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CAG Report: Expendited Rs 10 thousand crore, yet the army is not getting from NCC and soldier schools? CAG report opened pole

CAG Report

CAG Report: नेशनल कैडेट कोर (NCC) और सैनिक स्कूलों को हमेशा से भारतीय सेना के लिए अफसर तैयार करने की नर्सरी कहा गया है। लेकिन अब इन दोनों की असलियत पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में संसद में पेश हुई कैग (CAG) की रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि जितनी उम्मीद थी, उतने अफसर इन संस्थानों से सेना को नहीं मिल रहे हैं।

CAG Report: आंकड़े चौंकाने वाले हैं

कैग कहता है, NCC और सैनिक स्कूलों में छात्रों की भीड़ है, फिर भी इनसे सेना के लिए अफसर बनने वालों की संख्या काफी कम है। मार्च 2023 तक रिपोर्ट में यही तस्वीर सामने आई कि उम्मीदवार आते तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम का चयन हो पाता है।

CAG Report: पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की हालत खराब

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक खासकर पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में स्थिति और भी खराब है। रिपोर्ट में साफ बताया गया कि इन इलाकों से सेना को अपेक्षा के मुकाबले काफी कम अधिकारी मिल पा रहे हैं। सीएजी ने इस पर भी चिंता जताई है और सिफारिश की है कि यहां व्यवस्था और संसाधनों में तुरंत सुधार होना चाहिए। (CAG Report)

10 हजार करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन सस्थानों को मिलने वाली फंडिंग को लेकर भी चिंता जताई है। सीएजी का कहना है कि पिछले पांच साल में एनसीसी और सैनिक स्कूलों पर पूरे 10,043.66 करोड़ रुपये खर्च हुए। फिर भी, नतीजे कुछ खास नहीं निकले। रिपोर्ट कहती है कि इतना पैसा बहाने के बाद भी ट्रेनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिलेक्शन सवालों के घेरे में है। (CAG Report)

राज्यों ने बजट देने में भी ढिलाई की

रिपोर्ट में राज्य सरकारों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई राज्यों ने के लिए तय बजट के मुताबिक फंड ही नहीं दिया। नतीजा ये हुआ कि पश्चिम बंगाल और सिक्किम में 43 फीसदी से ज्यादा एनसीसी कैंप रद्द करने पड़े। वहीं, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एनसीसी अधिकारियों और कैडेट्स को मानदेय और भत्ते भी समय पर नहीं मिले। (CAG Report)

CAG Report: स्कॉलरशिप भी छात्रों को नहीं मिली

सीएजी रिपोर्ट में बताया गया है कि सैनिक स्कूलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। कई राज्यों ने रेगुलर फंडिंग नहीं की, जिससे स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की पेंशन और रिटायरमेंट बेनिफिट्स पर असर पड़ा। स्कॉलरशिप की रकम भी हर राज्य में अलग-अलग है, और यहां तक कि कुछ राज्यों ने तो अपने बच्चों को दूसरे राज्यों में पढ़ने पर स्कॉलरशिप तक नहीं दी। (CAG Report)

ट्रेनिंग की जगह और सुविधाएं भी कम

यहां तक कि ट्रेनिंग और रहने की सुविधाएं भी काफी कम हैं। 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एनसीसी के लिए स्थायी ट्रेनिंग एरिया ही नहीं है। इसकी वजह से फायरिंग ट्रेनिंग भी प्रभावित हुई। सैनिक स्कूलों में 11 जगहों पर या तो छात्रों के हॉस्टल हैं या फिर जर्जर हालत में हैं। 14 स्कूलों में स्टाफ क्वार्टर कम हैं और 7 स्कूलों में स्टाफ का रहना मुश्किल है। (CAG Report)

सेना में अफसर बनने का रास्ता तो एनसीसी और सैनिक स्कूलों से ही जाता है, चाहे वो स्पेशल एंट्री स्कीम हो या एनडीए। लेकिन, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, फंड की कमी और ट्रेनिंग की दिक्कतों के चलते फौज में जाने का छात्रों का सपना टूट रहा है। ये रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब सेना को लगातार युवा और ट्रेंड अफसरों की जरूरत है। (CAG Report)

क्या है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम

एनसीसी कैडेट्स के लिए भारतीय सेना में सीधी भर्ती का रास्ता है एनसीसी स्पेशल एंट्री स्कीम। इसमें बिना लिखित परीक्षा के भी अफसर बना जा सकता है, बस कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। उम्मीदवार का ग्रेजुएट होना जरूरी है, कम से कम 50% अंक होने चाहिए। एनसीसी की सीनियर डिवीजन या सीनियर विंग में दो से तीन साल की सेवा जरूरी है, और ‘सी’ सर्टिफिकेट में कम से कम ‘बी’ ग्रेड चाहिए। उम्र 19 से 25 साल के बीच हो और उम्मीदवार अविवाहित हो, ये भी जरूरी है। (CAG Report)

Indian Army New Bases: Indian Army making new military base in Mizoram, an increased risk on Bangladesh border! Two more locals short list

Indian Army New Bases
Lt Gen RC Tiwari visited the Company Operating Base of Assam Rifles and BSF under Spear Corps at Parva, Mizoram

Indian Army New Bases: बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाकों में बदलते हालात और घुसपैठ के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय सेना ने बड़ी तैयारियां शुरू कर दी हैं। बीते कुछ महीनों में सेना ने पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। वहीं अब मिजोरम में चौथा मिलिट्री बेस बनाने की तैयारी चल रही है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और कट्टरपंथी गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।

सेना के सूत्रों के अनुसार, आने वाले सालों में भारत-बांग्लादेश-म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में सिक्योरिटी स्ट्रक्चर को पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा। सेना की इस रणनीति का मकसद केवल घुसपैठ रोकना नहीं है, बल्कि किसी भी तरह की अस्थिरता या बाहरी खतरे से निपटने की पहले ही तैयारी रखना है।

Indian Army New Bases: मिजोरम में क्यों जरूरी है नया मिलिट्री बेस

भारतीय सेना ने मिजोरम में दो जगहों परवा और सिलसुरी को नए मिलिट्री बेस के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। ये दोनों इलाके बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां भारत, बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाएं एक-दूसरे के बेहद सटी हुई हैं।

यह इलाका लंबे समय से तस्करी, अवैध घुसपैठ और उग्रवादी गतिविधियों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। हाल के सालों में यहां ड्रग्स, हथियार और नकली सामान की तस्करी की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। सेना का मानना है कि अगर इस इलाके में स्थायी और मजबूत मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा किया जाता है, तो सुरक्षा एजेंसियों को कार्रवाई करने में आसानी होगी।

अगले पांच सालों में ये है बड़ा प्लान

सेना की तैयारी केवल एक बेस बनाने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि अगले पांच सालों में इस इलाके में बड़े पैमाने पर सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया जाएगा। इसमें दर्जनों आधुनिक बंकर, आर्टिफिशियल एम्बैंकमेंट्स, ब्लास्ट-प्रूफ शेल्टर और भूमिगत हथियार भंडार बनाए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, करीब 45 सेट ऐसे स्ट्रक्चर तैयार किए जाएंगे, ताकि जवानों को हर मौसम और हर स्थिति में सुरक्षित ठहरने और ऑपरेशन चलाने की सुविधा मिल सके। इन ठिकानों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत जवाबी कार्रवाई की जा सके।

पहले से एक्टिव तीन नए ठिकाने

मिजोरम से पहले भारतीय सेना पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में तीन नए ऑपरेशनल बेस पहले ही बना चुकी है। इन इलाकों को खासतौर पर इसलिए चुना गया, क्योंकि यहां से बांग्लादेश की सीमा बेहद करीब है और अतीत में यहां से अवैध गतिविधियों की खबरें आती रही हैं।

इन ठिकानों का मकसद सीमावर्ती इलाकों में स्थायी मौजूदगी बढ़ाना और स्थानीय सुरक्षा बलों के साथ बेहतर तालमेल बनाना है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि अब सुरक्षा केवल पेट्रोलिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि रियल-टाइम निगरानी और तुरंत कार्रवाई पर जोर होगा।

परवा में कमांडर का दौरा

इसी रणनीति के तहत हाल ही में भारतीय सेना की पूर्वी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने मिजोरम के परवा इलाके का दौरा किया। उनके साथ कई वरिष्ठ सैन्य अफसर भी मौजूद थे।

इस दौरे के दौरान उन्होंने स्पीयर कॉर्प्स के तहत आने वाले असम राइफल्स और बीएसएफ के कंपनी ऑपरेटिंग बेस का निरीक्षण किया। उन्होंने भारत-बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा हालात की समीक्षा की और जवानों से सीधे बातचीत भी की।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने जवानों की दृढ़ता, धैर्य और उच्च स्तर की ऑपरेशनल तैयारी की खुले तौर पर सराहना की। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवान बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और देश की सुरक्षा में उनकी भूमिका सबसे अहम होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने अपने दौरे के दौरान राज्य प्रशासन और स्थानीय एजेंसियों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि सेना और सिविल प्रशासन के बीच तालमेल से ही ऐसे बड़े प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो पाते हैं।

उन्होंने जवानों को भरोसा दिलाया कि सेना उनकी सुरक्षा, सुविधाओं और संसाधनों को प्राथमिकता दे रही है, ताकि वे पूरी क्षमता के साथ देश की सीमाओं की रक्षा कर सकें।

त्रिपुरा के बेलोनिया का दौरा

इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया में स्थित सीमा चौकी का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने भारत–बांग्लादेश सीमा पर मौजूदा सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की। आर्मी कमांडर ने फारवर्ड इलाकों में तैनात जवानों से बातचीत की और जमीनी हालात की जानकारी ली। उन्होंने भारतीय सेना, असम राइफल्स और बीएसएफ के जवानों की सराहना करते हुए कहा कि सभी बल पूरी तरह सतर्क हैं और उनकी ऑपरेशनल तैयारी उच्च स्तर की है।

असम में नया सैन्य स्टेशन

पूर्वी कमान के तहत असम में भी बड़े स्तर पर सैन्य ढांचा तैयार किया जा रहा है। नवंबर 2025 में लेफ्टिनेंट जनरल तिवारी ने धुबरी में नए लाचित बरफूकन मिलिट्री स्टेशन की आधारशिला रखी थी।

यह स्टेशन ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है और इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। धुबरी न केवल बांग्लादेश की सीमा के करीब है, बल्कि भूटान से भी यह काफी नजदीक है। यह स्टेशन लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और प्रशासनिक जरूरतों का बड़ा केंद्र बनेगा।

सेना के अनुसार, यह नया स्टेशन पूर्वोत्तर भारत में मिलिट्री ऑपरेशन को और ज्यादा मजबूत करेगा और जरूरत पड़ने पर तेजी से बलों की तैनाती भी की जा सकेगी।

सेना के इन सभी कदमों के पीछे एक बड़ा वजह सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी है, जिसे आमतौर पर “चिकन नेक” कहा जाता है। यह केवल 22 किलोमीटर चौड़ा इलाका है, जो भारत के मुख्य भूभाग को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।

अगर इस कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह की अस्थिरता पैदा होती है, तो पूरे पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि सेना अब इस पूरे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और मजबूत कर रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की यह रणनीति केवल प्रतिक्रिया भर नहीं है, बल्कि एक लंबी अवधि की तैयारी का हिस्सा है। बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल, सीमापार तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क की सक्रियता को देखते हुए भारत किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता।

नई मिलिट्री कैंटोनमेंट्स, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमावर्ती बलों के साथ तालमेल, ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब सीमा सुरक्षा को लेकर और ज्यादा सक्रिय और सतर्क रुख अपना रहा है।

Bangladesh Political Unrest: Mohammad Unus went on his last move to avoid elections! The power has not to be left so the anti-India environment

Bangladesh Political Unrest

Bangladesh Political Unrest: Bangladesh is once again in an atmosphere of uncertainty after the death of the extremist activist Sharif Osman Hadi in Bangladesh. Once in Bangladesh, violence, chaos and anti-india environment are visible. But this time neither is there Sheikh Hasina, nor Khalidada Jia. Mohammed Unus is the country’s workman. The difference is that there are elections at the beginning of the next year and the power to a chosen democratic government.

Bangladesh Political Unrest: Macha Bwal after the murder of Hadi

bangladesh At the moment in which violence is provoked, a murder occurred on December 12, is being considered. In which 32-year-old Shrif Usman Hadi’s bike rider in Dhaka was shot by Nakabush attackers. He was taken to Singapore for treatment, where he died on December 18. Haadi was involved in young people who performed against the then Prime Minister Sheikh Hasina during the movement in August 2024. Haadi was linked to a new political platform and was actively propagating for elections occurring in February. After the death of Hadi, protests in Dhaka and many other cities were accelerated.

As a spokesman of the Inclab platform platform, Hadi was known for his hardcore speeches and anti-India stance, making both his hardcore supporter and hardcore enemies.

Bangladesh Political Unrest: पुलिस का दावा, भारत भागे आरोपी

बांग्लादेश पुलिस ने दावा किया कि हादी पर हमला करने वाले दो आरोपी भारत की ओर भाग गए हैं। इसी दावे के माहौल और गरमा गया और हादी के समर्थकों और कुछ कट्टर संगठनों ने इसे आधार बनाकर भारत के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

देखते-ही-देखते प्रदर्शन भारत के राजनयिक ठिकानों तक पहुंच गए। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग के अलावा चटगांव, राजशाही, खुलना और सिलहट में मौजूद सहायक उच्चायोगों के बाहर भी प्रदर्शन हुए। हालात इतने बिगड़े कि एक दिन के लिए बांग्लादेशियों के लिए वीजा आवेदन केंद्र बंद करना पड़ा।

भारत ने तुरंत बांग्लादेश के राजदूत को तलब किया और अपने राजनयिक मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

Bangladesh Political Unrest: मीडिया को बनाया निशाना

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बेहद गंभीर बात सामने आई। बांग्लादेश के दो सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों पर हमला कियाा गया। ढाका में द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई।

विडंबना यह है कि यही दोनों अखबार पहले शेख हसीना सरकार की आलोचना करते रहे थे और छात्र आंदोलन को भी समर्थन दिया था। अब इन्हें “भारत समर्थक” और “पुरानी सत्ता के सहयोगी” बताकर निशाना बनाया गया। डेली स्टार ने इसे “स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए काला दिन” करार दिया।

अंतरिम सरकार की मुश्किलें

फिलहाल बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बनी इस सरकार का मुख्य काम चुनाव कराना और सुधार लागू करना है। लेकिन मौजूदा हालात में यह सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में कमजोर पड़ती दिख रही है।

सड़कों पर गुस्सा है, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता बढ़ती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार फरवरी में तय चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से करा पाएगी?

क्या वक्त पर होंगे चुनाव?

bangladesh चुनाव आयोग ने 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव कराने की घोषणा की है। लेकिन भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि क्या यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। भारत बार-बार कह चुका है कि वह बांग्लादेश में “फ्री, फेयर, इनक्लूसिव और क्रेडिबल” चुनाव चाहता है। यहां “इनक्लूसिव” शब्द खास तौर पर अहम है, क्योंकि इसका मतलब है कि शेख हसीना की अवामी लीग को भी चुनाव में हिस्सा लेने का मौका मिले।

हालांकि बांग्लादेश सरकार और उसके सलाहकार इस शब्द से बचते नजर आते हैं। उनका कहना है कि चुनाव का स्तर ऊंचा होना चाहिए, न कि किसी खास पार्टी की भागीदारी पर जोर दिया जाए।

चुनाव टालने की साजिश के आरोप

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि हिंसा और अराजकता चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती है। वहीं, शेख हसीना सरकार में मंत्री रह चुके कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि अंतरिम सरकार जानबूझकर हालात बिगड़ने दे रही है, ताकि चुनाव टाले जा सकें। उनके मुताबिक भारत-विरोधी माहौल बनाकर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की कोशिश भी की जा रही है।

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात

भारत के लिए यह सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का सवाल नहीं है। भारत को डर है कि अगर वहां हालात और बिगड़े, तो इसका असर सीमा पार भी पड़ सकता है। कट्टरपंथ, अवैध घुसपैठ और हिंसा का असर भारत के पूर्वी राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर पर पड़ सकता है।

इसके अलावा, अप्रैल-मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने हैं। भारत सरकार नहीं चाहती कि बांग्लादेश की अशांति का कोई “स्पिलओवर” भारतीय राजनीति या सुरक्षा व्यवस्था पर पड़े।

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी ने इस हिंसा को एक बड़ी रणनीति का हिस्सा बताया हैं। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश में हो रही घटनाओं का मूल मकसद भारत को उकसाना और उसे एक लंबे संघर्ष में खींचना है।”

उन्होंने संयम बरतने की अपील करते हुए तैयारी पर जोर दिया और भारत को जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “इंतजार करें और देखें, अपनी जासूसी, निगरानी, ​​खुफिया संसाधनों को तैनात रखें ताकि पहले से कदम उठाने के विकल्प तैयार किए जा सकें और किसी भी अप्रत्याशित घटना को रोका जा सके।
मेजर जनरल सुधाकर जी का कहना है कि भारत को हर कीमत पर लंबे संघर्ष से बचना चाहिए।

हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है हिंसा

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि ये घटनाएं बहुत चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा, “चिंता होनी चाहिए क्योंकि पड़ोस में जो कुछ भी होता है तो वह हमेशा चिंता का वजह होता है और खासकर पिछले एक साल में बांग्लादेश में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, वे काफी खतरनाक हैं।”

उन्होंने हिंसा के एक पैटर्न की ओर इशारा किया जो शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी जारी है। प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा, “जिस तरह की हिंसा हमने शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद भी देखी है। हसीना के कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश की गई।”

हादी की मौत के बाद हुई हिंदा पर उन्होंने कहा, “यह भारत के लिए चिंताजनक स्थिति है क्योंकि भारत बांग्लादेश के साथ एक लंबी सीमा साझा करता है। शरीफ ओसामा की मौत के मामले में, बांग्लादेश के लोगों के एक वर्ग का आरोप है कि जो लोग जिम्मेदार पदों पर हैं, उनका कहना है कि ओसामा को मारने वाला व्यक्ति असल में भारत भाग गया है।”

हिंसा भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं

त्रिपाठी ने कहा कि बीते दिन कुछ मीडिया हाउसों पर हमला हुआ, सिर्फ इसलिए कि उन्हें भारत समर्थक माना गया। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय उच्चायोग के आसपास हुए विरोध प्रदर्शन और इस तरह की घटनाएं बेहद चिंता पैदा करने वाली हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब बांग्लादेश में चुनाव नजदीक हैं। फरवरी में होने वाले चुनावों से पहले इस तरह की हिंसा देश के लिए ठीक संकेत नहीं है। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात पर बहुत सतर्क नजर रखने की जरूरत है।

त्रिपाठी ने कहा कि भले ही यह घटनाक्रम बांग्लादेश के भीतर का मामला हो, लेकिन इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत का बांग्लादेश में निवेश है और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा साझा होती है। ऐसे में वहां की अस्थिरता भारत के हितों को प्रभावित कर सकती है।

त्रिपाठी ने आशंका जताई कि ये हिंसक तत्व सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए भारत में भी परेशानी खड़ी करने की कोशिश कर सकते हैं।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: What was the ‘Visible War’ during Operation Sitter? Raj open from the statement of Defence Minister, what is "Maskirovka" Strategy?

Operation Sindoor Cognitive Warfare

Operation Sindoor Cognitive Warfare: Defence Minister Rajnath Singh said extremely importantly addressing the ‘Air Force Commanders’ conclave on Thursday. He said that people are scared at the time of an attack of the enemy, but when the Pakistani army tried to attack the bases of India, the country’s public remained absolutely quiet and engaged in their everyday work. Actually Defence Ministers were indirectly referring to the Information Warfare. While the Indian forces were spread over the border of Pakistan, the people of India were not in the face of the lyings and the Indian security forces were calming down. That he refused the fake news coming from Pakistan.

Operation Sindoor Cognitive Warfare: Minister of Defence

While the Defence Minister does not speak for the first time. They are referring to this ‘Invisible’ war through the signs even before. Narajnath Singh also said in the Joint Commanders Summit in Kolkata in September 2025 that it was said to be cautious and ready to deal with unconventional threats such as the Infirmation Warfare, the Idiological Warfare (which is linked to the Cognitive Warfare), the environmental and biological war. He said that the form of the war is changing, and these are as fatal as "invisible challenges".

Ran Samwad 2025 Doctrine: The battlefield will fight such corrosion from the human minds of the Younger of Special Forces! New work assigned after the operation shifter

In a event held in Dehradun in June this year, he had described the information war as a major challenge of the 21st century. He had given an example of spreading fake videos, arbitrary news, and propaganda from social media posts during the operation shift and appealed to the people to become social soldiers and contribute to this war by spreading awareness. He told data and information the greatest strength and challenge.

In the concluding session of the Chanakya Defence Dialogue 2025, the Defence Minister Rajnath Singh said in very clean words that the information war has become a very big challenge in today’s world. He said that India lives in a neighborhood where dangers are many, including terrorism, help extremism from border cross, try to change the situation, pressure in the sea and now information war. We have to be cautious at all times to deal with these complex challenges and keep our goal clear at all. Rajnath Singh told the information war a new generation of dangerous weapons, including cyber attacks. He stressed that improving the defence sector in today’s uncertain round is no choice, but the essential strategy, so that our forces can firmly combat these invisible threats, especially information wars. Operation Sindoor Cognitive Warfare

Operation Sindoor Cognitive Warfare: What is Cognitive Warfare?

रक्षा मंत्री की बात बिल्कुल सही है। आज की दुनिया में युद्ध का मतलब सिर्फ टैंक, मिसाइल और सैनिकों की लड़ाई नहीं रह गया है। अब एक ऐसा युद्ध भी चल रहा है, जो न तो दिखाई देता है और न ही इसकी आवाज सुनाई देती है। इस युद्ध को कॉग्निटिव वॉरफेयर, यानी दिमाग और सोच का युद्ध कहा जाता है। यह लड़ाई सीधे इंसान के मन, सोच, भावनाओं और फैसलों को निशाना बनाती है। इसका मकसद किसी देश को हथियारों से हराना नहीं, बल्कि उसकी एकता, आत्मविश्वास और फैसला लेने की क्षमता को कमजोर करना होता है।

फ्रांस की नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और नाटो के शीर्ष सैन्य कमांडर एडमिरल पियरे वांदिये के अनुसार, कॉग्निटिव वॉरफेयर का सबसे बड़ा निशाना इंसानी दिमाग है। इसमें समाज को तोड़ना, लोगों के मन में शक पैदा करना और सरकार व संस्थानों पर भरोसा कम करना शामिल है। यह युद्ध शांति, संकट और खुले युद्ध की सीमाओं को मिटा देता है। कई बार लोग यह समझ भी नहीं पाते कि वे ऐसे किसी हमले का शिकार हो चुके हैं।

पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे है कॉग्निटिव वॉरफेयर

कॉग्निटिव वॉरफेयर दरअसल पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे की चीज है। पहले सूचना युद्ध में झूठी खबरें या प्रोपेगंडा तक सीमित रहती थी, लेकिन अब सीधे यह कोशिश की जाती है कि लोग क्या सोचें, कैसे सोचें और कब फैसला लें। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकार जॉन बॉयड ने कहा था कि किसी भी दुश्मन को हराने के लिए उसके फैसले लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर देना काफी होता है। आज इसी सोच को हथियार बना लिया गया है। दुश्मन यह कोशिश करता है कि सामने वाला देश सही समय पर सही फैसला न ले पाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी

आज इंसान का दिमाग ही नया युद्धक्षेत्र बन चुका है। दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी। यानी दुश्मन न केवल लोगों के दिमाग को निशाना बनाता है, बल्कि उन्हीं लोगों की भावनाओं और सोच का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है। अगर किसी देश की सोच को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो जमीन, हवा या समुद्र में लड़ाई की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही वजह है कि यह युद्ध अक्सर “ग्रे जोन” में लड़ा जाता है, यानी उस स्तर पर जहां खुले युद्ध का ऐलान तो नहीं होता, लेकिन नुकसान लगातार होता रहता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रूस की “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी

रूस और चीन कॉग्निटिव वॉरफेयर में सबसे आगे माने जाते हैं। दोनों देश शांति के समय, संकट के समय और युद्ध के समय एक ही रणनीति पर काम करते हैं, दुश्मन की सोच को नियंत्रित करना। वहीं पाकिस्तान भी तेजी से कॉग्निटिव वॉरफेयर की रणनीति पर काम कर रहा है।

रूस की रणनीति उसकी पुरानी सैन्य परंपराओं से निकली है। रूस लंबे समय से धोखे और भ्रम की नीति अपनाता रहा है, जिसे वह “मास्किरोव्का” कहता है। इसका मतलब होता है दुश्मन को गुमराह करना, ताकि वह गलत फैसले ले। 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के दौरान रूस ने बिना वर्दी वाले सैनिक भेजे, और वह इससे लगातार इनकार करता रहा, साइबर हमले किए और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि यूक्रेन और पश्चिमी देश समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए।

“रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” स्ट्रेटेजी भी यूज करता है रूस

वहीं, रूस एक और तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिसे “रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” कहा जाता है। इसमें दुश्मन को सीधे आदेश नहीं दिए जाते, बल्कि उसे ऐसी जानकारी दी जाती है कि वह खुद वही फैसला करे जो रूस चाहता है। इसमें दुश्मन की सोच, आदतें, कमजोरियां और मनोविज्ञान तक का अध्ययन किया जाता है। रूस इस तरह से लंबे समय तक माहौल बनाता है, ताकि बिना गोली चलाए ही रणनीतिक फायदा मिल जाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

आज इस रणनीति को साइबर हमलों, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सोशल मीडिया प्रचार के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है। इसका असर सेना के फैसलों से लेकर आम लोगों की राय तक पर पड़ता है। गलत जानकारी, फर्जी वीडियो और भ्रम फैलाकर पूरे सिस्टम को धीमा और कमजोर किया जाता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: चीन की “थ्री वारफेयर” स्ट्रेटेजी

वहीं, चीन की रणनीति थोड़ी अलग है, लेकिन लक्ष्य वही है। चीन अपनी प्राचीन रणनीतिक सोच से प्रेरित है, जहां कहा गया है कि सबसे बड़ी जीत वह होती है, जिसमें दुश्मन बिना लड़े हार मान ले। चीन की सेना “थ्री वारफेयर” की नीति पर काम करती है। इसमें मनोवैज्ञानिक युद्ध, जनमत को प्रभावित करना और कानून की अपनी तरह से व्याख्या करना शामिल है।

चीन सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहता। वह सरकार, मीडिया, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति सभी को इस रणनीति में शामिल करता है। चीन के लिए यह पूरे समाज की कोशिश होती है। घरेलू स्तर पर वह लोगों की सोच को नियंत्रित करता है और बाहर की दुनिया में अपनी कहानी फैलाता है। अंतरराष्ट्रीय कानून को भी अपने पक्ष में दिखाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और ताइवान से जुड़े मामलों में चीन लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वही सही है, जबकि बाकी देशों को आक्रामक या अस्थिर बताया जाता है। यह सब कॉग्निटिव वॉरफेयर का हिस्सा है, जिसमें दुनिया की सोच को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की जाती है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

चीन अब नई तकनीक के जरिए इस युद्ध को और तेज कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बड़े डेटा, ड्रोन, ऑटोमेशन और यहां तक कि दिमाग से जुड़ी रिसर्च को भी वह युद्ध की तैयारी में शामिल कर रहा है। चीन मानता है कि भविष्य के युद्ध का स्वरूप दिमाग पर नियंत्रण का होगा। इसलिए वह इंसानी भावनाओं, सोच और व्यवहार को समझने और प्रभावित करने पर भारी निवेश कर रहा है।

पाकिस्तान की फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) स्ट्रेटेजी

पाकिस्तान भी भारत के खिलाफ कॉग्निटिव वॉरफेयर में काफी सक्रिय है। यह तरीका उसने अपनी पारंपरिक सैन्य कमजोरियों को छिपाने के लिए अपनाया है और इसे हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बना लिया है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी इनफॉरमेशन वॉरफेयर और कॉग्निटिव वॉरफेयर को फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) या हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बताते हैं।

पाकिस्तान की सेना की मीडिया इकाई ISPR इस पूरी रणनीति की रीढ़ है। ISPR और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, भ्रामक वीडियो, डीपफेक और बॉट नेटवर्क के जरिए भारत के खिलाफ लगातार नैरेटिव चलाते हैं। कश्मीर मुद्दे पर गलत जानकारियां फैलाना और भारतीय सेना की छवि खराब करना इसका प्रमुख उदाहरण है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर फर्जी वीडियो और सोशल मीडिया प्रोपगैंडा का इस्तेमाल किया। कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान भारत से आगे है, क्योंकि उसका सिस्टम ज्यादा केंद्रीकृत और आक्रामक है। चीन से मिलने वाली तकनीकी और साइबर मदद ने उसकी इस क्षमता को और मजबूत किया है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी

कई सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। इसे ग्रे जोन कहा जाता है। इसी ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। इसमें दुश्मन खुलकर युद्ध नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे समाज के भीतर अस्थिरता पैदा करता है। लोगों को यह एहसास भी नहीं होता कि वे किसी हमले का शिकार हो रहे हैं।

सोशल मीडिया बना सबसे आसान हथियार

नई तकनीक ने इस युद्ध को और खतरनाक बना दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक वीडियो, सोशल मीडिया बॉट्स और डेटा एनालिटिक्स की मदद से किसी भी देश के लोगों की भावनाओं को समझा और प्रभावित किया जा सकता है। अब फर्जी वीडियो, नकली भाषण और झूठी घटनाएं इतनी असली लगती हैं कि सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया लोगों की भावनाओं को भड़काने का सबसे आसान हथियार बन गया है। गुस्सा, डर और नफरत सबसे जल्दी फैलती है, और दुश्मन इसी का फायदा उठाता है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

सेना पर भी पड़ता है असर

सेना के स्तर पर भी कॉग्निटिव वॉरफेयर का असर गंभीर होता है। अगर कमांडर तक गलत जानकारी पहुंचे, या फैसला लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर दिया जाए, तो पूरी सैन्य कार्रवाई प्रभावित हो सकती है। आधुनिक सेनाएं डेटा, नेटवर्क और तकनीक पर निर्भर हैं, और यही निर्भरता उन्हें इस तरह के हमलों के प्रति कमजोर भी बनाती है। अगर किसी देश की सेना की सोच और आत्मविश्वास को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो असली युद्ध की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही इस युद्ध की सबसे खतरनाक बात है।

भारत के लोकतांत्रिक होने का दुश्मन को फायदा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए कॉग्निटिव वॉरफेयर एक बड़ी चुनौती है। इस तरह के हमलों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वहां सूचना की आजादी होती है। लोग सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय रखते हैं, जो बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं और सच अक्सर पीछे छूट जाता है। इसका असर समाज की एकता और स्थिरता पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में फेक न्यूज़, सोशल मीडिया के जरिए फैलाए गए झूठ और संस्थानों के खिलाफ दुष्प्रचार के कई उदाहरण सामने आए हैं। यह सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत भी इस तरह के मानसिक युद्ध के दायरे में है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम

हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह देखा गया कि कैसे तेज और सटीक सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना और नैरेटिव पर भी नियंत्रण रखा गया। रक्षा मंत्री ने जिस तरह जनता के शांत व्यवहार और सेना पर भरोसे की बात कही, वह इस बात का संकेत था कि भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम है। यही मजबूती किसी भी देश की सबसे बड़ी ढाल होती है।

कॉग्निटिव वॉरफेयर से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय काफी नहीं हैं। इसके लिए समाज को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर दिखाई देने वाली खबर सच नहीं होती। मीडिया लिटरेसी, संस्थानों पर भरोसा और सही समय पर सही जानकारी देना भी बेहद जरूरी है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Indian Army IKIGAI: Japanese Philosophy Now in Army Strategy! Army Chief General Byeendra Dwivedi Gives New Ikegai Mantra

Indian Army IKIGAI Framework
Army Chief

Indian Army IKIGAI: Nowadays the word "Ekigai" (IKIGAI) is quite discussed. The term is being heard from the life philosophy of common people to military platforms. This concept from Japan has now become a matter of discussion in India, especially when Indian Talsena chief General Upendra Dwivedi introduced a new framework connected to Ikegai on the international platform. It is important to understand what Ikegai is and what it is related to the army.

Indian Army IKIGAI: IKigai Means

Ikigai is a Japanese word. It is composed of two words. "unit" means life and "gai" means cause or value. That is the direct meaning of Ikegai is the cause of living life. Understand it in easy language is the reason for which a person rises every morning and begins his day.

Vijay Diwas 2025: The Indian Army appeared in Vijay Day ‘At Home’ from the strength of the indigenous, AI to the drone technology showcase

Ikigai in Japan is seen in a very simple way. It is not connected with a large target or elevated position. It is associated with everyday small joys, such as spending time with a family, working of choice, doing something for gardening, music or society. People in the Okinawa terrain of Japan live long and balanced life and behind this Ikegai is considered an important reason. Indian Army IKIGAI

Indian Army IKIGAI: The meaning of Ikegai is for Western countries

While Ikegai was explained in a slightly different way in Western countries. There it was introduced as a mail of four questions. First, what you like. Second, which work you are good. Third, what things the world needs. And the fourth, from which work you can earn. The balance between these four was called Ikegai. While the basic meaning in Japan is simpler and private. Indian Army IKIGAI

Indian Army IKIGAI: The Army Chief Introduces New Ikegai Framework

Ikegai was not limited to private life only. During the Land Forces Summit in Japan hosted in December 2025, the Indian Talsena chief General Byendra Dwivedi introduced a new Ikegai framework. This framework was proposed to strengthen cooperation between the thhal forces in the Indo-Pacific region.

The Summit included the Army Chief and Senior Officer of the countries such as Japan, America, Australia and the Philippines. The meeting discussed the security, strategic cooperation and shared challenges of the Indo-Pacific region. On the same platform, General Dwivedi reported that as Ikegai gives the person the purpose of life, the new Ikegai framework shows the direction of working with the shared objective to the forces. Indian Army IKIGAI

Ikegai is an acronym in terms of the army, that is, a different means of every letter. It includes aspects such as mutual synergy, information sharing, joint training, humanitarian assistance, technical cooperation, security partnership and logistics cooperation among the forces. The aim of this is to maintain regional peace and stability, coupled with the threshold forces of different countries. Indian Army IKIGAI

Indian Army IKIGAI Framework

Components of IKIGAI Framework

I – Interoperability and Information Sharing: Compatiability and Intelligence Sharing between the forces.
K – Knowledge and Professional Military Education Knowledge Sharing and Professional Training/Aducation.
I – International Humanitarian Assistance and Disaster Relief (HADR): Internationally humanitarian help and Disaster Relief (e.g. earthquake, flood assistance).
G – Generative Technological Partnerships Partnership in Emerging Technology (e.g. AI, Drone).
A – Assurance for Security Trust and Guarantee in Security Partnerships.
I – Log Integratedistics and Sustainment: Integrated logistics and support systems (strengthening the applicable chain).

General Dwivedi put this framework on three basic bases. First, identify shared challenges. Second, agreed upon the same principles. And third, taking together concrete steps. This idea focuses on strengthening cooperation between increasing security challenges in the Indo-Pacific region.

Includes member country of quad group

This Summit was also considered to be important as it has partnered with members of the quad group. Quad includes India, America, Japan and Australia. The cooperation is already on the ground and regional security among these countries. The discussion in the Land Forces Summit gave new direction to cooperation even at the level of the Army.

The message on behalf of the Indian Army was clean that India supports a free, open and inclusive Indo-Pacific region. It is necessary to work closely with countries with similar thinking. The Ikegai framework gives the same cooperation a structured look. Indian Army IKIGAI

The native of Ikigai is the expression "Intent"

In this way, the original expression of Ikegai is "indirect". It gives happiness and balance in personal life, while in the military context it shows the way of cooperation, shared responsibility and stability. This idea has now become part of the International Security Doylog, which has emerged from the culture of Japan.

Ikigai today has become a broad idea not only a life philosophy, but also to be adopted in different regions. Whether there is a everyday life of the common human being or strategic cooperation between the forces of the countries, Ikegai means the purpose and balance everywhere. Indian Army IKIGAI

Defense Emergency Procurement: Why can you hang in the pan? Understand what is Emergency Procurement Complete Game

Defence Emergency Procurement Extension: DAC Meeting

Defence Emergency Procurement: The timelines of the emergency procurement process of the Government of India are to be a month. This timeframe was ended on November 19 last month. Now the Ministry of Defence is seriously considering this time limit on a month and forth. This is because the interactions associated with multiple weapon systems and military equipment are in the final stage, but they could not be accomplished when they expire.

As per the senior sources of the Ministry of Defence, the deals that have been almost complete can be hanging in the face if this period is not extended. These deals can be delivered to the contract level by extending a month in such a way.

Defence Emergency Procurement: What is Emergency Procurement and Why Necessary

Emergency procurement is a special process, under which Indian forces are allowed to purchase weapons, ammunitions and essential military equipment at a very short time. Delivery is ensured within six months under the procedure where it takes two to three years.

In this process, neither long tenders are removed nor trialed. Generally every transaction ranges between Rs 300 to Rs 400 crore, so as to increase military capacity immediately at the time of need.

Defence Emergency Procurement: Increased need after operation transfer

Emergency Procurement has been used several times over the past few years. India had purchased a large number of weapons and equipment under this process after a collision with the Chinese army in Galwan, East Ladakh. In addition, this procedure was adopted even after operation shifter.

In May 2025, the Government had approved an emergency purchase of about Rs 40 thousand crore under this special arrangement. The motive was to meet the immediate operational needs of the Army, so that the preparedness in any circumstances did not decrease. During that, the Army had urgent need for drones, loweringmissions, air defense systems, and ammunition, which was completed through an emergency procurement. Defence Emergency Procurement

Let's say that the validity period of the Emergency Procurement Power is usually given 6 months. The power granted in May 2025 after operation shifter was Valid until November 19, 2025. Under this, it is mandatory to sign a contract within 40 days. There should be full delivery within 1 year. If there was no delivery in 1 year, a contract foreclosure can be cancelled under the new policy update of 2025. In November 2025, Defence Secretary Rajesh Kumar Singh had strict warning that this rule will now be strictly enforced, whether the supplier is desi or foreigner. Usually the purpose of emergency procurement is to ensure delivery in 3-6 months, so that immediate operational gap is filled. Defence Emergency Procurement

Defence Emergency Procurement: Most Thrust On Procurement of Drone System

The most emphasis under emergency procurement was given on systems connected to drones and drones. It includes Surveillance Drone. The drones like Heron Mark-2 have already been purchased and have also been negotiated on increasing the number of them. Simultaneously, those who attack the enemy bases are also purchased a well-sided drone. A large number of purchases of drones such as Nagastra-1R were made under the same procedure.

Defence Emergency Procurement: Focus on Long Range Loweringmission

In addition to the drone, the long range lowering Muniitions were also placed in priority to increase the army’s marching capacity. These include systems like Harop, Harpi, and Skystriker, which target the target on the right spot by paving the air for a long time. Also, the procurement of the ammunition required for Artillery, Air Defense Systems and Missile Units was made so that the supply is not lacking on any front. Defence Emergency Procurement

Emergency Defence Procurement Rules: New Strictly on Emergency Weapons Deals, No One Year Delivery Contract

Some of the special missile systems were also included during the Emergency Procurement. The rampage missile has already been purchased in this process and is now working on ordering and increasing indigenous production. The purchase of low-level radar was also crucial in view of the threat of the drone, which is used to identify the drone flying at low altitudes. Orders are given to India Electronics Limited in this area.

Bioalin anti-tank guided missiles also be part of emergency purchases to tackle tanks and armored vehicles. They were bought immediately from the U.S., as well as their co-production. In addition, the XCaliber 155 MM Precision Guided Artillery Shell used in operation shifter was also considered, as its accuracy has been proved in the field. Defence Emergency Procurement

The Army has also taken care of the Integrated Drone Detection and Interdistion System, considering the rising danger from the drone. This system helps to identify and deactivate drones, thereby strengthening the safety of sensitive bases.

Defence Emergency Procurement: Priority to Indian Companies

इन सभी खरीद में सरकार का जोर अधिक से अधिक भारतीय कंपनियों से सामान लेने पर रहा है। सोलर इंडस्ट्रीज, भारत डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों को बड़े ऑर्डर दिए गए हैं, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, कुछ जरूरी सिस्टम ऐसे भी हैं, जिन्हें इमरजेंसी हालात में विदेश से मंगाना पड़ा।

Defence Procurement Manual-2025: अब चुटकियों में होगी रक्षा खरीद, नए डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल में कई पुरानी बाधाओं को किया दूर

नवंबर 2025 तक इन सौदों में से कई पर बातचीत चलती रही, लेकिन इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समयसीमा खत्म हो जाने के कारण सभी समझौते पूरे नहीं हो सके। (Defence Emergency Procurement)

फास्ट ट्रैक परचेज सिस्टम भी विकल्प

रक्षा मंत्रालय के सामने एक और विकल्प फास्ट ट्रैक परचेज का भी है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट से मिलती-जुलती है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। हालांकि, अभी इस विकल्प पर भी चर्चा चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

दिसंबर में हो सकती है डीएसी की अहम बैठक

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा बढ़ाने पर फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में लिया जा सकता है। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होती है। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन शामिल होते हैं। (Defence Emergency Procurement)

Loitering munitions: भारत का पहला स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन नागास्त्र-1 भारतीय सेना में शामिल होने के लिए तैयार, अब लंबी रेंज वाले ड्रोन की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, डीएससी की इस साल की आखिरी बैठक 26 दिसंबर को होने की संभावना है। इसी बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के को बढ़ानेया फास्ट ट्रैक प्रक्रिया को अपनाने पर फैसला लिया जा सकता है।

स्वदेशी हथियारों पर सरकार का फोकस

हाल के महीनों में डीएसी ने जिन हथियारों को मंजूरी दी है, उनमें से अधिकतर पूरी तरह स्वदेशी या बड़े स्तर पर स्वदेशी सामान का इस्तेमाल हुआ है। यह सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल का हिस्सा है। हालांकि, कुछ बड़े सौदे अब भी विदेशी कंपनियों से जुड़े हैं, जिनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी प्रिडेटर ड्रोन की खरीद प्रमुख है। (Defence Emergency Procurement)

चल रही बातचीत को पूरा करने की जरूरत

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा को थोड़ा और बढ़ाया जाता है, तो पहले से चल रही बातचीत को औपचारिक समझौतों में बदला जा सकता है। इससे सेना की तत्काल जरूरतें भी पूरी होंगी और खरीद प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कतें भी नहीं आएंगी।

उरी आतंकी हमले के बाद बढ़ा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल

भारत में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट यानी आपातकालीन रक्षा खरीद की व्यवस्था का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में धीरे-धीरे बढ़ी है। साल 2014 से 2016 के बीच यह व्यवस्था बहुत सीमित थी और अधिकतर मामलों में खरीद सीधे रक्षा मंत्रालय के स्तर पर देखी जाती थी। उस समय सशस्त्र बलों को बड़े पैमाने पर विशेष खरीद अधिकार नहीं मिले थे।

लेकिन असल बदलाव साल 2016 के बाद आया। उरी आतंकी हमले के बाद सरकार ने सेना को विशेष वित्तीय शक्तियां दीं, ताकि जरूरत पड़ने पर हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके बाद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक अहम प्रक्रिया बन गई।

साल 2014 से अक्टूबर 2016 के बीच भारतीय सेना ने इस व्यवस्था के तहत कुल 17 छोटे कॉन्ट्रैक्ट किए, जिनकी कुल कीमत करीब 400 करोड़ रुपये रही। उस समय खरीद का दायरा सीमित था और जरूरतें भी तुलनात्मक रूप से कम थीं। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद हालात तेजी से बदले। उरी के बाद, बालाकोट एयर स्ट्राइक, फिर लद्दाख में चीन के साथ सैन्य तनाव और बाद में ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के चलते सेना को तत्काल हथियारों और उपकरणों की जरूरत पड़ी। इसी दौर में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की कई ट्रांच यानी चरण शुरू किए गए।

अब तक ईपी के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये

पहली से तीसरी ट्रांच, जिन्हें आमतौर पर ईपी-1 से ईपी-3 कहा जाता है, मुख्य तौर पर से सेना से जुड़ी थीं। इन चरणों में लगभग 68 कॉन्ट्रैक्ट किए गए और कुल खर्च 6,500 से 7,000 करोड़ रुपये के आसपास रहा। इन खरीद में हथियार, गोला-बारूद, निगरानी उपकरण और अन्य जरूरी सैन्य सिस्टम शामिल थे। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद 2022-23 के आसपास ईपी-4 लागू हुई, उसमें इमरजेंसी खरीद का दायरा और बढ़ा। इस चरण में 70 से ज्यादा योजनाओं को मंजूरी दी गई और कुल राशि करीब 11,000 करोड़ रुपये रही। इस ट्रांच की खास बात यह थी कि इसमें ज्यादातर सामान स्वदेशी कंपनियों से खरीदा गया, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके।

इसके बाद एक और छोटी ट्रांच, जिसे ईपी-5 कहा गया, सामने आई। इसकी कुल राशि बहुत ज्यादा नहीं थी और अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक यह करीब 2,000 करोड़ रुपये के आसपास मानी जाती है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर काउंटर-टेरर ऑपरेशंस और तत्काल जरूरतों के लिए किया गया।

सबसे बड़ी और अहम ट्रांच साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई। इसे आमतौर पर ईपी-6 कहा जा रहा है। इस चरण में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी। यह अब तक की सबसे बड़ी इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ट्रांच मानी जा रही है। इसमें ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल हैं।

अगर 2014 से दिसंबर 2025 तक की सभी उपलब्ध रिपोर्ट्स को जोड़ा जाए, तो अनुमानित तौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। अकेले सेना के लिए यह आंकड़ा अलग-अलग रिपोर्ट्स में 18,000 से 29,000 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है। (Defence Emergency Procurement)

Ladakh Fourth Axis Road: Preparation of BRO to connect Ladakh to the 4th road route, now every season must arrive in Leh Easy

Ladakh fourth Axis Road All Weather Ladakh Connectivity

Ladakh Fourth Axis Road: A big and important news has been revealed about the connectivity of Ladakh. Border Road Organization i.e. Border Roads Organisation (BRO) is preparing the fourth strategic Road Axis to connect Ladakh to the rest of the country. This new way will move from Tulling La Pass to Himachal Pradesh, for which the Detold Project Report i.e. DPR is being prepared. After its completion, it will be possible to reach twelve months of the year by Ladakh and especially Leh.

Ladakh Fourth Axis Road: Three Ways To Reach Ladakh Yet

BRO Director General Lieutenant General Raghu Srinivasan told defence news, Ladakh is a strategically significant area for India. He said that there was only one main way to reach Ladakh earlier, which connects Leh through Jogila Pass from Srinagar. This route was closed for a long time due to heavy snowfall in the winter, which caused the contact of Ladakh from the country. 4 Axis Road

Galwan War Memorial: Inauguration of 125 Project from Galwan War Memorial, Shyok Tunnel, without the name of China to the Defence Minister

Then the second route was prepared from Manali to Leh, which reaches the way of Upshi. In this way, the high hills like Talla La, Baralacha La, Nakhi La and Lachung La come to the centre. Although this route is also covered with snow in winter and the movement stops. The problem on the Manali was somewhat lowered after the Atal Tunnel was formed, but the high passes are still being challenged. 4 Axis Road

Ladakh 4 Axis Road: Neemo-Path-Darcha Road Continues Work

तीसरे विकल्प के तौर पर नीमू-पदम-दारचा रोड पर काम किया जा रहा है। यह सड़क करीब 298 किलोमीटर लंबी है और लद्दाख के लिए सबसे छोटा मार्ग माना जा रहा है। इस रोड पर शिंकु ला टनल का निर्माण चल रहा है, जिसका पहला ब्लास्ट पिछले साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। बीआरओ के मुताबिक, शिंकु ला टनल बन जाने के बाद यह मार्ग ऑल-वेदर हो जाएगा और साल भर लेह तक पहुंचा जा सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला पास से दक्षिण हिमाचल तक

बीआरओ डीजी लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन के मुताबिक, अब लद्दाख को चौथे सड़क मार्ग से जोड़ने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि यह नया मार्ग तकलिंग ला पास से होकर लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी हिस्सों से जोड़ेगा। बीआरओ के मुताबिक इस रूट के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी वजह से एक या दो मार्ग बंद हो जाएं, तब भी लद्दाख की सप्लाई लाइन और आवाजाही प्रभावित न हो। (Ladakh fourth Axis Road)

शिमला की तरफ से नया एक्सिस

लद्दाख को मिलने वाला चौथा रणनीतिक सड़क मार्ग शिमला की तरफ से तैयार किया जा रहा है, जिसके जरिए दक्षिणी हिमाचर प्रदेश की तरफ से लद्दाख को जोड़ने की तैयारी की जा रही है। यह नया रास्ता शिमला डिवीजन के मौजूदा सड़क नेटवर्क से निकलकर आगे बढ़ेगा। शिमला से ठियोग और रामपुर बुशहर होते हुए सड़क पहले ही किन्नौर जिले के रिकांग पिओ तक पहुंचती है। यह हिस्सा ऑल-वेदर रोड है और साल भर खुला रहता है। इसी मौजूदा नेटवर्क को आगे बढ़ाकर लद्दाख की ओर नया एक्सिस तैयार किया जा रहा है। (Ladakh fourth Axis Road)

रिकांग पिओ के बाद यह रास्ता अपर किन्नौर की तरफ बढ़ेगा और फिर स्पीति घाटी में प्रवेश करेगा। यहां से सड़क कियाटो क्षेत्र तक पहुंचेगी, जिसे स्पीति और लद्दाख के बीच का अहम जंक्शन माना जाता है। इसके बाद यह रास्ता तकलिंग ला पास की ओर जाएगा।

17,700 फीट पर है तकलिंग ला पास

तकलिंग ला पास लगभग 17,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह इलाका पहले पुराने ट्रेड रूट के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। अब इसे आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। इस रूट के जरिए लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के अंदरूनी इलाकों से सीधी और वैकल्पिक कनेक्टिविटी मिलेगी। यह मार्ग मिलिट्री मूवमेंट के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी फायदेमंद होगा। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला पास पर बनेगी टनल

बीआरओ ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत जो मुख्य सड़क बनाई जा रही है, उसका नाम कियाटो-करजोक रोड है। यह सड़क स्पीति घाटी के कियाटो (साउथ लाहौल) इलाके से शुरू होकर तकलिंग ला पास क्रास करेगी और लद्दाख के करजोक क्षेत्र तक पहुंचेगी। तकलिंग ला पार करने के बाद यह सड़क लद्दाख के करजोक (नॉर्थ लद्दाख) इलाके में प्रवेश करेगी, जो त्सो मोरीरी झील के पास स्थित है। इसके लिए तकलिंग ला पास पर एक टनल बनाने की भी योजना है। इस सड़क की कुल लंबाई करीब 125 किलोमीटर होगी। यही सड़क आगे चलकर सादन और मोरे प्लेंस इलाके से जुड़ जाएगी। (Ladakh fourth Axis Road)

तकलिंग ला से सादन तक का हिस्सा इस पूरे प्रोजेक्ट का अहम भाग है। तकलिंग ला पास पार करने के बाद सड़क मोरे प्लेन्स के रास्ते सादन तक पहुंचेगी। यह दूरी करीब 50 से 60 किलोमीटर की होगी। यह मार्ग भविष्य में मनाली–लेह हाईवे का एक वैकल्पिक रास्ता बनेगा। अभी इस हिस्से का सर्वे पूरा हो चुका है और डीपीआर अंतिम चरण में है। निर्माण शुरू होने के बाद यह सड़क लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से और तेजी से जोड़ सकेगी। (Ladakh fourth Axis Road)

वहीं, तकलिंग ला से सादन पहुंचने के बाद, हिमाचल प्रदेश की ओर एक और सड़क की योजना पर काम चल रहा है। यह रास्ता दारचा से शुरू होकर शिंकु ला पास होते हुए पदम और फिर निमू तक जाएगा। इस पूरे मार्ग को दारचा–शिंकु ला–पदम–निमू रोड कहा जाता है। इसकी कुल लंबाई करीब 220 किलोमीटर से ज्यादा होगी। इस परियोजना के तहत शिंकु ला पर करीब 4.1 किलोमीटर लंबी टनल बनाई जाएगी, जिससे यह रास्ता पूरे साल खुला रह सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)

इस सड़क और टनल की डीपीआर नेशनल हाइवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन तैयार कर रहा है। सर्वे का काम पूरा हो चुका है और डीपीआर को अंतिम रूप दिया जा रहा है। योजना के मुताबिक, टेंडर प्रक्रिया 2026 में और निर्माण कार्य 2027 में शुरू होने की संभावना है। इसके पूरा होने पर यह लद्दाख के लिए एक और वैकल्पिक रास्ता बन जाएगा।

टनल पूरा होने में करीब चार साल

इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर सीमा सड़क संगठन के महानिदेशक रघु श्रीनिवासन ने बताया कि तकलिंग ला पास पर बनने वाली टनल को पूरा होने में करीब चार साल लगेंगे, जबकि सड़क का निर्माण लगभग दो-तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। बीआरओ डीजी के अनुसार, सड़क पहले तैयार कर ली जाएगी ताकि सीमित समय में भी लद्दाख तक वैकल्पिक आवाजाही शुरू की जा सके, जबकि टनल बनने के बाद यह मार्ग पूरी तरह ऑल-वेदर बन जाएगा। (Ladakh fourth Axis Road)

इन सभी प्रोजेक्ट्स का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लद्दाख तक पहुंच अब केवल एक-दो रास्तों पर निर्भर नहीं रहेगी। सेना को सीमाई इलाकों तक तेजी से पहुंचने में मदद मिलेगी और जरूरी सामान की सप्लाई भी आसान होगी। इसके अलावा, पर्यटन और स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, इन सड़कों को बनाना आसान नहीं है। ऊंचाई, भारी बर्फबारी और कठिन मौसम बड़ी चुनौती हैं। इसके बावजूद बीआरओ इन परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है और टिकाऊ निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।

बीआरओ अधिकारियों के मुताबिक, पहले जहां लद्दाख तक पहुंचने के लिए सिर्फ एक मुख्य रास्ता था, अब चार प्रमुख एक्सिस पर काम किया जा रहा है। ये सभी रास्ते मिलकर लद्दाख की ऑल-वेदर कनेक्टिविटी को मजबूत करेंगे। इससे न सिर्फ सेना को फायदा होगा, बल्कि स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी आसान होगी।

बीआरओ का कहना है कि इन सभी प्रोजेक्ट्स में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, अत्यधिक ठंड और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए काम किया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और अनुभव के आधार पर इन सड़कों को तैयार किया जा रहा है ताकि वे लंबे समय तक टिकाऊ रहें। (Ladakh fourth Axis Road)

Varuna HA: The Indian Army showcased the country’s first two people will be made of high-altitude tactical aerial vehicle, helicopters option

SDE Varuna HA-India’s High-Altitude Two-Man VTOL
SDE Varuna HA-India’s High-Altitude Two-Man VTOL

Varuna HA: The movement in altitude and inaccessible areas for the Indian Army has always been a huge challenge. In view of this challenge, Indian Army is focusing on the indigenously developed Varuna HVTOL (Hybrid Vertical Take-off and Landing) platform. This platform has the ability to fly and descend from a very low space, allowing it to reach areas where the general chopper cannot fly.

On the occasion of the 54th Vijay Day, the Indian Army had organized the Vijay Day ‘At Home’ event at the Army House in New Delhi. The event is carried out in the memory of the historic victory of India in the war of 1971. On this spot, the Indian Army showcased indigenous techniques, Innovation. The Varuna HVTOL was prominently showcased.

Vijay Diwas 2025: The Indian Army appeared in Vijay Day ‘At Home’ from the strength of the indigenous, AI to the drone technology showcase

Varuna HVTOL has been developed by Pune-based Sea Defence Engineering. The platform is designed under Government Innovation Initiatives like iDEX and ADITI. Earlier this navy version was included in the Indian Navy to carry goods from ship to ship. Now the optimized version for high-altitude i.e. height is being developed according to the needs of the Indian Army. It is a high-altitude tactical aerial vehicle carrying the first two people in the country.

This platform comes with VTOL (Vertical Take-off and Landing) capability and has a special self-learning command and control navigation system technology of the company. With its help, Varuna HA can fly and land itself even from moving places.

वरुणा एचए को इस तरह डिजाइन किया गया है कि समय, खर्च और इंसानी जान का जोखिम कम हो। यह ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में भारी सामान उठाने में सक्षम है और जरूरत पड़ने पर हेलिकॉप्टर जैसे पारंपरिक प्लेटफॉर्म का विकल्प बन सकता है।

यह प्लेटफॉर्म कम ऊंचाई पर छोटी और मध्यम दूरी की तेज ट्रांसपोर्ट जरूरतों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में रसद, मेडिकल सप्लाई या जरूरी सामान पहुंचाने में यह बेहद कारगर साबित हो सकता है।

SDE Varuna HA-India’s High-Altitude Two-Man VTOL
SDE Varuna HA-India’s High-Altitude Two-Man VTOL

सेना के उत्तरी और पूर्वी कमानों ने इस प्लेटफॉर्म में गहरी रुचि दिखाई है। इसका मुख्य कारण यह है कि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में कई फॉरवर्ड पोस्ट ऐसे हैं जहां मौसम, टर्बुलेंस और पतली हवा के चलते हेलिकॉप्टरों से सप्लाई पहुंचाना मुश्किल होता है। ऐसे में वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म सैनिकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बन सकते हैं।

यह टैक्टिकल एरियल व्हीकल दो सैनिकों को एक साथ ले जाने या लगभग 150 से 200 किलोग्राम तक का सामान ढोने में सक्षम है। इसमें गोला-बारूद, राशन, मेडिकल सप्लाई और यहां तक कि घायल सैनिक को निकालकर सुरक्षित स्थान तक लाने की क्षमता भी शामिल है। इसकी उड़ान सीमा 25 किलोमीटर से अधिक और उड़ान समय एक घंटे से ज्यादा बताया गया है, जो ऊंचाई वाले इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है।

वरुणा एचवीटीओएल को खास तौर पर ऊंचाई और ठंडे मौसम के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें बड़े रोटर, डी-आइसिंग सिस्टम, मजबूत लैंडिंग गियर और ठंड में काम करने वाला इंजन शामिल किए जाने की योजना है। कंपनी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म माइनस 20 से 30 डिग्री तापमान में भी काम करने में सक्षम होगा।

इस प्लेटफॉर्म की एक बड़ी खासियत इसका सेफ्टी सिस्टम है। इसमें बैलिस्टिक पैराशूट, क्वाड-रिडंडेंट कंट्रोल सिस्टम और एयरबैग जैसी सुविधाएं दी गई हैं, जिससे आपात स्थिति में जोखिम कम हो जाता है। यह विशेष रूप से ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अहम साबित हो सकता है।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म से खतरनाक “फ्री-ड्रॉप” सप्लाई मिशनों की जरूरत कम हो सकती है। अभी कई जगहों पर हेलिकॉप्टरों को ऊंचाई पर उड़ते हुए सामान गिराना पड़ता है, जो पायलटों के लिए जोखिम भरा होता है। एक वरुणा डिटैचमेंट एक दिन में कई फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई पहुंचा सकता है।

सैन्य उपयोग के अलावा यह प्लेटफॉर्म डिजास्टर रिस्पॉन्स, ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस, इमरजेंसी मेडिकल सर्विस, लॉ-एन्फोर्समेंट और दूरदराज़ इलाकों में कनेक्टिविटी जैसे नागरिक कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह वरुणा एचवीटीओएल का इस्तेमाल ड्यूल-यूज प्लेटफॉर्म के तौर पर भी किया जा सकता है।

Operation Sindoor Turkish Drone: The operation was shot by India in Sindoor. This drone from Turkey, was launched from Lahore, it was scared.

Operation Sindoor Drone

Operation Sindoor Turkish Drone: Pakistan had attacked several drones on India during operation shifts. The Indian Army’s Air Defense System had failed with big accuracy. Among these, Pakistan had met many drone Turkie. The Indian Army also killed. One of those dropped drones has the chance to watch the drones also found the defence news. This armed drone made in Turkey was launched by Pakistan from Lahore. This drone was sent to target an important military base of the Indian Air Force, but the Indian Air Defense System L-70 guns had dropped it only before they entered within the border of India.

Pakistan Drone ToT: Pakistan is missing this special drone deal with the European company, monitor Indian agencies on the secret agreement

While the forces’ sources had confirmed this drone during that time, it was avoided by giving more information. After that this drone was sent to the forensic. This drone was recently exhibited on Delhi-based housing of Thal Army Chief General Subendra Dwivedi on the occasion of Vijay Day. This drone in the exhibition was placed with other military souvenirs.

Operation Sindoor Drone

Pakistan attacked this drone on May 8, i.e. around that day 24 hours after India had attacked Initiatives In response to the terror attack, the terror bases located in Pakistan and Pakistan authorized Kashmir were devastated. In response to this, Pakistan had sent more than 500 handcrafted drones in the Indian border, targeting 36 cities and towns of Jammu and Kashmir, Rajasthan and Punjab.

The multi-layered air defense system of Indian Army and Air Force responded to these attacks and nearly all drones were killed in the air. One of these was the drone Yiha-III (YIHA-III), which has been paved by Turkey and Pakistan. This is a worktable or suede drone, also known as the loiting munuition.

Yiha-III drones have been designed in such a way that it can boast for quite a long time over a terrain and attack it with an explosion when the right target meets. According to the authorities, this drone was launched from around the Lahore International Airport on May 10 and was flying at a height of about 2,000 meters at that time.

About 10 kg of explosive loaded in the drone. The target was the S-400 air defence missile system of the Indian Air Force deployed in Adampur near Jaldhar in Punjab. Some officials pointed out that the target could be a military establishment located at Hoshiarpur or Jalandhar Sector. However, this drone could not succeed in reaching its target and the Air Defense Units of the Indian Army near Amritsar intercepted it.

Operation Sindoor Drone

The cyber and technical experts of the Indian Army fully examined it after the drone was dropped. Analyzed its Flight Control System, Pre-Feed Flight Path, Launch Point and Target Data during this time. According to the army, it became clear in the investigation that the flight plan in the drone was already fed and it was sent directly to the Indian military base.

The Army officials pointed out that such investigation helps to understand the strategic and strategic intent of the enemy. Data of cameras, infrared sensors and other electronic devices engaged in drones is also protected.

Meanwhile, Pakistan had also used other handcrafted drones in Turkey during operation shifts. These include a drone named ‘Sungar’, which makes Turkish defence company Eshisgard. The weapons such as asolt rifle, grenade launcher and mortar can be mounted in different variants of the sanggar drone.

According to the Indian Army, these drones used by Pakistan won’t tick the vigilance of Indian security forces and strong air defense systems. Protected not only military bases from the sharp action of the army, but also saved the civilian terrain from large losses.

MH-60R 2nd squadron: 17 December Indian Navy will be highly specialized, commissioned in Goa will be the second squadron of Romeo Helicopters

MH-60R 2nd squadron

MH-60R 2nd squadron: भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता को जबरदस्त बूस्ट मिलने वाला है। नौसेना 17 दिसंबर को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में अपनी दूसरी एमएच-60आर यानी रोमियो हेलिकॉप्टर स्क्वाड्रन को कमीशन करेगी। इसका पहला स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 ‘सीहॉक्स’ पहले कोच्चि के आईएनएस गरूड़ पर मार्च 2024 में कमीशन किया गया था। यह स्क्वाड्रन उस समय बनाया गया था जब शुरु में एमएच-60आर हेलिकॉप्टर्स भारत आए थे।

MH-60R हेलिकॉप्टर की नई स्क्वाड्रन का नाम आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेज’ रखा गया है। इनकी कमीशनिंग के मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी भी मौजूद रहेंगे। यह कमीशनिंग भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)

इससे पहले नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने 4 दिसंबर की नेवी डे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिसंबर 2025 में ही आईएनएस हंसा, गोवा में फुल स्क्वाड्रन कमीशन होगा। नौसेना की योजना तीन स्क्वाड्रन बनाने की है इनमें से दो को वेस्टर्न फ्लीट के लिए, एक ईस्टर्न के लिए तैनात कियाा जाएगा।

MH-60R 2nd squadron

वहीं, आईएनएएस 335 स्क्वाड्रन के कमीशन होने से नौसेना की समुद्री निगरानी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और सतह पर मौजूद खतरों से निपटने की क्षमता को सीधा फायदा मिलेगा। एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों को दुनिया के सबसे आधुनिक मैरीटाइम हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: एमएच-60आर हेलिकॉप्टर क्यों हैं खास

एमएच-60आर हेलिकॉप्टर को ‘रोमियो’ नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऑल-वेदर मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर है, जिसे खासतौर पर एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आधुनिक सेंसर, एडवांस एवियोनिक्स और ताकतवर विपन सिस्टम लगा है। यही वजह है कि यह हेलिकॉप्टर ट्रेडीशनल एंड एसिमेट्रिकल दोनों तरह के खतरों से निपटने में सक्षम है। (MH-60R 2nd squadron)

ये हेलिकॉप्टर्स शिप्स (जैसे विक्रांत, विक्रमादित्य, डिस्ट्रॉयर्स) से ऑपरेट होते हैं, इसलिए एक स्क्वाड्रन के कुछ हेलिकॉप्टर्स अलग-अलग शिप्स पर एम्बार्क्ड रहते हैं।

MH-60R 2nd squadron

भारतीय नौसेना ने साल 2020 में अमेरिका से 24 एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया था, जिसकी कुल कीमत लगभग 2.4 अरब डॉलर थी। अब तक इनमें से 15 हेलिकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं। सभी की डिलीवरी 2027 तक पूरी हो जाएगी। इनमें से कुछ हेलिकॉप्टर अभी अमेरिका में ही हैं, जहां भारतीय पायलटों और टेक्निकल स्टाफ को ट्रेनिंग दी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: पहले भी साबित कर चुके हैं क्षमता

रोमियो हेलिकॉप्टर पहले ही नौसेना के फ्लीट ऑपरेशंस में पूरी तरह इंटीग्रेट हो चुके हैं और कई मौकों पर अपनी उपयोगिता साबित कर चुके हैं। इन हेलिकॉप्टरों को वॉरशिप्स से ऑपरेट किया जा सकता है, जिससे समुद्र के बड़े इलाके में निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ जाती है। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R Seahawk Helicopters: U.S. approved for sale of MH-60R helicopter’s support system, will strengthen India’s maritime security

इन हेलिकॉप्टरों में डिपिंग सोनार, मल्टी-मोड रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम लगे हैं, जो समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करते हैं। इसके साथ ही ये हेलिकॉप्टर मार्क-54 टॉरपीडो और हेलफायर एयर-टू-सर्फेस मिसाइलों से लैस हैं। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: आईएनएस हंसा से मिलेगी पश्चिमी में बढ़त

ऑस्प्रेज स्क्वाड्रन को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में तैनात किया जाएगा, जो पश्चिमी समुद्री तट पर नौसेना का प्रमुख एयर बेस है। यहां से अरब सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्र में निगरानी और ऑपरेशनल गतिविधियों को मजबूती मिलेगी। यह इलाका रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)

भारतीय नौसेना पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। हाल के वर्षों में चीनी नौसैनिक और रिसर्च जहाजों की मौजूदगी इस क्षेत्र में बढ़ी है, ऐसे में रोमियो जैसे आधुनिक हेलिकॉप्टर नौसेना के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। (MH-60R 2nd squadron)

MH-60R 2nd squadron: पुराने हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे रोमियो

रोमियो हेलिकॉप्टर भारतीय नौसेना में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पुराने सी किंग हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलिकॉप्टर अब अपनी मूल भूमिका की तुलना में ज्यादा ट्रांसपोर्ट कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे। नए हेलिकॉप्टरों के आने से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता फिर से मजबूत हो रही है। (MH-60R 2nd squadron)

मेंटेनेंस और सपोर्ट पर भी फोकस

हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच रोमियो हेलिकॉप्टरों (MH-60R 2nd squadron) के लिए लगभग 7,995 करोड़ रुपये का फॉलो-ऑन सपोर्ट समझौता भी हुआ है। इसके तहत अगले पांच वर्षों तक इन हेलिकॉप्टरों के मेंटेनेस, रिपेयर और स्पेयर सपोर्ट की व्यवस्था की जाएगी। भारत में ही इंटरमीडिएट लेवल मेंटेनेंस फैसिलिटी स्थापित की जाएगी, जिससे ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ेगी।