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राजनाथ सिंह बोले- डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ असेंबलिंग नहीं, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा उत्पादन

राजनाथ सिंह ने दिल्ली में आयोजित तीसरे दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 की थीम के चार प्रमुख पहलुओं का भी जिक्र किया। इनमें रक्षा सुधार, आत्मनिर्भरता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रक्षा निर्यात शामिल हैं...

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📍नई दिल्ली | 3 Nov, 2026, 4:59 PM

India Defence Self Reliance: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मतलब केवल विदेशी उपकरणों को भारत में असेंबल करना नहीं है, बल्कि देश के पास अपनी तकनीक विकसित करने, रक्षा प्लेटफॉर्म की डिजाइन तैयार करने, उनका निर्माण करने और जरूरत के अनुसार अपग्रेड करने की क्षमता भी होनी चाहिए।

दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 में उन्होंने भारत के रक्षा क्षेत्र में हुए बदलावों, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, निजी कंपनियों की भागीदारी और रक्षा निर्यात को लेकर सरकार की प्राथमिकताएं बताईं। राजनाथ सिंह ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है, जबकि रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये रहा।

India Defence Self Reliance: रक्षा सुधार, आत्मनिर्भरता, सहयोग और निर्यात पर जोर

राजनाथ सिंह ने दिल्ली में आयोजित तीसरे दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 की थीम के चार प्रमुख पहलुओं का भी जिक्र किया। इनमें रक्षा सुधार, आत्मनिर्भरता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रक्षा निर्यात शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ये चारों विषय अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि भारत के रक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाने की एक ही प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं।

रक्षा मंत्री के मुताबिक, सुधार का मतलब व्यवस्था में बदलाव लाने की इच्छा है। आत्मनिर्भरता का अर्थ देश के भीतर अपनी क्षमताएं विकसित करना है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग दुनिया के साथ साझेदारी करने का भरोसा दिखाता है, जबकि निर्यात वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि केवल स्वदेशी उपकरण बनाने से रक्षा उद्योग की पूरी क्षमता हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पादों की बिक्री, दूसरे देशों के साथ तकनीकी सहयोग और बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता भी जरूरी है।

दुनिया में बदल रहा है युद्ध का तरीका

रक्षा मंत्री ने कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए हालिया संघर्षों ने युद्ध के बदलते स्वरूप को सामने रखा है। अब युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं है। इसमें अंतरिक्ष, साइबर स्पेस और डिजिटल क्षेत्र की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है।

उन्होंने बताया कि पारंपरिक और गैर-पारंपरिक युद्ध के बीच का अंतर भी कम होता जा रहा है। आधुनिक युद्ध में ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम जैसे अपेक्षाकृत कम कीमत वाले प्लेटफॉर्म महंगे और आधुनिक सैन्य उपकरणों के लिए चुनौती बन सकते हैं।

ऐसे में किसी देश की सैन्य ताकत केवल उसके पास मौजूद आधुनिक हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। नई तकनीक विकसित करने, कम समय में उसका उत्पादन करने और युद्ध के दौरान जरूरी उपकरणों की सप्लाई बनाए रखने की क्षमता भी महत्वपूर्ण है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि 21वीं सदी में सैन्य तैयारी को तकनीकी और औद्योगिक तैयारी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसके लिए देश के पास महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों को डिजाइन करने, उनका निर्माण करने और लंबे समय तक उनका रखरखाव करने की क्षमता होनी चाहिए। (India Defence Self Reliance)

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डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और निजी कंपनियों की भूमिका

रक्षा मंत्री ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में किए गए सुधारों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार ने देश में रक्षा निर्माण की क्षमता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की स्थापना भी शामिल है। इन कॉरिडोर का उद्देश्य देश में रक्षा उपकरणों और सैन्य प्लेटफॉर्म के निर्माण को बढ़ावा देना है।

उन्होंने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के पुनर्गठन का भी उल्लेख किया। पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के तहत काम करने वाली फैक्ट्रियों को सात अलग-अलग डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग यानी सरकारी रक्षा कंपनियों में बदला गया था। इस बदलाव का उद्देश्य रक्षा उत्पादन में काम करने वाली इकाइयों को अधिक स्वायत्तता, बेहतर कामकाज और प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना था।

राजनाथ सिंह ने कहा कि रक्षा निर्माण में निजी कंपनियों की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) कार्यक्रम, पनडुब्बी परियोजनाओं, आर्टिलरी एम्युनिशन और युद्धपोत निर्माण जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया।

इन परियोजनाओं में निजी कंपनियों के साथ माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज यानी एमएसएमई, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। (India Defence Self Reliance)

2025 को रक्षा मंत्रालय ने ईयर ऑफ रिफॉर्म्स के रूप में मनाया

राजनाथ सिंह ने बताया कि रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2025 को ईयर ऑफ रिफॉर्म्स के रूप में मनाया था। इस दौरान रक्षा क्षेत्र में जॉइंटनेस, इंटीग्रेशन, नई तकनीक, इनोवेशन और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

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इन सुधारों के तहत रक्षा नीतियों, संस्थागत ढांचे, तकनीक के विकास, रक्षा खरीद की प्रक्रियाओं और कारोबार करने की व्यवस्था में बदलाव किए गए।

रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में सुधारों का उद्देश्य केवल मौजूदा प्रक्रियाओं को बदलना नहीं होना चाहिए। इनका मकसद देश की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाना भी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी तकनीक को प्रयोगशाला से सैन्य इस्तेमाल तक पहुंचने में कई साल लग जाते हैं, तो उस समय तक वह तकनीक पुरानी हो सकती है।

उन्होंने रिसर्च, प्रयोग, तकनीकी विकास और सैन्य इस्तेमाल के बीच समय कम करने पर जोर दिया। (India Defence Self Reliance)

आत्मनिर्भरता का मतलब केवल भारत में असेंबलिंग नहीं

राजनाथ सिंह ने आत्मनिर्भरता को तकनीकी संप्रभुता यानी टेक्नोलॉजिकल सोवरेन्टी से जोड़कर समझाया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ विदेशी कंपनियों से दूरी बनाना या हर तरह के आयात पर रोक लगाना नहीं है। इसका असली उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश की जरूरी रक्षा क्षमताएं बाहरी निर्भरता के कारण प्रभावित न हों।

उन्होंने कहा कि किसी रक्षा प्लेटफॉर्म को भारत में असेंबल कर देना ही आत्मनिर्भरता नहीं है। वास्तविक आत्मनिर्भरता तब मानी जाएगी, जब भारत के पास उस प्लेटफॉर्म को डिजाइन करने, उसकी तकनीक विकसित करने, उसका निर्माण करने और जरूरत के अनुसार उसमें बदलाव करने की क्षमता हो।

इसके साथ ही रक्षा उपकरणों के पूरे लाइफ साइकल के दौरान उनका रखरखाव और अपग्रेड करने की तकनीक भी देश के पास होनी चाहिए। (India Defence Self Reliance)

डीआरडीओ के योगदान की सराहना

रक्षा मंत्री ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के योगदान की सराहना की। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद डीआरडीओ के पूर्व चेयरमैन डॉ. सतीश रेड्डी का भी उल्लेख किया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि तकनीकी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल एक संस्थान की नहीं हो सकती। इसके लिए डीआरडीओ, सरकारी रक्षा कंपनियों, निजी कंपनियों, स्टार्टअप, विश्वविद्यालयों और रिसर्च लैबोरेटरी को मिलकर काम करना होगा।

उन्होंने कहा कि रिसर्च और डेवलपमेंट को केवल मौजूदा सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को नई तकनीक पर प्रयोग करने और अलग-अलग विचारों पर काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

उनके मुताबिक, हर प्रयोग सफल नहीं होता, लेकिन हर प्रयोग से कुछ नया सीखने को मिलता है। सफल तकनीक को केवल प्रयोगशाला या प्रोटोटाइप तक सीमित रखने के बजाय उसका उत्पादन और सैन्य इस्तेमाल भी सुनिश्चित करना जरूरी है। (India Defence Self Reliance)

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विदेशी कंपनियों के साथ को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत का आत्मनिर्भरता अभियान दुनिया से अलग रहने की नीति नहीं है। तकनीकी रूप से सक्षम भारत दूसरे देशों के साथ अधिक प्रभावी तरीके से रक्षा सहयोग कर सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत की रक्षा साझेदारियां पहले मुख्य रूप से उपकरणों की खरीद, लाइसेंस के तहत निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर आधारित रही हैं। लेकिन अब रक्षा क्षेत्र में को-डेवलपमेंट, को-प्रोडक्शन और साझा इनोवेशन को अधिक महत्व देने की जरूरत है।

ऐसी साझेदारियों में भारतीय कंपनियों की डिजाइन और विकास प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी, महत्वपूर्ण तकनीक तक पहुंच और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के उचित बंटवारे को जरूरी बताया गया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, औद्योगिक आधार और वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों की मजबूत टीम है। इन क्षमताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय उद्योगों के साथ साझेदारी के अवसर मौजूद हैं। (India Defence Self Reliance)

2025-26 में रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये पहुंचा

रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2013-14 में लगभग 686 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों में पहुंच रहे हैं।

उन्होंने कहा कि रक्षा निर्यात केवल हथियारों और सैन्य उपकरणों की बिक्री तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें मेंटेनेंस, रिपेयर, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी कोऑपरेशन जैसी सेवाएं भी शामिल होनी चाहिए।

राजनाथ सिंह के अनुसार, रक्षा निर्यात में हुई बढ़ोतरी के पीछे नीतियों को आसान बनाने, प्रक्रियाओं को सरल करने और मानकीकरण जैसे कदमों की भूमिका रही है। इनसे भारतीय निर्माता कंपनियों, खासकर एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसरों का लाभ उठाने में मदद मिली है।

उन्होंने रक्षा उत्पादन को 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक और रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये से अधिक करने का लक्ष्य भी बताया। (India Defence Self Reliance)

Author

  • Harendra Chaudhary

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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