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राफेल के Source Code पर क्यों मचा बवाल, क्या भारत लगा पाएगा अस्त्र और रूद्रम जैसी स्वदेशी मिसाइलें?

Rafale Source Code Explained

Rafale Source Code Explained: भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ फाइटर जेट खरीद का नहीं, बल्कि उसके “सोर्स कोड” को लेकर है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि फ्रांस राफेल के कुछ महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड भारत को देने के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या इससे भारत की ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ेगा और क्या भारत अपनी स्वदेशी मिसाइलों जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस एनजी को राफेल पर लगा पाएगा या नहीं।

यह पूरा मामला इसलिए भी अहम है 114 अतिरिक्त राफेल फाइटर जेट खरीद को अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील कहा जा रहा है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code Explained)

Rafale Source Code Explained: क्या होता है राफेल का सोर्स कोड

राफेल फाइटर जेट का सोर्स कोड उसके सॉफ्टवेयर सिस्टम का मूल हिस्सा होता है। यही सॉफ्टवेयर जेट के रडार, सेंसर, हथियार और मिशन कंप्यूटर को कंट्रोल करता है। आसान भाषा में समझें तो यह जेट का “दिमाग” होता है।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन और थेल्स ने इस सॉफ्टवेयर को कई सालों में डेवलप किया है। इसलिए इसे वे अपनी “प्रोप्राइटरी टेक्नोलॉजी” मानते हैं। इसी कारण फ्रांस किसी भी देश को पूरा सोर्स कोड देने से बचता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर पूरा सोर्स कोड नहीं मिलता है तो खरीदने वाला देश खुद से जेट के सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं कर सकता और उसे हर बदलाव के लिए निर्माता पर निर्भर रहना पड़ता है। जिसके लिए कंपनी अलग से रकम वसूलती है या कई बार इनकार भी कर देती है। (Rafale Source Code Explained)

क्या फ्रांस ने मना किया सोर्स कोड के लिए

सूत्रों के मुताबिक फ्रांस का कहना है कि राफेल के कोर सिस्टम जैसे SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन सॉफ्टवेयर अत्यंत संवेदनशील हैं। इन्हें साझा करना राष्ट्रीय सुरक्षा और इंडस्ट्री के हितों के खिलाफ हो सकता है। बता दें कि दुनिया में कोई भी जेट बनाने वाली कंपनी सोर्स कोड मुहैया नहीं कराती है।

इसी वजह से फ्रांस केवल सीमित एक्सेस देने के पक्ष में है, जिसे API यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन सिस्टम के साथ काम करने के लिए जरूरी इंटरफेस उपलब्ध कराया जाएगा। (Rafale Source Code Explained)

API मॉडल क्या है और कैसे काम करता है

API मॉडल को आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” सिस्टम कहा जा सकता है। इसमें जेट के मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम को जोड़ा जा सकता है।

इस मॉडल में भारतीय इंजीनियर सीधे सॉफ्टवेयर को नहीं बदलते, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए अपने सिस्टम को जोड़ते हैं। इससे सुरक्षा भी बनी रहती है और जरूरत के हिसाब से बदलाव भी संभव होता है।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय इंजीनियरों को जरूरी इंटरफेस (डेटा लिंक, रडार कम्युनिकेशन, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम) तक बिना कोर सॉफ्टवेयर को छेड़े नियंत्रित एक्सेस मिलेगा।

यूएई जैसे देश पहले ही इस मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्होंने अपने हथियारों को राफेल के साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है। (Rafale Source Code Explained)

क्या अस्त्र-रूद्रम मिसाइल राफेल पर लग सकेंगी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की स्वदेशी अस्त्र-रूद्रम मिसाइलें राफेल पर लगाई जा सकेंगी। इस पर रक्षा सूत्रों के अनुसार जवाब हां है। अस्त्र बियोंड-विजुअल-रेंज एयर टू एयर मिसाइल है।

भारत और फ्रांस के बीच चल रही बातचीत में यह तय किया जा रहा है कि भारत को अपने हथियार राफेल पर लगाने की अनुमति मिलेगी। इसके लिए API और सॉफ्टवेयर अपग्रेड का इस्तेमाल किया जाएगा।

राफेल पर अस्त्र मिसाइल लगाने की तैयारी पहले से ही चल रही है। भारतीय नौसेना के लिए जो 26 राफेल-मरीन विमान खरीदे जा रहे हैं, उनकी डील में ही अस्त्र एमके1 मिसाइल का इंटीग्रेशन शामिल किया गया है। इन विमानों की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होने की योजना है। (Rafale Source Code Explained)

वहीं भारतीय वायुसेना के मौजूदा और आने वाले राफेल विमानों पर भी अस्त्र एमके1 और अस्त्र एमके2 दोनों मिसाइलों को लगाने की योजना है। इसके लिए 2028 से ट्रायल्स शुरू होंगे, जिनमें अलग-अलग चरण होंगे जैसे कैरिज टेस्ट, कैप्टिव टेस्ट, रिलीज और लाइव फायरिंग। इन सभी परीक्षणों के लिए एक राफेल विमान को खास तौर पर फ्लाइंग टेस्ट बेड के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

अस्त्र मिसाइल पहले ही सुखोई-30 एमकेआई और तेजस जैसे भारतीय फाइटर जेट्स पर सफलतापूर्वक लगाई जा चुकी है। उसी तकनीक और अनुभव का उपयोग अब राफेल पर भी किया जाएगा, जिससे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना आसान हो जाता है। (Rafale Source Code Explained)

इस प्रक्रिया में फ्रांसीसी कंपनियां भी शामिल होंगी, जो सॉफ्टवेयर को इस तरह अपडेट करेंगी कि राफेल के रडार और सिस्टम के साथ अस्त्र मिसाइल सही तरीके से काम कर सके।

राफेल के नए वर्जन और उनकी क्षमता

भारत के पास अभी राफेल का F3-R वर्जन है, जिसमें भारत-विशेष कई सुधार किए गए हैं। नए सौदे में जो 114 राफेल आने हैं, वे F4 स्टैंडर्ड के होंगे, जो पहले से ज्यादा आधुनिक माने जाते हैं।

इसके बाद इन्हें भविष्य में F5 स्टैंडर्ड तक अपग्रेड किया जा सकता है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्क आधारित युद्ध और ड्रोन के साथ काम करने जैसी क्षमताएं शामिल होंगी।

इन नए विमानों में भारत की जरूरत के अनुसार कई बदलाव भी किए जाएंगे, जिनमें कम्युनिकेशन सिस्टम, डेटा लिंक और हथियार इंटीग्रेशन शामिल है। (Rafale Source Code Explained)

मेक इन इंडिया और इंडिजिनाइजेशन

इस डील का एक बड़ा हिस्सा “मेक इन इंडिया” से जुड़ा है। योजना के अनुसार 114 में से 18 विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि बाकी 96 भारत में असेंबल किए जाएंगे।

शुरुआत में लगभग 30 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट रहेगा, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। भारत चाहता है कि यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो।

इसके लिए भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दिया जा रहा है। (Rafale Source Code Explained)

सॉफ्टवेयर और नेटवर्क वॉरफेयर की भूमिका

आज के समय में फाइटर जेट सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर और डेटा नेटवर्क से भी ताकतवर बनते हैं। राफेल में सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) जैसी तकनीक होती है, जिससे अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम कर सकते हैं।

इससे रियल टाइम में जानकारी साझा होती है और कई प्लेटफॉर्म मिलकर एक ही लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर कहा जाता है।

भारत चाहता है कि नए राफेल जेट भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से जुड़ सकें, ताकि ऑपरेशन में तेजी और सटीकता बनी रहे। (Rafale Source Code Explained)

राफेल के अलावा भी, डीआरडीओ इसी तरह के स्वदेशी सॉफ्टवेयर सिस्टम डेवलप करने पर काम कर रहा है, ताकि भारत अपनी तकनीक पर ज्यादा नियंत्रण रख सके।

उदाहरण के तौर पर, हाल ही में लॉन्च किया गया इंडियन रेडियो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर (IRSA) स्टैंडर्ड 1.0 इस तरह बनाया गया है कि भारत में बने सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो अलग-अलग सैन्य प्लेटफॉर्म पर आसानी से एक साथ काम कर सकें।

इस तरीके से भारत महंगे विदेशी प्लेटफॉर्म को एक फिक्स सिस्टम की तरह नहीं, बल्कि एक फ्लेक्सिबल सिस्टम की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं। इससे आज के समय में, जहां सॉफ्टवेयर की तेजी और अपडेट बहुत अहम हो गए हैं, भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत बनाए रख सकता है। (Rafale Source Code Explained)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आया। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि अगर भारत के पास पूरा सॉफ्टवेयर कंट्रोल होता तो वह तेजी से बदलाव कर सकता था।

हालांकि भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी कमी को स्वीकार नहीं किया है। फिर भी, इस अनुभव के बाद भारत अब ज्यादा टेक्नोलॉजी कंट्रोल चाहता है। (Rafale Source Code Explained)

कई देशों के पास है राफेल

भारत लंबे समय से फ्रांस का बड़ा रक्षा साझेदार रहा है। कई देशों जैसे मिस्र, कतर और ग्रीस ने भी राफेल खरीदे हैं, लेकिन वे ज्यादातर फ्रांसीसी हथियारों पर निर्भर रहते हैं।

भारत की खासियत यह है कि वह अपने स्वदेशी हथियारों को इन प्लेटफॉर्म पर जोड़ना चाहता है। इसी वजह से सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर एक्सेस का मुद्दा अहम हो गया है।

फ्रांस भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन वह अपनी कोर टेक्नोलॉजी को सुरक्षित रखना चाहता है। (Rafale Source Code Explained)

हेलीकॉप्टर की भारी कमी के बीच नौसेना का बड़ा फैसला! प्राइवेट सेक्टर से लीज पर लेने के लिए हुई मजबूर!

Indian Navy Helicopter Lease- Leonardo AW139
Leonardo AW139

Indian Navy Helicopter Lease: भारतीय नौसेना ने यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों की कमी को पूरा करने के लिए एक बड़ा और अहम कदम उठाया है। नौसेना ने पहली बार प्राइवेट सेक्टर से हेलीकॉप्टर लीज पर लेकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना शुरू किया है। इस कदम के तहत नौसेना ने AW139 यूटिलिटी हेलीकॉप्टर को “वेट लीज” मॉडल पर शामिल किया है। इनमें से एक हेलीकॉप्टर पूर्वी तट पर और दूसरा पश्चिमी तट पर तैनात किया गया है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारतीय सेनाओं में हेलीकॉप्टर की कमी लंबे समय से बनी हुई है। इससे पहले भारतीय सेना भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर प्राइवेट कंपनियों से हेलीकॉप्टर लीज पर ले चुकी है। अब नौसेना ने भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। (Indian Navy Helicopter Lease)

Indian Navy Helicopter Lease: क्या है वेट लीज

नौसेना ने यह हेलीकॉप्टर एक प्राइवेट ऑपरेटर कंपनी से लिया है, जो इन्हें ऑपरेट और मेंटेन भी करेगी। इसे वेट लीज कहा जाता है, जिसमें हेलीकॉप्टर के साथ पायलट, मेंटेनेंस और सपोर्ट स्टाफ भी उसी कंपनी के होते हैं। इस मॉडल से बिना लंबे इंतजार के नौसेना को तुरंत ऑपरेशनल क्षमता मिल जाती है।

फरवरी 2026 की शुरुआत में इन हेलीकॉप्टरों में से एक ने पूर्वी समुद्री क्षेत्र में उड़ान भरनी शुरू कर दी है। यह हेलीकॉप्टर यूटिलिटी रोल में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, कम्युनिकेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और सर्च ऑपरेशन जैसे काम शामिल हैं। दूसरे हेलीकॉप्टर को पश्चिमी तट पर इसी तरह के कार्यों के लिए तैनात किया गया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

2021 में 24 में हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की थी तैयारी

नौसेना ने पहले भी साल 2021 में 24 हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की योजना बनाई थी। इस योजना में ग्राउंड सपोर्ट, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल थीं, लेकिन यह प्रोग्राम आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद नौसेना और कोस्ट गार्ड ने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर मार्क-3 (एएलएच एमके3) को शामिल किया, लेकिन हाल के वर्षों में इन हेलीकॉप्टरों के साथ कई हादसे हुए।

इन हादसों में कुल चार हेलीकॉप्टर खो गए, जिनमें से दो मामलों में जान का नुकसान भी हुआ। 5 जनवरी 2025 को हुए एक बड़े हादसे के बाद पूरे एएलएच फ्लीट को कुछ समय के लिए ग्राउंड कर दिया गया था। जांच में एक तकनीकी खराबी सामने आई थी, जिसके बाद इस फ्लीट की उड़ान पर असर पड़ा। (Indian Navy Helicopter Lease)

सी किंग पड़ चुके हैं पुराने

इस बीच पुराने हेलीकॉप्टर जैसे अलुएट-3 और सी किंग भी धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। नए हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में समय लग रहा है, जिससे नौसेना के सामने ऑपरेशनल गैप की स्थिति बन गई। इसी वजह से लीज मॉडल को फिर से अपनाया गया है।

नौसेना द्वारा लिए गए AW139 हेलीकॉप्टर सिविल एविएशन नियमों के तहत ऑपरेट किए जाएंगे। इसके लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी डीजीसीए द्वारा तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार काम किया जाएगा। इन हेलीकॉप्टरों का उपयोग तटीय इलाकों, जहाजों और ऑफशोर एसेट्स के बीच आवाजाही के लिए किया जाएगा।

हालांकि इन हेलीकॉप्टरों में कुछ सीमाएं भी हैं। इनमें रेस्क्यू विंच और ब्लेड फोल्डिंग की सुविधा नहीं है, जिसकी वजह से इन्हें जहाजों पर सीधे ऑपरेशन के लिए सीमित रूप से इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसे में इनका उपयोग मुख्य रूप से ट्रांजिट और सपोर्ट मिशन के लिए किया जाएगा। (Indian Navy Helicopter Lease)

लियोनार्डो के AW139 को चुना

इस लीज प्रक्रिया के लिए ईस्टर्न नेवल कमांड और वेस्टर्न नेवल कमांड ने टेंडर जारी किया था। इसमें दो भारतीय कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। प्रतिस्पर्धा के बाद लियोनार्डो कंपनी के AW139 हेलीकॉप्टर को चुना गया, जिसने एयरबस डॉफिन N3 हेलीकॉप्टर को पीछे छोड़ा।

भारत में रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत हेलीकॉप्टर लीज करने का प्रावधान डीएपी 2020 में शामिल किया गया है। इसके जरिए सेना और नौसेना जैसी सेवाएं अपनी तत्काल जरूरतों को तेजी से पूरा कर सकती हैं। इसी मॉडल पर भारतीय सेना पहले से ही उत्तरी कमान में हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल कर रही है।

वर्तमान में सेना के पास AS350 B3 और बेल 407 जैसे हल्के हेलीकॉप्टर प्राइवेट कंपनियों से लीज पर लिए गए हैं, जिनका इस्तेमाल कठिन इलाकों में लॉजिस्टिक्स और कम्युनिकेशन के लिए किया जा रहा है। अब नौसेना ने भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम में है देरी

भारतीय नौसेना द्वारा हेलीकॉप्टर की कमी को पूरा करने के लिए प्राइवेट कंपनियों से चॉपर लीज पर लेने के बीच एक और अहम अपडेट सामने आया है। सेंटरम इलेक्ट्रॉनिक्स को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल से लगभग 66 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। यह ऑर्डर यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम यानी यूएच-एम के लिए एईएसए रडार के डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़ा है, जिसे अगले दो साल में पूरा किया जाना है।

एईएसए रडार एक आधुनिक रडार तकनीक है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक करने और ज्यादा सटीक जानकारी देता है। इस रडार का इस्तेमाल यूएच-एम हेलीकॉप्टर में किया जाएगा, जो भविष्य में नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

हालांकि, इस ऑर्डर से यह भी साफ संकेत मिलता है कि यूएच-एम प्रोग्राम अभी शुरुआती चरण में है। रडार के डेवलपमेंट में ही दो साल लगने हैं, इसके बाद हेलीकॉप्टर में इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी होगी। ऐसे में इस हेलीकॉप्टर के ऑपरेशनल रूप से शामिल होने में अभी करीब 4 से 5 साल का समय लग सकता है। यही वजह है कि फिलहाल नौसेना को अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए लीज मॉडल का सहारा लेना पड़ रहा है। (Indian Navy Helicopter Lease)

भारतीय सेना को चाहिए नया ‘ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम’, स्वॉर्म अटैक से निपटने की है तैयारी, जारी की RFI

Military Drone Security Framework

Drone Interception System RFI: भारतीय सेना अब ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है। रूस-यूक्रेन जंग से सबक लेते हुए आर्मी एयर डिफेंस विंग एक अहम रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी किया है। जिसमें ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम की खरीद के लिए कंपनियों से जानकारी मांगी गई है। यह सिस्टम खास तौर पर छोटे और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोन और यूएएस यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम से निपटने के लिए तैयार किया जाएगा। हाल के समय में ड्रोन और स्वॉर्म अटैक का खतरा तेजी से बढ़ा है, इसलिए सेना अब ऐसे सिस्टम की तलाश में है जो इन खतरों का सीधे मुकाबला कर सके। (Drone Interception System RFI)

Drone Interception System RFI: क्या है यह RFI और क्यों जारी हुआ?

यह आरएफआई सेना के एयर डिफेंस निदेशालय द्वारा जारी किया गया है और इसका मकसद कंपनियों से तकनीकी और ऑपरेशनल जानकारी जुटाना है। यह कोई फाइनल खरीद प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आगे आने वाले टेंडर और ट्रायल की तैयारी का पहला चरण माना जाता है। इसमें साफ किया गया है कि सरकार इस प्रक्रिया को कभी भी बदल या रद्द कर सकती है और यह पूरी प्रक्रिया डीएपी 2020 के नियमों के तहत आगे बढ़ेगी। (Drone Interception System RFI)

तीन हिस्सों में पूरा नेटवर्क

इस प्रस्तावित सिस्टम को ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम यानी डीआईएस कहा गया है। यह एक ऐसा सिस्टम होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोक सके और उन्हें नष्ट कर सके। इसमें तीन मुख्य हिस्से होंगे, जिनमें एक ड्रोन सेंसर, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और चार ड्रोन इंटरसेप्टर शामिल होंगे। इन तीनों हिस्सों के जरिए पूरा सिस्टम मिलकर काम करेगा और दुश्मन के ड्रोन पर नजर रखने से लेकर उसे खत्म करने तक का पूरा काम करेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन सेंसर: आसमान पर 360 डिग्री नजर

ड्रोन सेंसर इस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा होगा। यह सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा। इसका काम आसमान में हर दिशा में नजर रखना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को पहचानना, ट्रैक करना और उनकी प्राथमिकता तय करना होगा। यह सेंसर बहुत छोटे ड्रोन को भी कई किलोमीटर दूर से पकड़ सकेगा और उनकी लोकेशन, दिशा और ऊंचाई की जानकारी देगा। (Drone Interception System RFI)

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन: पूरा ऑपरेशन यहीं से कंट्रोल

इसके बाद यह जानकारी ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचेगी। यह स्टेशन एक तरह का कंट्रोल सेंटर होगा, जिसमें लैपटॉप या टैबलेट आधारित सिस्टम होगा। इसमें ऑपरेटर को सभी जरूरी जानकारी रियल टाइम में दिखाई देगी। यह स्टेशन ड्रोन इंटरसेप्टर को कमांड देगा और उसे टारगेट तक पहुंचाएगा। इसमें डेटा रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे मिशन के बाद पूरा विश्लेषण किया जा सकेगा। यह स्टेशन आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा और फील्ड में जल्दी तैनात किया जा सकेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन इंटरसेप्टर: हवा में ही दुश्मन का खात्मा

ड्रोन इंटरसेप्टर इस पूरे सिस्टम का सबसे एक्टिव पार्ट होगा। यह एक खास तरह का ड्रोन होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही खत्म करेगा। इसमें दो तरह की क्षमता होगी, एक काइनेटिक यानी सीधे टक्कर मारकर दुश्मन ड्रोन को गिराना और दूसरा हाई एक्सप्लोसिव यानी विस्फोट के जरिए उसे नष्ट करना। यह इंटरसेप्टर पूरी तरह ऑटोमैटिक होगा और फायर एंड फॉरगेट तकनीक पर काम करेगा। यानी एक बार लॉन्च होने के बाद यह खुद ही लक्ष्य तक पहुंचकर हमला करेगा।

हर इलाके में तैनाती के लिए तैयार

इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह हर तरह के भारतीय इलाके में काम कर सके। चाहे रेगिस्तान हो, पहाड़ी इलाका हो, समुद्र के पास का क्षेत्र हो या फिर ऊंचाई वाले इलाके, हर जगह यह सिस्टम काम करने में सक्षम होगा। इसे माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तापमान तक चलाने की क्षमता रखनी होगी और नमी वाले वातावरण में भी यह काम कर सकेगा। (Drone Interception System RFI)

आकाशतीर से इंटीग्रेशन

इस सिस्टम की एक खास बात यह भी है कि इसे मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम और आकाशतीर जैसे नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा। इससे सेना को एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल मिलेगा और सभी सिस्टम आपस में जुड़कर तेजी से काम कर सकेंगे। इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी होगी, जिससे दुश्मन अगर इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की कोशिश करे तो भी सिस्टम सही तरीके से काम करता रहेगा।

सॉफ्टवेयर और AI की भूमिका

इसमें इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर पूरी तरह स्वदेशी होगा और भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक को इंटीग्रेट करने की भी संभावना रखी गई है। सिस्टम में डेटा स्टोरेज की सुविधा भी होगी, जिससे एक महीने तक का डेटा सुरक्षित रखा जा सकेगा और बाद में उसे ट्रेनिंग या विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

स्वदेशी तकनीक पर जोर

सेना ने इस आरएफआई में कंपनियों के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। इसमें कहा गया है कि कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी होना चाहिए। यानी सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले उपकरण, सॉफ्टवेयर और कंपोनेंट भारत में बने होने चाहिए। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कंपनियों को अपनी जानकारी 25 मार्च तक जमा करनी होगी। इसके बाद सेना इन प्रस्तावों का अध्ययन करेगी और आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसमें ट्रायल, टेक्निकल इवैल्यूएशन और कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन जैसे कई चरण शामिल होंगे।

इस पूरी प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को भी मौका दिया जा रहा है। छोटे उद्यमों के लिए कुछ वित्तीय शर्तों में छूट भी दी गई है, ताकि ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियां इसमें भाग ले सकें। (Drone Interception System RFI)

बढ़ते ड्रोन खतरे के बीच अहम पहल

इस सिस्टम की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है क्योंकि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे ड्रोन भी अब बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं और स्वॉर्म अटैक यानी एक साथ कई ड्रोन के हमले को रोकना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में यह ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम सेना की सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। (Drone Interception System RFI)

समंदर में ‘क्लोज-इन डिफेंस’ को मजबूत करने तैयारी कर रही भारतीय नौसेना, स्वदेशी 30एमएम नेवल गन के लिए मांगे प्रस्ताव

Indian Navy 30mm Naval Gun India

30mm Naval Gun India: भारत अब समुद्र में अपनी ताकत और बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है। रक्षा मंत्रालय के तहत भारतीय नौसेना ने देश की कंपनियों से एक खास तरह के वेपन सिस्टम नेवल सरफेस गन (एनएसजी) को बनाने के लिए आगे आने को कहा है। इसके लिए एक आधिकारिक दस्तावेज जारी किया गया है, जिसे “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई कहा जाता है। भारतीय नौसेना ने पहले भी यह ईओआई जारी कर चुकी है। लेकिन इसे फिर से जारी किया गया है।

सरल भाषा में समझें तो सरकार यह जानना चाहती है कि देश की कौन-कौन सी कंपनियां एक आधुनिक 30 मिमी नेवल सरफेस गन और उसके साथ जुड़ा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम बना सकती हैं। अगर कंपनियां योग्य पाई जाती हैं, तो उन्हें इस सिस्टम को डेवलप करने का मौका दिया जाएगा।

यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि अब भारत धीरे-धीरे ऐसे हथियार खुद बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो पहले विदेशों से खरीदे जाते थे। (30mm Naval Gun India)

30mm Naval Gun India: क्या 30 मिमी नेवल गन सिस्टम?

यह एक ऐसा हथियार होता है, जिसे समुद्र में चलने वाले युद्धपोत यानी नेवल शिप पर लगाया जाता है। इसका काम बहुत पास से आने वाले खतरे को तुरंत निशाना बनाना होता है। आज के समय में खतरे सिर्फ बड़े युद्धपोत या मिसाइल नहीं हैं। अब छोटे ड्रोन, तेज स्पीड वाली नावें, और पानी के नीचे छिपकर हमला करने वाले लोग भी बड़ा खतरा बन चुके हैं। ऐसे में इस तरह की गन बहुत काम आती है।

इस गन के साथ एक खास सिस्टम जोड़ा जाएगा, जिसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम (EOFCS) कहा जाता है। यह सिस्टम कैमरा, सेंसर और कंप्यूटर की मदद से टारगेट को पहचानता है और सटीक निशाना लगाने में मदद करता है। यानी यह सिर्फ एक बंदूक नहीं होगी, बल्कि एक पूरा स्मार्ट सिस्टम होगा जो खुद टारगेट को पहचानकर उस पर हमला कर सकेगा। (30mm Naval Gun India)

यह 30 एमएम गन जहाजों की नजदीकी रक्षा यानी क्लोज-इन वेपन सिस्टम का हथियार है। यह ड्रोन, तेज हमलावर नावें (फास्ट अटैक क्राफ्ट), स्विमिंग डाइवर्स और असिमेट्रिक खतरों को 3-5 किमी के अंदर मार गिराएगी। नौसेना के छोटे जहाजों (ओपीवी, एफएसी) पर मुख्य हथियार और बड़े जहाजों (डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट) पर बैकअप बनेगी। (30mm Naval Gun India)

यह प्रोजेक्ट क्यों है गेमचेंजर

आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब दुश्मन बड़े जहाज या मिसाइल ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ड्रोन और तेज स्पीड वाली नावों (स्विफ्ट क्राफ्ट) से भी हमला करता है। रेड सी जैसे इलाकों में हाल के हमलों ने साफ दिखा दिया है कि पास से आने वाले इन खतरों को रोकने के लिए मजबूत क्लोज-इन डिफेंस सिस्टम कितना जरूरी है।

अब तक भारत जिन 30 मिमी गन का इस्तेमाल करता था, वे या तो बाहर से खरीदी गई थीं या उनकी क्षमता सीमित थी। लेकिन नई स्वदेशी 30 मिमी नेवल सरफेस गन के साथ EOFCS सिस्टम कई मामलों में ज्यादा आधुनिक और असरदार होगी। (30mm Naval Gun India)

यह सिस्टम रडार जामिंग की स्थिति में भी काम कर सकेगा, क्योंकि इसमें कैमरा और सेंसर आधारित टारगेटिंग होगी। इसका मतलब है कि दुश्मन अगर इलेक्ट्रॉनिक जामिंग भी करे, तब भी यह गन अपना काम जारी रखेगी।

यह गन पूरी तरह स्टेबलाइज्ड होगी, यानी समुद्र की तेज लहरों के बीच भी निशाना सटीक रहेगा। साथ ही यह नेटवर्क्ड सिस्टम होगा, जिससे जहाज अकेले नहीं, बल्कि पूरी फ्लीट एक साथ जुड़कर ऑपरेशन कर सकेगी।

यह सिस्टम जहाज के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम (CMS) से जुड़ा होगा, जिससे पूरे जहाज के हथियार और सेंसर एक साथ काम करेंगे। गन की फायरिंग स्पीड तेज होगी और इसमें ऐसे गोला-बारूद का इस्तेमाल होगा जो टारगेट के पास जाकर फट सके (प्रॉक्सिमिटी फ्यूज)। इसे पूरी तरह समुद्री माहौल के हिसाब से बनाया जाएगा, यानी नमकीन पानी, झटकों, कंपन और -20°C से +55° से. तक के तापमान में भी यह सही काम करेगा। (30mm Naval Gun India)

साथ ही इसका रखरखाव आसान होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर इसे मौके पर ही ठीक किया जा सके। इसमें रिमोट कंट्रोल, मैनुअल और ऑटो – तीनों मोड होंगे, यानी जरूरत के हिसाब से इसे अलग-अलग तरीके से चलाया जा सकेगा।

नौसेना को इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 97 सिस्टम मिलने की संभावना है, जिससे दर्जनों युद्धपोतों की ताकत बढ़ेगी। साथ ही एमएसएमई और स्टार्टअप कंपनियों को भी इसमें हिस्सा लेने का मौका मिलेगा। योजना के अनुसार, सबसे कम कीमत देने वाली कंपनी (L1) को ज्यादा सिस्टम मिलेंगे, जबकि दूसरी कंपनियों (L2/L3) को भी मौका दिया जाएगा अगर वे कीमत मैच करें। सफल कंपनी को आधिकारिक सर्टिफिकेट भी मिलेगा, जो आगे के प्रोजेक्ट्स में काम आएगा। (30mm Naval Gun India)

‘मेक-II’ कैटेगरी के तहत प्रोजेक्ट

इस ईओआई का मुख्य उद्देश्य देश की कंपनियों को मौका देना है। नौसेना यह देखना चाहती है कि कौन-सी भारतीय कंपनी इस प्रोजेक्ट को संभाल सकती है। जो कंपनियां इस ईओआई का जवाब देंगी, उनमें से कुछ को चुना जाएगा और फिर उन्हें इस सिस्टम का प्रोटोटाइप यानी शुरुआती मॉडल बनाने का काम दिया जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि अगर सिर्फ एक कंपनी भी सभी शर्तें पूरी करती है, तो भी प्रोजेक्ट आगे बढ़ाया जाएगा। यानी सरकार इस काम में देरी नहीं करना चाहती।

यह प्रोजेक्ट “मेक-II” कैटेगरी के तहत किया जा रहा है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि कंपनियां पहले अपने खर्च पर इस सिस्टम का प्रोटोटाइप बनाएंगी। अगर वह सफल रहता है, तो नौसेना बाद में उसी सिस्टम को खरीद सकती है। यह खरीद “बाय (इंडियन-IDDM)” कैटेगरी के तहत होगी, जिसमें पूरी तरह भारतीय डिजाइन और निर्माण को प्राथमिकता दी जाती है। इससे सरकार का पैसा भी बचता है और कंपनियों को इनोवेशन करने का मौका भी मिलता है। (30mm Naval Gun India)

इस प्रोजेक्ट की सबसे अहम शर्तों में से एक है इंडिजिनस कंटेंट (IC) यानी स्वदेशी हिस्सेदारी। इस गन सिस्टम का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा भारत में बना होना चाहिए। बाद में यह बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक करना होगा। सिर्फ इतना ही नहीं, इस स्वदेशी हिस्से का कम से कम आधा भाग भारत में बने मटेरियल, पार्ट्स या सॉफ्टवेयर से होना चाहिए। वहीं, यह नियम सिर्फ गन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस टूल्स और टेस्टिंग इक्विपमेंट पर भी लागू होगा। सरकार की योजना है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए पूरी सप्लाई चेन को देश के अंदर ही विकसित किया जाए। (30mm Naval Gun India)

विदेशी कंपनियों की क्या होगी भूमिका?

इस प्रोजेक्ट में विदेशी कंपनियां सीधे हिस्सा नहीं ले सकतीं, लेकिन वे भारतीय कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी पार्टनर के रूप में जुड़ सकती हैं। अगर कोई भारतीय कंपनी किसी विदेशी कंपनी से तकनीक लेती है, तो उसे साफ-साफ बताना होगा कि कौन-सी तकनीक ली जा रही है और उसमें स्वदेशी हिस्सेदारी का योगदान कितना है। साथ ही, बिना भारत सरकार की अनुमति के इस सिस्टम के किसी भी हिस्से की जांच या ऑडिट कोई विदेशी एजेंसी नहीं कर सकती। यह नियम सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रखा गया है। (30mm Naval Gun India)

कैसे होगा कंपनियों का चयन?

जो कंपनियां इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लेना चाहती हैं, उन्हें अपने बारे में पूरी जानकारी देनी होगी। इसमें उनकी तकनीकी क्षमता, वित्तीय स्थिति, पहले किए गए प्रोजेक्ट और मैन्युफैक्चरिंग अनुभव शामिल होंगे। नौसेना इन सभी पहलुओं के आधार पर कंपनियों का मूल्यांकन करेगी और फिर कुछ कंपनियों को आगे के चरण के लिए चुनेगी। इसके बाद प्रोटोटाइप बनाया जाएगा, उसका परीक्षण होगा और सफल होने पर बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया जाएगा। (30mm Naval Gun India)

भारत फोर्ज बना रही है 30 एमएम और 75 एमएम नेवल गन

भारत फोर्ज भी भारतीय नौसेना के लिए 30 मिमी और 75 मिमी नेवल गन बना रही है। कंपनी का लक्ष्य है कि ये गन 2026 के अंत तक या 2027 तक टेस्ट होकर तैयार हो जाएं। भारत फोर्ज पुणे में अपने प्लांट में इन गन्स पर काम कर रही है। यह पहली बार होगा जब इस तरह की आधुनिक नेवल गन पूरी तरह भारत में डिजाइन और बनाई जाएगी।

30 मिमी गन छोटी दूरी के खतरों के लिए है। जैसे ड्रोन, तेज नावें या समुद्र में अचानक हमला करने वाले छोटे टारगेट। यह करीब 3 से 5 किलोमीटर के दायरे में दुश्मन को निशाना बना सकती है।

75/76 मिमी गन इससे बड़ी होती है और जहाजों पर मुख्य हथियार के तौर पर इस्तेमाल होती है। अभी भारत ज्यादातर ऐसी गन बाहर से लेता है, लेकिन यह नई गन उस कमी को पूरा कर सकती है। (30mm Naval Gun India)

इन गन्स को इस तरह बनाया जा रहा है कि ये समुद्र की तेज लहरों में भी सही निशाना लगा सकें। यानी जहाज हिल रहा हो, फिर भी फायरिंग सटीक होगी। इनमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम भी जोड़ा जाएगा, जिससे दिन और रात दोनों समय टारगेट को आसानी से देखा और निशाना बनाया जा सकेगा। अगर दुश्मन रडार को जाम कर दे, तब भी यह सिस्टम काम करेगा। इनका फायरिंग स्पीड भी तेज होगा, जिससे कम समय में ज्यादा फायर किया जा सकेगा। साथ ही इसमें अलग-अलग तरह के गोला-बारूद जैसे हाई एक्सप्लोसिव और आर्मर पियर्सिंग इस्तेमाल किए जा सकेंगे। सबसे अहम बात यह है कि इन गन्स में 70% से ज्यादा हिस्सा भारत में ही बनाया जा रहा है। (30mm Naval Gun India)

Tejas Mk1A की डिलीवरी शुरू करने को लेकर HAL को मिली बड़ी राहत, वायुसेना ने दी शर्तों में दी ‘विशेष’ छूट

Tejas Mk1A Delivery
File Photo

Tejas Mk1A Delivery: भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके1ए की डिलीवरी को लेकर एक बड़ा फैसला सरकार ने किया है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायुसेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कुछ शर्तों में छूट देने का फैसला किया है, ताकि इस अहम फाइटर जेट की डिलीवरी जल्द शुरू हो सके।

हालांकि इस पूरे फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विमान की मुख्य यानी “मस्ट-हैव” क्षमताओं पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यानी तेजस एमके1ए की ताकत और लड़ाकू क्षमता पूरी तरह बरकरार रहेगी। (Tejas Mk1A Delivery)

Tejas Mk1A Delivery: देरी के बाद लिया गया बड़ा फैसला

तेजस एमके1ए प्रोग्राम भारत के सबसे महत्वपूर्ण डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक है। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी डिलीवरी लगातार टलती रही। पहले उम्मीद थी कि 2024-25 में यह विमान वायुसेना को मिलने लगेगा, लेकिन अब यह समयसीमा बढ़कर मार्च 2026 से भी आगे खिसक गई है।

इस देरी के पीछे कई वजहें रहीं। सबसे बड़ी समस्या अमेरिका से आने वाले जीई एफ404 इंजन की सप्लाई में देरी रही। इसके अलावा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसे एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और हथियारों के इंटीग्रेशन में भी समय लगा।

इन्हीं कारणों को देखते हुए अब सरकार और वायुसेना ने यह फैसला लिया है कि कुछ गैर-जरूरी या कम अहम काम बाद में भी पूरे किए जा सकते हैं, लेकिन जरूरी क्षमताओं के साथ ही विमान को शामिल किया जाएगा। (Tejas Mk1A Delivery)

क्या मिली है एचएएल को छूट

नई व्यवस्था के तहत एचएएल को कुछ कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी शर्तों में राहत दी गई है। इसका मतलब यह है कि अगर कुछ ऐसे काम बाकी हैं, जिनका सीधा असर विमान की लड़ाकू क्षमता पर नहीं पड़ता, तो उनके बिना भी विमान की डिलीवरी शुरू की जा सकती है।

बताया जा रहा है कि पेंडिंग काम को तीन हिस्सों में बांटा गया है, माइनर, मेजर और नॉट एक्सेप्टेबल। इनमें से माइनर और कुछ मेजर कामों पर छूट दी जा सकती है।

वायुसेना इस बात के लिए तैयार है कि ऐसे विमान को स्वीकार किया जाए जिसमें कुछ काम बाद में पूरे किए जाएं, लेकिन यह छूट सिर्फ उन हिस्सों तक सीमित है जो ऑपरेशनल जरूरतों के लिए जरूरी नहीं हैं। (Tejas Mk1A Delivery)

किन चीजों पर कोई समझौता नहीं

इस पूरे फैसले का सबसे अहम हिस्सा यह है कि कुछ क्षमताओं को पूरी तरह जरूरी माना गया है। इनके बिना कोई भी विमान स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इनमें सबसे पहले आता है मिसाइल फायरिंग ट्रायल्स। यानी विमान को अपने हथियारों का सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए। (Tejas Mk1A Delivery)

दूसरा, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सही इंटीग्रेशन। यह आधुनिक युद्ध में बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे विमान दुश्मन के रडार और मिसाइल से बच सकता है।

तीसरा, पूरा वेपन पैकेज। यानी विमान पर लगाए जाने वाले सभी हथियार सिस्टम पूरी तरह काम करने चाहिए।

इन तीनों को “नॉन-कॉम्प्रोमाइज” कैटेगरी में रखा गया है। यानी इन पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जाएगी। (Tejas Mk1A Delivery)

एचएएल की क्या है डिलीवरी की तैयारी

एचएएल का कहना है कि वह डिलीवरी शुरू करने के लिए तैयार है। कंपनी के अनुसार पांच तेजस एमके1ए विमान पूरी तरह तैयार हैं और इनमें सभी जरूरी क्षमताएं शामिल हैं।

इसके अलावा नौ और विमान बनाए जा चुके हैं, लेकिन वे इंजन मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

एचएएल का यह भी कहना है कि जो देरी हुई है, वह सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग की वजह से नहीं है, बल्कि डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़े कुछ काम अभी पूरे होने बाकी हैं, जिनमें एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी की भूमिका भी है। (Tejas Mk1A Delivery)

इससे पहले दिसंबर 2025 में इस पूरे प्रोजेक्ट की समीक्षा के लिए एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें एचएएल ने अलग-अलग सिस्टम्स को पूरा करने के लिए टाइमलाइन दी थी।

अब अप्रैल 2026 में एक और बड़ी रिव्यू मीटिंग होने की संभावना है, जिसमें यह देखा जाएगा कि कितनी प्रगति हुई है।

इसके बाद मई 2026 में वायुसेना इस प्रोजेक्ट का व्यापक मूल्यांकन करेगी। अगर सब कुछ तय योजना के अनुसार रहा, तो 2026-27 के मध्य तक तेजस एमके1ए की डिलीवरी शुरू हो सकती है। (Tejas Mk1A Delivery)

वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस

भारतीय वायुसेना इस समय स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। पुराने मिग-21 जैसे विमान तेजी से रिटायर हो रहे हैं, जिससे फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या घट रही है।

ऐसे में तेजस एमके1ए एक अहम भूमिका निभाने वाला है। यह 4.5 जनरेशन का आधुनिक फाइटर जेट है, जिसमें एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग जैसी क्षमताएं हैं।

यह न सिर्फ वायुसेना की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगा। (Tejas Mk1A Delivery)

180 विमानों का बड़ा ऑर्डर

भारत ने तेजस एमके1ए के लिए कुल 180 विमानों का ऑर्डर दिया है। इसमें पहला कॉन्ट्रैक्ट 83 विमानों का 2021 में हुआ था, जिसकी कीमत करीब 48,000 करोड़ रुपये थी।

इसके बाद 2025 में 97 और विमानों का ऑर्डर दिया गया, जिसकी कीमत लगभग 62,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह भारत के डिफेंस सेक्टर में सबसे बड़े स्वदेशी ऑर्डर्स में से एक है। (Tejas Mk1A Delivery)

जानें क्या है भारतीय नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल? MILAN 2026 में जीता विदेशी मेहमानों का दिल

Indian Navy Continuity Drill MILAN 2026
Indian Navy Continuity Drill MILAN 2026

Indian Navy Continuity Drill: विशाखापत्तनम के आरके बीच पर गुरुवार की शाम एक अलग ही नजारा देखने को मिला। मिलन एक्सरसाइज 2026 के उद्घाटन के मौके पर आयोजित इंटरनेशनल सिटी परेड में हजारों लोग जुटे। समुद्र के किनारे जब भारतीय नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल शुरू हुई, तो कुछ ही पलों में वहां खड़े दर्शक तालियों और उत्साह से पूरा माहौल गूंज उठा।

Indian Navy Continuity Drill: क्या होती है कंटीन्यूटी ड्रिल?

कंटीन्यूटी ड्रिल भारतीय नौसेना की एक विशेष वेपन ड्रिल है। इसे साधारण मार्च या सामान्य परेड से अलग माना जाता है। इसमें सेलर्स राइफल के साथ बेहद सटीक और एकसमान मूवमेंट करते हैं। खास बात यह है कि ड्रिल शुरू होने के बाद बीच में कोई मौखिक कमांड नहीं दी जाती। पूरी ड्रिल बिना रुके और लगातार चलती रहती है। इसी वजह से इसे “कंटीन्यूटी” यानी निरंतरता की ड्रिल कहा जाता है।

इस ड्रिल में आम तौर पर 24 या उससे अधिक नाविक एक साथ शामिल होते हैं। वे .22 राइफल राइफल के साथ बेयोनेट लगाकर अभ्यास करते हैं। सभी सेलर्स इतने करीब खड़े होते हैं कि एक छोटी सी गलती भी पूरी ड्रिल को बिगाड़ सकती है। लेकिन जब यह टीम ड्रिल करती है, तो हर मूवमेंट ऐसा लगता है जैसे एक ही शरीर काम कर रहा हो। (Indian Navy Continuity Drill)

राइफल के जमीन पर पड़ने की आवाज, जूतों की एकसमान थाप और हथियारों की क्लिक की ध्वनि एक अलग ही ताल बनाती है। इसीलिए कई बार इसे “ड्रिल विद थ्रिल” भी कहा जाता है। इसमें रोमांच और अनुशासन दोनों साथ दिखाई देते हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

आरके बीच पर क्यों बना आकर्षण का केंद्र?

विशाखापत्तनम पूर्वी नौसैनिक कमान का मुख्यालय है। यहां नौसेना की कई महत्वपूर्ण यूनिट्स तैनात हैं। ऐसे में जब इंटरनेशनल सिटी परेड आयोजित हुई, तो नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल स्वाभाविक रूप से सबसे बड़ा आकर्षण बन गई।

मिलन 2026 में 74 देशों के प्रतिनिधिमंडल और नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय नौसेना की यह प्रस्तुति देश की प्रोफेशनल क्षमता और ट्रेनिंग का प्रदर्शन थी। विदेशी प्रतिनिधि भी इस ड्रिल को बड़े ध्यान से देखते नजर आए। (Indian Navy Continuity Drill)

मैन्यूवर ने दर्शकों को कर दिया रोमांचित

कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि के आगमन से हुई। वंदे मातरम और राष्ट्रीय गान के साथ वातावरण देशभक्ति से भर गया। इसके बाद बैनर फ्लाईपास्ट और एरियल डेमो ने आसमान में रोमांच पैदा कर दिया। फाइटर जेट्स और हेलीकॉप्टरों ने बे ऑफ बंगाल के ऊपर सिंक्रोनाइज्ड मैन्यूवर किए। एमएच-60आर हेलीकॉप्टर का ब्रेकआउट मैन्यूवर और बम बर्स्ट डेमो ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

डोर्नियर, कोस्ट गार्ड एयरक्राफ्ट और पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट के फ्लाईपास्ट ने नौसेना की हवाई ताकत दिखाई। सर्च एंड रेस्क्यू डेमो, स्लिथरिंग ऑपरेशन और मरीन कमांडोज के कॉम्बैट मैन्यूवर ने ऑपरेशनल तैयारियों की झलक दी। (Indian Navy Continuity Drill)

अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है दुनिया

परेड के दौरान नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि मिलन 2026 एक ऐतिहासिक आयोजन है। उन्होंने 74 देशों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत किया और आंध्र प्रदेश सरकार तथा विशाखापत्तनम के लोगों का धन्यवाद किया।

उन्होंने कहा कि यह आयोजन सिर्फ सैन्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि दोस्ती और सहयोग का प्रतीक है। जब अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक मंच पर आती हैं, तो आपसी भरोसा बढ़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और भारतीय नौसेना समुद्रों को सुरक्षित, मुक्त और खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि आज दुनिया अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। कई तरह की चुनौतियां सामने हैं। ऐसे समय में भारत और भारतीय नौसेना अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर समुद्रों को सुरक्षित, मुक्त और सबके लिए खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के उस विचार का उल्लेख किया कि जब वैश्विक समुद्रों में हलचल होती है, तो दुनिया एक स्थिर और भरोसेमंद प्रकाशस्तंभ की ओर देखती है। भारत उस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है। (Indian Navy Continuity Drill)

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि मिलन जैसे आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये अलग-अलग देशों की नौसेनाओं को एक साथ लाते हैं। चाहे समुद्र में संयुक्त अभ्यास हो या आज की तरह सिटी परेड में साथ कदम मिलाना, ऐसे कार्यक्रम आपसी विश्वास और तालमेल को मजबूत करते हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

रोशनी से जगमगा उठे युद्धपोत

जैसे ही सूरज ढलने लगा, समुद्र में लंगर डाले युद्धपोत रोशनी से जगमगा उठे। एंकरज पर खड़े जहाजों की इल्यूमिनेशन ने समुद्र को चमकते शहर में बदल दिया। इसके बाद फायरवर्क्स, लेजर शो और ड्रोन शो ने आसमान को रंगों से भर दिया। (Indian Navy Continuity Drill)

MILAN 2026: 74 देशों के बीच रक्षा मंत्री का बड़ा संदेश, समुद्री चुनौतियों से अकेला नहीं निपट सकता कोई देश

MILAN 2026 Maritime Security

MILAN 2026 Maritime Security: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को साफ शब्दों में कहा कि आज समुद्र से जुड़ी चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। ऐसे समय में दुनिया के देशों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने 74 देशों से आए नौसेना प्रमुखों और प्रतिनिधिमंडलों को संबोधित करते हुए कहा कि समुद्री सुरक्षा अब किसी एक देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है।

MILAN 2026 Maritime Security: समुद्री रास्तों पर नियंत्रण को लेकर बढ़ी होड़

विशाखापत्तनम में आयोजित मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज मिलन 2026 के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री परिवहन में भारी इजाफा हुआ है। इसके साथ ही समुद्री रास्तों, जलडमरूमध्यों और समुद्री चैनलों पर नियंत्रण को लेकर होड़ भी बढ़ी है। कई बार यह तनाव की स्थिति तक पहुंच जाती है। समुद्र के नीचे मौजूद खनिज संपदा, खासकर दुर्लभ खनिजों को लेकर भी दुनिया का ध्यान बढ़ा है, जिससे नई तरह की प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही है। (MILAN 2026 Maritime Security)

नौसेनाओं के लिए लगातार बढ़ रही हैं चुनौतियां

उन्होंने चेतावनी दी कि पारंपरिक खतरों के साथ-साथ नए खतरे भी सामने आ रहे हैं। समुद्री डकैती, मैरीटाइम टेररिज्म, अवैध मछली पकड़ना, तस्करी, साइबर हमले और सप्लाई चेन में रुकावट जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं भी ज्यादा बार और ज्यादा तीव्र रूप में आ रही हैं। ऐसे में मानवीय सहायता और आपदा राहत ऑपरेशन भी अधिक जरूरी हो गए हैं।

राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि कोई भी एक नौसेना, चाहे वह कितनी भी मजबूत क्यों न हो, इन सभी चुनौतियों का अकेले सामना नहीं कर सकती। उन्होंने नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने, सूचना साझा करने और संयुक्त अभ्यास करने की जरूरत पर जोर दिया। (MILAN 2026 Maritime Security)

ग्लोबल नेवल फ्रेमवर्क पर दिया जोर

रक्षा मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि यानी यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सीज (यूएनसीएलओएस) का जिक्र करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र से जुड़े मामलों के समाधान के लिए यह एक मजबूत लीगल फ्रेमवर्क देता है। लेकिन इसे और प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक ग्लोबल नेवल फ्रेमवर्क की जरूरत है। ऐसा फ्रेमवर्क देशों के बीच भरोसा बढ़ाएगा, संचार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और खुले समुद्र में आतंकवाद व अपराध जैसी गतिविधियों को रोकने में मदद करेगा। (MILAN 2026 Maritime Security)

मिलन जैसे प्लेटफॉर्म्स की है जरूरत

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज वैश्विक व्यवस्था में बदलाव दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में मिलन जैसे प्लेटफॉर्म प्रोफेशनल अनुभव साझा करने, आपसी भरोसा मजबूत करने और मिलकर काम करने की क्षमता बढ़ाने का अवसर देते हैं। जब अलग-अलग देशों के जहाज साथ चलते हैं, नाविक साथ में ट्रेनिंग लेते हैं और कमांडर साथ बैठकर चर्चा करते हैं, तो भौगोलिक और राजनीतिक दूरियां कम हो जाती हैं। (MILAN 2026 Maritime Security)

सागर से महासागर से समुद्री साझेदारी होगी मजबूत

उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से समुद्री सहयोग की जरूरत को समझता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन ‘सागर’ यानी सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन से आगे बढ़कर अब ‘महासागर’ यानी म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन का विचार सामने आया है। यह दिखाता है कि भारत सिर्फ अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक समुद्री साझेदारी को मजबूत करना चाहता है।

राजनाथ सिंह ने कहाा कि भारत नियमित रूप से मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइजेज में हिस्सा लेता है। कॉर्डिनेटेड पेट्रोलिंग, एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की निगरानी, हाइड्रोग्राफिक सहायता और चक्रवात जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में भी भारत सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक विश्व-मित्र के रूप में क्षेत्र में रचनात्मक और भरोसेमंद भूमिका निभाता रहेगा। (MILAN 2026 Maritime Security)

उन्होंने मिलन 2026 को वैश्विक समुद्री समुदाय के भारत पर भरोसे का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा न्यायपूर्ण समुद्री व्यवस्था स्थापित करना चाहता है जो अंतरराष्ट्रीय कानून और नौवहन की स्वतंत्रता पर आधारित हो। (MILAN 2026 Maritime Security)

नेवी चीफ ने मिलन को बताया समुद्री महाकुंभ

मिलन 2026 उद्घाटन समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने भी मिलन को एक समुद्री महाकुंभ बताया। उन्होंने कहा कि यह ऐसा मंच है जहां दुनिया भर के मैरीन प्रोफेशनल्स एक साझा उद्देश्य के साथ इकट्ठा होते हैं। उन्होंने दोहराया कि आज की समुद्री चुनौतियां जटिल और सीमाओं से परे हैं, जिनका समाधान सहयोग और साझेदारी से ही संभव है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना प्रधानमंत्री के महासागर विजन से प्रेरित है, जो साझेदारी और साझा जिम्मेदारी पर आधारित है। भारतीय नौसेना अपने सभी साझेदार देशों को बराबरी का दर्जा देती है और मानती है कि हर देश अपनी अलग ताकत लेकर आता है। (MILAN 2026 Maritime Security)

बराबरी और साझेदारी की भावना

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना अपने सभी समुद्री साझेदारों को बराबरी का दर्जा देती है। हर देश की अपनी खास ताकत होती है – चाहे वह अनुभव हो, भौगोलिक स्थिति हो या तकनीकी क्षमता। जब ये ताकतें एक साथ जुड़ती हैं, तो सामूहिक क्षमता बढ़ती है। इससे बदलती समुद्री चुनौतियों का सामना करने की ताकत भी मजबूत होती है। (MILAN 2026 Maritime Security)

तीन स्तरों पर काम करने की रणनीति

नौसेना प्रमुख ने बताया कि भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तीन स्तरों पर काम करती है।

इनमें वैश्विक स्तर पर भारत अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर समग्र समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देता है। इसमें कानून व्यवस्था, मानवीय सहायता, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन शामिल है।

वहीं, क्षेत्रीय स्तर पर भारत यह समझता है कि हर इलाके की जरूरत अलग होती है। इसलिए एक ही तरीका हर जगह काम नहीं करता। सहयोग को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालना जरूरी है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पिछले साल भारतीय नौसेना ने ‘इंडियन ओशन शिप सागर’ के रूप में एक जहाज को दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात किया। इसमें नौ देशों के 44 कर्मियों की मिलीजुली टीम शामिल थी। इसका मकसद अनुभव और जिम्मेदारी साझा करना था। (MILAN 2026 Maritime Security)

अब इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए ‘आईओएस सागर 2.0’ को इस साल अप्रैल में और बड़े स्तर पर तैनात किया जाएगा।

उन्होंने पिछले साल हुए ‘अफ्रीका–इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट’ अभ्यास का भी जिक्र किया। इस अभ्यास में पूर्वी अफ्रीका के देशों के साथ मिलकर व्यावहारिक सहयोग किया गया। इससे यह संदेश गया कि अगर इरादा मजबूत हो तो दूरी कोई बाधा नहीं बनती। (MILAN 2026 Maritime Security)

पड़ोसी देशों के साथ प्राथमिकता

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानी पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने की नीति भी समुद्री सुरक्षा में दिखती है। चाहे समन्वित पेट्रोलिंग हो या संकट के समय मानवीय सहायता, भारत हमेशा क्षेत्र में एक भरोसेमंद ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाता है। (MILAN 2026 Maritime Security)

दो चरणों में होगी मिलन एक्सरसाइज

मिलन 2026 को दो चरणों में आयोजित किया जा रहा है। पहले चरण यानी हार्बर फेज में प्रोफेशनल डिस्कशंस, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेमिनार, विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शहर भ्रमण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इससे देशों के बीच आपसी समझ और संबंध मजबूत होते हैं।

दूसरे चरण यानी सी फेज में समुद्र में संयुक्त अभ्यास होंगे। इनमें एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन और सामरिक अभ्यास शामिल हैं। इन अभ्यासों का मकसद नौसेनाओं के बीच तालमेल और सामूहिक तैयारी को मजबूत करना है। (MILAN 2026 Maritime Security)

नौ एशियान देशों के नौसेना प्रमुखों से मिले रक्षा मंत्री

मिलन के उदघाटन के दौरान रक्षा मंत्री ने नौ एशियान देशों के नौसेना प्रमुखों से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि एशियान भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ है। साझा सुरक्षा ही क्षेत्रीय समृद्धि की नींव है। उन्होंने एशियान देशों को भारत की रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भर भारत के तहत विकसित इकोसिस्टम का लाभ उठाने का निमंत्रण दिया।

उन्होंने आईएनएस विक्रांत और विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर जैसे जहाजों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अब “बिल्डर नेवी” बन चुका है। यानी भारत अब सिर्फ जहाज खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि खुद डिजाइन और निर्माण करने वाला देश है। (MILAN 2026 Maritime Security)

IFR-Milan 2026: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार साथ दिखे भारत के स्ट्रेटेजिक वॉरशिप, INS विक्रांत से अन्वेष तक दुनिया ने देखा भारत का दम

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

IFR-Milan 2026: बुधवार को विशाखापत्तनम भारतीय नौसेना की ब्लू वॉटर ताकत का सबसे बड़ा गवाह बना। विशाखापत्तनम के तट पर आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 सिर्फ एक नौसैनिक परेड नहीं थी, बल्कि यह भारत की समुद्री ताकत और रणनीतिक आत्मविश्वास का खुला प्रदर्शन था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला मौका था जब भारतीय नौसेना के कई अहम और स्ट्रेटेजिक वॉरशिप एक साथ कतार में दुनिया के सामने दिखाई दिए। ऐसे मौके कई सालों में कभी कभार ही देखने को मिलते हैं।

आईएफआर का निरीक्षण तीनों सेनाओं की सुप्रीम कमांडर और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। वह स्वदेशी ऑफशोर पेट्रोल वेसल आईएनएस सुमेधा पर सवार होकर फ्लीट का रिव्यू करती नजर आईं। समुद्र में कतारबद्ध खड़े भारतीय और विदेशी जहाजों ने यह साफ संदेश दिया कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अब सिर्फ एक तटीय ताकत नहीं, बल्कि एक सशक्त ब्लू वॉटर नेवी बन चुका है। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

IFR-Milan 2026: क्या होता है फ्लीट रिव्यू?

फ्लीट रिव्यू एक ऐसा कार्यक्रम होता है, जिसमें देश का सर्वोच्च कमांडर समुद्र में तैनात नौसेना के जहाजों का निरीक्षण करता है। इसमें दोस्त देशों की नौसेनाएं भी हिस्सा लेती हैं। भारत में इससे पहले 2001 में मुंबई और 2016 में विशाखापत्तनम में आईएफआर आयोजित हो चुका है। 2026 का आयोजन सबसे बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि इसमें मिलन एक्सरसाइज और आईओएनएस कॉन्क्लेव भी शामिल हैं।

इस बार आईएफआर में करीब 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं शामिल हुईं। भारतीय नौसेना के 50 से अधिक युद्धपोत, पनडुब्बियां और सपोर्ट शिप इसमें दिखाई दिए। साथ ही विदेशी नौसेनाओं के भी कई जहाज समुद्र में मौजूद रहे। (IFR-Milan 2026)

ऑपरेशन सिंदूर की यादें हुईं ताजा

पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच था, जहां भारतीय नौसेना की स्ट्रेटेजिक ताकत खुले तौर पर सामने आई। उस ऑपरेशन के दौरान भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत ने अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ अरब सागर में अहम भूमिका निभाई थी।

आईएफआर 2026 में आईएनएस विक्रांत मुख्य आकर्षण रहा। यह भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे कोचीन शिपयार्ड में बनाया गया है। लगभग 40 हजार टन से ज्यादा वजन वाला यह विशाल जहाज भारत की समुद्री शक्ति का प्रतीक बन चुका है।

इस पर मिग-29के फाइटर जेट, कामोव हेलीकॉप्टर और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव जैसे एयरक्राफ्ट तैनात किए जा सकते हैं। आईएफआर के दौरान समुद्र में एंकर डाले खड़े विक्रांत को देखकर साफ लगा कि भारत अब दूर समुद्रों में भी अपनी एयर पॉवर को प्रोजेक्ट करने की क्षमता रखता है। (IFR-Milan 2026)

स्वदेशी डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट ने भी दिखाया दम

आईएफआर में प्रोजेक्ट 15बी के तहत बने विशाखापत्तनम क्लास गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर भी शामिल थे। आईएनएस विशाखापत्तनम, आईएनएस मोरमुगाओ और अन्य जहाज आधुनिक रडार, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम से लैस हैं।

ये जहाज एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन वारफेयर में सक्षम हैं। इनकी स्टेल्थ डिजाइन से इन्हें दुश्मन के रडार से बचने में मदद करती है।

इसी तरह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बने नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भी आकर्षण का केंद्र रहे। ये जहाज अधिक ऑटोमेशन, कम क्रू और आधुनिक सेंसर से लैस हैं। इनका डिजाइन पूरी तरह भारतीय नौसेना के डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल डिजाइन द्वारा तैयार किया गया है। (IFR-Milan 2026)

पनडुब्बियों और एंटी सबमरीन वॉरशिप भी दिखे कतार में

आईएफआर में तीन भारतीय पनडुब्बियां भी दिखाई गईं। इनमें शिशु क्लास की शंकुल, सिंधु क्लास की आईएनएस सिंधुकेसरी और आईएनएस सिंधुकीर्ति शामिल थीं। ये पनडुब्बियां साइलेंट वॉरियर, लंबी दूरी की क्षमता और डीप स्ट्राइक के लिए जानी जाती हैं।

इसके अलावा अर्नाला क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट भी मौजूद रहे। इनका मकसद तटीय इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती पनडुब्बी गतिविधियों को देखते हुए यह क्षमता बेहद अहम मानी जा रही है। ये जहाज सोनार, टॉरपीडो और एएसडब्ल्यू हेलीकॉप्टर से लैस हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती पनडुब्बी गतिविधियों को देखते हुए इनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (IFR-Milan 2026)

आईएनएस निस्तार की दिखी झलक

आईएफआर में डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल यानी डीएसआरवी और डाइविंग सपोर्ट वेसल आईएनएस निस्तार भी देखने को मिला। इनका काम समुद्र में फंसी पनडुब्बियों के नाविकों को बचाना है। यह भारत की मानवीय और तकनीकी क्षमता दोनों को दिखाता है। नया स्वदेशी निस्तार भारतीय शिपयार्ड में बना है और यह भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दिखाता है। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

पहली बार दिखा आईएनएस अन्वेष

आईएफआर में भारतीय नौसना ने पहली बार अपने स्ट्रेटेजिक शिप आईएनएस अन्वेष (A41) को भी शोकेस किया। यह भारतीय नौसेना का एक बेहद खास और रणनीतिक जहाज है। इसे बैलास्टिक मिसाइल रेंज इंस्ट्रूमेंटेशन शिप कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो यह समुद्र में तैरती हुई टेस्टिंग लैब है, जहां से लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण और ट्रैकिंग की जाती है। इसी वजह से इसे फ्लोटिंग टेस्ट रेंज भी कहा जाता है।

“अन्वेष” का मतलब होता है खोज। यह नाम इसके काम को सही तरीके से दर्शाता है, क्योंकि यह जहाज मिसाइलों को ट्रैक करता है, उनका डेटा इकट्ठा करता है और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया को मॉनिटर करता है। (IFR-Milan 2026)

इस जहाज को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने डिजाइन किया है और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में बनाया गया है। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बड़ी मिसाल माना जाता है।

आईएनएस अन्वेष को 11 मार्च 2022 को गुप्त समारोह में कमीशन किया गया था। यह जहाज डीआरडीओ के स्वामित्व में है, लेकिन इसे भारतीय नौसेना संचालित करती है। यानी इस पर नौसेना के अधिकारी और जवान तैनात रहते हैं, जबकि इसके मिशन डीआरडीओ के कार्यक्रमों से जुड़े होते हैं। (IFR-Milan 2026)

यह जहाज करीब 118 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा है। इसका कुल वजन लगभग 11,300 टन है। यह 18 नॉट्स से ज्यादा की रफ्तार से चल सकता है और बिना दोबारा सप्लाई लिए करीब 45 दिन तक समुद्र में रह सकता है। इस पर लगभग 165 लोग तैनात रहते हैं। इनमें नौसेना के अधिकारी, तकनीकी स्टाफ और वैज्ञानिक शामिल होते हैं।

आईएनएस अन्वेष की सबसे बड़ी तकनीकी खासियत इसका इंटीग्रेटेड फुल इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम है। यह भारतीय नौसेना का पहला जहाज है जिसमें इस तरह की तकनीक लगी है। (IFR-Milan 2026)

इस सिस्टम से जहाज कम शोर करता है, ज्यादा स्थिर रहता है और लंबे समय तक लगातार काम कर सकता है। मिसाइल टेस्टिंग के दौरान स्थिरता बहुत जरूरी होती है, क्योंकि हल्की सी कंपन भी डेटा को प्रभावित कर सकती है।

आईएनएस अन्वेष पर लंबी दूरी का मल्टी-फंक्शन रडार लगाया गया है। यह रडार बैलिस्टिक मिसाइल को ट्रैक करने में सक्षम है। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम, टेलीमेट्री उपकरण और डेटा प्रोसेसिंग सेंटर भी हैं। जब कोई मिसाइल छोड़ी जाती है, तो यह जहाज उसकी उड़ान का पूरा डेटा रिकॉर्ड करता है।

इस पर मिसाइल लॉन्च सिस्टम भी मौजूद हैं। यानी जरूरत पड़ने पर यह जहाज खुद भी इंटरसेप्टर मिसाइल टेस्टिंग में हिस्सा ले सकता है। आईएनएस अन्वेष भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत दो चरणों में अपनी मिसाइल डिफेंस सिस्टम डेवलप कर रहा है। इस जहाज की मदद से समुद्र में गहराई तक जाकर मिसाइल इंटरसेप्टर का परीक्षण किया जा सकता है। (IFR-Milan 2026)

21 अप्रैल 2023 को इस जहाज से एक महत्वपूर्ण इंटरसेप्टर मिसाइल टेस्ट किया गया था। यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इससे साबित हुआ कि देश समुद्र आधारित मिसाइल रक्षा क्षमता विकसित कर रहा है। आईएनएस अन्वेष हिंद महासागर में काफी दूर तक जाकर परीक्षण कर सकता है। इससे 1500 किलोमीटर तक की रेंज वाली मिसाइलों की टेस्टिंग संभव हो जाती है। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

आसमान में भी दिखा शक्ति प्रदर्शन

समुद्र के साथ-साथ आसमान में भी शक्ति प्रदर्शन हुआ। मिग-29के फाइटर जेट, पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, डोर्नियर और भारतीय नौसेना की रीढ़ कहे जाने वाले चीता, एएलएच, सी किंग, कोमोव और एमएच 60 आर रोमियो हेलीकॉप्टरों ने फ्लाईपास्ट किया। हॉक जेट्स ने एरियल मैन्यूवर दिखाए। (IFR-Milan 2026)

“बिल्डर नेवी” की पहचान

आईएफआर 2026 ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया कि भारत अब “बायर नेवी” नहीं, बल्कि “बिल्डर नेवी” बन चुका है। पहले भारत बड़े युद्धपोत विदेशों से खरीदता था। आज एयरक्राफ्ट कैरियर से लेकर डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और सबमरीन तक देश में डिजाइन और निर्माण हो रहे हैं। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे संस्थान अब विश्वस्तरीय युद्धपोत बना रहे हैं। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

मैरीटाइम डिप्लोमेसी की दिखी पावर

आईएफआर-मिलन एक्सरसाइज में ईरान, अमेरिका, रूस, बांग्लादेश जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों की भागीदारी ने यह भी दिखाया कि भारत रणनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए सबके साथ संबंध मजबूत कर रहा है। यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ जब दुनिया कई खेमों में बंटी हुई है। इसके बावजूद विभिन्न देशों की नौसेनाएं एक ही मंच पर दिखीं।

नौसेना के प्रवक्ता कैप्टन विवेक मधवाल ने बताया कि इन आयोजनों में लगभग 72 देशों के प्रतिनिधिमंडल हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भागीदारी दिखाती है कि अलग-अलग देशों के बीच सहयोग कितना मजबूत हो रहा है। समुद्री सुरक्षा अब सिर्फ एक देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि सबकी साझा जिम्मेदारी है, क्योंकि समुद्र पूरी दुनिया की साझा संपत्ति हैं। (IFR-Milan 2026)

उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी युद्धपोतों की मौजूदगी भारत की समुद्री पहुंच और सहयोग की नीति को दर्शाती है। वहीं भारतीय नौसेना के जहाजों की संख्या और संरचना इस बात का संकेत है कि अब बेड़े में स्वदेशी जहाजों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है।

कैप्टन मधवाल के अनुसार, पहली बार स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत की भागीदारी, भारत में बनी कलवरी श्रेणी की पनडुब्बी की मौजूदगी और बड़ी संख्या में देश में डिजाइन और निर्मित प्लेटफॉर्म्स यह साबित करते हैं कि भारतीय नौसेना अब स्वदेशी क्षमता के मामले में काफी मजबूत हो चुकी है। (IFR-Milan 2026)

वहीं इन तीनों बड़े आयोजनों में क्वाड समूह के चारों देश भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया विशाखापत्तनम में मौजूद थे। हालांकि अमेरिका इस कार्यक्रम के लिए अपना एक डेस्ट्रॉयर वॉरशिप भेजने वाला था, लेकिन ऑपरेशनल जरूरतों के कारण वह जहाज शामिल नहीं हो सका। हालांकि, अमेरिका की बाकी भागीदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ। अमेरिकी पी-8 मैरीटाइम पेट्रोलिंग एय़रक्राफ्ट ने आईएफआर के फ्लाईपास्ट में हिस्सा लिया और वह एक्सरसाइज मिलन में भी शामिल होने वाला है। वहीं, भारत में अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि आपात जरूरतों के कारण यूएसएस पिनकनी इस साल इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में शामिल नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका भारत के साथ अपनी मजबूत साझेदारी को महत्व देता है और इस आयोजन की सफलता की कामना करता है। (IFR-Milan 2026)

ब्लू वॉटर में भारत का आत्मविश्वास

ब्लू वॉटर नेवी का मतलब है ऐसी नौसेना जो अपने तट से दूर, खुले महासागरों में भी लंबे समय तक अभियान चला सके। आईएफआर 2026 में दिखी जहाजों की विविधता और ताकत ने साफ किया कि भारत अब इस श्रेणी में मजबूती से खड़ा है। (IFR-Milan 2026)

क्यों कहा जाता है विशाखापत्तनम को ‘सबमरींस की कब्रगाह’? IFR-Milan 2026 के बीच गूंजेगी 1971 की जंग की कहानी

Visakhapatnam Submarine Graveyard
Representative Photo

Visakhapatnam Submarine Graveyard: विशाखापत्तनम इन दिनों भारतीय नौसेना के तीन बड़े आयोजनों का गवाह बनने जा रहा है। विशाखापत्तनम में इन दिनों इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 और मिलन एक्सरसाइज जैसे बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ आधुनिक नौसैनिक ताकत का प्रतीक नहीं है, बल्कि इतिहास का भी गवाह है। यही वजह है कि विशाखापत्तनम को अक्सर “सबमरींस की कब्रगाह” कहा जाता है।

इस नाम के पीछे दो बड़ी घटनाएं जुड़ी हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सबमरीन आरओ-110 का डूबना और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाजी का समंदर में समा जाना। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

Visakhapatnam Submarine Graveyard: 1971 की जंग में पीएनएस गाजी को डुबोया था

दिसंबर 1971 का समय था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो चुका था। पाकिस्तान की नौसेना की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली सबमरीन पीएनएस गाजी को एक खास मिशन पर भेजा गया था। उसका मकसद उस समय के भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत को निशाना बनाना था।

उस समय आईएनएस विक्रांत पूर्वी समुद्र में सक्रिय था और पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा बन चुका था। गाजी को विशाखापत्तनम के आसपास माइंस (समुद्री बारूदी सुरंगें) बिछाने और विक्रांत को ढूंढकर डुबाने का काम सौंपा गया था।

लेकिन 3 और 4 दिसंबर 1971 की रात को हालात बदल गए। भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस राजपूत ने समुद्र में संदिग्ध हलचल महसूस की और डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद जोरदार धमाका हुआ। अगले दिन समुद्र की सतह पर तेल के धब्बे और मलबा तैरता मिला। जांच में साफ हुआ कि पीएनएस गाजी डूब चुकी है। दरअसल भारतीय नौसेना ने आईएनएस राजपूत को आईएनएस विक्रांत का डेकोय (झांसा) बनाकर इस्तेमाल किया था, ताकि गाजी को फंसाया जा सके। जिसके बाद आईएनएस विक्रांत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) पर नौसैनिक नाकाबंदी कर ली थी, जो युद्ध में निर्णायक साबित हुई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

इस हादसे में सबमरीन पर सवार 93 पाकिस्तानी (11 अधिकारी और 82 नाविक) मारे गए। गाजी का मलबा विशाखापत्तनम तट से लगभग दो-ढाई किलोमीटर दूर फेयरवे ब्वॉय में करीब 100 मीटर गहराई में मिला। यह मलबा अब भी वहीं बरकरार है, और भारतीय नौसेना ने सम्मान के तौर पर इसे छेड़ा नहीं है।

भारतीय नौसेना के तत्कालीन डाइविंग सपोर्ट शिप आईएनएस निस्तार ने उस समय गाजी के मलबे की खोज और जांच में अहम भूमिका निभाई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

55 साल बाद फिर उसी जगह ‘निस्तार’

इतिहास की सबसे दिलचस्प बात यह है कि 1971 में जिस आईएनएस निस्तार ने गाजी के मलबे को खोजा था, उसी नाम का नया पूरी तरह स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुका है।

यह नया आईएनएस निस्तार 18 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। यह देश का पहला स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल है। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में यही निस्तार उसी समुद्र के पास मौजूद है, जहां गाजी की “कब्र” मानी जाती है।

पीएनएस गाजी पाकिस्तान की सबसे पुरानी और लंबी दूरी की सबमरीन थी। उसका डूबना पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था। इसलिए हर बार जब विशाखापत्तनम में बड़ा नौसैनिक आयोजन होता है, तो 1971 की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

आईएनएस निस्तार की खासियत

आईएनएस निस्तार लगभग 120 मीटर लंबा और करीब 10,000 टन वजनी जहाज है। यह करीब 18 नॉट की रफ्तार से चल सकता है। इसमें आधुनिक डाइविंग सिस्टम लगे हैं।

सबसे अहम बात यह है कि यह डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (डीएसआरवी) को समुद्र में उतार सकता है। डीएसआरवी एक छोटा लेकिन बेहद एडवांस रेस्क्यू व्हीकल होता है, जो गहरे समुद्र में जाकर किसी फंसी हुई सबमरीन से 15-16 नाविकों को एक बार में निकाल सकता है।

अगर भविष्य में किसी भारतीय या दोस्त देश की पनडुब्बी को समुद्र में दुर्घटना हो जाए, तो निस्तार जैसे जहाज जीवनरक्षक साबित होंगे। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

2024 में फिर सामने आया था गाजी का मलबा

फरवरी 2024 में मिलन एक्सरसाइज के दौरान भारतीय नौसेना के डीएसआरवी ने पीएनएस गाजी के मलबे को फिर से लोकेट किया। साइड स्कैन सोनार और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल की मदद से मलबे की तस्वीरें ली गईं। दरअसल भारतीय नौसेना ने मिलन 2024 में डीएसआरवी को डेमोंस्ट्रेट करने के लिए इस्तेमाल किया था। भारतीय नौसेना ने इसे “सबमरीन ग्रेवयार्ड” में ट्रेनिंग/टेस्टिंग के तौर पर इस्तेमाल किया था। हालांकि भारतीय नौसेना ने उसे छेड़ा नहीं। उसे युद्ध समाधि (वार ग्रेव) के रूप में सम्मान दिया गया। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

द्वितीय विश्व युद्ध में डूबी थी आरओ-110

विशाखापत्तनम के पास सिर्फ गाजी ही नहीं डूबी थी। 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सबमरीन आरओ-110 भी यहीं डूबी थी। आरओ-110 द्वितीय विश्व युद्ध के समय की एक जापानी पनडुब्बी थी। यह इंपीरियल जापानी नेवी की आरओ-100 क्लास की मध्यम आकार की तटीय अटैक सबमरीन थी। आज यह बंगाल की खाड़ी में विशाखापत्तनम के पास समुद्र की गहराई में पड़ी है।

आरओ-110 को 26 जनवरी 1943 को जापान के कोबे शिपयार्ड में लॉन्च किया गया था और 6 जुलाई 1943 को इसे आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया। इस पनडुब्बी पर 47 अधिकारी और नाविक तैनात थे। इसका वजन पानी की सतह पर करीब 600 टन और पानी के अंदर 800 टन से ज्यादा था। इसमें चार टॉरपीडो ट्यूब लगे थे और यह आठ टॉरपीडो ले जा सकती थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

फरवरी 1944 में इसकी आखिरी समुद्री कार्रवाई हुई। 11 या 12 फरवरी 1944 को यह सबमरीन कोलंबो से कोलकाता जा रहे मित्र राष्ट्रों के जहाजों के एक काफिले पर हमला कर रही थी। इसी दौरान इसने ब्रिटिश व्यापारी जहाज एसएस एस्फालियन पर दो टॉरपीडो दागे। हमले में छह लोगों की मौत हुई और जहाज को भारी नुकसान पहुंचा।

हमले के बाद काफिले की सुरक्षा कर रहे जहाजों ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की। रॉयल इंडियन नेवी के एचएमआईएस जमुना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी के एचएमएएस लॉन्सेस्टन तथा एचएमएएस इप्सविच ने सोनार की मदद से पनडुब्बी का पता लगाया और उस पर डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद समुद्र की सतह पर तेल का बड़ा धब्बा और बुलबुले दिखाई दिए। इससे साफ हो गया कि आरओ-110 डूब चुकी है। पनडुब्बी पर सवार सभी 47 नाविक मारे गए। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिसंबर 1943 में आरओ-110 ने ब्रिटिश जहाज डेजी मोलर पर भी टॉरपीडो हमला किया था।

आज आरओ-110 का मलबा गाजी के आसपास ही विशाखापत्तनम तट के पास करीब 90 से 110 मीटर की गहराई में मौजूद है। 2024 में भारतीय नौसेना के डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल ने इसे फिर से स्कैन किया, लेकिन सम्मान के कारण इसे वहीं छोड़ दिया गया। नौसेना इसे एक युद्ध समाधि मानती है और इसे उन सैनिकों का अंतिम विश्राम स्थल समझती है, जिन्होंने समुद्र में अपनी जान गंवाई। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

406 करोड़ की लागत से मेरठ से होगी पाकिस्तान-चीन सीमा की निगरानी! पहला ड्रोन एयरबेस बनाने के पीछे यह है वजह

Meerut Drone Airbase

Meerut Drone Airbase: रक्षा मंत्रालय ने मेरठ में देश का पहला डेडिकेटेड ड्रोन एयरबेस बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। यह एयरबेस खास तौर पर ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी आरपीए के लिए तैयार किया जाएगा। इसका मकसद सेना की निगरानी और स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत बनाना है। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय के तहत काम काम करने वाले बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ को दी गई है। (Meerut Drone Airbase)

Meerut Drone Airbase: 406 करोड़ रुपये की लागत

यह परियोजना करीब 406 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी। मेरठ के किला रोड इलाके में लगभग 900 एकड़ जमीन पर यह बेस बनाया जाएगा। इसे आधुनिक सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है, ताकि हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी HALE कैटेगरी के ड्रोन यहां से ऑपरेट किए जा सकें। ऐसे ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और कई घंटों तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकते हैं। (Meerut Drone Airbase)

2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे

इस एयरबेस का सबसे अहम हिस्सा होगा 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे। यह रनवे सिर्फ ड्रोन के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-295 और सी-130 जैसे विमानों के लिए भी इस्तेमाल होगा। रनवे पर आईसीएओ कैट-2 मानक की लाइटिंग और नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, ताकि कम विजिबिलिटी यानी धुंध या खराब मौसम में भी सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके। (Meerut Drone Airbase)

हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन

बेस पर दो बड़े हैंगर बनाए जाएंगे, जिनका आकार 60 गुणा 50 मीटर होगा। इन हैंगरों में ड्रोन की मेंटेनेंस, मरम्मत और तेजी से तैनाती की सुविधा होगी। अनुमान है कि यह बेस हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन संभाल सकेगा। यानी औसतन रोजाना चार ड्रोन उड़ानें यहां से ऑपरेट की जा सकेंगी। यह अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए एक स्ट्रैटेजिक नर्व सेंटर बनेगा। (Meerut Drone Airbase)

क्यों किया ड्रोन बेस बनाने का फैसला

सूत्रों का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे ऑपरेशन सिंदूर को बड़ी वजह माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था। उस दौरान ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। ड्रोन ने सटीक हमलों (प्रिसिजन टारगेटिंग) और निगरानी (सर्विलांस) में अहम भूमिका निभाई। इस अनुभव से सेना को यह समझ आया कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि अनमैन्ड सिस्टम यानी बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका और बढ़ेगी। (Meerut Drone Airbase)

एक वरिष्ठ सेना अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान और चीन की तरफ से ड्रोन से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह लंबे समय तक लगातार काम करने वाले यूएवी (बिना पायलट वाले विमान) ऑपरेशन नेटवर्क तैयार करे। अगर ड्रोन के लिए अलग से एक समर्पित बेस होगा, तो सैनिकों की ट्रेनिंग, ड्रोन की मेंटेनेंस और उन्हें जरूरत के समय तुरंत तैनात करना आसान हो जाएगा। उनका कहना है कि भविष्य का डिफेंस सिस्टम डेटा पर आधारित और बिना पायलट वाले सिस्टम पर टिक होगा। उनके अनुसार, ऐसी तैयारी से भारत की ताकत इतनी बढ़ेगी कि दुश्मन देशों के लिए यह बड़ी चिंता की वजह बन जाएगी।

वह कहते हैं, मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन दुश्मन के इलाके में बिना सैनिकों को खतरे में डाले निगरानी कर सकते हैं। रीयल टाइम इंटेलिजेंस यानी तुरंत जानकारी उपलब्ध कराते हैं। लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमले (प्रिसिजन टारगेटिंग) भी कर सकते हैं। ऐसे में एक समर्पित ड्रोन एयरबेस की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Meerut Drone Airbase)

प्रोजेक्ट के लिए क्यों चुना मेरठ को

मेरठ को इस प्रोजेक्ट के लिए चुनने के पीछे कई रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें यह दिल्ली के करीब 70 किमी दूर है और उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है। यहां से पश्चिमी सीमा यानी पाकिस्तान बॉर्डर और उत्तरी सीमा यानी चीन की ओर निगरानी करना आसान होगा। यह आतंकी घुसपैठ या सैन्य गतिविधियों को तुरंत डिटेक्ट करने में मदद करेगा। यहां से ड्रोन आसानी से पंजाब, राजस्थान और जम्मू क्षेत्र की ओर तैनात किए जा सकते हैं। उत्तरी सीमा की निगरानी के लिए भी यह बेहतरीन जगह है।

दूसरा कारण है यहां का मौजूदा मिलिटरी और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। मेरठ के पास हिंडन एयरबेस है, जो भारतीय वायुसेना का महत्वपूर्ण अड्डा है। इससे सपोर्ट और तालमेल आसान होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का हिस्सा होने के कारण यहां रक्षा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। (Meerut Drone Airbase)

वहीं तीसरी सबसे बड़ी वजह है कि मेरठ में सेना का बड़ा ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर) वर्कशॉप है। भारतीय सेना के ईएमई कोर के तहत देशभर में आठ आर्मी बेस वर्कशॉप हैं। इनमें से 515 आर्मी बेस वर्कशॉप का मुख्यालय मेरठ में है। इसके साथ 510 आर्मी बेस वर्कशॉप भी यहीं काम करती है। बेस वर्कशॉप ग्रुप का हेडक्वार्टर भी मेरठ में है, जो बाकी वर्कशॉप्स को कॉर्डिनेट करता है।

मेरठ की 510 बेस वर्कशॉप में एयर डिफेंस सिस्टम, गाइडेड मिसाइल, शिल्का और क्वाड्रेट जैसे हथियार सिस्टम, मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर और भारी सैन्य वाहनों की मरम्मत और ओवरहॉलिंग होती है। ईएमई का मुख्य काम इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल उपकरणों की मरम्मत, मेंटेनेंस और स्वदेशीकरण करना है। पिछले कुछ सालों में यहां यूएवी यानी बिना पायलट वाले विमानों के स्पेयर पार्ट्स भी बनाए और टेस्ट किए जा चुके हैं। हाल में आयोजित ड्रोन शक्ति (ईगल ऑन आर्म) के तहत ड्रोन की मरम्मत और सपोर्ट का पूरा सिस्टम ईएमई वर्कशॉप्स पर बेस्ड है, जिसमें मेरठ की भूमिका अहम है। (Meerut Drone Airbase)

85 महीने में पूरा होगा प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 85 महीने तय की गई है। इसमें सात महीने प्री-अवार्ड प्लानिंग के लिए, 18 महीने कंस्ट्रक्शन कार्य के लिए और इसके बाद मेंटेनेंस व निगरानी की अवधि शामिल है। बीआरओ ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए ई-टेंडर भी जारी कर दिया है।

इस प्रोजेक्ट को बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के चीफ इंजीनियर लीड करेंगे। एक बार पूरा होने पर, यह भारतीय सेना के लिए बॉर्डर रीजन पर निगरानी का हॉक आई बनेगा।

सूत्रों का कहना है कि यहां मौसम काफी सपोर्टिव है। अन्य जगहों जैसे जम्मू या लद्दाख की तुलना में, मेरठ कम रिस्की और स्केलेबल है। इसलिए यह जगह एक स्ट्रैटेजिक एविएशन हब बनाई जा सकती है, जो पूरे नॉर्थ इंडिया को कवर करेगी। (Meerut Drone Airbase)