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स्वदेशी फाइटर जेट इंजन को लेकर बड़ी खबर! कावेरी की देरी से लिया सबक, अब देश में बनेगा जेट इंजन टेस्टिंग सेंटर

National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility
National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility

National Aero Engine Test Complex: भारत अब जेट इंजन की टेस्टिंग को लेकर बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश जल्द ही अपना पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद यह है कि अब जेट इंजन की टेस्टिंग के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। (National Aero Engine Test Complex)

National Aero Engine Test Complex: कहां बनेगा यह हाई-टेक कॉम्प्लेक्स

सूत्रों के अनुसार, यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स कर्नाटक के चल्लाकेरे या फिर नागार्जुन सागर के आसपास बनाया जा सकता है। यह जगह इसलिए चुनी जा रही है क्योंकि यहां बड़े स्तर पर तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना आसान है।

अब तक भारत को अपने जेट इंजन की कई अहम टेस्टिंग के लिए रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की परफॉरमेंस जांचने के लिए भारत के पास खुद की सुविधा नहीं थी।

इस वजह से समय ज्यादा लगता था, खर्च बढ़ जाता था और कई बार प्रोजेक्ट में देरी भी हो जाती थी। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जिसमें टेस्टिंग के लिए विदेश जाना पड़ा और समयसीमा पर असर पड़ा। (National Aero Engine Test Complex)

कैसा होगा यह नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स

यह कॉम्प्लेक्स पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस होगा। इसमें जेट इंजन के हर हिस्से की टेस्टिंग के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी। इसमें हाई अल्टीट्यूड टेस्ट सिस्टम होगा, जहां 10 से 15 किलोमीटर ऊंचाई जैसी स्थिति बनाई जा सकेगी।

इसके अलावा इसमें फैन, कंप्रेसर, कंबस्चर, टरबाइन और आफ्टरबर्नर जैसे सभी अहम हिस्सों की जांच के लिए अलग टेस्ट सेटअप होंगे। इससे इंजन के छोटे-छोटे पार्ट्स से लेकर पूरे इंजन तक की जांच एक ही जगह पर हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

टर्नकी आधार पर बनेगा पूरा सिस्टम

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को टर्नकी आधार पर बनाने की योजना बनाई है। इसका मतलब है कि जो कंपनी इस प्रोजेक्ट को लेगी, वही डिजाइन से लेकर निर्माण और इंस्टॉलेशन तक की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी। इसमें सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ एडवांस टेस्टिंग सिस्टम भी शामिल होंगे। देश और विदेश की कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। (National Aero Engine Test Complex)

किन कंपनियों को मौका मिलेगा

इस प्रोजेक्ट में देशी और विदेशी कंपनियां दोनों हिस्सा ले सकती हैं। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स, टेस्ट फैसिलिटी बनाने वाली कंपनियां, जॉइंट वेंचर और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल हो सकते हैं।

फ्रांस की कंपनी सफरान और रूस की कंपनियां इस सेक्टर में पहले से काम कर रही हैं, इसलिए उनके भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें जीटीआरई के साथ 110-120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन के लिए संभावित साझेदारी भी शामिल है। (National Aero Engine Test Complex)

कावेरी इंजन की कहानी – क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स

कावेरी इंजन की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।

इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)

इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)

सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।

यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)

कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?

जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।

जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)

दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।

जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।

नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम

यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।

अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)

डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।

इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)

क्या इजरायल-ईरान जंग में कूदेगा पाकिस्तान? तेहरान को सऊदी की कड़ी चेतावनी के बाद क्यों छूटे शहबाज शरीफ के पसीने?

Saudi Arabia Iran Conflict
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Saudi Arabia Iran Conflict: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने इजरायल के साथ अपने उस पड़ोसियों पर भी जमकर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए, जिनकी सीमा ईरान से लगती थी। लेकिन इनमें से केवल पाकिस्तान ही अकेला एक ऐसा देश था, जिसकी सीमा ईरान से लगने के बावजूद ईरान ने उस पर कोई हमला नहीं किया। लेकिन अब पाकिस्तान का रोल नजर आने लगा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव जिस तरह से अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। और सऊदी अरब ने साफ तौर पर कहा है कि अगर ईरान की ओर से हमले नहीं रुके, तो वह सैन्य जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इस बयान के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और खासकर पाकिस्तान को लेकर कई देशों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

Saudi Arabia Iran Conflict: रियाद में हुई अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक

हाल ही में रियाद में ईरानी हमलों को लेकर अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में कतर, अजरबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्किये और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। मंत्रियों ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से ईरान के जानबूझकर किए गए हमलों की निंदा की, जिनमें रिहायशी इलाकों, सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें तेल की फैसिलिटी, डीसेलिनेशन प्लांट, एयरपोर्ट, रिहायशी इमारतें और डिप्लोमैटिक जगहों को निशाना बनाया गया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

बैठक में मंत्रियों ने यूनाइटेड नेशंस चार्टर के आर्टिकल (51) के अनुसार देशों के खुद का बचाव करने के अधिकार पर भी जोर दिया। साथ ही मंत्रियों ने ईरान से तुरंत अपने हमले रोकने और तनाव को खत्म करने, इलाके में सुरक्षा और स्थिरता पाने और संकट को हल करने के तरीके के तौर पर डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले इंटरनेशनल कानून, इंटरनेशनल मानवीय कानून और अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर दिया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक के बाद सऊदी अरब का सख्त संदेश

इस बैठक के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि वह इस तरह के हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करेगा। सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसियों पर दबाव बनाने के लिए हमले कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब अब झुकने वाला नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं।

इसके अलावा, बैठक में यह भी कहा गया कि ईरान को अपने सहयोगी मिलिशिया ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करना चाहिए। आरोप लगाया गया कि ईरान इन ग्रुप्स को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

समुद्री सुरक्षा पर भी जताई चिंता

बैठक में समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों को लेकर कहा गया कि इन्हें बंद करने या बाधित करने की कोई भी कोशिश वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

पाकिस्तान की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर हो रही है। दरअसल, पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इस नाटो स्टाइल समझौते में दोनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। इस डिफेंस पैक्ट के बाद पाकिस्तान को मध्य पूर्व में एक तरह से “सिक्योरिटी गारंटर” यानी सुरक्षा देने वाला देश माना जाने लगा है और इससे अरब-इस्लामिक देशों के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। जब ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए, तो इस समझौते की वजह से पाकिस्तान के सामने बड़ी कूटनीतिक मुश्किल खड़ी हो गई है।

इसका कारण यह है कि समझौते के मुताबिक अगर सऊदी अरब पर बड़ा हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसका साथ देना पड़ सकता है, जबकि पाकिस्तान के ईरान के साथ भी संबंध हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक में पाकिस्तान की मौजूदगी

रियाद में हुई बैठक में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि पाकिस्तान इस मामले में क्या रुख अपनाएगा।

हाल के दिनों में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संपर्क भी बढ़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी रियाद का दौरा किया था।

इन मुलाकातों को इस पूरे संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस मामले में कोई स्पष्ट सैन्य रुख नहीं अपनाया है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

म्यूचुअल डिफेंस समझौते का असर

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए यह स्थिति काफी जटिल है। एक तरफ उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है, तो दूसरी तरफ उसके ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय की बड़ी आबादी भी रहती है, ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इस बीच कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर सऊदी अरब इस युद्ध में पूरी तरह शामिल होता है, तो वह अपने रक्षा समझौते को सक्रिय कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब को सुरक्षा सहयोग दे सकता है। हालांकि इस तरह के दावों पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

हालांकि सऊदी अरब अब तक ईरान के साथ बातचीत करने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करता रहा है। इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया था कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत के दौरान सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते का मुद्दा उठाया था।

इशाक डार ने कहा कि “हमारा सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है, और हमने यह बात ईरान को भी साफ तौर पर बता दी है।” इस पर ईरान की ओर से यह कहा गया कि सऊदी की जमीन का इस्तेमाल उनके खिलाफ हमले करने के लिए नहीं होना चाहिए, इस बारे में भरोसा दिया जाए। (Saudi Arabia Iran Conflict)

होर्मुज से आया पाकिस्तान का पहला जहाज

सऊदी अरब के साथ कूटनीतिक और रक्षा संबंधों के अलावा पाकिस्तान खाड़ी देशों पर तेल और गैस के लिए भी काफी हद तक निर्भर है।

इसी हफ्ते पाकिस्तान के झंडे वाला जहाज “कराची” (जिसे लोरेक्स भी कहा जाता है) होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला पहला ऐसा जहाज बना, जो गैर-ईरानी कच्चा तेल लेकर जा रहा था। इस जहाज का ट्रैकिंग सिस्टम यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम चालू था।

यह जहाज पाकिस्तान की सरकारी कंपनी नेशनल शिपिंग कॉरपोरेशन का है और इसमें जो तेल था, वह संयुक्त अरब अमीरात से आया था।

जानकारों का मानना है कि इस जहाज के सुरक्षित गुजरने के लिए पाकिस्तान ने संभवतः ईरान सरकार के साथ पहले से बातचीत की थी। (Saudi Arabia Iran Conflict)

तेल सप्लाई और वैश्विक असर

ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव का असर तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और यहां तनाव बढ़ने से बाजार पर असर दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण का असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी पड़ा है।

हालांकि, सऊदी अरब ने खाड़ी क्षेत्र से अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल करके इस समस्या से बचने की कोशिश की है। इस पाइपलाइन के जरिए वह होर्मुज को बायपास करके रोज करीब 40 लाख बैरल (4 मिलियन बैरल प्रति दिन) कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच पा रहा है। जबकि युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब लगभग 70 लाख बैरल प्रति दिन (7 मिलियन bpd) तेल निर्यात करता था, जिसमें से बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जाता था। (Saudi Arabia Iran Conflict)

अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर जोर

बैठक में शामिल देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय कानून के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह की दखलअंदाजी से बचना चाहिए।

साथ ही यह भी कहा गया कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं और सभी देश इस दिशा में सहयोग जारी रखेंगे। (Saudi Arabia Iran Conflict)

संसदीय समिति का बड़ा सुझाव, चीन से मुकाबले के लिए भारत को चाहिए छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

Sixth Generation Fighter India
Sixth Generation Fighter India: Parliamentary Panel Calls for Roadmap to Boost Air Power (Photo: IAF)

Sixth Generation Fighter India: देश की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए संसद की स्थायी समिति ने बड़ा सुझाव दिया है। रक्षा मामलों से जुड़ी इस समिति ने कहा है कि भारत को अब छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट यानी सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के डेवलपमेंट के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार करना चाहिए।

लोकसभा में पेश की गई और राज्यसभा में भी रखी गई इस रिपोर्ट में समिति ने कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और इसमें एयर पावर की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत को केवल पुराने सिस्टम को अपग्रेड करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य की तकनीक पर काम शुरू करना चाहिए। (Sixth Generation Fighter India)

Sixth Generation Fighter India: नई पीढ़ी के युद्ध की जरूरतों पर जोर

31 सदस्यों वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब आज के समय में युद्ध केवल जमीन या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक मल्टी-डोमेन यानी कई क्षेत्रों में एक साथ लड़ा जा रहा है। इसमें हवा, अंतरिक्ष और साइबर जैसे क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं।

इसलिए भविष्य के फाइटर एयरक्राफ्ट ऐसे होने चाहिए, जो इन सभी क्षेत्रों में काम कर सकें। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिक्स्थ जेनरेशन एयरक्राफ्ट में एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और मैनड-अनमैनड टीमिंग जैसी क्षमताएं शामिल होंगी। (Sixth Generation Fighter India)

कई देश बनाने में जुटे

दुनिया के कई बड़े देश पहले से ही छठी पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने पर काम कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स का मकसद भविष्य के युद्ध को ध्यान में रखते हुए नई तकनीक विकसित करना है।

समिति ने कहा कि भारत को भी इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए ताकि वह वैश्विक स्तर पर पीछे न रह जाए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत इस समय यूरोप के कुछ देशों के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहा है। (Sixth Generation Fighter India)

यूरोपीय कंसोर्टियम से जुड़ने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, भारत दो बड़े यूरोपीय समूहों में से किसी एक के साथ जुड़ने पर विचार कर रहा है। एक समूह में ब्रिटेन, इटली और जापान शामिल हैं, जबकि दूसरे में फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं।

इन दोनों समूहों द्वारा सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट डेवलप किए जा रहे हैं। भारत इन प्रोजेक्ट्स में भागीदारी के जरिए तकनीक हासिल करने और उत्पादन में हिस्सेदारी चाहता है।

सूत्रों के अनुसार, भारत ने फ्रांस के साथ फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम में संभावित भागीदारी को लेकर शुरुआती स्तर पर बातचीत शुरू की है। यह एक अगली पीढ़ी का एयर कॉम्बैट प्रोग्राम है, जिसे फ्रांस जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर डेवलप कर रहा है। भारत इस सहयोग में खास तौर पर को-डेवलपमेंट यानी संयुक्त विकास और को-प्रोडक्शन यानी संयुक्त उत्पादन पर जोर दे रहा है।

यह कार्यक्रम दसॉ एविएशन, एयरबस और स्पेन की डिफेंस कंपनी इंद्रा के कंसोर्टियम पर आधारित है। हालांकि इस प्रोजेक्ट में फ्रांस और जर्मनी के बीच काम के बंटवारे और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर कुछ मतभेद भी सामने आए हैं। (Sixth Generation Fighter India)

स्वदेशी फाइटर प्रोग्राम पर भी काम जारी

इसी बीच भारत अपने स्वदेशी फाइटर जेट प्रोग्राम पर भी काम कर रहा है। एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए प्रोजेक्ट भारत का पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारत एक स्वदेशी इंजन डेवलप करने की दिशा में भी काम कर रहा है। फ्रांस की कंपनी के साथ मिलकर 110 से 120 किलो न्यूटन क्षमता का इंजन डेवलप करने को लेकर बातचीत चल रही है। जिसका इस्तेमाल इन स्वदेशी फाइटर जेट्स में किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

यह इंजन एएमसीए के भविष्य के वर्जन में इस्तेमाल किया जाएगा। इस सहयोग में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर यानी तकनीक का पूरा हस्तांतरण भी शामिल हो सकता है, जिससे भारत की विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।

भारतीय वायुसेना की योजना है कि वह इन पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के कुल छह स्क्वाड्रन शामिल करेगी और उन्हें साल 2035 से तैनात किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी पहले से बढ़ी

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी अब पहले से ज्यादा बढ़ गई है। अब वायुसेना को केवल पारंपरिक हमलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि उसे अंतरिक्ष और अन्य नए क्षेत्रों में भी काम करना होगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि वायुसेना को “नियर स्पेस” यानी पृथ्वी के ऊपर के उस हिस्से में भी क्षमता डेवलप करनी चाहिए, जहां से निगरानी और सुरक्षा कार्य किए जा सकते हैं।

इसके लिए समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वायुसेना को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वह आधुनिक तकनीक से लैस हो सके। (Sixth Generation Fighter India)

जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर पर भी जोर

समिति ने यह भी कहा कि भविष्य के युद्ध में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा। इसलिए संयुक्त सैन्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ को और मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त फंड देने की सिफारिश की गई है, ताकि तीनों सेनाएं मिलकर बेहतर योजना और संचालन कर सकें। (Sixth Generation Fighter India)

चीन बना चुका है पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि अन्य देश तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं। चीन भी अपने सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर जेट पर काम कर रहा है और उसने इसके कुछ विजुअल्स भी जारी किए हैं।

इसके अलावा चीन के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट पहले से ही तैयार हैं और उन्हें अन्य देशों के साथ साझा करने की चर्चा भी चल रही है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी एयर पावर को मजबूत बनाए और नई तकनीकों को अपनाए। (Sixth Generation Fighter India)

आंध्र प्रदेश में बनेगा दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग सेंटर, सागर डिफेंस इंजीनियरिंग करेगी तैयार

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar CEO, Sagar Defence Engineering with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh Garu, has laid the foundation for the world's first autonomous maritime shipbuilding and systems centre in Andhra Pradesh

Autonomous Maritime Shipyard: समुद्री तकनीक और रक्षा निर्माण के क्षेत्र में भारत को बड़ी कामयाबी मिली है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग एंड सिस्टम्स सेंटर स्थापित किया जा रहा है। इस परियोजना की आधारशिला 12 मार्च को रखी गई। यह परियोजना भारतीय रक्षा तकनीक कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा डेवलप की जा रही है।

रक्षा समाचार इस मौके का खास गवाह बना। यह नया शिपयार्ड आंध्र प्रदेश के जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में बनाया जाएगा। इस जगह की खूबी यह है कि यहां से सीधे समुद्र तक पहुंच उपलब्ध है। इससे जहाजों का निर्माण, लॉन्चिंग, परीक्षण और तैनाती एक ही जगह से की जा सकेगी। इस परियोजना को भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता और समुद्री तकनीक को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard: 29.58 एकड़ क्षेत्र में बनेगा आधुनिक शिपयार्ड

इस परियोजना के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में कुल 29.58 एकड़ भूमि आवंटित की है। इस भूमि में लगभग 7.58 एकड़ वाटरफ्रंट क्षेत्र शामिल है, जबकि बाकी हिस्सा हार्बर क्षेत्र में आता है। समुद्र के पास होने के कारण यहां जहाजों के निर्माण और परीक्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

यह केंद्र एक मॉडर्न एंड इंटीग्रेटिड कैंपस के तौर पर डेवलप किया जाएगा। यहां जहाज निर्माण सुविधा, परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर, जहाज मरम्मत और रखरखाव सुविधा तथा विशेष प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। इससे आटोनोमस मैरिन सिस्टम्स के डिजाइन से लेकर परीक्षण तक की पूरी प्रक्रिया एक ही परिसर में संभव होगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

अनमैन्ड मरीन टेक्नोलॉजी पर होगा फोकस

यह केंद्र मुख्य रूप से ऑटोनॉमस और अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स के डेवलपमेंट पर काम करेगा। इसमें ऐसे जहाज और उपकरण बनाए जाएंगे जो कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकें।

यहां अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (यूएसवी) यानी समुद्र की सतह पर चलने वाले मानवरहित जहाज विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स (एयूवी) भी बनाए जाएंगे जो समुद्र के अंदर काम करने वाले रोबोटिक सिस्टम होंगे।

इन तकनीकों का उपयोग समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा, समुद्री अनुसंधान और विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में किया जा सकेगा। इसके साथ ही केंद्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नेविगेशन सिस्टम, समुद्री सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क और कमांड एंड कंट्रोल प्लेटफॉर्म भी विकसित किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

रोबोटिक्स और एआई प्रोसेस-बेस्ड मैन्युफैक्चरिंग

इस शिपयार्ड में पारंपरिक जहाज निर्माण से अलग आधुनिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। यहां एआई आधारित शिपयार्ड मैनेजमेंट सिस्टम लगाया जाएगा जो डिजाइन, उत्पादन और परीक्षण प्रक्रियाओं का समन्वय करेगा।

निर्माण प्रक्रिया में रोबोटिक वेल्डिंग, ऑटोमेटेड कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा 3डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के निर्माण में किया जाएगा।

साथ ही यहां डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इसके तहत जहाज और शिपयार्ड के डिजिटल मॉडल तैयार किए जाएंगे, जिनकी मदद से वास्तविक परीक्षण से पहले ही उनके प्रदर्शन का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

समुद्र में वास्तविक परीक्षण की सुविधा

जुव्वलादिन्नी हार्बर के पास होने के कारण इस केंद्र को समुद्र में एक्चुअल टेस्ट करने की सुविधा भी मिलेगी। यहां विकसित किए गए जहाजों और सिस्टम्स का परीक्षण सीधे समुद्री वातावरण में किया जाएगा।

परीक्षण के दौरान जहाजों की ऑटोनॉमस नेविगेशन, ऑब्स्टेकल अवॉयडेंस और डॉकिंग क्षमता को जांचा जाएगा। इसके अलावा सेंसर और नेविगेशन तकनीकों का भी परीक्षण किया जाएगा।

इस तरह के परीक्षण से नए सिस्टम्स की विश्वसनीयता और कार्यक्षमता का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

आंध्र प्रदेश सरकार करेगी मदद

इस परियोजना को आंध्र प्रदेश सरकार भी सहयोग कर रही है। आधारशिला समारोह में राज्य के मानव संसाधन विकास, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री नारा लोकेश ने हिस्सा लिया।

नारा लोकेश ने कहा कि यह परियोजना आंध्र प्रदेश की समुद्री तकनीक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक निकुंज पराशर का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस परियोजना से राज्य के समुद्री क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि भारत की करीब 7500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था और तटीय समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

मैरीटाइम ऑपरेशंस में ऑटोनॉमस तकनीकों का बढ़ा इस्तेमाल

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैप्टन निकुंज पराशर ने कहा कि यह प्रोजेक्ट समुद्री तकनीक के क्षेत्र में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। उनके अनुसार दुनिया भर में मैरीटाइम ऑपरेशंस तेजी से ऑटोनॉमस तकनीकों की ओर बढ़ रहा है और यह केंद्र भारत को अगली पीढ़ी की अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स को देश के भीतर डिजाइन करने, परीक्षण करने और निर्माण करने की क्षमता देगा।

उन्होंने यह भी बताया कि इस शिपयार्ड में स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें रोबोटिक सिस्टम के जरिए ऑटोमेटेड वेल्डिंग, कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसे कार्य किए जाएंगे। इसके अलावा रोबोट और ऑटोमेटेड गाइडेड व्हीकल्स की मदद से सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाएगा। विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के तेज निर्माण के लिए 3डी प्रिंटिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

निकुंज पराशर ने कहा कि भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि और तटीय सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार यह परियोजना समुद्री तकनीक, रक्षा निर्माण और तटीय क्षेत्रों के विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। (Autonomous Maritime Shipyard)

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग की स्थापना वर्ष 2015 में कैप्टन निकुंज पराशर और उनके सहयोगियों द्वारा की गई थी। कंपनी ने शुरुआत मुंबई में एक छोटे वर्कस्पेस से की थी। समय के साथ यह कंपनी रक्षा तकनीक क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल हो गई।

कंपनी पुणे में स्थित अपने 10 एकड़ के रिसर्च एंड मैन्युफैक्चरिंग परिसर में विभिन्न प्रकार के स्वायत्त सिस्टम्स विकसित कर रही है। इनमें समुद्री, हवाई और जमीन पर काम करने वाले मानवरहित सिस्टम शामिल हैं।

कंपनी ने जेनेसिस नाम का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी डेवलप किया है। यह तकनीक किसी भी जहाज को रिमोट, सेमी-ऑटोनॉमस या पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में ऑपरेट कर सकती है। (Autonomous Maritime Shipyard)

ब्लू इकोनॉमी को मिलेगा बढ़ावा

इस परियोजना से आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इस केंद्र के संचालन से 300 से 1,000 तक नौकरियां प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। इसके अलावा इंजीनियर, तकनीशियन, जहाज डिजाइन विशेषज्ञ और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए भी अवसर उपलब्ध होंगे। इस सेंटर से न केवल ब्लू इकोनॉमी का विकास होगा बल्कि भारत को वैश्विक ऑटोनॉमस समुद्री टेक्नोलॉजी हब बनाने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही इस परियोजना से आसपास के क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स, हार्बर सेवाओं और सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। (Autonomous Maritime Shipyard)

मछुआरों के लिए भी होगा फायदा

इस परियोजना से स्थानीय मछुआरा समुदाय को भी फायदा मिलने की बात कही गई है। इस केंद्र में जहाजों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा उपलब्ध होगी, जिससे मछली पकड़ने वाली नौकाओं की मरम्मत जल्दी हो सकेगी।

इसके अलावा नई तकनीकों की मदद से रीयल टाइम मछली लोकेशन मैप्स, मौसम अलर्ट और समुद्री सुरक्षा सिस्टम जैसी सुविधाओं को भी विकसित करने की योजना है। इससे समुद्र में काम करने वाले मछुआरों की सुरक्षा और कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकेगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

भारत की समुद्री तकनीक क्षमता को बढ़ावा

यह केंद्र स्वदेशी समुद्री तकनीक के विकास में भूमिका निभाएगा। यहां विकसित होने वाले सिस्टम्स का उपयोग समुद्री निगरानी, अनुसंधान, आपदा प्रबंधन और विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जा सकेगा। इस परियोजना के माध्यम से समुद्री तकनीक, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोनॉमस सिस्टम्स के क्षेत्र में नए अनुसंधान और विकास कार्य भी किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित बोले- भारत को साझेदार नहीं, प्रतिद्वंद्वी मानता है चीन

India China Pakistan Strategic Challenge
Chief of Integrated Defence Staff Air Marshal Ashutosh Dixit addressed a special session in seminar on ‘Changing Dynamics in the Indian Neighbourhood’

India China Pakistan Strategic Challenge: एक तरफ जहां सरकार अब एक तय सीमा में चीन से आने वाली एफडीआई में 2020 के सख्त नियमों में ढील देने का फैसला कर रही है, तो वहीं दूसरी चीन भारत को साझेदार के रूप में नहीं बल्कि संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। यह कहना है चीफ ऑफ डिफेंस इंटिग्रेटेड स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का। उन्होंने कहा कि एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा कि आज भारत का पड़ोस वैसा नहीं है जैसा दस साल पहले था। हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक, और ढाका से काबुल तक रणनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं।

नई दिल्ली में बुधवार को आयोजित सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज (CENJOWS) की तरफ से आयोजित सेमिनार “चेंजिंग डायनेमिक्स इन द इंडियन नेबरहुड” में बोलते चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत का रणनीतिक माहौल पिछले दस सालों में तेजी से बदल गया है। कभी जो पड़ोस भारत के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माना जाता था, आज वही क्षेत्र बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान बनता जा रहा है। ऐसे समय में भारत को अपने पड़ोस में होने वाले बदलावों को बहुत ध्यान से समझना और उसके अनुसार अपनी रणनीति बनानी होगी।

India China Pakistan Strategic Challenge: तेजी से बदल रहा है भारत का रणनीतिक पड़ोस

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। भारत की सीमाएं दो परमाणु हथियारों से लैस देशों चीन और पाकिस्तान से लगती हैं। इसके अलावा भारत के आसपास कई छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश हैं जैसे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव। वहीं अफगानिस्तान मध्य एशिया की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण रास्ता है और आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा के लिहाज से भी अहम क्षेत्र माना जाता है।

उन्होंने कहा कि पहले हिंद महासागर को अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र माना जाता था, लेकिन अब यहां बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। अब यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

चीन की बढ़ती आक्रामकता बड़ी चिंता

उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में सबसे बड़ा बदलाव चीन की भूमिका में आया है। पहले चीन को क्षेत्रीय स्तर पर एक सावधान खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन अब वह अपने प्रभाव को आक्रामक तरीके से बढ़ा रहा है। चीन भारत को साझेदार के रूप में नहीं बल्कि संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है।

उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंधों में बड़ा मोड़ 2017 के डोकलाम गतिरोध के समय आया। इसके बाद 2020 की गलवान घाटी झड़प ने यह साफ कर दिया कि सीमा पर तनाव कितनी तेजी से बढ़ सकता है। इस घटना के बाद दोनों देशों ने हिमालयी सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक तैनात कर दिए। आज इस पूरे इलाके में एक लाख से अधिक सैनिक मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि भारत-चीन के बीच करीब 3488 किलोमीटर लंबी हिमालयी सीमा अब केवल एक एडमिनिस्ट्रेटिव सीमा नहीं रह गई है। यह अब एक बेहद संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र बन चुकी है जहां लगातार सैन्य दबाव बना हुआ है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

बेल्ट एंड रोड परियोजना से चीन का घेरा

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ने भारत की चिंता और बढ़ा दी है। इस परियोजना के तहत चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में कई बड़े निवेश किए हैं।

पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट, बांग्लादेश में बंदरगाह परियोजनाएं, श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट और मालदीव में बढ़ता प्रभाव, ये सभी मिलकर एक बड़े रणनीतिक नेटवर्क का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं।

एयर मार्शल दीक्षित के मुताबिक चिंता केवल किसी एक परियोजना की नहीं है, बल्कि इस पूरे नेटवर्क के पीछे मौजूद रणनीतिक सोच की है। हर पोर्ट, हर सड़क और हर निवेश एक बड़े रणनीतिक ढांचे का हिस्सा है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

भारत को मजबूत करनी होगी तैयारी

आईडीएस चीफ ने कहा कि हाल के सालों में भारत और चीन के बीच कुछ बातचीत और समझौते भी हुए हैं। 2024 के बाद कुछ क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी और बातचीत के नए दौर शुरू हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद चीन अपनी सैन्य ताकत लगातार बढ़ा रहा है।

2025 में चीन का फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर सक्रिय हुआ और उसी साल एक बड़े सैन्य परेड के जरिए चीन ने अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भी किया। साथ ही चीन ने रूस और ग्लोबल साउथ के कई देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत किए हैं।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा वास्तविक है और आने वाले समय में यह दबाव कम होने वाला नहीं है। इसलिए भारत को भी अपनी तैयारी मजबूत करनी होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को सीमा क्षेत्रों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से डेवलप करना होगा। सड़कों, सुरंगों और एयरफील्ड का निर्माण तेज करना जरूरी है। लक्ष्य यह है कि 2027 तक बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन की 100 से ज्यादा परियोजनाएं पूरी हों। (India China Pakistan Strategic Challenge)

क्वाड एलायंस को मजबूत बनाए रखना जरूरी

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत को क्वाड एलायंस जैसे सहयोगी ढांचे को भी मजबूत बनाए रखना होगा। इसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं, जो चीन की बढ़ती ताकत के संतुलन में भूमिका निभा सकते हैं।

बांग्लादेश का जिक्र करते हुए एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि यह उदाहरण है कि किस तरह एक भरोसेमंद पड़ोसी भी अचानक अनिश्चित दिशा में जा सकता है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

बांग्लादेश में बदलती राजनीतिक दिशा

उन्होंने कहा कि भारत के लिए बांग्लादेश लंबे समय तक एक भरोसेमंद साझेदार रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में वहां की राजनीति में बदलाव देखने को मिला है।

2024 में शेख हसीना सरकार के हटने और नई सरकार के आने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में अनिश्चितता बढ़ी है। इसके साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश के रिश्ते भी तेजी से मजबूत हो रहे हैं।

चीन ने बांग्लादेश में चटगांव इंडस्ट्रियल इकॉनॉमिक जोन और मोंगला पोर्ट विकास योजना जैसे बड़े निवेश किए हैं। इसके अलावा चीन ने बांग्लादेश को अपने बाजार में जीरो टैरिफ एक्सेस भी दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बांग्लादेश में ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की योजना भी शुरू हुई है। यह परियोजना चीन की कंपनी सीईटीसी के साथ मिलकर बनाई जा रही है।

इसके अलावा बांग्लादेश की सेना के लिए फोर्सेस गोल 2030 नाम का आधुनिकीकरण कार्यक्रम भी चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेश नई पीढ़ी के फाइटर जेट खरीदने की योजना बना रहा है। इसमें पाकिस्तान के जेएफ-17 थंडर फाइटर जेट का भी विकल्प शामिल है।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि ये सभी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि बांग्लादेश अब भारत को अपनी सुरक्षा का स्वाभाविक साझेदार नहीं मान रहा। ये कदम किसी दुश्मन देश के नहीं बल्कि ऐसे पड़ोसी के हैं जो अब अपनी सुरक्षा नीति में नए विकल्प तलाश रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत को बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को संतुलित और समझदारी से आगे बढ़ाना होगा। कनेक्टिविटी परियोजनाएं जैसे अगरतला-अखौरा रेल लिंक जारी रहनी चाहिए और दोनों देशों को मिलकर नए सहयोग के रास्ते तलाशने चाहिए। (India China Pakistan Strategic Challenge)

पाकिस्तान की रणनीति में बड़ा बदलाव

भारत के लिए पाकिस्तान लंबे समय से एक प्रमुख सुरक्षा चुनौती रहा है। एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ शत्रुतापूर्ण नीति पर काम कर रहा है। आतंकवाद और सैन्य दबाव पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी मिलिट्री स्ट्रक्चर में भी बदलाव किए हैं।

ऑपरेशन सिंदुर के बाद पाकिस्तान ने अपनी सैन्य रणनीति में नए कदम उठाए। अगस्त 2025 में पाकिस्तान ने आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड बनाने की घोषणा की। यह कमांड चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स की तर्ज पर बनाई गई है। इसका उद्देश्य भारत के भीतर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता बढ़ाना है।

इसके अलावा पाकिस्तान ने 2025 में अपने संविधान में संशोधन कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस का पद बनाया। इसके तहत तीनों सेनाओं आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की कमान एक व्यक्ति के हाथ में दी गई है।

इस बदलाव का मतलब है कि पाकिस्तान में मिलिट्री फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे, लेकिन इससे गलत फैसलों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

भारत को बनानी होगी नई रणनीति

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत को इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए एक व्यापक रणनीति बनानी होगी। सबसे पहले भारत को अपनाा बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना होगा। इसके लिए सड़कों, सुरंगों और एयरफील्ड का निर्माण तेजी से किया जा रहा है। लक्ष्य है कि 2027 तक सीमा क्षेत्रों में 100 से अधिक परियोजनाएं पूरी की जाएं।

इसके साथ ही भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना होगा। विशेष रूप से ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित करना जरूरी है।

हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

एयर मार्शल दीक्षित के मुताबिक हिंद महासागर क्षेत्र भी अब पहले जैसा शांत नहीं रहा। यहां बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। मालदीव, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों में चीन की बढ़ती सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय है। हालांकि भारत ने कई मौकों पर इन देशों की मदद करके अपना भरोसा मजबूत किया है। उदाहरण के तौर पर श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने उसे खाद्य सामग्री, ईंधन और आर्थिक सहायता दी।

पड़ोस की स्थिरता भारत की सुरक्षा से जुड़ी

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत के पड़ोस में होने वाली हर अस्थिरता का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ता है। अगर किसी पड़ोसी देश में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता या गृहयुद्ध होता है, तो उसका असर भारत की सीमाओं पर भी दिखाई देता है। इसलिए पड़ोस में स्थिरता बनाए रखना केवल कूटनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हित से भी जुड़ा है।

पड़ोस के साथ भरोसे का रिश्ता जरूरी

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत को अपने पड़ोस के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल युद्ध से नहीं होती। यह निवेश, बुनियादी ढांचे, तकनीक और आर्थिक सहयोग के जरिए भी होती है।

भारत को अपने पड़ोस में भरोसेमंद साझेदार के रूप में मौजूद रहना होगा। तभी भारत अपने क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा।

उन्होंने कहा कि भारत का पड़ोस कोई दूर की जगह नहीं है, बल्कि वही क्षेत्र है जहां से भारत की सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत को अपने पड़ोस के साथ मजबूत, संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी। (India China Pakistan Strategic Challenge)

भारतीय सेना के डिप्टी चीफ बोले- AI से तेज हुए युद्ध के फैसले, लेकिन 10 प्रतिशत गलती भी पड़ सकती है भारी

AI in Modern Warfare
Lt Gen Vipul Shinghal, AVSM, SM, Deputy Chief indian army, IS&T, IDS, India at At the Synergia Conclave in New Delhi,

AI in Modern Warfare: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भारतीय सेना डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल का कहना है कि युद्ध का स्वरूप भी पहले की तुलना में बिल्कुल अलग हो गया है। ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई भविष्य के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान यानी कमांडर को ही लेना होगा। वहीं, आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान का कहना है कि एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है।

AI in Modern Warfare: कमांडर ही लेता है अंतिम फैसला

नई दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय सिनर्जिया कॉन्क्लेव में “द एआई होराइजन: इंटेलिजेंट सिस्टम में भरोसे की कमी” विषय पर बोलते हुए भारतीय सेना के डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि तकनीक तेजी से बदल रही है और युद्ध का स्वरूप भी लगातार बदल रहा है, लेकिन इसके बावजूद अंतिम फैसला लेने की जिम्मेदारी अभी भी इंसान यानी कमांडर की ही होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल भारतीय सेना में डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने करीब 35 साल पहले सेना जॉइन की थी, तब हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय ऑपरेशन रूम में कागज के नक्शे होते थे और सूचनाएं धीरे-धीरे अलग-अलग सोर्सेज से आती थीं। कभी टेलीफोन कॉल के जरिए, कभी किसी रिपोर्ट के जरिए या किसी नोट के जरिए जानकारी मिलती थी। अधिकारी इन सूचनाओं को नक्शे पर पिन लगाकर चिन्हित करते थे और फिर सारी जानकारी जोड़कर कमांडर को दी जाती थी। कमांडर उसी आधार पर फैसला निर्णय लेते थे कि आगे क्या कार्रवाई करनी है। (AI in Modern Warfare)

उन्होंने कहा कि उस समय फैसला लेने की प्रक्रिया धीमी थी और जानकारी भी सीमित होती थी। लेकिन धीरे-धीरे तकनीक बढ़ने लगी। कुछ साल बाद कंप्यूटर, डिजिटल प्रेजेंटेशन और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम आने लगे। इससे जानकारी मिलने की गति बढ़ गई, लेकिन तब भी फैसला लेने की प्रक्रिया पूरी तरह इंसानों पर ही निर्भर थी। (AI in Modern Warfare)

एआई के कारण फैसले का समय हुआ कम

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल ने कहा कि आज युद्ध के मैदान में सबसे बड़ा बदलाव फैसला लेने के समय में कमी है। आज के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब ऑपरेशन रूम में डिजिटल मैप्स, सैटेलाइट फीड, ड्रोन, सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लगातार जानकारी आती रहती है। कमांडर के सामने एक साथ कई सोर्सेज से डेटा पहुंचता है और एआई बेस्ड सिस्टम कुछ ही सेकंड में एनालिसिस करके सुझाव भी देने लगते हैं कि किस टारगेट पर कब और कैसे कार्रवाई करनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में कमांडर के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय होता है। यही कारण है कि एआई पर भरोसा करने और मानव निर्णय के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो जाता है। (AI in Modern Warfare)

एआई पर भरोसा करना क्यों चुनौती है

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में यह भी मानकर चलना पड़ता है कि दुश्मन के पास भी लगभग वही जानकारी होती है जो हमारे पास होती है। इसलिए फैसला लेने की रफ्तार बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि एआई पर पूरी तरह निर्भर होना भी खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम डेटा के आधार पर निर्णय सुझाते हैं। लेकिन युद्ध के मैदान में डेटा हमेशा साफ और सही नहीं होता। धूल, धुआं, छलावा, दुश्मन की चाल और कई अन्य कारकों के कारण सेंसर और सिस्टम कभी-कभी गलत जानकारी भी दे सकते हैं।

अगर ऐसी स्थिति में एआई गलत निष्कर्ष निकाल ले तो उससे बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए अंतिम फैसला हमेशा इंसान के हाथ में ही रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर एआई 90 प्रतिशत सही है तो भी बाकी 10 प्रतिशत गलती युद्ध के मैदान में बहुत बड़ा जोखिम बन सकती है। (AI in Modern Warfare)

कमांडर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि मान लीजिए किसी इलाके में सेंसर को गतिविधि दिखाई देती है। एआई सिस्टम इसे दुश्मन की गतिविधि मान सकता है और हमला करने की सलाह दे सकता है। लेकिन एक अनुभवी कमांडर को महसूस हो सकता है कि कुछ गड़बड़ है। अगर वह थोड़ा रुककर जांच करता है तो पता चल सकता है कि वहां नागरिकों की आवाजाही हो रही थी, जो अभी सिस्टम के डेटा में शामिल नहीं हुई थी। अगर कमांडर ने बिना सोचे एआई की सलाह मान ली होती तो निर्दोष लोगों को बड़ा नुकसान हो सकता था।

उन्होंने कहा कि एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, फैसला लेने वाला अंतिम साधन नहीं बनाना चाहिए। अंतिम जिम्मेदारी हमेशा कमांडर की ही होती है, क्योंकि युद्ध के फैसलों में इंसानों की जान दांव पर लगी होती है। (AI in Modern Warfare)

एआई सिस्टम के लिए कड़े मानक जरूरी

उन्होंने कहा कि जब एआई सिस्टम किसी वेपन सिस्टम से जुड़ जाते हैं तो वे खुद एक तरह से हथियार का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी वही ट्रायल और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना चाहिए जिससे पारंपरिक हथियार गुजरते हैं। जैसे किसी मिसाइल या हथियार को सेना में शामिल करने से पहले कई चरणों के परीक्षण होते हैं, उसी तरह एआई सिस्टम को भी कठोर परीक्षण से गुजरना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सिस्टम युद्ध के मैदान में सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करे।

तकनीक को बेहतर तरीके से समझें कमांडर

उप सेना प्रमुख ने कहा कि कमांडरों को भी तकनीक को बेहतर तरीके से समझना होगा। उन्हें यह जानना होगा कि एआई सिस्टम किस डेटा के आधार पर फैसले सुझा रहा है और उसका विश्लेषण कैसे किया गया है। अगर सिस्टम पूरी तरह “ब्लैक बॉक्स” की तरह होगा और उसके अंदर क्या चल रहा है यह समझ में नहीं आएगा, तो उस पर भरोसा करना मुश्किल होगा। इसलिए एआई सिस्टम को अधिक पारदर्शी बनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में शक्ति और धर्म साथ-साथ चलते हैं। इसका मतलब है कि ताकत का इस्तेमाल हमेशा जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल भी इसी सिद्धांत के साथ होना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य मानवता की रक्षा करना होना चाहिए, न कि उसे खतरे में डालना। (AI in Modern Warfare)

सिस्टम पर करना होगा भरोसा

वहीं, कॉन्क्लेव में बोलते हुए आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान ने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में है जिसे अक्सर ग्रे-जोन युद्ध कहा जाता है। इसमें खतरे केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि साइबर स्पेस, इनफॉरमेशन सिस्टम और टेक्निकल सिस्टम तक फैल जाते हैं। ऐसे माहौल में एआई, ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम जैसी तकनीकें तेजी से सेना के काम का हिस्सा बन रही हैं।

मेजर जनरल मान ने कहा कि इन तकनीकों से सेना की क्षमता जरूर बढ़ती है, लेकिन एक बड़ी समस्या विश्वास की कमी है। युद्ध के समय सैनिक और कमांडर को सिस्टम पर पूरी तरह भरोसा होना चाहिए। अगर उन्हें मशीन के फैसले पर भरोसा नहीं होगा, तो उस तकनीक का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा।

उन्होंने कहा कि सैन्य क्षेत्र में “ट्रस्ट” यानी भरोसे का मतलब सिर्फ तकनीक का सही काम करना नहीं है। असली भरोसा तब बनता है जब कमांडर और सैनिक यह महसूस करें कि वे युद्ध की स्थिति में मशीन के सुझाव पर भरोसा कर सकते हैं। क्योंकि कई बार युद्ध के मैदान में फैसला कुछ ही सेकंड में लेना होता है और उसी पर सैनिकों की जान निर्भर करती है।

कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह

मेजर जनरल मान ने कहा कि कई रिसर्च बताती हैं कि मिलिट्री एआई सिस्टम पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जाता। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत ऑपरेटर एआई आधारित सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर होने में झिझक महसूस करते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह होते हैं। यानी वे निर्णय तो देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि उस निर्णय तक वे कैसे पहुंचे।

उन्होंने बताया कि एआई से जुड़ी मुख्य समस्याओं को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला है एक्सप्लेनबिलिटी, यानी सिस्टम अपने निर्णय का कारण समझा पाए। दूसरा है रॉबस्टनेस, यानी सिस्टम कठिन परिस्थितियों में भी सही तरीके से काम करे। तीसरा है ह्यूमन-एआई सहयोग, यानी इंसान और मशीन के बीच सही तालमेल। (AI in Modern Warfare)

डेटा पॉइजनिंग का शिकार हो सकता है एआई सिस्टम

मेजर जनरल मान ने समझाया कि अगर किसी एआई सिस्टम को गलत डेटा दे दिया जाए, जिसे डेटा पॉइजनिंग कहा जाता है, तो वह गलत निष्कर्ष निकाल सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी ड्रोन या सेंसर को दुश्मन द्वारा हैक कर लिया जाए, तो वह दोस्त और दुश्मन की पहचान गलत कर सकता है। इससे गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम की मजबूती यानी रॉबस्टनेस भी एक बड़ी चुनौती है। कई एआई सिस्टम अलग-अलग देशों के हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, डेटा सेट और ओपन सोर्स लाइब्रेरी पर आधारित होते हैं। अगर इनमें से किसी भी हिस्से में कमजोरी हो, तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। (AI in Modern Warfare)

एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि एक सर्वे के अनुसार 60 प्रतिशत से ज्यादा सैनिक ऐसे मामलों में इंसान द्वारा लिया गया फैसला ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि एआई बेकार है, बल्कि यह बताता है कि एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

जनरल मान के मुताबिक एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है। एआई की एक और चुनौती डेटा से जुड़ी है। किसी भी एआई सिस्टम को काम करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा की जरूरत होती है। लेकिन मिलिट्री एरिया में दुश्मन के हथियार, उपकरण और रणनीति से जुड़ा डेटा आसानी से उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में एआई मॉडल को सही ढंग से ट्रेनिंग करना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने बताया कि कई बार सेना को अपने ही डेटा के आधार पर मॉडल तैयार करना पड़ता है और बाकी चीजों को दुश्मन मानकर विश्लेषण करना पड़ता है। लेकिन इसमें भी जोखिम होता है, क्योंकि अगर मॉडल 90 फीसदी सही है तो बाकी 10 प्रतिशत गलती भी गंभीर परिणाम दे सकती है। (AI in Modern Warfare)

“ट्रस्टवर्दी एआई” बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए भरोसेमंद एआई सिस्टम विकसित करना जरूरी है। इसके लिए दुनिया भर में कई प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में “ट्रस्टवर्दी एआई” यानी भरोसेमंद एआई को लेकर कई स्ट्रक्चर तैयार किए गए हैं।

इन ढांचों में कुछ मूल सिद्धांत तय किए गए हैं। इनमें विश्वसनीयता, मजबूती, सुरक्षा, पारदर्शिता और निष्पक्षता जैसे तत्व शामिल हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई सिस्टम सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करें।

उन्होंने यह भी कहा कि एआई सिस्टम को साइबर हमलों के खिलाफ परखने के लिए विशेष परीक्षण किए जाने चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि सिस्टम कठिन परिस्थितियों में कितना भरोसेमंद है।

एआई को लेकर हो लीगल फ्रेमवर्क 

मेजर जनरल मान ने आगे कहा कि कमांडरों को एआई सिस्टम की कार्यप्रणाली समझने का अधिकार होना चाहिए। जब कमांडर को यह पता होगा कि मशीन किस आधार पर फैसला दे रही है, तभी वह उस पर भरोसा कर सकेगा। उन्होंने कहा कि एआई के इस्तेमाल में एक लीगल फ्रेमवर्क भी जरूरी है। अगर युद्ध के दौरान एआई आधारित सिस्टम के कारण कोई गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह पहले से तय होना चाहिए। इससे कमांडर अनावश्यक कानूनी डर के बिना फैसले ले सकेंगे।

उन्होंने भरोसा जताया कि भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और भविष्य में “मेड-इन-इंडिया” भरोसेमंद एआई सिस्टम सेना की ताकत को और मजबूत बनाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सबसे बड़ी चुनौती इन नीतियों को जमीन पर लागू करना है।

उनके अनुसार अगर सही तरीके से काम किया जाए तो एआई भविष्य में सेना के लिए एक शक्तिशाली और भरोसेमंद उपकरण बन सकता है। (AI in Modern Warfare)

Fact Check: क्या IRIS Dena को डुबाने में भारत ने की अमेरिका की मदद? COMCASA-LEMOA पर क्यों उठे सवाल

IRIS Dena Sinking Fact Check

IRIS Dena Fact Check: हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और स्ट्रेटेजिक एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने IRIS Dena के साथ हुए हादसे को लेकर एक अहम सवाल उठाया है। उनका कहना है कि क्या ईरानी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी साझा की गई? जिसके बाद सवाल उठाए जाने लगे कि क्या इस घटना में भारत की भी किसी तरह की भूमिका है, खासकर अमेरिका के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग करने को लेकर।

जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ गई। सोशल मीडिया पर कुछ एक्सपर्ट्स ने दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच मौजूद रक्षा समझौतों के तहत भारत की ओर से दी गई जानकारी का इस्तेमाल किया गया होगा।

हालांकि रक्षा मामलों के जानकारों और नौसेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस तरह की अटकलें वास्तविक सैन्य प्रक्रियाओं और अंतरराष्ट्रीय रक्षा समझौतों की सही समझ के बिना लगाई जा रही हैं। उनका कहना है कि भारत द्वारा अमेरिका को ऐसी कोई जानकारी देना, जिससे किसी ईरानी जहाज को निशाना बनाया जा सके, व्यावहारिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से असंभव है। (IRIS Dena Fact Check)

IRIS Dena Fact Check: क्या लिखा है डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने

डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच दो महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हैं COMCASA और LEMOA हैं। इन समझौतों के तहत दोनों देश समुद्री गतिविधियों से जुड़ी कुछ संवेदनशील जानकारी साझा करते हैं। अगर ऐसी साझा जानकारी का इस्तेमाल किसी अमेरिकी अटैक सबमरीन ने ईरानी फ्रिगेट को खोजने और डुबाने के लिए किया हो, तो यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।

उन्होंने आगे लिखा कि IRIS Dena जैसे मौद्गे-क्लास फ्रिगेट की सैन्य क्षमता एक अमेरिकी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन के सामने बहुत कम होती है। तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा जहाज अमेरिकी पनडुब्बी के मुकाबले टिक नहीं सकता। लेकिन इस पूरे मामले में असली मुद्दा ताकत का नहीं बल्कि परिस्थितियों का है। (IRIS Dena Fact Check)

डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर यह सच है कि IRIS Dena पर उस समय बहुत कम हथियार या गोला-बारूद था, तो यह घटना सामान्य युद्ध कार्रवाई की बजाय एक योजनाबद्ध हमला लग सकती है। क्योंकि भारत द्वारा आयोजित MILAN-2026 नौसैनिक अभ्यास के दौरान जहाजों को एक तरह के “पीस प्रोटोकॉल” के तहत सीमित हथियारों के साथ भाग लेना होता है।

डॉ. चेल्लानी का कहना है कि यह दावा पूरी तरह असंभव भी नहीं लगता। आम तौर पर जब कई देशों की नौसेनाएं मिलकर कोई अभ्यास करती हैं, तो उस दौरान जहाज पूरी युद्ध तैयारी के साथ नहीं आते। ऐसे अभ्यासों का मकसद सहयोग और आपसी तालमेल बढ़ाना होता है, न कि वास्तविक युद्ध करना। (IRIS Dena Fact Check)

उन्होंने लिखा कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, जिसे “हार्बर फेज” कहा जाता है, तब उन्हें सुरक्षित स्थिति यानी “सेफ कॉन्फिगरेशन” में रखा जाता है। इस दौरान जहाजों पर सार्वजनिक दौरे, कूटनीतिक कार्यक्रम और फ्लीट रिव्यू जैसी गतिविधियां होती हैं, इसलिए हथियारों को सुरक्षित रखा जाता है और गोला-बारूद का इस्तेमाल नहीं होता।

इसके बाद जब अभ्यास का “सी फेज” होता है, तब कुछ ऑपरेशनल ड्रिल और लाइव-फायर अभ्यास किए जाते हैं। लेकिन उस समय भी जहाजों में केवल उतना ही गोला-बारूद रखा जाता है जितना उन विशेष अभ्यासों के लिए जरूरी होता है। डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर IRIS Dena अभ्यास खत्म होने के बाद उसी सीमित कॉन्फिगरेशन में बंदरगाह से रवाना हुआ था, तो फिर हमलावर और लक्ष्य के बीच असमानता और भी स्पष्ट हो जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

एक तरफ एक ऐसा जहाज जो संभवतः हल्के हथियारों के साथ या शायद लगभग निहत्था था और एक नौसैनिक अभ्यास से लौट रहा था। वहीं, दूसरी तरफ दुनिया की सबसे एडवांस अंडरसी वॉरफेयर तकनीक से लैस अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी थी। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में एक सामान्य सैन्य टकराव था या फिर पहले से तय किया गया हमला। (IRIS Dena Fact Check)

क्या हैं COMCASA और LEMOA

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों में कई रक्षा समझौते हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से COMCASA (कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) और LEMOA (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) शामिल हैं।

जिसके बाद कुछ लोगों ने यह मान लिया कि इन समझौतों के चलते भारत की ओर से मिलने वाली जानकारी सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में इस्तेमाल हो सकती है। (IRIS Dena Fact Check)

लेकिन सूत्र सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को सिरे से नकारते हैं। उनका कहना है कि यह समझ पूरी तरह सही नहीं है। वह बताते हैं कि COMCASA का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन सिस्टम को सक्षम बनाना है। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त अभ्यास, मानवीय मिशन या समुद्री सुरक्षा जैसे कार्यों के दौरान सुरक्षित कम्यूनिकेशन कर सकें। यह समझौता किसी देश को दूसरे देश को सीधे टार्गेटिंग इंटेलिजेंस देने की अनुमति नहीं देता।

इसी तरह LEMOA एक लॉजिस्टिक एग्रीमेंट है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल ईंधन, मेंटेनेंस या सप्लाई के लिए कर सकते हैं। इसका कॉम्बैट आपरेशंस या इंटेलिजेंस शेयरिंग से कोई सीधा संबंध नहीं होता। सूत्रों का कहना है कि इन समझौतों को लेकर अक्सर सार्वजनिक चर्चा में गलत धारणाएं बन जाती हैं। (IRIS Dena Fact Check)

क्या करती है समुद्री निगरानी प्रणाली

भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बड़े स्तर पर मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस सिस्टम डेवलप किया है। गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) इसी सिस्टम का हिस्सा है।

इस सेंटर में कई देशों के लायजन ऑफिसर मौजूद रहते हैं और यहां जहाजों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी साझा की जाती है। यह जानकारी आम तौर पर व्हाइट शिपिंग डेटा यानी कमर्शियल जहाजों और समुद्री यातायात से संबंधित होती है।

इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल समुद्री सुरक्षा, एंटी-पायरेसी ऑपरेशन और व्यापारिक जहाजों की निगरानी के लिए किया जाता है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम किसी वॉरशिप पर हमला करने के लिए जरूरी रीयल-टाइम टार्गेटिंग डेटा नहीं देती। किसी पनडुब्बी से हमला करने के लिए टारगेट की बहुत सटीक स्थिति, गति और दिशा का पता होना जरूरी होता है। यह जानकारी आमतौर पर पनडुब्बी के अपने सेंसर और सैन्य निगरानी प्रणाली से मिलती है। (IRIS Dena Fact Check)

क्या है सबमरीन वॉरफेयर की असलियत

सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले में एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि किसी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन को किसी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए बाहरी सहायता जरूरी होती है। उनका कहना है कि दरअसल IRIS Dena जैसे जहाज एक सरफेस वॉरशिप होते हैं, जिनका वजन करीब 1500 टन होता है और जो खुले समुद्र में चलते हैं। जब कोई जहाज समुद्र में चलता है तो उसके इंजन, मशीनरी और पानी में बनने वाले प्रवाह से खास तरह की आवाजें पैदा होती हैं। इन्हें अकॉस्टिक सिग्नेचर कहा जाता है। आधुनिक पनडुब्बियों के सोनार सिस्टम इन आवाजों को काफी दूर से पहचान सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

एक न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन खुद ही लक्ष्य को खोजने और ट्रैक करने की क्षमता रखती हैं। इन पनडुब्बियों में बेहद संवेदनशील पैसिव सोनार सिस्टम लगे होते हैं जो समुद्र में मौजूद जहाजों की आवाज और मशीनरी के कंपन को दूर से पहचान सकते हैं। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी स्टेल्थ क्षमता, लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता और एडवांस सेंसर सिस्टम होते हैं।

सूत्रों ने बताया कि पनडुब्बियों में लगे पैसिव सोनार सिस्टम आसपास के जहाजों की आवाज को पकड़ लेते हैं, लेकिन खुद कोई सिग्नल नहीं भेजते। इससे पनडुब्बी की स्थिति दुश्मन को पता नहीं चलती। इस तरह पनडुब्बी बिना सामने आए ही सतह पर चल रहे जहाजों को पहचान और ट्रैक कर सकती है। क्योंकि समुद्र में चलने वाला हर जहाज एक खास तरह की ध्वनि पैदा करता है। इंजन, प्रोपेलर और पानी के प्रवाह से बनने वाली आवाज को पनडुब्बी के सोनार सिस्टम पकड़ सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

इसके अलावा आधुनिक मिलिटरी आपरेशंस में अक्सर सैटेलाइट निगरानी भी मदद करती है। सैटेलाइट पहले लक्ष्य की सामान्य लोकेशन का पता लगा सकते हैं और फिर यह जानकारी पनडुब्बी तक भेजी जा सकती है, जबकि पनडुब्बी समुद्र के भीतर ही रहती है। साथ ही, अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रीमोट सेंसिंग सैटेलाइट नेटवर्क भी है, जो समुद्री गतिविधियों पर नजर रखता है। इसलिए यह मानना कि अमेरिकी नौसेना को किसी वॉरशिप को निशाना बनाने के लिए किसी अन्य देश से जानकारी लेनी पड़ी होगी, यह जानकारी बिल्कुल गलत है।

उनका कहना है कि लगभग 1500 टन के आकार का एक फ्रिगेट जैसे IRIS Dena खुले समुद्र में पनडुब्बी के लिए एक स्पष्ट टारगेट हो सकता है। ऐसे में किसी तीसरे देश से मिली जानकारी की जरूरत नहीं होती। (IRIS Dena Fact Check)

बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास को लेकर हैं गलतफहमियां

सूत्रों का कहना है कि यह सोचना कि IRIS Dena संभवतः किसी “पीस प्रोटोकॉल” या “सेफ कॉन्फिगरेशन” में था क्योंकि उसने भारत में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास MILAN में हिस्सा लिया था। यह सोचना गलत है।

उनका कहना है कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास के दौरान कुछ सुरक्षा नियम जरूर लागू होते हैं, लेकिन उनका मतलब यह नहीं होता कि जहाज पूरी तरह हथियारों से खाली या निहत्थे होते हैं। जब ऐसे अभ्यासों का हार्बर फेज होता है, यानी जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, मेहमानों का स्वागत कर रहे होते हैं या सार्वजनिक दौरे कराए जा रहे होते हैं, तब सुरक्षा वजहों से कुछ वेपन सिस्टम को सुरक्षित स्थिति में रखा जाता है। इसी तरह लाइव-फायर अभ्यास के लिए इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी सख्त निगरानी में रखा जाता है और जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जाता है। यह प्रक्रिया दुनिया की लगभग सभी नौसेनाओं में सामान्य रूप से अपनाई जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि जहाज बंदरगाह से निकलने के बाद पूरी तरह निहत्था हो जाता है। जब कोई युद्धपोत बंदरगाह से निकलता है, तो वह बिना हथियारों के ही समुद्र में जाता है। हर युद्धपोत अपने डिजाइन के अनुसार अपने मूल हथियारों के साथ ही चलता है और वह हमेशा एक कॉम्बैट प्लेटफॉर्म बना रहता है।

भले ही अभ्यास के दौरान गोला-बारूद की मात्रा सीमित रखी जाए, लेकिन जहाज अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखता है। इसके अलावा जब कोई जहाज अभ्यास क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पहुंच जाता है, तब उसकी ऑपरेशनल स्थिति उस देश की नौसेना तय करती है, जिससे वह जहाज संबंधित होता है। (IRIS Dena Fact Check)

भारत की क्या है रणनीतिक स्थिति

सूत्रों का कहना है कि भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता आया है। भारत के ईरान, अमेरिका और कई अन्य देशों के साथ अलग-अलग रणनीतिक संबंध हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत किसी ऐसे जहाज के खिलाफ कार्रवाई में जानकारी देता जो भारतीय नौसेना के आमंत्रण पर किसी अभ्यास में शामिल हुआ था, तो यह कूटनीतिक भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता था।

भारतीय नौसेना की पहचान एक पेशेवर और तटस्थ समुद्री शक्ति के रूप में रही है। भारत ने हमेशा हिंद महासागर को सहयोग और स्थिरता का क्षेत्र बनाए रखने की बात कही है।

इसी वजह से सूत्रों का मानना है कि भारत द्वारा किसी विदेशी युद्धपोत को निशाना बनाने में अप्रत्यक्ष मदद देने की बात पूरी तरह से बेबुनियाद है। (IRIS Dena Fact Check)

रक्षा साझेदारी और ऑपरेशनल कंट्रोल अलग चीजें

सूत्रों का कहना है कि अक्सर रक्षा साझेदारी को लेकर एक बड़ी गलतफहमी यह होती है कि लोग मान लेते हैं कि इससे एक देश दूसरे देश के मिलिटरी ऑपरेशंस को प्रभावित कर सकता है।

असल में ऐसा नहीं होता। रक्षा समझौते केवल तकनीकी सहयोग, ट्रेनिंग या लॉजिस्टिक मदद के लिए होते हैं। हर देश अपनी सैन्य जानकारी और सेंसर नेटवर्क पर पूरी तरह से कंट्रोल बनाए रखता है। भारत भी अपने सभी सैन्य सेंसर, सैटेलाइट और इंटेलिजेंस नेटवर्क पर पूरी तरह संप्रभु नियंत्रण रखता है। (IRIS Dena Fact Check)

जिम्मेदारी से करें सोशल मीडिया पर चर्चा

सूत्रों ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में सार्वजनिक चर्चा बेहद सावधानी के साथ होनी चाहिए। बिना ठोस प्रमाण के किसी देश को किसी सैन्य कार्रवाई से जोड़ देना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकता है।

उन्होंने कहा कि नेवल ऑपरेशंस और समुद्री युद्ध की प्रक्रियाएं बेहद जटिल होती हैं। इन्हें समझे बिना की गई टिप्पणियां अक्सर गलतफहमियां पैदा कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि खुफिया जानकारी साझा करने या किसी मिलिटरी ऑपरेशंस की जिम्मेदारी से जुड़े दावे बहुत सावधानी से किए जाने चाहिए और उन्हें पुख्ता तथ्यों के आधार पर ही रखा जाना चाहिए। (IRIS Dena Fact Check)

अब हफ्तों तक पानी के नीचे रहेगी भारतीय सबमरीन, INS Khanderi पनडुब्बी में लगने जा रहा पहला स्वदेशी AIP सिस्टम

Air Independent Propulsion AIP: INS Khanderi

AIP System: भारतीय नौसेना को इस साल तक पहली स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन वाली सबमरीन मिल जाएगी। भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार यह काम वर्ष 2026 के अंत तक पूरा करने की योजना है। इस तकनीक के जुड़ने के बाद पनडुब्बी लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपकर काम कर सकेगी, जिससे उसकी ऑपरेशनल क्षमता और स्टेल्थ दोनों में बड़ा सुधार होगा।

इस सिस्टम को डीआरडीओ ने डेवलप किया है। इस तकनीक पर कई सालों से काम चल रहा था और अब इसे ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने की तैयारी की जा रही है। (AIP System)

AIP System: क्या है एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP एक ऐसी तकनीक है जिससे डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी बिना सतह पर आए लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए समुद्र की सतह के पास आना पड़ता है।

जब पनडुब्बी सतह के पास आती है, तो उसके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि उस समय दुश्मन के रडार या एंटी-सबमरीन सिस्टम उसे खोज सकते हैं।

वहीं एआईपी सिस्टम लगने के बाद पनडुब्बी कई हफ्तों तक पानी के अंदर रह सकती है। इस सिस्टम के साथ पनडुब्बी कम गति पर करीब 13 से 21 दिन तक लगातार पानी के अंदर रह सकती है। और इस दौरान उसे बैटरी चार्ज करने के लिए स्नॉर्कलिंग यानी सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती। (AIP System)

इसके विपरीत सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर 4 से 5 दिन में, और कई बार ऑपरेशन की स्थिति के अनुसार 2 से 3 दिन में ही सतह के पास आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है। यही कारण है कि AIP सिस्टम पनडुब्बी की स्टेल्थ और ऑपरेशनल क्षमता को काफी बढ़ा देता है। इससे उसकी छिपकर काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाती है। यह तकनीक पनडुब्बियों को दुश्मन की नजर से बचाकर लंबे समय तक ऑपरेशन करने में मदद करती है।

एआईपी तकनीक में फ्यूल-सेल के जरिए बिजली बनाई जाती है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा पैदा होती है। इस प्रक्रिया में कोई धुआं या प्रदूषण नहीं निकलता और इसका मुख्य बाई-प्रोडक्ट्स साफ पानी होता है। खास बात यह है कि इसमें हाइड्रोजन को ऑनबोर्ड जेनरेट किया जाता है। (AIP System)

डीआरडीओ ने बनाया है स्वदेशी एआईपी

भारत का एआईपी सिस्टम पुणे स्थित नेवल मैटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी ने डेवलप किया है। यह प्रयोगशाला समुद्री तकनीकों के विकास के लिए जानी जाती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसमें फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल-सेल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। यह तकनीक हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के जरिए बिजली पैदा करती है।

इस परियोजना को शुरू करने की मंजूरी लगभग 2014 में मिली थी। उस समय इस प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत करीब 270 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि तकनीकी चुनौतियों और ट्रायल प्रोसेस के चलते इस परियोजना को पूरा होने में कई साल लग गए। डीआरडीओ के साथ इस प्रोजेक्ट में इंडस्ट्री पार्टनर लार्सन एंड टूब्रो है। (AIP System)

लंबे परीक्षणों के बाद मिली मंजूरी

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम का जमीन पर आधारित प्रोटोटाइप कई सालों तक ट्रायल्स के दौर से गुजरा है। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि फ्यूल-सेल आधारित यह सिस्टम लगातार बिजली बना सकता है या नहीं और पनडुब्बी की जरूरतों के अनुसार इसकी क्षमता कितनी है। सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम ने परीक्षण के दौरान 200 किलोवॉट से अधिक बिजली उत्पादन की क्षमता दिखाई है। यह क्षमता कलवरी क्लास पनडुब्बियों के लिए पर्याप्त मानी जा रही है। लंबे ट्रायल्स के बाद अब इस सिस्टम को ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने के लिए तैयार माना जा रहा है। बता दें कि भारतीय नेवी में स्कॉर्पीन क्लास को ही कलवरी क्लास कहा जाता है। (AIP System)

आईएनएस खंडेरी पर कैसे लगेगा एआईपी

इस तकनीक को लगाने के लिए पनडुब्बी को रिफिट यानी बड़े मेंटेनेंस के लिए डॉक में लाया जाएगा। इस दौरान पनडुब्बी के स्ट्रक्चर के अंदर एक विशेष “एनर्जी मॉड्यूल” लगाया जाएगा। यही मॉड्यूल फ्यूल-सेल के जरिए बिजली पैदा करेगा। रक्षा सूत्रों के अनुसार अगले तीन से चार महीनों में डीआरडीओ यह एनर्जी मॉड्यूल मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड को सौंप देगा। इसके बाद इस सिस्टम को आईएनएस खंडेरी में लगाने की प्रक्रिया शुरू होगी। (AIP System)

कब होंगे समुद्री ट्रायल्स

सूत्रों के अनुसार एआईपी सिस्टम लगाने के बाद पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह जांचना होगा कि सिस्टम वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती समुद्री परीक्षण 2027 के मध्य में शुरू हो सकते हैं। पूरी प्रक्रिया 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना है। (AIP System)

पहले आईएनएस कलवरी पर लगना था सिस्टम

दिलचस्प बात यह है कि इस तकनीक को सबसे पहले भारतीय नौसेना की पहली कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस कलवरी पर लगाने की योजना थी। लेकिन उस समय एआईपी सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था, इसलिए इसे बाद में लगाने का फैसला किया गया। अब इस तकनीक को आईएनएस खंडेरी पर लगाया जा रहा है, जो इस वर्ग की दूसरी पनडुब्बी है। (AIP System)

कलवरी क्लास पनडुब्बियों की खासियत

स्कॉर्पीन क्लास यानी कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां भारत के प्रोजेक्ट-75 कार्यक्रम के तहत बनाई गई हैं। इन्हें मुंबई में तैयार किया गया है। इन पनडुब्बियों का निर्माण फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप के सहयोग से किया गया है।
इस परियोजना के तहत कुल छह पनडुब्बियां बनाई गई हैं और सभी अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुकी हैं। इनके नाम हैं आईएनएस कलवरी (S21), आईएनएस खंडेरी (S22), आईएनएस करंज (S23), आईएनएस वेला (S24), आईएनएस वागीर (S25) और आईएनएस वाग्शीर (S26) हैं। इन पनडुब्बियों को आधुनिक सेंसर, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम से लैस किया गया है। (AIP System)

भारत के पास कितनी हैं सबमरींस

भारतीय नौसेना के पास फिलहाल लगभग 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां 30 साल से अधिक पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उन्हें सेवा से हटाने की योजना बनाई जा रही है। नई पनडुब्बियों और आधुनिक तकनीक के जुड़ने से भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी सिस्टम लगने के बाद डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की क्षमता काफी बढ़ जाती है।

वहीं, अगर यह तकनीक सफलतापूर्वक काम करती है तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने फ्यूल-सेल आधारित एआईपी तकनीक खुद विकसित की है। दुनिया में अभी बहुत कम देशों के पास यह क्षमता है। इनमें जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं। भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (AIP System)

ईरानी वॉरशिप IRIS Dena पर हमला क्यों अमेरिका को पड़ सकता है भारी, क्या हैं नियम? भारतीय नौसेना ने भी की थी मदद

IRIS Dena: US Submarine Torpedo Sinks Iranian Warship Near Sri Lanka in Indian Ocean
IRIS Dena: US Submarine Torpedo Sinks Iranian Warship Near Sri Lanka in Indian Ocean

IRIS Dena: हिंद महासागर क्षेत्र में ईरान की नौसेना के युद्धपोत आईआरआईएस देना को निशाना बनाना अमेरिका को भारी पड़ सकता है। देना को अमेरिकी नौसेना की न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन ने श्रीलंका के दक्षिणी समुद्री इलाके के पास टारपीडो दाग कर डुबा दिया था। इस घटना के बाद समुद्र में बचाव अभियान चलाया गया, जिसमें लगभग 30 नाविकों को बचाया गया, जबकि 100 से ज्यादा के मारे जाने की खबर है।

इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह युद्धपोत हाल ही में भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौट रहा था। (IRIS Dena)

विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि ईरानी युद्धपोत ने घटना के तुरंत बाद संकट संदेश यानी डिस्ट्रेस कॉल भेजा, जिसके बाद श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से खोज और बचाव अभियान शुरू किया। बचाए गए नाविकों को श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में स्थित अस्पतालों में पहुंचाया गया।

आईआरआईएस देना ईरानी नौसेना का एक आधुनिक फ्रिगेट था। यह ईरान के मौज-क्लास युद्धपोतों में शामिल माना जाता है। इस जहाज को वर्ष 2021 में नौसेना में शामिल किया गया था और इसका नाम ईरान के माउंट देना के नाम पर रखा गया था। ईरान की दक्षिणी नौसैनिक फ्लीट में इसे महत्वपूर्ण युद्धपोत माना जाता था।

फरवरी 2026 में यह जहाज भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर-मिलन एक्सरसाइज में शामिल हुआ था। यह कार्यक्रम कई देशों की नौसेनाओं के बीच सहयोग और पेशेवर संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। (IRIS Dena)

IRIS Dena: कैसे हुआ हमला

रिपोर्टों के अनुसार 3 मार्च को जब ईरानी युद्धपोत भारत से लौटकर ईरान की ओर जा रहा था। जहाज श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र से गुजर रहा था।

बताया गया है कि इसी दौरान अमेरिकी नौसेना की एक अटैक सबमरीन ने जहाज पर टॉरपीडो दागा। टॉरपीडो लगने के बाद जहाज को गंभीर नुकसान हुआ और उसने तुरंत डिस्ट्रेस कॉल भेजी। (IRIS Dena)

कुछ समय बाद जहाज समुद्र में डूब गया। घटना की जानकारी मिलने के बाद श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने बचाव अभियान शुरू किया। कई नाविक समुद्र में तैरते हुए पाए गए, जिन्हें सुरक्षित निकालकर किनारे लाया गया।

श्रीलंका के अधिकारियों के अनुसार जहाज से संकट संदेश मिलने के बाद तुरंत नौसेना के जहाज और हेलीकॉप्टर भेजे गए। बचाव दल ने समुद्र में तैरते हुए कई नाविकों को बचाया और उन्हें अस्पताल पहुंचाया।

श्रीलंका की नौसेना के प्रवक्ता ने बताया कि यह घटना देश की समुद्री सीमा के बाहर हुई थी, लेकिन यह क्षेत्र श्रीलंका के खोज और बचाव क्षेत्र में आता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में तत्काल सहायता प्रदान करना आवश्यक होता है।

रिपोर्टों के अनुसार बचाए गए नाविकों को गाले के करापिटिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। बचाव अभियान के दौरान समुद्र में तेल का बड़ा धब्बा भी देखा गया, जिससे संकेत मिला कि जहाज को भारी नुकसान हुआ था। (IRIS Dena)

हमले को लेकर उठे सवाल

इस घटना के बाद कई रणनीतिक और कूटनीतिक सवाल उठे हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध के दौरान भी समुद्र में कुछ मानवीय नियम लागू होते हैं।

युद्ध के कानूनों में शामिल जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार यदि कोई जहाज डूबता है, तो जहां तक सैन्य परिस्थितियां अनुमति दें, वहां तक जीवित बचे लोगों की तलाश और बचाव का प्रयास किया जाना चाहिए। कई विशेषज्ञों ने इस मामले में यह सवाल उठाया कि हमले के बाद बचाव अभियान में अमेरिकी नौसेना की भूमिका क्यों नहीं दिखी।

हालांकि यह भी कहा जाता है कि पनडुब्बियां अक्सर अपनी सुरक्षा के कारण हमले के बाद तुरंत क्षेत्र छोड़ देती हैं। इस कारण बचाव कार्य अन्य नौसेनाओं द्वारा किया जाता है। (IRIS Dena)

अमेरिकी पनडुब्बी रख रही थी अभ्यास पर नजर

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि इस तरह की घटना समुद्री सहयोग के माहौल पर सवाल खड़े करती है। सिबल ने कहा कि मिलन एक्सरसाइज का उद्देश्य विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच आपसी समझ, भरोसा और पेशेवर सहयोग को बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि इस अभ्यास का मकसद समुद्री क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि जिस ईरानी फ्रिगेट को बाद में निशाना बनाया गया, वह भारतीय नौसेना के निमंत्रण पर इस अभ्यास में शामिल हुआ था। उनका कहना था कि अमेरिकी पनडुब्बी इस पूरे अभ्यास पर नजर रख रही थी और जब यह जहाज भारत से वापस ईरान जा रहा था, तब श्रीलंका के पास उस पर टॉरपीडो से हमला किया गया। उनके अनुसार इस कार्रवाई से मिलान अभ्यास की भावना को ठेस पहुंची है और यह स्थिति किसी के लिए भी सकारात्मक नहीं कही जा सकती। (IRIS Dena)

मेजबान देश के प्रति असम्मान

रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने भी इस घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी बहुराष्ट्रीय अभ्यास से लौट रहे जहाज पर हमला होना समुद्री कूटनीति के लिहाज से संवेदनशील मामला है। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा और विश्वास से जुड़े सवाल पैदा करती हैं।

चेलानी के अनुसार इस घटना से ऐसा लगता है कि भारत के समुद्री पड़ोस को एक तरह से युद्ध क्षेत्र में बदल दिया गया है। कूटनीतिक दृष्टि से यह कदम नौसैनिक मेजबानी से जुड़े एक अनलिखे नियम का उल्लंघन माना जा सकता है। आम तौर पर यह माना जाता है कि यदि कोई जहाज किसी देश के आमंत्रण पर उसके सैन्य अभ्यास में शामिल हुआ हो, तो उसके वहां से निकलने के तुरंत बाद उस पर हमला करना उस मेजबान देश के प्रति असम्मान माना जाता है। उनका कहना था कि इस घटना से अन्य देशों की नौसेनाओं के सामने यह संदेश जा सकता है कि भारत में होने वाले नौसैनिक अभ्यासों में भाग लेने के बाद भी उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। (IRIS Dena)

क्या कहते हैं समुद्री कानून और अंतरराष्ट्रीय नियम

समुद्र से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय नियम भी इस घटना के संदर्भ में चर्चा में आए हैं। समुद्र के कानूनों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन यानी UNCLOS समुद्री गतिविधियों के लिए कुछ नियम तय करता है। इन नियमों के तहत अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में जहाजों को नेविगेशन की स्वतंत्रता होती है। हालांकि युद्ध की स्थिति में सैन्य कार्रवाई के अपने अलग नियम भी लागू होते हैं। (IRIS Dena)

कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि समुद्र में युद्ध के दौरान भी मानवीय नियमों का पालन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि बेहतर यही होता कि अमेरिका पहले भारत और ईरान दोनों को यह जानकारी दे देता कि विशाखापत्तनम से लौटते समय देना संभावित लक्ष्य बन सकता है। यदि ऐसा होता, तो जहाज का कप्तान संभवतः किसी तटस्थ बंदरगाह में शरण लेने का फैसला कर सकता था।

जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में जहाजों को आवाजाही की स्वतंत्रता जरूर मिलती है, लेकिन युद्ध की स्थिति में इसका मतलब यह नहीं होता कि उन पर हमला नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि युद्ध के दौरान भी कुछ मानवीय नियम लागू होते हैं। (IRIS Dena)

जिनेवा कन्वेंशन के तहत यदि कोई जहाज डूबने की स्थिति में हो, तो हमलावर पक्ष को जहां तक सैन्य परिस्थितियां अनुमति दें, वहां तक जीवित बचे लोगों की तलाश और बचाव का प्रयास करना चाहिए। इस मामले में रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी पनडुब्बी हमले के बाद तुरंत वहां से निकल गई और बचाव कार्य श्रीलंका की नौसेना को करना पड़ा।

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि जब अमेरिकी नौसेना की किसी कार्रवाई ने भारत को असहज स्थिति में डाला हो। वर्ष 2021 में भी अमेरिकी नौसेना ने लक्षद्वीप के आसपास सैन्य अभ्यास किया था।

अमेरिका ने अभी तक UNCLOS की पुष्टि नहीं की है, जबकि भारत इस संधि का हिस्सा है। इस संधि के अनुसार किसी देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में सैन्य अभ्यास करने के लिए संबंधित देश की सहमति आवश्यक मानी जाती है। (IRIS Dena)

भारतीय नौसेना का खोज और बचाव अभियान

भारतीय नौसेना की तरफ से जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक श्रीलंका की नौसेना के अनुसार 4 मार्च की सुबह तड़के देना शिप से एक डिस्ट्रेस कॉल कोलंबो स्थित मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी एमआरसीसी को मिला था। उस समय यह जहाज गाले से लगभग 20 नॉटिकल मील पश्चिम में मौजूद था। यह इलाका समुद्री खोज और बचाव क्षेत्र यानी एसएआर रीजन के अंतर्गत आता है, जिसकी जिम्मेदारी श्रीलंका के पास है। (IRIS Dena)

यह जानकारी मिलते ही भारतीय नौसेना ने तुरंत खोज और बचाव अभियान शुरू कर दिया। 4 मार्च को सुबह लगभग 10 बजे भारतीय नौसेना के एक लंबी दूरी के मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट को खोज अभियान में सहायता के लिए भेजा गया। यह विमान श्रीलंका द्वारा शुरू किए गए बचाव अभियान को मजबूत करने के उद्देश्य से तैनात किया गया था। (IRIS Dena)

इसके अलावा एक और विमान को भी तैयार रखा गया, जिसमें हवा से गिराए जा सकने वाले लाइफ राफ्ट मौजूद थे। जरूरत पड़ने पर इस विमान को तुरंत भेजने की व्यवस्था की गई थी ताकि समुद्र में फंसे लोगों को मदद पहुंचाई जा सके।

उस समय आसपास के क्षेत्र में मौजूद भारतीय नौसेना का जहाज आईएनएस तरंगिणी भी बचाव अभियान में मदद के लिए भेजा गया। यह जहाज 4 मार्च को शाम करीब 4 बजे खोज क्षेत्र में पहुंच गया और बचाव प्रयासों में शामिल हो गया। तब तक श्रीलंका की नौसेना और अन्य एजेंसियां समुद्र में खोज और बचाव का काम शुरू कर चुकी थीं। (IRIS Dena)

इसके अलावा भारतीय नौसेना का एक और जहाज आईएनएस इक्क्षक कोच्चि से रवाना किया गया ताकि खोज अभियान को और मजबूत किया जा सके। यह जहाज अब भी उस क्षेत्र में मौजूद है और समुद्र में लापता लोगों की तलाश कर रहा है। यह अभियान मानवीय आधार पर चलाया जा रहा है ताकि जहाज दुर्घटना में फंसे लोगों की सहायता की जा सके।

भारतीय नौसेना और श्रीलंका के अधिकारियों के बीच खोज और बचाव अभियान को लेकर लगातार समन्वय जारी है और दोनों देश मिलकर इस मानवीय अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। (IRIS Dena)

घटना के बाद क्षेत्र में बढ़ी सतर्कता

इस घटना के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ गई है। कई देशों की नौसेनाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और समुद्री गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।

जहाज के डूबने की घटना के बाद आसपास के समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने भी इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। (IRIS Dena)

पोखरण में वायुसेना ने दोहराई ऑपरेशन सिंदूर की पूरी स्ट्राइक प्लानिंग, आकाश और स्पाइडर ने दुश्मन को हमलों को किया नाकाम!

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026: राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित ‘वायु शक्ति 2026’ अभ्यास के दौरान भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े अहम हिस्सों को दोबारा दुनिया के सामने पेश किया। इस दौरान वायुसेना ने अपनी प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस फायरपावर का प्रदर्शन किया।

अभ्यास के दौरान वायुसेना ने दिखाया कि वह असली युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी मुश्किल से मुश्किल ऑपरेशनों को आसानी से कर सकती है। इससे पहले राष्ट्रपति ने स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टर एलसीएच ‘प्रचंड’ में उड़ान भी भरी।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026: इंटेलिजेंस से शुरू हुई एक्सरसाइज

इस बार वायु शक्ति अभ्यास को ऑपरेशन सिंदूर को फोकस में रखते हुए एक पूरी कहानी की तरह तैयार किया गया, जिसमें युद्ध जैसी स्थितियां बनाई गई। इसमें हवाई हमले, एयर डिफेंस, स्पेशल फोर्स ऑपरेशन और राहत-बचाव मिशन सभी को एक साथ दिखाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान और फ्लाईपास्ट से हुई, जिसमें चेतक हेलीकॉप्टरों ने तिरंगा और वायुसेना का झंडा लेकर उड़ान भरी। इसके बाद राफेल लड़ाकू विमान ने जोरदार सुपरसोनिक बूम साउंड के साथ उड़ान भरकर वहां सभी को अचरज में डाल दिया।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

अभ्यास के दौरान ऑपरेशन सिंदूर की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से दिखाया गया। सबसे पहले इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी निगरानी और जानकारी जुटाने की प्रक्रिया को दर्शाया गया। इसमें रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और जरूरी जानकारी जुटाते हैं।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Vayushakti 2026: राष्ट्रपति मुर्मू ‘प्रचंड’ हेलीकॉप्टर में भरेंगी उड़ान, पोखरण में देखेंगी एयरफोर्स का मेगा शो

इसके बाद दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने की कार्रवाई दिखाई गई। इसके लिए लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल किया गया जो हवा में मंडराते हुए सही समय पर हमला कर सकते हैं। इस दौरान हार्पी ड्रोन का इस्तेमाल दिखाया गया, जिसे ऑपरेशन सिंदूर में भी इस्तेमाल किया गया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

आकाश, एल-70 की लाइव फायरिंग

अभ्यास में काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम यानी ड्रोन रोधी सिस्टम का भी प्रदर्शन किया गया। इसमें दुश्मन के ड्रोन जैसे टारगेट्स को पहचानकर उन्हें हवा में ही नष्ट करने की क्षमता का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान एयर डिफेंस सिस्टम की ताकत भी दिखाई गई, जिसमें आकाश सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम और स्पाइडर मिसाइल सिस्टम के साथ आर्मी की अपग्रेडेड एल-70 एयर डिफेंस गन, इजरायल से खरीदे स्पाइडर सिस्टम की लाइव फायरिंग भी की गई। अभ्यास में एम-777 हॉवित्जर का इस्तेमाल हुआ। इससे यह दिखाया गया कि भारतीय वायुसेना किस तरह अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर हवाई खतरों से निपट सकती है। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना ने आतंकी ठिकानों को बनाया निशाना

अभ्यास के दौरान यह भी बताया गया कि 7 मई 2025 की सुबह भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से किए गए हवाई प्रयासों को भी नाकाम किया गया था। इस दौरान वायुसेना ने पुराने सोवियत मूल के सिस्टम्स के साथ-साथ आधुनिक और स्वदेशी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया।

इनमें आकाश, एमआर-सैम, पिचोरा और ओसा-एके जैसे एयर डिफेंस सिस्टम शामिल थे, जिन्होंने दुश्मन के हवाई खतरों को रोकने में अहम भूमिका निभाई। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

S-400 की पावर का हुआ जिक्र

अभ्यास में S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की क्षमता का भी जिक्र किया गया। बताया गया कि इस सिस्टम ने ऑपरेशन के दौरान लंबी दूरी पर दुश्मन के एयरक्राफ्ट को मार गिराया था। यह अब तक के सबसे लंबे दूरी के एयर किल में से एक माना जाता है। इस सिस्टम ने दुश्मन के एयर ऑपरेशन को काफी हद तक सीमित कर दिया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

130 एयरक्राफ्ट ने लिया हिस्सा

इस अभ्यास में 130 से ज्यादा एयरक्राफ्ट शामिल हुए। इनमें राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000, मिग-29, जगुआर, हॉक, एमआई-17, सी-130जे, सी-17, सी-295, एएलएच ध्रुव और एलसीएच प्रचंड जैसे विमान और हेलीकॉप्टर शामिल रहे। लड़ाकू विमानों ने दुश्मन के नकली ठिकानों पर सटीक हमले किए और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल दिखाया। हालांकि स्वदेशी तेजस विमान इस अभ्यास का हिस्सा नहीं बना, क्योंकि हाल ही में हुए एक रनवे हादसे के बाद उसका बेड़ा अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

सी-295 विमान की रात में असॉल्ट लैंडिंग

अभ्यास में स्पेशल फोर्स ऑपरेशन भी शामिल थे। शाम के समय गरुड़ कमांडो और पैरा स्पेशल फोर्स को हेलीकॉप्टर से उतारा गया, जिन्होंने शहर जैसी स्थिति में ऑपरेशन और बंधकों को छुड़ाने का अभ्यास किया। इसके बाद सी-130 और पहली बार सी-295 विमान ने रात के समय असॉल्ट लैंडिंग कर जवानों को निकालने का प्रदर्शन किया। इसके अलावा सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान ने छोटे रनवे पर लैंडिंग कर गरुड़ कमांडो को एक सिमुलेटेड युद्ध क्षेत्र में उतारा और कुछ ही मिनटों में वहां से वापस उड़ान भर ली।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

इसके दौरान अटैक हेलीकॉप्टरों ने पूरे इलाके को सुरक्षित किया, जिससे यह दिखाया गया कि युद्ध के दौरान अलग-अलग यूनिट्स किस तरह मिलकर काम करती हैं। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

अभ्यास के अंत में सी-17 ग्लोबमास्टर विमान ने फ्लेयर्स छोड़े और फ्लाईपास्ट किया और ड्रोन शो के जरिए वायुसेना की उपलब्धियों को दिखाया गया। ‘अचूक, अभेद्य और सटीक’ के मूल मंत्र के साथ हुए इस अभ्यास में वायुसेना ने अपनी पूरी ताकत और तैयारियों का प्रदर्शन किया।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026
Drone Show

हेलीकॉप्टरों ने दिखाई ताकत

अभ्यास में एमआई-17 हेलीकॉप्टर से स्पाइक एनएलओएस मिसाइल दागी गई, जो करीब 50 किलोमीटर दूर तक टारगेट को निशाना बना सकती है। इसके अलावा रुद्र, प्रचंड, चेतक, एएलएच एमके-4, चिनूक और अपाचे जैसे हेलीकॉप्टरों ने भी अलग-अलग मिशन में हिस्सा लिया।

इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने मिलकर वायुसेना की मल्टी-रोल क्षमता को दर्शाया, जिसमें हमला, सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सभी शामिल हैं। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

विदेशी पत्रकार भी रहे मौजूद

इस बड़े अभ्यास को देखने के लिए करीब 30 विदेशी पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। यह पहल विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की ओर से की गई थी, ताकि भारत की सैन्य क्षमता और स्वदेशी रक्षा तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाया जा सके। इन पत्रकारों ने नौसेना की इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और थलसेना के रेगिस्तानी क्षेत्र में हुए ‘अग्नि वर्षा’ अभ्यास को भी देखा। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)