📍बीजिंग | 28 Sep, 2026, 5:52 PM
China Anti-Drone System: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष और हाल के कई सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़े सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए चीन की कंपनी कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप ने एक नया 70 मिमी मिसाइल आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम पेश किया है।
यह सिस्टम सितंबर 2026 में बीजिंग में आयोजित चाइना इंटरनेशनल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स एग्जीबिशन (सीआईडीईएक्स-2026) में प्रदर्शित किया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की जगह कम लागत वाले 70 मिमी (2.75 इंच) रॉकेट का इस्तेमाल करके ड्रोन और ड्रोन स्वार्म को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
China Anti-Drone System: डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस पर आधारित है पूरा सिस्टम
कांगशुओ इलेक्ट्रिक ग्रुप का यह सिस्टम पूरी तरह मोबाइल है। इसे चीन के डोंगफेंग मेंगशी 6×6 हाई-मोबिलिटी ऑफ-रोड चेसिस पर तैयार किया गया है।
सिस्टम में चार अलग-अलग व्हीकल शामिल हैं। इनमें कमांड व्हीकल, लॉन्च व्हीकल, एम्युनिशन सप्लाई व्हीकल और सपोर्ट व्हीकल शामिल हैं।
कमांड व्हीकल पूरे सिस्टम का कंट्रोल सेंटर है। लॉन्च व्हीकल रॉकेट दागने का काम करता है। सप्लाई व्हीकल अतिरिक्त मिसाइल और रॉकेट लेकर चलता है, जबकि सपोर्ट व्हीकल तकनीकी मदद और मेंटेनेंस के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
कंपनी के मुताबिक यह सिस्टम काफी हद तक ऑटोमेटेड है और जरूरत पड़ने पर सीमित मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकता है। (China Anti-Drone System)
40 किलोमीटर दूर से खोज सकता है टारगेट
इस सिस्टम की सबसे महत्वपूर्ण खूबियों में इसका रडार नेटवर्क शामिल है। कमांड व्हीकल पर लगाया गया सर्च रडार लगभग 40 किलोमीटर तक टारगेट का पता लगाने का दावा करता है। इसका इस्तेमाल शुरुआती चेतावनी और टारगेट की पहचान के लिए किया जाता है।
इसके अलावा लॉन्च व्हीकल पर भी एक अलग फेज्ड एरे रडार लगाया गया है, जिसकी डिटेक्शन रेंज लगभग 20 किलोमीटर बताई गई है। यह रडार टारगेट को ट्रैक करता है और आखिरी चरण में रॉकेट को टारगेट की ओर गाइड करने में मदद करता है।
दो अलग-अलग रडार का इस्तेमाल सिस्टम को एक क्लोज्ड लूप एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बनाता है। जिससे टारगेट की पहचान से लेकर हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया एक ही नेटवर्क के भीतर पूरी की जा सकती है।
लॉन्चर में 30 रॉकेट तक ले जाने की क्षमता
एंटी-ड्रोन सिस्टम का लॉन्च व्हीकल एक बार में लगभग 24 से 30 रॉकेट ले जा सकता है। कंपनी का दावा है कि सिस्टम एक साथ कई टारगेटों के खिलाफ काम कर सकता है।
वहीं, इसकी अधिकतम कॉम्बैट रेंज लगभग 6 किलोमीटर है। वहीं अधिकतम कॉम्बैट ऊंचाई 4.5 किलोमीटर है।
यह ऊंचाई और दूरी छोटे तथा मध्यम आकार के अधिकांश मिलिट्री ड्रोन, सर्विलांस यूएवी और लॉइटरिंग म्यूनिशन को निशाना बनाने के लिए काफी मानी जाती है। (China Anti-Drone System)

दो तरह के 70 मिमी रॉकेट
इस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले 70 मिमी रॉकेट दो अलग-अलग कॉन्फिगरेशन में उपलब्ध हैं। पहला वर्जन लेजर गाइडेड रॉकेट है। इसका इस्तेमाल उन टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है जो घातक हों या तेज रफ्तार से उड़ रहे हों। लेजर गाइडेंस टारगेट पर अधिक सटीक हमला करने में मदद करती है।
दूसरा वर्जन प्रोग्रामेबल टाइमिंग फ्यूज वाला रॉकेट है। इसे एक निश्चित दूरी या समय पर हवा में फटने के लिए सेट किया जा सकता है।
इस तकनीक का इस्तेमाल विशेष रूप से ड्रोन स्वार्म के खिलाफ किया जाता है। जब रॉकेट टारगेट के पास पहुंचता है तो वह हवा में विस्फोट करता है और बड़ी संख्या में मेटल के टुकड़े फैलाता है। (China Anti-Drone System)
1,920 धातु के टुकड़ों से है बना
हर 70 मिमी रॉकेट में लगभग 1,920 प्री-फॉर्म्ड फ्रैगमेंट यानी पहले से तैयार मेटल के टुकड़े लगाए गए हैं।
रॉकेट के विस्फोट के बाद ये टुकड़े तेज गति से चारों ओर फैलते हैं। कंपनी का दावा है कि इनकी प्रभावी किल रेडियस 15 मीटर तक है।
इसका मतलब है कि ड्रोन को सीधे हिट करना जरूरी नहीं है। यदि रॉकेट टारगेट के पास फटता है तो उसके टुकड़े ड्रोन के मोटर, सेंसर, पंख या कंट्रोल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
एंटी-ड्रोन ऑपरेशंस में यह तरीका काफी प्रभावी माना जाता है क्योंकि छोटे ड्रोन का साइज बहुत कम होता है और उन्हें सीधे मारना हमेशा आसान नहीं होता। (China Anti-Drone System)
महंगी मिसाइलों का सस्ता विकल्प
हाल के सालों में दुनिया भर की सेनाओं को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा है। कई बार कुछ हजार डॉलर की कीमत वाला ड्रोन गिराने के लिए लाखों डॉलर की एयर डिफेंस मिसाइल दागनी पड़ती है।
यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, चीन और अन्य देश कम लागत वाले इंटरसेप्टर हथियारों पर काम कर रहे हैं।
वहीं, 70 मिमी (2.75 इंच) कैलिबर का रॉकेट कोई नई तकनीक नहीं है। यह पुराने हाइड्रा और एफएफएआर (फोल्डिंग-फिन एरियल रॉकेट) परिवार का हिस्सा है।
अमेरिका ने इसी रॉकेट में एपीकेडब्ल्यूएस हाइड्रा 70 मिमी (एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम) किट जोड़कर इसे सटीक निशाना लगाने वाला लेजर गाइडेड रॉकेट बना दिया। इसकी एक रॉकेट की कीमत लगभग 15,000 से 20,000 डॉलर होती है, जो पैट्रियट जैसी महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों की तुलना में काफी कम है। इस सिस्टम का इस्तेमाल लाल सागर क्षेत्र में हूती ड्रोन को मार गिराने में भी किया गया है।
साल 2026 में फ्रांस की कंपनी थेल्स ने एलजीआर-275 प्रॉक्सी नाम का नया वर्जन पेश किया है, जिसमें लेजर गाइडेंस के साथ प्रॉक्सिमिटी सेंसर भी लगाया गया है। इससे रॉकेट टारगेट के बिल्कुल पास पहुंचते ही फट सकता है। वहीं, ताइवान भी 70 मिमी रॉकेट पॉड और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल डायरेक्टर आधारित अपने सिस्टम पर काम कर रहा है।
चीन का नया सिस्टम भी इसी कॉन्सैप्ट पर है, लेकिन उसने इसे सिर्फ रॉकेट तक सीमित नहीं रखा। चीन ने पूरे सिस्टम को ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस बैटरी के तौर पर डेवलप किया है, जिसे मेंगशी सैन्य वाहन पर लगाया गया है। (China Anti-Drone System)
मोबाइल एयर डिफेंस पर चीन का जोर
चीन पहले से कई मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम ऑपरेट करता है। इनमें एफबी-10ए एयर डिफेंस मिसाइल, एसडब्ल्यूएस-3 गन और मिसाइल सिस्टम, ओडब्ल्यू-5/गुआंगजियान लेजर हथियार और यहां तक कि लीजियान पोर्टेबल लेजर सिस्टम भी शामिल हैं।
नया 70 मिमी एंटी-ड्रोन सिस्टम विशेष रूप से फील्ड फोर्सेज, सैन्य काफिलों और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया है। डोंगफेंग मेंगशी 6×6 चेसिस कठिन इलाकों में भी तेजी से तैनाती की जा सकती है।
वहीं, 70 मिमी रॉकेट सिस्टम को सबसे निचली और सबसे सस्ती डिफेंस लेयर माना जा रहा है। इसका उद्देश्य छोटे और कम कीमत वाले ड्रोन को महंगी मिसाइलों से नहीं, बल्कि कम लागत वाले रॉकेट से नष्ट करना है। चीन की यह रणनीति “चिड़िया को तोप से नहीं, रॉकेट से मारने” जैसी है, ताकि दुश्मन के सस्ते ड्रोन को गिराने में अत्यधिक महंगे हथियारों का इस्तेमाल न करना पड़े। (China Anti-Drone System)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





