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Project-17A का चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट INS Taragiri नौसेना में शामिल, पढ़ें कैसे स्वदेशी शिपबिल्डिंग इकोसिस्टम हो रहा मैच्योर

INS Taragiri Commission
INS Taragiri Commissioned: Rajnath Singh Calls Strong Navy a Strategic Necessity for India

INS Taragiri Commission: भारत की समुद्री क्षमता को शुक्रवार को बड़ा बूस्ट मिला, जब देश की तीसरी न्यूक्लियर सबरमरीन आईएनएस अरिदमन के साथ एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में नौसेना में शामिल किया गया। तारागिरी पूर्वी समुद्री तट पर ईस्टर्न फ्लीट का हिस्सा बनेगी।

इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। समारोह विशाखापत्तनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में आयोजित किया गया, जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

6,670 टन वजनी आईएनएस तारागिरी को प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार किया गया है और यह आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट्स की उसी सीरीज का हिस्सा है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर नई पीढ़ी के समुद्री युद्ध को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

INS Taragiri Commission: 11 हजार किमी से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा

समारोह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होना भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देश की 11 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा है और भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में देश के विकास को समुद्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने साफ कहा कि देश का लगभग 95 फीसदी व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और ऊर्जा सुरक्षा भी समुद्र पर निर्भर करती है। इसलिए एक मजबूत और सक्षम नौसेना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है।

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखती है, चाहे वह फारस की खाड़ी हो या मलक्का जलडमरूमध्य। किसी भी संकट की स्थिति में नौसेना हमेशा आगे रहती है, चाहे वह लोगों को सुरक्षित निकालना हो या मानवीय सहायता पहुंचाना। (INS Taragiri Commission)

12. बदलते हालात में बढ़ रही समुद्र की अहमियत

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि आज के समय में वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और समुद्र इन बदलावों का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो उसका असर सबसे पहले समुद्री व्यापार और एनर्जी सप्लाई पर दिखाई देता है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत की नौसेना ने कई बार यह साबित किया है कि वह सिर्फ देश के हितों की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक स्तर पर भी अपने नागरिकों और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखने में सक्षम है।

11. इंटरनेट केबल्स की सुरक्षा पर जताई चिंता

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में दुनिया का ज्यादातर डेटा समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स के जरिए चलता है। अगर इन केबल्स को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। इसलिए अब समुद्री सुरक्षा को सिर्फ पारंपरिक नजरिए से नहीं, बल्कि एक व्यापक और भविष्य के हिसाब से तैयार दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें केवल अपनी तटरेखा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों, चोक पॉइंट्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भी सुरक्षा करनी होगी, जो सीधे देश के हितों से जुड़े हैं। भारतीय नौसेना इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रही है और यही सोच हमें आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करती है। उन्होंने कहा कि जब भी भारत आईएनएस तारागिरी जैसे आधुनिक युद्धपोत बनाता और तैनात करता है, तो यह पूरे क्षेत्र में शांति और समृद्धि की गारंटी जैसा होता है। (INS Taragiri Commission)

10. नेवी चीफ बोले- जीपीएस और सैटेलाइट सर्विसेज पर बढ़ा खतरा

वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि आज का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर समुद्री क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई दे रहा है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि अब समुद्री क्षेत्र में सिर्फ पारंपरिक खतरे ही नहीं हैं, बल्कि जीपीएस और सैटेलाइट सेवाओं में रुकावट जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं, जिससे समुद्री ऑपरेशन और भी जटिल हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि आज का समुद्री सुरक्षा माहौल पहले से ज्यादा जटिल हो गया है, जहां बदलती जियोपॉलिटिक्स, नई तकनीक और नए तरह के खतरे सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय नौसेना का लक्ष्य है कि वह हमेशा कॉम्बैट-रेडी, भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार फोर्स बनी रहे, जो कभी भी, कहीं भी देश के समुद्री हितों की रक्षा कर सके।

9. नौसेना की ताकत बढ़ाने पर जोर

नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना ने लगातार अपनी ताकत बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में नौसेना ने कई नए जहाज, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि देश के दोनों समुद्री तटों यानी पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों पर नौसेना की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है, ताकि हर तरह की चुनौती का सामना किया जा सके। (INS Taragiri Commission)

8. पुराने तारागिरी की विरासत का किया जिक्र

नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में पुराने आईएनएस तारागिरी की विरासत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इसका नाम पहले लियंडर क्लास फ्रिगेट पर रखा गया था, जो 1980 में नौसेना में शामिल हुआ था और जिसने एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और ऑपरेशनल इनोवेशन में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्होंने बताया कि पुराने तारागिरी ने 1999 के गुजरात चक्रवात के दौरान राहत और बचाव कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा 2004 की सुनामी के समय श्रीलंका में मानवीय सहायता पहुंचाने में भी इस जहाज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उन्होंने कहा कि उस समय इस जहाज पर सी किंग हेलीकॉप्टर का संचालन एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी, जिससे नौसेना की एंटी-सबमरीन क्षमता में भी सुधार हुआ था। (INS Taragiri Commission)

7. आधुनिक तकनीक से लैस नया युद्धपोत

नई आईएनएस तारागिरी पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस है। यह करीब 6,670 टन वजनी युद्धपोत है, जिसे मुंबई स्थित मझगांव जॉक शिपबिल्डर्स में बनाया गया है। इस जहाज को बनाने में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसके निर्माण में देश के 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने योगदान दिया है।

6. स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए चुनौती

आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। इसका मतलब यह है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार पर आसानी से नजर नहीं आता।

इसका रडार क्रॉस सेक्शन काफी कम रखा गया है और इसके बाहरी ढांचे को इस तरह बनाया गया है कि यह समुद्र में आसानी से छिपा रह सके। इसके अलावा इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर तकनीक भी दी गई है, जिससे दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ने में मुश्किल महसूस करते हैं।

5. लगे हैं आधुनिक हथियार और कॉम्बैट सिस्टम

इस युद्धपोत में आधुनिक हथियारों का पूरा सेट लगाया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल सिस्टम, मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं।

इन सभी सिस्टम को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है।

4. तेज रफ्तार और लंबी तैनाती की क्षमता

आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इससे जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन का इस्तेमाल कर सकता है।

इस वजह से यह जहाज तेज रफ्तार से चल सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है। यह खासियत इसे अलग-अलग तरह के मिशन के लिए सक्षम बनाती है। (INS Taragiri Commission)

3. कई तरह के मिशन के लिए तैयार

आईएनएस तारागिरी को सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बनाया गया है, बल्कि यह कई तरह के ऑपरेशन में काम आ सकता है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट के साथ-साथ ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे मिशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

2. प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत सात फ्रिगेट

आईएनएस तारागिरी (एफ41) एक आधुनिक नीलगिरी क्लास स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत तैयार किया गया है। प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत कुल सात ऐसे फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें चार जहाज मझगांव डॉक द्वारा और तीन जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं। इनमें चार नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं। इनमें आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस हिमगिरि और अब आईएनएस तारागिरी शामिल हैं।

इसके अलावा कुछ अन्य जहाज जैसे दुनागिरी पहले ही नौसेना को डिलीवर हो चुके हैं, लेकिन उनका कमीशन होना अभी बाकी है। वहीं महेंद्रगिरि और विंध्यगिरि जैसे अन्य युद्धपोत अलग-अलग निर्माण और परीक्षण के चरण में हैं। इन जहाजों को सी ट्रायल यानी समुद्री परीक्षण के बाद ही नौसेना में शामिल किया जाता है।

इन फ्रिगेट्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये भारतीय नौसेना की ब्लू-वॉटर क्षमता को मजबूत करते हैं। इसका मतलब है कि अब भारतीय नौसेना सिर्फ अपने तटों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर समुद्र में भी लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। स्टेल्थ डिजाइन, तेज मिसाइलें और पनडुब्बी रोधी क्षमता के चलते ये युद्धपोत एक साथ कई तरह के खतरों का सामना करने में सक्षम हैं।

1. इस साल 15 शिप शामिल करने का लक्ष्य

नौसेना का लक्ष्य 2035 तक 200 से ज्यादा जहाजों की फ्लीट तैयार करना है। जिनमें अभी सभी 50 से ज्यादा शिप भारतीय यार्ड्स में ही बन रहे हैं।

अगर साल 2025 की बात करें, तो इस दौरान भारतीय नौसेना में कुल 12 नए युद्धपोत, एक पनडुब्बी और एक एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। वहीं, साल 2026 में यह रफ्तार और बढ़ने की उम्मीद है। नेवी चीफ के मुताबिक इस साल करीब 15 नए युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जा सकते हैं। इस तेज रफ्तार के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है भारत का मजबूत होता स्वदेशी शिपबिल्डिंग सिस्टम। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और एलएंडटी जैसे शिपयार्ड अब एक साथ कई जहाजों का निर्माण कर रहे हैं। इसके साथ ही मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे अलग-अलग हिस्सों को पहले तैयार करके बाद में जोड़ा जाता है, और समय की बचत होती है।

वहीं, पहले किसी भी नए जहाज की पहली यूनिट बनने में ज्यादा समय लगता था, लेकिन अब उसी क्लास के अगले जहाज कम समय में तैयार हो रहे हैं। अनुभव और तकनीकी सुधार की वजह से अब बाद के जहाज 20 से 30 प्रतिशत कम समय में बन जाते हैं। इसके अलावा पहले नौसेना किसी जहाज को कमीशन करने से पहले कम से कम पांच सॉर्टी करती थी, जहां जहाज का परीक्षण करती थी, लेकिन अब 1-2 सॉर्टी में ही अप्रूवल मिल जाता है। इसकी वजह है कि जहाज बनाने वाली कंपनियों को इस बात का अनुभव हो गया कि नौसेना की असल जरूरत क्या है, जिसका फायदा जल्दी कमीशनिंग में देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं ने भी इस रफ्तार को बढ़ाया है। अब जहाजों में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हो रही है और सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योग इसमें योगदान दे रहे हैं। सरकार की नीतियों और बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ने भी निर्माण प्रक्रिया को तेज किया है। (INS Taragiri Commission)

Exclusive: ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक! स्वार्म ड्रोन से निपटने के लिए सेना खरीदेगी नेक्स्ट जनरेशन एयर डिफेंस गन

ADG NG Air Defence Gun RFI

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए भारतीय सेना अब बड़ी तैयारी कर रही है। सेना की एयर डिफेंस क्षमता को और मजबूत करने के लिए सेना की एयर डिफेंस विंग ने नई पीढ़ी की एयर डिफेंस गन यानी एडीजी-एनजी की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब युद्ध के मैदान में ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन जैसे नए खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।

सेना का मानना है कि पारंपरिक फाइटर जेट या हेलीकॉप्टर के मुकाबले दुश्मन अब बड़े प्लेटफॉर्म की बजाय छोटे और सस्ते हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। ड्रोन के जरिए निगरानी के साथ-साथ हमले भी किए जा रहे हैं। कई बार एक साथ कई ड्रोन यानी स्वार्म अटैक किए जाते हैं, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में एक ऐसी गन सिस्टम की जरूरत महसूस की गई है जो कम लागत में इन खतरों को तुरंत खत्म कर सके।

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

आरएफआई में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि पश्चिमी मोर्चे पर दुश्मन ने ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया था। इन हमलों में सिविल और डिफेंस ठिकानों को निशाना बनाया गया।

इन बदलते खतरों को देखते हुए अब एक नई पीढ़ी की गन सिस्टम की जरूरत महसूस की जा रही है। यह सिस्टम समय रहते टारगेट को पहचान सके, उसे ट्रैक कर सके और कम लागत में उसे खत्म कर सके, ताकि महत्वपूर्ण ठिकानों को किसी भी बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

इसी वजह से सेना अब ऐसी गन सिस्टम चाहती है जो कम समय में ज्यादा टारगेट को ट्रैक और न्यूट्रलाइज कर सके। एडीजी-एनजी को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

कैसे काम करेगी यह गन

आर्मी एयर डिफेंस का काम होता है कि वह युद्ध क्षेत्र और पीछे के इलाकों में मौजूद महत्वपूर्ण ठिकानों की हर मौसम में सुरक्षा करे। इन ठिकानों को दुश्मन के हवाई हमलों से बचाना इसकी जिम्मेदारी होती है।

नई एयर डिफेंस गन को व्हीकल पर भी लगाया जा सकेगा या फिर इसे खींचकर भी ले जाया जा सकेगा। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे यह खुद ही टारगेट को पहचानकर उस पर हमला कर सकेगी।

यह सिस्टम अलग-अलग तरह के खतरों को निशाना बना सकेगा। इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, रिमोट पायलटेड एयरक्राफ्ट, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड हथियार शामिल हैं।

नई एयर डिफेंस गन को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि यह कई तरह के हवाई खतरों को एक साथ संभाल सके। इसमें फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और रॉकेट-आर्टिलरी-मोर्टार जैसे हथियार शामिल हैं।

इसका मुख्य काम होगा तेजी से टारगेट को पहचानना, उसे ट्रैक करना और सही समय पर सटीक फायर करके खत्म करना। खास बात यह है कि यह सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी होगा, जो अक्सर रडार से बच निकलते हैं। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

क्या होंगी तकनीकी खूबियां

इस गन की मारक क्षमता कम से कम 4 किलोमीटर या उससे ज्यादा रखी गई है। यह 500 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आने वाले टारगेट को भी निशाना बना सकेगी। फायरिंग स्पीड कम से कम 300 राउंड प्रति मिनट होगी, जिससे कम समय में ज्यादा फायर किया जा सकेगा। इसकी प्रभावी ऊंचाई 2500 मीटर या उससे ज्यादा होगी। इसमें छोटे टारगेट जैसे माइक्रो एयरक्राफ्ट, पैरा मोटर, पैराग्लाइडर और छोटे ड्रोन भी शामिल किए गए हैं।

इसमें इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी आधुनिक होगा। इसमें प्रोग्रामेबल और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज वाले राउंड होंगे, जो टारगेट के पास पहुंचकर खुद ही फट सकते हैं। इसके अलावा सामान्य हाई एक्सप्लोसिव राउंड और ट्रेनिंग अम्यूनिशन भी शामिल होंगे।

गन में ऑटोमैटिक लोडिंग सिस्टम होगा, जिससे फायरिंग के दौरान समय की बचत होगी। कम क्रू के साथ इसे ऑपरेट किया जा सकेगा और दो लोग भी इसे रीलोड कर पाएंगे।

पावर और सिस्टम इंटीग्रेशन

गन में अपना पावर सिस्टम होगा, जिसमें जनरेटर और बैटरी दोनों शामिल होंगे। बैटरी के जरिए साइलेंट ऑपरेशन भी किया जा सकेगा, जिससे दुश्मन को इसकी लोकेशन का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा।

यह सिस्टम मॉड्यूलर होगा, यानी जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव किया जा सकेगा। साथ ही इसे मौजूदा रडार और नेविगेशन सिस्टम के साथ भी जोड़ा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम

इस गन की सबसे बड़ी ताकत इसका इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम होगा। इसमें डे और नाइट दोनों में काम करने की क्षमता होगी। कैमरा, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर की मदद से यह दूर के टारगेट को भी पहचान सकेगा।

अगर किसी कारण से इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो जाए, तब भी इसे मैनुअल ओपन साइट के जरिए चलाया जा सकेगा। इसका मतलब है कि खराब हालात में भी यह पूरी तरह बंद नहीं होगी। इस सिस्टम में रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे ऑपरेशन का डेटा बाद में देखा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

हर इलाके में काम करने की क्षमता

सेना चाहती है कि यह गन हर तरह के इलाके में काम कर सके। चाहे ऊंचे पहाड़ी इलाके हों, रेगिस्तान हो या सामान्य मैदान, यह हर जगह तैनात की जा सके। मैदानी इलाकों में इसकी मूवमेंट स्पीड करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है, जबकि पहाड़ों में 30 किलोमीटर प्रति घंटा और ऑफ रोड में 20 किलोमीटर प्रति घंटा की क्षमता होगी।

यह सिस्टम -30 डिग्री से लेकर +55 डिग्री तक के तापमान में काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। साथ ही इसे समुद्र तल से 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से यह भी जानकारी मांगी है कि उनका सिस्टम अलग-अलग टारगेट को कितनी दूरी से पहचान सकता है। इसमें छोटे ड्रोन से लेकर हेलीकॉप्टर और फाइटर जेट तक शामिल हैं।

इसके लिए खास तौर पर DJI Mavic Pro 3 ड्रोन, चीता हेलीकॉप्टर और राफेल जैसे फाइटर जेट को उदाहरण के तौर पर लिया गया है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

फील्ड ट्रायल भारत में ही

सेना इस सिस्टम को खरीदने के लिए टू-बिड सिस्टम अपनाएगी। पहले टेक्निकल मूल्यांकन होगा और उसके बाद कमर्शियल बिड खोली जाएगी। फील्ड ट्रायल भारत में ही किए जाएंगे, जहां अलग-अलग परिस्थितियों में इसकी क्षमता को परखा जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में स्वदेशी हिस्सेदारी पर खास जोर दिया गया है। कम से कम 50 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट जरूरी रखा गया है, यानी इसका बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में सरकारी और निजी दोनों सेक्टर की कंपनियों के लिए मौका खुला है। रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियां इसमें हिस्सा ले सकती हैं। उन्हें अपनी तकनीकी क्षमता, उत्पादन क्षमता और सपोर्ट सिस्टम की जानकारी देनी होगी।

सेना ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि वे कितनी जल्दी उत्पादन कर सकती हैं और कितनी संख्या में गन सप्लाई कर सकती हैं।

प्री-सबमिशन मीटिंग अप्रैल के मध्य में रखी गई है, जहां कंपनियों को अपनी शंकाएं दूर करने का मौका मिलेगा। रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों को 11 जून तक अपना जवाब जमा करने के लिए कहा है। इसके बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की थीं ये एयर डिफेंस गन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने बड़े स्तर पर ड्रोन हमलों का सामना किया। पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान ने 600 से ज्यादा छोटे ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, जिनका मकसद निगरानी करना और सैन्य ठिकानों पर हमला करना था। इन खतरों से निपटने के लिए आर्मी एयर डिफेंस ने मल्टी-लेयर सिस्टम अपनाया, जिसमें गन और मिसाइल दोनों का इस्तेमाल हुआ।

इस ऑपरेशन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल बोफोर्स एल-70 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन का हुआ। यह गन अपग्रेडेड सिस्टम के साथ थी, जिसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज अम्यूनिशन शामिल था। इसकी फायरिंग स्पीड 300 राउंड प्रति मिनट से ज्यादा है और इसने कई ड्रोन मार गिराए।

इसके अलावा जेडयू-23-2 ट्विन बैरल गन का भी इस्तेमाल किया गया। यह हल्की और तेज फायरिंग वाली गन है, जो छोटे ड्रोन को गिराने में काफी कारगर साबित हुई। वहीं कुछ जगहों पर व्हीकल माउंटेड जेडयू-23-4 शिल्का गन सिस्टम भी तैनात किया गया था, जो तेजी से मूव कर सकता है।

इन गन्स के साथ मिसाइल सिस्टम जैसे पिचोरा और ओसा-का भी इस्तेमाल हुए, जबकि सभी सिस्टम को एक साथ जोड़ने के लिए आधुनिक कमांड और कंट्रोल नेटवर्क का सहारा लिया गया। ऑपरेशन के दौरान इन गन्स ने बड़ी संख्या में ड्रोन को गिराकर महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा की। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

Explainer: रूस-फ्रांस-अमेरिका और इजरायल से क्यों दूरी बना रहा भारत? क्या है देश का नया मिलिट्री डिप्लोमेसी प्लान?

India Defence Attache Reshuffle
File Photo: ADGPI

India Defence Attache Reshuffle: भारत ने अपनी मिलिट्री डिप्लोमेसी में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसका सीधा असर कई देशों में देखने को मिलेगा। संसदीय समिति को सरकार ने बताया कि भारत अब विदेश में तैनात अपने डिफेंस अटैची नेटवर्क में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। अब भारत उन देशों में अपनी मौजूदगी कम कर रहा है, जहां से वह लंबे समय से हथियार खरीदता रहा है। वहीं, नई रणनीति के तहत उन देशों पर ध्यान बढ़ा रहा है जहां भारतीय हथियारों के खरीदार मौजूद हैं। यह बदलाव चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है और इसका मकसद रक्षा निर्यात को बढ़ाना है।

India Defence Attache Reshuffle: क्या होता है डिफेंस अटैची और क्या है इसकी भूमिका

डिफेंस अटैची किसी भी देश के दूतावास में तैनात एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होता है। उसका काम दो देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना, सैन्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना और रणनीतिक संवाद बनाए रखना होता है।

अब तक इन अधिकारियों की भूमिका मुख्य रूप से उन देशों में ज्यादा महत्वपूर्ण रही है, जहां से भारत हथियार और सैन्य तकनीक खरीदता था। लेकिन अब इस सिस्टम को बदला जा रहा है।

नई नीति के तहत डिफेंस अटैची सिर्फ सैन्य संपर्क अधिकारी नहीं रहेंगे, बल्कि वे भारत के रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व भी करेंगे। (India Defence Attache Reshuffle)

सीडीएस ने क्यों लिया यह फैसला

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने डिफेंस अटैचियों में किए गए इस बदलाव पर संसदीय रक्षा स्थायी समिति के साथ बातचीत के दौरान चर्चा की। यह वही समिति है, जिसकी हालिया रिपोर्ट पिछले हफ्ते लोकसभा में पेश की गई थी।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने संसदीय रक्षा समिति को बताया कि भारत अब एक एक्सपोर्टर की भूमिका निभाना चाहता है। इसके लिए जरूरी है कि सैन्य कूटनीति का फोकस भी बदला जाए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन देशों से भारत हथियार आयात करता था, वहां बड़ी संख्या में अटैची तैनात थे। अब उन्हें वहां से हटाकर उन देशों में भेजा जा रहा है जहां भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग बनने की संभावना है।

किन देशों में घट रही है तैनाती

इस बदलाव के तहत भारत ने उन देशों में अपनी सैन्य कूटनीतिक मौजूदगी कम करनी शुरू कर दी है, जो लंबे समय से उसके प्रमुख सप्लायर रहे हैं। इनमें रूस, फ्रांस, अमेरिका और इजरायल जैसे देश शामिल हैं।

पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि 2021 से 2025 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आया था। रूस अकेले करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा सप्लायर रहा, जबकि फ्रांस और इजरायल का योगदान भी काफी बड़ा था।

अब इन देशों में अटैचियों की संख्या घटाई जा रही है, क्योंकि यहां भारत की भूमिका मुख्य रूप से खरीदार की रही है।

कहां बढ़ रही है भारत की मौजूदगी

दूसरी ओर, भारत अब उन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है जहां रक्षा निर्यात की संभावनाएं ज्यादा हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में रक्षा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। इन देशों के पास सीमित बजट होता है, इसलिए वे ऐसे विकल्प तलाशते हैं जो सस्ते, भरोसेमंद और टिकाऊ हों।

भारत खुद को इसी रूप में पेश कर रहा है और डिफेंस अटैची नेटवर्क के जरिए इन देशों तक अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है। (India Defence Attache Reshuffle)

तेजी से बढ़ता भारतीय रक्षा निर्यात

भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,682 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में करीब 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2029-30 तक इसे बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये किया जाए।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्यात को बढ़ावा देना जरूरी है, और इसी दिशा में डिफेंस अटैची नेटवर्क को फिर से व्यवस्थित किया जा रहा है।

हाल ही में जारी सिपरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016-20 से 2021-25 के बीच भारत के हथियार आयात में करीब 4 फीसदी की कमी आई है। इसके बावजूद भारत अब भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आयातक बना हुआ है और वैश्विक हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 8.2 फीसदी है।

क्या-क्या बेच रहा है भारत

भारत अब दुनिया के करीब 100 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। इनमें मिसाइल, आर्टिलरी गन, रॉकेट, आर्मर्ड व्हीकल, ऑफशोर पेट्रोल वेसल, रडार, सर्विलांस सिस्टम और गोला-बारूद जैसे कई उत्पाद शामिल हैं।

इसमें निजी कंपनियों और सरकारी रक्षा उपक्रमों दोनों का योगदान है। निजी सेक्टर ने इस क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बनाई है। (India Defence Attache Reshuffle)

ब्रह्मोस की बढ़ रही मांग

भारत अब छोटे उपकरणों के साथ-साथ बड़े और एडवांस हथियार सिस्टम भी निर्यात करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल इसका प्रमुख उदाहरण है। फिलीपींस को इस मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति पहले ही की जा चुकी है। इसके अलावा इंडोनेशिया के साथ भी इस मिसाइल को लेकर बातचीत चल रही है।

इसके साथ ही हल्के लड़ाकू विमान, एडवांस हेलीकॉप्टर और अन्य प्लेटफॉर्म भी निर्यात के लिए तैयार किए जा रहे हैं। (India Defence Attache Reshuffle)

क्या होगी डिफेंस अटैची की नई भूमिका

अब डिफेंस अटैची की जिम्मेदारी सिर्फ सैन्य संपर्क तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें यह निर्देश दिए गए हैं कि वे भारत के पूरे रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व करें। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि अब अटैची विदेशी देशों में जाकर भारतीय रक्षा उत्पादों को बढ़ावा देने और नए बाजार तलाशने का काम करेंगे।

नीति सुधारों का असर

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई अहम सुधार किए हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, कई कंपोनेंट्स को लाइसेंस की जरूरत से बाहर किया गया है और निर्यात अनुमति प्रक्रिया को सरल किया गया है। इन सुधारों के कारण रक्षा क्षेत्र में कंपनियों की संख्या बढ़ी है और निर्यात में तेजी आई है। (India Defence Attache Reshuffle)

शिपबिल्डिंग सेक्टर पर जोर

भारत अब खुद को वैश्विक शिपबिल्डिंग हब के रूप में भी स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य समुद्री क्षमता को मजबूत करना और नए रोजगार के अवसर पैदा करना है।

हालांकि भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, लेकिन इसमें धीरे-धीरे कमी आ रही है। इससे साफ है कि भारत अब आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

चरणबद्ध तरीके से हो रहा बदलाव

डिफेंस अटैची नेटवर्क में यह बदलाव एक साथ नहीं किया गया है, बल्कि इसे चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण में उन देशों से अटैचियों को हटाया गया जहां से आयात होता था, जबकि दूसरे चरण में नए बाजार वाले देशों में उनकी तैनाती बढ़ाई गई। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद यह है कि भारत की सैन्य कूटनीति सीधे उसके आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों को मजबूत करे। (India Defence Attache Reshuffle)

बिना गोली चलाए होगी T-90 टैंक गनर्स की ट्रेनिंग! भारतीय सेना खरीदेगी AI बेस्ड वर्चुअल वॉरफील्ड सिमुलेटर

T-90 Gunnery Simulator
T-90 BHISHMA

T-90 Gunnery Simulator: भारतीय सेना अब टी-90 भीष्म टैंक क्रू को सिमुलेटर पर ट्रेनिंग देगी। रक्षा मंत्रालय ने करीब 50 बेसिक गनरी सिमुलेटर खरीदने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। इन सिमुलेटर के जरिए टैंक गनर्स को बिना असली फायरिंग रेंज पर ले जाए ट्रेनिंग दी जाएगी।

यह सिमुलेटर खास तौर पर टी-90 टैंक के गनर और कमांडर को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएंगे, ताकि वे असली युद्ध जैसे माहौल में बेहतर तरीके से अभ्यास कर सकें।

T-90 Gunnery Simulator: असली फायरिंग जैसा अनुभव मिलेगा

सेना ने साफ किया है कि यह सिमुलेटर सिर्फ स्क्रीन पर ट्रेनिंग देने वाला साधारण सिस्टम नहीं होगा, बल्कि इसमें वास्तविक फायरिंग जैसा पूरा अनुभव मिलेगा। टैंक के अंदर का माहौल बिल्कुल असली टी-90 जैसा बनाया जाएगा, जिसमें गनर की सीट, कंट्रोल्स और डिस्प्ले सिस्टम भी उसी तरह काम करेंगे।

इसमें गनर को दुश्मन को पहचानने, उसे ट्रैक करने, दूरी नापने, निशाना साधने और फायर करने तक की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाएगी। इसमें 125 मिमी की मुख्य तोप, 7.62 मिमी मशीन गन, इनवार मिसाइल और स्मोक ग्रेनेड लॉन्चर का इस्तेमाल भी सिखाया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)

आवाज और झटके भी लगेंगे

इस सिमुलेटर की एक खास बात यह होगी कि इसमें सिर्फ विजुअल नहीं, बल्कि आवाज और झटकों का भी पूरा अनुभव दिया जाएगा। जब टैंक फायर करेगा तो झटका महसूस होगा और स्क्रीन पर फ्लैश भी दिखाई देगा।

इंजन की आवाज, ऑटो लोडर के चलने की आवाज, दुश्मन की फायरिंग और युद्ध में बम फटने की आवाजें भी सुनाई देंगी। इससे ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक मानसिक रूप से उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जैसा असली युद्ध के दौरान होता है। (T-90 Gunnery Simulator)

मशीन में होगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

इस सिमुलेटर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का खास इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें दुश्मन के टारगेट एआई के जरिए तैयार किए जाएंगे, जो हर अभ्यास के साथ ज्यादा मुश्किल होते जाएंगे।

इंस्ट्रक्टर चाहे तो कठिनाई का स्तर खुद भी तय कर सकता है। इसके अलावा सिस्टम खुद ही यह देखेगा कि ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक कहां गलती कर रहा है और उसे सुधारने के सुझाव भी देगा। (T-90 Gunnery Simulator)

अलग-अलग इलाकों में होगी ट्रेनिंग

इस सिस्टम में भारत के अलग-अलग सीमावर्ती इलाकों जैसा माहौल बनाया जाएगा। इसमें पश्चिमी सीमा, नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा जैसे क्षेत्रों के हालात शामिल होंगे।

रेगिस्तान, मैदान, नदी के इलाके, ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र और शहरी इलाकों जैसे अलग-अलग टेरेन में ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सैनिकों को हर तरह के ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सकेगा। (T-90 Gunnery Simulator)

ट्रेनिंग पर नजर रखेगा इंस्ट्रक्टर

इस सिस्टम में एक इंस्ट्रक्टर स्टेशन भी होगा, जहां से ट्रेनिंग पर नजर रखी जाएगी। इंस्ट्रक्टर यह देख सकेगा कि सैनिक कैसे प्रदर्शन कर रहे हैं, कहां गलती कर रहे हैं और उन्हें कैसे सुधारना है। साथ ही बाहर लगे डिस्प्ले पर दूसरे सैनिक भी ट्रेनिंग को देख सकेंगे।

जरूरत पड़ने पर सिस्टम में जानबूझकर खराबी भी डाली जा सकती है, ताकि सैनिकों को इमरजेंसी स्थिति से निपटना सिखाया जा सके।

साइज और मजबूती पर खास ध्यान

सेना ने सिमुलेटर के डिजाइन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसे मिलिट्री ग्रेड मजबूती के साथ बनाया जाना होगा, ताकि यह अलग-अलग मौसम और कठिन परिस्थितियों में काम कर सके।

यह सिस्टम इतना कॉम्पैक्ट होगा कि इसे अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रक में रखा जा सके। इसका वजन और साइज भी तय सीमा के भीतर होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।

यह सिमुलेटर -10 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक के तापमान में काम कर सकेगा और दिन में 12 से 16 घंटे तक लगातार चलने में सक्षम होगा। इसमें बैकअप पावर के लिए यूपीएस की सुविधा भी होगी। (T-90 Gunnery Simulator)

लंबी सर्विस लाइफ और मेंटेनेंस की व्यवस्था

सेना ने इस सिमुलेटर की सर्विस लाइफ करीब 15 साल तय की है। कंपनियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे लंबे समय तक इसके स्पेयर्स और मेंटेनेंस की सुविधा दे सकें।

साथ ही, अगर किसी कंपनी को प्रोडक्शन बंद करना हो, तो उसे पहले से सूचना देनी होगी, ताकि जरूरी पार्ट्स का स्टॉक तैयार किया जा सके। (T-90 Gunnery Simulator)

खरीद प्रक्रिया में स्वदेशी कंपनियों को प्राथमिकता

यह पूरी प्रक्रिया आत्मनिर्भर भारत के तहत की जा रही है। इसका मतलब है कि इसमें भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सेना कंपनियों से यह भी पूछ रही है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है। इसके आधार पर आगे चयन किया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)

चीन-पाकिस्तान के लिए बुरी खबर; IAF का ‘बाज’ बनेगा और घातक, मिग-29 में वायुसेना करने जा रही बड़ा मिसाइल अपग्रेड

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Photo: IAF/ Gp Captain Indranil Nandi

MiG-29 ASRAAM missile upgrade: भारतीय वायुसेना अपने फेवरेट ‘बाज’ यानी मिग-29 फाइटर एयरक्राफ्ट (Fulcrum) को और ज्यादा घातक बनाने की तैयारी में है। वायुसेना मिग-29 में ASRAAM यानी एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल को लगाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने बकायदा इसके लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। हाल ही में वायुसेना ने आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है, जिसमें इंडिजिनस कंपनियों से निविदा मांगी गई है।

इस अपग्रेड के तहत मिग-29 फ्लीट के 56 एयरक्राफ्ट, जिनमें 48 फाइटर और 8 ट्रेनर शामिल हैं, पर ASRAAM मिसाइल का इंटीग्रेशन और सर्टिफिकेशन किया जाएगा। इसके साथ ही नए लॉन्चर, टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और ट्रेनिंग भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।

MiG-29 ASRAAM missile upgrade: क्यों जरूरी है यह अपग्रेड

मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक अहम फाइटर एयरक्राफ्ट है, जिसे मिग-29UPG वर्जन में अपग्रेड किया जा चुका है। इसके बावजूद इसमें इस्तेमाल हो रही कुछ मिसाइलें अब पुरानी हो चुकी हैं। खास तौर पर शॉर्ट रेंज फाइट यानी क्लोज कॉम्बैट में इस्तेमाल होने वाली आर-73 मिसाइल 1980 के दशक की टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है, जिसकी रेंज 10-15 किमीतक है। वहीं इसमें मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल भी इस्तेमाल होती है।

आज के समय में जब एयर कॉम्बैट तेजी से बदल रहा है, जहां बेहतर सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नई मिसाइल टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। ऐसे में ASRAAM जैसी लेटेस्ट मिसाइल के इंटीग्रेट होने से मिग-29 की कॉम्बैट क्षमता बनी रहेगी, बल्कि मॉडर्न डॉगफाइट में भी इसकी सुपीरियरिटी बनी रहेगी। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Photo Source: IAF

क्या है ASRAAM मिसाइल

ASRAAM एक शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (विद इन विजुअल रेंज- WVR) है, जिसे ब्रिटेन की कंपनी एमबीडीए ने डेवलप किया है। यह मिसाइल मैक-3 से ज्यादा की स्पीड से उड़ सकती है और इसकी रेंज लगभग 25 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है। ASRAAM को साल 1998 में रॉयल एयर फोर्स (RAF) में शामिल किया गया था।

इसमें एडवांस्ड इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर लगा होता है, जो दुश्मन के विमान को बेहतर तरीके से पहचान सकता है। यह मिसाइल फ्लेयर्स और जैमिंग जैसी तकनीकों से बचने में भी सक्षम है।

ASRAAM की एक खूबी यह भी है कि इसे लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च (LOBL) और लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च (LOAL) मोड में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च मोड में पायलट पहले दुश्मन के विमान को अपनी स्क्रीन या हेलमेट से देखता है और मिसाइल को उसी समय टारगेट पर लॉक कर देता है। जब लॉक हो जाता है, तब मिसाइल फायर की जाती है। इसका फायदा यह है कि मिसाइल पहले से टारगेट को पकड़ चुकी होती है, इसलिए हिट करने की संभावना ज्यादा रहती है।

वहीं, लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च ज्यादा एडवांस है। इस मोड में पायलट बिना पूरी तरह लॉक किए पहले मिसाइल दाग देता है। मिसाइल हवा में आगे बढ़ती है और उड़ते-उड़ते खुद ही टारगेट को ढूंढकर लॉक कर लेती है। इसमें पायलट सिर्फ दिशा बताता है कि दुश्मन किस तरफ है। बाकी काम मिसाइल खुद करती है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि पायलट को दुश्मन को सीधे सामने रखने की जरूरत नहीं होती। वह साइड में या दूर होते हुए भी हमला कर सकता है। कई बार दुश्मन को पता भी नहीं चलता कि मिसाइल उसकी तरफ आ रही है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Air Chief Marshal AP Singh with MiG-29 UPG on March 12, 2026

चीन की PL-10 और पाकिस्तान की PL-10E से कैसे करेगी मुकाबला

भारत के मुकाबले चीन और पाकिस्तान भी अपने फाइटर जेट में आधुनिक शॉर्ट रेंज मिसाइलें इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन की PL-10 और उसका एक्सपोर्ट वर्जन PL-10E ऐसी ही मिसाइलें हैं। चीन की PL-10 मिसाइल को साल 2015 में सेवा में शामिल किया गया था। इसका डेवलपमेंट 2004 में शुरू हुआ था और 2010 में इसका डिजाइन मंजूर हुआ। इसके बाद 2013 से इसका प्रोडक्शन शुरू हो गया।

यह मिसाइल खास तौर पर चीन के नए फाइटर जेट जैसे जे-10सी, जे-16 और जे-20 के लिए बनाई गई है। यह एक शॉर्ट रेंज इंफ्रारेड गाइडेड मिसाइल है, यानी यह दुश्मन के विमान की गर्मी को ट्रैक करके उसे निशाना बनाती है।

पीएल-10 की रेंज आम तौर पर करीब 20 किलोमीटर बताई जाती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह 30 किलोमीटर तक भी जा सकती है। इसकी स्पीड मैक-4 तक पहुंच सकती है, जो इसे काफी तेज बनाती है।

अगर ASRAAM से तुलना करें, तो पीएल-10 की टॉप स्पीड ज्यादा है। लेकिन ASRAAM में बड़ा रॉकेट मोटर लगा होता है, जिससे यह ज्यादा देर तक रफ्तार बनाए रख सकती है और लंबी दूरी तक असरदार बनी रहती है।

पाकिस्तान ने भी इस मिसाइल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। वह पीएल-10ई वर्जन को अपने जेएफ-17 ब्लॉक-3 फाइटर जेट में लगा रहा है। यह डील चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग का हिस्सा है।

मिग-29 में हुए क्या-क्या अपग्रेड

हाल ही में 12 मार्च को एयर फोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आदमपुर एयरबेस पर अपग्रेड हुए मिग-29 यूपीजी को उड़ाया था। भारतीय वायुसेना के मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट पहले से ही कई अपग्रेड से गुजर चुके हैं। शुरुआत में 6 मिग-29 विमानों का अपग्रेड रूस में किया गया था, जबकि बाकी विमानों को भारत में नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में अपग्रेड किया गया। वायुसेना के अधिकारियों के अनुसार, हर एक मिग-29 को अपग्रेड करने में करीब 15 मिलियन डॉलर खर्च आया है। अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी की क्षमता काफी हद तक एफ-16 ब्लॉक 70 जैसे आधुनिक फाइटर के बराबर मानी जा रही है।

इसमें नया झुक-एमई रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक कर सकता है। हवाई मोड में यह करीब 120 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान को पहचान सकता है। यह एक साथ 10 टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से 4 पर एक साथ हमला किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें एडवांस एवियोनिक्स, ग्लास कॉकपिट और इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं।

मिग-29यूपीजी में ईएलटी-568 जैमर भी लगाया गया है। यह सिस्टम दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भ्रमित करने में मदद करता है। इससे विमान पर हमला करना मुश्किल हो जाता है।

इसके अलावा मिग-29 में डी-29 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार को पहचान कर उसे जाम करने में मदद करता है। इसे भारत में ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट ने बनाया है और इसका निर्माण बीईएल ने किया है। इसके साथ ही इसमें आईआरएसटी यानी इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम भी है, जो बिना रडार ऑन किए दुश्मन के विमान को ट्रैक कर सकता है।

इसके अलावा इसमें सिक्योर डेटा लिंक भी लगाया गया है, जिससे यह अवाक्स और ग्राउंड रडार से जुड़कर जानकारी ले सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

मिग-29 का इंजन भी बदला

मिग-29 यूपीजी में नए सीरीज-3 आरडी-33 इंजन भी लगाया गया है। जहां चीन का जे-11 फाइटर जेट थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो के मामले में करीब 1 पर है, वहीं मिग-29 यूपीजी का यह अनुपात लगभग 1.11 तक पहुंच जाता है। जिससे मिग-29 ज्यादा वजन के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।

मिग-29 के आरडी-33 इंजन की खासियत यह है कि यह बहुत तेजी से पावर जनरेट करता है, जिससे पायलट को अचानक स्पीड और ऊंचाई बदलने में मदद मिलती है। यही वजह है कि हवाई लड़ाई के दौरान यह दुश्मन की मिसाइलों से बचने और जवाबी हमला करने में ज्यादा सक्षम माना जाता है। इन इंजनों का निर्माण भारत में ही एचएएल के कोरापुट डिवीजन में लाइसेंस के तहत किया जा रहा है। इस अपग्रेड के बाद मिग-29 अब सात हार्ड पॉइंट्स पर करीब 4,500 किलोग्राम तक हथियार ले जा सकता है, जिससे इसकी स्ट्राइक क्षमता बढ़ गई है।

इसके अलावा इस अपग्रेड से मिग-29 की रेंज में भी करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अब यह विमान सिर्फ अपने इंटरनल फ्यूल के सहारे करीब 2,100 किलोमीटर तक मिशन पूरा कर सकता है। साथ ही इसमें एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के लिए रिट्रैक्टेबल प्रोब भी जोड़ा गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर उड़ान के दौरान ही ईंधन भरा जा सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

बढ़ जाएगी मिग-29 की लाइफ

मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट को अभी कई साल तक सेवा में रखा जाना है। भारतीय वायुसेना का प्लान इसे 2033–37 तक रिटायर करने का है। इस वजह से इसमें लगातार नए अपग्रेड किए जा रहे हैं, ताकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक काम करता रहे। ASRAAM का इंटीग्रेशन इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल मिग-29 की तीन स्क्वाड्रन हैं, जो अलग-अलग इलाकों में तैनात हैं। इन एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन मिशन में किया जाता है। इन बदलावों के चलते इस विमान की उम्र करीब 10 साल तक बढ़ गई है। इसके रखरखाव की लागत भी कम हुई है और इसकी ऑपरेशनल रेंज भी पहले से ज्यादा हो गई है।

इन सभी अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी अब एक आधुनिक 4 जेनरेशन फाइटर के बराबर माना जाता है। इसकी लड़ाकू क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ताकत दोनों में बड़ा सुधार हुआ है। अब यह विमान पहले की तुलना में ज्यादा समय तक उड़ान भर सकता है और ज्यादा प्रभावी तरीके से मिशन पूरा कर सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

किन मिसाइलों की जगह लेगी ASRAAM

मिग-29 में अभी दो तरह की एयर-टू-एयर मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं। मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल और शॉर्ट रेंज मिसाइल के लिए आर-73 मिसाइल लगी है।

अब वायुसेना आर-77 की जगह स्वदेशी अस्त्र मार्क-1 और आने वाले समय में अस्त्र मार्क-2 को शामिल करने की योजना बना रही है। वहीं आर-73 की जगह ASRAAM को लाया जा रहा है।

इस बदलाव के बाद मिग-29 पूरी तरह आधुनिक मिसाइल सिस्टम से लैस हो जाएगा, जिसमें लंबी दूरी के लिए अस्त्र और नजदीकी लड़ाई के लिए ASRAAM का कॉम्बिनेशन होगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

दो कंपनियां बनाती हैं ASRAAM

ASRAAM मिसाइल को मुख्य रूप से दो कंपनियां बनाती हैं। पहली कंपनी है ब्रिटेन की एमबीडीए है, जो इस मिसाइल की असली और मुख्य निर्माता यानी ओईएम है। दुनिया भर में जो ASRAAM मिसाइल इस्तेमाल होती है, उसकी सप्लाई भी यही कंपनी करती है। यूके, ऑस्ट्रेलिया और कई फाइटर जेट जैसे टाइफून और एफ-35 में यही मिसाइल लगाई जाती है।

वहीं, दूसरी कंपनी है भारत डायनैमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल, जो भारत की सरकारी रक्षा कंपनी है। साल 2021 में दोनों कंपनियों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत में ही ASRAAM मिसाइल को जोड़ने और तैयार करने का काम शुरू हुआ। अब हैदराबाद में बीडीएल इस मिसाइल की असेंबली, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन करती है।

एक जैसी मिसाइलों से मिलेगा फायदा

वायुसेना अब अपने अलग-अलग फाइटर एयरक्राफ्ट में एक जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है। ASRAAM को पहले ही तेजस मार्क-1ए और जगुआर जैसे एयरक्राफ्ट में शामिल किया जा चुका है। भारतीय वायुसेना की योजना है कि धीरे-धीरे इस मिसाइल को सभी फाइटर जेट में लगाया जाए।

अगर मिग-29 में भी यही मिसाइल लगती है, तो ट्रेनिंग और मेंटेनेंस आसान हो जाएगा। पायलट एक ही तरह की मिसाइल पर ट्रेनिंग ले सकेंगे और लॉजिस्टिक्स भी सरल हो जाएगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

कैसे होगा इंटीग्रेशन

आरएफपी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट में मिसाइल को एयरक्राफ्ट के साथ पूरी तरह जोड़ना और उसकी टेस्टिंग शामिल होगी। इसके अलावा 98 नए लॉन्चर दिए जाएंगे, जिनमें प्रोटोटाइप और प्रोडक्शन दोनों शामिल हैं।

इसके साथ ही टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और मेंटेनेंस टूल्स भी दिए जाएंगे। वायुसेना के 30 कर्मियों को इस सिस्टम के लिए खास ट्रेनिंग भी दी जाएगी, जो नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में होगी।

इस प्रक्रिया में एयरक्राफ्ट के सॉफ्टवेयर, फायर कंट्रोल सिस्टम और अन्य सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि मिसाइल पूरी तरह से काम कर सके। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

हाई एल्टीट्यूड में शानदार परफॉरमेंस

2020 में लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए गतिरोध के दौरान हल्के वजन के चलते मिग-29 यूपीजी ने शानदार प्रदर्शन किया था। ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में इसकी क्षमता को देखते हुए इसे “ड्रैगन स्लेयर” का नाम भी दिया गया। 2020 में पूरी लद्दाख में स्टैंडऑफ के दौरान मिडियम-वेट फाइटर जैसे मिग-29 यूपीजी और राफेल ने उच्च हिमालयी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि भारी फाइटर जेट जैसे सुखोई-30 एमकेआई को पतली हवा के चलते कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

लद्दाख में तैनाती के दौरान मिग-29 यूपीजी को लेह और थोइस एयरबेस पर ऑपरेट किया गया। लेह करीब 10,600 फीट और थोइस लगभग 9,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। इन एयरबेस से मिग-29 ने नियमित सॉर्टीज उड़ाईं और हिमालयी इलाकों में पेट्रोलिंग की। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

मिग-29 यूपीजी की ताकत का सबसे बड़ा कारण उसका हल्का वजन है। इसका मैक्स टेकऑफ वेट करीब 27 टन है, जबकि सुखोई-30 एमकेआई लगभग 38 टन का होता है। ऊंचाई वाले इलाकों में जहां हवा पतली होती है, वहां हल्का विमान ज्यादा आसानी से लिफ्ट और थ्रस्ट हासिल कर पाता है। यही वजह है कि मिग-29 ऐसे इलाकों में ज्यादा सहज तरीके से ऑपरेट करता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

सेना को सप्लाई किए जाने वाले ड्रोन में ‘चीनी घुसपैठ’ का खतरा, अब पास करना होगा 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट

Military Drone Security Framework

Military Drone Security Framework: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब कोई भी ड्रोन सीधे सेना में शामिल नहीं होगा। अब भारतीय सेनाओं के लिए खरीदे जाने वाले हर ड्रोन को 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट पास करना जरूरी होगा। यह कदम खास तौर पर उस खतरे को देखते हुए उठाया गया है, जिसमें “मेड इन इंडिया” के नाम पर इस्तेमाल हो रहे ड्रोन के अंदर चीनी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर पाए गए हैं।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सेना के भीतर यह चिंता बढ़ रही थी कि कुछ ड्रोन दिखने में भारतीय हैं, लेकिन उनके अंदर लगे अहम कंपोनेंट्स विदेशी हो सकते हैं, जो सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

Military Drone Security Framework: नया ड्रोन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

रक्षा मंत्रालय ने एक नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसके तहत हर ड्रोन को खरीद से पहले सख्त जांच से गुजरना होगा। यह फ्रेमवर्क सेना, नौसेना और वायुसेना के साथ मिलकर तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ड्रोन सिस्टम बिना पूरी जांच के सेना में शामिल न हो।

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इस नई व्यवस्था में ड्रोन को सिर्फ उड़ान क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी साइबर सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और कंट्रोल सिस्टम की मजबूती के आधार पर भी जांचा जाएगा। (Military Drone Security Framework)

चीन से जुड़ा है खतरा

भारतीय एजेंसियों को यह इनपुट मिल रहे थे कि कई ड्रोन में ऐसे पार्ट्स लगे हैं जो चीन में बने हैं। यह हार्डवेयर या फर्मवेयर के जरिए ड्रोन की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं या उसे कंट्रोल भी कर सकते हैं।

इसका खतरा सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं है। अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल बाहर से लिया जा सके, तो वह मिशन के दौरान गलत दिशा में जा सकता है या संवेदनशील जानकारी बाहर भेज सकता है। इसी वजह से अब हर ड्रोन को पूरी तरह जांचने का फैसला लिया गया है। (Military Drone Security Framework)

सीमा पर हुई घटना ने बढ़ाई चिंता

पिछले साल एक घटना ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया। पूर्वी सेक्टर में चीन सीमा के पास उड़ रहा एक भारतीय ड्रोन अचानक अपनी दिशा से भटक गया और चीन के नियंत्रण वाले इलाके में पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने उस ड्रोन का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। कुछ समय तक उसे ऑपरेट करने के बाद उन्होंने उसे वापस लौटा दिया। यह ड्रोन इजरायली तकनीक पर बेस्ड था और इसमें एन्क्रिप्टेड डेटा लिंक भी था, इसके बावजूद उसका कंट्रोल छिन जाना सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील था।

सात बड़े खतरों की हुई पहचान

नए फ्रेमवर्क में ड्रोन से जुड़े सात प्रमुख खतरों की पहचान की गई है। इसमें ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच कम्युनिकेशन लिंक को इंटरसेप्ट करना, जीपीएस जैमिंग या स्पूफिंग, फर्मवेयर के जरिए कंट्रोल हासिल करना, डेटा चोरी, इंटरनेट के जरिए डेटा बाहर भेजना, बाहर से भेजे गए मैलिशियस अपडेट और नेटवर्क से जुड़े डिवाइसेस के जरिए अतिरिक्त डेटा कलेक्शन शामिल हैं। इन सभी खतरों को ध्यान में रखते हुए टेस्टिंग सिस्टम तैयार किया गया है, ताकि ड्रोन के हर हिस्से को अलग-अलग स्तर पर जांचा जा सके। (Military Drone Security Framework)

कैसे काम करेगा 20 पॉइंट टेस्ट सिस्टम

रक्षा मंत्रालय ने जो नया सिस्टम बनाया है, उसमें कुल 20 टेस्ट होंगे। इनमें 10 हार्डवेयर से जुड़े होंगे और 10 सॉफ्टवेयर से। हार्डवेयर टेस्ट में ड्रोन के अंदर लगे इंटीग्रेटेड सर्किट की जांच की जाएगी। यह देखा जाएगा कि कहीं उनमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई है। इसके अलावा सिक्योर बूट सिस्टम, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की परतों की जांच और अलग-अलग हिस्सों के बीच होने वाले कम्युनिकेशन की सिक्योरिटी भी चेक की जाएगी।

वहीं सॉफ्टवेयर टेस्ट में यह देखा जाएगा कि ड्रोन में इस्तेमाल हो रहे क्रिप्टोग्राफिक-की कितनी सुरक्षित हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम की मेमोरी प्रोटेक्शन, डेटा ट्रांसफर के दौरान सिक्योरिटी और फर्मवेयर को बिना अनुमति बदले जाने से रोकने की क्षमता की भी जांच होगी। साथ ही यह देखा जाएगा कि ड्रोन का ऑपरेटिंग सिस्टम, डेटा ट्रांसफर और कंट्रोल सिस्टम सुरक्षित है या नहीं। इसमें यह भी जांचा जाएगा कि कहीं ड्रोन को दूर से हैक करके कंट्रोल तो नहीं किया जा सकता।

आठ अहम हिस्सों पर खास नजर

ड्रोन के आठ हिस्सों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, उसका फर्मवेयर, ट्रांसमिशन यूनिट, आईएनएस और जीपीएस मॉड्यूल, सेंसर, ग्राउंड डेटा टर्मिनल और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन का सॉफ्टवेयर शामिल हैं। इन हिस्सों में अगर कोई भी कमजोरी होती है, तो पूरा सिस्टम खतरे में आ सकता है। इसलिए इन पर सबसे ज्यादा सख्ती रखी गई है। (Military Drone Security Framework)

किन ड्रोन पर लागू होंगे नियम

अभी यह नियम छोटे और हल्के ड्रोन पर लागू किया गया है, जिन्हें लो, स्लो और स्मॉल कैटेगरी में रखा जाता है। इसमें नैनो, माइक्रो और छोटे क्वाडकॉप्टर और हेक्साकॉप्टर जैसे ड्रोन शामिल हैं। ये वही ड्रोन हैं, जो सेना में निगरानी, टोही और सीमित ऑपरेशन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। इन्हीं में सबसे ज्यादा सुरक्षा खतरे भी सामने आए हैं।

टेस्टिंग कहां और कैसे होगी

ड्रोन की जांच भारत में ही होगी। इसके लिए सिर्फ उन्हीं लैब को अनुमति दी जाएगी, जो एनएबीएल से मान्यता प्राप्त हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल कर चुकी हों। फिलहाल क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ही एक ऐसी संस्था है, जो पूरी टेस्टिंग प्रक्रिया को संभाल सकती है। इसके अलावा डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस सिकंदराबाद में एक नई टेस्टिंग सुविधा तैयार कर रहा है। (Military Drone Security Framework)

गलत जानकारी देने पर सख्त कार्रवाई

अगर कोई कंपनी अपने ड्रोन के पार्ट्स या सॉफ्टवेयर के बारे में गलत जानकारी देती है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होगी। ऐसे विक्रेताओं को सीधे सस्पेंड किया जा सकता है या भविष्य के कॉन्ट्रैक्ट से बाहर किया जा सकता है और ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।

रक्षा उत्पादन विभाग एक सेंट्रल डेटाबेस भी बनाएगा, जिसमें उन कंपनियों और ड्रोन मॉडल्स की जानकारी होगी जो सभी टेस्ट पास कर चुके हैं। एक बार मंजूरी मिलने के बाद उसी मॉडल को दोबारा टेस्ट की जरूरत नहीं होगी, जब तक उसमें कोई बदलाव न किया जाए।

इसके अलावा ड्रोन को सेना में शामिल करने के बाद भी उसकी निगरानी जारी रहेगी। समय-समय पर उसके सॉफ्टवेयर अपडेट और सुरक्षा जांच की जाएगी। अगर किसी ड्रोन में बाद में कोई कमजोरी पाई जाती है, तो उसे तुरंत ठीक किया जाएगा या सिस्टम से हटाया जा सकता है। (Military Drone Security Framework)

बनी हुई है सप्लाई चेन की चुनौती

हालांकि यह नया फ्रेमवर्क काफी सख्त है, लेकिन एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है। भारत में चिप स्तर पर पूरी तरह स्वदेशी निर्माण अभी शुरुआती चरण में है। पहले एक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए हार्डवेयर के सोर्स को ट्रैक किया जाता था, लेकिन नवंबर 2024 में उसे बंद कर दिया गया। इसके बाद सप्लाई चेन की पूरी ट्रेसबिलिटी अभी भी एक अधूरी कड़ी बनी हुई है। इस वजह से यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि हर पार्ट पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इसलिए फिलहाल टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। (Military Drone Security Framework)

सैनिक स्कूलों को लेकर संसदीय समिति ने कही ये बड़ी बात, बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर जताई नाराजगी!

Sainik Schools India
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Sainik Schools: देश के सैनिक स्कूलों को लेकर संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने बड़ी सिफारिश की है। हाल ही में जारी संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक अब इन स्कूलों का फोकस केवल आर्म्ड फोर्सेज में भर्ती तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समिति का कहना है कि छात्रों को रक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों जैसे डिफेंस रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिसिन में भी करियर बनाने के लिए तैयार किया जाए।

यह सिफारिश समिति की हालिया रिपोर्ट में दी गई है, जिसमें कहा गया है कि समय के साथ युद्ध और सुरक्षा का स्वरूप बदल गया है। ऐसे में छात्रों को भी नई तकनीक और आधुनिक क्षेत्रों के लिए तैयार करना जरूरी है। (Sainik Schools)

Sainik Schools: अब केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा करियर

अभी तक सैनिक स्कूलों का मुख्य उद्देश्य छात्रों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और नौसेना अकादमी के लिए तैयार करना रहा है। यहां पढ़ने वाले अधिकतर छात्र सेना, नौसेना या वायुसेना में जाने का सपना देखते हैं।

लेकिन समिति ने कहा है कि अब छात्रों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार अन्य विकल्प भी दिए जाने चाहिए। इसमें डिफेंस टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, रिसर्च, मेडिकल और डिजाइन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इससे छात्रों के सामने करियर के ज्यादा रास्ते खुलेंगे। (Sainik Schools)

देश में कितने हैं सैनिक स्कूल

देश में इस समय कुल 33 सैनिक स्कूल हैं, जो 1961 से केंद्र और राज्य सरकारों के मिल कर चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और देहरादून स्थित राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज भी रक्षा मंत्रालय के तहत काम करते हैं।

आरआईएमसी की स्थापना 1922 में हुई थी और राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल 1925 से शुरू हुए। ये दोनों पूरी तरह केंद्र सरकार के अधीन हैं। वहीं सैनिक स्कूल केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से चलते हैं।

इन संस्थानों का उद्देश्य शुरू से ही सेना के लिए अधिकारियों को तैयार करना और देश के अलग-अलग हिस्सों से युवाओं को समान अवसर देना रहा है। (Sainik Schools)

नए विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश

रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिक स्कूल, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज के छात्रों को रक्षा से जुड़े दूसरे क्षेत्रों जैसे रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिकल फील्ड में भी जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे छात्रों को ज्यादा अवसर मिलेंगे और वे अलग-अलग क्षेत्रों में देश की सेवा कर सकेंगे।

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि सैनिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में आधुनिक तकनीक से जुड़े विषय शामिल किए जाएं। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वारफेयर, स्पेस वारफेयर, ड्रोन टेक्नोलॉजी, क्वांटम टेक्नोलॉजी और डायरेक्टेड एनर्जी जैसे विषय शामिल हैं।

इन विषयों के जरिए छात्रों को नई तरह के युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में जानकारी मिलेगी। साथ ही वे आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे। (Sainik Schools)

मल्टी-डायरेक्शनल शिक्षा पर जोर

रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय को इन स्कूलों के जरिए छात्रों में शुरुआती स्तर से ही जागरूकता बढ़ानी चाहिए। इसके लिए एक मल्टी-प्रॉन्ग्ड अप्रोच अपनाने की बात कही गई है, जिसमें छात्रों को अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में जानकारी दी जाए और उनकी पसंद के मुताबिक मार्गदर्शन किया जाए।

इसका उद्देश्य छात्रों का समग्र विकास करना है, ताकि वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें और देश के भविष्य में योगदान दे सकें। (Sainik Schools)

नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना

सरकार पहले ही देश में 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना शुरू कर चुकी है। ये स्कूल एनजीओ, प्राइवेट संस्थानों और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में खोले जा रहे हैं। अब तक 86 नए स्कूलों को मंजूरी मिल चुकी है।

इन नए स्कूलों के जरिए ज्यादा से ज्यादा छात्रों को सैनिक शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। (Sainik Schools)

फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि कई सैनिक स्कूलों को बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। खासकर राज्य सरकारों से मिलने वाली आर्थिक मदद काफी नहीं है।

इस वजह से स्कूलों के रखरखाव, स्टाफ सुविधाओं और अन्य जरूरी कामों में दिक्कत आती है। समिति ने सुझाव दिया है कि इन स्कूलों को पर्याप्त फंड दिया जाए ताकि उनकी जरूरतें पूरी हो सकें। (Sainik Schools)

सरकार को दिए निर्देश

समिति ने रक्षा मंत्रालय से कहा है कि वह वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर सैनिक स्कूलों के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित करे। इसके साथ ही पुराने 33 सैनिक स्कूलों के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नए स्कूलों को फीस सपोर्ट, ट्रेनिंग ग्रांट और अन्य सुविधाएं समय पर दी जानी चाहिए, ताकि उनकी गुणवत्ता बनी रहे। (Sainik Schools)

Special Report: भारतीय सेना की आर्मर्ड कोर में बड़ा बदलाव! अब हर टैंक यूनिट के साथ होगी ड्रोन से लैस ये खास “स्क्वाड्रन”

Shaurya Squadron Indian Army
Shaurya Squadron Indian Army

Shaurya Squadron Indian Army: भारतीय सेना अब तेजी से अपने युद्ध लड़ने के तरीके को बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका-ईरान जैसे हालिया संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ टैंक, तोप और सैनिकों से नहीं जीते जाते, बल्कि टेक्नोलॉजी, खासकर ड्रोन की बड़ी भूमिका होती है। यही वजह है कि भारतीय सेना अब अपनी इन्फैंट्री के बाद आर्मर्ड कोर यानी टैंक यूनिट्स में भी बड़ा बदलाव करने जा रही है।

सेना अब हर आर्मर्ड रेजिमेंट में “शौर्य स्क्वाड्रन” नाम से एक नई यूनिट जोड़ने की तैयारी कर रही है। यह कोई सामान्य यूनिट नहीं होगी, बल्कि इन्फैंट्री की अश्नि प्लाटून की तरह ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस एक आधुनिक टैक्टिकल फोर्स होगी, जो टैंकों की ताकत को कई गुना बढ़ा देगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

Shaurya Squadron Indian Army: क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों ने दुनिया को दिखाया है कि ड्रोन अब गेम चेंजर बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसा देखा गया कि छोटे-छोटे ड्रोन ने महंगे टैंकों को भी नष्ट कर दिया। वहीं, मिडिल ईस्ट में भी ड्रोन अटैक और सर्विलांस ने युद्ध की दिशा बदल दी।

भारतीय सेना ने इन अनुभवों से सीख लेते हुए यह फैसला किया है कि अब सिर्फ टैंक या आर्मर्ड व्हीकल्स पर निर्भर रहना काफी नहीं है। उन्हें ड्रोन-एनेबल्ड बनाना जरूरी है। यानी अब टैंक जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान से मिलने वाली जानकारी और हमले की क्षमता के साथ काम करेंगे। (Shaurya Squadron Indian Army)

क्या है नई शौर्य स्क्वाड्रन

शौर्य स्क्वाड्रन भारतीय सेना की एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे खास तौर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस के लिए तैयार किया जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी यूनिट है जो एक साथ कई काम कर सकती है। इन प्रस्तावित स्क्वाड्रनों को आर्मर्ड रेजिमेंट के अंदर कंपनी स्तर पर बनाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि ड्रोन यूनिट्स को सीधे फ्रंटलाइन लड़ाकू यूनिट्स के साथ जोड़ा जाएगा, न कि उन्हें ऊपर के स्तर पर अलग रखा जाएगा।

आम तौर पर एक आर्मर्ड रेजिमेंट की कंपनी में करीब एक दर्जन टैंक और सौ से ज्यादा जवान होते हैं। ऐसे में इसी स्तर पर ड्रोन तैनात करने का मकसद है कि निगरानी, टारगेट पहचान और हमला करने की प्रक्रिया को तेज और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।

यह यूनिट दुश्मन की निगरानी करेगी, टारगेट ढूंढेगी, जरूरत पड़ने पर तुरंत हमला भी करेगी और लगातार मैदान में सक्रिय भी रहेगी। इसका मकसद है दूर तक देखना, गहराई में वार करना और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखना।

यह यूनिट सबसे पहले सदर्न कमांड के तहत सुदर्शन चक्र कोर की व्हाइट टाइगर डिवीजन में रेज की गई है। हाल ही में इसे बाबीना फायरिंग रेंज में “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” के दौरान टेस्ट भी किया गया, जहां इसने अपनी क्षमताओं का सफल प्रदर्शन किया। (Shaurya Squadron Indian Army)

ड्रोन के साथ टैंक की नई जोड़ी

अब भारतीय सेना का फोकस यह है कि टैंक और ड्रोन एक साथ मिलकर काम करें। पहले टैंक आगे बढ़ते थे और उन्हें दुश्मन की जानकारी सीमित मिलती थी। लेकिन अब ड्रोन पहले ही आसमान से दुश्मन की पोजीशन, मूवमेंट और हथियारों की जानकारी दे देंगे।

इससे टैंक यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी हो जाएंगी। अगर दुश्मन कहीं छिपा हुआ है, तो ड्रोन पहले ही उसे पहचान लेगा। इसके बाद टैंक या ड्रोन खुद उस पर सटीक हमला कर सकते हैं।

यही नहीं, अब टैंक कॉलम के आगे ड्रोन “स्काउट” की तरह काम करेंगे। यानी वे रास्ता साफ करेंगे, खतरे की जानकारी देंगे और जरूरत पड़ने पर खुद हमला भी कर सकते हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

हर आर्मर्ड रेजिमेंट में होगी ड्रोन यूनिट

सूत्रों के मुताबिक, इन स्क्वाड्रनों का फोकस निगरानी के साथ-साथ हमले पर भी रहेगा। इसमें फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन के जरिए दुश्मन के टैंक और लॉजिस्टिक ठिकानों पर हमला करने की क्षमता शामिल होगी।

हालांकि, सूत्रों ने यह भी साफ किया है कि “शौर्य स्क्वाड्रन” का यह कॉन्सेप्ट अभी शुरुआती चरण में है और इसे धीरे-धीरे डेवलप किया जा रहा है।

सेना की योजना है कि आने वाले समय में हर आर्मर्ड रेजिमेंट में एक डेडिकेटेड ड्रोन प्लाटून या शौर्य स्क्वाड्रन तैनात किया जाए। इसमें करीब 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक होंगे, जो खास तौर पर ड्रोन ऑपरेशन में एक्सपर्ट होंगे। बता दें कि प्रेसिडेंट गार्ड को शामिल करके सेना में लगभग 60 से 67 आर्मर्ड रेजिमेंट्स हैं। जिनमें से हर एक में लगभग 45-50 टैंक हैं और इन्हें कई स्क्वाड्रनों में बांटा गया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

भारतीय सेना के पास करीब 4000-4200 तक मुख्य युद्धक टैंक हैं। इनमें टी-90 भीष्मा, टी-72 अजेय और अर्जुन एमके1ए जैसे टैंक शामिल हैं। सेना की आर्मर्ड रेजिमेंट्स इन्हीं टैंकों को चलाती और इस्तेमाल करती हैं।

इन यूनिट्स के पास अलग-अलग तरह के ड्रोन होंगे। कुछ ड्रोन सिर्फ निगरानी के लिए होंगे, कुछ दुश्मन पर हमला करने के लिए और कुछ ऐसे होंगे जो टारगेट पर मंडराते रहेंगे और सही समय पर खुद को विस्फोट कर देंगे।

इस तरह यह यूनिट टैंक यूनिट्स के लिए “आंख और हथियार” दोनों का काम करेगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज में दिखी ताकत

हाल ही में बाबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” में शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन देखा गया। जहां सदर्न कमांड के जजनरल ऑफिसर कमांडर इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ भी इस एक्सरसाइज को देखने पहुंचे। इस एक्सरसाइज में टैंक, अटैक हेलीकॉप्टर, फाइटर जेट, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम एक साथ काम करते नजर आए।

यह पहली बार था जब इतने बड़े स्तर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का प्रदर्शन किया गया। इसमें ड्रोन ने रियल-टाइम सर्विलांस दिया, टारगेट की पहचान की और फिर सटीक हमले में मदद की।

बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ जल्द ही दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे।

सदर्न कमांड की तरफ से जारी ट्विट में लिखा गया, “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज के दौरान भारतीय सेना ने शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन किया। यह एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे व्हाइट टाइगर डिवीजन ने सुदर्शन चक्र कोर के तहत तैयार किया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

इस एक्सरसाइज में शौर्य स्क्वाड्रन को बिल्कुल असली युद्ध जैसे माहौल में टेस्ट किया गया। इसमें इस यूनिट ने दिखाया कि कैसे यह एक साथ दुश्मन पर नजर रख सकती है, उसकी गतिविधियों को समझ सकती है और फिर सही समय पर सटीक हमला भी कर सकती है।

शौर्य स्क्वाड्रन की खास बात यह है कि यह दूर तक निगरानी करने, दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर हमला करने और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखने के लिए बनाई गई है। यह रियल टाइम जानकारी जुटाकर तुरंत और सटीक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

इस एक्सरसाइज से यह साफ हो गया कि आने वाले समय में यह यूनिट युद्ध के मैदान में बहुत अहम भूमिका निभा सकती है और सेना की ताकत को काफी बढ़ा सकती है।” (Shaurya Squadron Indian Army)

इन्फैंट्री में अश्नि, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र

पिछले साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, भैरव बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई UAV/ड्रोन-केंद्रित स्ट्रक्चर बनाने का ऐलान किया था। ये सभी यूनिट्स मुख्य रूप से इन्फैंट्री और आर्टिलरी के लिए डिजाइन की गई हैं, ताकि पारंपरिक बलों को आधुनिक ड्रोन युद्ध क्षमता से लैस किया जा सके।

अश्नि प्लाटून (Ashni Platoons) इन्फैंट्री बटालियनों के अंदर रेज की गई हैं। प्रत्येक बटालियन में 20-25 विशेष प्रशिक्षित सैनिकों वाली यह प्लाटून सर्विलांस, रिकॉन्सेंस, FPV स्ट्राइक और लॉइटरिंग मुनिशन (कामिकाजे ड्रोन) से लैस है। इसका उद्देश्य हर इन्फैंट्री यूनिट को ऑर्गेनिक ड्रोन क्षमता देना है, जिससे ग्राउंड फोर्सेस रीयल-टाइम इंटेलिजेंस और प्रिसिजन स्ट्राइक कर सकें। सेना की योजना है कि हर इन्फैंट्री यूनिट में अश्नि प्लाटून तैयार की जाए।

शक्तिबाण रेजिमेंट भी आर्टिलरी के अंतर्गत तैयार की गई हैं। ये यूएवी/सी-यूएवी आधारित स्पेशल आर्टिलरी रेजिमेंट्स हैं, जो लंबी दूरी के ड्रोन स्वार्म, लॉइटरिंग मुनिशन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम से लैस हैं। ये बैटलफील्ड पर डीप स्ट्राइक और एंटी-ड्रोन रक्षा प्रदान करती हैं।

भैरव बटालियन स्पेशल फोर्सेस/लाइट कमांडो यूनिट्स हैं, जो घातक और स्पेशल फोर्सेस के बीच की कड़ी है। ये ड्रोन-इंटीग्रेटेड कमांडो ऑपरेशंस के लिए हैं, जहां स्वार्म ड्रोन, ओवरवॉच और शॉक एक्शन पर फोकस है। 25-30 ऐसी बटालियन रेज की जा रही हैं।

वहीं, दिव्यास्त्र बैटरी आर्टिलरी में लॉइटरिंग मुनिशन और सर्विलांस एसेट्स का कॉम्बिनेशन हैं। ये मूविंग टारगेट्स को ट्रैक करके रीयल-टाइम में सटीक हमला करती हैं, जिससे आर्टिलरी की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

ये स्ट्रक्चर ‘डेकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ (2023-2032) का हिस्सा हैं, जो रुद्र ब्रिगेड्स के साथ मिलकर सेना को अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए तैयार कर रही हैं। ड्रोन को सबसे निचले स्तर तक इंटीग्रेट करके भारतीय सेना फ्यूचर-रेडी बन रही है, जहां हर सैनिक ईगल इन द आर्म की तरह ड्रोन से लैस होगा। यह परिवर्तन सीमा पर चीन-पाकिस्तान थ्रेट्स के जवाब में महत्वपूर्ण है। (Shaurya Squadron Indian Army)

सेना की “ड्रोन-फर्स्ट” अप्रोच

भारतीय सेना अब धीरे-धीरे “ड्रोन-फर्स्ट” रणनीति की ओर बढ़ रही है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में सबसे पहले ड्रोन का इस्तेमाल होगा, उसके बाद बाकी हथियारों का।

भारतीय सेना की इन्फैंट्री में पहले ही अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र जैसे ड्रोन यूनिट्स तैनात की जा चुकी हैं। अब उसी मॉडल को आर्मर्ड में भी लागू किया जा रहा है।

सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक हर सैनिक को बेसिक ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग मिल जाए। इसके लिए देशभर के कई मिलिट्री संस्थानों में ट्रेनिंग सेंटर भी बनाए गए हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

रुद्र ब्रिगेड और मल्टी-डोमेन वॉर

सेना अब सिर्फ यूनिट लेवल पर ही नहीं, बल्कि ब्रिगेड लेवल पर भी बदलाव कर रही है। “रुद्र ब्रिगेड” जैसे नए स्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं, जिनमें टैंक, इन्फैंट्री, आर्टिलरी और ड्रोन सभी को एक साथ जोड़ा जा रहा है।

इससे सेना की मारक क्षमता और प्रतिक्रिया समय दोनों बेहतर होंगे। दुश्मन पर तेजी से और सटीक हमला करना आसान हो जाएगा। (Shaurya Squadron Indian Army)

F-INSAS प्रोग्राम के तहत सेना खरीदेगी 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स, एक क्लिक में दुश्मन खत्म!

Holographic Reflex Sight India RFI

Holographic Reflex Sight India RFI: भारतीय सेना को आधुनिक बनाने के लिए फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (F-INSAS) के तहत रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। यह इक्विपमेंट जवानों की निशानेबाजी को पहले से कहीं ज्यादा तेज और सटीक बनाने में मदद करेगा। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत की जा रही है, ताकि देश में ही इन इक्विपमेंट्स का निर्माण हो सके।

Holographic Reflex Sight India RFI: क्या है होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट और क्यों है जरूरी

सरल शब्दों में समझें तो होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट एक आधुनिक निशानेबाजी इक्विपमेंट है, जो राइफल पर लगाया जाता है। पहले जवान आयरन साइट्स यानी साधारण निशाने का इस्तेमाल करते थे, जिसमें टारगेट को फोकस करने में थोड़ा समय लगता था। लेकिन इस नई तकनीक में जवानों को एक होलोग्राफिक रेटिकल यानी चमकता हुआ निशान दिखाई देता है, जिससे वह बहुत तेजी से टारगेट पर निशाना लगा सकता है।

यह इक्विपमेंट मुख्य रूप से 7.62×51 मिमी असॉल्ट राइफल के साथ इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन इसे 7.62×39 मिमी राइफल पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जवान दोनों आंखें खुली रखकर भी फायरिंग कर सकता है। इससे आसपास के हालात पर नजर बनाए रखते हुए भी दुश्मन पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में जहां हर सेकंड की अहमियत होती है, वहां यह इक्विपमेंट काफी मददगार साबित होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

हर मौसम और हर इलाके में काम करेगा

आरएफआई में साफ कहा गया है कि ये साइट्स देश के अलग-अलग इलाकों में इस्तेमाल होंगी। इसमें पश्चिमी सीमा के रेगिस्तान से लेकर उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ तक शामिल हैं। यानी यह इक्विपमेंट 18,000 फीट की ऊंचाई तक भी काम करेगा।

मौसम चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, जैसे तेज बारिश, धूल, बर्फ या तेज धूप, यह साइट लगातार काम करती रहेगी। तापमान माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तक होने पर भी इसकी परफॉर्मेंस पर असर नहीं पड़ेगा। और जेन-2 या जेन-3 इमेज इंटेंसिफायर के साथ आसानी से काम करेंगी। रात के समय भी इसे नाइट विजन डिवाइस के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे सैनिक अंधेरे में भी दुश्मन को आसानी से देख और निशाना लगा पाएंगे। इनका डिजाइन मॉड्यूलर होगा, यानी भविष्य में इन्हें बिना ज्यादा बदलाव किए आसानी से अपग्रेड किया जा सकेगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

सैनिकों की ताकत कई गुना बढ़ेगी

इस इक्विपमेंट से सैनिकों की फायरिंग स्पीड और सटीकता दोनों बढ़ेंगी। पहले जहां निशाना साधने में समय लगता था, अब दुश्मन को देखते ही तुरंत फायर किया जा सकेगा। इसमें पैरालैक्स एरर नहीं होता, यानी आंख की स्थिति बदलने पर भी निशाना नहीं बदलता।

सबसे खास बात यह है कि अगर इस साइट का सामने वाला ग्लास आंशिक रूप से टूट भी जाए, तब भी इसका रेटिकल काम करता रहता है। यही होलोग्राफिक साइट की सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। यानी युद्ध के दौरान नुकसान होने पर भी सैनिक अपनी फायरिंग जारी रख सकता है। यही वजह है कि इसे सैनिकों के लिए “तीसरी आंख” भी कहा जाता है।

इसके साथ ही इसमें लंबी बैटरी लाइफ होनी चाहिए, ताकि इसे बार-बार चार्ज या बदलने की जरूरत न पड़े। सैनिक अगर दस्ताने पहने हों तब भी इसके बटन आसानी से दबा सकें। इसे हेलमेट या गैस मास्क पहनकर भी आराम से इस्तेमाल किया जा सके और राइफल के रेल कवर या चार्जिंग हैंडल के साथ कोई दिक्कत न आए।

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई जारी करके कंपनियों से जानकारी मांगी है। इसका मकसद यह जानना है कि कौन-कौन सी भारतीय या विदेशी कंपनियां इस तरह के इक्विपमेंट बना सकती हैं। कंपनियों को 28 अप्रैल तक अपना जवाब देना होगा।

इसके बाद तकनीकी जांच होगी, फिर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि इक्विपमेंट असली परिस्थितियों में कितना अच्छा काम करता है। इसमें ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, बारिश और धूल जैसी परिस्थितियों में टेस्ट किया जाएगा। जो कंपनी इन सभी टेस्ट में सफल होगी, उसे आगे कॉन्ट्रैक्ट मिलने की संभावना होगी। (Holographic Reflex Sight India RFI)

‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा बड़ा फायदा

इस पूरी खरीद प्रक्रिया का एक बड़ा उद्देश्य देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक इक्विपमेंट भारत में ही बनें। इससे देश की कंपनियों को काम मिलेगा, रोजगार बढ़ेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

भारतीय कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि वे कितने प्रतिशत इक्विपमेंट देश में ही बना सकती हैं और क्या वे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन कर सकती हैं। अगर यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में भारत खुद इस तकनीक में आत्मनिर्भर बन सकता है।

कंपनियों से पूछा गया है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का क्या प्लान है और जरूरी पार्ट्स कहां से आएंगे।

ट्रायल्स के लिए “नो कॉस्ट नो कमिटमेंट” आधार रखा गया है, यानी कंपनियों को बिना किसी भुगतान के अपने प्रोडक्ट का टेस्ट देना होगा। यह टेस्ट ऊंचाई वाले इलाकों, रेगिस्तान, बारिश, धूल, रिकॉयल और गिरने जैसी स्थितियों में किया जाएगा। इसके लिए वेंडर को अपना प्रोटोटाइप देना होगा।

ट्रेनिंग के मामले में भी कंपनियों से पूछा गया है कि वे सैनिकों और तकनीकी स्टाफ को कैसे ट्रेनिंग देंगे, क्या कंप्यूटर बेस्ड ट्रेनिंग देंगे और ट्रेन-द-ट्रेनर सिस्टम होगा या नहीं।

वहीं वेंडर चुनने की प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को इसमें कुछ छूट भी दी गई है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

अभी क्या स्थिति है सेना में

फिलहाल भारतीय सेना में यह तकनीक सीमित संख्या में इस्तेमाल हो रही है। इन्हें अभी चुनिंदा यूनिट्स में ही इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे घातक प्लाटून, पैरा एसएफ और वे इन्फैंट्री यूनिट्स जो फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (एफ-इंसास) के तहत आधुनिक उपकरणों से लैस हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या अभी कुछ हजार के आसपास ही है। कुछ यूनिट्स, खासकर स्पेशल फोर्सेस और घातक प्लाटून में ऐसे इक्विपमेंट पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब इन्हें बड़े स्तर पर लाने की तैयारी है।

सबसे पहले बात करें स्वदेशी विकल्प की, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल की होलोग्राफिक वेपन साइट सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आ रही है। इसे डीआरडीओ के सहयोग से बनाया गया है। यह साइट सिग-716आई बैटल राइफल, एके-203 असॉल्ट राइफल, इंसास और अन्य क्लोज क्वार्टर बैटल हथियारों पर लगाई जा रही है। यह एफ-इंसास प्रोग्राम का हिस्सा है और 2022 से धीरे-धीरे सेना में शामिल की जा रही है। इसकी खासियत यह है कि सैनिक दोनों आंखें खुली रखकर निशाना लगा सकता है, इसमें पैरालैक्स की समस्या नहीं होती, दिन और रात दोनों समय काम करती है और मजबूत होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत सस्ती भी है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

इसके अलावा कुछ इम्पोर्टेड साइट्स भी इस्तेमाल हो रही हैं, जिनमें ईओटेक EXPS3 और 512 मॉडल शामिल हैं। ये मुख्य रूप से पैरा एसएफ, एनएसजी और अन्य स्पेशल फोर्सेस के पास हैं। इन्हें एम4ए1 कार्बाइन, एके-203 और सिग-716 जैसी राइफलों पर लगाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दुनिया की सबसे भरोसेमंद होलोग्राफिक साइट्स मानी जाती हैं। अगर इनका फ्रंट ग्लास टूट भी जाए, तब भी रेटिकल काम करता रहता है, जो युद्ध में बहुत अहम होता है।

इसके अलावा कुछ अन्य साइट्स भी सीमित संख्या में मौजूद हैं। डीआरडीओ की इंडिजिनस साइट, जिसे इगनेटा कहा जाता है, अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के चरण में है और इसे सिग सॉयर, एके-47 और उग्रम जैसी राइफलों के लिए तैयार किया जा रहा है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

जानें फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम के बारे में

भारतीय सेना का फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम, जिसे एफ-इंसास (F-INSAS) कहा जाता है, एक ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट है जिसका मकसद सैनिकों को आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। इस सिस्टम में हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और डिजिटल नेटवर्क जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं, ताकि वह ज्यादा सुरक्षित, तेज और घातक बन सके।

यह योजना करीब 2007-08 में शुरू हुई थी। उस समय लक्ष्य था कि 2020 तक सेना की सभी इन्फैंट्री बटालियनों को आधुनिक इक्विपमेंटों से लैस कर दिया जाए। 2015 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया। पहले यह एक ही बड़ा प्रोग्राम था, लेकिन बाद में इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। पहला हिस्सा था सैनिकों के हथियार और व्यक्तिगत इक्विपमेंट, जैसे असॉल्ट राइफल, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते और अन्य जरूरी चीजें। दूसरा हिस्सा था बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम, यानी ऐसा डिजिटल सिस्टम जिससे सैनिक को रीयल टाइम में जानकारी मिल सके कि दुश्मन कहां है, उसके साथी कहां हैं और किस दिशा से हमला हो सकता है।

इसके बाद 2022 में इस प्रोग्राम को नया रूप मिला। रक्षा मंत्री ने इसका एक अपडेटेड वर्जन सेना को सौंपा। इसमें कई नई चीजें शामिल थीं, जैसे नया कैमोफ्लाज यूनिफॉर्म, एडवांस्ड हेलमेट, मजबूत बॉडी आर्मर, नाइट विजन डिवाइस, थर्मल इमेजर और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम। इसके साथ ही नई एके-203 असॉल्ट राइफल भी दी गई, जो पुरानी इंसास राइफल की जगह ले रही है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

फिलहाल यह प्रोग्राम धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। कई यूनिट्स, खासकर जो सीमा पर तैनात हैं, उन्हें नए इक्विपमेंट मिल चुके हैं। सैनिकों को बेहतर राइफल, मजबूत सुरक्षा गियर और आधुनिक इक्विपमेंट दिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ डीआरडीओ और निजी कंपनियां डिजिटल सिस्टम पर काम कर रही हैं, जिससे सैनिक को युद्ध के दौरान हर जानकारी तुरंत मिल सके।

आने वाले समय में इसमें और भी नई तकनीक जुड़ सकती है। जैसे सैनिक हेलमेट या चश्मे के जरिए ही दुश्मन की लोकेशन देख सके, ड्रोन से मिल रही जानकारी सीधे उसके सामने दिखाई दे, और वह तेजी से फैसले ले सके। इसे और बेहतर बनाने के लिए “स्मार्ट सोल्जर” जैसी पहल भी चल रही है।

इस प्रोग्राम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैनिक की फायरपावर बढ़ेगी। नई राइफल से वह ज्यादा दूर और सटीक निशाना लगा सकेगा। साथ ही, बेहतर बॉडी आर्मर और हेलमेट उसे दुश्मन की गोली से बचाने में मदद करेंगे। हल्के और आरामदायक इक्विपमेंट होने से उसकी मूवमेंट भी बेहतर होगी। सबसे अहम बात यह है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए उसे हर समय पूरी स्थिति की जानकारी मिलती रहेगी, जिससे वह ज्यादा समझदारी से लड़ाई लड़ सकेगा।

कुल मिलाकर, एफ-इंसास अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रहा, बल्कि भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की पूरी सोच बन चुका है। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारतीय सैनिक को तकनीक से लैस एक “स्मार्ट फाइटर” बना देगा, जो हर तरह की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की तैयारी; सरकार ने संसदीय कमेटी में क्या कहा थिएटर कमांड्स पर, अगले 3 माह में कैसे बदलेगा पूरा मिलिट्री स्ट्रक्चर?

India Theatre Commands
3 Service Chiefs and CDS (File Photo)

India Theatre Commands: अगले कुछ महीने भारतीय सेनाओं के लिए बेहद अहम होने वाले हैं। एक तरफ जहां, सीडीएस, नेवी चीफ मई के आखिर तक रिटायर हो जाएंगे तो मौजूदा आर्मी चीफ जून के आखिर तक रिटायर होंगे। वहीं दूसरी तरफ सरकार तीन इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स बनाने की तैयारी में है, जिससे सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर काम करेंगी। इस पर संसदीय कमेटी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है और लगभग सभी पक्षों में सहमति बन गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, अब कुछ अंतिम मुद्दों पर चर्चा चल रही है और प्रशासनिक काम भी साथ-साथ आगे बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि मई तक इस पर बड़ा फैसला हो सकता है। कोशिश यह है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के मई में रिटायर होने से पहले इस योजना को मंजूरी मिल जाए। इसके लिए जल्द ही कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी से अप्रूवल लिया जा सकता है। यह बदलाव आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। (India Theatre Commands)

India Theatre Commands: क्या होते हैं थिएटर कमांड्स

थिएटर कमांड्स का मतलब है कि किसी खास इलाके या दुश्मन के हिसाब से सेना की तीनों शाखाओं को एक कमांड के तहत लाया जाए। अभी भारत में आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के अलग-अलग कमांड हैं, जो अपने-अपने तरीके से काम करते हैं।

नए सिस्टम में एक ही कमांडर के तहत तीनों सेनाएं मिलकर ऑपरेशन चलाएंगी। इससे फैसले जल्दी होंगे और युद्ध के समय तालमेल बेहतर रहेगा। (India Theatre Commands)

रक्षा मंत्रालय ने क्या कहा संसदीय कमेटी को

संसदीय कमेटी को रक्षा मंत्रालय ने बताया कि थिएटर कमांड्स बनाने की दिशा में अच्छा काम हुआ है और ज्यादातर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। अब कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा चल रही है, जिन्हें चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी यानी सीओएससी अंतिम रूप दे रही है। साथ ही, प्रशासनिक स्तर पर भी तैयारियां लगातार जारी हैं, ताकि जब फैसला हो, तो उसे तुरंत लागू किया जा सके।

सरकार का मानना है कि आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर, स्पेस और मल्टी-डोमेन में भी होती है। ऐसे में सेना के ढांचे में बदलाव करना जरूरी हो गया है, ताकि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तेजी और बेहतर तरीके से काम किया जा सके।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा है कि थिएटर कमांड्स का एक बड़ा फायदा यह होगा कि तीनों सेनाओं के बीच “जॉइंटनेस” यानी मिलकर काम करने की संस्कृति मजबूत होगी। अभी अलग-अलग सिस्टम होने की वजह से कई बार तालमेल की कमी दिखती है, लेकिन नए ढांचे में यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। (India Theatre Commands)

तीन बड़े थिएटर कमांड्स की योजना

अभी भारत में करीब 17 अलग-अलग सिंगल सर्विस कमांड्स हैं। जैसे आर्मी के अलग कमांड, एयर फोर्स के अलग और नेवी के अलग कमांड्स हैं। थिएटर कमांड्स बनने के बाद इन सभी को मिलाकर तीन बड़े कमांड बनाए जाएंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने कमांड पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, बल्कि उनका रोल बदल जाएगा।

दुश्मन के हिसाब से बनेगा नया स्ट्रक्चर

सूत्रों के मुताबिक भारत जिस नए थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी कर रहा है, उसकी सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ नक्शे के हिसाब से नहीं, बल्कि दुश्मन के हिसाब से बनाया जा रहा है। यानी पहले की तरह सिर्फ इलाके के आधार पर कमांड नहीं होगी, बल्कि जहां से खतरा है, उसी हिसाब से पूरी सैन्य ताकत को एक जगह लाकर रखा जाएगा।

इस नए मॉडल में तीन बड़े थिएटर कमांड नॉर्दर्न, वेस्टर्न और मैरिटाइम बनाए जाने की योजना है। हर कमांड का अपना अलग रोल होगा और उसमें तीनों सेनाओं के संसाधन एक साथ काम करेंगे। (India Theatre Commands)

नॉर्दर्न थिएटर कमांड: चीन के खिलाफ सबसे बड़ा फ्रंट

नॉर्दर्न थिएटर कमांड का सबसे बड़ा फोकस चीन के साथ लगने वाली सीमा यानी एलएसी पर होगा। इसमें लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक का पूरा इलाका शामिल होगा। इसके साथ ही पूर्वी सेक्टर में बांग्लादेश और म्यांमार से जुड़े इलाकों पर भी नजर रखी जाएगी, ताकि पूरे पूर्वी मोर्चे को एक साथ कंट्रोल किया जा सके।

इस कमांड का हेडक्वार्टर लखनऊ में बनाया जा सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि लखनऊ भौगोलिक रूप से इस पूरे क्षेत्र के बीच में पड़ता है और यहां से कमांड और कंट्रोल करना आसान होगा।

इस थिएटर कमांड में आर्मी की नॉर्दर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के कुछ हिस्सों को शामिल किया जाएगा। साथ ही एयर फोर्स की वेस्टर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के एयर एसेट्स भी इसमें शामिल होंगे। यानी लड़ाई की स्थिति में जमीन और हवा दोनों से एक साथ कार्रवाई हो सकेगी। (India Theatre Commands)

इसका कमांडर तीन-स्टार रैंक का अधिकारी होगा, जो आर्मी या एयर फोर्स दोनों में से किसी से भी हो सकता है। माना जा रहा है कि इसमें रोटेशन सिस्टम भी हो सकता है, ताकि दोनों सेनाओं को बराबर मौका मिले।

इस कमांड का मुख्य उद्देश्य चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के खिलाफ मजबूत डिफेंस तैयार करना और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई यानी काउंटर-ऑफेंसिव करना होगा। पिछले कुछ सालों में एलएसी पर जो तनाव देखने को मिला है, उसके बाद इस कमांड की अहमियत और बढ़ जाती है। (India Theatre Commands)

वेस्टर्न थिएटर कमांड: पाकिस्तान फ्रंट पर तेजी से जवाब

वेस्टर्न थिएटर कमांड पूरी तरह पाकिस्तान को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसका इलाका सियाचिन में साल्टोरो रिज से लेकर रण ऑफ कच्छ तक फैला होगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में चल रहे काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस भी इसी कमांड के तहत आएंगे।

इसका हेडक्वार्टर जयपुर में बनाया जा सकता है। जयपुर की लोकेशन पश्चिमी मोर्चे के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि यहां से पूरे बॉर्डर पर नजर रखना आसान होता है। (India Theatre Commands)

इस थिएटर में आर्मी की वेस्टर्न और साउथ-वेस्टर्न कमांड्स के हिस्से शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के जरूरी स्क्वाड्रन्स भी इसमें जोड़े जाएंगे। यानी अगर किसी भी तरह के तनाव की स्थिति बनती है, तो आर्मी और एयर फोर्स मिलकर तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे।

इस कमांड का नेतृत्व भी तीन-स्टार जनरल करेगा, लेकिन यहां आर्मी अफसर को कमांड सौंपी जाा सकती है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ जमीन पर टकराव की संभावना ज्यादा रहती है।

इस थिएटर का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की पारंपरिक लड़ाई या “कोल्ड स्टार्ट” जैसे ऑपरेशन में तेजी से और प्रभावी कार्रवाई की जा सके। अभी तक अलग-अलग कमांड्स के चलते फैसलों में देरी हो सकती थी, लेकिन अब एक ही कमांडर के पास पूरा कंट्रोल होगा, जिससे प्रतिक्रिया का समय कम हो जाएगा। (India Theatre Commands)

मैरिटाइम थिएटर कमांड: नेवी की समुद्र में बढ़ेगी ताकत

तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण थिएटर कमांड होगा मैरिटाइम थिएटर कमांड, जो पूरी तरह समुद्री क्षेत्र पर फोकस करेगा। इसमें हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी जैसे इलाके शामिल होंगे। इसके साथ ही इंडियन ओशन रीजन में चीन की बढ़ती मौजूदगी पर भी नजर रखी जाएगी।

इसके हेडक्वार्टर के लिए तिरुवनंतपुरम, कारवार या कोयंबटूर में से किसी एक जगह को चुना जा सकता है। हालांकि तिरुवनंतपुरम की लोकेशन समुद्री ऑपरेशंस के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है।

इस थिएटर में नेवी की ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड्स के सभी एसेट्स शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के कुछ समुद्री ऑपरेशन से जुड़े स्क्वाड्रन्स और आर्मी की कोस्टल यूनिट्स भी इसमें शामिल होंगी। यानी समुद्र से जुड़े हर ऑपरेशन को एक ही कमांड के तहत लाया जाएगा।

इस कमांड का नेतृत्व नेवी के फ्लैग ऑफिसर यानी एडमिरल रैंक के अधिकारी के पास होगा। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि समुद्री ऑपरेशंस में नेवी की भूमिका सबसे ज्यादा होती है।

इस थिएटर का मुख्य उद्देश्य समुद्री रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक, जहां से दुनिया का बड़ा व्यापार गुजरता है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत को संतुलित करना भी इसका अहम लक्ष्य होगा। (India Theatre Commands)

कुल 197 जॉइंटनेस इनिशिएटिव्स तय

आज के समय में सेना की ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि तीनों सेनाएं – आर्मी, नेवी और एयर फोर्स – मिलकर कितनी अच्छी तरह काम करती हैं। इसी को “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन” कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है तीनों सेनाओं का एक टीम की तरह काम करना, ताकि युद्ध के समय पूरी ताकत एक साथ इस्तेमाल हो सके।

सरकार और रक्षा मंत्रालय का मानना है कि यही जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन भविष्य के युद्धों में जीत की सबसे बड़ी कुंजी है। इसी सोच के तहत कुल 197 अलग-अलग पहलें यानी इनिशिएटिव्स तय किए गए हैं। ये पहलें कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जैसे ऑपरेशन और इंटेलिजेंस, नई सैन्य क्षमता का विकास, कम्युनिकेशन और आईटी सिस्टम, लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस, मानव संसाधन, प्रशासन और कानूनी व्यवस्था।

इन सभी क्षेत्रों में सुधार करके यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि तीनों सेनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर काम करें।

इन 197 पहलों को अलग-अलग चरणों में लागू किया जा रहा है। पहले चरण में वे काम शामिल थे, जो थिएटर कमांड्स की घोषणा से पहले पूरे किए जाने थे। इस चरण में कुल 50 काम तय किए गए थे, जिनमें से 29 पूरे हो चुके हैं।

दूसरे चरण में थिएटर कमांड्स की घोषणा के बाद से लेकर उनके पूरी तरह काम शुरू करने तक पूरे किए जाएंगे। इस चरण में 62 काम तय किए गए हैं, जिनमें से 12 पर काम पूरा हो चुका है और बाकी पर तेजी से काम चल रहा है।

तीसरा चरण वह है, जो थिएटर कमांड्स के पूरी तरह ऑपरेशनल होने के बाद भी जारी रहेगा। इसमें 51 काम शामिल हैं, जिनमें से 7 पूरे किए जा चुके हैं। यानी यह प्रक्रिया सिर्फ एक बार की नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाला सुधार है।

अगर इन तीनों चरणों को मिलाकर देखें, तो कुल 163 काम इस मुख्य सेट में आते हैं, जिनमें से अब तक 48 पूरे हो चुके हैं। इसके अलावा 34 ऐसे काम भी हैं, जो थिएटर कमांड्स बनने से सीधे जुड़े नहीं हैं, लेकिन सेना की जॉइंटनेस बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। इनमें से 10 काम पूरे हो चुके हैं। (India Theatre Commands)

क्या हैं फोर्स एप्लीकेशन और फोर्स जनरेशन

थिएटर कमांड बनने के बाद अब सर्विस चीफ यानी आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के प्रमुख “फोर्स जनरेशन” पर ध्यान देंगे। यानी भर्ती, ट्रेनिंग, उपकरण और तैयारी उनकी जिम्मेदारी होगी। फोर्स जनरेशन यानी सेना को तैयार करना – भर्ती, ट्रेनिंग, हथियार आदि – यह काम सर्विस चीफ्स करेंगे।

जबकि फोर्स एप्लीकेशन यानी असली ऑपरेशन की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। इससे कमांडर पूरी तरह युद्ध और ऑपरेशन पर ध्यान दे पाएगा।

सथ ही, रणनीतिक और ऑपरेशनल प्लानिंग को नए तरीके से व्यवस्थित किया जाएगा। अब पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी एक ही कमांडर के पास होगी। इससे “यूनिटी ऑफ कमांड” बनेगी। पहले अलग-अलग कमांड होने की वजह से कई बार तालमेल की समस्या आती थी, लेकिन अब यह समस्या कम हो जाएगी। एक ही कमांडर पूरे ऑपरेशन को प्लान करेगा और तीनों सेनाएं मिलकर काम करेंगी। (India Theatre Commands)

अगले तीन महीनों में कई बड़े बदलाव

अगले तीन महीनों में भारतीय सेना के शीर्ष स्तर पर कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इसकी शुरुआत नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस की नियुक्ति से होगी। मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान को पिछले साल सितंबर में एक्सटेंशन दिया गया था, जो 30 मई तक है। यानी मई के अंत तक नए सीडीएस की नियुक्ति तय मानी जा रही है।

सरकार अप्रैल के अंत तक इस पर फैसला ले सकती है। रक्षा मंत्रालय के 2022 के नियमों के मुताबिक, सीडीएस पद के लिए वही अधिकारी चुने जा सकते हैं जो तीन-स्टार रैंक के हों, यानी लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल। ये अधिकारी या तो सेवा में हों या रिटायर हो चुके हों, लेकिन उनकी उम्र नियुक्ति के समय 62 साल से कम होनी चाहिए। (India Theatre Commands)

इस नियम में 2019 के पुराने नियम में बदलाव करके यह दायरा बढ़ाया गया था, जिसके बाद जनरल अनिल चौहान को भी 2022 में सीडीएस बनाया गया था। इसका मतलब यह है कि सरकार के पास काफी बड़ा विकल्प है और 150 से ज्यादा तीन-स्टार अधिकारी इस पद के लिए संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं।

हालांकि अगर सरकार चाहे, तो वह इस नियम से आगे जाकर मौजूदा सेना प्रमुखों में से भी किसी को सीडीएस बना सकती है। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि अगला सीडीएस कौन होगा।

सीडीएस के अलावा आर्मी और नेवी में भी बड़े बदलाव होने वाले हैं। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं, जबकि थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 30 जून को रिटायर होंगे। ऐसे में इन दोनों पदों पर भी नए चेहरों की नियुक्ति होगी।

अप्रैल की शुरुआत में ही आर्मी के शीर्ष अधिकारियों में फेरबदल की योजना बनाई जा चुकी है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनके स्थान पर लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को साउदर्न आर्मी कमांड का नया कमांडर बनाया जाएगा।

वहीं, मौजूदा वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल पीपी सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कटियार की जगह वेस्टर्न कमांड की कमान संभालेंगे, जो 31 मार्च को रिटायर हो रहे हैं। इसी दिन ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी भी रिटायर होंगे और उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को जिम्मेदारी दी जाएगी, जो अभी क्वार्टर मास्टर जनरल के पद पर हैं।

यह सारे बदलाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि मौजूदा कमांड सिस्टम जारी रहता है या नहीं। अगर जल्द ही इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स लागू हो जाते हैं, तो सेना के पूरे ढांचे में बड़े स्तर पर बदलाव, प्रमोशन और नई नियुक्तियां देखने को मिल सकती हैं। (India Theatre Commands)