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CAG Report: 10 हजार करोड़ रुपये खर्च, फिर भी सेना को एनसीसी और सैनिक स्कूलों से नहीं मिल रहे अफसर? कैग रिपोर्ट ने खोली पोल

CAG Report

CAG Report: नेशनल कैडेट कोर (NCC) और सैनिक स्कूलों को हमेशा से भारतीय सेना के लिए अफसर तैयार करने की नर्सरी कहा गया है। लेकिन अब इन दोनों की असलियत पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में संसद में पेश हुई कैग (CAG) की रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि जितनी उम्मीद थी, उतने अफसर इन संस्थानों से सेना को नहीं मिल रहे हैं।

CAG Report: आंकड़े चौंकाने वाले हैं

कैग कहता है, एनसीसी और सैनिक स्कूलों में छात्रों की भीड़ है, फिर भी इनसे सेना के लिए अफसर बनने वालों की संख्या काफी कम है। मार्च 2023 तक रिपोर्ट में यही तस्वीर सामने आई कि उम्मीदवार आते तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम का चयन हो पाता है।

CAG Report: पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की हालत खराब

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक खासकर पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में स्थिति और भी खराब है। रिपोर्ट में साफ बताया गया कि इन इलाकों से सेना को अपेक्षा के मुकाबले काफी कम अधिकारी मिल पा रहे हैं। सीएजी ने इस पर भी चिंता जताई है और सिफारिश की है कि यहां व्यवस्था और संसाधनों में तुरंत सुधार होना चाहिए। (CAG Report)

10 हजार करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन सस्थानों को मिलने वाली फंडिंग को लेकर भी चिंता जताई है। सीएजी का कहना है कि पिछले पांच साल में एनसीसी और सैनिक स्कूलों पर पूरे 10,043.66 करोड़ रुपये खर्च हुए। फिर भी, नतीजे कुछ खास नहीं निकले। रिपोर्ट कहती है कि इतना पैसा बहाने के बाद भी ट्रेनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिलेक्शन सवालों के घेरे में है। (CAG Report)

राज्यों ने बजट देने में भी ढिलाई की

रिपोर्ट में राज्य सरकारों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई राज्यों ने के लिए तय बजट के मुताबिक फंड ही नहीं दिया। नतीजा ये हुआ कि पश्चिम बंगाल और सिक्किम में 43 फीसदी से ज्यादा एनसीसी कैंप रद्द करने पड़े। वहीं, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एनसीसी अधिकारियों और कैडेट्स को मानदेय और भत्ते भी समय पर नहीं मिले। (CAG Report)

CAG Report: स्कॉलरशिप भी छात्रों को नहीं मिली

सीएजी रिपोर्ट में बताया गया है कि सैनिक स्कूलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। कई राज्यों ने रेगुलर फंडिंग नहीं की, जिससे स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की पेंशन और रिटायरमेंट बेनिफिट्स पर असर पड़ा। स्कॉलरशिप की रकम भी हर राज्य में अलग-अलग है, और यहां तक कि कुछ राज्यों ने तो अपने बच्चों को दूसरे राज्यों में पढ़ने पर स्कॉलरशिप तक नहीं दी। (CAG Report)

ट्रेनिंग की जगह और सुविधाएं भी कम

यहां तक कि ट्रेनिंग और रहने की सुविधाएं भी काफी कम हैं। 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एनसीसी के लिए स्थायी ट्रेनिंग एरिया ही नहीं है। इसकी वजह से फायरिंग ट्रेनिंग भी प्रभावित हुई। सैनिक स्कूलों में 11 जगहों पर या तो छात्रों के हॉस्टल हैं या फिर जर्जर हालत में हैं। 14 स्कूलों में स्टाफ क्वार्टर कम हैं और 7 स्कूलों में स्टाफ का रहना मुश्किल है। (CAG Report)

सेना में अफसर बनने का रास्ता तो एनसीसी और सैनिक स्कूलों से ही जाता है, चाहे वो स्पेशल एंट्री स्कीम हो या एनडीए। लेकिन, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, फंड की कमी और ट्रेनिंग की दिक्कतों के चलते फौज में जाने का छात्रों का सपना टूट रहा है। ये रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब सेना को लगातार युवा और ट्रेंड अफसरों की जरूरत है। (CAG Report)

क्या है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम

एनसीसी कैडेट्स के लिए भारतीय सेना में सीधी भर्ती का रास्ता है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम। इसमें बिना लिखित परीक्षा के भी अफसर बना जा सकता है, बस कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। उम्मीदवार का ग्रेजुएट होना जरूरी है, कम से कम 50% अंक होने चाहिए। एनसीसी की सीनियर डिवीजन या सीनियर विंग में दो से तीन साल की सेवा जरूरी है, और ‘सी’ सर्टिफिकेट में कम से कम ‘बी’ ग्रेड चाहिए। उम्र 19 से 25 साल के बीच हो और उम्मीदवार अविवाहित हो, ये भी जरूरी है। (CAG Report)

Indian Army New Bases: बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा खतरा, मिजोरम में नया मिलिट्री बेस बना रही भारतीय सेना! दो और लोकेशंस शॉर्ट लिस्ट

Indian Army New Bases
Lt Gen RC Tiwari visited the Company Operating Base of Assam Rifles and BSF under Spear Corps at Parva, Mizoram

Indian Army New Bases: बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में बदलते हालात और घुसपैठ के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने बड़ी तैयारियां शुरू कर दी हैं। बीते कुछ महीनों में सेना ने पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। वहीं अब मिजोरम में चौथा मिलिट्री बेस बनाने की तैयारी चल रही है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और कट्टरपंथी गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।

सेना के सूत्रों के अनुसार, आने वाले सालों में भारत-बांग्लादेश-म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में सिक्योरिटी स्ट्रक्चर को पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा। सेना की इस रणनीति का मकसद केवल घुसपैठ रोकना नहीं है, बल्कि किसी भी तरह की अस्थिरता या बाहरी खतरे से निपटने की पहले ही तैयारी रखना है।

Indian Army New Bases: मिजोरम में क्यों जरूरी है नया मिलिट्री बेस

भारतीय सेना ने मिजोरम में दो जगहों परवा और सिलसुरी को नए मिलिट्री बेस के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। ये दोनों इलाके बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां भारत, बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाएं एक-दूसरे के बेहद सटी हुई हैं।

यह इलाका लंबे समय से तस्करी, अवैध घुसपैठ और उग्रवादी गतिविधियों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। हाल के सालों में यहां ड्रग्स, हथियार और नकली सामान की तस्करी की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। सेना का मानना है कि अगर इस इलाके में स्थायी और मजबूत मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा किया जाता है, तो सुरक्षा एजेंसियों को कार्रवाई करने में आसानी होगी।

अगले पांच सालों में ये है बड़ा प्लान

सेना की तैयारी केवल एक बेस बनाने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि अगले पांच सालों में इस इलाके में बड़े पैमाने पर सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया जाएगा। इसमें दर्जनों आधुनिक बंकर, आर्टिफिशियल एम्बैंकमेंट्स, ब्लास्ट-प्रूफ शेल्टर और भूमिगत हथियार भंडार बनाए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, करीब 45 सेट ऐसे स्ट्रक्चर तैयार किए जाएंगे, ताकि जवानों को हर मौसम और हर स्थिति में सुरक्षित ठहरने और ऑपरेशन चलाने की सुविधा मिल सके। इन ठिकानों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत जवाबी कार्रवाई की जा सके।

पहले से एक्टिव तीन नए ठिकाने

मिजोरम से पहले भारतीय सेना पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए ऑपरेशनल बेस पहले ही बना चुकी है। इन इलाकों को खासतौर पर इसलिए चुना गया, क्योंकि यहां से बांग्लादेश की सीमा बेहद करीब है और अतीत में यहां से अवैध गतिविधियों की खबरें आती रही हैं।

इन ठिकानों का मकसद सीमावर्ती इलाकों में स्थायी मौजूदगी बढ़ाना और स्थानीय सुरक्षा बलों के साथ बेहतर तालमेल बनाना है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि अब सुरक्षा केवल पेट्रोलिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रियल-टाइम निगरानी और तुरंत कार्रवाई पर जोर होगा।

परवा में कमांडर का दौरा

इसी रणनीति के तहत हाल ही में भारतीय सेना की पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने मिजोरम के परवा इलाके का दौरा किया। उनके साथ कई वरिष्ठ सैन्य अफसर भी मौजूद थे।

इस दौरे के दौरान उन्होंने स्पीयर कॉर्प्स के तहत आने वाले असम राइफल्स और बीएसएफ के कंपनी ऑपरेटिंग बेस का निरीक्षण किया। उन्होंने भारत-बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा हालात की समीक्षा की और जवानों से सीधे बातचीत भी की।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने जवानों की दृढ़ता, धैर्य और उच्च स्तर की ऑपरेशनल तैयारी की खुले तौर पर सराहना की। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवान बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और देश की सुरक्षा में उनकी भूमिका सबसे अहम होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने अपने दौरे के दौरान राज्य प्रशासन और स्थानीय एजेंसियों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि सेना और सिविल प्रशासन के बीच तालमेल से ही ऐसे बड़े प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो पाते हैं।

उन्होंने जवानों को भरोसा दिलाया कि सेना उनकी सुरक्षा, सुविधाओं और संसाधनों को प्राथमिकता दे रही है, ताकि वे पूरी क्षमता के साथ देश की सीमाओं की रक्षा कर सकें।

त्रिपुरा के बेलोनिया का दौरा

इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया में स्थित सीमा चौकी का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने भारत–बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की। आर्मी कमांडर ने फारवर्ड इलाकों में तैनात जवानों से बातचीत की और जमीनी हालात की जानकारी ली। उन्होंने भारतीय सेना, असम राइफल्स और बीएसएफ के जवानों की सराहना करते हुए कहा कि सभी बल पूरी तरह सतर्क हैं और उनकी ऑपरेशनल तैयारी उच्च स्तर की है।

असम में नया सैन्य स्टेशन

पूर्वी कमान के तहत असम में भी बड़े स्तर पर सैन्य ढांचा तैयार किया जा रहा है। नवंबर 2025 में लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने धुबरी में नए लाचित बरफूकन मिलिट्री स्टेशन की आधारशिला रखी थी।

यह स्टेशन ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है और इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। धुबरी न केवल बांग्लादेश की सीमा के करीब है, बल्कि भूटान से भी यह काफी नजदीक है। यह स्टेशन लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और प्रशासनिक जरूरतों का बड़ा केंद्र बनेगा।

सेना के अनुसार, यह नया स्टेशन पूर्वोत्तर भारत में मिलिट्री ऑपरेशन को और ज्यादा मजबूत करेगा और जरूरत पड़ने पर तेजी से बलों की तैनाती भी की जा सकेगी।

सेना के इन सभी कदमों के पीछे एक बड़ा वजह सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी है, जिसे आमतौर पर “चिकन नेक” कहा जाता है। यह केवल 22 किलोमीटर चौड़ा इलाका है, जो भारत के मुख्य भूभाग को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।

अगर इस कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह की अस्थिरता पैदा होती है, तो पूरे पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि सेना अब इस पूरे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और मजबूत कर रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की यह रणनीति केवल प्रतिक्रिया भर नहीं है, बल्कि एक लंबी अवधि की तैयारी का हिस्सा है। बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल, सीमापार तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क की सक्रियता को देखते हुए भारत किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता।

नई मिलिट्री कैंटोनमेंट्स, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमावर्ती बलों के साथ तालमेल, ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब सीमा सुरक्षा को लेकर और ज्यादा सक्रिय और सतर्क रुख अपना रहा है।

Bangladesh Political Unrest: चुनाव टालने के लिए मोहम्मद यूनुस ने चल दी अपनी आखिरी चाल! सत्ता न छोड़नी पड़े इसलिए बनाया भारत-विरोधी माहौल

Bangladesh Political Unrest

Bangladesh Political Unrest: बांग्लादेश में चरमपंथी कार्यकर्ता शरीफ ओस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश एक बार फिर अनिश्चितता के माहौल में है। बांग्लादेश में एक बार फिर हिंसा, अराजकता और भारत-विरोधी माहौल बनता दिख रहा है। लेकिन इस बार न तो वहां शेख हसीना हैं और न ही खालिदा जिया। वहां इस समय मोहम्मद यूनुस देश के कार्यवाहक है। बस अंतर इतना है कि वहां अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं और किसी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को सत्ता सौंपनी है।

Bangladesh Political Unrest: हादी की हत्या के बाद मचा बवाल

बांग्लादेश में फिलहाल जो हिंसा भड़की है, उसके पीछे वजह 12 दिसंबर को हुई एक हत्या मानी जा रही है। जिसमें ढाका में 32 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी की बाइक सवार नकाबपोश हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। उसे इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया था, जहां 18 दिसंबर को उसकी मौत हो गई। हादी उन युवाओं में शामिल था, जिसने अगस्त 2024 में हुए आंदोलन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन किया था। हादी एक नए राजनीतिक मंच से जुड़ा था और फरवरी में होने वाले चुनावों के लिए सक्रिय तौर पर प्रचार कर रहा था। हादी के मौत के बाद ढाका और कई अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए।

इंकलाब मंच प्लेटफॉर्म के प्रवक्ता के तौर पर, हादी अपने कट्टर भाषणों और भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते थे, जिससे उनके कट्टर समर्थक और कट्टर दुश्मन दोनों बन गए थे।

Bangladesh Political Unrest: पुलिस का दावा, भारत भागे आरोपी

बांग्लादेश पुलिस ने दावा किया कि हादी पर हमला करने वाले दो आरोपी भारत की ओर भाग गए हैं। इसी दावे के माहौल और गरमा गया और हादी के समर्थकों और कुछ कट्टर संगठनों ने इसे आधार बनाकर भारत के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

देखते-ही-देखते प्रदर्शन भारत के राजनयिक ठिकानों तक पहुंच गए। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग के अलावा चटगांव, राजशाही, खुलना और सिलहट में मौजूद सहायक उच्चायोगों के बाहर भी प्रदर्शन हुए। हालात इतने बिगड़े कि एक दिन के लिए बांग्लादेशियों के लिए वीजा आवेदन केंद्र बंद करना पड़ा।

भारत ने तुरंत बांग्लादेश के राजदूत को तलब किया और अपने राजनयिक मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

Bangladesh Political Unrest: मीडिया को बनाया निशाना

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बेहद गंभीर बात सामने आई। बांग्लादेश के दो सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों पर हमला कियाा गया। ढाका में द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई।

विडंबना यह है कि यही दोनों अखबार पहले शेख हसीना सरकार की आलोचना करते रहे थे और छात्र आंदोलन को भी समर्थन दिया था। अब इन्हें “भारत समर्थक” और “पुरानी सत्ता के सहयोगी” बताकर निशाना बनाया गया। डेली स्टार ने इसे “स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए काला दिन” करार दिया।

अंतरिम सरकार की मुश्किलें

फिलहाल बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बनी इस सरकार का मुख्य काम चुनाव कराना और सुधार लागू करना है। लेकिन मौजूदा हालात में यह सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में कमजोर पड़ती दिख रही है।

सड़कों पर गुस्सा है, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता बढ़ती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार फरवरी में तय चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से करा पाएगी?

क्या वक्त पर होंगे चुनाव?

बांग्लादेश चुनाव आयोग ने 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव कराने की घोषणा की है। लेकिन भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि क्या यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। भारत बार-बार कह चुका है कि वह बांग्लादेश में “फ्री, फेयर, इनक्लूसिव और क्रेडिबल” चुनाव चाहता है। यहां “इनक्लूसिव” शब्द खास तौर पर अहम है, क्योंकि इसका मतलब है कि शेख हसीना की अवामी लीग को भी चुनाव में हिस्सा लेने का मौका मिले।

हालांकि बांग्लादेश सरकार और उसके सलाहकार इस शब्द से बचते नजर आते हैं। उनका कहना है कि चुनाव का स्तर ऊंचा होना चाहिए, न कि किसी खास पार्टी की भागीदारी पर जोर दिया जाए।

चुनाव टालने की साजिश के आरोप

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि हिंसा और अराजकता चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती है। वहीं, शेख हसीना सरकार में मंत्री रह चुके कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि अंतरिम सरकार जानबूझकर हालात बिगड़ने दे रही है, ताकि चुनाव टाले जा सकें। उनके मुताबिक भारत-विरोधी माहौल बनाकर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की कोशिश भी की जा रही है।

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात

भारत के लिए यह सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का सवाल नहीं है। भारत को डर है कि अगर वहां हालात और बिगड़े, तो इसका असर सीमा पार भी पड़ सकता है। कट्टरपंथ, अवैध घुसपैठ और हिंसा का असर भारत के पूर्वी राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर पर पड़ सकता है।

इसके अलावा, अप्रैल-मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने हैं। भारत सरकार नहीं चाहती कि बांग्लादेश की अशांति का कोई “स्पिलओवर” भारतीय राजनीति या सुरक्षा व्यवस्था पर पड़े।

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी ने इस हिंसा को एक बड़ी रणनीति का हिस्सा बताया हैं। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश में हो रही घटनाओं का मूल मकसद भारत को उकसाना और उसे एक लंबे संघर्ष में खींचना है।”

उन्होंने संयम बरतने की अपील करते हुए तैयारी पर जोर दिया और भारत को जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “इंतजार करें और देखें, अपनी जासूसी, निगरानी, ​​खुफिया संसाधनों को तैनात रखें ताकि पहले से कदम उठाने के विकल्प तैयार किए जा सकें और किसी भी अप्रत्याशित घटना को रोका जा सके।
मेजर जनरल सुधाकर जी का कहना है कि भारत को हर कीमत पर लंबे संघर्ष से बचना चाहिए।

हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है हिंसा

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि ये घटनाएं बहुत चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा, “चिंता होनी चाहिए क्योंकि पड़ोस में जो कुछ भी होता है तो वह हमेशा चिंता का वजह होता है और खासकर पिछले एक साल में बांग्लादेश में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, वे काफी खतरनाक हैं।”

उन्होंने हिंसा के एक पैटर्न की ओर इशारा किया जो शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है। प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा, “जिस तरह की हिंसा हमने शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी देखी है। हसीना के कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश की गई।”

हादी की मौत के बाद हुई हिंदा पर उन्होंने कहा, “यह भारत के लिए चिंताजनक स्थिति है क्योंकि भारत बांग्लादेश के साथ एक लंबी सीमा साझा करता है। शरीफ ओसामा की मौत के मामले में, बांग्लादेश के लोगों के एक वर्ग का आरोप है कि जो लोग जिम्मेदार पदों पर हैं, उनका कहना है कि ओसामा को मारने वाला व्यक्ति असल में भारत भाग गया है।”

हिंसा भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं

त्रिपाठी ने कहा कि बीते दिन कुछ मीडिया हाउसों पर हमला हुआ, सिर्फ इसलिए कि उन्हें भारत समर्थक माना गया। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय उच्चायोग के आसपास हुए विरोध प्रदर्शन और इस तरह की घटनाएं बेहद चिंता पैदा करने वाली हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब बांग्लादेश में चुनाव नजदीक हैं। फरवरी में होने वाले चुनावों से पहले इस तरह की हिंसा देश के लिए ठीक संकेत नहीं है। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात पर बहुत सतर्क नजर रखने की जरूरत है।

त्रिपाठी ने कहा कि भले ही यह घटनाक्रम बांग्लादेश के भीतर का मामला हो, लेकिन इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत का बांग्लादेश में निवेश है और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा साझा होती है। ऐसे में वहां की अस्थिरता भारत के हितों को प्रभावित कर सकती है।

त्रिपाठी ने आशंका जताई कि ये हिंसक तत्व सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए भारत में भी परेशानी खड़ी करने की कोशिश कर सकते हैं।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्या था ‘अदृश्य युद्ध’? रक्षा मंत्री के बयान से खुला राज, क्या है “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी?

Operation Sindoor Cognitive Warfare

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को ‘एयर फोर्स कमांडर्स’ कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए बेहद अहम बात कही। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि आम तौर पर दुश्मन के हमले के समय लोग डर जाते हैं, लेकिन जब पाकिस्तानी सेना ने भारत के ठिकानों पर हमला करने की कोशिश की, तो देश की जनता बिल्कुल शांत रही और अपने रोजमर्रा के कामों में लगी रही। दरअसल रक्षा मंत्री अप्रत्यक्ष रूप से इन्फॉरमेशन वॉरफेयर का जिक्र कर रहे थे। यानी कि उस दौरान पाकिस्तान की तरफ से भारतीय सेनाओं को लेकर तमाम तरह के झूठ फैलाए जा रहे तब भी भारत की जनता उन झूठों के फेर में नहीं पड़ी और भारतीय सुरक्षा बलों पर भरोसा जताते हुए शांत रही। यानी कि उन्होंने पाकिस्तान की तरफ से आ रही फेक न्यूज को नकार दिया था।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: लगातार चेताते रहे हैं रक्षा मंत्री

हालांकि रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात नहीं बोली है। वे इससे पहले भी संकेतों के माध्यम से इस ‘अदृश्य’ युद्ध के बारे में जिक्र करते रहे हैं। सितंबर 2025 में कोलकाता में संयुक्त कमांडर्स सम्मेल में भी नराजनाथ सिंह ने कहा था कि पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर इनफॉरमेशन वॉरफेयर, आइडियोलॉजिकल वॉरफेयर (जो कॉग्निटिव वॉरफेयर से जुड़ा है), पर्यावरणीय और जैविक युद्ध जैसे अपरंपरागत खतरों से निपटने के लिए सतर्क और तैयार रहने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है, और ये “अदृश्य चुनौतियां” उतनी ही घातक हैं।

Ran Samwad 2025 Doctrine: युद्ध का मैदान बने इंसानी दिमाग से ऐसे जंग लड़ेंगे स्पेशल फोर्सेज के जवान! ऑपरेशन सिंदूर के बाद सौंपा गया नया काम

इस साल जून में देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने सूचना युद्ध को 21वीं सदी की बड़ी चुनौती बताया था। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया पोस्ट से प्रोपगैंडा फैलाने का उदाहरण दिया था और लोगों से अपील की कि वे सामाजिक सैनिक बनें और जागरूकता फैलाकर इस युद्ध में योगदान दें। उन्होंने डेटा और सूचना को सबसे बड़ी ताकत व चुनौती बताया।

नवंबर के आखिर में हुए चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 के समापन सत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बहुत साफ शब्दों में कहा था कि आज की दुनिया में सूचना युद्ध एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि भारत ऐसे पड़ोस में रहता है जहां खतरे कई तरह के हैं, जिनमें आतंकवाद, सीमा पार से चरमपंथ को मदद, हालात बदलने की कोशिशें, समुद्र में दबाव और अब सूचना युद्ध भी शामिल है। इन सब जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए हमें हर समय सतर्क रहना होगा और अपना लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट रखना होगा। राजनाथ सिंह ने सूचना युद्ध को नई पीढ़ी के खतरनाक हथियार बताया, जिसमें साइबर हमले भी शामिल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के अनिश्चित दौर में रक्षा क्षेत्र में सुधार कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी रणनीति है, ताकि हमारी सेनाएं इन अदृश्य खतरों, खासकर सूचना युद्ध, से मजबूती से मुकाबला कर सकें। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Operation Sindoor Cognitive Warfare: क्या है कॉग्निटिव वॉरफेयर?

रक्षा मंत्री की बात बिल्कुल सही है। आज की दुनिया में युद्ध का मतलब सिर्फ टैंक, मिसाइल और सैनिकों की लड़ाई नहीं रह गया है। अब एक ऐसा युद्ध भी चल रहा है, जो न तो दिखाई देता है और न ही इसकी आवाज सुनाई देती है। इस युद्ध को कॉग्निटिव वॉरफेयर, यानी दिमाग और सोच का युद्ध कहा जाता है। यह लड़ाई सीधे इंसान के मन, सोच, भावनाओं और फैसलों को निशाना बनाती है। इसका मकसद किसी देश को हथियारों से हराना नहीं, बल्कि उसकी एकता, आत्मविश्वास और फैसला लेने की क्षमता को कमजोर करना होता है।

फ्रांस की नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और नाटो के शीर्ष सैन्य कमांडर एडमिरल पियरे वांदिये के अनुसार, कॉग्निटिव वॉरफेयर का सबसे बड़ा निशाना इंसानी दिमाग है। इसमें समाज को तोड़ना, लोगों के मन में शक पैदा करना और सरकार व संस्थानों पर भरोसा कम करना शामिल है। यह युद्ध शांति, संकट और खुले युद्ध की सीमाओं को मिटा देता है। कई बार लोग यह समझ भी नहीं पाते कि वे ऐसे किसी हमले का शिकार हो चुके हैं।

पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे है कॉग्निटिव वॉरफेयर

कॉग्निटिव वॉरफेयर दरअसल पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे की चीज है। पहले सूचना युद्ध में झूठी खबरें या प्रोपेगंडा तक सीमित रहती थी, लेकिन अब सीधे यह कोशिश की जाती है कि लोग क्या सोचें, कैसे सोचें और कब फैसला लें। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकार जॉन बॉयड ने कहा था कि किसी भी दुश्मन को हराने के लिए उसके फैसले लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर देना काफी होता है। आज इसी सोच को हथियार बना लिया गया है। दुश्मन यह कोशिश करता है कि सामने वाला देश सही समय पर सही फैसला न ले पाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी

आज इंसान का दिमाग ही नया युद्धक्षेत्र बन चुका है। दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी। यानी दुश्मन न केवल लोगों के दिमाग को निशाना बनाता है, बल्कि उन्हीं लोगों की भावनाओं और सोच का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है। अगर किसी देश की सोच को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो जमीन, हवा या समुद्र में लड़ाई की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही वजह है कि यह युद्ध अक्सर “ग्रे जोन” में लड़ा जाता है, यानी उस स्तर पर जहां खुले युद्ध का ऐलान तो नहीं होता, लेकिन नुकसान लगातार होता रहता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रूस की “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी

रूस और चीन कॉग्निटिव वॉरफेयर में सबसे आगे माने जाते हैं। दोनों देश शांति के समय, संकट के समय और युद्ध के समय एक ही रणनीति पर काम करते हैं, दुश्मन की सोच को नियंत्रित करना। वहीं पाकिस्तान भी तेजी से कॉग्निटिव वॉरफेयर की रणनीति पर काम कर रहा है।

रूस की रणनीति उसकी पुरानी सैन्य परंपराओं से निकली है। रूस लंबे समय से धोखे और भ्रम की नीति अपनाता रहा है, जिसे वह “मास्किरोव्का” कहता है। इसका मतलब होता है दुश्मन को गुमराह करना, ताकि वह गलत फैसले ले। 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के दौरान रूस ने बिना वर्दी वाले सैनिक भेजे, और वह इससे लगातार इनकार करता रहा, साइबर हमले किए और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि यूक्रेन और पश्चिमी देश समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए।

“रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” स्ट्रेटेजी भी यूज करता है रूस

वहीं, रूस एक और तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिसे “रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” कहा जाता है। इसमें दुश्मन को सीधे आदेश नहीं दिए जाते, बल्कि उसे ऐसी जानकारी दी जाती है कि वह खुद वही फैसला करे जो रूस चाहता है। इसमें दुश्मन की सोच, आदतें, कमजोरियां और मनोविज्ञान तक का अध्ययन किया जाता है। रूस इस तरह से लंबे समय तक माहौल बनाता है, ताकि बिना गोली चलाए ही रणनीतिक फायदा मिल जाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

आज इस रणनीति को साइबर हमलों, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सोशल मीडिया प्रचार के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है। इसका असर सेना के फैसलों से लेकर आम लोगों की राय तक पर पड़ता है। गलत जानकारी, फर्जी वीडियो और भ्रम फैलाकर पूरे सिस्टम को धीमा और कमजोर किया जाता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: चीन की “थ्री वारफेयर” स्ट्रेटेजी

वहीं, चीन की रणनीति थोड़ी अलग है, लेकिन लक्ष्य वही है। चीन अपनी प्राचीन रणनीतिक सोच से प्रेरित है, जहां कहा गया है कि सबसे बड़ी जीत वह होती है, जिसमें दुश्मन बिना लड़े हार मान ले। चीन की सेना “थ्री वारफेयर” की नीति पर काम करती है। इसमें मनोवैज्ञानिक युद्ध, जनमत को प्रभावित करना और कानून की अपनी तरह से व्याख्या करना शामिल है।

चीन सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहता। वह सरकार, मीडिया, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति सभी को इस रणनीति में शामिल करता है। चीन के लिए यह पूरे समाज की कोशिश होती है। घरेलू स्तर पर वह लोगों की सोच को नियंत्रित करता है और बाहर की दुनिया में अपनी कहानी फैलाता है। अंतरराष्ट्रीय कानून को भी अपने पक्ष में दिखाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और ताइवान से जुड़े मामलों में चीन लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वही सही है, जबकि बाकी देशों को आक्रामक या अस्थिर बताया जाता है। यह सब कॉग्निटिव वॉरफेयर का हिस्सा है, जिसमें दुनिया की सोच को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की जाती है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

चीन अब नई तकनीक के जरिए इस युद्ध को और तेज कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बड़े डेटा, ड्रोन, ऑटोमेशन और यहां तक कि दिमाग से जुड़ी रिसर्च को भी वह युद्ध की तैयारी में शामिल कर रहा है। चीन मानता है कि भविष्य के युद्ध का स्वरूप दिमाग पर नियंत्रण का होगा। इसलिए वह इंसानी भावनाओं, सोच और व्यवहार को समझने और प्रभावित करने पर भारी निवेश कर रहा है।

पाकिस्तान की फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) स्ट्रेटेजी

पाकिस्तान भी भारत के खिलाफ कॉग्निटिव वॉरफेयर में काफी सक्रिय है। यह तरीका उसने अपनी पारंपरिक सैन्य कमजोरियों को छिपाने के लिए अपनाया है और इसे हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बना लिया है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी इनफॉरमेशन वॉरफेयर और कॉग्निटिव वॉरफेयर को फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) या हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बताते हैं।

पाकिस्तान की सेना की मीडिया इकाई ISPR इस पूरी रणनीति की रीढ़ है। ISPR और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, भ्रामक वीडियो, डीपफेक और बॉट नेटवर्क के जरिए भारत के खिलाफ लगातार नैरेटिव चलाते हैं। कश्मीर मुद्दे पर गलत जानकारियां फैलाना और भारतीय सेना की छवि खराब करना इसका प्रमुख उदाहरण है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर फर्जी वीडियो और सोशल मीडिया प्रोपगैंडा का इस्तेमाल किया। कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान भारत से आगे है, क्योंकि उसका सिस्टम ज्यादा केंद्रीकृत और आक्रामक है। चीन से मिलने वाली तकनीकी और साइबर मदद ने उसकी इस क्षमता को और मजबूत किया है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी

कई सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। इसे ग्रे जोन कहा जाता है। इसी ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। इसमें दुश्मन खुलकर युद्ध नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे समाज के भीतर अस्थिरता पैदा करता है। लोगों को यह एहसास भी नहीं होता कि वे किसी हमले का शिकार हो रहे हैं।

सोशल मीडिया बना सबसे आसान हथियार

नई तकनीक ने इस युद्ध को और खतरनाक बना दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक वीडियो, सोशल मीडिया बॉट्स और डेटा एनालिटिक्स की मदद से किसी भी देश के लोगों की भावनाओं को समझा और प्रभावित किया जा सकता है। अब फर्जी वीडियो, नकली भाषण और झूठी घटनाएं इतनी असली लगती हैं कि सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया लोगों की भावनाओं को भड़काने का सबसे आसान हथियार बन गया है। गुस्सा, डर और नफरत सबसे जल्दी फैलती है, और दुश्मन इसी का फायदा उठाता है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

सेना पर भी पड़ता है असर

सेना के स्तर पर भी कॉग्निटिव वॉरफेयर का असर गंभीर होता है। अगर कमांडर तक गलत जानकारी पहुंचे, या फैसला लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर दिया जाए, तो पूरी सैन्य कार्रवाई प्रभावित हो सकती है। आधुनिक सेनाएं डेटा, नेटवर्क और तकनीक पर निर्भर हैं, और यही निर्भरता उन्हें इस तरह के हमलों के प्रति कमजोर भी बनाती है। अगर किसी देश की सेना की सोच और आत्मविश्वास को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो असली युद्ध की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही इस युद्ध की सबसे खतरनाक बात है।

भारत के लोकतांत्रिक होने का दुश्मन को फायदा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए कॉग्निटिव वॉरफेयर एक बड़ी चुनौती है। इस तरह के हमलों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वहां सूचना की आजादी होती है। लोग सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय रखते हैं, जो बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं और सच अक्सर पीछे छूट जाता है। इसका असर समाज की एकता और स्थिरता पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में फेक न्यूज़, सोशल मीडिया के जरिए फैलाए गए झूठ और संस्थानों के खिलाफ दुष्प्रचार के कई उदाहरण सामने आए हैं। यह सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत भी इस तरह के मानसिक युद्ध के दायरे में है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम

हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह देखा गया कि कैसे तेज और सटीक सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना और नैरेटिव पर भी नियंत्रण रखा गया। रक्षा मंत्री ने जिस तरह जनता के शांत व्यवहार और सेना पर भरोसे की बात कही, वह इस बात का संकेत था कि भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम है। यही मजबूती किसी भी देश की सबसे बड़ी ढाल होती है।

कॉग्निटिव वॉरफेयर से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय काफी नहीं हैं। इसके लिए समाज को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर दिखाई देने वाली खबर सच नहीं होती। मीडिया लिटरेसी, संस्थानों पर भरोसा और सही समय पर सही जानकारी देना भी बेहद जरूरी है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Indian Army IKIGAI: जापानी दर्शन अब सेना की रणनीति में! सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने दिया नया इकीगाई मंत्र

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework
Army Chief General Upendra Dwivedi

Indian Army IKIGAI: आजकल “इकीगाई” (IKIGAI) शब्द काफी चर्चा में है। यह शब्द आम लोगों के जीवन दर्शन से लेकर मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स तक सुनाई दे रहा है। जापान से निकला यह कॉन्सेप्ट अब भारत में भी चर्चा का विषय बन गया है, खासकर तब जब भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इकीगाई से जुड़ा एक नया फ्रेमवर्क पेश किया। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि इकीगाई क्या है और इसका सेना से क्या संबंध है।

Indian Army IKIGAI: इकीगाई का यह है मतलब

इकीगाई एक जापानी शब्द है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। “इकी” का मतलब होता है जीवन और “गाई” का अर्थ होता है कारण या मूल्य। यानी इकीगाई का सीधा अर्थ है जीवन जीने का कारण। इसे आसान भाषा में समझें तो यह वह वजह है, जिसके लिए कोई व्यक्ति हर सुबह उठता है और अपने दिन की शुरुआत करता है।

Vijay Diwas 2025: विजय दिवस ‘एट होम’ में भारतीय सेना ने दिखाई स्वदेशी की ताकत, AI से लेकर से ड्रोन टेक्नोलॉजी को किया शोकेस

जापान में इकीगाई को बहुत साधारण तरीके से देखा जाता है। वहां इसे किसी बड़े लक्ष्य या ऊंचे पद से नहीं जोड़ा जाता। यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी खुशियों से जुड़ा होता है, जैसे परिवार के साथ समय बिताना, पसंद का काम करना, बागवानी, संगीत या समाज के लिए कुछ करना। जापान के ओकिनावा इलाके में लोग लंबी और संतुलित जिंदगी जीते हैं और इसके पीछे इकीगाई को एक अहम वजह माना जाता है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: पश्चिमी देशों के लिए यह है इकीगाई का अर्थ

वहीं, पश्चिमी देशों में इकीगाई को थोड़ा अलग तरीके से समझाया गया। वहां इसे चार सवालों के मेल के रूप में पेश किया गया। पहला, आपको क्या पसंद है। दूसरा, आप किस काम में अच्छे हैं। तीसरा, दुनिया को किस चीज की जरूरत है। और चौथा, किस काम से आप कमाई कर सकते हैं। इन चारों के बीच संतुलन को इकीगाई कहा गया। हालांकि जापान में इसका मूल अर्थ इससे कहीं ज्यादा सरल और निजी है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: सेना प्रमुख ने पेश किया नया इकीगाई फ्रेमवर्क

इकीगाई केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं रहा। दिसंबर 2025 में जापान की मेजबानी में हुए लैंड फोर्सेस समिट के दौरान भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसी विचार से प्रेरित होकर एक नया इकीगाई फ्रेमवर्क पेश किया। यह फ्रेमवर्क इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में थल सेनाओं के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित किया गया।

इस समिट में भारत के साथ-साथ जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे देशों के सेना प्रमुख और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और साझा चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसी मंच पर जनरल द्विवेदी ने बताया कि जैसे इकीगाई व्यक्ति को जीवन का उद्देश्य देता है, वैसे ही यह नया इकीगाई फ्रेमवर्क सेनाओं को साझा उद्देश्य के साथ काम करने की दिशा दिखाता है। (Indian Army IKIGAI)

सेना के संदर्भ में इकीगाई एक एक्रोनिम है, यानी हर अक्षर का एक अलग मतलब है। इसमें सेनाओं के बीच आपसी तालमेल, सूचना साझा करना, जॉइंट ट्रेनिंग, मानवीय सहायता, तकनीकी सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और लॉजिस्टिक्स सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं। इसका मकसद यह है कि अलग-अलग देशों की थल सेनाएं मिलकर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखें। (Indian Army IKIGAI)

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework

IKIGAI फ्रेमवर्क के कंपोनेंट्स

I – Interoperability and Information Sharing: सेनाओं के बीच कंपैटिबिलिटी और इंटेलिजेंस शेयरिंग।
K – Knowledge and Professional Military Education: नॉलेज शेयरिंग और प्रोफेशनल ट्रेनिंग/एजुकेशन।
I – International Humanitarian Assistance and Disaster Relief (HADR): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मदद और डिजास्टर रिलीफ (जैसे भूकंप, बाढ़ में सहायता)।
G – Generative Technological Partnerships: उभरती टेक्नोलॉजी (जैसे AI, ड्रोन) में पार्टनरशिप।
A – Assurance for Security Partnerships: सिक्योरिटी पार्टनरशिप्स में विश्वास और गारंटी।
I – Integrated Logistics and Sustainment: इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और सपोर्ट सिस्टम (सप्लाई चेन मजबूत करना)।

जनरल द्विवेदी ने इस फ्रेमवर्क को तीन बुनियादी आधारों पर रखा। पहला, साझा चुनौतियों की पहचान। दूसरा, समान सिद्धांतों पर सहमति। और तीसरा, मिलकर ठोस कदम उठाना। यह विचार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के बीच सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित है।

क्वाड समूह के सदस्य देश शामिल

यह समिट इसलिए भी अहम मानी गई क्योंकि इसमें क्वाड समूह के सदस्य देशों की भागीदारी रही। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन देशों के बीच समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर पहले से ही सहयोग चल रहा है। लैंड फोर्सेस समिट में हुई चर्चा ने थल सेनाओं के स्तर पर भी सहयोग को नई दिशा दी।

भारतीय सेना की ओर से यह संदेश साफ था कि भारत एक मुक्त, खुला और इन्क्लूसिव इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थन करता है। इसके लिए समान सोच वाले देशों के साथ मिलकर काम करना जरूरी है। इकीगाई फ्रेमवर्क इसी सहयोग को एक स्ट्रक्चर्ड रूप देता है। (Indian Army IKIGAI)

इकीगाई का मूल भाव है “उद्देश्य”

इस तरह देखा जाए तो इकीगाई का मूल भाव “उद्देश्य” है। व्यक्तिगत जीवन में यह खुशी और संतुलन देता है, जबकि सैन्य संदर्भ में यह सहयोग, साझा जिम्मेदारी और स्थिरता का रास्ता दिखाता है। जापान की संस्कृति से निकला यह विचार अब अंतरराष्ट्रीय सिक्योरिटी डॉयलॉग का हिस्सा बन चुका है।

इकीगाई आज केवल एक जीवन दर्शन नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाया जाने वाला एक ब्रॉड आइडिया बन गया है। चाहे आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी हो या देशों की सेनाओं के बीच रणनीतिक सहयोग, इकीगाई का अर्थ हर जगह उद्देश्य और संतुलन से जुड़ा हुआ है। (Indian Army IKIGAI)

Defence Emergency Procurement: जानिए क्यों अधर में लटक सकते हैं अरबों के रक्षा सौदे? समझिए इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का क्या है पूरा खेल

Defence Emergency Procurement Extension: DAC Meeting

Defence Emergency Procurement: भारत सरकार के इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया की समयसीमा को खत्म हुए एक महीना होने वाला है। यह समयसीमा पिछले महीने 19 नवंबर समाप्त हो गई थी। अब रक्षा मंत्रालय इस समय सीमा को एक महीना और आगे बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसकी वजह यह है कि कई हथियार प्रणालियों और सैन्य उपकरणों से जुड़ी बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन समयसीमा समाप्त होने के चलते उन्हें पूरा नहीं किया जा सका।

रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों के अनुसार, अगर यह अवधि नहीं बढ़ाई जाती है, तो जिन सौदों पर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, वे अधर में लटक सकते हैं। ऐसे में एक महीने का एक्सटेंशन देकर इन सौदों को कॉन्ट्रैक्ट के स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।

Defence Emergency Procurement: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्या है और क्यों जरूरी है

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक विशेष प्रक्रिया है, जिसके तहत भारतीय सेनाओं को बेहद कम समय में हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण खरीदने की अनुमति दी जाती है। सामान्य रक्षा सौदों में जहां दो से तीन साल तक का वक्त लग जाता है, वहीं इस प्रक्रिया के तहत छह महीने के भीतर डिलीवरी सुनिश्चित की जाती है।

इस प्रक्रिया में न तो लंबा टेंडर निकाला जाता है और न ही ट्रायल किए जाते हैं। आम तौर पर हर सौदे की सीमा 300 से 400 करोड़ रुपये के बीच होती है, ताकि जरूरत के समय तुरंत सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सके।

Defence Emergency Procurement: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

पिछले कुछ सालों में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल कई बार किया गया है। पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीनी सेना के साथ हुए टकराव के बाद भारत ने इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में हथियार और उपकरण खरीदे थे। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इस प्रक्रिया को अपनाया गया।

मई 2025 में सरकार ने इस विशेष व्यवस्था के तहत करीब 40 हजार करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी थी। इसका मकसद सेना की तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना था, ताकि किसी भी हालात में तैयारियों में कमी न रहे। उस दौरान सेना को ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, एयर डिफेंस सिस्टम और गोला-बारूद की तत्काल जरूरत पड़ी थी, जिसे इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के जरिए पूरा किया गया। (Defence Emergency Procurement)

बता दें कि इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर की वैलिडिटी पीरियड आमतौर पर 6 महीने दी जाती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद मई 2025 में दी गई पावर नवंबर 19, 2025 तक वैलिड थी। इसके तहत 40 दिनों के अंदर कॉन्ट्रैक्ट साइन करना अनिवार्य होता है। वहीं 1 साल के अंदर पूरी डिलीवरी होनी चाहिए। अगर 1 साल में डिलीवरी नहीं हुई, तो 2025 की नई पॉलिसी अपडेट के तहत कॉन्ट्रैक्ट फोरक्लोज यानी कैंसल किया जा सकता है। नवंबर 2025 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने सख्त चेतावनी दी थी कि अब इस नियम को सख्ती से लागू किया जाएगा, चाहे सप्लायर देसी हो या विदेशी। आमतौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का उद्देश्य 3-6 महीने में डिलीवरी सुनिश्चित करना है, ताकि तत्काल ऑपरेशनल गैप भरा जाए। (Defence Emergency Procurement)

Defence Emergency Procurement: सबसे ज्यादा जोर ड्रोन सिस्टम की खरीद पर

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत सबसे ज्यादा जोर ड्रोन और ड्रोन से जुड़े सिस्टम पर दिया गया। इसमें निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले सर्विलांस ड्रोन शामिल हैं। इनमें हेरॉन मार्क-2 जैसे ड्रोन पहले ही खरीदे जा चुके हैं और इनकी संख्या बढ़ाने पर भी बातचीत हुई है। इसके साथ ही दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने वाले कामिकेजे ड्रोन यानी सुसाइड ड्रोन भी खरीदे गए हैं। नागास्त्र-1आर जैसे ड्रोन की बड़ी संख्या में खरीद इसी प्रक्रिया के तहत की गई।

Defence Emergency Procurement: लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन पर फोकस

ड्रोन के अलावा, सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन भी प्राथमिकता में रखे गए। इनमें हारॉप, हार्पी और स्काईस्ट्राइकर जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो लंबे समय तक हवा में मंडराकर सही मौके पर टारगेट को निशाना बनाते हैं। इनके साथ-साथ आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल यूनिट्स के लिए जरूरी गोला-बारूद की खरीद भी की गई, ताकि किसी भी मोर्चे पर सप्लाई की कमी न हो। (Defence Emergency Procurement)

Emergency Defence Procurement Rules: आपातकालीन हथियार सौदों पर नई सख्ती, एक साल में डिलीवरी नहीं तो रद्द होगा कॉन्ट्रैक्ट

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के दौरान कुछ खास मिसाइल सिस्टम भी शामिल किए गए। रैंपेज मिसाइल पहले ही इस प्रक्रिया में खरीदी जा चुकी हैं और अब इनके और ऑर्डर देने तथा स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर भी काम चल रहा है। ड्रोन के खतरे को देखते हुए लो-लेवल रडार की खरीद भी अहम रही, जिनका इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन की पहचान के लिए किया जाता है। इस क्षेत्र में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को ऑर्डर दिए गए हैं।

टैंक और बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए जैवेलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी इमरजेंसी खरीद का हिस्सा बनीं। इन्हें अमेरिका से तुरंत खरीदा गया, साथ ही इनके को-प्रोडक्शन को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए एक्सकैलिबर 155 एमएम प्रिसिजन गाइडेड आर्टिलरी शेल की और खरीद पर भी विचार किया गया, क्योंकि इनकी सटीकता मैदान में साबित हो चुकी है। (Defence Emergency Procurement)

ड्रोन से बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना ने इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम पर भी ध्यान दिया है। यह सिस्टम ड्रोन की पहचान करने और उन्हें निष्क्रिय करने में मदद करता है, जिससे संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा मजबूत होती है।

Defence Emergency Procurement: भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता

इन सभी खरीद में सरकार का जोर अधिक से अधिक भारतीय कंपनियों से सामान लेने पर रहा है। सोलर इंडस्ट्रीज, भारत डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों को बड़े ऑर्डर दिए गए हैं, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, कुछ जरूरी सिस्टम ऐसे भी हैं, जिन्हें इमरजेंसी हालात में विदेश से मंगाना पड़ा।

Defence Procurement Manual-2025: अब चुटकियों में होगी रक्षा खरीद, नए डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल में कई पुरानी बाधाओं को किया दूर

नवंबर 2025 तक इन सौदों में से कई पर बातचीत चलती रही, लेकिन इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समयसीमा खत्म हो जाने के कारण सभी समझौते पूरे नहीं हो सके। (Defence Emergency Procurement)

फास्ट ट्रैक परचेज सिस्टम भी विकल्प

रक्षा मंत्रालय के सामने एक और विकल्प फास्ट ट्रैक परचेज का भी है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट से मिलती-जुलती है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। हालांकि, अभी इस विकल्प पर भी चर्चा चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

दिसंबर में हो सकती है डीएसी की अहम बैठक

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा बढ़ाने पर फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में लिया जा सकता है। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होती है। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन शामिल होते हैं। (Defence Emergency Procurement)

Loitering munitions: भारत का पहला स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन नागास्त्र-1 भारतीय सेना में शामिल होने के लिए तैयार, अब लंबी रेंज वाले ड्रोन की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, डीएससी की इस साल की आखिरी बैठक 26 दिसंबर को होने की संभावना है। इसी बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के को बढ़ानेया फास्ट ट्रैक प्रक्रिया को अपनाने पर फैसला लिया जा सकता है।

स्वदेशी हथियारों पर सरकार का फोकस

हाल के महीनों में डीएसी ने जिन हथियारों को मंजूरी दी है, उनमें से अधिकतर पूरी तरह स्वदेशी या बड़े स्तर पर स्वदेशी सामान का इस्तेमाल हुआ है। यह सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल का हिस्सा है। हालांकि, कुछ बड़े सौदे अब भी विदेशी कंपनियों से जुड़े हैं, जिनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी प्रिडेटर ड्रोन की खरीद प्रमुख है। (Defence Emergency Procurement)

चल रही बातचीत को पूरा करने की जरूरत

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा को थोड़ा और बढ़ाया जाता है, तो पहले से चल रही बातचीत को औपचारिक समझौतों में बदला जा सकता है। इससे सेना की तत्काल जरूरतें भी पूरी होंगी और खरीद प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कतें भी नहीं आएंगी।

उरी आतंकी हमले के बाद बढ़ा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल

भारत में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट यानी आपातकालीन रक्षा खरीद की व्यवस्था का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में धीरे-धीरे बढ़ी है। साल 2014 से 2016 के बीच यह व्यवस्था बहुत सीमित थी और अधिकतर मामलों में खरीद सीधे रक्षा मंत्रालय के स्तर पर देखी जाती थी। उस समय सशस्त्र बलों को बड़े पैमाने पर विशेष खरीद अधिकार नहीं मिले थे।

लेकिन असल बदलाव साल 2016 के बाद आया। उरी आतंकी हमले के बाद सरकार ने सेना को विशेष वित्तीय शक्तियां दीं, ताकि जरूरत पड़ने पर हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके बाद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक अहम प्रक्रिया बन गई।

साल 2014 से अक्टूबर 2016 के बीच भारतीय सेना ने इस व्यवस्था के तहत कुल 17 छोटे कॉन्ट्रैक्ट किए, जिनकी कुल कीमत करीब 400 करोड़ रुपये रही। उस समय खरीद का दायरा सीमित था और जरूरतें भी तुलनात्मक रूप से कम थीं। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद हालात तेजी से बदले। उरी के बाद, बालाकोट एयर स्ट्राइक, फिर लद्दाख में चीन के साथ सैन्य तनाव और बाद में ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के चलते सेना को तत्काल हथियारों और उपकरणों की जरूरत पड़ी। इसी दौर में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की कई ट्रांच यानी चरण शुरू किए गए।

अब तक ईपी के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये

पहली से तीसरी ट्रांच, जिन्हें आमतौर पर ईपी-1 से ईपी-3 कहा जाता है, मुख्य तौर पर से सेना से जुड़ी थीं। इन चरणों में लगभग 68 कॉन्ट्रैक्ट किए गए और कुल खर्च 6,500 से 7,000 करोड़ रुपये के आसपास रहा। इन खरीद में हथियार, गोला-बारूद, निगरानी उपकरण और अन्य जरूरी सैन्य सिस्टम शामिल थे। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद 2022-23 के आसपास ईपी-4 लागू हुई, उसमें इमरजेंसी खरीद का दायरा और बढ़ा। इस चरण में 70 से ज्यादा योजनाओं को मंजूरी दी गई और कुल राशि करीब 11,000 करोड़ रुपये रही। इस ट्रांच की खास बात यह थी कि इसमें ज्यादातर सामान स्वदेशी कंपनियों से खरीदा गया, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके।

इसके बाद एक और छोटी ट्रांच, जिसे ईपी-5 कहा गया, सामने आई। इसकी कुल राशि बहुत ज्यादा नहीं थी और अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक यह करीब 2,000 करोड़ रुपये के आसपास मानी जाती है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर काउंटर-टेरर ऑपरेशंस और तत्काल जरूरतों के लिए किया गया।

सबसे बड़ी और अहम ट्रांच साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई। इसे आमतौर पर ईपी-6 कहा जा रहा है। इस चरण में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी। यह अब तक की सबसे बड़ी इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ट्रांच मानी जा रही है। इसमें ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल हैं।

अगर 2014 से दिसंबर 2025 तक की सभी उपलब्ध रिपोर्ट्स को जोड़ा जाए, तो अनुमानित तौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। अकेले सेना के लिए यह आंकड़ा अलग-अलग रिपोर्ट्स में 18,000 से 29,000 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है। (Defence Emergency Procurement)

Ladakh fourth Axis Road: लद्दाख को चौथे सड़क मार्ग से जोड़ने की BRO की तैयारी, अब हर मौसम में लेह पहुंचना होगा आसान

Ladakh fourth Axis Road All Weather Ladakh Connectivity

Ladakh fourth Axis Road: लद्दाख की कनेक्टिविटी को लेकर एक बड़ी और अहम खबर सामने आई है। सीमा सड़क संगठन यानी बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) लद्दाख को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए चौथे रणनीतिक रोड एक्सिस की तैयारी कर रहा है। यह नया रास्ता तकलिंग ला पास से होकर हिमाचल प्रदेश की ओर जाएगा, जिसके लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा रही है। इसके पूरा होने के बाद लद्दाख और खासकर लेह तक साल के बारहों महीने पहुंचना संभव हो सकेगा।

Ladakh fourth Axis Road: अभी तक लद्दाख पहुंचने के लिए तीन रास्ते

बीआरओ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने रक्षा समाचार को बताया, लद्दाख भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि पहले लद्दाख तक पहुंचने के लिए केवल एक ही मुख्य रास्ता था, जो श्रीनगर से जोजिला पास के जरिए लेह को जोड़ता था। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता था, जिससे लद्दाख का संपर्क देश से कट जाता था। (Ladakh fourth Axis Road)

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इसके बाद दूसरा मार्ग मनाली से लेह तक तैयार किया गया, जो उपशी के रास्ते लद्दाख पहुंचता है। इस रास्ते में तंगला ला, बारालाचा ला, नाकी ला और लाचुंग ला जैसे ऊंचे पहाड़ी दर्रे आते हैं। हालांकि यह मार्ग भी सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है और आवाजाही बंद हो जाती है। अटल टनल बनने के बाद मनाली की तरफ समस्या कुछ हद तक कम हुई, लेकिन ऊंचे पास अब भी चुनौती बने हुए हैं। (Ladakh fourth Axis Road)

Ladakh fourth Axis Road: नीमू-पदम-दारचा रोड पर काम जारी

तीसरे विकल्प के तौर पर नीमू-पदम-दारचा रोड पर काम किया जा रहा है। यह सड़क करीब 298 किलोमीटर लंबी है और लद्दाख के लिए सबसे छोटा मार्ग माना जा रहा है। इस रोड पर शिंकु ला टनल का निर्माण चल रहा है, जिसका पहला ब्लास्ट पिछले साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। बीआरओ के मुताबिक, शिंकु ला टनल बन जाने के बाद यह मार्ग ऑल-वेदर हो जाएगा और साल भर लेह तक पहुंचा जा सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला पास से दक्षिण हिमाचल तक

बीआरओ डीजी लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन के मुताबिक, अब लद्दाख को चौथे सड़क मार्ग से जोड़ने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि यह नया मार्ग तकलिंग ला पास से होकर लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी हिस्सों से जोड़ेगा। बीआरओ के मुताबिक इस रूट के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी वजह से एक या दो मार्ग बंद हो जाएं, तब भी लद्दाख की सप्लाई लाइन और आवाजाही प्रभावित न हो। (Ladakh fourth Axis Road)

शिमला की तरफ से नया एक्सिस

लद्दाख को मिलने वाला चौथा रणनीतिक सड़क मार्ग शिमला की तरफ से तैयार किया जा रहा है, जिसके जरिए दक्षिणी हिमाचर प्रदेश की तरफ से लद्दाख को जोड़ने की तैयारी की जा रही है। यह नया रास्ता शिमला डिवीजन के मौजूदा सड़क नेटवर्क से निकलकर आगे बढ़ेगा। शिमला से ठियोग और रामपुर बुशहर होते हुए सड़क पहले ही किन्नौर जिले के रिकांग पिओ तक पहुंचती है। यह हिस्सा ऑल-वेदर रोड है और साल भर खुला रहता है। इसी मौजूदा नेटवर्क को आगे बढ़ाकर लद्दाख की ओर नया एक्सिस तैयार किया जा रहा है। (Ladakh fourth Axis Road)

रिकांग पिओ के बाद यह रास्ता अपर किन्नौर की तरफ बढ़ेगा और फिर स्पीति घाटी में प्रवेश करेगा। यहां से सड़क कियाटो क्षेत्र तक पहुंचेगी, जिसे स्पीति और लद्दाख के बीच का अहम जंक्शन माना जाता है। इसके बाद यह रास्ता तकलिंग ला पास की ओर जाएगा।

17,700 फीट पर है तकलिंग ला पास

तकलिंग ला पास लगभग 17,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह इलाका पहले पुराने ट्रेड रूट के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। अब इसे आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। इस रूट के जरिए लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के अंदरूनी इलाकों से सीधी और वैकल्पिक कनेक्टिविटी मिलेगी। यह मार्ग मिलिट्री मूवमेंट के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी फायदेमंद होगा। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला पास पर बनेगी टनल

बीआरओ ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत जो मुख्य सड़क बनाई जा रही है, उसका नाम कियाटो-करजोक रोड है। यह सड़क स्पीति घाटी के कियाटो (साउथ लाहौल) इलाके से शुरू होकर तकलिंग ला पास क्रास करेगी और लद्दाख के करजोक क्षेत्र तक पहुंचेगी। तकलिंग ला पार करने के बाद यह सड़क लद्दाख के करजोक (नॉर्थ लद्दाख) इलाके में प्रवेश करेगी, जो त्सो मोरीरी झील के पास स्थित है। इसके लिए तकलिंग ला पास पर एक टनल बनाने की भी योजना है। इस सड़क की कुल लंबाई करीब 125 किलोमीटर होगी। यही सड़क आगे चलकर सादन और मोरे प्लेंस इलाके से जुड़ जाएगी। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला से सादन तक का हिस्सा इस पूरे प्रोजेक्ट का अहम भाग है। तकलिंग ला पास पार करने के बाद सड़क मोरे प्लेन्स के रास्ते सादन तक पहुंचेगी। यह दूरी करीब 50 से 60 किलोमीटर की होगी। यह मार्ग भविष्य में मनाली–लेह हाईवे का एक वैकल्पिक रास्ता बनेगा। अभी इस हिस्से का सर्वे पूरा हो चुका है और डीपीआर अंतिम चरण में है। निर्माण शुरू होने के बाद यह सड़क लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से और तेजी से जोड़ सकेगी। (Ladakh fourth Axis Road)

वहीं, तकलिंग ला से सादन पहुंचने के बाद, हिमाचल प्रदेश की ओर एक और सड़क की योजना पर काम चल रहा है। यह रास्ता दारचा से शुरू होकर शिंकु ला पास होते हुए पदम और फिर निमू तक जाएगा। इस पूरे मार्ग को दारचा–शिंकु ला–पदम–निमू रोड कहा जाता है। इसकी कुल लंबाई करीब 220 किलोमीटर से ज्यादा होगी। इस परियोजना के तहत शिंकु ला पर करीब 4.1 किलोमीटर लंबी टनल बनाई जाएगी, जिससे यह रास्ता पूरे साल खुला रह सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)

इस सड़क और टनल की डीपीआर नेशनल हाइवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन तैयार कर रहा है। सर्वे का काम पूरा हो चुका है और डीपीआर को अंतिम रूप दिया जा रहा है। योजना के मुताबिक, टेंडर प्रक्रिया 2026 में और निर्माण कार्य 2027 में शुरू होने की संभावना है। इसके पूरा होने पर यह लद्दाख के लिए एक और वैकल्पिक रास्ता बन जाएगा।

टनल पूरा होने में करीब चार साल

इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर सीमा सड़क संगठन के महानिदेशक रघु श्रीनिवासन ने बताया कि तकलिंग ला पास पर बनने वाली टनल को पूरा होने में करीब चार साल लगेंगे, जबकि सड़क का निर्माण लगभग दो-तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। बीआरओ डीजी के अनुसार, सड़क पहले तैयार कर ली जाएगी ताकि सीमित समय में भी लद्दाख तक वैकल्पिक आवाजाही शुरू की जा सके, जबकि टनल बनने के बाद यह मार्ग पूरी तरह ऑल-वेदर बन जाएगा। (Ladakh fourth Axis Road)

इन सभी प्रोजेक्ट्स का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लद्दाख तक पहुंच अब केवल एक-दो रास्तों पर निर्भर नहीं रहेगी। सेना को सीमाई इलाकों तक तेजी से पहुंचने में मदद मिलेगी और जरूरी सामान की सप्लाई भी आसान होगी। इसके अलावा, पर्यटन और स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, इन सड़कों को बनाना आसान नहीं है। ऊंचाई, भारी बर्फबारी और कठिन मौसम बड़ी चुनौती हैं। इसके बावजूद बीआरओ इन परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है और टिकाऊ निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।

बीआरओ अधिकारियों के मुताबिक, पहले जहां लद्दाख तक पहुंचने के लिए सिर्फ एक मुख्य रास्ता था, अब चार प्रमुख एक्सिस पर काम किया जा रहा है। ये सभी रास्ते मिलकर लद्दाख की ऑल-वेदर कनेक्टिविटी को मजबूत करेंगे। इससे न सिर्फ सेना को फायदा होगा, बल्कि स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी आसान होगी।

बीआरओ का कहना है कि इन सभी प्रोजेक्ट्स में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, अत्यधिक ठंड और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए काम किया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और अनुभव के आधार पर इन सड़कों को तैयार किया जा रहा है ताकि वे लंबे समय तक टिकाऊ रहें। (Ladakh fourth Axis Road)

Varuna HA: भारतीय सेना ने शोकेस किया देश का पहला दो लोगों को ले जाने वाला हाई-एल्टीट्यूड टैक्टिकल एरियल व्हीकल, हेलिकॉप्टरों का बनेगा विकल्प

SDE Varuna HA- India’s High-Altitude Two-Man VTOL
SDE Varuna HA- India’s High-Altitude Two-Man VTOL

Varuna HA: भारतीय सेना के लिए ऊंचाई वाले और दुर्गम इलाकों में आवाजाही हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना स्वदेशी रूप से विकसित वरुणा एचवीटीओएल (हाइब्रिड वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) प्लेटफॉर्म पर फोकस कर रही है। यह प्लेटफॉर्म बेहद कम जगह से उड़ान भरने और उतरने की क्षमता रखता है, जिससे वह उन इलाकों तक पहुंच सकता है जहां सामान्य हेलिकॉप्टर नहीं उड़ सकते।

54वें विजय दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने नई दिल्ली स्थित आर्मी हाउस में विजय दिवस ‘एट होम’ कार्यक्रम का आयोजन किया था। यह आयोजन 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में किया जाता है। इस मौके पर भारतीय सेना ने स्वदेशी तकनीकों, इनोवेशन को शोकेस किया। इनमें वरुणा एचवीटीओएल को प्रमुख तौर पर शोकेस किया गया था।

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वरुणा एचवीटीओएल को पुणे स्थित सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने डेवलप किया है। यह प्लेटफॉर्म iDEX और ADITI जैसी सरकारी इनोवेशन पहलों के तहत तैयार किया गया है। पहले इसका नेवी वर्जन भारतीय नौसेना में जहाज से जहाज तक सामान ले जाने के लिए शामिल किया गया था। अब इसका हाई-एल्टीट्यूड यानी ऊंचाई के लिए अनुकूलित संस्करण भारतीय सेना की जरूरतों के मुताबिक डेवलप किया जा रहा है। यह देश का पहला दो लोगों को ले जाने वाला हाई-एल्टीट्यूड टैक्टिकल एरियल व्हीकल है।

यह प्लेटफॉर्म वीटीओएल (वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग) क्षमता के साथ आता है और इसमें कंपनी की खास सेल्फ-लर्निंग कमांड एंड कंट्रोल नेविगेशन सिस्टम तकनीक लगी है। इसकी मदद से वरुणा एचए अपने आप यहां तक कि चलती हुई जगहों से भी उड़ान भर सकता है और लैंडिंग कर सकता है।

वरुणा एचए को इस तरह डिजाइन किया गया है कि समय, खर्च और इंसानी जान का जोखिम कम हो। यह ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में भारी सामान उठाने में सक्षम है और जरूरत पड़ने पर हेलिकॉप्टर जैसे पारंपरिक प्लेटफॉर्म का विकल्प बन सकता है।

यह प्लेटफॉर्म कम ऊंचाई पर छोटी और मध्यम दूरी की तेज ट्रांसपोर्ट जरूरतों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में रसद, मेडिकल सप्लाई या जरूरी सामान पहुंचाने में यह बेहद कारगर साबित हो सकता है।

SDE Varuna HA- India’s High-Altitude Two-Man VTOL
SDE Varuna HA- India’s High-Altitude Two-Man VTOL

सेना के उत्तरी और पूर्वी कमानों ने इस प्लेटफॉर्म में गहरी रुचि दिखाई है। इसका मुख्य कारण यह है कि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में कई फॉरवर्ड पोस्ट ऐसे हैं जहां मौसम, टर्बुलेंस और पतली हवा के चलते हेलिकॉप्टरों से सप्लाई पहुंचाना मुश्किल होता है। ऐसे में वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म सैनिकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बन सकते हैं।

यह टैक्टिकल एरियल व्हीकल दो सैनिकों को एक साथ ले जाने या लगभग 150 से 200 किलोग्राम तक का सामान ढोने में सक्षम है। इसमें गोला-बारूद, राशन, मेडिकल सप्लाई और यहां तक कि घायल सैनिक को निकालकर सुरक्षित स्थान तक लाने की क्षमता भी शामिल है। इसकी उड़ान सीमा 25 किलोमीटर से अधिक और उड़ान समय एक घंटे से ज्यादा बताया गया है, जो ऊंचाई वाले इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है।

वरुणा एचवीटीओएल को खास तौर पर ऊंचाई और ठंडे मौसम के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें बड़े रोटर, डी-आइसिंग सिस्टम, मजबूत लैंडिंग गियर और ठंड में काम करने वाला इंजन शामिल किए जाने की योजना है। कंपनी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म माइनस 20 से 30 डिग्री तापमान में भी काम करने में सक्षम होगा।

इस प्लेटफॉर्म की एक बड़ी खासियत इसका सेफ्टी सिस्टम है। इसमें बैलिस्टिक पैराशूट, क्वाड-रिडंडेंट कंट्रोल सिस्टम और एयरबैग जैसी सुविधाएं दी गई हैं, जिससे आपात स्थिति में जोखिम कम हो जाता है। यह विशेष रूप से ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अहम साबित हो सकता है।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म से खतरनाक “फ्री-ड्रॉप” सप्लाई मिशनों की जरूरत कम हो सकती है। अभी कई जगहों पर हेलिकॉप्टरों को ऊंचाई पर उड़ते हुए सामान गिराना पड़ता है, जो पायलटों के लिए जोखिम भरा होता है। एक वरुणा डिटैचमेंट एक दिन में कई फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई पहुंचा सकता है।

सैन्य उपयोग के अलावा यह प्लेटफॉर्म डिजास्टर रिस्पॉन्स, ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस, इमरजेंसी मेडिकल सर्विस, लॉ-एन्फोर्समेंट और दूरदराज़ इलाकों में कनेक्टिविटी जैसे नागरिक कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह वरुणा एचवीटीओएल का इस्तेमाल ड्यूल-यूज प्लेटफॉर्म के तौर पर भी किया जा सकता है।

Operation Sindoor Turkish Drone: ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने मार गिराया था तुर्की का यह ड्रोन, लाहौर से हुआ था लॉन्च, यह था निशाना

Operation Sindoor Turkish Drone

Operation Sindoor Turkish Drone: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत पर कई ड्रोन हमले किए थे। जिन्हें भारतीय सेना के एयर डिफेंस सिस्टम ने बडी सटीकता के साथ नाकाम कर दिया था। इनमें से पाकिस्तान को कई ड्रोन तुर्किए से मिले थे। इन्हें भी भारतीय सेना ने मार गिराया था। उन गिराए गए ड्रोनों में से एक ड्रोन का देखने का मौका रक्षा समाचार को भी मिला। तुर्की में बने इस आर्मेड ड्रोन को पाकिस्तान ने लाहौर से लॉन्च किया था। यह ड्रोन भारतीय वायुसेना के एक अहम सैन्य ठिकाने को निशाना बनाने के लिए भेजा गया था, लेकिन भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम एल-70 गनों ने इसे भारत की सीमा के भीतर घुसने से पहले ही गिरा दिया था।

Pakistan drone ToT: पाकिस्तान गुपचुप कर रहा है यह खास ड्रोन डील, यूरोपियन कंपनी के साथ हुए गुप्त समझौते पर भारतीय एजेंसियों की नजर

हालांकि उस दौरान सेना के सूत्रों ने इस ड्रोन की पुष्टि थी, लेकिन ज्यादा जानकारी देने से परहेज बरता था। उसके बाद इस ड्रोन को फॉरेंसिक के लिए भेजा गया था। यह ड्रोन हाल ही में विजय दिवस के अवसर पर थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के दिल्ली स्थित आवास पर प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में यह ड्रोन अन्य सैन्य स्मृतिचिह्नों के साथ रखा गया था।

Operation Sindoor Turkish Drone

पाकिस्तान ने यह ड्रोन हमला 8 मई को किया था, यानी उस दिन के करीब 24 घंटे बाद जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों को तबाह किया था। इसके जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और पंजाब के 36 शहरों और कस्बों को निशाना बनाते हुए 500 से ज्यादा हथियारबंद ड्रोन भारतीय सीमा में भेजे थे।

भारतीय सेना और वायुसेना की मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम ने इन हमलों का जवाब दिया और लगभग सभी ड्रोन हवा में ही मार गिराए गए। इन्हीं में से एक ड्रोन था यीहा-III (YIHA-III), जिसे तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर डेवलप किया है। यह एक कामिकेज या सुसाइड ड्रोन है, जिसे लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है।

यीहा-III ड्रोन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह किसी इलाके के ऊपर काफी समय तक मंडरा सकता है और सही टारगेट मिलने पर विस्फोट के साथ उस पर हमला कर देता है। अधिकारियों के मुताबिक, यह ड्रोन 10 मई को लाहौर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के आसपास से लॉन्च किया गया था और उस समय लगभग 2,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहा था।

ड्रोन में करीब 10 किलोग्राम विस्फोटक लोड किया गया था। इसका टारगेट पंजाब में जलंधर के पास आदमपुर में तैनात भारतीय वायुसेना का एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम था। कुछ अधिकारियों ने बताया कि निशाना होशियारपुर या जालंधर सेक्टर में स्थित सैन्य प्रतिष्ठान हो सकता था। हालांकि, यह ड्रोन अपने टारगेट तक पहुंचने में सफल नहीं हो सका और अमृतसर के पास भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने इसे इंटरसेप्ट कर गिरा दिया।

Operation Sindoor Turkish Drone

ड्रोन को गिराने के बाद भारतीय सेना के साइबर और तकनीकी विशेषज्ञों ने इसे पूरी तरह खोलकर जांच की। इस दौरान इसके फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, प्री-फीडेड फ्लाइट पाथ, लॉन्च पॉइंट और टारगेट डेटा का विश्लेषण किया गया। सेना के अनुसार, जांच में यह स्पष्ट हो गया कि ड्रोन में फ्लाइट प्लान पहले से फीड किया गया था और इसे सीधे भारतीय सैन्य ठिकाने की ओर भेजा गया था।

सेना के अधिकारियों ने बताया कि इस तरह की जांच से दुश्मन की रणनीतिक और सामरिक मंशा को समझने में मदद मिलती है। ड्रोन में लगे कैमरे, इंफ्रारेड सेंसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का डेटा भी सुरक्षित किया गया है।

इस दौरान यह भी सामने आया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की में बने अन्य हथियारबंद ड्रोन भी इस्तेमाल किए थे। इनमें ‘सोंगार’ नाम का ड्रोन शामिल है, जिसे तुर्की की डिफेंस कंपनी एशिसगार्ड बनाती है। सोंगार ड्रोन के अलग-अलग वेरिएंट्स में असॉल्ट राइफल, ग्रेनेड लॉन्चर और मोर्टार जैसे हथियार लगाए जा सकते हैं।

भारतीय सेना के अनुसार, पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए ये ड्रोन भारतीय सुरक्षा बलों की सतर्कता और मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम के सामने टिक नहीं पाए। सेना की तेज कार्रवाई से न केवल सैन्य ठिकानों को सुरक्षित रखा, बल्कि नागरिक इलाकों को भी बड़े नुकसान से बचाया।

MH-60R 2nd squadron: 17 दिसंबर भारतीय नौसेना के लिए होगा बेहद खास, गोवा में कमीशन होगी रोमियो हेलीकॉप्टर्स की दूसरी स्क्वाड्रन

MH-60R 2nd squadron

MH-60R 2nd squadron: भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता को जबरदस्त बूस्ट मिलने वाला है। नौसेना 17 दिसंबर को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में अपनी दूसरी एमएच-60आर यानी रोमियो हेलिकॉप्टर स्क्वाड्रन को कमीशन करेगी। इसका पहला स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 ‘सीहॉक्स’ पहले कोच्चि के आईएनएस गरूड़ पर मार्च 2024 में कमीशन किया गया था। यह स्क्वाड्रन उस समय बनाया गया था जब शुरु में एमएच-60आर हेलिकॉप्टर्स भारत आए थे।

एमएच-60आर हेलिकॉप्टर की नई स्क्वाड्रन का नाम आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेज’ रखा गया है। इनकी कमीशनिंग के मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी भी मौजूद रहेंगे। यह कमीशनिंग भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)

इससे पहले नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने 4 दिसंबर की नेवी डे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिसंबर 2025 में ही आईएनएस हंसा, गोवा में फुल स्क्वाड्रन कमीशन होगा। नौसेना की योजना तीन स्क्वाड्रन बनाने की है इनमें से दो को वेस्टर्न फ्लीट के लिए, एक ईस्टर्न के लिए तैनात कियाा जाएगा।

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वहीं, आईएनएएस 335 स्क्वाड्रन के कमीशन होने से नौसेना की समुद्री निगरानी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और सतह पर मौजूद खतरों से निपटने की क्षमता को सीधा फायदा मिलेगा। एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों को दुनिया के सबसे आधुनिक मैरीटाइम हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: एमएच-60आर हेलिकॉप्टर क्यों हैं खास

एमएच-60आर हेलिकॉप्टर को ‘रोमियो’ नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऑल-वेदर मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर है, जिसे खासतौर पर एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आधुनिक सेंसर, एडवांस एवियोनिक्स और ताकतवर विपन सिस्टम लगा है। यही वजह है कि यह हेलिकॉप्टर ट्रेडीशनल एंड एसिमेट्रिकल दोनों तरह के खतरों से निपटने में सक्षम है। (MH-60R 2nd squadron)

ये हेलिकॉप्टर्स शिप्स (जैसे विक्रांत, विक्रमादित्य, डिस्ट्रॉयर्स) से ऑपरेट होते हैं, इसलिए एक स्क्वाड्रन के कुछ हेलिकॉप्टर्स अलग-अलग शिप्स पर एम्बार्क्ड रहते हैं।

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भारतीय नौसेना ने साल 2020 में अमेरिका से 24 एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया था, जिसकी कुल कीमत लगभग 2.4 अरब डॉलर थी। अब तक इनमें से 15 हेलिकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं। सभी की डिलीवरी 2027 तक पूरी हो जाएगी। इनमें से कुछ हेलिकॉप्टर अभी अमेरिका में ही हैं, जहां भारतीय पायलटों और टेक्निकल स्टाफ को ट्रेनिंग दी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: पहले भी साबित कर चुके हैं क्षमता

रोमियो हेलिकॉप्टर पहले ही नौसेना के फ्लीट ऑपरेशंस में पूरी तरह इंटीग्रेट हो चुके हैं और कई मौकों पर अपनी उपयोगिता साबित कर चुके हैं। इन हेलिकॉप्टरों को वॉरशिप्स से ऑपरेट किया जा सकता है, जिससे समुद्र के बड़े इलाके में निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ जाती है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R Seahawk Helicopters: अमेरिका ने MH-60R हेलिकॉप्टर के सपोर्ट सिस्टम की बिक्री के लिए दी मंजूरी, भारत की समुद्री सुरक्षा को मिलेगी मजबूती

इन हेलिकॉप्टरों में डिपिंग सोनार, मल्टी-मोड रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम लगे हैं, जो समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करते हैं। इसके साथ ही ये हेलिकॉप्टर मार्क-54 टॉरपीडो और हेलफायर एयर-टू-सर्फेस मिसाइलों से लैस हैं। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: आईएनएस हंसा से मिलेगी पश्चिमी में बढ़त

ऑस्प्रेज स्क्वाड्रन को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में तैनात किया जाएगा, जो पश्चिमी समुद्री तट पर नौसेना का प्रमुख एयर बेस है। यहां से अरब सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्र में निगरानी और ऑपरेशनल गतिविधियों को मजबूती मिलेगी। यह इलाका रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)

भारतीय नौसेना पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। हाल के वर्षों में चीनी नौसैनिक और रिसर्च जहाजों की मौजूदगी इस क्षेत्र में बढ़ी है, ऐसे में रोमियो जैसे आधुनिक हेलिकॉप्टर नौसेना के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: पुराने हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे रोमियो

रोमियो हेलिकॉप्टर भारतीय नौसेना में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पुराने सी किंग हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलिकॉप्टर अब अपनी मूल भूमिका की तुलना में ज्यादा ट्रांसपोर्ट कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे। नए हेलिकॉप्टरों के आने से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता फिर से मजबूत हो रही है। (MH-60R 2nd squadron)

मेंटेनेंस और सपोर्ट पर भी फोकस

हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच रोमियो हेलिकॉप्टरों (MH-60R 2nd squadron) के लिए लगभग 7,995 करोड़ रुपये का फॉलो-ऑन सपोर्ट समझौता भी हुआ है। इसके तहत अगले पांच वर्षों तक इन हेलिकॉप्टरों के मेंटेनेस, रिपेयर और स्पेयर सपोर्ट की व्यवस्था की जाएगी। भारत में ही इंटरमीडिएट लेवल मेंटेनेंस फैसिलिटी स्थापित की जाएगी, जिससे ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ेगी।