National Aero Engine Test Complex: India is now in preparation for large leaps on jet engine testing. The country is soon going to create its first fully integrated Aero Engine Test Complex. The objective of this project is that India will no longer have to rely on overseas for testing the jet engine.
DRDO has started the process of creating "National Aero Engine Test Complex" for this. Under this Gas Turbine Research Institute i.e. GTREE RFI i.e. Request for Information has been released from the industry. National Aero Engine Test Complex
National Aero Engine Test Complex: Where to Make This High-Tech Complex
According to the formulas, this test complex can be made around Karnataka’s challakee or then the Nagarjuna Sea. This place is therefore being selected as it is easy to develop technical infrastructure at large.
So far, India had to rely on countries like Russia for several important testing of its jet engine. India didn’t have its own facility to check engine performance at high altitudes.
Due to this, the cost was increased and the project was delayed several times. The Kaveri engine project has been the largest example of it, which had to go abroad for testing and had a timely effect. National Aero Engine Test Complex
How It Will Be The New Test Complex
This complex will be fully equipped with modern technology. in it Jet Engine There will be different facilities for testing every part of. It will have a high Altitude test system where a position like 10 to 15 kilometres of height will be created.
Also it will have different test setups to check all the important parts like Fan, Compressor, Conbusture, Turbine and Afterburner. This allows the engine to check from small parts to the whole engine in one place. National Aero Engine Test Complex
The turnkey base will make the whole system
DRDO Planned to build this project on a turnkey basis. This means that the company will take this project from the same design to construction and installation. It will include civil infrastructure as well as advanced testing systems. The country and foreign companies are invited to participate in it. National Aero Engine Test Complex
What companies will get a chance
This project can take part of both native and foreign companies. It can include original equipment manufacturers, companies that create test facility, joint ventures and industry partners.
France’s company Travel and Russia’s companies are already working in this sector, so they are also likely to join this project. It also includes possible partnerships for the engine of 110-120 kg Newton Categorie with GTRE. National Aero Engine Test Complex
Kaveri Engine's story – Why is it necessary
Kaveri Engine की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।
इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)
इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)
सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।
यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)
कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?
जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।
जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)
दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।
जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।
नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)
भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम
यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।
अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)
डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।
इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।
आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)
भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट
आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।
यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)
























