IAF Civil Services Support Survey: भारतीय वायु सेना के अंदर एक ऐसा बदलाव शुरू हुआ है, जो अफसरों के करियर को एक नई दिशा दे सकता है। वायु सेना ने अपने अधिकारियों के करियर को लेकर एक अहम कदम उठाया है। एयर मुख्यालय की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र में यह संकेत दिया गया है कि अब सेना अपने अधिकारियों को यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी में मदद करने की संभावना तलाश रही है। इसके लिए पूरे संगठन में एक डिमांड सर्वे शुरू किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि कितने अधिकारी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
यह पहल खास तौर पर उन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो सैन्य सेवा के बाद प्रशासनिक क्षेत्र में जाना चाहते हैं।
IAF Civil Services Support Survey: एयर हेडक्वार्टर से जारी हुआ आधिकारिक पत्र
23 अप्रैल को एयर मुख्यालय से एक पत्र जारी किया गया। यह पत्र सभी कमांड एजुकेशन ऑफिसर्स को भेजा गया है, जिनमें वेस्टर्न, साउथ वेस्टर्न, सेंट्रल, ईस्टर्न, साउदर्न, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और अंडमान-निकोबार कमांड शामिल हैं।
सभी कमांड्स के एजुकेशन ऑफिसर्स को निर्देश दिया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्र में अफसरों के बीच “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” पर सर्वे कराएं। जिसके तहत वायुसेना यह जानना चाहती है कि कितने अफसर भविष्य में प्रशासनिक सेवाओं जैसे आईएएस, आईपीएस या आईएफएस में जाना चाहते हैं और क्या उन्हें इसके लिए संस्थागत मदद दी जानी चाहिए।
किन अफसरों के लिए है यह सर्वे
इस सर्वे का केंद्र बिंदु शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारी हैं। ये वे अधिकारी होते हैं जो आम तौर पर 10 से 14 साल की सेवा के बाद सेना से बाहर आते हैं और उसके बाद उन्हें नई करियर दिशा तलाशनी होती है।
ऐसे अफसरों के सामने अक्सर यह सवाल होता है कि आगे क्या किया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए वायु सेना अब उन्हें सिविल सर्विस की तैयारी में मदद देने का विकल्प देख रही है।
किन अधिकारियों को मिलेगा मौका
पत्र में साफ किया गया है कि यह सर्वे उन सभी अधिकारियों के लिए है, जिन्होंने कम से कम 5 साल की सेवा पूरी कर ली है। इसमें एसएससी अधिकारियों के साथ-साथ परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।
हालांकि परमानेंट कमीशन यानी पीसी अफसर भी इस सर्वे में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें सामान्य यूपीएससी प्रक्रिया से ही गुजरना होगा। उनके लिए किसी विशेष सुविधा की बात अभी नहीं कही गई है।
एयर फोर्स ने अपनी सभी यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र के सभी इच्छुक अधिकारियों तक यह जानकारी पहुंचाएं और उन्हें सर्वे में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।
सभी इच्छुक अधिकारियों को एजुकेशन डायरेक्टरेट के पोर्टल पर जाकर एक प्रोफॉर्मा भरना होगा। इस प्रोफॉर्मा के जरिए यह जानकारी ली जा रही है कि कितने अफसर गंभीरता से सिविल सर्विस की तैयारी करना चाहते हैं।
इस सर्वे की अंतिम तारीख 8 मई तय की गई है, इसलिए इसे तेजी से पूरा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम के जरिए आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य ग्रुप ए सेवाओं में भर्ती होती है। इसमें देशभर से लाखों उम्मीदवार हिस्सा लेते हैं।
बढ़ेगा सिविल-मिलिट्री फ्यूजन
वायुसेना की इस पहल को “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। ताकि मिलिट्री और सिविल प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। अगर एयर फोर्स के अधिकारी सिविल सर्विस में जाते हैं, तो वे अपने साथ सैन्य अनुभव, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता भी लेकर जाएंगे, जो प्रशासन में काम आ सकती है।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल अमोल अवाते का कहना है कि अगर यह पहल सही है, तो यह एक अच्छा और आगे की सोच वाला कदम है, खासकर शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारियों के लिए। इससे उन्हें सिविल सर्विस में जाने का एक साफ और तय रास्ता मिल सकता है।
उनके मुताबिक, सेना के अधिकारी अपने साथ कई अहम गुण लेकर आते हैं। उनमें अनुशासन होता है, ईमानदारी होती है, नेतृत्व की क्षमता होती है और दबाव में फैसले लेने की आदत होती है। इसके साथ ही वे कठिन परिस्थितियों में काम करने और संसाधनों को सही तरीके से संभालने का अनुभव रखते हैं। आज के जटिल प्रशासनिक माहौल में ये सभी गुण बहुत जरूरी हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले सावधानी से सोचना होगा, खासकर परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारियों के मामले में। मेडिकल कैटेगरी, प्रमोशन पर असर और छोटे अनुशासनिक मामलों जैसे मुद्दों को स्पष्ट नियमों के जरिए तय करना जरूरी होगा। इसके साथ ही वेतन सुरक्षा और वरिष्ठता को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि सबके साथ न्याय हो सके और ज्यादा लोग इसमें भाग लेने के लिए आगे आएं।
उन्होंने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसे मॉडल पहले भी रहे हैं और आज भी कई देशों में, साथ ही भारत में सीएपीएफ, राज्य पुलिस और पीएसयू में काम कर रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि यह व्यवस्था संभव भी है और उपयोगी भी।
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मिले विकल्प
वहीं, रिटायर्ड कमोडोर विनय कुमार कुशवाहा का कहना है कि सशस्त्र सेनाओं के स्थायी कमीशन अधिकारियों के साथ मौजूदा व्यवस्था में समानता नहीं है। अभी इन अधिकारियों को पेंशन पाने के लिए कम से कम 20 साल की सेवा करनी पड़ती है, जबकि सिविल सेवाओं में कम समय के बाद भी सेवानिवृत्ति के विकल्प मिल जाते हैं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी/भारतीय सैन्य अकादमी/वायु सेना अकादमी में चार साल को भी सेवा में जोड़ते हुए कुल 15 साल की सेवा के बाद अधिकारियों को प्रोराटा पेंशन के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प दिया जाए। इससे अधिकारी कम उम्र में ही सिविल सेवा या अन्य क्षेत्रों में दूसरा करियर शुरू कर सकेंगे।
उनके मुताबिक, इससे सेना के अधिकारियों के अनुभव और नेतृत्व का बेहतर उपयोग होगा, मनोबल बढ़ेगा और युवा अधिकारियों को आगे बढ़ने के मौके मिलेंगे। साथ ही, सरकार पर लंबे समय का पेंशन बोझ भी कम हो सकता है।
साथ ही, यह सुधार सशस्त्र बलों के भीतर स्वस्थ संगठनात्मक वातावरण बनाएगा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ सिविल-मिलिट्री फ्यूजन को मजबूत करेगा।
Operation Sindoor Anniversary: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने के मौके पर 7 और 8 मई को जयपुर में भारतीय सेना की साउथ वेस्टर्न कमांड यानी सप्तशक्ति कमाांड में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है। जिसमें तीनों सेनाएं थल सेना, वायु सेना और नौसेना की टॉप लीडरशिप पिछले ऑपरेशनों की समीक्षा से लेकर भविष्य की सैन्य रणनीति तक हर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करेगी। इस बार इस कॉन्फ्रेंस का सबसे बड़ा केंद्र जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर रहने वाला है, जिसे महीने के आखिर तक पूरी तरह तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।
पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद 7 मई की रात भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना ने मिलकर ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और पीओके के अंदर मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया।
कार्रवाई बेहद कम समय में पूरी की गई, लेकिन उसका असर कई दिनों तक दिखाई दिया। सेना के अंदर इसे एक ऐसे ऑपरेशन के तौर पर देखा गया, जिसने जॉइंट मिलिट्री आपरेशन की जरूरत को और स्पष्ट कर दिया।
Operation Sindoor Anniversary: क्या होने वाला है जयपुर में
जयपुर में होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में सीडीएस जनरल अनिल चौहान, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के अलावा तीनों सेनाओं के वरिष्ठ कमांडर शामिल होंगे।
यहां ऑपरेशन सिंदूरकी पूरी समीक्षा की जाएगी। यह देखा जाएगा कि ऑपरेशन के दौरान क्या मजबूत रहा और किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। इसके साथ ही पाकिस्तान और चीन से जुड़े सुरक्षा हालात पर भी विस्तार से चर्चा होगी।
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “यह कॉन्फ्रेंस सिर्फ समीक्षा नहीं है, बल्कि आने वाले समय की तैयारी का पूरा रोडमैप तय करने का मंच है।”
खास बात यह है कि सात मई को ही जयपुर में एक बेहद अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस भी होने वाली है, जिसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ रहे लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई, वायुसेना के डीजी एयर ऑपरेशंस रहे एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती, और डीजी नेवल ऑपरेशंस वाइस एडमिरल एएन प्रमोद संबोधित करेंगे। बता दें कि ये तीनों वही अफसर हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद 6-7 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।
माना जा रहा है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद अहम एलान हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर बनाने को लेकर भी एलान हो सकता है।
क्या है जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर यानी जेओसी एक ऐसा केंद्रीय सिस्टम है, जहां तीनों सेनाओं की जानकारी और ऑपरेशन एक साथ जुड़ेंगे। यह सेंटर नई दिल्ली में बनाया जा रहा है और इसे मई 2026 के अंत तक पूरी तरह शुरू करने की योजना है। इसका मकसद अलग-अलग काम कर रही सेनाओं को एक साथ लाकर एक ही दिशा में काम करना है।
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने हाल ही में एक इवेंट में कहा था, “जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर जॉइंटनेस को मजबूत करने का एक बड़ा कदम है और इसे जल्द ही पूरी तरह ऑपरेशनल कर दिया जाएगा।”
कैसे काम करेगा यह सेंटर
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर का काम सिर्फ जानकारी इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि उसे समझकर तुरंत निर्णय लेने में मदद करना है। अभी तक तीनों सेनाएं अपने-अपने सिस्टम के जरिए काम करती थीं, लेकिन अब सभी डेटा एक ही जगह पर आएगा।
इस सेंटर में रियल टाइम डेटा शेयरिंग होगी। यानी जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस से जुड़ी जानकारी एक साथ दिखाई देगी। इसे कॉमन ऑपरेटिंग पिक्चर कहा जाता है।
जब किसी ऑपरेशन की योजना बनेगी, तो तीनों सेनाओं के अधिकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर बैठकर फैसला ले सकेंगे। इससे समय बचेगा और फैसले लेने की रफ्तार बढ़ेगी।
मल्टी डोमेन ऑपरेशन का बनेगा आधार
आज के युद्ध सिर्फ जमीन या हवा तक सीमित नहीं रहे हैं। अब साइबर अटैक, ड्रोन, सैटेलाइट और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। इसी को मल्टी डोमेन ऑपरेशन कहा जाता है।
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इन सभी क्षेत्रों को जोड़ने का काम करेगा। अगर कहीं सीमा पर हलचल होती है, तो उसका डेटा तुरंत एयर और नेवी तक भी पहुंच जाएगा।
एक अधिकारी के अनुसार, “अब युद्ध का फैसला तेजी से लेने वाले पक्ष के हाथ में होता है, इसलिए डेटा और निर्णय का एक साथ होना जरूरी है।”
OODA लूप को तेज करने की कोशिश
सैन्य भाषा में एक प्रक्रिया होती है, ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट। इसे ओओडीए लूप कहा जाता है। इसका मतलब है कि पहले स्थिति को देखो, समझो, फैसला लो और फिर कार्रवाई करो।
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर का मकसद इसी प्रक्रिया को तेज करना है। जितनी जल्दी फैसला होगा, उतनी ही जल्दी कार्रवाई हो सकेगी।
इस सेंटर के जरिए तीनों सेनाओं के एयर डिफेंस सिस्टम को भी जोड़ा जाएगा। अभी तक सेना, वायु सेना और नौसेना के अपने-अपने सिस्टम थे, लेकिन अब सभी एक साथ काम करेंगे।
कम्युनिकेशन सिस्टम भी इंटीग्रेट किया जा रहा है, ताकि किसी भी ऑपरेशन के दौरान जानकारी में देरी न हो। सुरक्षित मोबाइल कम्युनिकेशन और साझा साइबर सुरक्षा नीति भी इसी का हिस्सा है।
थिएटर कमांड्स की दिशा में कदम
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर को थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अभी भारत में अलग-अलग कमांड हैं, लेकिन भविष्य में उन्हें मिलाकर बड़े थिएटर बनाए जाएंगे। इस दिशा में तीन सेट की सिफारिशें पहले ही सरकार को भेजी जा चुकी हैं। जयपुर कॉन्फ्रेंस में इन पर भी चर्चा होगी।
टेक्नोलॉजी और डेटा पर जोर
2026 को सेना के अंदर “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक” साल के रूप में देखा जा रहा है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में तकनीक और डेटा की भूमिका सबसे अहम हो गई है।
जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इसी सोच का हिस्सा है, जहां डेटा के आधार पर फैसले लिए जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लगातार काम हो रहा है। इसके तहत कम्युनिकेशन, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशन जैसे कई क्षेत्रों में बदलाव किए गए हैं। जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इन्हीं प्रयासों को एक जगह लाकर मजबूत करेगा।
सेना के अंदर इस सेंटर को लेकर काफी समय से काम चल रहा है। अलग-अलग सिस्टम को जोड़ना, डेटा शेयरिंग की व्यवस्था बनाना और अधिकारियों को इसके लिए तैयार करना, ये सभी काम धीरे-धीरे किए गए हैं।
एक अधिकारी ने कहा, “यह बदलाव दिखने में छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे बहुत बड़ा काम हुआ है।”
ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक
इस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी विस्तार से रखा जाएगा। उस ऑपरेशन में मिसाइल, एयर स्ट्राइक और जमीनी कार्रवाई एक साथ हुई थी, लेकिन बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस हुई थी।
सीडीएस ने अपने एक बयान में कहा था, “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन एक धीमी प्रक्रिया है, लेकिन यही भविष्य के युद्ध की जरूरत है।”
7 मई को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े कुछ अहम पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। इसमें ऑपरेशन की योजना, लक्ष्य और उसके परिणामों की जानकारी दी जा सकती है।
Indian Army Bulletproof Troop Carrier: भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में तैनात राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट्स के लिए एक नए तरह के सुरक्षित व्हीकल को खरीदने की तैयारी कर रही है। इसके तहत करीब 159 बुलेट प्रूफ ट्रूप्स कैरियर यानी बीपीटीसी खरीदने की योजना बनाई गई है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह व्हीकल खास तौर पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात जवानों के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन लगातार चलते रहते हैं।
Indian Army Bulletproof Troop Carrier: 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर करेगा काम
बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि यह अलग-अलग तरह के इलाकों में आसानी से काम कर सके। यह व्हीकल मैदानी जगहों के साथ-साथ पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में भी चल सके। इसे करीब 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर ऑपरेट करने के लिए तैयार रहे, जहां आम व्हीकल काम नहीं कर पाते।
इसमें हर मौसम में काम करने की क्षमता होगी। चाहे भारी बारिश हो, बर्फबारी हो या धूल भरे हालात, यह व्हीकल बिना रुकावट के चलता रहेगा। इसके अंदर हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगाया जाए, जिससे केबिन का तापमान कंट्रोल रहे। इससे ठंडे इलाकों में भी जवानों को परेशानी नहीं होगी। यह वाहन बेहद कठिन मौसम में भी काम करने के लिए तैयार हो। इसमें माइनस 5 से माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड और 40 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी में पूरी तरह से ऑपरेशनल रहने की क्षमता हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
30 लोगों के बैठने की व्यवस्था
इस व्हीकल की सबसे बड़ी खूबी इसकी सुरक्षा है। इसमें कुल 30 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी, जिसमें ड्राइवर और को-ड्राइवर के अलावा 28 जवान बैठ सकेंगे। अंदर की सीट्स इस तरह बनाई गई हैं कि जवानों को लंबी दूरी के दौरान भी आराम मिल सके।
इसकी पेलोड क्षमता कम से कम 3 टन हो, ताकि यह भारी मात्रा में सामान और उपकरण एक साथ ले जा सके। वाहन का कुल वजन अधिकतम 20 टन तक हो, जिसमें वाहन का खुद का वजन और उसमें बैठने वाले जवानों का वजन शामिल है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
मजबूत इंजन और बेहतर मोबिलिटी
बीपीटीसी में टर्बोचार्ज्ड डीजल इंजन लगा हो, जो इसे अलग-अलग तरह के रास्तों पर चलने की ताकत देगा। यह 4×4 ड्राइव सिस्टम से लैस होना चाहिए, जिससे जरूरत के अनुसार इसे अलग-अलग मोड में चलाया जा सकेगा। इसकी लंबाई 9 मीटर, चौड़ाई 2.5 मीटर और 3.25 मीटर हो।
इस व्हीकल की स्पीड सड़क पर करीब 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे हो, जबकि खराब इलाकों में इसकी स्पीड 50 से 75 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए। साथ ही, इसकी रेंज भी मैदानी इलाकों के लिए 350 किमी और पहाड़ी इलाकों के लिए 300 किमी रखी गई है, जिससे यह एक बार में सैकड़ों किलोमीटर तक चल सकता है।
इसके साथ इसमें सेल्फ रिकवरी सिस्टम भी हो, यानी अगर व्हीकल कहीं फंस जाए तो यह खुद को बाहर निकाल सके। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
बैलिस्टिक प्रोटेक्शन से लैस
इस व्हीकल की सबसे अहम बात इसका STANAG लेवल-3 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन है। इसे इस तरह तैयार किया जाए कि यह अलग-अलग तरह की गोलियों और हमलों से जवानों को बचा सके।
व्हीकल के सभी हिस्सों, जैसे दरवाजे, दीवारें और छत, को मजबूत बुलेट प्रूफ स्टील से बनाया जाए। इसमें खास तरह का बुलेट रेसिस्टेंट ग्लास लगा हो, जो गोलियों को रोक सके।
इसके अलावा व्हीकल के नीचे वाले हिस्से भी मजबूत हो, ताकि यह ग्रेनेड या विस्फोट जैसे हमलों को झेल सके। इंजन और फ्यूल टैंक को भी अतिरिक्त सुरक्षा का फीचर हो, ताकि हमला होने पर भी व्हीकल तुरंत बंद न हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
लगे हों रन-फ्लैट सिस्टम वाले टायर
बीपीटीसी में ऐसे टायर लगाए जाएं, जो खराब होने के बाद भी कुछ दूरी तक व्हीकल को चलने देंगे। इसे रन-फ्लैट सिस्टम कहा जाता है। इसका मतलब है कि अगर टायर पंचर भी हो जाए तो व्हीकल तुरंत नहीं रुकेगा।
इसमें अतिरिक्त टायर भी दिया जाए, जिससे जरूरत पड़ने पर उसे बदला जा सके। यह सुविधा ऑपरेशन के दौरान बहुत काम आती है, जहां रुकना जोखिम भरा हो सकता है।
इस बुलेटप्रूफट्रूप्स कैरियर में आधुनिक लाइटिंग सिस्टम होना चाहिए, जिसमें एलईडी हेडलाइट्स, फॉग लाइट्स, टेल लाइट्स, ब्रेक लाइट्स और कन्वॉय लाइट्स शामिल हैं। इसके साथ ब्लैकआउट स्विच की सुविधा भी हो, जिससे ऑपरेशन के दौरान जरूरत पड़ने पर पूरी लाइटिंग बंद की जा सके। वाहन पर एंटी-रायट वायर मेश भी लगा हो, जो सुरक्षा को और मजबूत बनाएगा।
गनर हैच और फायरिंग की सुविधा
इस व्हीकल को सिर्फ ट्रांसपोर्ट के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर फायरिंग के लिए भी तैयार हो। इसके ऊपर एक गनर हैच लगा हो, जहां से सैनिक मशीन गन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसके अलावा व्हीकल के दोनों तरफ छोटे-छोटे फायरिंग पोर्ट दिए जाएं, जिनसे अंदर बैठे जवान भी जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकें। इससे यह व्हीकल एक तरह से चलते-फिरते सुरक्षा प्लेटफॉर्म की तरह काम करता है।
बीपीटीसी में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम भी दिया जाएगा। इसमें ऐसे फीचर्स होंगे जो ड्राइवर को मुश्किल रास्तों पर व्हीकल को चलाने में मदद करेंगे।
इसमें 360 डिग्री कैमरा, टक्कर से बचाने वाला सिस्टम, ब्रेकिंग कंट्रोल और ड्राइवर की थकान को पहचानने वाले फीचर्स शामिल होंगे। इससे दुर्घटना की संभावना कम हो जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
बेहतर कंट्रोल और ब्रेकिंग सिस्टम
इस व्हीकल में सभी पहियों पर डिस्क ब्रेक लगे हो और एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम भी दिया गया हो। इससे अचानक ब्रेक लगाने पर भी व्हीकल संतुलित रहेगा।
इसमें एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम यानी एडीएएस लेवल-2 फीचर्स भी अनिवार्य रूप से हो। यह सिस्टम खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, कच्चे रास्तों और कम विजिबिलिटी जैसे कोहरा, बर्फ या धूल भरे माहौल में बेहतर ड्राइविंग में मदद करेगा। इसमें एडाप्टिव क्रूज कंट्रोल दिया गया हो, जो ट्रैफिक के हिसाब से खुद स्पीड को कंट्रोल करे। इसके साथ फॉरवर्ड कोलिजन वार्निंग और ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम भी हो, जो सामने खतरा आने पर वाहन को अपने आप रोक सकता है।
यह व्हीकल ढलान वाले रास्तों पर भी पूरी तरह लोड होने के बावजूद रुक सकता है। यह खासियत पहाड़ी इलाकों में काफी जरूरी मानी जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
आसान रखरखाव और लंबी उम्र
सेना ने आरएफआई में कहा कि बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि इसका रखरखाव आसान हो। इसके अलग-अलग हिस्सों को जरूरत पड़ने पर आसानी से बदला जा सकता है। इससे फील्ड में ही इसकी मरम्मत की जा सकेगी।
इसकी उम्र भी 10 साल या एक लाख किमी रखी गई है, ताकि इसे कई सालों तक इस्तेमाल किया जा सके। इसके साथ कंपनियों को स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस सपोर्ट देना भी जरूरी होगा।
यह पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाई जा रही है और इसे ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी में रखा गया है। इसका मतलब है कि इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी और स्वदेशी तकनीक पर जोर रहेगा।
इस प्रोजेक्ट के तहत चुनी गई कंपनी को तय समय में सभी व्हीकल तैयार करने होंगे। कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद हर तीन साल तक 60 व्हीकलों की डिलीवरी करनी होगी, ताकि सेना को समय पर यह नई क्षमता मिल सके।
सेना की जरूरतों के मुतबिक यह व्हीकल सड़क और रेल दोनों के जरिए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके। इसके साथ कंपनी को ट्रेनिंग के लिए एआर और वीआर वीडियो, सेक्शनाइज्ड मॉडल्स और डिटेल्ड मैनुअल्स भी देने होंगे, ताकि सैनिक इसे सही तरीके से ऑपरेट और मेंटेन कर सकें।
इसमें भाग लेने के लिए कंपनियों को यह भी दिखाना होगा कि उनके पास बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)
Akashteer CADET Air Defence Carriers: भारतीय सेना ने अपनी मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन्स की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 83 कैरियर एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम (CADET) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। ये खास ट्रैक्ड व्हीकल होंगे, जिन पर ‘आकाशतीर’ एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम लगाया जाएगा। इसका मकसद युद्ध के मैदान में टैंक और आर्मर्ड यूनिट्स को एरियल थ्रेट्स से सुरक्षा देना है।
Akashteer CADET Air Defence Carriers: क्या है ‘आकाशतीर’ सिस्टम
‘आकाशतीर’ एक एडवांस्ड एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम है, जिसे डीआडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम अलग-अलग रडार, सेंसर और हथियारों को एक ही नेटवर्क में जोड़ता है।
यह सिस्टम युद्ध के दौरान आसमान में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखता है और तुरंत जानकारी संबंधित यूनिट्स तक पहुंचाता है। इससे फैसले जल्दी लिए जा सकते हैं और खतरे का जवाब तुरंत दिया जा सकता है।
क्यों लगाया जा रहा है ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर
अब तक एयर डिफेंस के कई सिस्टम फिक्स्ड या व्हील्ड प्लेटफॉर्म पर चलते थे। लेकिन समस्या यह थी कि ये टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ हर इलाके में बराबर रफ्तार से नहीं चल पाते थे। टैंक जहां ऊबड़-खाबड़ इलाकों, रेगिस्तान या पहाड़ों में आसानी से आगे बढ़ते हैं, वहीं व्हील्ड सिस्टम कई बार पीछे रह जाते थे।
इसी वजह से अब ‘आकाशतीर’ को ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर लगाया जा रहा है। ये प्लेटफॉर्म टैंकों की तरह ही मुश्किल इलाकों में चल सकते हैं।
कैसे काम करेगा CADET सिस्टम
कैडेट को एक तरह से मोबाइल कमांड पोस्ट माना जा रहा है। यह सीधे आर्मर्ड कॉलम के साथ रहेगा और एयर डिफेंस यूनिट्स को रियल टाइम में जानकारी देता रहेगा। जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या फाइटर जेट जैसे खतरे सामने आएंगे, तो यह सिस्टम तुरंत उनकी जानकारी देगा और हथियारों को एक्टिव करने में मदद करेगा। इससे युद्ध के दौरान प्रतिक्रिया देने का समय काफी कम हो जाएगा और यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित रह सकेंगी। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)
ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर किया डिजाइन
पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कैडेट प्लेटफॉर्म को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि भविष्य में इसमें ड्रोन डिटेक्शन और ड्रोन काउंटर सिस्टम भी जोड़े जा सकें। इससे यह सिस्टम सिर्फ पारंपरिक खतरों के लिए नहीं, बल्कि नए तरह के युद्ध के लिए भी तैयार रहेगा।
इसमें आकाशतीर सिस्टम के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए जाएंगे, जिन्हें सेना खुद उपलब्ध कराएगी। यह वाहन टैंकों की तरह ही हर तरह के मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और पहाड़ों में 5000 मीटर ऊंचाई तक आसानी से चल सकेगा।
इस ट्रैक्ड व्हीकल को बेहद कठिन हालात में काम करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह माइनस 30 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा।
यह एक बार में 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है। सड़क पर इसकी गति करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि कठिन इलाकों में यह करीब 15 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकेगा।
इसमें कम से कम चार लोगों की टीम बैठ सकेगी और उनके लिए अंदर क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम भी होगा, ताकि हर मौसम में काम करना आसान रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)
Akashteer System (Pic: Indian Army)
सुरक्षा और पावर सिस्टम
कैडेट में STANAG लेवल-2 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन भी दिया जाएगा, जिससे यह गोलीबारी और हमलों से कुछ हद तक सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा इसमें एक अलग पावर यूनिट होगी, जो बिना मुख्य इंजन चालू किए भी सिस्टम को करीब छह घंटे तक चला सकेगी। यह सुविधा खासतौर पर तब काम आएगी, जब व्हीकल को किसी एक जगह पर खड़े रहकर निगरानी करनी हो।
इस प्लेटफॉर्म में आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, जो जीपीएस, ग्लोनास और भारत के नाविक सिस्टम से जुड़ेंगे। इससे यह हर स्थिति में अपनी लोकेशन को सटीक तरीके से ट्रैक कर सकेगा। साथ ही, इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी सिस्टम को जैमिंग से बचाया जा सके। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)
रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। इसके तहत 83 सिस्टम खरीदे जाएंगे।
इनकी डिलीवरी एडवांस पेमेंट के बाद 36 महीने के अंदर पूरी करनी होगी। अगर दो कंपनियां इस प्रक्रिया में योग्य पाई जाती हैं, तो ऑर्डर को 60 और 40 प्रतिशत के अनुपात में बांटा जाएगा। इन सिस्टम्स की वारंटी 24 महीने की होगी और इन्हें करीब 20 साल तक इस्तेमाल करने के हिसाब से डिजाइन किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट को ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी के तहत रखा गया है। इसका मतलब है कि इसमें कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही डिजाइन और बनाया जाएगा। इससे देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।
सेना के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम
सेना की मैकेनाइज्ड यूनिट्स टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स युद्ध के दौरान सबसे आगे रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें हवाई हमलों से तुरंत सुरक्षा न मिले, तो उन्हें भारी नुकसान हो सकता है। कैडेट और ‘आकाशतीर’ सिस्टम मिलकर इस कमी को पूरा करेंगे। ये सिस्टम सीधे फ्रंटलाइन पर मौजूद रहकर हर तरह के हवाई खतरे की जानकारी देंगे और उससे निपटने में मदद करेंगे।
इस प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे एयरलिफ्ट भी किया जा सके। यह बड़े सैन्य विमान जैसे सी-17 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में आसानी से ले जाया जा सकेगा। इससे जरूरत पड़ने पर इसे किसी भी इलाके में जल्दी तैनात किया जा सकता है। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)
बदलते युद्ध के अनुसार तैयारी
सेना अब अपने सिस्टम्स को मॉडर्न वॉरफेयर को देखते हुए तैयार कर रही है। आज के समय में नेटवर्क आधारित युद्ध, रियल टाइम डेटा और तुरंत जवाबी कार्रवाई आज की जरूरत बन चुके हैं। कैडेट और ‘आकाशतीर’ इसी दिशा में एक अहम कदम माने जा रहे हैं, जहां जमीन पर चल रही यूनिट्स को आसमान से होने वाले खतरों के खिलाफ लगातार सुरक्षा मिलती रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)
UHLH Helicopter IAF: भारतीय वायुसेना ने अपनी भारी लिफ्ट क्षमता को मजबूत करने के लिए अल्ट्रा हेवी लिफ्ट हेलीकॉप्टर यानी यूएचएलएच के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी की है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से निकाली गई इस प्रक्रिया में ऐसे हेलीकॉप्टर की तलाश की जा रही है जो बेहद भारी वजन उठा सके और कम समय में ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाए। इस प्रस्ताव के तहत तीन हेलीकॉप्टर शुरुआती तौर पर दो साल के लिए डैम्प लीज मॉडल पर लिए जाएंगे, जिसके बाद इन्हें खरीदने का विकल्प भी रहेगा।
UHLH Helicopter IAF: क्या होता है डैम्प लीज मॉडल
डैम्प लीज को आसान भाषा में समझें तो इसमें हेलीकॉप्टर वेंडर से लिया जाता है, लेकिन उसे उड़ाने और ऑपरेट करने की जिम्मेदारी वायुसेना की होती है। यानी मशीन बाहर से आती है, लेकिन उसका इस्तेमाल और मेंटेनेंस इस्तेमाल करने वाला पक्ष संभालता है। इससे ट्रेनिंग, ऑपरेशन और कंट्रोल पूरी तरह सेना के पास रहता है।
इस मॉडल का फायदा यह है कि हेलीकॉप्टर कम समय में उपलब्ध हो जाते हैं और वायुसेना को नई क्षमता जल्दी मिल जाती है। साथ ही बाद में अगर जरूरत लगे तो उसी प्लेटफॉर्म को खरीदा भी जा सकता है। (UHLH Helicopter IAF)
हेलीकॉप्टर में क्या-क्या चाहिए
वायुसेना ने इस आरएफआई में कुछ साफ तकनीकी शर्तें रखी हैं। सबसे अहम शर्त इसकी पेलोड क्षमता है, जो करीब 20 टन होनी चाहिए। यह हेलीकॉप्टर भारी हथियार, वाहन या बड़ी मात्रा में सामान एक बार में ले जा सके।
इसके अलावा इसकी क्रूज स्पीड 230 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा होनी चाहिए, ताकि तेजी से मूवमेंट हो सके। अधिकतम स्पीड इससे भी ज्यादा रखी गई है, जिससे यह जरूरत पड़ने पर तेज ऑपरेशन कर सके।
हेलीकॉप्टर में कम से कम 45 सैनिक बैठ सकें, या इसे ऐसे बदला जा सके कि इसमें 20 स्ट्रेचर के साथ घायल सैनिकों को ले जाया जा सके। इससे यह हेलीकॉप्टर सिर्फ ट्रांसपोर्ट ही नहीं, बल्कि मेडिकल इवैक्यूएशन में भी काम आएगा।
ऊंचाई और मौसम में काम करने की क्षमता
इस हेलीकॉप्टर को ऊंचे इलाकों में उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए। इसके लिए ऑपरेटिंग एल्टीट्यूड करीब 5500 मीटर या उससे अधिक तय किया गया है। यह शर्त खासतौर पर हिमालयी इलाकों को ध्यान में रखकर रखी गई है, जहां ऑक्सीजन कम होती है और उड़ान चुनौतीपूर्ण होती है।
इसके साथ ही हेलीकॉप्टर को हर मौसम में उड़ान भरने के लिए आईएफआर सर्टिफाइड होना जरूरी है। इसका मतलब है कि खराब मौसम या कम विजिबिलिटी में भी यह सुरक्षित उड़ान भर सके।
हो ईड्ब्ल्यूएस सिस्टम से लैस
हेलीकॉप्टरमें एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम भी होना जरूरी है। इसमें रडार वार्निंग रिसीवर और मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम जैसे उपकरण शामिल होंगे, जो खतरे का पहले से पता लगा सकें। इसके साथ काउंटर मेजर डिस्पेंसिंग सिस्टम भी होना चाहिए, जिससे जरूरत पड़ने पर दुश्मन के हमले से बचाव किया जा सके।
ये सभी सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े होने चाहिए, ताकि खतरे की पहचान और प्रतिक्रिया जल्दी हो सके। इससे हेलीकॉप्टर की सर्वाइवल क्षमता बढ़ती है। (UHLH Helicopter IAF)
भारी वजन उठाने और लटकाकर ले जाने की क्षमता
इस हेलीकॉप्टर को सिर्फ अंदर ही नहीं, बल्कि बाहर लटकाकर भी वजन ले जाने की क्षमता होनी चाहिए। इसके लिए लगभग 10 टन तक का अंडरस्लंग लोड उठाने की शर्त रखी गई है। इसके साथ यह भी जरूरी है कि पायलट दिन और रात दोनों समय इस लटकाए गए लोड को देख और मॉनिटर कर सके।
यह क्षमता पहाड़ी इलाकों में बेहद काम आती है, जहां सीधे लैंडिंग संभव नहीं होती और सामान को रस्सी के जरिए नीचे उतारा जाता है।
वायुसेना ने इस हेलीकॉप्टर की उपलब्धता कम से कम 95 प्रतिशत रखने की शर्त रखी है। यानी यह मशीन ज्यादातर समय ऑपरेशन के लिए तैयार रहे। इसके साथ हर महीने करीब 30 घंटे के इस्तेमाल की क्षमता भी तय की गई है। यह शर्त इसलिए रखी गई है ताकि हेलीकॉप्टर सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि लगातार ऑपरेशन में इस्तेमाल हो सके। (UHLH Helicopter IAF)
करनी होगी जल्दी डिलीवरी
इस आरएफआई में सबसे खास बात इसकी डिलीवरी टाइमलाइन है। वेंडर्स को कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद 3 से 6 महीने के अंदर हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने होंगे। यह समय सीमा काफी कम मानी जाती है, जिससे साफ है कि वायुसेना को यह क्षमता जल्द से जल्द चाहिए।
यूएचएलएच हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कई तरह के ऑपरेशन में किया जा सकता है। इनमें भारी हथियार और वाहन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, सीमावर्ती इलाकों में सप्लाई पहुंचाना और आपदा राहत जैसे काम शामिल हैं।
इसके अलावा यह हेलीकॉप्टर घायल सैनिकों को निकालने और कठिन इलाकों में तेजी से सैनिकों की तैनाती के लिए भी उपयोगी होगा। पहाड़ी, रेगिस्तानी और दूर-दराज के इलाकों में इसकी भूमिका अहम मानी जाती है।
मौजूदा फ्लीट और नई जरूरत
भारतीय वायुसेना के पास पहले से कुछ भारी हेलीकॉप्टर मौजूद हैं, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या और क्षमता दोनों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। कुछ पुराने हेलीकॉप्टर अब अपनी उम्र पूरी कर रहे हैं, जबकि नए ऑपरेशन के लिए ज्यादा क्षमता वाले प्लेटफॉर्म की जरूरत है।
इसी वजह से 20 टन क्षमता वाले हेलीकॉप्टर की मांग सामने आई है, जो एक बार में ज्यादा सामान और सैनिकों को ले जा सके। (UHLH Helicopter IAF)
इस पूरी प्रक्रिया को डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें भारतीय और विदेशी दोनों तरह के वेंडर्स भाग ले सकते हैं, लेकिन प्राथमिकता भारतीय लीज कैटेगरी को दी जाएगी। वायुसेना की जरूरत को देखते हुए यह कदम तेजी से क्षमता बढ़ाने के मकसद से उठाया गया है, ताकि बिना लंबी खरीद प्रक्रिया के तुरंत ऑपरेशनल जरूरत पूरी की जा सके।
आरएफआई जारी होने के बाद अब कंपनियां अपनी प्रतिक्रिया देंगी। इसके बाद अगला चरण यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल आएगा, जिसमें तकनीकी और फाइनेंशियल ऑफर मांगे जाएंगे। इस प्रक्रिया के जरिए तय किया जाएगा कि कौन सा हेलीकॉप्टर वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से सबसे उपयुक्त है। (UHLH Helicopter IAF)
NFU for Armed Forces: देश के हजारों सैन्य वेटरंस इन दिनों एक अहम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। मामला है एनएफयू (नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन) का, जो लंबे समय से अदालत और सरकार के बीच फंसा हुआ है। सेना के पूर्व अधिकारी चाहते हैं कि उन्हें भी वही सुविधा मिले, जो सिविल सर्विसेज के अधिकारियों को मिलती है। लेकिन अब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।
NFU for Armed Forces: क्या है पूरा मामला
एनएफयूको लेकर विवाद कोई नया नहीं है। साल 2017 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इससे पहले 2016 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने सरकार को निर्देश दिया था कि सेना के अधिकारियों को भी एनएफयू का लाभ दिया जाए। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा था कि सेना को इससे बाहर रखना “अनुचित और बिना ठोस वजह” के है।
इसके बावजूद यह फैसला लागू नहीं हुआ और मामला आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। पिछले नौ सालों में इस पर कई बार सुनवाई तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से टलती रही। अब वेटरंस को कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है।
सरकारी स्तर पर हुई चर्चा के अनुसार, एक इंटर-मिनिस्ट्रीयल कमेटी ने सेना के अधिकारियों को एनएफयू देने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। कमेटी ने इसके पीछे कई वजहें बताईं हैं। इसमें कहा गया कि इसे लागू करना आसान नहीं होगा, इसमें कानूनी मुश्किलें हैं और इससे सरकार पर हर साल लगभग 800 से 1800 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त भार पड़ सकता है।
एनएफयू आखिर होता क्या है
एनएफयू एक तरह का पे और स्टेटस बेनिफिट है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी अधिकारी को प्रमोशन नहीं मिलता, तब भी उसे समय के साथ उच्च वेतन स्तर मिल जाता है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझें कि अगर एक ही बैच के दो अधिकारी हैं और उनमें से एक को प्रमोशन मिल जाता है, तो दूसरे अधिकारी को भी कुछ समय बाद उसी लेवल का वेतन मिल जाता है, भले ही उसे प्रमोशन न मिला हो। इसका उद्देश्य यह है कि एक ही बैच के अधिकारियों के बीच वेतन में ज्यादा अंतर न हो।
यह व्यवस्था छठे वेतनआयोग के बाद 2006 में लागू की गई थी। शुरुआत में यह सुविधा सिर्फ आईएएस और आईएफएस अधिकारियों को मिली थी, लेकिन बाद में इसे अन्य ग्रुप ‘ए’ सर्विसेज और सीएपीएफ तक बढ़ा दिया गया।
लेकिन सेना को क्यों रखा गया बाहर
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सिविल सर्विसेज को यह सुविधा मिल रही है, तो सेना को इससे बाहर क्यों रखा गया। सरकार का कहना है कि सेना का स्ट्रक्चर और काम करने का तरीका अलग है।
सेना में प्रमोशन पूरी तरह रैंक बेस्ड सिस्टम पर होता है। यहां हर स्तर पर सीमित पद होते हैं और प्रमोशन के लिए सख्त चयन प्रक्रिया होती है। अगर किसी अधिकारी को तय संख्या में मौके मिलने के बाद भी प्रमोशन नहीं मिलता, तो वह उसी रैंक पर रिटायर हो जाता है।
इसके उलट सिविल सर्विसेज में प्रमोशन का तरीका अलग है, जहां सीनियरिटी और फिटनेस के आधार पर आगे बढ़ने के ज्यादा मौके होते हैं।
सरकार का यह भी मानना है कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर रैंक जैसा वेतन दिया गया, तो इससे सेना के चेन ऑफ कमांड सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में कमेटी ने दी रिपोर्ट
हाल ही में एक हाई लेवल कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इस कमेटी ने साफ तौर पर कहा है कि सेना को एनएफयू देना सही नहीं होगा।
रिपोर्ट के अनुसार सेना के सर्विस कंडीशंस सिविल कर्मचारियों से अलग हैं। सेना के जवानों और अधिकारियों को पहले से ही कई खास सुविधाएं जैसे ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन) और एमएसपी (मिलिट्री सर्विस पे) मिलती हैं।
कमेटी ने यह भी कहा कि अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक इस पर सालाना हजारों करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। साथ ही इससे पेंशन सिस्टम में भी बड़े बदलाव करने पड़ेंगे।
वेटरंस क्यों कर रहे हैं विरोध
दूसरी तरफ, मिलिट्री वेटरंस इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं है, बल्कि मुद्दा बराबरी के दर्जे का है।
इस फैसले के बाद कई सैन्य वेटरंस ने नाराजगी जताई है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे और लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया (रिटायर्ड) ने इसे एक बड़ा मौका गंवाना बताया। उनका कहना है कि यह सालों से चली आ रही असमानता को खत्म करने का सही समय था। उनके मुताबिक एनएफयू कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि सेना के अधिकारियों के लिए बराबरी का अधिकार है, खासकर तब जब वे कठिन और जोखिम भरे माहौल में काम करते हैं और फिर भी करियर में रुकावट का सामना करते हैं।
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड) ने भी इस मुद्दे पर साफ राय दी। उन्होंने कहा कि या तो एनएफयू सभी सेवाओं के लिए खत्म कर दिया जाए, या फिर सेना समेत सभी को दिया जाए।
इसी तरह लेफ्टिनेंट कर्नल आर के भारद्वाज (रिटायर्ड) ने एक खुले पत्र में कहा कि सेना और पूर्व सैनिक इस फैसले से बहुत निराश हैं। उन्होंने लिखा कि जहां बाकी सभी सिविल सर्विसेज और सीएपीएफ को एनएफयू का फायदा मिल रहा है, वहीं सेना को इससे बाहर रखना गलत है। उनका कहना है कि इससे सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ रहा है और उनके साथ भेदभाव का हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिकाकर्ता रिटायर्ड कर्नल मुकुल देव का कहना है कि सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारी एनएफयू का लाभ ले रहे हैं, लेकिन सेना को इससे बाहर रखा गया है। उनके मुताबिक यह एक तरह का भेदभाव है।
वेटरंस का यह भी तर्क है कि सेना में प्रमोशन के मौके बहुत सीमित होते हैं। कई अधिकारी 50-54 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं, जबकि सिविल सर्विसेज में रिटायरमेंट उम्र 60 साल है। इस वजह से उन्हें करियर में आगे बढ़ने और ज्यादा कमाने के कम मौके मिलते हैं।
सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सेना को एमएसपी और अन्य भत्ते मिलते हैं, इसलिए एनएफयू की जरूरत नहीं है। लेकिन वेटरंस इस बात से सहमत नहीं हैं।
उनका कहना है कि एमएसपी कोई अतिरिक्त फायदा नहीं है, बल्कि पहले से मिल रहे कई भत्तों को मिलाकर बनाया गया है। इसलिए इसे एनएफयू के बराबर नहीं माना जा सकता।
मौजूदा समय में कमीशंड अधिकारियों (लेफ्टिनेंट से ब्रिगेडियर) को हर महीने करीब 15,500 रुपये एमएसपी मिलता है, जबकि जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) को करीब 5,200 रुपये मिलते हैं।
सेना में कैसे मिलता है प्रमोशन
सेना में करियर ग्रोथ स्ट्रक्चर काफी सीमित है, जिसे पिरामिड जैसा माना जाता है। शुरुआत में सभी अधिकारियों को समय के साथ प्रमोशन मिलता है, लेकिन ऊपरी रैंक पर पहुंचते-पहुंचते मौके बहुत कम हो जाते हैं।
लेफ्टिनेंट, कैप्टन और मेजर रैंक तक लगभग सभी अधिकारियों को प्रमोशन मिल जाता है। लेफ्टिनेंट कर्नल तक भी यह प्रक्रिया टाइम स्केल पर होती है। लेकिन इसके बाद स्थिति बदल जाती है।
कर्नल रैंक पर सिर्फ लगभग 14 फीसदी अधिकारी ही पहुंच पाते हैं। ब्रिगेडियर बनने वालों की संख्या और भी कम होकर करीब 2.79 फीसदी रह जाती है। मेजर जनरल तक पहुंचने वालों की संख्या सीमित रहती है और लेफ्टिनेंट जनरल (हाईएस्ट लेवल) तक सिर्फ लगभग 1 फीसदी से भी कम अधिकारी पहुंच पाते हैं।
इसका मतलब यह है कि ज्यादातर अधिकारी लंबे समय तक सेवा करने के बावजूद पे लेवल 12 या 13 पर ही रुक जाते हैं। प्रमोशन के सीमित अवसरों की वजह से करियर में ठहराव आता है, जिसका असर मनोबल पर पड़ता है।
कमेटी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना और सिविल सर्विसेज के प्रमोशन सिस्टम में मूलभूत अंतर है। सेना में कर्नल और उससे ऊपर के पदों के लिए चयन बोर्ड होते हैं और सीमित मौके मिलते हैं।
अगर अधिकारी इन मौकों में चयनित नहीं होता, तो वह आगे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं रहता। वहीं सिविल सर्विसेज में प्रमोशन के अवसर लगातार बने रहते हैं।
इसी वजह से सरकार का मानना है कि एनएफयू को सेना पर लागू करना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों सिस्टम का स्ट्रक्चर अलग है।
क्यों लंबी खिंच रही है कानूनी लड़ाई, देखें टाइमलाइन
दिसंबर 2016 में दिल्ली की आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसला दिया। यह मामला कर्नल मुकुल देव बनाम भारत सरकार का था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सेना को एनएफयू न देना गलत है और सरकार को इसे लागू करना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने इसे “अनुचित और बिना सही वजह” का फैसला बताया।
इसके बाद सरकार ने इस आदेश को नहीं माना और 2019 में सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तरह का मामला सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) का भी था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में उन्हें एनएफयू का फायदा दे दिया था। लेकिन सेना के मामले में अभी तक फैसला नहीं आया है।
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दोबारा देखने के लिए रक्षा मंत्रालय को एक हाई-लेवल कमेटी बनाने को कहा। इस कमेटी के चेयरमैन फाइनेंशियल एडवाइजर (डिफेंस सर्विसेज) थे। जनवरी 2026 में इस कमेटी ने सेना के प्रतिनिधियों की बात भी सुनी और पूरे मामले का अध्ययन किया।
2026 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि सेना को एनएफयू नहीं दिया जाना चाहिए। इसके पीछे कई कारण बताए गए।
साथ ही कमेटी ने एक और चिंता जताई कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर जैसा वेतन मिलने लगे, तो इससे चेन ऑफ कमांड पर असर पड़ सकता है। कमेटी ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे को आगे 8वें वेतन आयोग में देखा जा सकता है।
अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाखिल किया। इसमें कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई और साफ कहा गया कि सेना को एनएफयू देना उचित नहीं है।
अप्रैल 2026 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस दौरान कई बार सुनवाई की तारीख तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से सुनवाई टल गई।
अब तक इस केस में 75 से ज्यादा बार सुनवाई टली है। 22 अप्रैल 2026 को भी यह मामला सूची में था, लेकिन समय की कमी और जस्टिस जेके माहेश्वरी के रिटायरमेंट के कारण सुनवाई नहीं हो सकी।
मुख्य याचिकाकर्ता कर्नल मुकुल देव (रिटायर्ड) के अनुसार, पिछले 9 साल में इस मामले को सुनने के लिए 5 अलग-अलग बेंच बन चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर हैं, जहां इस मामले में अंतिम फैसला होना बाकी है। वेटरंस उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सिविल सर्विसेज के बराबर दर्जा मिलेगा, जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है।
कितना पड़ेगा आर्थिक बोझ
सीजीडीए (CGDA) के इनपुट के अनुसार, अगर सेना को एनएफयू दिया जाता है, तो इसका वित्तीय असर काफी बड़ा होगा। सिर्फ आर्मी के लगभग 26,182 अधिकारियों पर इसका सालाना खर्च करीब 555.24 करोड़ रुपये आंका गया है। इसी आधार पर नेवी के लगभग 4,945 अधिकारियों पर करीब 106.59 करोड़ और एयरफोर्स के करीब 6,571 अधिकारियों पर लगभग 142.22 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
इस तरह तीनों सेनाओं के लिए कुल मिलाकर सालाना खर्च करीब 804.05 करोड़ रुपये बैठता है।
अगर इसमें पेंशन का असर जोड़ा जाए, तो यह खर्च बढ़कर करीब 1200 करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा, ओआरओपी के तहत पेंशन को दोबारा तय करना पड़ेगा, जिससे खर्च और बढ़ सकता है।
सातवें वेतन आयोग के पूरे 10 साल के दौर में यह खर्च 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है। इसमें ब्याज और अन्य संभावित खर्च शामिल नहीं हैं, जिससे कुल राशि और बढ़ सकती है। सरकार का कहना है कि इतने बड़े वित्तीय बोझ और प्रशासनिक मुश्किलों को देखते हुए एनएफयू लागू करना आसान नहीं है। (Military Veterans Await Supreme Court Verdict on NFU, Demand for Equal Status with Civil Services)
DRDO QKDN Technology: साइबर सिक्योरिटी और सुरक्षित कम्युनिकेशन को लेकर डीआरडीओ बड़ी तैयारी कर रहा है। डीआरडीओ ने क्वांटम टेक्नोलॉजी पर आधारित हैकप्रूफ कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी को और विस्तृत रूप देने जा रहा है। डीआरडीओ ने 500 किमी तक हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन के लिए “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई नोटिस जारी किया है। इसके तहत ‘क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क’ (QKDN) सिस्टम बनाया जाएगा।
क्या है DRDO QKDN Technology?
QKDN का पूरा नाम है क्वांटमकी डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें डेटा को सुरक्षित रखने के लिए क्वांटम फिजिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दो जगहों के बीच एक खास तरह की “की” यानी कोड भेजी जाता है, जो डेटा को एन्क्रिप्ट करती है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति इस कम्युनिकेशन को बीच में पकड़ने की कोशिश करता है, तो सिस्टम तुरंत पहचान लेता है कि कोई हैकिंग की कोशिश कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि क्वांटम सिस्टम में सिग्नल को छूते ही उसकी स्थिति बदल जाती है। इसी वजह से इसे “अनहैकबल” या बेहद सुरक्षित कम्युनिकेशन माना जाता है।
QKDN सिस्टम कैसे करता है काम?
डीआरडीओ के नए प्रोजेक्ट में अब केवल दो पॉइंट के बीच नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को जोड़ने की योजना है। इसका मतलब है कि स्टार, रिंग, हाइब्रिड और पॉइंट-टू-पॉइंट जैसे अलग-अलग नेटवर्क टोपोलॉजी में यह सिस्टम काम करेगा।
इस प्रोजेक्ट का टारगेट है कि लगभग 500 किलोमीटर तक की दूरी में सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाया जाए। इसके लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स और सॉफ्टवेयर डिफाइंड नेटवर्किंग (SDN) का इस्तेमाल किया जाएगा। एसडीएन एक ऐसा सिस्टम होता है, जिसमें नेटवर्क को सॉफ्टवेयर के जरिए कंट्रोल किया जाता है, जिससे उसे जरूरत के हिसाब से जल्दी बदला जा सके।
स्वदेशी तकनीक पर फोकस
इस प्रोजेक्ट में COTS यानी कमर्शियल ऑफ द शेल्फ प्रोडक्ट्स का स्वदेशी वर्जन इस्तेमाल किया जाएगा। यानी भारत में ही बने हुए सिस्टम को नेटवर्क में लगाया जाएगा और उसे एसडीएन के साथ जोड़ा जाएगा।
डीआरडीओ की योजना है कि यह पूरा सिस्टम देश में ही डिजाइन और डेवलप हो, ताकि डिफेंस और अन्य महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए पूरी तरह सुरक्षित और कंट्रोल्ड नेटवर्क तैयार किया जा सके।
इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 500 किलोमीटर के नेटवर्क को कवर करने के लिए कई क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स लगाई जाएंगी। इनमें डीपीएस क्यूकेडी (Differential Phase Shift) और सीओडब्ल्यू क्यूकेडी (Coherent One-Way) यूनिट्स शामिल होंगी, जो नेटवर्क में अलग-अलग जगहों पर लगाकर पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाएंगी। इसके साथ एसडीएन के जरूरी कंपोनेंट्स भी लगाए जाएंगे।
हालांकि डीआरडीओ ने साफ किया है कि ये संख्या और डिजाइन भविष्य में बदल भी सकते हैं, क्योंकि यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है और आगे की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव किया जाएगा।
पहले भी हो चुके हैं सफल परीक्षण
भारत में क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम नया नहीं है। पहले भी डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर कई अहम टेस्ट किए हैं। साल 2022 में पहली बार प्रयागराज और विंध्याचल के बीच 100 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया गया था। यह देश का पहला इंटर-सिटी क्यूकेडी डेमो था, जिसमें टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल किया गया था।
इससे पहले 2020 में हैदराबाद में डीआरडीओ की दो लैब्स के बीच भी क्यूकेडी का शुरुआती टेस्ट किया गया था। इसके बाद 2024 में 100 किलोमीटर लंबी फाइबर लाइन पर क्वांटम की ट्रांसमिशन को सफलतापूर्वक दिखाया गया।
फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन में बड़ी उपलब्धि
पिछले साल 16 जून को डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिल कर बिना फाइबर की मदद के हवा के जरिए क्वांटम कम्युनिकेशन का डेमो किया गया था। इस प्रयोग में एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर लेजर आधारित ऑप्टिकल लिंक के जरिए सुरक्षित की ट्रांसफर की गई।
इस दौरान सिक्योर की रेट करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड रहा और एरर रेट 7 प्रतिशत से कम था, जो इस तरह के सिस्टम के लिए अच्छा माना जाता है। इस तरह का फ्री-स्पेस सिस्टम पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में बेहद उपयोगी है, जहां फाइबर केवल बिछाना मुश्किल होता है।
क्यों जरूरी है यह तकनीक
आज के डिजिटल युग में जहां डेटा ही सबसे बड़ी ताकत है, उनमें ज्यादातर कम्युनिकेशन सिस्टम क्लासिकल एन्क्रिप्शन पर आधारित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे क्वांटम कंप्यूटर विकसित हो रहे हैं, वैसे-वैसे पुराने एन्क्रिप्शन सिस्टम को हैक करने का खतरा बढ़ रहा है। DRDO QKDN Technology भारत के सिक्योरिटी सिस्टम में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। क्योंकि 500 किमी तक बनने वाले इस हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन नेटवर्क के तैयार होने से न केवल हमारी सैन्य सूचनाएं सुरक्षित होंगी, बल्कि दुश्मन के बड़े से बड़े साइबर अटैक भी पूरी तरह विफल हो जाएंगे।
ऐसे में क्यूकेडी और क्यूकेडीएन जैसी तकनीक भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। इसका इस्तेमाल डिफेंस कम्युनिकेशन, बैंकिंग नेटवर्क, डेटा सेंटर, 5जी और 6जी नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां डेटा की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी होती है। (DRDO QKDN Technology)
AAP vs WhAP vs Stryker: डीआरडीओ ने दो नए एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पेश किए हैं। इनमें एक ट्रैक्ड यानी चेन वाला व्हीकल है और दूसरा व्हील्ड यानी पहियों पर चलने वाला 8×8 प्लेटफॉर्म है। इन दोनों को महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में स्थित व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (VRDE) में लॉन्च किया गया। वहीं, इसके एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) का व्हील्ड वर्जन को पुराने व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) का आधुनिक विकल्प माना जा रहा है। साथ ही, नया AAP अमेरिका के स्ट्राइकर को कड़ी टक्कर दे रहा है।
AAP vs WhAP vs Stryker: पूरी तरह देश में डिजाइन और डेवलप
ये दोनों आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पूरी तरह भारत में डिजाइन और डेवलप किए गए हैं। इन्हें आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। आज के समय में सेना को ऐसे वाहनों की जरूरत होती है जो तेज हों, ज्यादा सुरक्षित हों और अलग-अलग तरह के मिशन में इस्तेमाल किए जा सकें।
इसी को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओने ट्रैक्ड और व्हील्ड दोनों तरह के वर्जन बनाए हैं, ताकि अलग-अलग इलाकों में इन्हें इस्तेमाल किया जा सके। (AAP vs WhAP vs Stryker)
30 मिमी क्रूलेस टरेट सबसे बड़ी खूबी
इन प्लेटफॉर्म्स की सबसे बड़ी खासियत इन पर लगा 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसका मतलब है कि इस टरेट में कोई क्रू बैठता नहीं है, बल्कि इसे रिमोट कंट्रोल या ऑटोमेटेड सिस्टम से चलाया जाता है।
इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप लगी है, साथ में 7.62 मिमी पीकेटी मशीन गन भी है। इसके अलावा यह एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी एटीजीएम भी लॉन्च कर सकता है।
यह वाहन दुश्मन के टैंक, बंकर और लो-फ्लाइंग टारगेट्स पर हमला कर सकता है। टरेट का डिजाइन ऐसा है कि इसे अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बदला भी जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled)
खराब रास्तों पर चल सकता है
इन दोनों प्लेटफॉर्म्स में हाई पावर इंजन और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन दिया गया है। इससे ये तेजी से चलते हैं और मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से आगे बढ़ते हैं।
इनका पावर टू वेट रेशियो बेहतर रखा गया है, यानी कम वजन में ज्यादा ताकत मिलती है। इससे यह वाहन ऊंची चढ़ाई, कीचड़, रेत और पत्थरीले इलाकों में भी आसानी से आगे बढ़ सकता है।
ट्रैक्ड वर्जन खास तौर पर पहाड़ और जंगल जैसे कठिन इलाकों के लिए उपयोगी है, जबकि व्हील्ड वर्जन सड़क और खुले मैदान में तेजी से चल सकता है।
एम्फीबियस क्षमता
इन प्लेटफॉर्म्स में एम्फीबियस क्षमता भी दी गई है, यानी यह पानी में भी चल सकते हैं। इसमें हाइड्रो जेट्स लगाए गए हैं, जिनकी मदद से यह नदी या तालाब जैसे पानी के रास्तों को पार कर सकते हैं।
सुरक्षा के लिए मजबूत प्रोटेक्शन
इन वाहनों में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। इन्हें STANAG लेवल 4 और लेवल 5 प्रोटेक्शन के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जो नाटो का एक स्टैंडर्ड है।
इस पर भारी गोलीबारी और ब्लास्ट का भी कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर ब्लास्ट और बैलिस्टिक प्रोटेक्शन दिया गया है, जिसे जरूरत के हिसाब से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे वाहन के अंदर बैठे सैनिक सुरक्षित रहते हैं।
इन प्लेटफॉर्म्स में करीब 65 प्रतिशत तक स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसे आगे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है।
इन प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों की भी अहम भूमिका रही है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज लिमिटेड ने इसमें सहयोग किया है। इसके अलावा कई छोटे और मझोले उद्योगों ने भी इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया है। इससे देश का डिफेंस इंडस्ट्री इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
ट्रैक्ड और व्हील्ड वर्जन में क्या है अंतर
भारत का भूगोल काफी अलग-अलग तरह का है, जिसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदान शामिल हैं। इसी वजह से सेना को अलग-अलग तरह के वाहनों की जरूरत होती है। एक पहियों पर चलता है (व्हील्ड 8×8) और दूसरा चेन या ट्रैक पर (ट्रैक्ड)। सेना दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग परिस्थितियों में करती है, क्योंकि दोनों की ताकत अलग है।
स्पीड की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म सड़क पर काफी तेज चलता है। इसकी रफ्तार आम तौर पर 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इसलिए यह लंबी दूरी जल्दी तय कर सकता है। वहीं ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म की स्पीड कम होती है, लगभग 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा, लेकिन इसकी असली ताकत स्पीड नहीं बल्कि कठिन इलाकों में चलने की क्षमता है।
जबकि ट्रैक्ड वाहन मिट्टी, बर्फ, पहाड़ और जंगल जैसे इलाकों में आसानी से चलता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन को पकड़कर आगे बढ़ते हैं। वहीं व्हील्ड वाहन ऐसे इलाकों में चल तो सकता है, लेकिन उसकी क्षमता सीमित होती है। यही वजह है कि पहाड़ी या दलदली इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।
वहीं, मेंटेनेंस के मामले में व्हील्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा आसान होता है। इसके पार्ट्स जल्दी बदल जाते हैं और खर्च भी कम आता है। ट्रैक्ड वाहन में चेन सिस्टम होता है, जिसकी देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है और खर्च भी ज्यादा होता है। इसलिए लंबे समय तक ऑपरेशन के लिए व्हील्ड प्लेटफॉर्म लॉजिस्टिक के लिहाज से आसान रहता है।
आवाज और स्टील्थ यानी छिपकर चलने की क्षमता भी अहम होती है। व्हील्ड वाहन कम आवाज करता है, जिससे दुश्मन को इसकी मौजूदगी का पता लगाना मुश्किल होता है। ट्रैक्ड वाहन ज्यादा आवाज करता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन से रगड़ खाते हुए चलते हैं। इस वजह से सरप्राइज मूवमेंट में व्हील्ड प्लेटफॉर्म को फायदा मिलता है।
वजन और ट्रांसपोर्ट के मामले में भी अंतर है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म आमतौर पर हल्का होता है, करीब 24 से 26 टन के आसपास, इसलिए इसे पुलों से पार कराना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान होता है। ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भारी होता है और इसके लिए मजबूत पुल या खास ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है।
फायरिंग के दौरान स्थिरता की बात करें तो यहां ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म आगे रहता है। इसकी ग्रिप मजबूत होती है, जिससे चलते समय भी गन ज्यादा सटीक फायर कर सकती है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म में भी अच्छी स्टैबिलिटी होती है, लेकिन ट्रैक्ड जितनी नहीं। इसलिए भारी कॉम्बैट में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म को बेहतर गन प्लेटफॉर्म माना जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
इस्तेमाल की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म मैदान, रेगिस्तान, शहर और हाईवे जैसे इलाकों के लिए बेहतर है। यह काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में भी काम आता है, जहां तेजी से मूव करना जरूरी होता है। दूसरी तरफ ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पहाड़, जंगल और भारी लड़ाई वाले इलाकों के लिए बनाया जाता है, जहां जमीन कठिन होती है और ज्यादा ग्रिप की जरूरत होती है।
भारतीय सेना को दोनों तरह के प्लेटफॉर्म इसलिए चाहिए क्योंकि देश का भूगोल बहुत अलग-अलग तरह का है। पंजाब और राजस्थान जैसे मैदान और रेगिस्तान वाले इलाकों में व्हील्ड प्लेटफॉर्म तेजी से काम करता है। वहीं लद्दाख, हिमालय और उत्तर-पूर्व के इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद रहता है, क्योंकि वहां बर्फ, कीचड़ और ढलान ज्यादा होती है।
इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इन्हें अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
इनका इस्तेमाल इंफैंट्री कॉम्बैट, टोही मिशन, कमांड पोस्ट और एंटी टैंक ऑपरेशन जैसे कई रोल में किया जा सकता है। इससे एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
DRDO unveils next-gen Armoured Platforms 🇮🇳🔥
Defence Research and Development Organisation has unveiled Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled) at Ahilyanagar, Maharashtra—designed to meet evolving battlefield requirements. The platforms were launched by Samir V Kamat.… pic.twitter.com/zECq1K6omz
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) April 25, 2026
WhAP और नए AAP में क्या है अंतर
WhAP पहला मजबूत बेस था, और AAP उसी का अगला, ज्यादा एडवांस्ड वर्जन है। WhAP 8×8 दरअसल डीआरडीओ और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का बनाया हुआ एक पहियों वाला आर्मर्ड वाहन था। इसे इंफैंट्री को सुरक्षित तरीके से ले जाने और जरूरत पड़ने पर लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसमें सैनिक अंदर बैठकर मूव करते थे और ऊपर लगे टरेट से फायरिंग होती थी। पुराने WhAP में आमतौर पर मैन्ड टरेट लगाया जाता था, यानी टरेट के अंदर भी सैनिक बैठता था, या फिर कुछ मामलों में रिमोट कंट्रोल्ड वेपन सिस्टम लगाया जाता था।
तकनीकी तौर पर WhAP करीब 24 टन वजन का होता है और इसमें लगभग 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया जाता है। यह पानी में भी चल सकता है, यानी इसमें एम्फीबियस क्षमता होती है। सुरक्षा के लिए इसमें STANAG लेवल 3 से 4 तक का प्रोटेक्शन दिया गया था, जो गोलियों और छोटे ब्लास्ट से बचाव करता है। इस प्लेटफॉर्म को मोरक्को जैसे देशों को एक्सपोर्ट भी किया गया और भारत में कुछ सुरक्षा बलों ने भी इसका इस्तेमाल किया। (AAP vs WhAP vs Stryker)
वहीं, नए Advanced Armoured Platform यानी AAP की बत करें, तो यह उसी WhAP का अगला और ज्यादा आधुनिक रूप है। सबसे बड़ा बदलाव इसके टरेट में है। नए AAP में 30 मिमी का क्रूलेस टरेट लगाया गया है। क्रूलेस का मतलब है कि टरेट के अंदर कोई सैनिक नहीं बैठता, बल्कि इसे पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हैं और उन्हें सीधे खतरे का सामना नहीं करना पड़ता।
इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप के साथ 7.62 मिमी की मशीन गन भी लगी होती है। इसके अलावा इसमें एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM लॉन्च करने की क्षमता भी होती है। सुरक्षा के मामले में भी नया AAP काफी आगे है। इसमें STANAG लेवल 4 और 5 तक का प्रोटेक्शन दिया गया है, जो पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। इसमें मॉड्यूलर आर्मर लगाया गया है, यानी जरूरत के हिसाब से सुरक्षा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे यह अलग-अलग ऑपरेशन के हिसाब से खुद को ढाल सकता है।
डिजाइन की बात करें तो AAP पूरी तरह मॉड्यूलर है। एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग रोल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे इसे इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, कमांड पोस्ट, रेकी व्हीकल या मोर्टार कैरियर में बदला जा सकता है।
मोबिलिटी यानी चलने-फिरने की क्षमता भी बेहतर की गई है। इसमें हाई पावर इंजन और बेहतर पावर-टू-वेट रेशियो दिया गया है, जिससे यह तेज रफ्तार से चल सकता है और मुश्किल रास्तों को पार कर सकता है। पानी में चलने के लिए इसमें बेहतर हाइड्रो जेट सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसकी एम्फीबियस क्षमता पहले से ज्यादा प्रभावी हो गई है।
इसके अलावा इसमें रन-फ्लैट टायर्स भी होते हैं, यानी अगर टायर को नुकसान भी हो जाए, तब भी वाहन कुछ दूरी तक चलता रह सकता है। साथ ही इसमें एडवांस्ड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो युद्ध के दौरान बेहतर जानकारी और कंट्रोल देते हैं।
वहीं ट्रैक्ड AAP एक बिल्कुल अलग और नया प्लेटफॉर्म है। इसे ट्रैक्ड इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के तौर पर डेवलप किया गया है, जो भविष्य में पुराने बीएमपी-2 जैसे वाहनों की जगह ले सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
स्ट्राइकर और 8×8 AAP में क्या है अंतर
स्ट्राइकरऔर भारत का नया एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) दोनों ही 8×8 व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल हैं, लेकिन इनका डिजाइन और इस्तेमाल अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है। स्ट्राइकर अमेरिकी सेना के लिए बना एक हल्का और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है, जबकि AAP भारत की परिस्थितियों—जैसे ऊंचाई, नदियां और अलग-अलग इलाकों—को ध्यान में रखकर तैयार किया गया नया और ज्यादा एडवांस्ड सिस्टम है।
वजन की बात करें तो स्ट्राइकर का वजन 16.5 से 19 टन के बीच है। वहीं AAP का वजन ज्यादा है, लगभग 24 से 26 टन। हल्का होने की वजह से स्ट्राइकर को एयरक्राफ्ट (जैसे सी-130) से आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। लेकिन ज्यादा वजन होने के बावजूद AAP में ताकत ज्यादा मिलती है।
इंजन पावर की बात करें, तो स्ट्राइकर में लगभग 350 हॉर्सपावर का इंजन होता है, जबकि AAP में करीब 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया गया है। AAP कठिन इलाकों जैसे पहाड़ या ऊंचाई वाले क्षेत्र में बेहतर काम कर सकता है। इसका पावर-टू-वेट रेशियो भी ज्यादा है, जो लगभग 24-25 एचपी/टन के आसपास माना जाता है, जबकि स्ट्राइकर में यह करीब 17-18 एचपी/टन है।
स्पीड दोनों की लगभग बराबर है। सड़क पर दोनों 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकते हैं। लेकिन असली फर्क पानी में देखने को मिलता है। स्ट्राइकर पूरी तरह एम्फीबियस नहीं है, सिर्फ सीमित पानी (फोर्डिंग) पार कर सकता है। दूसरी तरफ AAP में हाइड्रो जेट्स लगे होते हैं, जिससे यह पानी में 8 से 10 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है।
प्रोटेक्शन की बात करें, तो स्ट्राइकर में STANAG लेवल 3 से 4 तक की सुरक्षा मिलती है और इसमें IED ब्लास्ट से बचने के लिए डबल वी-हुल डिजाइन दिया गया है। वहीं AAP में STANAG लेवल 4 से 5 तक का प्रोटेक्शन मिलता है, जो ज्यादा मजबूत है। इसके साथ मॉड्यूलर आर्मर भी है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
अब फायरपावर की बात करें तो AAP यहां ज्यादा एडवांस्ड है। इसमें 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसके साथ 7.62 मिमी मशीन गन और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM भी एक ही टरेट में इंटीग्रेटेड होती है।
स्ट्राइकर में 2.7 मिमी मशीन गन या 40 मिमी ग्रेनेड लॉन्चर लगा होता है। कुछ वर्जन में 30 मिमी गन भी होती है, लेकिन ATGM अलग सिस्टम के जरिए लगाया जाता है, जैसे TOW मिसाइल वाला अलग वेरिएंट या Javelin मिसाइल के साथ रिमोट वेपन स्टेशन। यानी AAP में फायरपावर ज्यादा इंटीग्रेटेड है।
दोनों वाहनों में 2 क्रू मेंबर और 9-10 सैनिक बैठ सकते हैं। मॉड्यूलर डिजाइन के मामले में भी दोनों मजबूत हैं। स्ट्राइकर के कई वेरिएंट हैं, जैसे एम्बुलेंस, कमांड, रिकॉन। वहीं, AAP को भी अलग-अलग रोल जैसे इंफैंट्री कॉम्बैट, कमांड पोस्ट या मोर्टार कैरियर के लिए बदला जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
Hellhole India Information Warfare: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप एक सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक वीडियो क्लिप शेयर करते हुए भारत और चीन को लेकर “हेलहोल” यानी “नरक का गड्ढा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। हालांकि विदेश मंत्रालय ने संयमित प्रतिक्रिया दी, लेकिन राजनीतिक स्तर पर चुप्पी साधे रखी। वहीं, ईरान का इस विवाद से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था, लेकिन भारत का बचाव करते हुए अमेरिका पर जमकर पलटवार किया।
यह क्लिप असल में एक पुराने पॉडकास्ट इंटरव्यू का हिस्सा थी, जिसमें जन्म आधारित नागरिकता यानी बर्थराइट सिटिजनशिप पर चर्चा हो रही थी। क्लिप में कहा गया, “यहां एक बच्चा तुरंत नागरिक बन जाता है और फिर पूरा परिवार चीन या भारत या दुनिया के किसी दूसरे नरक के गड्ढे से आ जाता है।” उसी दौरान भारत और चीन को लेकर यह टिप्पणी की गई थी। ट्रंप ने इसे दोबारा से शेयर कर दिया, जिसके बाद यह मामला तेजी से फैल गया।
Hellhole India Information Warfare: विदेश मंत्रालय का संयमित जवाब
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि ऐसी टिप्पणियां तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और पूरी तरह अनुचित हैं। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह के बयान भारत-अमेरिका संबंधों की असलियत को नहीं दर्शाते।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि चल रही व्यापार और रणनीतिक बातचीत पर इस तरह की टिप्पणियों का कोई असर नहीं पड़ेगा।
सरकार ने बयान देते समय संतुलन बनाए रखा और किसी भी तरह के टकराव से बचने की कोशिश दिखाई।
Maybe someone should book a one-way cultural detox for Mr. #Trump, it might just reduce the random bakwaas 😏
इसी बीच ईरान ने इस पूरे मामले को अपने हाथों में लेते हुए जमकर प्रतिक्रिया दी। भारत में मौजूद ईरानी मिशनों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इस बयान का विरोध किया।
China and India are the cradles of Civilization. In fact, the #hellhole is where its war-criminal president threatened to decimate the civilization in Iran.
हैदराबाद मिशन ने पोस्ट में लिखा, “ट्रंप के पोस्ट से उनकी सोच साफ दिखती है और यह नस्लवाद (racism) को दर्शाता है। भारत और चीन बहुत पुरानी और समृद्ध सभ्यताएं हैं। असल हेल होल तो वो जगह है जहां इसका युद्ध अपराधी राष्ट्रपति ईरान की सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रहा था।” मुंबई कांसुलेट ने महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “कभी भारत आकर देखो।” ईरान ने भारत को “सभ्यताओं का केंद्र” बताते हुए ट्रंप की टिप्पणी को अमेरिका पर उलट दिया।
एक और पोस्ट में व्यंग्य करते हुए कहा गया कि “डिवाइड एंड रूल” की बात होती है, लेकिन ट्रंप सिर्फ लोगों को बांट रहे हैं, शासन नहीं कर पा रहे।
यह जवाब इतना तीखा और व्यंग्यपूर्ण था कि सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। भारतीय यूजर्स ने इसे “ईरान की मजबूत दोस्ती” बताया।
ईरान के इन पोस्ट्स के बाद सोशल मीडिया पर एक तरह का “मीम वॉर” शुरू हो गया। कई मीम्स में ट्रंप को अलग-अलग अंदाज में दिखाया गया। एक मीम में उन्हें वैज्ञानिक आइंस्टीन की तरह दिखाया गया, जबकि दूसरे में उन्हें बमबारी के बाद कमजोर हालत में दिखाया गया। इन मीम्स के जरिए ईरान ने ट्रंप के बयान का मजाक उड़ाया और अपनी बात लोगों तक पहुंचाई।
इनफॉरमेशन वॉरफेयर का बड़ा उदाहरण
हो सकता है कि मोबाइल स्कीन पर आप ईरान की तरफ से शेयर वडा पाव, बन मस्का, पाव भाजी या ईरानी चाय के वीडियोज को देख कर खुश हो रहे हों, और उन्हें रीट्वीट कर रहे हों, लेकिन यह ईरान की इनफॉरमेशन वॉरफेयर की रणनीति है।
When your city wakes up to the ocean, has the world, and your street corner alone runs a global food summit? 😏#Mumbai doesn’t do “either/or”… it does “aur kya hai menu mein?” https://t.co/Jq06ZZnm2ypic.twitter.com/ccUCIFryfD
आज के समय में किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटना की शुरुआत अक्सर सोशल मीडिया से होती है। एक वीडियो या पोस्ट तेजी से लोगों तक पहुंचता है और उसी के आधार पर धारणा बनती है।
ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, इस तरह के पोस्ट भारत में ही तैयार किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजरायल की तरफ से जो प्रचार किया जाता है, उसका जवाब सिर्फ आधिकारिक बयान से नहीं दिया जा सकता। इसलिए लोगों तक पहुंचने के लिए क्रिएटिव और आसान तरीके अपनाए जा रहे हैं, ताकि ज्यादा लोग इसे समझ सकें और जुड़ सकें।
इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। पहले एक वीडियो क्लिप सामने आई, फिर उस पर प्रतिक्रिया आई और उसके बाद अलग-अलग देशों ने अपनी-अपनी तरह से संदेश देना शुरू किया।
ईरान की प्रतिक्रिया में व्यंग्य, सांस्कृतिक संदर्भ और सोशल मीडिया की भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिससे वह जल्दी वायरल हो गई।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से जुड़े कुछ ऑनलाइन नेटवर्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर काफी सक्रिय रहे हैं। इनमें “BRICS4CLICKS” और “Verified4War” जैसे ग्रुप शामिल बताए जाते हैं। कहा जाता है कि इन नेटवर्क्स ने बहुत कम समय में करोड़ों-करोड़ लोगों तक अपना कंटेंट पहुंचाया।
इन पोस्ट्स में एआई से बनाए गए वीडियो, एडिट की गई तस्वीरें और ऐसे संदेश शामिल होते हैं, जो एक खास नजरिया दिखाते हैं। इनमें अक्सर अमेरिका और इजरायल की छवि खराब दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि ईरान को मजबूत और सफल दिखाया जाता है।
हालांकि ईरान की तरफ से यह भी कहा गया कि एआई का इस्तेमाल जानकारी समझाने के लिए होना चाहिए, न कि गलत प्रचार फैलाने के लिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने कुछ ऐसी तस्वीरों का जिक्र किया था, जिन्हें बाद में एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीरें बताया गया।
परेस्प्शन की लड़ाई
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने यह दिखाया है कि युद्ध अब सिर्फ जमीन, आसमान या समुद्र में नहीं लड़ा जाता, बल्कि धारणा (परेस्प्शन) की लड़ाई भी उतनी ही अहम हो गई है।
सोशल मीडिया पर जो पक्ष सबसे पहले लोगों का ध्यान खींच लेता है, वही आगे की पूरी कहानी को प्रभावित करता है। टीवी डिबेट, अखबारों की हेडलाइन और कूटनीतिक चर्चा तक उसी के असर में आती है।
ईरान ने इस बात को समझते हुए अपनी रणनीति बनाई। उसने सिर्फ सरकारी बयान नहीं दिए, बल्कि मीम्स, छोटे वीडियो, एआई से बने विजुअल्स और आसान भाषा का इस्तेमाल किया।
अलग-अलग दर्शकों के लिए अलग संदेश
ईरान ने अपने संदेश को अलग-अलग देशों और दर्शकों के हिसाब से तैयार किया। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए उसने खुद को एक हमले का शिकार देश बताया। पश्चिमी देशों के लिए उसने इसे अमेरिकी दखल के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर उसने व्यंग्य, मजाक और इंटरनेट कल्चर का इस्तेमाल किया, जिससे युवा वर्ग जल्दी जुड़ गया।
वहीं भारत के मामले में यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी ईरान कई बार ऐसा कर चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का यह कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत ने इस पूरे मामले में सीधे किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, लेकिन ईरान ने इसे अपने तरीके से “दोस्ती” की तरह पेश करने की कोशिश की।
ईरान के बयानों में बार-बार भारत को एक पुरानी और महान सभ्यता बताया गया, ताकि लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाया जा सके।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के सामने संतुलन बनाए रखना जरूरी है। भारत के एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान और रूस के साथ भी ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े संबंध हैं।
AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत और जर्मनी अब डिफेंस सेक्टर में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। जर्मनी की एयरोडेटा एजी और भारत की डायनॉटन सिस्टम्स ने एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत भारत में एक नए तरह के एडवांस्ड ड्रोन यानी यूएवी प्लेटफॉर्म “एयरोफोर्स एक्स” का को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन किया जाएगा। यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर निगरानी और खुफिया मिशनों के लिए तैयार किया जाएगा। बता दें कि रक्षा मंत्री ने भी अपने जमर्नी दौरे में को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है। भारत जर्मन इंडस्ट्री को एडवांस टेक्नोलॉजी में हमारे साथ मिलकर को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने के लिए आमंत्रित करता है।
AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत में बनेगा एडवांस्ड यूएवी प्लेटफॉर्म
डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के प्रमुख डॉ. उदयंत टोबी मल्होत्रा ने कहा कि जर्मनी की कंपनी एयरोडेटा एजी और डायनॉटन सिस्टम्स, जो डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज का हिस्सा है, ने मिलकर एक नया ड्रोन सिस्टम बनाने का फैसला किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत “एयरोफोर्स एक्स” नाम का एडवांस्ड यूएवी भारत में बनाया जाएगा।
22 अप्रैल को हुए इस समझौते का मकसद भारत में ही बड़े और आधुनिक अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी तैयार करना है। यह ड्रोन सिस्टम मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस कैटेगरी में आएगा, जिन्हें शॉर्ट में MALEऔर HALE कहा जाता है।
यह प्लेटफॉर्म करीब 5 टन वेट कैटेगरी का होगा और लंबे समय तक लगातार उड़ान भर सकेगा। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह पहाड़ी इलाकों और समुद्री क्षेत्रों दोनों में काम कर सके। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
लंबी उड़ान और ऊंचाई इसकी खासियत
एयरोफोर्स एक्स एक नया और एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम है, जिसे एमएएलई यूएएस कहा जाता है। इसका वजन लगभग 5 टन है, यानी यह काफी बड़ा और ताकतवर प्लेटफॉर्म है। इसमें करीब सेंसर और कैमरे समेत 1300 किलो तक के उपकरण लगाए जा सकते हैं।
यह ड्रोन एक बार में करीब 40 घंटे तक लगातार उड़ सकता है, इसलिए लंबे समय तक निगरानी करने के लिए यह बहुत उपयोगी है। इसका एक वर्जन 30 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर उड़ सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 50 हजार फीट से भी ऊपर उड़ान भर सकता है।
इसकी एक खास बात यह भी है कि यह ITAR-फ्री प्लेटफॉर्म है, यानी इस पर अमेरिकी एक्सपोर्ट नियमों की पाबंदी नहीं होगी। इससे दूसरे देशों के साथ मिलकर काम करना आसान हो जाता है। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
हिमालय और समुद्र दोनों पर नजर
इस प्लेटफॉर्म को खास तौर पर हिमालय क्षेत्र और हिंद महासागरक्षेत्र के लिए तैयार किया जा रहा है। हिमालय में ऊंचाई और मौसम बड़ी चुनौती होती है, जहां लंबे समय तक निगरानी रखना आसान नहीं होता। ऐसे में यह ड्रोन लगातार उड़ान भरकर इलाके पर नजर रख सकेगा।
वहीं समुद्री क्षेत्र में इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, गतिविधियों पर नजर रखने और सुरक्षा से जुड़े कामों में किया जा सकेगा। यह प्लेटफॉर्म इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशनों के लिए उपयोगी होगा।
इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी डायनॉटन सिस्टम्स की अहम भूमिका होगी। कंपनी अपने खुद के विकसित सॉफ्टवेयर, कस्टम हार्डवेयर और सेंसर सिस्टम इस प्लेटफॉर्म में लगाएगी। बताया गया है कि इसमें 50 लाख लाइनों का कोड इस्तेमाल किया जाएगा, जो पूरे सिस्टम को कंट्रोल करेगा।
इसे प्लेटफॉर्म का “नर्वस सिस्टम” कहा जा रहा है, जो सभी हिस्सों को आपस में जोड़कर काम करने में मदद करेगा। इस तरह यह सिर्फ एक ड्रोन नहीं, बल्कि एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
दोनों कंपनियां मिलकर करेंगी काम
डॉ. मल्होत्रा के अनुसार, यह सिर्फ एक सामान्य साझेदारी नहीं है, बल्कि दोनों कंपनियां मिलकर इस तकनीक को विकसित करेंगी। यानी डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन सब कुछ साथ में होगा। इस प्रोजेक्ट में बनने वाली टेक्नोलॉजी पर दोनों कंपनियों का साझा अधिकार होगा।
इस समझौते के तहत दोनों कंपनियां मिलकर इस प्लेटफॉर्म को विकसित करेंगी। इसमें डिजाइन से लेकर निर्माण तक का काम शामिल होगा। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ी टेक्नोलॉजी और आईपी यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का स्वामित्व दोनों कंपनियों के पास रहेगा।
इसका मतलब है कि भारत को इस टेक्नोलॉजी पर सीधा नियंत्रण मिलेगा और भविष्य में इसमें बदलाव या सुधार करना आसान होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
जर्मनी के दौरे पर थे रक्षा मंत्री
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जर्मनी के दौरे पर थे। उन्होंने म्यूनिख में डिफेंस इन्वेस्टर समिट के दौरान जर्मन उद्योग जगत को भारत के साथ मिलकर काम करने का न्योता दिया था।
उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी बहुत जरूरी हो गई है और भारत ऐसे सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है। उन्होंने साफ किया कि भारत अब सिर्फ रक्षा उपकरण खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन में भागीदार बनना चाहता है।
इस प्रोजेक्ट को “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” अभियान से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत लंबे समय से ड्रोन टेक्नोलॉजी के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। ऐसे में इस तरह का प्लेटफॉर्म देश में विकसित होने से घरेलू क्षमता मजबूत होगी। वहीं, भारतीय कंपनियों को नई टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा क्षेत्र में उनका अनुभव भी बढ़ेगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
बता दें कि एयरोडेटा एजी जर्मनी की एक कंपनी है, जो एयरबोर्न सर्विलांस और मिशन सिस्टम्स के क्षेत्र में काम करती है। वहीं डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज भारत की एक जानी-मानी इंजीनियरिंग कंपनी है, जो एयरोस्पेस और अन्य क्षेत्रों में काम करती है। उसकी डायनॉटन सिस्टम्स यूनिट खास तौर पर ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम्स पर काम कर रही है।
डॉ. मल्होत्रा ने यह भी बताया कि इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है और शुरुआती चरण की तस्वीरें भी सामने आई हैं। इसमें डिजाइन, सिस्टम इंटीग्रेशन और अलग-अलग तकनीकों को जोड़ने का काम चल रहा है। यह पूरा प्रोजेक्ट चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगा, जिसमें पहले डिजाइन और टेस्टिंग होगी, उसके बाद उत्पादन की दिशा में काम किया जाएगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)
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