📍नई दिल्ली | 3 Nov, 2026, 7:27 PM
Indian Navy Self Reliance 2047: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा है कि 2047 तक भारतीय नौसेना को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि नौसेना को ऐसी स्थिति में पहुंचाना है, जहां वह अपने प्लेटफॉर्म और हथियारों का निर्माण करने के साथ उनकी मरम्मत, मेंटेनेंस, अपग्रेड और ऑपरेशन भी बिना किसी बाहरी निर्भरता के कर सके।
दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026 में बोलते हुए एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा कि आत्मनिर्भरता भारतीय नौसेना के लिए केवल एक विचार नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी सैन्य प्लेटफॉर्म की क्षमता तभी पूरी मानी जा सकती है, जब उसके जरूरी कंपोनेंट और सप्लाई चेन भी देश के नियंत्रण में हों। उन्होंने रक्षा उद्योग, स्टार्टअप, एमएसएमई, वैज्ञानिकों और शिक्षण संस्थानों से नौसेना की जरूरतों के मुताबिक तकनीक विकसित करने में भागीदारी बढ़ाने की अपील की।
Indian Navy Self Reliance 2047: 1960 में बना भारत में पहला स्वदेशी युद्धपोत
एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन के मुताबिक, भारतीय नौसेना ने आत्मनिर्भरता की दिशा में करीब छह दशक पहले काम शुरू किया था। साल 1960 में भारत में पहला स्वदेशी युद्धपोत बनाने के बाद से लगातार स्वदेशी डिजाइन और निर्माण की क्षमता बढ़ाने पर काम किया गया है। साल 1964 में नौसेना का डिजाइन ऑफिस स्थापित किया गया था, जो आगे चलकर डायरेक्टरेट ऑफ नेवल डिजाइन बना। इसी व्यवस्था के तहत भारतीय नौसेना ने अपने कई आधुनिक युद्धपोतों और दूसरे प्लेटफॉर्म का डिजाइन तैयार किया।
उन्होंने बताया कि भारतीय शिपयार्ड अब तक अलग-अलग क्लास के 100 से अधिक युद्धपोतों का डिजाइन और निर्माण कर चुके हैं। और इस समय भी भारत के शिपयार्ड में 42 युद्धपोत निर्माणाधीन हैं। इनमें आधुनिक युद्धपोत, डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और कॉर्वेट्स शामिल हैं।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जो अपने डिजाइन के आधार पर आधुनिक डिस्ट्रॉयर, एयरक्राफ्ट कैरियर और दूसरे बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म का निर्माण कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि युद्धपोतों के निर्माण में मिली सफलता के बावजूद कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट और टेक्नोलॉजी के लिए विदेशी सप्लाई पर निर्भरता बनी हुई है।
आधुनिक युद्ध में हथियारों से ज्यादा जरूरी है उत्पादन क्षमता
एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है और सैन्य ताकत का इस्तेमाल कई देशों की विदेश नीति का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। उनके मुताबिक, साल 2025 में दुनिया भर में करीब 65 स्टेट बेस्ड आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट दर्ज किए गए। यह 1946 से आंकड़े दर्ज किए जाने के बाद सबसे अधिक संख्या बताई गई।
उन्होंने कहा कि अब युद्ध में केवल आधुनिक हथियारों होने काफी नहीं हैं। किसी देश के पास उन हथियारों को बड़ी संख्या में बनाने, इस्तेमाल के बाद उनकी जगह नए हथियार उपलब्ध कराने और लगातार सप्लाई बनाए रखने की क्षमता भी होनी चाहिए।
दूसरे विश्व युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अमेरिका ने 1941 से 1945 के बीच अपने शिपयार्ड में 2,710 जहाज बनाए थे। साल 1941 में एक जहाज बनाने में औसतन 230 दिन लगते थे, जबकि 1943 तक यह समय घटकर करीब 42 दिन रह गया था। इससे पता चलता है कि युद्ध के दौरान बड़े स्तर पर उत्पादन करने वाली इंडस्ट्रियल क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। (Indian Navy Self Reliance 2047)
🇮🇳⚓ Malacca Strait: Indian Navy Keeps Close Watch on Maritime Traffic
Navy Chief Admiral Krishna Swaminathan said the Indian Navy closely monitors every ship entering the Indian Ocean Region, maintaining a comprehensive maritime picture of vessel movements, origins, destinations and cargo.
He described India as a “funnel state” for the Malacca Strait, stressing its strategic importance and the role of the Andaman and Nicobar Islands in India’s maritime security.
#IndianNavy #MalaccaStrait #AndamanAndNicobar #MaritimeSecurity #IndianOcean #AdmiralKrishnaSwaminathan #DefenceNews #RakshaSamachar @IDSAIndia @indiannavy— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) November 3, 2026
लाल सागर में हूथी हमलों ने दिखाई आधुनिक समुद्री युद्ध की चुनौती
एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों की ओर से कमर्शियल जहाजों पर किए गए हमलों का उदाहरण देते हुए बताया कि आधुनिक युद्ध में अब छोटे समूह भी कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइल जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके बड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हूथी हमलों में ड्रोन और मिसाइलों सहित अलग-अलग तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें कुछ बेहद आधुनिक तकनीक से लैस सिस्टम भी शामिल हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज तकनीक तक पहुंच पहले के मुकाबले काफी आसान हो गई है। इसे टेक्नोलॉजी का डेमोक्रेटाइजेशन कहा जाता है। इसका मतलब है कि ऐसी तकनीक, जो पहले केवल बड़ी सैन्य ताकतों या विकसित देशों के पास होती थी, अब गैर-सरकारी समूहों और छोटे संगठनों तक भी पहुंच रही है। इसका इस्तेमाल अच्छे उद्देश्यों के साथ-साथ सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले समूह भी कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में किसी खतरे का पता लगाने, निर्णय लेने और जवाबी कार्रवाई करने के लिए मिलने वाला समय लगातार कम हो रहा है। चिप, सैटेलाइट सर्विलांस और दूसरी आधुनिक तकनीकों ने युद्ध को पहले से ज्यादा तेज और जटिल बना दिया है। ऐसे माहौल में नौसेना को अपनी तकनीक और ऑपरेशनल क्षमता को लगातार अपग्रेड करना जरूरी है। (Indian Navy Self Reliance 2047)
बताईं आत्मनिर्भरता की पांच प्राथमिकताएं
नौसेना प्रमुख ने भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताएं बताईं। पहली प्राथमिकता उन तकनीकी कमियों की पहचान करना है, जिनकी वजह से नौसेना को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह समीक्षा केवल बड़े प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सिस्टम, सब-सिस्टम और छोटे कंपोनेंट के स्तर पर भी कमियों का पता लगाना जरूरी है।
दूसरी प्राथमिकता नई और महत्वपूर्ण तकनीकों में निवेश बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि भारत अपने जीडीपी का करीब 0.84 फीसदी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन करीब 2.7 प्रतिशत और अमेरिका लगभग 3.5 प्रतिशत खर्च करता है। उनके मुताबिक, भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स और दूसरी उभरती तकनीकों में निवेश बढ़ाने के साथ अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी भी विकसित करनी होगी।
तीसरी प्राथमिकता इंडस्ट्रियल क्षमता बढ़ाना है। नौसेना को ऐसी उत्पादन व्यवस्था चाहिए, जो जरूरत पड़ने पर तेजी से उत्पादन बढ़ा सके। युद्ध के दौरान हथियारों और गोला-बारूद की खपत बढ़ने पर उनकी सप्लाई बाधित नहीं होनी चाहिए।
चौथी प्राथमिकता रिसर्च और इनोवेशन को जल्द से जल्द वास्तविक सैन्य क्षमता में बदलना है। इसके लिए नौसेना, इंडस्ट्री, वैज्ञानिक समुदाय और अकादमिक संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
पांचवीं प्राथमिकता विदेशी देशों के साथ टेक्नोलॉजी सहयोग बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं है। भारत को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के जरिए तकनीक हासिल करनी चाहिए, लेकिन ऐसे सहयोग में भारतीय कंपनियों और संस्थानों की भूमिका भी मजबूत होनी चाहिए। भारत के पास संबंधित सिस्टम की मैन्युफैक्चरिंग, मेंटेनेंस, मॉडिफिकेशन और अपग्रेड करने के अधिकार होने चाहिए। (Indian Navy Self Reliance 2047)
स्वावलंबन कार्यक्रम से स्टार्टअप और इंडस्ट्री को जोड़ रही नौसेना
नौसेना प्रमुख ने स्वदेशी तकनीक विकसित करने में इंडस्ट्री और स्टार्टअप की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना ने 2005 में इंडिजेनाइजेशन की दिशा में विशेष व्यवस्था शुरू की थी। इसके तहत नौसेना के अलग-अलग कमांड में इंडिजेनाइजेशन यूनिट बनाई गईं, जो उद्योगों, वैज्ञानिकों और शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर विदेशी कंपोनेंट के स्वदेशी विकल्प तलाशती हैं।
इसके अलावा नेवल इनोवेशन एंड इंडिजेनाइजेशन ऑर्गनाइजेशन (एनआईआईओ) नौसेना के इनोवेशन और स्वदेशीकरण से जुड़े कामों का प्रमुख केंद्र है। नौसेना ने नई और विशेष तकनीकों की पहचान के लिए दो स्पेशल टास्क फोर्स भी बनाई हैं।
उन्होंने कहा कि नौसेना उद्योगों के साथ अपनी ऑपरेशनल जरूरतें साझा करना चाहती है, ताकि कंपनियां वास्तविक सैन्य समस्याओं को समझकर उनके समाधान विकसित कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी कंपोनेंट पर निर्भरता कम करने के लिए चिप, स्पेशल अलॉय, बैटरी और दूसरे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण उपकरणों पर भी काम करना जरूरी है। (Indian Navy Self Reliance 2047)
भारत में बने सिस्टम को अपग्रेड करने की क्षमता भी जरूरी
एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा कि आत्मनिर्भरता का असली मतलब केवल किसी प्लेटफॉर्म को भारत में बनाना नहीं है। भारत के पास उसे अपनी जरूरत के अनुसार बदलने, अपग्रेड करने और मेंटेन करने की क्षमता भी होनी चाहिए। विदेशी तकनीक के साथ सहयोग करते समय जरूरी टेक्नोलॉजी और डिजाइन से जुड़े अधिकार हासिल करना महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना 2047 तक ऐसी फोर्स बनना चाहती है, जिसके पास अपने ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार काम करने की क्षमता हो और जिसकी सप्लाई चेन किसी बाहरी बाधा से प्रभावित न हो। इसके लिए स्वदेशी डिजाइन, घरेलू इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, मजबूत उत्पादन क्षमता और अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग को साथ लेकर चलने की जरूरत है। (Indian Navy Self Reliance 2047)
🇮🇳 Navy Chief Sets 2047 Goal: A Fully Self-Reliant Indian Navy!
Chief of the Naval Staff Admiral Krishna Swaminathan outlined the Indian Navy’s roadmap towards Aatmanirbharta at the Delhi Defence Dialogue 2026, organised by MP-IDSA.
He highlighted five key priorities: identifying critical capability gaps, investing in advanced technologies and indigenous intellectual property, building scalable industrial capacity, accelerating the transition from innovation to operational deployment, and strengthening international partnerships.
The Navy aims to achieve complete self-reliance by 2047, ensuring it can design, build, sustain, upgrade and operate its capabilities without critical external dependencies.
Admiral Swaminathan also stressed the importance of AI, quantum technologies, robotics, resilient supply chains and closer collaboration between the Navy, industry, academia and the scientific community.
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मलक्का स्ट्रेट और अंडमान-निकोबार पर भारतीय नौसेना की खास नजर
नेवी चीफ ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री रणनीति और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की भूमिका पर कहा कि भारतीय नौसेना अपनी सैन्य क्षमता का विकास क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, सुरक्षा चुनौतियों और संभावित खतरों को ध्यान में रखकर करती है। भारत के लिए हिंद महासागर प्राथमिक समुद्री क्षेत्र है और नौसेना इसी क्षेत्र में अपनी निगरानी तथा ऑपरेशनल मौजूदगी को मजबूत बनाए रखती है।
उन्होंने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बताया। ये द्वीप मलक्का स्ट्रेट के करीब स्थित हैं। मलक्का स्ट्रेट हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां से बड़ी संख्या में व्यापारिक जहाज और ऊर्जा से जुड़े मालवाहक जहाज गुजरते हैं। इस वजह से इस क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों का सीधा असर भारत की समुद्री सुरक्षा पर भी पड़ता है।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत भले ही मलक्का स्ट्रेट से जुड़ा तटीय देश नहीं है, लेकिन उसे एक ‘फनल स्टेट’ कहा जा सकता है। और मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाला समुद्री ट्रैफिक भारत के समुद्री सुरक्षा हितों को प्रभावित करता है। इसलिए भारतीय नौसेना इस क्षेत्र पर लगातार नजर रखती है।
उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना अंडमान-निकोबार के अलावा लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप जैसे रणनीतिक स्थानों पर भी अपनी मौजूदगी और सुविधाओं को विकसित करने पर काम कर रही है। इन क्षेत्रों का इस्तेमाल समुद्री निगरानी, ऑपरेशनल गतिविधियों और हिंद महासागर में नौसेना की पहुंच को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। (Indian Navy Self Reliance 2047)
हिंद महासागर में हर जहाज की गतिविधि पर नजर
नेवी चीफ ने भारतीय नौसेना की मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस यानी समुद्री क्षेत्र की निगरानी क्षमता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में आने वाले जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखती है। इसमें जहाज कहां से आया है, कब पहुंचा है, कहां जा रहा है और उसके कार्गो में क्या सामान है, जैसी जानकारियां शामिल होती हैं।
नौसेना जहाजों के पिछले पोर्ट ऑफ कॉल, अगले गंतव्य और उनकी गतिविधियों का भी विश्लेषण करती है। इसके लिए ट्रेंड एनालिसिस और पैटर्न एनालिसिस जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इससे हिंद महासागर में मौजूद व्यापारिक जहाजों, मित्र देशों के नौसैनिक प्लेटफॉर्म और संभावित विरोधी गतिविधियों की जानकारी रखने में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी वाले समुद्री क्षेत्र की एक स्पष्ट मैरीटाइम पिक्चर बनाए रखती है। जरूरत के अनुसार समुद्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई जाती है और दूसरे देशों के साथ साझेदारी भी की जाती है, ताकि समुद्री सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का मिलकर सामना किया जा सके। (Indian Navy Self Reliance 2047)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।


