोन एक साथ कॉर्निडेटेड तरीके से हमला कर सकते हैं।

सेना की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक एयर डिफेंस युनिट्स को चौथी और पांचवीं पीढ़ी के विमानों के साथ-साथ क्रूज मिसाइलों और अनमैन्ड एरियल सिस्टम जैसे नए खतरों का मुकाबला करने के लिए तैयार करना जरूरी हो गया है। इसी कारण ऐसे टारगेट सिस्टम की आवश्यकता महसूस की गई है जो वास्तविक दुश्मन की तरह व्यवहार कर सकें और सैनिकों को व्यावहारिक अनुभव दे सकें। (Indian Army Air Defence Training)

मल्टीरोटर कॉप्टर बनेगा टारगेट

पहला सिस्टम मल्टीरोटर कॉप्टर बेस्ड टारगेट सिस्टम है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे टारगेट उपलब्ध कराना है जो धीमी गति से उड़ने वाले हेलीकॉप्टर या छोटे ड्रोन जैसे दिखाई दें।

यह सिस्टम पूरी तरह मॉड्यूलर होगा, यानी इसे अलग-अलग हिस्सों में ले जाकर मौके पर जल्दी से जोड़ा जा सकेगा। इसमें वर्टिकल टेक ऑफ और लैंडिंग क्षमता होगी। इसका मतलब यह है कि इसे रनवे की जरूरत नहीं होगी और यह सीधे जमीन से ऊपर उठ सकेगा।

सिस्टम में ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और रेडियो डेटा लिंक भी शामिल होगा। एक ही कंट्रोल स्टेशन से कम से कम दो एरियल टारगेट्स को कंट्रोल किया जा सकेगा। इससे ट्रेनिंग के दौरान एक साथ कई तरह की परिस्थितियां बनाई जा सकेंगी।

सेना चाहती है कि इस प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग प्रकार के पेलोड लगाए जा सकें। इनमें रडार क्रॉस सेक्शन बढ़ाने वाला उपकरण शामिल होगा, जिससे टारगेट रडार स्क्रीन पर ज्यादा स्पष्ट दिखाई देगा। इसके अलावा इंफ्रा रेड सिग्नेचर बढ़ाने वाला सिस्ट्म भी होगी ताकि हीट सीकिंग मिसाइलें टारगेट को पहचान सकें।

गति और उड़ान क्षमता पर विशेष जोर

सेना ने इस सिस्टम के लिए कई तकनीकी मानक तय किए हैं। बिना अतिरिक्त पेलोड के इसकी अधिकतम गति कम से कम 30 मीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए। अलग अलग स्पीड पर इसकी फ्लाइट ड्यूरेशन भी तय किय गया है ताकि लंबे समय तक अभ्यास कराया जा सके।

ऑपरेशनल रेंज 15 किलोमीटर या उससे अधिक रखने की मांग की गई है। इसके अलावा यह ऊंचाई वाले इलाकों में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। सेना चाहती है कि इसे समुद्र तल से 4200 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर भी ऑपरेट किया जा सके।

इस तरह की क्षमता विशेष रूप से लद्दाख और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में उपयोगी साबित होती है, जहां सामान्य ड्रोन का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। (Indian Army Air Defence Training)

स्वॉर्म ड्रोन से होगी नई तरह की ट्रेनिंग

दूसरा आरएफआई स्वॉर्म ड्रोन टारगेट सिस्टम से जुड़ा है। स्वॉर्म तकनीक में कई ड्रोन एक समूह के रूप में काम करते हैं और एक-दूसरे के साथ कॉर्डिनेट करके मिशन पूरा करते हैं।

सेना जिस सिस्टम की तलाश कर रही है उसमें 12 ड्रोन का एक सेट होगा। ये सभी ड्रोन ऑटोनॉमस तरीके से उड़ान भर सकेंगे और समूह में ऑपरेट होंगे। प्रत्येक ड्रोन में वर्टिकल टेक ऑफ और लैंडिंग क्षमता होगी।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के माध्यम से पूरे स्वॉर्म को प्रोग्राम किया जा सकेगा। ऑपरेटर पहले से उड़ान मार्ग निर्धारित कर सकेंगे और ड्रोन उसी के अनुसार काम करेंगे।

इस तरह के टारगेट्स एयर डिफेंस वेपंस के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति तैयार करते हैं क्योंकि एक साथ कई टारगेट दिखाई देते हैं। इससे जवानों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में निर्णय लेने का अनुभव मिलता है।

कमांड लिंक टूटने पर भी मिशन जारी

स्वॉर्म सिस्टम की एक दिलचस्प विशेषता उसकी सुरक्षा व्यवस्था है। यदि किसी कारण से कंट्रोल लिंक टूट जाए तो ड्रोन स्वतः निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।

पहले मोड में ड्रोन पहले से तय वेपॉइंट के अनुसार उड़ान जारी रखेंगे और फिर निर्धारित लैंडिंग क्षेत्र में लौट आएंगे। दूसरे मोड में वे सीधे रिटर्न टू होम प्रक्रिया शुरू कर देंगे।

इससे ट्रेनिंग के दौरान दुर्घटना की संभावना कम होती है और महंगे उपकरणों को सुरक्षित वापस लाया जा सकता है।

रॉकेट बेस्ड टारगेट क्यों है खास

तीसरा और सबसे अलग सिस्टम इंटरमीडिएट टारगेट सिस्टम रॉकेट है। यह विशेष रूप से इंफ्रा रेड होमिंग मिसाइलों की ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जा रहा है।

ऐसी मिसाइलें टारगेट की गर्मी को पहचानकर उसकी ओर बढ़ती हैं। इसलिए अभ्यास के दौरान ऐसे टारगेट की जरूरत होती है जो वास्तविक विमान या हेलीकॉप्टर जैसी गर्मी पैदा कर सके।

सेना के दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि रॉकेट पूरे ऑपरेशन के दौरान इंफ्रा रेड सिग्नेचर देता रहे ताकि हीट सीकिंग मिसाइलें उस पर लॉक कर सकें। (Indian Army Air Defence Training)

रॉकेट की तकनीकी क्षमताएं

सेना ने रॉकेट के लिए न्यूनतम रफ्तार 180 मीटर प्रति सेकंड निर्धारित की है। इसकी उड़ान अवधि कम से कम 30 सेकंड होनी चाहिए। साथ ही इंफ्रा रेड सोर्स कम से कम 20 सेकंड तक लगातार पर्याप्त गर्मी प्रदान करे ताकि मिसाइल प्रभावी ढंग से लक्ष्य को ट्रैक कर सके।

रॉकेट की प्रभावी रेंज 6 किलोमीटर से अधिक होनी चाहिए। लॉन्च की तैयारी 15 मिनट से कम समय में पूरी हो जानी चाहिए। इसके अलावा इसकी चढ़ाई दर 30 मीटर प्रति सेकंड से ज्यादा मांगी गई है।

सेना चाहती है कि लॉन्चर को अलग-अलग दिशा और कोण में घुमाया जा सके। इससे विभिन्न प्रकार की उड़ान प्रोफाइल बनाई जा सकेंगी और मिसाइल ऑपरेटरों को अलग-अलग परिस्थितियों में अभ्यास मिलेगा। (Indian Army Air Defence Training)

सुरक्षा को लेकर भी कड़े मानक

रॉकेट सिस्टम में फ्लेयर गिरने से रोकने के लिए विशेष सुरक्षा उपाय मांगे गए हैं। दस्तावेज में स्टेनलेस स्टील मेश या उससे बेहतर व्यवस्था की मांग की गई है।

इसके अलावा यह सिस्टम हल्की बारिश, कोहरे और बादलों वाली परिस्थितियों में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरा सिस्टम सड़क, रेल, वायु और समुद्री मार्ग से आसानी से परिवहन योग्य होना चाहिए।

रिकॉर्डिंग और डेटा विश्लेषण पर फोकस

मॉडर्न मिलिटरी ट्रेनिंग सिस्टम केवल फायरिंग तक सीमित नहीं है। हर अभ्यास के बाद डेटा का विश्लेषण भी किया जाता है।

इसी कारण सेना ने रिकॉर्डिंग सुविधा को अनिवार्य बनाया है। ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन कम से कम दो घंटे तक मिशन डेटा रिकॉर्ड कर सके और उसके पास न्यूनतम 256 जीबी डेटा स्टोरेज हो।

इस रिकॉर्डिंग से ट्रेनर यह देख सकते हैं कि टारगेट किस दिशा में गया, मिसाइल या हथियार का रेस्पॉन्स कैसा रही और ऑपरेटर ने किस तरह निर्णय लिए। (Indian Army Air Defence Training)

स्वदेशीकरण पर विशेष जोर

रक्षा खरीद प्रक्रिया में इस बार भी स्वदेशी सामग्री को बड़ी प्राथमिकता दी गई है। सेना ने स्पष्ट किया है कि कुल इंडिजिनस कंटेंट कम से कम 50 प्रतिशत होना चाहिए। इसमें भारत में निर्मित मटेरियल, कंपोनेंट और सॉफ्टवेयर शामिल होंगे।

वेंडर्स को यह भी बताना होगा कि कौन-कौन से सबसिस्टम्स पूरी तरह देश में बनाए गए हैं और किन तकनीकों के लिए विदेशी निर्भरता बनी हुई है।

इससे सेना केवल तैयार उत्पाद नहीं बल्कि उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता का भी मूल्यांकन कर सकेगी। (Indian Army Air Defence Training)

कैसे चलेगी खरीद प्रक्रिया

तीनों सिस्टम्स के लिए सिंगल स्टेज टू बिड सिस्टम अपनाया जाएगा। कंपनियों को तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव अलग-अलग सीलबंद लिफाफों में जमा करने होंगे। व्यावसायिक प्रस्ताव कम से कम 18 महीने तक वैध रहेगा।

तकनीकी मूल्यांकन समिति पहले प्रस्तावों की जांच करेगी। जो कंपनियां इस चरण में सफल होंगी उनके उपकरणों का भारत में परीक्षण किया जाएगा। यह परीक्षण नो कॉस्ट नो कमिटमेंट आधार पर होगा, यानी सेना पर कोई वित्तीय दायित्व नहीं होगा।

इसके बाद स्टाफ मूल्यांकन और अंतिम चयन की प्रक्रिया पूरी होगी। सबसे कम कीमत वाले पात्र विक्रेता को अनुबंध दिया जाएगा। (Indian Army Air Defence Training)

वेंडर्स को देनी होगी विस्तृत जानकारी

वेंडर्स को यह बताना होगा कि उनका सिस्टम कितनी ऊंचाई तक काम कर सकता है, उसकी अधिकतम गति क्या है, उसमें कितनी स्वदेशी तकनीक है और भविष्य में उसका रखरखाव कैसे किया जाएगा।

कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि क्या वे प्रशिक्षण सिम्युलेटर, रखरखाव उपकरण और तकनीकी साहित्य उपलब्ध करा सकती हैं, ताकि सेना लंबे समय तक इन प्रणालियों का उपयोग कर सके।

आरएफआई के अनुसार प्री सबमिशन बैठक 17 जुलाई 2026 को आयोजित की जाएगी, जहां कंपनियां अपनी शंकाओं का समाधान कर सकेंगी। इसके बाद प्रस्ताव जमा करने की अंतिम प्रक्रिया अगस्त में पूरी होगी। दस्तावेज जमा करने के लिए सेना भवन में विशेष ड्रॉप बॉक्स की व्यवस्था की जाएगी। (Indian Army Air Defence Training)

4×4 ट्रक पर 155 मिमी तोप! भारत की MArG गन ने यूरोप में मचाई सनसनी, जानिए क्यों खास है यह स्वदेशी आर्टिलरी सिस्टम

MArG 155mm Artillery Gun
MArG 155mm Artillery Gun (Image Source: Kalyani Strategic Systems Limited)

MArG 155mm Artillery Gun: फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित दुनिया की सबसे बड़ी रक्षा प्रदर्शनी यूरोसैटरी 2026 में भारत की डिफेंस कंपनी कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (केएसएसएल) ने अपनी नई पीढ़ी की एमएआरजी (माउंटेड आर्टिलरी गन) सीरीज को दुनिया के सामने रखा है। यह 155 मिमी कैलिबर की आधुनिक तोप है, जिसे 4×4 हाई मोबिलिटी वाहन पर लगाया गया है।

यह सिस्टम पारंपरिक भारी आर्टिलरी और तेज रफ्तार वाले मोबाइल प्लेटफॉर्म के बीच एक नया संतुलन बनाता है। खास बात यह है कि जिस तरह की मारक क्षमता आमतौर पर 6×6 या 8×8 बड़े मिलिट्री व्हीकल्स पर देखने को मिलती है, उसे केएसएसएल ने एक अपेक्षाकृत छोटे 4×4 प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने का दावा किया है।

MArG 155mm Artillery Gun: यूरोसैटरी 2026 में भारत की मजबूत मौजूदगी

यूरोसैटरी को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित रक्षा और सुरक्षा प्रदर्शनियों में गिना जाता है। यहां दुनिया भर की कंपनियां अपनी नवीनतम सैन्य तकनीक और हथियार प्रणालियां प्रदर्शित करती हैं।

इस बार भारतीय रक्षा उद्योग की ओर से सबसे अधिक चर्चा एमएआरजी सीरीज की हो रही है। केएसएसएल ने एमएआरजी-39, एमएआरजी-45 और एमएआरजी-52 नाम से तीन अलग-अलग वेरिएंट पेश किए हैं। तीनों में एक ही प्लेटफॉर्म का उपयोग किया गया है लेकिन उनकी मारक दूरी और कैलिबर कॉन्फिगरेशन अलग-अलग हैं।

कंपनी का कहना है कि इससे किसी भी देश की सेना अपनी जरूरत, भौगोलिक परिस्थितियों और ऑपरेशनल प्रोफाइल के अनुसार उपयुक्त मॉडल चुन सकती है।

आखिर क्या है एमएआरजी सीरीज?

एमएआरजी का पूरा नाम माउंटेड आर्टिलरी गन है। यह ट्रक आधारित आधुनिक तोप प्रणाली है, जिसे तेजी से तैनात करने और तेजी से स्थान बदलने के लिए डिजाइन किया गया है।

आधुनिक युद्ध में भारी तोपों की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि दुश्मन उनके स्थान का पता लगाकर जवाबी हमला कर सकता है। इसलिए आज दुनिया की सेनाएं ऐसी आर्टिलरी चाहती हैं जो गोली चलाने के तुरंत बाद अपनी स्थिति बदल सके।

एमएआरजी सीरीज को इसी सोच के साथ विकसित किया गया है। यह “शूट एंड स्कूट” क्षमता से लैस है। यानी लक्ष्य पर गोले दागने के बाद यह कुछ ही मिनटों में नई जगह पहुंच सकती है। (MArG 155mm Artillery Gun)

एमएआरजी-39 क्यों बना आकर्षण का केंद्र?

यूरोसैटरी 2026 में एमएआरजी-39 को प्रदर्शित किया गया है। यह 155 मिमी और 39 कैलिबर की तोप है, जिसे एक 4×4 हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया गया है।

इसका कुल वजन लगभग 22 टन है। कंपनी के अनुसार यह पहाड़, रेगिस्तान, सीमावर्ती क्षेत्र और कमजोर सड़क नेटवर्क वाले इलाकों में भी आसानी से ऑपरेट कर सकती है।

एमएआरजी-39 में 18 गोले साथ लेकर चलने की क्षमता है। यह दिन में लगभग डेढ़ मिनट और रात में दो मिनट के भीतर फायरिंग के लिए तैयार हो सकती है।

इसकी फायरिंग दर भी काफी प्रभावशाली बताई गई है। यह तीन मिनट में 10 राउंड दाग सकती है जबकि लगातार फायरिंग के दौरान एक घंटे में 42 राउंड तक फायर कर सकती है। (MArG 155mm Artillery Gun)

पहाड़ों और सीमावर्ती इलाकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण?

भारत जैसे देश के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में भारी तोपों को पहुंचाना हमेशा चुनौती रहा है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे इलाकों में सड़कें सीमित हैं और कई जगह बड़े सैन्य वाहनों की आवाजाही आसान नहीं होती।

एमएआरजी सीरीज का सबसे बड़ा फायदा इसकी मोबिलिटी है। कंपनी का दावा है कि यह 25 डिग्री तक की चढ़ाई पर भी आसानी से चल सकती है।

इसी कारण इसे ऐसे इलाकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जहां भारी 8×8 प्लेटफॉर्म पहुंचने में कठिनाई महसूस करते हैं।

दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचने की क्षमता

आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी की सबसे बड़ी परीक्षा दुश्मन के काउंटर बैटरी फायर से बचना होती है। जब कोई तोप फायर करती है तो उसकी स्थिति का पता लगाया जा सकता है।

एमएआरजी सीरीज को इस खतरे को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। फायरिंग के बाद यह बहुत कम समय में अपनी स्थिति बदल सकती है। इससे दुश्मन की जवाबी गोलाबारी से बचने की संभावना बढ़ जाती है।

केएसएसएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नीलेश तुंगार ने कहा कि एमएआरजी सीरीज ऐसे क्षेत्रों तक पहुंच सकती है जहां भारी सिस्टम आसानी से नहीं पहुंच पाते। उन्होंने कहा कि इसकी गतिशीलता इसे युद्धक्षेत्र में बड़ा लाभ देती है। (MArG 155mm Artillery Gun)

आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम से लैस

एमएआरजी सीरीज में आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया गया है। यह डिजिटल नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट सिस्टम के साथ काम कर सकता है।

इसकी मदद से टारगेट की पहचान, फायर मिशन की योजना और सटीक गोलाबारी को बेहतर बनाया जा सकता है। यह आधुनिक नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर के अनुरूप विकसित किया गया है।

कंपनी के अनुसार यह प्रणाली प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन के उपयोग के लिए भी उपयुक्त है। साथ ही यह नाटो मानक 155 मिमी गोला-बारूद फायर कर सकती है। (MArG 155mm Artillery Gun)

एक प्लेटफॉर्म, तीन विकल्प

एमएआरजी सीरीज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि तीनों वेरिएंट एक ही मूल प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं।

एमएआरजी-39 को तेज तैनाती और बेहतर मोबिलिटी के लिए डेवलप किया गया है। एमएआरजी-45 रेंज और मारक क्षमता के बीच संतुलन प्रदान करता है। वहीं एमएआरजी-52 को लंबी दूरी की गोलाबारी के लिए डिजाइन किया गया है।

इससे किसी सेना को अलग-अलग प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सिस्टम विकसित करने की जरूरत कम पड़ती है।

भारत फोर्ज के वाइस चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित कल्याणी ने कहा कि कंपनी ने अपनी छह दशक की इंजीनियरिंग और धातु विज्ञान विशेषज्ञता को इस प्लेटफॉर्म में शामिल किया है।

उनके अनुसार एमएआरजी सीरीज आधुनिक सेनाओं को ऐसी क्षमता प्रदान करती है जिसमें फायरपावर और गतिशीलता के बीच कोई समझौता नहीं करना पड़ता।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक हथियार प्रणाली नहीं बल्कि ऐसी तकनीक है जिसे साझेदार देशों में स्थानीय उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण के साथ विकसित किया जा सकता है।

दुनिया में क्यों बढ़ रही है मोबाइल आर्टिलरी की मांग?

पिछले कुछ सालों में दुनिया भर की सेनाएं भारी ट्रैक्ड तोपों की बजाय व्हील बेस्ड मोबाइल आर्टिलरी की ओर तेजी से बढ़ी हैं।

फ्रांस की सीजर गन, स्वीडन की आर्चर प्रणाली और कई अन्य आधुनिक तोपें इसी कॉन्सैप्ट पर बनी हैं। इनका उद्देश्य कम समय में तैनाती, कम रखरखाव और अधिक गतिशीलता उपलब्ध कराना है।

एमएआरजी सीरीज इसी वैश्विक प्रवृत्ति का भारतीय उत्तर मानी जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें 155 मिमी की भारी मारक क्षमता को 4×4 प्लेटफॉर्म पर समाहित किया गया है। (MArG 155mm Artillery Gun)

आत्मनिर्भर भारत को मजबूती

एमएआरजी सीरीज को भारत की रक्षा निर्माण क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। इसमें स्थानीय उद्योग, स्वदेशी इंजीनियरिंग और घरेलू उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया है।

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि ऐसे प्लेटफॉर्म न केवल सेना की जरूरतें पूरी करते हैं बल्कि भारत के रक्षा निर्यात को भी मजबूत बनाते हैं।

कंपनी का कहना है कि यह प्रणाली स्थानीय औद्योगिकीकरण, तकनीक हस्तांतरण और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से विकसित की गई है। (MArG 155mm Artillery Gun)

36 साल बाद रिटायर हुआ नौसेना का ‘फ्लाइंग फ्रिगेट’, पाकिस्तान की पनडुब्बियों का था सबसे बड़ा दुश्मन

Sea King Bravo Retirement
Sea King Bravo (Image Source: PIB)

Sea King Bravo Retirement: भारतीय नौसेना के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय गुपचुप ही समाप्त हो गया। लगभग 36 सालों तक समुद्र और आसमान में अपनी सेवाएं देने वाले सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को आधिकारिक तौर पर सेवा से हटा दिया गया। मुंबई के कोलाबा स्थित आईएनएस शिक्रा (INAS 330) में इन हेलीकॉप्टरों ने अपनी अंतिम उड़ान भरी और इसके साथ ही नौसेना के सबसे भरोसेमंद समुद्री हेलीकॉप्टरों में से एक का सफर खत्म हो गया।

अंतिम उड़ान के दौरान दो सी किंग चार्ली हेलीकॉप्टरों ने सी किंग ब्रावो को एस्कॉर्ट किया। जब हेलीकॉप्टर अपनी आखिरी उड़ान पूरी कर वापस लौटा, तो फायर टेंडरों की ओर से उसे वॉटर कैनन सलामी दी गई। नौसेना में किसी विमान या जहाज की विदाई के समय यह सम्मान विशेष अवसरों पर दिया जाता है।

Sea King Bravo Retirement: 1989 में हुई थी सी किंग ब्रावो की एंट्री

सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को भारतीय नौसेना ने 1989 और 1990 के बीच शामिल किया था। उस समय यह दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों में गिने जाते थे। इनका मुख्य काम दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों का पता लगाना और जरूरत पड़ने पर उन पर हमला करना था।

एक समय में भारतीय नौसेना के पास लगभग 20 सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टर थे। बाद के वर्षों में कुछ हेलीकॉप्टर सेवा से बाहर होते गए और आखिर तक लगभग आठ हेलीकॉप्टर ही एक्टिव थे। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में इनमें मिड-लाइफ अपग्रेड भी किए गए, जिससे इसकी उम्र बढ़ी।

नौसेना में इन्हें अक्सर “फ्लाइंग फ्रिगेट” कहा जाता था। इसका कारण यह था कि यह हेलीकॉप्टर अकेले ही कई ऐसे काम कर सकता था जो सामान्य तौर पर एक युद्धपोत करता है। यह समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाजों को भी निशाना बना सकता था और समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का भी शिकार कर सकता था। आज जो काम एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर करते हैं।

Sea King Bravo Retirement
Sea King Bravo (Image Source: PIB)

कैसे हुई भारतीय नौसेना में सी किंग की शुरुआत

भारतीय नौसेना ने पहली बार सी किंग हेलीकॉप्टर 1971 में खरीदे थे। उस समय पाकिस्तान की पनडुब्बियों से बढ़ते खतरे को देखते हुए नौसेना अपनी पनडुब्बी रोधी क्षमता मजबूत करना चाहती थी।

इसी उद्देश्य से सी किंग एमके-42 हेलीकॉप्टर खरीदे गए। इनके ऑपरेशन के लिए 17 अप्रैल 1971 को आईएनएएस-330 “हार्पून्स” स्क्वाड्रन की स्थापना की गई। कुछ महीनों बाद 26 जुलाई 1971 को पहले दो सी किंग हेलीकॉप्टर भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात किए गए।

अप्रैल 1971 में सी किंग एमके-42 हेलीकॉप्टरों को शामिल किया गया। इसके बाद नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स पर सी किंग अल्फा वेरिएंट तैनात किए गए।

बाद में एमके-42 और एमके-42 अल्फा को सर्विस से हटा दिया गया। भारतीय नौसेना ने 1982 में अधिक एडवांस सी किंग एमके-42बी (ब्रावो) हेलीकॉप्टर खरीदने का फैसला किया। साल 1988 से 1992 के बीच नौसेना को लगभग 20 सी किंग एमके-42बी हेलीकॉप्टर मिले। इसके अलावा कुछ एमके-42सी वेरिएंट भी शामिल किए गए, जिनका उपयोग सैनिकों के परिवहन, विशेष अभियानों और असॉल्ट मिशनों के लिए किया जाता था। यही कारण था कि सी किंग परिवार कई दशकों तक भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति का अहम हिस्सा बना रहा। यही वजह है कि सी किंग ब्रावो को इस परिवार का आखिरी सक्रिय सदस्य माना जाता था।

बेहद एडवांस नेवल हेलीकॉप्टर

सी किंग एमके-42बी अपने समय का बेहद एडवांस नेवल हेलीकॉप्टर माना जाता था। इसमें दो शक्तिशाली रोल्स-रॉयस ग्नोम एच1400-1टी टर्बोशाफ्ट इंजन लगे थे, जिनकी मदद से यह लगभग 208 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकता था। यही वजह थी कि भारतीय नौसेना इसे लंबे समय तक समुद्री अभियानों में इस्तेमाल करती रही।

इस हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी ताकत इसकी अत्याधुनिक निगरानी और पनडुब्बी खोजने वाली प्रणालियां थीं। इसमें एमईएल सुपर सर्चर रडार लगाया गया था, जो समुद्र की सतह पर मौजूद जहाजों और अन्य लक्ष्यों का पता लगाने में मदद करता था। वहीं अलकाटेल एचएस-12 डिपिंग सोनार समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों की खोज के लिए इस्तेमाल होता था। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम) सिस्टम और एक्यूएस-902बी एकॉस्टिक प्रोसेसर भी लगे थे, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और पानी के भीतर की ध्वनियों का विश्लेषण करने में मदद करते थे।

आखिर इतनी खास क्यों थी यह मशीन?

जब सी किंग ब्रावो भारतीय नौसेना में शामिल हुआ था तब इसकी तकनीक अपने समय से काफी आगे मानी जाती थी। कई वर्षों तक इसे उड़ाने वाले रिटायर्ड कैप्टन संजय कर्वे बताते हैं कि उस दौर में इसकी एवियोनिक्स और मिशन सिस्टम बेहद एडवांस थे। हेलीकॉप्टर में ऐसे सेंसर लगे थे जो समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करते थे।

इसमें शक्तिशाली रडार, डिपिंग सोनार और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम मौजूद थे। डिपिंग सोनार एक ऐसा उपकरण होता है जिसे हेलीकॉप्टर समुद्र में नीचे उतारता है और उससे पानी के भीतर मौजूद गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करता है।

यही क्षमता इसे भारतीय नौसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती थी।

दुश्मन पनडुब्बियों के लिए बड़ा खतरा

सी किंग ब्रावो का सबसे महत्वपूर्ण काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान था। समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियां अक्सर सतह के नीचे छिपकर चलती हैं। उन्हें ढूंढना किसी भी नौसेना के लिए सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है।

सी किंग ब्रावो अपने सोनार और सेंसरों की मदद से पनडुब्बियों का पता लगाता था। इसके बाद जरूरत पड़ने पर टॉरपीडो छोड़कर हमला भी कर सकता था। पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए सी किंग ब्रावो व्हाइटहेड ए244एस या रूसी एपीआर-2 टॉरपीडो, डेप्थ चार्ज और समुद्री माइंस ले जा सकता था।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार हिंद महासागर क्षेत्र में कई दशकों तक यह हेलीकॉप्टर पनडुब्बी रोधी अभियानों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

Sea King Bravo Retirement
Sea King Bravo (Image Source: PIB)

दुश्मन जहाजों पर भी कर सकता था हमला

सी किंग ब्रावो की दूसरी बड़ी खासियत उसकी एंटी-शिप क्षमता थी। इसमें दो सी ईगल एंटी-शिप मिसाइलें लगाई जाती थीं। ये मिसाइलें समुद्र में मौजूद दुश्मन जहाजों को काफी दूरी से निशाना बनाने में सक्षम थीं। यह हेलीकॉप्टर केवल पनडुब्बियों तक सीमित नहीं था। जरूरत पड़ने पर यह सतह पर मौजूद दुश्मन युद्धपोतों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकता था। इसी वजह से इसे “फ्लाइंग फ्रिगेट” कहा जाता था। इसके अलावा आत्मरक्षा और नजदीकी अभियानों के लिए इसमें मशीन गन और अन्य हल्के हथियार भी लगाए जा सकते थे।

कई युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर से किया ऑपरेशन

सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों की भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोतों पर तैनाती भी हुई। इनमें लीएंडर क्लास, गोदावरी क्लास और दिल्ली क्लास युद्धपोत शामिल रहे। इसके अलावा ये हेलीकॉप्टर एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विराट से भी ऑपरेट किए जाते रहे।

समुद्र में लंबे समय तक तैनाती के दौरान ये हेलीकॉप्टर नौसेना की आंख और कान की भूमिका निभाते थे। जहाज से काफी दूर जाकर वे खतरे की पहचान कर सकते थे और युद्धपोत को समय रहते चेतावनी दे सकते थे।

बचाई हजारों जानें

सी किंग ब्रावो का योगदान केवल युद्ध अभियानों तक सीमित नहीं रहा। इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल खोज और बचाव अभियानों में भी बड़े पैमाने पर किया गया। समुद्र में फंसे नाविकों को बचाने, दुर्घटनाओं में राहत पहुंचाने और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सहायता सामग्री पहुंचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कई मौकों पर खराब मौसम और ऊंची लहरों के बीच भी इन हेलीकॉप्टरों ने सफल मिशन पूरे किए। नौसेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि अनेक समुद्री बचाव अभियानों में सी किंग ने लोगों की जान बचाई।

रिटायर्ड कैप्टन संजय कर्वे ने कहा कि सी किंग उनके जीवन का अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने बताया कि इस हेलीकॉप्टर के साथ उन्होंने खुशियों और दुख दोनों के पल देखे।

उनके अनुसार जब कोई मिशन सफल होता था तो पूरी टीम खुश होती थी, लेकिन जब किसी साथी को खोना पड़ता था तो दुख भी उतना ही गहरा होता था।

उन्होंने कहा कि आज खुशी इस बात की है कि उन्हें इस शानदार प्लेटफॉर्म के साथ काम करने का मौका मिला, लेकिन दुख इस बात का है कि अब यह हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना के रंगों में उड़ता दिखाई नहीं देगा।

चीन और पाकिस्तान के बढ़ते समुद्री खतरे के बीच बड़ा बदलाव

सी किंग ब्रावो की विदाई ऐसे समय में हुई है जब हिंद महासागर क्षेत्र में पनडुब्बी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।

चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना मानी जाती है। उसके बेड़े में 60 से ज्यादा पनडुब्बियां शामिल हैं। इनमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाली अटैक पनडुब्बियां भी हैं जो लंबे समय तक समुद्र में रह सकती हैं।

दूसरी ओर पाकिस्तान भी चीन की मदद से नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां शामिल कर रहा है। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक है, जिससे वे लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं।

ऐसे माहौल में भारतीय नौसेना को अधिक आधुनिक पनडुब्बी रोधी हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता महसूस हो रही थी।

अब कौन लेगा सी किंग की जगह?

सी किंग ब्रावो की जगह धीरे-धीरे अमेरिकी एमएच-60आर रोमियो हेलीकॉप्टर ले रहे हैं। भारत ने अमेरिका से 24 एमएच-60आर रोमियो हेलीकॉप्टर खरीदने का समझौता किया था। इनमें से 21 हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना को मिल चुके हैं।

इनमें से 15 सक्रिय सेवा में हैं जबकि कुछ ट्रेनिंग और कुछ को भारत के लिए खास बने सिस्टम्स को जोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है।

रोमियो हेलीकॉप्टरों को सी किंग की तुलना में एक पीढ़ी आगे की तकनीक माना जाता है। इनमें अत्याधुनिक मल्टी-मोड रडार, लो-फ्रीक्वेंसी डिपिंग सोनार, सोनोबॉय सिस्टम और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर लगे हैं, जो समुद्र की सतह और उसके नीचे मौजूद खतरों का पता लगाने में सक्षम हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए इनमें एमके-54 टॉरपीडो और हेलफायर मिसाइलें भी लगाई गई हैं।

नौसेना को अभी भी हेलीकॉप्टरों की जरूरत

हालांकि रोमियो हेलीकॉप्टरों की एंट्री शुरू हो चुकी है, लेकिन भारतीय नौसेना की जरूरत इससे कहीं ज्यादा है।

नौसेना को 100 से अधिक मल्टी-रोल और पनडुब्बी रोधी हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता बताई जाती है। लंबे समय से 123 नेवल मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर खरीदने की योजना पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक अंतिम अनुबंध नहीं हुआ है।

इसके अलावा, स्वदेशी बहु-भूमिका हेलीकॉप्टरों (UH-M) की खरीद की योजनाएं भी चल रही हैं। सी किंग की जगह पर आने वाले नए प्लेटफॉर्म्स में एडवांस एवियोनिक्स, बेहतर इंजन दक्षता, कम रखरखाव लागत और ड्रोन इंटीग्रेशन जैसी खूबियां होंगी।

नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि रोमियो हेलीकॉप्टर पुराने सी किंग और कामोव-28 बेड़े की तुलना में तकनीकी रूप से एक नई पीढ़ी का प्लेटफॉर्म हैं। हालांकि सी किंग और कामोव हेलीकॉप्टरों को समय-समय पर अपग्रेड किया गया था, लेकिन कई दशक पुराने होने के कारण उनके रखरखाव और उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही थीं।

जून में मिलेगा नौसेना को बड़ा तोहफा! एक साथ कमीशन होंगे 3 स्वदेशी युद्धपोत

Indian Navy Tri-Commissioning
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Indian Navy Tri-Commissioning: जून के तीसरे हफ्ते में भारतीय नौसेना को एक बड़ा रणनीतिक तोहफा मिल सकता है। कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) शिपयार्ड में आयोजित विशेष समारोह में भारतीय नौसेना के तीन नए स्वदेशी युद्धपोतों को औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। इनमें स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस दूनागिरी, एंटी सबमरीन वेसल आईएनएस अग्रय और रिसर्च वेसल आईएनएस संशोधक शामिल हैं।

इन तीनों जहाजों का एक साथ कमीशन होना केवल नौसेना की ताकत बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यह भारतीय जहाज निर्माण क्षमता, स्वदेशी तकनीक और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में देश की बढ़ती ताकत को भी दर्शाता है। खास बात यह है कि तीनों प्लेटफॉर्म अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार किए गए हैं और समुद्र में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाएंगे।

Indian Navy Tri-Commissioning: एक बार फिर होगी ऐतिहासिक ट्राई-कमीशनिंग

भारतीय नौसेना के इतिहास में एक साथ तीन बड़े प्लेटफॉर्म्स को कमीशन करने की घटनाएं बहुत कम हुई हैं। जनवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने मुंबई स्थित नौसेना डॉकयार्ड में आईएनएस सूरत, आईएनएस नीलगिरी और आईएनएस वाघशीर को एक साथ राष्ट्र को समर्पित किया था। उस समारोह में एक डिस्ट्रॉयर, एक फ्रिगेट और एक पनडुब्बी को एक साथ शामिल किया गया था।

अब कोलकाता में होने वाला यह समारोह भी उसी तरह ऐतिहासिक माना जा रहा है। हालांकि इस बार तीनों प्लेटफॉर्म अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बनाए गए हैं। एक जहाज समुद्री युद्ध के लिए है, दूसरा दुश्मन पनडुब्बियों की तलाश और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए, जबकि तीसरा समुद्र की गहराइयों का सर्वेक्षण और समुद्री मानचित्र तैयार करने का काम करेगा।

जीआरएसई ने रचा नया रिकॉर्ड

कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) भारत के सबसे पुराने और प्रमुख रक्षा शिपयार्ड में से एक है। मार्च 2026 में जीआरएसई ने इन तीनों जहाजों को एक साथ भारतीय नौसेना को सौंपकर नया रिकॉर्ड बनाया था।

कंपनी अब तक 118 से अधिक युद्धपोत और सहायक जहाज बना चुका है। इनमें से 80 से ज्यादा जहाज भारतीय नौसेना को दिए जा चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि तीन अलग-अलग कैटेगरी के वॉरशिप्स को लगभग एक साथ तैयार करना किसी भी शिपयार्ड की तकनीकी क्षमता और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का बड़ा उदाहरण माना जाता है।

इन जहाजों में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इससे देश के छोटे और मध्यम उद्योगों को भी बड़ा लाभ मिला है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आईएनएस दूनागिरी बढ़ाएगा नौसेना की मारक क्षमता

तीनों जहाजों में सबसे ज्यादा चर्चा आईएनएस दूनागिरी की हो रही है। यह प्रोजेक्ट-17ए के तहत बनाया गया आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट है। इसका नाम भारतीय हिमालयी पर्वत श्रृंखला की दूनागिरी चोटी के नाम पर रखा गया है।

दूनागिरी लगभग 149 मीटर लंबा और 6,670 टन वजनी युद्धपोत है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि दुश्मन के रडार पर इसकी पहचान करना मुश्किल हो। आधुनिक स्टेल्थ तकनीक इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

यह जहाज समुद्र में लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसकी अधिकतम रफ्तार 30 नॉट्स से अधिक है और यह हजारों किलोमीटर तक लगातार मिशन पर रह सकता है।

दूनागिरी कई भूमिकाएं निभाने में सक्षम है। यह दुश्मन के जहाजों पर हमला कर सकता है, हवाई खतरों का मुकाबला कर सकता है और पनडुब्बियों को खोजकर उन पर कार्रवाई भी कर सकता है।

ब्रह्मोस और बराक-8 से लैस होगा दूनागिरी

आईएनएस दूनागिरी की मारक क्षमता इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें तैनात होंगी, जो समुद्र में दुश्मन के जहाजों को लंबी दूरी से निशाना बना सकती हैं।

इसके अलावा बराक-8 एयर डिफेंस सिस्टम इसे हवाई खतरों से बचाने का काम करेगी। जहाज पर आधुनिक रडार, सोनार और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम भी लगाए गए हैं।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार यह जहाज हिंद महासागर क्षेत्र में लंबी दूरी की तैनाती और समुद्री निगरानी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। (Indian Navy Tri-Commissioning)

दुश्मन पनडुब्बियों की तलाश करेगा आईएनएस अग्रय

दूसरा जहाज आईएनएस अग्रय है। यह अर्नाला क्लास के एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट कार्यक्रम का हिस्सा है। इसका मुख्य काम तटीय इलाकों और उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना है।

हाल के वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में विभिन्न देशों की पनडुब्बियों की गतिविधियां बढ़ी हैं। ऐसे में भारतीय नौसेना के लिए विशेष पनडुब्बी रोधी जहाजों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

आईएनएस अग्रय इसी जरूरत को पूरा करेगा। लगभग 900 टन वजनी यह जहाज अपेक्षाकृत छोटे आकार का है, लेकिन इसकी तकनीकी क्षमता बेहद आधुनिक है। करीब 77 मीटर लंबे इस युद्धपोत में आधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं, जो समुद्र के भीतर छिपे खतरों को पहचान सकते हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

उथले समुद्र में भी कर सकेगा ऑपरेशन

अग्रय का ड्राफ्ट काफी कम है, जिससे यह तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में भी आसानी से ऑपरेट कर सकता है। यही वजह है कि इसे बंदरगाह सुरक्षा और तटीय निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस जहाज में अत्याधुनिक सोनार प्रणाली सिस्टम है जो समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों की पहचान कर सकता है। जहाज में टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं। इसे भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक पनडुब्बी रोधी प्लेटफॉर्म में से एक माना जा रहा है।

डीआरडीओ द्वारा विकसित कई स्वदेशी प्रणालियां भी इस जहाज में शामिल की गई हैं। (Indian Navy Tri-Commissioning)

समुद्र का नक्शा तैयार करेगा आईएनएस संशोधक

जहां दूनागिरी और अग्रय सीधे सैन्य अभियानों के लिए तैयार किए गए हैं, वहीं आईएनएस संशोधक की भूमिका कुछ अलग है। यह एक आधुनिक सर्वे जहाज है, जिसका काम समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और नौवहन से जुड़ी जानकारी जुटाना होगा।

यह सैंडहायक क्लास का रिसर्च वेसल है और समुद्र की गहराइयों का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है। किसी भी नौसेना के लिए समुद्र की सटीक जानकारी बेहद जरूरी होती है। सुरक्षित नौवहन, नए समुद्री मार्गों की पहचान और समुद्री नक्शों को अपडेट करने के लिए ऐसे जहाजों की जरूरत पड़ती है।

करीब 110 मीटर लंबा संशोधक तटीय और गहरे समुद्र दोनों क्षेत्रों में सर्वेक्षण कर सकेगा। नौसेना के लिए समुद्री सर्वेक्षण बेहद महत्वपूर्ण काम होता है। समुद्र के भीतर की गहराई, चट्टानों, समुद्री मार्गों और अन्य भौगोलिक जानकारियों का सटीक रिकॉर्ड तैयार करना किसी भी नौसैनिक अभियान के लिए आवश्यक होता है।

आईएनएस संशोधक इसी कार्य को और अधिक आधुनिक तरीके से करेगा। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आधुनिक उपकरणों से लैस है संशोधक

संशोधक में अत्याधुनिक सर्वेक्षण उपकरण लगाए गए हैं। इसमें डिजिटल साइड स्कैन सोनार, ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स और एडवांस डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम शामिल हैं।

इनकी मदद से जहाज समुद्र की सतह के नीचे की गतिविधियों और संरचनाओं का विस्तृत अध्ययन कर सकता है।

इसके अलावा जहाज में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स जैसी आधुनिक प्रणालियां भी मौजूद हैं।

जरूरत पड़ने पर यह जहाज मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सीमित चिकित्सा सुविधाओं के कारण यह अस्पताल जहाज की भूमिका भी निभा सकता है। (Indian Navy Tri-Commissioning)

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

इन तीनों जहाजों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इनमें इस्तेमाल की गई स्वदेशी तकनीक है। आज भारतीय शिपयार्ड न केवल आधुनिक युद्धपोत बना रहे हैं बल्कि सेंसर, वेपन सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म इंटीग्रेशन भी देश में ही किया जा रहा है।

सरकार लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है। नौसेना इस दिशा में सबसे आगे मानी जाती है। आज भारतीय नौसेना के लिए बनने वाले अधिकांश युद्धपोत देश के शिपयार्ड्स में तैयार किए जा रहे हैं।

जीआरएसई, मझगांव डॉक, कोचीन शिपयार्ड और गोवा शिपयार्ड जैसी संस्थाएं इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ेगी भारत की मौजूदगी

भारतीय नौसेना पिछले कुछ वर्षों से हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रही है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, तटीय निगरानी, समुद्री संसाधनों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना नौसेना की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है।

आईएनएस दूनागिरी जैसे आधुनिक फ्रिगेट नौसेना की दूरदराज के क्षेत्रों में संचालन क्षमता को मजबूत करेंगे। वहीं आईएनएस अग्रय तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा को मजबूत बनाएगा। दूसरी ओर आईएनएस संशोधक नौसेना को समुद्र संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराएगा। (Indian Navy Tri-Commissioning)

C-130J को चुनौती देगा KC-390? ब्राजील ने दिया भारत में पूरी प्रोडक्शन लाइन लगाने का प्रस्ताव, जानें IAF के नए ट्रांसपोर्ट विमान की रेस में कौन है आगे

KC-390 vs C-130J
KC-390 Embraer

KC-390 vs C-130J: भारतीय वायुसेना के लिए नए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश के बीच ब्राजील की एयरोस्पेस कंपनी एम्ब्रेयर ने एक बड़ा प्रस्ताव दिया है। कंपनी का कहना है कि अगर उसे भारतीय वायुसेना के लिए केसी-390 मिलेनियम विमान बनाने का ऑर्डर मिलता है, तो वह भारत में अपनी पहली फॉरेन प्रोडक्शन युनिट लगाएगी। ययुनिट ब्राजील के साओ पाउलो के बाहर एम्ब्रेयर की पहली ऐसी फैक्ट्री होगी, जहां इस आधुनिक सैन्य विमान का निर्माण किया जाएगा।

कंपनी का दावा है कि भारत में केवल विमानों की असेंबली नहीं होगी, बल्कि पूरा एयरोस्पेस इकोसिस्टम तैयार किया जाएगा, जिसमें निर्माण, सप्लाई चेन, मेंटेनेंस, रिपेयर, ओवरहॉल और तकनीकी प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।

KC-390 vs C-130J: एम्ब्रेयर दुनिया की प्रमुख विमान निर्माता

ब्राजील की एम्ब्रेयर दुनिया की प्रमुख विमान निर्माता कंपनियों में गिनी जाती है। कंपनी सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार के विमान बनाती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत तेजी से रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रहा है। यही वजह है कि दुनिया की कई बड़ी रक्षा कंपनियां भारत में उत्पादन सुविधाएं स्थापित करने में रुचि दिखा रही हैं।

एम्ब्रेयर के अधिकारियों का कहना है कि भारत के पास पहले से मजबूत औद्योगिक आधार, प्रशिक्षित तकनीकी मानव संसाधन और बड़ा रक्षा बाजार मौजूद है। इसी कारण कंपनी भारत को केवल ग्राहक नहीं बल्कि दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देख रही है।

कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार यदि भारतीय वायुसेना केसी-390 को चुनती है तो भारत में वही प्रोडक्शन सिस्टम बनाया जाएगी जो आज ब्राजील में मौजूद है। इसके लिए ब्राजील के विशेषज्ञ भारत आकर स्थानीय इंजीनियरों और तकनीशियनों को ट्रेनिंग भी देंगे।

क्या है केसी-390 मिलेनियम?

केसी-390 मिलेनियम आधुनिक पीढ़ी का मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इसे ब्राजील की एम्ब्रेयर कंपनी ने बनाया है। यह दो शक्तिशाली टर्बोफैन इंजनों से लैस है और इसे कई प्रकार के मिशनों के लिए तैयार किया गया है।

यह विमान एक बार में लगभग 26 टन तक भार ले जाने में सक्षम है। इसमें सैनिक, सैन्य वाहन, हथियार, राहत सामग्री और अन्य भारी उपकरण आसानी से ले जाए जा सकते हैं।

विमान में लगभग 80 सैनिकों को ले जाने की क्षमता है। इसके अलावा पैराट्रूपर मिशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और मानवीय सहायता अभियानों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी रफ्तार है। केसी-390 लगभग 870 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है, जो कई पारंपरिक सैन्य परिवहन विमानों से अधिक है। (KC-390 vs C-130J)

भारतीय वायुसेना को नए विमान की जरूरत क्यों?

भारतीय वायुसेना वर्तमान में एएन-32, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस, सी-17 ग्लोबमास्टर और आईएल-76 जैसे परिवहन विमानों को ऑपरेट करती है।

इनमें से एएन-32 विमान कई दशक पुराने हो चुके हैं। हालांकि उनका आधुनिकीकरण किया गया है, लेकिन वायुसेना भविष्य की जरूरतों को देखते हुए नए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश कर रही है।

इसी उद्देश्य से मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत 18 से 30 टन तक भार उठाने वाले 40-80 आधुनिक परिवहन विमान खरीदे जाने हैं। इसका आरएफआई 2022 में जारी हुआ था। वहीं अभी एओएन प्रक्रिया चल रही है और आरएफपी जल्द जारी होने की उम्मीद है।

केसी-390 के मुकाबले में लॉकहीड मार्टिन का C-130J सुपर हरक्यूलिस और एयरबस का A400M शामिल हैं। एम्ब्रेयर का दावा है कि केसी-390 अपनी रफ्तार, ज्यादा पेलोड, मल्टी-मिशन क्षमता और लागत के मामले में सबसे उपयुक्त है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विमान भारतीय वायुसेना के मौजूदा हल्के और भारी परिवहन बेड़े के बीच की क्षमता को मजबूत करेगा। (KC-390 vs C-130J)

महिंद्रा के साथ मिलकर बनेगा विमान

एम्ब्रेयर ने भारत में इस परियोजना के लिए महिंद्रा ग्रुप के साथ साझेदारी की है। दोनों कंपनियों के बीच पहले ही समझौते हो चुके हैं।

इस साझेदारी का उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं बल्कि भारत में संपूर्ण इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना है। यदि परियोजना आगे बढ़ती है तो विमान निर्माण, पुर्जों का उत्पादन, रखरखाव और प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां भारत में ही संचालित की जाएंगी।

कंपनी का कहना है कि शुरुआती विमान ब्राजील से तैयार होकर आएंगे, लेकिन साथ ही भारतीय इंजीनियरों और तकनीशियनों को प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि आगे चलकर भारत में भी उत्पादन शुरू किया जा सके। (KC-390 vs C-130J)

भारत में बनेगा पूरा एयरोस्पेस इकोसिस्टम

एम्ब्रेयर का प्रस्ताव केवल फैक्ट्री लगाने तक सीमित नहीं है। कंपनी भारत में एक संपूर्ण एयरोस्पेस इकोसिस्टम विकसित करना चाहती है।

इसमें विमान निर्माण इकाई, मेंटेनेंस रिपेयर और ओवरहॉल सेंटर, स्पेयर पार्ट्स सप्लाई नेटवर्क, तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र और स्थानीय सप्लायर नेटवर्क शामिल होंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि ऐसा होता है तो भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में केसी-390 विमान के लिए एक महत्वपूर्ण सपोर्ट हब बन सकता है।

इससे भारतीय उद्योगों को भी वैश्विक सप्लाई चेन में शामिल होने का अवसर मिलेगा।

भारत में क्यों महत्वपूर्ण है एमआरओ सुविधा?

किसी भी सैन्य विमान के लिए केवल खरीदना ही पर्याप्त नहीं होता। उसके रखरखाव और मरम्मत की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

इसी कारण एम्ब्रेयर भारत में पूर्ण मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ सुविधा विकसित करने की योजना बना रही है।

इससे विमान की नियमित सर्विसिंग, भारी मरम्मत, इंजन और एवियोनिक्स सिस्टम का रखरखाव भारत में ही किया जा सकेगा।

अभी कई मामलों में विदेशी सुविधाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं। (KC-390 vs C-130J)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर विशेष जोर

एम्ब्रेयर का कहना है कि इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तकनीक हस्तांतरण होगा। ब्राजील के विशेषज्ञ भारत में आकर स्थानीय कर्मचारियों को प्रशिक्षण देंगे। वहीं भारतीय इंजीनियरों और तकनीशियनों को भी ब्राजील की उत्पादन इकाइयों में भेजा जाएगा।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं बल्कि भारत में दीर्घकालिक तकनीकी क्षमता विकसित करना है।

रक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि ऐसी परियोजनाएं भारत को केवल आयातक देश से आगे बढ़ाकर रक्षा उत्पादन केंद्र में बदल सकती हैं।

अदाणी के साथ भी कर चुकी है साझेदारी

महिंद्रा के अलावा एम्ब्रेयर ने अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के साथ भी समझौता किया है।

यह साझेदारी मुख्य रूप से क्षेत्रीय यात्री विमानों और नागरिक विमानन क्षेत्र से जुड़ी है। इसके तहत भारत में नागरिक विमानों के लिए सप्लाई चेन, प्रशिक्षण और रखरखाव सुविधाओं के विकास पर काम किया जाएगा।

इससे सैन्य और नागरिक दोनों क्षेत्रों में भारत की एयरोस्पेस क्षमता मजबूत होगी। (KC-390 vs C-130J)

केसी-390 को दुनिया में क्यों मिल रही है लोकप्रियता?

केसी-390 को कई देशों ने अपनी वायु सेनाओं के लिए चुना है। इसकी प्रमुख वजह इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है।

यह विमान सैनिकों और सैन्य उपकरणों के परिवहन के अलावा हवाई ईंधन भरने, पैराट्रूपर ड्रॉप, राहत कार्य, मेडिकल मिशन और आपदा प्रबंधन अभियानों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसके अलावा यह अपेक्षाकृत छोटे और कम विकसित रनवे से भी उड़ान भर सकता है। यही कारण है कि इसे आधुनिक सैन्य परिवहन विमान के रूप में देखा जा रहा है।

वहीं, दूसरी तरफ C-130J के लिए लॉकहीड मार्टिन पहले से टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ काम कर रही है। औऱ हाल ही में मेड इन इंडिया विमान ने अपनी पहली उड़ान भी भरी है। (KC-390 vs C-130J)

KC-390 vs C-130J
KC-390 vs C-130J (Image for reference only. AI-Generated Image)

केसी-390, C-130J और A400M में क्या अंतर है?

भारतीय वायुसेना नए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) की तलाश में है। इस दौड़ में सबसे ज्यादा चर्चा ब्राजील के केसी-390 मिलेनियम और अमेरिका के C-130J सुपर हरक्यूलिस की हो रही है। वहीं एयरबस A400M एटलस भी एक विकल्प है, लेकिन इसे वायुसेना की जरूरतों के मुकाबले बड़ा और महंगा माना जा रहा है।

अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन का C-130J सुपर हरक्यूलिस भारतीय वायुसेना के लिए कोई नया विमान नहीं है। वायुसेना पहले से इसे ऑपरेट कर रही है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत है कि यह ऊंचाई वाले इलाकों, छोटे रनवे और कठिन परिस्थितियों में शानदार प्रदर्शन करता है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और विशेष अभियान जैसे मिशनों में यह पहले ही अपनी क्षमता साबित कर चुका है।

चूंकि यह विमान पहले से भारतीय बेड़े में मौजूद है, इसलिए पायलट प्रशिक्षण, रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की व्यवस्था भी पहले से उपलब्ध है।

वहीं, केसी-390 मिलेनियम नई पीढ़ी का जेट इंजन वाला सैन्य परिवहन विमान है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी स्पीड है। जहां C-130J की क्रूज स्पीड लगभग 670 किलोमीटर प्रति घंटा है, वहीं केसी-390 करीब 870 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ सकता है। यानी यह मिशन को कम समय में पूरा कर सकता है।

पेलोड यानी सामान ले जाने की क्षमता की बात करें तो केसी-390 लगभग 26 टन भार उठा सकता है, जबकि C-130J की क्षमता करीब 20 टन है। इसका मतलब है कि केसी-390 एक उड़ान में ज्यादा सैनिक, वाहन या सैन्य सामग्री ले जा सकता है।

इनमें यूरोपीय कंपनी एयरबस का A400M एटलस तीनों विमानों में सबसे बड़ा है। यह लगभग 37 टन तक भार ले जा सकता है, जो केसी-390 और C-130J दोनों से कहीं ज्यादा है। इसकी रेंज भी बेहतर है और यह रणनीतिक तथा सामरिक दोनों तरह के मिशनों में उपयोगी है।

लेकिन समस्या इसकी कीमत है। A400M न सिर्फ खरीदने में महंगा है, बल्कि उसका ऑपरेशन और मेंटेनेंस भी ज्यादा खर्चीला माना जाता है। इसी वजह से इसे भारतीय वायुसेना की 18 से 30 टन श्रेणी की जरूरतों के लिए कुछ ज्यादा बड़ा विकल्प माना जा रहा है। (KC-390 vs C-130J)

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IAF Graduation Parade 2026
Raksha Mantri reviews Combined Graduation Parade of 217 Course at Air Force Academy, Dundigal (Image Source: PIB)

IAF Graduation Parade 2026: भारतीय वायुसेना को शनिवार को 231 नए अधिकारी मिले। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह की मौजूदगी में डुंडीगल स्थित एयर फोर्स अकादमी में आयोजित 217वें कोर्स की कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड की समीक्षा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की और कैडेट्स को प्रेसिडेंट कमीशन प्रदान किया। इनमें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) की पहली महिला बैच की कैडेट्स भी शामिल थीं। रक्षा मंत्री ने इस मौके पर कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और नए अधिकारियों को हर चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। इस दौरान वायुसेना प्रमुख की अगुवाई में फ्लाईपास्ट हुआ, जिसमें पिलाटस पीसी-7 एमके-II, हॉक, किरण और चेतक जैसे ट्रेनर एयरक्राफ्ट्स ने हिस्सा लिया।

IAF Graduation Parade 2026: भारतीय वायुसेना को मिले 231 नए अधिकारी

एयर फोर्स अकादमी में आयोजित इस समारोह में 231 फ्लाइट कैडेट्स ने प्रशिक्षण पूरा किया। इनमें 194 पुरुष और 37 महिला फ्लाइट कैडेट शामिल हैं। यह किसी भी सैन्य अधिकारी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है क्योंकि इसी दिन वह ट्रेनी से अफसर बनता है।

इस अवसर पर भारतीय नौसेना के 9 अधिकारियों, भारतीय तटरक्षक बल के 3 अधिकारियों और वियतनाम के 2 अधिकारियों को भी उनकी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद विंग्स प्रदान किए गए। इसके अलावा नेविगेशन ट्रेनिंग पूरा करने वाले 3 अधिकारियों को ब्रेवेट्स प्रदान किए गए। (IAF Graduation Parade 2026)

पहले महिला एनडीए बैच ने रचा नया इतिहास

इस समारोह की सबसे बड़ी खासियत राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से आईं पहली महिला कैडेट्स का वायुसेना अधिकारी बनना रहा। कुछ साल पहले तक एनडीए में केवल पुरुष कैडेट्स को प्रवेश मिलता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महिलाओं के लिए भी रास्ता खुला।

अब उन्हीं महिला कैडेट्स का पहला बैच प्रशिक्षण पूरा कर भारतीय वायुसेना का हिस्सा बना है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने महिला अधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि बढ़ती नारी शक्ति भारतीय वायुसेना को और मजबूत, संतुलित तथा सक्षम बना रही है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत की समावेशी सैन्य व्यवस्था को दर्शाती है।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने भारतीय वायुसेना की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वायुसेना ने हमेशा देश के लिए ढाल और तलवार दोनों की भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि 1947-48 के कश्मीर युद्ध के दौरान श्रीनगर एयरलिफ्ट ने युद्ध की दिशा बदल दी थी। इसी तरह 1971 के युद्ध में भारतीय वायुसेना ने निर्णायक भूमिका निभाकर इतिहास रचा।

राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस अभियान के दौरान भारतीय वायुसेना ने अत्यधिक सटीकता और पेशेवर क्षमता का प्रदर्शन किया। आतंकवादी ठिकानों पर किए गए हमलों ने यह साबित किया कि भारतीय वायुसेना आधुनिक युद्ध की चुनौतियों का सामना करने में पूरी तरह सक्षम है।

उन्होंने कहा कि इस सफलता के पीछे केवल स्वदेशी प्लेटफॉर्म नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित, अनुशासित और साहसी अधिकारी भी थे, जिन्होंने मिशन को सफल बनाया। (IAF Graduation Parade 2026)

बदलते युद्ध के स्वरूप को समझने की जरूरत

रक्षा मंत्री ने नए अधिकारियों को चेतावनी दी कि आधुनिक युद्ध पहले की तुलना में पूरी तरह बदल चुका है। उन्होंने कहा कि एक समय था जब युद्ध में सैनिक और हथियार साफ दिखाई देते थे, लेकिन आज स्थिति अलग है।

अब रडार, उपग्रह, ड्रोन, सेंसर, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें युद्ध का स्वरूप बदल रही हैं। कई बार दुश्मन दिखाई नहीं देता, लेकिन वह साइबर नेटवर्क, कम्युनिकेशन सिस्टम या अन्य तकनीकी माध्यमों से हमला कर सकता है।

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अधिकारियों को लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें जो शिक्षा दी गई है, वही उन्हें अनिश्चित परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में मदद करेगी।

IAF Graduation Parade 2026
Raksha Mantri reviews Combined Graduation Parade of 217 Course at Air Force Academy, Dundigal (Image Source: PIB)

नई तकनीकों को अपनाने पर दिया जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भविष्य के युद्धों में केवल पारंपरिक हथियारों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। अधिकारियों को नई तकनीकों को समझना, अपनाना और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने अनुसार ढालना भी सीखना होगा।

उन्होंने कहा कि हर संघर्ष नई सीख देता है। आधुनिक दौर में वही देश आगे बढ़ रहे हैं जो तकनीक का सबसे बेहतर उपयोग कर रहे हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज छोटे देश भी नई रणनीतियों और आधुनिक हथियारों के जरिए बड़ी सैन्य शक्तियों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। इसलिए अधिकारियों को लगातार सीखते रहना होगा और अपनी पेशेवर क्षमता को मजबूत बनाए रखना होगा। (IAF Graduation Parade 2026)

सेकंडों में लेने होंगे फैसले

नए अधिकारियों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि उनके कंधों पर अब बड़ी जिम्मेदारी है। कई बार ऐसी परिस्थितियां आएंगी जब उन्हें मिनटों नहीं बल्कि कुछ सेकंड में फैसला लेना होगा।

उन्होंने कहा कि अधिकारी के कंधों पर लगी विंग्स केवल एक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह पूरे देश के भरोसे का चिन्ह हैं। इसलिए उन्हें हमेशा उच्चतम स्तर की पेशेवर क्षमता और अनुशासन बनाए रखना होगा। (IAF Graduation Parade 2026)

वायुसेना प्रमुख ने लिया फ्लाईपास्ट में हिस्सा

कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड के दौरान आकर्षक फ्लाईपास्ट भी आयोजित किया गया। फ्लाईपास्ट में पिलाटस पीसी-7 मार्क-2, हॉक, किरण और चेतक जैसे प्रशिक्षण विमानों ने हिस्सा लिया। आसमान में इन विमानों को देख कर दर्शक रोमांचित हो गए।

फ्लाईपास्ट में तीन किरण ट्रेनर जेट की फॉर्मेशन ने भी हिस्सा लिया। इस फॉर्मेशन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह स्वयं एक किरण विमान उड़ा रहे थे। आमतौर पर ऐसे अवसरों पर वरिष्ठ अधिकारी फ्लाईपास्ट का निरीक्षण करते हैं, लेकिन इस बार एयर चीफ ने खुद कॉकपिट संभालकर उड़ान भरी।

आकाश गंगा और शक्ति टीम का प्रदर्शन बना आकर्षण

समारोह में भारतीय वायुसेना की प्रसिद्ध स्काईडाइविंग टीम “आकाश गंगा” ने भी प्रदर्शन किया। इसके अलावा महिला एयर वॉरियर्स की “शक्ति” ड्रिल टीम ने अपनी शानदार प्रस्तुति से दर्शकों की खूब सराहना हासिल की।

इसके अलावा सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान, सारंग हेलीकॉप्टर डिस्प्ले टीम और सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम ने मनमोहक हवाई करतब दिखाए। (IAF Graduation Parade 2026)

इन अधिकारियों को मिले प्रतिष्ठित पुरस्कार

प्रशिक्षण के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को रक्षा मंत्री ने सम्मानित भी किया।

फ्लाइंग ऑफिसर आशीष कुमार यादव को पायलट कोर्स में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रतिष्ठित “प्रेसिडेंट्स प्लाक” और “नवानगर स्वॉर्ड ऑफ ऑनर” प्रदान किया गया। उन्होंने समग्र मेरिट सूची में पहला स्थान प्राप्त किया।

नेविगेशन शाखा में फ्लाइंग ऑफिसर एकता गुप्ता को समग्र मेरिट में प्रथम स्थान हासिल करने पर “प्रेसिडेंट्स प्लाक” दिया गया।

ग्राउंड ड्यूटी शाखा में फ्लाइंग ऑफिसर दिव्यांशी सिंह को सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने पर “प्रेसिडेंट्स प्लाक” से सम्मानित किया गया। (IAF Graduation Parade 2026)

क्या होता है प्रेसिडेंट कमीशन

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में किसी भी कैडेट के लिए अधिकारी बनने का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह होता है, जब उसे प्रेसिडेंट कमीशन प्रदान किया जाता है। यह वह आधिकारिक नियुक्ति है, जिसके बाद एक कैडेट सैन्य अधिकारी बन जाता है।

जब कोई कैडेट एनडीए, आईएमए, ओटीए, आईएनए या एयर फोर्स अकादमी से अपना प्रशिक्षण पूरा करता है, तो पासिंग आउट परेड के दौरान उसे राष्ट्रपति की ओर से कमीशन दिया जाता है। इसके साथ ही वह भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी के रूप में शामिल हो जाता है। चूंकि भारत के राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के सर्वोच्च सेनापति होते हैं, इसलिए यह नियुक्ति उनके नाम से जारी की जाती है।

प्रेसिडेंट कमीशन केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक कानूनी अधिकार भी देता है। इसके बाद अधिकारी अपनी यूनिट में जाकर सैनिकों का नेतृत्व कर सकता है, सैन्य जिम्मेदारियां संभाल सकता है और अपने पद से जुड़े अधिकारों का उपयोग कर सकता है। बिना कमीशन के कोई भी व्यक्ति आधिकारिक तौर पर सैन्य अधिकारी नहीं माना जाता।

पासिंग आउट परेड के दौरान कैडेटों को शपथ दिलाई जाती है कि वे देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करेंगे। इसके बाद उन्हें उनकी शाखा और रैंक के अनुसार सेना, नौसेना या वायुसेना में नियुक्त किया जाता है। इसी प्रक्रिया को प्रेसिडेंट कमीशन कहा जाता है।

यह उस लंबे और कठिन प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव होता है, जिसे पूरा करने के बाद एक कैडेट अधिकारी बनने का अधिकार प्राप्त करता है। यही कारण है कि सैन्य अकादमियों में होने वाले कमीशनिंग समारोह को बेहद गौरवपूर्ण और भावनात्मक अवसर माना जाता है। परिवारों के लिए भी यह गर्व का क्षण होता है, क्योंकि उसी दिन उनका बेटा या बेटी आधिकारिक रूप से भारतीय सशस्त्र बलों का अधिकारी बन जाता है। (IAF Graduation Parade 2026)

29 साल बाद आर्मर्ड कोर से मिला नया सेना प्रमुख: कौन हैं लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ, जिन्होंने टैंक फॉर्मेशन से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक निभाई अहम भूमिका

Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief
Lt Gen Dhiraj Seth Appointed Next Army Chief, First Armoured Corps Officer to Lead Indian Army Since 1997 (Photo: PIB)

Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief: केंद्र सरकार ने भारतीय सेना के वर्तमान उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को देश का अगला सेना प्रमुख नियुक्त करने का फैसला किया है। वह 30 जून की दोपहर से भारतीय सेना की कमान संभालेंगे। मौजूदा सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी उसी दिन रिटायर हो रहे हैं। लगभग चार दशक लंबे सैन्य अनुभव, सेना के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान और दो ऑपरेशनल कमांड की कमान संभालने का अनुभव रखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ अब भारतीय सेना के सर्वोच्च पद तक पहुंच गए हैं। उनकी नियुक्ति इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि 1997 के बाद पहली बार आर्मर्ड कोर का कोई अधिकारी सेना प्रमुख बनने जा रहा है।

Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief: कौन हैं लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ?

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ भारतीय सेना के उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने अपने करियर में ऑपरेशनल कमांड, रणनीतिक योजना, सैन्य आधुनिकीकरण और अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग जैसे लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में काम किया है।

वह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र हैं और दिसंबर 1986 में भारतीय सेना की प्रतिष्ठित आर्मर्ड कोर में कमीशन प्राप्त किया था। उस समय भारतीय सेना तेजी से आधुनिकीकरण के दौर से गुजर रही थी और आर्मर्ड फोर्सेज को पश्चिमी सीमा पर महत्वपूर्ण भूमिका दी जा रही थी। धीरज सेठ ने अपने करियर की शुरुआत टैंक रेजिमेंट से की और धीरे-धीरे सेना के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे।

करीब 40 सालों की सेवा के दौरान उन्होंने रेगिस्तान से लेकर जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी मोर्चे से लेकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक अलग-अलग सैन्य जिम्मेदारियां संभाली हैं। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

29 साल बाद आर्मर्ड कोर से बने सेना प्रमुख

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की नियुक्ति भारतीय सेना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम मानी जा रही है। भारतीय सेना के इतिहास में आर्मर्ड कोर के अधिकारियों का सेना प्रमुख बनना अपेक्षाकृत कम देखने को मिला है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ से पहले आर्मर्ड कोर से आने वाले आखिरी सेना प्रमुख जनरल शंकर रॉय चौधरी थे, जिन्होंने वर्ष 1994 से 1997 तक भारतीय सेना की कमान संभाली थी। वह प्रतिष्ठित 20 लांसर्स रेजिमेंट से थे और टैंक युद्धक अभियानों के विशेषज्ञ माने जाते थे।

दिलचस्प बात यह है कि जनरल शंकर रॉय चौधरी को सेना प्रमुख का पद उस समय मिला था जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन चंद्र जोशी का कार्यकाल के दौरान अचानक निधन हो गया था। जनरल जोशी भी आर्मर्ड कोर से ही थे और 64 कैवेलरी रेजिमेंट से कमीशन प्राप्त अधिकारी थे। वह भारतीय सेना के उन चुनिंदा “टैंकमैन” अधिकारियों में गिने जाते थे जिन्होंने सेना के सर्वोच्च पद तक पहुंच बनाई।

जनरल बिपिन चंद्र जोशी के निधन के बाद जनरल शंकर रॉय चौधरी ने सेना की कमान संभाली और 1997 तक सेना प्रमुख रहे। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद लगभग 29 वर्षों तक आर्मर्ड कोर का कोई अधिकारी भारतीय सेना के शीर्ष पद तक नहीं पहुंच पाया। अब लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की नियुक्ति के साथ यह लंबा अंतराल समाप्त हो गया है और आर्मर्ड कोर को एक बार फिर भारतीय सेना का नेतृत्व करने का अवसर मिला है।

आर्मर्ड कोर भारतीय सेना की वह शाखा है जो टैंक और मैकेनाइज्ड युद्धक अभियानों के लिए जानी जाती है। आधुनिक युद्ध में टैंक फॉर्मेशन किसी भी सेना की आक्रमण क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं।

स्वतंत्र भारत में अब तक केवल कुछ ही आर्मर्ड कोर अधिकारियों को सेना प्रमुख बनने का अवसर मिला है। इनमें जनरल राजेंद्र सिंह जाडेजा, जनरल जे.एन. चौधरी, जनरल ए.एस. वैद्य, जनरल वी.एन. शर्मा, जनरल बिपिन चंद्र जोशी और जनरल शंकर रॉय चौधरी जैसे नाम शामिल हैं। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

हर स्तर पर संभाली कमान

धीरज सेठ का सैन्य करियर केवल स्टाफ नियुक्तियों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने जमीनी स्तर से लेकर बड़े मिलिट्री स्ट्रक्चर्स तक हर स्तर पर कमान संभाली है।

उन्होंने सबसे पहले रेगिस्तानी क्षेत्र में एक आर्मर्ड रेजिमेंट का नेतृत्व किया। इसके बाद पश्चिमी क्षेत्र में 98 आर्मर्ड ब्रिगेड की कमान संभाली। यह ब्रिगेड उस समय पाकिस्तान केंद्रित स्ट्राइक फॉर्मेशन का हिस्सा मानी जाती थी।

इसके बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर में यूनिफॉर्म फोर्स की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह डिवीजन स्तर की काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स है, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद उन्होंने भारतीय सेना की प्रमुख स्ट्राइक फॉर्मेशन सुदर्शन चक्र कोर यानी 21 कोर की कमान संभाली। यह सेना की सबसे ताकतवर आक्रमणकारी फॉर्मेशन में से एक मानी जाती है।

बाद में उन्हें दिल्ली एरिया का जनरल ऑफिसर कमांडिंग नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सैन्य आयोजनों तथा महत्वपूर्ण समारोहों की जिम्मेदारी संभाली। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

दो ऑपरेशनल कमांड की कमान संभालने का दुर्लभ रिकॉर्ड

भारतीय सेना में बहुत कम अधिकारियों को दो अलग-अलग ऑपरेशनल कमांड का नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने यह उपलब्धि हासिल की।

उन्होंने नवंबर 2023 से जून 2024 तक दक्षिण पश्चिमी कमांड की कमान संभाली। इसके बाद जुलाई 2024 में उन्हें सदर्न कमांड का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ नियुक्त किया गया।

करीब ढाई वर्षों तक उन्होंने भारतीय सेना की दो महत्वपूर्ण कमांड का नेतृत्व किया। इस दौरान पश्चिमी मोर्चे, प्रशिक्षण गतिविधियों और सामरिक तैयारियों की निगरानी उनकी जिम्मेदारी रही। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान निभाई अहम भूमिका

सदर्न कमांड के प्रमुख के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि ऑपरेशन की कई जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं, लेकिन सैन्य सूत्रों के अनुसार उस दौरान विभिन्न कमांड्स के बीच समन्वय और ऑपरेशनल तैयारियों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। यही कारण है कि उन्हें 2026 में उत्तम युद्ध सेवा पदक (यूवाईएसएम) से सम्मानित किया गया। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

सेना के आधुनिकीकरण के प्रमुख चेहरों में रहे शामिल

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को भारतीय सेना में मॉर्डनाइजेशन और कैपेसिटी डेवलपमेंट का विशेषज्ञ माना जाता है। सैन्य हलकों में उनकी सबसे बड़ी पहचान एक ऐसे अधिकारी की रही है, जिन्होंने अपने करियर के दौरान केवल ऑपरेशनल कमांड ही नहीं संभाली, बल्कि सेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने वाली योजनाओं पर भी लंबे समय तक काम किया। उनकी अधिकांश महत्वपूर्ण स्टाफ नियुक्तियां सेना के कैपेबिलिटी डेवलपमेंट, हथियार अधिग्रहण और मॉडर्नाइजेशन से जुड़ी रही हैं।

आर्मी मुख्यालय में उन्होंने मैकेनाइज्ड फोर्सेस के लिए कैपेबिलिटी डेवलपमेंट की जिम्मेदारी संभाली, जहां उनका काम टैंक और आर्मर्ड फॉर्मेशनों की युद्धक क्षमता को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना था। इसके बाद ब्रिगेडियर के रूप में उन्होंने पर्सपेक्टिव प्लान्स एंड एक्विजिशन से जुड़े महत्वपूर्ण पद पर काम किया। यह वही शाखा है जहां सेना के लंबे समय के आधुनिकीकरण कार्यक्रम, नई सैन्य क्षमताओं की योजना और हथियारों की खरीद से संबंधित रोडमैप तैयार किए जाते हैं।

बाद में एडिशनल डायरेक्टर जनरल वेपन्स एंड इक्विपमेंट के रूप में उन्होंने आधुनिक हथियार प्रणालियों, सैन्य उपकरणों की खरीद, परीक्षण और सेना में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई। भारतीय सेना के लॉन्ग टर्म इंटीग्रेटेड पर्सपेक्टिव प्लान (एलटीआईपीपी) में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। यह योजना सेना के आने वाले वर्षों के आधुनिकीकरण, नई तकनीकों को शामिल करने और युद्धक क्षमता बढ़ाने का आधार मानी जाती है।

सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहते हुए उन्होंने “डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन” और “फ्यूचर रेडी फोर्स” के कॉन्सैप्ट पर विशेष जोर दिया। उनके नेतृत्व में आयोजित एक्सरसाइज रुद्र शक्ति जैसे बड़े सैन्य अभ्यासों में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस, प्रिसीजन फायरपावर और नई तकनीकों के इंटीग्रेशन प्रमुखता दी गई। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

शौर्य स्क्वॉड्रन: टैंक और ड्रोन को लाए साथ

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को भारतीय सेना में आधुनिकीकरण और नई युद्ध तकनीकों को अपनाने वाले अधिकारियों में गिना जाता है। सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान “शौर्य स्क्वॉड्रन” की नींव रखी। जिसे भारतीय सेना के भविष्य के युद्धक्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। हालांकि इसे अभी तक फाइनल ऑपरेशन क्लीयरेंस नहीं मिला है, लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही इसे मंजूरी मिलेगी।

शौर्य स्क्वॉड्रन मूल रूप से एक विशेष ड्रोन स्क्वॉड्रन है, जिसे आर्मर्ड फॉर्मेशनों यानी टैंक और मैकेनाइज्ड यूनिट्स के साथ जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य युद्ध के दौरान टैंक फॉर्मेशनों को रियल-टाइम सर्विलांस, टारगेट की पहचान, प्रिसीजन स्ट्राइक, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और दुश्मन की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराना है। आधुनिक युद्ध में केवल टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ ड्रोन, सेंसर और डिजिटल नेटवर्क का इंटीग्रेशन भी जरूरी हो गया है। शौर्य स्क्वॉड्रन इसी सोच का हिस्सा है।

मार्च 2026 में झांसी के पास बबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित एक बड़े इंटीग्रेटेड मैकेनाइज्ड अभ्यास के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने शौर्य स्क्वॉड्रन की क्षमताओं का प्रदर्शन देखा था। इस अभ्यास में ड्रोन और आर्मर्ड फोर्सेस के बीच तालमेल, रियल-टाइम टारगेटिंग और कॉर्डिनेटेड फायरपावर का प्रदर्शन किया गया। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

मिला था ट्राई-सर्विस गार्ड ऑफ ऑनर

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ के कार्यकाल की एक और उल्लेखनीय उपलब्धि तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस और कॉर्डिनेशन को मजबूत करना रही। 31 मार्च को जब उन्होंने सदर्न कमांड की कमान छोड़ी, तब उन्हें एक विशेष ट्राई-सर्विस गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया।

सामान्य तौर पर किसी आर्मी कमांडर को कमान छोड़ते समय केवल सेना की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है, लेकिन धीरज सेठ को भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के संयुक्त दल द्वारा सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके नेतृत्व में बढ़े ट्राई-सर्विस सहयोग और जॉइंट मिलिट्री एप्रोच को लेकर दिया गया।

उनके कार्यकाल के दौरान सदर्न कमांड क्षेत्र में कई जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज आयोजित की गईं, जिनमें तीनों सेनाओं ने मिलकर हिस्सा लिया। इन अभ्यासों का उद्देश्य युद्ध के समय बेहतर समन्वय, संसाधनों का साझा उपयोग और जॉइंट आपरेशनल कैपेबिलिटी डेवलप करना था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुई तीनों सेनाओं की जॉइंट एक्सरसाइज त्रिशूल में भी इस जॉइंट एप्रोच की झलक देखने को मिली। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

पारिवारिक विरासत भी है बेहद खास

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ का सैन्य करियर कई मायनों में एक दिलचस्प पारिवारिक विरासत से भी जुड़ा हुआ है। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. सेठ भी भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते थे और उन्होंने सेना के एडजुटेंट जनरल के रूप में दिसंबर 1997 में रिटायर हुए थे।

खास बात यह है कि पिता और पुत्र दोनों ने भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 21 स्ट्राइक कोर, जिसे “सुदर्शन चक्र कोर” के नाम से भी जाना जाता है, की कमान संभाली। यह भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण आक्रमणकारी फॉर्मेशनों में से एक मानी जाती है और पश्चिमी मोर्चे पर इसकी अहम भूमिका रहती है।

यह भारतीय सेना के इतिहास में उन दुर्लभ अवसरों में से एक रहा जब पिता और पुत्र दोनों एक ही प्रतिष्ठित स्ट्राइक कोर के कमांडर बने। इससे उनके परिवार का भारतीय सेना के साथ लंबे और गहरे जुड़ाव का भी पता चलता है।

सैन्य सेवा की यह परंपरा परिवार की अगली पीढ़ी तक भी जारी है। लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. सेठ के दूसरे पुत्र रियर एडमिरल रवनीश सेठ भारतीय नौसेना में वरिष्ठ अधिकारी हैं और वर्तमान में कर्नाटक के कारवार स्थित महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे पर तैनात हैं। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

संयुक्त राष्ट्र मिशन में भी किया प्रतिनिधित्व

धीरज सेठ को अंतरराष्ट्रीय सैन्य अनुभव भी प्राप्त है। वर्ष 1995-96 के दौरान उन्होंने अंगोला में संयुक्त राष्ट्र मिशन के साथ ऑपरेशंस ऑफिसर के रूप में काम किया।

यह अनुभव उन्हें बहुराष्ट्रीय सैन्य अभियानों, शांति स्थापना अभियानों और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों को समझने में मददगार रहा।

शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण में हमेशा रहे अव्वल

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ का रिकॉर्ड केवल फील्ड कमांड तक सीमित नहीं रहा है है। सैन्य शिक्षा और प्रोफेल ट्रेनिंग में भी उन्होंने लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वे आर्मर्ड कोर्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट भी हैं। 

उन्होंने जूनियर कमांड कोर्स में पहला स्थान प्राप्त किया था। डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में उन्हें बेस्ट ऑल राउंड स्टूडेंट ऑफिसर का सम्मान मिला। यंग ऑफिसर्स कोर्स में उन्हें सिल्वर सेंटूरियन पुरस्कार प्रदान किया गया।

उन्होंने हायर कमांड कोर्स, नेशनल डिफेंस कॉलेज और पेरिस के प्रतिष्ठित कमांड एंड स्टाफ कोर्स में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके अलावा अमेरिका के नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल में इंटरनेशनल डिफेंस एक्विजिशन मैनेजमेंट कोर्स भी किया। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

मिले कई प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान

अपने लंबे सैन्य करियर के दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण सैन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

उन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम), परम विशिष्ट सेवा पदक (पीवीएसएम) और उत्तम युद्ध सेवा पदक (यूवाईएसएम) प्रदान किए जा चुके हैं। इसके अलावा सेना प्रमुख और आर्मी कमांडर स्तर की प्रशस्तियां भी उन्हें मिल चुकी हैं।

अप्रैल 2026 में बने थे उप सेना प्रमुख

1 अप्रैल 2026 को लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने उप सेना प्रमुख का पद संभाला था। उस समय उन्हें सेना की ऑपरेशनल तैयारियों, आधुनिकीकरण कार्यक्रमों और रणनीतिक योजनाओं की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी।

अब सरकार ने उन्हें भारतीय सेना का अगला प्रमुख नियुक्त किया है। 30 जून 2026 को जनरल उपेंद्र द्विवेदी के सेवानिवृत्त होने के बाद वह भारतीय सेना की कमान संभालेंगे और देश के 31वें सेना प्रमुख बनेंगे। (Lt Gen Dhiraj Seth Army Chief)

94 साल में पहली बार IMA से पासआउट हुईं 9 महिला कैडेट्स, 515 में से 34 विदेशी भी बने अफसर, जानें किसे मिला स्वॉर्ड ऑफ ऑनर

IMA Passing Out Parade 2026
PRESIDENT OF INDIA REVIEWS THE PASSING OUT PARADE OF 158TH REGULAR COURSE AND 141ST TECHNICAL GRADUATE COURSE AT THE INDIAN MILITARY ACADEMY (Image Source: PIB)

IMA Passing Out Parade 2026: भारतीय सेनाओं के लिए शनिवार का दिन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। एक तरफ देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पासिंग आउट परेड की सलामी ली और नए मिलिट्री अफसरों को सेना में शामिल होने की शुभकामनाएं दीं, वहीं दूसरी तरफ हैदराबाद के डुंडीगल स्थित एयर फोर्स अकादमी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड की समीक्षा कर भारतीय वायुसेना के नए फ्लाइंग अधिकारियों को बधाई दी।

भारतीय सैन्य अकादमी के 94 साल के इतिहास में पहली बार महिला कैडेट्स का एक बैच प्रशिक्षण पूरा कर भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में शामिल हुआ है।

IMA Passing Out Parade 2026: रेगुलर कोर्स और टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स की पासिंग आउट परेड

देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी का चेटवुड ड्रिल स्क्वायर शनिवार सुबह सैन्य परंपराओं, अनुशासन और गर्व का गवाह बना। यहां 158वें रेगुलर कोर्स और 141वें टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स की पासिंग आउट परेड आयोजित की गई।

परेड की समीक्षा देश की राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं की सुप्रीम कमांडर द्रौपदी मुर्मू ने की। इस अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

जैसे ही कैडेट्स ने अंतिम पग बढ़ाए और परेड पूरी की, उनके वर्षों के कठिन प्रशिक्षण का सफर एक नए अध्याय में बदल गया। परेड समाप्त होते ही वे भारतीय सेना के अधिकारी बन गए।

IMA Passing Out Parade 2026
PRESIDENT OF INDIA REVIEWS THE PASSING OUT PARADE OF 158TH REGULAR COURSE AND 141ST TECHNICAL GRADUATE COURSE AT THE INDIAN MILITARY ACADEMY (Image Source: PIB)

कुल 515 कैडेट्स बने अधिकारी

भारतीय सैन्य अकादमी की पासिंग आउट परेड में इस बार कुल 515 जेंटलमैन कैडेट्स अधिकारी के रूप में भारतीय सेना और मित्र देशों की सेनाओं में शामिल हुए। इनमें 481 भारतीय अधिकारी कैडेट्स शामिल हैं, जबकि 16 मित्र देशों के 34 विदेशी अधिकारी कैडेट्स ने भी सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा किया।

बता दें कि विदेशी कैडेट्स को भी आईएमए में प्रशिक्षण दिया जाता है, जो भारत की उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत मित्र देशों के सैन्य अधिकारियों को प्रोफेशनल मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाती है।

इन कैडेट्स ने भारतीय कैडेट्स के साथ समान प्रशिक्षण लिया और अब अपने-अपने देशों की सेनाओं में अधिकारी के रूप में सेवाएं देंगे।

राष्ट्रपति ने इन कैडेट्स को बधाई देते हुए कहा कि उनके देशों ने भारत पर भरोसा करते हुए उन्हें सैन्य प्रशिक्षण के लिए यहां भेजा है। (IMA Passing Out Parade 2026)

पहली बार महिला कैडेट्स ने रचा इतिहास

इस बार की परेड का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नौ महिला कैडेट्स का पासआउट होना रहा। आईएमए की स्थापना 1932 में हुई थी। तब से लेकर अब तक हजारों अधिकारी यहां से निकलकर भारतीय सेना का हिस्सा बने, लेकिन पहली बार महिला कैडेट्स ने यहां प्रशिक्षण पूरा किया।

ये महिला कैडेट्स जुलाई 2025 में आईएमए में शामिल हुई थीं। लगभग एक वर्ष के कठोर सैन्य प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने पुरुष साथियों के साथ कदम से कदम मिलाकर परेड में हिस्सा लिया। ये कैडेट्स एनडीए की पहली महिला बैच (साल 2022) से हैं। एनडीए से ग्रेजुएट होने के बाद उन्होंने जुलाई 2025 में आईएमए में एक साल का प्री-कमीशन ट्रेनिंग पूरा किया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे भारतीय सैन्य इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने कहा कि नौ महिला कैडेट्स को पासआउट होते देखना उनके लिए बेहद खुशी का विषय है। यह केवल आईएमए के इतिहास का नया अध्याय नहीं बल्कि महिला नेतृत्व वाले विकास की दिशा में भारत की यात्रा का भी प्रतीक है।

राष्ट्रपति ने भरोसा जताया कि आने वाले समय में और अधिक महिला कैडेट्स अकादमी में शामिल होंगी। (IMA Passing Out Parade 2026)

राष्ट्रपति बोलीं- सेवा ही सर्वोच्च कर्तव्य

अपने संबोधन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नए अधिकारियों से कहा कि वे देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता के रक्षक हैं। उन्होंने कहा कि 140 करोड़ से अधिक भारतीय नागरिकों का विश्वास अब इन युवा अधिकारियों के कंधों पर है।

राष्ट्रपति ने अधिकारियों को याद दिलाया कि सेवा ही सर्वोच्च कर्तव्य है और सैन्य जीवन में व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्रहित को रखना होता है।

उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती सुरक्षा चुनौतियों, नई तकनीकों और जटिल वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारतीय सेना को हमेशा भविष्य के लिए तैयार रहना होगा।

राष्ट्रपति ने युवा अधिकारियों से आजीवन सीखते रहने, साहसिक निर्णय लेने और नैतिक नेतृत्व का उदाहरण बनने का आह्वान किया। (IMA Passing Out Parade 2026)

IMA Passing Out Parade 2026
PRESIDENT OF INDIA REVIEWS THE PASSING OUT PARADE OF 158TH REGULAR COURSE AND 141ST TECHNICAL GRADUATE COURSE AT THE INDIAN MILITARY ACADEMY (Image Source: PIB)

सैनिकों का नेतृत्व करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी

राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि सेना का अधिकारी केवल आदेश देने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि अपने सैनिकों का मार्गदर्शक और संरक्षक भी होता है।

उन्होंने कहा कि अधिकारियों को अपने सैनिकों का विश्वास जीतना होगा, उन्हें प्रेरित करना होगा और टीम भावना को मजबूत करना होगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि एक अच्छा सैन्य नेता वही होता है जो सबसे आगे चलकर नेतृत्व करे, अपने जवानों का ध्यान रखे और सेना की सर्वोत्तम परंपराओं को आगे बढ़ाए। (IMA Passing Out Parade 2026)

इन कैडेट्स को मिला स्वॉर्ड ऑफ ऑनर

हर पासिंग आउट परेड में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले कैडेट को प्रतिष्ठित “स्वॉर्ड ऑफ ऑनर” प्रदान किया जाता है।
पासिंग आउट कोर्स ST-26 के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले जेंटलमैन कैडेट्स को विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कारों और पदकों से सम्मानित किया गया। इस कोर्स में अकादमी कैडेट एडजुटेंट (ACA) विशाल कुमार ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए प्रतिष्ठित स्वॉर्ड ऑफ ऑनर हासिल किया, जो पूरे कोर्स में सर्वश्रेष्ठ अधिकारी कैडेट को दिया जाता है। इसके साथ ही उन्होंने गोल्ड मेडल भी जीता और रेगुलर कोर्स में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

अकादमी अंडर ऑफिसर (AUO) प्रिंस राज को रेगुलर कोर्स में दूसरा स्थान हासिल करने पर सिल्वर मेडल प्रदान किया गया। वहीं सीनियर अंडर ऑफिसर (SUO) तेजस भट्ट ने रेगुलर कोर्स में तीसरा स्थान प्राप्त किया और उन्हें ब्रॉन्ज मेडल से सम्मानित किया गया।

तकनीकी ग्रेजुएट कोर्स (TGC) में ऑफिसर कैडेट ऋषभ मिश्रा ने पहला स्थान हासिल किया और उन्हें सिल्वर मेडल (TGC) प्रदान किया गया। इसी तरह स्पेशल कमीशंड ऑफिसर (SCO) कोर्स में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले ऑफिसर कैडेट बोध राज थापा को सिल्वर मेडल (SCO) दिया गया।

टेक्निकल एंट्री स्कीम (TES) कोर्स में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले ऑफिसर कैडेट करण पांडेय को सिल्वर मेडल (TES) से सम्मानित किया गया। वहीं विदेशी अधिकारी कैडेट्स (FOCs) में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जूनियर अंडर ऑफिसर (JUO) जैफ सादिद अल्वी को बेस्ट फॉरेन ऑफिसर कैडेट (Best FOC) ट्रॉफी प्रदान की गई। (IMA Passing Out Parade 2026)

पासिंग आउट परेड क्यों होती है खास

सेना के किसी भी कैडेट के लिए पासिंग आउट परेड केवल एक समारोह नहीं होती। यह उस लंबे और कठिन सफर का अंतिम पड़ाव होती है जिसमें शारीरिक प्रशिक्षण, हथियार संचालन, युद्धक रणनीति, नेतृत्व क्षमता, फील्ड एक्सरसाइज और मानसिक मजबूती जैसे कई चरण शामिल होते हैं।

आईएमए में प्रशिक्षण के दौरान कैडेट्स को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम करना सिखाया जाता है ताकि वे वास्तविक सैन्य चुनौतियों का सामना कर सकें। इसी कारण पासिंग आउट परेड को हर सैन्य अधिकारी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। (IMA Passing Out Parade 2026)

हैदराबाद में वायुसेना को मिले नए फ्लाइंग ऑफिसर

देहरादून में आयोजित समारोह के समानांतर हैदराबाद के डुंडीगल स्थित एयर फोर्स अकादमी में भी एक महत्वपूर्ण आयोजन हुआ। यहां भारतीय वायुसेना के 217वें कोर्स की कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड आयोजित की गई। इस परेड की समीक्षा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। परेड के बाद आयोजित पिपिंग और कमीशनिंग समारोह में नए अधिकारियों को औपचारिक रूप से भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नए अधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण पूरा कर अब ये युवा अधिकारी भारतीय वायुसेना के सक्रिय सदस्य बन गए हैं और देश की हवाई सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे।

राजनाथ सिंह ने फ्लाइट कैडेट्स के प्रशिक्षण और उनके समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि वायुसेना में अधिकारी बनना केवल एक नौकरी नहीं बल्कि राष्ट्र सेवा का दायित्व है। (IMA Passing Out Parade 2026)

जोरहाट में हादसे का शिकार हुआ AN-32, क्यों आज भी भारतीय वायुसेना की लाइफलाइन बना हुआ है 42 साल पुराना विमान?

AN-32 Crash in Jorhat
Image Source: Special arrangement

AN-32 Crash in Jorhat: असम के जोरहाट एयर फोर्स स्टेशन पर भारतीय वायुसेना का एक एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान लैंडिंग के दौरान हादसे का शिकार हो गया। विमान रूटीन सॉर्टी पर था और रनवे पर उतरते समय क्रैश लैंडिंग का शिकार हुआ, जिसके बाद उसमें आग लग गई। विमान में विस्फोट जैसी स्थिति की भी बात कही गई है। हादसे के तुरंत बाद बचाव और जांच टीमें मौके पर पहुंच गईं। घटना की जांच शुरू कर दी गई है और वायुसेना ने हादसे की जांच के आदेश दे दिए हैं।

इस विमान हादसे में पांच जवानों शहीद हो गए। दुर्घटना में स्क्वाड्रन लीडर प्रशांत सिंह, फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार, सार्जेंट जितेंद्र शर्मा, अग्निवीरवायु खेमाराम कुमावत और अग्निवीरवायु दानिश आलम ने ड्यूटी के दौरान अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।

वायुसेना ने शोक संतप्त परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि इस कठिन समय में वह पूरी मजबूती के साथ उनके साथ खड़ी है। देश उनकी सेवा, समर्पण और बलिदान को हमेशा याद रखेगा।

यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब एएन-32 अब भी भारतीय वायुसेना की परिवहन क्षमता की रीढ़ माना जाता है। लगभग चार दशक पहले सेवा में शामिल हुआ यह विमान आज भी देश के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में सैनिकों, हथियारों, राशन और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने का काम कर रहा है।

AN-32 Crash in Jorhat: जुलाई 1984 में शामिल हुआ था एएन-32?

एएन-32 सोवियत संघ में विकसित एक ट्विन इंजन टर्बोप्रॉप मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इसे विशेष रूप से भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। दरअसल भारत को ऐसा विमान चाहिए था जो ऊंचे पहाड़ी इलाकों, गर्म मौसम और छोटे रनवे पर भी आसानी से उड़ान भर सके।

एएन-32 को पुराने एएन-26 विमान के आधार पर तैयार किया गया, लेकिन इसमें ज्यादा ताकतवर इंजन लगाए गए। यही वजह है कि यह लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सियाचिन और उत्तर-पूर्व के कई दुर्गम इलाकों में सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर सकता है।

भारतीय वायुसेना में यह विमान जुलाई 1984 में शामिल किया गया था। इसके बाद 1984 से 1991 के बीच बड़ी संख्या में विमान भारत पहुंचे। कुल मिलाकर भारत ने करीब 125 एएन-32 विमान खरीदे थे।

AN-32 Crash in Jorhat
IAF AN-32 Crash in Jorhat: Why India’s Four-Decade-Old Air Force Workhorse Remains Indispensable. (Image Source: PIB)

भारतीय वायुसेना का सबसे भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट विमान

रिटायर्ड एयर मार्शल संजीव कपूर ने कहा कि एएन-32 भारतीय वायुसेना का बेहद भरोसेमंद और सुरक्षित परिवहन विमान रहा है, जो पिछले लगभग 40 वर्षों से सेवा में है। यह विमान लंबे समय से वायुसेना के ट्रांसपोर्ट बेड़े की रीढ़ माना जाता है। सियाचिन, लेह और लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों और रसद की आपूर्ति से लेकर अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्रों तक जरूरी सामान पहुंचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

एएन-32 को अक्सर भारतीय वायुसेना का “वर्कहॉर्स” कहा जाता है। इसका कारण इसकी बहुमुखी क्षमता है। यह विमान सैनिकों की तैनाती, रसद आपूर्ति, हवाई परिवहन, राहत सामग्री पहुंचाने और आपदा प्रबंधन अभियानों में लगातार इस्तेमाल किया जाता रहा है।

सियाचिन ग्लेशियर से लेकर अरुणाचल प्रदेश की अग्रिम चौकियों तक हजारों उड़ानें इसी विमान ने भरी हैं। कई ऐसे हवाई पट्टियां हैं जहां बड़े विमान नहीं उतर सकते, लेकिन एएन-32 वहां आसानी से ऑपरेट कर सकता है।

वायुसेना के अधिकारियों का मानना रहा है कि ऊंचाई वाले इलाकों में इसकी उपयोगिता आज भी बेहद महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि इतने पुराने होने के बावजूद इसे पूरी तरह सेवा से बाहर नहीं किया गया है।

सुरक्षित लैंडिंग की प्रक्रिया में था विमान

जोरहाट एयर फोर्स स्टेशन उत्तर-पूर्व भारत में वायुसेना का एक महत्वपूर्ण ठिकाना है। यहां से नियमित रूप से परिवहन और रसद मिशन ऑपरेट किए जाते हैं।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार विमान सुरक्षित लैंडिंग की प्रक्रिया में था, लेकिन रनवे पर उतरते समय किसी तकनीकी या ऑपरेशनल समस्या के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसके बाद विमान में आग लग गई। हालांकि हादसे की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

यह घटना 2019 में अरुणाचल प्रदेश में हुए एएन-32 हादसे से अलग है। उस दुर्घटना में विमान उड़ान के दौरान लापता हो गया था और बाद में उसका मलबा मिला था। वर्तमान घटना एयरबेस पर लैंडिंग के दौरान हुई है।

रिटायर्ड एयर मार्शल संजीव कपूर ने असम के जोरहाट एयरबेस पर हुए एएन-32 विमान हादसे पर कहा कि दुर्घटना की असली वजह तभी सामने आएगी, जब अधिक जानकारी उपलब्ध होगी या फिर कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी।

कैसा रहा है एएन-32 का सुरक्षा रिकॉर्ड

एएन-32 लंबे समय से कठिन परिस्थितियों में उड़ान भरता रहा है। यही कारण है कि इसके परिचालन इतिहास में कई दुर्घटनाएं भी दर्ज हैं।

1986 में एक विमान अरब सागर के ऊपर लापता हो गया था। उसी साल जम्मू क्षेत्र में भी एक दुर्घटना हुई। 1990 में केरल के पर्वतीय क्षेत्र में एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। 1999 में दिल्ली के पास हुई दुर्घटना सबसे गंभीर घटनाओं में गिनी जाती है, जिसमें कई लोगों की जान गई थी।

2009 में अरुणाचल प्रदेश के मेचुका क्षेत्र में एक एएन-32 दुर्घटनाग्रस्त हुआ। 2016 में बंगाल की खाड़ी के ऊपर उड़ान भर रहा विमान लापता हो गया था। 2019 में फिर अरुणाचल प्रदेश में एक विमान हादसे का शिकार हुआ था। उस हादसे में 13 लोगों की मौत हुई थी।

हालांकि सूत्रों का कहना है कि इन घटनाओं को केवल विमान की डिजाइन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। एएन-32 का अधिकांश ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण वातावरण में होता है, जहां मौसम, ऊंचाई और भूभाग स्वयं बड़े जोखिम पैदा करते हैं।

AN-32 Crash in Jorhat
Image Source: Special arrangement

क्यों जरूरत पड़ी आधुनिकीकरण की?

सालों तक लगातार सेवा देने के बाद वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन विमानों को आधुनिक बनाए रखना था। इसी जरूरत को देखते हुए भारत ने 2009 में बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम की शुरुआत की।

एयर मार्शल कपूर ने बताया कि समय-समय पर इन विमानों का आधुनिकीकरण किया गया है और उनकी तकनीकी स्थिति अच्छी है, भले ही उनका बेड़ा पुराना हो। उनके अनुसार एएन-32 ने दशकों से भारतीय वायुसेना की जरूरतों को सफलतापूर्वक पूरा किया है और कठिन परिस्थितियों में भी अपनी उपयोगिता साबित की है।

इसके लिए यूक्रेन की कंपनी स्पेट्सटेक्नोएक्सपोर्ट के साथ लगभग 400 मिलियन डॉलर का समझौता किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 105 विमानों की तकनीकी उम्र बढ़ाना और उनमें आधुनिक सिस्टम्स लगाना था।

वायुसेना का फोकस केवल विमान को उड़ाने योग्य बनाए रखना नहीं था, बल्कि उसकी सुरक्षा, विश्वसनीयता और ऑपरेशनल क्षमता को भी बढ़ाना था।

अपग्रेड में हुए क्या-क्या बदलाव?

आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत विमानों में आधुनिक एवियोनिक्स लगाए गए। कॉकपिट को पहले की तुलना में ज्यादा डिजिटल बनाया गया। नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम्स को बेहतर किया गया ताकि पायलटों को अधिक सटीक जानकारी मिल सके।

विमान में नया ऑक्सीजन सिस्टम लगाया गया। चालक दल के लिए बेहतर सीटें उपलब्ध कराई गईं। इंजन और एयरफ्रेम की तकनीकी उम्र बढ़ाने पर भी काम किया गया।

इन सुधारों के बाद विमान का ऑपरेशन पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने की कोशिश की गई।

यूक्रेन और भारत में हुआ अपग्रेड

इस परियोजना के तहत लगभग 45 विमानों का आधुनिकीकरण यूक्रेन में किया गया। बाकी विमानों पर भारत में काम शुरू किया गया।

कानपुर स्थित 1 बेस रिपेयर डिपो और 3 बीआरडी चंडीगढ़ समेत अन्य सैन्य रखरखाव प्रतिष्ठानों को इस परियोजना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। बाद में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए भारतीय उद्योगों की भागीदारी भी बढ़ाई गई। यूक्रेन से लगभग 35 अपग्रेडेड एएन-32आरई विमान डिलीवर किए गए।

रूस-यूक्रेन तनाव के कारण परियोजना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता में बाधाएं आईं। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने घरेलू स्तर पर ओवरहॉल और लाइफ एक्सटेंशन कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। 2019 में भारत और यूक्रेन ने फिर से समझौता किया और रूसी मूल के पुर्जों के विकल्प तैयार किए गए।

2040 तक सेवा में रखने की योजना

वायुसेना का मानना है कि एएन-32 अभी भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकता है। इसी कारण कई विमानों की सेवा अवधि बढ़ाने की योजना पर काम किया गया।

अपग्रेड किए गए विमानों कम से कम 60 विमानों को 2040 तक सेवा में बनाए रखने की योजना तैयार की गई है। इसके लिए नियमित ओवरहॉल, निरीक्षण और तकनीकी सुधार जारी हैं।

हालांकि समानांतर रूप से नए परिवहन विमानों को भी शामिल किया जा रहा है ताकि भविष्य में ऑपरेशनल बोझ कम किया जा सके।

सी-295 से कैसे अलग है एएन-32?

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय वायुसेना ने सी-295 विमान को शामिल करना शुरू किया है। यह आधुनिक तकनीक वाला नया ट्रांसपोर्ट विमान है। सी-295 को मुख्य रूप से एवरो एचएस-748 को रिप्लेस करने के लिए खरीदा गया था।

भारत ने स्पेन से कुल 56 सी-295 विमान खरीदे हैं। इनमें से 16 स्पेन से डिलीवर किए गए हैं। बाकी 40 विमान टाटा एडवांस्ड सिस्टम वडोदरा में में बना रही है। जिसमें से पहले जहाज ने हाल ही में पहली उड़ान भी भरी है। भारतीय निर्मित विमानों की डिलीवरी 2026 के अंत से शुरू होने की उम्मीद है। सभी 40 भारतीय विमान अगस्त 2031 तक डिलीवर होने हैं।

सी-295 अधिक वजन उठा सकता है, ज्यादा सैनिकों को ले जा सकता है और आधुनिक डिजिटल कॉकपिट से लैस है। इसका रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। वहीं यह मल्टीरोल भी है, यह सिर्फ ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि समुद्री निगरानी, मेडिकल इवैक्यूएशन आदि भी कर सकता है।

इसके बावजूद एएन-32 की एक बड़ी ताकत उसकी ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने की क्षमता है। लद्दाख और उत्तर-पूर्व के कई क्षेत्रों में इसका प्रदर्शन अब भी प्रभावशाली माना जाता है।

यही कारण है कि दोनों विमानों को फिलहाल अलग-अलग भूमिकाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि एएन-32 को तब तक चलाया जाएगा जब तक नया मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) या सी-295 पूरी तरह नहीं आ जाता।

एएन-32 और सी-295 में क्या है अंतर

भारतीय वायुसेना का एएन-32 लगभग 40 साल पुराना विमान है, जबकि सी-295 नई पीढ़ी का आधुनिक ट्रांसपोर्ट विमान है। दोनों का काम सैनिकों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है, लेकिन उनकी क्षमताओं में काफी अंतर है।

सामान ले जाने की क्षमता की बात करें तो सी-295 ज्यादा ताकतवर है। एएन-32 एक बार में लगभग 7 टन तक सामान ले जा सकता है, जबकि सी-295 करीब 9 टन से ज्यादा भार उठा सकता है। इसी तरह सैनिकों के परिवहन में भी सी-295 आगे है। एएन-32 जहां 42 से 50 सैनिकों को ले जा सकता है, वहीं सी-295 करीब 70 सैनिकों को एक साथ ले जाने में सक्षम है।

रेंज यानी एक बार ईंधन भरने के बाद उड़ान की दूरी में भी सी-295 बेहतर है। एएन-32 लगभग 2,500 किलोमीटर तक उड़ सकता है, जबकि सी-2953,700 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है।

हालांकि गति के मामले में एएन-32 थोड़ा आगे है। इसकी अधिकतम गति लगभग 530 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि सी-295 की गति लगभग 509 किलोमीटर प्रति घंटा है। लेकिन यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है।

जहां एएन-32 आज भी अपनी खास पहचान बनाए हुए है, वह है ऊंचाई वाले इलाकों और छोटे रनवे पर ऑपरेशन। लद्दाख, सियाचिन और उत्तर-पूर्व के दुर्गम क्षेत्रों में एएन-32 का प्रदर्शन बेहद अच्छा माना जाता है। इसे खास तौर पर “हॉट एंड हाई” परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया था। यही वजह है कि भारतीय वायुसेना अब भी इस पर भरोसा करती है।

नए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश

भारतीय वायुसेना लंबे समय से ऐसे नए ट्रासंपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश कर रही है जो एएन-32 और हेवी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के बीच की जरूरतों को पूरा कर सके।

इसी उद्देश्य से मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम पर काम चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत 18 से 30 टन तक भार उठाने वाले आधुनिक विमान खरीदने की योजना बनाई गई है।

इससे भविष्य में परिवहन क्षमता को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। हालांकि फिलहाल एएन-32 वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

उत्तर-पूर्व और हिमालय में एएन-32 की भूमिका

भारतीय वायुसेना के लिए उत्तर-पूर्व और हिमालयी क्षेत्र हमेशा चुनौतीपूर्ण रहे हैं। यहां मौसम तेजी से बदलता है, रनवे छोटे होते हैं और कई बार विजिबिलिटी बेहद कम होती है।

ऐसे वातावरण में एएन-32 ने वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सैनिकों की तैनाती, गोला-बारूद की आपूर्ति, राहत सामग्री पहुंचाने और आपदा के समय सहायता पहुंचाने जैसे मिशनों में इस विमान का खूब इस्तेमाल हुआ है।

DRDO का मल्टी-लेयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैयार! AD-1, AD-2 और NASM-MR ने दिखाया दम, दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हुआ भारत

DRDO AD-1 AD-2 Missile Test
India Joins Elite Missile Defence Club After Successful AD-1, AD-2 and NASM-MR Missile Trials

AD-1 AD-2 Missile Test: भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। डीआरडीओ ने हाल ही में तीन महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर देश की सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया है। इन परीक्षणों में दो एडवांस बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर और एक नई नेवल एंटी-शिप मिसाइल शामिल थी। इन सफल परीक्षणों के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में पहुंच गया है जिनके पास लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता मौजूद है।

10 और 11 जून 2026 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किए गए इन परीक्षणों ने यह दिखाया कि भारत अब केवल मिसाइल बनाने वाला देश नहीं रहा, बल्कि दुश्मन की मिसाइलों को रोकने और समुद्र में मौजूद दुश्मन के जहाजों पर सटीक हमला करने की क्षमता भी हासिल कर चुका है। डीआरडीओ के मुताबिक ये परीक्षण भारत के मल्टी-लेयर्ड डिफेंस सिस्टम और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप डेवलप की गई नई तकनीकों की सफलता का प्रमाण हैं।

AD-1 AD-2 Missile Test: 24 घंटे में तीन सफल परीक्षण

डीआरडीओ ने लगातार तीन उड़ान परीक्षण किए। इनमें दो बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर और एक नेवल एंटी-शिप मिसाइल का परीक्षण शामिल था। इन तीनों परीक्षणों का उद्देश्य अलग-अलग प्रकार के खतरों के खिलाफ भारत की प्रतिक्रिया क्षमता को परखना था।

पहले दो परीक्षणों में ऐसी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जो दुश्मन की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को बीच रास्ते में ही नष्ट कर सकती हैं। तीसरा परीक्षण नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज यानी एनएएसएम-एमआर (NASM-MR) का था, जिसने समुद्री युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि तीनों परीक्षण अपने निर्धारित लक्ष्यों पर पूरी तरह सफल रहे और सभी सिस्टम्स ने अपेक्षित प्रदर्शन किया।

क्या होता है बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम?

किसी भी देश के लिए बैलिस्टिक मिसाइल सबसे गंभीर खतरों में से एक मानी जाती है। ऐसी मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर से छोड़ी जा सकती हैं और बहुत कम समय में अपने टारगेट तक पहुंच सकती हैं। अगर इनके खिलाफ प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था न हो तो सैन्य ठिकानों, शहरों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इसी खतरे से बचाने के लिए बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम डेवलप किया जाता है। यह एक ऐसा मल्टी-लेयर्ड डिफेंस सिस्टम होता है जो दुश्मन की मिसाइल का पता लगाकर उसे टारगेट तक पहुंचने से पहले ही नष्ट कर देता है।

भारत का बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम कई सालों से विकसित किया जा रहा है। हालिया परीक्षण इसी कार्यक्रम के दूसरे चरण की बड़ी उपलब्धि माने जा रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस सफलता के बाद भारत की सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है। (AD-1 AD-2 Missile Test)

AD-1 और AD-2 इंटरसेप्टर

हालांकि सरकार ने आधिकारिक रूप से इंटरसेप्टरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन सूत्रों ने बताया कि ये एडी-1 और एडी-2 इंटरसेप्टर हैं। ये दोनों मिसाइलें डीआरडीओ के फेज-2 बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

एडी-1 इंटरसेप्टर ऊंचाई पर जाकर दुश्मन की मिसाइल को वायुमंडल के बाहर या उसकी सीमा के आसपास नष्ट करने के लिए तैयार की गई है। वहीं एडी-2 इंटरसेप्टर वायुमंडल के भीतर आने वाली मिसाइलों को निशाना बनाने के लिए डेवलप की गई है।

दोनों मिलकर एक डुअल सिक्युरिटी लेयर तैयार करती हैं। यदि पहली लेयर में टारगेट नष्ट नहीं होता तो दूसरी लेयर एक्टिव होकर उसे खत्म करने का प्रयास करती है। यही वजह है कि इसे मल्टी-लेयर्ड डिफेंस सिस्टम कहा जाता है।

2000 से 5000 किमी रेंज वाली मिसाइलों को रोकने की क्षमता

रक्षा सूत्रों के अनुसार इन इंटरसेप्टरों को खास तौर पर उन बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ तैयार किया गया है जिनकी मारक क्षमता 2000 से 5000 किलोमीटर तक होती है। इस श्रेणी को इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल कहा जाता है।

ऐसी मिसाइलें आधुनिक युद्ध में बेहद खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि वे लंबी दूरी से हमला कर सकती हैं और उनके पास भारी वारहेड ले जाने की क्षमता होती है।

सूत्रों का कहना है कि इस क्षमता के साथ भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से बचाव की एडवांस तकनीक मौजूद है।

पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों पर नजर

सूत्रों का कहना है कि भारत ने बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम को इसलिए भी प्राथमिकता दी है क्योंकि क्षेत्र में मिसाइल क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं।

पाकिस्तान लगातार नए मिसाइल सिस्टम्स पर काम कर रहा है। फतह-1, फतह-2 और चीन से जुड़े कुछ अन्य मिसाइल सिस्टम्स को लेकर भारतीय सुरक्षा एजेंसियां लगातार निगरानी रखती हैं। ऐसे माहौल में एक मजबूत मिसाइल रक्षा कवच की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही थी। (AD-1 AD-2 Missile Test)

समुद्र में दुश्मन के जहाजों पर भी होगी पैनी नजर

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस परीक्षणों के साथ डीआरडीओ ने पहली बार नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज का भी सफल परीक्षण किया। यह मिसाइल भारतीय नौसेना की समुद्री हमला क्षमता को मजबूत करने के लिए तैयार की गई है।

परीक्षण के दौरान मिसाइल ने समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भरी और अपने टारगेट तक सटीक पहुंचने की क्षमता दिखाई। सूत्रों ने इसे सी-स्किमिंग प्रोफाइल बताया है, जिसमें मिसाइल बहुत कम ऊंचाई पर उड़ती है ताकि दुश्मन के रडार उसे देर से पहचान सकें।

मिसाइल ने अपनी नेविगेशन क्षमता, लक्ष्य पहचान और अंतिम चरण की सटीकता का सफल प्रदर्शन किया। इससे यह साबित हुआ कि भविष्य में भारतीय नौसेना के पास दुश्मन के युद्धपोतों और अन्य समुद्री लक्ष्यों को निशाना बनाने का एक और स्वदेशी विकल्प उपलब्ध होगा।

नेटवर्क आधारित युद्ध सिस्टम का भी हुआ परीक्षण

इन परीक्षणों की एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि केवल मिसाइलों का ही नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर को भी परखा गया।

लंबी दूरी के रडार, कमांड सेंटर, कम्यूनिकेशन नेटवर्क और कंट्रोल सिस्टम्स ने मिलकर टारगेट का पता लगाया, उसकी जानकारी साझा की और इंटरसेप्टर मिसाइलों को निर्देशित किया।

आधुनिक युद्ध में हथियारों, सेंसरों और कमांड सिस्टम के बीच तालमेल ही सफलता तय करता है। डीआरडीओ ने इन परीक्षणों के जरिए इस क्षमता का भी प्रदर्शन किया। (AD-1 AD-2 Missile Test)

रक्षा मंत्री और डीआरडीओ प्रमुख ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इन सफल परीक्षणों पर डीआरडीओ को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि भारत की रक्षा तैयारियों को नई मजबूती देगी। उन्होंने कहा कि ऐसी तकनीकें देश को हवाई और समुद्री खतरों से निपटने में महत्वपूर्ण मदद प्रदान करेंगी।

डीआरडीओ के चेयरमैन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी वैज्ञानिकों, उद्योग भागीदारों और सशस्त्र बलों की संयुक्त टीम की सराहना की। उन्होंने कहा कि केवल 24 घंटे के भीतर इतने अहम परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा करना इंडियन डिफेंस रिसर्च सिस्टम की क्षमता को दर्शाता है। (AD-1 AD-2 Missile Test)