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भारतीय सेना को चाहिए आकाशतीर के साथ 83 नए डिफेंस कैरियर, जो टैंकों के साथ चलते हुए दुश्मन को करेगा ट्रैक

कैडेट को एक तरह से मोबाइल कमांड पोस्ट माना जा रहा है। यह सीधे आर्मर्ड कॉलम के साथ रहेगा और एयर डिफेंस यूनिट्स को रियल टाइम में जानकारी देता रहेगा...

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📍नई दिल्ली | 30 Apr, 2026, 11:53 AM

Akashteer CADET Air Defence Carriers: भारतीय सेना ने अपनी मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन्स की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 83 कैरियर एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम (CADET) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। ये खास ट्रैक्ड व्हीकल होंगे, जिन पर ‘आकाशतीर’ एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम लगाया जाएगा। इसका मकसद युद्ध के मैदान में टैंक और आर्मर्ड यूनिट्स को एरियल थ्रेट्स से सुरक्षा देना है।

Akashteer CADET Air Defence Carriers: क्या है ‘आकाशतीर’ सिस्टम

आकाशतीर’ एक एडवांस्ड एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम है, जिसे डीआडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम अलग-अलग रडार, सेंसर और हथियारों को एक ही नेटवर्क में जोड़ता है।

यह सिस्टम युद्ध के दौरान आसमान में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखता है और तुरंत जानकारी संबंधित यूनिट्स तक पहुंचाता है। इससे फैसले जल्दी लिए जा सकते हैं और खतरे का जवाब तुरंत दिया जा सकता है।

क्यों लगाया जा रहा है ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर

अब तक एयर डिफेंस के कई सिस्टम फिक्स्ड या व्हील्ड प्लेटफॉर्म पर चलते थे। लेकिन समस्या यह थी कि ये टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ हर इलाके में बराबर रफ्तार से नहीं चल पाते थे। टैंक जहां ऊबड़-खाबड़ इलाकों, रेगिस्तान या पहाड़ों में आसानी से आगे बढ़ते हैं, वहीं व्हील्ड सिस्टम कई बार पीछे रह जाते थे।

इसी वजह से अब ‘आकाशतीर’ को ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर लगाया जा रहा है। ये प्लेटफॉर्म टैंकों की तरह ही मुश्किल इलाकों में चल सकते हैं।

कैसे काम करेगा CADET सिस्टम

कैडेट को एक तरह से मोबाइल कमांड पोस्ट माना जा रहा है। यह सीधे आर्मर्ड कॉलम के साथ रहेगा और एयर डिफेंस यूनिट्स को रियल टाइम में जानकारी देता रहेगा। जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या फाइटर जेट जैसे खतरे सामने आएंगे, तो यह सिस्टम तुरंत उनकी जानकारी देगा और हथियारों को एक्टिव करने में मदद करेगा। इससे युद्ध के दौरान प्रतिक्रिया देने का समय काफी कम हो जाएगा और यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित रह सकेंगी। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

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ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर किया डिजाइन

पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कैडेट प्लेटफॉर्म को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि भविष्य में इसमें ड्रोन डिटेक्शन और ड्रोन काउंटर सिस्टम भी जोड़े जा सकें। इससे यह सिस्टम सिर्फ पारंपरिक खतरों के लिए नहीं, बल्कि नए तरह के युद्ध के लिए भी तैयार रहेगा।

इसमें आकाशतीर सिस्टम के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए जाएंगे, जिन्हें सेना खुद उपलब्ध कराएगी। यह वाहन टैंकों की तरह ही हर तरह के मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और पहाड़ों में 5000 मीटर ऊंचाई तक आसानी से चल सकेगा।

इस ट्रैक्ड व्हीकल को बेहद कठिन हालात में काम करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह माइनस 30 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा।

यह एक बार में 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है। सड़क पर इसकी गति करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि कठिन इलाकों में यह करीब 15 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकेगा।

इसमें कम से कम चार लोगों की टीम बैठ सकेगी और उनके लिए अंदर क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम भी होगा, ताकि हर मौसम में काम करना आसान रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

Akashteer
Akashteer System (Pic: Indian Army)

सुरक्षा और पावर सिस्टम

कैडेट में STANAG लेवल-2 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन भी दिया जाएगा, जिससे यह गोलीबारी और हमलों से कुछ हद तक सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा इसमें एक अलग पावर यूनिट होगी, जो बिना मुख्य इंजन चालू किए भी सिस्टम को करीब छह घंटे तक चला सकेगी। यह सुविधा खासतौर पर तब काम आएगी, जब व्हीकल को किसी एक जगह पर खड़े रहकर निगरानी करनी हो।

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इस प्लेटफॉर्म में आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, जो जीपीएस, ग्लोनास और भारत के नाविक सिस्टम से जुड़ेंगे। इससे यह हर स्थिति में अपनी लोकेशन को सटीक तरीके से ट्रैक कर सकेगा। साथ ही, इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी सिस्टम को जैमिंग से बचाया जा सके। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। इसके तहत 83 सिस्टम खरीदे जाएंगे।
इनकी डिलीवरी एडवांस पेमेंट के बाद 36 महीने के अंदर पूरी करनी होगी। अगर दो कंपनियां इस प्रक्रिया में योग्य पाई जाती हैं, तो ऑर्डर को 60 और 40 प्रतिशत के अनुपात में बांटा जाएगा। इन सिस्टम्स की वारंटी 24 महीने की होगी और इन्हें करीब 20 साल तक इस्तेमाल करने के हिसाब से डिजाइन किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट को ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी के तहत रखा गया है। इसका मतलब है कि इसमें कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही डिजाइन और बनाया जाएगा। इससे देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

सेना के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम

सेना की मैकेनाइज्ड यूनिट्स टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स युद्ध के दौरान सबसे आगे रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें हवाई हमलों से तुरंत सुरक्षा न मिले, तो उन्हें भारी नुकसान हो सकता है। कैडेट और ‘आकाशतीर’ सिस्टम मिलकर इस कमी को पूरा करेंगे। ये सिस्टम सीधे फ्रंटलाइन पर मौजूद रहकर हर तरह के हवाई खतरे की जानकारी देंगे और उससे निपटने में मदद करेंगे।

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इस प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे एयरलिफ्ट भी किया जा सके। यह बड़े सैन्य विमान जैसे सी-17 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में आसानी से ले जाया जा सकेगा। इससे जरूरत पड़ने पर इसे किसी भी इलाके में जल्दी तैनात किया जा सकता है। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

बदलते युद्ध के अनुसार तैयारी

सेना अब अपने सिस्टम्स को मॉडर्न वॉरफेयर को देखते हुए तैयार कर रही है। आज के समय में नेटवर्क आधारित युद्ध, रियल टाइम डेटा और तुरंत जवाबी कार्रवाई आज की जरूरत बन चुके हैं। कैडेट और ‘आकाशतीर’ इसी दिशा में एक अहम कदम माने जा रहे हैं, जहां जमीन पर चल रही यूनिट्स को आसमान से होने वाले खतरों के खिलाफ लगातार सुरक्षा मिलती रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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