Home Blog Page 31

IFR 2026 में पहली बार पूरे ‘लाव-लश्कर’ के साथ दिखेगा INS विक्रांत, जानें कैरियर बैटल ग्रुप में कौन-कौन से जंगी जहाज होते हैं शामिल

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच होने जा रहे इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारतीय नौसेना के इन दो बड़े मेगा इवेंट्स में भारतीय नौसेना का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पूरे लावलश्कर के साथ दिखाई देगा। इस दौरान वे शिप भी शोकेस होंगे जो आईएनएस विक्रांत के साथ कैरियर बैटल ग्रुप (सीबीजी) के साथ प्रमुख भूमिका में नजर आते हैं। यह पहली बार होगा जब इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में स्वदेशी एयरक्राप्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत हिस्सा लेगा।

18 फरवरी को होने वाले इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के मुख्य कार्यक्रम में भारतीय सेनाओं की सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में तैनात युद्धपोतों की समीक्षा करेंगी। इस अवसर पर आईएनएस विक्रांत भारतीय नौसेना के “सेंटर ऑफ अट्रैक्शन” के रूप में रहेगा। यह भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे देश में ही तैयार किया गया है। हालांकि इस दौरान विक्रांत सीबीजी की फॉर्मेशन में नहीं होगा, लेकिन सीबीजी में शामिल शिप जरूर दिखेंगे। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: क्या होता है कैरियर बैटल ग्रुप?

कैरियर बैटल ग्रुप का मतलब है एयरक्राफ्ट कैरियर के चारों तरफ तैनात ऐसे युद्धपोत, जो उसे हर दिशा से सुरक्षा देते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं। यह एक मल्टी-लेयर्ड सिक्युरिटी घेरा होता है, जिसमें उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सपोर्ट शिप और कई बार पनडुब्बियां भी शामिल रहती हैं। सीबीजी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नौसेनाएं जिनके पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, वे इस ग्रुपिंग को ऑपरेट करती हैं।

भारतीय नौसेना का सीबीजी स्थायी रूप से तय नहीं होता। यह ऑपरेशन, खतरे के स्तर और अभ्यास के अनुसार बदलता रहता है। आमतौर पर इसमें 8 से 12 सरफेस वॉरशिप शामिल होते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

केंद्र में रहेगा आईएनएस विक्रांत

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। करीब 45 हजार टन वजनी यह विशाल युद्धपोत 262 मीटर लंबा है और लगभग 28 नॉट्स की अधिकतम गति हासिल कर सकता है। इसमें करीब 1600 नौसैनिक तैनात रह सकते हैं। यह एक साथ लगभग 30 एयरक्राफ्ट ऑपरेट किया जा सकते हैं, इसमें मिग-29के फाइटर जेट, एमएच-60आर मल्टी रोल हेलीकॉप्टर, कामोव-31 अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर, चेतक, रोमियो हेलीकॉप्टर और एएलएच ध्रुव जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह एसटीओबार सिस्टम पर आधारित है, जिसमें शॉर्ट टेक ऑफ और अरेस्टेड रिकवरी की सुविधा होती है।

इस बार का फ्लीट रिव्यू इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि लगभग छह दशक बाद किसी स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को इस स्तर पर प्रदर्शित किया जाएगा।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के तुरंत बाद 19 फरवरी से एक्सरसाइज मिलन 2026 शुरू होगी, जो 25 फरवरी तक चलेगी। यह अभ्यास विशाखापत्तनम और बंगाल की खाड़ी में दो चरणों हार्बर फेज और सी फेज में आयोजित किया जाएगा। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

सीबीजी में डेस्ट्रॉयर्स की भूमिका अहम

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। यह ग्रुप एंटी सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस और सर्च एंड रेस्क्यू जैसे अभ्यास करेगा। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और एंटी सबमरीन वॉरफेयर जहाज शामिल होते हैं, जो मिलकर एक सुरक्षा घेरा बनाते हैं।

इसमें सबसे अहम भूमिका डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स निभाते हैं। डेस्ट्रॉयर्स के तौर पर कोलकाता क्लास या विशाखापत्तनम क्लास जैसे गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के लिए आईएनएस कोलकाता (D63), आईएनएस मोरमुगाओ (D67) और आईएनएस सूरत (D69) जैसे बड़े युद्धपोत शामिल होते हैं। ये जहाज लंबी दूरी की एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और एंटी-शिप मिसाइल क्षमता के लिए जाने जाते हैं और कैरियर को हवाई तथा समुद्री खतरों से बचाते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देते हैं फ्रिगेट्स

डेस्ट्रॉयर्स के बाद फ्रिगेट्स भी इस ग्रुप का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। तलवार क्लास के तहत आईएनएस ताबर, (F44) और आईएनएस तेग (F45) जैसे जहाज शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा नीलगिरी क्लास (प्रोजेक्ट 17ए, शिवालिक क्लास (प्रोजेक्ट 17) और ब्रह्मपुत्र क्लास (प्रोजेक्ट 16ए) के 2 से 3 फ्रिगेट भी तैनात किए जाते हैं।

इमें शिवालिक क्लास स्टेल्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट्स हैं, जो एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर और लैंड अटैक में अहम भूमिका निभाते हैं। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो नीलगिरी या शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। इनमें से आईएनएस शिवालिक (F47), आईएनएस सतपुड़ा (F48) और आईएनएस सहयाद्री (F49) प्रमुख हैं। वहीं, नीलगिरी क्लास में इन तीनों में से किसी भी दो जहाजों को अक्सर आईएनएस विक्रांत के साथ तैनात देखा जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

शिवालिक क्लास को भारतीय नौसेना की पहली स्टेल्थ फ्रिगेट श्रेणी माना जाता है। इन जहाजों का मुख्य काम एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देना और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रदान करना होता है। इनमें श्टिल-1 और बराक-1 जैसी एयर डिफेंस मिसाइल प्रणालियां लगी होती हैं, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देती हैं।

शिवालिक क्लास के अलावा विक्रांत के साथ ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स भी देखे जाते हैं। ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स सीबीजी की उस सुरक्षा परत का हिस्सा होते हैं, जो समुद्र के नीचे से आने वाले खतरों पर लगातार नजर रखती है और पूरे समूह को सुरक्षित बनाए रखने में अहम योगदान देती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स की बात करें, तो ये भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल युद्धपोत हैं। जो शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स का अपग्रेडेड वर्जन हैं। इनमें बेहतर स्टेल्थ फीचर्स, कम रडार क्रॉस सेक्शन, आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली लगाई गई है। इसका मतलब है कि ये दुश्मन के रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आते और लंबी दूरी से सटीक वार करने में सक्षम हैं।

इस क्लास में कुल सात फ्रिगेट्स शामिल हैं। इनमें से तीन आईएनएस नीलगिरी (एफ33), आईएनएस हिमगिरी (एफ34) और आईएनएस उदयगिरी (एफ35) नेवी में कमीशन हो चुकी हैं। बाकी जल्द ही सेवा में शामिल हो जाएंगी। ये फ्रिगेट्स मल्टी रोल क्षमता वाली हैं। यानी ये हवा से आने वाले खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाज और पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों – तीनों से मुकाबला कर सकती हैं। इनमें ब्रह्मोस एंटी शिप मिसाइल, बराक-8 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, 76 मिमी मुख्य तोप, टॉरपीडो और एंटी सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ब्रह्मपुत्र क्लास भारतीय नौसेना के ऐसे युद्धपोत हैं, जिनका मुख्य फोकस एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान पर होता है। करीब 3,850 टन वजनी ये फ्रिगेट पुराने गोदावरी क्लास के अपग्रेडेड संस्करण माने जाते हैं और समुद्र के नीचे छिपे खतरों से निपटने में खास भूमिका निभाते हैं।

कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस ब्रह्मपुत्र (F31), आईएनएस बेतवा (F39) और आईएनएस ब्यास (F37) जैसे जहाज इस श्रेणी में आते हैं। इन तीनों में से किसी भी दो को अक्सर आईएनएस विक्रांत के नेतृत्व वाले सीबीजी के साथ तैनात किया जाता है। इनमें टॉरपीडो और आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां लगी होती हैं, जो अंडरवाटर टारगेट्स के खिलाफ प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

इसके अलावा तलवार क्लास फ्रिगेट्स भी आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप का अहम हिस्सा मानी जाती हैं। प्रोजेक्ट 11356 के तहत बनी ये रूसी डिजाइन वाली स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स हैं, जिन्हें मल्टी-रोल भूमिका के लिए तैयार किया गया है। इनमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, श्टिल-1 एयर डिफेंस सिस्टम और एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता मौजूद है।

2025-2026 की हाल की फॉर्मेशन और एक्सरसाइज की तस्वीरों तथा वीडियो विश्लेषण में अक्सर दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स को विक्रांत के साथ देखा गया है। एक सामान्य फॉर्मेशन में केंद्र में आईएनएस विक्रांत होता है, दोनों ओर कोलकाता क्लास के डेस्ट्रॉयर तैनात रहते हैं, और तिरछी दिशा में शिवालिक क्लास, ब्रह्मपुत्र क्लास के साथ दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स दिखाई देती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी तलवार क्लास के जहाज, जैसे आईएनएस तबार, आईएनएस तेग और आईएनएस त्रिखंड, विक्रांत सीबीजी के साथ तैनात रहे। एक्सरसाइज कोंकण 2025 में भी आईएनएस तेग ने विक्रांत के साथ जॉइंट ऑपरेशन में हिस्सा लिया था।

तलवार क्लास के अन्य जहाजों में आईएनएस तलवार, आईएएस तरकश और हाल में शामिल आईएनएस तुशील भी आते हैं। हालांकि सीबीजी की संरचना हर मिशन के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन ब्रह्मोस से लैस होने के कारण तलवार और नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स ज्यादा खतरे वाले ऑपरेशनों में मजबूत एंटी-शिप क्षमता देते हैं और विक्रांत के सुरक्षा घेरे को और मजबूत बनाते हैं।

इसके अलावा इन फ्रिगेट्स की डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है। यही कारण है कि कैरियर बैटल ग्रुप में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि ये न सिर्फ पनडुब्बियों और दुश्मन जहाजों पर नजर रखते हैं, बल्कि हवा से आने वाले हमलों से भी कैरियर की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

वहीं डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट की बात करें, तो डेस्ट्रॉयर बड़े होते हैं और ज्यादा ताकतवर होते हैं। इनकी एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता छोटे फ्रिगेट्स के मुकाबले ज्यादा होती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कॉर्वेट्स भी होते हैं कैरियर बैटल ग्रुप में

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में अक्सर कॉर्वेट्स को भी शामिल किए जाते हैं। कॉर्वेट्स नौसेना में मध्यम आकार के युद्धपोत होते हैं, जो फ्रिगेट्स से छोटे लेकिन पेट्रोल क्राफ्ट या मिसाइल बोट्स से बड़े होते हैं। ये आमतौर पर 500 से 3,000 टन तक के डिस्प्लेसमेंट वाले होते हैं और मुख्य रूप से (तटीय और उथले समुद्र) में काम करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

इनका मुख्य काम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से होता है, इसलिए सीबीजी में एक मजबूत एंटी-सबमरीन लेयर बनाना जरूरी माना जाता है। कॉर्वेट्स एस्कॉर्ट ड्यूटी भी निभाते हैं। जब जहाजों का समूह एक साथ यात्रा करता है, तो कॉर्वेट्स उन्हें पनडुब्बी या दुश्मन जहाजों से बचाने में मदद करते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कई कॉर्वेट्स ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों से लैस होते हैं। इसके अलावा ये सीमित एंटी-एयर वारफेयर क्षमता भी रखते हैं, यानी कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान, हेलिकॉप्टर या ड्रोन से सुरक्षा कर सकते हैं। इसके लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जैसे बराक सीरीज, लगाई जाती हैं। फ्रिगेट्स की तुलना में कॉर्वेट्स सस्ते, तेज और उथले पानी में ज्यादा प्रभावी होते हैं। हालांकि इनकी मारक क्षमता और लंबी दूरी तक संचालन की क्षमता कुछ कम होती है। इसी कारण इन्हें कम स्तर के बहु-भूमिका युद्धपोत कहा जाता है, लेकिन आधुनिक समुद्री सुरक्षा में इनकी अहमियत बहुत ज्यादा है।

कामोर्टा क्लास को प्रोजेक्ट 28 के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय नौसेना की विशेष स्टेल्थ कॉर्वेट कैटेगरी है। इस क्लास के चारों जहाज आईएनएस कामोर्ता, आईएनएस कदमत्त, आईएनएस किल्टन और आईएनएस कवरत्ती सक्रिय सेवा में हैं। करीब 3,500 टन वजनी और 109 मीटर लंबे ये जहाज 25 नॉट्स से अधिक की रफ्तार पकड़ सकते हैं। इनमें आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर, वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस्ड सोनार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की क्षमता होती है। इनकी डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है और शोर स्तर भी कम रहता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत मुख्य रूप से वेस्टर्न कमांड से ऑपरेट होता है, जहां सबमरीन गतिविधियों की संभावना को ध्यान में रखते हुए एंटी-सबमरीन सुरक्षा बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में कामोर्टा क्लास कॉर्वेट्स सीबीजी के उस सुरक्षा घेरे का हिस्सा बनती हैं, जो समुद्र की सतह के नीचे से आने वाले खतरों पर नजर रखता है। हालांकि हर मिशन में इनकी संख्या तय नहीं होती, लेकिन खतरे के स्तर के अनुसार एक या दो कामोर्टा क्लास जहाज विक्रांत के साथ तैनात किए जा सकते हैं।

वहीं आईएनएस विक्रमादित्य के सीबीजी में आमतौर पर कोलकाता श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, तलवार श्रेणी के फ्रिगेट और दीपक श्रेणी के टैंकर शामिल होते हैं। इस ग्रुप में कॉर्वेट्स हमेशा मुख्य हिस्सा नहीं होते, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़ा जा सकता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

रिप्लेनिशमेंट शिप्स होते हैं सीबीजी की लॉजिस्टिक्स रीढ़

फ्लीट सपोर्ट या रिप्लेनिशमेंट शिप्स किसी भी कैरियर बैटल ग्रुप की असली लॉजिस्टिक्स रीढ़ मानी जाती हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हों, अगर उन्हें समय-समय पर ईंधन, गोला-बारूद और जरूरी सामान न मिले, तो वे लंबे समय तक समुद्र में नहीं टिक सकते। यही काम ये सपोर्ट शिप्स करती हैं।

इनका सबसे अहम काम अंडरवे रिप्लेनिशमेंट यानी यूएनआरईपी होता है। इसका मतलब समुद्र में चलते हुए जहाजों को ही डीजल, एविएशन फ्यूल, गोला-बारूद, भोजन, पानी और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना है। यह ट्रांसफर जहाज के बराबर चलकर या पीछे से किया जाता है। कई सपोर्ट शिप्स पर हेलिपैड और हैंगर भी होते हैं, जिससे हेलीकॉप्टर ऑपरेशन और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे काम भी किए जा सकते हैं। आपदा या मानवीय सहायता के समय ये जहाज एचएडीआर ऑपरेशन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। आम तौर पर कैरियर बैटल ग्रुप में एक या दो ऐसी शिप्स शामिल होती हैं और वे फॉर्मेशन के पीछे सुरक्षित दूरी पर रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत के साथ अक्सर दीपक क्लास फ्लीट टैंकर तैनात की जाती है। इस क्लास की प्रमुख शिप है आईएनएस दीपक (A50) है। लगभग 27,500 टन वजनी यह जहाज बड़े पैमाने पर ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर करने में सक्षम है और एक साथ कई जहाजों को यूएनआरईपी दे सकता है। इसके अलावा आईएनएस शक्ति (A57) भी जरूरत पड़ने पर विक्रांत सीबीजी का हिस्सा बनती है।

साथ ही, आईएनएस आदित्य (A59) और आईएनएस ज्योति (A58) जैसे टैंकर भी लंबे डिप्लॉयमेंट में सपोर्ट देते हैं। भविष्य में बड़े एचएसएल क्लास सपोर्ट जहाज भी शामिल होने वाले हैं, जिससे समुद्र में भारत की ब्लू-वाटर क्षमता और मजबूत होगी। कुल मिलाकर, ये फ्लीट सपोर्ट शिप्स ही वह ताकत हैं जो विक्रांत और उसके कैरियर बैटल ग्रुप को हफ्तों और महीनों तक समुद्र में सक्रिय बनाए रखती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

गुपचुप विक्रांत को सुरक्षा देती हैं सबमरींस

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में सबमरीन्स भी शामिल होती हैं, लेकिन ये सरफस पर दिखाई नहीं देतीं। ये पानी के भीतर तैनात रहकर पूरे ग्रुप को अंडरवाटर सुरक्षा देती हैं। इनका मुख्य काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से माना जाता है, इसलिए सीबीजी में अंडरवाटर सुरक्षा बेहद अहम होती है।

ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण भारतीय नौसेना हर मिशन में शामिल सबमरीन्स के नाम सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन हाल की एक्सरसाइज और रिपोर्ट्स में देखा गया है कि आम तौर पर एक से तीन सबमरींस सीबीजी के साथ तैनात रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

विक्रांत के साथ सीबीजी में आदर्श तौर पर न्यूक्लियर पावर वाली अटैक सबमरीन, यानी एसएसएन, शामिल होनी चाहिए। चूंकि भारतीय नौसेना के पास कोई स्वदेशी ऑपरेशनल एसएसएन मौजूद नहीं है। इसी वजह से अभी सीबीजी की सुरक्षा के लिए कलवरी क्लास की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन, जिन्हें एसएसके भी कहा जाता है, तैनात की जाती हैं। खासकर आईएनएस विक्रांत के साथ इन्हीं पनडुब्बियों को लगाया जाता है।

दुनिया की बड़ी नौसेनाएं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस, अपने कैरियर ग्रुप के साथ एसएसएन तैनात करती हैं। इसका कारण साफ है। न्यूक्लियर प्रोपल्शन की वजह से ऐसी पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी रफ्तार भी ज्यादा होती है और वे कैरियर के साथ तेज रफ्तार में चल सकती हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में एसएसएन बहुत प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

भारत में स्वदेशी एसएसएन परियोजना अभी डिजाइन और विकास के चरण में है। माना जा रहा है कि 2030 के दशक में पहली स्वदेशी एसएसएन नौसेना में शामिल हो सकती है। रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्रा अब सेवा में नहीं है और अगली लीज भी अभी समय ले रही है। इसलिए फिलहाल भारतीय नौसेना के पास सीबीजी के साथ स्थायी रूप से तैनात करने के लिए कोई एसएसएन उपलब्ध नहीं है।

ऐसी स्थिति में कलवरी क्लास की यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित ये पनडुब्बियां काफी शांत यानी लो एकॉस्टिक सिग्नेचर वाली हैं। पानी के अंदर इनका पता लगाना आसान नहीं होता। इनके पास एंटी-शिप मिसाइल और भारी टॉरपीडो जैसे हथियार हैं। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में माइंस भी बिछा सकती हैं। इनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और निगरानी कर सकती हैं, जिससे कैरियर की सुरक्षा मजबूत होती है।

कलवरी क्लास, यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस में आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज, आईएनएस वेला और आईएनएस वाग्शीर जैसी सबमरींस शामिल हैं। लगभग 1,800 टन वजनी ये सबमरीन्स स्टेल्थ क्षमता से लैस हैं और एक्सोसेट मिसाइल तथा हेवीवेट टॉरपीडो दागने में सक्षम हैं। पूर्वी नौसैनिक बेड़े के साथ विक्रांत के संचालन के दौरान इन्हें प्राथमिक अंडरवाटर एस्कॉर्ट माना जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

जब आईएनएस विक्रांत समुद्र में ऑपरेशन पर निकलता है, तो उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, फ्लीट टैंकर और एयर विंग के अलावा पनडुब्बियां भी तैनात रहती हैं। यही पनडुब्बियां समुद्र के नीचे एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं। वे आसपास के क्षेत्र को साफ यानी सैनेटाइज करती हैं, ताकि कोई दुश्मन पनडुब्बी या जहाज पास न आ सके। हिंद महासागर के उथले और तटीय इलाकों में डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां काफी कारगर मानी जाती हैं। इसलिए मौजूदा हालात में विक्रांत के मुकाबले स्पीड कम होने के बाद भी कलवरी क्लास भारतीय सीबीजी के लिए एक प्रभावी समाधान साबित हो रही हैं।

अक्टूबर 2025 में हुई एक्सरसाइज कोंकण के दौरान एक कलवरी क्लास सबमरीन ने ब्रिटेन की नौसेना के साथ संयुक्त पनडुब्बी खोज अभ्यास में हिस्सा लिया था। इसी तरह ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी विक्रांत सीबीजी के साथ कवलरी क्लास सबमरीन्स की तैनाती देखी गई थी।

इसके अलावा शिशुमार क्लास और सिंधुघोष क्लास की कुछ पुरानी लेकिन सक्रिय सबमरींस भी जरूरत के अनुसार शामिल की जा सकती हैं। शिशुमार क्लास को टाइप 209/1500 के नाम से जाना जाता है। ये पुरानी जरूर हैं, लेकिन अब भी सक्रिय सेवा में है। इस श्रेणी में आईएनएस शाल्कि और आईएनएस शंकुश जैसी पनडुब्बियां शामिल हैं। अपनी विश्वसनीयता और ऑपरेशनल अनुभव के कारण ये अब भी नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनी हुई हैं।

वहीं सिंधुघोष क्लास, जिसे किलो क्लास भी कहा जाता है, रूसी मूल की पनडुब्बियां हैं। इस श्रेणी में आीएनएस सिधुंरक्षक शामिल रही हैं। ये लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम हैं और कई वर्षों तक भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक क्षमता का आधार रही हैं। हालांकि समय के साथ इनकी जगह धीरे-धीरे आधुनिक कलवरी क्लास पनडुब्बियां ले रही हैं, जो ज्यादा स्टेल्थ और एडवांस तकनीक से लैस हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

अब दुश्मन के ड्रोनों को ‘बंदी’ बनाएगी भारतीय सेना! खरीदेगी ये खास ‘जाल’

Indian Army Drone Catcher System
AI Image

Indian Army Drone Catcher System: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से पाकिस्तान ने खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए सस्ते और छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए थे, उसे देखते हुए भारतीय सेना भी कमर कस रही है। अब छोटे और कम दिखाई देने वाले दुश्मन ड्रोनों से निपटने के लिए सेना नई तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए “ड्रोन कैचर सिस्टम” यानी डीसीएस खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए सेना की तरफ से रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। (Indian Army Drone Catcher System)

पिछले कुछ समय से कम रडार सिग्नेचर यानी लो-आरसीएस वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे आकार और कम रडार पहचान के कारण इन्हें पकड़ना और गिराना पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बनता जा रहा है। (Indian Army Drone Catcher System)

Indian Army Drone Catcher System: क्यों जरूरी हुआ ड्रोन कैचर सिस्टम?

आरएफआई के शुरुआत में साफ कहा गया है कि लो-आरसीएस ड्रोन, चाहे अकेले आएं या झुंड यानी स्वॉर्म में, अब एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। हाल के ऑपरेशनों में भी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल देखा गया, जिसने सेना को अलग से “ड्रोन पकड़ने” वाली क्षमता डेवलप करने की जरूरत का अहसास कराया।

अब तक ज्यादातर सिस्टम ड्रोन को जाम करने या मार गिराने में एक्सपर्ट थे, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जिनमें ड्रोन को सही सलामत पकड़ना ज्यादा उपयोगी होता है। इससे उसकी तकनीक, कैमरा, डेटा और सोर्स के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। यही काम यह नया ड्रोन कैचर सिस्टम करेगा। (Indian Army Drone Catcher System)

ड्रोन कैचर सिस्टम में क्या-क्या होगा?

आरएफआई के मुताबिक यह सिस्टम तीन मुख्य हिस्सों से मिलकर बनेगा– ड्रोन सेंसर, ड्रोन कैचर और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस)। ड्रोन सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (ईएसए) टेक्नोलॉजी या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होगा। इसे 360 डिग्री कवरेज देना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को डिटेक्ट और ट्रैक करने की क्षमता रखनी होगी। यह भी शर्त रखी गई है कि ये सेंसर 0.01 वर्ग मीटर के छोटे आरसीएस वाले टारगेट्स को भी कम से कम 4 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकें।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन इस पूरे सिस्टम का दिमाग होगा। सेंसर से मिली जानकारी यहीं आएगी, जहां माइक्रोप्रोसेसर के जरिए टारगेट की गणना की जाएगी और ड्रोन कैचर को निर्देश भेजे जाएंगे। जीसीएस में लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस होगा, जिसमें दुश्मन ड्रोन की दिशा, दूरी और ऊंचाई जैसी जानकारी दिखेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

तीसरा और सबसे अहम हिस्सा है ड्रोन कैचर। यह खुद एक ड्रोन होगा, जो दुश्मन ड्रोन के पास जाकर उस पर जाल फेंकेगा और उसे निष्क्रिय करेगा। इसे पूरी तरह ऑटोनॉमस यानी स्वायत्त रूप से काम करने में सक्षम होना होगा।

सिर्फ जाल ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक हमला भी

इस सिस्टम में केवल जाल फेंककर ड्रोन पकड़ने की सुविधा ही नहीं होगी, बल्कि एक जैमर सबसिस्टम भी होगा । यह रेडियो फ्रीक्वेंसी डिनायल, सिलेक्टिव जीएनएसएस डिनायल और जीएनएसएस डीसैप्शन जैसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेगा।

अगर दुश्मन ड्रोन सैटेलाइट नेविगेशन या रेडियो सिग्नल के जरिए कंट्रोल हो रहा है, तो यह सिस्टम उसके सिग्नल को काट या भ्रमित कर सकता है। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकता है या जमीन पर गिर सकता है। (Indian Army Drone Catcher System)

हर इलाके में करे काम

सेना ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम भारत के हर तरह के इलाके में काम करने योग्य होना चाहिए। इसमें मैदान, रेगिस्तान, तटीय इलाके और 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं।

साथ ही, ये सिस्टम ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस के अलावा 95 प्रतिशत तक नमी में काम करना चाहिए। (Indian Army Drone Catcher System)

मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि ड्रोन सेंसर को “आकाशतीर” कमांड एंड रिपोर्टिंग मॉड्यूल के साथ इंटीग्रेट करने की क्षमता होनी चाहिए। इसका मतलब है कि यह सिस्टम अलग-थलग नहीं रहेगा, बल्कि सेना के मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बन सकेगा।

इस तरह दुश्मन ड्रोन की जानकारी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम तक भी पहुंचाई जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर मिसाइल या अन्य हथियारों से भी कार्रवाई हो सकेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

इंडिजिनियस कंटेंट पर जोर

आरएफआई में साफ कहा गया है कि कुल इंडिजिनियस कंटेंट यानी स्वदेशी सामग्री कम से कम 50 फीसदी होनी चाहिए, जो डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर 2020 के नियमों के मुताबिक है।

इसका मतलब है कि कंपनियों को भारत में ही ज्यादा से ज्यादा निर्माण और तकनीक विकसित करनी होगी। इससे देश की रक्षा इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

यह अभी शुरुआती चरण है। कंपनियों को 17 मार्च तक जानकारी और प्रपोजल जमा करने होंगे। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, ट्रायल और फिर कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन की प्रक्रिया चलेगी। अगर सब कुछ तय समय पर आगे बढ़ा, तो आने वाले कुछ सालों में सेना के पास एक डेडिकेटेड ड्रोन कैचर क्षमता होगी। (Indian Army Drone Catcher System)

DAC अप्रूवल के बाद भी करना होगा लंबा इंतजार! 2027 तक क्यों खिंच सकती है 114 राफेल डील की बात?

114 Rafale deal

114 Rafale deal: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अगले हफ्ते होने वाली भारत यात्रा से पहले भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की बहुप्रतीक्षित डील को गुरुवार को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी एओएन दे दी है। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसे भारत की अब तक की सबसे बड़ी फाइटर जेट खरीद माना जा रहा है।

लेकिन एओएन मिलने के बावजूद कॉन्ट्रैक्ट साइन होने में एक साल या उससे ज्यादा समय लग सकता है। आम लोगों के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जब मंजूरी मिल गई, तो फिर देरी क्यों? इसका जवाब समझने के लिए पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझना जरूरी है। (114 Rafale deal)

114 Rafale deal: एओएन का मतलब क्या है?

एओएन का मतलब है कि सरकार ने सैद्धांतिक रूप में मान लिया है कि यह खरीद जरूरी है। यानी वायुसेना को 114 मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट चाहिए और इस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। लेकिन एओएन मिलना अंतिम मंजूरी नहीं होती। इसके बाद कई और चरण पूरे करने होते हैं। (114 Rafale deal)

कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की अंतिम मंजूरी

एओएन के बाद अंतिम मंजूरी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से मिलती है। यह समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बैठती है। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में सीसीएस की बैठक शुक्रवार को बुलाई जा सकती है, जहां इसे अंतिम मंजूरी दी जा सकती है। बड़े रक्षा सौदों पर यह समिति अंतिम फैसला लेती है।

सूत्रों का कहना है कि फ्रांस के राष्ट्रपति की यात्रा से पहले सरकार इसके सभी प्रोसिजर पूरे लेना चाहती है, ताकि बाद में डील में कोई रुकावट न आने पाए। हालांकि सूत्रों का कहना है कि सीसीएस की बैठक के बावजूद सरकारी स्तर पर पूरी फाइल प्रक्रिया, वित्तीय जांच और शर्तों की समीक्षा में समय लगना सामान्य बात है। इसलिए डील पर आखिरी महर लगने में एक साल तक का वक्त लग सकता है। (114 Rafale deal)

कीमत तय करना सबसे बड़ी चुनौती

114 राफेल की डील बहुत बड़ी है। इसमें केवल विमान ही नहीं, बल्कि हथियार पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में मैन्युफैक्चरिंग सुविधा भी शामिल है।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन से कीमत तय करने में लंबी बातचीत होगी। 2016 में जब 36 राफेल विमानों की डील हुई थी, तब भी कीमत और हथियार पैकेज को लेकर लंबी बातचीत चली थी। इस बार सौदा बहुत बड़ा है। इसमें सिर्फ विमान ही नहीं, बल्कि मीटियोर बीवीआर मिसाइल, स्कैल्प क्रूज मिसाइल, मेंटेनेंस पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट भी शामिल होंगे। हर चीज की अलग-अलग कीमत तय होती है। इसके अलावा रुपये और यूरो के बीच विनिमय दर में उतार-चढ़ाव भी अंतिम लागत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन कमेटी को हर बिंदु पर विस्तार से चर्चा करनी होगी। (114 Rafale deal)

सूत्रों के मुताबिक यह सौदा सरकार-से-सरकार यानी गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट मॉडल पर होगा। प्रस्ताव के मुताबिक 114 में से लगभग 18 विमान सीधे फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे, जबकि बाकी 96 विमान भारत में बनाए या असेंबल किए जाएंगे। यही “मेक इन इंडिया” वाला हिस्सा है, जो इस डील को और जटिल बनाता है। भारत में निर्माण के दौरान कम से कम 50 से 60 फीसदी स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। यही हिस्सा बातचीत को लंबा कर सकता है। (114 Rafale deal)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और ‘मेक इन इंडिया’ की शर्तें

इस डील का बड़ा हिस्सा ‘मेक इन इंडिया’ से जुड़ा है। भारत चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा काम देश में हो। इसके लिए प्रोडक्शन लाइन लगानी होगी, इंजन और एवियोनिक्स सिस्टम के कुछ हिस्सों का स्थानीय निर्माण तय करना होगा, और भारतीय कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

दसॉ एविएशन टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ साझेदारी कर रही है। लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने से पहले फैक्ट्री, उपकरण, गुणवत्ता जांच और ट्रेनिंग जैसी कई तैयारियां करनी होंगी। इन सब पर लंब समझौता करना पड़ता है, जिसमें समय लगता है। (114 Rafale deal)

बजट और वैश्विक हालात का असर

इतने बड़े सौदे के लिए बजट का प्रबंधन भी अहम है। डिफेंस कैपिटल बजेट सीमित होता है और कई बड़े प्रोजेक्ट एक साथ चल रहे हैं। इसके अलावा डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव भी कुल लागत को प्रभावित करता है।

ग्लोबल सप्लाई चेन की स्थिति, यूरोप में उत्पादन क्षमता और अन्य अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर भी डिलीवरी शेड्यूल को प्रभावित कर सकते हैं। (114 Rafale deal)

वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है यह डील?

एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारतीय वायुसेना की मौजूदा स्थिति। स्वीकृत 42.5 स्क्वाड्रन की तुलना में अभी वायुसेना के पास लगभग 30 स्क्वाड्रन ही हैं। पुराने मिग-21 और अन्य विमान चरणबद्ध तरीके से बाहर हो रहे हैं। ऐसे में नए लड़ाकू विमानों की जरूरत तुरंत है। फिर भी प्रक्रिया को छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इतना बड़ा सौदा पारदर्शिता और नियमों के तहत ही आगे बढ़ता है। भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया “डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर” यानी डीएपी के तहत चलती है, जिसमें हर फेज का स्पष्ट स्ट्रक्चर होता है। (114 Rafale deal)

राफेल एक 4.5 पीढ़ी का ओम्नी रोल फाइटर है। यह हवा से हवा, हवा से जमीन, लंबी दूरी की स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे कई मिशन कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसकी भूमिका को लेकर वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सकारात्मक टिप्पणी की थी। (114 Rafale deal)

डिलीवरी कब शुरू हो सकती है?

सूत्रों का मानना है कि अगर बातचीत तेजी से चली तो 2026 के अंत तक बिजनेस निगोशिएशन्स पूरी हो सकती है और 2027 की शुरुआत में समझौते पर हस्ताक्षर संभव हैं। वहीं, आमतौर पर ऐसे सौदों में कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 3 से 4 साल बाद पहली डिलीवरी शुरू होती है। अगर 2027 में समझौता साइन होता है तो शुरुआती विमान 2030 के आसपास मिल सकते हैं। भारत में बनने वाले विमानों की पूरी डिलीवरी में 8 से 10 साल भी लग सकते हैं। (114 Rafale deal)

क्या देरी असामान्य है?

बड़े रक्षा सौदों में लंबी प्रक्रिया सामान्य बात है। पहले एमएमआरसीए टेंडर (2007) से लेकर 36 राफेल डील (2016) तक की कहानी भी लंबी रही थी। इस बार सरकार सरकार के बीच समझौता होने की संभावना है, जिससे प्रक्रिया कुछ तेज हो सकती है, लेकिन फिर भी एक साल का समय लगना असामान्य नहीं है। (114 Rafale deal)

समुद्र के भीतर से दुश्मन पर वार! पनडुब्बियों के लिए 500 किमी रेंज वाली क्रूज मिसाइल खरीदेगी भारतीय नौसेना

Indian Navy Submarine LACM

Indian Navy Submarine LACM: भारतीय नौसेना अपनी पारंपरिक पनडुब्बियों को और अधिक घातक बनाने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। आरएफआई में नौसेना ने कंपनियों से जानकारी मांगी है जो ऐसी लैंड अटैक क्रूज मिसाइल उपलब्ध करा सकें, जिन्हें पनडुब्बियों से दागी जा सकें और जो जमीन पर दूर बैठे दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों को सटीकता के साथ निशाना बना सकें।

इन मिसाइलों का मकसद समुद्र के भीतर से दुश्मन के जमीन पर मौजूद ठिकानों पर सटीक हमला करना है। इससे नौसेना की लंबी दूरी से वार करने की क्षमता और मजबूत होगी। ऐसी मिसाइलें दुश्मन के एयरबेस, सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटर या अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकती हैं। (Indian Navy Submarine LACM)

Indian Navy Submarine LACM: क्यों बढ़ाई जा रही है यह क्षमता

आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं या समुद्र की सतह तक सीमित नहीं है। मॉडर्न मिलिटरी स्ट्रेटेजी में पनडुब्बियों को “साइलेंट स्ट्राइक प्लेटफॉर्म” माना जाता है। यानी वे समुद्र के भीतर छिपकर दुश्मन के तटीय शहरों, एयरबेस, सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशनों और कमांड सेंटर पर हमला कर सकती हैं।

यदि किसी पनडुब्बी के पास 500 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल हो, तो वह दुश्मन के ठिकानों तक अंदर तक मार तक सकती है। इससे स्ट्रेटेजिक बैलेंस बदल सकता है। यही वजह है कि नौसेना ऐसी मिसाइल चाहती है जो लंबी दूरी, उच्च सटीकता और विश्वसनीयता के साथ काम कर सके। (Indian Navy Submarine LACM)

मिसाइल का वजन 1500 किग्रा से कम

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उन्हे जो मिसाइल चाहिए उसकी अधिकतम मारक दूरी 500 किलोमीटर से अधिक होनी चाहिए, जबकि न्यूनतम दूरी 50 किलोमीटर से कम हो। इसका मतलब है कि मिसाइल छोटी दूरी के लक्ष्यों के साथ-साथ बहुत दूर स्थित ठिकानों में इस्तेमाल की जा सके।

मिसाइल का कुल वजन 1500 किलोग्राम से कम होना चाहिए, जिसमें उसका कैप्सूल भी शामिल होगा। मिसाइल को 533 मिलीमीटर व्यास वाले पनडुब्बी के वेपन ट्यूब से लॉन्च किया जा सके। इसकी लंबाई 6.4 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह शर्त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय नौसेना की पारंपरिक पनडुब्बियां इसी मानक के टॉरपीडो ट्यूब से लैस हैं। (Indian Navy Submarine LACM)

पनडुब्बी से कैसे दागी जाएगी मिसाइल?

यह मिसाइल न्यूमेटिक रैम इजेक्शन सिस्टम से लॉन्च की जाएगी। इसका मतलब है कि पहले मिसाइल को प्रेशराइज्ड हवा की मदद से ट्यूब से बाहर निकाला जाएगा, फिर पानी की सतह पर पहुंचते ही उसका इंजन एक्टिव होगा।

यह मिसाइल पेरिस्कोप गहराई से लॉन्च की जा सकेगी। यानी पनडुब्बी जब समुद्र में लगभग 15 मीटर से लेकर 100 मीटर की गहराई पर होगी, तब भी इसे दागा जा सकेगा। सामान्य ऑपरेशन के दौरान पनडुब्बी की स्पीड 6 नॉट्स तक और आपात स्थिति में 8 नॉट्स तक हो सकती है। यह भी शर्त रखी गई है कि दो मिसाइलों को एक साथ सैल्वो फायरिंग मोड में दागा जा सके, और उनके होमिंग सिस्टम में आपसी हस्तक्षेप न हो। (Indian Navy Submarine LACM)

नेविगेशन के लिए आईएनएस सिस्टम

मिसाइल की उड़ान चार फेज में होगी। पहले बूस्ट फेज में शुरुआती गति प्राप्त की जाएगी। उसके बाद क्रूज फेज में मिसाइल लंबी दूरी तक स्थिर रूप से उड़ान भरेगी। तीसरे चरण में टर्मिनल गाइडेंस होगा, जिसमें टारगेट के पास पहुंचकर अंतिम फाइनल डायरेक्शन करेक्शन किया जाएगा। अंत में पॉप-अप मैन्यूवर जैसे विकल्प भी हो सकते हैं, जिससे आखिरी समय में भी ऊंचाई बदलकर हमला किया जा सके।

नेविगेशन के लिए आईएनएस (इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम), सैटेलाइट नेविगेशन और एंटी-जैम तकनीक अनिवार्य रखी गई है। यानी यदि दुश्मन जीपीएस सिग्नल को बाधित करने की कोशिश करे, तब भी मिसाइल अपने मार्ग से भटके नहीं। (Indian Navy Submarine LACM)

कितनी मिसाइलें खरीदी जाएंगी?

फिलहाल रक्षा मंत्रालय ने यह साफ नहीं किया है कि कितनी मिसाइलें खरीदी जाएंगी। लेकिन कंपनियों से यह जरूर पूछा गया है कि क्या वे ऐसी ही या मिलती-जुलती मिसाइलें पहले किसी अन्य देश को दे चुकी हैं या नहीं।

साथ ही, ऑफसेट नियम के तहत यह शर्त रखी गई है कि जिस कंपनी को ठेका मिलेगा, उसे कुल अनुबंध राशि का 30 फीसदी भारत में निवेश या उत्पादन के रूप में पूरा करना होगा। इससे देश में रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। (Indian Navy Submarine LACM)

मिसाइल में हाई एक्सप्लोसिव वारहेड 

मिसाइल में असंवेदनशील हाई एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया जाएगा। इसे इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि स्टोरेज या ट्रांसपोर्टेशन के दौरान अनजाने में सक्रिय न हो। वारहेड की विश्वसनीयता 0.99 यानी लगभग 99 प्रतिशत होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि लक्ष्य पर पहुंचने के बाद उसके फेल होने की संभावना बेहद कम हो।

सेफ्टी एंड आर्मिंग मैकेनिज्म यह सुनिश्चित करेगा कि वारहेड केवल लॉन्च के बाद सुरक्षित दूरी तय करने पर ही सक्रिय हो। यदि किसी कारण से मिसाइल लक्ष्य से भटक जाए या ऑपरेटर आदेश दे, तो उसमें सेल्फ-डिस्ट्रक्ट की क्षमता भी होनी चाहिए। (Indian Navy Submarine LACM)

कठिन हालात में भी काम करने की क्षमता

मिसाइल को ऐसे डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह पनडुब्बी के रोल और पिच यानी झुकाव को भी सहन कर सके। यदि पनडुब्बी 45 डिग्री तक झुक जाए या हिले, तब भी सिस्टम काम करता रहे।

टारगेट तय करने की प्रक्रिया भौगोलिक निर्देशांकों यानी अक्षांश और देशांतर के आधार पर होगी। मिसाइल को घने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर वातावरण में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यदि दुश्मन रेडियो सिग्नल या जीपीएस में बाधा डालने की कोशिश करे, तब भी मिसाइल अपना रास्ता न भूले। (Indian Navy Submarine LACM)

25 साल तक अपग्रेड की सुविधा

रक्षा मंत्रालय ने यह भी शर्त रखी है कि निर्माता कंपनी को कम से कम 25 साल तक अपग्रेड का रास्ता उपलब्ध कराना होगा। यानी भविष्य में तकनीक बदलने पर मिसाइल को आधुनिक बनाया जा सके। ऑनबोर्ड स्टोरेज कम से कम 24 महीने तक संभव होना चाहिए। यह -10 डिग्री से +70 डिग्री सेल्सियस तापमान और 95 प्रतिशत आर्द्रता तक सहन कर सके।

कंपनियों को 10 वर्षों तक स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने होंगे। इसके अलावा ट्रेनिंग मॉड्यूल, टेस्ट इक्विपमेंट और विस्तृत तकनीकी दस्तावेज भी देने होंगे। (Indian Navy Submarine LACM)

मारक क्षमता में बड़ा इजाफा

आज के समय में पनडुब्बी से जमीन पर लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता किसी भी नौसेना के लिए बहुत बड़ी ताकत मानी जाती है। इससे दुश्मन को बिना चेतावनी अंदर तक निशाना बनाया जा सकता है।

इस नई मिसाइल खरीद प्रक्रिया से भारतीय नौसेना की अंडरसी स्ट्राइक पावर यानी समुद्र के भीतर से हमला करने की ताकत काफी बढ़ जाएगी। हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते सुरक्षा परिदृश्य और पड़ोसी देशों की सैन्य गतिविधियों को देखते हुए यह कदम भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त साबित हो सकता है। (Indian Navy Submarine LACM)

भारतीय नेवल डिप्लोमेसी का कमाल, जब विशाखापत्तनम में एक साथ दिखेंगे 75 देश और उनके 90 से ज्यादा जंगी जहाज

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy

IFR Milan 2026: एक तरफ जहां पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका तनावपूर्ण संबंध बने हुए हैं, तो वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पूरी दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। लेकिन इसी दुनिया में, पश्चिमी एशिया से तकरीबन तीन हजार किलोमीटर दूर, हिंद महासागर के किनारे बसे भारत के विशाखापत्तनम में एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलने वाली है। यहां दुनिया के 75 देश एक साथ एक ही मंच पर दिखने वाले हैं। जहां दुनिया के कई धुरविरोधी देश कुछ दिन ही सही, लेकिन एक-दूसरे के ‘दोस्त’ बन कर रहेंगे। यह सब संभव हुआ है भारतीय नौसेना की डिप्लोमेसी के चलते।

फरवरी 2026 में आयोजित IFR और मिलन अभ्यास में इस साल में ऐसा पहली बार होगा, जब कई देश अपनी युद्धपोतों के साथ भारतीय नौसेना के बुलावे पर एक ही समुद्र में एक साथ अभ्यास करेंगे, एक-दूसरे को सलामी देंगे और साझा सुरक्षा पर बातचीत करेंगे। भारत ने इन इवेंट्स में उन देशों को आमंत्रित किया है, जो मुख्य रूप से इंडियन ओशन और इंडो-पैसिफिक में भारत के सहयोगी हैं। देखा जाए तो यह केवल एक मिलिट्री प्रोग्राम नहीं है, बल्कि भारत की मजबूत और संतुलित नेवल डिप्लोमेसी की सबसे बड़ी मिसाल है। (IFR Milan 2026)

हिंद महासागर से सटे विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी तक तीन बड़े मेगा इवेंट इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज मिलन 2026, और इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम (आईओएनएस) कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन हो रहा है। ये तीनों कार्यक्रम एक ही शहर, एक ही समय और एक ही उद्देश्य के साथ आयोजित हो रहे हैं। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026: विशाखापत्तनम से पूरी दुनिया के लिए संदेश

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम सिर्फ एक बंदरगाह शहर नहीं रहेगा। यह भारत की समुद्री कूटनीति की राजधानी बन जाएगा। यही वह शहर है, जहां भारतीय नौसेना का ईस्टर्न नेवल कमांड स्थित है और जहां से बंगाल की खाड़ी से लेकर पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जाती है।

15 फरवरी से 25 फरवरी तक चलने वाले इन कार्यक्रमों में दुनिया के दर्जनों देशों के युद्धपोत, हजारों नौसैनिक अधिकारी और सैकड़ों डिफेंस एक्सपर्ट्स एक साथ जुटेंगे। समुद्र में युद्धपोतों की कतारें होंगी, तो जमीन पर कूटनीतिक बैठकों और सेमिनारों का दौर चलेगा। (IFR Milan 2026)

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026: महासागरों के माध्यम से एकजुटता

इस बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की थीम है यूनाइटेड थ्रो ओशन्स यानी महासागरों के माध्यम से एकजुटता। यह किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। इसमें राष्ट्रपति या राष्ट्राध्यक्ष नौसेना के जहाजों का निरीक्षण करते हैं। लेकिन भारत के लिए यह सिर्फ ताकत दिखाने का मंच नहीं है, बल्कि भरोसा और पारदर्शिता दिखाने का जरिया भी है।

18 फरवरी को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बंगाल की खाड़ी में भारतीय और विदेशी युद्धपोतों का निरीक्षण करेंगी। इस दौरान उन्हें गन सैल्यूट दिया जाएगा। भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत इस इवेंट का मुख्य आकर्षण होगा। यह भारत की “बिल्डर्स नेवी” यानी खुद बनाने वाली नौसेना की पहचान है।

खास बात यह है कि इस मेगा इवेंट में हिस्सा लेने वाला कोई भी देश दुश्मन या दोस्त के तौर पर नहीं, बल्कि एक समुद्री साझेदार के तौर पर मौजूद रहेगा।

बता दें कि भारत अब तक दो बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की मेजबानी कर चुका है। पहला आयोजन साल 2001 में मुंबई में हुआ था। यह भारत के गणतंत्र की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था और देश का पहला आईएफआर था। इसमें 29 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था और कुल 97 जहाज इस आयोजन में शामिल हुए, जिनमें 20 देशों के जहाज थे और 24 विदेशी युद्धपोत भी शामिल थे। इसके अलावा 54 सैन्य विमान फ्लाईपास्ट में शामिल हुए थे। उस समय यह आयोजन भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का बड़ा प्रदर्शन माना गया था।

इसके बाद दूसरा और अब तक का सबसे बड़ा आयोजन साल 2016 में विशाखापत्तनम में हुआ। इसमें लगभग 52 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में करीब 95 से 100 जहाज शामिल हुए, जिनमें 24 विदेशी युद्धपोत और बाकी भारतीय नौसेना के जहाज थे। 50 से अधिक विदेशी नौसेनाओं के प्रतिनिधिमंडल भी इसमें पहुंचे थे। इसमें अमेरिका, रूस, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई बड़े देशों की नौसेनाएं शामिल हुई थीं। 2016 का आईएफआर अब तक का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है, जहां दुनिया भर से नौसेनाएं भारत के साथ समुद्री सहयोग के लिए एक मंच पर आई थीं। (IFR Milan 2026)

मिलन 2026 में दिखेगा भाईचारा, सहयोग और तालमेल 

अगर आईएफआर को नौसेना की परेड कहा जाए, तो मिलन अभ्यास उसकी असली परीक्षा है। इस बार मिलन एक्सरसाइज की थीम है भाईचारा, सहयोग, तालमेल। इस अभ्यास की शुरुआत 1995 में पोर्ट ब्लेयर से हुई थी, जब इसमें सिर्फ चार-पांच देश शामिल थे। आज यह दुनिया के सबसे बड़े मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज में से एक बन चुकी है। मिलन 2026 के लिए 135 से अधिक देशों को निमंत्रण भेजा गया है।

मिलन 2026 में 40 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। इस अभ्यास का मकसद सिर्फ वॉर एक्सरसाइज करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं आपदा, समुद्री खतरे और मानवीय संकट के समय एक साथ कैसे काम कर सकती हैं। यह अभ्यास दो चरणों सी फेज और हार्बर फेज में होगा। हार्बर फेज में सेमिनार, प्रोफेशनल बातचीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल होते हैं। जबकि सी फेज में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास जैसे- एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू, और ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे अभ्यास किए जाएंगे।

मिलन 2024 भी विशाखापत्तनम में आयोजित हुआ था। इसमें लगभग 40 से ज्यादा ने हिस्सा लिया था। करीब 15 से 20 देशों ने अपने युद्धपोत या विमान भेजे, जबकि बाकी देशों ने अपने प्रतिनिधि या नौसेना प्रमुख भेजे। इस एडिशन में 35 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां तथा 50 से अधिक विमान शामिल हुए थे।

वहीं मिलन 2022 में करीब 39 से 42 देशों ने भाग लिया था। 13 देशों ने अपने युद्धपोत भेजे थे और कुल 39 विदेशी डेलीगेशन शामिल हुए थे। यह कोविड महामारी के बाद पहला बड़ा आयोजन था।

जबकि मिलन 2018 में 17 देश शामिल हुए थे। मिलन 2014 में भी 17 देशों ने भाग लिया था और उस समय तक वह सबसे बड़ा एडिशन माना गया था। 2010 और 2012 के संस्करणों में भी करीब 16 विदेशी देश शामिल हुए थे। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy
IONS Conclave (File Photo)

आईओएनएस कॉनक्लेव में कई देशों के नेवी चीफ शामिल

विशाखापत्तनम में 20 फरवरी को 9वें इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम कॉनक्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन होगा। इसमें 42 देशों के नौसेना प्रमुख शामिल होने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक इस आयोजन में ईरानी नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल शाहराम ईरानी भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि ईरान पिछले आईओएनएस इवेंट्स में नियमित रूप से भाग लेता रहा है।

आईओएनएस के 25 मुख्य सदस्य देश हिंद महासागर क्षेत्र के तटीय देश हैं। इन्हें चार हिस्सों में बांटा गया है-दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया व ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र। इन सदस्य देशों में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका, सेशेल्स, ईरान, ओमान, सऊदी अरब, यूएई, केन्या, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फ़्रांस (रीयूनियन), मोजाम्बिक, तंजानिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर, कोमोरोस, जिबूती, मेडागास्कर और अन्य देश शामिल हैं। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा कुछ देश ऑब्जर्वर के रूप में जुड़े हैं, इनमें जर्मनी, इटली, यूके, जापान, रूस, स्पेन, नीदरलैंड और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। कुछ अन्य देशों को विशेष निमंत्रण दिया गया है। इनमें सदस्य और ऑब्जर्वर देशों में पाकिस्तान, चीन और तुर्किए भी शामिल हैं, लेकिन उन्हें इस मेगा इवेंट से बाहर रखा गया है।

इस बैठक में समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत, समुद्री डकैती और साइबर हमलों जैसी चुनौतियों, सूचना साझा करने की व्यवस्था, ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों के उपयोग और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा होगी। आईओएनएस का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में साझा चुनौतियों से मिलकर निपटना है। वहीं इस दौरान भारत 2026 से 2028 तक के लिए आईओएनएस की चेयरमैनशिप भी संभालेगा। हालांकि इससे पहले भारत 2008 से 2010 तक चेयरमैन रह चुका है। (IFR Milan 2026)

भारत की नेवल डिप्लोमेसी की बड़ी जीत

इस पूरे आयोजन की सबसे दिलचस्प तस्वीर तब बनेगी, जब कई धुर विरोधी देश रूस, ईरान और अमेरिका के युद्धपोत एक साथ एक ही जगह पर दिखाई देंगे। पश्चिमी एशिया में जहां ईरान और अमेरिका एक-दूसरे के धुरविरोधी हैं, तो यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और अमेरिका दोनों देशों के रिश्ते बेहद खराब हैं। लेकिन विशाखापत्तनम में ये सभी देश भारत के मंच पर साथ होंगे।

वहीं भारत के लिए सिर्फ बड़े देश ही अहम नहीं हैं। बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश नौसेना भी अपने फ्रिगेट के साथ इस आयोजन का हिस्सा बन रही है। भले ही भारत बांग्लादेश के बीच राजनीतिक और राजनयिक संबंध कितने खराब हों, लेकिन नेवल डिप्लोमेसी आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले हुआ करती थी। बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की साझा जिम्मेदारियां हैं, जिनमें चक्रवात, समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना और आपदा राहत शामिल हैं। ऐसे में मिलन और आईएफआर जैसे मंच दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करते हैं। (IFR Milan 2026)

इन तीनों कार्यक्रमों में ईरान और अमेरिका, रूस और अमेरिका, छोटे और बड़े देशों को लेकर एक साथ बुला कर भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि सभी के साथ मिलकर चलने वाला देश है। जहां दुनिया टकराव और ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत समुद्र के रास्ते संवाद और सहयोग की राह दिखा रहा है। भारत ने यह दिखा दिया है कि उसकी नौसेना राजनीति से ऊपर उठकर साझा समुद्री सुरक्षा की बात करती है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। (IFR Milan 2026)

विशाखापत्तनम में होगा नेवी का एयर शो

इस मेगा इवेंट के दौरान 19 फरवरी को विशाखापत्तनम में ही आयोजित आरके बीच पर इंटरनेशल सिटी परेड में भारतीय नौसेना अपनी एयर पावर का डेमोन्स्ट्रेशन भी करेगी। जो मुख्य रूप से ऑपरेशनल डेमोन्स्ट्रेशन का हिस्सा है। भारतीय नौसेना के लगभग 45 एयरक्राफ्ट इस पूरे आयोजन में भाग ले रहे हैं, जो समुद्र और आसमान दोनों में उसकी तैयारियों और क्षमताओं को दिखाएंगे।

एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत से मिग-29के फाइटर जेट्स उड़ान भरेंगे। ये जेट फॉर्मेशन फ्लाइट्स और एयर डिफेंस डेमो में हिस्सा लेंगे, जिससे समुद्र के ऊपर नौसेना की मारक क्षमता का प्रदर्शन होगा।इसमें भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स लाइव डिस्प्ले करेंगे। इस दौरान कुछ फॉर्मेशंस भी दिखाई जाएंगी। जिनमें एयरक्राफ्ट फॉर्मेशन जैसे एरोहेड और डायमंड, हेलीकॉप्टर मैन्यूवर्स, और सिमुलेटेड ऑपरेशन्स (जैसे एंटी-सबमरीन वारफेयर या सर्च एंड रेस्क्यू) शामिल हैं।

वहीं, हेलीकॉप्टर श्रेणी में स्वदेशी एएलएच ध्रुव, एमएच-60आर सीहॉक भी भाग लेगा, जो एंटी-सबमरीन ऑपरेशन्स और मल्टी-रोल मिशनों के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं कामोव केए-31 एयरबोर्न अर्ली वार्निंग की भूमिका निभाएगा और दूर से आने वाले खतरों की जानकारी देगा। इसके अलावा विमानों में लंबी दूरी की समुद्री गश्त के लिए बोइंद पी8आई पोसीडॉन, डोर्नियर 228, आईएआई सर्चर या आईएआई हेरॉन जैसे यूएवी भी शामिल हो सकते हैं। (IFR Milan 2026)

75 से ज्यादा देश ले रहे हैं हिस्सा

इन तीनों आयोजनों में 75 से ज्यादा देश और 4000 से ज्यादा डेलीगेट्स हिस्सा ले रहे हैं। जिनमें ईरान, अमेरिका, रूस और बांग्लादेश जैसे देश भी शामिल हैं। इस आयोजन में अभी तक भारत के अलावा 67 जहाजों के अलावा विदेशी देशों के 22 युद्धपोत और प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। भारतीय नौसेना की ओर से एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सबमरीन और अन्य युद्धपोत शामिल किए गए हैं। साथ ही कई मिलिट्री एयरक्राफ्ट भी इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

भारत की तरफ से प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत (R11), डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई (D65), आईएनएस विशाखापत्तनम (D66), आईएनएस मैसूर (D60), आईएनएस मुंबई (D62), आईएनएस राणा (D52) और आईएनएस रणविजय (D55) शामिल हैं। फ्रिगेट कैटेगरी में आईएनएस तरकश (F50), आईएनएस तमाल (F71) और आईएनएस नीलगिरि (F33) भी भाग ले रहे हैं। इनके अलावा कई अन्य युद्धपोत और पनडुब्बियां भी हैं। (IFR Milan 2026)

सबमरींस की बात करें, तो इन आयोजनों में भारत की तरफ से सिंधुघोष क्लास (प्रोजेक्ट 877EKM) यानी किलो क्लास की तीन पनडुब्बियां हिस्सा ले रही हैं। इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी (S60), आईएनएस शंकुल (S47), आईएनएस सिंधुकीर्ति (S61) शामिल हैं।

इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी 1989 में कमीशन हुई थी, जो हाल ही में रिफिट से गुजरी है। जिसमें नए सोनार और वेपन सिस्टम्स लगाए गए हैं। आईएफआर में फ्लीट रिव्यू के दौरान यह सबमर्ज्ड या सरफेस पोजीशन में हिस्सा लेगी, जो भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर कैपेबिलिटी दिखाएगी। वहीं, मिलन के सी फेज में एंटी-सबमरीन एक्सरसाइज में यह शामिल होगी।

वहीं, 1992 में कमीशन हुई आईएनएस शंकुल सबमरीन स्टेल्थ फीचर्स के लिए जानी जाती है और यह मिसाइल कैपेबल है। आईएफआर में 18 फरवरी को प्रेसिडेंशियल रिव्यू के दौरान यह फॉर्मेशन में रहेगी। जबकि मिलन में इंटरऑपरेबिलिटी ड्रिल्स (जैसे सर्च एंड रेस्क्यू या एंटी सबमरीन वॉरफेयर) में अपना जलवा बिखेरेगी।

आईएनएस सिंधुकीर्ति की बात करें, तो यह 1990 में कमीशन हुई थी। यह भारत की पहली सबमरीन है जो पूरी तरह से भारत में विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड में रिफिट हुई है। यह आईएफआर में डिस्प्ले का हिस्सा बनेगी, और मिलन अभ्यास के दौरान विदेशी नौसेनाओं के साथ कोऑर्डिनेटेड ऑपरेशंस में शामिल होगी। (IFR Milan 2026)

ये विदेशी जहाज बन रहे हैं हिस्सा

आईएफआर और मिलन एक्सरसाइज में ईरान के तीन शिप IRINS देना, बुशहर और लवन हिस्सा ले रहे हैं। इनमें देना माउज-क्लास की स्वदेशी फ्रिगेट है, जिसे ईरान ने अपने देश में डेवलप किया है, जो एंटी-शिप और एयर डिफेंस क्षमताओं से लैस है। यह फ्रिगेट आमतौर पर पर्शियन गल्फ और हिंद महासागर क्षेत्र में ऑपरेट करती है। वहीं, बुशहर कामन-क्लास की फास्ट अटैक क्राफ्ट या कोरवेट श्रेणी की मिसाइल बोट है। इसकी खासियत इसकी तेज रफ्तार है। यह छोटे आकार की होने के बावजूद एंटी-शिप मिसाइलों से लैस है। जबकि लवन एक ऑक्जिलियरी या सपोर्ट वेसल है। इसका मुख्य काम लॉजिस्टिक सपोर्ट देना होता है, जैसे समुद्र में ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सामग्री की सप्लाई करना है। (IFR Milan 2026)

वहीं, रूस की नौसेना भी इस बार मिलन 2026 में सक्रिय भागीदारी कर रही है। रूसी पैसिफिक फ्लीट से आने वाला आरएफएस मार्शल शापोशनिकोव (543) एक उडालॉय-क्लास डेस्ट्रॉयर/फ्रिगेट है, जिसे पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता और लंबी दूरी के ऑपरेशन्स के लिए जाना जाता है। इसके साथ आरएफएस बोरिस बुटोमा (P234) भी शामिल है, जो एक ऑक्जिलियरी या रिप्लेनिशमेंट शिप है और समुद्र में तैनात युद्धपोतों को ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सपोर्ट उपलब्ध कराने का काम करता है।

जबकि अमेरिकी नौसेना की तरफ से इस बार मिलन और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में यूएसएस पिंकनी (DDG 91) हिस्सा ले रहा है। यह आर्ले बर्क-क्लास गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर है, जिसे आधुनिक हथियार प्रणालियों और मजबूत एयर डिफेंस क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी मौजूदगी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है। जो भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती नौसैनिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग का मजबूत संदेश है। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा बांग्लादेश नौसेना का प्रमुख युद्धपोत बीएनएस सोमुद्र अविजान (F29) इस बार विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर और मिलन 2026 में हिस्सा ले रहा है। यह बांग्लादेश नेवी का एक अहम पेट्रोल फ्रिगेट है, जो लंबे समुद्री गश्त और सुरक्षा अभियानों के लिए तैनात किया जाता है। यह जहाज मूल रूप से अमेरिका के कोस्ट गार्ड का हाई एंड्यूरेंस कटर रूश था। इसे हैमिल्टन-क्लास कटर के रूप में बनाया गया था, जिसे बाद में बांग्लादेश नौसेना ने 2016 में पेट्रोल फ्रिगेट के तौर पर अपने बेड़े में शामिल किया था।

इन जहाजों के अलावा तो ऑस्ट्रेलिया से HMAS वाररामुंगा, इंडोनेशिया से केआरआई बंग तोमो, जापान की ओर से जेएस युदाची और मलेशिया की ओर से केडी श्री इंद्र शक्ति, मालदीव से सीजीएस हुरावी, म्यांमार से यूएमएस किंग आंग जेया, ओमान से आरएनओवी साध और फिलिपींस से बीआरपी मिगुएल मालवर, दक्षिण कोरिया की नौसेना ROKS गैंग गाम चान शिप के साथ पहुंच रही है। इसके अलावा सेशेल्स से एससीजीएस जोरोस्टर, दक्षिण अफ्रीका से एसएएस अमाटोला और श्रीलंका से एसएलएनएस सागर और एसएलएनएस नंदीमित्रा हिस्सा ले रहे हैं। इस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। (IFR Milan 2026)

भारतीय नौसेना को मिल सकते हैं स्वदेशी मरीन इंजन, DAC की बैठक में 114 राफेल और P-8i को मिल सकती है हरी झंडी

Indigenous Marine Gas Turbine Engine for Indian Navy in DAC Meeting

DAC Meeting: अगले हफ्ते होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में एक बड़ा और अहम फैसला लिया जा सकता है। माना जा रहा है कि डीएसी की बैठक 12 फरवरी को हो सकती है। बैठक में नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन के डेवलपमेंट से जुड़े एक बड़े प्रोग्राम को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह फैसला सिर्फ नौसेना के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। (DAC Meeting)

यह प्रोग्राम खास तौर पर 24 से 28 मेगावॉट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन इंजन के स्वदेशी विकास से जुड़ा है। ऐसे इंजन नौसेना के बड़े युद्धपोतों, जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट में इस्तेमाल होते हैं। अभी तक भारत इन इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: क्या है यह मरीन गैस टर्बाइन प्रोग्राम?

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना अब चाहती है कि ऐसे अहम इंजन भारत में ही डिजाइन हों, भारत में ही बनें और भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं। इसी उद्देश्य से यह नया प्रोग्राम तैयार किया गया है, जिसे डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 की मेक-1 कैटेगरी में लाया गया है।

मेक-1 कैटेगरी का मतलब होता है कि सरकार खुद इस प्रोजेक्ट में बड़ा निवेश करती है, ताकि देश के भीतर इन्हें तैयार किया जा सके। (DAC Meeting)

कितनी होगी लागत और सरकार कितना पैसा देगी?

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मरीन इंजन प्रोग्राम की लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये हो सकती है। मेक-1 नियमों के तहत सरकार प्रोटोटाइप यानी शुरुआती नमूने बनाने की लागत का 70 फीसदी तक खर्च उठाएगी। बाकी 30 फीसदी लागत उस इंडस्ट्री पार्टनर को वहन करनी होगी, जो इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

नियमों के मुताबिक, एक डेवलपमेंट एजेंसी को प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दी जा सकती है। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा और अहम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसमें कई चरणों में निवेश किया जाएगा। (DAC Meeting)

कितने इंजन बनेंगे और कहां होंगे इस्तेमाल?

इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले 4 प्रोटोटाइप इंजन बनाए जाएंगे। इन इंजनों को जमीन पर और बाद में जहाज पर टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि वे नौसेना की सभी जरूरतों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

अगर ये प्रोटोटाइप सफल रहते हैं, तो इसके बाद शुरुआती तौर पर कम से कम 40 मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की योजना है। आगे चलकर यह संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में कई नए युद्धपोत शामिल करने वाली है।

ये इंजन खास तौर पर डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट जैसे बड़े सरफेस कॉम्बैटेंट्स के लिए बनाए जाएंगे, जो नौसेना की ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। (DAC Meeting)

अभी किन विदेशी इंजनों पर निर्भर है भारत?

फिलहाल भारतीय नौसेना के ज्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन इंजनों पर चलते हैं। इनमें मुख्य रूप से दो नाम आते हैं। उनमें एक यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट और दूसरी अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई)है।

इन कंपनियों के इंजन वर्षों से भारतीय नौसेना के जहाजों में लगे हुए हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में वैश्विक हालात ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी सप्लाई पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। युद्ध, प्रतिबंध या राजनीतिक तनाव की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम से भारत में हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, एडवांस्ड मटीरियल्स और प्रिसीजन इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी तकनीकी तरक्की होगी।

इसी वजह से नौसेना अब चाहती है कि भविष्य में ऐसे अहम सिस्टम्स पूरी तरह से स्वदेशी हों। (DAC Meeting)

पहले भी हुए हैं स्वदेशी प्रयास, लेकिन यह प्रोग्राम क्यों है अलग?

भारतीय नौसेना और डीआरडीओ पहले भी मरीन इंजन के क्षेत्र में स्वदेशी प्रयास कर चुके हैं। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने कावेरी इंजन का एक मरीन वर्जन डेवलप करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसी सार्वजनिक कंपनियों ने भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए लोकलाइजेशन पर काम किया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार मौजूदा मरीन इंजन प्रोग्राम का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक रखा गया है। इस बार विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राइवेट इंडस्ट्री की अगुवाई में, नौसेना की सक्रिय भागीदारी के साथ इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (DAC Meeting)

प्राइवेट इंडस्ट्री से क्या है उम्मीद?

पिछले साल के आखिर में नौसेना ने भारतीय प्राइवेट कंपनियों से संपर्क किया था और उनसे जानकारी मांगी थी कि क्या वे ऐसे हाई-पावर मरीन गैस टर्बाइन इंजन बना सकती हैं। कंपनियों से यह पूछा गया कि क्या उनके पास गैस टर्बाइन डिजाइन करने का अनुभव है। क्या वे फोर्जिंग, कास्टिंग और प्रिसीजन मशीनिंग जैसे अहम काम कर सकती हैं। साथ ही, क्या उनके पास टेस्टिंग फैसिलिटी और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है और वे इंजन का मेंटेनेंस और लाइफ-साइकिल सपोर्ट कैसे देंगे। इस कवायद का मकसद यह समझना था कि भारतीय इंडस्ट्री इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है। (DAC Meeting)

खुल सकती है निर्यात की संभावना भी

अगर भारत इस 24-28 मेगावॉट मरीन गैस टर्बाइन को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में इसे इंडियन ओशन रीजन की मित्र नौसेनाओं को निर्यात भी किया जा सकता है। आज कई छोटे और मध्यम देश अपने युद्धपोतों के लिए भरोसेमंद और किफायती इंजन की तलाश में रहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए एक नया विकल्प बन सकता है। (DAC Meeting)

डीएसी बैठक में और किस पर हो सकती है चर्चा

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की होने वाली बैठक में वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिससे यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल मानी जा रही है। इसके अलावा डीएसी में भारतीय नौसेना के लिए छह अतिरिक्त पी-8आई समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान खरीदने का प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान हैं, जिनका इस्तेमाल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए किया जाता है। नौसेना अपनी निगरानी क्षमता को और मजबूत करने के लिए छह और विमानों की जरूरत महसूस कर रही है। यह खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) रूट के जरिए की जानी है। (DAC Meeting)

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने मई 2021 में इस बिक्री को मंजूरी दे दी थी और उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 2.42 अरब डॉलर बताई गई थी। हालांकि, लागत से जुड़े सवालों और पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बने राजनीतिक माहौल के कारण यह सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद बातचीत बंद नहीं हुई। सितंबर में अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग के वरिष्ठ अधिकारी भारत आए थे और इस सौदे को लेकर विस्तृत चर्चा की गई थी। अब सूत्रों का कहना है कि डीएसी से मंजूरी मिलने की स्थिति में यह सौदा अगले वित्त वर्ष में औपचारिक रूप से साइन किया जा सकता है। (DAC Meeting)

रनवे की जरूरत खत्म! पानी और जमीन दोनों से उड़ेंगे विमान, भारत में डिफेंस से टूरिज्म तक गेमचेंजर बनेंगे एम्फिबियन एयरक्राफ्ट

Amphibious Aircraft India

Amphibious Aircraft India: भारत में पहली बार एंफीबियन एयरक्राफ्ट के लिए बड़ी पहल हुई है। भारत में डिफेंस और सिविल एविएशन मार्केट की जरूरतों को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया की कंपनी एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (एएआई) और भारत की अपोजी एयरोस्पेस के बीच एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी हुई है। इस समझौते के तहत अपोजी एयरोस्पेस ने 15 अल्बाट्रॉस 2.0 एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के लिए करीब 3,500 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है। यह डील सिर्फ एयरक्राफ्ट खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ भारत में मैन्युफैक्चरिंग, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने की योजना भी है।

Amphibious Aircraft India: एम्फिबियन एयरक्राफ्ट क्या होते हैं और क्यों हैं खास

एम्फिबियन एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो रनवे के साथ-साथ वाटर से भी टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकते हैं। इन्हें आम भाषा में सी-प्लेन भी कहा जाता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां लंबी समुद्री तटरेखा, सैकड़ों द्वीप, बड़ी नदियां और दूर-दराज के इलाके हैं, ऐसे विमान बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।

अब तक भारत में इस तरह के विमानों का इस्तेमाल सीमित रहा है। लेकिन सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी, ब्लू इकॉनमी, सागरमाला प्रोग्राम और द्वीप विकास योजनाओं को देखते हुए एम्फिबियन एयरक्राफ्ट की जरूरत तेजी से महसूस की जा रही थी। इस डील का मकसद भारत के डिफेंस और सिविल एविएशन बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाना है। (Amphibious Aircraft India)

अल्बाट्रॉस 2.0: पुराने नाम में नई तकनीक

अल्बाट्रॉस 2.0 कोई बिल्कुल नया नाम नहीं है। यह मशहूर ग्रुमैन एचयू-16 अल्बाट्रॉस से प्रेरित आधुनिक एयरक्राफ्ट है, जिसे आज की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह नया डिजाइन दिया गया है।

अल्बाट्रॉस 2.0 की खास बात यह है कि यह दुनिया का पहला और इकलौता ऐसा एम्फिबियन एयरक्राफ्ट है, जिसे ट्रांसपोर्ट कैटेगरी में एफएए या ईएएसए सर्टिफिकेशन मिला है और जिसमें 19 से ज्यादा, यानी 28 यात्रियों तक बैठने की क्षमता है।

यह एयरक्राफ्ट सिर्फ टूरिज्म या सिविल फ्लाइट्स के लिए नहीं, बल्कि डिफेंस, कोस्ट गार्ड, नेवी, सर्च एंड रेस्क्यू और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे मिशनों के लिए भी तैयार किया गया है। (Amphibious Aircraft India)

भारत में 500 करोड़ रुपये का निवेश

इस डील का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ 15 एयरक्राफ्ट नहीं हैं, बल्कि भारत में होने वाला निवेश है। भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (रिटायर्ड) विंग कमांडर एमवीएन साई ने बताया कि उनकी कंपनी वह 500 करोड़ रुपये तक का निवेश करेगी। इस निवेश से भारत में टेल-सेक्शन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) सेंटर, ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधाएं डेवलप की जाएंगी। इसके अलावा मिलिट्री वर्जन के लिए एडवांस्ड सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा डेवलप होगी। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में अल्बाट्रॉस 2.0 के कई अहम पार्ट्स और सर्विसेज भारत में ही तैयार होंगी।

उन्होंने बताया कि यह पहल भारत के एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ-साथ रीजनल एयर कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद करेगी। (Amphibious Aircraft India)

Amphibious Aircraft India

डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह डील

डिफेंस सेक्टर को लेकर कंपनी ने साफ किया कि वह आने वाले सरकारी खरीद कार्यक्रमों में हिस्सा लेगी। इससे पहले 10 जनवरी को आई रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय पहले ही भारतीय नौसेना के लिए चार फिक्स्ड-विंग एम्फिबियन एयरक्राफ्ट को वेट लीज पर लेने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी कर चुका है। जिसकी खबर सबसे पहले रक्षा समाचार ने ब्रेक की थी। इन विमानों का इस्तेमाल रिकॉनिसेंस, सर्विलांस और सर्च एंड रेस्क्यू के लिए किया जाना है।

एम्फिबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के प्रेसिडेंट और सीईओ गोपी रेड्डी ने कहा कि उनकी भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस इस बिडिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेगी। उन्होंने बताया कि अल्बाट्रॉस 2.0 एक पूरी तरह प्रोवेन एयरक्राफ्ट है और भारतीय नौसेना इसे पहले दिन से ऑपरेट कर सकती है। उन्होंने बताया कि आने वाले 18 से 24 महीनों में पहला अल्बाट्रॉस 2.0 भारत में ऑपरेशन में आ सकता है। उनका दावा है कि जहां दूसरे विकल्पों जैसे शिनमयवा US-2 की कीमत 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा है, वहीं अल्बाट्रॉस 2.0 की बेस कीमत करीब 25 मिलियन डॉलर के आसपास है। (Amphibious Aircraft India)

सिविल एविएशन और टूरिज्म को भी मिलेगा फायदा

सिर्फ डिफेंस ही नहीं, सिविल सेक्टर में भी इस एयरक्राफ्ट की बड़ी भूमिका देखी जा रही है। अल्बाट्रॉस 2.0 वर्जन 28 यात्रियों को ले जा सकता है या फिर 4.5 टन कार्गो ढो सकता है। सााथ ही, लास्ट माइल कनेक्टिविटी द्वीपों, पहाड़ी इलाकों और नदी-तटीय क्षेत्रों को जोड़ सकता है

अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, पूर्वोत्तर भारत और तटीय राज्यों में यह विमान टूरिज्म और कनेक्टिविटी को नई रफ्तार दे सकता है। खास बात यह है कि इसे बड़े एयरपोर्ट या रनवे की जरूरत नहीं होती, यानी यह जीरो इंफ्रास्ट्रक्चर से ऑपरेट हो सकता है। (Amphibious Aircraft India)

Amphibious Aircraft India

भारत को ग्लोबल हब बनाने की योजना

एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (AAI) के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन खोआ होआंग ने साफ कहा है कि कंपनी का अंतिम लक्ष्य भारत में दूसरी पूरी मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली लाइन स्थापित करना है। फिलहाल AAI की मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी अमेरिका में है, लेकिन भारत को भविष्य का बड़ा सेंटर माना जा रहा है।

अगर यह योजना साकार होती है, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है, जहां से एम्फिबियन एयरक्राफ्ट का निर्माण, मेंटेनेंस और एक्सपोर्ट किया जाएगा। (Amphibious Aircraft India)

आत्मनिर्भर भारत और बजट सपोर्ट

दिलचस्प बात यह है कि यह डील ऐसे समय पर हुई है, जब केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने सी-प्लेन और एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने की बात कही है। बजट में सी-प्लेन वीजीएफ स्कीम लाने का भी ऐलान किया गया है, जिससे इनके ऑपरेशन को सपोर्ट मिलेगा। (Amphibious Aircraft India)

क्यों माना जा रहा है इसे गेम-चेंजर

इस पूरे समझौते को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यह भारत की डिफेंस और सिविल एविएशन जरूरतों को एक साथ पूरा करता है। यह एयरक्राफ्ट पानी और जमीन दोनों से ऑपरेट कर सकता है, जिससे यह भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों के लिए काफी उपयोगी बन जाता है। साथ ही, कंपनी मिलिट्री वर्जन के लिए पूरे सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा भी दे रही है। सरकार की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करता है।

सिविल एविएशन की बात करें तो अल्बाट्रॉस 2.0 में 28 यात्री या 4.5 टन कार्गो ले जाने की क्षमता है। इस वजह से यह द्वीपों, तटों और दूरदराज इलाकों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर-फ्री कनेक्टिविटी देता है, जो सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी योजनाओं का अहम हिस्सा है। इसके अलावा भारत को एम्फिबियन एविएशन का ग्लोबल हब बनाने की दिशा में ले जाता है। (Amphibious Aircraft India)

AMCA प्रोजेक्ट से बाहर कर क्या सरकार तोड़ रही HAL का दबदबा, कैसे एक नियम ने बदली 5th जेनरेशन फाइटर की कहानी

HAL AMCA disqualification

HAL AMCA disqualification: बुधवार का दिन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए आसान नहीं रहा। ट्रेडिंग सेशन के दौरान एचएएल के शेयर करीब 8 फीसदी तक टूट गए और दिन के निचले स्तर 4100.15 रुपये तक पहुंच गए। यह गिरावट उस वक्त देखने को मिली, जब बाजार में यह खबर तेजी से फैली कि एचएएल को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा प्रोजेक्ट पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट एएमसीए की रेस से बाहर कर दिया गया है।

शेयर बाजार खुलते ही एचएएल का स्टॉक 4220 रुपये पर ओपन हुआ था, जो पिछले बंद भाव 4470 रुपये से काफी नीचे था। शुरुआती कुछ मिनटों में ही बिकवाली का दबाव बढ़ गया और शेयर फिसलते-फिसलते दिन के लो तक पहुंच गया। निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि एएमसीए प्रोजेक्ट से बाहर होने की खबरें ही इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह हैं। (HAL AMCA disqualification)

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम बात यह भी है कि अब तक न तो रक्षा मंत्रालय, न ही डीआरडीओ या एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) की तरफ से एचएएल के बाहर होने का कोई औपचारिक एलान किया गया है। खुद एचएएल ने भी साफ कहा है कि उसे इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। (HAL AMCA disqualification)

HAL AMCA disqualification: क्या है एचएएल का आधिकारिक स्टैंड?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए प्रोग्राम को लेकर मीडिया में चल रही खबरों पर एचएएल ने अपनी बात रखी है। कंपनी का कहना है कि उसे इस संबंध में अभी तक कोई भी आधिकारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है। ऐसे में मौजूदा समय में इन मीडिया रिपोर्ट्स पर कोई टिप्पणी करना संभव नहीं है। एचएएल ने यह भी कहा है कि जैसे ही कोई आधिकारिक जानकारी मिलेगी, वह सभी संबंधित पक्षों को पूरी तरह अवगत कराएगी।

एचएएल ने दोहराया है कि उसके पास इस समय मजबूत और पक्का ऑर्डर बुक मौजूद है, जिससे कंपनी की आय को लेकर स्पष्टता बनी हुई है। इसके साथ ही एचएएल का प्रोडक्शन और एक्जीक्यूशन प्लान 2032 तक मजबूत स्थिति में है।

कंपनी एक साथ कई रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। इनमें इंडियन मल्टी रोल हेलीकॉप्टर (आईएमआरएच), एलसीए मार्क-2 और कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम (कैट्स) जैसे अहम प्रोग्राम शामिल हैं। ये सभी प्रोजेक्ट एचएएल की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेंगे और लंबे समय में कंपनी के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। इन प्रोग्राम्स के 2032 के बाद प्रोडक्शन में आने की उम्मीद है। (HAL AMCA disqualification)

इसके अलावा, एचएएल सिविल एविएशन सेक्टर में भी अपने काम का दायरा बढ़ा रही है। ध्रुव एनजी, हिंदुस्तान 228 और एसजे-100 जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए कंपनी भविष्य में अपनी आय बढ़ाने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने पर काम कर रही है।

एचएएल का कहना है कि कंपनी की आर्थिक स्थिति मजबूत है और वह लगातार बेहतर प्रदर्शन के जरिए हर साल स्थिर और टिकाऊ ग्रोथ हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। (HAL AMCA disqualification)

आखिर एएमसीए है क्या, जिसे लेकर इतना बड़ा हंगामा?

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भारत का फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। यह वही प्लेटफॉर्म है, जिसे भविष्य में भारतीय वायुसेना की एयर डॉमिनेंस की रीढ़ माना जा रहा है।

इस प्रोजेक्ट को एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी लीड कर रही है, जो डीआरडीओ के तहत काम करती है। एएमसीए को पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर तैयार किया जा रहा है, जिसमें स्टेल्थ शेपिंग, इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और सुपरक्रूज जैसी क्षमताएं होंगी।

सरल शब्दों में कहें तो यह प्रोजेक्ट भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करने वाला है, जो खुद का फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर बना सकते हैं। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल से सबको क्यों थी उम्मीद?

एचएएल दशकों से भारत की सबसे बड़ी और सबसे भरोसेमंद एयरोस्पेस कंपनी मानी जाती रही है। तेजस एलसीए, सुखोई-30 एमकेआई, ध्रुव हेलीकॉप्टर, प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म एचएएल ही बना रही है।

ऐसे में आम धारणा यही थी कि एएमसीए जैसे बड़े और टेक्निकली तौर पर अहम प्रोजेक्ट में एचएएल की भूमिका सबसे अहम होगी। यही वजह है कि जब एचएएल के बाहर होने की खबरें सामने आईं, तो बाजार और डिफेंस सर्कल दोनों चौंक गए। (HAL AMCA disqualification)

एएमसीए की बिडिंग प्रोसेस कैसे शुरू हुई?

एएमसीए के लिए सरकार ने इस बार एक नया रास्ता चुना। पहले जहां ऐसे बड़े एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट लगभग पूरी तरह एचएएल के भरोसे रहते थे, वहीं इस बार प्राइवेट सेक्टर को भी बराबरी का मौका दिया गया।

इसके तहत एडीए ने साल 2025 में एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया। इसका मकसद यह था कि प्रोटोटाइप डेवलपमेंट के लिए ऐसी कंपनियां या कंसोर्टियम चुने जाएं, जो तकनीकी रूप से सक्षम हों, आर्थिक रूप से मजबूत हों और समय पर डिलीवरी कर सकें।

इस प्रक्रिया में कुल 7 कंसोर्टियम मैदान में उतरे, जिनमें सरकारी और निजी दोनों तरह की कंपनियां शामिल थीं। (HAL AMCA disqualification)

वह एक शर्त, जिसने रोक दी एचएएल की राह

इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है ईओआई में रखी गई एक खास शर्त। इस शर्त के मुताबिक, किसी भी कंपनी का ऑर्डर बुक उसकी सालाना टर्नओवर से तीन गुना से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

अगर किसी कंपनी का पेंडिंग ऑर्डर इस सीमा से ज्यादा निकलता है, तो उस पैरामीटर में उसे जीरो मार्क्स दिए जाते हैं। यह नियम पहले से दस्तावेज में लिखा हुआ था, लेकिन इसका असर अब जाकर सबके सामने आया।

इन सभी बिड्स का मूल्यांकन केवल नाम या पुराने अनुभव के आधार पर नहीं किया गया, बल्कि इसके लिए एक विस्तृत और सख्त इवैल्यूएशन फ्रेमवर्क अपनाया गया। कंपनियों को उनकी टेक्निकल कैपेबिलिटी, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स का अनुभव और सबसे अहम, ऑर्डर बुक बनाम टर्नओवर रेशियो जैसे मानकों पर परखा गया। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल इस शर्त पर क्यों फेल हुई?

एचएएल की वित्तीय स्थिति मजबूत है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। एचएएल की सालाना टर्नओवर करीब 30,000 करोड़ रुपये के आसपास है, जबकि उसकी कुल ऑर्डर बुक 2.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि एचएएल के पास उसकी कमाई के मुकाबले लगभग आठ गुना ज्यादा काम पहले से ही लाइन में लगा है।

ईओआई की शर्तों के हिसाब से यह अनुपात तय सीमा से काफी ज्यादा था। नतीजा यह हुआ कि एचएएल को इस अहम फाइनेंशियल पैरामीटर में पूरे अंक नहीं मिल पाए, और कुल स्कोर में वह शॉर्टलिस्ट होने से चूक गई।

इस ईओआई के जवाब में कुल सात कंसोर्टियम सामने आए, जिनमें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टूब्रो, अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स और ब्रह्मोस एयरोस्पेस जैसे बड़े नाम शामिल थे। (HAL AMCA disqualification)

सरकार ने ऐसा नियम क्यों रखा?

यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। सरकार और एडीए की सोच साफ मानी जा रही है। एएमसीए जैसे क्रिटिकल प्रोजेक्ट में देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। एचएएल के पास पहले से तेजस मार्क-1ए, प्रचंड, सुखोई अपग्रेड, टीईडीबीएफ यानी ट्विन इंजन टेक बेस्ड फाइटर और कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स हैं। इन सबकी डिलीवरी टाइमलाइन पहले ही खिंची हुई है। सरकार नहीं चाहती थी कि ज्यादा वर्कलोड के कारण एएमसीए भी उसी रास्ते पर चला जाए।

इसलिए ऐसी कंपनी को प्राथमिकता दी गई, जिसके पास बैलेंस्ड वर्कलोड हो और जो नए प्रोजेक्ट को पूरी फोकस के साथ आगे बढ़ा सके। (HAL AMCA disqualification)

क्या तेजस की देरी ने भी भूमिका निभाई?

आधिकारिक तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन डिफेंस सर्कल में यह चर्चा जरूर है कि तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी में हुई देरी, इंजन सप्लाई से जुड़ी समस्याएं और प्रोडक्शन स्लो होने जैसी बातें बैकग्राउंड में असर डाल सकती हैं।

हालांकि यह साफ है कि मुख्य वजह वही ऑर्डर बुक बनाम टर्नओवर वाला नियम रहा, न कि कोई अचानक लिया गया फैसला। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल पूरी तरह बाहर हुई या नहीं?

यहां एक जरूरी क्लैरिटी समझनी होगी। एचएएल को पूरी तरह एएमसीए से बाहर नहीं किया गया है। अभी बात सिर्फ प्रोटोटाइप डेवलपमेंट फेज की है, जिसकी लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा मानी जा रही है।

भविष्य में जब प्रोटोटाइप्स के बाद, 2034-2035 से एएमसीए का फुल सीरियल प्रोडक्शन शुरू होगा, तब एचएएल की भूमिका फिर से सामने आ सकती है। एचएएल पहले से एएमसीए के डिजाइन और स्ट्रक्चर से जुड़े कुछ कामों में शामिल रही है। (HAL AMCA disqualification)

प्राइवेट सेक्टर की एंट्री से क्या बदलेगा?

एएमसीए प्रोजेक्ट में प्राइवेट सेक्टर की बड़ी एंट्री सरकार की उस नीति को दिखाती है, जिसमें डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को एचएएल के मोनोपॉली से बाहर निकालकर ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाना है। इससे एक तरफ जहां स्पीड और इनोवेशन बढ़ने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत में फाइटर जेट बनाने का सबसे ज्यादा अनुभव अभी भी एचएएल के पास ही है। यही वजह है कि कुछ एक्सपर्ट्स इस फैसले को रिस्की भी मान रहे हैं। (HAL AMCA disqualification)

एएमसीए की आगे की टाइमलाइन क्या है?

सूत्रों के मुताबिक एएमसीए के लिए तीन कंसोर्टियम को शॉर्टलिस्ट किया गया है। इनमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स एक स्वतंत्र दावेदार के तौर पर सामने आई, जबकि लार्सन एंड टूब्रो ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर जगह बनाई। तीसरा शॉर्टलिस्टेड समूह कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स के नेतृत्व में बना कंसोर्टियम था, जिसमें बीईएमएल और दाता पैटर्न्स शामिल थे।

मौजूदा योजना के मुताबिक, शॉर्टलिस्ट किए गए कंसोर्टियम को जल्द ही अप्रैल 2026 तक आरएफपी जारी किया जाएगा। इसके बाद फाइनल सेलेक्शन फाइनल सेलेक्शन जून-जुलाई 2026 में होगा और पांच प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे।

पहला प्रोटोटाइप 2028-29 के आसपास रोल-आउट हो सकता है, जबकि पहली उड़ान 2029 में देखने को मिल सकती है। इंडक्शन का लक्ष्य 2035 के आसपास रखा गया है। (HAL AMCA disqualification)

भारत में हर साल बनेंगे 100 मिलिट्री हेलीकॉप्टर, अदाणी-लियोनार्डो समझौते से बदलेगी सेनाओं की तस्वीर

Adani Leonardo helicopter manufacturing India
Adani Defence–Leonardo MoU to Build Integrated Helicopter Manufacturing Ecosystem in India

Adani Leonardo helicopter manufacturing India: वह जिन दूर नहीं जब भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल 100 मिलिट्री हेलीकॉप्टर्स बनाए जाएंगे। इसी कड़ी में देश की प्राइवेट सेक्टर की टॉप कंपनी अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इटली की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी लिओनार्डो के बीच 3 फरवरी, मंगलवार को एक अहम समझौते (एमओयू) पर दस्तखत किए। इस समझौते का मकसद भारत में एक ऐसा मजबूत और पूरी तरह इंटीग्रेटेड हेलीकॉप्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना है, जो आने वाले सालों में भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ देश को ग्लोबल लेवल पर एक भरोसेमंद डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बना सके।

Adani Leonardo helicopter manufacturing India: सिर्फ हेलीकॉप्टर नहीं, पूरी सोच बदलने वाला समझौता

अदाणी डिफेंस का कहना है कि यह समझौता सिर्फ हेलीकॉप्टर खरीद या असेंबली तक सीमित नहीं है। इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। इस साझेदारी के तहत भारत में हेलीकॉप्टर का डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ, पायलट ट्रेनिंग और सप्लाई चेन डेवलपमेंट तक का पूरा इकोसिस्टम तैयार किया जाएगा। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

अब तक भारत को अपनी सैन्य जरूरतों के लिए बड़ी संख्या में हेलीकॉप्टर विदेशों से आयात करने पड़ते थे। इससे न सिर्फ लागत बढ़ती थी, बल्कि स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर और अपग्रेड के लिए भी विदेशों पर निर्भरता बनी रहती थी। अदाणी और लियोनार्डो की यह साझेदारी इसी निर्भरता को धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

किन हेलीकॉप्टरों पर होगा फोकस

इस एमओयू के तहत शुरुआत में दो मॉडर्न मिलिट्री हेलीकॉप्टरों पर खास फोकस किया जाएगा। इनमें पहला है AW169M। यह एक लाइट ट्विन-इंजन मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर है, जिसे खासतौर पर सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह ट्रूप ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इवैक्यूएशन, सर्च एंड रेस्क्यू, सर्विलांस और सीमित अटैक रोल में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह हेलीकॉप्टर हाई-एल्टिट्यूड एरिया में भी बेहतर परफॉर्मेंस देने के लिए जाना जाता है, जो भारतीय सेना के लिए बेहद अहम है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

दूसरा हेलीकॉप्टर है AW109 ट्रेकर-एम। यह स्किड-लैंडिंग गियर वाला हेलीकॉप्टर है, जो पहाड़ी, जंगल और दुर्गम इलाकों में ऑपरेशन के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। इसका इस्तेमाल पेट्रोलिंग, रेकॉनिसेंस, लाइट यूटिलिटी और वीआईपी मूवमेंट जैसे कामों में किया जा सकता है। इसकी स्पीड और मैन्यूवरेबिलिटी इसे खास बनाती है।

लिओनार्डो हेलीकॉप्टर्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सेसारे कैसिया ने बताया कि इस एमओयू का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की तत्कालिक जरूरतों को पूरा करना है, जिसमें नए नेवल यूटिलिटी और टोही और निगरानी हेलीकॉप्टर फ्लीट शामिल हैं, और भारत के सर्कुलर अलायंस पॉलिसी फ्रेमवर्क और लॉन्ग-टर्म विजन में योगदान देना है। उन्होंने बताया कि उनका फ्लीट 130 से ज्यादा देशों में उड़ता है, और उनके पास सबसे आधुनिक प्रोडक्ट रेंज में से एक है जो मिलिट्री और सिविल दोनों तरह के इस्तेमाल के लिए सभी मुख्य मार्केट सेगमेंट को कवर करती है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी के अभी भारत में लगभग 50 हेलीकॉप्टर हैं जो एनर्जी ऑफशोर और पैसेंजर ट्रांसपोर्ट में काम कर रहे हैं। लिओनार्डो के पास हेलीकॉप्टर बनाने का 70 से ज्यादा सालों का अनुभव है और वे ट्रांसमिशन और ब्लेड जैसे जरूरी कंपोनेंट्स से लेकर हेलीकॉप्टर डिजाइन, इंटीग्रेशन और लाइफ साइकिल सपोर्ट तक पूरी वैल्यू चेन को कंट्रोल करते हैं। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

देश की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा हुआ कदम

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के डायरेक्टर जीत अदाणी ने इस मौके पर कहा, “लियोनार्डो के साथ यह पार्टनरशिप, जैसा कि हमने पिछले हफ्ते एम्ब्रेयर के साथ किया था, यह दिखाता है कि हम भारत में मिलिट्री और सिविल एविएशन इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा बनने के लिए बहुत कमिटेड हैं।” उन्होंने कहा, यह साझेदारी सिर्फ एक कारोबारी करार नहीं है, बल्कि देश की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा हुआ कदम है। उन्होंने कहा कि भारत की सेनाएं बेहद कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करती हैं और उनकी जरूरतों के मुताबिक क्षमताओं का विकास करना उद्योग की जिम्मेदारी है।

उनके मुताबिक, अदाणी ग्रुप डिफेंस को सिर्फ एक सेक्टर के तौर पर नहीं, बल्कि एक समग्र रणनीतिक जरूरत के रूप में देखता है। इस साझेदारी के जरिए भारत में मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेनिंग और सपोर्ट का ऐसा स्ट्रक्चर खड़ा किया जाएगा, जो लंबे समय तक देश की जरूरतों को पूरा कर सके। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

वहीं, लियोनार्डो हेलीकॉप्टर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर जियान पिएरो कुटिलो ने कहा, “हम अदाणी के साथ जुड़कर बेहद खुश हैं। यह साझेदारी भारत के रोटरक्राफ्ट इंडस्ट्री को और मजबूत बनाने की उसकी सोच में योगदान देगी। हमारा लक्ष्य भारत को वही आधुनिक तकनीक और ऑपरेशनल क्षमता उपलब्ध कराना है, जिसकी उसे जरूरत है।”

आत्मनिर्भर भारत को जमीन पर उतारने वाला एमओयू

इस कार्यक्रम में विशेष तौर पर मौजूद रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा, अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और लियोनार्डो के बीच हुआ यह एमओयू भारत में रोटरी विंग यानी हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम बनाने की दिशा में एक दूरदर्शी और अहम कदम है। उन्होंने कहा कि यह समझौता दो प्रतिष्ठित औद्योगिक संस्थाओं के एक साथ आने का प्रतीक है और भारत-ईयू के बीच हाल ही में हुए सुरक्षा और रक्षा रणनीतिक साझेदारी को जमीन पर उतारने वाला प्रयास है।

रक्षा सचिव ने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब पूरी तरह आयात बंद करना नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से आयात पर निर्भरता कम करना और भारत में वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी औद्योगिक क्षमता खड़ी करना है। उन्होंने कहा कि हेलीकॉप्टर सेगमेंट भारत की रक्षा तैयारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और अब निजी क्षेत्र व अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की भागीदारी से इस क्षेत्र को और मजबूत किया जाएगा।

उन्होंने यह भी साफ किया कि 100 प्रतिशत आत्मनिर्भरता तुरंत संभव नहीं होती, लेकिन ऐसे कदम निर्भरता को लगातार कम करते हैं। उनके अनुसार, रोटरी विंग यानी हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम का भारत में विकास सेनाओं की ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करेगा और देश को लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक फायदा देगा।

उन्होंने कहा कि ऐसी साझेदारियां न सिर्फ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कंपीटिशन को बढ़ावा देंगी, बल्कि रक्षा बजट के बेहतर उपयोग और भारत में एक मजबूत, विविध और आधुनिक रक्षा एयरोस्पेस इंडस्ट्रियल बेस के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

हिमालय से समुद्री तटों तक जोड़ेगी साझेदारी

भारत में इटली के राजदूत एंतोनियो एनरिको बार्तोली ने कहा कि अदाणी डिफेंस और लियोनार्डो की साझेदारी भारत के एयरोस्पेस सफर में एक ऐतिहासिक मोड़ है। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में हेलीकॉप्टर सेगमेंट में एक बड़ा कदम बताया। राजदूत के अनुसार, यह साझेदारी सिर्फ मशीनें बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे विशाल देश को हिमालय से लेकर समुद्री तटों तक जोड़ने का माध्यम बनेगी।

उन्होंने बताया कि वैश्विक हेलीकॉप्टर बाजार तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में भारत इसमें एक अहम हिस्सेदार बन सकता है। सैन्य आधुनिकीकरण और सिविल एविएशन की बढ़ती जरूरतें इस विकास को रफ्तार देंगी। उन्होंने रक्षा मंत्रालय की नीतियों, बजट में बढ़े पूंजीगत आवंटन और सुधारों की सराहना की, जिनसे उद्योग, स्टार्टअप्स और एमएसएमई को बढ़ावा मिल रहा है।

राजदूत ने कहा कि लियोनार्डो की विश्वस्तरीय डिजाइन और अदाणी की औद्योगिक क्षमता मिलकर भारत में ऐसा इकोसिस्टम बनाएगी, जहां हेलीकॉप्टर भारत में, भारतीय हाथों से और भारत के भविष्य के लिए तैयार होंगे। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

अगले दशक में 1000 से ज्यादा हेलीकॉप्टरों की जरूरत

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के सीईओ आशीष राजवंशी ने इस साझेदारी के व्यावहारिक पहलुओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारतीय सशस्त्र बलों ने अगले एक दशक में एक हजार से ज्यादा हेलीकॉप्टरों की जरूरत का अनुमान जताया है। उन्होंने कहा कि जल्दी ही भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में ही हर साल 100 हेलीकॉप्टर बनाएं जाएंगे। उन्होंने आगे कहा, यह साझेदारी हमारी उस सोच को साकार करती है, जिसमें भारत में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी डेवलप करना लक्ष्य है।”

उन्होंने बताया कि इस साझेदारी से इंडिजिनाइजेशन तेज होगा, सप्लाई चेन मजबूत होगी और भारत को विश्व-स्तरीय प्रोडक्शन बेस बनाने में मदद मिलेगी। उनके अनुसार, यह सिर्फ वर्तमान जरूरतों का समाधान नहीं है, बल्कि भविष्य की मांगों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

पुरानी पड़ चुकी फ्लीट के लिए नए ऑप्शन

आशीष राजवंशी ने बताया कि भारतीय सेनाओं के पास अभी भी बड़ी संख्या में पुराने चेतक और चीता जैसे हेलीकॉप्टर सेवा में हैं, जो दशकों पहले शामिल किए गए थे। समय के साथ-साथ इनकी मेंटेनेंस कॉस्ट बढ़ गई है और ऑपरेशनल सीमाएं भी सामने आने लगी हैं। ऐसे में AW169M और AW109 ट्रेकर-एम जैसे आधुनिक हेलीकॉप्टर इनकी जगह लेने के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।

वहीं, इन नए हेलीकॉप्टरों के आने से सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ेगी। सीमावर्ती इलाकों में तेज मूवमेंट, आपात स्थिति में रेस्क्यू और लॉजिस्टिक सपोर्ट कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

भारत में बनेगा मैन्युफैक्चरिंग और एमआरओ हब

सीईओ आशीष राजवंशी के मुताबिक इस साझेदारी का सबसे अहम पहलू यह है कि हेलीकॉप्टर सिर्फ भारत में असेंबल नहीं होंगे, बल्कि धीरे-धीरे उनका मैन्युफैक्चरिंग कंटेंट भी देश के अंदर बढ़ाया जाएगा। इसे फेज्ड इंडिजिनाइजेशन कहा जा रहा है। शुरुआती चरण में कुछ अहम कंपोनेंट्स विदेश से आ सकते हैं, लेकिन समय के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा पार्ट्स भारत में ही बनाए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि इसके साथ-साथ भारत में ही एमआरओ फैसिलिटी विकसित की जाएगी। इस एमआरओ में सिविल और मिलिट्री दोनों तरह के एप्लीकेशन में रोटरी प्लेटफॉर्म की सर्विसिंग और मेंटेनेंस का काम कर सकेंगे। जिसका मतलब यह होगा कि हेलीकॉप्टरों की रिपेयर और ओवरहॉल के लिए अब उन्हें विदेश भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी और ऑपरेशनल रेडीनेस भी बेहतर बनी रहेगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

पैदा होंगी बंपर नौकरियां

इस हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम के बनने से हजारों हाई-स्किल नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर खुलेंगे। इसके अलावा, जब भारत में मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी, तो भविष्य में इन हेलीकॉप्टरों का निर्यात भी संभव हो सकेगा। इससे विदेशी मुद्रा आएगी और भारत की पहचान एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर मजबूत होगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

10 पॉइंट्स में समझिए Defence Budget 2026-27, क्यों कहा जा रहा है इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बजट

Defence Budget 2026-27 Explained

Defence Budget 2026-27: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पेश किए गए यूनियन बजट 2026-27 में रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये का ऐतिहासिक आवंटन मिला है। यह पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के मुकाबले करीब 15.19 फीसदी ज्यादा है। वहीं, रक्षा बजट केंद्र सरकार के खर्च का 14.67 फीसदी है और यह सभी मंत्रालयों में सबसे ज्यादा है। खास बात यह है कि इस बजट में सिर्फ खर्च बढ़ाने पर नहीं, बल्कि आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च और सैनिकों व पूर्व सैनिकों के कल्याण पर भी बड़ा जोर दिया गया है। आइए 10 पॉइंट्स में समझते हैं कि इस डिफेंस बजट में क्या खास है…

Defence Budget 2026-27 

1. अब तक का सबसे बड़ा रक्षा बजट: 7.85 लाख करोड़ रुपये

डिफेंस बजट 2026-27 में रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये दिए गए हैं। यह न सिर्फ पिछले साल से ज्यादा है, बल्कि सभी मंत्रालयों में सबसे बड़ा आवंटन भी है। यह बजट अनुमानित जीडीपी का करीब 2 फीसदी है और कुल केंद्रीय बजट का लगभग 14.7 प्रतिशत हिस्सा रक्षा के लिए रखा गया है। सरकार का साफ मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात, सीमा पर चुनौतियां और आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए यह बढ़ोतरी जरूरी थी। (Defence Budget 2026-27)

2. कैपिटल बजट में रिकॉर्ड उछाल: आधुनिकीकरण पर फोकस

इस बजट की सबसे बड़ी ताकत है कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी पूंजीगत खर्च। वित्त वर्ष 2026-27 में कैपिटल हेड के तहत 2.19 लाख करोड़ रुपये दिए गए हैं, जो पिछले साल के 1.80 लाख करोड़ रुपये से करीब 21.84 फीसदी ज्यादा हैं। इसका मतलब साफ है – अब पैसा सिर्फ सैलरी या मेंटेनेंस पर नहीं, बल्कि नए हथियार, प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी पर ज्यादा खर्च होगा। (Defence Budget 2026-27)

3. मॉडर्नाइजेशन बजट में 24% की छलांग

कैपिटल बजट के भीतर जो हिस्सा सीधे तौर पर मॉडर्नाइजेशन के लिए होता है, उसे कैपिटल एक्विजिशन बजट कहा जाता है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बजट करीब 1.48 लाख करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है। जो वित्त वर्ष 2025-26 के कैपिटल एक्विजिशन बजट से लगभग 24 फीसदी ज्यादा है। मौजूदा वैश्विक हालात में, आधुनिकीकरण बजट में इतनी बड़ी बढ़ोतरी एक रणनीतिक जरूरत है।

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, तीसरी तिमाही तक यानी दिसंबर 2025 तक, रक्षा मंत्रालय ने 2.10 लाख करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट पूरे किए हैं और अब तक 3.50 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के लिए ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ मंजूरी दी है। कैपिटल एक्विजिशन के तहत आने वाले प्रोजेक्ट्स से सेनाओं को अगली पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट, स्मार्ट और घातक हथियार, जहाज/पनडुब्बी, मानवरहित हवाई वाहन, ड्रोन, स्पेशलिस्ट वाहन आदि मिलेंगे। (Defence Budget 2026-27)

4. ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी तैयारी

ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस बजट में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के लिए भी पर्याप्त जगह बनाई गई है। चाहे गोला-बारूद हो, हथियार हों या जरूरी उपकरण, सरकार ने साफ कर दिया है कि सेनाओं की तैयारी में किसी तरह की कमी नहीं छोड़ी जाएगी। कैपिटल और रेवेन्यू, दोनों हेड्स में बढ़ा हुआ बजट इसी सोच को दिखाता है। (Defence Budget 2026-27)

5. आत्मनिर्भर भारत पर बड़ा दांव: 1.39 लाख करोड़ स्वदेशी उद्योगों के लिए

इस बजट का एक और मजबूत पहलू है आत्मनिर्भर भारत। कैपिटल एक्विजिशन बजट का 75 फीसदी, यानी करीब 1.39 लाख करोड़ रुपये, घरेलू उद्योगों से खरीद के लिए तय किया गया है। इसमें सरकारी डिफेंस कंपनियों के साथ-साथ प्राइवेट सेक्टर को भी बड़ी भूमिका मिलेगी। इससे न सिर्फ विदेशी निर्भरता घटेगी, बल्कि देश में रोजगार, स्टार्टअप्स और सप्लाई चेन को भी मजबूती मिलेगी। (Defence Budget 2026-27)

6. ऑपरेशनल रेडीनेस के लिए ज्यादा पैसा

डिफेंस बजट में रेवेन्यू एक्सपेंडिचर के तहत करीब 3.65 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस पैसे से सैनिकों की सैलरी, अलाउंस, ईंधन, राशन, स्पेयर पार्ट्स और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होंगी। सरकार ने यह भी साफ किया है कि बॉर्डर पर अतिरिक्त तैनाती, ज्यादा फ्लाइंग आवर्स और लंबे नेवल डिप्लॉयमेंट को ध्यान में रखकर यह आवंटन किया गया है। (Defence Budget 2026-27)

7. बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती

सीमाओं पर सड़क, सुरंग और पुल जितने मजबूत होंगे, उतनी ही मजबूत सेना होगी। इसी सोच के तहत बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) के लिए कैपिटल हेड में 7,394 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इससे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में टनल्स, ब्रिज और एयरफील्ड्स बनेंगे। साथ ही, इससे सीमावर्ती इलाकों में पर्यटन और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। (Defence Budget 2026-27)

8. पूर्व सैनिकों के लिए हेल्थकेयर पर खास ध्यान

सरकार ने साफ किया है कि देश की सेवा करने वाले सैनिकों और उनके परिवारों की जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है। इसीलिए एक्स-सर्विसमेन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) के लिए 12,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह पिछले साल की तुलना में करीब 45 फीसदी ज्यादा है। पिछले पांच सालों में ईसीएचएस का बजट तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका है, जो पूर्व सैनिकों के कल्याण को लेकर सरकार की गंभीरता दिखाता है। (Defence Budget 2026-27)

9. रिसर्च और डेवलपमेंट को नई ताकत

आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और इनोवेशन से जीता जाता है। इसीलिए डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) को इस साल 29,100 करोड़ रुपये मिले हैं। इसमें से करीब 17,250 करोड़ रुपये कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए हैं, जिससे नई मिसाइल्स, एडवांस्ड सिस्टम्स और डीप टेक्नोलॉजी पर काम तेज होगा। (Defence Budget 2026-27)

10. पेंशन और सुरक्षा-विकास-आत्मनिर्भरता का संतुलन

डिफेंस पेंशन के लिए इस बजट में 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह पैसा करीब 34 लाख पेंशनर्स को समय पर पेंशन देने के लिए इस्तेमाल होगा। रक्षा मंत्री ने साफ कहा है कि यह बजट सिक्योरिटी, डेवलपमेंट और सेल्फ-रिलायंस के बीच संतुलन बनाता है और देश के हित में है। (Defence Budget 2026-27)