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DRDO के पूर्व चेयरमैन समीर वी कामत बोले- डिफेंस ट्रायल और खरीद में देरी बड़ी चुनौती, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ाना जरूरी

डॉ. कामत ने भारतीय डिफेंस सेक्टर की चुनौतियों पर बात करते हुए कहा कि रक्षा क्षेत्र में सरकार ही सबसे बड़ी और एकमात्र प्रमुख खरीदार है। अर्थव्यवस्था में ऐसी स्थिति को मोनोप्सनी कहा जाता है...

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📍नई दिल्ली | 4 Nov, 2026, 10:35 PM

Delhi Defence Dialogue 2026: डीआरडीओ के पूर्व चेयरमैन डॉ. समीर वी कामत का कहना है कि भारत को डिफेंस टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि भारत अभी अपनी जीडीपी का केवल 0.84 प्रतिशत रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च कर रहा है, जबकि प्रतिस्पर्धी देश अपनी जीडीपी का 2.5 से 3 प्रतिशत तक इस क्षेत्र में निवेश कर रहे हैं। डिफेंस बजट का भी केवल 5 प्रतिशत हिस्सा आर एंड डी पर खर्च होता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है।

मनोहर पर्रिकर आईडीएसए के तीसरे दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 में बोलते हुए उन्होंने डिफेंस सेक्टर और सिविल सेक्टर के बीच बेहतर तालमेल बनाने, प्राइवेट इंडस्ट्री और स्टार्टअप को रिसर्च में शामिल करने और सैन्य तकनीक से जुड़े ट्रायल और खरीद प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया।

Delhi Defence Dialogue 2026: डिफेंस और सिविल सेक्टर के बीच बेहतर तालमेल जरूरी

डॉ. समीर वी कामत ने कहा कि भारत में लंबे समय तक डिफेंस सेक्टर और सिविल सेक्टर को अलग-अलग रखा गया। लेकिन अब कई ऐसी टेक्नोलॉजी हैं, जिनका इस्तेमाल सैन्य और सामान्य नागरिक, दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है। इन्हें ड्यूल यूज टेक्नोलॉजी कहा जाता है।

उन्होंने टेलीकम्युनिकेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उदाहरण देते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में कई बार सिविल सेक्टर सैन्य क्षेत्र से आगे है। इसलिए दोनों के बीच ज्यादा सहयोग और तालमेल की जरूरत है।

डॉ. कामत के मुताबिक, अब कई राष्ट्रीय स्तर के सिविल मिशनों में डीआरडीओ और सेना की भागीदारी भी बढ़ रही है। इससे सैन्य जरूरतों के लिए नई टेक्नोलॉजी विकसित करने में मदद मिल सकती है। उनका कहना था कि देश में उपलब्ध तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल डिफेंस रिसर्च में भी किया जाना चाहिए।

मिलिट्री टेक्नोलॉजी के लिए युवाओं को तैयार करना जरूरी

डीआरडीओ के पूर्व चेयरमैन ने डिफेंस सेक्टर में कुशल ह्यूमन रिसोर्स तैयार करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि नई टेक्नोलॉजी के विकास के लिए सिर्फ आधुनिक लैब और मशीनें पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रशिक्षित वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की भी जरूरत है।

उन्होंने कहा कि देश के विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम में उभरती हुई टेक्नोलॉजी को शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही प्रोपेलेंट और एक्सप्लोसिव जैसे मिलिट्री सेक्टर से जुड़े विषयों को भी पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

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डॉ. कामत ने बताया कि डीआरडीओ इस दिशा में काम कर रहा है। संस्थान अकादमिक सेक्टर के पीएचडी छात्रों को अपनी लैब में रिसर्च करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसके अलावा बीटेक छात्रों को भी इंटर्नशिप दी जा रही है, ताकि वे डीआरडीओ की लैब में काम करके सैन्य तकनीक और रिसर्च की प्रक्रिया को समझ सकें।

आधुनिक युद्ध में साइबर, स्पेस और एआई की बढ़ेगी भूमिका

डॉ. कामत ने कहा कि युद्ध के क्षेत्र लगातार बदल रहे हैं। पहले मिलिट्री ऑपरेशन मुख्य रूप से जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब साइबर, स्पेस और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को भविष्य के नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के लिए तैयार करना होगा। इसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म, सेंसर और हथियार एक नेटवर्क के जरिए जुड़े होते हैं। इससे सैन्य कमांडरों को ऑपरेशन के दौरान बेहतर जानकारी और तेजी से फैसले लेने में मदद मिलती है। उन्होंने ऑटोनॉमस सिस्टम और प्रिसिजन वेपन की जरूरत पर भी बात की। (Delhi Defence Dialogue 2026)

सुदर्शन चक्र कार्यक्रम से एयर डिफेंस रिसर्च को बढ़ावा

डॉ. कामत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से घोषित सुदर्शन चक्र कार्यक्रम का भी जिक्र किया। उन्होंने इसे एक इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस प्रोग्राम बताया।

उनके मुताबिक, इस कार्यक्रम में अलग-अलग सेंसर को एक नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इससे आने वाले हवाई खतरों की जानकारी एक जगह उपलब्ध हो सकेगी। इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से यह तय करने में सहायता मिलेगी कि किसी खतरे को रोकने के लिए कौन-सा हथियार सबसे उपयुक्त होगा।

उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था में सेंसर, डेटा नेटवर्क और हथियारों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा। इससे देश में एयर डिफेंस से जुड़ी रिसर्च और नई तकनीक के विकास को बढ़ावा मिल सकता है। (Delhi Defence Dialogue 2026)

डिफेंस ट्रायल और खरीद प्रक्रिया में देरी बड़ी चुनौती

डॉ. कामत ने भारतीय डिफेंस सेक्टर की चुनौतियों पर बात करते हुए कहा कि रक्षा क्षेत्र में सरकार ही सबसे बड़ी और एकमात्र प्रमुख खरीदार है। अर्थव्यवस्था में ऐसी स्थिति को मोनोप्सनी कहा जाता है, जहां किसी उत्पाद या सेवा का एक ही खरीदार होता है।

उन्होंने कहा कि भारत में हथियारों और सैन्य उपकरणों के ट्रायल तथा खरीद की प्रक्रिया में काफी समय लगता है। किसी नई तकनीक को विकसित करने के बाद उसका परीक्षण, मूल्यांकन और सेना में शामिल करने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

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उन्होंने कहा कि डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर में बदलाव करके इन प्रक्रियाओं को तेज करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी और सुधार की जरूरत है।

डॉ. कामत ने सैन्य उपकरणों के परीक्षण में सिमुलेशन और मॉडलिंग का इस्तेमाल बढ़ाने की बात भी कही। (Delhi Defence Dialogue 2026)

डीआरडीओ में रिसर्च के दौरान असफलता को भी स्वीकार करना होगा

डॉ. कामत ने कहा कि भारत में रिसर्च और नई तकनीक विकसित करने के दौरान असफलता को लेकर सोच बदलने की जरूरत है। उनके मुताबिक, देश में किसी प्रोजेक्ट के असफल होने पर सवाल उठाए जाते हैं, जबकि नई तकनीक विकसित करने में जोखिम लेना जरूरी होता है।

उन्होंने अमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (DARPA) का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि DARPA के प्रोजेक्ट्स की सफलता दर करीब 15 फीसदी है। इसके बावजूद वहां रिसर्च और प्रयोग जारी रहते हैं।

डॉ. कामत ने कहा कि अगर डीआरडीओ की सफलता दर 15 प्रतिशत हो, तो भारत में उस पर कड़े सवाल उठाए जाएंगे। यहां तक कि 70 से 80 प्रतिशत सफलता के बावजूद संसदीय लोक लेखा समिति (PAC) में सवालों का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि अत्याधुनिक रिसर्च में हर प्रयोग का सफल होना जरूरी नहीं है। असफलता से मिली जानकारी का इस्तेमाल अगली तकनीक को बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जरूरी है कि असफलता से जल्दी सीखकर आगे बढ़ा जाए। (Delhi Defence Dialogue 2026)

रिसर्च-डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ाने की जरूरत

डॉ. कामत ने भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर होने वाले खर्च को भी एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी जीडीपी का लगभग 0.84 प्रतिशत हिस्सा रिसर्च-डेवलपमेंट पर खर्च करता है। वहीं प्रतिस्पर्धी देश अपनी जीडीपी का 2.5 से 3 प्रतिशत तक रिसर्च पर निवेश कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि डिफेंस बजट का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा रिसर्च-डेवलपमेंट के लिए खर्च किया जाता है। इस निवेश को काफी बढ़ाने की जरूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि रिसर्च के लिए मिलने वाला पैसा केवल डीआरडीओ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्राइवेट कंपनियों, डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (पीएसयू) और दूसरे संस्थानों को भी रिसर्च के लिए फंडिंग मिलनी चाहिए। इससे देश में नई तकनीक विकसित करने वाला बड़ा इकोसिस्टम तैयार हो सकेगा। (Delhi Defence Dialogue 2026)

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ब्रह्मोस और एमआर-सैम को बताया को-डेवलपमेंट का उदाहरण

डॉ. कामत ने डिफेंस टेक्नोलॉजी के विकास में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और को-डेवलपमेंट को उपयोगी मॉडल बताया। उन्होंने ब्रह्मोस और एमआर-सैम मिसाइल प्रोग्राम का उदाहरण दिया।

ब्रह्मोस मिसाइल को डीआरडीओ और रूस की एनपीओएम (NPOM) के सहयोग से विकसित किया गया है। वहीं एमआर-सैम (MR-SAM) मिसाइल प्रोग्राम में डीआरडीओ और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने मिलकर काम किया है।

उन्होंने कहा कि इन दोनों प्रोग्राम से पता चलता है कि को-डेवलपमेंट के जरिए मुश्किल मिलिट्री टेक्नोलॉजी विकसित करने की प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। उन्होंने फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए गैस टर्बाइन इंजन के विकास में भी इस मॉडल को अपनाने की बात कही। इससे तकनीकी जोखिम कम करने और विकास प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। (Delhi Defence Dialogue 2026)

डिफेंस कॉरिडोर में डीआरडीओ की टेस्ट सुविधाएं

डॉ. कामत ने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए गए डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि डीआरडीओ इन कॉरिडोर में टेस्टिंग और कंसल्टेंसी से जुड़ी सुविधाएं विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।

उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर में ऐसी सुविधा स्थापित की जा चुकी है। वहीं तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में भी इसी तरह की सुविधा स्थापित करने को लेकर बातचीत चल रही है।

इन टेस्ट सेंटर का इस्तेमाल छोटी कंपनियां, स्टार्टअप और माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) कर सकेंगे। उन्हें अपने प्रोडक्ट और टेक्नोलॉजी के परीक्षण के साथ विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेने का मौका मिलेगा।

डॉ. कामत ने कहा कि डिफेंस सेक्टर में छोटे उद्योगों को टेस्टिंग और मेंटरशिप की सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे सैन्य जरूरतों के अनुसार नए उपकरण और तकनीक विकसित करने में भागीदारी कर सकें। (Delhi Defence Dialogue 2026)

Author

  • Harendra Chaudhary

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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