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The big step of the Air Force on Civil Military Fusion will now become IAF Officer IAS-IPS!

IAF Civil Services Support Survey
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IAF Civil Services Support Survey: भारतीय वायु सेना के अंदर एक ऐसा बदलाव शुरू हुआ है, जो अफसरों के करियर को एक नई दिशा दे सकता है। वायु सेना ने अपने अधिकारियों के करियर को लेकर एक अहम कदम उठाया है। एयर मुख्यालय की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र में यह संकेत दिया गया है कि अब सेना अपने अधिकारियों को यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी में मदद करने की संभावना तलाश रही है। इसके लिए पूरे संगठन में एक डिमांड सर्वे शुरू किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि कितने अधिकारी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

यह पहल खास तौर पर उन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो सैन्य सेवा के बाद प्रशासनिक क्षेत्र में जाना चाहते हैं।

IAF Civil Services Support Survey: एयर हेडक्वार्टर से जारी हुआ आधिकारिक पत्र

23 अप्रैल को एयर मुख्यालय से एक पत्र जारी किया गया। यह पत्र सभी कमांड एजुकेशन ऑफिसर्स को भेजा गया है, जिनमें वेस्टर्न, साउथ वेस्टर्न, सेंट्रल, ईस्टर्न, साउदर्न, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और अंडमान-निकोबार कमांड शामिल हैं।
सभी कमांड्स के एजुकेशन ऑफिसर्स को निर्देश दिया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्र में अफसरों के बीच “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” पर सर्वे कराएं। जिसके तहत वायुसेना यह जानना चाहती है कि कितने अफसर भविष्य में प्रशासनिक सेवाओं जैसे आईएएस, आईपीएस या आईएफएस में जाना चाहते हैं और क्या उन्हें इसके लिए संस्थागत मदद दी जानी चाहिए।

किन अफसरों के लिए है यह सर्वे

इस सर्वे का केंद्र बिंदु शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारी हैं। ये वे अधिकारी होते हैं जो आम तौर पर 10 से 14 साल की सेवा के बाद सेना से बाहर आते हैं और उसके बाद उन्हें नई करियर दिशा तलाशनी होती है।

ऐसे अफसरों के सामने अक्सर यह सवाल होता है कि आगे क्या किया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए वायु सेना अब उन्हें सिविल सर्विस की तैयारी में मदद देने का विकल्प देख रही है।

किन अधिकारियों को मिलेगा मौका

पत्र में साफ किया गया है कि यह सर्वे उन सभी अधिकारियों के लिए है, जिन्होंने कम से कम 5 साल की सेवा पूरी कर ली है। इसमें एसएससी अधिकारियों के साथ-साथ परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

हालांकि परमानेंट कमीशन यानी पीसी अफसर भी इस सर्वे में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें सामान्य यूपीएससी प्रक्रिया से ही गुजरना होगा। उनके लिए किसी विशेष सुविधा की बात अभी नहीं कही गई है।

एयर फोर्स ने अपनी सभी यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र के सभी इच्छुक अधिकारियों तक यह जानकारी पहुंचाएं और उन्हें सर्वे में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।

सभी इच्छुक अधिकारियों को एजुकेशन डायरेक्टरेट के पोर्टल पर जाकर एक प्रोफॉर्मा भरना होगा। इस प्रोफॉर्मा के जरिए यह जानकारी ली जा रही है कि कितने अफसर गंभीरता से सिविल सर्विस की तैयारी करना चाहते हैं।

इस सर्वे की अंतिम तारीख 8 मई तय की गई है, इसलिए इसे तेजी से पूरा कराने के निर्देश दिए गए हैं।

यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम के जरिए आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य ग्रुप ए सेवाओं में भर्ती होती है। इसमें देशभर से लाखों उम्मीदवार हिस्सा लेते हैं।

बढ़ेगा सिविल-मिलिट्री फ्यूजन

वायुसेना की इस पहल को “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। ताकि मिलिट्री और सिविल प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। अगर एयर फोर्स के अधिकारी सिविल सर्विस में जाते हैं, तो वे अपने साथ सैन्य अनुभव, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता भी लेकर जाएंगे, जो प्रशासन में काम आ सकती है।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल अमोल अवाते का कहना है कि अगर यह पहल सही है, तो यह एक अच्छा और आगे की सोच वाला कदम है, खासकर शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारियों के लिए। इससे उन्हें सिविल सर्विस में जाने का एक साफ और तय रास्ता मिल सकता है।

उनके मुताबिक, सेना के अधिकारी अपने साथ कई अहम गुण लेकर आते हैं। उनमें अनुशासन होता है, ईमानदारी होती है, नेतृत्व की क्षमता होती है और दबाव में फैसले लेने की आदत होती है। इसके साथ ही वे कठिन परिस्थितियों में काम करने और संसाधनों को सही तरीके से संभालने का अनुभव रखते हैं। आज के जटिल प्रशासनिक माहौल में ये सभी गुण बहुत जरूरी हैं।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले सावधानी से सोचना होगा, खासकर परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारियों के मामले में। मेडिकल कैटेगरी, प्रमोशन पर असर और छोटे अनुशासनिक मामलों जैसे मुद्दों को स्पष्ट नियमों के जरिए तय करना जरूरी होगा। इसके साथ ही वेतन सुरक्षा और वरिष्ठता को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि सबके साथ न्याय हो सके और ज्यादा लोग इसमें भाग लेने के लिए आगे आएं।

उन्होंने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसे मॉडल पहले भी रहे हैं और आज भी कई देशों में, साथ ही भारत में सीएपीएफ, राज्य पुलिस और पीएसयू में काम कर रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि यह व्यवस्था संभव भी है और उपयोगी भी।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मिले विकल्प

वहीं, रिटायर्ड कमोडोर विनय कुमार कुशवाहा का कहना है कि सशस्त्र सेनाओं के स्थायी कमीशन अधिकारियों के साथ मौजूदा व्यवस्था में समानता नहीं है। अभी इन अधिकारियों को पेंशन पाने के लिए कम से कम 20 साल की सेवा करनी पड़ती है, जबकि सिविल सेवाओं में कम समय के बाद भी सेवानिवृत्ति के विकल्प मिल जाते हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी/भारतीय सैन्य अकादमी/वायु सेना अकादमी में चार साल को भी सेवा में जोड़ते हुए कुल 15 साल की सेवा के बाद अधिकारियों को प्रोराटा पेंशन के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प दिया जाए। इससे अधिकारी कम उम्र में ही सिविल सेवा या अन्य क्षेत्रों में दूसरा करियर शुरू कर सकेंगे।

उनके मुताबिक, इससे सेना के अधिकारियों के अनुभव और नेतृत्व का बेहतर उपयोग होगा, मनोबल बढ़ेगा और युवा अधिकारियों को आगे बढ़ने के मौके मिलेंगे। साथ ही, सरकार पर लंबे समय का पेंशन बोझ भी कम हो सकता है।

साथ ही, यह सुधार सशस्त्र बलों के भीतर स्वस्थ संगठनात्मक वातावरण बनाएगा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ सिविल-मिलिट्री फ्यूजन को मजबूत करेगा।

The Army’s Mahasammelan in Jaipur on the Barsi of Operation Sindoor, Top Officers Will Press Conference, What Will Big Disclosure?

Operation Sindoor Anniversary
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Operation Sindoor Anniversary: Joint Commanders’ Conference is being organized in the South Western Command of the Indian Army in Jaipur on 7th and 8th May on the occasion of a year of operation shifter. The three forces in which Thal Army, Air Force and Naval Top Leadership will discuss every issue from reviewing previous operations to the future military strategy in detail. This time the largest centre of this conference is going to be the Joint Operations Centre, which has been aiming to fully prepare until the end of the month.

Last year on April 22 Basron The terror attack in the valley had shackled the whole country. The Indian Army, Air Force and Navy, on the night of 7th May, together, carried out the operation centre. In this operation, the terrorist bases present inside Pakistan and POK were targeted.

The action was completed in a very short time, but its effect appeared for several days. Inside the army it was seen as an operation that further clarified the need for the joint military operation.

Operation Sindoor Anniversary: What is going to happen in Jaipur

This conference in Jaipur will include senior commander of the three forces in addition to CDS General Anil Chauhan, Army Chief General Dyendra Dwivedi, Naval Chief Admiral Dinesh Tripathi and Air Force Chief Marshal AP Singh.

here Operation Shifter The complete review will be reviewed. It will be seen what was strong during operation and what areas need to improve. In addition, there will be a discussion on the security situation associated with Pakistan and China.

"This conference is not just a review, but a platform to decide the entire roadmap of the preparation of the coming time. ""

The special thing is that on May seven is also a highly important press conference in Jaipur, which will address the Lt. General Rajiv Ghai, Air Force’s DG Air Operations Air Marshal Awadush Kumar Bharti, and DG Naval Operations Vice Admiral AN Pramod, who has been the DG GMO during the operation shift. Let’s say that these three are the only ones who had press conference on May 6-7 after the operation shifter.

It is believed that this press conference can have extremely important alan. The formulas say that this press conference can also be an allan on creating a joint operations centre.

What is Joint Operations Center

Joint Operations Centre i.e. JOC is a central system where the information and operation of the three forces will connect together. This centre is being built in New Delhi and plans to start it completely by the end of May 2026. Its motive is to work in the same direction by bringing together different working forces.

CDS General Anil Chauhan recently said in an event, "Joint Operations Center is a big step to strengthen the jointness and will be fully operationalized soon. ""

How it works

The work of the Joint Operations Centre is not just to collect information, but to help him immediately make decisions. Yet the three forces worked through their own system, but now all the data will come in one place.

Real time data will be shared in this centre. i. Information related to ground, air, sea, cyber and space will appear simultaneously. It is called Common Operating Picture.

When planning an operation, the officers of the three forces will be able to take a decision on the same platform. This will save time and increase the speed of decision-making.

Multi domains will be made of operation base

Today’s wars are not limited to just ground or air. Now cyber attack, drone, satellite and electronic systems have also become part of the war. The same is called multi domain operation.

The Joint Operations Centre will work to connect all these areas. If there is a sway on the border, then its data will immediately reach the air and the Navy.

According to an officer, "Now the decision of the war is in the hand of the fast-taking side, so it is necessary to be together of data and judgment. ""

Try to accelerate the OODA loop

Military language has a process, Observe, Orient, Disside and Act. It is called ODA loop. This means that first look at the situation, understand, decide and then act.

The objective of the Joint Operations Centre is to accelerate the corresponding process. The sooner the decision will be, the sooner the action will be taken.

Air defense system of the three forces will also be added through this centre. Yet there were their own systems of the Army, the Air Force and the Navy, but now all will work together.

कम्युनिकेशन सिस्टम भी इंटीग्रेट किया जा रहा है, ताकि किसी भी ऑपरेशन के दौरान जानकारी में देरी न हो। सुरक्षित मोबाइल कम्युनिकेशन और साझा साइबर सुरक्षा नीति भी इसी का हिस्सा है।

थिएटर कमांड्स की दिशा में कदम

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर को थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अभी भारत में अलग-अलग कमांड हैं, लेकिन भविष्य में उन्हें मिलाकर बड़े थिएटर बनाए जाएंगे। इस दिशा में तीन सेट की सिफारिशें पहले ही सरकार को भेजी जा चुकी हैं। जयपुर कॉन्फ्रेंस में इन पर भी चर्चा होगी।

टेक्नोलॉजी और डेटा पर जोर

2026 को सेना के अंदर “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक” साल के रूप में देखा जा रहा है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में तकनीक और डेटा की भूमिका सबसे अहम हो गई है।

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इसी सोच का हिस्सा है, जहां डेटा के आधार पर फैसले लिए जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लगातार काम हो रहा है। इसके तहत कम्युनिकेशन, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशन जैसे कई क्षेत्रों में बदलाव किए गए हैं। जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इन्हीं प्रयासों को एक जगह लाकर मजबूत करेगा।

सेना के अंदर इस सेंटर को लेकर काफी समय से काम चल रहा है। अलग-अलग सिस्टम को जोड़ना, डेटा शेयरिंग की व्यवस्था बनाना और अधिकारियों को इसके लिए तैयार करना, ये सभी काम धीरे-धीरे किए गए हैं।

एक अधिकारी ने कहा, “यह बदलाव दिखने में छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे बहुत बड़ा काम हुआ है।”

Operations Lessons Meet From the Sindoor

इस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी विस्तार से रखा जाएगा। उस ऑपरेशन में मिसाइल, एयर स्ट्राइक और जमीनी कार्रवाई एक साथ हुई थी, लेकिन बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस हुई थी।

सीडीएस ने अपने एक बयान में कहा था, “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन एक धीमी प्रक्रिया है, लेकिन यही भविष्य के युद्ध की जरूरत है।”

7 मई को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े कुछ अहम पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। इसमें ऑपरेशन की योजना, लक्ष्य और उसके परिणामों की जानकारी दी जा सकती है।

New Torrent, going to buy the Army for National Rifles, will get the operation against terrorists in Jammu and Kashmir New Bullet Proof Trops Carrier

Indian Army Bulletproof Troop Carrier RFI
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Indian Army Bulletproof Troop Carrier: भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में तैनात राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट्स के लिए एक नए तरह के सुरक्षित व्हीकल को खरीदने की तैयारी कर रही है। इसके तहत करीब 159 बुलेट प्रूफ ट्रूप्स कैरियर यानी बीपीटीसी खरीदने की योजना बनाई गई है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह व्हीकल खास तौर पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात जवानों के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन लगातार चलते रहते हैं।

Indian Army Bulletproof Troop Carrier: 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर करेगा काम

बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि यह अलग-अलग तरह के इलाकों में आसानी से काम कर सके। यह व्हीकल मैदानी जगहों के साथ-साथ पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में भी चल सके। इसे करीब 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर ऑपरेट करने के लिए तैयार रहे, जहां आम व्हीकल काम नहीं कर पाते।

इसमें हर मौसम में काम करने की क्षमता होगी। चाहे भारी बारिश हो, बर्फबारी हो या धूल भरे हालात, यह व्हीकल बिना रुकावट के चलता रहेगा। इसके अंदर हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगाया जाए, जिससे केबिन का तापमान कंट्रोल रहे। इससे ठंडे इलाकों में भी जवानों को परेशानी नहीं होगी। यह वाहन बेहद कठिन मौसम में भी काम करने के लिए तैयार हो। इसमें माइनस 5 से माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड और 40 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी में पूरी तरह से ऑपरेशनल रहने की क्षमता हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

30 लोगों के बैठने की व्यवस्था

इस व्हीकल की सबसे बड़ी खूबी इसकी सुरक्षा है। इसमें कुल 30 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी, जिसमें ड्राइवर और को-ड्राइवर के अलावा 28 जवान बैठ सकेंगे। अंदर की सीट्स इस तरह बनाई गई हैं कि जवानों को लंबी दूरी के दौरान भी आराम मिल सके।

इसकी पेलोड क्षमता कम से कम 3 टन हो, ताकि यह भारी मात्रा में सामान और उपकरण एक साथ ले जा सके। वाहन का कुल वजन अधिकतम 20 टन तक हो, जिसमें वाहन का खुद का वजन और उसमें बैठने वाले जवानों का वजन शामिल है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

मजबूत इंजन और बेहतर मोबिलिटी

बीपीटीसी में टर्बोचार्ज्ड डीजल इंजन लगा हो, जो इसे अलग-अलग तरह के रास्तों पर चलने की ताकत देगा। यह 4×4 ड्राइव सिस्टम से लैस होना चाहिए, जिससे जरूरत के अनुसार इसे अलग-अलग मोड में चलाया जा सकेगा। इसकी लंबाई 9 मीटर, चौड़ाई 2.5 मीटर और 3.25 मीटर हो।

this Careers की स्पीड सड़क पर करीब 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे हो, जबकि खराब इलाकों में इसकी स्पीड 50 से 75 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए। साथ ही, इसकी रेंज भी मैदानी इलाकों के लिए 350 किमी और पहाड़ी इलाकों के लिए 300 किमी रखी गई है, जिससे यह एक बार में सैकड़ों किलोमीटर तक चल सकता है।

इसके साथ इसमें सेल्फ रिकवरी सिस्टम भी हो, यानी अगर व्हीकल कहीं फंस जाए तो यह खुद को बाहर निकाल सके। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

बैलिस्टिक प्रोटेक्शन से लैस

इस व्हीकल की सबसे अहम बात इसका STANAG लेवल-3 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन है। इसे इस तरह तैयार किया जाए कि यह अलग-अलग तरह की गोलियों और हमलों से जवानों को बचा सके।

व्हीकल के सभी हिस्सों, जैसे दरवाजे, दीवारें और छत, को मजबूत बुलेट प्रूफ स्टील से बनाया जाए। इसमें खास तरह का बुलेट रेसिस्टेंट ग्लास लगा हो, जो गोलियों को रोक सके।

इसके अलावा व्हीकल के नीचे वाले हिस्से भी मजबूत हो, ताकि यह ग्रेनेड या विस्फोट जैसे हमलों को झेल सके। इंजन और फ्यूल टैंक को भी अतिरिक्त सुरक्षा का फीचर हो, ताकि हमला होने पर भी व्हीकल तुरंत बंद न हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

लगे हों रन-फ्लैट सिस्टम वाले टायर

बीपीटीसी में ऐसे टायर लगाए जाएं, जो खराब होने के बाद भी कुछ दूरी तक व्हीकल को चलने देंगे। इसे रन-फ्लैट सिस्टम कहा जाता है। इसका मतलब है कि अगर टायर पंचर भी हो जाए तो व्हीकल तुरंत नहीं रुकेगा।

इसमें अतिरिक्त टायर भी दिया जाए, जिससे जरूरत पड़ने पर उसे बदला जा सके। यह सुविधा ऑपरेशन के दौरान बहुत काम आती है, जहां रुकना जोखिम भरा हो सकता है।

this बुलेटप्रूफ ट्रूप्स कैरियर में आधुनिक लाइटिंग सिस्टम होना चाहिए, जिसमें एलईडी हेडलाइट्स, फॉग लाइट्स, टेल लाइट्स, ब्रेक लाइट्स और कन्वॉय लाइट्स शामिल हैं। इसके साथ ब्लैकआउट स्विच की सुविधा भी हो, जिससे ऑपरेशन के दौरान जरूरत पड़ने पर पूरी लाइटिंग बंद की जा सके। वाहन पर एंटी-रायट वायर मेश भी लगा हो, जो सुरक्षा को और मजबूत बनाएगा।

गनर हैच और फायरिंग की सुविधा

इस व्हीकल को सिर्फ ट्रांसपोर्ट के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर फायरिंग के लिए भी तैयार हो। इसके ऊपर एक गनर हैच लगा हो, जहां से सैनिक मशीन गन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

इसके अलावा व्हीकल के दोनों तरफ छोटे-छोटे फायरिंग पोर्ट दिए जाएं, जिनसे अंदर बैठे जवान भी जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकें। इससे यह व्हीकल एक तरह से चलते-फिरते सुरक्षा प्लेटफॉर्म की तरह काम करता है।

बीपीटीसी में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम भी दिया जाएगा। इसमें ऐसे फीचर्स होंगे जो ड्राइवर को मुश्किल रास्तों पर व्हीकल को चलाने में मदद करेंगे।

इसमें 360 डिग्री कैमरा, टक्कर से बचाने वाला सिस्टम, ब्रेकिंग कंट्रोल और ड्राइवर की थकान को पहचानने वाले फीचर्स शामिल होंगे। इससे दुर्घटना की संभावना कम हो जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

बेहतर कंट्रोल और ब्रेकिंग सिस्टम

इस व्हीकल में सभी पहियों पर डिस्क ब्रेक लगे हो और एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम भी दिया गया हो। इससे अचानक ब्रेक लगाने पर भी व्हीकल संतुलित रहेगा।

इसमें एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम यानी एडीएएस लेवल-2 फीचर्स भी अनिवार्य रूप से हो। यह सिस्टम खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, कच्चे रास्तों और कम विजिबिलिटी जैसे कोहरा, बर्फ या धूल भरे माहौल में बेहतर ड्राइविंग में मदद करेगा। इसमें एडाप्टिव क्रूज कंट्रोल दिया गया हो, जो ट्रैफिक के हिसाब से खुद स्पीड को कंट्रोल करे। इसके साथ फॉरवर्ड कोलिजन वार्निंग और ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम भी हो, जो सामने खतरा आने पर वाहन को अपने आप रोक सकता है।

यह व्हीकल ढलान वाले रास्तों पर भी पूरी तरह लोड होने के बावजूद रुक सकता है। यह खासियत पहाड़ी इलाकों में काफी जरूरी मानी जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

आसान रखरखाव और लंबी उम्र

सेना ने RFI में कहा कि बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि इसका रखरखाव आसान हो। इसके अलग-अलग हिस्सों को जरूरत पड़ने पर आसानी से बदला जा सकता है। इससे फील्ड में ही इसकी मरम्मत की जा सकेगी।

इसकी उम्र भी 10 साल या एक लाख किमी रखी गई है, ताकि इसे कई सालों तक इस्तेमाल किया जा सके। इसके साथ कंपनियों को स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस सपोर्ट देना भी जरूरी होगा।

यह पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाई जा रही है और इसे ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी में रखा गया है। इसका मतलब है कि इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी और स्वदेशी तकनीक पर जोर रहेगा।

इस प्रोजेक्ट के तहत चुनी गई कंपनी को तय समय में सभी व्हीकल तैयार करने होंगे। कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद हर तीन साल तक 60 व्हीकलों की डिलीवरी करनी होगी, ताकि सेना को समय पर यह नई क्षमता मिल सके।

सेना की जरूरतों के मुतबिक यह व्हीकल सड़क और रेल दोनों के जरिए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके। इसके साथ कंपनी को ट्रेनिंग के लिए एआर और वीआर वीडियो, सेक्शनाइज्ड मॉडल्स और डिटेल्ड मैनुअल्स भी देने होंगे, ताकि सैनिक इसे सही तरीके से ऑपरेट और मेंटेन कर सकें।

इसमें भाग लेने के लिए कंपनियों को यह भी दिखाना होगा कि उनके पास बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

The Indian army must track 83 new defense carriers with the storm, which will drive the enemy while walking with the tanks

Akashteer CADET Air Defence Carriers
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Akashteer CADET Air Defence Carriers: भारतीय सेना ने अपनी मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन्स की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 83 कैरियर एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम (CADET) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। ये खास ट्रैक्ड व्हीकल होंगे, जिन पर ‘आकाशतीर’ एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम लगाया जाएगा। इसका मकसद युद्ध के मैदान में टैंक और आर्मर्ड यूनिट्स को एरियल थ्रेट्स से सुरक्षा देना है।

Akashteer CADET Air Defence Carriers: क्या है ‘आकाशतीर’ सिस्टम

‘AIR’ एक एडवांस्ड एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम है, जिसे डीआडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम अलग-अलग रडार, सेंसर और हथियारों को एक ही नेटवर्क में जोड़ता है।

यह सिस्टम युद्ध के दौरान आसमान में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखता है और तुरंत जानकारी संबंधित यूनिट्स तक पहुंचाता है। इससे फैसले जल्दी लिए जा सकते हैं और खतरे का जवाब तुरंत दिया जा सकता है।

क्यों लगाया जा रहा है ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर

अब तक एयर डिफेंस के कई सिस्टम फिक्स्ड या व्हील्ड प्लेटफॉर्म पर चलते थे। लेकिन समस्या यह थी कि ये टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ हर इलाके में बराबर रफ्तार से नहीं चल पाते थे। टैंक जहां ऊबड़-खाबड़ इलाकों, रेगिस्तान या पहाड़ों में आसानी से आगे बढ़ते हैं, वहीं व्हील्ड सिस्टम कई बार पीछे रह जाते थे।

इसी वजह से अब ‘आकाशतीर’ को ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर लगाया जा रहा है। ये प्लेटफॉर्म टैंकों की तरह ही मुश्किल इलाकों में चल सकते हैं।

कैसे काम करेगा CADET सिस्टम

कैडेट को एक तरह से मोबाइल कमांड पोस्ट माना जा रहा है। यह सीधे आर्मर्ड कॉलम के साथ रहेगा और एयर डिफेंस यूनिट्स को रियल टाइम में जानकारी देता रहेगा। जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या फाइटर जेट जैसे खतरे सामने आएंगे, तो यह सिस्टम तुरंत उनकी जानकारी देगा और हथियारों को एक्टिव करने में मदद करेगा। इससे युद्ध के दौरान प्रतिक्रिया देने का समय काफी कम हो जाएगा और यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित रह सकेंगी। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर किया डिजाइन

पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कैडेट प्लेटफॉर्म को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि भविष्य में इसमें ड्रोन डिटेक्शन और ड्रोन काउंटर सिस्टम भी जोड़े जा सकें। इससे यह सिस्टम सिर्फ पारंपरिक खतरों के लिए नहीं, बल्कि नए तरह के युद्ध के लिए भी तैयार रहेगा।

इसमें आकाशतीर सिस्टम के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए जाएंगे, जिन्हें सेना खुद उपलब्ध कराएगी। यह वाहन टैंकों की तरह ही हर तरह के मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और पहाड़ों में 5000 मीटर ऊंचाई तक आसानी से चल सकेगा।

इस ट्रैक्ड व्हीकल को बेहद कठिन हालात में काम करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह माइनस 30 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा।

यह एक बार में 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है। सड़क पर इसकी गति करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि कठिन इलाकों में यह करीब 15 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकेगा।

इसमें कम से कम चार लोगों की टीम बैठ सकेगी और उनके लिए अंदर क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम भी होगा, ताकि हर मौसम में काम करना आसान रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

Akashteer
Indian Army

सुरक्षा और पावर सिस्टम

कैडेट में STANAG लेवल-2 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन भी दिया जाएगा, जिससे यह गोलीबारी और हमलों से कुछ हद तक सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा इसमें एक अलग पावर यूनिट होगी, जो बिना मुख्य इंजन चालू किए भी सिस्टम को करीब छह घंटे तक चला सकेगी। यह सुविधा खासतौर पर तब काम आएगी, जब व्हीकल को किसी एक जगह पर खड़े रहकर निगरानी करनी हो।

इस प्लेटफॉर्म में आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, जो जीपीएस, ग्लोनास और भारत के नाविक सिस्टम से जुड़ेंगे। इससे यह हर स्थिति में अपनी लोकेशन को सटीक तरीके से ट्रैक कर सकेगा। साथ ही, इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी सिस्टम को जैमिंग से बचाया जा सके। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। इसके तहत 83 सिस्टम खरीदे जाएंगे।
इनकी डिलीवरी एडवांस पेमेंट के बाद 36 महीने के अंदर पूरी करनी होगी। अगर दो कंपनियां इस प्रक्रिया में योग्य पाई जाती हैं, तो ऑर्डर को 60 और 40 प्रतिशत के अनुपात में बांटा जाएगा। इन सिस्टम्स की वारंटी 24 महीने की होगी और इन्हें करीब 20 साल तक इस्तेमाल करने के हिसाब से डिजाइन किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट को ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी के तहत रखा गया है। इसका मतलब है कि इसमें कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही डिजाइन और बनाया जाएगा। इससे देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

सेना के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम

सेना की मैकेनाइज्ड यूनिट्स टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स युद्ध के दौरान सबसे आगे रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें हवाई हमलों से तुरंत सुरक्षा न मिले, तो उन्हें भारी नुकसान हो सकता है। कैडेट और ‘आकाशतीर’ सिस्टम मिलकर इस कमी को पूरा करेंगे। ये सिस्टम सीधे फ्रंटलाइन पर मौजूद रहकर हर तरह के हवाई खतरे की जानकारी देंगे और उससे निपटने में मदद करेंगे।

इस प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे एयरलिफ्ट भी किया जा सके। यह बड़े सैन्य विमान जैसे सी-17 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में आसानी से ले जाया जा सकेगा। इससे जरूरत पड़ने पर इसे किसी भी इलाके में जल्दी तैनात किया जा सकता है। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

बदलते युद्ध के अनुसार तैयारी

सेना अब अपने सिस्टम्स को मॉडर्न वॉरफेयर को देखते हुए तैयार कर रही है। आज के समय में नेटवर्क आधारित युद्ध, रियल टाइम डेटा और तुरंत जवाबी कार्रवाई आज की जरूरत बन चुके हैं। कैडेट और ‘आकाशतीर’ इसी दिशा में एक अहम कदम माने जा रहे हैं, जहां जमीन पर चल रही यूनिट्स को आसमान से होने वाले खतरों के खिलाफ लगातार सुरक्षा मिलती रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

Indian Air Force Should Have Heavy Payloaded ‘Super Elevator’ Helicopter! RFI released for UHLH

UHLH Helicopter IAF:

UHLH Helicopter IAF: Indian Air Force has released the Request for Information for ULH i.e. Ultra Heavy Lift Helicopter to strengthen its heavy lift capacity. In this process extracted from the Ministry of Defence, helicopters are being explored which can lift extremely heavy weights and prepare for operation in a short time. Under this offer, three helicopters will initially go for two years on the Dam Lease model, after which they will also have the option to buy.

UHLH Helicopter IAF: What Does Damp Lease Model

Understand Damp Lease in easy language Helicopter Vander is taken, but the responsibility of blowing and operating it is airborne. That is, the machine comes from the outside, but its use and maintenance handles the side. This keeps training, operation and control completely near the Army.

The advantage of this model is that helicopters become available in a short time and the air force gets new capacity quickly. The same platform can also be purchased if needed later. (UHLH Helicopter IAF)

What is Helicopter?

Air Force has laid some clean technical conditions in this RFI. The most important condition is its payload capacity, which should be about 20 tons. This helicopter can carry heavy arms, vehicles or large quantities of accessories at once.

Also its cruise speed should be more than 230 kilometres per hour, so as to move faster. The maximum speed is even higher, allowing it to perform faster operation when needed.

At least 45 soldiers can sit in the helicopter, or it can be changed that it can be transported to injured soldiers with 20 stretchers. This helicopter will work not only in transport, but also in medical equipment.

Height and weathering ability

This helicopter should be able to fly into elevated areas. The operating altitude for this is fixed about 5500 m or more. The condition is specially placed by taking into account the Himalayan terrain, where oxygen is low and flight is challenging.

At the same time, the helicopter needs to be an IFR certified to fly every season. This means that it can fly safe even in bad weather or low visibility.

Equipped with HO EWS system

Helicopter The advanced electronic warfare system is also required. It will include devices such as radar warning receiver and missile approach warning system, which can detect the danger in advance. The counter should also be Major Dispensing System, to prevent enemy attack when needed.

All these systems should be connected to each other, so as to quickly identify and respond to danger. This increases the survival capacity of the helicopter. (UHLH Helicopter IAF)

Heavy weight lifting and hanging carrying capacity

This helicopter should have the ability to move weight not only inside, but also by hanging out. The condition for lifting the underslung load of up to 10 tonnes is laid. It also requires that the pilot can view and monitor this hung load both day and night.

This capacity is extremely handy in hilly areas where landings are not possible directly and the goods are lowered through a rope.

The Air Force has kept the availability of this helicopter at least 95 percent. That is, this machine was mostly ready for time operation. The capacity of 30 hours is also fixed every month. This condition is placed so that the helicopter can be used not just in papers, but in constant operation. (UHLH Helicopter IAF)

Quick delivery

The most important thing in this RFI is its delivery timeline. The vendors have to provide helicopters within 3 to 6 months after the contract is signed. This time frame is considered quite low, which is clean that this capacity to the air force should be as soon as possible.

UHLH helicopter can be used in a variety of operations. These include carrying heavy weapons and vehicle from one place to another, delivering supplies to border areas and work like disaster relief.

Also this helicopter will also be useful for extracting injured soldiers and deploying soldiers rapidly in difficult areas. Its role in mountain, desert and remote areas is considered to be Ahmed.

Existing Fleet and New Need

Indian Air Force There are already some heavy helicopters, but the need for change in both their number and capacity is being felt over time. Some old helicopters are now fulfiling their ages, while newer operations need more capacity platforms.

That’s why the demand for a helicopter with a capacity of 20 tonnes is revealed, which can carry more goods and troops at once. (UHLH Helicopter IAF)

इस पूरी प्रक्रिया को डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें भारतीय और विदेशी दोनों तरह के वेंडर्स भाग ले सकते हैं, लेकिन प्राथमिकता भारतीय लीज कैटेगरी को दी जाएगी। वायुसेना की जरूरत को देखते हुए यह कदम तेजी से क्षमता बढ़ाने के मकसद से उठाया गया है, ताकि बिना लंबी खरीद प्रक्रिया के तुरंत ऑपरेशनल जरूरत पूरी की जा सके।

RFI जारी होने के बाद अब कंपनियां अपनी प्रतिक्रिया देंगी। इसके बाद अगला चरण यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल आएगा, जिसमें तकनीकी और फाइनेंशियल ऑफर मांगे जाएंगे। इस प्रक्रिया के जरिए तय किया जाएगा कि कौन सा हेलीकॉप्टर वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से सबसे उपयुक्त है। (UHLH Helicopter IAF)

Government and waiters face-to-face on NFU! 75 times tolly hearing, will the army get civil service status?

NFU for Armed Forces
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NFU for Armed Forces: Thousands of the country are waiting for an important decision these days. The case is of Nfu (non-functional upgradation), which has long been trapped between court and government. Former Army officials want to have the same facility, which meets the officers of Civil Services. But so far there is no final decision on it.

NFU for Armed Forces: What's Complete Case

NFU There is no new dispute. This case is pending in the Supreme Court from 2017. Earlier in 2016, the Armed Forces Tribunal (AFT) had directed the government to give the benefit of the NFO to the Army authorities. The tribunal had said that the army is "recognized and unsolar cause" to keep it out of it.

Despite this, the decision did not apply and the case went forward to the Supreme Court. In the last nine years, the hearing has been fixed several times, but every time there was no reason. Now waits for the final decision of the court to the waiters.

According to the government-level discussion, an inter-ministerial committee has dismissed the proposal for granting Nfu to the Army authorities. There are many reasons behind the committee. It said that it will not be easy to apply, it has legal difficulties and can lead to an additional load of up to Rs 800 to 1800 crore every year on the government.

What is NFU?

Nfu is a kind of pay and status benefit. This means that if an officer does not get a promotion, he gets a higher salary level over time.

Understand that if there are two officers of the same batch and one of them gets a promotion, the other officer gets the same level salary after a while, even if he has not received a promotion. It is aimed not to have much difference between the officers of the same batch.

This arrangement sixth Salary The Commission was implemented in 2006. At the beginning this facility was just found to IAS and IFS officers, but later it was extended to other Group ‘A’ Services and CAPFs.

But why the army put out

The biggest question is why the army was excluded when civil services are getting this facility. The government says the structure of the army and the way to work is different.

The promotion in the army takes place on a fully ranked base system. Here are limited posts at every level and strict selection process for promotion. If an officer does not receive a promotion even after receiving a fixed number of opportunities, he gets retire at the same rank.

The mode of promotion in Civil Services is different, where there are more chances of proceeding based on seniority and fitness.

The government also believes that if the officer of the junior rank was paid a salary as a senior rank through the NFO, it may have an impact on the chain of command system of the army.

Report by Committee in Supreme Court

Recently A High Level Committee Supreme Court entrusted its report. This committee has clearly stated that it would not be correct to give Nfu to the army.

According to the report, the service conditions of the Army are different from civil employees. The Army seals and officers already get several special facilities like OROP (One Rank One Pension) and MSP (Military Service Pay).

कमेटी ने यह भी कहा कि अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक इस पर सालाना हजारों करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। साथ ही इससे पेंशन सिस्टम में भी बड़े बदलाव करने पड़ेंगे।

वेटरंस क्यों कर रहे हैं विरोध

दूसरी तरफ, मिलिट्री वेटरंस इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं है, बल्कि मुद्दा बराबरी के दर्जे का है।

इस फैसले के बाद कई सैन्य वेटरंस ने नाराजगी जताई है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे और लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया (रिटायर्ड) ने इसे एक बड़ा मौका गंवाना बताया। उनका कहना है कि यह सालों से चली आ रही असमानता को खत्म करने का सही समय था। उनके मुताबिक एनएफयू कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि सेना के अधिकारियों के लिए बराबरी का अधिकार है, खासकर तब जब वे कठिन और जोखिम भरे माहौल में काम करते हैं और फिर भी करियर में रुकावट का सामना करते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड) ने भी इस मुद्दे पर साफ राय दी। उन्होंने कहा कि या तो एनएफयू सभी सेवाओं के लिए खत्म कर दिया जाए, या फिर सेना समेत सभी को दिया जाए।

इसी तरह लेफ्टिनेंट कर्नल आर के भारद्वाज (रिटायर्ड) ने एक खुले पत्र में कहा कि सेना और पूर्व सैनिक इस फैसले से बहुत निराश हैं। उन्होंने लिखा कि जहां बाकी सभी सिविल सर्विसेज और सीएपीएफ को एनएफयू का फायदा मिल रहा है, वहीं सेना को इससे बाहर रखना गलत है। उनका कहना है कि इससे सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ रहा है और उनके साथ भेदभाव का हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिकाकर्ता रिटायर्ड कर्नल मुकुल देव का कहना है कि सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारी एनएफयू का लाभ ले रहे हैं, लेकिन सेना को इससे बाहर रखा गया है। उनके मुताबिक यह एक तरह का भेदभाव है।

वेटरंस का यह भी तर्क है कि सेना में प्रमोशन के मौके बहुत सीमित होते हैं। कई अधिकारी 50-54 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं, जबकि सिविल सर्विसेज में रिटायरमेंट उम्र 60 साल है। इस वजह से उन्हें करियर में आगे बढ़ने और ज्यादा कमाने के कम मौके मिलते हैं।

सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सेना को एमएसपी और अन्य भत्ते मिलते हैं, इसलिए एनएफयू की जरूरत नहीं है। लेकिन वेटरंस इस बात से सहमत नहीं हैं।

उनका कहना है कि एमएसपी कोई अतिरिक्त फायदा नहीं है, बल्कि पहले से मिल रहे कई भत्तों को मिलाकर बनाया गया है। इसलिए इसे एनएफयू के बराबर नहीं माना जा सकता।

मौजूदा समय में कमीशंड अधिकारियों (लेफ्टिनेंट से ब्रिगेडियर) को हर महीने करीब 15,500 रुपये एमएसपी मिलता है, जबकि जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) को करीब 5,200 रुपये मिलते हैं।

सेना में कैसे मिलता है प्रमोशन

सेना में करियर ग्रोथ स्ट्रक्चर काफी सीमित है, जिसे पिरामिड जैसा माना जाता है। शुरुआत में सभी अधिकारियों को समय के साथ प्रमोशन मिलता है, लेकिन ऊपरी रैंक पर पहुंचते-पहुंचते मौके बहुत कम हो जाते हैं।

लेफ्टिनेंट, कैप्टन और मेजर रैंक तक लगभग सभी अधिकारियों को प्रमोशन मिल जाता है। लेफ्टिनेंट कर्नल तक भी यह प्रक्रिया टाइम स्केल पर होती है। लेकिन इसके बाद स्थिति बदल जाती है।

कर्नल रैंक पर सिर्फ लगभग 14 फीसदी अधिकारी ही पहुंच पाते हैं। ब्रिगेडियर बनने वालों की संख्या और भी कम होकर करीब 2.79 फीसदी रह जाती है। मेजर जनरल तक पहुंचने वालों की संख्या सीमित रहती है और लेफ्टिनेंट जनरल (हाईएस्ट लेवल) तक सिर्फ लगभग 1 फीसदी से भी कम अधिकारी पहुंच पाते हैं।

इसका मतलब यह है कि ज्यादातर अधिकारी लंबे समय तक सेवा करने के बावजूद पे लेवल 12 या 13 पर ही रुक जाते हैं। प्रमोशन के सीमित अवसरों की वजह से करियर में ठहराव आता है, जिसका असर मनोबल पर पड़ता है।

कमेटी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना और सिविल सर्विसेज के प्रमोशन सिस्टम में मूलभूत अंतर है। सेना में कर्नल और उससे ऊपर के पदों के लिए चयन बोर्ड होते हैं और सीमित मौके मिलते हैं।

अगर अधिकारी इन मौकों में चयनित नहीं होता, तो वह आगे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं रहता। वहीं सिविल सर्विसेज में प्रमोशन के अवसर लगातार बने रहते हैं।

इसी वजह से सरकार का मानना है कि एनएफयू को सेना पर लागू करना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों सिस्टम का स्ट्रक्चर अलग है।

क्यों लंबी खिंच रही है कानूनी लड़ाई, देखें टाइमलाइन

दिसंबर 2016 में दिल्ली की आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसला दिया। यह मामला कर्नल मुकुल देव बनाम भारत सरकार का था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सेना को एनएफयू न देना गलत है और सरकार को इसे लागू करना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने इसे “अनुचित और बिना सही वजह” का फैसला बताया।

इसके बाद सरकार ने इस आदेश को नहीं माना और 2019 में सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तरह का मामला सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) का भी था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में उन्हें एनएफयू का फायदा दे दिया था। लेकिन सेना के मामले में अभी तक फैसला नहीं आया है।

दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दोबारा देखने के लिए रक्षा मंत्रालय को एक हाई-लेवल कमेटी बनाने को कहा। इस कमेटी के चेयरमैन फाइनेंशियल एडवाइजर (डिफेंस सर्विसेज) थे। जनवरी 2026 में इस कमेटी ने सेना के प्रतिनिधियों की बात भी सुनी और पूरे मामले का अध्ययन किया।

2026 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि सेना को एनएफयू नहीं दिया जाना चाहिए। इसके पीछे कई कारण बताए गए।

साथ ही कमेटी ने एक और चिंता जताई कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर जैसा वेतन मिलने लगे, तो इससे चेन ऑफ कमांड पर असर पड़ सकता है। कमेटी ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे को आगे 8वें वेतन आयोग में देखा जा सकता है।

अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाखिल किया। इसमें कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई और साफ कहा गया कि सेना को एनएफयू देना उचित नहीं है।

अप्रैल 2026 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस दौरान कई बार सुनवाई की तारीख तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से सुनवाई टल गई।

अब तक इस केस में 75 से ज्यादा बार सुनवाई टली है। 22 अप्रैल 2026 को भी यह मामला सूची में था, लेकिन समय की कमी और जस्टिस जेके माहेश्वरी के रिटायरमेंट के कारण सुनवाई नहीं हो सकी।

मुख्य याचिकाकर्ता कर्नल मुकुल देव (रिटायर्ड) के अनुसार, पिछले 9 साल में इस मामले को सुनने के लिए 5 अलग-अलग बेंच बन चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर हैं, जहां इस मामले में अंतिम फैसला होना बाकी है। वेटरंस उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सिविल सर्विसेज के बराबर दर्जा मिलेगा, जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है।

कितना पड़ेगा आर्थिक बोझ

सीजीडीए (CGDA) के इनपुट के अनुसार, अगर सेना को एनएफयू दिया जाता है, तो इसका वित्तीय असर काफी बड़ा होगा। सिर्फ आर्मी के लगभग 26,182 अधिकारियों पर इसका सालाना खर्च करीब 555.24 करोड़ रुपये आंका गया है। इसी आधार पर नेवी के लगभग 4,945 अधिकारियों पर करीब 106.59 करोड़ और एयरफोर्स के करीब 6,571 अधिकारियों पर लगभग 142.22 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

इस तरह तीनों सेनाओं के लिए कुल मिलाकर सालाना खर्च करीब 804.05 करोड़ रुपये बैठता है।

अगर इसमें पेंशन का असर जोड़ा जाए, तो यह खर्च बढ़कर करीब 1200 करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा, ओआरओपी के तहत पेंशन को दोबारा तय करना पड़ेगा, जिससे खर्च और बढ़ सकता है।

सातवें वेतन आयोग के पूरे 10 साल के दौर में यह खर्च 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है। इसमें ब्याज और अन्य संभावित खर्च शामिल नहीं हैं, जिससे कुल राशि और बढ़ सकती है। सरकार का कहना है कि इतने बड़े वित्तीय बोझ और प्रशासनिक मुश्किलों को देखते हुए एनएफयू लागू करना आसान नहीं है। (Military Veterans Await Supreme Court Verdict on NFU, Demand for Equal Status with Civil Services)

DRDO is making up to 500 km ‘hackproof’ communication network, enemy cyber attack will fail

DRDO QKDN Technology
Photo: PIB (For Reference Only)

DRDO QKDN Technology: DRDO is preparing large for cyber security and safe communication. DRDO is going to further expand the hackproof communication technology based on quantum technology. DRDO has released "Expression of Interest" i.e. EOI Notice for hack-proof communication up to 500 km. Under this, the ‘Distribution Over Network’ (QKDN) system will be created.

What is DRDO QKDN Technology?

QKDN has full name Quantum The distribution over network of. It is a technique that uses quantum physics to protect data. It sends a certain type of "key" code between two places, which encrypts data.

The greatest merit of this technique is that if a third person tries to catch this communication in the middle, the system immediately recognizes that someone is trying to hack. This happens because the quantum system changes its position once the signal is touched. This is why it is considered "unhackable" or extremely safe communication.

How does QKDN system work?

डीआरडीओ के नए प्रोजेक्ट में अब केवल दो पॉइंट के बीच नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को जोड़ने की योजना है। इसका मतलब है कि स्टार, रिंग, हाइब्रिड और पॉइंट-टू-पॉइंट जैसे अलग-अलग नेटवर्क टोपोलॉजी में यह सिस्टम काम करेगा।

इस प्रोजेक्ट का टारगेट है कि लगभग 500 किलोमीटर तक की दूरी में सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाया जाए। इसके लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स और सॉफ्टवेयर डिफाइंड नेटवर्किंग (SDN) का इस्तेमाल किया जाएगा। एसडीएन एक ऐसा सिस्टम होता है, जिसमें नेटवर्क को सॉफ्टवेयर के जरिए कंट्रोल किया जाता है, जिससे उसे जरूरत के हिसाब से जल्दी बदला जा सके।

स्वदेशी तकनीक पर फोकस

इस प्रोजेक्ट में COTS यानी कमर्शियल ऑफ द शेल्फ प्रोडक्ट्स का स्वदेशी वर्जन इस्तेमाल किया जाएगा। यानी भारत में ही बने हुए सिस्टम को नेटवर्क में लगाया जाएगा और उसे एसडीएन के साथ जोड़ा जाएगा।

डीआरडीओ की योजना है कि यह पूरा सिस्टम देश में ही डिजाइन और डेवलप हो, ताकि डिफेंस और अन्य महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए पूरी तरह सुरक्षित और कंट्रोल्ड नेटवर्क तैयार किया जा सके।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 500 किलोमीटर के नेटवर्क को कवर करने के लिए कई क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स लगाई जाएंगी। इनमें डीपीएस क्यूकेडी (Differential Phase Shift) और सीओडब्ल्यू क्यूकेडी (Coherent One-Way) यूनिट्स शामिल होंगी, जो नेटवर्क में अलग-अलग जगहों पर लगाकर पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाएंगी। इसके साथ एसडीएन के जरूरी कंपोनेंट्स भी लगाए जाएंगे।

हालांकि डीआरडीओ ने साफ किया है कि ये संख्या और डिजाइन भविष्य में बदल भी सकते हैं, क्योंकि यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है और आगे की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव किया जाएगा।

पहले भी हो चुके हैं सफल परीक्षण

भारत में क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम नया नहीं है। पहले भी डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर कई अहम टेस्ट किए हैं। साल 2022 में पहली बार प्रयागराज और विंध्याचल के बीच 100 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया गया था। यह देश का पहला इंटर-सिटी क्यूकेडी डेमो था, जिसमें टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल किया गया था।

इससे पहले 2020 में हैदराबाद में डीआरडीओ की दो लैब्स के बीच भी क्यूकेडी का शुरुआती टेस्ट किया गया था। इसके बाद 2024 में 100 किलोमीटर लंबी फाइबर लाइन पर क्वांटम की ट्रांसमिशन को सफलतापूर्वक दिखाया गया।

फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन में बड़ी उपलब्धि

पिछले साल 16 जून को डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिल कर बिना फाइबर की मदद के हवा के जरिए क्वांटम कम्युनिकेशन का डेमो किया गया था। इस प्रयोग में एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर लेजर आधारित ऑप्टिकल लिंक के जरिए सुरक्षित की ट्रांसफर की गई।

इस दौरान सिक्योर की रेट करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड रहा और एरर रेट 7 प्रतिशत से कम था, जो इस तरह के सिस्टम के लिए अच्छा माना जाता है। इस तरह का फ्री-स्पेस सिस्टम पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में बेहद उपयोगी है, जहां फाइबर केवल बिछाना मुश्किल होता है।

क्यों जरूरी है यह तकनीक

आज के डिजिटल युग में जहां डेटा ही सबसे बड़ी ताकत है, उनमें ज्यादातर कम्युनिकेशन सिस्टम क्लासिकल एन्क्रिप्शन पर आधारित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे क्वांटम कंप्यूटर विकसित हो रहे हैं, वैसे-वैसे पुराने एन्क्रिप्शन सिस्टम को हैक करने का खतरा बढ़ रहा है। DRDO QKDN Technology भारत के सिक्योरिटी सिस्टम में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। क्योंकि 500 किमी तक बनने वाले इस हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन नेटवर्क के तैयार होने से न केवल हमारी सैन्य सूचनाएं सुरक्षित होंगी, बल्कि दुश्मन के बड़े से बड़े साइबर अटैक भी पूरी तरह विफल हो जाएंगे।

ऐसे में क्यूकेडी और क्यूकेडीएन जैसी तकनीक भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। इसका इस्तेमाल डिफेंस कम्युनिकेशन, बैंकिंग नेटवर्क, डेटा सेंटर, 5जी और 6जी नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां डेटा की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी होती है। (DRDO QKDN Technology)

DRDO launched two new armored platforms, WhAP is also advanced by AAP, a collision giving the American striker!

AAP vs WhAP vs Stryker
Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled)

AAP vs WhAP vs Stryker: DRDO has introduced two new advanced armored platforms. There is a tracked vehicle with a chain and another wheeled is a 8×8 platform running on wheels. Both of these were launched at the Vehicles Research and Development Assessment (VRDE) based in Ahilyanagar, Maharashtra. While the wheeled version of its advanced armored platform (AAP) is being considered as a modern alternative to the old wheeled armored platform (WhAP). At the same time, the new AAP is giving a link to the US striker.

AAP vs WhAP vs Stryker: Fully Designed and Developed in the Country

Both of these armored platforms are fully designed and developed in India. They are designed to take into account the needs of the modern war. In today’s time, the army needs vehicles that are faster, safer and can be used in different missions.

Keeping in mind DRDO Both tracked and wheeled versions have created so that they can be used in different areas. (AAP vs WhAP vs Stryker)

30mm Crules Turate Biggest Spicy

The biggest feature of these platforms is a 30-mm crossless tort. This means that no crew sits in this turret, but it is run by remote control or automated systems.

This turret has a main cannon of 30mm, with a 7.62mm PKT machine gun as well. Also it can launch anti tank guided missile i.e. ATGM.

This vehicle can attack enemy tanks, bunkers and low-flying targets. The design of the turret is that it can also be changed for different roles. (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker
Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled)

Can walk on bad paths

Both of these platforms have been given high power engine and automatic transmission. They move fast and move smoothly on difficult paths.

Their power to weight ratio is better placed, i.e. less weight gain strength. This allows the vehicle to move smoothly in high climbing, sludge, sand and stone areas.

The tracked version is particularly useful for tough areas such as mountain and jungle, while the wheeled version can run faster in the road and open ground.

Amphibious Capacity

Amphibious capacity is also given in these platforms, i.e. it can also run in water. Hydro jets are planted in which it can cross water paths like river or pond.

Strong Protection for Safety

These vehicles have a special focus on safety. These are designed according to STANAG level 4 and level 5 protection, which is a standard of NATO.

There is no effect on heavy shoots and blasts. Also it has been given modular blast and ballistic protection, which can be extended or subtracted as needed. This makes the soldiers sitting inside the vehicle safe.

इन प्लेटफॉर्म्स में करीब 65 प्रतिशत तक स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसे आगे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है।

इन प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों की भी अहम भूमिका रही है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज लिमिटेड ने इसमें सहयोग किया है। इसके अलावा कई छोटे और मझोले उद्योगों ने भी इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया है। इससे देश का डिफेंस इंडस्ट्री इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker

ट्रैक्ड और व्हील्ड वर्जन में क्या है अंतर

भारत का भूगोल काफी अलग-अलग तरह का है, जिसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदान शामिल हैं। इसी वजह से सेना को अलग-अलग तरह के वाहनों की जरूरत होती है। एक पहियों पर चलता है (व्हील्ड 8×8) और दूसरा चेन या ट्रैक पर (ट्रैक्ड)। सेना दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग परिस्थितियों में करती है, क्योंकि दोनों की ताकत अलग है।

स्पीड की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म सड़क पर काफी तेज चलता है। इसकी रफ्तार आम तौर पर 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इसलिए यह लंबी दूरी जल्दी तय कर सकता है। वहीं ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म की स्पीड कम होती है, लगभग 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा, लेकिन इसकी असली ताकत स्पीड नहीं बल्कि कठिन इलाकों में चलने की क्षमता है।

जबकि ट्रैक्ड वाहन मिट्टी, बर्फ, पहाड़ और जंगल जैसे इलाकों में आसानी से चलता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन को पकड़कर आगे बढ़ते हैं। वहीं व्हील्ड वाहन ऐसे इलाकों में चल तो सकता है, लेकिन उसकी क्षमता सीमित होती है। यही वजह है कि पहाड़ी या दलदली इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।

वहीं, मेंटेनेंस के मामले में व्हील्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा आसान होता है। इसके पार्ट्स जल्दी बदल जाते हैं और खर्च भी कम आता है। ट्रैक्ड वाहन में चेन सिस्टम होता है, जिसकी देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है और खर्च भी ज्यादा होता है। इसलिए लंबे समय तक ऑपरेशन के लिए व्हील्ड प्लेटफॉर्म लॉजिस्टिक के लिहाज से आसान रहता है।

आवाज और स्टील्थ यानी छिपकर चलने की क्षमता भी अहम होती है। व्हील्ड वाहन कम आवाज करता है, जिससे दुश्मन को इसकी मौजूदगी का पता लगाना मुश्किल होता है। ट्रैक्ड वाहन ज्यादा आवाज करता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन से रगड़ खाते हुए चलते हैं। इस वजह से सरप्राइज मूवमेंट में व्हील्ड प्लेटफॉर्म को फायदा मिलता है।

वजन और ट्रांसपोर्ट के मामले में भी अंतर है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म आमतौर पर हल्का होता है, करीब 24 से 26 टन के आसपास, इसलिए इसे पुलों से पार कराना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान होता है। ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भारी होता है और इसके लिए मजबूत पुल या खास ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है।

फायरिंग के दौरान स्थिरता की बात करें तो यहां ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म आगे रहता है। इसकी ग्रिप मजबूत होती है, जिससे चलते समय भी गन ज्यादा सटीक फायर कर सकती है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म में भी अच्छी स्टैबिलिटी होती है, लेकिन ट्रैक्ड जितनी नहीं। इसलिए भारी कॉम्बैट में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म को बेहतर गन प्लेटफॉर्म माना जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker

इस्तेमाल की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म मैदान, रेगिस्तान, शहर और हाईवे जैसे इलाकों के लिए बेहतर है। यह काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में भी काम आता है, जहां तेजी से मूव करना जरूरी होता है। दूसरी तरफ ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पहाड़, जंगल और भारी लड़ाई वाले इलाकों के लिए बनाया जाता है, जहां जमीन कठिन होती है और ज्यादा ग्रिप की जरूरत होती है।

भारतीय सेना को दोनों तरह के प्लेटफॉर्म इसलिए चाहिए क्योंकि देश का भूगोल बहुत अलग-अलग तरह का है। पंजाब और राजस्थान जैसे मैदान और रेगिस्तान वाले इलाकों में व्हील्ड प्लेटफॉर्म तेजी से काम करता है। वहीं लद्दाख, हिमालय और उत्तर-पूर्व के इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद रहता है, क्योंकि वहां बर्फ, कीचड़ और ढलान ज्यादा होती है।

इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इन्हें अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
इनका इस्तेमाल इंफैंट्री कॉम्बैट, टोही मिशन, कमांड पोस्ट और एंटी टैंक ऑपरेशन जैसे कई रोल में किया जा सकता है। इससे एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

WhAP और नए AAP में क्या है अंतर

WhAP पहला मजबूत बेस था, और AAP उसी का अगला, ज्यादा एडवांस्ड वर्जन है। WhAP 8×8 दरअसल डीआरडीओ और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का बनाया हुआ एक पहियों वाला आर्मर्ड वाहन था। इसे इंफैंट्री को सुरक्षित तरीके से ले जाने और जरूरत पड़ने पर लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसमें सैनिक अंदर बैठकर मूव करते थे और ऊपर लगे टरेट से फायरिंग होती थी। पुराने WhAP में आमतौर पर मैन्ड टरेट लगाया जाता था, यानी टरेट के अंदर भी सैनिक बैठता था, या फिर कुछ मामलों में रिमोट कंट्रोल्ड वेपन सिस्टम लगाया जाता था।

तकनीकी तौर पर WhAP करीब 24 टन वजन का होता है और इसमें लगभग 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया जाता है। यह पानी में भी चल सकता है, यानी इसमें एम्फीबियस क्षमता होती है। सुरक्षा के लिए इसमें STANAG लेवल 3 से 4 तक का प्रोटेक्शन दिया गया था, जो गोलियों और छोटे ब्लास्ट से बचाव करता है। इस प्लेटफॉर्म को मोरक्को जैसे देशों को एक्सपोर्ट भी किया गया और भारत में कुछ सुरक्षा बलों ने भी इसका इस्तेमाल किया। (AAP vs WhAP vs Stryker)

वहीं, नए Advanced Armoured Platform यानी AAP की बत करें, तो यह उसी WhAP का अगला और ज्यादा आधुनिक रूप है। सबसे बड़ा बदलाव इसके टरेट में है। नए AAP में 30 मिमी का क्रूलेस टरेट लगाया गया है। क्रूलेस का मतलब है कि टरेट के अंदर कोई सैनिक नहीं बैठता, बल्कि इसे पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हैं और उन्हें सीधे खतरे का सामना नहीं करना पड़ता।

इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप के साथ 7.62 मिमी की मशीन गन भी लगी होती है। इसके अलावा इसमें एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM लॉन्च करने की क्षमता भी होती है। सुरक्षा के मामले में भी नया AAP काफी आगे है। इसमें STANAG लेवल 4 और 5 तक का प्रोटेक्शन दिया गया है, जो पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। इसमें मॉड्यूलर आर्मर लगाया गया है, यानी जरूरत के हिसाब से सुरक्षा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे यह अलग-अलग ऑपरेशन के हिसाब से खुद को ढाल सकता है।

डिजाइन की बात करें तो AAP पूरी तरह मॉड्यूलर है। एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग रोल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे इसे इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, कमांड पोस्ट, रेकी व्हीकल या मोर्टार कैरियर में बदला जा सकता है।

मोबिलिटी यानी चलने-फिरने की क्षमता भी बेहतर की गई है। इसमें हाई पावर इंजन और बेहतर पावर-टू-वेट रेशियो दिया गया है, जिससे यह तेज रफ्तार से चल सकता है और मुश्किल रास्तों को पार कर सकता है। पानी में चलने के लिए इसमें बेहतर हाइड्रो जेट सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसकी एम्फीबियस क्षमता पहले से ज्यादा प्रभावी हो गई है।

इसके अलावा इसमें रन-फ्लैट टायर्स भी होते हैं, यानी अगर टायर को नुकसान भी हो जाए, तब भी वाहन कुछ दूरी तक चलता रह सकता है। साथ ही इसमें एडवांस्ड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो युद्ध के दौरान बेहतर जानकारी और कंट्रोल देते हैं।

वहीं ट्रैक्ड AAP एक बिल्कुल अलग और नया प्लेटफॉर्म है। इसे ट्रैक्ड इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के तौर पर डेवलप किया गया है, जो भविष्य में पुराने बीएमपी-2 जैसे वाहनों की जगह ले सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

स्ट्राइकर और 8×8 AAP में क्या है अंतर

स्ट्राइकर और भारत का नया एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) दोनों ही 8×8 व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल हैं, लेकिन इनका डिजाइन और इस्तेमाल अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है। स्ट्राइकर अमेरिकी सेना के लिए बना एक हल्का और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है, जबकि AAP भारत की परिस्थितियों—जैसे ऊंचाई, नदियां और अलग-अलग इलाकों—को ध्यान में रखकर तैयार किया गया नया और ज्यादा एडवांस्ड सिस्टम है।

वजन की बात करें तो स्ट्राइकर का वजन 16.5 से 19 टन के बीच है। वहीं AAP का वजन ज्यादा है, लगभग 24 से 26 टन। हल्का होने की वजह से स्ट्राइकर को एयरक्राफ्ट (जैसे सी-130) से आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। लेकिन ज्यादा वजन होने के बावजूद AAP में ताकत ज्यादा मिलती है।

इंजन पावर की बात करें, तो स्ट्राइकर में लगभग 350 हॉर्सपावर का इंजन होता है, जबकि AAP में करीब 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया गया है। AAP कठिन इलाकों जैसे पहाड़ या ऊंचाई वाले क्षेत्र में बेहतर काम कर सकता है। इसका पावर-टू-वेट रेशियो भी ज्यादा है, जो लगभग 24-25 एचपी/टन के आसपास माना जाता है, जबकि स्ट्राइकर में यह करीब 17-18 एचपी/टन है।

स्पीड दोनों की लगभग बराबर है। सड़क पर दोनों 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकते हैं। लेकिन असली फर्क पानी में देखने को मिलता है। स्ट्राइकर पूरी तरह एम्फीबियस नहीं है, सिर्फ सीमित पानी (फोर्डिंग) पार कर सकता है। दूसरी तरफ AAP में हाइड्रो जेट्स लगे होते हैं, जिससे यह पानी में 8 से 10 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है।

प्रोटेक्शन की बात करें, तो स्ट्राइकर में STANAG लेवल 3 से 4 तक की सुरक्षा मिलती है और इसमें IED ब्लास्ट से बचने के लिए डबल वी-हुल डिजाइन दिया गया है। वहीं AAP में STANAG लेवल 4 से 5 तक का प्रोटेक्शन मिलता है, जो ज्यादा मजबूत है। इसके साथ मॉड्यूलर आर्मर भी है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

अब फायरपावर की बात करें तो AAP यहां ज्यादा एडवांस्ड है। इसमें 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसके साथ 7.62 मिमी मशीन गन और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM भी एक ही टरेट में इंटीग्रेटेड होती है।

स्ट्राइकर में 2.7 मिमी मशीन गन या 40 मिमी ग्रेनेड लॉन्चर लगा होता है। कुछ वर्जन में 30 मिमी गन भी होती है, लेकिन ATGM अलग सिस्टम के जरिए लगाया जाता है, जैसे TOW मिसाइल वाला अलग वेरिएंट या Javelin मिसाइल के साथ रिमोट वेपन स्टेशन। यानी AAP में फायरपावर ज्यादा इंटीग्रेटेड है।

दोनों वाहनों में 2 क्रू मेंबर और 9-10 सैनिक बैठ सकते हैं। मॉड्यूलर डिजाइन के मामले में भी दोनों मजबूत हैं। स्ट्राइकर के कई वेरिएंट हैं, जैसे एम्बुलेंस, कमांड, रिकॉन। वहीं, AAP को भी अलग-अलग रोल जैसे इंफैंट्री कॉम्बैट, कमांड पोस्ट या मोर्टार कैरियर के लिए बदला जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

Trump told India ‘Narak’s Pita’, the Inforation Worfair took a gaze Iran

Hellhole India Information Warfare
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Hellhole India Information Warfare: The U.S. President Trump began a social media post controversy has now become a topic of international discussions. Former US President Donald Trump shared a video clip using words like "Helhole" i.e. "Neck’s pit" from India and China. However, the Ministry of External Affairs responded to a restrained response, but kept silence as a political level. Whereas Iran had no health far from this dispute, but rebounded on the US while defending India.

The clip was actually part of an old podcast interview, discussing birth-based citizenship i.e. Berthright Citizenship. The clip said, "There is a child immediately becoming a citizen and then the whole family comes from the pit of China or India or any other dancer in the world. "It was commented on India and China during the same time. Trump re-shared it, after which the case spreads rapidly.

Hellhole India Information Warfare: Restrained Response to the Ministry of External Affairs

The Ministry of External Affairs of India said that such comments are not based on facts and are completely inappropriate. The ministry spokesperson said that such statements do not reflect the reality of India-US relations.

He also clarified that relations between the two countries are based on mutual respect and shared interests. Also stated that such comments on on on ongoing business and strategic interaction will have no effect.

The government maintained balance while making statements and saw attempts to avoid any conflict.

Iran’s entry, rebound on social media

About Us iran Reacted by taking this whole case in your hands. The Iranian Missions present in India, posted on social media and opposed the statement.

The Hyderabad Mission wrote in the post, "His thinking from Trump’s post looks clean and reflects racism. India and China are very old and rich civilizations. The actual heel hole is the place where its war was threatening to eradicate the criminal president’s civilization. "Mumbai Kansulette wrote a video of the cultural heritage of Maharashtra, "Sometimes India came and watch. " Iran reversed the Trump’s comment on the US, stating the "Centre of Goods" to India.

Speaking in another post, said that "devided and ruel" is a matter of, but tremps are just sharing people, not being able to rule.

यह जवाब इतना तीखा और व्यंग्यपूर्ण था कि सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। भारतीय यूजर्स ने इसे “ईरान की मजबूत दोस्ती” बताया।

ईरान के इन पोस्ट्स के बाद सोशल मीडिया पर एक तरह का “मीम वॉर” शुरू हो गया। कई मीम्स में ट्रंप को अलग-अलग अंदाज में दिखाया गया। एक मीम में उन्हें वैज्ञानिक आइंस्टीन की तरह दिखाया गया, जबकि दूसरे में उन्हें बमबारी के बाद कमजोर हालत में दिखाया गया। इन मीम्स के जरिए ईरान ने ट्रंप के बयान का मजाक उड़ाया और अपनी बात लोगों तक पहुंचाई।

इनफॉरमेशन वॉरफेयर का बड़ा उदाहरण

हो सकता है कि मोबाइल स्कीन पर आप ईरान की तरफ से शेयर वडा पाव, बन मस्का, पाव भाजी या ईरानी चाय के वीडियोज को देख कर खुश हो रहे हों, और उन्हें रीट्वीट कर रहे हों, लेकिन यह ईरान की इनफॉरमेशन वॉरफेयर की रणनीति है।

आज के समय में किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटना की शुरुआत अक्सर सोशल मीडिया से होती है। एक वीडियो या पोस्ट तेजी से लोगों तक पहुंचता है और उसी के आधार पर धारणा बनती है।

ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, इस तरह के पोस्ट भारत में ही तैयार किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजरायल की तरफ से जो प्रचार किया जाता है, उसका जवाब सिर्फ आधिकारिक बयान से नहीं दिया जा सकता। इसलिए लोगों तक पहुंचने के लिए क्रिएटिव और आसान तरीके अपनाए जा रहे हैं, ताकि ज्यादा लोग इसे समझ सकें और जुड़ सकें।

इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। पहले एक वीडियो क्लिप सामने आई, फिर उस पर प्रतिक्रिया आई और उसके बाद अलग-अलग देशों ने अपनी-अपनी तरह से संदेश देना शुरू किया।

ईरान की प्रतिक्रिया में व्यंग्य, सांस्कृतिक संदर्भ और सोशल मीडिया की भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिससे वह जल्दी वायरल हो गई।

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से जुड़े कुछ ऑनलाइन नेटवर्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर काफी सक्रिय रहे हैं। इनमें “BRICS4CLICKS” और “Verified4War” जैसे ग्रुप शामिल बताए जाते हैं। कहा जाता है कि इन नेटवर्क्स ने बहुत कम समय में करोड़ों-करोड़ लोगों तक अपना कंटेंट पहुंचाया।

इन पोस्ट्स में एआई से बनाए गए वीडियो, एडिट की गई तस्वीरें और ऐसे संदेश शामिल होते हैं, जो एक खास नजरिया दिखाते हैं। इनमें अक्सर अमेरिका और इजरायल की छवि खराब दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि ईरान को मजबूत और सफल दिखाया जाता है।

हालांकि ईरान की तरफ से यह भी कहा गया कि एआई का इस्तेमाल जानकारी समझाने के लिए होना चाहिए, न कि गलत प्रचार फैलाने के लिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने कुछ ऐसी तस्वीरों का जिक्र किया था, जिन्हें बाद में एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीरें बताया गया।

परेस्प्शन की लड़ाई

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने यह दिखाया है कि युद्ध अब सिर्फ जमीन, आसमान या समुद्र में नहीं लड़ा जाता, बल्कि धारणा (परेस्प्शन) की लड़ाई भी उतनी ही अहम हो गई है।

Social Media पर जो पक्ष सबसे पहले लोगों का ध्यान खींच लेता है, वही आगे की पूरी कहानी को प्रभावित करता है। टीवी डिबेट, अखबारों की हेडलाइन और कूटनीतिक चर्चा तक उसी के असर में आती है।

ईरान ने इस बात को समझते हुए अपनी रणनीति बनाई। उसने सिर्फ सरकारी बयान नहीं दिए, बल्कि मीम्स, छोटे वीडियो, एआई से बने विजुअल्स और आसान भाषा का इस्तेमाल किया।

अलग-अलग दर्शकों के लिए अलग संदेश

ईरान ने अपने संदेश को अलग-अलग देशों और दर्शकों के हिसाब से तैयार किया। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए उसने खुद को एक हमले का शिकार देश बताया। पश्चिमी देशों के लिए उसने इसे अमेरिकी दखल के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर उसने व्यंग्य, मजाक और इंटरनेट कल्चर का इस्तेमाल किया, जिससे युवा वर्ग जल्दी जुड़ गया।

वहीं भारत के मामले में यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी ईरान कई बार ऐसा कर चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का यह कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत ने इस पूरे मामले में सीधे किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, लेकिन ईरान ने इसे अपने तरीके से “दोस्ती” की तरह पेश करने की कोशिश की।

ईरान के बयानों में बार-बार भारत को एक पुरानी और महान सभ्यता बताया गया, ताकि लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाया जा सके।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के सामने संतुलन बनाए रखना जरूरी है। भारत के एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान और रूस के साथ भी ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े संबंध हैं।

AeroForce X, India-Germany, a powerful drone of 5 tonnes, will be built in India

AeroForce X UAV India Germany Deal

AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत और जर्मनी अब डिफेंस सेक्टर में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। जर्मनी की एयरोडेटा एजी और भारत की डायनॉटन सिस्टम्स ने एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत भारत में एक नए तरह के एडवांस्ड ड्रोन यानी यूएवी प्लेटफॉर्म “एयरोफोर्स एक्स” का को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन किया जाएगा। यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर निगरानी और खुफिया मिशनों के लिए तैयार किया जाएगा। बता दें कि रक्षा मंत्री ने भी अपने जमर्नी दौरे में को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है। भारत जर्मन इंडस्ट्री को एडवांस टेक्नोलॉजी में हमारे साथ मिलकर को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने के लिए आमंत्रित करता है।

AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत में बनेगा एडवांस्ड यूएवी प्लेटफॉर्म

डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के प्रमुख डॉ. उदयंत टोबी मल्होत्रा ने कहा कि जर्मनी की कंपनी एयरोडेटा एजी और डायनॉटन सिस्टम्स, जो डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज का हिस्सा है, ने मिलकर एक नया ड्रोन सिस्टम बनाने का फैसला किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत “एयरोफोर्स एक्स” नाम का एडवांस्ड यूएवी भारत में बनाया जाएगा।

22 अप्रैल को हुए इस समझौते का मकसद भारत में ही बड़े और आधुनिक अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी तैयार करना है। यह ड्रोन सिस्टम मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस कैटेगरी में आएगा, जिन्हें शॉर्ट में MALE और HALE कहा जाता है।

यह प्लेटफॉर्म करीब 5 टन वेट कैटेगरी का होगा और लंबे समय तक लगातार उड़ान भर सकेगा। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह पहाड़ी इलाकों और समुद्री क्षेत्रों दोनों में काम कर सके। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

AeroForce X UAV India Germany Deal

लंबी उड़ान और ऊंचाई इसकी खासियत

एयरोफोर्स एक्स एक नया और एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम है, जिसे एमएएलई यूएएस कहा जाता है। इसका वजन लगभग 5 टन है, यानी यह काफी बड़ा और ताकतवर प्लेटफॉर्म है। इसमें करीब सेंसर और कैमरे समेत 1300 किलो तक के उपकरण लगाए जा सकते हैं।

यह ड्रोन एक बार में करीब 40 घंटे तक लगातार उड़ सकता है, इसलिए लंबे समय तक निगरानी करने के लिए यह बहुत उपयोगी है। इसका एक वर्जन 30 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर उड़ सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 50 हजार फीट से भी ऊपर उड़ान भर सकता है।

इसकी एक खास बात यह भी है कि यह ITAR-फ्री प्लेटफॉर्म है, यानी इस पर अमेरिकी एक्सपोर्ट नियमों की पाबंदी नहीं होगी। इससे दूसरे देशों के साथ मिलकर काम करना आसान हो जाता है। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

हिमालय और समुद्र दोनों पर नजर

इस प्लेटफॉर्म को खास तौर पर हिमालय क्षेत्र और Indian Ocean क्षेत्र के लिए तैयार किया जा रहा है। हिमालय में ऊंचाई और मौसम बड़ी चुनौती होती है, जहां लंबे समय तक निगरानी रखना आसान नहीं होता। ऐसे में यह ड्रोन लगातार उड़ान भरकर इलाके पर नजर रख सकेगा।

वहीं समुद्री क्षेत्र में इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, गतिविधियों पर नजर रखने और सुरक्षा से जुड़े कामों में किया जा सकेगा। यह प्लेटफॉर्म इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशनों के लिए उपयोगी होगा।

इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी डायनॉटन सिस्टम्स की अहम भूमिका होगी। कंपनी अपने खुद के विकसित सॉफ्टवेयर, कस्टम हार्डवेयर और सेंसर सिस्टम इस प्लेटफॉर्म में लगाएगी। बताया गया है कि इसमें 50 लाख लाइनों का कोड इस्तेमाल किया जाएगा, जो पूरे सिस्टम को कंट्रोल करेगा।

इसे प्लेटफॉर्म का “नर्वस सिस्टम” कहा जा रहा है, जो सभी हिस्सों को आपस में जोड़कर काम करने में मदद करेगा। इस तरह यह सिर्फ एक ड्रोन नहीं, बल्कि एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

AeroForce X UAV India Germany Deal

दोनों कंपनियां मिलकर करेंगी काम

डॉ. मल्होत्रा के अनुसार, यह सिर्फ एक सामान्य साझेदारी नहीं है, बल्कि दोनों कंपनियां मिलकर इस तकनीक को विकसित करेंगी। यानी डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन सब कुछ साथ में होगा। इस प्रोजेक्ट में बनने वाली टेक्नोलॉजी पर दोनों कंपनियों का साझा अधिकार होगा।

इस समझौते के तहत दोनों कंपनियां मिलकर इस प्लेटफॉर्म को विकसित करेंगी। इसमें डिजाइन से लेकर निर्माण तक का काम शामिल होगा। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ी टेक्नोलॉजी और आईपी यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का स्वामित्व दोनों कंपनियों के पास रहेगा।

इसका मतलब है कि भारत को इस टेक्नोलॉजी पर सीधा नियंत्रण मिलेगा और भविष्य में इसमें बदलाव या सुधार करना आसान होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

जर्मनी के दौरे पर थे रक्षा मंत्री

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जर्मनी के दौरे पर थे। उन्होंने म्यूनिख में डिफेंस इन्वेस्टर समिट के दौरान जर्मन उद्योग जगत को भारत के साथ मिलकर काम करने का न्योता दिया था।

उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी बहुत जरूरी हो गई है और भारत ऐसे सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है। उन्होंने साफ किया कि भारत अब सिर्फ रक्षा उपकरण खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन में भागीदार बनना चाहता है।

इस प्रोजेक्ट को “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” अभियान से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत लंबे समय से ड्रोन टेक्नोलॉजी के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। ऐसे में इस तरह का प्लेटफॉर्म देश में विकसित होने से घरेलू क्षमता मजबूत होगी। वहीं, भारतीय कंपनियों को नई टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा क्षेत्र में उनका अनुभव भी बढ़ेगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

बता दें कि एयरोडेटा एजी जर्मनी की एक कंपनी है, जो एयरबोर्न सर्विलांस और मिशन सिस्टम्स के क्षेत्र में काम करती है। वहीं डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज भारत की एक जानी-मानी इंजीनियरिंग कंपनी है, जो एयरोस्पेस और अन्य क्षेत्रों में काम करती है। उसकी डायनॉटन सिस्टम्स यूनिट खास तौर पर ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम्स पर काम कर रही है।

AeroForce X UAV India Germany Deal

डॉ. मल्होत्रा ने यह भी बताया कि इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है और शुरुआती चरण की तस्वीरें भी सामने आई हैं। इसमें डिजाइन, सिस्टम इंटीग्रेशन और अलग-अलग तकनीकों को जोड़ने का काम चल रहा है। यह पूरा प्रोजेक्ट चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगा, जिसमें पहले डिजाइन और टेस्टिंग होगी, उसके बाद उत्पादन की दिशा में काम किया जाएगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)