📍नई दिल्ली | 3 Nov, 2025, 11:16 AM
MALE RPAS: पांच अगस्त को रक्षा मंत्रालय की ने डिफेंस एक्विजेशन काउंसिल (डीएसी) ने तीनों सेनाओं के लिए 87 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस यानी मेल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम के लिए 30 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर को मंजूरी दी थी। जिसके बाद 30 हजार करोड़ रुपये के इस मेगा ऑर्डर के लिए भारतीय कंपनियों ने कमर कस ली है। तमाम भारतीय कंपनियां इस ऑर्डर की शर्तों को पूरा करने के लिए विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रही हैं। इन ड्रोनों का इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया जाएगा।
MALE RPAS: क्या होंते हैं मेल ड्रोन
मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम ऐसे ड्रोन होते हैं जो मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं और ये कई तरह के पेलोड व हथियार ले जाने में सक्षम होते हैं। इनका उपयोग 24×7 सर्विलांस, प्रिसिजन स्ट्राइक और कोवर्ट ऑपरेशंस में किया जा सकता है। आधुनिक युद्ध में ये ड्रोन “आई-इन-द-स्काई” की भूमिका निभाते हैं और जमीनी व समुद्री ऑपरेशनों को रियल-टाइम खुफिया और स्ट्राइक सपोर्ट देते हैं। इन ड्रोन की तैनाती से सीमाओँ की निगरानी में मजबूती आएगी और यह नेटवर्क-सेन्ट्रिक बैटल सिस्टम में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
इन ड्रोन्स की सबसे बड़ी खासियत है कि ये लगातार 24 से 30 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं। इनकी ऑपरेटिंग ऊंचाई 30,000 से 35,000 फीट तक होती है, जिससे ये दुश्मन की नजरों से दूर रहकर भी निगरानी और टोही कर सकते हैं। साथ ही ये ड्रोन एक ही उड़ान में 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकते हैं। इसका मतलब है कि वे एक ही मिशन में बड़े क्षेत्र जैसे लद्दाख, अरुणाचल या अरब सागर तक की निगरानी कर सकते हैं।
इसके अलावा ये न सिर्फ निगरानी बल्कि हमले में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनमें मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसर, हाई-रेजोल्यूशन कैमरे, रडार सिस्टम और प्रिसिजन स्ट्राइक वेपन्स लगाए जा सकते हैं। ये एमक्यू-9 प्रीडेटर की तरह मिसाइल और लाइट बम ले जा सकते हैं, जिससे ये सटीक निशाने पर हमला कर सकते हैं।
MALE RPAS: पेश कर रहीं मॉडिफाइड ड्रोन
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय सेनाओं के लिए कुल 87 मेल यूएवी की खरीद की जाएगी। इन टेंडरों को भारतीय कंपनियों के लिए ही खोला जाएगा ताकि देश में एक मजबूत यूएवी मैन्युफैक्चरिंग इकोससिस्टम तैयार हो सके। लेकिन चुनौती यह है कि विदेशी कंपनियां पहले से ही तैयार प्रोडक्ट्स को भारतीय जरूरतों के हिसाब से मॉडिफाइड करके पेश कर रही हैं, जबकि भारतीय कंपनियों को कम समय में स्वदेशी डिजाइन तैयार करना होगा।
MALE RPAS: इजरायल और अमेरिकी कंपनियां दौड़ में
इस सौदे के लिए कई विदेशी कंपनियां ने भारतीय कंपनियों के साथ करार किया है। इनमें इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स और अमेरिका की जनरल एटोमिक्स प्रमुख हैं। ये कंपनियां ऐसे ड्रोन पेश करेंगी, जो पहले से ही अन्य देशों की सेनाओं में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन्हें भारतीय जरूरतों के मुताबिक मॉडिफाइड किया जाएगा, जबकि भारतीय कंपनियां देश में प्रोडक्शन फैसिलिटी तैयार करेंगी और कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल करेंगी।
वहीं, अगर कोई भारतीय कंपनी तय समय सीमा में छह महीने के अंदर ट्रायल के लिए पूरी तरह से स्वदेशी ड्रोन पेश नहीं कर पाती है, तो रक्षा मंत्रालय विदेशी डिजाइन वाले ड्रोन्स को भी शामिल कर सकता है। माना जा रहा है कि अगले छह महीनों में ट्रायल शुरू हो जाएंगे।
सूत्रों का कहना है कि इनकी डिलीवरी 2027 से 2029 के बीच शुरू होने की संभावना है। सेना को सबसे ज्यादा यूनिट्स मिलेंगी, जबकि नौसेना और वायुसेना को क्रमशः निगरानी और स्ट्राइक ऑपरेशनों के लिए तैनात किया जाएगा।
MALE RPAS: दो कंपनियों को मिलेगा फायदा
रक्षा मंत्रालय ने यह भी तय किया है कि इस इतने बड़े कॉन्ट्रैक्ट का फायदा केवल एक नहीं, बल्कि दो कंपनियों को मिलेगा। 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक के इस सौदे को दो हिस्सों में बांटा जाएगा। सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को 64 फीसदी और दूसरे स्थान पर रहने वाली कंपनी को 36 फीसदी ऑर्डर दिया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि भारत में दो ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग लाइन्स तैयार करना है ताकि जरूरत पड़ने पर उत्पादन तेजी से बढ़ाया जा सके। बिडर कंपनियों को 10 साल का मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट भी दिया जाएगा।
MALE RPAS: भारत में बनेगा इंजन और एयरोस्ट्रक्चर
टेंडर की शर्तों के मुताबिक, कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ड्रोन का मुख्य ढांचा यानी एयरोस्ट्रक्चर भारत में ही तैयार हो। इंजन भी देश में असेंबल और टेस्ट किया जाएगा। साथ ही इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के कई घटक भारत में ही बनने चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना और भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को आत्मनिर्भर करना है। इसके अलावा, नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम भी भारतीय तकनीक से इंटीग्रेट किए जाएंगे।
MALE RPAS: मेल ड्रोन परियोजना से जुड़ी प्रमुख भारतीय कंपनियां
इस टेंडर के लिए भारत की कई बड़ी कंपनियों ने विदेशी साझेदारों के साथ करार किए हैं। लार्सन एंड टर्बो ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स के साथ समझौता किया है, जिसके तहत एमक्यू-सीरीज यूएवी भारत में बनााए जाएंगे। यह समझौता पिछले महीने अक्टूबर की आखिर में हुआ। माना दा रहा है कि लार्सन एंड टर्बो प्रमुख बोली लगाने वाली कंपनी होगी।
वहीं, भारत फोर्ज ने फ्रांस की तर्गिस गेलार्ड कंपनी के साथ आरोक ड्रोन बनाने के लिए करार किया है। यह एक घातक मेल यूएवी होगा, जो भारतीय सेना की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा रहा है।
अदाणी डिफेंस ने इजरायली एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर दृष्टि 10 स्टारलाइनर ड्रोन बनाया है, जो हर्मेस 900 प्लेटफॉर्म पर बेस्ड है। यह पहले से भारतीय सेना और नौसेना में शामिल हो चुका है और इसमें लगभग 70 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, टाटा एडवांस सिस्टम्स भी इसमें रूचि दिखा रही है और उसने पहला जेट पॉवर्ड मेल यूएवी बनाया है। हालांकि टाटा एडवांस सिस्टम्स ने स्वतंत्र रूप से भी मेल यूएवी तैयार किया है, लेकिन इसमें उसने कई अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की सहयोग भी लिया है।
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