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अमेरिका में जनरल उपेंद्र द्विवेदी को मिला बड़ा सम्मान, यूएस के इस प्रतिष्ठित संस्थान के ‘हॉल ऑफ फेम’ में मिली जगह

Gen Upendra Dwivedi US visit-COAS inducted into USAWC International Hall of Fame
General Upendra Dwivedi, COAS, visited the Army War College (AWC), Carlisle Barracks, USA

Gen Upendra Dwivedi US visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का अमेरिका दौरा बेहद ही खास रहा है। उनका नाम अमेरिका के प्रतिष्ठित यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी वॉर कॉलेज के इंटरनेशनल फेलोज हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया है। इसके साथ ही वह इस सम्मान को पाने वाले तीसरे भारतीय सेना प्रमुख बन गए हैं। उनसे पहले जनरल वी.के. सिंह और जनरल बिक्रम सिंह को यह सम्मान मिल चुका है।

Gen Upendra Dwivedi US visit: अमेरिका में मिला बड़ा सम्मान

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्थित कार्लिसल बैरक्स में मौजूद आर्मी वॉर कॉलेज का दौरा किया। यहीं पर उन्हें इंटरनेशनल हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। यह सम्मान उन विदेशी सैन्य अधिकारियों को दिया जाता है, जिन्होंने इस संस्थान से पढ़ाई करने के बाद अपने देश की सेना के शीर्ष पद तक पहुंच हासिल की हो।

इस मौके पर उन्होंने वहां मौजूद फैकल्टी और अलग-अलग देशों से आए सैन्य अधिकारियों को संबोधित भी किया। अपने संबोधन में उन्होंने नेतृत्व, प्रोफेशनल मिलिट्री एजुकेशन और बदलते सुरक्षा हालात जैसे मुद्दों पर बात की।

उसी संस्थान के रहे हैं छात्र

जनरल द्विवेदी खुद भी इस प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र रह चुके हैं। उन्होंने साल 2014-15 में यहां से स्ट्रैटेजिक स्टडीज से जुड़ा हाई लेवल कोर्स किया था। उन्हें डिस्टिंग्विश्ड फेलो का सम्मान भी मिला हुआ है। इस कोर्स को भारत के नेशनल डिफेंस कॉलेज के बराबर माना जाता है, जहां वरिष्ठ सैन्य अधिकारी रणनीतिक स्तर की ट्रेनिंग लेते हैं।

दौरे के दौरान उन्होंने कॉलेज की अलग-अलग सुविधाओं का भी निरीक्षण किया। इसके साथ ही उन्होंने पैनल डिस्कशन में हिस्सा लिया, स्कॉलर्स प्रोग्राम के तहत तैयार किए गए एडवांस्ड स्टडी प्रोजेक्ट्स को देखा और संस्थान के वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत की।

क्या होता है इंटरनेशनल हॉल ऑफ फेम

आर्मी वॉर कॉलेज का इंटरनेशनल फेलोज हॉल ऑफ फेम एक खास सम्मान माना जाता है। इसकी शुरुआत 1988 में हुई थी। इसमें उन्हीं अधिकारियों को जगह दी जाती है, जो इस कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद अपने देश में सेना प्रमुख या उसके बराबर के उच्च पद तक पहुंचे हों।

दुनिया भर के हजारों इंटरनेशनल फेलोज में से बहुत कम लोगों को यह सम्मान मिलता है। किसी अधिकारी का नाम पहले उसके देश की ओर से प्रस्तावित किया जाता है, जिसके बाद अमेरिकी सैन्य नेतृत्व की मंजूरी के बाद उसे औपचारिक रूप से शामिल किया जाता है।

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हवाई और वॉशिंगटन में भी अहम कार्यक्रम

अमेरिका दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने हवाई स्थित फोर्ट शाफ्टर का भी दौरा किया, जो यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी पैसिफिक का मुख्यालय है। यहां उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। उन्होंने यूएसएआरपैक के कमांडिंग जनरल रोनाल्ड पी क्लार्क और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकें कीं।

इन बैठकों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने, संयुक्त ट्रेनिंग और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस पर चर्चा हुई। मल्टी-डोमेन का मतलब है जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में मिलकर काम करना।

इसके अलावा टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत हुई, जिसमें डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, को-प्रोडक्शन और नई तकनीकों पर सहयोग जैसे विषय शामिल रहे।

ओआहू द्वीप का हवाई दौरा

दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने ओआहू द्वीप का हवाई सर्वे भी किया। इस दौरान उन्हें अमेरिकी सेना के ट्रेनिंग सिस्टम और ऑपरेशनल तैयारी को करीब से समझने का मौका मिला। खासतौर पर जंगल और समुद्री इलाकों में होने वाले अभ्यास और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की जानकारी दी गई।

इस सर्वे में यह देखा गया कि अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ ऑपरेशन कैसे किए जाते हैं और सेना किस तरह अपनी तैयारी बनाए रखती है।

लगातार बढ़ रहा सैन्य संपर्क

जनरल द्विवेदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के बीच सैन्य स्तर पर लगातार संपर्क बढ़ रहा है। पिछले कुछ महीनों में तीनों भारतीय सेना प्रमुख अमेरिका जा चुके हैं।

नवंबर 2025 में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने अमेरिका का दौरा किया था। इसके बाद अप्रैल 2026 की शुरुआत में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह भी वहां गए। अब थल सेना प्रमुख का दौरा हुआ है।

इन दौरों के दौरान अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों में बातचीत हुई है। नौसेना ने समुद्री सुरक्षा और सहयोग पर ध्यान दिया, वायुसेना ने एयर ऑपरेशन और लॉजिस्टिक्स पर चर्चा की, जबकि थल सेना ने जमीन आधारित ऑपरेशन और आपसी तालमेल को लेकर बातचीत की। (Gen Upendra Dwivedi US visit)

सेना कर रही ‘सुपर कंट्रोल सिस्टम’ बनाने की तैयारी, “डिजिटल दिमाग” से जुड़ेंगे टैंक, मिसाइल और आर्टिलरी

LVCCS Indian Army RFI
AI-Generated Image

LVCCS Indian Army: भारतीय थलसेना एक नया सिस्टम डेवलप करने की तैयारी कर रही है, जिसका नाम है लैंड वेक्टर्स कंट्रोल एंड कोऑर्डिनेशन सिस्टम (LVCCS)। यह सिस्टम सेना के सभी लैंड बेस्ड वेपंस और फायर पावर को एक ही नेटवर्क में जोड़ने के लिए बनाया जा रहा है। इसके लिए सेना के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ इंफॉर्मेशन सिस्टम ने सेना को नेटवर्क सेंट्रिक बनाने के लिए एक ड्राफ्ट रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है।

यह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा, जिसमें जमीन पर चलने वाले सभी मिलिट्री वेक्टर्स जैसे टैंक, आर्टिलरी गन, हॉवित्जर, रॉकेट, मिसाइल, लॉइटरिंग अमुनिशन को रीयल-टाइम में कंट्रोल और कॉर्डिनेट करेगा।

LVCCS Indian Army: क्यों जरूरी है यह सिस्टम

अब तक सेना के अलग-अलग हथियार और यूनिट्स अपने-अपने तरीके से काम करते थे। टारगेट देखना, प्लान बनाना, फायर करना और नुकसान का आकलन करना – यह सब अलग-अलग सिस्टम से होता था। इससे समय ज्यादा लगता था और कई बार तालमेल में कमी आ जाती थी।

एलवीसीसीएस इस पूरी प्रक्रिया को एक साथ जोड़ देगा। यह ऑब्जर्वेशन से लेकर फायर डिलीवरी और डैमेज असेसमेंट तक सब कुछ ऑटोमेट करेगा। इसका मतलब है कि कमांडर को एक ही स्क्रीन पर पूरा बैटलफील्ड दिखेगा और वह तुरंत फैसला ले सकेगा। (LVCCS Indian Army)

कैसे काम करेगा एलवीसीसीएस

यह सिस्टम चार मुख्य हिस्सों में काम करेगा। पहला हिस्सा फायर कंट्रोल का होगा, जिसमें कमांडर और सेंसर जैसे रडार और ड्रोन शामिल होंगे। दूसरा हिस्सा फायरिंग यूनिट्स का होगा, जहां से असल में गोली या मिसाइल दागी जाएगी। तीसरा हिस्सा लॉजिस्टिक्स से जुड़ा होगा और चौथा हिस्सा सभी हथियारों को जोड़ने वाला नेटवर्क होगा।

इसमें टारगेट की जानकारी ड्रोन या सेंसर से आएगी, फिर सिस्टम खुद प्लान बनाएगा और गन या रॉकेट सिस्टम उस ऑर्डर को एग्जीक्यूट करेंगी। इससे समय की बचत होगी और सटीकता बढ़ेगी।

आर्टिलरी सिस्टम को मिलेगा बड़ा अपग्रेड

एलवीसीसीएस खास तौर पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। इसमें फायर कंट्रोल, टैक्टिकल कंट्रोल और फायर प्लानिंग जैसे फीचर्स होंगे। यह सिस्टम तय करेगा कि किस हथियार का इस्तेमाल कहां और कैसे करना है। इससे रिसोर्सेज का सही इस्तेमाल होगा और दुश्मन पर दबाव बढ़ेगा। इसके जरिए थिएटर लेवल पर भी फायर प्लान तैयार किया जा सकेगा, यानी बड़े स्तर पर ऑपरेशन को कंट्रोल करना आसान होगा।

जीआईएस और डिजिटल मैप का इस्तेमाल

इस सिस्टम में जीआईएस यानी जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके जरिए डिजिटल मैप पर पूरे इलाके की जानकारी मिलेगी। इसमें 3डी टेरेन मॉडलिंग, सैटेलाइट इमेज और रास्तों का विश्लेषण जैसे फीचर्स होंगे। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन सा इलाका फायरिंग के लिए सही है और कौन सा नहीं। इसके अलावा यह सिस्टम खुद सबसे छोटा रास्ता और वैकल्पिक मार्ग भी सुझा सकेगा। (LVCCS Indian Army)

नेटवर्क और कम्युनिकेशन सिस्टम

एलवीसीसीएस एक मजबूत नेटवर्क पर काम करेगा। इसमें सैटेलाइट, रेडियो, लाइन और लोकल नेटवर्क का इस्तेमाल होगा। यह सिस्टम आर्मी डेटा नेटवर्क से जुड़ा होगा और इसमें हाई लेवल एन्क्रिप्शन होगा, जिससे डेटा सुरक्षित रहेगा। इससे युद्ध के दौरान भी कम्युनिकेशन सुरक्षित और बिना रुकावट के चलता रहेगा।

लिनक्स पर होगा ऑपरेट

यह सिस्टम किसी एक खास मशीन पर निर्भर नहीं होगा। इसे लैपटॉप, टैबलेट या कंप्यूटर पर चलाया जा सकेगा।
इसमें लिनक्स जैसे भरोसेमंद ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही यह टच स्क्रीन फ्रेंडली होगा और इस्तेमाल में आसान रहेगा। हार्डवेयर के तौर पर मजबूत और टिकाऊ लैपटॉप और टैबलेट दिए जाएंगे, जो धूल, पानी और झटकों को सह सकें। (LVCCS Indian Army)

मौजूदा सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

एलवीसीसीएस को इस तरह बनाया जा रहा है कि यह सेना के मौजूदा सिस्टम के साथ भी काम कर सके। यह बैटलफील्ड सर्विलांस सिस्टम और कमांड इंफॉर्मेशन सिस्टम से जुड़कर काम करेगा। इससे पुराने और नए सिस्टम के बीच तालमेल बना रहेगा और ऑपरेशन में कोई दिक्कत नहीं आएगी।

LVCCS आने से बदलेगी नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की क्षमता

भविष्य में जब कभी युद्ध जैसी स्थिति होगी, तब सबसे बड़ा फर्क गति और सटीकता में दिखेगा। पहले मैनुअल प्रक्रिया में जो 10-15 मिनट लगते थे, अब कुछ सेकंड-मिनट में हो जाएगा। साथ ही, कमांडर को पूरा “ग्राउंड पिक्चर” दिखेगा, कौन सा हथियार कहां है, किस दिशा में फायर करना है और किस टारगेट को पहले लेना है। यह सब एक ही जगह से तय होगा। इससे गलत फैसलों की संभावना कम होगी।

इस सिस्टम का फायदा यह है कि बिना नए हथियार खरीदे ही मौजूदा हथियार ज्यादा प्रभावी हो जाएंगे। टैक्टिकल कंट्रोल से एक ही टारगेट पर जरूरत से ज्यादा फायर नहीं होगा। सही हथियार सही जगह इस्तेमाल होगा। इससे गोला-बारूद की बचत होगी और असर ज्यादा दिखेगा। इसी वजह से इसे “फोर्स मल्टीप्लायर” कहा जाता है, यानी वही ताकत कई गुना असर दिखाएगी।

वहीं, अभी तक अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल बनाने में समय लगता है। एलवीसीसीएस के बाद यह काम आसान हो जाएगा। ऑब्जर्वेशन पोस्ट, कमांड पोस्ट और फायरिंग यूनिट्स एक ही सिस्टम से जुड़े होंगे। इससे जानकारी तुरंत शेयर होगी और आदेश भी तुरंत पहुंचेंगे।

यह सिस्टम इलाके की पूरी जानकारी देता है, जैसे कौन सा इलाका ऊंचा है, कहां रुकावट है और कहां से फायर ज्यादा असर करेगा। इससे हथियारों को सही जगह तैनात करना आसान होगा। गलत जगह फायरिंग करने की संभावना कम होगी और असर ज्यादा होगा।

एलवीसीसीएस सिर्फ फायरिंग तक ही सीमित नहीं है, यह लॉजिस्टिक्स पर भी नजर रखता है। किस यूनिट के पास कितना गोला-बारूद है, किसे जरूरत है और कहां सपोर्ट भेजना है, यह सब जानकारी सिस्टम में मिलेगी। इससे सप्लाई में तेजी आएगी। (LVCCS Indian Army)

प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट से शुरुआत

अभी इस प्रोजेक्ट की शुरुआत प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट यानी पीओसी से होगी। इसमें एक ब्रिगेड स्तर पर इस सिस्टम को टेस्ट किया जाएगा। इसमें 155 मिमी बोफोर्स गन और स्मर्च रॉकेट सिस्टम को जोड़कर देखा जाएगा कि सिस्टम कैसे काम करता है। अगर यह सफल रहा तो इसे धीरे-धीरे पूरे आर्मी स्तर पर लागू किया जाएगा।

सोर्स कोड सेना के पास

इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि इसका पूरा सोर्स कोड सेना के पास रहेगा। कोई बाहरी कंपनी इस सिस्टम पर कंट्रोल नहीं रखेगी। सभी डेटा और तकनीक सेना के पास ही रहेगी। इसके अलावा सिस्टम का सिक्योरिटी ऑडिट भी किया जाएगा ताकि किसी तरह की साइबर ​​वल्नरेबिलिटी न रहे।

मेंटेनेंस और सपोर्ट

एलवीसीसीएस को 10 साल तक इस्तेमाल में रखने की योजना है। इसके साथ 3 साल की वारंटी और लंबे समय तक तकनीकी सपोर्ट भी दिया जाएगा। इसमें ट्रेनिंग, रिपेयर और अपग्रेड की सुविधा भी शामिल होगी, ताकि सिस्टम हमेशा अपडेट बना रहे।

इस प्रोजेक्ट के लिए भारतीय कंपनियों को मौका दिया जाएगा। उन्हें अपनी क्षमता और अनुभव के आधार पर चुना जाएगा। सरकार चाहती है कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी हो और इसमें ज्यादा से ज्यादा भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हो। (LVCCS Indian Army)

नौसेना, वायुसेना प्रमुख के दौरे के बाद अब आर्मी चीफ पहुंचे US, क्या नया डिफेंस गेम प्लान बना रहे हैं भारत-अमेरिका?

India US defence chiefs visit

India US defence chiefs visit: भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर इन दिनों गर्मजोशी दिख रही है। इसकी वजह है तीनों भारतीय सेना प्रमुखों के अमेरिका दौरे, जो बेहद कम समय के अंतराल में हुए हैं। पहले नौसेना प्रमुख, फिर वायुसेना प्रमुख और अब थल सेना प्रमुख का दौरा, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत तेज हुई है।

नवंबर 2025 में भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी अमेरिका गए थे। इसके बाद इस साल अप्रैल की शुरुआत में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अमेरिका का दौरा किया। अब अप्रैल के दूसरे हिस्से में थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी भी अमेरिका में हैं। इन लगातार दौरों को हाई-लेवल मिलिट्री-टू-मिलिट्री एक्सचेंज के तौर पर देखा जा रहा है।

India US defence chiefs visit: लगातार दौरों का क्या है मतलब

इन दौरों के दौरान अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों पर बातचीत हो रही है। नौसेना प्रमुख के दौरे में समुद्री सुरक्षा, सूचना साझा करने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा हुई। वायुसेना प्रमुख ने एयर पावर, जॉइंट एक्सरसाइज और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट जैसे मुद्दों पर बातचीत की। अब थल सेना प्रमुख का दौरा जमीन आधारित ऑपरेशंस और मल्टी-डोमेन कोऑर्डिनेशन पर फोकस है।

सुरक्षा मामलों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के दौरे दोनों देशों की सेनाओं के बीच समझ बढ़ाने के लिए होते हैं। इसमें ऑपरेशन के तरीके, ट्रेनिंग सिस्टम और नई तकनीकों को लेकर बातचीत होती है। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

हवाई में सेना प्रमुख को मिला गार्ड ऑफ ऑनर

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी इस हफ्ते अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित फोर्ट शाफ्टर पहुंचे, जहां उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी पैसिफिक यानी यूएसएआरपैक का दौरा किया। फोर्ट शाफ्टर में उन्हें औपचारिक सैन्य सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

इस दौरान उन्होंने यूएसएआरपैक के कमांडिंग जनरल रोनाल्ड पी क्लार्क और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, संयुक्त ट्रेनिंग को बेहतर बनाना और जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में मिलकर काम करने पर जोर रहा। साथ ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते हालात के बीच शांति और स्थिरता बनाए रखने के तरीकों पर भी बातचीत हुई।

एक और अहम विषय टेक्नोलॉजी से जुड़ा रहा। दोनों पक्षों ने डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, को-प्रोडक्शन और नई तकनीकों पर साथ काम करने की संभावनाओं पर चर्चा की। इसका उद्देश्य यह है कि दोनों देश रक्षा क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर सकें। (India US defence chiefs visit)

ओआहू द्वीप का हवाई दौरा

दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने ओआहू द्वीप का हवाई सर्वे भी किया। इस दौरान उन्हें अमेरिकी सेना के ट्रेनिंग सिस्टम और उनकी ऑपरेशनल तैयारी को करीब से समझने का मौका मिला। खासतौर पर जंगल और समुद्र किनारे वाले इलाकों में होने वाले युद्ध अभ्यास और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर जानकारी दी गई।

यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच सैन्य स्तर पर कई बैठकों और बातचीत का दौर चला है। इससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में काम जारी है।

हवाई के बाद जनरल द्विवेदी का दौरा वॉशिंगटन डीसी में रहा। जहां भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने उन्हें इंडिया हाउस में होस्ट किया। इस दौरान आगे अमेरिकी रक्षा विभाग और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकों का कार्यक्रम तय किया गया है।

इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, ट्रेनिंग और साझा ऑपरेशन के अनुभवों पर चर्चा की जा रही है। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

पिछले साल नवंबर में अमेरिका गए थे नेवी चीफ

इससे पहले 12 से 17 नवंबर 2025 में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने अमेरिका का दौरा किया था। उन्होंने यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड और यूएस पैसिफिक फ्लीट के अधिकारियों से मुलाकात की थी। इनमें यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो, यूएस पैसिफिक फ्लीट के कमांडर एडमिरल स्टीफन टी. कोहलर और यूएस मरीन फोर्सेज पैसिफिक के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेम्स एफ. ग्लिन शामिल रहे।

दौरे के दौरान उन्होंने जॉइंट बेस पर्ल हार्बर-हिकम और यूएसएस डेनियल इनोउये का भी दौरा किया। इसके अलावा अमेरिकी नौसेना के अलग-अलग ऑपरेशनल कमांड्स और संस्थानों को करीब से देखा और उनकी कार्यप्रणाली को समझा। उन्होंने अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय अधिकारियों से भी मुलाकात की, जो आइजनहावर स्कूल और नेशनल वॉर कॉलेज में ट्रेनिंग ले रहे हैं।

इस पूरे दौरे में भारत और अमेरिका की नौसेनाओं के बीच समुद्री सहयोग को मजबूत करने पर जोर रहा। समुद्री सुरक्षा, जानकारी साझा करने, समुद्री क्षेत्र में नजर रखने की क्षमता और आपसी तालमेल बढ़ाने जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े साझा मुद्दों, जैसे मिलन एक्सरसाइज और कंबाइंड मैरिटाइम फोर्सेज में सहयोग, पर भी बात हुई। इन बैठकों से दोनों नौसेनाओं के बीच तालमेल और ऑपरेशनल सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में काम हुआ। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

अप्रैल में अमेरिका पहुंचे वायुसेना प्रमुख

6 से 9 अप्रैल तक वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी अमेरिका दौरे पर थे। उन्होंने पेंटागन में बैठकों के अलावा अलग-अलग एयरबेस का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने फाइटर जेट ऑपरेशन और स्पेस आधारित सिस्टम के बारे में जानकारी ली।

अमेरिका दौरे के दौरान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह का जॉइंट बेस एनाकोस्टिया-बोलिंग पर फुल ऑनर्स के साथ स्वागत किया गया। इसके बाद उन्होंने पेंटागन में अमेरिकी वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की, जहां यूएस सेक्रेटरी ऑफ द एयर फोर्स ट्रॉय मिंक और यूएस एयर फोर्स चीफ जनरल केन विल्सबैक के साथ अहम बातचीत हुई।

दौरे के दौरान वे पीटरसन स्पेस फोर्स बेस (कोलोराडो) भी पहुंचे, जहां उन्हें नोराड (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) की एयरोस्पेस वॉर्निंग, कंट्रोल और मैरिटाइम वॉर्निंग सिस्टम्स के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इसके बाद उन्होंने नेलिस एयर फोर्स बेस (नेवादा) का दौरा किया, जहां यूएस एयर फोर्स वारफेयर सेंटर की ऑपरेशनल तैयारियों पर ब्रीफिंग ली।

इसी दौरान उन्होंने एफ-15ईएक्स ईगल-II फाइटर जेट में फेमिलराइजेशन फ्लाइट भी की, जिसे उन्होंने खुद उड़ाकर उसकी क्षमताओं को करीब से समझा। इस पूरे दौरे में दोनों देशों के बीच कम्बाइंड एक्सरसाइज, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और मॉडर्नाइजेशन जैसे अहम मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। (India US defence chiefs visit)

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर खास ध्यान

इन सभी दौरों में एक बात समान रही है, और वह है इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर फोकस। इस क्षेत्र में समुद्री रास्तों की सुरक्षा, सैन्य संतुलन और सहयोग जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही है।

भारत और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में अपने सहयोग को बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। इसी वजह से अलग-अलग सैन्य शाखाओं के बीच संपर्क बढ़ाया जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दौरे लंबे समय से चल रहे सैन्य सहयोग का हिस्सा होते हैं। इसमें दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के अनुभवों को समझती हैं और जरूरत के अनुसार सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में जॉइंट ट्रेनिंग, ऑपरेशन प्लानिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत होती है। (India US defence chiefs visit)

तीनों सेनाओं के स्तर पर बढ़ा संपर्क

इन दौरों की खास बात यह है कि इसमें तीनों सेनाओं नौसेना, वायुसेना और थल सेना के प्रमुख शामिल रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि सहयोग केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी सैन्य क्षेत्रों में बातचीत हो रही है। इस तरह के संपर्क से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर काम किया जा रहा है, जिसमें अलग-अलग ऑपरेशन और ट्रेनिंग सिस्टम को समझना शामिल है। (India US defence chiefs visit)

यूक्रेन का नया वॉर फॉर्मूला, ड्रोन-रोबोट असॉल्ट मॉडल कैसे बदलेगा भविष्य के युद्धों की तस्वीर

Ukraine Drone War Model

Ukraine Drone War Model: 2022 से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध नई तकनीक के इस्तेमाल के मामले में बहुत अलग और खास माना जा रहा है। इसे “आधुनिक युद्ध की प्रयोगशाला” भी कहा जा रहा है। इस युद्ध की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसमें नई तकनीक को बहुत तेजी से अपनाया गया है। खासकर यूक्रेन ने सस्ती और आसानी से बनने वाली तकनीक को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। वहीं ड्रोन वॉर के बाद यह युद्ध अगले स्तर पर पहुंचता दिखाई दे रहा है।

हाल ही में यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने एक नए युद्ध मॉडल को लागू करने की बात कही है, जिसमें ड्रोन और जमीन पर चलने वाले रोबोट्स को सैनिकों के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब युद्ध के मैदान में लगातार ड्रोन हमले हो रहे हैं और दोनों देशों की सेनाएं नई रणनीतियों की तलाश में हैं।

Ukraine Drone War Model: 2022 में ड्रोन युद्ध की शुरुआत

साल 2022 में जब युद्ध शुरू हुआ, तब यूक्रेन ने छोटे-छोटे ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया। ये ड्रोन ऊपर उड़कर दुश्मन की लोकेशन बताते थे या सीधे हमला करते थे। इन्हें एफपीवी ड्रोन कहा जाता है। उस समय ये सिर्फ मदद के लिए इस्तेमाल हो रहे थे, लेकिन जल्दी ही ये बहुत जरूरी हथियार बन गए। इन ड्रोन की मदद से यूक्रेन ने रूसी टैंकों और गाड़ियों को काफी नुकसान पहुंचाया। अब हालात यह हैं कि युद्ध में होने वाले नुकसान का बड़ा हिस्सा ड्रोन की वजह से हो रहा है।

2023 और 2024 तक आते-आते युद्ध लंबा हो चला। अब सबसे बड़ी समस्या सैनिकों की कमी बन गई। यूक्रेन की आबादी रूस से कम है, इसलिए नए सैनिक जुटाना मुश्किल होने लगा। दूसरी तरफ, हर बार सीधे हमले में सैनिकों को आगे भेजना खतरनाक साबित हो रहा था और नुकसान भी ज्यादा हो रहा था। इसी वजह से यूक्रेन ने ड्रोन और मशीनों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। (Ukraine Drone War Model)

क्या है यूक्रेन का नया वॉर मॉडल

यूक्रेन ने जिस नए मॉडल की घोषणा की है, उसमें “ड्रोन-असॉल्ट यूनिट्स” बनाई जा रही हैं। इन यूनिट्स में एरियल ड्रोन, जमीन पर चलने वाले ग्राउंड अनमैन्ड सिस्टम यानी रोबोट और पारंपरिक इन्फैंट्री को एक साथ जोड़ा गया है।

इसके तहत अब किसी भी ऑपरेशन में पहले ड्रोन इलाके की निगरानी करेंगे, फिर ग्राउंड रोबोट्स आगे बढ़कर हमला करेंगे और आखिर में जरूरत पड़ने पर सैनिक वहां पहुंचेंगे। इससे सीधे टकराव की स्थिति कम हो जाती है।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस सिस्टम को एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क की तरह तैयार किया गया है, जहां सभी मशीनें और सैनिक एक साथ काम करते हैं। (Ukraine Drone War Model)

Ukraine Drone War Model

ग्राउंड रोबोट्स का बढ़ता इस्तेमाल

इस नए मॉडल में सबसे ज्यादा ध्यान ग्राउंड रोबोट्स पर दिया गया है। ये ऐसे छोटे या बड़े वाहन होते हैं, जिन्हें दूर से कंट्रोल किया जाता है। इनमें कैमरे, सेंसर और कई बार हथियार या विस्फोटक भी लगाए जाते हैं।

यूक्रेन की एक थर्ड असाल्ट ब्रिगेड (थर्ड आर्मी कॉर्प्स), जिसे एनसी-13 कंपनी कहा जाता है, ने ऐसे 100 से ज्यादा ऑपरेशन किए हैं। इस यूनिट का काम ही इन रोबोट्स के जरिए दुश्मन की पोजीशन पर हमला करना है।

इन ऑपरेशंस में दुश्मन के बंकर, कमांड पोस्ट और अन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। साथ ही इन रोबोट्स की मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और घुसपैठ रोकने का काम भी किया गया।

एनसी-13 का कहना है कि अब 5-6 ग्राउंड कमिकाजे रोबोट्स और कॉम्बैट मॉड्यूल वाले रोबोट्स को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। इससे इन्फैंट्री असॉल्ट ग्रुप की जगह पूरी तरह रोबोट्स ले लेते हैं। दुश्मन अक्सर इसे इन्फैंट्री अटैक समझकर पोजीशन छोड़ देता है। वहीं, एक रोबोट ने तो बिना सैनिकों के 45 दिनों तक फ्रंटलाइन पर ड्यूटी भी की। (Ukraine Drone War Model)

कैसे हुआ पहला बड़ा रोबोटिक हमला

इस नई रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण साल 2025 में देखने को मिला। एक जगह पर यूक्रेनी सैनिकों ने दो बार हमला किया, लेकिन हर बार उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद ग्राउंड रोबोट्स का इस्तेमाल किया गया। चार रोबोट्स को दुश्मन की पोजीशन की तरफ भेजा गया, जिनमें भारी मात्रा में विस्फोटक लगे थे।

पहले रोबोट ने बंकर की एंट्री पर धमाका किया। दूसरे रोबोट ने वहां जाकर रास्ता बंद कर दिया। इसके बाद अंदर मौजूद सैनिकों ने हालात को समझते हुए सरेंडर कर दिया।

इस पूरी कार्रवाई में किसी भी सैनिक को सीधे लड़ाई में शामिल नहीं होना पड़ा। बाद में जब सैनिक वहां पहुंचे, तो बिना किसी गोलीबारी के इलाके पर कब्जा कर लिया गया।

इस मॉडल ने दक्षिणी मोर्चे पर फरवरी 2026 से अब तक बड़े क्षेत्र को आजाद कराया है। मंत्रालय के अनुसार, अब तक दसियों हजार अनमैन्ड ग्राउंड सिस्टम्स (UGVs) तैयार हो चुके हैं, जो सैनिकों की जगह ले सकते हैं।

ब्रिगेड ने इसे “दुनिया का पहला रोबोटिक असॉल्ट बताया, जिसमें कैदियों को बिना इन्फैंट्री के अरेस्ट किया गया।” वहीं, जेलेंस्की ने इसे एतिहासिक बताया था। (Ukraine Drone War Model)

हवाई ड्रोन और रोबोट्स का टीमवर्क

इस नए मॉडल में सिर्फ ग्राउंड रोबोट्स ही नहीं, बल्कि हवाई ड्रोन भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। ड्रोन पहले इलाके की तस्वीरें और वीडियो भेजते हैं, जिससे यह पता चलता है कि दुश्मन कहां है।

इसके बाद रोबोट्स को उसी दिशा में भेजा जाता है। ड्रोन लगातार ऊपर से नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत जानकारी देते रहते हैं।

इस तरह से जमीन और आसमान दोनों से एक साथ ऑपरेशन चलता है, जिससे सटीक हमला करना आसान हो जाता है। (Ukraine Drone War Model)

सैनिकों की भूमिका में बदलाव

इस सिस्टम के आने के बाद सैनिकों की भूमिका भी बदल रही है। अब उन्हें सीधे आगे बढ़कर हमला करने की जरूरत कम पड़ रही है। रोबोट्स पहले दुश्मन की पोजीशन को कमजोर करते हैं। उसके बाद सैनिक वहां पहुंचकर इलाके को सुरक्षित करते हैं। इससे जान का खतरा कम होता है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने 13 अप्रैल को डिफेंस इंडस्ट्री वर्कर्स डे पर कहा है कि कई जगहों पर रोबोट्स और ड्रोन की मदद से बिना किसी सैनिक नुकसान के दुश्मन की पोजिशंस पर कब्जा किया गया। वो भी बिना किसी इन्फैंट्री के और बिना किसी नुकसान के। उन्होंने 3 महीनों में 22,000 से ज्यादा फ्रंटलाइन ड्रोन मिशन्स का भी जिक्र किया। (Ukraine Drone War Model)

बड़े स्तर पर तैयार हो रहे रोबोट्स

यूक्रेन अब बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट्स और ड्रोन तैयार कर रहा है। बताया जा रहा है कि हजारों की संख्या में ये सिस्टम बनाए जा चुके हैं और लगातार उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। यूक्रेन में 280 से ज्यादा कंपनियां रोबोट/ड्रोन बना रही हैं। वहीं, इस साल 20,000 से ज्यादा UGVs का टारगेट है। इसके अलावा नॉर्वे-जर्मनी जैसे देशों से भी जॉइंट प्रोडक्शन हो रहा है।

इनमें अलग-अलग तरह के रोबोट शामिल हैं। कुछ केवल निगरानी के लिए हैं, कुछ सामान पहुंचाने के लिए और कुछ हमले के लिए बनाए गए हैं।

कुछ रोबोट्स में मशीन गन जैसे हथियार भी लगाए गए हैं, जिससे वे दुश्मन पर सीधा हमला कर सकते हैं।

तकनीक कैसे कर रही मदद

इन रोबोट्स और ड्रोन में एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें थर्मल कैमरे लगे होते हैं, जिससे रात में भी साफ नजर आता है।

इसके अलावा कई सिस्टम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम करते हैं, जिससे वे टारगेट को पहचान सकते हैं। इन्हें सैटेलाइट इंटरनेट और रेडियो सिस्टम के जरिए दूर से कंट्रोल किया जाता है। कई मामलों में एक ही ऑपरेटर कई रोबोट्स और ड्रोन को एक साथ कंट्रोल कर सकता है।

NC-13 कमांडर माइकोला “माकर” जिन्केविच कहते हैं कि रोबोट्स युद्ध का रुख बदल देंगे। मंत्रालय का मानना है कि ये यूनिट्स “लोगों को रिप्लेस” कर रही हैं।

यूक्रेन के इस नए मॉडल से यह साफ हो रहा है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब सीधे आमने-सामने लड़ाई की जगह मशीनों और ऑटोमेटेड सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

ड्रोन और रोबोट्स के जरिए पहले जानकारी जुटाई जाती है, फिर हमला किया जाता है और आखिर में सैनिक आगे बढ़ते हैं। इस पूरे सिस्टम को एक साथ जोड़कर ऑपरेशन किया जा रहा है। इस बदलाव ने युद्ध के मैदान में नई तरह की रणनीति को जन्म दिया है, जहां टेक्नोलॉजी और सैनिक दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। (Ukraine Drone War Model)

स्टेल्थ फ्रिगेट तारागिरी है एडवांस स्पॉटर ड्रोन से लैस, चलते जहाज पर भी कर सकता काम

INS Taragiri spotter drone integration

INS Taragiri spotter drone integration: भारतीय नौसेना के नए स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी के साथ अब एक स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन भी जोड़ा गया है। इस इंटीग्रेशन को नौसेना की निगरानी और ऑपरेशन क्षमता में एक अहम बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि यह शिप को डिस्ट्रिब्यूटेड आईएसआर नोड में बदल देता है, जिससे समुद्र और आसमान दोनों से एक साथ जानकारी जुटाना आसान हो जाता है।

आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना का नया स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे 3 अप्रैल को विशाखापट्टनम में कमीशन किया गया था। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनने वाले नीलगिरी क्लास के सात फ्रिगेट्स की सीरीज का चौथा जहाज है। इस जहाज को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में तैयार किया गया है।

करीब 6,670 टन वजन वाला यह जहाज मल्टी-रोल कैपेबिलिटी के साथ आता है। इसमें एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन करने की क्षमता है। स्टेल्थ डिजाइन की वजह से यह दुश्मन के रडार से आसानी से बच सकता है। इसके साथ ही इसमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, एडवांस्ड रडार और सोनार सिस्टम जैसे आधुनिक उपकरण लगे हैं। (INS Taragiri spotter drone integration)

INS Taragiri spotter drone integration: क्या है मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन

आईएनएस तारागिरी के साथ जिस मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन को जोड़ा गया है, वह पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। यह एक मल्टी-कॉप्टर यूएवी है, जिसे खास तौर पर समुद्र में इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है।

इसका डिजाइन ऐसा बनाया गया है कि अगर इसमें कोई खराबी आती है, तो इसके पार्ट्स जल्दी बदले जा सकते हैं। इसमें कार्बन फाइबर और हल्की धातु का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह मजबूत के साथ हल्का भी रहता है।

इस ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि यह चलते हुए जहाज से भी उड़ान भर सकता है और उसी पर वापस उतर सकता है। आम तौर पर ड्रोन को स्थिर प्लेटफॉर्म की जरूरत होती है, लेकिन यह सिस्टम समुद्र में 20 नॉट्स की स्पीड पर चलते जहाज पर भी काम कर सकता है।

यह ड्रोन लगभग 72 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है। तेज हवा में भी काम करने के लिए इसे मजबूत बनाया गया है और यह लगभग 16 मीटर प्रति सेकंड की हवा को झेल सकता है, जो समुद्र के हालात के हिसाब से जरूरी है।

यह ड्रोन रियल टाइम वीडियो और तस्वीरें भेज सकता है, जिससे दूर तक निगरानी करना आसान हो जाता है। इसकी रेंज करीब 20 किलोमीटर तक है और यह एक बार में करीब एक घंटे तक उड़ान भर सकता है। यह स्पॉटर 90 से 120 मिनट तक काम कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना ने इस ड्रोन की अहमियत को देखते हुए 2021 में करीब 30 यूनिट्स का ऑर्डर दिया था और बाद में 60 और ड्रोन मंगाए। इस तरह की तकनीक दुनिया में बहुत कम कंपनियों के पास है और सागर डिफेंस भी उनमें शामिल है। (INS Taragiri spotter drone integration)

कैसे काम करता है यह सिस्टम

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन का यह संयोजन एक तरह से समुद्र और आसमान के बीच तालमेल बनाता है। जहाज के अपने रडार और सेंसर की एक सीमा होती है, लेकिन ड्रोन उस सीमा से आगे जाकर निगरानी कर सकता है।

इसमें एडवांस कैमरे इलेक्ट्रो-ऑप्टिक कैमरा और थर्मल इमेजर लगे होते हैं। इनकी मदद से यह दिन और रात दोनों समय टारगेट को देख सकता है। यह लाइव वीडियो भेज सकता है, तस्वीरें ले सकता है और आसपास की पूरी स्थिति की जानकारी देता है। कुछ वेरिएंट में जहाजों की पहचान करने वाला सिस्टम भी लगाया गया है।

ड्रोन से मिलने वाला यह डेटा सीधे जहाज तक पहुंचता है, जिससे आसपास की स्थिति की बेहतर समझ बनती है। इससे ऑपरेशन के दौरान फैसले लेने में मदद मिलती है और जहाज की पहुंच भी बढ़ जाती है।

यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोमेटेड तरीके से काम कर सकता है। यानी यह खुद ही उड़ान भर सकता है, मिशन पूरा कर सकता है और वापस जहाज पर उतर सकता है। इसमें जियोफेंसिंग और फॉलो-मी जैसे फीचर्स भी होते हैं, जिससे इसे अलग-अलग कामों में इस्तेमाल करना आसान हो जाता है।

इसे जहाज के कंट्रोल सिस्टम से चलाया जा सकता है। इसके अलावा मार्कोस कमांडोज इसे हेंड हील्ड डिवाइस से भी ऑपरेट कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इसका कंट्रोल एक जहाज से दूसरे जहाज को भी दिया जा सकता है। इसमें एंटी-जैमिंग तकनीक भी होती है, जिससे दुश्मन इसके सिग्नल को बाधित नहीं कर पाता।

ऑपरेशन में क्या फायदा

इस सिस्टम के जरिए समुद्र में लगातार निगरानी रखना आसान हो जाता है। जहाज को हर समय अपने आसपास की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। इससे संदिग्ध जहाजों, तस्करी या अन्य गतिविधियों पर नजर रखना संभव होता है।

ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर ऐसे इलाकों में उपयोगी होता है, जहां समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा होता है और हर जगह एक साथ नजर रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इस तरह का सिस्टम एक जहाज को ज्यादा इलाके को कवर करने में सक्षम बनाता है।

यह ड्रोन जहाज के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करता है। इसका मतलब है कि जहाज की ताकत और निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। जहाज के रडार की जो सीमा होती है, यह ड्रोन उससे आगे जाकर जानकारी देता है, जिससे लगातार निगरानी संभव होती है। (INS Taragiri spotter drone integration)

पहले भी हुआ इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल मार्च 2024 में पहले भी नौसेना के ऑपरेशन में किया जा चुका है। सोमाली पाइरेट्स को रोकने के लिए एंटी-पाइरेसी मिशन के दौरान इन ड्रोन ने आईएनएस कोलकाता को रियल टाइम जानकारी देने में अहम भूमिका निभाई थी। इससे मार्कोस को स्थिति समझने और कार्रवाई करने में आसानी हुई थी। हालांकि पाइरेट्स ने ड्रोन पर फायरिंग भी की थी, बावजूद इसके ड्रोन काम करता रहा।

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन दोनों ही स्वदेशी तकनीक पर आधारित हैं। जहाज के निर्माण में बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियों का योगदान रहा है, वहीं ड्रोन भी देश में ही डिजाइन और विकसित किया गया है। (INS Taragiri spotter drone integration)

Operation Tiranga: इस नई सीक्रेट वॉर स्ट्रैटेजी ने रखी सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की नींव, जानें क्या है यह ऐतिहासिक टेबल टॉप एक्सरसाइज

Operation Tiranga Explained: How India’s Theatre Command Plan Will Transform Armed Forces Structure

Operation Tiranga: अगले कुछ महीनों में भारतीय सेनाओं के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा रक्षा सुधार माना जाएगा। इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स को सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन थिएटर कमांड्स को आकार देने में सबसे अहम भूमिका निभाई है ऑपरेशन तिरंगा ने।

नाम भले ही किसी सैन्य अभियान जैसा लगे, लेकिन यह असल में एक टेबल टॉप एक्सरसाइज (TTX) थी, जिसमें तीनों सेनाओं ने बैठकर भविष्य के युद्ध का पूरा खाका तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया में जनरल अनिल चौहान की अगुवाई में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने मिलकर थिएटर कमांड का फॉर्मेट तय किया।

यह एक्सरसाइज कई महीनों तक चली और अप्रैल 2026 में इसका मुख्य काम पूरा हो गया। इसमें सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि युद्ध के समय तीनों सेनाएं एक साथ कैसे काम करें और फैसले जल्दी कैसे लिए जाएं।

Operation Tiranga पर क्या कहा सीडीएस ने

अप्रैल 2026 में बेंगलुरु में हुए रण संवाद कार्यक्रम के दौरान सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने पहली बार खुलकर “ऑपरेशन तिरंगा” का नाम लिया। उन्होंने साफ शब्दों में बताया कि यह कोई युद्ध अभ्यास नहीं था, बल्कि तीनों सेनाओं के बीच थिएटर कमांड बनाने को लेकर गहन चर्चा और योजना बनाने की प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन तिरंगा” के तहत जो भी बातचीत और विचार-विमर्श चल रहा था, वह अब पूरा हो चुका है। यानी सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच जो बड़े मुद्दे थे, उन पर चर्चा खत्म हो गई है और एक तरह से सहमति बन चुकी है।

जनरल चौहान ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि थिएटर कमांड बनने के बाद सर्विस चीफ्स की कुछ शक्तियां कम हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद तीनों सेनाएं इस बदलाव के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। यानी तीनों सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर देश के बड़े हित के लिए एक साथ काम करने को तैयार हैं।

जनरल चौहान ने सबसे अहम बात यह कही कि थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर तीनों सेनाओं के बीच कोई मतभेद नहीं है। उनके मुताबिक, सभी सर्विस चीफ इस बात से सहमत हैं कि भविष्य के युद्ध के लिए यह सिस्टम जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी सेवा प्रमुख यह नहीं कह रहा कि थिएटर कमांड नहीं बनना चाहिए।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय है, लेकिन ये मतभेद केवल इस बात को लेकर हैं कि इसे लागू कैसे किया जाए। इसे उन्होंने “मैनिफेस्टेशन” यानी कार्यान्वयन का हिस्सा बताया।

उनके अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो, किस क्रम में हो और संसाधनों का बंटवारा कैसे किया जाए। खास तौर पर एयर एसेट्स यानी फाइटर जेट और दूसरे हवाई संसाधनों को लेकर चर्चा ज्यादा हुई है। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि ये सभी मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं।

सीडीएस ने यह भी बताया कि तीनों सेनाओं की तरफ से जो काम होना था, वह लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं और इसे जल्द ही रक्षा मंत्री को सौंप दिया जाएगा, जिसके बाद इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

क्या है Operation Tiranga

ऑपरेशन तिरंगा को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई जमीनी ऑपरेशन नहीं था। यह ऑपरेशन एक “टेबल टॉप एक्सरसाइज” यानी टीटीएक्स के रूप में किया गया, जहां असली युद्ध नहीं लड़ा गया, बल्कि अलग-अलग संभावित परिस्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई। इसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने हिस्सा लिया और यह समझने की कोशिश की कि भविष्य में अगर एक साथ कई तरह के खतरे सामने आएं, तो उनसे कैसे निपटा जाए।

इस एक्सरसाइज में अलग-अलग हालात बनाए गए, जैसे अगर एक साथ दो सीमाओं पर तनाव बढ़ जाए या समुद्र में दुश्मन सक्रिय हो जाए, तो तीनों सेनाएं कैसे प्रतिक्रिया देंगी। इन सभी परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा हुई और हर स्थिति में फैसले लेने का तरीका तय किया गया।

कैसे हुई टेबल टॉप एक्सरसाइज

ऑपरेशन तिरंगा के दौरान कई तरह के काल्पनिक हालात तैयार किए गए। इनमें चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ युद्ध, समुद्री खतरे, साइबर हमले और स्पेस से जुड़े खतरे शामिल थे। इन सभी स्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई कि अगर ऐसा होता है तो कौन क्या करेगा और कैसे करेगा।

इस प्रक्रिया में “रोल प्ले” भी किया गया। यानी कुछ अधिकारियों को थिएटर कमांडर की भूमिका दी गई, कुछ को डिप्टी कमांडर की और कुछ को सर्विस चीफ की भूमिका में रखा गया। इसके जरिए यह समझा गया कि आदेश कैसे दिए जाएंगे, किसके पास कितना अधिकार होगा और किस तरह से संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

मल्टी-डोमेन युद्ध पर फोकस

इस दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि केवल एक डोमेन यानी जमीन, हवा या समुद्र के आधार पर अब युद्ध नहीं जीता जा सकता। सभी डोमेन्स को एक साथ जोड़कर ही काम करना होगा। इसमें साइबर हमले, स्पेस टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जानकारी की लड़ाई भी शामिल होती है। यही वजह है कि इसे मल्टी-डोमेन अप्रोच कहा जाता है।

ऑपरेशन तिरंगा में इस बात पर खास ध्यान दिया गया कि कैसे एक कमांडर एक साथ सभी डोमेन्स को समझ सके और उनका इस्तेमाल कर सके। उदाहरण के तौर पर, अगर जमीन पर सेना आगे बढ़ रही है, तो उसी समय वायुसेना एयर सपोर्ट दे रही हो और नौसेना समुद्र में दुश्मन की सप्लाई रोक रही हो। (Operation Tiranga)

नए थिएटर कमांड्स की तैयारी

आज भारतीय सेनाएं अलग-अलग कमांड के तहत काम करती हैं। कुल मिलाकर करीब 17 कमांड हैं, जिनमें आर्मी, नेवी और वायुसेना की अपनी-अपनी व्यवस्था है। हर सर्विस का अपना अलग कमांड सिस्टम होता है। जैसे आर्मी का वेस्टर्न कमांड पाकिस्तान सीमा को देखता है, नॉर्दर्न कमांड चीन सीमा को संभालता है, जबकि वायुसेना का वेस्टर्न एयर कमांड जरूरत पड़ने पर एयर सपोर्ट देता है।

इस पूरे अभ्यास के बाद तीन बड़े थिएटर कमांड का प्रस्ताव तैयार किया गया। पहला वेस्टर्न थिएटर, जो पाकिस्तान पर फोकस करेगा। दूसरा नॉर्दर्न या ईस्टर्न थिएटर, जो चीन से जुड़े क्षेत्रों को संभालेगा। तीसरा मैरिटाइम थिएटर, जो समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालेगा।

इन तीनों थिएटर में अलग-अलग सेवाओं के अधिकारी कमांडर बनेंगे, लेकिन उनके साथ दूसरी सेवाओं के अधिकारी भी डिप्टी के रूप में काम करेंगे। इससे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बना रहेगा।

इसके अलावा एक और प्रस्ताव सामने आया, जिसमें वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नई पोस्ट बनाने की बात कही गई है, जो ऑपरेशन के स्तर पर कॉर्डिनेशन में मदद करेगा।

इसके अलावा यह भी तय हुआ कि कुछ खास संसाधन, जैसे एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट या बड़े सर्विलांस सिस्टम, सीधे वायुसेना के पास ही रहेंगे, ताकि जरूरत के हिसाब से उन्हें कहीं भी भेजा जा सके। (Operation Tiranga)

कौन लेगा ऑपरेशनल फैसले

इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव फैसले लेने के तरीके में आएगा। अभी किसी ऑपरेशन के लिए अलग-अलग स्तर पर अनुमति लेनी पड़ती है। थिएटर कमांड में यह प्रक्रिया छोटी हो जाएगी।

इससे समय की बचत होगी और किसी भी आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। साथ ही, अलग-अलग संसाधनों का बेहतर उपयोग भी हो पाएगा, क्योंकि सब कुछ एक ही कमांड के तहत होगा।

क्योंकि तीनों सेनाएं अभी अपने-अपने संसाधनों का इस्तेमाल अलग-अलग करती हैं। इससे कई बार एक ही तरह के संसाधन अलग-अलग जगहों पर उपयोग होते हैं, जिससे खर्च भी बढ़ता है और प्रभाव भी कम होता है।

थिएटर कमांड के जरिए सभी संसाधनों को एक साथ लाकर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम भी मजबूत होगा और ऑपरेशन में कोई रुकावट नहीं आएगी। (Operation Tiranga)

ट्रेनिंग और तैयारी में बदलाव

थिएटर कमांड लागू होने के बाद सैनिकों की ट्रेनिंग में भी बदलाव आएगा। अब उन्हें सिर्फ अपने डोमेन की नहीं, बल्कि दूसरे डोमेन्स की भी जानकारी दी जाएगी।

इससे सैनिक और अधिकारी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कि युद्ध के समय किस तरह अलग-अलग सिस्टम एक साथ काम करते हैं। इससे उनकी तैयारी भी मजबूत होगी और ऑपरेशन के दौरान गलतियों की संभावना कम होगी।

अंडमान-निकोबार कमांड से मिली सीख

भारत में पहले से एक जॉइंट कमांड मौजूद है, जिसे अंडमान-निकोबार कमांड कहा जाता है। इसे मॉडल के तौर पर देखा गया।

यह कमांड तीनों सेनाओं को एक साथ लेकर काम करता है और लंबे समय से सक्रिय है। ऑपरेशन तिरंगा में इसके अनुभव का इस्तेमाल किया गया, ताकि नई व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। (Operation Tiranga)

कमांड और कंट्रोल सिस्टम में बदलाव

थिएटर कमांड के साथ कमांड और कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा। इसमें कम्युनिकेशन, डेटा और इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़ा जाएगा।

इसका मतलब है कि जमीन पर मौजूद सैनिक से लेकर ऊपर बैठे कमांडर तक, सभी को एक ही समय में एक जैसी जानकारी मिलेगी। इससे फैसले लेने में आसानी होगी।

थिएटर कमांड लागू होने के बाद क्या करेंगे सर्विस चीफ

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने साफ बताया है कि थिएटर कमांड लागू होने के बाद आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ की भूमिका बदल जाएगी। पहले ये चीफ्स ऑपरेशन भी संभालते थे और अपनी-अपनी सेना की तैयारी भी करते थे, लेकिन अब ये दोनों काम अलग हो जाएंगे।

अब युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। यानी किसी इलाके में अगर ऑपरेशन होता है, तो वहां एक ही कमांडर तीनों सेनाओं को मिलाकर काम करेगा।

थिएटर कमांड बनने के बाद सेवा चीफ्स का मुख्य काम अपनी-अपनी सेना को तैयार रखना होगा। इसे आसान भाषा में “रेज, ट्रेन और सस्टेन” कहा जाता है। (Operation Tiranga)

रेज का मतलब है नई यूनिट बनाना, भर्ती करना और नए हथियार व उपकरण शामिल करना। ट्रेन का मतलब है सैनिकों और अधिकारियों को अच्छी ट्रेनिंग देना, ताकि वे हर स्थिति में तैयार रहें। सस्टेन का मतलब है सेना को हमेशा तैयार रखना, जिसमें हथियारों की मरम्मत, गोला-बारूद, ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की सप्लाई शामिल है।

इसके अलावा सेवा चीफ्स अपने-अपने फोर्स की परंपरा और सिस्टम को बनाए रखेंगे। वे जरूरत पड़ने पर थिएटर कमांडर को तैयार और ट्रेन की हुई फोर्स उपलब्ध कराएंगे। साथ ही, वे रणनीतिक स्तर पर सीडीएस की मदद भी करेंगे।

पहले सेवा चीफ्स ही ऑपरेशन भी चलाते थे और सेना भी तैयार करते थे, जिससे कई बार तालमेल की कमी और देरी होती थी। अब ऑपरेशन और तैयारी दोनों काम अलग हो जाएंगे, जिससे काम ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से हो सकेगा। (Operation Tiranga)

क्या होगा स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड (SFC) का?

थिएटर कमांड बनने की प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड यानी SFC का क्या होगा। इस बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। लेकिन सूत्रों का कहना है, एसएफसी को अलग ही रखा जाएगा। इसे थिएटर कमांड में शामिल नहीं किया जाएगा। क्योंकि चीन और रूस में भी स्ट्रेटेजिक फोर्सेस अलग-अलग हैं।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड की स्थापना 2003 में की गई थी। इसका मुख्य काम भारत के परमाणु हथियारों से जुड़ी पूरी व्यवस्था को संभालना है। इसमें जमीन से छोड़ी जाने वाली मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलें और हवाई माध्यम से इस्तेमाल होने वाले परमाणु हथियार शामिल होते हैं। इनमें अग्नि मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें (SLBM), और एयर-ड्रॉप्ड न्यूक्लियर वेपंस शामिल हैं।

फिलहाल स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड के वर्तमान कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल दिनेश सिंह राणा हैं, जो सीडीएस को रिपोर्ट करते हैं।

यह कमांड पहले से ही तीनों सेनाओं का संयुक्त सिस्टम है, यानी आर्मी, नेवी और वायुसेना, तीनों की न्यूक्लियर ताकत इसमें शामिल रहती है। इसका कंट्रोल बहुत ही उच्च स्तर पर होता है और यह सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के दिशा-निर्देशों के तहत काम करता है।

सूत्रों ने बताया कि थिएटर कमांड का काम सामान्य युद्ध यानी जमीन, हवा और समुद्र में होने वाले ऑपरेशन को संभालना होगा। लेकिन स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड का काम इससे अलग और ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि यह परमाणु हथियारों से जुड़ा है। (Operation Tiranga)

इसी वजह से इसे किसी क्षेत्रीय थिएटर कमांडर के अधीन नहीं रखा जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो कमांड और कंट्रोल सिस्टम में जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड को अलग ही रखा जाएगा, ताकि इसका कंट्रोल सीधे राष्ट्रीय स्तर पर बना रहे।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड पहले की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा। यह परमाणु हथियारों की सुरक्षा, नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की तैयारी से जुड़ा रहेगा। थिएटर कमांडर्स को इसके संसाधनों पर सीधा कंट्रोल नहीं मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि अगर किसी स्थिति में कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ेगी, तो यह काम सीडीएस के जरिए किया जाएगा। यानी स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड और थिएटर कमांड्स के बीच तालमेल रहेगा, लेकिन कंट्रोल अलग-अलग रहेगा। (Operation Tiranga)

थिएटर कमांड बनने के बाद कितने 4-स्टार अफसर

थिएटर कमांड लागू होने के बाद भारतीय सेना में 4-स्टार अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी। अभी स्थिति यह है कि सिर्फ चार ही 4-स्टार अधिकारी होते हैं, जिनमें एक सीडीएस, एक आर्मी चीफ, एक नेवी चीफ और एक एयर चीफ शामिल हैं।

लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुल 8 चार-स्टार अधिकारी होंगे। इनमें सबसे ऊपर सीडीएस होंगे। उनके अलावा एक नया पद बनेगा, जिसे वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (VCDS) कहा जाएगा। यह भी 4-स्टार रैंक का होगा।

इसके बाद तीनों सेनाओं के प्रमुख यानी आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ पहले की तरह 4-स्टार रहेंगे। साथ ही तीन नए थिएटर कमांडर भी बनाए जाएंगे, जो अलग-अलग इलाकों की कमान संभालेंगे और ये भी 4-स्टार रैंक के होंगे। इस तरह कुल मिलाकर 8 बड़े अधिकारी होंगे। (Operation Tiranga)

कानपुर बनेगा एविएशन हब, जीई एयरोस्पेस से मिलेगा यूपी डिफेंस कॉरिडोर को ग्रोथ का “इंजन”!

GE Aerospace Tejas Engine Depot
GE Aerospace Tejas Engine Depot India: Kanpur Set to Become Aviation Hub Boosting UP Defence Corridor

GE Aerospace Tejas Engine Depot: उत्तर प्रदेश अब डिफेंस और एविएशन सेक्टर में भी ऊंची छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पोस और भारतीय वायुसेना के बीच तेजस के इंजन को लेकर हाल ही में अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत देश में ही एफ-404-आईएन20 इंजन के लिए एक इन-कंट्री डिपो फैसिलिटी बनाई जाएगी, जो तेजस एलसीए फाइटर जेट्स के इंजन की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम करेगी। सूत्रों का कहना है कि यह फैसिलिटी उत्तर प्रदेश में लगाई जा सकती है।

इस फैसिलिटी को भारतीय वायुसेना तैयार करेगी, जबकि जीई एयरोस्पेस तकनीकी सहयोग देगा। इस कदम को यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए एक बड़े बूस्ट के तौर पर देखा जा रहा है।

GE Aerospace Tejas Engine Depot: क्या है नया डिपो प्रोजेक्ट

इस समझौते का मुख्य उद्देश्य यह है कि भारत में ही तेजस एमके1/एमके1ए के इंजन रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा तैयार हो सके। अभी तक जब भी तेजस फाइटर जेट के इंजन में बड़ी खराबी आती थी, तो उसे विदेश भेजना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगता था और कई विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहते थे।

अब इस नई डिपो फैसिलिटी के बनने के बाद यह काम देश के अंदर ही हो सकेगा। इससे रिपेयर का समय कम होगा और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशनल रह पाएंगे। इस फैसिलिटी का पूरा ऑपरेशन भारतीय वायुसेना के हाथ में होगा। जबकि जीई एयरोस्पेस ट्रेनिंग, तकनीकी सपोर्ट, स्पेयर पार्ट्स और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगा।

समय पर मिलेंगे इंजन

जीई एरोस्पेस की डिफेंस और सिस्टम्स की सेल्स और बिजनेस डेवलपमेंट की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लैहर्टी ने कहा,भारतीय सशस्त्र बलों की मदद करना उनकी कंपनी की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के तहत यह साझेदारी आगे बढ़ाई जा रही है, ताकि तेजस विमान के इंजनों की देखभाल और सपोर्ट की क्षमता भारत में ही मजबूत हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि नई डिपो फैसिलिटी के जरिए भारतीय वायुसेना को एफ-404 आईएन20 इंजन समय पर उपलब्ध रहेंगे और उन्हें आधुनिक तकनीक का सीधा फायदा मिलेगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

तेजस फ्लीट को कैसे मिलेगा फायदा

एफ-404-आईएन20 वही इंजन है, जो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एलएएल) तेजस फाइटर जेट में लगाया जाता है। यह भारत का स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है। इंजन की समय पर मरम्मत और मेंटेनेंस न होने की वजह से कई बार विमान उड़ान के लिए तैयार नहीं हो पाते थे। अब डिपो फैसिलिटी के जरिए यह समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। इसका सीधा असर यह होगा कि वायुसेना के पास ज्यादा विमान एक साथ उपलब्ध रहेंगे और ऑपरेशनल क्षमता बेहतर बनी रहेगी। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

यूपी डिफेंस कॉरिडोर को मिलेगी मजबूती

उत्तर प्रदेश में बना डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर देश के बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक है। यह कॉरिडोर छह अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है, जिसमें अलीगढ़, आगरा, चित्रकूट, झांसी, लखनऊ और कानपुर शामिल हैं।

इन सभी में कानपुर को सबसे अहम नोड माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और पहले से ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत बेस मौजूद है। सूत्रों का कहना है कि जीई एरोस्पेस अपनी नई फैसिलिटी के लिए कानपुर नोड को चुन सकता है।

इसकी वजह है कि कानपुर में पुराने समय से ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां काम कर रही हैं, जहां हथियार और सैन्य उपकरण बनाए जाते रहे हैं। यहां आयुध निर्माणी कानपुर, लघु शस्त्र निर्माणी, फील्ड गन निर्माणी जैसी कई ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां पहले से ही मौजूद हैं। इसके साथ ही यहां के लोगों को मेटल वर्क, लेदर और टेक्सटाइल का अच्छा अनुभव है, जिससे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए तैयार स्किल्ड वर्कफोर्स और इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

चकेरी में है बेस रिपेयर डिपो 

सूत्रों ने बताया कि कानपुर के चकेरी इलाके में भारतीय वायुसेना और एचएएल की बड़ी मरम्मत और मेंटेनेंस सुविधाएं भी हैं। चकेरी एयर फोर्स स्टेशन पर वायुसेना के दो बड़े वर्कशॉप हैं, जिन्हें बेस रिपेयर डिपो कहा जाता है। पहला है 1 बीआरडी, जहां मुख्य रूप से ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे एएन-32 की मरम्मत और ओवरहॉल किया जाता है। यहां विमान के इंजन, बॉडी और सिस्टम्स की पूरी जांच और सुधार किया जाता है, ताकि वह लंबे समय तक सुरक्षित उड़ान भर सके। दूसरा है 4 बीआरडी, जहां एयरक्राफ्ट के इंजन की मरम्मत होती है। यहां मिग और मिराज जैसे फाइटर जेट्स में इस्तेमाल होने वाले इंजनों की ओवरहॉलिंग की जाती रही है।

इसके अलावा चकेरी में ही एचएएल का ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डिविजन भी है। यहां डॉर्नियर-228 जैसे विमानों का निर्माण भी होता है और उनकी रिपेयरिंग भी की जाती है। इसके अलावा एएन-32 और दूसरे ट्रांसपोर्ट विमानों की मेंटेनेंस का काम भी यहीं होता है।

चकेरी की खासियत यह है कि यहां पहले से ही स्किल्ड वर्कफोर्स और पुरानी डिफेंस फैक्ट्री का अनुभव मौजूद है। आजादी के बाद से यह जगह एयरक्राफ्ट रिपेयर का बड़ा केंद्र रही है।

तेजी से बढ़ रहा निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर

कानपुर यूपी डिफेंस कॉरिडोर का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और यही वजह है कि इसे इस कॉरिडोर का “इंजन” कहा जाता है। अब तक यहां करीब 12,683 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जो बाकी सभी नोड्स से ज्यादा है।

यहां नए-नए डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है। नरवल इलाके में बड़े पैमाने पर जमीन डेवलप की गई है, जहां कंपनियों को प्लॉट दिए जा रहे हैं। इसके अलावा यहां सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े प्रोजेक्ट्स भी शुरू किए गए हैं। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान के जुड़ने से रिसर्च और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को भी बढ़ावा मिल रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

इसके अलावा कानपुर में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी तेजी से निवेश किया है। यहां बड़े प्राइवेट प्रोजेक्ट्स भी तेजी से आ रहे हैं। अदाणी डिफेंस एंड एरोस्पेस का करीब 1,500 करोड़ रुपये का प्लांट कानपुर में शुरू हो चुका है, जहां मिसाइल और गोला-बारूद बनाए जा रहे हैं। इसे दक्षिण एशिया के बड़े डिफेंस प्लांट्स में गिना जाता है।

यह यूनिट सालाना करीब 30 करोड़ राउंड छोटे हथियारों के लिए बना सकती है। इस तरह हथियार और गोला-बारूद दोनों का निर्माण देश में ही हो रहा है, जिससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत हो रही है। हाल ही में अदाणी डिफेंस की तरफ से सेना को डिलीवर की गईं प्रहार लाइट मशीन गन की गोलियां भी यहीं बनाई जा रही हैं।

कानपुर में टेक्नोलॉजी और रिसर्च पर भी काम हो रहा है। आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जा रहा है। शिवली इलाके में डिफेंस पार्क की योजना है, जहां बैलिस्टिक मैटेरियल और डिफेंस टेक्सटाइल से जुड़े प्रोजेक्ट्स लगाए जाएंगे।

इसमें बड़े डिफेंस प्लांट लगाए जा रहे हैं, जहां मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरण बनाए जा रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स की वजह से न सिर्फ उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। सरकार की तरफ से भी इन कंपनियों को पॉलिसी सपोर्ट, टैक्स में छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा दी जा रही है, जिससे निवेश को बढ़ावा मिल रहा है।

सीधे शब्दों में कहें तो पुरानी फैक्ट्रियों और नई प्राइवेट कंपनियों के निवेश की वजह से कानपुर सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है और पूरे डिफेंस कॉरिडोर को रफ्तार दे रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

सेना के कई प्लेटफॉर्म्स में जीई के इंजन

कंपनी भारत में एविएशन सेक्टर को मजबूत बनाने पर भी काम कर रही है। डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में लगातार सहयोग किया जा रहा है। कंपनी ने भारत में कई ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाए हैं, जिनसे हजारों लोगों को तकनीकी कौशल सिखाया गया है।

तेजस के अलावा भी जीई एरोस्पेस के इंजन भारतीय नौसेना और वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल हो रहे हैं। इनमें पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और एएच-64 अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। इसके अलावा एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और आईएनएस जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर में भी लगाए गए हैं।

इसके साथ ही, जीई और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ‘तेजस एमके2’ के लिए भारत में एफ414 इंजनों का संयुक्त उत्पादन भी करेंगे, जिसमें 80% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल होगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

रक्षा मंत्रालय की बड़ी मंजूरी, ‘वीराज’ एंटी-टैंक स्मार्ट माइन और एयर-ड्रॉप्ड ड्रोन स्वार्म सिस्टम को दी हरी झंडी!

Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System
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Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System: रक्षा मंत्रालय ने ‘मेक-II’ कैटेगरी के तहत दो नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। जिसके तहत एंटी टैंक माइन ‘वीराज’ और एयर-ड्रॉप्ड कैनिस्टराइज्ड स्वार्म सिस्टम को डेवलप किया जाएगा। इन दोनों प्रोजेक्ट्स को ‘मेक-II’ कैटेगरी के तहत इन-प्रिंसिपल अप्रूवल यानी शुरुआती मंजूरी दी गई है। जिसके बाद अब देश की कंपनियां इन सिस्टम्स को डिजाइन और डेवलप करने का काम शुरू कर सकती हैं। ये दोनों सिस्टम सेना और वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं और इनमें खास तौर पर स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया गया है।

Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System: क्या है मेक-II और क्यों अहम है

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मेक-II कैटेगरी क्या होती है। यह डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिजर का हिस्सा है जिसमें सरकार कंपनियों को सीधे पैसे नहीं देती, बल्कि कंपनियां खुद अपने खर्च पर प्रोटोटाइप यानी शुरुआती मॉडल तैयार करती हैं।

अगर वह सफल होता है और सेना की जरूरतों को पूरा करता है, तो बाद में उसी कंपनी को बड़े स्तर पर प्रोडक्शन का ऑर्डर मिल सकता है। इस मॉडल का मकसद यह है कि देश में नई टेक्नोलॉजी डेवलप हो और विदेशों पर निर्भरता कम हो।

इसमें एक शर्त यह भी होती है कि कम से कम 50 फीसदी तकनीक और सामग्री भारत में ही तैयार होनी चाहिए। इसी वजह से इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम कदम माना जाता है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

क्या है वीराज’ एंटी-टैंक माइन

‘वीराज’ एंटी-टैंक माइन का इस्तेमाल दुश्मन के टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों को रोकने के लिए किया जाएगा। अभी तक सेना मुख्य रूप से जमीन पर हाथ से या मशीन के जरिए माइंस बिछाती रही है। जिसमें समय लगता है और कई बार जोखिम भी होता है, क्योंकि सैनिकों को दुश्मन के करीब जाकर यह काम करना पड़ता है।

वहीं नई ‘वीराज’ माइन को ज्यादा एडवांस बनाने की योजना है। इसमें सेंसर आधारित सिस्टम हो सकता है, जो टैंक या भारी वाहन की हलचल को पहचान सके। इसके अलावा इसमें सेल्फ-न्यूट्रलाइजेशन जैसी क्षमता भी हो सकती है, यानी एक तय समय के बाद यह खुद ही डिएक्टिवेट हो जाए।

इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि माइन्स को सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि ड्रोन या अन्य सिस्टम के जरिए भी तेजी से लगाया जा सकेगा। इससे सेना को किसी एरिया को जल्दी से ब्लॉक करने में मदद मिलेगी, जिसे सैन्य भाषा में ‘एरिया डिनायल’ कहा जाता है। इस तरह के सिस्टम से खास तौर पर सीमावर्ती इलाकों में दुश्मन के आगे बढ़ने की गति को रोका जा सकता है।

पहले कैसे बिछाई जाती थीं माइंस

अब तक माइंस बिछाने का तरीका काफी पारंपरिक रहा है। सैनिक या तो खुद जाकर माइंस लगाते थे या फिर विशेष वाहन के जरिए इन्हें जमीन पर फैलाया जाता था। इसमें समय ज्यादा लगता था और कई बार दुश्मन को पहले ही इसका अंदाजा हो जाता था। इसके अलावा पुरानी माइंस में स्मार्ट फीचर्स नहीं होते थे, जिससे उन्हें हटाना या इनएक्टिव करना भी आसान हो जाता था। नई ‘वीराज’ माइन इन कमियों को दूर करने की दिशा में एक कदम मानी जा रही है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

क्या है ड्रोन स्वार्म सिस्टम

दूसरा प्रोजेक्ट एयर-ड्रॉप्ड कैनिस्टराइज्ड स्वार्म सिस्टम यानी एडीसी-एस से जुड़ा है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें एक साथ कई ड्रोन हवा में छोड़े जा सकते हैं और वे मिलकर हमला कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, एक बड़ा विमान हवा में एक कंटेनर गिराएगा और उस कंटेनर के अंदर से कई छोटे-छोटे ड्रोन बाहर निकलेंगे। ये ड्रोन अलग-अलग दिशा में जाकर अपने-अपने टारगेट पर हमला कर सकते हैं। जिसे इसे स्वार्म टेक्नोलॉजी कहा जाता है। इसमें ड्रोन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और मिलकर काम करते हैं। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस सिस्टम को बड़े ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-17, सी-130 या सी-295 से इस्तेमाल किया जा सकता है। विमान सुरक्षित दूरी से ही इस कैनिस्टर को गिराएगा और उसके बाद अंदर मौजूद ड्रोन एक्टिव होकर अपने टारगेट की ओर बढ़ेंगे।

इन ड्रोनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे वे बिना जीपीएस के भी काम कर सकें। यह खास तौर पर तब जरूरी होता है जब दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम कर देता है। हर ड्रोन अपने साथ विस्फोटक ले जा सकता है और सटीक तरीके से टारगेट पर हमला कर सकता है।

अभी तक लंबी दूरी से हमला करने के लिए फाइटर जेट्स या मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था। फाइटर जेट्स को दुश्मन के इलाके के करीब जाना पड़ता था, जिससे खतरा बढ़ जाता था। वहीं, मिसाइलें महंगी होती हैं और हर स्थिति में उनका इस्तेमाल आसान नहीं होता। ड्रोन स्वार्म सिस्टम इन दोनों समस्याओं का समाधान देता है। इसमें एक साथ कई छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जो दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कन्फ्यूज्ड कर सकते हैं।

स्वार्म टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। इसमें कई ड्रोन एक साथ काम करते हैं और दुश्मन के सिस्टम को ओवरलोड कर देते हैं। अगर दुश्मन एक-दो ड्रोन को रोक भी ले, तो बाकी ड्रोन अपने टारगेट तक पहुंच सकते हैं।

इन दोनों प्रोजेक्ट्स के साथ एक बड़ा बदलाव यह भी है कि अब निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को इसमें शामिल होने का मौका दिया गया है। वे अपने स्तर पर इन सिस्टम्स को डिजाइन और डेवलप कर सकते हैं। अगर उनका मॉडल सफल होता है, तो उन्हें बड़े स्तर पर उत्पादन का मौका मिल सकता है। इससे देश में डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और नई तकनीक तेजी से विकसित हो सकेगी। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

किस चरण में हैं ये प्रोजेक्ट

फिलहाल ये दोनों प्रोजेक्ट शुरुआती चरण में हैं। इन्हें इन-प्रिंसिपल अप्रूवल मिल चुका है, यानी डिजाइन और डेवलपमेंट की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इसके बाद कंपनियां अपने प्रोटोटाइप बनाएंगी, उनका ट्रायल होगा और फिर सेना की जरूरतों के हिसाब से अंतिम सिस्टम तैयार किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया समय लेती है, क्योंकि इसमें तकनीकी परीक्षण और सुरक्षा मानकों को पूरा करना जरूरी होता है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

IFC-IOR रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, होर्मुज में 9 दिन की ‘खामोशी’ का बताया सच, GPS जामिंग से रास्ता भटक रहे जहाज

Strait of Hormuz Maritime Threat

Strait of Hormuz Maritime Threat: 20-29 मार्च के आसपास स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज और पर्शियन गल्फ में जहाजों पर हमलों की संख्या अचानक घट गई थी, जिसके बाद यह अनुमान लगाए जा रहे थे कि ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर जल्दी ही कोई समझौता हो सकता है।

गुरुग्राम स्थित इंडियन नेवी के सहयोग से काम करने वाले इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में जो 9 दिन की शांति दिखी थी, वह असल में किसी सीजफायर या कूटनीतिक समझौते का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 28 फरवरी से शुरू हुई जंग के बाद अरब सागर क्षेत्र, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान में समुद्री सुरक्षा हालात बेहद खराब हो चुके हैं और खतरे का स्तर “क्रिटिकल” बना हुआ है। बता दें कि ने IFC-IOR कई देशों के साथ मिलकर समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है।

Strait of Hormuz Maritime Threat: 9 दिन की शांति: क्या थी असली वजह?

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि 9 दिन का जो शांत समय दिखा था, वह किसी भी तरह से युद्ध रुकने का संकेत नहीं था। यह एक “टैक्टिकल पॉज” यानी रणनीतिक ठहराव था।

IFR-IOR की रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान हमला करने वाले पक्ष ने अपनी गतिविधियों को रोकने के बजाय दोबारा हमले की तैयारी की। बाद में एमवी एक्सप्रेस रोम, एमवी अल सल्मी और एमवी एक्वा 1 जैसे जहाजों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया कि यह सिर्फ एक अंतराल था, अंत नहीं।

इस पैटर्न में पहले तेज हमले होते हैं, फिर कुछ दिन का अंतर आता है और उसके बाद फिर से हमले शुरू हो जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर हमले दिन के समय या ऐसे समय पर हुए जब उनका सटीक समय तय नहीं किया जा सका। लेकिन जो पैटर्न सामने आया है उससे यह साफ होता है कि हमले मौके का फायदा उठाकर किए गए। खास तौर पर ऐसे जहाजों को निशाना बनाया गया जो समुद्र में अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। अधिकतर हमले सुबह या दोपहर के समय देखने को मिले, जब जहाज सामान्य रूप से अपनी यात्रा जारी रखते हैं।

रिपोर्ट बताती है कि अब समुद्री हमले सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं रहे हैं। शुरुआत में हमले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक सीमित थे, लेकिन अब यह खतरा बढ़कर उत्तरी अरब सागर, यूएई के पानी और प्रमुख बंदरगाहों तक फैल गया है।

हमलों का तरीका भी बदल गया है। अब सिर्फ मिसाइल या पारंपरिक हथियार ही नहीं, बल्कि ड्रोन, बिना चालक वाली नावें और इंटरसेप्शन के दौरान गिरने वाला मलबा भी खतरा बन रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी से 2 अप्रैल तक कुल 29 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से 23 जहाज सीधे हमलों का शिकार हुए। पिछले सात दिनों में भी तीन हमले सामने आए हैं, जो लगातार बने खतरे को दिखाते हैं। अरब सागर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान के पूरे क्षेत्र में खतरे का स्तर इस समय ‘क्रिटिकल’ बना हुआ है, यानी स्थिति बेहद गंभीर है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

जीपीएस जामिंग के खतरा बढ़ा

रिपोर्ट में जीपीएस और जीएनएसएस जामिंग पर चिंता जाहिर की गई है। जिसका मतलब है कि जहाजों के नेविगेशन सिस्टम सही काम नहीं कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास, गल्फ ऑफ ओमान और अरब सागर के इलाके में लगातार जीपीएस और जीएनएसएस सिस्टम में दिक्कत आ रही है। इसकी वजह से जहाजों को सही दिशा और लोकेशन का पता लगाने में परेशानी हो रही है। एआईएस सिस्टम, जिससे जहाजों की पहचान और ट्रैकिंग होती है, वह भी प्रभावित हो रहा है।

यह खतरा अचानक सामने आ सकता है और किसी भी जहाज को निशाना बना सकता है, चाहे वह किसी भी देश का हो, किस कंपनी का हो या उसमें क्या सामान हो। खास तौर पर वे जहाज ज्यादा जोखिम में हैं जो एक जगह खड़े होते हैं, आदेश का इंतजार कर रहे होते हैं या किसी अहम समुद्री रास्ते के पास काम कर रहे होते हैं, क्योंकि ऐसे समय में उनके पास तेजी से दिशा बदलने की क्षमता कम होती है।

इस वजह से जहाजों को सही दिशा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है और समुद्र में उनकी स्थिति को समझना भी कठिन हो जाता है। यह खतरा इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि यह बिना किसी चेतावनी के सामने आता है और किसी भी जहाज को प्रभावित कर सकता है, चाहे उसका झंडा, मालिक या माल कुछ भी हो। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

कब और कैसे हो रहे हैं हमले

रिपोर्ट के अनुसार, हमले अब पूरी तरह अनिश्चित हो चुके हैं। ये हमले चलते हुए जहाजों पर भी हो रहे हैं और बंदरगाह के पास खड़े जहाजों पर भी। कई मामलों में जहाज जब एंकर पर खड़े होते हैं या एक जहाज से दूसरे जहाज में माल ट्रांसफर कर रहे होते हैं, तब भी उन्हें निशाना बनाया गया है।

हमलों में खासतौर पर जहाज के इंजन रूम या पानी की सतह के ऊपर के हिस्से को निशाना बनाया जाता है, जिससे आग लगने या विस्फोट होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे कई बार जहाज छोड़कर भागना पड़ता है या जहाज डूब भी सकता है। ये हमले मिसाइलों, ड्रोन, यूएसवी से भी किए जा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस समय कोई भी जहाज पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हमलों में कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकर, कंटेनर जहाज, बल्क कैरियर और सपोर्ट जहाज सभी निशाने पर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से हर दिन करीब 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। इस रास्ते के प्रभावित होने का मतलब है कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और व्यापार दोनों पर असर पड़ना।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात आधुनिक समय में अभूतपूर्व हैं और इसका असर दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

नए रास्तों का कर रहे इस्तेमाल

रिपोर्ट के मुताबिक समुद्री क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए शिपिंग इंडस्ट्री ने अपने तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं।
कई जहाज अब केप ऑफ गुड होप के रास्ते जा रहे हैं, क्योंकि यह फिलहाल सबसे सुरक्षित माना जा रहा है। हालांकि लंबा रास्ता है और लागत बढ़ जाती है, साथ ही, वहां के बंदरगाहों पर ईंधन भरने की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

इसके साथ ही इस पूरे इलाके के लिए वॉर रिस्क प्रीमियम यानी बीमा की लागत काफी बढ़ गई है और बीमा कंपनियां भी अब ज्यादा सख्त रुख अपना रही हैं।

कुछ तेल शिपमेंट को सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए यनबू पोर्ट तक भेजा जा रहा है, जहां से आगे उन्हें लोड किया जाता है। इससे फिलहाल थोड़ी राहत मिली है, लेकिन यह भी एक सीमित रास्ता है और यमन के गैर-सरकारी समूहों से खतरे में बना रहता है।

वहीं, ओमान के डुक्म पोर्ट को भी कुछ ऑपरेटर्स एक वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट हब के तौर पर देख रहे हैं, क्योंकि यह सीधे खतरे वाले इलाके से थोड़ा बाहर स्थित है, लेकिन यह भी पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

यमन के समूहों की एंट्री से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यमन के हूथी समूहों ने इस अभियान के साथ जुड़ने का ऐलान किया है। हालांकि इस चरण में उनके द्वारा कोई सीधा समुद्री हमला दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन उनकी क्षमता और इरादे को देखते हुए खतरा बढ़ सकता है। इससे रेड सी, बाब-अल-मंदेब और गल्फ ऑफ एडन जैसे इलाकों में भी जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

होर्मुज में लगभग ठप हुआ ट्रैफिक

रिपोर्ट के बताया गया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। जहां पहले हर दिन करीब 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर सिर्फ 4 से 5 जहाज प्रतिदिन रह गई है। कुछ दिनों में तो यह संख्या लगभग शून्य तक पहुंच गई।

यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि जहाज संचालकों ने जोखिम से बचने के लिए इस रास्ते से गुजरना लगभग बंद कर दिया है। वहीं, खतरे से बचने के लिए कई जहाज अब ईरान के क्षेत्रीय जल के करीब से गुजरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे जोखिम कम होगा, लेकिन इससे नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।

इसमें कानूनी, राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी अड़चनें शामिल हैं। इसके बावजूद यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

होर्मुज से गाजा तक बारूदी सुरंगों ने कैसे पूरी दुनिया को खतरे में डाला, दशकों तक ‘साइलेंट किलर’ बने रहते हैं डबल एज्ड वेपंस

International Mine Awareness Day 2026

International Mine Awareness Day 2026: दुनिया भर में आज इंटरनेशनल डे फॉर माइन अवेयरनेस एंड असिस्टेंस इन माइन एक्शन मनाया जा रहा है। यह दिन उन खतरों की याद दिलाता है, जो लड़ाई खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक जमीन और समुद्र में बने रहते हैं। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें और अनफटे गोला-बारूद ऐसे ही खतरे हैं, जो सालों तक लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान में चल रहे टकराव के बीच यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैनिटेरियन माइन एक्शन स्टडीज (IIFOMAS) के डायरेक्टर जनरल और होराइजन ग्रुप के चेयरमैन रिटायर्ड कर्नल नवनीत एम.पी. मित्तल ने रक्षा समाचार को खास बातचीत में बताया कि युद्ध का असर सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह दशकों तक समाज, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है।

International Mine Awareness Day 2026: “युद्ध समाधान नहीं, बातचीत है जरूरी”

डिफेंस और पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट एनवायरमेंट मैनेजमेंट के एक्सपर्ट कर्नल नवनीत मित्तल का साफ कहना है कि किसी भी जंग का अंत बातचीत से ही होता है। किसी भी युद्ध में जिम्मेदारी और समझदारी बेहद जरूरी होती है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि युद्ध दोनों पक्षों के आम लोगों को बराबर नुकसान पहुंचाता है।

वह कहते हैं, “युद्ध कोई समाधान नहीं है। यह कुछ समय के लिए दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन आखिर में बातचीत से ही रास्ता निकलता है। मैंने खुद गाजा जैसे इलाकों में हालात देखे हैं, जहां लोग बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जी रहे हैं। बमबारी का असर हर चीज पर पड़ता है, यात्रा, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी सब प्रभावित होती है।”

उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के कई देश सीधे तौर पर किसी एक पक्ष के साथ नहीं हैं, लेकिन वे अस्थिरता भी नहीं चाहते। “इन देशों के बीच भले दोस्ती न हो, लेकिन खुली दुश्मनी भी नहीं है। वे बस अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि मिसाइल या हमले उनके इलाके तक पहुंचें।” (International Mine Awareness Day 2026)

बढ़ते संघर्ष का वैश्विक असर

अमेरिका-ईरान वॉर को जिक्र करते हुए मित्तल कहते हैं, यह संघर्ष सीमित नहीं है। “अगर युद्ध लंबा चलता है तो दूसरे देशों की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। वे पूछना शुरू कर देंगे कि यह कब खत्म होगा।” उनके अनुसार, इसका असर पहले ही तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर दिखने लगा है। हवाई यात्रा, शिपिंग और सप्लाई चेन तक प्रभावित हो रहे हैं। (International Mine Awareness Day 2026)

बारूदी सुरंगें: युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार

हॉर्मुज और खार्ग में ईरान की बारूदी सुरंग बिछाने की खबरों पर कर्नल मित्तल कहते हैं कि आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली बारूदी सुरंगें और समुद्री माइंस सबसे खतरनाक हथियारों में मानी जाती हैं।

वह कहते हैं, “हर साल औसतन 5 से 6 हजार लोग माइंस की वजह से मारे जाते हैं या घायल होते हैं।” लेकिन असली खतरा आंकड़ों से बड़ा है। “अगर सड़क पर एक्सीडेंट हो जाए तो लोग गाड़ी चलााना नहीं छोड़ते, उस रास्ते पर फिर भी चलते हैं। लेकिन अगर किसी इलाके में माइंस होने की खबर हो, तो कोई वहां कदम भी नहीं रखता। यही इसका सबसे बड़ा डर है।”

ईरान-अमेरिका तनाव में समुद्री माइंस का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे इलाकों में, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।

उन्होंने कहा, “समुद्री माइंस दो तरह की होती हैं, कुछ एक जगह बंधी रहती हैं और कुछ पानी में तैरती रहती हैं। तैरने वाली माइंस ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे बहकर कहीं भी पहुंच सकती हैं और बड़ा हादसा कर सकती हैं।” International Mine Awareness Day 2026)

डबल एज्ड वेपन: लगाने वाला भी फंसता है

बारूदी सुरंगों को कर्नल मित्तल “दो धार वाली तलवार” बताते हैं। उनके मुताबिक, “जो देश माइंस बिछाता है, उसे यह भी पता होता है कि एक दिन उसे ही इन्हें हटाना पड़ेगा। लेकिन जब तक ये जमीन में रहती हैं, तब तक पूरा इलाका ठप हो जाता है।” उन्होंने बताया कि माइंस का सबसे बड़ा असर डर होता है, जो पूरे इलाके को बेकार बना देता है। यहां तक कि न तो वहां खेती की जा सकती है और न ही वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो सकता है। पूरा इलाका नो मेंस लैंड में बदल जाता है।

दशकों तक जिंदा रहती हैं माइंस

लैंड माइंस की सबसे खतरनाक बात यह है कि वे दशकों तक सक्रिय रह सकती हैं। कर्नल मित्तल बताते हैं, “कई बार 10-15 साल बाद भी अनफटे गोला-बारूद मिलते हैं। किसी भी युद्ध में 2-5 फीसदी हथियार अनफटे रह जाते हैं।”

कर्नल मित्तल ने कुवैत का उदाहरण देते हुए बताया कि 1991 के गल्फ वॉर खत्म होने के 12-13 साल बाद भी हमें अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) मिलते रहे। आमतौर पर सफाई (माइन क्लीयरेंस) बाद भी 2-3 प्रतिशत विस्फोटक जमीन में रह जाते हैं।

उन्होंने बताया कि उनकी टीम अब तक दुनिया भर में 1 लाख 77 हजार से ज्यादा अनफटे गोला-बारूद को हटाकर नष्ट कर चुकी है और 400 मिलियन वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन को सुरक्षित बनाया जा चुका है। वहीं अकेले कुवैत में होराइजन ग्रुप ने 50,000 से अधिक अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस को हटाया है।

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(Left) Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board, (Middle) CDS General Anil Chauhan, (Right) Col Navneet MP Mittal (Retd), Director General, IIFOMAS

विकास पर पड़ता है सीधा असर

माइंस की वजह से कई देशों में बड़े इलाके पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। वहां न खेती हो सकती है, न घर बन सकते हैं और न ही कोई विकास कार्य हो सकता है।

मित्तल के अनुसार, “यूक्रेन में माइंस हटाने के लिए करीब 35 अरब डॉलर की जरूरत होगी और इसमें दशकों लग सकते हैं। गाजा में यह खर्च लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। जब तक जमीन से बारूदी सुरंगें नहीं हटाई जाती, तब तक वह किसी काम की नहीं होती।”

माइंस हटाने का काम धीमा और कठिन

बारूदी सुरंगों को हटाना बेहद कठिन और खतरनाक प्रक्रिया है। इसमें कई चरण होते हैं, पहले सर्वे किया जाता है, फिर माइंस को ढूंढा जाता है, उसके बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया जाता है।

मित्तल बताते हैं, “एक व्यक्ति एक दिन में मुश्किल से 20 वर्ग मीटर क्षेत्र ही साफ कर पाता है। यह बहुत धीमा और जोखिम भरा काम है। कई बार मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हर कदम बहुत सावधानी से उठाना पड़ता है।”

उन्होंने बताया कि कई जगहों पर कुत्तों और चूहों जैसे जानवरों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो माइंस की पहचान करने में मदद करते हैं। लेकिन अंत में इंसान को ही जाकर उन्हें हटाना पड़ता है। इसके अलावा ड्रोन तकनीक का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। (International Mine Awareness Day 2026)

युद्ध के बाद भी जारी रहती है लड़ाई

मित्तल का कहना है कि युद्ध कागजों पर खत्म हो सकता है, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए यह लंबे समय तक खत्म नहीं होता। हर कदम पर जान का जोखिम होता है, क्योंकि यह पता नहीं होता कि जमीन के नीचे क्या छिपा है। यही वजह है कि माइंस को “साइलेंट किलर” भी कहा जाता है।

उन्होंने कहा, “माइंस वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए हर कदम जिंदगी और मौत के बीच का फैसला होता है। यही युद्ध की असली सच्चाई है।”

आज जब दुनिया नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें उस खतरे की याद दिलाती हैं, जो दशकों तक तक बना रहता है।

वह कहते हैं, दुनिया आज जब नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी है कि युद्ध की असली कीमत सिर्फ लड़ाई में नहीं, बल्कि उसके बाद की लंबी और कठिन प्रक्रिया में चुकानी पड़ती है। (International Mine Awareness Day 2026)

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लैंडमाइन की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक

लागत के लिहाज से देखें तो लैंडमाइन्स एक बेहद खतरनाक असमानता पैदा करती हैं। कर्नल नवनीत मित्तल बताते हैं कि एक लैंडमाइन बिछाने में मुश्किल से 3 डॉलर, यानी करीब 250 रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जब उसे हटाने की बारी आती है, तो यही लागत बढ़कर 1000 से 2000 डॉलर, यानी लगभग 80 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है।

यानी जो हथियार सस्ते में तैयार होकर जमीन में दबा दिए जाते हैं, उन्हें हटाने में कई गुना ज्यादा पैसा और संसाधन लगते हैं। इसी वजह से युद्ध खत्म होने के बाद असली आर्थिक बोझ शुरू होता है, क्योंकि तब देशों को अपने ही इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है।

कर्नल मित्तल इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि हर 5000 लैंडमाइन्स को साफ करते समय एक व्यक्ति की जान चली जाती है। यानी यह सिर्फ महंगा काम ही नहीं, बल्कि बेहद जानलेवा भी है।

आज स्थिति यह है कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन लैंडमाइन्स और अनफटे विस्फोटकों से प्रभावित है। इन इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली फंडिंग काफी कम है। पिछले दस वर्षों में यह फंडिंग औसतन 700 से 800 मिलियन डॉलर सालाना ही रही है, जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा है।

यही कारण है कि कई देशों में युद्ध खत्म होने के बाद भी जमीन सालों तक उपयोग के लायक नहीं बन पाती और विकास की रफ्तार थम जाती है। (International Mine Awareness Day 2026)

खतरनाक काम में महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी

माइन क्लीयरेंस जैसे खतरनाक काम में अब महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। मित्तल बताते हैं कि 2008-09 के आसपास श्रीलंका में माइंस हटाने की मुहिम के दौरान महिलाओं को भी इस काम में शामिल करना शुरू किया गया था। हमने महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया और उन्होंने शानदार काम किया। आज यह एक ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां जेंडर इक्वालिटी साफ दिखाई देती है।”

माइन एक्शन के पांच स्तंभ

कर्नल मित्तल ने बताया कि माइंस से निपटने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे माइन एक्शन कहा जाता है। इसके पांच मुख्य हिस्से होते हैं- माइंस को हटाना, लोगों को जागरूक करना, पीड़ितों की मदद करना, हथियारों के भंडार को नष्ट करना और माइंस पर रोक लगाने के प्रयास करना।

हालांकि, मित्तल का कहना है कि इन सभी में बराबर ध्यान नहीं दिया जाता। “ज्यादातर बजट माइंस हटाने में खर्च हो जाता है, जबकि पीड़ितों की मदद के लिए बहुत कम पैसा मिलता है।” (International Mine Awareness Day 2026)

पीड़ितों के लिए जरूरी है पुनर्वास

माइंस से प्रभावित लोगों को लंबे समय तक इलाज और सहारे की जरूरत होती है। कई लोगों के हाथ-पैर चले जाते हैं और उन्हें कृत्रिम अंग की जरूरत होती है।

मित्तल कहते हैं, “विक्टिम असिस्टेंस बहुत जरूरी है। इसमें मेडिकल केयर, प्रोस्थेटिक्स और पुनर्वास शामिल है। भारत ने जयपुर फुट जैसे प्रोग्राम के जरिए कई देशों में मदद की है।”

PPP मॉडल से निकल सकता है रास्ता

कर्नल नवनीत मित्तल माइन क्लियरेंस के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल को एक प्रभावी समाधान मानते हैं। वह कहते हैं कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में कंपनियां माइंस क्लियर कर विकास कार्य कर सकती हैं। उनके अनुसार, कंपनियां युद्ध प्रभावित जमीन को “एडॉप्ट” करें, वहां खुद माइन हटाने का काम करें और उसके बाद उसी जमीन पर खेती, खनन या इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें। इससे एक साथ कई फायदे होते हैं। देश को सुरक्षित और उपयोगी जमीन मिलती है, कंपनियों को संसाधन और निवेश का अवसर मिलता है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलते हैं। इस तरह यह मॉडल विकास और पुनर्निर्माण दोनों को साथ लेकर चलता है। (International Mine Awareness Day 2026)

भारत की भूमिका: ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का है मौका

कर्नल नवनीत मित्तल के मुताबिक अगर हम ग्लोबल साउथ की बात करते हैं, तो हमें इन देशों की मदद करनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है और अवसर भी। वह कहते हैं कि ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर लैंडमाइंस और अनफटे विस्फोटकों का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है। अफ्रीका के अंगोला, मोजाम्बिक और सूडान, दक्षिण एशिया के श्रीलंका और अफगानिस्तान, दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया और लाओस, और मध्य पूर्व के इराक, सीरिया और गाजा जैसे इलाके आज भी इस खतरे से जूझ रहे हैं। इन देशों में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां संसाधन कम हैं, अर्थव्यवस्था कमजोर है और कई जगह लंबे समय तक युद्ध चलता रहा है।

कर्नल नवनीत मित्तल का मानना है कि भारत को इस क्षेत्र में आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए। भारत माइन एक्शन प्रोग्राम शुरू कर सकता है, पूर्व सैनिकों को इसमें शामिल कर सकता है और श्रीलंका की तरह दूसरे देशों को सीधी मदद दे सकता है।

वह कहते हैं, “आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन चुकी है। एक जगह का संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। अगर दूसरे देश अस्थिर हैं, तो उसका असर हम पर भी पड़ेगा। भारत के पास तकनीकी क्षमता और अनुभव है, इसलिए उसे आगे आना चाहिए।” (International Mine Awareness Day 2026)