📍कानपुर | 28 Sep, 2026, 8:19 PM
G-11 Heavy Drop Platform: सीमावर्ती क्षेत्रों, ऊंचे पर्वतीय इलाकों और युद्धक्षेत्रों में भारी सैन्य सामग्री की रैपिड सप्लाई के लिए ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड (जीआईएल) ने स्वदेशी जी-11 हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट से भारतीय वायुसेना की स्ट्रेटेजिक एयरड्रॉप क्षमता को और मजबूती मिलेगी।
इस अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म से सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III जैसे ट्रांसपोर्ट विमानों से करीब 19 टन तक के भारी सैन्य उपकरण, वाहन, इंजीनियरिंग स्टोर, गोला-बारूद और लॉजिस्टिक सामग्री को पैराशूट के जरिए दुर्गम इलाकों में सुरक्षित उतारा जा सकेगा। कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री ने इस प्रोजेक्ट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है।
G-11 Heavy Drop Platform: सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का प्रमुख हिस्सा
जी-11 प्लेटफॉर्म एक विशेष सैन्य एयरड्रॉप सिस्टम का मुख्य स्ट्रक्चरल हिस्सा है। इसे डीआरडीओ की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) की बनाई तकनीक के आधार पर तैयार किया जा रहा है।
जब किसी सैन्य अभियान, आपदा राहत मिशन या दुर्गम क्षेत्र में भारी सामान पहुंचाने की जरूरत होती है, तब इस प्लेटफॉर्म पर मिलिट्री इक्विपमेंट को सुरक्षित तरीके से बांधा जाता है। इसके बाद प्लेटफॉर्म को ट्रांसपोर्ट विमान में लोड किया जाता है और निर्धारित स्थान पर पैराशूट के जरिए नीचे उतारा जाता है।
इस प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को विमान से बाहर निकालने, हवा में स्थिर रखने और जमीन पर सुरक्षित लैंडिंग तक पूरे भार को संभालना पड़ता है। यही वजह है कि इसकी डिजाइन और स्ट्रक्चरल मजबूती बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
19,050 किलोग्राम तक भार ले जाने की क्षमता
जीआईएल का कहना है कि जी-11 सिस्टम का ऑल-अप मास (एयूएम) अधिकतम 19,050 किलोग्राम तक होगा। इसका मतलब है कि लगभग 19 टन तक का सैन्य सामान एक बार में एयरड्रॉप किया जा सकेगा।
इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना के दो प्रमुख सामरिक परिवहन विमानों सी-130जे सुपर हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर-III के साथ जोड़ा जाएगा।
प्लेटफॉर्म छह अलग-अलग लंबाई में उपलब्ध रहेगा। इनमें 12 फुट, 16 फुट, 20 फुट, 24 फुट, 28 फुट और 32 फुट के विकल्प शामिल हैं। अलग-अलग आकार के सैन्य उपकरण और वाहनों के अनुसार उपयुक्त प्लेटफॉर्म चुना जा सकेगा। (G-11 Heavy Drop Platform)
पैराशूट सिस्टम की भी खास भूमिका
हेवी ड्रॉप मिशन में केवल प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि पैराशूट सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। जी-11 सिस्टम में 100 फुट व्यास वाले मुख्य पैराशूट का इस्तेमाल किया जाएगा। जरूरत के अनुसार एक से लेकर आठ कैनोपी तक का क्लस्टर इस्तेमाल किया जा सकता है।
विमान से प्लेटफॉर्म को बाहर निकालने के लिए एक्सट्रैक्टर पैराशूट लगाए जाएंगे। इनके आकार 15 फुट, 22 फुट और 28 फुट व्यास के होंगे।
एयरड्रॉप के दौरान विमान की गति 140 से 145 नॉट इंडिकेटेड एयर स्पीड (आईएएस) रखी जाएगी। इस स्पीड पर प्लेटफॉर्म को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालकर सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित की जाती है। (G-11 Heavy Drop Platform)
कैसे काम करता है हेवी ड्रॉप सिस्टम?
लो-वेलोसिटी एयरड्रॉप तकनीक में सबसे पहले एक्सट्रैक्टर पैराशूट खुलता है। यह पैराशूट विमान के कार्गो कम्पार्टमेंट से पूरे प्लेटफॉर्म को बाहर खींचता है।
जैसे ही प्लेटफॉर्म विमान से अलग होता है, मुख्य पैराशूट खुल जाते हैं। इसके बाद हैवी लोड नियंत्रित गति से जमीन की ओर उतरता है।
इस पूरी प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को कई प्रकार के लोड और झटकों का सामना करना पड़ता है। इसलिए उसकी डिजाइन में स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ, बैलेंसिंग, शॉक एब्जॉर्प्शन और लोड डिस्ट्रिब्यूशन का विशेष ध्यान रखा जाता है। (G-11 Heavy Drop Platform)
भारतीय वायुसेना के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
भारतीय वायुसेना के सी-130जे और सी-17 विमान देश की स्ट्रेटेजिक एयरलिफ्ट क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं।
सी-130जे का इस्तेमाल छोटे रनवे, पहाड़ी इलाकों और अग्रिम मोर्चों तक सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया जाता है। वहीं सी-17 लंबी दूरी तक भारी सैन्य उपकरण और वाहन ले जाने में सक्षम है।
ऐसे क्षेत्रों में जहां सड़क संपर्क नहीं होता या आपात स्थिति में रैपिड सप्लाई की जरूरत होती है, वहां एयरड्रॉप सिस्टम बेहद उपयोगी साबित होता है। इसी वजह से स्वदेशी हेवी ड्रॉप प्लेटफॉर्म का विकास रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (G-11 Heavy Drop Platform)
डीआरडीओ पहले भी कर चुका है सफल परीक्षण
डीआरडीओ की एडीआरडीई प्रयोगशाला पहले ही हेवी ड्रॉप सिस्टम के कई परीक्षण कर चुकी है। दिसंबर 2023 में सी-17 ग्लोबमास्टर विमान से लगभग 16 टन वजन वाले 24 फुट लंबे प्लेटफॉर्म का सफल एयरड्रॉप परीक्षण किया गया था।
इन परीक्षणों में सिस्टम की स्ट्रक्चरल मजबूती, पैराशूट प्रदर्शन और सुरक्षित लैंडिंग क्षमता का मूल्यांकन किया गया था। क्वालिफिकेशन प्रक्रिया में सिमिलैक द्वारा निर्धारित मानकों की भी जांच की गई थी।
कानपुर स्थित ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री के पास देश में पैराशूट निर्माण का लंबा अनुभव है। साल 1941 से यह फैक्ट्री विभिन्न प्रकार के सैन्य पैराशूट तैयार करती रही है।
2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेट पुनर्गठन के बाद यह ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड का हिस्सा बनी। कंपनी वर्तमान में पायलट पैराशूट, ब्रेक पैराशूट, सप्लाई ड्रॉप सिस्टम, कॉम्बैट पैराशूट और हेवी ड्रॉप पैराशूट का निर्माण करती है।
हाल के सालों में कंपनी ने डीआरडीओ के साथ मिलकर पी-7 हेवी ड्रॉप सिस्टम, एडीसी-150 एयरड्रॉपेबल कंटेनर और मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम जैसी प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया है। (G-11 Heavy Drop Platform)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





