📍नई दिल्ली | 3 Nov, 2026, 6:02 PM
Air Marshal Tejinder Singh: चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (सीआईएससी) एयर मार्शल तेजिंदर सिंह का कहना है कि दुनिया में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब कई ऐसे संघर्ष देखने को मिल रहे हैं, जिनके कुछ सप्ताह में खत्म होने की उम्मीद थी, लेकिन सालों तक चल रहे हैं। इन युद्धों में तोप के गोले इतनी तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं कि उनका उत्पादन उस रफ्तार से नहीं हो पा रहा है। वहीं, ड्रोन जैसे कम लागत वाले हथियारों का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर बढ़ा है।
दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत में बने और डिजाइन किए गए कई हथियारों तथा सैन्य प्रणालियों का सफल इस्तेमाल हुआ। इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब मिला है। उनके मुताबिक, भारत ने रक्षा उत्पादन में काफी प्रगति की है, लेकिन आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए तकनीक, निजी क्षेत्र की भागीदारी और उत्पादन क्षमता पर लगातार काम करना जरूरी है।
Air Marshal Tejinder Singh: लंबे युद्ध और ड्रोन ने बदल दी आधुनिक सैन्य रणनीति
दिल्ली में आयोजित तीसरे दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 में एयर मार्शल तेजिंदर सिंह ने कहा कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों में युद्ध की अवधि और हथियारों की खपत दोनों बढ़ रही हैं। पहले जिन युद्धों के कुछ सप्ताह में खत्म होने की उम्मीद की जाती थी, वे कई साल तक चल रहे हैं। ऐसे संघर्षों में तोप के गोले और दूसरे सैन्य उपकरण तेजी से खर्च हो रहे हैं।
उन्होंने ड्रोन को आधुनिक युद्ध की एक बड़ी बदलावकारी तकनीक बताया। एयर मार्शल के मुताबिक, अब ड्रोन का निर्माण और इस्तेमाल इतनी बड़ी संख्या में हो रहा है, जिसकी पहले कल्पना करना भी मुश्किल था। कम कीमत वाले ड्रोन कई बार महंगे मिलिट्री प्लेटफॉर्म और हथियार प्रणालियों के लिए चुनौती बन जाते हैं। ऐसे में केवल आधुनिक हथियार खरीदना काफी नहीं है। किसी देश के पास उन्हें बड़े पैमाने पर बनाने और जरूरत पड़ने पर उनकी सप्लाई बनाए रखने की क्षमता भी होनी चाहिए।
उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अभियान में भारत में निर्मित और भारतीय डिजाइन वाले कई डिफेंस सिस्टम्स का इस्तेमाल किया गया। इनमें पूरी तरह स्वदेशी प्रणालियों के साथ सहयोग के जरिए विकसित किए गए सिस्टम भी शामिल थे।
भारत में बन रहे कई मिलिट्री प्लेटफॉर्म
उन्होंने कहा कि भारत में कई बड़े मिलिट्री प्लेटफॉर्म और वेपन सिस्टम्स तैयार किए जा रहे हैं। इनमें विशाखापत्तनम क्लास के युद्धपोत, नीलगिरि क्लास के फ्रिगेट, विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत और पनडुब्बियां शामिल हैं। इसके अलावा भारत में आर्टिलरी गन, तेजस लड़ाकू विमान और मिसाइल प्रणालियों का भी निर्माण हो रहा है।
एयर मार्शल ने सी-295 विमान कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। यह भारत और विदेशी साझेदार के बीच सहयोग से चल रहा विमान निर्माण कार्यक्रम है। उनके मुताबिक, इस तरह की साझेदारियां भारत में आधुनिक तकनीक और निर्माण क्षमता विकसित करने में मदद करती हैं। (Air Marshal Tejinder Singh)
ब्रह्मोस और आकाश में दूसरे देशों की दिलचस्पी
एयर मार्शल तेजिंदर सिंह ने कहा कि ब्रह्मोस मिसाइल का फिलीपींस को निर्यात भारत की रक्षा क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने हाल ही में फिलीपींस की अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि वहां इस मिसाइल के अतिरिक्त ऑर्डर की मांग रखी गई है। इसके साथ ही फिलीपींस ने आकाश मिसाइल सिस्टम में भी दिलचस्पी दिखाई है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत के रक्षा निर्यात में सरकारी कंपनियों के बड़े कॉन्ट्रैक्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वहीं, निजी कंपनियों की ओर से बड़े पैमाने पर निर्यात शुरू होना इस क्षेत्र की मजबूती का एक अहम संकेत होगा। उन्होंने भारतीय निजी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की जरूरत बताई। (Air Marshal Tejinder Singh)
विदेशी कंपनियों पर निर्भरता जारी
एयर मार्शल ने कहा कि भारत ने रक्षा निर्माण में काफी प्रगति की है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण तकनीकों और उपकरणों के लिए अभी भी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है। लड़ाकू विमानों के इंजन इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने तेजस लड़ाकू विमान का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके निर्माण और उत्पादन से जुड़ी दूसरी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, लेकिन इंजन की सप्लाई एक महत्वपूर्ण निर्भरता बनी हुई है।
उन्होंने बताया कि किसी भी डिफेंस प्लेटफॉर्म को स्वदेशी मानने से पहले उसके अंदर इस्तेमाल होने वाले छोटे लेकिन महत्वपूर्ण उपकरणों पर भी ध्यान देना चाहिए। इनमें चिप, स्पेशल अलॉय, बैटरी और एक्चुएटर जैसे कंपोनेंट शामिल हैं। अगर इनकी सप्लाई विदेशी कंपनियों पर निर्भर है, तो संकट के समय पूरे स्वदेशी प्लेटफॉर्म का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
उनके मुताबिक, जरूरी उपकरणों के लिए एक से अधिक सप्लायर और मजबूत सप्लाई चेन तैयार करना महत्वपूर्ण है। इससे किसी एक देश या कंपनी पर निर्भरता कम की जा सकती है। (Air Marshal Tejinder Singh)
निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़े
एयर मार्शल तेजिंदर सिंह ने कहा कि आधुनिक सैन्य तकनीक तेजी से बदल रही है। कंप्यूटर, इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी, स्पेस बेस्ड कम्युनिकेशन और सेंसर अब लगभग सभी मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स का हिस्सा बन चुके हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल नागरिक क्षेत्र में भी बड़े स्तर पर हो रहा है और सेना इन्हें अपने सिस्टम में शामिल कर रही है।
उन्होंने कहा कि भारत को तकनीकी विकास की रफ्तार के साथ आगे बढ़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ानी होगी।
उन्होंने कहा कि डीआरडीओ को उन क्षेत्रों में रिसर्च और डेवलपमेंट पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जहां निजी क्षेत्र के लिए काम करना मुश्किल है। वहीं, जिन तकनीकों का विकास और उत्पादन निजी कंपनियां कर सकती हैं, उनमें उन्हें अधिक अवसर मिलने चाहिए। (Air Marshal Tejinder Singh)
स्वदेशी सिस्टम में डिजाइन और अपग्रेड का अधिकार जरूरी
एयर मार्शल ने आत्मनिर्भरता को केवल किसी उपकरण के भारत में निर्माण से जोड़कर नहीं देखा। उन्होंने कहा कि किसी सैन्य प्लेटफॉर्म की वास्तविक तकनीकी क्षमता का पता इस बात से चलता है कि भारत उसके डिजाइन में बदलाव कर सकता है या नहीं, उसमें नए हथियार जोड़ सकता है या नहीं और जरूरत के अनुसार उसे अपग्रेड कर सकता है या नहीं।
उन्होंने तेजस और भारत में निर्मित कुछ पुराने लड़ाकू विमानों जैसे जगुआर, और रूसी विमानों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय वायुसेना ने अपने कई विमानों को समय-समय पर अपग्रेड किया है। यह क्षमता डिजाइन से जुड़ी जानकारी और जरूरी अधिकार मिलने पर ही संभव होती है।
उन्होंने विदेशी प्लेटफॉर्म के मामले में भी इसी तरह के अधिकार सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उनके मुताबिक, भारत को ऐसे समझौते करने चाहिए, जिनसे भारतीय सेनाएं जरूरत के अनुसार अपने हथियार और तकनीक संबंधित प्लेटफॉर्म में जोड़ सकें। (Air Marshal Tejinder Singh)
2030 तक ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर जोर
एयर मार्शल ने बताया कि भारतीय सेनाओं ने 10 साल का इंटीग्रेटेड कैपेबिलिटी डेवलपमेंट प्लान तैयार किया है। यह योजना रक्षा मंत्रालय के विचार के लिए भेजी गई है। इसके अलावा मिशन सुदर्शन चक्र से जुड़ा रोडमैप भी तैयार किया गया है और उस पर विचार-विमर्श चल रहा है।
उन्होंने कहा कि साल 2030 तक की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और पारंपरिक मिसाइल क्षमता को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही सेनाओं के लिए ऐसे सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल हो। इनका उपयोग ट्रेनिंग, इंटेलिजेंस और सैन्य निर्णय लेने में सहायता के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने साल 2035 को कुछ लंबी अवधि की तकनीकों के विकास के लिए महत्वपूर्ण समय बताया। इनमें भारत में सहयोग के साथ एयरो इंजन और दूसरे महत्वपूर्ण रक्षा सिस्टम विकसित करना शामिल है। वहीं, वर्ष 2047 के लिए उन्होंने भारतीय रक्षा उद्योग और सेनाओं को स्वदेशी तकनीक पर अधिक निर्भर बनाने की जरूरत बताई। (Air Marshal Tejinder Singh)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।


