Indian Army FM Radio Stations: In the remote hilly areas of India, adjacent to China and Pakistan border, it is now not only the army chowk but also the sound of the radio. Ongoing FM radio stations with the help of Indian Army in the border villages of Ladakh, Arunachal Pradesh, Sikkim, Himachal Pradesh and Uttarakhand are now becoming a major resort to information, weather, cultivation, health and employment for locals. The motive of these stations is not just to entertain, but also to connect people living in border areas to the mainstream of the country and respond to rumors.
Indian Army Operation Harmony These FM stations launched under the project and central government’s Vibrant Willage Program are now becoming a new identity of the villages settled near the LAC i.e. Line of Actual Control. Where the mobile network is weak, the Internet remains as closed for several times days and the road contact is broken due to the weather, there has become the most trusted means of delivering the necessary information to the radio station people.
The three FM stations have been launched in Himachal Pradesh in the past three and a half years, according to the sources. These stations broadcast for about 12 to 14 hours every day. The programmes are prepared in local languages and dialects so that people in the village can easily understand them.
Indian Army FM Radio Stations: Why are required in the border villages
भारत-चीन सीमा से लगे हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांव आज भी नेटवर्क और संचार सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। कई जगहों पर मोबाइल सिग्नल नहीं आता, इंटरनेट बेहद धीमा रहता है और खराब मौसम में पूरा इलाका बाहरी दुनिया से कट जाता है।
ऐसे हालात में रेडियो अभी भी सबसे असरदार माध्यम माना जाता है। सेना और प्रशासन ने महसूस किया कि अगर स्थानीय लोगों तक समय पर सही जानकारी पहुंचानी है तो लोकल एफएम नेटवर्क सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है।
इसी सोच के तहत सेना ने सीमावर्ती गांवों में ऐसे रेडियो स्टेशन शुरू किए, जो सिर्फ समाचार नहीं सुनाते, बल्कि गांवों की अपनी आवाज बनकर उभरे हैं। यहां खेती-किसानी से लेकर बर्फबारी, सड़क बंद होने, लैंडस्लाइड, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं और सेना भर्ती तक की जानकारी दी जाती है।
इन स्टेशनों का एक बड़ा मकसद गलत सूचनाओं और अफवाहों को रोकना भी है। सीमावर्ती इलाकों में कई बार सोशल मीडिया या बाहरी स्रोतों से फैली गलत खबरें लोगों में भ्रम पैदा करती हैं। ऐसे में लोकल रेडियो स्टेशन भरोसेमंद जानकारी का माध्यम बन रहे हैं।
ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेजे प्रोग्राम का हिस्सा
इन एफएम स्टेशनों को भारतीय सेना के “ऑपरेशन सद्भावना” के तहत चलाया जा रहा है। सेना लंबे समय से सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामुदायिक विकास से जुड़े प्रोजेक्ट चलाती रही है।
केंद्र सरकार का “वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम” भी इसी दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य चीन सीमा के पास बसे गांवों को खाली होने से रोकना और वहां बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना है।
सरकार और सेना का मानना है कि अगर सीमावर्ती गांव मजबूत और आबाद रहेंगे तो राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी। एफएम स्टेशन इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश में कहां चल रहे हैं एफएम स्टेशन
हिमाचल प्रदेश में फिलहाल दो बड़े एफएम स्टेशन चल रहे हैं। दोनों स्टेशन ऐसे इलाकों में हैं जो चीन सीमा के बेहद करीब माने जाते हैं।
पहला स्टेशन “वॉयस ऑफ किन्नौर” है, जो 88.4 एफएम फ्रीक्वेंसी पर चलता है। यह किन्नौर जिले के पूह इलाके में स्थापित किया गया है। यह इलाका हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के पास स्थित है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस स्टेशन से किन्नौरी बोली में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। यहां के कार्यक्रमों का मुख्य फोकस सेब और ड्राई फ्रूट की खेती पर रहता है। किसानों को मंडियों में फलों के ताजा दाम, नई ग्राफ्टिंग तकनीक, कीट नियंत्रण और मौसम की जानकारी दी जाती है।
किन्नौर में अक्सर भारी बर्फबारी और लैंडस्लाइड के कारण सड़कें बंद हो जाती हैं। ऐसे समय में यह स्टेशन लोगों को सड़क की स्थिति और मौसम से जुड़े अलर्ट भी देता है।
दूसरा स्टेशन “वॉयस ऑफ स्पीति” है, जो 88.8 एफएम पर चलता है। यह लाहौल-स्पीति जिले के ग्यू गांव में स्थापित किया गया है। यह इलाका बेहद ऊंचाई पर स्थित है और सर्दियों में कई महीनों तक कट जाता है।
यह स्टेशन स्थानीय बोली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। यहां खेती, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों के अलावा लोक संस्कृति पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। गांव के बुजुर्गों की मौखिक कहानियां और लोक गीत भी प्रसारित किए जाते हैं।
उत्तराखंड में तीन बड़े स्टेशन ऑपरेशनल
uttarakhand में फिलहाल तीन एफएम स्टेशन काम कर रहे हैं। इनका दायरा बद्रीनाथ, गंगोत्री, हेमकुंड साहिब और कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट तक फैला हुआ है।
जोशीमठ में चल रहे स्टेशन का नाम “तराना” है। इसे कई जगह “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” के नाम से भी जाना जाता है। यह स्टेशन चमोली जिले में स्थित है।
जोशीमठ बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब जाने वाले यात्रियों के लिए मुख्य पड़ाव माना जाता है। यहां का रेडियो स्टेशन गढ़वाली और हिंदी भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता है।
इस स्टेशन पर एग्रो-टूरिज्म, पहाड़ी खेती, स्थानीय हस्तशिल्प और टिकाऊ पर्यटन से जुड़े कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। स्थानीय महिलाएं और युवा भी रेडियो कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।
उत्तरकाशी जिले के हर्षिल में भी “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। यह गंगोत्री मार्ग पर स्थित है। यहां का स्टेशन मौसम, सड़क की स्थिति, बर्फबारी और लैंडस्लाइड की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाता है।
गंगोत्री यात्रा के दौरान हजारों तीर्थयात्री इस इलाके से गुजरते हैं। ऐसे में यह स्टेशन यात्रियों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए उपयोगी साबित हो रहा है।
पिथौरागढ़ में “पंचशूल पल्स 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। इसका टैगलाइन है “हिल से दिल तक”। यह स्टेशन लिपुलेख पास की तरफ जाने वाले इलाके में स्थित है, जहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग भी गुजरता है।
यह स्टेशन मुख्य रूप से कृषि और बागवानी पर केंद्रित है। यहां किसानों को फल और सब्जियों की खेती, मौसम और बाजार से जुड़ी जानकारी दी जाती है।
अब चार और स्टेशन शुरू करने की तैयारी
सेना और प्रशासन अब उत्तराखंड में चार और एफएम स्टेशन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। ये सभी स्टेशन भी चीन सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में बनाए जाएंगे।
इनमें पहला स्टेशन गूंजी में प्रस्तावित है। गूंजी पिथौरागढ़ जिले में भारत-नेपाल-तिब्बत ट्राई-जंक्शन के पास स्थित है। यह इलाका सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
दूसरा स्टेशन धाराली में बनाया जाएगा, जो गंगोत्री के पास स्थित है।
इसके अलावा लैंसडाउन और रानीखेत में भी नए स्टेशन शुरू किए जाने की योजना है। ये दोनों इलाके अपेक्षाकृत निचले पहाड़ी क्षेत्रों में आते हैं।
अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी शुरुआत
पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे चीन सीमा से जुड़े दूरदराज क्षेत्रों में सेना की मदद से कई आर्मी-बैक्ड एफएम और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किए गए हैं।
ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले के दिरांग इलाके में रेडियो दिरांग 88.4 एफएम शुरू किया गया है। इसकी टैगलाइन है “अपनी मिट्टी, अपनी कहानी”। यह भारत-चीन सीमा के पास स्थित क्षेत्र में स्थापित किया गया है। दिसंबर 2025 में ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने इसका उद्घाटन किया था। इसे ईस्टर्न थिएटर का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है।
यह स्टेशन 4 गजराज कोर द्वारा संचालित किया जा रहा है। यहां स्थानीय संस्कृति, परंपराएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, मौसम और सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। खास बात यह है कि लोग इसे मोबाइल ऐप के जरिए भी सुन सकते हैं। एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर इसकी लाइव स्ट्रीमिंग और पॉडकास्ट सुविधा उपलब्ध है।
इसके अलावा सिक्किम में भी सेना ने “रेडियो सिक्किम सुंदरी 88.4 एफएम” शुरू किया है। इसे अप्रैल 2026 में लॉन्च किया गया था। यह सिक्किम का पहला बॉर्डर विलेज कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। यह स्टेशन ट्राई शक्ति कोर के तहत हाई-ऑल्टीट्यूड सीमा क्षेत्र में चलाया जा रहा है।
इस रेडियो स्टेशन पर स्थानीय समाचार, मौसम अपडेट, सरकारी योजनाएं, लोकल संस्कृति और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। सिक्किम के कई गांव कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कमजोर नेटवर्क की समस्या से जूझते हैं। ऐसे में यह स्टेशन लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहा है। इसका मोबाइल ऐप भी उपलब्ध है, जिससे लोग कहीं से भी कार्यक्रम सुन सकते हैं। इन रेडियो स्टेशनों से रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण किया जाता है। कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं और बोलियों में तैयार किए जाते हैं ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।
लद्दाख में भी सेना चला रही है पांच स्टेशन
लद्दाख के दूर-दराज और भारत-चीन सीमा से जुड़े इलाकों में भी भारतीय सेना रेडियो के जरिए लोगों तक जरूरी जानकारी भी पहुंचा रही है। इन रेडियो स्टेशनों से स्थानीय लोगों को मौसम, बर्फबारी, सड़क बंद होने, सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती और सेना भर्ती जैसी जानकारी मिलती है। खास बात यह है कि कार्यक्रम लद्दाखी, शीना, हिंदी और दूसरी लोकल भाषाओं में प्रसारित किए जाते हैं, ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।
लेह में “एफएम यांग स्यान” नाम का स्टेशन 90 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर चलता है। इसे जून 2024 में शुरू किया गया था। यह स्टेशन फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत चलता है। यहां लोकल संस्कृति, युवाओं से जुड़े कार्यक्रम, शिक्षा और सामुदायिक मुद्दों पर प्रसारण होता है। इसका सिग्नल लेह और आसपास के इलाकों तक पहुंचता है।
कारगिल जिले की द्रास घाटी में “रेडियो द्रास” या “सीआरएस द्रास 90.4 एफएम” चल रहा है। द्रास को दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका माना जाता है। इस स्टेशन की टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है। यहां मौसम अलर्ट, लैंडस्लाइड, सरकारी योजनाएं, स्वास्थ्य और खेती से जुड़ी जानकारी दी जाती है। यह स्टेशन लोकल लोगों के लिए काफी मददगार माना जा रहा है। इसकी लाइव स्ट्रीमिंग भी उपलब्ध है। स्टेशन को सेना ने शुरू किया, लेकिन अब इसमें स्थानीय लोग भी काम कर रहे हैं।
इसके अलावा लेह जिले के बेहद दूरदराज इलाके हानले में “सीआरएस अनले” या “कम्युनिटी रेडियो हनले” 89.6 मेगाहर्ट्ज पर चलता है। इसे नवंबर 2024 में शुरू किया गया था। इस इलाके को तारों से भरे आसमान के लिए जाना जाता है, इसलिए इसकी टैगलाइन “जहां सितारे मिले” रखी गई। यहां लद्दाखी, हिंदी और अंग्रेजी में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। स्टेशन पर शिक्षा, मनोरंजन, लोकल संस्कृति और जरूरी सूचनाओं से जुड़े शो चलते हैं।
कारू इलाके में भी सेना ने एक कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किया है। यह भी ऑपरेशन सद्भावना प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसका मकसद आसपास के गांवों को जानकारी और संचार से जोड़ना है।
वहीं, नुब्रा वैली के त्याक्षी गांव में “रेडियो श्योक” 89.2 एफएम पर प्रसारण करता है। इसे 3 कुमाऊं राइफल्स मैनेज करती है। यहां शिक्षा, बॉर्डर गांवों के विकास, युवाओं के मोटिवेशन और लोकल न्यूज पर कार्यक्रम होते हैं। हाल ही में शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने यहां पॉडकास्ट भी रिकॉर्ड किए थे।
लद्दाख में ऐसे पांच से ज्यादा रेडियो स्टेशन सेना के सहयोग से चल रहे हैं। ये स्टेशन रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण करते हैं।
पाकिस्तान से सटे इलाकों में भी चल रहे हैं स्टेशन
केवल चीन सीमा से सटे इलाके ही नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान सीमा यानी एलओसी के पास भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है।
एलओसी पर सबसे प्रमुख स्टेशन “रेडियो संगम 88.8 एफएम” माना जाता है। यह जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के केरी गांव में स्थित है। यह गांव एलओसी से करीब एक किलोमीटर दूर है। जनवरी 2026 में भारतीय सेना और सिविल प्रशासन ने मिलकर इसे शुरू किया था।
रेडियो संगम को एलओसी का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसकी आवाज पाकिस्तान की तरफ भी सुनी जा सकती है। यहां स्थानीय मुद्दों, सरकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और लोकल संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं।
इसके अलावा कुपवाड़ा जिले के तंगधार-कर्नाह इलाके में “रूह-ए-कर्नाह” नाम का स्टेशन भी चल रहा है। यह इलाका एलओसी के बेहद करीब माना जाता है। इस स्टेशन का मुख्य फोकस स्थानीय कला, संगीत, सामुदायिक कहानियां, शिक्षा और सकारात्मक संदेशों पर है। इसका उद्देश्य सीमावर्ती गांवों की आवाज को सामने लाना है।
कुपवाड़ा के त्रेहगाम इलाके में “रेडियो चिनार” भी शुरू किया गया था। यहां युवाओं से जुड़े कार्यक्रमों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा बारामूला और दूसरे सीमावर्ती इलाकों में भी सेना की मदद से ऐसे रेडियो प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं।
वहीं एलओसी से सटे कारगिल-द्रास इलाके में भी सेना की मदद से “रेडियो द्रास 90.4 एफएम” चलाया जा रहा है। यह द्रास घाटी में स्थित है, जिसे दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका कहा जाता है। इसकी टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है।
इस स्टेशन की शुरुआत फरवरी 2023 में फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेन गुप्ता ने की थी। यहां हिंदी, उर्दू और शीना भाषा में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इसका कवरेज द्रास और आसपास के गांवों तक फैला हुआ है।
रेडियो द्रास पर सरकारी योजनाएं, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। साथ ही मौसम, बर्फबारी, पर्यटन और लोकल संस्कृति पर भी शो चलते हैं।
यह स्टेशन मुश्कोह वैली, कारगिल वॉर मेमोरियल और आसपास के पर्यटन स्थलों की जानकारी भी देता है। लोकल फोक म्यूजिक और सामुदायिक कार्यक्रम यहां की खास पहचान बन चुके हैं।
कारगिल शहर में “आरगाजोम 90.8 मेगाहर्ट्ज” नाम का एक और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन भी है। इसे 2022 में शुरू किया गया था और इसे लद्दाख का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसे भी भारतीय सेना का सहयोग मिला हुआ है।
सिर्फ मनोरंजन नहीं, सुरक्षा से भी जुड़ा मिशन
इन रेडियो स्टेशनों को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना जा रहा। सेना इन्हें सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक और रणनीतिक जुड़ाव के रूप में देख रही है।
सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोग कई बार खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। ऐसे में जब उनकी अपनी भाषा में रेडियो कार्यक्रम चलते हैं तो उनमें अपनापन पैदा होता है।
इन स्टेशनों पर सेना भर्ती से जुड़ी जानकारी भी दी जाती है। स्थानीय युवाओं को भर्ती प्रक्रिया, शारीरिक तैयारी और जरूरी दस्तावेजों के बारे में बताया जाता है।
सरकारी योजनाओं की जानकारी भी लगातार प्रसारित की जाती है ताकि गांवों तक सही जानकारी पहुंच सके।
लोक संस्कृति को भी मिल रहा नया मंच
इन एफएम स्टेशनों का एक बड़ा असर स्थानीय संस्कृति पर भी पड़ा है। पहाड़ी इलाकों के कई लोक गीत और परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थीं।
अब रेडियो पर लोक संगीत, पारंपरिक कहानियां और स्थानीय इतिहास को जगह मिल रही है। बुजुर्ग अपनी पुरानी यादें और अनुभव साझा करते हैं। महिलाएं लोक गीत गाती हैं और युवा रेडियो एंकरिंग सीख रहे हैं।
कई जगह किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों को भी रेडियो पर अपनी बात रखने का मौका दिया जा रहा है।
मौसम और आपदा अलर्ट में बड़ी मदद
हिमालयी इलाकों में मौसम बेहद तेजी से बदलता है। कई बार अचानक बर्फबारी, बारिश या लैंडस्लाइड होने से लोग फंस जाते हैं। ऐसे समय में ये एफएम स्टेशन तुरंत अलर्ट जारी करते हैं। किस सड़क पर भूस्खलन हुआ, कहां बर्फ ज्यादा है, कौन सा रास्ता बंद है, ऐसी जानकारी लगातार प्रसारित की जाती है। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड और चारधाम यात्रा मार्गों पर यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
स्थानीय लोग भी बन रहे हैं रेडियो की आवाज
इन स्टेशनों की खास बात यह है कि यहां सिर्फ बाहरी लोग कार्यक्रम नहीं चलाते। स्थानीय युवाओं, महिलाओं और शिक्षकों को भी प्रशिक्षण देकर कार्यक्रमों से जोड़ा गया है। कई कार्यक्रम गांव के लोग खुद तैयार करते हैं। इससे रेडियो स्टेशन स्थानीय समुदाय का हिस्सा बन गए हैं। रेडियो पर खेती की समस्याओं पर चर्चा होती है, बच्चों के लिए शैक्षणिक कार्यक्रम चलते हैं और स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं।













