📍New Delhi | 16 Feb, 2026, 4:19 PM
Indigenous Aero Engine: At a time when the conception has been accelerated by the defence technology around the world and is becoming uncertain in the supply chain, India is emphasizing its strategic techniques to make indigenous. Defence Minister Rajnath Singh visited the Gas Turbine Research Establishment of DRDO in Bengaluru on Monday. This tour is especially being considered important to review the progress of the Military Aero Engine Development and pursue the goal of self-sufficient India. Indigenous Aero Engine
Indigenous Aero Engine: GTRE: Centre for Indigenous Aero Engine
GTREEDRDO is the leading laboratory where research and development work on the military gas turbine engine. For decades, try to create indigenous Aero Engines. The Kaveri engine project has been the most churched and ambitious project of the same lab. The project aims to eliminate India’s dependence on foreign engines.
During the tour Defence Minister Reviewed in detail all indigenous military gas turbine engine projects running. Scientists and officers told them that what steps are going on, how cooperation is happening with Indian industry and academic institutions, and how technical support is being given to the defence forces.
इस दौरान रक्षा मंत्री एक खास प्रदर्शनी भी देखने पहुंचे, जिसमें स्वदेशी इंजनों और उनके अलग-अलग पार्ट्स को दिखाया गया था। यह प्रदर्शनी इस बात का संकेत थी कि भारत अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं है, बल्कि जटिल तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। (Indigenous Aero Engine)
कावेरी इंजन का अहम परीक्षण
इस दौरान उन्होंने कावेरी इंजन का फुल आफ्टरबर्नर टेस्ट भी देखा। कावेरी इंजन पर 1980 और 1990 के दशक से काम चल रहा है। इसे शुरू में एलसीए तेजस के लिए तैयार किया जा रहा था, लेकिन थ्रस्ट और हाई टेम्परेचर मैटेरियल जैसी तकनीकी चुनौतियों के चलते इसमें देरी हुई। अब इसका ड्राई वेरिएंट बिना आफ्टरबर्नर के डेवलप किया जा रहा है, जिसे भविष्य में घटक यूसीएवी यानी अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल में इस्तेमाल किया जा सकता है। रक्षा मंत्रालय ने 2026 में ड्राई कावेरी के सर्टिफिकेशन का लक्ष्य रखा है। इस टेस्ट को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। (Indigenous Aero Engine)
एयरो इंजन में आत्मनिर्भरता की जरूरत
रक्षा मंत्री ने वैज्ञानिकों से बातचीत में कहा कि आज के बदलते भू-राजनीतिक माहौल में एयरो इंजन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि दुनिया में सप्लाई चेन बदल रही हैं और जिन देशों के पास अपनी महत्वपूर्ण तकनीक होगी, वही सुरक्षित और मजबूत रहेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सरकार एयरो इंजन डेवलपमेंट को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में हमें सिर्फ पांचवीं पीढ़ी के इंजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि छठी पीढ़ी की तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और नए मैटेरियल्स पर भी तुरंत काम शुरू करना होगा। (Indigenous Aero Engine)
समय सीमा कम करने की अपील
रक्षा मंत्री ने एयरो इंजन डेवलपमेंट को बेहद जटिल प्रक्रिया बताया। इसमें थर्मोडायनामिक्स, मैटेरियल साइंस, फ्लूड मेकैनिक्स और एडवांस्ड मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसी कई शाखाएं जुड़ी होती हैं। उन्होंने कहा कि विकसित देशों को ऐसे इंजन बनाने में 25 से 30 साल लग जाते हैं, लेकिन भारत को अपनी रणनीतिक जरूरतों के चलते समय कम करना होगा। उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि हमें मान लेना चाहिए कि 20 साल बीत चुके हैं और अब हमारे पास केवल 5 से 7 साल बचे हैं। (Indigenous Aero Engine)
ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण
उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उनके अनुसार इस ऑपरेशन में कम्युनिकेशन सिस्टम, सर्विलांस इक्विपमेंट और अटैक वेपन्स जैसे कई सिस्टम स्वदेशी थे। इससे सैनिकों का मनोबल बढ़ा और देशवासी भी गौरवान्वित हुए। उन्होंने कहा कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए हमें विश्व स्तरीय स्वदेशी सिस्टम तैयार करने होंगे।
रक्षा मंत्री ने यूनाइटेड किंगडम के साथ चल रही जॉइंट स्टडी और फ्रांस के साथ नेशनल एयरो इंजन मिशन के तहत शुरू हुई प्रक्रिया की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इन सहयोगों से भारत को नई तकनीक समझने और पुराने अनुभवों से सीखने का मौका मिलेगा।
उन्होंने यह भी बताया कि एयरो इंजन टेक्नोलॉजी का फायदा सिर्फ रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। जीटीआरई हाई टेम्परेचर कॉम्पोजिट्स बना रहा है, जिनका उपयोग सिविल एविएशन, पावर जेनरेशन और स्पेस सेक्टर में भी हो सकता है। भारत तेजी से बढ़ता सिविल एविएशन मार्केट है और आज रक्षा क्षेत्र में हुई प्रगति कल आर्थिक विकास में योगदान दे सकती है।
इस मौके पर डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत और जीटीआरई के वरिष्ठ वैज्ञानिक भी मौजूद रहे। यह दौरा इस बात का संकेत है कि भारत अब एयरो इंजन जैसी जटिल और रणनीतिक तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है। (Indigenous Aero Engine)
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