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Pakistan Fake Propaganda: ऑपरेशन सिंदूर के महीनों बाद पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा, सोशल मीडिया पर शेयर कर रहा फर्जी सैटेलाइट इमेज, बेनकाब हुआ झूठ

Pakistan Fake Propaganda
Photo Credit: Damien Symon/X

Pakistan Fake Propaganda: ऑपरेशन सिंदूर के महीनों बाद पाकिस्तान एक बार फिर सोशल मीडिया पर नया प्रोपेगेंडा फैलाने में जुट गया है। पाकिस्तान आधारित कुछ सोशल मीडिया अकाउंट और उनसे जुड़े हैंडल फेक सैटेलाइट तस्वीरें शेयर कर यह दावा कर रहे हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पंजाब में, खासतौर पर अमृतसर के आसपास, भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए थे। लेकिन पाकिस्तान के ये दावे बिना किसी ठोस सबूत के हैं।

डिफेंस सूत्रों और ओपन सोर्स एनालिस्ट्स की जांच में यह साफ हो चुका है कि इन तस्वीरों में दिखाए जा रहे इलाकों में किसी भी तरह की तबाही या नुकसान के संकेत नहीं दिखे हैं। जिन सैन्य ठिकानों का नाम लेकर दावे किए जा रहे हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित हैं और वहां पर किसी भी हमले के निशान भी नहीं हैं। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: बिना सबूत के दावे, सैटेलाइट तस्वीरों का खेल

पाकिस्तान से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स जिन सैटेलाइट इमेजेस को शेयर कर रहे हैं, उनमें न तो तस्वीर खींचे जाने की तारीख दी गई है और न ही यह बताया गया है कि वे किस सैटेलाइट से ली गई हैं। किसी भी सैटेलाइट इमेज की विश्वसनीयता के लिए टाइमस्टैम्प, सैटेलाइट सोर्स और रेजोल्यूशन जैसी जानकारियां बेहद जरूरी होती हैं, लेकिन यहां यह सब गायब हैं।

फैक्ट चेक में यह भी सामने आया है कि जिन जगहों को “टारगेट” बताया जा रहा है, वहां न तो विस्फोट के गड्ढे हैं, न मलबा, न जले हुए निशान और न ही किसी तरह का स्ट्रक्चरल डैमेज दिखाई दिया। अगर वाकई किसी सैन्य ठिकाने पर ऐसे हमले होते हैं, तो ऐसे संकेत साफ तौर पर दिखाई देते हैं। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: गलत जानकारी फैलाने की कोशिश

सैटेलाइट इमेजरी एक्सपर्ट डेमियन सिमोन कहते हैं, “सोशल मीडिया पर जानबूझकर भ्रामक तस्वीरें फैलाकर यह दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान ने भारत के पंजाब के अमृतसर में सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। लेकिन इन तस्वीरों की स्वतंत्र जांच में साफ हो गया है कि जिन जगहों को निशाना बताए जा रहे हैं, वहां किसी भी तरह की तबाही या नुकसान के कोई निशान नहीं हैं। न तो विस्फोट के संकेत दिखते हैं और न ही किसी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। यह पूरी कोशिश गलत जानकारी फैलाने की है। ऐसे और भी कमजोर दावों वाली तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं, जिनकी पड़ताल कर उन्हें एक-एक करके बेनकाब किया जा रहा है। छुट्टियों के बावजूद यह प्रक्रिया जारी रहेगी।” (Pakistan Fake Propaganda)

सात महीने बाद अचानक क्यों सामने आईं तस्वीरें

सबसे बड़ा सवाल इन दावों के समय को लेकर उठ रहा है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान अपने दावों के समर्थन में एक भी भरोसेमंद सैटेलाइट इमेज नहीं दिखा सका था। अब करीब सात महीने बाद अचानक ऐसी तस्वीरों का सामने आना इशारा करता है कि यह सब बाद में गढ़ी गई कहानी है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह “पोस्ट-फैक्टो प्रोपेगैंडा” की एक क्लासिक मिसाल है, जहां पहले बुरी तरह मार खाने के बाद डिजिटल कंटेंट के जरिए जीत की कहानी गढ़ने की कोशिश की जाती है। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: पहले भी फैल चुकी हैं ऐसी झूठी कहानियां

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान से जुड़े सोशल मीडिया नेटवर्क ने इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए हों। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके तुरंत बाद भी तथाकथित “विक्ट्री रेशियो”, भारत के “स्ट्रैटेजिक सेंटर ऑफ ग्रैविटी” पर हमले और बड़े नुकसान के दावे किए गए थे। लेकिन इन सभी बातों को न तो किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने स्वीकार किया और न ही कोई स्वतंत्र जांच उन्हें सही साबित कर पाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दावों को गंभीरता से नहीं लिया गया, क्योंकि उनके साथ कोई भरोसेमंद डेटा या सबूत मौजूद नहीं थे। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: ओपन सोर्स एनालिस्ट्स ने बताया झूठा

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस यानी ओएसआईएनटी पर काम करने वाले कई एक्सपर्ट्स ने इन नई सैटेलाइट तस्वीरों का बारीकी से अध्ययन किया। उनके मुताबिक, तस्वीरों में जानबूझकर बहुत सीमित एंगल दिखाए गए हैं। इनमें हमले के बाद दिखने वाले आम संकेत पूरी तरह गायब हैं।

आमतौर पर किसी एयर स्ट्राइक या मिसाइल हमले के बाद गड्ढे, आसपास का मलबा, जलने के निशान, टूटी हुई इमारतें या सेकेंडरी एक्सप्लोजन के संकेत दिखते हैं। लेकिन यहां ऐसी कोई बात नजर नहीं आती। उन्हीं लोकेशंस की पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करने पर भी कोई फर्क नहीं दिखाई दिया। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: फिर भी क्यों जारी है प्रचार

पाकिस्तान की तरफ से ऐसी झूठी तस्वीरों का लगातार प्रचार किया जाना इस ओर इशारा करता है कि यह कोई सामान्य गलती या गलतफहमी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी डिसइन्फॉर्मेशन मुहिम है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह की कोशिशें अक्सर घरेलू ऑडियंस को यह दिखाने के लिए किए जाते हैं कि “कुछ हासिल हुआ”, भले ही हकीकत कुछ और हो।

इसके साथ ही, अंतररष्ट्रीय स्तर पर भी भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है, ताकि असल हालात पर सवाल खड़े किए जा सकें। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: राफेल से लेकर नौसेना तक, एक जैसा पैटर्न

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान का यह रवैया कोई नया नहीं है। जब भारत ने राफेल फाइटर जेट्स को वायुसेना में शामिल किया था, तब भी सोशल मीडिया पर राफेल के क्रैश, टेक्निकल फेल्योर और कमजोर होने के झूठे वीडियो फैलाए गए थे। बाद में जांच में पता चला कि वे वीडियो या तो पुराने थे, किसी और देश के थे या वीडियो गेम फुटेज थे।

अब वही तरीका नौसेना और जमीनी अभियानों को लेकर अपनाया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं हुआ था, तो डिजिटल दुनिया में एक “विक्ट्री नैरेटिव” गढ़ने की कोशिश शुरू कर दी गई थी। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: AI डीपफेक्स का बढ़ता इस्तेमाल

हाल के सालों में इस तरह की टैक्टिक्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल भी बढ़ा है। डिफेंस सूत्र बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ वीडियो ऐसे भी सामने आए, जिनमें भारतीय सैन्य अधिकारियों को कथित तौर पर नुकसान स्वीकार करते या ऑपरेशन की आलोचना करते दिखाया गया। बाद में ये वीडियो डीपफेक साबित हुए।

पीआईबी फैक्ट चेक और अन्य फैक्ट चेकिंग एजेंसियों ने ऐसे कई वीडियो को झूठा करार दिया है। शुरुआती जांच में इनमें से कई अकाउंट्स का लिंक पाकिस्तान से जुड़े डिजिटल नेटवर्क से मिला। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: इनफॉरमेशन वॉरफेयर की स्ट्रैटेजी

डिफेंस एनालिस्ट्स मानते हैं कि यह सब किसी एक घटना से जुड़ा नहीं है, बल्कि एक लंबी रणनीति का हिस्सा है। जब कुछ हासिल नहीं होता तो झूठी इनफॉरमेशन फैला कर जीत जैसा माहौल बनाया जाता है। इसका मकसद जमीनी सच्चाई को बदलना नहीं, बल्कि लोगों की सोच को प्रभावित करना होता है।

ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी मौजूदा सोशल मीडिया मुहिम भी इसी रणनीति की अगली कड़ी मानी जा रही है।

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में इस तरह की डिजिटल फेख खबरें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सही जानकारी, फैक्ट चेक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान की यह नई सोशल मीडिया मुहिम एक बार फिर यह दिखाती है कि जब जमीन पर कुछ दिखाने को नहीं होता, तो कहानियां इंटरनेट पर गढ़ी जाती है। लेकिन सच्चाई यही है कि बिना सबूतों के ऐसे दावे सिर्फ प्रोपेगेंडा बनकर रह जाते हैं, जिनकी उम्र बहुत लंबी नहीं होती। (Pakistan Fake Propaganda)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: भारतीय सेना को मिलेगा यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, नाइब लिमिटेड को 292.69 करोड़ का इमरजेंसी ऑर्डर

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी क्षमता को और बढ़ाने के लिए पुणे की नाइब कंपनी को करीब 292.69 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर सेना ने इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रावधान के तहत दिया है। इस समझौते के तहत कंपनी भारतीय सेना को लंबी दूरी तक अचूक मार करने वाले यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम उपलब्ध कराएगी। जिससे आने वाले समय में सेना की फायर पावर को नई मजबूती मिलेगी।

कंपनी ने इस सौदे की जानकारी बीएसई और एनएसई को भी दी है। कंपनी का कहना कि यह कॉन्ट्रैक्ट भारतीय सेना की इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रोविजन के तहत किया गया है, जिसका मतलब है कि सिस्टम को कम समय में सेना तक पहुंचाया जाएगा, ताकि मौजूदा सुरक्षा जरूरतों को तुरंत पूरा किया जा सके।

यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब सेना सीमाओं पर अपनी ऑपरेशनल तैयारियों को और मजबूत करने पर फोकस कर रही है। हाल के सालों में बदलते सुरक्षा हालात और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों की जरूरत को देखते हुए सेना आधुनिक रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को तेजी से शामिल कर रही है।

नाइब लिमिटेड को मिला यह ऑर्डर यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर प्लेटफॉर्म के लिए है। इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अलग-अलग रेंज और कैलिबर के रॉकेट्स को एक ही लॉन्चर से दागा जा सकता है। रक्षा समाचार डॉट कॉम को मिली जानकारी के अनुसार, यह सिस्टम दो अलग-अलग दूरी वाले रॉकेट्स को सपोर्ट कर सकता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: 12 महीनों में सप्लाई

नाइब लिमिटेड को इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम से जुड़े लॉन्चर, ग्राउंड इक्विपमेंट, एक्सेसरीज, एन्हांस्ड सिस्टम प्रोजेक्टाइल्स और एम्युनिशन की सप्लाई करनी है। कंपनी को यह पूरी डिलीवरी 12 महीनों के भीतर चरणबद्ध तरीके से पूरी करनी होगी। यानी तय समय के अंदर अलग-अलग किस्तों में सेना को यह सारा सिस्टम सौंपा जाएगा।

कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के मुताबिक, नाइब लिमिटेड को कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 30 दिनों के भीतर कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का 10 फीसदी हिस्सा परफॉर्मेंस-कम-वारंटी बैंक गारंटी के तौर पर जमा करना होगा। ताकि सप्लाई समय पर और तय क्वॉलिटी स्टैंडर्ड्स के अनुसार हो सके। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

क्या है यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम

यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम दरअसल इजरायल की डिफेंस कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के बनाए पीयूएलएस (प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक मल्टी-कैलिबर और मल्टी-रेंज प्लेटफॉर्म है।

सूत्रों का कहना है कि पीयूएलएस को भारत में “सूर्या” नाम दिया जा सकता है। पीयूएलएस यह एक मॉड्यूलर मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर (एमआरएल) है। इस सिस्टम से अलग-अलग रेंज के रॉकेट दागे जा सकते हैं। इसमें 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट्स को इंटीग्रेट करने की क्षमता है। सेना के लिए यह इसलिए अहम है, क्योंकि अब अलग-अलग रेंज के लिए अलग-अलग लॉन्चर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal:  एक प्लेटफॉर्म, कई रॉकेट

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 122 एमएम, 160 एमएम और 306 एमएम जैसे अलग-अलग कैलिबर के रॉकेट्स के साथ काम कर सकता है। रॉकेट पॉड्स की संख्या और कॉन्फिगरेशन इस्तेमाल होने वाले रॉकेट पर निर्भर करती है।

यह लॉन्चर 6×6 या 8×8 व्हीकल चैसिस पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे अलग-अलग इलाकों में तेजी से तैनात किया जा सके। पहाड़ी क्षेत्र हों, रेगिस्तानी इलाका हो या मैदानी क्षेत्र, यह सिस्टम हर मौसम और हर भूभाग में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: शूट एंड स्कूट क्षमता

यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की एक बड़ी खूबी इसकी “शूट एंड स्कूट” क्षमता है। यानी रॉकेट फायर करने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बहुत जरूरी मानी जाती है, क्योंकि इससे दुश्मन की काउंटर फायर से बचा जा सकता है।

लॉन्चर के पीछे की तरफ एक रिमोटली कंट्रोल्ड और पावर्ड यूनिट लगी होती है। फायरिंग के समय वाहन के दोनों तरफ और पीछे हाइड्रॉलिक स्टेबलाइजर्स लगाए जाते हैं, जिससे लॉन्चर पूरी तरह स्थिर रहता है, इससे फायरिंग के दौरान सटीकता बनी रहती है और सिस्टम सुरक्षित रहता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

मेक इन इंडिया को बढ़ावा

यह सौदा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के लिहाज से भी काफी अहम माना जा रहा है। जुलाई 2025 में नाइब लिमिटेड ने एल्बिट सिस्टम्स के साथ समझौता किया था, जिसके तहत पीयूएलएस सिस्टम का निर्माण भारत में किया जाना है। अब भारतीय सेना के लिए इस सिस्टम का ऑर्डर मिलना उसी साझेदारी का बड़ा नतीजा माना जा रहा है।

इससे देश के भीतर रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय सप्लाई चेन मजबूत होगी। इसके साथ ही छोटे और मझोले उद्योगों को भी इससे फायदा मिलने की उम्मीद है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे सिस्टम्स के निर्यात की संभावनाएं भी खुल सकती हैं।

इस सिस्टम के भारतीय सेना में शामिल होने के बाद यह पहला यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा, जिसे सेना ऑपरेशनल तौर पर इस्तेमाल करेगी। इससे पहले मई 2025 में भी नाइब लिमिटेड को एक इजरायली टेक्नोलॉजी कंपनी से 150.62 करोड़ रुपये का एक और ऑर्डर मिला था। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

सेना की मारक क्षमता में इजाफा

भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम्स पर खास ध्यान दे रही है। पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम के एडवांस वर्जन, गाइडेड रॉकेट्स और अब यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर जैसे प्लेटफॉर्म इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

150 से 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट्स से लैस यह सिस्टम सेना को दुश्मन के इलाकों में गहराई तक मौजूद लक्ष्यों पर सटीक हमला करने की क्षमता देगा। इससे सीमावर्ती इलाकों में तैनात यूनिट्स को तेज प्रतिक्रिया और ज्यादा ऑपरेशनल विकल्प मिलेंगे। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

रणनीतिक तौर पर अहम कदम

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम जैसे प्लेटफॉर्म भारतीय सेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयार करते हैं। एक ही सिस्टम से अलग-अलग रेंज के रॉकेट दागने की क्षमता आधुनिक युद्ध के लिहाज से बेहद अहम है। यह कॉन्ट्रैक्ट देश की रॉकेट आर्टिलरी क्षमता को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है। आने वाले एक साल में जब यह सिस्टम सेना के पास पूरी तरह पहुंच जाएगा, तो भारतीय सेना की फायर पावर और ऑपरेशनल तैयारी में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

MoD Defence Deal 2025: साल के अंत में सरकार का सेनाओं को बड़ा तोहफा, भारतीय सेना को नई CQB कार्बाइन और नौसेना को ब्लैक शार्क टॉरपीडो

MoD Defence Deal 2025
MoD Defence Contracts: Rs 4,666 Crore Deals Signed for CQB Carbine and Heavy Weight Torpedoes

MoD Defence Deal 2025: रक्षा मंत्रालय ने 2025 खत्म होते-होते भारतीय सेनाओं को खास तोहफा दिया। मंत्रालय ने 30 दिसंबर को 4,666 करोड़ रुपये की लागत से दो बड़े रक्षा कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत किए। यह डील क्लोज क्वार्टर बैटल (सीक्यूबी) कार्बाइन और हेवी वेट टॉरपीडो की खरीद को लेकर हैं। नई दिल्ली स्थित साउथ ब्लॉक में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में इन सौदों पर दस्तखत किए गए।

इन समझौतों का सीधा फायदा भारतीय सेना और भारतीय नौसेना को मिलेगा। एक तरफ सेना और नौसेना के जवानों को मॉडर्न सीक्यूबी कार्बाइन मिलेंगी, तो दूसरी ओर नौसेना की कलवरी क्लास सबमरीनों की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए हेवी वेट टॉरपीडो शामिल किए जाएंगे। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये दोनों ही कॉन्ट्रैक्ट मौजूदा और आने वाले समय की सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किए गए हैं।

MoD Defence Deal 2025

MoD Defence Deal 2025: सीक्यूबी कार्बाइन के लिए 2,770 करोड़ की डील

इन दो कॉन्ट्रैक्ट में सबसे बड़ा हिस्सा सीक्यूबी कार्बाइन का है। रक्षा मंत्रालय ने 4.25 लाख से अधिक क्लोज क्वार्टर बैटल कार्बाइन और उनसे जुड़ी एक्सेसरीज की खरीद के लिए 2,770 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। ये हथियार भारतीय सेना और भारतीय नौसेना दोनों को दिए जाएंगे।

इस प्रोजेक्ट के लिए दो भारतीय कंपनियों भारत फोर्ज और पीएलआर सिस्टम्स को चुना गया है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, यह सौदा आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी हथियारों को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

भारत फोर्ज लिमिटेड, अपनी सब्सिडियरी कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स के जरिए, और पीएलआर सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, जो अदाणी डिफेंस और इजराइल वेपन इंडस्ट्रीज का जॉइंट वेंचर है। रक्षा समाचार ने पहले बताया था कि भारत फोर्ज लगभग 60 फीसदी यानी करीब 2.55 लाख कार्बाइन सप्लाई करेगा, जबकि पीएलआर सिस्टम्स करीब 40 फीसदी यानी लगभग 1.70 लाख यूनिट्स देगा। डिलीवरी की शुरुआत 2026 से होगी और ज्यादातर कार्बाइन 2028 तक सैनिकों तक पहुंच जाएंगी।

सीक्यूबी कार्बाइन को खासतौर पर नजदीकी लड़ाई यानी क्लोज कॉम्बैट के लिए डिजाइन किया गया है। इसका कॉम्पैक्ट डिजाइन, हल्के वजन और तेज फायरिंग रेट के चलते इसे शहरी इलाकों, आतंकवाद विरोधी अभियानों और सीमित जगहों पर होने वाले ऑपरेशनों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

MoD Defence Deal 2025: क्या हैं CQB कार्बाइन की खूबियां

सीक्यूबी कार्बाइन 5.56×45 एमएम कैलिबर की हैं, जो इंसास और नैटो दोनों तरह की एम्युनिशन के साथ काम कर सकती हैं। इनका वजन करीब 3.3 किलो है और इनका डिजाइन काफी कॉम्पैक्ट है, जिसकी कुल लंबाई 800 मिलीमीटर से भी कम रहती है। इनकी रेंज करीब 200 मीटर से ज्यादा है और लगभग 600 राउंड प्रति मिनट का फायर रेट है, जो क्लोज कॉम्बैट के लिए शानदार है।

इन कार्बाइनों में आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पिकाटिनी रेल्स दी गई हैं, जिन पर ऑप्टिकल साइट्स, लेजर, सप्रेसर जैसे उपकरण आसानी से लगाए जा सकते हैं। भारत फोर्ज के वैरिएंट को डीआरडीओ के पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) ने डिजाइन किया है और इसे पूरी तरह भारत में बनाया जा रहा है। वहीं पीएलआर सिस्टम्स का वैरिएंट इजराइल वेपन इंडस्ट्रीज के गालिल ऐस (Galil ACE) प्लेटफॉर्म पर बेस्ड है। (MoD Defence Deal 2025)

MoD Defence Deal 2025: पुरानी कार्बाइन की जगह आधुनिक हथियार

भारतीय सेना लंबे समय से पुरानी 9 एमएम स्टर्लिंग कार्बाइन का इस्तेमाल कर रही थी, जिसका डिजाइन 1940 पर बेस्ड है। नई सीक्यूबी कार्बाइन के आने से इन पुराने हथियारों को चरणबद्ध तरीके से बदला जाएगा। इससे जवानों को आधुनिक तकनीक से लैस हथियार मिलेंगे, जो मौजूदा समय की जरूरत भी हैं।

नई कार्बाइन में आधुनिक साइट्स, बेहतर ग्रिप, कम रीकॉइल और ज्यादा एक्यूरेसी जैसे फीचर्स शामिल हैं। इन हथियारों को भारतीय परिस्थितियों में टेस्ट किया गया है और इन्हें अलग-अलग मौसम और इलाकों में इस्तेमाल के लिए तैयार किया गया है। 2022 में इस हथियार के लिए एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) दी गई थी और 2025 में इसके ट्रायल्स पूरे हुए। (MoD Defence Deal 2025)

MoD Defence Deal 2025: मेक-इन-इंडिया और एमएसएमई को बढ़ावा

वहीं, सीक्यूबी कार्बाइन का यह कॉन्ट्रैक्ट मेक-इन-इंडिया पहल को भी मजबूती देगा। हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई कंपोनेंट्स और रॉ मटेरियल देश के भीतर ही तैयार किए जाएंगे। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों यानी एमएसएमई को भी काम मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए निजी क्षेत्र और सरकार के बीच सहयोग को और मजबूती मिलेगी। इससे भविष्य में भी स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास का रास्ता खुलेगा। (MoD Defence Deal 2025)

हेवी वेट टॉरपीडो के लिए 1,896 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट

दूसरा बड़ा कॉन्ट्रैक्ट भारतीय नौसेना के लिए है। रक्षा मंत्रालय ने 48 हेवी वेट टॉरपीडो और उनसे जुड़े इक्विपमेंट्स की खरीद के लिए लगभग 1,896 करोड़ रुपये की डील पर दस्तखत किए है। ये टॉरपीडो नौसेना की कलवरी क्लास सबमरीनों (प्रोजेक्ट-75) में लगाए जाएंगे। इन टॉरपीडो का नाम है ब्लैक शार्क है, जिसे दुनिया के सबसे एडवांस्ड हेवी वेट टॉरपीडो में गिना जाता है।

यह कॉन्ट्रैक्ट पर इटली की कंपनी वास सबमरीन सिस्टम्स (Whitehead Alenia Sistemi Subacquei) के साथ किया गयाा है। यह कंपनी अंडरवॉटर वेपन सिस्टम सेक्टर में जानी-मानी मानी जाती है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन टॉरपीडो की डिलीवरी अप्रैल 2028 से शुरू होगी और इसे 2030 की शुरुआत तक पूरा कर लिया जाएगा। (MoD Defence Deal 2025)

MoD Defence Deal 2025: क्या हैं ब्लैक शार्क की खूबियां

ब्लैक शार्क टॉरपीडो एक बेहद आधुनिक हेवी वेट टॉरपीडो है, जिसे खास तौर पर दुश्मन की सबमरीन और वारशिप्स को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। यह टॉरपीडो पानी के नीचे होने वाली लड़ाई में नौसेना को बड़ी बढ़त देता है।

यह एक वायर-गाइडेड टॉरपीडो है, यानी इसे लॉन्च करने के बाद भी सबमरीन उससे जुड़ी रहती है और जरूरत पड़ने पर उसकी दिशा बदली जा सकती है। इसमें इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम लगा होता है, जिससे यह बहुत कम आवाज करता है। कम शोर की वजह से दुश्मन के सोनार के लिए इसे पकड़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

ब्लैक शार्क की मारक क्षमता 50 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है और यह 50 नॉट्स से अधिक की रफ्तार से पानी के भीतर चल सकता है। इसमें लगा हाई एक्सप्लोसिव वारहेड किसी भी बड़े जहाज या सबमरीन को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। यह टॉरपीडो गहरे समुद्र यानी डीप सी में भी काम करता है और तट के पास के इलाकों यानी कोस्टल वॉटर्स में भी पूरी तरह से काम करता है।

इस टॉरपीडो में एक्टिव और पैसिव सोनार सिस्टम लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह अपने टारगेट को खुद पहचान सकता है, ट्रैक कर सकता है और सही समय पर हमला कर सकता है। (MoD Defence Deal 2025)

क्या बैन हुई थी वास सबरमरीन सिस्टम्स?

इटली की कंपनी वास सबरमरीन सिस्टम्स की पेरेंट कंपनी फिनमेकानिका को भारत में पहले ब्लैक लिस्ट किया गया था। साल 2013-14 में भारत में अगस्तावेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले का खुलासा हुआ था। यह करीब 3,600 करोड़ रुपये की डील थी, जिसमें रिश्वत और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। अगस्तावेस्टलैंड उस समय इटली की बड़ी डिफेंस कंपनी फिनमेकानिका की सब्सिडियरी थी, जिसका नाम बाद में लियोनार्डो हो गया। जिसके बाद 2014 में रक्षा मंत्रालय ने फैसला लिया कि फिनमेकानिका ग्रुप और उससे जुड़ी सभी कंपनियों को नए डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिए जाएंगे।

लेकिन इस बैन का सबसे बड़ा नुकसान भारतीय नौसेना को भी झेलना पड़ा। साल 2008-09 में वास ने ब्लैक शार्क हेवी वेट टॉरपीडो के लिए सबसे कम बोली (L1) लगाई थी। ये टॉरपीडो कलवरी-क्लास सबमरीन्स के लिए थे। लेकिन बैन लगने के कारण यह डील कैंसल हो गई। नतीजा यह हुआ कि भारतीय नौसेना को कई साल तक बिना आधुनिक टॉरपीडो के अपनी नई सबमरीन्स चलानी पड़ीं। इसी बीच स्टॉप-गैप अरेंजमेंट के तौर पर पुराने या स्वदेशी विकल्प इस्तेमाल किए गए। (MoD Defence Deal 2025)

MoD Defence Deal 2025: 2021 में हटा बैन

साल 2021 में बड़ा मोड़ आया। लियोनार्डो ने भारत सरकार के साथ बातचीत के बाद वीवीआईपी हेलिकॉप्टर डील से जुड़े अपने क्लेम (करीब 350 मिलियन यूरो) वापस ले लिए। इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने ग्रुप पर लगा बैन औपचारिक तौर पर हटा दिया। मामले में जांच और कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह चलती रही, लेकिन कंपनी लेकिन डिफेंस बिजनेस करने की अनुमति दोबारा मिल गई। वहीं, बैन हटने के बाद लियोनार्डो और वास ने फिर से एरो इंडिया जैसे इवेंट्स में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। (MoD Defence Deal 2025)

ब्लैक शार्क से कलवरी क्लास सबमरीनों की ताकत बढ़ेगी

भारतीय नौसेना के पास इस समय छह कलवरी क्लास सबमरीन हैं, जिन्हें फ्रांस के स्कॉर्पीन डिजाइन पर देश में ही बनाया गया है। इन सबमरीनों की भूमिका समुद्र के भीतर निगरानी, दुश्मन के जहाजों और सबमरीनों को निशाना बनाना और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना है। (MoD Defence Deal 2025)

नए हेवी वेट टॉरपीडो के शामिल होने से इन सबमरीनों की कॉम्बैट क्षमता में इजाफा होगा। ये टॉरपीडो लंबी दूरी से दुश्मन के लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम हैं और आधुनिक गाइडेंस सिस्टम से लैस हैं।

नौसेना की ऑपरेशनल जरूरतों पर फोकस

रक्षा मंत्रालय (MoD Defence Deal 2025) का कहना है कि यह खरीद नौसेना की मौजूदा ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए की गई है। समुद्री क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों और बदलते सुरक्षा माहौल के बीच नौसेना के लिए आधुनिक और भरोसेमंद हथियार प्रणालियां जरूरी हो गई हैं। हेवी वेट टॉरपीडो की यह डील नौसेना की अंडरवॉटर वारफेयर क्षमता को मजबूत करेगी और कलवरी क्लास सबमरीनों की प्रभावशीलता बढ़ाएगी।

MoD Defence Deal 2025: वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड रक्षा सौदे

रक्षा मंत्रालय (MoD Defence Deal 2025) ने जानकारी दी है कि वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक 1,82,492 करोड़ रुपये के कैपिटल कॉन्ट्रैक्ट साइन किए जा चुके हैं। ये सौदे थलसेना, नौसेना और वायुसेना के मॉडर्नाइजेशन से जुड़े हैं। इन कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए हथियार, गोला-बारूद, प्लेटफॉर्म और सपोर्ट सिस्टम्स को अपडेट किया जा रहा है। मंत्रालय का उद्देश्य है कि सशस्त्र बलों को समय पर आधुनिक उपकरण मिलें और उनकी ऑपरेशनल तैयारियां मजबूत बनी रहें।

S4 SSBN Sea Trials: अरिहंत-क्लास की आखिरी सबमरीन के सी ट्रायल्स शुरू, चीन की Type-094 से कितनी अलग है भारत की न्यूक्लियर पनडुब्बी?

S4 SSBN Sea Trials
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S4 SSBN Sea Trials: भारत ने अपनी चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) का ट्रायल शुरू कर दिया है। एस4 के नाम से जाने जानी वाली यह पनडुब्बी पिछले सप्ताह विशाखापत्तनम के शिपबिल्डिंग सेंटर से बाहर निकलकर समुद्र में ट्रायल्स के लिए रवाना हुई। यह अरिहंत-क्लास की आखिरी सबमरीन है और भारत के बेहद गोपनीय प्रोजेक्ट का अहम पड़ाव मानी जा रही है, जो करीब चार दशक पहले शुरू हुआ था।

S4 SSBN Sea Trials: 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है एस4

एस4 लगभग 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है और इसे खास तौर पर परमाणु हथियार ले जाने और दागने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आठ के-4 सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) तैनात की जा सकती हैं, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। ये मिसाइलें परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हैं। यह चीन और पकिस्तान के लिए भारत की तरफ से समुद्र में बड़ा जवाब है।

S4 SSBN Sea Trials: सी ट्रायल करीब एक साल तक

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, एस4 का सी ट्रायल करीब एक साल तक चलने की उम्मीद है। इन ट्रायल्स के दौरान पनडुब्बी के सभी अहम सिस्टम, जैसे न्यूक्लियर रिएक्टर, प्रोपल्शन, सोनार, नेविगेशन और वेपन सिस्टम्स की अलग-अलग परिस्थितियों में जांच की जाएगी। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो यह पनडुब्बी 2027 की शुरुआत तक भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से शामिल की जा सकती है।

S4 SSBN Sea Trials: 80 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी

एस4 को अरिहंत-क्लास की बाकी पनडुब्बियों से अलग और ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है, जो अब तक बनी चारों पनडुब्बियों में सबसे अधिक है। इसका मतलब यह है कि भारत अब न्यूक्लियर सबमरीन टेक्नोलॉजी में पहले से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर हो चुका है। इसमें रिएक्टर से लेकर सेंसर और कॉम्बैट सिस्टम तक, बड़ी संख्या में भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।

S4 SSBN Sea Trials: भारत के पास दो ऑपरेशनल एसएसबीएन

इस समय भारत के पास समुद्र में चार एसएसबीएन हैं। इनमें से दो पनडुब्बियां पूरी तरह सेवा में हैं और दो ट्रायल्स के अलग-अलग चरणों में हैं। पहली पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को 2016 में कमीशन किया गया था और उसने 2018 में अपनी पहली डिटरेंट पेट्रोल पूरी की थी। दूसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिघात अगस्त 2024 में नौसेना में शामिल हुई। तीसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन अपने सभी सी ट्रायल्स लगभग पूरे कर चुकी है और इसके 2026 के अंत तक कमीशन होने की उम्मीद है। अब एस4 के ट्रायल्स शुरू होने के साथ ही भारत का एसएसबीएन बेड़ा एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया है।

1984 से शुरू होती है एसएसबीएन की कहानी

भारत की न्यूक्लियर सबमरीन यात्रा की कहानी 1984 से शुरू होती है, जब सरकार ने एडवांस्ड टेक्नोलॉजी व्हीकल (एटीवी) प्रोजेक्ट की नींव रखी थी। उस समय लक्ष्य था कि भारत खुद की न्यूक्लियर पनडुब्बी डेवलप करे, ताकि देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह मजबूत हो सके। इसके तहत शुरुआती योजना तीन एसएसबीएन बनाने की थी, लेकिन बदलते रणनीतिक हालात और तकनीकी जरूरतों को देखते हुए बाद में इसमें बदलाव किए गए।

अरिहंत-क्लास की पहली पनडुब्बी का स्ट्रक्चर 1998 में रखा गया था, उसी साल जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे। हालांकि तकनीकी जटिलताओं और गोपनीयता के चलते इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में लंबा समय लगा। आईएनएस अरिहंत को 2009 में लॉन्च किया गया और 2016 में कमीशन किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे इस क्लास की अगली पनडुब्बियों पर काम आगे बढ़ा।

एस5 क्लास पनडुब्बियों की तैयारी

अरिहंत और अरिघात लगभग एक जैसी डिजाइन की पनडुब्बियां हैं। दोनों की लंबाई 110 मीटर से ज्यादा है और इनका वजन करीब 6,000 टन है। इनमें चार वर्टिकल लॉन्च ट्यूब्स हैं, जिनसे या तो 16 के-15 मिसाइलें या फिर चार के-4 मिसाइलें दागी जा सकती हैं। लेकिन तीसरी और चौथी पनडुब्बी, यानी अरिधमान और एस4, को थोड़ा बड़ा बनाया गया है। इनके डिजाइन में 10 मीटर का अतिरिक्त सेक्शन जोड़ा गया है, जिससे इनमें चार अतिरिक्त के-4 मिसाइलें रखी जा सकती हैं। इस तरह ये पनडुब्बियां ज्यादा दूरी तक मार करने में सक्षम हो गई हैं।

एस4 भविष्य में आने वाली बड़ी एस5 क्लास पनडुब्बियों के बीच की कड़ी है। एस5 क्लास की पनडुब्बियां करीब 13,500 टन वजनी होंगी, यानी अरिहंत-क्लास से लगभग दोगुनी। इन नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइलें, ज्यादा लंबी रेंज और ज्यादा एडवांस सिस्टम होंगे। एटीवी प्रोजेक्ट के तहत एस5 क्लास की पहली दो पनडुब्बियों का निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है। उम्मीद है कि पहली एस5 पनडुब्बी 2030 के शुरुआती वर्षों में सेवा में आएगी और 2030 के दशक के अंत तक कुल चार एस5 एसएसबीएन नौसेना को मिल जाएंगी।

हालांकि एस4 का नाम अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन नौसेना के पुराने रिवाज को देखते हुए माना जा रहा है कि इसका नाम भी “अरि” से शुरू होगा। संस्कृत में “अरि” का अर्थ दुश्मन होता है, और इसी वजह से अरिहंत, अरिघात और अरिधमान जैसे नाम चुने गए हैं।

सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी बढ़ी

रणनीतिक नजरिए से एस4 का समुद्र में उतरना भारत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। एसएसबीएन ऐसी पनडुब्बियां होती हैं, जो दुश्मन के लिए ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इन्हें परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। अगर किसी देश पर अचानक परमाणु हमला हो जाए, तब भी समुद्र में छिपी एसएसबीएन जवाबी हमला कर सकती है। इसे ही “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” कहा जाता है।

के-4 मिसाइलों की लंबी रेंज की वजह से भारत को एक और रणनीतिक बढ़त मिलती है। अब भारतीय एसएसबीएन को दुश्मन के तट के पास जाने की जरूरत नहीं होगी। वे हिंद महासागर या बंगाल की खाड़ी जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों से ही अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती हैं। इससे पनडुब्बियों की सुरक्षा और मिशन की सफलता दोनों बढ़ जाती हैं।

एस4 के सी ट्रायल्स की शुरुआत इस बात का संकेत है कि भारत अब उस स्तर के करीब पहुंच रहा है, जहां वह लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन तैनात रख सके। इसे “कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस” कहा जाता है। इसके लिए आमतौर पर चार से पांच एसएसबीएन की जरूरत मानी जाती है, ताकि कुछ पनडुब्बियां पेट्रोलिंग पर हों, कुछ मेंटनेंस में और कुछ ट्रेनिंग या ट्रायल्स में हों। (S4 SSBN Sea Trials)

चीन के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन

चीन की बात करें, तो पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन हैं, जो मुख्य रूप से टाइप 094 (जिन-क्लास) हैं। ये चीन की सी-बेस्ड न्यूक्लियर डिटरेंस की रीढ़ हैं। पुरानी टाइप 092 (शिया-क्लास) अब लगभग रिटायर्ड या लिमिटेड रोल में है। नेक्स्ट जेनरेशन टाइप 096 (तांग-क्लास) कंस्ट्रक्शन में है, लेकिन अभी ऑपरेशनल नहीं हैं।

S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 है एस4 से बड़ी और भारी

चीन की टाइप-094 (जिन-क्लास) उसकी पहली पूरी तरह भरोसेमंद बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन मानी जाती है। टाइप-094 का पानी के नीचे डिस्प्लेसमेंट करीब 11 हजार टन है, जबकि भारत की एस4 लगभग 7 हजार टन की है। लंबाई में भी चीन की सबमरीन थोड़ी आगे है। इसका मतलब यह है कि चीनी सबमरीन ज्यादा बड़ी और भारी है, जबकि भारतीय सबमरीन तुलनात्मक रूप से कॉम्पैक्ट है। (S4 SSBN Sea Trials)

S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब

अब आते हैं मिसाइल क्षमता पर, तो एस4 में 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब हैं, जिनमें के-4 बैलिस्टिक मिसाइलें लगती हैं। के-4 की रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन के बड़े हिस्से को कवर करने की क्षमता देती है।

चीन की टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब हैं। इसमें जेएल-2 या नया जेएल-3 मिसाइल सिस्टम लगाया जाता है। जेएल-3 की रेंज 10,000 किलोमीटर से भी ज्यादा मानी जाती है, यानी चीन अपनी सबमरीन से अमेरिका तक को निशाना बना सकता है। इस लिहाज से रेंज और मिसाइल संख्या में चीन आगे है।

लेकिन रणनीति सिर्फ रेंज से नहीं बनती। भारत की सोच अलग है। एस4 को बंगाल की खाड़ी जैसे सुरक्षित समुद्री इलाके में तैनात किया जा सकता है। वहां से बिना ज्यादा खतरा उठाए यह चीन के अहम इलाकों को कवर कर सकती है। यानी भारत को दूर तक जाने की जरूरत नहीं, अपनी ही सुरक्षित समुद्री सीमा से मजबूत जवाबी क्षमता मिल जाती है। (S4 SSBN Sea Trials)

बेहद शोर करती है चीन की टाइप-094

अब बात करते हैं स्टेल्थ की। एसएसबीएन जितनी कम आवाज करती है, उतनी ही ज्यादा सुरक्षित होती है। चीन की टाइप-094 को अक्सर “नॉइजी” यानी ज्यादा आवाज करने वाली सबमरीन माना गया है। शुरुआती वर्जन तो 1970 के दशक की सोवियत तकनीक से भी ज्यादा शोर करने वाले बताए गए। बाद में 094ए वैरिएंट में कुछ सुधार हुए, लेकिन फिर भी यह पश्चिमी देशों की आधुनिक सबमरीन से पीछे मानी जाती है।

भारत की अरिहंत-क्लास भी पूरी तरह साइलेंट नहीं मानी जाती, लेकिन एस4 में डिजाइन और टेक्नोलॉजी में सुधार किया गया है। 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सिस्टम होने के कारण भारत ने अपनी जरूरत के हिसाब से इसमें एकॉस्टिक यानी आवाज कम करने पर खास ध्यान दिया है। (S4 SSBN Sea Trials)

भारत का अपना प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर

रिएक्टर और तकनीक के मामले में भी फर्क है। एस4 में भारत का अपना बनाया प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर लगा है। यह आत्मनिर्भरता की बड़ी मिसाल है। चीन का रिएक्टर घरेलू जरूर है, लेकिन उसमें रूसी डिजाइन का असर साफ दिखता है। तकनीकी तौर पर दोनों देश अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़े हैं, लेकिन भारत ने सीमित संसाधनों में ज्यादा स्वदेशी समाधान तैयार किए हैं।

अब आते हैं ऑपरेशनल स्थिति पर। चीन के पास इस समय करीब 6 टाइप-094 सबमरीन ऑपरेशनल मानी जाती हैं, जो नियमित रूप से गश्त पर जाती हैं। इससे चीन को लगातार समुद्र में परमाणु मौजूदगी मिलती है। भारत अभी उस स्तर पर पहुंचने की प्रक्रिया में है। एस4 के ट्रायल पूरे होने और अरिहंत-क्लास की चारों सबमरीन के सक्रिय होने के बाद भारत भी लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन रखने की स्थिति में आ जाएगा। इसे ही कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस कहा जाता है। (S4 SSBN Sea Trials)

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद सर्दियों में कैसे सेना ने बदली रणनीति, अब आतंकवाद के लिए नहीं कोई ‘ऑफ-सीजन’

Indian Army New Winter Doctrine

Indian Army New Winter Doctrine: इस साल पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने अपनी पुरानी रणनीतियों में कई बदलाव किए हैं। यह बदलाव खासतौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आया है, जिसके बाद सेना ने यह साफ कर दिया कि अब आतंकी सर्दियों की आड़ लेकर भारत में घुसपैठ नहीं कर सकेंगे।

पहलगाम अटैक से पहले सर्दियों में जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने सरहद पार करके भारतीय इलाकों में घुसपैठ की थी और फिर वारदात को अंजाम दिया था। उसके बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना की काउंटर-टेररिज्म की रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों को अब केवल मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि ऑपरेशनल मौके के तौर पर देखा जा रहा है। इसे ही भारतीय सेना की नई विंटर डॉक्ट्रिन कहा जा रहा है।

आमतौर पर जम्मू-कश्मीर में दिसंबर और जनवरी के महीने, खासकर चिल्लई कलां के दौरान काउंटर-टेरर ऑपरेशंस की कम हो जाते हैं। भारी बर्फबारी, बंद रास्ते और बेहद ठंडे मौसम के चलते ऊंचाईं वाले इलाकों में सैन्य मूवमेंट सीमित रहता था। ऐसे हालात का फायदा उठाकर आतंकी ऊंचाई पर स्थित जंगलों और पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे, रीग्रुपिंग करते थे और अगली गर्मियों की तैयारी करते थे। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद बदला सोच का तरीका

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे हालात का दोबारा मुआयना किया। इस आकलन में यह बात साफ सामने आई कि आतंकवादी सर्दियों को एक “सेफ पीरियड” मानकर अपनी गतिविधियों की प्लानिंग करते हैं और दोबारा से संगठित करते हैं। इसी के बाद सेना ने तय किया कि अब सर्दियों में भी ऑपरेशंस उसी तेजी से चलाए जाएंगे, जैसी गर्मियों में होते हैं।

नई विंटर डॉक्ट्रिन लागू करके भारतीय सेना ने का आतंकियों को यह स्पष्ट तौर यह संदेश दे दिया है कि अब वे सर्दियों का फायदा नहीं उठा सकते। बर्फ, ठंड और दुर्गम इलाका अब सेना के लिए रुकावट नहीं, बल्कि ऑपरेशन का हिस्सा हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine
Indian Army Winter Operations: How Troops Are Fighting Terror and Denying Militants Shelter in Sub-Zero Cold

प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर: अब कोई ब्रेक नहीं

इस डॉक्ट्रिन के तहत सेना ने प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर अपनाया है। इसका मतलब है कि सर्दियों में ऑपरेशंस को कम करने की बजाय उन्हें और मजबूत किया गया है। किश्तवाड़, डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अस्थायी विंटर बेस और सर्विलांस पोस्ट बनाई गई हैं।

पहले जिन इलाकों को सर्दियों में खाली कर दिया जाता था, अब वहां सैनिक लगातार तैनात हैं। बर्फ से ढके पहाड़, घने जंगल और संकरी घाटियों में अभी भी पेट्रोलिंग हो रही है। इससे आतंकियों के लिए किसी भी इलाके को सुरक्षित ठिकाना बनाना मुश्किल हो गया है। (Indian Army New Winter Doctrine)

दशकों से 1990 की इंसर्जेंसी से लेकर 2024 तक चिल्लई कलां आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए सुरक्षित पीरियड या नेचुरल शील्ड की तरह काम करता था। भारी बर्फबारी से ऊंचे दर्रे बंद हो जाते थे, और सेना के बड़े ऑपरेशंस मुश्किल हो जाते थे। हिंटरलैंड जैसे जम्मू रीजन जैसे डोडा, किश्तवाड़ में सेना मुख्य रूप से डिफेंसिव रहती थी। इससे आतंकवादियों को मौसमी फायदा मिलता था और वे लोकल सपोर्ट के जरिए छिपकर सर्वाइव करते थे। इसे “टेम्परेरी लुल इन टेररिस्ट एक्टिविटी” भी कहा जाता था। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: क्या है सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल

नई विंटर डॉक्ट्रिन का बेस सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल है। इसका मतलब है कि किसी भी इलाके में पहले लगातार निगरानी की जाती है। ड्रोन, थर्मल इमेजर और ग्राउंड सेंसर्स से मूवमेंट पर नजर रखी जाती है। जैसे ही पुख्ता इनपुट मिलता है, वहां ऑपरेशन चलाकर इलाके को क्लियर किया जाता है। इसके बाद भी निगरानी जारी रहती है, ताकि आतंकी दोबारा उसी इलाके में वापस न आ सकें।

इसका मतलब है कि इस मॉडल के बाद ऑपरेशंस अब लगातार चलते रहेंगे। सेना का मकसद सिर्फ आतंकियों को मार गिराना नहीं, बल्कि पूरे इलाके को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखना है। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऊंचाई और ठंड वाले इलाकों में भी तैनाती

सर्दियों में ऑपरेशन चलाना शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की भी परीक्षा है। सैनिकों को घुटनों तक बर्फ में चलना पड़ता है, एवलांच संभावित इलाकों से गुजरना होता है और शून्य से काफी नीचे तापमान में रातें बितानी पड़ती हैं।

इसके लिए सेना ने स्पेशलाइज्ड विंटर वॉरफेयर सब-यूनिट्स को आगे बढ़ाया है। इन यूनिट्स को स्नो नेविगेशन, कोल्ड वेदर सर्वाइवल, एवलांच रिस्पॉन्स और ऊंचाई पर कॉम्बैट की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। यही कारण है कि अब चिल्लई कलां के दौरान गश्त और ऑपरेशन लगातार जारी हैं। चिल्लई कलां में दिसंबर-जनवरी में भयंकर सर्दी पड़ती है और भारी बर्फबारी और मुश्किल मौसम के कारण वहां बड़े ऑपरेशंस कम या स्केल डाउन हो जाते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: ऐसा क्या खास है चिल्लई कलां में?

चिल्लई कलां एक फारसी शब्द है, जिसमें “चिल्ला” का मतलब 40, और “कलां” मतलब बड़ा/मेजर होता है। यानी “बड़ी 40 दिनों की ठंड” पड़ती है। मध्य एशिया से आए सूफी संतों ने सर्दियों में 40 दिनों की एकांत साधना (चिल्ला) प्रथा शुरू की, जहां वे श्राइन में रहकर ध्यान करते थे। यह प्रथा कश्मीर में लोकप्रिय हुई और सबसे ठंडे 40 दिनों को “चिल्लई कलां” कहा जाने लगा। इसका जिक्र सूफी संतों की तजकीराओं (जीवनी ग्रंथों) में मिलता है।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इसका इतिहास 1000 साल से ज्यादा पुराना है। ईरानी परंपरा में 21 दिसंबर की रात को “शब-ए-यल्दा” या “शब-ए-चेल्ले” (40 की रात) मनाया जाता है, जो कश्मीर तक पहुंचा। वहीं पहले बौद्ध काल में इसे “शिश्शर मास” भी कहा जाता था।

चिल्लई कलां कश्मीर घाटी की सर्दियों का सबसे कठिन और ठंडा दौर है, जो हर साल 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक लगभग 40 दिनों तक चलता है। यह कश्मीर की सर्दियों का “पीक” पीरियड है, जब ठंड सबसे ज्यादा प्रचंड होती है। इस दौराान तापमान -10 डिग्री फ्रीजिंग पॉइंट से काफी नीचे चला जाता है और भारी बर्फबारी होती है, पानी की पाइपें जम जाती हैं, डल झील जैसी झीलें फ्रीज हो सकती हैं, और ऊंचे इलाकों में रास्ते बंद हो जाते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

Indian Army New Winter Doctrine: टेक्नोलॉजी बनी सबसे बड़ी ताकत

नई विंटर डॉक्ट्रिन में टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम है। ड्रोन से ऊंचे इलाकों की निगरानी की जा रही है, जहां पैदल पहुंचना जोखिम भरा हो सकता है। थर्मल इमेजिंग उपकरण बर्फ और अंधेरे के बीच भी हीट सिग्नेचर पकड़ लेते हैं। ग्राउंड सेंसर्स से जंगलों और घाटियों में हलचल का पता लगाया जा रहा है।

इन सभी उपकरणों को रियल-टाइम इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि फील्ड यूनिट्स को तुरंत इनपुट मिल सके। हालांकि सेना के सूत्र साफ कहते हैं कि तकनीक मददगार है, लेकिन अंतिम फैसला और कार्रवाई जमीन पर मौजूद सैनिक ही करते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

आतंकियों पर बढ़ रहा दबाव

हाल ही में जारी इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक जम्मू रीजन में करीब 30 से 35 आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं। लगातार चल रहे ऑपरेशंस के कारण इन्हें निचले और आबादी वाले इलाकों से पीछे हटकर ऊंचे और निर्जन क्षेत्रों में जाना पड़ा है। स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स और सपोर्ट नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा है।

सर्दियों में जब गांवों तक पहुंचना मुश्किल होता है, तब आतंकियों के लिए राशन, दवाइयां और कम्युनिकेशन बनाए रखना और भी कठिन हो जाता है। सेना का मानना है कि यही दबाव आतंकियों को कमजोर करता है। (Indian Army New Winter Doctrine)

जॉइंट और इंटीग्रेटेड अप्रोच

नई रणनीति में सेना अकेले काम नहीं कर रही है। जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप, फॉरेस्ट गार्ड्स, विलेज डिफेंस गार्ड्स और सिविल एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर एक साझा सिक्योरिटी ग्रिड बनाया गया है।

इंटेलिजेंस शेयरिंग तेज हुई है और ऑपरेशन के बाद इलाके की सुरक्षा जिम्मेदारी तय की जाती है। इससे आतंकियों के लिए दोबारा घुसपैठ या वापसी की गुंजाइश कम हो जाती है। (Indian Army New Winter Doctrine)

ग्रामीण इलाकों में भरोसा कायम रखने की कोशिश

बर्फीले और दूरदराज के गांवों में सेना की मौजूदगी से स्थानीय लोगों में भी भरोसा बढ़ रहा है। पहले जो इलाके सर्दियों में अलग-थलग पड़ जाते हैं औऱ जिसका फादयाा आतंकी उठाते थे, अब वहं सेना की लगातार मौजूदगी देखने को मिल रही है। विलेज डिफेंस गार्ड्स से गांवों में सुरक्षा पुख्ता हो रही है। सेना लगातार ग्रामीणों से संपर्क रखती है, ताकि डर और अफवाह का माहौल न बने।

स्थानीय लोग भी अब संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी तुरंत सुरक्षा बलों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे ऑपरेशंस करने में आसानी हो रही है।

वहीं, नई विंटर डॉक्ट्रिन के जरिए सेना ने यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद के लिए अब कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होगा। बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी रातें और सुनसान जंगल अब आतंकियों के लिए ढाल नहीं बनेंगे। (Indian Army New Winter Doctrine)

DAC meeting: डीएसी बैठक टली, अब 29 दिसंबर को होगी अहम मीटिंग, इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की डेडलाइन 15 जनवरी तक बढ़ी

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes
DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes (File Photo)

DAC meeting: देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर मुहर लगाने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक शुक्रवार को नहीं हो सकी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली यह इस साल की आखिरी बैठक थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि बैठक को इसी साल के लिए टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि बैठक अगले हफ्ते हो सकती है। इस बैठक में देश की तीनों सेनाओं को उन सभी हथियारों और उपकरणों पर मुहर लग सकती है जिसकी उन्हें बेहद सख्त जरूरत है।

DAC meeting: क्यों टल गई आज की डीएसी बैठक

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, आज डीएसी की बैठक की औपचारिक शुरुआत तो की गई थी, लेकिन काउंसिल के सभी सदस्य मौजूद नहीं थे। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह विदेश दौरे पर थे। वह मिस्र की यात्रा से लौट रहे थे। डीएसी में तीनों सेनाओं के प्रमुखों की मौजूदगी जरूरी होती है, क्योंकि फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। ऐसे में जब सभी सदस्य उपलब्ध नहीं हो पाए, तो बैठक का एजेंडा आगे नहीं बढ़ाया गया। (DAC meeting)

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उनकी गैरमौजूदगी में इतने बड़े और संवेदनशील रक्षा सौदों पर चर्चा करना सही नहीं माना गया। इसी वजह से बैठक को टालकर 29 दिसंबर की नई तारीख तय की गई है। यानी इसी साल में ही यह बैठक फिर से होगी।

हालांकि बैठक में रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) की अंतिम तारीख को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया है। यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए सेना, नौसेना और वायुसेना को जरूरी हथियार और उपकरण जल्दी उपलब्ध कराए जाते हैं।

DAC meeting: क्यों बढ़ी इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट की डेडलाइन

डीएसी बैठक के टलने का सीधा असर इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) प्रक्रिया पर भी पड़ा है। पहले ईपी की अंतिम तारीख 19 नवंबर को खत्म हो चुकी थी। इसके बाद उम्मीद थी कि दिसंबर के आखिर तक पेंडिंग मामलों को निपटा लिया जाएगा। लेकिन चूंकि अब ईपी की समयसीमा को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया गया है। तो उम्मीद है कि पेंडिंग मामलों को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

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DAC meeting: क्या है इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट, और यह कैसे करती है काम

जब देश की सीमाओं पर अचानक तनाव बढ़ता है, कोई बड़ा सैन्य ऑपरेशन होता है या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तब भारतीय सेना को इंतजार करने का वक्त नहीं होता। ऐसे समय में हथियार, गोला-बारूद, ड्रोन, मिसाइल, स्पेयर पार्ट्स और दूसरे जरूरी उपकरण तुरंत चाहिए होते हैं।

इसके लिए इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाताा है, जिसके तहत सेना लंबी खरीद प्रक्रिया में पड़े बिना तुरंत जरूरी हथियार, गोला-बारूद और उपकरण खरीद सकती हैं। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब अचानक हालात बिगड़ते हैं या किसी बड़े ऑपरेशन के बाद हथियारों की तुरंत जरूरत महसूस होती है।

आमतौर पर डिफेंस डील्स में डीएपी–2020 (डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर) जैसी लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन ईपी का मकसद सिर्फ एक होता है, कम से कम समय में सेना को जरूरत को पूरा करना।

‘ट्रांच’ में क्यों बांटा गया है ईपी को

अभी ईपी-6 चल रहा है, जिसकी डेडलाइन को बढ़ा कर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया है। यानी इस तारीख तक सभी पेंडिंग कॉन्ट्रैक्ट्स को साइन करना होगा। इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट एक बार में नहीं, बल्कि चरणों में दी जाती है। इन्हें ईपी–1, ईपी–2, ईपी–3 जैसे नाम दिए जाते हैं। हर ट्रांच एक खास हालात के लिए होती है, जैसे सीमा पर तनाव, चीन के साथ टकराव या किसी बड़े आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के बाद ईपी बनाई जाती है। हर ट्रांच में सरकार यह तय करती है कि कितने पैसे तक की खरीद होगी, कितने समय के लिए यह व्यवस्था लागू रहेगी और किन चीजों को प्राथमिकता दी जाएगी। (DAC meeting)

DAC meeting: क्या है पैसे का पूरा गणित?

ईपी के तहत हर एक कॉन्ट्रैक्ट की एक तय सीमा होती है। किसी भी एक सौदे की कीमत 300 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यह सीमा हथियारों और उपकरणों, दोनों तरह की खरीद पर लागू होती है।

एक बार जरूरत तय हो जाने के बाद कॉन्ट्रैक्ट को 40 दिनों के अंदर फाइनल करना होता है। यही वजह है कि इसे फास्ट ट्रैक कहा जाता है। इसके बाद सप्लायर को 12 महीने, यानी एक साल के भीतर ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

अगर तय समय में डिलीवरी नहीं होती, तो अब सरकार उस कॉन्ट्रैक्ट को फोरक्लोज, यानी रद्द भी कर सकती है। हाल के समय में इस नियम को और सख्त किया गया है, ताकि कंपनियां देरी न करें।

हर ईपी ट्रांच का एक बजट फ्रेम होता है। ईपी–6 ट्रांच में कुल सीमा करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी गई है। यह पैसा एक ही सौदे में नहीं जाता, बल्कि कई छोटे–छोटे कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए खर्च होता है।

DAC meeting: स्वदेशी खरीद को क्यों मिलती है प्राथमिकता

ईपी में स्पष्ट नियम है कि जहां संभव हो, वहां भारतीय कंपनियों से ही खरीद की जाए। यानी इंडिजिनस सोर्स को पहली प्राथमिकता मिलती है। अगर किसी सिस्टम या हथियार के लिए आयात जरूरी हो, तो उसके लिए अलग से रक्षा मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है। इसका मकसद सिर्फ तेजी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना भी है।

कितने समय के लिए होती है ईपी

आमतौर पर एक ईपी ट्रांच 3 से 6 महीने या फिर एक साल के लिए लागू रहती है। लेकिन अगर बातचीत चल रही हो और सौदे अधूरे हों, तो इसकी अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। जैसे हाल ही में ईपी की समयसीमा नवंबर 2025 में खत्म हो गई थी, लेकिन इसे बढ़ाकर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया, ताकि चल रही नेगोशिएशंस पूरी की जा सकें। (DAC meeting)

ईपी में असली पावर है किसके पास

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की सबसे बड़ी ताकत तीनों सेनाओं के वाइस चीफ्स के पास होती है। सेना में यह पावर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के पास है। नौसेना में वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ यह अधिकार इस्तेमाल करते हैं। वायुसेना में यह जिम्मेदारी डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पास होती है। यही अधिकारी ईपी के तहत कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी देते हैं और फाइनेंशियल पावर एक्सरसाइज करते हैं। इसमें हर कॉन्ट्रैक्ट 300 करोड़ रुपये तक का हो सकता है, और ये फास्ट-ट्रैक पर अप्रूव करते हैं। यानी 40 दिनों में कॉन्ट्रैक्ट फाइनल और 1 साल में  ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।

डिप्टी चीफ्स का रोल आमतौर पर सपोर्टिंग जैसे प्लानिंग या तकनीकी सलाह देना होता है। सामान्य रक्षा खरीद में उनके पास अलग वित्तीय अधिकार होते हैं, लेकिन ईपी में मुख्य फैसला वाइस चीफ ही लेते हैं।

क्या करता है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड

ईपी के मामलों में एक अहम भूमिका होती है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड, यानी एसपीबी की। यह बोर्ड हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तहत काम करता है। एसपीबी की बैठकें चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (CISC) की अध्यक्षता में होती हैं। एसपीबी एक जॉइंट बोर्ड है, जिसमें तीनों सर्विसेज (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) के थ्री-स्टार या टू-स्टार लेवल ऑफिसर्स (जैसे डायरेक्टर जनरल्स या संबंधित ब्रांच हेड्स) और अन्य संबंधित प्रतिनिधि शामिल होते हैं।

एसपीबी यह तय करता है कि जो चीज खरीदी जा रही है, वह वाकई जरूरी है या नहीं। इसे ही एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी, यानी एओएन कहा जाता है। एओएन मिलने के बाद ही आगे खरीद की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले यह काम एक अलग कमेटी करती थी, लेकिन अब एसपीबी के जरिए तीनों सेनाओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: कैसे चलता है ईपी का पूरा प्रोसेस

सबसे पहले सेना, नौसेना या वायुसेना अपनी तत्काल जरूरत पहचानती है। इसके बाद मामला एसपीबी के पास जाता है, जहां से एओएन मिलती है। फिर डिफेंस फाइनेंस या इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल एडवाइजर से सहमति ली जाती है।

इसके बाद सप्लायर से बातचीत होती है और वाइस चीफ की मंजूरी से कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जाता है। यह सब काम 40 दिनों के भीतर पूरा करना होता है।

अगर कोई चीज विदेश से मंगानी हो, तो रक्षा मंत्रालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।

ईपी की पूरी ट्रांच को अंत में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल, यानी डीएसी, से मंजूरी मिलती है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं।

कैपिटल और रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट में फर्क

ईपी के तहत दो तरह की खरीद होती है। एक होती है कैपिटल प्रॉक्यूरमेंट, यानी नए हथियार और बड़े सिस्टम खरीदे जाते हैं। वहीं, दूसरी होती है रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट, जिसमें गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस से जुड़ी चीजें आती हैं। ईपी का फोकस दोनों में होता है, लेकिन असली मकसद होता है सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस, यानी युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रहना। (DAC meeting)

DAC meeting: क्यों जरूरी मानी जाती है ईपी

इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की शुरुआत 2016 के उरी हमले के बाद हुई थी। इसके बाद गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव के समय इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी ईपी की एक नई ट्रांच लाई गई।

इस व्यवस्था की वजह से सेना को वक्त पर जरूरी हथियार मिलते हैं और किसी भी आपात स्थिति में तैयारी में कमी नहीं रहती। हालांकि, इसके साथ यह भी साफ कर दिया गया है कि इंडस्ट्री को तय समय में सप्लाई करनी ही होगी, वरना कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकता है।

पिछले कुछ सालों में भारत ने कई बार इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट का सहारा लिया है। ईपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न तो लंबा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाता है और न ही ट्रायल जैसा लंबा प्रोसेस अपनाया जाता है। आमतौर पर एक डील की सीमा करीब 300 से 400 करोड़ रुपये तक होती है और हथियार छह महीने के भीतर सेना को मिल जाते हैं। सामान्य रक्षा सौदों में यही प्रक्रिया दो से तीन साल तक खिंच सकती है। (DAC meeting)

फास्ट ट्रैक परचेज का भी विकल्प

इसके अलावा डिफेंस इक्विपमेंट्स की तुरंत खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय के पास एक और विकल्प होता है, जिसे फास्ट ट्रैक परचेज (एफटीपी) कहा जाता है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट जैसी ही है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। अगर ईपी की समयसीमा खत्म होने के बाद भी अगर कुछ सौदे अटके रहते हैं, तो उन्हें एफटीपी के तहत आगे बढ़ाया जाता है। (DAC meeting)

क्या है डीएसी और क्यों अहम है

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल रक्षा मंत्रालय की सबसे हाई पर्चेज कमेटी होती है। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के चेयरमैन शामिल होते हैं।

डीएसी यह तय करती है कि सेना को किस तरह के हथियार और सिस्टम खरीदने हैं। एक बार डीएसी किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे देती है, तभी आगे कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू होते हैं। इसलिए डीएसी की मंजूरी को किसी भी रक्षा सौदे का पहला और सबसे अहम कदम माना जाता है। (DAC meeting)

DAC meeting: 29 दिसंबर की बैठक से क्या उम्मीदें

अब सभी की नजर 29 दिसंबर को होने वाली डीएसी बैठक पर टिकी है। माना जा रहा है कि यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक होगी और इसमें कई बड़े प्रस्तावों पर चर्चा हो सकती है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति को आगे बढ़ाया जा सके। (DAC meeting)

संभावना है कि बैठक में भारतीय सेना के लिए बड़ी संख्या में लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर फैसला लिया जा सकता है। इसके अलावा वायुसेना के लिए लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल, जैसे एस्ट्रा मार्क-2, और कुछ विदेशी सिस्टम पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।

MRSAM और टैंक प्रोजेक्ट भी एजेंडे में

डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (MRSAM) की खरीद का प्रस्ताव भी आ सकता है। इसका मकसद नौसेना के युद्धपोतों को हवाई खतरों से सुरक्षा देना है।

वहीं, भारतीय सेना अपने टी-90 टैंकों के स्वदेशी ओवरहॉल का प्रस्ताव भी रख सकती है। इसके तहत करीब 200 टैंकों को देश में ही आधुनिक बनाया जाएगा। इससे न सिर्फ विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। (DAC meeting)

इस विदेशी सौदों पर भी हो सकती है चर्चा 

हालांकि सरकार का जोर स्वदेशी प्रणालियों पर है, लेकिन कुछ विदेशी सौदों पर भी चर्चा हो सकती है। इनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन को लीज पर लेने का प्रस्ताव शामिल है। भारत पहले ही 31 ऐसे ड्रोन खरीदने का करार कर चुका है, जो 2028 से भारत में आने शुरू होंगे।

इसके अलावा वायुसेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट और कुछ विशेष हथियार प्रणालियों पर भी फैसला लिया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा खरीद में देरी भारत के लिए ठीक नहीं है। सीमाओं पर चुनौतियां बनी हुई हैं और तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में जरूरी है कि लंबित सौदों को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए। (DAC meeting)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए रेगिस्तान से लद्दाख तक 24,000 फीट पर उड़ने वाले टैक्टिकल ड्रोन, 8 घंटे रहें हवा में, बिना रनवे भरें उड़ान

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area

Tactical RPA RFI: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना अब भविष्य की जंग के लिए खुद को एक नए स्तर पर तैयार कर रही है। सीमाओं पर बदलते खतरे, ड्रोन युद्ध की बढ़ती भूमिका और चीन-पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की बढ़ती हिमाकत को देखते हुए सेना ने एक अहम कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय की ओर से टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (टैक आरपीए) यानी मॉडर्न मिलिट्री ड्रोन के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है।

आरएफआई के जरिए सेना यह जानना चाहती है कि भारत में कौन-कौन सी कंपनियां ऐसे एडवांस हथियारबंद ड्रोन बना सकती हैं, जो मैदानी इलाकों से लेकर ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में हर हालात में काम कर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: सेना को चाहिए 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन

जारी आरएफआई के तहत सेना लगभग 20 टैक्टिकल आरपीए ड्रोन शामिल करने की योजना बना रही है। यह पूरी खरीद मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत होगी। सेना की योजना के मुताबिक इनमें से 10 ड्रोन मैदानी इलाकों के लिए होंगे, जबकि 10 को खास तौर पर ऊंचाई वाले और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाएगा। सेना की तैयारी है कि ये ड्रोन ऐसे होने चाहिए, जो पंजाब और राजस्थान जैसे मैदानी इलाकों से लेकर लद्दाख और अरुणाचल की ऊंची चोटियों तक, हर जगह काम कर सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन दिन-रात, हर मौसम और हर हालात में उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

सेना की इस पहल को हाल के समय में सीमाओं पर बदले हालात से जोड़कर देखा जा रहा है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल और लाइन ऑफ कंट्रोल पर ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। इन ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन देश निगरानी से लेकर, हथियार गिराने और जासूसी में लगातार किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय सेना के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सिर्फ जवाबी कार्रवाई न करे, बल्कि पहले से ही दुश्मन की हर चाल पर नजर रख सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: अपग्रेड करने का भी हो विकल्प

सेना के मुताबिक टैक्टिकल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म होगा, जो एक साथ कई काम कर सके। इसमें निगरानी, जासूसी, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और जरूरत पड़ने पर सीधे हमले की क्षमता भी होनी चाहिए। ड्रोन का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए, ताकि भविष्य में बिना पूरे सिस्टम को बदले नए सेंसर और हथियार जोड़े जा सकें। सेना चाहती है कि ये ड्रोन आने वाले 15–20 साल तक तकनीकी रूप से एडवांस बने रहें, ताकि उन्हें अपग्रेड भी किया जा सके। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: झेल सकें 60 नॉट्स तक की तेज हवा

सेना ने आरएफआई में साफ किया है कि ये ड्रोन दिन और रात दोनों समय काम करने में सक्षम होने चाहिए। खराब मौसम, तेज हवा, बारिश, अत्यधिक ठंड और गर्मी जैसे हालात में भी ये काम कर सकें। ऊंचाई वाले इलाकों में ऐसे ड्रोन चााहिए जो 60 नॉट्स तक की तेज हवा झेल सकें, जबकि मैदानी इलाकों में इस्तेमाल किए जाने वाले 30 नॉट्स तक की हवा में भी स्थिर उड़ान भर सकें। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1
Tactical RPA RFI Procurement- Indian Army Issues RFI for High-End Armed Drones for Plains and High Altitude Area-1

Tactical RPA RFI: माइनस 40 डिग्री सेल्सियस में भी करे काम

तापमान को लेकर भी सेना ने मानक तय किए हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में ड्रोन को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 30 डिग्री सेल्सियस तक काम करना होगा। वहीं मैदानी इलाकों में यह सीमा माइनस 20 से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस तक रखी गई है। इसका मतलब है कि इन ड्रोन को सियाचिन जैसी ठंडी जगह और राजस्थान जैसी गर्म जगह पर भी समान रूप से सक्षम होना होगा। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: रेंज 400 किलोमीटर तक

ड्रोनों की उड़ान क्षमता को लेकर सेना ने कड़े मानक तय किए हैं। ड्रोन को सामान्य रेडियो कंट्रोल यानी लाइन ऑफ साइट मोड में कम से कम 120 किलोमीटर तक काम करना होगा। वहीं अगर सैटेलाइट कम्युनिकेशन का इस्तेमाल किया जाए, तो इसकी रेंज 400 किलोमीटर या उससे अधिक होनी चाहिए। इससे सेना को दूर-दराज के इलाकों में भी निगरानी और ऑपरेशन करने की सुविधा मिलेगी। (Tactical RPA RFI)

Tactical RPA RFI: 8 घंटे लगातार हवा में रहें ड्रोन

इसके अलावा आरएफआई की शर्तों में ऊंचाई को लेकर सेना में स्टैंडर्ड तय किए हैं। मैदानी इलाकों के लिए ड्रोन को कम से कम 14,000 फीट की ऊंचाई तक काम करने में सक्षम होना होगा। वहीं ऊंचाई वाले इलाकों के लिए यह सीमा 24,000 फीट तक रखी गई है। इसके साथ ही ड्रोन में कम से कम 8 घंटे लगातार हवा में रहने की क्षमता भी होनी चाहिए। ताकि लंबे समय तक निगरानी और मिशन को अंजाम दिया जा सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: रनवे पर निर्भरता नहीं

सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि ड्रोन को उड़ाने के लिए लंबे और पक्के रनवे की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों में ऐसी सुविधाएं हमेशा उपलब्ध नहीं होतीं। इसलिए ड्रोन या तो सीधे ऊपर उठकर यानी वीटीओएल मोड में उड़ान भर सके, या फिर 200 मीटर की कच्ची पट्टी से टेकऑफ कर सके। साथ ही कुछ मामलों में कैटापल्ट लॉन्च और पैराशूट के जरिए लैंडिंग का भी फीचर होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

50 किमी दूर से पहचानने की हो क्षमता

ड्रोन के सेंसर और पेलोड को लेकर भी सेना चाहती है कि ड्रोन में ऐसे कैमरे और सिस्टम लगाए जाएं, जो दिन और रात दोनों समय हाई-डेफिनिशन फोटो और वीडियो दे सकें। इसमें इलेक्ट्रो ऑप्टिक और इंफ्रारेड कैमरा, थर्मल सेंसर, और लेजर बेस्ड सिस्टम शामिल होंगे, जो अंधेरे, धुंध और खराब मौसम में भी दुश्मन की हलचल को पकड़ सकें। इनमें लेजर रेंज फाइंडर और लेजर डिजाइनटर भी होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर सटीक हमला किया जा सके।

इसके अलावा ड्रोन को इंसानों और वाहनों को 40-50 किलोमीटर दूर से पहचानने और करीब 15 किलोमीटर से साफ तौर पर पहचानने में सक्षम होना चाहिए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

पकड़ सकें दुश्मन के सिग्नल 

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि यह ड्रोन सिर्फ देखने वाला नहीं होगा, बल्कि सुनने वाला भी होगा। इसमें ईएलआईएनटी और कॉमइंट सिस्टम लगाए जाएंगे, जो दुश्मन के रेडियो, मोबाइल, रडार और कम्युनिकेशन सिग्नल को पकड़ सकें। सेना चाहती है कि ड्रोन 100 किलोमीटर दूर से भी ऐसे सिग्नल पकड़ सके। इससे दुश्मन की गतिविधियों की पहले से जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा ड्रोन में एफओपीईएन रडार भी होना चाहिए, जो जंगलों के अंदर छिपे टारगेट्स, बर्फीले इलाकों और पहाड़ी ढलानों पर मौजूद गतिविधियों को भी आसानी से पहचान सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

जैमिंग और जीपीएस फेल होने पर भी उड़ान भरें ड्रोन

आज की जंग में दुश्मन सबसे पहले जीपीएस जैमिंग और साइबर अटैक करता है। सेना इसलिए चाहती है कि ड्रोन सिर्फ जीपीएस पर निर्भर न रहे। ड्रोन को जीपीएस, ग्लोनास, गैलीलियो और नाविक, चारों सिस्टम इस्तेमाल करने होंगे। अगर फिर भी जीपीएस सिग्नल खत्म हो जाए, तो ड्रोन आईएनएस, आईएमयू और विजुअल नेविगेशन से उड़ान जारी रख सके। वहीं, अगर हालात बहुत खराब हों, तो ड्रोन अपने आप सुरक्षित तरीके से वापस बेस पर लौट आए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: हथियार भी ढो सकें ड्रोन

इन ड्रोनों को केवल निगरानी तक के लिए सीमित नहीं रखा गया है। सेना चाहती है कि यह ड्रोन 200 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम हो। इसमें एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, प्रिसिजन ग्लाइड बम, एंटी-टैंक हथियार और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल हैं। यानी जरूरत पड़ने पर यह ड्रोन दुश्मन पर सीधा हमला भी कर सकेगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

डेटा सुरक्षा सबसे अहम

आरएफआई में कहा गया है कि ड्रोन से मिलने वाला सारा डेटा बेहद संवेदनशील होगा। इसलिए सेना ने साफ कहा है कि सारा डेटा 256-बिट एईएस एन्क्रिप्शन से सुरक्षित होना चाहिए। अगर किसी कारण से ड्रोन गिर जाए या दुश्मन के हाथ लग जाए, तो उसमें मौजूद डेटा अपने आप नष्ट हो जाना चाहिए।

भारतीय सिस्टम से हो सके कनेक्ट

आरएफआई के मुताबिक यह ड्रोन भारतीय सेना के मौजूदा कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस सिस्टम से कनेक्ट होना चाहिए। ताकि लाइव वीडियो और डेटा सीधे कमांड सेंटर तक पहुंचता रहे। इसे सेना के काउंटर-ड्रोन सिस्टम के साथ भी इंटीग्रेट किया जाएगा, ताकि पूरे बैटलफील्ड की एक साझा तस्वीर मिल सके। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता

आरएफआई में कहा गया इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। आरएफआई के अनुसार, इसमें सिर्फ भारतीय कंपनियां या भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी करने वाली विदेशी कंपनियां ही हिस्सा ले सकती हैं। कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि ड्रोन में कितने प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा और भविष्य में मेंटेनेंस और सपोर्ट की व्यवस्था कैसे की जाएगी। इसके साथ ही कंपनियां यह भी बताएं कि भविष्य में किन-किन हिस्सों को और ज्यादा स्वदेशी बनाया जा सकता है। सरकार चाहती है कि सिर्फ ड्रोन खरीदे न जाएं, बल्कि देश में ही पूरा ड्रोन इकोसिस्टम तैयार किया जाए। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Tactical RPA RFI: 18 मार्च 2026 तक का समय

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई का जवाब देने के लिए कंपनियों को 18 मार्च 2026 तक का समय दिया है। सके बाद सेना सभी जवाबों का अध्ययन करेगी, तकनीकी जरूरतें तय करेगी और फिर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। (TACTICAL REMOTELY PILOTED AIRCRAFTS)

Akash NG Missile को क्यों कहा जा रहा है “पुअर मैंस पैट्रियट”! कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले ड्रोन को भी करेगी ढेर

Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design
Akash NG Missile Clears User Evaluation Trials With Extended Range and Sleeker Design

Akash NG Missile: डीआरडीओ ने हाल ही में आकाश-न्यू जेनरेशन मिसाइल सिस्टम यानी आकाश-एनजी का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे हो गए हैं। जिसके बाद भारतीय वायुसेना में इस आधुनिक सतह-से-हवा मिसाइल सिस्टम को शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है। ट्रायल्स के दौरान आकाश-एनजी मिसाइल ने अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर उड़ रहे हवाई लक्ष्यों को सटीक तरीके से इंटरसेप्ट किया।

डीआरडीओ की तरफ जारी जानकारी के मुताबिक, इन परीक्षणों में मिसाइल सिस्टम को रियलिस्टिक वारटाइम कंडीशंस में परखा गया। इसमें लंबी दूरी पर ऊंचाई से आने वाले हवाई खतरे और सीमा के पास बहुत कम ऊंचाई पर उड़ रहे लक्ष्यों को भी सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। यह ट्रायल्स ओडिशा के तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किए गए, जहां पूरी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच ट्रायल संपन्न हुआ।

आकाश मिसाइल की कहानी कई दशक पुरानी है। डीआरडीओ ने 1980 के दशक के अंत में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत आकाश मिसाइल के डेवलपमेंट का काम शुरू किया था। इस कार्यक्रम का नेतृत्व उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कर रहे थे। शुरुआती दौर में इस मिसाइल को एक शॉर्ट-टू-मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल के रूप में डेवलप किया गया, ताकि देश के संवेदनशील इलाकों और महत्वपूर्ण ठिकानों को हवाई हमलों से सुरक्षित रखा जा सके।

1990 और 2000 के दशक में आकाश मिसाइल के कई डेवलपमेंटल ट्रायल्स किए गए। इसके बाद भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना ने इसके व्यापक यूजर ट्रायल्स किए। इन परीक्षणों में मिसाइल की रेंज, सटीकता और एक साथ कई लक्ष्यों को मार गिराने की क्षमता को परखा गया। सफल परीक्षणों के बाद वर्ष 2014 में आकाश मिसाइल को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया और इसके अगले वर्ष इसे भारतीय थलसेना में भी तैनात किया गया।

आकाश मिसाइल सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह एक साथ कई एरियल टारगेट्स को ग्रुप मोड या ऑटोनॉमस मोड में निशाना बना सके। इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स यानी ईसीसीएम की सुविधा दी गई, जिससे यह दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम को भी बेअसर कर सके। समय के साथ भारतीय वायुसेना और थलसेना ने आकाश मिसाइल की कई स्क्वाड्रन और रेजिमेंट तैयार कीं।

हालांकि बदलते युद्ध के स्वरूप और नई तकनीकों के चलते डीआरडीओ ने आकाश मिसाइल के एक और आधुनिक वर्जन पर काम शुरू किया। जहां पुराने आकाश मिसाइल की ऑपरेशनल रेंज लगभग 27 से 30 किलोमीटर थी, वहीं, आकाश-एनजी की रेंज बढ़कर करीब 70 किलोमीटर तक पहुंच गई है। यह बदलाव देश के एयर डिफेंस के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

आकाश-एनजी मिसाइल का डिजाइन पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और स्लीक बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिसाइल का आकार और वजन दोनों कम किए गए हैं, जिससे इसकी तैनाती और ऑपरेशन आसान हो गया है। इसके साथ ही इसका ग्राउंड सिस्टम फुटप्रिंट भी छोटा किया गया है, जिससे कम जगह में भी इसे तैनात किया जा सकता है।

इस नए मिसाइल सिस्टम में पूरी तरह स्वदेशी कु बैंड रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है। यह सीकर टारगेट को लास्ट फेज में खुद पहचान कर उस पर लॉक करता है। इसकी खूबी यह है कि यह सीकर लो रडार क्रॉस सेक्शन टारगेट्स जैसे ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स को टर्मिनल फेज में लॉक कर सकता है। इसके साथ ही आकाश-एनजी में नया लॉन्चर, मल्टी-फंक्शन रडार और कमांड, कंट्रोल एवं कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल किया गया है, जिससे पूरे सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता और सटीकता बढ़ गई है। इसमें एईएसए मल्टी-फंक्शन रडार (MFR), इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग, 360° कवरेज, 20-70° एलिवेशन फीचर है। खास बात यह है कि रडार की मदद से एक बैटरी 10 टारगेट्स को एक साथ एंगेज कर सकती है।

आकाश-एनजी को कैनिस्टराइज्ड लॉन्चर सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। कैनिस्टराइज्ड सिस्टम का मतलब होता है कि मिसाइल को एक खास तरह के सील्ड कंटेनर में रखा जाता है। इससे मिसाइल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च किया जा सकता है। इससे ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज दोनों आसान होता है और मिसाइल की ऑपरेशनल रेडीनेस को बेहतर होती है।

डीआरडीओ के अधिकारियों के अनुसार, आकाश-एनजी को खासतौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह मिसाइल उन हवाई खतरों को रोकने में सक्षम है, जो तेज रफ्तार से उड़ते हैं और जिनका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस बहुत कम होता है। कम आरसीएस वाले टारगेट्स को रडार पर पकड़ना कठिन होता है, लेकिन आकाश-एनजी को इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स से पहले इसके कई अहम फ्लाइट टेस्ट किए गए थे। इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2021 को किया गया था, जिसमें इसकी बुनियादी क्षमताओं को परखा गया। इसके बाद मार्च और जुलाई 2021 में इसके और परीक्षण किए गए। जुलाई 2021 में एक्टिव सीकर से लैस मिसाइल ने एक हाई-स्पीड अनमैन्ड एरियल टारगेट को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया था।

जनवरी 2024 में आकाश-एनजी का एक और महत्वपूर्ण फ्लाइट टेस्ट किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़ रहे एक अनमैन्ड एरियल टारगेट को निशाना बनाया। इस सफलता के बाद इसके यूजर ट्रायल्स का रास्ता साफ हुआ। हालिया यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स में मिसाइल ने सभी प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स यानी पीएसक्यूआर को पूरा किया।

डीआरडीओ ने बताया कि इन ट्रायल्स में पूरे वेपन सिस्टम की कार्यक्षमता को परखा गया। इसमें मिसाइल, लॉन्चर, रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम सभी शामिल थे। अलग-अलग प्रकार के हवाई खतरों के खिलाफ सिस्टम की प्रतिक्रिया और सटीकता को जांचा गया।

आकाश-एनजी प्रोजेक्ट को सितंबर 2016 में मंजूरी दी गई थी। यह मिसाइल सिस्टम एक क्लीन-शीट डिजाइन पर आधारित है, यानी इसे पुराने आकाश सिस्टम का संशोधित रूप नहीं बल्कि पूरी तरह नए सिरे से डिजाइन किया गया है। पुराने आकाश इंटरसेप्टर का बेस सोवियत काल की एसए-6 मिसाइल थी, जबकि आकाश-एनजी आधुनिक तकनीक पर आधारित है।

आकाश-एनजी में ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इस मोटर में दो अलग-अलग फेज में थ्रस्ट मिलता है, जिससे मिसाइल को बेहतर मैन्यूवर करने की क्षमता मिलती है। इसके साथ इसमें स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्य की दूरी बढ़ने पर भी सटीकता बनी रहती है। साथ ही डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर मिड-फेज में “साइलेंट कोस्टिंग” करके हीट सिग्नेचर कम करता है, जिससे दुश्मन के इंफ्रारेंड सेंसर्स से बचने में मदद मिलती है।

डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का पहला पल्स (बूस्ट फेज) लॉन्च के 5-10 सेकंड में फुल थ्रस्ट देता है, जिससे मिसाइल की रफ्तार मैक 2.5+ तक पहुंच जाती है। फिर मोटर ऑफ हो जाती है और मिसाइल बैलिस्टिक ग्लाइड पर जाती है। वहीं कोस्टिंग फेज में स्पीड मेंटेन रहती है लेकिन एग्जॉस्ट प्लूम और हीट कम होती है। आखिरी 10-15 किमी पर दूसरा पल्स एक्टिवेट होता है, जो टर्मिनल मैन्यूवरिंग के लिए हाई एनर्जी देता है जिसमें तेज टर्न्स, हाई-जी पुल-अप किए जा सकते हैं।

इस डिजाइन से न सिर्फ रेंज बढ़ती है बल्कि एंटी-सैचुरेशन अटैक कैपेबिलिटी भी बूस्ट होती है। सैचुरेशन अटैक में अगर दुश्मन 10-20 ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स एक साथ भेजता है, ताकि डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड किया जा सके। लेकिन आकाश-एनजी की कोस्टिंग फेज में कम हीट/आईआर सिग्नेचर से दुश्मन के इंफ्रा-रेड सर्च एंड ट्रैक सेंसर्स को मिसाइल देर से डिटेक्ट होती है– इससे बैटरी के रडार को प्रायरिटी तय करने में ज्यादा वक्त मिलता है।

कु बैंड आरएफ सीकर के साथ मिलकर यह फीचर “होम-ऑन-जैम” मोड को सपोर्ट करता है। अगर दुश्मन जैमिंग करता है, तो मिसाइल जैम सिग्नल पर ही लॉक कर लेती है। डुअल-पल्स की एनर्जी सेविंग से टर्मिनल फेज में सीकर के लिए ज्यादा पावर बचती है, जो जैमिंग में भी एक्यूरेट रहता है।

इसलिए आकाश एनजी को “पुअर मैंस पैट्रियट” भी कहा जा रहा है। जो न केवल सस्ता है बल्कि चीन और पाकिस्तान की हूथी स्टाइल ड्रोन स्वार्म स्ट्रैटेजी के खिलाफ भी बेहद असरदार हैं। ऑपरेशन सिंदूर में जैसे पुराने आकाश सिस्टम ने कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए थे, वहीं, आकाश एनजी वर्जन एलएसी पर चीन के हाई-स्पीड यूएवी जैसे डब्ल्यूजे-700) के लिए काल साबित होगा।

Indian Army Social Media Policy: सेना का बड़ा फैसला! जवानों के लिए सोशल मीडिया यूज करने के नियमों में किया ये बड़ा बदलाव

Indian Army Social Media Policy
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Indian Army Social Media Policy: सेना ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ा फैसला किया है। सेना ने अपनी पुरानी सोशल मीडिया पॉलिसी में बड़ा बदलाव करते हुए सैन्य कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को लेकर बड़ी राहत दी है। सेना ने जवानों और अफसरों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, लेकिन साथ ही कुछ प्रतिबंध भी लगाए हैं। सेना ये फैसला सेना प्रमुख के उस बयान के बाद लिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन आज के समय की जरूरत बन गया है, लेकिन जवानों को को सोशल मीडिया पर रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के बीच अंतर समझना होगा।

Indian Army Social Media Policy: देखने और मॉनिटरिंग तक की परमिशन

रक्षा समाचार को मिली जानकारी के मुताबिक सेना की तरफ से हाल ही में नए दिशा-निर्देशों जारी किए हैं। जिनके मुताबिक अब सेना कर्मियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के इस्तेमाल की अनुमति केवल देखने और मॉनिटरिंग तक ही होगी। इस नई व्यवस्था के तहत इंस्टाग्राम पर किसी भी तरह का कमेंट, राय या प्रतिक्रिया साझा करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यह संशोधित पॉलिसी तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: नहीं कर सकते संवाद या रिएक्ट

सेना की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि इंस्टाग्राम पर सेना कर्मियों की भूमिका अब केवल “पैसिव पार्टिसिपेशन” यानी निष्क्रिय भागीदारी तक सीमित रहेगी। इसका मतलब यह है कि जवान और अधिकारी प्लेटफॉर्म पर मौजूद जानकारी को देख सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से संवाद या रिएक्ट नहीं कर सकते। सेना के अनुसार, यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और ऑपरेशनल सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: व्हाट्सएप, टेलीग्राम को लेकर कही ये बात

साथ ही सेना ने इंस्टाग्राम के अलावा अन्य सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स को लेकर भी पॉलिसी में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और स्काइप जैसे मैसेजिंग ऐप्स पर केवल सामान्य और अनक्लासिफाइड जानकारी साझा करने की अनुमति दी गई है। यह जानकारी भी केवल जानकार लोगों के साथ ही साझा की जा सकती है। सही व्यक्ति की पहचान की पूरी जिम्मेदारी यूजर की होगी। किसी भी तरह की संवेदनशील, ऑफिशियल या ड्यूटी से जुड़ी जानकारी इन प्लेटफॉर्म्स पर साझा करने की अनुमति नहीं है। (Indian Army Social Media Policy)

Indian Army Social Media Policy: प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी के लिए

इसके अलावा यूट्यूब, एक्स यानी पूर्व में ट्विटर और क्वोरा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी सेना कर्मियों को केवल पैसिव यूज की अनुमति है। इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल जानकारी हासिल करने के लिए किया जा सकता है। किसी भी तरह का वीडियो अपलोड करना, पोस्ट लिखना, मैसेज डालना या कमेंट करना सख्त मना है। सेना का मानना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर एक्टिव भागीदारी से अनजाने में संवेदनशील जानकारियां लीक हो सकती हैं। (Indian Army Social Media Policy)

लिंक्डइन को लेकर सख्त

वहीं पॉलिसी डॉक्यूमेंट में लिंक्डइन को लेकर नीति और भी सख्त है। जवानों और अफसरों को लिंक्डइन का इस्तेमाल केवल रिज्यूमे अपलोड करने या संभावित एम्प्लॉयर और एम्प्लॉयी से जुड़ी सामान्य जानकारी प्राप्त करने के लिए ही करने की अनुमति है। इसके लिए भी अलग से अनुमति लेना जरूरी होगा।

पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स से करें परेहज

इसके अलावा सेना ने अपने कर्मियों को कुछ खास तरह की वेबसाइट्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से पूरी तरह दूर रहने की सलाह भी दी है। इसमें जनरल वेबसाइट्स, क्रैक या पायरेटेड सॉफ्टवेयर वाली साइट्स, फ्री मूवी वेबसाइट्स, टोरेंट और वीपीएन सॉफ्टवेयर से जुड़ी साइट्स, वेब प्रॉक्सी, अनॉनिमाइज्ड वेबसाइट्स, चैट रूम और फाइल ट्रांसफर साइट्स शामिल हैं। क्लाउड डेटा स्टोरेज वेबसाइट्स के इस्तेमाल को लेकर भी अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा गया है। (Indian Army Social Media Policy)

भारतीय सेना की सोशल मीडिया पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य हनीट्रैपिंग, डेटा चोरी और संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने की घटनाओं को रोकना बताया गया है। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां दुश्मन देशों की एजेंसियों ने सोशल मीडिया के जरिए सैनिकों से संपर्क कर उनसे जानकारियां हासिल करने की कोशिश की। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए नीति को समय-समय पर सख्त किया जाता रहा है। (Indian Army Social Media Policy)

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा था- सोच-समझकर करें कम्युनिकेशन

पिछले महीने नवंबर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यंग लीडर्स फोरम और चाणक्य डिफेंस डॉयलॉग में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि आज की जेन जी डिजिटली फ्लुएंट और सोशली कांशस है। सेना में आने वाले नए एनडीए कैडेट्स को फोन से दूर रहना मुश्किल होता है और इसमें महीनों लग सकते हैं। उन्होंने सलाह दी थी कि सोशल मीडिया पर रिएक्ट करने की बजाय रिस्पॉन्ड करें और सोच-समझकर कम्युनिकेशन करें। उन्होंने कहा था कि स्मार्टफोन पर पूरी तरह पाबंदी सही नहीं है, बल्कि इस्तेमाल के नियम और जवाब देने का तरीका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा था कि जवानों को ट्विटर आदि प्लेटफॉर्म पर निगरानी की अनुमति दी जा सकती है ताकि वे देख सकें कि दुनिया में क्या हो रहा है, लेकिन सार्वजनिक रूप से तुरंत जवाब देने से रुका जाए। सेना प्रमुख खुद सोशल मीडिया को मॉर्डन वॉरफेयर का हिस्सा मानते हैं और उनका मानना है कि इसका इस्तेमाल राष्ट्रहित में किया जाना चाहिए। (Indian Army Social Media Policy)

2020 में लगाया था 89 ऐप्स पर बैन

2018 और 2019 के दौरान तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सोशल मीडिया को लेकर संतुलित रुख अपनाने की बात कही थी। हालंकि वे खुद मोबाइल फोन नहीं रखते थे, लेकिन मानते थे कि स्मार्टफोन का इस्तेमाल रोका नहीं जा सकता। उन्होंने यह माना था कि सैनिकों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन इसके नियंत्रित इस्तेमाल की जरूरत है। उन्होंने जोर दिया था कि आधुनिक युद्ध में इंफॉर्मेशन वॉरफेयर महत्वपूर्ण है, और सोशल मीडिया को दुश्मन (जैसे प्रॉक्सी वॉर या आतंकवाद में) के खिलाफ फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन सैनिकों को ट्रेनिंग देकर जोखिम कम करने चाहिए। हालांकि, हनीट्रैप के बढ़ते मामलों के बाद सेना ने 2020 में कई लोकप्रिय 89 ऐप्स पर सख्त बैन लगाया था और अकाउंट डिलीट करने तक के निर्देश जारी किए गए थे।

गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद सोशल मीडिया और डिजिटल ऐप्स को लेकर सेना अलर्ट हो गई थी। उस दौरान फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, पबजी समेत कई दूसरी ऐप्स पर भी बैन लगाया गया था। सेना के मुताबिक, उस दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों ने निर्देशों का पालन करते हुए किया और 13 लाख सैनिकों में सिर्फ 8 मामलों में ही निर्देशों का उल्लंघन पाया गया था। (Indian Army Social Media Policy)

यूनिफॉर्म में फोटो डालने पर रोक

2023 और 2024 में भी सेना की ओर से कई एडवाइजरी जारी की गईं, जिनमें जवानों को यूनिफॉर्म में फोटो डालने, रैंक या यूनिट की जानकारी साझा करने और जियो-टैगिंग का इस्तेमाल बंद रखने की हिदायत दी गई थी। अनजान फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करने और निजी जानकारी साझा न करने की बात भी कही गई थी। (Indian Army Social Media Policy)

CAG on ECHS: कैशलेस का वादा, लेकिन भुगतान की मार; क्यों चरमरा रही है पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना?

CAG on ECHS

CAG on ECHS: पूर्व सैनिकों के लिए बनाई गई एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 18 दिसंबर को संसद में पेश की गई सीएजी (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट ने ईसीएचएस की कमजोर कड़ियां उजागर कर दी हैं। रिपोर्ट में घोटाले या भ्रष्टाचार की बात इसमें नहीं है, लेकिन रिपोर्ट खुलकर कहती है कि लापरवाहियों और पैसों की तंगी ने ईसीएचएस को उसके असली मकसद से दूर कर दिया है।

ईसीएचएस की शुरुआत 2003 में इस सोच के साथ हुई थी कि देश की सेवा कर चुके सैनिकों और उनके परिवारों को रिटायरमेंट के बाद इलाज के लिए भटकना न पड़े। योजना का मकसद था कि कैशलेस, बिना लिमिट के इलाज, चाहे मरीज किसी भी राज्य में क्यों न हो। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि यह वादा कागजों में तो कायम है, जमीनी लेवल पर लगातार कमजोर पड़ रहा है। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: अस्पतालों को भुगतान में हो रही देरी

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक ईसीएचएस के तहत जुड़े अस्पतालों को भुगतान में लगातार देरी हो रही है। इलाज से जुड़ी रकम के लिए जो बजट तय होता है, वह अक्सर कम पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि कई प्राइवेट अस्पताल महीनों तक भुगतान का इंतजार करते हैं और अंत में योजना से बाहर निकल जाते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इलाज से जुड़े खर्च के लिए बजट की कमी की वजह से अस्पतालों को समय पर पैसा नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर यह होता है कि अस्पताल ईसीएचएस छोड़ देते हैं और रिटायर्ड सैनिकों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है। (CAG on ECHS)

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सीजीएचएस जैसी योजना केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सांसदों, जजों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए ठीक से चलाई जा सकती है, तो पूर्व सैनिकों के इलाज के लिए पैसा जुटाना इतना मुश्किल क्यों है। उन्होंने कहा कि ईसीएचएस एक अजीब व्यवस्था बन गई है, जहां मेंबरशिप तो जरूरी है और पूर्व सैनिकों से 30,000 से लेकर 1,20,000 रुपये तक की रकम ली जाती है, लेकिन मंत्रालय की तरफ से इस योजना को सुचारू चलाने की जिम्मेदारी कहीं नहीं दिखती। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: कैशलेस योजना है तो लेकिन जेब से खर्च क्यों?

ईसीएचएस को कैशलेस कहा जाता है, लेकिन कई मामलों में पूर्व सैनिकों को इलाज के समय अपनी जेब से पैसे देने पड़ते हैं। कहीं अस्पताल योजना से बाहर हो चुका होता है, तो कहीं बिल का भुगतान अटका रहता है। ऐसे में मरीज या तो इलाज टालता है या मजबूरी में पैसा खर्च करता है। (CAG on ECHS)

रिटायर्ड कमांडर विक्रम डब्ल्यू. कारवे का कहना है कि अगर सरकार सच में पूर्व सैनिकों की परवाह करती है, तो ईसीएचएस की कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार जरूरी है। अच्छे अस्पतालों को योजना से जोड़ना होगा और उनके बिल समय पर चुकाने होंगे, वरना भरोसा लगातार टूटता रहेगा। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: योजना पर बोझ बढ़ा, बजट जस का तस

वरिष्ठ नौसेना अधिकारी और रक्षा मामलों के जानकार महेंद्र नेगी ने कहा कि बीते कुछ सालों में ईसीएचएस के दायरे को बिना तैयारी के बढ़ा दिया गया। योजना का मूल मकसद पूर्व सैनिकों के लिए था, लेकिन अब इसमें तीनों सेनाओं के यूनिफॉर्मधारी पेंशनर्स और बड़ी संख्या में आश्रित भी जुड़ गए हैं। इसके मुकाबले बजट में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ। (CAG on ECHS)

उनका कहना है कि अब जरूरत है कि ईसीएचएस की पूरी रिव्यू की जाए। बजट बढ़ाया जाए, लाभार्थियों की स्पष्ट कैटेगरी तय हो और जिन लोगों को सीजीएचएस में शामिल किया जा सकता है, उन्हें वहां शिफ्ट किया जाए। इससे ईसीएचएस पर दबाव कम होगा और योजना वाकई काम की बन पाएगी। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: राजनीति में पूर्व सैनिकों की प्राथमिकता कहां

पूर्व ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह और भी सीधा बोलते हैं। उनका कहना है कि सरकार की दिलचस्पी ईसीएचएस सुधारने में इसलिए कम है क्योंकि पूर्व सैनिक कोई ऑर्गनाइज्ड वोट बैंक नहीं हैं। न तो वे “लाड़ली बहनाएं” हैं और न ही एम्प्लॉयमेंट की मांग करने वाला बड़ा समूह। उन्होंने यह भी कहा कि सर्विस में मौजूद सीनियर अधिकारी भी अक्सर इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाते। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: तीन राज्यों में ही खर्च का बड़ा हिस्सा

सीएजी रिपोर्ट और पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, ईसीएचएस का 60 फीसदी खर्च सिर्फ दिल्ली, पंजाब, और हरियाणा में हो जाता है। जबकि, देशभर के करीब 18 लाख मुख्य लाभार्थियों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी 24-26 फीसदी ही है। फिर भी, जालंधर, दिल्ली-I और दिल्ली-II जैसे रीजनल सेंटर्स नेशनल खर्च का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।

रिटायर्ड वाइस एडमिरल सुधीर पिल्लै बताते हैं, ये असंतुलन सिर्फ संख्या की वजह से नहीं है। इसमें बड़े प्राइवेट और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल, महंगे इलाज, ज्यादा कैंसर और हार्ट की बीमारियां, और रिटायरमेंट के बाद इन इलाकों में बसने की प्रवृत्ति भी शामिल है। (CAG on ECHS)

यही कारण है कि कई पूर्व सैनिकों को ईसीएचएस के साथ-साथ अलग से ग्रुप इंश्योरेंस या प्राइवेट हेल्थ कवर लेना पड़ रहा है।

सीएजी की चेतावनी साफ है

सीएजी की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि ईसीएचएस पूरी तरह फेल हो चुकी है, लेकिन यह जरूर बताती है कि योजना थक चुकी है। बेनेफिशियरीज बढ़ते गए, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ, बजट और मॉनिटरिंग उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। अगर समय रहते ठोस सुधार नहीं किए गए, तो ईसीएचएस सिर्फ नाम की हेल्थ स्कीम बनकर रह जाएगी। (CAG on ECHS)