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LAC और LoC से सटे गांवों में सेना के FM रेडियो स्टेशन बने लोगों की लाइफलाइन, मौसम से रोजगार तक मिल रही हर जानकारी

Indian Army FM Radio Stations
Indian Army FM Radio Stations

Indian Army FM Radio Stations: चीन और पाकिस्तान सीमा से सटे भारत के दूरदराज पहाड़ी इलाकों में अब सिर्फ सेना की चौकियां ही नहीं, बल्कि रेडियो की आवाज भी गूंज रही है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती गांवों में भारतीय सेना की मदद से चल रहे एफएम रेडियो स्टेशन अब स्थानीय लोगों के लिए सूचना, मौसम, खेती, स्वास्थ्य और रोजगार का बड़ा सहारा बनते जा रहे हैं। इन स्टेशनों का मकसद सिर्फ मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को देश की मुख्यधारा से जोड़ना और अफवाहों का जवाब देना भी है।

भारतीय सेना के ऑपरेशन सद्भावना प्रोजेक्ट और केंद्र सरकार के वाइब्रेंट विलेजे प्रोग्राम के तहत शुरू किए गए ये एफएम स्टेशन अब एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास बसे गांवों की नई पहचान बन रहे हैं। जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर है, इंटरनेट कई बार दिनों तक बंद जैसा रहता है और मौसम के कारण सड़क संपर्क टूट जाता है, वहां यह रेडियो स्टेशन लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब डेढ़ साल में हिमाचल प्रदेश में दो और उत्तराखंड में तीन एफएम स्टेशन शुरू किए गए हैं। इन स्टेशनों से हर दिन करीब 12 से 14 घंटे तक प्रसारण होता है। कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं और बोलियों में तैयार किए जाते हैं ताकि गांव के लोग आसानी से उन्हें समझ सकें।

Indian Army FM Radio Stations: सीमावर्ती गांवों में क्यों जरूरी हैं ये एफएम स्टेशन

भारत-चीन सीमा से लगे हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांव आज भी नेटवर्क और संचार सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। कई जगहों पर मोबाइल सिग्नल नहीं आता, इंटरनेट बेहद धीमा रहता है और खराब मौसम में पूरा इलाका बाहरी दुनिया से कट जाता है।

ऐसे हालात में रेडियो अभी भी सबसे असरदार माध्यम माना जाता है। सेना और प्रशासन ने महसूस किया कि अगर स्थानीय लोगों तक समय पर सही जानकारी पहुंचानी है तो लोकल एफएम नेटवर्क सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है।

इसी सोच के तहत सेना ने सीमावर्ती गांवों में ऐसे रेडियो स्टेशन शुरू किए, जो सिर्फ समाचार नहीं सुनाते, बल्कि गांवों की अपनी आवाज बनकर उभरे हैं। यहां खेती-किसानी से लेकर बर्फबारी, सड़क बंद होने, लैंडस्लाइड, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं और सेना भर्ती तक की जानकारी दी जाती है।

इन स्टेशनों का एक बड़ा मकसद गलत सूचनाओं और अफवाहों को रोकना भी है। सीमावर्ती इलाकों में कई बार सोशल मीडिया या बाहरी स्रोतों से फैली गलत खबरें लोगों में भ्रम पैदा करती हैं। ऐसे में लोकल रेडियो स्टेशन भरोसेमंद जानकारी का माध्यम बन रहे हैं।

ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेजे प्रोग्राम का हिस्सा

इन एफएम स्टेशनों को भारतीय सेना के “ऑपरेशन सद्भावना” के तहत चलाया जा रहा है। सेना लंबे समय से सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामुदायिक विकास से जुड़े प्रोजेक्ट चलाती रही है।

केंद्र सरकार का “वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम” भी इसी दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य चीन सीमा के पास बसे गांवों को खाली होने से रोकना और वहां बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना है।

सरकार और सेना का मानना है कि अगर सीमावर्ती गांव मजबूत और आबाद रहेंगे तो राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी। एफएम स्टेशन इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में कहां चल रहे हैं एफएम स्टेशन

हिमाचल प्रदेश में फिलहाल दो बड़े एफएम स्टेशन चल रहे हैं। दोनों स्टेशन ऐसे इलाकों में हैं जो चीन सीमा के बेहद करीब माने जाते हैं।

पहला स्टेशन “वॉयस ऑफ किन्नौर” है, जो 88.4 एफएम फ्रीक्वेंसी पर चलता है। यह किन्नौर जिले के पूह इलाके में स्थापित किया गया है। यह इलाका हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के पास स्थित है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस स्टेशन से किन्नौरी बोली में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। यहां के कार्यक्रमों का मुख्य फोकस सेब और ड्राई फ्रूट की खेती पर रहता है। किसानों को मंडियों में फलों के ताजा दाम, नई ग्राफ्टिंग तकनीक, कीट नियंत्रण और मौसम की जानकारी दी जाती है।

किन्नौर में अक्सर भारी बर्फबारी और लैंडस्लाइड के कारण सड़कें बंद हो जाती हैं। ऐसे समय में यह स्टेशन लोगों को सड़क की स्थिति और मौसम से जुड़े अलर्ट भी देता है।

दूसरा स्टेशन “वॉयस ऑफ स्पीति” है, जो 88.8 एफएम पर चलता है। यह लाहौल-स्पीति जिले के ग्यू गांव में स्थापित किया गया है। यह इलाका बेहद ऊंचाई पर स्थित है और सर्दियों में कई महीनों तक कट जाता है।

यह स्टेशन स्थानीय बोली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। यहां खेती, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों के अलावा लोक संस्कृति पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। गांव के बुजुर्गों की मौखिक कहानियां और लोक गीत भी प्रसारित किए जाते हैं।

उत्तराखंड में तीन बड़े स्टेशन ऑपरेशनल

उत्तराखंड में फिलहाल तीन एफएम स्टेशन काम कर रहे हैं। इनका दायरा बद्रीनाथ, गंगोत्री, हेमकुंड साहिब और कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट तक फैला हुआ है।

जोशीमठ में चल रहे स्टेशन का नाम “तराना” है। इसे कई जगह “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” के नाम से भी जाना जाता है। यह स्टेशन चमोली जिले में स्थित है।

जोशीमठ बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब जाने वाले यात्रियों के लिए मुख्य पड़ाव माना जाता है। यहां का रेडियो स्टेशन गढ़वाली और हिंदी भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता है।

इस स्टेशन पर एग्रो-टूरिज्म, पहाड़ी खेती, स्थानीय हस्तशिल्प और टिकाऊ पर्यटन से जुड़े कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। स्थानीय महिलाएं और युवा भी रेडियो कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।

उत्तरकाशी जिले के हर्षिल में भी “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। यह गंगोत्री मार्ग पर स्थित है। यहां का स्टेशन मौसम, सड़क की स्थिति, बर्फबारी और लैंडस्लाइड की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाता है।

गंगोत्री यात्रा के दौरान हजारों तीर्थयात्री इस इलाके से गुजरते हैं। ऐसे में यह स्टेशन यात्रियों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए उपयोगी साबित हो रहा है।

पिथौरागढ़ में “पंचशूल पल्स 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। इसका टैगलाइन है “हिल से दिल तक”। यह स्टेशन लिपुलेख पास की तरफ जाने वाले इलाके में स्थित है, जहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग भी गुजरता है।

यह स्टेशन मुख्य रूप से कृषि और बागवानी पर केंद्रित है। यहां किसानों को फल और सब्जियों की खेती, मौसम और बाजार से जुड़ी जानकारी दी जाती है।

अब चार और स्टेशन शुरू करने की तैयारी

सेना और प्रशासन अब उत्तराखंड में चार और एफएम स्टेशन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। ये सभी स्टेशन भी चीन सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में बनाए जाएंगे।

इनमें पहला स्टेशन गूंजी में प्रस्तावित है। गूंजी पिथौरागढ़ जिले में भारत-नेपाल-तिब्बत ट्राई-जंक्शन के पास स्थित है। यह इलाका सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

दूसरा स्टेशन धाराली में बनाया जाएगा, जो गंगोत्री के पास स्थित है।

इसके अलावा लैंसडाउन और रानीखेत में भी नए स्टेशन शुरू किए जाने की योजना है। ये दोनों इलाके अपेक्षाकृत निचले पहाड़ी क्षेत्रों में आते हैं।

अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी शुरुआत

पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे चीन सीमा से जुड़े दूरदराज क्षेत्रों में सेना की मदद से कई आर्मी-बैक्ड एफएम और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किए गए हैं।

ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले के दिरांग इलाके में रेडियो दिरांग 88.4 एफएम शुरू किया गया है। इसकी टैगलाइन है “अपनी मिट्टी, अपनी कहानी”। यह भारत-चीन सीमा के पास स्थित क्षेत्र में स्थापित किया गया है। दिसंबर 2025 में ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने इसका उद्घाटन किया था। इसे ईस्टर्न थिएटर का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है।

यह स्टेशन 4 गजराज कोर द्वारा संचालित किया जा रहा है। यहां स्थानीय संस्कृति, परंपराएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, मौसम और सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। खास बात यह है कि लोग इसे मोबाइल ऐप के जरिए भी सुन सकते हैं। एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर इसकी लाइव स्ट्रीमिंग और पॉडकास्ट सुविधा उपलब्ध है।

इसके अलावा सिक्किम में भी सेना ने “रेडियो सिक्किम सुंदरी 88.4 एफएम” शुरू किया है। इसे अप्रैल 2026 में लॉन्च किया गया था। यह सिक्किम का पहला बॉर्डर विलेज कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। यह स्टेशन ट्राई शक्ति कोर के तहत हाई-ऑल्टीट्यूड सीमा क्षेत्र में चलाया जा रहा है।

इस रेडियो स्टेशन पर स्थानीय समाचार, मौसम अपडेट, सरकारी योजनाएं, लोकल संस्कृति और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। सिक्किम के कई गांव कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कमजोर नेटवर्क की समस्या से जूझते हैं। ऐसे में यह स्टेशन लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहा है। इसका मोबाइल ऐप भी उपलब्ध है, जिससे लोग कहीं से भी कार्यक्रम सुन सकते हैं। इन रेडियो स्टेशनों से रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण किया जाता है। कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं और बोलियों में तैयार किए जाते हैं ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।

लद्दाख में भी सेना चला रही है पांच स्टेशन

लद्दाख के दूर-दराज और भारत-चीन सीमा से जुड़े इलाकों में भी भारतीय सेना रेडियो के जरिए लोगों तक जरूरी जानकारी भी पहुंचा रही है। इन रेडियो स्टेशनों से स्थानीय लोगों को मौसम, बर्फबारी, सड़क बंद होने, सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती और सेना भर्ती जैसी जानकारी मिलती है। खास बात यह है कि कार्यक्रम लद्दाखी, शीना, हिंदी और दूसरी लोकल भाषाओं में प्रसारित किए जाते हैं, ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।

लेह में “एफएम यांग स्यान” नाम का स्टेशन 90 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर चलता है। इसे जून 2024 में शुरू किया गया था। यह स्टेशन फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत चलता है। यहां लोकल संस्कृति, युवाओं से जुड़े कार्यक्रम, शिक्षा और सामुदायिक मुद्दों पर प्रसारण होता है। इसका सिग्नल लेह और आसपास के इलाकों तक पहुंचता है।

कारगिल जिले की द्रास घाटी में “रेडियो द्रास” या “सीआरएस द्रास 90.4 एफएम” चल रहा है। द्रास को दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका माना जाता है। इस स्टेशन की टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है। यहां मौसम अलर्ट, लैंडस्लाइड, सरकारी योजनाएं, स्वास्थ्य और खेती से जुड़ी जानकारी दी जाती है। यह स्टेशन लोकल लोगों के लिए काफी मददगार माना जा रहा है। इसकी लाइव स्ट्रीमिंग भी उपलब्ध है। स्टेशन को सेना ने शुरू किया, लेकिन अब इसमें स्थानीय लोग भी काम कर रहे हैं।

इसके अलावा लेह जिले के बेहद दूरदराज इलाके हानले में “सीआरएस अनले” या “कम्युनिटी रेडियो हनले” 89.6 मेगाहर्ट्ज पर चलता है। इसे नवंबर 2024 में शुरू किया गया था। इस इलाके को तारों से भरे आसमान के लिए जाना जाता है, इसलिए इसकी टैगलाइन “जहां सितारे मिले” रखी गई। यहां लद्दाखी, हिंदी और अंग्रेजी में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। स्टेशन पर शिक्षा, मनोरंजन, लोकल संस्कृति और जरूरी सूचनाओं से जुड़े शो चलते हैं।

कारू इलाके में भी सेना ने एक कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किया है। यह भी ऑपरेशन सद्भावना प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसका मकसद आसपास के गांवों को जानकारी और संचार से जोड़ना है।

वहीं, नुब्रा वैली के त्याक्षी गांव में “रेडियो श्योक” 89.2 एफएम पर प्रसारण करता है। इसे 3 कुमाऊं राइफल्स मैनेज करती है। यहां शिक्षा, बॉर्डर गांवों के विकास, युवाओं के मोटिवेशन और लोकल न्यूज पर कार्यक्रम होते हैं। हाल ही में शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने यहां पॉडकास्ट भी रिकॉर्ड किए थे।

लद्दाख में ऐसे पांच से ज्यादा रेडियो स्टेशन सेना के सहयोग से चल रहे हैं। ये स्टेशन रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण करते हैं।

पाकिस्तान से सटे इलाकों में भी चल रहे हैं स्टेशन

केवल चीन सीमा से सटे इलाके ही नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान सीमा यानी एलओसी के पास भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है।

एलओसी पर सबसे प्रमुख स्टेशन “रेडियो संगम 88.8 एफएम” माना जाता है। यह जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के केरी गांव में स्थित है। यह गांव एलओसी से करीब एक किलोमीटर दूर है। जनवरी 2026 में भारतीय सेना और सिविल प्रशासन ने मिलकर इसे शुरू किया था।

रेडियो संगम को एलओसी का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसकी आवाज पाकिस्तान की तरफ भी सुनी जा सकती है। यहां स्थानीय मुद्दों, सरकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और लोकल संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं।

इसके अलावा कुपवाड़ा जिले के तंगधार-कर्नाह इलाके में “रूह-ए-कर्नाह” नाम का स्टेशन भी चल रहा है। यह इलाका एलओसी के बेहद करीब माना जाता है। इस स्टेशन का मुख्य फोकस स्थानीय कला, संगीत, सामुदायिक कहानियां, शिक्षा और सकारात्मक संदेशों पर है। इसका उद्देश्य सीमावर्ती गांवों की आवाज को सामने लाना है।

कुपवाड़ा के त्रेहगाम इलाके में “रेडियो चिनार” भी शुरू किया गया था। यहां युवाओं से जुड़े कार्यक्रमों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा बारामूला और दूसरे सीमावर्ती इलाकों में भी सेना की मदद से ऐसे रेडियो प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं।

वहीं एलओसी से सटे कारगिल-द्रास इलाके में भी सेना की मदद से “रेडियो द्रास 90.4 एफएम” चलाया जा रहा है। यह द्रास घाटी में स्थित है, जिसे दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका कहा जाता है। इसकी टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है।

इस स्टेशन की शुरुआत फरवरी 2023 में फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेन गुप्ता ने की थी। यहां हिंदी, उर्दू और शीना भाषा में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इसका कवरेज द्रास और आसपास के गांवों तक फैला हुआ है।

रेडियो द्रास पर सरकारी योजनाएं, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। साथ ही मौसम, बर्फबारी, पर्यटन और लोकल संस्कृति पर भी शो चलते हैं।

यह स्टेशन मुश्कोह वैली, कारगिल वॉर मेमोरियल और आसपास के पर्यटन स्थलों की जानकारी भी देता है। लोकल फोक म्यूजिक और सामुदायिक कार्यक्रम यहां की खास पहचान बन चुके हैं।

कारगिल शहर में “आरगाजोम 90.8 मेगाहर्ट्ज” नाम का एक और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन भी है। इसे 2022 में शुरू किया गया था और इसे लद्दाख का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसे भी भारतीय सेना का सहयोग मिला हुआ है।

सिर्फ मनोरंजन नहीं, सुरक्षा से भी जुड़ा मिशन

इन रेडियो स्टेशनों को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना जा रहा। सेना इन्हें सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक और रणनीतिक जुड़ाव के रूप में देख रही है।

सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोग कई बार खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। ऐसे में जब उनकी अपनी भाषा में रेडियो कार्यक्रम चलते हैं तो उनमें अपनापन पैदा होता है।

इन स्टेशनों पर सेना भर्ती से जुड़ी जानकारी भी दी जाती है। स्थानीय युवाओं को भर्ती प्रक्रिया, शारीरिक तैयारी और जरूरी दस्तावेजों के बारे में बताया जाता है।

सरकारी योजनाओं की जानकारी भी लगातार प्रसारित की जाती है ताकि गांवों तक सही जानकारी पहुंच सके।

लोक संस्कृति को भी मिल रहा नया मंच

इन एफएम स्टेशनों का एक बड़ा असर स्थानीय संस्कृति पर भी पड़ा है। पहाड़ी इलाकों के कई लोक गीत और परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थीं।

अब रेडियो पर लोक संगीत, पारंपरिक कहानियां और स्थानीय इतिहास को जगह मिल रही है। बुजुर्ग अपनी पुरानी यादें और अनुभव साझा करते हैं। महिलाएं लोक गीत गाती हैं और युवा रेडियो एंकरिंग सीख रहे हैं।

कई जगह किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों को भी रेडियो पर अपनी बात रखने का मौका दिया जा रहा है।

मौसम और आपदा अलर्ट में बड़ी मदद

हिमालयी इलाकों में मौसम बेहद तेजी से बदलता है। कई बार अचानक बर्फबारी, बारिश या लैंडस्लाइड होने से लोग फंस जाते हैं। ऐसे समय में ये एफएम स्टेशन तुरंत अलर्ट जारी करते हैं। किस सड़क पर भूस्खलन हुआ, कहां बर्फ ज्यादा है, कौन सा रास्ता बंद है, ऐसी जानकारी लगातार प्रसारित की जाती है। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड और चारधाम यात्रा मार्गों पर यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

स्थानीय लोग भी बन रहे हैं रेडियो की आवाज

इन स्टेशनों की खास बात यह है कि यहां सिर्फ बाहरी लोग कार्यक्रम नहीं चलाते। स्थानीय युवाओं, महिलाओं और शिक्षकों को भी प्रशिक्षण देकर कार्यक्रमों से जोड़ा गया है। कई कार्यक्रम गांव के लोग खुद तैयार करते हैं। इससे रेडियो स्टेशन स्थानीय समुदाय का हिस्सा बन गए हैं। रेडियो पर खेती की समस्याओं पर चर्चा होती है, बच्चों के लिए शैक्षणिक कार्यक्रम चलते हैं और स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाक के बीच ‘सीक्रेट डायलॉग’! पूर्व विदेश सचिव और रॉ चीफ ने उठाए सवाल

India-Pakistan Track 2 Talks
Former Foreign Secretary Kanwal Sibal and Formerly R& AW Chief Vikram Sood..

India-Pakistan Track 2 Talks: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बैक चैनल बातचीत को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत और पाकिस्तान के रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और पूर्व राजनयिकों के बीच तीसरे देशों में ट्रैक-2 मीटिंग्स हुई हैं। इन बैठकों को लेकर अब देश के रणनीतिक और सुरक्षा हलकों में बहस छिड़ गई है।

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने इन बैठकों को लेकर खुलकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं दिख रहा, तब भारत में कुछ लॉबी फिर से पाकिस्तान के साथ बातचीत बहाल करने का माहौल बनाने में जुटी है।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले तीन महीनों में भारत और पाकिस्तान के रिटायर्ड जनरलों और पूर्व डिप्लोमैट्स के बीच कम से कम दो अनौपचारिक बैठकें हो चुकी हैं। इनमें से एक बैठक कतर में हुई, जबकि दूसरी किसी अन्य एशियाई देश की राजधानी में आयोजित की गई।

India-Pakistan Track 2 Talks: क्या है ट्रैक-2 बातचीत का मकसद

ट्रैक-2 डायलॉग ऐसे अनौपचारिक संवाद होते हैं, जिनमें सरकार के मौजूदा अधिकारी शामिल नहीं होते। इसमें रिटायर्ड सैन्य अधिकारी, पूर्व राजनयिक, थिंक टैंक विशेषज्ञ या रणनीतिक मामलों के जानकार हिस्सा लेते हैं।

आमतौर पर इन बैठकों का मकसद दोनों देशों के बीच तनाव कम करना, एक-दूसरे की सोच को समझना और संकट की स्थिति में बातचीत के रास्ते खुले रखना होता है। हालांकि इनका कोई आधिकारिक दर्जा नहीं होता।

भारत और पाकिस्तान के बीच पहले भी कई बार ऐसे ट्रैक-2 संपर्क होते रहे हैं। अतीत में बैंकॉक, दुबई, कतर और यूरोप के कुछ देशों में ऐसी बैठकें आयोजित की जाती रही हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार हुईं ऐसी बैठकें

रिपोर्ट के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहली बार है जब दोनों देशों के पूर्व अधिकारियों के बीच इस तरह की बातचीत हुई है।

पाकिस्तान समर्थक आतंकी संगठनों ने 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले को अंजाम दिया था। जिसके बाद भारत ने 6-7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था, जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच चार दिन तक सैन्य तनाव बना रहा।

उस दौरान डीजीएमओ हॉटलाइन के अलावा कोई एक्टिव कम्यूनिकेशन सिस्टम नहीं था। अब माना जा रहा है कि इसी अनुभव के बाद कुछ रणनीतिक हलकों में यह सोच बनी कि अगर भविष्य में कोई बड़ा संकट पैदा होता है, तो कम से कम कोई एक अनौपचारिक कम्यूनिकेशन सिस्टम मौजूद होना चाहिए।

एनएसए अजित डोभाल के ऑफिस तक पहुंची जानकारी

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि इन बैठकों की जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल के कार्यालय तक पहुंचाई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट (NSCS) को पाकिस्तान की तरफ से दिखाई गई “विलिंगनेस” यानी बातचीत की इच्छा के बारे में भी जानकारी दी गई है।

हालांकि अभी तक भारत सरकार की तरफ से किसी आधिकारिक बैक चैनल को मंजूरी नहीं दी गई है।

सूत्रों के हवाले से कहा गया कि यह कोई औपचारिक बातचीत नहीं है, बल्कि केवल क्राइसिस मैनेजमेंट के दौरान कम्यूनिकेशन सिस्टम के संभावित विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

भारत की नीति में बदलाव नहीं

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि भारत की आधिकारिक नीति अभी भी वही है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का मानना है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद खत्म किए बिना औपचारिक बातचीत का कोई मतलब नहीं है। इसी वजह से इन ट्रैक-2 बैठकों को किसी नए शांति प्रयास या आधिकारिक डायलॉग की शुरुआत नहीं माना जा रहा।

पूर्व विदेश सचिव ने उठाए सवाल

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इन बैठकों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मीडिया में ‘सूत्रों’ के जरिए जानबूझकर ऐसी खबरें प्लांट की जा रही हैं, ताकि भारत में पाकिस्तान के साथ फिर से बैक चैनल डायलॉग शुरू करने के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

कंवल सिब्बल ने लिखा कि कुछ अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय लॉबी इन बैठकों को बढ़ावा दे रही हैं। उनका कहना था कि इन रिपोर्टों का उद्देश्य यह दिखाना है कि आधिकारिक बातचीत बंद होने के कारण पैदा हुए “वैक्यूम” को भरने के लिए ट्रैक-2 डायलॉग जरूरी है।

उनके मुताबिक अमेरिका और पाकिस्तान के बेहतर होते संबंधों को देखकर कुछ लोग चाहते हैं कि भारत खुद ही पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू कर दे, ताकि भविष्य में अमेरिका का दबाव न बढ़े।

सिब्बल का आरोप है कि कुछ लोग चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान के प्रति अपनी सख्त नीति को नरम कर दे, जबकि पाकिस्तान की सोच और भारत विरोधी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है।

उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक माहौल पहले जैसा मजबूत नहीं रहा और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की भारत की कोशिशें भी पूरी तरह सफल नहीं हुईं हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब पाकिस्तान की भारत विरोधी नीति में कोई बदलाव नहीं आया, तब भारत को अपनी मूल नीति क्यों बदलनी चाहिए। कंवल सिब्बल ने इसे “व्यावहारिक कूटनीति” के नाम पर “हार मानने वाली सोच” बताया। उनका कहना है कि इससे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को दिया गया सख्त संदेश कमजोर पड़ सकता है।

उनके मुताबिक कुछ लोग अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में आई गर्माहट के कारण भारत को डिफेंसिव पोजिशन स्थिति में धकेलना चाहते हैं। उन्होंने इसे “प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी” के नाम पर “डिफीटिस्ट एटीट्यूड” बताया।

पूर्व रॉ चीफ ने भी जताई चिंता

रॉ के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने भी कंवल सिब्बल की बातों का समर्थन किया। विक्रम सूद ने कहा कि भारत में कुछ लोग पाकिस्तान की असली सोच को समझना ही नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि हर बार जब पाकिस्तान किसी मुश्किल में फंसता है, तब वह भारत में शांति और बातचीत की बात करने वाले लोगों को आगे कर देता है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की मानसिकता और नीतियां नहीं बदलेंगी।

विक्रम सूद ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने इस्लामिक और जिहादी विचारधारा की बात की थी।

उन्होंने कहा कि भारत की मौजूदा नीति, पाकिस्तान को नजरअंदाज करना और जरूरत पड़ने पर जवाब देना, फिलहाल सही तरीके से काम कर रही है।

अमेरिका फैक्टर क्यों बना चर्चा का विषय

इस पूरे मामले में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है। सूत्रों के हवाले से कहा गया कि पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके करीबी अधिकारियों ने पाकिस्तान के नेतृत्व, खासकर फील्ड मार्शल असीम मुनीर को खुला समर्थन दिया है।

सूत्रों के मुताबिक भारत को चिंता है कि अगर भविष्य में कोई बड़ा आतंकी हमला होता है, तो पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। इसी वजह से भारत चाहता है कि उसके पास अपने “पॉइंट्स ऑफ एंगेजमेंट” मौजूद रहें, ताकि किसी संकट की स्थिति में अमेरिका सीधे हस्तक्षेप न करे।

क्या भारत पर अमेरिकी दबाव है?

इस पूरे विवाद के बीच सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जाने लगा कि अमेरिका भारत पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने का दबाव बना रहा है। हालांकि सूत्रों ने इस पर कुछ नहीं कहा, लेकिन ये जरूर कहा कि भारत खुद चाहता है कि कोई ऐसा अनौपचारिक चैनल मौजूद रहे, जिससे किसी संकट के समय तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से बचा जा सके।

सूत्रों ने कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। ऐसे में किसी भी बड़े सैन्य तनाव के दौरान वैश्विक दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण कुछ रणनीतिक हलकों में यह सोच उभरी है कि कम से कम संवाद का एक सीमित और अनौपचारिक रास्ता खुला रहना चाहिए।

पाकिस्तान में भी पावर स्ट्रक्चर में बदलाव

इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान में भी पावर स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव हुआ है। पिछले साल 30 अप्रैल को पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी नियुक्त किया गया। वह पाकिस्तान के पहले ऐसे एनएसए बने हैं जो एक साथ आईएसआई चीफ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दोनों पद संभाल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान में सैन्य और नागरिक सत्ता केंद्र लगभग एक हो गए हैं। यानी पाकिस्तान की सुरक्षा और विदेश नीति पर अब सेना का नियंत्रण पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की तरफ से इन ट्रैक-2 मीटिंग्स को संभव बनाने में अब पाकिस्तान के एनएसए और आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक की अहम भूमिका मानी जा रही है। उनक कहना है कि मई 2025 में एनएसए बनने के बाद असीम मलिक ने बैकडोर कम्युनिकेशन चैनल फिर से एक्टिव किए।

पहले ऐसी बैठकों में पाकिस्तान की तरफ से रिटायर्ड जनरल या पूर्व डिप्लोमैट शामिल होते थे, जिनकी बात को ज्यादा आधिकारिक नहीं माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब इन मीटिंग्स में ऐसे लोग शामिल बताए जा रहे हैं जो सीधे पाकिस्तान के असली पावर सेंटर यानी आर्मी और आईएसआई के करीब हैं।

इसका मतलब है कि बातचीत में जो भी चर्चा होती है, उसकी जानकारी सीधे पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व तक पहुंच सकती है। इसलिए अब ट्रैक-2 मीटिंग्स को पहले से ज्यादा “अथॉरिटेटिव” माना जा रहा है। वहीं, भारतीय पक्ष में भी इन बैठकों पर नजर रखी जा रही है। बताया जा रहा है कि अजित डोभाल का ऑफिस इन मीटिंग्स की जानकारी ले रहा है। सूत्रों का कहना है कि मई 2025 के बाद से डोभाल और असीम मलिक के बीच इनडायरेक्ट संपर्क चैनल भी मौजूद है।

इसी वजह से अब ट्रैक-2 बातचीत को सिर्फ रिटायर्ड अधिकारियों की औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे किसी बड़े संकट की स्थिति में “क्राइसिस मैनेजमेंट बैकअप” के तौर पर देखा जा रहा है।

पहले भी चलती रही हैं बैक चैनल बातचीत

भारत और पाकिस्तान के बीच बैक चैनल संपर्क कोई नई बात नहीं है। 2015 से 2018 के बीच एनएसए अजित डोभाल और पाकिस्तान के तत्कालीन एनएसए नासिर खान जंजुआ के बीच कई गुप्त बैठकें हुई थीं।

बाद में यह भी सामने आया कि डोभाल की बातचीत पाकिस्तान के पूर्व एनएसए मोईद यूसुफ और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से भी होती रही थी। इन बैठकों का मकसद सीमा तनाव कम करना और सैन्य टकराव को रोकना बताया गया था। हालांकि इन प्रयासों के बावजूद भारत-पाकिस्तान संबंधों में स्थायी सुधार नहीं हो पाया।

एक ‘अग्नि-6’ मिसाइल और कई निशाने…MIRV टेस्ट से बढ़ेगी चीन-पाकिस्तान की टेंशन!

Agni MIRV Missile Test
Agni MIRV Missile Test

Agni MIRV Missile Test: भारत ने 8 मई 2026 को ओडिशा तट से एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल फ्लाइट ट्रायल कर अपनी लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता का बड़ा प्रदर्शन किया। इस परीक्षण की सबसे अहम बात यह रही कि मिसाइल में मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल (MIRV) सिस्टम लगाया गया था। इसका मतलब यह है कि अब एक ही मिसाइल अलग-अलग दिशाओं में मौजूद कई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह परीक्षण डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया। मिसाइल में कई पेलोड लगाए गए थे, जिन्हें भारतीय महासागर क्षेत्र में फैले अलग-अलग लक्ष्यों की तरफ भेजा गया। ग्राउंड और शिप आधारित ट्रैकिंग सिस्टम ने लॉन्च से लेकर सभी पेलोड के लक्ष्य तक पहुंचने तक पूरी उड़ान को मॉनिटर किया। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि परीक्षण के सभी मिशन आब्जेक्टिव्स सफलतापूर्वक हासिल हुए।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, भारतीय सेना और रक्षा उद्योग को इस सफलता पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण देश की रक्षा तैयारियों को नई ताकत देगा।

Agni MIRV Missile Test: क्या है यह नई अग्नि-6 मिसाइल?

हालांकि डीआरडीओ ने आधिकारिक तौर पर मिसाइल का नाम सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन रक्षा सूत्रों ने इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) श्रेणी का परीक्षण बताया गया। एक सूत्र ने कहा कि यह परीक्षण आईसीबीएम कैटेगरी का था, भले ही इसका डिजाइन पारंपरिक अग्नि-6 जैसा न दिखता हो।

इससे पहले डीआरडीओ चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत भी कह चुके थे कि अग्नि-6 कार्यक्रम को लेकर उनकी तकनीकी तैयारियां पूरी हैं और सरकार की मंजूरी मिलते ही आगे बढ़ा जाएगा।

परीक्षण से पहले भारत ने 6 से 9 मई के लिए बंगाल की खाड़ी में 3600 किलोमीटर क्षेत्र के लिए NOTMAR यानी नोटिस टू मेरिनर्स जारी किया था। यह आमतौर पर बड़े मिसाइल परीक्षणों से पहले किया जाता है ताकि समुद्री और हवाई क्षेत्र सुरक्षित रखा जा सके।

8 मई की शाम को मिसाइल को ओडिशा तट पर मौजूद डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया गया। यह द्वीप पहले व्हीलर आइलैंड के नाम से जाना जाता था और डीआरडीओ के प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्रों में शामिल है।

मिसाइल के लॉन्च होते ही ग्राउंड आधारित रडार, टेलीमेट्री सिस्टम और समुद्र में तैनात ट्रैकिंग जहाजों ने इसकी उड़ान पर नजर रखी। मिसाइल ने तय रास्ते का पालन किया और उसके सभी पेलोड अलग-अलग लक्ष्यों की तरफ बढ़े।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक पूरे मिशन के दौरान सभी सिस्टम सामान्य तरीके से काम करते रहे और सभी पेलोड अपने निर्धारित क्षेत्रों तक पहुंचे।

किन तकनीकों का हुआ इस्तेमाल

एडवांस अग्नि मिसाइल में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया माना जा रहा है। इनमें एडवांस नेविगेशन सिस्टम, हाई प्रिसिजन गाइडेंस, री-एंट्री टेक्नोलॉजी और मल्टीपल पेलोड डिप्लॉयमेंट शामिल हैं।

री-एंट्री टेक्नोलॉजी सबसे अहम मानी जाती है। जब मिसाइल अंतरिक्ष जैसी ऊंचाई से वापस वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच सकता है। ऐसे में वॉरहेड को सुरक्षित रखना बेहद कठिन होता है।

रक्षा वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तरह की तकनीक केवल कुछ देशों के पास ही होती है।

रफ्तार करीब मैक 24 तक

इस एडवांस अग्नि मिसाइल की सबसे ज्यादा स्पीड तब होती है, जब इसका री-एंट्री व्हीकल यानी MIRV पेलोड अंतरिक्ष से वापस धरती के वायुमंडल में प्रवेश करता है। इस दौरान इसकी रफ्तार करीब मैक 24 तक पहुंच जाती है। जो आवाज की गति से 24 गुना ज्यादा तेज होती है। इसकी स्पीड लगभग 29,400 किलोमीटर प्रति घंटा या करीब 8 किलोमीटर प्रति सेकंड मानी जाती है।

बैलिस्टिक मिसाइल की उड़ान कई चरणों में होती है। शुरुआत में जब मिसाइल लॉन्च होती है और उसका रॉकेट इंजन जल रहा होता है, तब उसकी गति धीरे-धीरे बढ़ती है। इसके बाद मिसाइल अंतरिक्ष में पहुंचती है, जहां वह मिड-कोर्स फेज में तय रास्ते पर आगे बढ़ती है।

सबसे अहम चरण टर्मिनल फेज होता है। इसी समय मिसाइल का री-एंट्री व्हीकल बहुत तेज गति से धरती की तरफ लौटता है। यही वह चरण होता है, जब इसकी स्पीड मैक 20 से मैक 25 तक पहुंच सकती है। अग्नि-5 के लिए भी करीब मैक 24 की स्पीड बताई जाती है और इस नई एडवांस अग्नि मिसाइल की गति भी लगभग इसी स्तर की मानी जा रही है।

MIRV तकनीक की वजह से एक ही मिसाइल के अंदर मौजूद अलग-अलग पेलोड अलग दिशाओं में जाकर अलग-अलग टारगेट को निशाना बना सकते हैं। हालांकि उनकी मुख्य री-एंट्री स्पीड बेहद ज्यादा रहती है।

इतनी तेज गति का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि दुश्मन के एयर डिफेंस और मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। दुनिया की दूसरी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें भी लगभग इसी स्पीड रेंज में उड़ती हैं।

क्या होती है ICBM मिसाइल

आईसीबीएम यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल ऐसी लंबी दूरी की मिसाइल होती है जो हजारों किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य को निशाना बना सकती है। सामान्य तौर पर 5500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को आईसीबीएम श्रेणी में रखा जाता है।

अगर भारत पूरी तरह आईसीबीएम क्षमता हासिल कर लेता है, तो दुनिया के किसी भी हिस्से तक उसकी मिसाइल पहुंच सकती है। अभी अमेरिका, रूस, चीन और उत्तर कोरिया के पास ऐसी क्षमता मानी जाती है। फ्रांस और ब्रिटेन के पास लंबी दूरी की परमाणु क्षमता वाली सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आईसीबीएम तकनीक केवल लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता नहीं दिखाती, बल्कि यह एडवांस रॉकेट प्रोपल्शन, गाइडेंस सिस्टम और री-एंट्री टेक्नोलॉजी में महारत का संकेत भी होती है।

कैसे शुरू हुआ अग्नि मिसाइल कार्यक्रम

भारत का अग्नि मिसाइल कार्यक्रम डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत शुरू हुआ था। शुरुआत छोटी दूरी की अग्नि-1 से हुई, जिसकी रेंज करीब 700 किलोमीटर थी। इसके बाद अग्नि-2, अग्नि-3, अग्नि-4 और अग्नि-5 विकसित की गईं।

अग्नि-5 को भारत की सबसे आधुनिक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल माना जाता है। इसकी रेंज 5000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है। अब एडवांस अग्नि मिसाइल और MIRV तकनीक को अग्नि श्रृंखला की अगली पीढ़ी माना जा रहा है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह केवल रेंज बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि मिसाइल को ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा सटीक और ज्यादा घातक बनाने की दिशा में कदम है।

क्या होती है MIRV तकनीक?

MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल आधुनिक मिसाइल तकनीक की सबसे मुश्किल सिस्टम्स में से एक मानी जाती है।

सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल में केवल एक वॉरहेड होता है, जो एक टारगेट पर हमला करता है। लेकिन MIRV सिस्टम में एक ही मिसाइल के अंदर कई री-एंट्री व्हीकल या वॉरहेड लगाए जाते हैं। मिसाइल जब अंतरिक्ष जैसी ऊंचाई तक पहुंचती है, तो उसका ऊपरी हिस्सा खुलता है और अलग-अलग वॉरहेड अलग दिशाओं में निकल जाते हैं।

इसके बाद हर वॉरहेड अपने अलग लक्ष्य की तरफ बढ़ता है। यानी एक ही मिसाइल कई शहरों, सैन्य ठिकानों या रणनीतिक लक्ष्यों पर एक साथ हमला कर सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक MIRV तकनीक दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है, क्योंकि उसे एक साथ कई वॉरहेड रोकने पड़ते हैं।

दुश्मन के मिसाइल डिफेंस को कैसे चुनौती देती है MIRV

आज कई देशों ने एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम विकसित किए हैं, जो आने वाली मिसाइलों को हवा में नष्ट करने की कोशिश करते हैं। लेकिन MIRV सिस्टम इन डिफेंस नेटवर्क के लिए मुसिबत है।

अगर एक मिसाइल में पांच या उससे ज्यादा वॉरहेड हों, तो डिफेंस सिस्टम को हर वॉरहेड को अलग-अलग ट्रैक करना पड़ेगा। कई बार इनमें डिकॉय यानी नकली टारगेट भी शामिल किए जाते हैं, जिससे असली वॉरहेड की पहचान मुश्किल हो जाती है।

इसी वजह से MIRV तकनीक को स्ट्रैटेजिक डिटरेंस यानी न्यूक्लियर डिटरेंस का अहम हिस्सा माना जाता है।

भारत के लिए यह परीक्षण क्यों अहम

भारत लंबे समय से “नो फर्स्ट यूज” नीति पर चलता रहा है। यानी भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ तो वह जवाब देने में सक्षम रहेगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि MIRV तकनीक भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को मजबूत करती है। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन पहले हमला करता है, तब भी भारत जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

भारत के सामने चीन और पाकिस्तान दोनों की चुनौती है। चीन के पास पहले से DF-41 जैसी लंबी दूरी की MIRV क्षमता वाली मिसाइल मौजूद है। पाकिस्तान भी अपनी मिसाइल क्षमता लगातार बढ़ा रहा है।

ऐसे में एडवांस अग्नि मिसाइल का यह परीक्षण भारत की रणनीतिक तैयारी के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।

दुनिया के दूसरे देशों के पास क्या क्षमता है

रूस के पास RS-28 सरमत जैसी मिसाइल है, जिसकी रेंज 12000 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है। अमेरिका के पास मिनुटमैन-3 और नया सेंटिनल कार्यक्रम है। चीन के DF-41 को दुनिया की सबसे खतरनाक MIRV मिसाइलों में गिना जाता है।

उत्तर कोरिया भी लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण कर चुका है। कई रिपोर्टों में उसकी मिसाइल रेंज 10000 किलोमीटर से ज्यादा बताई गई है।

भारत अब उन देशों की सूची में तेजी से आगे बढ़ रहा है जिनके पास लंबी दूरी की मल्टीपल वॉरहेड क्षमता मौजूद है।

सिर्फ जनरल नहीं, ‘वॉर आर्किटेक्ट’ हैं लेफ्टिनेंट जनरल राजा सुब्रमणि, इसलिए सरकार ने उन्हें चुना नया CDS

CDS Appointment 2026
Lieutenant General NS Raja Subramani

CDS Appointment 2026: भारत सरकार ने रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि को देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) नियुक्त किया है। वह 30 मई को पदभार संभालेंगे। वर्तमान में वह नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट यानी एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर के पद पर कार्यरत हैं। सेना में चार दशक से ज्यादा सेवा देने वाले राजा सुब्रमणि को पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों का अनुभवी अधिकारी माना जाता है।

उनकी नियुक्ति को केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि भारतीय सेना के बड़े सैन्य सुधारों से जोड़कर देखा जा रहा है। खासतौर पर थिएटर कमांड, ट्राई-सर्विस इंटीग्रेशन और जॉइंट वॉरफेयर जैसे लंबे समय से चल रहे सैन्य सुधार अब अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। ऐसे समय में सरकार ने एक ऐसे अधिकारी को चुना है, जिसे ऑपरेशनल अनुभव के साथ-साथ रणनीतिक और सुधारवादी सोच वाला अधिकारी माना जाता है।

राजा सुब्रमणि मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान की जगह लेंगे। जनरल चौहान को पिछले साल छह महीने का एक्सटेंशन दिया गया था ताकि वह मिलिट्री इंटीग्रेशन और थिएटराइजेशन से जुड़े काम को आगे बढ़ा सकें।

CDS Appointment 2026: सरकार ने फिर चुना रिटायर्ड अधिकारी

लेफ्टिनेंट जनरल राजा सुब्रमणिकी नियुक्ति ने यह भी साफ कर दिया है कि अब सीडीएस का पद केवल सबसे वरिष्ठ सेवा प्रमुख के लिए तय नहीं माना जा रहा। इस बार भी सरकार ने मौजूदा फोर स्टार सर्विस चीफ्स को पीछे छोड़ते हुए एक रिटायर्ड थ्री-स्टार अधिकारी को चुना है।

इससे पहले पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत और मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान भी सेना से आए थे। जनरल चौहान भी रिटायरमेंट के बाद सीडीएस बने थे। अब राजा सुब्रमणि तीसरे सेना अधिकारी होंगे जो यह पद संभालेंगे।

रणनीतिक हलकों में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी को भी मजबूत दावेदार माना जा रहा था। लेकिन सरकार ने अनुभव और सैन्य सुधारों से जुड़े ट्रैक रिकॉर्ड को प्राथमिकता दी।

सूत्रों का कहना है कि वर्तमान समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां जमीन आधारित हैं। चीन और पाकिस्तान दोनों सीमाओं पर तनाव को देखते हुए सरकार ऐसे अधिकारी को आगे लाना चाहती थी, जिसे दोनों मोर्चों का अनुभव हो।

थिएटर कमांड सुधारों के बीच बड़ी जिम्मेदारी

राजा सुब्रमणि ऐसे समय में सीडीएस का पद संभाल रहे हैं जब भारतीय सेना के सबसे बड़े सैन्य पुनर्गठन पर काम तेजी से चल रहा है। थिएटर कमांड सुधारों को आजादी के बाद भारतीय सेना का सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव माना जा रहा है।

पिछले कई सालों से सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच थिएटर कमांड मॉडल को लेकर चर्चा चल रही थी। हालांकि कमांड स्ट्रक्चर, संसाधनों के बंटवारे और ऑपरेशनल कंट्रोल जैसे मुद्दों पर तीनों सेनाओं के बीच मतभेद भी रहे।

जनरल अनिल चौहान के कार्यकाल में इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया। उन्होंने अलग-अलग सेनाओं के बीच बातचीत और सहमति बनाने पर जोर दिया। हाल ही में जयपुर में आयोजित एक सेमिनार में जनरल चौहान ने कहा था कि थिएटर कमांड से जुड़ी तीन सिफारिशें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दी गई हैं।

उन्होंने कहा था, “इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड के तहत सेनाओं के पुनर्गठन को लेकर तीन सेट की सिफारिशें रक्षा मंत्री को भेजी गई हैं।” जनरल चौहान ने यह भी बताया था कि मई के अंत तक एक नया जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर शुरू हो जाएगा, जिसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और इंटीग्रेशन को मजबूत करना है। उनके मुताबिक थिएटर कमांड की पूरी नींव “जॉइंटनेस” और “इंटीग्रेशन” पर आधारित होगी।

क्या है थिएटर कमांड

वर्तमान में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने कमांड सिस्टम के तहत काम करती हैं। थिएटर कमांड मॉडल में तीनों सेनाओं के रिर्सोसेज को इंटीग्रेट किया जाएगा। इस व्यवस्था के तहत किसी खास क्षेत्र के लिए एक संयुक्त कमांडर होगा, जिसके पास आर्मी, एयरफोर्स और नेवी की ताकत एक साथ होगी।

मौजूदा योजना के अनुसार उत्तरी थिएटर का फोकस चीन सीमा पर होगा। वहीं, पश्चिमी थिएटर पाकिस्तान मोर्चे को संभालेगा। वहीं मैरिटाइम थिएटर हिंद महासागर क्षेत्र की जिम्मेदारी देखेगा।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि इससे युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेने और संयुक्त ऑपरेशन चलाने में मदद मिलेगी।

पाकिस्तान और चीन मोर्चे का अनुभव

राजा सुब्रमणि को सेना में बेहद अनुभवी ऑपरेशनल कमांडर माना जाता है। उन्होंने अपने करियर में पाकिस्तान और चीन दोनों सीमाओं पर अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। दिसंबर 1985 से 31 जुलाई 2025 तक करीब 39 वर्ष सेवा करने के बाद वे 47वें वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ (VCOAS) के पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने यह पद 1 जुलाई 2024 से संभाला था।

उन्होंने भारतीय सेना की 2 कोर की कमान संभाली थी, जिसे पश्चिमी मोर्चे की सबसे अहम स्ट्राइक कोर माना जाता है। यह फॉर्मेशन पाकिस्तान सीमा पर बड़े ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है।

इसके अलावा उन्होंने जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और उत्तरी सीमाओं पर भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।

उन्होंने असम में ऑपरेशन राइनो के दौरान 16 गढ़वाल राइफल्स की कमान संभाली। जम्मू-कश्मीर में 168 इन्फैंट्री ब्रिगेड और सेंट्रल सेक्टर में 17 माउंटेन डिवीजन का नेतृत्व भी किया।

सेना में उन्हें शांत लेकिन सख्त अधिकारी माना जाता है। कई अधिकारी उन्हें “सोल्जर-स्कॉलर” यानी सैन्य रणनीति समझने वाला युद्ध अनुभव रखने वाला अधिकारी बताते हैं।

एनएससीएस में निभा रहे थे अहम भूमिका

सेना से रिटायर होने के बाद सितंबर 2025 में उन्हें नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट में मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया था। यह संस्था राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में काम करती है।

एनएससीएस राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की कार्यकारी इकाई मानी जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को सलाह और अलग-अलग मंत्रालयों के बीच समन्वय का काम करती है।

इस संस्था में मिलिट्री अफेयर्स, टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस कोऑर्डिनेशन और मैरिटाइम सिक्योरिटी जैसे कई विभाग होते हैं। मिलिट्री एडवाइजर का दफ्तर सेना और एनएससीएस के बीच मुख्य कड़ी माना जाता है। यहां से ऑपरेशनल तैयारी, फोर्स प्लानिंग और क्षमता विकास से जुड़ी जानकारी दी जाती है।

लंबा सैन्य और अकादमिक अनुभव

राजा सुब्रमणि ने 14 दिसंबर 1985 को 8वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स में कमीशन लिया था। वह नेशनल डिफेंस अकादमी और इंडियन मिलिट्री अकादमी के पूर्व छात्र हैं।

उन्होंने ब्रिटेन के ब्रैकनेल स्थित जॉइंट सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज से भी प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा नई दिल्ली के नेशनल डिफेंस कॉलेज से उच्च सैन्य शिक्षा हासिल की।

उनके पास किंग्स कॉलेज लंदन से मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री और मद्रास यूनिवर्सिटी से डिफेंस स्टडीज में एमफिल की डिग्री भी है।

मिलिट्री इंटेलिजेंस और ऑपरेशंस का अनुभव

राजा सुब्रमणि ने सेना में कई रणनीतिक पदों पर भी काम किया है। वह मिलिट्री इंटेलिजेंस में डिप्टी डायरेक्टर जनरल रहे। इसके अलावा ईस्टर्न कमांड में ब्रिगेडियर जनरल स्टाफ ऑपरेशंस और कर्नल जनरल स्टाफ ऑपरेशंस की जिम्मेदारी भी संभाली।

उन्होंने डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन में चीफ इंस्ट्रक्टर के रूप में भी काम किया। नॉर्दर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ और बाद में सेंट्रल कमांड के प्रमुख भी रहे।

विदेश में भारत के डिफेंस अटैची के तौर पर उन्होंने कजाकिस्तान में भी सेवा दी हैं।

जॉइंटनेस पर रहेगा बड़ा फोकस

राजा सुब्रमणि ऐसे समय में सीडीएस बन रहे हैं जब भारतीय सेना “जॉइंट वॉरफेयर” मॉडल पर तेजी से काम कर रही है। हाल ही में जयपुर में हुई जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भी मल्टी-डोमेन ऑपरेशन, साइबर वॉरफेयर, एआई और जॉइंटनेस पर जोर दिया गया था।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान लगातार कह रहे थे कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं बल्कि डेटा, नेटवर्किंग, साइबर और इंटीग्रेटेड ऑपरेशन से तय होंगे।

राजा सुब्रमणि अब उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें तीनों सेनाओं को अलग-अलग सोच से निकालकर एक जॉइंट कॉम्बैट स्ट्रक्चर्स में लाने की कोशिश हो रही है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि थिएटराइजेशन केवल नया कमांड सिस्टम नहीं बल्कि पूरी सैन्य सोच में बदलाव है। इसमें संसाधनों का साझा इस्तेमाल, संयुक्त ऑपरेशन और तेज फैसले लेने पर जोर दिया जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा फोकस

सैन्य हलकों में यह भी माना जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद जॉइंट ऑपरेशन और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर को लेकर फोकस और बढ़ा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना, वायुसेना और दूसरे सुरक्षा तंत्रों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस की गई थी। इसके बाद थिएटर कमांड और जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर को लेकर काम तेज हुआ।

राजा सुब्रमणि को ऐसे अधिकारी के रूप में देखा जा रहा है जो ऑपरेशनल अनुभव और रणनीतिक समझ दोनों रखते हैं। यही वजह है कि सरकार ने उन्हें देश की सबसे बड़ी सैन्य जिम्मेदारी सौंपी है।

अब वह सीडीएस के साथ-साथ डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स के सचिव की भूमिका भी निभाएंगे। इस पद पर रहते हुए उन्हें सैन्य सुधारों, तीनों सेनाओं के तालमेल और थिएटर कमांड जैसे बड़े बदलावों को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी संभालनी होगी।

Explained: क्या है भारतीय सेनाओं की नई MUM-T डॉक्ट्रिन? ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों बदल रही है वॉर स्ट्रैटेजी

MUM-T Doctrine India
CDS rGeneral Anil Chauhan released doctrine on Joint Primer on Manned and Unmanned Teaming (MUM-T)

MUM-T Doctrine India: भारतीय सेना अब जंग के पुराने तरीकों से आगे बढ़कर नई तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम पर तेजी से काम कर रही है। जयपुर में आयोजित जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कई अहम मिलिटरी डॉक्यूमेंट्स जारी किए। इनमें सबसे अहम डॉक्ट्रिन “जॉइंट प्राइमर ऑन मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” (MUM-T) भी शामिल है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ एक नई गाइडलाइन नहीं, बल्कि भारत की पूरी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव है।

जयपुर में हुई इस कॉन्फ्रेंस में जनरल अनिल चौहान ने “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” और “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” भी जारी किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल टैंक, लड़ाकू विमान और सैनिकों के दम पर नहीं लड़े जाएंगे। बल्कि अब ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिस्टम और डेटा आधारित नेटवर्क भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

सीडीएस ने साफ कहा कि यह बदलाव केवल प्रक्रियाओं का अपडेट नहीं है, बल्कि भारत की “वारफाइटिंग फिलॉसफी” यानी युद्ध लड़ने की सोच में बड़ा परिवर्तन है।

क्या है MUM-T Doctrine India

MUM-T का पूरा नाम “मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” है। इसका मतलब है इंसानों द्वारा चलाए जाने वाले मिलिट्री प्लेटफॉर्म और बिना पायलट वाले सिस्टम का एक साथ मिलकर काम करना। MUM-T फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करेगा।

इसमें लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक या दूसरे सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम जोड़े जाएंगे। युद्ध के दौरान इंसान और मशीन दोनों मिलकर ऑपरेशन को अंजाम देंगे।

MUM-T सिस्टम के तहत एक लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर या दूसरा मैनड प्लेटफॉर्म एक साथ कई ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम को कंट्रोल कर सकेगा। यानी एक पायलट अपने साथ उड़ रहे 4 से 10 या उससे ज्यादा ड्रोन को ऑपरेशन के दौरान निर्देश दे पाएगा। इससे सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके की तरफ जा रहा है, तो उसके साथ कई ड्रोन भी उड़ सकते हैं। ये ड्रोन पहले दुश्मन की लोकेशन, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाएंगे। कुछ ड्रोन दुश्मन के रडार को कन्फ्यूज्ड करेंगे, जबकि कुछ सीधे हमला भी कर सकते हैं। इस दौरान असली फाइटर जेट सुरक्षित दूरी पर रहेगा।

सूत्रों का कहना है कि इससे पायलट और सैनिकों का जोखिम काफी कम हो जाएगा। हाई थ्रेट एरिया यानी जहां दुश्मन का मजबूत एयर डिफेंस मौजूद हो, वहां सबसे पहले अनमैन्ड सिस्टम और ड्रोन भेजे जाएंगे।

अंतिम फैसला इंसान ही लेगा

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि MUM-T प्राइमर मानव दिमाग की समझ और मशीन की सटीकता को एक साथ जोड़ने का स्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि अब भारत ऐसे “सॉवरेन एआई ड्रिवन सिस्टम” पर काम कर रहा है, जो पूरी तरह भारतीय कंट्रोल में होंगे और युद्ध के दौरान मैनड प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करेंगे।

सेना के अधिकारियों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में कुछ सेकंड की देरी भी भारी पड़ सकती है। ऐसे में एआई आधारित सिस्टम तेजी से डेटा प्रोसेस कर कमांडरों की मदद करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से युद्ध के दौरान फैसले लेने की रफ्तार भी तेज होगी। सेना इसे OODA लूप कहती है, यानी स्थिति को देखना, समझना, फैसला लेना और तुरंत कार्रवाई करना। एआई सिस्टम तेजी से डेटा एनालिसिस कर कमांडरों को तुरंत जानकारी देंगे, जिससे सटीक और तेज कार्रवाई संभव होगी।

ड्रोन और लॉयल विंगमैन सिस्टम पर बढ़ा फोकस

भारतीय सेना पहले से ही कई अनमैन्ड सिस्टम पर काम कर रही है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का “कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम” (कैट्स वॉरियर) भी शामिल है। जिसमें लॉयल विंगमैन ड्रोन जैसे CATS Warrior, Hunter और Alfa-S जैसे अनमैन्ड सिस्टम तेजस या दूसरे लड़ाकू विमानों के साथ के साथ इंटीग्रेट होंगे। ये ड्रोन मुख्य विमान के साथ रहकर कई तरह के काम करेंगे। इनमें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, दुश्मन के रडार की पहचान और हमला शामिल हो सकता है। “लॉयल विंगमैन” कॉन्सेप्ट में ड्रोन लड़ाकू विमान के साथ उड़ते हैं और उसके लिए सुरक्षा, निगरानी और हमला जैसे काम करते हैं।

सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल महंगे लड़ाकू विमान और बड़े हथियारों पर निर्भरता नहीं रह गई है। भविष्य के युद्धों में स्वार्म ड्रोन यानी बड़ी संख्या में एक साथ उड़ने वाले ड्रोन भी बड़ी भूमिका निभाएंगे। स्वार्म अटैक यानी एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन भेजकर दुश्मन के सिस्टम पर दबाव बनाया जा सकता है।

भारतीय सेना भी टैक्टिकल यूएवी, लॉइटरिंग म्यूनिशन और अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स को इन्फैंट्री और आर्मर्ड यूनिट्स के साथ जोड़ने पर काम कर रही है। यानी भविष्य में सैनिकों और टैंकों के साथ रोबोटिक सिस्टम और ड्रोन भी ऑपरेशन का हिस्सा होंगे।

वहीं, भारतीय नौसेना भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है। नौसेना जहाजों के साथ यूएवी और अनमैन्ड सरफेस व्हीकल्स यानी बिना चालक वाली बोट्स को जोड़ने की तैयारी कर रही है, ताकि समुद्र में निगरानी और हमले की क्षमता बढ़ाई जा सके।

डीआरडीओ भी कई बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इनमें तपस ड्रोन, घातक यूसीएवी और अस्त्र आधारित कामिकाजे ड्रोन जैसे सिस्टम शामिल हैं। इनका इस्तेमाल निगरानी, दुश्मन की पहचान और सटीक हमलों के लिए किया जाएगा।

इसके साथ ही भारत सुरक्षित और तेज डाटा लिंक सिस्टम पर भी काम कर रहा है। बीईएल और एल एंड टी जैसी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर हाई-बैंडविड्थ डाटा लिंक तैयार किए जा रहे हैं। इनके जरिए रियल टाइम वीडियो फीड, सेंसर डेटा और ड्रोन कंट्रोल संभव होगा। शुरुआत में इन्हें सुखोई-30 एमकेआई, तेजस, एलसीएच और एएमसीए जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ जोड़ा जाएगा।

MUM-T प्राइमर इन सभी को एक मिलिट्री स्ट्रक्चर देने का काम करेगा। इसके जरिए कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स, अलग-अलग सेनाओं के बीच तालमेल और ऑपरेशन के नियमों को एक समान बनाया जाएगा।

सूत्रों का कहना है कि MUM-T प्राइमर के जरिए ट्रेनिंग, सैन्य अभ्यास, हथियार खरीद और रिसर्च से जुड़ी गाइडलाइंस भी तय की जाएंगी। इसके तहत भविष्य में जॉइंट MUM-T वॉर गेम्स और एक्सरसाइज भी कराए जाएंगे, जहां सैनिक और ड्रोन मिलकर ऑपरेशन का अभ्यास करेंगे।

मल्टी डोमेन ऑपरेशन का है हिस्सा

यह पूरी व्यवस्था मल्टी डोमेन ऑपरेशन (MDO) का हिस्सा है, जिसे 2025 में जारी किया गया था। इसका मकसद यह है कि जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में एक साथ मिलकर युद्ध लड़ा जा सके। सेना के अधिकारियों के मुताबिक 2026 को “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक वॉरफेयर” का साल माना जा रहा है, जहां सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं बल्कि सही समय पर सही डेटा होगा।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान का मानना है कि MUM-T भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनॉमस सिस्टम और स्वार्म ड्रोन जैसी नई तकनीकों में आगे ले जाएगा। खास तौर पर चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों को देखते हुए भारत तेजी से ऐसे सिस्टम डेवलप कर रहा है, जो युद्ध के दौरान तेज और सटीक कार्रवाई कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

जयपुर में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस ऐसे समय में हो रही है, जब ऑपरेशन सिंदूर को एक साल पूरा हुआ है। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना ने मल्टी डोमेन ऑपरेशन का इस्तेमाल किया था। सेना के अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी इस प्राइमर में शामिल किया गया है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और डेटा नेटवर्क भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

क्या है मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी

कॉन्फ्रेंस के दौरान जारी की गई “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” भी काफी अहम मानी जा रही है। इसके जरिए सेना अपने साइबर नेटवर्क और सैन्य डेटा को सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम करेगी।

आधुनिक युद्ध में साइबर अटैक बड़ा खतरा बन चुके हैं। दुश्मन किसी देश के कम्युनिकेशन सिस्टम, रडार नेटवर्क, सैटेलाइट लिंक और एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बना सकता है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब साइबर सुरक्षा को युद्ध का अहम हिस्सा मान रही है।

अधिकारियों के मुताबिक इस पॉलिसी के तहत आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की साइबर यूनिट्स मिलकर काम करेंगी। इसमें डीआरडीओ, एनटीआरओ और दूसरी राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ भी तालमेल बढ़ाया जाएगा।

बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ पैम्फलेट क्यों अहम

कॉन्फ्रेंस में जारी किया गया “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में तैयार किया गया है ताकि तीनों सेनाओं के अधिकारी एक जैसी प्रक्रिया और शब्दावली का इस्तेमाल कर सकें। अधिकारियों का मानना है कि इससे आपसी तालमेल बेहतर होगा।

Explained: क्या है DRDO का नया हथियार TARA? जो साधारण बम को बना देता है स्मार्ट, जगुआर से हुआ सफल ट्रायल

TARA Glide Weapon System
TARA Glide Weapon System

TARA Glide Weapon System: डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना ने 7 मई को ओडिशा तट के पास “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” यानी तारा (TARA) वेपन सिस्टम का पहला सफल फ्लाइट ट्रायल किया। यह भारत का पहला स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम है, जो साधारण बमों को लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रिसिजन वेपन्स में बदल सकता है।

तारा एक मॉड्यूलर रेंज एक्सटेंशन किट है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसा सिस्टम है, जिसे सामान्य बमों पर लगाया जाता है और फिर वही बम “स्मार्ट प्रिसीजन वेपन” बन जाता है। इसकी मदद से वायुसेना दुश्मन के ठिकानों पर ज्यादा दूरी से और ज्यादा सटीक हमला कर सकती है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर डीआरडीओ, वायुसेना और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

क्या है TARA Glide Weapon System?

तारा यानी “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” एक ग्लाइड वेपन सिस्टम है। इसे खास तौर पर इस तरह बनाया गया है कि पुराने और साधारण बमों को भी आधुनिक “प्रिसीजन गाइडेड वेपन” में बदला जा सके।

आमतौर पर जब कोई साधारण बम जहाज से गिराया जाता है, तो वह सीधे नीचे गिरता है और उसकी दूरी सीमित होती है। लेकिन तारा किट लगने के बाद वही बम हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड कर सकता है और तय टारगेट तक पहुंच सकता है।

यही वजह है कि इसे “रेंज एक्सटेंशन किट” कहा जा रहा है। यह बम की मारक दूरी और सटीकता दोनों बढ़ा देता है।

डीआरडीओ ने किया डिजाइन

तारा सिस्टम को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने तैयार किया है। यह डीआरडीओ की प्रमुख लैब मानी जाती है, जो मिसाइल गाइडेंस, नेविगेशन और एवियोनिक्स सिस्टम पर काम करती है।

तारा (TARA) प्रोजेक्ट को सबसे पहले 2022 में गणतंत्र दिवस परेड की झांकी में दिखाया गया था। उसी समय पहली बार सार्वजनिक तौर पर इस नए स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद 2023 और 2024 के दौरान इसके ग्राउंड फिटमेंट ट्रायल किए गए। इन परीक्षणों में तारा सिस्टम को जगुआर और मिग-29के जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाकर जांचा गया कि यह विमान के साथ सही तरीके से फिट और काम कर रहा है या नहीं।

इस परियोजना में सिर्फ आरसीआई ही नहीं, बल्कि डीआरडीओ की दूसरी लैब्स जैसे डीआरडीएल और एएसएल ने भी अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा कई निजी भारतीय कंपनियां भी इससे जुड़ी रहीं। अपोलो माइक्रो सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने इसमें इस्तेमाल होने वाले एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तैयार करने में सहयोग दिया।

साधारण बम कैसे बनता है स्मार्ट हथियार?

तारा का सबसे अहम हिस्सा उसका “गाइडेंस और ग्लाइड सिस्टम” है। तारा के डिजाइन में खास एरोडायनामिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके पीछे कंट्रोल फिन्स और विंग्स लगे होते हैं, जो इसे हवा में ज्यादा स्थिर और लंबी दूरी तक ग्लाइड करने में मदद करते हैं। यह डिजाइन दुश्मन के रडार से बचने में भी मदद करता है।

जब विमान से बम छोड़ा जाता है, तो ये विंग्स खुल जाते हैं और बम हवा में आगे की तरफ ग्लाइड करने लगता है। इसके बाद गाइडेंस सिस्टम उसे लक्ष्य तक पहुंचाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इंजन का इस्तेमाल नहीं होता। यही वजह है कि इसे “ग्लाइड बम” कहा जाता है।

वहीं, जब तारा अपने टारगेट के करीब पहुंचता है, तो वह उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने और खुद को एडजस्ट करने की क्षमता रखता है। इससे लक्ष्य पर ज्यादा सटीक हमला करना संभव होता है।

कितनी दूरी तक कर सकता है हमला?

तारा की आधिकारिक रेंज सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह लगभग 150 से 180 किलोमीटर तक मार कर सकता है। अगर तारा को 5 किलोमीटर की ऊंचाई से और तेज रफ्तार में लॉन्च किया जाए, तो यह काफी दूर तक ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंच सकता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की सीमा से बाहर रहते हुए हमला कर सकते हैं। इसे लगाने के बाद विमान को दुश्मन के बेहद करीब जाने की जरूरत नहीं होगी। वह दूर से ही बम छोड़ सकेगा और तारा सिस्टम उसे टारगेट तक पहुंचा देगा।

अलग-अलग वर्जन में तैयार

तारा को अलग-अलग वजन वाले बमों के लिए तैयार किया गया है। इसमें 250 किलोग्राम, 450 किलोग्राम और 500 किलोग्राम वाले वर्जन शामिल हैं। यानी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग मिशन में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। छोटे लक्ष्य के लिए हल्का वर्जन इस्तेमाल होगा, जबकि मजबूत बंकर या बड़े सैन्य ठिकानों के लिए भारी वर्जन काम आएंगे।

दिन और रात दोनों समय करेगा काम

तारा में एडवांस गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है। इसमें जीपीएस, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड तकनीक शामिल है। इस वजह से यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। खराब मौसम में भी इसकी प्रिसीजन क्षमता बनी रहती है।

सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम लक्ष्य को बहुत कम गलती के साथ हिट कर सकता है। इसकी सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 5 मीटर से कम से कम है।

किन विमानों से किया जा सकेगा इस्तेमाल?

तारा को भारतीय वायुसेना के कई लड़ाकू विमानों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें जगुआर, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 और एलसीए तेजस जैसे विमान शामिल हैं। 2025 में इसके कुछ परीक्षण जगुआर विमान पर किए जा चुके थे। अब सफल फ्लाइट ट्रायल के बाद इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

आज किस जहाज से हुआ ट्रायल

7 मई को हुआ तारा (TARA) वेपन सिस्टम का ट्रायल भारतीय वायुसेना के जगुआर लड़ाकू विमान से किया गया। TARA 500 सिस्टम जगुआर विमान के विंग के नीचे लगे पाइलॉन पर फिट किया गया है।

इससे पहले 2025 में इसके “कैप्टिव कैरी ट्रायल” भी जगुआर पर किए गए थे। इन ट्रायल्स में हथियार को विमान के साथ लगाकर उड़ाया गया था, लेकिन उसे छोड़ा नहीं गया था। इसका मकसद यह जांचना था कि विमान और हथियार का इंटीग्रेशन सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।

जगुआर को भारतीय वायुसेना में “शमशेर” के नाम से भी जाना जाता है। यह विमान लंबे समय से डीप स्ट्राइक और ग्राउंड अटैक मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसी वजह से तारा जैसे प्रिसीजन ग्लाइड वेपन के परीक्षण के लिए इसे उपयुक्त प्लेटफॉर्म माना गया।

क्यों अहम माना जा रहा है यह सिस्टम?

आधुनिक युद्ध में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू विमानों के लिए सीधे दुश्मन के ऊपर जाकर हमला करना ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।

इसी वजह से दुनिया की बड़ी वायु सेनाएं अब “स्टैंड-ऑफ वेपन” पर जोर दे रही हैं। यानी ऐसे हथियार जो लंबी दूरी से दागे जा सकें।

तारा इसी श्रेणी का सिस्टम माना जा रहा है। इससे भारतीय वायुसेना की “डीप स्ट्राइक” क्षमता मजबूत होगी। यानी दुश्मन के अंदर मौजूद ठिकानों पर भी सुरक्षित दूरी से हमला किया जा सकेगा।

कम लागत में बड़ा फायदा

तारा की एक बड़ी खासियत इसकी कम लागत भी मानी जा रही है। आमतौर पर लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें काफी महंगी होती हैं। लेकिन तारा पुराने बमों को ही स्मार्ट हथियार में बदल देता है। इससे लागत कम हो जाती है। और वायुसेना को पूरी तरह नए हथियार खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम कम लागत में ज्यादा असर देने की रणनीति का हिस्सा है।

कई देशों के पास है यह सिस्टम

दुनिया के कई देशों के पास ऐसे ग्लाइड बम सिस्टम पहले से मौजूद हैं। तारा (TARA) को आसान भाषा में समझें तो यह अमेरिका के जेडीएएम और इजरायल के स्पाइस-1000 जैसे स्मार्ट ग्लाइड बम सिस्टम की तरह है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है।

डीआरडीओ के दूसरे ग्लाइड बम “गौरव” की तुलना में तारा आकार में छोटा और ज्यादा टैक्टिकल सिस्टम माना जा रहा है। वहीं एसएएडब्ल्यू यानी स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन जहां खास तौर पर एयरबेस और रनवे को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया था, वहीं तारा का मुख्य फोकस साधारण बमों की मारक दूरी बढ़ाना और उन्हें ज्यादा सटीक बनाना है।

इसका डिजाइन मॉड्यूलर रखा गया है। यानी जरूरत के हिसाब से इसमें नए सेंसर, गाइडेंस सिस्टम या दूसरे अपग्रेड आसानी से जोड़े जा सकते हैं।

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी दुश्मन द्वारा जीपीएस और गाइडेंस सिस्टम को जाम करने की कोशिश बड़ी समस्या बन चुकी है। ऐसे में हथियार की प्रिसिजन क्षमता बनाए रखना जरूरी होता है। इसी वजह से तारा में डुअल और ट्राई-मोड गाइडेंस जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। वहीं भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टारगेटिंग और ज्यादा एडवांस सेंसर जैसी तकनीकें भी जोड़ी जा सकती हैं।

रक्षा मंत्रालय ने तारा सिस्टम के लिए भारतीय उद्योगों के साथ मिलकर उत्पादन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कई निजी कंपनियां और रक्षा क्षेत्र की भारतीय फर्म इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन और तकनीकी क्षमता दोनों बढ़ेंगी।

TARA Explained: India’s Indigenous Glide Weapon System Successfully Tested From Jaguar Fighter Jet.

ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने क्या सीखा? बना रहा ड्रोन और मिसाइल रोकने वाला नया सुरक्षा कवच

Operation Sindoor Military Strategy
Lieutenant General Rajiv Ghai, Air Marshal Awadhesh Kumar Bharti

Operation Sindoor Military Strategy: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भारतीय सेना और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहली बार खुलकर बताया कि इस अभियान से भारत ने क्या सीखा और अब देश की सैन्य रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है। जयपुर में आयोजित एक विशेष प्रेस ब्रीफिंग में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसने भारत की युद्ध नीति, हथियार खरीद रणनीति, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन युद्ध, स्पेस क्षमताओं और मिसाइल स्ट्रक्चर को बदलने का काम किया।

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक के बाद भारत अब अपने मिलिट्री स्ट्रक्चर, हथियार प्रणालियों और ऑपरेशनल तैयारी में बड़े बदलाव कर रहा है।

Operation Sindoor Military Strategy: “ऑपरेशन अभी खत्म नहीं हुआ”

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब ऑपरेशन सिंदूर की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल पूछा गया, तो अधिकारियों ने साफ संकेत दिया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई अभी रुकी नहीं है।

अधिकारियों ने कहा कि भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लगातार जारी रहेगी। उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर को किसी एक दिन की सैन्य कार्रवाई की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक लंबी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा, “भारत की आतंकवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी। ऑपरेशन उतने समय तक जारी रहेगा, जितनी जरूरत होगी।”

ऑपरेशन सिंदूर से क्या सीखा भारत ने

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इसके बाद पाकिस्तान ने ड्रोन, मिसाइल और अन्य हथियारों के जरिए भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी।

एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि इस पूरे 88 घंटे तक चलते संघर्ष ने भारत को कई महत्वपूर्ण सबक दिए। उन्होंने कहा कि सेना लगातार अपनी ट्रेनिंग, तैयारी और हथियार प्रणालियों की समीक्षा करती रहती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस प्रक्रिया को और तेज किया गया।

उन्होंने कहा, “हम लगातार यह देखते रहते हैं कि हमारी ट्रेनिंग कैसी है, हमारे उपकरण कैसे हैं और हमारी तैयारी किस स्तर की है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी यह प्रक्रिया लगातार चल रही है।”

भरोसेमंद इंटेलिजेंस के लिए आईएसआर पर निवेश

एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना अपनी खरीद रणनीति और सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करने पर काम कर रही है। उन्होंने बताया कि भारत के पास जरूरी क्षमताएं तो थीं, लेकिन कुछ सिस्टम्स की संख्या उतनी नहीं थी जितनी बड़े स्तर के ऑपरेशन के लिए होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी कार्रवाई में सही जानकारी और भरोसेमंद इंटेलिजेंस सबसे अहम होती है। अगर दुश्मन के बारे में सही जानकारी ही नहीं होगी, तो सटीक लक्ष्य तय करना मुश्किल हो जाएगा। इसी वजह से भारत अब अपनी आईएसआर यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस क्षमताओं को तेजी से मजबूत कर रहा है।

उन्होंने बताया कि एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट, मेडिकल इवैक्युएशन सिस्टम और दूसरे “फोर्स मल्टीप्लायर” प्लेटफॉर्म्स की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। उनका कहना था कि ये सिस्टम युद्ध के दौरान सेना की पहुंच, निगरानी क्षमता और ऑपरेशनल ताकत को कई गुना बढ़ा देते हैं।

मिसाइल और एयर डिफेंस क्षमताओं को मजबूत करने पर फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने कहा, “हम ऐसा इंटीग्रेटेड और मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहे हैं, जो ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और मिसाइल जैसे कई तरह के खतरों से एक साथ सुरक्षा दे सके।”

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले अनुभवों के बाद भारत ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत बनाने पर तेजी से काम शुरू किया है।

वहीं, एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि भारत लगातार अपनी स्वदेशी मिसाइल और एयर डिफेंस क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। उन्होंने बताया कि स्वदेशी अस्त्र मिसाइल, क्यूआर-एसएएम और दूसरे कई प्रोजेक्ट्स पर लगातार काम चल रहा है। उनका कहना था कि यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है और सेना अपनी क्षमताओं को समय-समय पर बेहतर करती रहती है।

उन्होंने कहा कि आज खतरा तेजी से बदल रहा है। अब सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों का दौर है। इसी वजह से भारत नए सेंसर और एडवांस एयर डिफेंस तकनीकों पर काम कर रहा है, ताकि ऐसी तेज रफ्तार मिसाइलों को भी समय रहते ट्रैक और इंटरसेप्ट किया जा सके।

एस-400 सिस्टम की नई खेप जल्द मिलेगी

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एयर डिफेंस सिस्टम की भूमिका काफी अहम रही। इस पर बोलते हुए अधिकारियों ने बताया कि भारत जल्द ही रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की नई यूनिट्स हासिल करेगा।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि कुछ एस-400 यूनिट्स पहले ही आ चुकी हैं और बाकी यूनिट्स भी अगले कुछ महीनों में भारत को मिल जाएंगी। उन्होंने बताया, “अगले एक महीने के भीतर एस-400 की अगली यूनिट हमारे पास होगी और इस साल के अंत तक आखिरी यूनिट भी मिलने की उम्मीद है।”

एस-400 को दुनिया के सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। यह लंबी दूरी से दुश्मन के विमान, ड्रोन और मिसाइलों को ट्रैक कर उन्हें मार गिराने में सक्षम माना जाता है।

“सुदर्शन चक्र” और “कुशा” पर तेजी से काम

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान अधिकारियों ने पहली बार “सुदर्शन चक्र” और “कुशा” जैसे प्रोजेक्ट्स का भी खुलकर जिक्र किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही “सुदर्शन चक्र” को लेकर दिशा-निर्देश दे चुके हैं और इस पर काम जारी है।

इसके साथ ही स्वदेशी लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम “कुशा” पर भी तेजी से काम हो रहा है। अधिकारियों ने कहा कि अब खतरे बदल रहे हैं। पहले जहां सामान्य मिसाइलें चुनौती थीं, वहीं अब सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों का खतरा बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत ऐसे सेंसर और सिस्टम डेवलप कर रहा है जो इन तेज रफ्तार वाली मिसाइलों का भी समय रहते पता लगा सकें।

ड्रोन वॉरफेयर ने बदली रणनीति

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया था। इसके बाद भारत ने ड्रोन और काउंटर ड्रोन सिस्टम (C-UAS) पर अपना फोकस और बढ़ा दिया।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि अब भारत बड़ी संख्या में ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे सिस्टम युद्ध के दौरान सेना की ताकत कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके अलावा भारत अब बड़ी संख्या में ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम्स की जरूरत को भी समझ रहा है। इसी वजह से सरकार ड्रोन सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रोत्साहन दे रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर तेजी से बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सके।

उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार की पीएलआई योजना के तहत एमएसएमई और निजी कंपनियों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “अगर युद्ध के समय हमें हजारों ड्रोन की जरूरत पड़े, तो हमारी इंडस्ट्री उन्हें तेजी से बना सके। हम इसी क्षमता को विकसित कर रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब हार्ड किल और सॉफ्ट किल दोनों तरह के काउंटर ड्रोन सिस्टम पर काम कर रहा है।

“हर हथियार का अपना रोल होता है”

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की लागत और सस्ते विकल्पों को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर एयर मार्शल भारती ने कहा कि आधुनिक युद्ध में हाई कॉस्ट और लो कॉस्ट दोनों तरह के हथियार जरूरी होते हैं।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस जैसी हाई एंड मिसाइलों की अपनी अलग भूमिका होती है, जिन्हें सस्ते ड्रोन या छोटे सिस्टम पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा कि ड्रोन और छोटे अनमैन्ड सिस्टम दुश्मन को परेशान कर सकते हैं, लेकिन निर्णायक असर पैदा करने के लिए भारी और ताकतवर हथियारों की जरूरत होती है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें बड़े लक्ष्य को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि ब्रह्मोस भारत की स्वदेशी ताकत का बड़ा उदाहरण है और देश को इस पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने बताया कि आने वाले एक-दो साल में कई नए स्वदेशी हथियार सिस्टम भारतीय सेनाओं में शामिल होते दिखाई देंगे।

भारतीय वायुसेना बढ़ा रही अपनी ताकत

एयर मार्शल भारती ने कहा कि भारतीय वायुसेना अब अपनी ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने वाले सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म्स पर बड़े स्तर पर काम कर रही है। उन्होंने बताया कि एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट जैसे महत्वपूर्ण “फोर्स मल्टीप्लायर” सिस्टम्स की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ रही है और इसके लिए आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल पहले ही जारी किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि एलसीए मार्क-1ए जल्द वायुसेना में शामिल होगा। इसके अलावा एलसीए मार्क-2 और पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए फाइटर जेट पर भी काम जारी है।

उन्होंने एमआरएफए प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया, जिसके तहत भारतीय वायुसेना 114 नए मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना पर काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि इस बार वायुसेना के बजट में भी बढ़ोतरी की गई है। पिछले साल जहां लगभग 1.30 लाख करोड़ रुपये का बजट था, वहीं अब यह बढ़कर करीब 1.55 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

मिसाइल फोर्स और नए स्ट्रक्चर पर काम कर रहा भारत

इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान के “न्यूक्लियर ब्लैकमेल” को भी चुनौती दी।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अपने मिसाइल स्ट्रक्चर और रॉकेट फोर्स को मजबूत करने की कोशिश शुरू की है, लेकिन भारत उसकी पूरी क्षमता को अच्छी तरह समझता है।

उन्होंने कहा कि भारत अब पारंपरिक मिसाइल फोर्स और नए स्ट्रक्चर पर भी काम कर रहा है।

मिनवाला ने कहा कि दुनिया में मिसाइलों का इस्तेमाल अब केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। अब उन्हें पारंपरिक युद्ध में भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “यह एक बड़ा पैराडाइम शिफ्ट है। मिसाइलों की भूमिका अब केवल स्ट्रैटेजिक नहीं रही।”

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि भारत अलग-अलग रेंज और अलग-अलग प्रकार की मिसाइल क्षमताओं पर काम कर रहा है।

उन्होंने कहा कि डीआरडीओ द्वारा हाल के महीनों में किए गए कई परीक्षण इसी दिशा का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के पास पहले से ही प्रभावी डिलीवरी सिस्टम मौजूद हैं और दुश्मन यह जानता है कि भारत के पास मजबूत स्ट्राइक क्षमता है।

India Revamps Military Strategy After Operation Sindoor, Focus on Missiles, Drones and Air Defence.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली भारत की वॉर स्ट्रैटेजी! बना रहा जॉइंट आईएसआर और टारगेटिंग डॉक्ट्रिन, समझें क्या है ये

Operation Sindoor Joint Doctrine
AI-Generated Image

Operation Sindoor Joint Doctrine: भारतीय सेना अब युद्ध की तैयारी केवल सीमा पर सैनिक और हथियार तैनात करके नहीं कर रही, बल्कि पूरा फोकस “जॉइंट वॉरफेयर” पर है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपनी मिलिट्री स्ट्रैटेजी में बड़े बदलाव शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने खुलासा किया है कि भारत अब जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन और जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन पर तेजी से काम कर रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर का एक साल पूरा होने पर जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उन्होंने बताया कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा नेटवर्क के जरिए युद्ध लड़ने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसी तरह के तालमेल ने भारत को तेजी से और सटीक कार्रवाई करने में मदद की।

Operation Sindoor Joint Doctrine: क्या है जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि आईएसआर का मतलब होता है इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है दुश्मन की जानकारी जुटाना, उस पर लगातार नजर रखना और उसकी गतिविधियों की टोह लेना। अब तक सेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने सिस्टम के जरिए यह काम करती थीं। कई बार जानकारी अलग-अलग जगहों पर रहती थी, जिससे फैसले लेने में समय लगता था।

नई जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन का मकसद इन सभी सिस्टम्स को एक साथ जोड़ना है। इसका मतलब यह है कि अब सैटेलाइट, ड्रोन, रडार, जासूसी विमान, समुद्री निगरानी सिस्टम और खुफिया एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी एक ही नेटवर्क में आएगी। इससे युद्ध क्षेत्र की पूरी तस्वीर रियल टाइम में तीनों सेनाओं को एक साथ दिखाई देगी।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस नई व्यवस्था में कई तरह की तकनीकों को जोड़ा जा रहा है। इसमें स्पेस बेस्ड निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस का इस्तेमाल होगा। आसमान से निगरानी के लिए एडवांस ड्रोन, एडब्ल्यूएसीएस विमान और रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट काम करेंगे। जमीन और समुद्र में रडार, सोनार और अन्य निगरानी सिस्टम लगाए जाएंगे। इसके साथ साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को भी नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इस पूरी व्यवस्था का मकसद दुश्मन की गतिविधियों का जल्दी पता लगाना और तुरंत जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है।

Operation Sindoor Joint Doctrine 1
Lieutenant General Zubin A. Minwalla

ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने महसूस किया कि आधुनिक युद्ध केवल बंदूक और मिसाइल से नहीं लड़े जाते। उन्होंने बताया कि उस दौरान अलग-अलग एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी को तेजी से जोड़ना और सही समय पर कार्रवाई करना सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण काम था।

उनके मुताबिक, “ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि मल्टी डोमेन ऑपरेशन कितना जरूरी हो चुका है।” उन्होंने कहा कि आज युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब साइबर स्पेस, डेटा नेटवर्क और सूचना युद्ध भी उतने ही अहम हो चुके हैं।

क्या है जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि पहले तीनों सेनाएं अपने-अपने लक्ष्य तय करती थीं। लेकिन अब एक जॉइंट टारगेटिंग सिस्टम बनाया जा रहा है।

इसका मतलब यह होगा कि सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर तय करेंगी कि कौन सा लक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण है और उस पर हमला किस हथियार या प्लेटफॉर्म से करना सबसे प्रभावी होगा।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी दुश्मन एयरबेस पर हमला करना है, तो पहले आईएसआर सिस्टम उसके बारे में जानकारी जुटाएगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि वहां ब्रह्मोस मिसाइल इस्तेमाल करनी है, ड्रोन हमला करना है या लड़ाकू विमान भेजना है। इसके बाद हमले के असर का आकलन भी उसी नेटवर्क के जरिए किया जाएगा।

छह चरणों में होगा पूरा ऑपरेशन

भारतीय सेना अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक एक नई “जॉइंट टारगेटिंग साइकिल” पर काम कर रही है। इसमें सबसे पहले ऑपरेशन का उद्देश्य तय किया जाएगा। फिर दुश्मन के लक्ष्यों की पहचान होगी। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि कौन सा हथियार सबसे सही रहेगा। उसके बाद कमांड स्तर पर मंजूरी मिलेगी और फिर मिशन को अंजाम दिया जाएगा। आखिर में यह जांचा जाएगा कि हमला कितना सफल रहा।

डेटा बेस्ड वॉरफेयर की तरफ बढ़ रहा भारत

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में आईएसीसीएस और आकाशतीर जैसे सिस्टम को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। इससे पूरे एयर स्पेस की एक संयुक्त तस्वीर तैयार हुई और खतरे की पहचान तेजी से हो सकी। उन्होंने कहा कि भारत अब “नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर” से आगे बढ़कर “डेटा सेंट्रिक वॉरफेयर” की दिशा में जा रहा है।

इसका मतलब है कि भविष्य के युद्धों में सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं, बल्कि सही समय पर सही डेटा होगा। मल्टी सेंसर इनपुट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रियल टाइम डेटा फ्यूजन के जरिए युद्ध के दौरान फैसले तेजी से लिए जाएंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय सेनाएं अब ऐसे सिस्टम बना रही हैं, जहां हर प्लेटफॉर्म और हर एजेंसी एक साझा नेटवर्क से जुड़ी हो।

उन्होंने बताया कि पिछले एक साल में कई ट्राई सर्विस एक्सरसाइज और वॉर गेमिंग अभ्यास किए गए हैं। इन अभ्यासों का मकसद यही है कि युद्ध के समय सेना, नौसेना और वायुसेना बिना किसी देरी के एक साथ काम कर सकें। उन्होंने कहा कि भारतीय तटरक्षक बल, बीएसएफ, डीआरडीओ, एनटीआरओ और दूसरी एजेंसियों के साथ भी तालमेल मजबूत किया गया है। उनके मुताबिक, आधुनिक युद्ध में केवल एक सेना नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की संयुक्त शक्ति काम करती है।

India Developing Joint ISR and Targeting Doctrine After Operation Sindoor, Reveals Lt Gen Minwalla

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ‘न्यू एज वॉरफेयर’ की झलक, भारत तैयार कर रहा मल्टी डोमेन वॉर सिस्टम

Operation Sindoor New Warfare Model
Lieutenant General Zubin A. Minwalla, Lieutenant General Rajiv Ghai, Air Marshal Awadhesh Kumar Bharti and Vice Admiral A.N. Pramod address a press conference on the anniversary of 𝐎𝐩𝐞𝐫𝐚𝐭𝐢𝐨𝐧 𝐒𝐢𝐧𝐝𝐨𝐨𝐫 in Jaipur, Rajasthan.

Operation Sindoor New Warfare Model: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस ऑपरेशन आधुनिक युद्ध का नया मॉडल बताया। इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसमें साइबर स्पेस, सूचना युद्ध और मल्टी डोमेन ऑपरेशन का भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दिखाया कि अब भारत की सेनाएं सिर्फ पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहीं, बल्कि नई तकनीक और अलग-अलग डोमेन्स को जोड़कर तेज और सटीक कार्रवाई करने में सक्षम हैं।

जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं के तालमेल, इंटेलिजेंस नेटवर्क, एयर डिफेंस सिस्टम, साइबर क्षमताओं और सूचना युद्ध की भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी।

Operation Sindoor New Warfare Model: ऑपरेशन सिंदूर में दिखा नया वॉर मॉडल

लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच ऐसा तालमेल देखने को मिला, जो पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत था। उन्होंने बताया कि पूरे ऑपरेशन को चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के निर्देशों के तहत हेडक्वार्टर आईडीएस के ऑपरेशन डायरेक्टरेट ने ऑपरेट किया।

उन्होंने कहा, “ऑपरेशन के दौरान सिर्फ पारंपरिक सैन्य क्षेत्र ही नहीं, बल्कि साइबर स्पेस और सूचना क्षेत्र को भी साथ लेकर काम किया गया। यह हमारी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव दिखाता है।”

उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि भारत अब मल्टी डोमेन ऑपरेशन को तेजी से, सटीकता और स्पष्ट उद्देश्य के साथ अंजाम दे सकता है।

सिर्फ पाकिस्तान पर हमला नहीं था यह ऑपरेशन

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को किसी एक घटना की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे कई सालों की तैयारी, सैन्य सुधार और अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय शामिल था।

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि इस अभियान की सफलता अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके लिए लंबे समय से मिलिट्री स्ट्रक्चर, प्रक्रियाओं और क्षमता निर्माण पर काम किया जा रहा था। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर कोई अकेली सफलता नहीं थी। यह संस्थागत मजबूती का परिणाम था।”

सीडीएस और रक्षा सुधारों की अहम भूमिका

उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद बनाए जाने और रक्षा सुधारों पर लगातार काम करने से तीनों सेनाओं के बीच तालमेल मजबूत हुआ। रक्षा मंत्री द्वारा 2025 को “रिफॉर्म्स का वर्ष” घोषित किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इससे जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन को आगे बढ़ाने में मदद मिली।

उन्होंने कहा कि स्ट्रक्चर्स, प्रोसेसेस, एंड आर्गेनाइजेशंस को एक-दूसरे से जोड़ने का असर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान साफ दिखाई दिया।

इंटेलिजेंस और कम्युनिकेशन नेटवर्क ने निभाई बड़ी भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अलग-अलग एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि मजबूत जॉइंट कम्युनिकेशन सिस्टम की वजह से हर स्तर पर बेहतर स्थिति की जानकारी मिलती रही।

उन्होंने कहा कि सेना, खुफिया एजेंसियों और निगरानी प्रणालियों से मिलने वाले इनपुट को तेजी से साझा किया गया, जिससे फैसले लेने की प्रक्रिया काफी तेज हो गई।

उनके मुताबिक, अब इस पूरे नेटवर्क को और मजबूत किया जा रहा है और इसे एक फुली फंक्शनल जॉइंट ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर में बदला जा रहा है। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में टारगेट तय करने और ऑपरेशन के दौरान फैसले लेने की क्षमता और बेहतर होगी।

एयर डिफेंस सिस्टम ने संभाला मोर्चा

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों का इस्तेमाल किया गया था। इस पर बोलते हुए लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने बताया कि आईएसीसीएस और आकाशतीर जैसे सिस्टम को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। इससे पूरे एयर स्पेस की एक संयुक्त तस्वीर तैयार हुई और खतरे की पहचान तेजी से हो सकी।

उन्होंने कहा कि अब इन नेटवर्क्स को और मजबूत बनाया जा रहा है ताकि ड्रोन, मिसाइल और दूसरे हवाई खतरों से एक साथ निपटा जा सके।

ड्रोन और नई तकनीकों पर बढ़ा फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि हाल के संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि अब युद्ध में अनमैन्ड और ऑटोनॉमस सिस्टम की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि भारतीय सेनाएं अब लंबी दूरी तक मार करने वाली सटीक हथियार प्रणालियों और मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग पर काम कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय और सिविल एविएशन मंत्रालय के साथ मिलकर एक नेशनल काउंटर यूएएस पॉलिसी तैयार की जा रही है। इसका मकसद ड्रोन खतरों से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत ढांचा तैयार करना है।

स्पेस और डेटा आधारित युद्ध की तैयारी

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय सेनाएं अब नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम से आगे बढ़कर डेटा सेंट्रिक आर्किटेक्चर की तरफ जा रही हैं। उन्होंने बताया कि स्पेस डोमेन में भी तेजी से काम हो रहा है। इसरो और डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि रियल टाइम निगरानी और टारगेटिंग क्षमता मजबूत हो सके।

उनके मुताबिक, मल्टी सेंसर इनपुट और डेटा आधारित फैसलों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फेक न्यूज से लड़ने के लिए बनेगा नया डिवीजन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सोशल मीडिया और सूचना युद्ध भी बड़ा मुद्दा बना रहा। इसे लेकर लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि अब रक्षा क्षेत्र में एक नया “डिफेंस स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन डिवीजन” बनाया जा रहा है। यह डिवीजन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स का इस्तेमाल करेगा।

उन्होंने कहा कि इसका मकसद गलत जानकारी, दुष्प्रचार और फेक नैरेटिव को रियल टाइम में जवाब देना होगा।

उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सूचना और संज्ञानात्मक क्षेत्र में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया गया था। इससे सरकार और सेना का पक्ष प्रभावी तरीके से सामने रखा जा सका।

तीनों सेनाओं के बीच बढ़ा तालमेल

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि पिछले एक साल में कई ट्राई सर्विस एक्सरसाइज, वॉर गेमिंग और सिमुलेशन किए गए, जिससे मल्टी डोमेन ऑपरेशन की अवधारणा को मजबूत किया गया। उन्होंने बताया कि सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट और मेंटेनेंस प्रोटोकॉल को भी जोड़ा गया है। इससे ऑपरेशनल तैयारी और क्षमता में सुधार हुआ है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय तटरक्षक बल, बीएसएफ, खुफिया एजेंसियों, डीआरडीओ, एनटीआरओ और निजी इंडस्ट्री के साथ भी समन्वय बढ़ा है। उनके मुताबिक, पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट कंपनियां और स्टार्टअप्स भी अब रक्षा तैयारियों का हिस्सा बन रहे हैं।

उन्होंने कहा, “आज हमारे पास ऐसा सिस्टम है जिसमें सेनाएं, मंत्रालय और सरकारी एजेंसियां एक साथ काम कर रही हैं। यही पूरे राष्ट्र की संयुक्त शक्ति का उदाहरण है।”

Operation Sindoor Showed India’s New-Age Warfare Model with Cyber, AI and Multi-Domain Operations: Lt Gen Zubin Minwalla

INS विक्रांत से उड़ा भारत का पहला स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन, भारतीय नौसेना को मिली नई ‘आंख’

INS Vikrant Maritime Spotter Drone
INS Vikrant Maritime Spotter Drone

INS Vikrant Maritime Spotter Drone: देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से भारत के पहले स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन का सफल ऑपरेशन किया गया है। इस ड्रोन को खास तौर पर समुद्री मिशनों के लिए तैयार किया गया है। यह ड्रोन समुद्र में निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने, एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन और अवैध तस्करी रोकने जैसे मिशनों में नौसेना की मदद करेगा। भारतीय नौसेना ने इस उपलब्धि को देश में एडवांस्ड ऑटोनॉमस नेवल सिस्टम के विकास की दिशा में अहम मील का पत्थर बताया है। नौसेना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह सिस्टम अब समुद्र में भारतीय जहाजों की “आंख” की तरह काम करेगा।

अब तक समुद्री निगरानी के लिए बड़े हेलीकॉप्टर या विमान का इस्तेमाल करना पड़ता था। लेकिन छोटे मिशनों के लिए ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता। स्पॉटर ड्रोन इस कमी को पूरा करता है। यह कम समय में उड़ान भर सकता है और कम खर्च में निगरानी कर सकता है।

INS Vikrant Maritime Spotter Drone: आईएनएस विक्रांत से भरी उड़ान

इस ड्रोन को भारत के पहले स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत के डेक से उड़ाया गया। चलते हुए विशाल युद्धपोत से किसी ड्रोन का सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग आसान नहीं माना जाता, क्योंकि समुद्र में जहाज लगातार हिलता रहता है और तेज हवाएं भी चुनौती पैदा करती हैं। इसके बावजूद इस ड्रोन ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और मिशन पूरा करने के बाद सुरक्षित वापसी भी की। इस उपलब्धि को नौसेना की तकनीकी तैयारी और भारतीय कंपनियों की क्षमता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

आईएनएस विक्रांत भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी विमानवाहक पोत है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में डिजाइन और तैयार किया गया। यह युद्धपोत भारतीय नौसेना की ब्लू वॉटर क्षमता का प्रमुख हिस्सा माना जाता है। करीब 45 हजार टन वजनी यह पोत लंबी दूरी के समुद्री अभियानों को अंजाम देने में सक्षम है।

इस विमानवाहक पोत पर मिग-29के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और दूसरे एयर प्लेटफॉर्म तैनात किए जा सकते हैं। अब इसमें स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन की क्षमता भी जुड़ गई है। इससे इसकी समुद्री निगरानी और इंटेलिजेंस क्षमता और मजबूत हो गई है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

क्या है मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन

मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन एक छोटा लेकिन बेहद आधुनिक समुद्री निगरानी सिस्टम है। इसे पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। यह ड्रोन खास तौर पर नौसेना के लिए बनाया गया है ताकि समुद्र में जहाजों को दूर तक नजर रखने में मदद मिल सके। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह समुद्र के कठिन वातावरण में भी काम कर सके। तेज हवा, नमकीन पानी और लगातार हिलते प्लेटफॉर्म पर भी इसकी कार्यक्षमता बनी रहती है।

बता दें कि भारतीय नौसेना के नए स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को भी स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन भी जोड़ा गया है, जिसे सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

चलते जहाज से उड़ान भरने की क्षमता

इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह चलते हुए युद्धपोत से भी उड़ान भर सकता है और उसी पर वापस उतर सकता है। आम तौर पर यह काम बेहद मुश्किल माना जाता है। यह ड्रोन 20 से 45 नॉट की रफ्तार से चल रहे जहाज से भी ऑपरेट हो सकता है। दुनिया की बहुत कम कंपनियों के पास ऐसी तकनीक है। समुद्री इलाकों में तेज हवा, नमी और लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच ड्रोन ऑपरेट करना आसान नहीं होता। इसी वजह से इस सिस्टम को कठिन समुद्री माहौल में काम करने के लिए तैयार किया गया है।

एक नौसैनिक अधिकारी ने कहा, “समुद्र में जहाज लगातार गति और दिशा बदलता रहता है। ऐसे में ड्रोन का सुरक्षित उतरना तकनीकी रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है।” (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

कितनी है इसकी क्षमता

यह ड्रोन करीब 20 किलोमीटर तक निगरानी कर सकता है। एक बार उड़ान भरने के बाद यह लगभग एक घंटे तक हवा में रह सकता है। इसमें आधुनिक कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी मदद से दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकती है। ड्रोन रियल टाइम वीडियो और डेटा सीधे जहाज तक भेजता है। यानी समुद्र में क्या हो रहा है, उसकी जानकारी तुरंत कंट्रोल रूम तक पहुंच जाती है।

ड्रोन में AIS रिसीवर और दूसरे इंटेलिजेंस उपकरण लगाने की क्षमता भी है। इससे समुद्र में जहाजों की गतिविधियों और संदिग्ध मूवमेंट पर नजर रखना आसान हो जाता है।

कंपनी के अनुसार यह ड्रोन करीब 5 किलो तक पेलोड ले जा सकता है। इसमें रीयल टाइम डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम लगाया गया है, जिससे जहाज पर मौजूद ऑपरेटर को तुरंत जानकारी मिलती रहती है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

समुद्र में कैसे करेगा मदद

भारतीय नौसेना के लिए यह ड्रोन कई तरह के मिशनों में उपयोगी साबित हो रहा है। अगर किसी जहाज के आसपास संदिग्ध नाव दिखाई देती है, तो यह ड्रोन तुरंत वहां पहुंचकर तस्वीरें और वीडियो भेज सकता है। एंटी पाइरेसी ऑपरेशन में भी इसकी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। समुद्र में समुद्री लुटेरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए यह काफी उपयोगी है। इसके अलावा अवैध तस्करी रोकने, संदिग्ध जहाजों की पहचान करने और खोज एवं बचाव अभियान में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

पहले भी ऑपरेशन में हो चुका इस्तेमाल

भारतीय नौसेना पहले भी इस तरह के ड्रोन का इस्तेमाल एंटी-पाइरेसी मिशनों में कर चुकी है। साल 2024 में यमन के पास एक मर्चेंट जहाज को समुद्री लुटेरों ने हाईजैक कर लिया था। उस दौरान आईएनएस कोलकाता ने ऑपरेशन चलाकर जहाज को सुरक्षित कराया था।

उस मिशन में स्पॉटर ड्रोन ने रीयल टाइम तस्वीरें और जानकारी उपलब्ध कराई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार ऑपरेशन के दौरान एक समुद्री लुटेरे ने ड्रोन पर गोली भी चलाई थी, लेकिन ड्रोन सुरक्षित वापस लौट आया।

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के को-फाउंडर कैप्टन निकुंज पराशर ने उस समय कहा था, “अगर ड्रोन पर गोली चलती है तो इसका मतलब है कि हमारे सैनिक सुरक्षित हैं। यही इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत है।”

कई मिशनों में मदद करेगा यह सिस्टम

भारतीय नौसेना के लिए यह ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल समुद्री तस्करी रोकने, संदिग्ध नौकाओं की पहचान करने, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन और फ्लीट कोऑर्डिनेशन में भी किया जा सकता है।

ड्रोन की मदद से जहाजों को आसपास के समुद्री इलाके की ज्यादा स्पष्ट जानकारी मिलती है। इससे ऑपरेशन के दौरान तेजी से फैसले लेने में मदद मिलती है और जोखिम भी कम होता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना में इस तरह के 60 से ज्यादा ड्रोन शामिल किए जा चुके हैं। इन्हें अलग-अलग युद्धपोतों और समुद्री मिशनों में इस्तेमाल किया जा रहा है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

हिंद महासागर में बढ़ती चुनौतियां

भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। इस क्षेत्र में समुद्री तस्करी, पाइरेसी और विदेशी जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी माना जाता है।

भारत की समुद्री सीमा लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी है। ऐसे में समुद्री निगरानी के लिए एडवांस्ड ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। यह ड्रोन नौसेना को समुद्र में दूर तक निगरानी रखने में मदद करेगा और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जल्दी पहचान हो सकेगी। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)