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हूतियों की पाकिस्तान को खुली धमकी! हूती हमलों ने खोली मक्का पैक्ट की पोल? तुर्किये क्यों आ गया निशाने पर?

सितंबर 2026 के दौरान हूतियों ने सऊदी अरब के कई इलाकों को निशाना बनाया है। रियाद, ताइफ, जिजान, नजरान, खामिस मुशैत, अभा और यनबू जैसे क्षेत्रों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं...

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📍नई दिल्ली/रियाद/सना | 21 Sep, 2026, 8:27 PM

Houthi Mecca Defence Pact: पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यमन के हूती आंदोलन (अंसार अल्लाह) ने पहली बार पाकिस्तान और तुर्किये को सीधे शब्दों में चेतावनी दी है। हूतियों का यह बयान ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़े हैं और इन धमकियों के बाद हाल ही में हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर भी सवाल उठने लगे हैं।

हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने 19 सितंबर को एक इराकी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि यदि पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब के साथ मिलकर यमन में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं तो उन्हें भी जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

अल-बुखैती ने कहा, “खुदा की कसम, अगर तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हुए तो हम उन पर लोहे की मुट्ठी से वार करेंगे। जैसे हम आज सऊदी अरब को सबक सिखा रहे हैं, वैसे ही उन्हें भी सबक सिखाएंगे।”

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी दोनों देशों की सरकारों के लिए थी, आम जनता के लिए नहीं। उनके अनुसार पाकिस्तान और तुर्किये की जनता यमन के लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है।

Houthi Mecca Defence Pact: मक्का रक्षा समझौते के बाद पहली बड़ी परीक्षा

हूती नेता का यह बयान सीधे तौर पर 7 अगस्त को हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से जुड़ा माना जा रहा है। इस समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दस्तखत किए थे।

समझौते का मुख्य प्रावधान यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसे सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था। समझौते का मूल विचार यह है कि यदि तीन देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे सभी पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से शुरुआत में तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने इसकी तुलना नाटो (NATO) के आर्टिकल-5 से की थी।

हालांकि समझौते के एक महीने से अधिक समय बाद भी सऊदी अरब पर हो रहे हमलों के बावजूद किसी जॉइंट मिलिट्री कार्रवाई की सार्वजनिक घोषणा नहीं हुई है। न कोई जॉइंट एयर पेट्रोलिंग दिखाई दी है और न ही किसी सामूहिक सैन्य प्रतिक्रिया की औपचारिक घोषणा हुई है। जिसके बाद अब इस समझौते पर अहमियत पर ही सवाल उठने लगे हैं।

सऊदी अरब पर बढ़े मिसाइल और ड्रोन हमले

सितंबर 2026 के दौरान हूतियों ने सऊदी अरब के कई इलाकों को निशाना बनाया है। रिपोर्टों के अनुसार रियाद, ताइफ, जिजान, नजरान, खामिस मुशैत, अभा और यनबू जैसे क्षेत्रों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं।

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19-20 सितंबर को रियाद की ओर दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल को सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम ने इंटरसेप्ट कर लिया। इसके बाद राजधानी के आसपास धुएं के गुबार देखे गए।

यनबू क्षेत्र में एनर्जी प्लांट और अरामको से जुड़ी फैसिलिटीज को भी निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। ताइफ में ड्रोन के मलबे से एक व्यक्ति की मौत और कई लोगों के घायल होने की रिपोर्ट आई। घायलों में एक पाकिस्तानी नागरिक के भी शामिल होने की बात कही गई।

सऊदी सिविल डिफेंस ने मक्का, जेद्दा, यनबू और अन्य शहरों में अलर्ट जारी किए। 14 और 15 सितंबर को रिकॉर्ड संख्या में चेतावनी संदेश जारी किए गए। (Houthi Mecca Defence Pact)

बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य पर बढ़ी टेंशन

तनाव की एक बड़ी वजह बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य भी है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार हूती बलों ने माय्यून, नॉर्थ हानिश और साउथ हानिश जैसे रणनीतिक द्वीपों पर नियंत्रण मजबूत किया है। इससे लाल सागर के समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ा है।

हूतियों ने सऊदी अरब से जुड़े जहाजों को निशाना बनाने और समुद्री यातायात बाधित करने की कोशिश की है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां और ऊर्जा बाजार स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए हैं।

तेल सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका

सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल है। यनबू बंदरगाह और पूर्व-पश्चिम क्रूड ऑयल पाइपलाइन देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

रिपोर्टों के अनुसार हूती ड्रोन हमलों के बाद लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के ऑपरेशन पर असर पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल को फारस की खाड़ी से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक पहुंचाती है।

यह मात्रा वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 4 से 5 प्रतिशत मानी जाती है। इसलिए क्षेत्र में बढ़ता तनाव ऊर्जा बाजारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

खाद्य आपूर्ति को लेकर भी चिंता

जिजान बंदरगाह सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्से में खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। यहां कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं, फूड टर्मिनल और बड़े पैमाने पर कार्गो हैंडलिंग सिस्टम मौजूद हैं। समुद्री मार्गों में व्यवधान से खाद्य आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। (Houthi Mecca Defence Pact)

पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई पर साधी चुप्पी

पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब के समर्थन की बात दोहराई है। इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) के अनुसार पाकिस्तान हरमैन शरीफैन और सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए हर संभव सहयोग देगा।

हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हो रही है। हालांकि पाकिस्तान को भी इस तरह के रक्षा समझौते के लिए संसदीय मंजूरी की जरूरत होगी।

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इस्लामाबाद ने संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है। पाकिस्तान ईरान के साथ भी संपर्क में है ताकि क्षेत्रीय तनाव कम किया जा सके।

संयुक्त राष्ट्र में भी पाकिस्तान ने समुद्री जहाजों पर हमलों की आलोचना की और बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य को सैन्य दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने का विरोध किया।

जुलाई 2026 में पाकिस्तान पहले ही चेतावनी दे चुका था कि यदि किसी पाकिस्तानी जहाज पर हमला हुआ तो उसे “रेड लाइन” माना जाएगा।

सऊदी अरब में पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार 2026 में हजारों पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में तैनात हैं।

कुछ रिपोर्टों में लगभग 8,000 सैनिकों की मौजूदगी, जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमानों की तैनाती, सैन्य ड्रोन स्क्वाड्रन और एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम की जानकारी दी गई है।

इन संसाधनों का ऑपरेशन पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों द्वारा किया जाता है जबकि वित्तीय खर्च का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब वहन करता है। (Houthi Mecca Defence Pact)

तुर्की अभी क्यों नहीं भेज सकता सैनिक?

तुर्की के संविधान का आर्टिकल-90 कहता है कि सुरक्षा और रक्षा से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संधियों को केवल राष्ट्रपति की मंजूरी से लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए तुर्की की संसद यानी ग्रैंड नेशनल असेंबली (TBMM) की मंजूरी जरूरी होती है।

सितंबर 2026 के मध्य तक तुर्की सरकार ने इस समझौते को संसद में पेश भी नहीं किया था। रिपोर्टों के अनुसार इसे अक्टूबर में संसद के सामने रखा जा सकता है। एक वरिष्ठ तुर्की अधिकारी ने बताया कि समझौते के रक्षा संबंधी दायित्व अभी “कानूनी रूप से प्रभावी नहीं” हैं।

यानी तुर्की अभी यह नहीं कह सकता कि समझौते के आधार पर उसकी सेना स्वतः किसी युद्ध में शामिल हो जाएगी।

तुर्की का रुख शुरू से यह रहा है कि वह सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतों में मदद करेगा, लेकिन सीधे क्षेत्रीय युद्ध का हिस्सा बनने से बचेगा। विदेश मंत्री हाकन फिदान ने कहा कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता पर गंभीर खतरे हैं और तुर्की मक्का पैक्ट के तहत उसकी सैन्य और तकनीकी जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है।

लेकिन उन्होंने कहीं भी यमन में सैनिक भेजने या आक्रामक सैन्य कार्रवाई की बात नहीं की। तुर्की का जोर मुख्य रूप से रक्षा और तकनीकी सहयोग पर है।

इसमें संयुक्त सैन्य योजना बनाना, प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना, खुफिया जानकारी साझा करना और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है।

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इसके अलावा तुर्की एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन टेक्नोलॉजी, निगरानी क्षमता और अन्य तकनीकी सहायता उपलब्ध करा सकता है। यानी कुल मिला कर तुर्किए का फोकस “डिफेंसिव सपोर्ट” पर है, “ऑफेंसिव ऑपरेशन” पर नहीं। (Houthi Mecca Defence Pact)

सीधे यमन में क्यों नहीं उतरना चाहता है तुर्की?

इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। पहला कारण ईरान है। तुर्की नहीं चाहता कि वह सीधे ऐसे संघर्ष में फंस जाए जिससे ईरान के साथ तनाव बढ़े।

दूसरा कारण यह है कि तुर्की हूती आंदोलन को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन नहीं मानता। इससे उसके पास बातचीत और कूटनीति का विकल्प खुला रहता है।

तीसरा कारण अफ्रीका और लाल सागर क्षेत्र में तुर्की के आर्थिक और सामरिक हित हैं। बड़े युद्ध में शामिल होने से उसकी सप्लाई लाइनों और क्षेत्रीय परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।

इसीलिए अंकारा की रणनीति सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक दबाव और प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने की है। (Houthi Mecca Defence Pact)

आईएमसीटीसी और समुद्री गठबंधन की भूमिका

सऊदी अरब के नेतृत्व में इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (आईएमसीटीसी) भी रीजनल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क्स का हिस्सा है। इसका नेतृत्व पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ कर रहे हैं।

यह गठबंधन मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।

इसके अलावा हाल ही में मल्टीनेशनल मेरिटाइम डिफेंस कोएलिशन (एमएमडीसी) भी बनाई गई है। इसका उद्देश्य लाल सागर, बाब-अल-मंदब और अदन की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

इस गठबंधन में पाकिस्तानी नौसेना अधिकारी कमोडोर राशिद शेख को डिप्टी कमांडर की जिम्मेदारी दी गई है। (Houthi Mecca Defence Pact)

क्षेत्र में लगातार बढ़ रही अनिश्चितता

इसी बीच पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के हंगू जिले में 20 सितंबर 2026 को सुरक्षा बलों के काफिले पर हमला हुआ। रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में एक लेफ्टिनेंट सहित आठ पाकिस्तानी सैन्यकर्मी मारे गए।

यह घटना ऐसे समय हुई है जब पाकिस्तान एक साथ आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों और पश्चिम एशिया में बढ़ते क्षेत्रीय तनाव दोनों का सामना कर रहा है। (Houthi Mecca Defence Pact)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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