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दुनिया के 60 देशों में बारूदी सुरंगों का खतरा, भारतीय पूर्व सैनिकों ने हटाए 1.80 लाख विस्फोटक; 5 नवंबर को दिल्ली में होगी चर्चा

होराइजन सेफ पावर फाउंडेशन ने दुनिया के अलग-अलग देशों में करीब 1.80 लाख बारूदी सुरंगों को हटाया है। श्रीलंका, कंबोडिया और दूसरे देशों में मानवीय माइन क्लीयरेंस के जरिए लोगों को सुरक्षित जमीन उपलब्ध कराने में जुटा है संगठन...

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📍नई दिल्ली | 4 Nov, 2026, 8:58 PM

Mine Action: दुनिया के कई देशों में युद्ध और सैन्य संघर्ष खत्म होने के बाद भी आम लोगों के लिए खतरा बना रहता है। युद्ध के दौरान बिछाई गई बारूदी सुरंगें और दूसरे विस्फोटक उपकरण सालों तक लोगों की जान के लिए खतरा बने रहते हैं। ऐसे इलाकों में खेती करना, घर बनाना और सामान्य जीवन शुरू करना मुश्किल हो जाता है। भारत का एक पूर्व सैनिकों का संगठन इस चुनौती से निपटने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योगदान दे रहा है। होराइजन सेफ पावर फाउंडेशन (Horizon Safe Power Foundation) दुनिया के अलग-अलग देशों में मानवीय माइन क्लीयरेंस का काम कर रहा है।

संगठन के अनुसार, अब तक वह दुनिया के विभिन्न देशों में 40 करोड़ वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र को बारूदी सुरंगों और विस्फोटक उपकरणों से मुक्त कराकर सुरक्षित घोषित कर चुका है। इस दौरान करीब 1.80 लाख विस्फोटक विस्फोटकों को हटाया गया है। संगठन का कहना है कि इस काम से युद्ध प्रभावित इलाकों में लोगों को दोबारा खेती करने, घर बनाने, स्कूल और उद्योग शुरू करने का अवसर मिला है।

Mine Action: संयुक्त राष्ट्र मिशन से शुरू हुआ विचार

IIFOMAS के संस्थापक और डायरेक्ट जनरल एवं होराइजन सेफ पावर फाउंडेशन के सह-संस्थापक और चेयरमैन कर्नल (रि.) नवनीत मित्तल ने बताया कि इस संगठन को बनाने का विचार उन्हें 1998-99 में आया। उस समय वह लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) के साथ चीफ ह्यूमैनिटेरियन ऑफिसर के रूप में तैनात थे। इसी दौरान आयरलैंड की एक गैर-सरकारी संस्था के प्रतिनिधि उनसे मिलने आए। उन्होंने इजरायल के कब्जे वाले क्षेत्र में बारूदी सुरंगों को हटाने के काम में रुचि दिखाई।

इस बातचीत के बाद कर्नल मित्तल के मन में विचार आया कि भारत में भी ऐसा संगठन होना चाहिए, जो दुनिया के युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में बारूदी सुरंगें हटाने और लोगों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने का काम करे। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के पास इस क्षेत्र में लंबे समय का अनुभव है। बड़ी संख्या में प्रशिक्षित पूर्व सैनिक भी उपलब्ध हैं, जिनके अनुभव का इस्तेमाल मानवीय कार्यों में किया जा सकता है।

इसी विचार के साथ 2001-02 में कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों ने मिलकर संगठन की शुरुआत की। मेजर जनरल एसजी पित्रे इसके पहले चेयरमैन बने। साल 2003 में भारत सरकार और श्रीलंका की ओर से माइन क्लीयरेंस के काम के लिए जरूरत सामने आई। इसी दौरान संगठन ने काम को आगे बढ़ाने के लिए प्राइवेट लिमिटेड कंपनी भी बनाई, ताकि अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से जुड़े अनुबंध और अन्य व्यावसायिक जरूरतें पूरी की जा सकें।

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बता दें कि आईआईएफओएमएएस (IIFOMAS) भारत का एक स्वतंत्र थिंक टैंक है, जो दुनिया भर में बारूदी सुरंगों और युद्ध के बाद बच गए विस्फोटक हथियारों को हटाने के काम पर शोध और नीति बनाने में मदद करता है। इसकी स्थापना हॉराइजन सेफर वर्ल्ड फाउंडेशन ने की है।

यह संगठन सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, सशस्त्र बलों, रक्षा उद्योग और शिक्षण संस्थानों को एक मंच पर लाने का काम करता है। इसका उद्देश्य बारूदी सुरंगों और दूसरे विस्फोटक खतरों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत, रिसर्च और नीतिगत सहयोग को बढ़ावा देना है। साथ ही, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में भारत की मजबूत पहचान बनाना चाहता है।

बारूदी सुरंगों को हटाना क्यों है जरूरी?

युद्ध खत्म होने के बाद भी बारूदी सुरंगें और दूसरे विस्फोटक हथियार आम लोगों के लिए खतरा बने रहते हैं। इनमें बारूदी सुरंगों के अलावा युद्ध के दौरान बच गए विस्फोटक (ईआरडब्ल्यू), इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) और बिना फटे बम व गोले (यूएक्सओ) शामिल हैं।

ये विस्फोटक लंबे समय तक जमीन में दबे रह सकते हैं। इनकी वजह से आम लोगों की जान जा सकती है या वे गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं। ऐसे खतरों के कारण राहत और बचाव का काम प्रभावित होता है। प्रभावित इलाकों में सड़क, घर, खेती और दूसरी विकास परियोजनाओं का निर्माण भी मुश्किल हो जाता है। विस्थापित लोगों के लिए अपने घर लौटना भी सुरक्षित नहीं रहता।

आईआईएफओएमएएस की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के करीब 60 देश और क्षेत्र अब भी बारूदी सुरंगों और विस्फोटक हथियारों से प्रभावित हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, बारूदी सुरंगों और विस्फोटक घटनाओं के करीब 90 प्रतिशत पीड़ित आम नागरिक होते हैं। इनमें लगभग आधे पीड़ित बच्चे हैं।

लैंडमाइन मॉनिटर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में बारूदी सुरंगों और विस्फोटक हथियारों से जुड़ी घटनाओं में 6,279 लोग हताहत हुए। यह पिछले चार सालों में दर्ज किया गया सबसे बड़ा आंकड़ा था। (Mine Action)

श्रीलंका में काम से मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

संगठन ने श्रीलंका में बारूदी सुरंगें हटाने का महत्वपूर्ण काम किया है। कर्नल मित्तल ने बताया कि भारत सरकार की ओर से 2009 में सीधे फंडिंग मिलने के बाद वहां चार साल तक माइन क्लीयरेंस का काम किया गया।

उन्होंने श्रीलंका में अपने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि करीब दस साल बाद जब वह दोबारा उस इलाके में पहुंचे, जहां संगठन ने बारूदी सुरंगें हटाई थीं, तो वहां खेती होती दिखाई दी। कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया कि पहले यह इलाका खतरनाक था, लेकिन अब वहां घर बन चुके हैं और लोग सामान्य जीवन जी रहे हैं।

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उनके अनुसार, मानवीय माइन क्लीयरेंस का सबसे बड़ा उद्देश्य युद्ध प्रभावित लोगों को सुरक्षित जीवन उपलब्ध कराना है। संगठन के मुताबिक, 2012 से होराइजन भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माइन क्लीयरेंस का काम करने वाला एकमात्र संगठन है। (Mine Action)

65 संघर्षों ने बढ़ाई मानवीय माइन क्लीयरेंस की जरूरत

कर्नल मित्तल ने स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के शोध का हवाला देते हुए कहा कि साल 2025 में दुनिया में 65 ऐसे सशस्त्र संघर्ष दर्ज किए गए, जिनमें कम से कम एक पक्ष किसी देश की सरकार था। उनके अनुसार, 1946 के बाद यह सबसे बड़ी संख्या है।

उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संघर्ष जैसे उदाहरण बताते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी आम लोगों को लंबे समय तक खतरे का सामना करना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों और विस्फोटक उपकरणों को हटाना जरूरी होता है।

उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का भी उदाहरण दिया, जहां समुद्री बारूदी सुरंगों की आशंका के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की बात सामने आई। इसका असर कच्चे तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर भी पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के संकट केवल संबंधित देश तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था और व्यापार को भी प्रभावित करते हैं। (Mine Action)

महाराष्ट्र पुलिस और भारतीय सेना को भी दी ट्रेनिंग

होराइजन ने भारत में भी बम निरोधक और काउंटर-आईईडी ट्रेनिंग से जुड़े काम किए हैं। कर्नल मित्तल के मुताबिक, मुंबई में आतंकी हमले के बाद संगठन ने महाराष्ट्र पुलिस की बम निरोधक इकाइयों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाए थे। संगठन ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को भी सुरक्षा के लिहाज से सैनिटाइज किया था।

इसके अलावा भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स की उन टीमों को भी प्रशिक्षण दिया गया, जो कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में सहायता के लिए जाती हैं। वर्ष 2011 में पुणे में सीआरपीएफ के काउंटर-आईईडी ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना में भी संगठन ने योगदान दिया।

कर्नल मित्तल ने स्पष्ट किया कि युद्ध के दौरान की जाने वाली कॉम्बैट क्लीयरेंस और शांति के समय होने वाली ह्यूमैनिटेरियन माइन क्लीयरेंस अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मानवीय माइन क्लीयरेंस में संयुक्त राष्ट्र के इंटरनेशनल माइन एक्शन स्टैंडर्ड्स (IMAS) और संबंधित देश के नियमों का पालन करना होता है। (Mine Action)

भारत ने 30 से अधिक देशों में दी माइन क्लीयरेंस ट्रेनिंग

IIFOMAS बोर्ड के चयरमैन मेजर जनरल (रि.) अजय सेठ ने बताया कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत 30 से अधिक देशों में माइन क्लीयरेंस प्रशिक्षण दिया है। वियतनाम, लाओस और कंबोडिया जैसे देश इनमें शामिल हैं। भारत ने कंबोडिया और सेनेगल को माइन एक्शन के लिए 12.4 लाख डॉलर की मदद भी दी है।

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भारत की ओर से माइन प्रभावित लोगों की सहायता में जयपुर फुट का भी योगदान रहा है। 1975 से जयपुर फुट के माध्यम से बारूदी सुरंगों से प्रभावित दस लाख से अधिक लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए गए हैं। (Mine Action)

5 नवंबर को नई दिल्ली में IIFOMAS का तीसरा वार्षिक सम्मेलन

बारूदी सुरंगों और युद्ध के बाद बचे विस्फोटकों से पैदा होने वाले खतरों पर चर्चा के लिए भारत में तीसरा वार्षिक आईआईएफओएमएएस सिम्पोजियम आयोजित किया जाएगा। यह कार्यक्रम 5 नवंबर को नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में होगा। इस साल सम्मेलन की थीम ‘माइन एक्शन: ग्लोबल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड इंडियाज पर्सपेक्टिव’ रखी गई है।

इसमें इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (आईसीडब्ल्यूए) और सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (क्लॉज) भी सहयोग कर रहे हैं। एक दिवसीय सम्मेलन में इस बात पर चर्चा होगी कि भारत मानवीय सहायता, तकनीकी विशेषज्ञता, नई तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के जरिए दुनिया में बारूदी सुरंगों को हटाने के अभियान में किस तरह योगदान दे सकता है।

माइन बैन ट्रीटी पर भारत के हस्ताक्षर नहीं

भारत 1997 की माइन बैन ट्रीटी का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। इसकी वजह देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरतें हैं। हालांकि, भारत ने अमेन्डेड प्रोटोकॉल-2 और अमेन्डेड प्रोटोकॉल-5 को स्वीकार किया है।

अमेन्डेड प्रोटोकॉल-2 के तहत बारूदी सुरंगों में इतनी मेटल होना जरूरी है कि उन्हें मेटल डिटेक्टर से पहचाना जा सके। इसके लिए कम से कम 25 ग्राम धातु की आवश्यकता का मानक रखा गया है। (Mine Action)

Author

  • Harendra Chaudhary

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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