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70,000 करोड़ की मेगा डील! भारतीय नौसेना को मिलेंगी ऐसी पनडुब्बियां जो हफ्तों तक नहीं आएंगी सतह पर

India AIP Submarine Deal

India AIP Submarine Deal: भारतीय नौसेना अगले कुछ महीनों में अपनी सबसे बड़ी पनडुब्बी परियोजनाओं में से एक को अंतिम रूप देने जा रही है। करीब 70 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली प्रोजेक्ट-75 इंडिया यानी पी-75आई के तहत भारत छह नई एडवांस पनडुब्बियां खरीदेगा। इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी तकनीक होगी, जिससे ये लंबे समय तक समुद्र के अंदर बिना सतह पर आए रह सकेंगी।

यह सौदा ऐसे समय में किया जा रहा है जब पाकिस्तान तेजी से अपने अंडरवॉटर बेड़े को मजबूत कर रहा है। चीन की मदद से पाकिस्तान ने हाल ही में नई हंगोर क्लास एआईपी पनडुब्बियां शामिल कर रहा है, जबकि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी ऑपरेशनल एआईपी पनडुब्बी नहीं है। वहीं भारतीय नौसेना भी अपनी कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है, जो इस साल के आखिर तक पूरा हो जाएगा।

India AIP Submarine Deal: सितंबर तक लग सकती है सौदे पर अंतिम मुहर

रक्षा सूत्रों के मुताबिक इस परियोजना से जुड़ी प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इसी महीने इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप से मंजूरी मिलने की उम्मीद है। इसके बाद सितंबर तक कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत हो सकते हैं।

इस प्रोजेक्ट में मुंबई की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल भारतीय स्ट्रेटेजिक पार्टनर होगी। जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस इसके साथ मिलकर काम करेगी।

रक्षा मंत्रालय के स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत विदेशी कंपनी भारत को पनडुब्बी डिजाइन और तकनीक ट्रांसफर करेगी। इसके बाद भारत में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा।

क्या होती है एआईपी तकनीक

एआईपी तकनीक आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे अहम क्षमता मानी जाती है। सामान्य पनडुब्बियों को बैटरियां चार्ज करने के लिए कुछ समय बाद समुद्र की सतह के करीब आना पड़ता है या स्नॉर्कल इस्तेमाल करना पड़ता है। इस दौरान दुश्मन के रडार और सेंसर उन्हें पकड़ सकते हैं।

लेकिन एआईपी तकनीक वाली पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी स्टेल्थ क्षमता काफी बढ़ जाती है और दुश्मन के लिए उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में यह तकनीक बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे पनडुब्बी बिना दिखाई दिए लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। (India AIP Submarine Deal)

सात साल बाद मिलेगी पहली पनडुब्बी

योजना के मुताबिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के करीब सात साल बाद पहली पनडुब्बी नौसेना को मिलेगी। इसके बाद हर साल एक नई पनडुब्बी की डिलीवरी की जाएगी।

सरकार ने इस परियोजना में स्वदेशीकरण पर भी बड़ा जोर दिया है। पहली पनडुब्बी में कम से कम 45 प्रतिशत भारतीय उपकरण और सिस्टम होंगे। छठी पनडुब्बी तक यह हिस्सा बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय इसे “आत्मनिर्भर भारत” अभियान से जुड़ी बड़ी परियोजना मान रहा है। इसके जरिए भारत में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। (India AIP Submarine Deal)

भारत के सामने बड़ी चुनौती

भारतीय नौसेना के पास इस समय 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां काफी पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उनकी सर्विस लाइफ खत्म होने की तरफ बढ़ रही है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी ऑपरेशनल नहीं है। यही वजह है कि पी-75आई परियोजना को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

रक्षा योजनाकारों का मानना है कि अगर नई पनडुब्बियां समय पर नहीं मिलीं तो भारत की अंडरवॉटर क्षमता पर असर पड़ सकता है। (India AIP Submarine Deal)

चीन की मदद से तेजी से आगे बढ़ रहा पाकिस्तान

दूसरी तरफ पाकिस्तान तेजी से अपनी अंडरवॉटर ताकत बढ़ा रहा है। 30 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान ने चीन में बनी अपनी चौथी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी को शामिल किया था।

यह हंगोर क्लास पनडुब्बी कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान कुल आठ हंगोर क्लास पनडुब्बियां चीन की मदद से बना रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक अगले कुछ सालों में पाकिस्तान के पास 11 तक एआईपी पनडुब्बियां हो सकती हैं। इससे उसे लंबे समय तक समुद्र में छिपे रहने की क्षमता मिल जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारतीय नौसेना के लिए चिंता का विषय है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में अंडरवॉटर मुकाबला तेजी से बढ़ रहा है। (India AIP Submarine Deal)

डीआरडीओ भी बना रहा स्वदेशी एआईपी सिस्टम

भारत केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ भी स्वदेशी एआईपी सिस्टम विकसित कर रहा है।

सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम अगले महीने जून तक तैयार हो सकता है। इसे भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में लगाया जाएगा।

आईएनएस खंडेरी, कलवरी क्लास की दूसरी पनडुब्बी है। इसे रखरखाव के दौरान एआईपी मॉड्यूल से लैस किया जाएगा।

हालांकि इस परियोजना में पहले भी देरी हो चुकी है। शुरुआत में योजना थी कि आईएनएस कलवरी में ही एआईपी लगाया जाएगा, लेकिन सिस्टम समय पर तैयार नहीं हो पाया। इसी वजह से कलवरी का रिफिट बिना एआईपी के पूरा किया गया।

कलवरी क्लास बनी नौसेना की रीढ़

भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बियां फिलहाल देश की सबसे अहम पारंपरिक अंडरवॉटर ताकत मानी जाती हैं। इन्हें फ्रांस की नेवल ग्रुप की तकनीकी मदद से मझगांव डॉक में बनाया गया है।

इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कॉर्पीन क्लास के नाम से भी जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यह परियोजना भारत की घरेलू पनडुब्बी निर्माण क्षमता बढ़ाने में अहम साबित हुई है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पी-75आई इसी अनुभव को आगे बढ़ाने वाली अगली बड़ी परियोजना है। (India AIP Submarine Deal)

हिंद महासागर में बढ़ रही चीन की मौजूदगी

भारत की चिंता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी यानी पीएलए नेवी भी हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के पास इस समय करीब 355 युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। 2025 तक उसके पास 65 पनडुब्बियां होने का अनुमान है। 2035 तक यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है।

चीन लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपने जहाज, सर्विलांस प्लेटफॉर्म और पनडुब्बियां भेज रहा है। भारत इसे अपनी रणनीतिक चुनौती के तौर पर देख रहा है।

इसी वजह से भारतीय नौसेना अपनी कुल ताकत बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। फिलहाल नौसेना के पास 130 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। लक्ष्य अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 170 से 175 तक पहुंचाने का है।

दुनिया के कई देशों के पास है एआईपी तकनीक

आज दुनिया की ज्यादातर आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों में एआईपी तकनीक इस्तेमाल हो रही है। जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के पास पहले से ऑपरेशनल एआईपी सिस्टम हैं।

भारत फिलहाल इस तकनीक में पीछे माना जाता है। यही वजह है कि शुरुआती चरण में उसे विदेशी साझेदार की जरूरत पड़ रही है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी तकनीक केवल पनडुब्बी की क्षमता नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे नौसैनिक संतुलन को प्रभावित करती है। लंबे समय तक समुद्र के अंदर रहने वाली पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों, सप्लाई रूट्स और नौसैनिक गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकती हैं। (India AIP Submarine Deal)

तेजस मार्क-1ए को लेकर HAL ने कर ली IAF के साथ सेटिंग! जानें क्या है अब डिलीवरी की नई डेडलाइन?

Tejas Mk-1A Delivery Delay

Tejas Mk-1A Delivery Delay: भारतीय वायु सेना के सबसे अहम फाइटर जेट प्रोग्राम में शामिल तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और भारतीय वायु सेना के बीच होने वाली अहम रिव्यू बैठक टलने के पीछ अहम वजह सामने आई है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक एचएएल के नए चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रवि कोटा ने हाल ही में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह से मुलाकात की थी और तेजस कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की थी।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान रवि कोटा ने वायु सेना प्रमुख से रिव्यू बैठक को कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध किया। उन्होंने करीब एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा है क्योंकि तेजस मार्क-1ए से जुड़े कई महत्वपूर्ण ट्रायल और टेक्निकल टेस्टिंग अभी भी जारी हैं। यह समीक्षा बैठक बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि इसी के बाद यह तय होना है कि विमान भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा कर रहा है या नहीं।

बता दें कि रवि कोटा लंबे समय से तेजस कार्यक्रम से जुड़े रहे हैं और डिफेंस सेक्टर में उन्हें अक्सर “एलसीए मैन” के नाम से भी जाना जाता है। अब एचएएल के शीर्ष पद की जिम्मेदारी संभालते ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती तेजस मार्क-1ए कार्यक्रम की विश्वसनीयता बनाए रखना और समय पर डिलीवरी करना है।

इस रिव्यू बैठक में वायु सेना की ओर से वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल नागेश कपूर, टेस्ट पायलट्स और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल होने वाले हैं। बैठक में विमान की तकनीकी स्थिति, ट्रायल रिपोर्ट, वेपन सिस्टम और नई डिलीवरी टाइमलाइन पर चर्चा होनी है।

Tejas Mk-1A Delivery Delay: दो साल से ज्यादा पीछे चल रहा है प्रोजेक्ट

तेजस मार्क-1ए प्रोग्राम पहले से ही तय समयसीमा से काफी पीछे चल रहा है। भारतीय वायु सेना को पहले ही इस विमान की शुरुआती खेप मिल जानी चाहिए थी। सूत्रों के मुताबिक पहले तय योजना के अनुसार अब तक करीब 35 से 36 तेजस मार्क-1ए विमान वायु सेना को मिल जाने चाहिए थे।

लेकिन इंजन सप्लाई में देरी, रडार इंटीग्रेशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और वेपंस ट्रायल के चलते पूरा कार्यक्रम प्रभावित हुआ है। अब नई समीक्षा बैठक के बाद ही यह साफ होगा कि पहली डिलीवरी कब शुरू होगी।

एचएएल को मिला छठा एफ-404 इंजन

इसी बीच एचएएल को अमेरिका की जीई एयरोस्पेस से एफ-404 इंजन की छठी यूनिट भारत पहुंच चुकी है। यह इंजन तेजस मार्क-1ए का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है।

सूत्रों ने बताया कि एचएएल ने अब तक करीब 18 मार्क-1ए एयरफ्रेम तैयार कर लिए हैं, लेकिन इनमें से केवल कुछ विमानों को ही इंजन मिल पाए हैं।

कुछ इंजन अभी ट्रायल प्रोसेस में हैं जबकि कुछ को विमान में इंटीग्रेट किया जा रहा है। एचएएल का कहना है कि अगस्त या सितंबर 2026 तक इंजन सप्लाई पूरी तरह स्टेबल होने की उम्मीद है। इसके बाद प्रोडक्शन उत्पादन और डिलीवरी की रफ्तार बढ़ सकेगी।

सूत्रों ने बताया कि कहा कि इंजन सप्लाई स्टेबल होने के बाद भारतीय वायु सेना के साथ नई डिलीवरी टाइमलाइन को अंतिम रूप देने पर चर्चा शुरू होगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अगस्त-सितंबर 2026 से तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी शुरू हो सकती है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

आखिर क्यों हो रही है देरी

रक्षा सूत्रों के मुताबिक देरी की सबसे बड़ी वजह केवल इंजन नहीं है। तेजस मार्क-1ए में कई एडवांस सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिनके इंटीग्रेशन और ट्रायल में वक्त लग रहा है।

वायु सेना ने कुछ मैंडेटरी ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स तय किए हैं। इनमें मिसाइल फायरिंग ट्रायल, एईएसए रडार का इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन और पूरे हथियार पैकेज की फुल टेस्टिंग शामिल है।

सूत्रों का कहना है कि जब तक इन सभी स्टैंडर्ड्स की सफल टेस्टिंग नहीं हो जाती, तब तक विमान को औपचारिक रूप से वायु सेना में शामिल नहीं किया जाएगा।

हालांकि वायु सेना ने एचएएल को कुछ अनुबंधीय शर्तों में राहत भी दी है, लेकिन अनिवार्य तकनीकी जरूरतों को पूरा करना अभी भी जरूरी है।

बता दें कि तेजस मार्क-1ए भारतीय वायु सेना के पुराने मिग-21 विमानों की जगह लेने के लिए डेवलप किया जा रहा है। यह मूल तेजस मार्क-1 का ज्यादा एडवांस और घातक वर्जन है।

इस विमान में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए रडार लगाया जा रहा है। यह रडार एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और लंबी दूरी पर दुश्मन के विमानों का पता लगाने में सक्षम है।

विमान में नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइलों से बचाव में मदद करेगा। इसके अलावा यह बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर मिसाइल से भी लैस है।

तेजस मार्क-1ए को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसकी मेंटेनेंस जरूरतें कम हों और ऑपरेशनल उपलब्धता ज्यादा रहे। यानी ज्यादा विमान कम समय में उड़ान भर सकेंगे। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

कब से लगेगा उत्तम रडार

फिलहाल 83 तेजस मार्क-1ए विमानों के मौजूदा ऑर्डर में शुरुआती विमानों में इजरायल का ईएलएम-2052 एईएसए रडार लगाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक स्वदेशी “उत्तम” रडार अभी डीआरडीओ के कंट्रोल में है और एचएएल केवल प्रोडक्शन एजेंसी की भूमिका निभा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक 83 विमानों के ऑर्डर में 41वें विमान से उत्तम रडार को शामिल किया जाएगा। इसके बाद दूसरे बैच के 97 विमानों में 2027 से नया गैलियम नाइट्राइड आधारित एडवांस उत्तम रडार लगाया जाएगा।

सूत्रों ने बताया कि स्वदेशी उत्तम एईएसए रडार की पहली खेप में करीब 33 रडार भारतीय वायु सेना को 2026 से मिलना शुरू होंगे। इन रडारों को तेजस मार्क-1ए फाइटर जेट में लगाने की तैयारी की जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि इस रडार में 912 ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होंगे और यह 150 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर फाइटर जेट को ट्रैक कर सकेगा। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

ट्रायल और सॉफ्टवेयर ट्यूनिंग जारी

एचएएल के मुताबिक विमान में केवल हार्डवेयर नहीं बल्कि कई सॉफ्टवेयर और मिशन सिस्टम सुधार भी किए जा रहे हैं। कंपनी फिलहाल फ्लाइट पैरामीटर वैलिडेशन, सिस्टम इंटीग्रेशन और मिशन सॉफ्टवेयर ट्यूनिंग पर काम कर रही है।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जब विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हो तो उसे तुरंत ऑपरेशनल रोल में इस्तेमाल किया जा सके।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि आधुनिक फाइटर जेट केवल एक विमान नहीं बल्कि उड़ता हुआ नेटवर्क सिस्टम होता है। इसलिए हर सेंसर, रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का एक साथ सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

पांच विमान तैयार लेकिन मंजूरी बाकी

फरवरी में एचएएल ने दावा किया था कि पांच तेजस मार्क-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार हैं। कंपनी ने कहा था कि इन विमानों में अधिकांश जरूरी क्षमताएं शामिल कर दी गई हैं।

हालांकि रक्षा सूत्रों का कहना है कि अभी सभी जरूरी सर्टिफिकेशन पूरे नहीं हुए हैं। कुछ जरूरी क्लियरेंस और तकनीकी मंजूरियां अभी बाकी हैं।

यही वजह है कि वायु सेना अंतिम मंजूरी देने से पहले सभी ट्रायल्स और टेस्टिंग्स की समीक्षा करना चाहती है।

वायु सेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस

भारतीय वायु सेना इस समय स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायु सेना की स्वीकृत ताकत 42.5 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन वर्तमान में उसके पास करीब 29 स्क्वाड्रन ही हैं।

इससे पहले तेजस मार्क-1 के 30 से ज्यादा विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हो चुके हैं। ये विमान फिलहाल दो स्क्वाड्रनों नंबर 45 फ्लाइंग डैगर्स और नंबर 18 फ्लाइंग बुलेट्स में ऑपरेशनल भूमिका में हैं।

ऐसे में तेजस मार्क-1ए को भविष्य की लड़ाकू क्षमता का अहम हिस्सा माना जा रहा है। वायु सेना ने कुल 180 तेजस मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दिया है।

अगर एचएएल की मौजूदा उत्पादन क्षमता को देखा जाए तो कंपनी सालाना लगभग 24 फाइटर जेट बना सकती है। ऐसे में पूरी डिलीवरी प्रक्रिया को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

नासिक लाइन से भी बढ़ेगा उत्पादन

एचएएल ने तेजस प्रोडक्शन के लिए बेंगलुरु के अलावा नासिक में भी नई असेंबली लाइन शुरू की है। पिछले साल अक्टूबर में नासिक में बने पहले तेजस मार्क-1ए विमान ने उड़ान भरी थी।

कंपनी का लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाकर समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना है। इसके लिए सप्लाई चेन, सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन और परीक्षण प्रक्रिया पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

भारतीय वायु सेना ला रही है खास ‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम, पायलट करेंगे दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और एयर अटैक की लाइव प्रैक्टिस

IAF AGNI Simulator System RFP
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IAF AGNI Simulator System: भारतीय वायु सेना अपने पायलटों को हाईटेक ट्रेनिंग देने के लिए नए एडवांस सिमुलेटर सिस्टम खरीदने जा रही है। इसके लिए वायु सेना ने “एयर कॉम्बैट, ग्राउंड प्लानिंग एंड नेटवर्क इंटीग्रेटेड (AGNI) सिमुलेटर सिस्टम” की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। यह सिस्टम लखनऊ में मेमौरा एयर फोर्स स्टेशन स्थित एयर डिफेंस कॉलेज में लगाया जाएगा। खास बात यह है कि यह केवल आम फ्लाइट सिमुलेटर नहीं है, बल्कि यह पूरा नेटवर्क आधारित इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जिसमें पायलट, एयर डिफेंस कंट्रोलर और ग्राउंड कमांडर एक साथ ट्रेनिंग ले सकेंगे।

IAF AGNI Simulator System: क्या है ‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम?

आज के समय में हवाई युद्ध केवल फाइटर जेट उड़ाने तक सीमित नहीं रह गया है। अब रडार, नेटवर्क लिंक, सैटेलाइट डेटा, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और साइबर सिस्टम्स भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में पुराने तरीके की ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं मानी जा रही थी। इसी जरूरत को देखते हुए ”अग्नि” प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया गया।

‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम ऐसा डिजिटल युद्ध सिस्टम होगा, जिसमें बिना असली लड़ाकू विमान उड़ाए, बिना गोला-बारूद खर्च किए और बिना किसी जोखिम के वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों का अभ्यास किया जा सकेगा। इसमें दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन, मिसाइल हमले, रडार ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नेटवर्क कमांड जैसे पूरे युद्ध माहौल को लाइव सिमुलेट किया जाएगा।

आखिर ‘अग्नि’ सिस्टम करेगा क्या?

‘अग्नि’ सिस्टम का मुख्य काम युद्ध जैसे हालात बनाकर अधिकारियों को ट्रेनिंग देना है। इसमें फाइटर पायलट, एयर डिफेंस कंट्रोलर और ग्राउंड वॉर प्लानर एक साथ अभ्यास करेंगे।

मान लीजिए दुश्मन का लड़ाकू विमान भारतीय सीमा की तरफ बढ़ रहा है। सिस्टम में रडार उसे पकड़ लेगा। कंट्रोलर स्क्रीन पर उसकी लोकेशन देखेगा। फिर वह फाइटर जेट को आदेश देगा। पायलट अपने कॉकपिट में बैठकर दुश्मन की तरफ जाएगा। मिसाइल लॉक होगी, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग शुरू होगी और नीचे बैठी ग्राउंड टीम पूरे ऑपरेशन को कंट्रोल करेगी। यह सब कुछ एक साथ नेटवर्क पर चलेगा।

चार हिस्सों में बंटा होगा पूरा सिस्टम

इस पूरे सिस्टम को चार बड़े सेक्शन में बांटा गया है। पहला हिस्सा फाइटर कंट्रोलर सेक्शन होगा। यही वह जगह होगी जहां एयर डिफेंस कंट्रोलर बैठकर दुश्मन के विमानों और मिसाइलों की निगरानी करेंगे। यहां बड़े पैनोरमिक डिस्प्ले लगाए जाएंगे जिन पर एक साथ हजार से ज्यादा ट्रैक्स दिखाई दे सकेंगे। इनमें फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और मिसाइल शामिल होंगी।

अधिकारियों को यह भी ट्रेनिंग दी जाएगी कि किस स्थिति में कौन सा हथियार इस्तेमाल करना है और किस विमान को इंटरसेप्ट करना है। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के हालात भी बनाए जाएंगे ताकि जामिंग और फेक सिग्नल जैसी स्थितियों से निपटने का अभ्यास हो सके। (IAF AGNI Simulator System)

असली लड़ाकू विमान जैसा कॉकपिट

अग्नि सिस्टम का दूसरा सबसे अहम हिस्सा एयरक्राफ्ट कॉकपिट सेक्शन होगा। यहां चार हाई-फिडेलिटी कॉकपिट बनाए जाएंगे। इनमें भारतीय वायु सेना के सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 या राफेल जैसे विमान का अनुभव मिलेगा। साथ ही विदेशी विमानों जैसे एफ-16, एफ-22 या चीन के जे-10 और जे-11 जैसे प्लेटफॉर्म भी सिमुलेट किए जाएंगे।

इन कॉकपिट में बैठने वाले पायलट को ऐसा महसूस होगा जैसे वह असली विमान उड़ा रहा हो। कंट्रोल स्टिक, थ्रॉटल, रडार, मिसाइल चेतावनी सिस्टम और हथियार नियंत्रण – सब कुछ वास्तविक विमान जैसा होगा। सीट हल्के झटकों और मूवमेंट के साथ काम करेगी ताकि टेकऑफ, मोड़ और मिसाइल लॉन्च जैसी स्थितियां असली लगें।

सबसे खास बात यह है कि इसमें वीआर और मिक्स्ड रियलिटी तकनीक भी इस्तेमाल होगी। पायलट हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी के जरिए युद्ध क्षेत्र को देख सकेंगे। उन्हें बादल, बारिश, कोहरा और रात जैसी परिस्थितियों में भी उड़ान का अभ्यास कराया जाएगा। (IAF AGNI Simulator System)

डॉगफाइट से लंबी दूरी की ट्रेनिंग

इस सिस्टम में “टू वर्सेस टू” एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग भी होगी। मतलब दो विमान मिलकर दुश्मन के दो विमानों के खिलाफ लड़ाई का अभ्यास कर सकेंगे। इसके अलावा बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर और विजुअल रेंज डॉगफाइट दोनों तरह के युद्ध अभ्यास होंगे।

पायलटों का सीधा संपर्क फाइटर कंट्रोलर से रहेगा। कंट्रोलर उन्हें रडार पर दिख रहे दुश्मन की जानकारी देंगे और पायलट उसी आधार पर कार्रवाई करेंगे। इससे टीमवर्क और रियल टाइम कोऑर्डिनेशन बेहतर होगा। (IAF AGNI Simulator System)

जमीन से लेकर समुद्र तक पूरा बैटलफील्ड होगा सिमुलेट

एजीएनआई सिस्टम का सबसे जटिल हिस्सा ग्राउंड एनवायरनमेंट सेक्शन माना जा रहा है। यहां थल सेना, नौसेना और वायु सेना तीनों से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को एक साथ जोड़ा जाएगा।

आरएफपी डॉक्यूमेंट के मुताबिक इसमें टैंक, मिसाइल सिस्टम, रडार, ड्रोन, युद्धपोत, एयरक्राफ्ट कैरियर, सबमरीन और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक को सिमुलेट किया जाएगा। 3डी इंटरैक्टिव स्क्रीन पर पूरा युद्धक्षेत्र दिखाई देगा। कौन सा रडार कितना क्षेत्र कवर कर रहा है, किस मिसाइल की रेंज कितनी है और कहां से हमला हो सकता है – सब कुछ लाइव दिखेगा।

यही नहीं, सिस्टम में धुआं, विस्फोट, मिसाइल ट्रेल और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसे स्पेशल इफेक्ट्स भी होंगे ताकि अभ्यास बिल्कुल वास्तविक लगे। साथ ही, खराब मौसम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी सिमुलेट किया जाएगा।

यानी बारिश, तूफान, धुंध, रडार जैमिंग, फर्जी सिग्नल और इलेक्ट्रॉनिक हमले जैसी स्थितियां भी बनाई जाएंगी। इससे अधिकारियों को वास्तविक युद्ध की कठिन परिस्थितियों की ट्रेनिंग मिलेगी। (IAF AGNI Simulator System)

इंस्ट्रक्टर पूरे युद्ध को करेंगे कंट्रोल

सिस्टम में अलग से सुपरवाइजर सेक्शन भी होगा। यहां बैठे इंस्ट्रक्टर किसी भी समय युद्ध की स्थिति बदल सकेंगे। वे अचानक दुश्मन के नए विमान जोड़ सकते हैं, नेटवर्क जामिंग कर सकते हैं या मौसम खराब कर सकते हैं।

पूरे अभ्यास की रिकॉर्डिंग भी होगी। बाद में वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग देखकर पायलटों और कंट्रोलरों की गलतियों का विश्लेषण किया जाएगा। (IAF AGNI Simulator System)

तीनों सेनाओं की संयुक्त ट्रेनिंग

इस सिस्टम की एक बड़ी खासियत यह भी होगी कि इसमें केवल वायु सेना ही नहीं, बल्कि थल सेना और नौसेना के अधिकारी भी ट्रेनिंग ले सकेंगे।

यानी भविष्य में तीनों सेनाएं एक साथ मल्टी डोमेन वॉरफेयर का अभ्यास कर सकेंगी। यह थिएटराइजेशन और जॉइंटनेस मॉडल के लिए भी अहम माना जा रहा है। (IAF AGNI Simulator System)

देना होगा मैलिशियस कोड न होने का प्रूफ

अग्नि के वेंडर को यह साबित करना होगा कि सिस्टम में कोई मैलिशियस कोड या साइबर खतरा नहीं है। सभी सॉफ्टवेयर और नेटवर्क पूरी तरह सुरक्षित होने चाहिए। कंपनियों को ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर यानी ओईएम सपोर्ट सर्टिफिकेट भी देना होगा। इसके लिए विशेष सुरक्षा जांच और सर्टिफिकेट जरूरी होंगे।

वायु सेना ने पूरे प्रोजेक्ट के लिए 365 दिन की समय सीमा तय की है। पहले चरण में फाइटर कंट्रोलर सेक्शन तैयार होगा। उसके बाद कॉकपिट सेक्शन लगाया जाएगा। सबसे आखिर में ग्राउंड एनवायरनमेंट सेक्शन को ऑपरेशनल किया जाएगा क्योंकि यह सबसे जटिल हिस्सा है।

अगर कोई कंपनी तय समय पर सिस्टम तैयार नहीं कर पाती तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का अधिकार भी वायु सेना के पास रहेगा।

इसमें भविष्य में नए कॉकपिट, अतिरिक्त कंसोल और नए युद्ध परिदृश्य जोड़ने की सुविधा रखी गई है। सिस्टम को 20 साल तक अपग्रेड करने लायक बनाया जाएगा।

साथ ही ऑपरेटर और मेंटेनेंस ट्रेनिंग भी दी जाएगी ताकि लंबे समय तक इसका ऑपरेशन भारत में ही किया जा सके। यही वजह है कि इसे आत्मनिर्भर भारत अभियान से जोड़कर भी देखा जा रहा है। (IAF AGNI Simulator System)

भारत-यूएई मिलकर बनाएंगे ड्रोन, मिसाइल और AI वेपंस! हैदराबाद में बनेंगी विदेशी स्नाइपर राइफल

India-UAE Defence Partnership

India-UAE Defence Partnership: भारत और यूएई अब मिलकर ड्रोन, मिसाइल, गोला-बारूद, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, साइबर डिफेंस और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी डेवलप करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। शुक्रवार को अबू धाबी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात के दौरान “फ्रेमवर्क फॉर स्ट्रैटेजिक डिफेंस पार्टनरशिप” को आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दिया गया।

यह समझौता भारत और यूएई के रक्षा संबंधों में अब तक का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक कदम माना जा रहा है। इस नई साझेदारी के तहत दोनों देश रक्षा उपकरणों का संयुक्त उत्पादन के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस हथियार, ड्रोन टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, स्पेशल ऑपरेशन, ट्रेनिंग और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम्स पर भी साथ काम करेंगे।

प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस फ्रेमवर्क में डिफेंस इंडस्ट्रियल कोलैबोरेशन, इनोवेशन, एडवांस टेक्नोलॉजी, संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग, एजुकेशन, स्पेशल ऑपरेशन, इंटरऑपरेबिलिटी, मैरीटाइम सिक्योरिटी, साइबर डिफेंस और इंफॉर्मेशन एक्सचेंज जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल हैं।

India-UAE Defence Partnership: जनवरी में शुरू हुई थी प्रक्रिया

दरअसल इस समझौते की नींव जनवरी 2026 में पड़ गई थी, जब यूएई के राष्ट्रपति भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान दोनों देशों ने स्ट्रैटेजिक डिफेंस पार्टनरशिप को लेकर एक लेटर ऑफ इंटेंट यानी एलओआई साइन किया था। शुक्रवार को अबू धाबी में उसी प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पिछले दो सालों में भारत और यूएई के बीच रक्षा उद्योग सहयोग को लेकर लगातार बातचीत चल रही थी। भारत-यूएई डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन फोरम की पहली बैठक सितंबर 2024 में भारत में हुई थी। इसके बाद दूसरी बैठक 2025 में नई दिल्ली में आयोजित की गई थी।

इन बैठकों में यूएई की बड़ी डिफेंस कंपनी एज ग्रुप और भारत की सरकारी और निजी रक्षा कंपनियों ने हिस्सा लिया था। इसी दौरान संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और एडवांस सैन्य सिस्टम्स पर साझेदारी को लेकर चर्चा तेज हुई।

ड्रोन, मिसाइल और एआई पर रहेगा बड़ा फोकस

सूत्रों का कहना है कि भारत और यूएई अब संयुक्त रूप से हाई-टेक डिफेंस प्लेटफॉर्म्स बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। इनमें अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी, एडवांस मिसाइल सिस्टम्स, प्रिसिजन म्यूनिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य तकनीक और नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

भारत का तेजी से बढ़ता रक्षा उत्पादन और यूएई की वित्तीय तथा तकनीकी क्षमता इस साझेदारी को खास बना रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात करीब 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि कुल रक्षा उत्पादन लगभग 1.54 लाख करोड़ रुपये रहा।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यूएई भारत के लिए केवल एक साझेदार देश नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के रक्षा बाजार तक पहुंच का बड़ा रास्ता बन सकता है।

हैदराबाद में खुल चुका है जॉइंट आर्म्स कॉम्प्लेक्स

भारत और यूएई के बीच रक्षा उत्पादन सहयोग की शुरुआत पहले ही हो चुकी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैदराबाद में बना आईकॉम-काराकल स्मॉल आर्म्स कॉम्प्लेक्स है।

यूएई की काराकल कंपनी और भारत की आईकॉम टेली लिमिटेड के बीच यह पहला बड़ा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रोजेक्ट माना जा रहा है। इस फैसिलिटी का उद्घाटन पिछले साल 21 अप्रैल को किया गया था।

इस प्रोजेक्ट के तहत यूएई की काराकल कंपनी की पूरी हथियार रेंज अब भारत में बनाई जा रही है। इसमें पिस्टल, स्नाइपर राइफल और दूसरे छोटे हथियार शामिल हैं।

हाल ही में सीएसआर-338 स्नाइपर राइफल का कॉन्ट्रैक्ट सीआरपीएफ को मिला है और इन राइफलों का निर्माण भी हैदराबाद की इसी यूनिट में होगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत मॉडल का बड़ा उदाहरण बन चुका है, जहां विदेशी तकनीक को भारत में लाकर स्थानीय उत्पादन किया जा रहा है।

India-UAE Defence Partnership

अदाणी और एज ग्रुप के बीच भी बड़ा समझौता

भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग केवल छोटे हथियारों तक सीमित नहीं है। जून 2024 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और यूएई के एज ग्रुप के बीच भी बड़ा समझौता हुआ था।

इस साझेदारी में मिसाइल सिस्टम्स, ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, काउंटर ड्रोन टेक्नोलॉजी, अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और साइबर सिस्टम्स पर संयुक्त काम करने का फैसला लिया गया था।

सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों में रिसर्च एंड डेवलपमेंट फैसिलिटी तैयार करने पर भी काम चल रहा है।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल और एज ग्रुप के बीच भी एयरोस्पेस सेक्टर में सहयोग बढ़ रहा है। दोनों कंपनियां तेजस लड़ाकू विमान में यूएई के एयरबोर्न सिस्टम्स के इंटीग्रेशन पर चर्चा कर रही हैं।

शिप रिपेयर और नेवल सेक्टर में भी बड़ी साझेदारी

प्रधानमंत्री मोदी के यूएई दौरे के दौरान रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक और अहम समझौता हुआ। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और यूएई की ड्राईडॉक्स वर्ल्ड कंपनी के बीच गुजरात के वाडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर डेवलप करने के लिए एमओयू साइन किया गया।

इस प्रोजेक्ट में ऑफशोर फैब्रिकेशन और समुद्री प्लेटफॉर्म्स की मरम्मत जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।

इसके साथ ही मैरीटाइम और शिपबिल्डिंग सेक्टर में स्किल डेवलपमेंट के लिए भी अलग समझौता हुआ है। इसके तहत भारतीय वर्कफोर्स को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि भारत को ग्लोबल शिप रिपेयर हब के रूप में विकसित किया जा सके।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इसका सीधा संबंध भविष्य में नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के जॉइंट प्रोडक्शन और मेंटेनेंस से भी जुड़ा हुआ है।

तीनों सेनाओं के बीच बढ़े सैन्य अभ्यास

पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के सैन्य संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच लगातार संयुक्त अभ्यास हो रहे हैं।

भारतीय सेना और यूएई सेना के बीच “डेजर्ट साइक्लोन” सैन्य अभ्यास आयोजित किया गया। 2024 में इसका आयोजन भारत में हुआ था, जबकि 2025 में इसका आयोजन यूएई में किया गया।

भारतीय नौसेना और यूएई नौसेना के बीच “एक्स गल्फ वेव्स” अभ्यास भी हुआ। इसके अलावा दोनों देशों के युद्धपोतों के बीच नियमित पोर्ट कॉल्स जारी हैं।

भारतीय वायुसेना ने यूएई में आयोजित “डेजर्ट फ्लैग” एयर एक्सरसाइज में अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी की थी। वहीं यूएई ने भारत के “तरंग शक्ति” अभ्यास में हिस्सा लिया था।

इसके अलावा दोनों देशों के बीच एयर चीफ, नेवी चीफ और आर्मी अधिकारियों के कई हाई लेवल दौरे भी हुए हैं।

साइबर और सुरक्षित कम्युनिकेशन पर भी जोर

नई रक्षा साझेदारी में साइबर डिफेंस और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम्स को भी खास जगह दी गई है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्धों में साइबर हमले और डेटा सुरक्षा सबसे बड़े मुद्दों में शामिल हो चुके हैं।

इसी वजह से भारत और यूएई अब सुरक्षित इंफॉर्मेशन शेयरिंग और डिफेंस नेटवर्क्स पर भी साथ काम करेंगे।

सूत्रों का कहना है कि यह साझेदारी किसी तीसरे देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि इसका मकसद दोनों देशों की तकनीकी और सैन्य क्षमता को मजबूत करना है।

CDS जनरल चौहान बोले- थिएटर कमांड अंत नहीं, बल्कि बड़े सैन्य सुधारों की शुरुआत, सेनाओं की सोच बदलने में लगा वक्त

CDS on Theatre Command
Anil Chauhan during an interactive session at the ‘Kalam and Kavach’ Defence Conclave held at the Manekshaw Centre.

CDS on Theatre Command: देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने साफ कहा है कि भविष्य के युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे। आने वाले समय में साइबर, स्पेस, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर भी उतने ही बड़े हथियार होंगे। उन्होंने कहा कि भारत अब तेजी से थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस और मल्टी डोमेन वॉरफेयर की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

नई दिल्ली में मानेकशॉ सेंटर में आयोजित सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज (CENJOWS) के कलम एंड कवच के तीसरे संस्करण में आयोजित फायरसाइड चैट में बोलते हुए सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता, मल्टी-डोमेन वॉरफेयर, इनोवेशन और भविष्य के युद्धों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम में बातचीत के दौरान जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भारतीय सेनाओं में जो बड़े सैन्य सुधार चल रहे हैं, वे केवल स्ट्रक्चरल बदलाव नहीं हैं, बल्कि सोच बदलने की प्रक्रिया भी है। उन्होंने माना कि थिएटर कमांड बनाने से ज्यादा मुश्किल काम सेनाओं की मानसिकता बदलना था।

उन्होंने कहा कि भारत जिस थिएटराइजेशन और जॉइंटनेस सुधार की तरफ बढ़ रहा है, वह देश के सबसे बड़े सैन्य सुधारों में से एक है। उनके मुताबिक भविष्य का युद्ध जॉइंटनेस यानी तीनों सेनाओं के एक साथ काम करने पर आधारित होगा।

CDS on Theatre Command: “सहमति” के रास्ते से आगे बढ़ाने की कोशिश

जनरल चौहान ने कहा कि कई देशों ने पहले भी इस मॉडल को अपनाया है और हर जगह अलग-अलग सैन्य सेवाओं के बीच मतभेद और प्रतिस्पर्धा देखने को मिली थी। भारत में भी शुरुआत में कई तरह की चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने इस प्रक्रिया को “सहमति” के रास्ते से आगे बढ़ाने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने हजारों सैन्य अधिकारियों और संस्थानों के बीच जाकर थिएटर कमांड और जॉइंटनेस पर चर्चा की। उनका मकसद केवल नया ढांचा बनाना नहीं बल्कि यह समझाना था कि भविष्य के युद्धों में तीनों सेनाओं को एक साथ काम करना ही होगा।

सीडीएस ने कहा कि जैसे-जैसे अधिकारियों और जवानों को यह समझ आया कि मल्टी डोमेन वॉरफेयर में अकेली कोई भी सेना पूरी लड़ाई नहीं लड़ सकती, वैसे-वैसे थिएटराइजेशन को लेकर स्वीकार्यता भी बढ़ी।

उन्होंने कहा कि असली चुनौती संरचना बदलना नहीं बल्कि “माइंडसेट” बदलना था।

जनरल चौहान ने कहा कि अब इस प्रक्रिया को “गति और दिशा” दोनों मिल चुकी हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले सीडीएस के कार्यकाल में यह प्रक्रिया और तेजी से आगे बढ़ेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि सैन्य सुधार कभी खत्म नहीं होते, यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस सैन्य अभियान के दौरान भारत के पास दुश्मन की तुलना में बेहतर बैटलफील्ड ट्रांसपेरेंसी और सिचुएशनल अवेयरनेस थी। यानी भारतीय सेनाओं को यह साफ पता था कि सीमा के दोनों तरफ क्या हो रहा है।

उन्होंने कहा कि यही वजह थी कि भारत पूरे ऑपरेशन के दौरान “एस्केलेशन मैट्रिक्स” पर हावी रहा। उन्होंने बताया कि भारतीय सेनाओं के बीच बेहतर इंटीग्रेशन और नेटवर्क आधारित सिस्टम की वजह से तेजी से फैसले लेने और जवाब देने में मदद मिली। सीडीएस ने कहा कि आधुनिक युद्धों में केवल हथियार नहीं बल्कि सूचना, डेटा और नेटवर्क भी बड़ी ताकत बन चुके हैं। (CDS On Theatre Command)

मल्टी डोमेन वॉरफेयर पर जोर

जनरल चौहान ने कहा कि आज सेनाओं के बीच इंटीग्रेशन केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रह सकता। अब साइबर स्पेस, स्पेस डोमेन, कॉग्निटिव वॉरफेयर और इंफॉर्मेशन ऑपरेशन भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

उन्होंने बताया कि भविष्य के युद्धों में “कॉग्निटिव वॉरफेयर” यानी लोगों की सोच और भावनाओं को प्रभावित करना भी एक बड़ा हथियार होगा। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और फेक न्यूज अब युद्ध का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

सीडीएस ने अधिकारियों को सलाह दी कि वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीखें, क्योंकि सोशल मीडिया पर छोटी-छोटी बातें भी विरोधी देशों द्वारा इस्तेमाल की जा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया अभी भी इस नए तरह के युद्ध को पूरी तरह समझने की कोशिश कर रही है और भारत भी लगातार इससे सीख रहा है। (CDS On Theatre Command)

ईरान युद्ध और ड्रोन खतरे का जिक्र

जनरल चौहान ने हाल के संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन वॉरफेयर देखने को मिला, लेकिन ईरान से जुड़े संघर्षों में एक नई चीज देखने को मिली, वह थी बड़े पैमाने पर मिसाइलों का इस्तेमाल।

उन्होंने कहा कि कई बैलिस्टिक मिसाइलें सैन्य और नागरिक दोनों तरह के ठिकानों तक पहुंचीं। कुछ मिसाइलों को रोका गया लेकिन कुछ अपने टारगेट तक भी पहुंचीं।

सीडीएस के मुताबिक भविष्य में दुनिया को ड्रोन और मिसाइलों के “सैचुरेशन अटैक” से बड़ी चुनौती मिल सकती है। यानी एक साथ इतनी बड़ी संख्या में हमले किए जाएं कि एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाए। उन्होंने कहा कि यह एक नया ट्रेंड है, जिसे पूरी दुनिया देख रही है। (CDS On Theatre Command)

डीएमए और आईडीएस की भूमिका समझाई

जनरल चौहान ने फायरसाइड चैट के दौरान डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए और हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस की भूमिका भी समझाई। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच अभी भी इन दोनों संस्थाओं को लेकर भ्रम है।

उन्होंने बताया कि आईडीएस का काम तीनों सेनाओं के बीच इंटीग्रेशन और नए डोमेन्स में क्षमता निर्माण करना है, जबकि डीएमए रक्षा मंत्रालय के भीतर सैन्य मामलों को संभालता है।

उन्होंने कहा कि डीएमए की स्थापना भारतीय सैन्य सुधारों में सबसे बड़ा बदलाव रही है क्योंकि अब सेना से जुड़े कई फैसले सीधे सैन्य नेतृत्व के जरिए लिए जा सकते हैं।

कारगिल रिव्यू कमेटी का भी जिक्र

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि थिएटराइजेशन का सुझाव सबसे पहले कारगिल रिव्यू कमेटी ने दिया था। उनके अनुसार डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए का गठन इस दिशा में सबसे बड़ा बदलाव रहा है, क्योंकि अब सैन्य मामलों के लिए एक अलग और स्पष्ट व्यवस्था मौजूद है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस सिस्टम को पूरी तरह से बनने के लिए अभी समय की जरूरत है। (CDS On Theatre Command)

भारत के पास विवादित सीमाएं

जनरल चौहान ने कहा कि भारत के पास विवादित सीमाएं हैं, इसलिए देश को हर समय तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि युद्ध छोटा होगा या लंबा, इस पर ध्यान देने की बजाय उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अगर किसी सैन्य कार्रवाई का लक्ष्य स्पष्ट हो तो मिशन पूरा होने के बाद जल्दी बाहर निकलने की रणनीति भी जरूरी होती है।

सीडीएस ने यह भी कहा कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, ऑटोनॉमस सिस्टम और नई पीढ़ी की तकनीकें युद्ध का रूप बदल देंगी। उन्होंने कहा कि थिएटर कमांड अंत नहीं, बल्कि आगे आने वाले बड़े सैन्य सुधारों की शुरुआत है। (CDS On Theatre Command)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बड़ा फैसला, थिएटराइजेशन से पहले भारतीय सेना और नौसेना के बीच जॉइंटनेस बढ़ाने को लेकर हुआ बड़ा समझौता

Army-Navy MoA Agreement

Army-Navy MoA Agreement: भारतीय सेना और भारतीय नौसेना के बीच हाल ही में एक अहम समझौता हुआ है। नया “मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन ऑन अफिलिएशन” समझौता देश के मिलिट्री स्ट्रक्चर में बड़े बदलावों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इस समझौते के तहत सेना और नौसेना अब नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ ट्रेनिंग, एक्सचेंज प्रोग्राम, ऑपरेशनल जानकारी और जॉइंट गतिविधियों में शामिल होंगी, ताकि भविष्य के मल्टी-डोमेन युद्धों में तेजी से और एकजुट होकर कार्रवाई की जा सके।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस और इंटीग्रेटेड वॉरफेयर मॉडल की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछले कुछ सालों में चीन और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा खतरे, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियां और ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य के युद्ध अब केवल जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे।

Army Navy MoA Agreement: नई दिल्ली में हुआ समझौता

नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय सेना की ओर से एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक और भारतीय नौसेना की ओर से चीफ ऑफ पर्सनल वाइस एडमिरल गुरचरण सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ और नौसेना के वाइस चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्स्यायन भी मौजूद रहे।

इस समझौते का मकसद दोनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑपरेशन और जॉइंटनेस को और मजबूत करना है। इसके तहत सेना की रेजिमेंट्स, नौसेना के जहाजों, ट्रेनिंग संस्थानों और मिलिट्री इंस्टॉलेशंस के बीच इंटीग्रेशन बढ़ाया जाएगा।

आसान शब्दों में समझें तो अब सेना और नौसेना की अलग-अलग यूनिट्स नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ समय बिताएंगी, ट्रेनिंग करेंगी और ऑपरेशनल अनुभव साझा करेंगी। इससे दोनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक-दूसरे की कार्यप्रणाली और चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

सैन्य भाषा में अफिलिएशन का मतलब दो अलग सैन्य यूनिट्स के बीच औपचारिक संबंध बनाना होता है। उदाहरण के तौर पर सेना की किसी रेजिमेंट को नौसेना के किसी युद्धपोत या ट्रेनिंग संस्थान से जोड़ा जा सकता है। इसके बाद दोनों यूनिट्स के बीच रेगुलर विजिट, संयुक्त कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, सेमिनार और ट्रेनिंग एक्सचेंज होते हैं। इसका मकसद ऑपरेशनल समझ और तालमेल को मजबूत करना होता है।

हालांकि पहले भी भारतीय सेना और नौसेना की कुछ यूनिट्स के बीच ऐसे संबंध रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस तेग को सिख लाइट इन्फैंट्री से और आईएनएस सह्याद्री को पूना हॉर्स रेजिमेंट से जोड़ा गया था। लेकिन अब पहली बार पूरे स्तर पर एक औपचारिक नीति बनाई गई है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले सभी अफिलिएशन को एक समान स्ट्रक्चर में लाया जाएगा।

क्यों जरूरी हो गया यह बदलाव

भारत का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है। एक तरफ चीन सीमा पर दबाव बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ हिंद महासागर क्षेत्र में भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इसके अलावा साइबर वॉरफेयर, ड्रोन अटैक, स्पेस टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में केवल थलसेना या नौसेना अकेले काम नहीं कर सकतीं। अगर समुद्र में किसी सैन्य कार्रवाई की जरूरत पड़े तो नौसेना को सेना के साथ तालमेल बैठाना होगा। इसी तरह जमीन पर होने वाले बड़े ऑपरेशन में वायुसेना और नौसेना की भूमिका भी अहम होगी।

इसी वजह से भारत अब मल्टी-डोमेन ऑपरेशन मॉडल पर काम कर रहा है। इसमें जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई की जाती है।

इसके तहत आने वाले समय के सैन्य अभियानों में तेजी से फैसले लेना, अलग-अलग डोमेन्स के बीच कॉर्डिनेशन और इंटरऑपरेबल क्षमता बेहद जरूरी होगी। यही वजह है कि सेवाओं के बीच सहज तालमेल को मजबूत किया जा रहा है।

Army-Navy MoA Agreement

ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

इस समझौते के पीछे ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव भी बड़ा कारण माना जा रहा है। मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे।

करीब 88 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ मिलकर कार्रवाई की थी। सेना ने जमीन से प्रिसिजन फायर किए, वायुसेना ने लंबी दूरी की मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से हमले किए, जबकि नौसेना ने अरब सागर में अपनी फॉरवर्ड तैनाती मजबूत की।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस ऑपरेशन ने यह साबित कर दिया कि जब तीनों सेनाएं एक साथ काम करती हैं तो ऑपरेशन की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

सेना की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं एक साथ मिल कर कार्रवाई की और सफलता मिली। इसी अनुभव के आधार पर अब इंटर-सर्विस सहयोग को और संस्थागत रूप दिया जा रहा है। (Army-Navy MoA Agreement)

क्या यह थिएटराइजेशन की शुरुआत है?

सूत्रों के मुताबिक यह समझौता थिएटराइजेशन की शुरुआत नहीं है, लेकिन उसकी दिशा में एक अहम कदम जरूर माना जा रहा है।

थिएटराइजेशन भारतीय सेनाओं का सबसे बड़ा सैन्य सुधार कार्यक्रम माना जा रहा है। इसके तहत तीनों सेनाओं को अलग-अलग कमांड की बजाय इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स के तहत लाया जाएगा।

उदाहरण के तौर पर चीन सीमा के लिए अलग थिएटर कमांड, पाकिस्तान सीमा के लिए अलग और समुद्री क्षेत्र के लिए अलग कमांड बनाई जा सकती है। इनमें एक ही कमांडर के अधीन थलसेना, वायुसेना और नौसेना काम करेंगी।

इसका उद्देश्य कमांड चेन को छोटा करना, संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेना है।

सूत्रों के मुताबिक थिएटराइजेशन की योजना अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और इस पर पिछले दिनों जयपुर में हुई जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भी इस पर चर्चा हुई थी। (Army-Navy MoA Agreement)

जमीनी स्तर पर बढ़ेगा तालमेल

सेना और नौसेना के बीच हुए इस समझौते का सबसे बड़ा असर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा। अब सेना और नौसेना की यूनिट्स के बीच नियमित संपर्क रहेगा। जवान और अधिकारी एक-दूसरे के बेस, जहाजों और ट्रेनिंग संस्थानों का दौरा करेंगे।

इससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन के दौरान गलतफहमी और समन्वय की समस्या कम होगी। सैन्य योजनाओं और ऑपरेशनल जरूरतों को समझना आसान होगा।

दुनिया के कई बड़े देश पहले से इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसी सेनाएं लंबे समय से जॉइंट कमांड और इंटर-सर्विस इंटीग्रेशन पर जोर देती रही हैं। (Army-Navy MoA Agreement)

अरुणाचल में LAC के पास क्यों पहुंची GSI की टीम, क्या चीन सीमा पर बड़ी तैयारी में जुटा है भारत?

Arunachal LAC GSI Survey
Pics: Indian Army/ Gajraj Corps

Arunachal LAC GSI Survey: अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में हाल ही में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) की एक टीम ने दौरा किया था। ईस्टर्न कमांड के तहत आने वाली भारतीय सेना की गजराज कोर के साथ जीएसआई टीम ने फॉरवर्ड इलाकों का दौरा किया। यह पूरा मिशन भारत-चीन सीमा यानी एलएसी से जुड़े संवेदनशील इलाकों में हुआ, जहां पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सड़कें, पुल, सुरंगें और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं।

गजराज कोर की तरफ से जारी जानकारी के मुताबिक जीएसआई की इस टीम का नेतृत्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ. पंकज जायसवाल और डायरेक्टर डी.पी. डंगवाल ने किया। टीम ने फॉरवर्ड एरिया में जाकर जमीन की स्थिरता, लैंडस्लाइड रिस्क और हार्ड रॉक मैपिंग का अध्ययन किया। इसके बाद टीम ने गजराज कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल नीरज शुक्ला से मुलाकात भी की।

इस दौरान सीमावर्ती इलाकों में सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर और लैंड मैनेजमेंट को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। सेना और जीएसआई की यह जॉइंट एक्टिविटी ऐसे समय हुई है, जब भारत पूर्वोत्तर में बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को पहले से कहीं ज्यादा तेजी से मजबूत कर रहा है।

Arunachal LAC GSI Survey: क्या कर रही थी जीएसआई की टीम

जीएसआई की टीम का मुख्य काम पहाड़ी इलाकों की जियोलॉजिकल स्ट्रक्चर को समझना था। इसमें यह देखा जाता है कि कौन सा इलाका भूस्खलन के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील है, कहां जमीन कमजोर है और किन क्षेत्रों में सड़क या मिलिट्री स्ट्रक्चर बनाना सुरक्षित रहेगा।

टीम ने जिन इलाकों का दौरा किया, वे ज्यादातर हाई एल्टीट्यूड और फॉरवर्ड एरिया माने जाते हैं। वहां सैनिकों ने टीम को ऊंचाई वाले कठिन इलाकों तक पहुंचाया। गजराज कोर ने बर्फ से ढके पहाड़, चट्टानी क्षेत्र और हाई एल्टीट्यूड झीलों के फोटो भी जारी किए हैं।

जीएसआई की तरफ से “हार्ड रॉक मैपिंग” भी की गई। जिसमें पहाड़ों की चट्टानों की गुणवत्ता और मजबूती का अध्ययन किया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि कौन सी चट्टानें सड़क, बंकर या पुल निर्माण के लिए उपयुक्त हैं और कौन सी जगहें भूस्खलन का खतरा पैदा कर सकती हैं।

सेना को क्यों पड़ी इसकी जरूरत 

अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के कई इलाके बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। यहां भारी बारिश, बादल फटना, भूकंप और लैंडस्लाइड आम बात है। मानसून के दौरान कई बार सड़कें टूट जाती हैं और सेना की सप्लाई लाइन प्रभावित हो जाती है।

भारत-चीन सीमा के पास इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ाने के लिए ऑल वेदर रोड, सुरंग और नए सैन्य ढांचे बनाए जा रहे हैं। लेकिन पहाड़ी इलाकों में निर्माण करना आसान नहीं होता। अगर पहाड़ की भू-संरचना को समझे बिना निर्माण किया जाए तो कुछ समय बाद सड़क धंस सकती है या लैंडस्लाइड से टूट सकती है।

इसी वजह से सेना अब वैज्ञानिक तरीके से बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रही है। जीएसआई की टीम उसी प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि केवल सड़क बनाना काफी नहीं है, उसे हर मौसम में चालू रखना ज्यादा बड़ी चुनौती है। खासकर उन इलाकों में जहां सैनिकों और सैन्य वाहनों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।

गलवान के बाद तेजी से बदली रणनीति

पूर्वी लद्दाख में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की रफ्तार काफी बढ़ा दी थी। लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक कई नए प्रोजेक्ट शुरू किए गए।

सड़क, पुल, एडवांस लैंडिंग ग्राउंड, टनल और बॉर्डर गांवों के विकास पर विशेष फोकस किया गया। केंद्र सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम और बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए।

अब रणनीति केवल तेजी से निर्माण करने की नहीं बल्कि “रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर” बनाने की है। यानी ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर जो भारी बारिश, बर्फबारी, भूकंप और लैंडस्लाइड जैसी परिस्थितियों में भी लंबे समय तक टिक सके।

जीएसआई और सेना की यह साझेदारी उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

गजराज कोर क्यों है अहम

गजराज कोर भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण कोर में गिनी जाती है। इसका मुख्यालय तेजपुर में है और यह अरुणाचल प्रदेश तथा असम के सीमावर्ती क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालती है।

तवांग समेत कई रणनीतिक इलाके इसी कोर के दायरे में आते हैं। चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद इस पूरे सेक्टर में सैन्य गतिविधियां काफी बढ़ी हैं।

नई सड़कें, सुरंगें और सप्लाई नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से सैनिक और हथियार सीमा तक पहुंचा सके।

लेकिन पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर का सबसे बड़ा दुश्मन मौसम और लैंडस्लाइड हैं। ऐसे में जीएसआई की भूमिका और बढ़ जाती है।

क्यों किया गया झीलों का सर्वे

जीएसआई टीम ने हाई एल्टीट्यूड झीलों का भी सर्वे किया। हिमालयी इलाकों में कई झीलें ग्लेशियर पिघलने से बनती हैं। इनमें से कुछ झीलें अचानक टूटने पर भारी तबाही ला सकती हैं।

इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है। इससे सड़कें, पुल और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर अचानक नष्ट हो सकते हैं। इसी वजह से हाई एल्टीट्यूड झीलों की निगरानी अब सीमा क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सेना और वैज्ञानिक एजेंसियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि कौन सी झीलें खतरा पैदा कर सकती हैं और किन इलाकों में पहले से तैयारी जरूरी है।

मिशन मौसम और वेदर रडार की बड़ी तैयारी

सूत्रों ने बताया कि जीएसआई टीम का यह दौरान इन इलाकों में वेदर रडार लगाने का है। ताकि इस इलाके में मौसम निगरानी नेटवर्क भी तेजी से मजबूत किया जा सके।

भारत सरकार “मिशन मौसम” के तहत पूरे देश में 53 नए डॉप्लर वेदर रडार लगाने की योजना पर काम कर रही है। इसके तहत पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में 10 एक्स-बैंड डॉप्लर रडार लगाए जा रहे हैं।

इन रडारों का काम रियल टाइम बारिश, बादल, तूफान और मौसम की गतिविधियों की निगरानी करना है। तेजपुर, सेंट्रल अरुणाचल, जोरहाट, नामसाई और दूसरे इलाकों में नए रडार नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं।

ये रडार सीमा से जुड़े ऊंचाई वाले इलाकों में लगाए जा रहे हैं ताकि भारी बारिश, तूफान और बर्फबारी पर तुरंत नजर रखी जा सके। इससे भूस्खलन का खतरा पहले ही पता चल सकेगा, क्योंकि ज्यादातर लैंडस्लाइड तेज बारिश की वजह से होते हैं। इसके अलावा सेना की सड़कें, पुल और दूसरे बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बनाने में भी मदद मिलेगी।

रक्षा और मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम की सही जानकारी पहले मिल जाए तो लैंडस्लाइड और बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जीएसआई की जियोलॉजिकल मैपिंग और मौसम विभाग के रडार सिस्टम को मिलाकर सीमा क्षेत्रों में एक बड़ा डिजास्टर मैनेजमेंट नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। (Arunachal LAC GSI Survey)

रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला, अब ‘जरूरत’ के आधार पर मिलेगी सरकारी नौकरी, बदले अनुकंपा नियुक्ति के नियम

Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026
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Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026: रक्षा मंत्रालय ने सेना, नौसेना, वायुसेना, डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय के दूसरे संगठनों में कंपैशनेट अपॉइंटमेंट यानी अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। मंत्रालय ने नया ऑफिस मेमोरेंडम जारी करते हुए “रिलेटिव मेरिट पॉइंट सिस्टम” को संशोधित कर दिया है। अब किसी कर्मचारी की मौत या मेडिकल आधार पर सेवा समाप्त होने के बाद उसके परिवार को नौकरी देने का फैसला पूरी तरह 100 पॉइंट मेरिट सिस्टम के आधार पर होगा।

रक्षा मंत्रालय का यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया गया है। मंत्रालय ने साफ कहा है कि अब हर आवेदन को तय पैरामीटर्स के हिसाब से नंबर दिए जाएंगे और सबसे ज्यादा जरूरतमंद परिवार को प्राथमिकता मिलेगी।

यह बदलाव ऐसे समय में किया गया है जब लंबे समय से कंपैशनेट अपॉइंटमेंट में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई परिवारों का आरोप था कि असली जरूरतमंद लोग पीछे रह जाते हैं जबकि बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को नौकरी मिल जाती है। इसी वजह से अब पूरी प्रक्रिया को ज्यादा व्यवस्थित और डेटा बेस्ड बनाया गया है।

Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026: क्या है कंपैशनेट अपॉइंटमेंट

सरकारी नौकरी के दौरान अगर किसी कर्मचारी की अचानक मौत हो जाती है या फिर गंभीर बीमारी अथवा मेडिकल कारणों से उसे समय से पहले नौकरी छोड़नी पड़ती है, तो उसके परिवार की आमदनी अचानक रुक जाती है।

डिफेंस फोर्सेस में यह समस्या और गंभीर मानी जाती है क्योंकि कई बार कर्मचारी की उम्र कम होती है और परिवार पूरी तरह उसी की कमाई पर निर्भर होता है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, शादी, इलाज और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी एक साथ परिवार पर आ जाती है।

इसी स्थिति में सरकार परिवार के एक सदस्य को नौकरी देकर आर्थिक सहारा देने की कोशिश करती है। इसे ही कंपैशनेट अपॉइंटमेंट कहा जाता है।

लेकिन नौकरी की सीटें सीमित होती हैं और आवेदन हजारों आते हैं। ऐसे में यह तय करना मुश्किल होता है कि सबसे ज्यादा जरूरत किस परिवार को है। इसी वजह से रक्षा मंत्रालय ने कुछ समय पहले 100 पॉइंट का मेरिट सिस्टम बनाया था, जिसे अब और ज्यादा विस्तृत और सख्त बनाया गया है।

नए सिस्टम में कैसे तय होंगे नंबर

रक्षा मंत्रालय ने परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को आठ बड़े हिस्सों में बांटा है। हर हिस्से के लिए अलग-अलग पॉइंट तय किए गए हैं।

सबसे ज्यादा 20 पॉइंट फैमिली पेंशन के लिए रखे गए हैं। यानी अगर परिवार को कम पेंशन मिल रही है तो उसे ज्यादा नंबर मिलेंगे। मंत्रालय का मानना है कि कम पेंशन वाला परिवार ज्यादा आर्थिक संकट में होगा।

वहीं, अगर किसी परिवार को 9 हजार रुपये तक पेंशन मिल रही है तो उसे पूरे 20 पॉइंट मिलेंगे। जैसे-जैसे पेंशन बढ़ेगी, पॉइंट कम होते जाएंगे। 31,500 रुपये से ज्यादा पेंशन होने पर कोई पॉइंट नहीं मिलेगा।

एकमुश्त रकम भी बनेगी बड़ा फैक्टर

किसी कर्मचारी की मौत के बाद परिवार को ग्रेच्युटी, जीपीएफ, लीव इनकैशमेंट, बीमा और दूसरी रकम मिलती है। मंत्रालय ने इसे भी बड़ा फैक्टर माना है।

अगर परिवार को 10 लाख रुपये तक की रकम मिली है, तो उसे पूरे 10 पॉइंट दिए जाएंगे। वहीं ज्यादा रकम मिलने पर पॉइंट घटते जाएंगे।

मंत्रालय का मानना है कि ज्यादा एकमुश्त राशि मिलने वाले परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ हद तक बेहतर मानी जा सकती है, इसलिए कम रकम पाने वाले परिवार को प्राथमिकता दी जाएगी।

अब प्रॉपर्टी और दूसरी आमदनी भी छिपाना मुश्किल

नए नियमों में परिवार की दूसरी आय और संपत्ति को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। अगर परिवार के पास जमीन, दुकान, मकान, बैंक बैलेंस या दूसरी संपत्ति है, तो उसका मूल्यांकन किया जाएगा।

इसके अलावा परिवार में दूसरे कमाने वाले सदस्यों की आय भी देखी जाएगी। अगर परिवार के पास कोई दूसरी आमदनी नहीं है तो उसे ज्यादा पॉइंट मिलेंगे। मंत्रालय का कहना है कि इससे वास्तविक आर्थिक स्थिति का बेहतर आकलन हो सकेगा।

बेटियों और छोटे बच्चों को किया शामिल

इस बार रक्षा मंत्रालय ने परिवार की जिम्मेदारियों को बहुत अहम माना है। अगर परिवार में अविवाहित बेटियां हैं तो उसके हिसाब से अलग पॉइंट दिए जाएंगे। तीन या उससे ज्यादा अविवाहित बेटियां होने पर परिवार को 15 पॉइंट तक मिल सकते हैं।

इसी तरह छोटे बच्चों की संख्या के लिए भी 15 पॉइंट तय किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि जिन परिवारों में छोटे बच्चे और बेटियां ज्यादा हैं, वहां आर्थिक और सामाजिक दबाव ज्यादा होता है। इसलिए ऐसे परिवारों को नौकरी में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

अगर कम उम्र में हुई कर्मचारी की मौत…

नए सिस्टम में “लेफ्ट ओवर सर्विस” को भी शामिल किया गया है। यह देखा जाएगा कि कर्मचारी की नौकरी में कितने साल बाकी थे। अगर कर्मचारी की मौत तब हुई जब उसकी नौकरी में 20 साल या उससे ज्यादा समय बाकी था, तो परिवार को पूरे 10 पॉइंट मिलेंगे।

मंत्रालय का मानना है कि कम उम्र में कर्मचारी की मौत होने पर परिवार पर ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ता है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारियां बाकी होती हैं।

विधवा और अनाथ बच्चों के लिए विशेष राहत

नए नियमों में कुछ मामलों को “स्पेशल केस” माना गया है। अगर कर्मचारी और उसकी पत्नी दोनों की मौत हो चुकी है और बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए हैं, तो ऐसे मामलों में 20 अतिरिक्त ग्रेस पॉइंट मिलेंगे।

अगर मृत कर्मचारी की पत्नी खुद नौकरी के लिए आवेदन करती है तो उसे 15 अतिरिक्त पॉइंट दिए जाएंगे। वहीं अगर परिवार में कोई सदस्य दिव्यांग है तो अलग से अतिरिक्त पॉइंट मिलेंगे।

देर से आवेदन करने वालों को भी राहत

पहले कई परिवार समय पर आवेदन नहीं कर पाते थे। कई बार परिवार को नियमों की जानकारी ही नहीं होती थी।
अब मंत्रालय ने ऐसे मामलों के लिए भी अलग पॉइंट सिस्टम बनाया है।

अगर मौत के दो साल के भीतर आवेदन किया गया है तो 10 पॉइंट मिलेंगे। दो से तीन साल के बीच आवेदन करने पर सात पॉइंट और पांच साल बाद आवेदन करने पर भी तीन पॉइंट दिए जाएंगे।

इसे बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि पहले देरी होने पर परिवार की स्थिति कमजोर हो जाती थी।

बराबर नंबर होने पर कैसे होगा फैसला

रक्षा मंत्रालय ने बराबर स्कोर वाले मामलों के लिए भी साफ नियम बना दिए हैं। अगर दो परिवारों के पॉइंट बराबर हैं तो सबसे पहले प्रति सदस्य उपलब्ध आय देखी जाएगी। यानी परिवार की कुल आय को आश्रितों की संख्या से बांटा जाएगा। जिस परिवार की प्रति सदस्य आय कम होगी, उसे प्राथमिकता मिलेगी।

अगर इसके बाद भी मामला बराबर रहता है तो कर्मचारी की बची हुई सेवा, दिव्यांग सदस्य, अविवाहित बेटियां और आवेदक की उम्र को देखा जाएगा। बड़ी उम्र वाले आवेदक को प्राथमिकता दी जाएगी।

पुराने मामलों के लिए भी अलग व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय ने यह भी माना कि पुराने मामलों में पेंशन और टर्मिनल बेनिफिट आज की तुलना में बहुत कम थे। इसी वजह से प्री-2006 और प्री-2016 मामलों के लिए अलग पेंशन स्लैब और पॉइंट सिस्टम बनाया गया है ताकि पुराने परिवारों के साथ अन्याय न हो।

सेना, नौसेना, वायुसेना और डीआरडीओ सब पर लागू होंगे नियम

यह नया सिस्टम केवल सेना तक सीमित नहीं है। रक्षा मंत्रालय ने इसे आर्मी मुख्यालय, नेवल मुख्यालय, एयर मुख्यालय, डीआरडीओ, कोस्ट गार्ड, डीजीक्यूए और रक्षा मंत्रालय के बाकी संगठनों पर भी लागू किया है। अब रक्षा मंत्रालय से जुड़े हर कर्मचारी के परिवार के लिए यही नया नियम लागू होगा।

पुराने मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जिन मामलों पर पहले ही बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स फैसला ले चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। हालांकि जो मामले अभी प्रक्रिया में हैं या नए आवेदन आएंगे, उन पर यही नया सिस्टम लागू होगा। (Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026)

Defence Ministry Revises Compassionate Appointment Rules, New 100-Point Merit System to Prioritise Needy Families.

Exclusive: अग्निवीरों के रिस्क और हार्डशिप अलाउंस में 25% तक बढ़ोतरी, सियाचिन में तैनात जवानों को ज्यादा भत्ता

Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026
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Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026: अग्निपथ योजना के तहत भर्ती हुए अग्निवीरों के लिए बड़ा अपडेट है। भारतीय सेना ने अग्निवीरों के लिए बड़ा आर्थिक राहत पैकेज लागू किया है। सेना मुख्यालय से जारी एडवाइजरी में अग्निवीरों के ड्रेस अलाउंस और रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस में बढ़ोतरी की गई है। बता दें कि अग्निपथ योजना लागू होने के बाद पहली बार अग्निवीरों के लिए इतने बड़े स्तर पर जोखिम भत्तों में संशोधन देखने को मिला है।

इंटीग्रेटेड हेडक्वार्टर्स ऑफ मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस (आर्मी), एडजुटेंट जनरल ब्रांच की तरफ से जारी एडवाइजरी में अग्निपथ स्कीम 2022 के तहत सेवा दे रहे अग्निवीरों को मुश्किल और खतरे वाली जगहों की पोस्टिंग्स पर ज्यादा भत्ते देने की बात कही है। डॉक्यूमेंट में सियाचिन, हाई एल्टीट्यूड एरिया, काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन, फील्ड एरिया और स्पेशल फोर्सेस जैसी तैनातियों पर मिलने वाले भत्तों के नए रेट्स शामिल हैं।

Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026: क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव

अग्निपथ योजना लागू होने के बाद से लगातार यह बहस होती रही कि चार साल की सेवा अवधि में अग्निवीरों को कितनी आर्थिक सुरक्षा मिल रही है। सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी थी कि अग्निवीरों को बेसिक सैलरी के अलावा रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस, राशन, ट्रैवल अलाउंस और सेवा निधि पैकेज भी दिया जाएगा। लेकिन अब पहली बार इन अतिरिक्त भत्तों में बड़े स्तर पर संशोधन किया गया है।

सेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ समय से कठिन इलाकों में तैनात अग्निवीरों के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता बढ़ाने पर विचार चल रहा था। खासकर सियाचिन, लद्दाख, एलओसी, एलएसी और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन वाले इलाकों में काम कर रहे जवानों की परिस्थितियों को देखते हुए यह बदलाव जरूरी माना गया।

सेना के अंदर यह भी माना जा रहा है कि इससे अग्निवीरों का मनोबल बढ़ेगा।

सियाचिन अलाउंस में सबसे बड़ा बदलाव

एडवाइजरी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सियाचिन अलाउंस में देखने को मिली है। नए ऑर्डर के मुताबिक सियाचिन में तैनात अग्निवीरों को मिलने वाला अलाउंस 30 हजार रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 37,500 रुपये कर दिया गया है। सियाचिन अलाउंस में लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।

सियाचिन को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। यहां तापमान कई बार माइनस 40 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऑक्सीजन की कमी, बर्फीले तूफान और ग्लेशियर की खतरनाक परिस्थितियों के बीच सैनिकों को लंबे समय तक तैनात रहना पड़ता है। ऐसे में यहां मिलने वाला भत्ता सेना में सबसे कठिन पोस्टिंग्स में गिना जाता है।

सेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि सियाचिन में ड्यूटी करना केवल सैन्य चुनौती नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर बेहद कठिन होता है। ऐसे में अग्निवीरों को मिलने वाली अतिरिक्त राशि उनके परिवारों के लिए भी बड़ी राहत मानी जा रही है।

हाई एल्टीट्यूड और स्पेशल फोर्सेस अलाउंस भी बढ़ा

एडवाइजरी में हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-3 और स्पेशल फोर्सेस अलाउंस में भी बढ़ोतरी की गई है। पहले यह राशि 17,300 रुपये थी, जिसे बढ़ाकर 21,625 रुपये कर दिया गया है।

यह भत्ता उन जवानों को मिलता है जो 14 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात होते हैं। लद्दाख, पूर्वी लद्दाख और कुछ अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में यह कैटेगरी लागू होती है। इसके अलावा स्पेशल फोर्सेस में सेवा देने वाले जवानों को भी यह अलाउंस दिया जाता है।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन, बेहद ठंडे मौसम और सीमित संसाधनों के बीच ड्यूटी करना सामान्य फील्ड पोस्टिंग से काफी अलग माना जाता है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे इलाकों में लंबे समय तक रहने से शरीर पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए इन पोस्टिंग्स पर अतिरिक्त भत्ता दिया जाता है।

एलओसी और काउंटर इंसर्जेंसी इलाकों में भी राहत

जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसे इलाकों में एक्टिव फील्ड एरिया और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में लगे जवानों के लिए भी भत्ते बढ़ाए गए हैं। एडवाइजरी के अनुसार पहले जहां यह अलाउंस 9,700 रुपये था, अब इसे बढ़ाकर 12,125 रुपये किया गया है।

ये वे इलाके होते हैं जहां आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन, घुसपैठ रोधी कार्रवाई और लगातार सैन्य सतर्कता बनी रहती है। एलओसी और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में जवानों को लंबे समय तक हाई अलर्ट पर रहना पड़ता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की पोस्टिंग्स में शारीरिक जोखिम के साथ मानसिक दबाव भी काफी ज्यादा होता है। ऐसे में अतिरिक्त आर्थिक सहायता को सेना की वेलफेयर पॉलिसी का हिस्सा माना जा रहा है।

फील्ड एरिया और पैरा अलाउंस में भी इजाफा

एडवाइजरी में फील्ड एरिया अलाउंस, सीआई ऑपरेशन पीस एरिया अलाउंस और पैरा अलाउंस में भी संशोधन किया गया है। पहले यह राशि 6 हजार रुपये थी, जिसे अब बढ़ाकर 7,500 रुपये किया गया है।

यह अलाउंस उन जवानों को मिलता है जो सामान्य फील्ड पोस्टिंग या पैरा यूनिट्स में तैनात होते हैं। सेना सूत्रों का कहना है कि यह कैटेगरी भले सबसे कठिन न मानी जाए, लेकिन यहां भी जवानों को सामान्य शांति क्षेत्र की तुलना में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

हाई एल्टीट्यूड और टफ लोकेशन कैटेगरी में बदलाव

हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-2 और टफ लोकेशन अलाउंस-1 में भी 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। पहले यह राशि 4,100 रुपये थी, जिसे अब 5,125 रुपये किया गया है।

इसी तरह हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-1 और टफ लोकेशन अलाउंस-2 को 2,700 रुपये से बढ़ाकर 3,375 रुपये किया गया है।

ये अलाउंस उन इलाकों में तैनात जवानों को मिलते हैं जहां मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य से कठिन होती हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में नहीं रखा जाता।

टफ लोकेशन अलाउंस-3 में भी बढ़ोतरी

कम जोखिम वाले लेकिन चुनौतीपूर्ण इलाकों के लिए मिलने वाले टफ लोकेशन अलाउंस-3 को भी बढ़ाया गया है। यह पहले एक हजार रुपये था और अब 1250 रुपये कर दिया गया है।

हालांकि राशि अपेक्षाकृत कम है, लेकिन सेना में इसे भी एक महत्वपूर्ण संशोधन माना जा रहा है। लगभग सभी कैटेगरी में एक समान 25 प्रतिशत वृद्धि लागू की गई है।

मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस भी बढ़ा

एडवाइजरी में मॉडिफाइड फील्ड एरिया और काउंटर इंसर्जेंसी मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस में भी संशोधन शामिल है। पहले जहां मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस 3,600 रुपये था, अब इसे बढ़ाकर 4,500 रुपये कर दिया गया है।

इसी तरह काउंटर इंसर्जेंसी मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस 7,469 रुपये से बढ़ाकर 9,336 रुपये किया गया है।

ये वे इलाके होते हैं जहां पूरी तरह सक्रिय युद्ध जैसी स्थिति नहीं होती, लेकिन सुरक्षा जोखिम और ऑपरेशनल दबाव बना रहता है।

ड्रेस अलाउंस में भी 25 फीसदी बढ़ोतरी

सेना ने केवल रिस्क अलाउंस ही नहीं, बल्कि ड्रेस अलाउंस में भी बढ़ोतरी की है। पहले अग्निवीरों को सालाना 10 हजार रुपये ड्रेस अलाउंस मिलता था, जिसे अब बढ़ाकर 12,500 रुपये कर दिया गया है।

यह राशि यूनिफॉर्म, बूट्स, बैज और दूसरी सैन्य जरूरतों के रखरखाव के लिए दी जाती है। सेना सूत्रों का कहना है कि बढ़ती कीमतों और कठिन पोस्टिंग्स को देखते हुए इस राशि में संशोधन जरूरी माना गया।

दावा करने के लिए क्या करना होगा

एडवाइजरी में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बढ़े हुए भत्तों का लाभ पाने के लिए सही दस्तावेज जरूरी होंगे। पोस्टिंग ऑर्डर, संबंधित आरएच मैट्रिक्स कैटेगरी और यूनिट सर्टिफिकेशन जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।

सेना मुख्यालय ने यूनिट्स को निर्देश दिया है कि इस जानकारी को सैनिक सम्मेलन और रोल कॉल के जरिए नीचे तक पहुंचाया जाए ताकि सभी पात्र अग्निवीरों को इसकी जानकारी मिल सके।

8वें वेतन आयोग से पहले क्यों अहम माना जा रहा कदम

वहीं, इस बदलाव को 8वें वेतन आयोग से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। हालांकि यह बदलाव सभी अग्निवीरों के लिए समान वेतन वृद्धि नहीं है। इसका लाभ केवल उन्हीं जवानों को मिलेगा जो संबंधित कैटेगरी की पोस्टिंग में तैनात हैं।

पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि सेना में लंबे समय से यह व्यवस्था रही है कि कठिन और जोखिम भरी पोस्टिंग्स के लिए अतिरिक्त भत्ते दिए जाएं। अग्निवीरों को भी उसी ढांचे में शामिल करना जरूरी था ताकि ऑपरेशनल ड्यूटी में कोई असमानता महसूस न हो। वहीं, इससे अग्निपथ योजना के तहत वेलफेयर स्ट्रक्चर को भी मजबूती मिलेगी।

रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला, सेना को खराब हथियार या लेट सप्लाई दी तो 10 साल तक ब्लैकलिस्ट हो सकती है कंपनी

Defence Procurement New Rules

Defence Procurement New Rules: रक्षा खरीद में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बड़े बदलाव करते हुए नए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। अब अगर कोई कंपनी भ्रष्टाचार, कॉन्ट्रैक्ट उल्लंघन, खराब गुणवत्ता, सप्लाई में देरी या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में दोषी पाई जाती है, तो उसे पांच से लेकर दस साल तक के लिए बैन किया जा सकता है। नए नियमों के तहत सिर्फ मुख्य कंपनी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सहयोगी कंपनियां, जॉइंट वेंचर और मर्जर के बाद बनी नई इकाइयां भी कार्रवाई के दायरे में आएंगी।

रक्षा मंत्रालय ने 27 अप्रैल को “एमेंडेड गाइडलाइंस ऑफ द मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस फॉर पेनल्टीज इन बिजनेस डीलिंग्स विद एंटिटीज” नाम का नया दस्तावेज जारी किया है। इसके साथ ही 21 नवंबर 2016 के पुराने नियमों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। यह नया फ्रेमवर्क तुरंत प्रभाव से लागू हो चुका है।

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि रक्षा खरीद में “जीरो टॉलरेंस” यानी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के प्रति बिल्कुल भी नरमी नहीं बरती जाएगी। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि अब केवल हथियार खरीदने पर ही फोकस नहीं होगा, बल्कि समय पर डिलीवरी, बेहतर परफॉर्मेंस और ऑपरेशनल रेडीनेस भी उतनी ही अहम होगी।

Defence Procurement New Rules: क्यों बदले गए पुराने नियम

रक्षा मंत्रालय ने अपने नए दस्तावेज में माना है कि 2016 के बाद डिफेंस प्रोक्योरमेंट का पूरा स्ट्रक्चर काफी बदल चुका है। अब सेना को हाई-टेक सिस्टम, एडवांस सेंसर, नेटवर्क-बेस्ड वारफेयर सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तेज सप्लाई चेन की जरूरत है। ऐसे में पुराने नियम काफी नहीं रह गए थे।

मंत्रालय ने कहा है कि नए दिशानिर्देशों का मकसद “हाइएस्ट स्टैंडर्ड्स ऑफ प्रॉप्रायटी, पब्लिक अकाउंटेबिलिटी, ट्रांसपेरेंसी और फेयर कॉम्पिटिशन” सुनिश्चित करना है। दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि रक्षा खरीद केवल उन्हीं कंपनियों से की जाएगी, जिनका रिकॉर्ड साफ और विश्वसनीय हो।

“अंडर परफॉर्मेंस” प्रोडक्ट्स देना पड़ेगा भारी

पुराने नियमों में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी पर कार्रवाई का प्रावधान तो था, लेकिन सप्लाई में देरी, खराब गुणवत्ता और तकनीकी परफॉर्मेंस को लेकर बहुत स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। नए नियमों में पहली बार सर्विसेबिलिटी, डाउनटाइम और फेलियर रेट जैसे तकनीकी मानकों को भी शामिल किया गया है।

अगर कोई कंपनी समय पर उपकरण नहीं देती, बार-बार तकनीकी खराबी आती है या सिस्टम लगातार फेल होता है, तो उसे “अंडर परफॉर्मेंस” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में कंपनी पर पांच साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि कई बार महंगे हथियार समय पर नहीं पहुंचते या लंबे समय तक खराब पड़े रहते हैं, जिससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित होती है। नए नियम इसी समस्या को रोकने के लिए लाए गए हैं।

भ्रष्टाचार पर अधिकतम 10 साल तक बैन

नए नियमों के सेक्शन 4 में उन कारणों को विस्तार से बताया गया है, जिनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। इनमें इंटीग्रिटी पैक्ट का उल्लंघन, रिश्वत, गलत जानकारी देना, एजेंट कमीशन नियम तोड़ना, राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाना, विदेशी अदालत में भ्रष्टाचार साबित होना और भारतीय कानूनों के तहत दोषी पाए जाना शामिल है।

ऐसे मामलों में शुरुआत में एक साल का प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिसे हर साल रिव्यू के बाद बढ़ाया जा सकता है। कुल अवधि अधिकतम दस साल तक जा सकती है।

इससे पहले प्रतिबंध की अवधि को लेकर स्पष्ट समय सीमा नहीं थी। अब पहली बार अधिकतम सजा तय कर दी गई है।

सस्पेंशन और प्रतिबंध में क्या फर्क

नए दिशानिर्देशों में “सस्पेंशन” और “डिबारमेंट” को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। सस्पेंशन अस्थायी रोक है, जबकि डिबारमेंट लंबी अवधि का प्रतिबंध माना जाएगा।

अगर किसी कंपनी के खिलाफ सीबीआई या दूसरी एजेंसी जांच शुरू करती है, एफआईआर दर्ज होती है या चार्जशीट दायर होती है, तो विभागीय सचिव कंपनी को सस्पेंड कर सकते हैं। शुरुआत में यह सस्पेंशन छह महीने का होगा। जरूरत पड़ने पर इसे छह-छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। सामान्य तौर पर यह अवधि दो साल तक सीमित रहेगी।

सस्पेंशन के दौरान कंपनी नई टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाएगी। अगर कोई कंपनी एल-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाली भी हो, तब भी उसे प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है।

सहयोगी कंपनियां भी नहीं बच पाएंगी

नए नियमों का सबसे बड़ा बदलाव यह माना जा रहा है कि अब केवल मुख्य कंपनी पर ही कार्रवाई नहीं होगी। अगर किसी डिबार्ड या सस्पेंड कंपनी की दूसरी सहयोगी फर्म, जॉइंट वेंचर, मर्जर यूनिट या नई बनाई गई यूनिट है, तो उस पर भी कार्रवाई लागू हो सकती है।

दस्तावेज में “एलाइड फर्म्स” की विस्तृत परिभाषा दी गई है। अगर किसी दूसरी कंपनी में समान मैनेजमेंट, समान शेयरहोल्डिंग या कंट्रोल मौजूद है, तो उसे भी उसी श्रेणी में रखा जाएगा।

रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कई कंपनियां बैन से बचने के लिए नया नाम या नई यूनिट बनाकर फिर से टेंडर में हिस्सा ले लेती थीं। अब ऐसा करना मुश्किल होगा।

हेवी पेनल्टी का भी प्रावधान

नए दिशानिर्देशों में सिर्फ बैन ही नहीं, बल्कि भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान किया गया है। सेक्शन 13 के अनुसार, इंटीग्रिटी पैक्ट उल्लंघन की स्थिति में ईएमडी, परफॉर्मेंस बैंक गारंटी और एडिशनल बैंक गारंटी जब्त की जा सकती है।

अगर किसी कंपनी को पहले भुगतान किया जा चुका है, तो वह रकम ब्याज समेत वापस ली जा सकती है। ब्याज की दर एसबीआई बेस रेट से दो प्रतिशत ज्यादा या लिबोर प्लस दो प्रतिशत तक हो सकती है।

अगर एजेंट कमीशन या गिफ्ट से जुड़ा मामला सामने आता है, तो वह रकम भी वापस वसूली जाएगी।

30 दिन का शो-कॉज नोटिस अनिवार्य

नए नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी शामिल किया गया है। अब किसी कंपनी पर सीधे कार्रवाई नहीं होगी। पहले उसे कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा। कंपनी को जवाब देने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा।

अगर कंपनी जवाब नहीं देती, तो विभाग एक्स-पार्टी कार्रवाई कर सकता है। लेकिन हर आदेश लिखित कारणों के साथ जारी करना होगा। इसे “स्पीकिंग ऑर्डर” कहा गया है। रक्षा मंत्रालय की विजिलेंस शाखा सस्पेंड और डिबार कंपनियों की सूची वेबसाइट पर अपडेट करेगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में विशेष छूट

हालांकि नियम सख्त किए गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार ने लचीला रुख भी अपनाया है। अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई दूसरा विकल्प नहीं है, तो सरकार विशेष अनुमति देकर उसी कंपनी से स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड या मेंटेनेंस का काम जारी रख सकती है।

इसके लिए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों या डीआरडीओ के सक्षम अधिकारी का प्रमाणपत्र जरूरी होगा कि संबंधित उपकरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

यह प्रावधान खास तौर पर उन मामलों के लिए रखा गया है, जहां किसी विदेशी सिस्टम या विशेष तकनीक का विकल्प उपलब्ध नहीं होता।

कर्मचारियों और एजेंटों पर भी कार्रवाई

नए दिशानिर्देशों में केवल कंपनियों ही नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों और एजेंटों को भी दायरे में लाया गया है। अगर किसी एजेंट या कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच चल रही है, तो उसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में हिस्सा लेने से रोका जा सकता है। अगर अदालत में दोष साबित हो जाता है, तो ऐसे व्यक्ति का नाम भी विजिलेंस वेबसाइट पर डाला जाएगा।

रक्षा उद्योग पर पड़ेगा क्या असर

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि नए नियमों का असर छोटे और बड़े दोनों वेंडर्स पर पड़ेगा। अब केवल कम कीमत पर टेंडर जीतना काफी नहीं होगा। कंपनियों को समय पर सप्लाई, तकनीकी गुणवत्ता और बेहतर सर्विस सपोर्ट भी देना होगा।

एलएंडटी, टाटा, एचएएल, बीईएल, अदाणी डिफेंस जैसी बड़ी कंपनियों के लिए भी परफॉर्मेंस मॉनिटरिंग पहले से ज्यादा सख्त हो जाएगी। वहीं छोटे और मध्यम उद्योगों को भी कॉन्ट्रैक्ट शर्तों का पालन बेहद सावधानी से करना होगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों के बाद कंपनियां मर्जर या एक्विजिशन से पहले ड्यू डिलिजेंस ज्यादा गंभीरता से करेंगी, क्योंकि अब पुरानी देनदारियां नई इकाइयों पर भी लागू हो सकती हैं।

पूरे रक्षा मंत्रालय पर लागू होंगे नियम

ये दिशानिर्देश रक्षा मंत्रालय के सभी विभागों पर लागू होंगे। इसमें डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस, डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन, डीआरडीओ, डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले सभी संगठन शामिल हैं।

दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि ये नियम डीएपी, डीपीएम और रक्षा खरीद से जुड़े दूसरे नियमों का हिस्सा माने जाएंगे। रक्षा मंत्रालय ने इसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में “पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता” मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है।

India Tightens Defence Procurement Rules, Up To 10-Year Ban For Corruption And Delayed Supply