📍नई दिल्ली | 21 Oct, 2026, 3:35 PM
घIndigenous 20mm Gun: भारतीय सेनाओं के अटैक हेलीकॉप्टर एलसीएच प्रचंड और एएलएच रुद्र के लिए अब स्वदेशी 20 एमएम एविएशन गन और टर्रेट सिस्टम डेवलप किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए डीआरडीओ की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) ने भारतीय कंपनियों एसएसएस डिफेंस और कल्याणी ग्रुप को चुना है। इस सिस्टम का उद्देश्य हेलीकॉप्टरों में इस्तेमाल होने वाली विदेशी गन तकनीक पर निर्भरता कम करना और भारत में ही हथियार विकसित करने की क्षमता बढ़ाना है।
दोनों कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर गन और टर्रेट सिस्टम के डिजाइन, विकास और उत्पादन पर काम करेंगी। ऐसा पहली बार होगा जब भारत में एविएशन के लिए मीडियम कैलिबर गन विकसित की जा रही है।
Indigenous 20mm Gun: प्रचंड और रुद्र के लिए क्यों जरूरी है नई गन?
अटैक हेलीकॉप्टर दुश्मन के ठिकानों, बख्तरबंद वाहनों और जमीन पर मौजूद अन्य सैन्य लक्ष्यों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए उनमें गन, रॉकेट और मिसाइल जैसे हथियार लगाए जाते हैं।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का एएलएच एमके-IV, जिसे रुद्र के नाम से जाना जाता है, ध्रुव हेलीकॉप्टर का हथियारों से लैस वर्जन है। इसमें 20 एमएम टर्रेट गन के अलावा 70 एमएम रॉकेट पॉड और मिसाइल जैसे हथियार इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
वहीं, लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (एलसीएच) प्रचंड को खास तौर पर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य ऑपरेशन के लिए विकसित किया गया है। यह ऊंचाई वाले इलाकों में भी ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसके हथियारों में 20 एमएम टर्रेट गन, 70 एमएम रॉकेट और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल शामिल हैं।
20 एमएम गन हेलीकॉप्टर को कम दूरी पर मौजूद जमीन के टारगेट्स के खिलाफ फायर करने की क्षमता देती है। इसका इस्तेमाल सैनिकों को जमीनी कार्रवाई के दौरान फायर सपोर्ट देने के लिए भी किया जा सकता है।
फ्रांस की गन तकनीक की जगह लेगा स्वदेशी सिस्टम?
अभी प्रचंड और रुद्र में इस्तेमाल होने वाला 20 एमएम टर्रेट गन सिस्टम फ्रांसीसी मूल की तकनीक पर आधारित है। मौजूदा टीएचएल20 टर्रेट सिस्टम में फ्रांस की 20एम621 कैनन का इस्तेमाल होता है। इस सिस्टम का निर्माण यूरोपीय डिफेंस कंपनी केएनडीएस करती है।
यह गन 20×102 एमएम कैलिबर के गोला-बारूद का इस्तेमाल करती है। गन को टर्रेट में फिट किया जाता है, जिससे हेलीकॉप्टर के अंदर बैठे क्रू को हथियार की दिशा नियंत्रित करने और लक्ष्यों पर फायर करने की सुविधा मिलती है। यह हेलीकॉप्टर के टारगेटिंग सिस्टम के साथ भी काम करती है।
सितंबर 2026 में केएनडीएस ने भारत के एलसीएच प्रोग्राम के लिए 126 टीएचएल20 टर्रेट का ऑर्डर मिलने की जानकारी दी थी। हालांकि, इस घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इन टर्रेट का कितना उत्पादन भारत में होगा। (Indigenous 20mm Gun)
एसएसएस डिफेंस और कल्याणी ग्रुप की क्या होगी भूमिका?
इस प्रोजेक्ट के लिए एसएसएस डिफेंस और कल्याणी ग्रुप को डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर यानी डीसीपीपी के तौर पर चुना गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एआरडीई और एचएएल के बीच पिछले साल इस प्रोजेक्ट पर सहयोग के लिए समझौता हुआ था। इसके बाद कंपनियों से प्रस्ताव मांगे गए और चयन प्रक्रिया पूरी की गई।
एसएसएस डिफेंस के सीईओ विवेक कृष्णन के मुताबिक कंपनी टेंडर प्रक्रिया में एल-1 बोलीदाता के रूप में सामने आई है। कंपनी डीआरडीओ की एआरडीई के साथ मिलकर पूरे गन और टर्रेट सिस्टम के डिजाइन तथा उत्पादन पर काम करेगी।
डेवलपमेंट के बाद मिलने वाले ऑर्डर को दोनों कंपनियों के बीच लागत के आधार पर बांटा जाएगा। एल-1 कंपनी को 60 प्रतिशत और दूसरी कंपनी को 40 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। (Indigenous 20mm Gun)
दो साल में डेवलपमेंट
इस प्रोजेक्ट के डेवलपमेंट फेज में लगभग दो साल लगने का अनुमान है। इसमें गन का डिजाइन तैयार करना, प्रोटोटाइप बनाना, परीक्षण करना और हेलीकॉप्टर के सिस्टम के साथ उसका इंटीग्रेशन शामिल होगा।
एसएसएस डिफेंस के सीईओ विवेक कृष्णन के अनुसार, एविएशन गन सिस्टम के लिए दो साल का लक्ष्य काफी चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एआरडीई और निजी उद्योग के बीच सहयोग से इस समयसीमा को हासिल करने का प्रयास किया जाएगा।
गन को हेलीकॉप्टर में इस्तेमाल करने से पहले केवल जमीन पर फायरिंग का परीक्षण होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि गन हेलीकॉप्टर के फायर कंट्रोल सिस्टम के साथ सही तरीके से काम करती है या नहीं। इसके अलावा फायरिंग के दौरान पैदा होने वाले कंपन, दबाव और अन्य प्रभावों का विमान की संरचना तथा इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर भी जांचना पड़ता है।
इसके बाद सिस्टम को उड़ान के दौरान सुरक्षित इस्तेमाल के लिए जरूरी परीक्षण और एयरवर्दीनेस सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया से गुजरना होता है। (Indigenous 20mm Gun)
हेलमेट-माउंटेड साइट से भी जुड़ सकता है सिस्टम
नई गन और टर्रेट सिस्टम को हेलीकॉप्टर के मौजूदा वेपन-कंट्रोल सिस्टम के साथ जोड़ने की योजना है। इससे पायलट या क्रू को लक्ष्य पर निशाना लगाने में मदद मिलती है। सिस्टम को हेलमेट-माउंटेड साइट के साथ काम करने के लिए भी तैयार किया जाना है।
हेलमेट-माउंटेड साइट ऐसी तकनीक है, जिसमें पायलट के हेलमेट पर लगे डिस्प्ले या सेंसर के जरिए लक्ष्य की दिशा से जुड़ी जानकारी मिल सकती है। इससे क्रू को लक्ष्य की तरफ गन घुमाने और निशाना लगाने में सुविधा होती है। हालांकि, नए स्वदेशी सिस्टम की पूरी तकनीकी विशेषताएं अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं। (Indigenous 20mm Gun)
20 एमएम गोला-बारूद की तकनीक भी अहम
गन के साथ इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी सिस्टम की क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से जनवरी 2025 में जारी एक टेक्निकल डॉक्युमेंट में एएलएच-डब्ल्यूएसआई और एलसीएच के लिए 20 एमएम गन एम्युनिशन से जुड़ी जरूरतें बताई गईं थीं।
इस दस्तावेज में गोला-बारूद की शुरुआती गति कम से कम 975 मीटर प्रति सेकंड रखने की जरूरत बताई गई थी। इसमें बॉल, ट्रेसर और आर्मर-पियर्सिंग इन्सेंडियरी जैसे अलग-अलग प्रकार के राउंड का उल्लेख था। दस्तावेज में यह भी पूछा गया था कि गोला-बारूद भारतीय परिस्थितियों में माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 55 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में स्थिर रह सकता है या नहीं।
इसके अलावा कारतूस की सुरक्षा, स्टोरेज पीरियड, पानी से बचाव, प्राइमर की गुणवत्ता और फायरिंग के दौरान हेलीकॉप्टर के स्ट्रक्चर पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे पहलुओं पर भी जानकारी मांगी गई थी। (Indigenous 20mm Gun)
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