📍नई दिल्ली | 23 Apr, 2026, 2:18 PM
LVCCS Indian Army: भारतीय थलसेना एक नया सिस्टम डेवलप करने की तैयारी कर रही है, जिसका नाम है लैंड वेक्टर्स कंट्रोल एंड कोऑर्डिनेशन सिस्टम (LVCCS)। यह सिस्टम सेना के सभी लैंड बेस्ड वेपंस और फायर पावर को एक ही नेटवर्क में जोड़ने के लिए बनाया जा रहा है। इसके लिए सेना के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ इंफॉर्मेशन सिस्टम ने सेना को नेटवर्क सेंट्रिक बनाने के लिए एक ड्राफ्ट रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है।
यह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा, जिसमें जमीन पर चलने वाले सभी मिलिट्री वेक्टर्स जैसे टैंक, आर्टिलरी गन, हॉवित्जर, रॉकेट, मिसाइल, लॉइटरिंग अमुनिशन को रीयल-टाइम में कंट्रोल और कॉर्डिनेट करेगा।
LVCCS Indian Army: क्यों जरूरी है यह सिस्टम
अब तक सेना के अलग-अलग हथियार और यूनिट्स अपने-अपने तरीके से काम करते थे। टारगेट देखना, प्लान बनाना, फायर करना और नुकसान का आकलन करना – यह सब अलग-अलग सिस्टम से होता था। इससे समय ज्यादा लगता था और कई बार तालमेल में कमी आ जाती थी।
एलवीसीसीएस इस पूरी प्रक्रिया को एक साथ जोड़ देगा। यह ऑब्जर्वेशन से लेकर फायर डिलीवरी और डैमेज असेसमेंट तक सब कुछ ऑटोमेट करेगा। इसका मतलब है कि कमांडर को एक ही स्क्रीन पर पूरा बैटलफील्ड दिखेगा और वह तुरंत फैसला ले सकेगा। (LVCCS Indian Army)
कैसे काम करेगा एलवीसीसीएस
यह सिस्टम चार मुख्य हिस्सों में काम करेगा। पहला हिस्सा फायर कंट्रोल का होगा, जिसमें कमांडर और सेंसर जैसे रडार और ड्रोन शामिल होंगे। दूसरा हिस्सा फायरिंग यूनिट्स का होगा, जहां से असल में गोली या मिसाइल दागी जाएगी। तीसरा हिस्सा लॉजिस्टिक्स से जुड़ा होगा और चौथा हिस्सा सभी हथियारों को जोड़ने वाला नेटवर्क होगा।
इसमें टारगेट की जानकारी ड्रोन या सेंसर से आएगी, फिर सिस्टम खुद प्लान बनाएगा और गन या रॉकेट सिस्टम उस ऑर्डर को एग्जीक्यूट करेंगी। इससे समय की बचत होगी और सटीकता बढ़ेगी।
आर्टिलरी सिस्टम को मिलेगा बड़ा अपग्रेड
एलवीसीसीएस खास तौर पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। इसमें फायर कंट्रोल, टैक्टिकल कंट्रोल और फायर प्लानिंग जैसे फीचर्स होंगे। यह सिस्टम तय करेगा कि किस हथियार का इस्तेमाल कहां और कैसे करना है। इससे रिसोर्सेज का सही इस्तेमाल होगा और दुश्मन पर दबाव बढ़ेगा। इसके जरिए थिएटर लेवल पर भी फायर प्लान तैयार किया जा सकेगा, यानी बड़े स्तर पर ऑपरेशन को कंट्रोल करना आसान होगा।
जीआईएस और डिजिटल मैप का इस्तेमाल
इस सिस्टम में जीआईएस यानी जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके जरिए डिजिटल मैप पर पूरे इलाके की जानकारी मिलेगी। इसमें 3डी टेरेन मॉडलिंग, सैटेलाइट इमेज और रास्तों का विश्लेषण जैसे फीचर्स होंगे। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन सा इलाका फायरिंग के लिए सही है और कौन सा नहीं। इसके अलावा यह सिस्टम खुद सबसे छोटा रास्ता और वैकल्पिक मार्ग भी सुझा सकेगा। (LVCCS Indian Army)
नेटवर्क और कम्युनिकेशन सिस्टम
एलवीसीसीएस एक मजबूत नेटवर्क पर काम करेगा। इसमें सैटेलाइट, रेडियो, लाइन और लोकल नेटवर्क का इस्तेमाल होगा। यह सिस्टम आर्मी डेटा नेटवर्क से जुड़ा होगा और इसमें हाई लेवल एन्क्रिप्शन होगा, जिससे डेटा सुरक्षित रहेगा। इससे युद्ध के दौरान भी कम्युनिकेशन सुरक्षित और बिना रुकावट के चलता रहेगा।
लिनक्स पर होगा ऑपरेट
यह सिस्टम किसी एक खास मशीन पर निर्भर नहीं होगा। इसे लैपटॉप, टैबलेट या कंप्यूटर पर चलाया जा सकेगा।
इसमें लिनक्स जैसे भरोसेमंद ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही यह टच स्क्रीन फ्रेंडली होगा और इस्तेमाल में आसान रहेगा। हार्डवेयर के तौर पर मजबूत और टिकाऊ लैपटॉप और टैबलेट दिए जाएंगे, जो धूल, पानी और झटकों को सह सकें। (LVCCS Indian Army)
मौजूदा सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन
एलवीसीसीएस को इस तरह बनाया जा रहा है कि यह सेना के मौजूदा सिस्टम के साथ भी काम कर सके। यह बैटलफील्ड सर्विलांस सिस्टम और कमांड इंफॉर्मेशन सिस्टम से जुड़कर काम करेगा। इससे पुराने और नए सिस्टम के बीच तालमेल बना रहेगा और ऑपरेशन में कोई दिक्कत नहीं आएगी।
LVCCS आने से बदलेगी नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की क्षमता
भविष्य में जब कभी युद्ध जैसी स्थिति होगी, तब सबसे बड़ा फर्क गति और सटीकता में दिखेगा। पहले मैनुअल प्रक्रिया में जो 10-15 मिनट लगते थे, अब कुछ सेकंड-मिनट में हो जाएगा। साथ ही, कमांडर को पूरा “ग्राउंड पिक्चर” दिखेगा, कौन सा हथियार कहां है, किस दिशा में फायर करना है और किस टारगेट को पहले लेना है। यह सब एक ही जगह से तय होगा। इससे गलत फैसलों की संभावना कम होगी।
इस सिस्टम का फायदा यह है कि बिना नए हथियार खरीदे ही मौजूदा हथियार ज्यादा प्रभावी हो जाएंगे। टैक्टिकल कंट्रोल से एक ही टारगेट पर जरूरत से ज्यादा फायर नहीं होगा। सही हथियार सही जगह इस्तेमाल होगा। इससे गोला-बारूद की बचत होगी और असर ज्यादा दिखेगा। इसी वजह से इसे “फोर्स मल्टीप्लायर” कहा जाता है, यानी वही ताकत कई गुना असर दिखाएगी।
वहीं, अभी तक अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल बनाने में समय लगता है। एलवीसीसीएस के बाद यह काम आसान हो जाएगा। ऑब्जर्वेशन पोस्ट, कमांड पोस्ट और फायरिंग यूनिट्स एक ही सिस्टम से जुड़े होंगे। इससे जानकारी तुरंत शेयर होगी और आदेश भी तुरंत पहुंचेंगे।
यह सिस्टम इलाके की पूरी जानकारी देता है, जैसे कौन सा इलाका ऊंचा है, कहां रुकावट है और कहां से फायर ज्यादा असर करेगा। इससे हथियारों को सही जगह तैनात करना आसान होगा। गलत जगह फायरिंग करने की संभावना कम होगी और असर ज्यादा होगा।
एलवीसीसीएस सिर्फ फायरिंग तक ही सीमित नहीं है, यह लॉजिस्टिक्स पर भी नजर रखता है। किस यूनिट के पास कितना गोला-बारूद है, किसे जरूरत है और कहां सपोर्ट भेजना है, यह सब जानकारी सिस्टम में मिलेगी। इससे सप्लाई में तेजी आएगी। (LVCCS Indian Army)
प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट से शुरुआत
अभी इस प्रोजेक्ट की शुरुआत प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट यानी पीओसी से होगी। इसमें एक ब्रिगेड स्तर पर इस सिस्टम को टेस्ट किया जाएगा। इसमें 155 मिमी बोफोर्स गन और स्मर्च रॉकेट सिस्टम को जोड़कर देखा जाएगा कि सिस्टम कैसे काम करता है। अगर यह सफल रहा तो इसे धीरे-धीरे पूरे आर्मी स्तर पर लागू किया जाएगा।
सोर्स कोड सेना के पास
इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि इसका पूरा सोर्स कोड सेना के पास रहेगा। कोई बाहरी कंपनी इस सिस्टम पर कंट्रोल नहीं रखेगी। सभी डेटा और तकनीक सेना के पास ही रहेगी। इसके अलावा सिस्टम का सिक्योरिटी ऑडिट भी किया जाएगा ताकि किसी तरह की साइबर वल्नरेबिलिटी न रहे।
मेंटेनेंस और सपोर्ट
एलवीसीसीएस को 10 साल तक इस्तेमाल में रखने की योजना है। इसके साथ 3 साल की वारंटी और लंबे समय तक तकनीकी सपोर्ट भी दिया जाएगा। इसमें ट्रेनिंग, रिपेयर और अपग्रेड की सुविधा भी शामिल होगी, ताकि सिस्टम हमेशा अपडेट बना रहे।
इस प्रोजेक्ट के लिए भारतीय कंपनियों को मौका दिया जाएगा। उन्हें अपनी क्षमता और अनुभव के आधार पर चुना जाएगा। सरकार चाहती है कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी हो और इसमें ज्यादा से ज्यादा भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हो। (LVCCS Indian Army)


