📍नई दिल्ली | 8 Oct, 2026, 12:26 PM
Naval Shipborne Unmanned Aerial System: भारतीय नौसेना जल्द ही अपने युद्धपोतों की “आंख और कान” माने जाने वाले नए समुद्री ड्रोन तैनात करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम (NSUAS) कार्यक्रम के तहत ऐसे एडवांस मानव रहित हवाई प्लेटफॉर्म खरीदे जाएंगे। रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) से मंजूरी मिलने के बाद नौसेना ने 1 अक्टूबर को इंडस्ट्री के लिए सूचना जारी कर एक्विजिशन प्रोसेस को आगे बढ़ा दिया है। जिसे 31 जनवरी 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती समुद्री गतिविधियों, व्यापारिक जहाजों पर हमलों, समुद्री डकैती, आतंकवाद और चीन-पाकिस्तान की नौसेनाओं की मौजूदगी के बीच लगातार निगरानी की जरूरत बढ़ रही है।
Naval Shipborne Unmanned Aerial System: युद्धपोतों से होंगे ऑपरेट
नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम ऐसे मानव रहित हवाई प्लेटफॉर्म हैं जो सीधे युद्धपोतों से ऑपरेट किए जा सकते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशन को अंजाम देना है। ये समुद्र में दुश्मन की गतिविधियों, संदिग्ध जहाजों और आसपास के समुद्री क्षेत्र पर लगातार नजर रख सकते हैं। जहाज से उड़ान भरने के बाद ये ड्रोन कई घंटों तक हवा में रहकर वीडियो, तस्वीरें और सेंसर डेटा सीधे युद्धपोत के कमांड सेंटर तक भेज सकते हैं।
भारतीय नौसेना के अनुसार इन सिस्टम्स का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण अभियानों में किया जाएगा। इनमें लो इंटेंसिटी मेरीटाइम ऑपरेशंस यानी कम तीव्रता वाले समुद्री अभियान शामिल हैं। इसके अलावा बैटल डैमेज असेसमेंट यानी किसी सैन्य कार्रवाई के बाद हुए नुकसान का आकलन करने में भी ये उपयोगी होंगे।
सर्च एंड रेस्क्यू मिशनों में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। समुद्र में किसी जहाज, नाव या व्यक्ति के संकट में फंसने की स्थिति में ये बड़े इलाके को तेजी से स्कैन कर सकते हैं। इसके अलावा समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी इनका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
क्यों जरूरी हैं शिपबोर्न ड्रोन?
अब तक नौसेना समुद्री निगरानी के लिए मुख्य रूप से जहाजों के रडार और हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रही है। लेकिन हेलीकॉप्टरों की अपनी सीमाएं हैं। इनका फ्लाइट ड्यूरेशन सीमित होता है और ऑपरेशन महंगा होता है। जबकि शिपबोर्न ड्रोन कम लागत में लंबे समय तक उड़ सकते हैं। वे दिन और रात दोनों समय काम कर सकते हैं और काफी दूर तक निगरानी कर सकते हैं। इससे कमांडरों को किसी भी संभावित खतरे की जानकारी पहले मिल जाती है और प्रतिक्रिया देने के लिए अतिरिक्त समय प्राप्त होता है। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
आधुनिक सेंसरों से लैस होंगे सिस्टम
एनएसयूएएस में लगे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर दिन में हाई क्वॉलिटी तस्वीरें उपलब्ध कराएंगे, जबकि इन्फ्रारेड सेंसर रात में भी लक्ष्य की पहचान करने में सक्षम होंगे। अगर रडार और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सिस्टम जोड़े जाते हैं, तो ये ड्रोन दुश्मन के रडार एमिशंस, संचार सिग्नल्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों का पता लगाने में भी मदद कर सकते हैं। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमता को मिलेगी ताकत
भारतीय नौसेना तेजी से नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की दिशा में आगे बढ़ रही है। जिमें विभिन्न प्लेटफॉर्म्स से मिली जानकारी को इंटीग्रेट करके एक शेयर्ड ऑपरेशनल तस्वीर तैयार की जाए। एनएसयूएएस से मिलने वाला डेटा सीधे युद्धपोतों के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा जा सकता है। इससे कमांडरों को रीयल टाइम में अधिक व्यापक जानकारी मिलेगी। हिंद महासागर क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी के लिए यह क्षमता बेहद उपयोगी मानी जा रही है। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
2022 से चल रही थी तैयारी
इस प्रोजेक्ट की शुरुआत वास्तव में 2022 में जारी किए गए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) से हुई थी।
उस समय नौसेना ने 100 मीटर से अधिक लंबाई वाले युद्धपोतों के लिए लगभग 40 सिस्टम की जरूरत जताई थी। प्रत्येक सिस्टम में दो एयर व्हीकल, एक मुख्य कंट्रोल स्टेशन और एक स्टैंडबाय कंट्रोल स्टेशन शामिल करने की योजना थी।
नौसेना ने इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर के अलावा रडार, कम्युनिकेशन रिले, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस जैसी क्षमताओं पर भी विचार किया था। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
जुलाई 2026 में मिली थी डीएसी की मंजूरी
रक्षा अधिग्रहण परिषद ने जुलाई 2026 में लगभग 52,000 करोड़ रुपये के पूंजीगत रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी थी। इन्हीं प्रस्तावों में नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम की खरीद भी शामिल थी।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन सिस्टम्स में आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे, जो नौसेना की सिचुएशनल अवेयरनेस यानी आसपास की गतिविधियों की समझ को काफी बेहतर बनाएंगे। एओएन रक्षा खरीद प्रक्रिया का पहला आधिकारिक चरण होता है। इसके बाद आरएफपी जारी किया जाता है, जिसके आधार पर कंपनियां अपनी बोलियां जमा करती हैं। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
‘बाय इंडियन’ कैटेगरी में होगी खरीद
यह खरीद पूरी तरह “बाय (इंडियन)” श्रेणी के तहत की जाएगी। जिसके तहत प्रोजेक्ट में भारतीय उद्योग की भागीदारी को प्राथमिकता दी जाएगी। नौसेना ने न्यूनतम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी है। इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि सामग्री, घटकों और सॉफ्टवेयर का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा भारत में निर्मित हो।
इस नीति का उद्देश्य केवल उपकरण खरीदना नहीं है, बल्कि देश के भीतर डिजाइन, सॉफ्टवेयर विकास, सिस्टम इंटीग्रेशन और विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना भी है।
समुद्री वातावरण में ऑपरेशन सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि इस कार्यक्रम के सामने कई तकनीकी चुनौतियां भी हैं। समुद्र में तेज हवाएं, ऊंची लहरें, नमी और नमक युक्त वातावरण किसी भी ड्रोन सिस्टम के लिए कठिन परिस्थितियां पैदा करते हैं। जहाज लगातार चलते रहते हैं, इसलिए ड्रोन को सुरक्षित रूप से टेक-ऑफ और लैंडिंग करने में सक्षम होना होगा। इसके अलावा डेटा लिंक सिक्योरिटी, साइबर सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में कम्युनिकेशन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा। (Naval Shipborne Unmanned Aerial System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





