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F-16 upgrade for Pakistan: ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने गिराए थे पाकिस्तान के 6 एफ-16? अमेरिकी अपग्रेड पैकेज से खुला नुकसान का राज

F-16 upgrade for Pakistan

F-16 upgrade for Pakistan: एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है, “सच कितना भी छिपाओ, देर-सवेर बाहर आ ही जाता है।” कुछ ऐसा ही हुआ है पाकिस्तान के मामले में। पाकिस्तान को अमेरिकी सरकार ने 686 मिलियन डॉलर का एफ-16 फाइटर जेट्स का अपग्रेड पैकेज मंजूर किया है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल फिर चर्चा में है कि क्या ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 6 या उससे ज्यादा एफ-16 फाइटर जेट्स को नुकसान पहुंचाया था। क्योंकि इतने बड़े पैकेज का मतलब यह है कि पाकिस्तान को अपने कम-से-कम छह एफ-16 जेट्स को बदलने या भारी मरम्मत कराने की जरूरत पड़ रही है।

अमेरिका के डिफेंस सिक्युरिटी कोआपरेशन एजेंसी (डीएससीए) के अनुसार यह पैकेज पाकिस्तान के एफ-16 बेड़े को सुरक्षित रखने, आधुनिक बनाने और 2040 तक उसकी उड़ान क्षमता बेहतर करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें लिंक-16 टैक्टिकल डेटा लिंक सिस्टम, क्रिप्टोग्राफिक मॉड्यूल, अपग्रेडेड एवियोनिक्स, ट्रेनिंग और व्यापक लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह पैकेज पाकिस्तान को “इंटरऑपरेबिलिटी” बनाए रखने में मदद करेगा, ताकि वह जॉइंट ऑपरेशंस में अमेरिकी और पार्टनर फोर्सेज के साथ काम कर सके। (F-16 upgrade for Pakistan

IAF Chief on Operation Sindoor: वायुसेना प्रमुख बोले- पाकिस्तान का नैरेटिव मनोहर कहानियों जैसा, ऑपरेशन सिंदूर में गिराए एफ-16 और जेएफ-17 समेत 10 फाइटर जेट

खास बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर होने के लगभग 8 महीने बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को यह पैकेज दिया है। लेकिन भारत में इस पैकेज को अलग नजरिए से देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इतने बड़े पैकेज का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई एफ-16 जेट हवा में और जमीन पर नष्ट हो गए थे। भारतीय वायुसेना ने भी बाद में इस बात की पुष्टि भी की थी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद मई 2025 में भारतीय वायुसेना ने पहली बार स्वीकार किया था कि पाकिस्तान के कम से कम पांच विमान गिराए गए थे, जिनमें एफ-16 भी शामिल था। वायुसेना के डायरेक्टर जनरल एयर ऑपरेशंस एयर मार्शल एके भारती ने बताया था कि वायुसेना के रडार, एयर-डिफेंस सिस्टम और फाइटर जेट्स ने मिलकर यह कार्रवाई की। हालांकि उस समय पूरा ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया था।

कुछ महीनों बाद अगस्त 2025 में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि भारत के एफ-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने 300 किलोमीटर से अधिक दूरी से पांच पाकिस्तानी विमानों को हवा में ही नष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के जैकोबाबाद एयरबेस पर खड़े कुछ एफ-16 और एक अवॉक्स विमान को भी नुकसान पहुंचा था। उनके बयान से पहली बार स्पष्ट हुआ कि नुकसान सिर्फ हवा में नहीं, बल्कि जमीन पर भी हुआ था।

वहीं, दो अक्टूबर को वायुसेना दिवस से पहले दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने “कुल नौ से दस पाकिस्तानी फाइटर जेट” नष्ट किए। उन्होंने कहा था, “मई में हुई झड़पों के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 10 से अधिक फाइटर जेट गिराए, जिनमें अमेरिका निर्मित एफ-16 और चीन-पाकिस्तान के बनाए जेएफ-17 भी शामिल थे।”

उन्होंने कहा था कि भारत के पास रडार ट्रैक, सैटेलाइट इमेजरी और विजुअल रिकॉर्डिंग सहित हर सबूत मौजूद है, और पाकिस्तान किसी भी दावे का एक भी प्रमाण पेश नहीं कर पाया है।

उन्होंने यह भी जोड़ा था कि एस-400 सिस्टम ने इस ऑपरेशन में “गेम चेंजर” की भूमिका निभाई, क्योंकि यह पहली बार था जब इतनी दूरी से किसी टारगेट को इंटरसेप्ट किया गया। वायुसेना प्रमुख ने 15 भारतीय विमान गिराने के पाकिस्तानी दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा था कि यह “कल्पना” पर आधारित बयान है।

वहीं, अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को 686 मिलियन डॉलर का अपग्रेड पैकेज देने को लेकर विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि सिर्फ सामान्य अपग्रेड के लिए नहीं होती। इसमें ऐसे उपकरण और सिस्टम शामिल हैं जो अक्सर गंभीर नुकसान के बाद लगाए जाते हैं। इसके अलावा लिंक-16 सिस्टम जैसे इक्विपमेंट्स हाई वैल्यू विमानों पर ही लगाए जाते हैं, और पैकेज में इसकी संख्या भी काफी अधिक बताई गई है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कुल 9 से 10 फाइटर एयरक्राफ्ट नष्ट हुए, जिनमें कई एफ-16 भी शामिल थे। यह नुकसान दो तरह से हुआ, कुछ विमान हवा में मार गिराए गए और कुछ जमीन पर खड़े-खड़े मिसाइल स्ट्राइक्स में तबाह हुए।

ऑपरेशन के पहले दिन 7 मई की रात को ऑपरेशन की पहली कार्रवाई हुई। रात लगभग डेढ़ बजे से लेकर सुबह चार बजे के बीच भारतीय वायुसेना ने पीओके और पाकिस्तानी पंजाब में मौजूद नौ आतंकी कैंपों को निशाना बनाया। जवाब में पाकिस्तान ने एफ-16 और जेएफ-17 विमान स्क्रैम्बल किए, पंजाब सेक्टर में तैनात एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी से तीन लंबी दूरी की मिसाइलें दागीं। पहली मिसाइल ने बहावलपुर के ऊपर एक एफ-16 को हवा में ही निशाना बनाया। दूसरी मिसाइल ने मुजफ्फराबाद–कोटली क्षेत्र के एयरस्पेस में एक और एफ-16 मार गिराया। तीसरा टारगेट सियालकोट के पास, नियंत्रण रेखा से करीब 40 किलोमीटर अंदर, एक जेएफ-17 या एफ-16 बना।

वहीं, अगली सुबह यानी 8 मई को भारतीय वायुसेना ने सैटेलाइट और ड्रोन निगरानी से मिले ठोस इनपुट के आधार पर पाकिस्तान के चार प्रमुख एयरबेस जैकोबाबाद, भोलारी, रहीम यार खान और सरगोधा पर हमले किए। जैकोबाबाद एयरबेस पर मौजूद हैंगर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और उनमें खड़े चार एफ-16 तथा एक सी-130 एयरक्राफ्ट पूरी तरह नष्ट हो गए। भोलारी एयरबेस पर स्थित एफ-16 मेंटेनेंस हैंगर को भारी नुकसान पहुंचा और एक एफ-16 विमान वहां पूरी तरह बर्बाद हो गया। रहीम यार खान में रनवे पर खड़ा एक एफ-16 और दो जेएफ-17 मिसाइल हमले का निशाना बन गया। सरगोधा बेस पर स्थित एक एफ-16 और एक अवॉक्स एयरक्राफ्ट के भी हमले में तबाह होने की पुष्टि बाद में सामने आई।

9 मई को पाकिस्तानी वायुसेना ने एक आखिरी कोशिश करते हुए चक अमरू–सियालकोट सेक्टर में भारतीय ठिकानों के करीब आने की कोशिश की, लेकिन वहां तैनात एफ-400 ने एक और एफ-16 को हवा में ही ढेर कर दिया। इसके बाद पाकिस्तानी वायुसेना ने अपनी कोशिशें रोक दीं और युद्धविराम की मांग की। 10 मई को सैन्य कार्रवाई पूरी तरह थम गई।

Landmine crisis: दुनिया भर में 12 करोड़ से ज्यादा बारूदी सुरंगें, 2024 में 1114.82 वर्ग किमी जमीन प्रभावित और 1,05,604 लैंडमाइन की नष्ट

Landmine crisis- Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board
Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board

Landmine crisis: लैंडमाइन मॉनिटर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में 1114.82 वर्ग किमी जमीन बारूदी सुरंग से प्रभावित हुई और 1,05,604 बारूदी सुरंगों को खोजकर सुरक्षित रूप से नष्ट किया गया। यह आंकड़े चौंकने वाले हैं। दुनिया के कई हिस्सों में बारूदी सुरंग और युद्ध के विस्फोटक अवशेष आज भी लाखों लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं। जंग खत्म हो जाने के बाद भी यह खतरा सालों तक बरकरार रहता है और लंबे समय तक आम नागरिकों, बच्चों, किसानों और लौटने वाले विस्थापित परिवारों की जिंदगी को प्रभावित करता है।

मंगलवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित दूसरी सालाना इंडिया इंटरनेशनल फोरम ऑन माइन एक्शन एंड सेफ्टी (IIFOMAS) सिम्पोजियम 2025 में बारूदी सुरंगों से जुड़े खतरों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि लैंडमाइन यानी बारूदी सुरंगें हटाने का काम अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, समावेशी विकास और दीर्घकालिक स्थिरता का अहम हिस्सा बन चुका है। सिंपोजियम में देश-विदेश से आए अधिकारियों ने बताया कि बारूदी सुरंगों से से भरे इलाके सालों वर्षों तक लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं और युद्ध खत्म होने के बाद भी मौतें जारी रहती हैं।

Landmine crisis- CDS Gen Anil Chauhan
CDS Gen Anil Chauhan

Landmine crisis: सीडीएस बोले- माइन एक्शन एक नैतिक मिशन

भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने वर्चुअल संबोधित करते हुए कहा कि माइन एक्शन केवल तकनीकी काम नहीं, बल्कि एक नैतिक मिशन है। उन्होंने कहा, “जब एक माइन हटती है, तो एक जिंदगी बचती है; जब एक हेक्टेयर जमीन साफ होती है, तो एक समुदाय फिर से बस सकता है।”

CDS on Indian Defence Industry: निजी डिफेंस कंपनियों पर बरसे सीडीएस चौहान, बोले- सिर्फ मुनाफा नहीं, देशभक्ति भी जरूरी

सीडीएस ने कहा कि इस मिशन में डिफेंस प्रोफेशनल्स, वेटरंस, ह्यूमैनिटेरियन वर्कर्स, पॉलिसी मेकर्स, इंडस्ट्री लीडर्स और एकेडमिक्स सभी की साझेदारी जरूरी है, क्योंकि माइन एक्शन सीधे मानवीय सुरक्षा और सामाजिक पुनर्निर्माण से जुड़ा हुआ है।

Landmine crisis: दुनिया भर में 12 करोड़ से ज्यादा लैंडमाइन

IIFOMAS बोर्ड के चेयरमैन रिटायर्ड मेजर जनरल अजय सेठ ने बताया कि दुनिया के लगभग 90 देशों में 80 से 120 मिलियन (8 से 12 करोड़) लैंडमाइन फैली हुई हैं। इन लैंडमाइनों ने ऐसे बड़े क्षेत्र को दूषित कर दिया है जहां लोग खेती या घर बनाने तो दूर, सुरक्षित तरीके से चल भी नहीं सकते। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में लगभग 35 फीसदी जमीन लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाई। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2023 में अफगानिस्तान के उसके 29 प्रांतों में से केवल दो ही बारूदी सुरंगों से मुक्त माने जाते हैं। जबकि कंबोडिया में गृहयुद्ध के बाद जमीन का बड़ा हिस्सा बरसों तक बेकार पड़ा रहा।

उन्होंने बताया कि IIFOMAS का पूरा नाम है India International Forum on Mine Action and Safety। यह होराइजन ग्रुप का एक हिस्सा है। होराइजन ग्रुप कई देशों में बारूदी सुरंगों को साफ करने का काम करता रहा है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने साल 2024 में यह थिंक टैंक शुरू किया। पिछला साल पहला सिम्पोजियम था और इस साल दूसरा सिम्पोजियम हो रहा है।

दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या

मेजर जनरल अजय सेठ के मुताबिक IIFOMAS का मुख्य उद्देश्य है कि लोगों को बारूदी सुरंगों के खतरे के बारे में जागरूक किया जाए। आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या है। हर एक लैंडमाइन हादसा किसी की जिंदगी पूरी तरह बदल देता है। सबसे दुखद बात यह है कि 2024 की लैंडमाइन रिपोर्ट बताती है कि लैंडमाइन से होने वाले कुल हादसों में करीब 40 फीसदी बच्चे होते हैं। इसलिए भारत की जिम्मेदारी है कि वह खासकर दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों की मदद करे जहां यह समस्या गंभीर है। हमें उनकी मदद करके डिमाइनिंग यानी सुरंगों को साफ करने के प्रयास बढ़ाने चाहिए।

माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा काम

वहीं IIFOMAS के संस्थापक और डायरेक्टर जनरल कर्नल (सेवानिवृत्त) नवनीत एमपी मित्तल ने बताया कि गाजा में लगभग 7500 से 10,000 मिलियन मीट्रिक टन मलबा पड़ा है, जिसे तभी हटाया जा सकता है जब पूरा इलाका सुरक्षित घोषित हो। उन्होंने कहा कि बारूदी सुरंगें हटाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी, जमीन, घर, रोजगार और सामाजिक ढांचे को वापस खड़ा करने का काम है। जब जमीन सुरक्षित होती है, तभी लोग खेती कर सकते हैं, सड़कें बन सकती हैं और बच्चे स्कूल जा सकते हैं।

Landmine crisis- Col Navneet MP Mittal (Retd), Founder and Director General IIFOMAS
Col Navneet MP Mittal (Retd), Founder and Director General IIFOMAS

कर्नल मित्तल के मुताबिक, “माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा, धीमा और महंगा काम है, लेकिन यह जरूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई समाज युद्ध के बाद सामान्य जीवन में लौट नहीं सकता।”

उन्होंने बताया कि युद्ध क्षेत्र में जहां बिना फटे विस्फोटक होते हैं, वहां एक अकेला डिमाइनर (लैंडमाइन हटाने वाला व्यक्ति) एक दिन में 10 से 200 वर्ग मीटर जमीन ही साफ कर पाता है। जहां मशीनें लगती हैं, वहां रफ्तार बढ़कर 5,000 से 20,000 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक हो जाती है। जबकि डॉग्स यानी खोजी कुत्ते 1000 से 1500 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक सूंघकर खतरे पहचान सकते हैं। वहीं, रैट्स लगभग 400 वर्ग मीटर प्रतिदिन खोज पाते हैं।

इसके बाद असली प्रक्रिया शुरू होती है बारूदी सुरंग की पहचान करना, उसे सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय करना और जमीन को पूरी तरह साफ घोषित करना। यही वजह है कि माइन क्लीयरेंस बेहद धीमा और जोखिम भरा है।

लैंडमाइन बनाने की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक

कर्नल मित्तल ने कहा, “एक लैंडमाइन बनाने में करीब 3 डॉलर लगते हैं, लेकिन उसे हटाने में 1000 से 2000 डॉलर तक खर्च होता है। और दुनिया के आंकड़ों के मुताबिक हर 5000 लैंडमाइन साफ करते समय एक व्यक्ति की जान जाती है।”

आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र लैंडमाइन और विस्फोटक अवशेषों से भरा पड़ा है। इन्हें हटाने में अरबों डॉलर लगते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय फंडिंग इतनी नहीं है। पिछले दस सालों में फंडिंग लगभग 700–800 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष ही रही है, जबकि जरूरत इसका कई गुना है।

उन्होंने बताया कि सिर्फ गाजा में माइन एक्शन के लिए 1 बिलियन डॉलर की जरूरत है। वहीं, यूक्रेन में यह आंकड़ा 20–30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। (Landmine crisis)

‘250 साल लगेंगे लेबनान को साफ करने में’

पूर्व राजनयिक दिनकर श्रीवास्तव ने बताया कि लेबनान में जितना इलाका लैंडमाइनों से भरा है, उसे मौजूदा रफ्तार से साफ करने में 250 साल लगेंगे। उन्होंने कहा कि 2022 में केवल 25,000 वर्गमीटर जमीन साफ हो पाई थी।

उन्होंने बताया कि यूएन माइन एक्शन सर्विस की फंडिंग 7 साल में 125 मिलियन डॉलर से घटकर 46 मिलियन डॉलर रह गई है। उन्होंने यह भी बताया कि 2024 में 68 फीसदी माइन पीड़ित नागरिक थे। उन्होंने अपने अफ्रीका मिशन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी बच्चे, किसान और मजदूर माइन के शिकार हो जाते हैं।

श्रीलंका ने लगभग 1 करोड़ लैंडमाइन हटाईं

कार्यक्रम में शामिल श्रीलंका की हाई कमिश्नर महिशिनी कॉलोन ने बताया कि उनके देश ने 2009 से अब तक लगभग 99 लाख लैंडमाइन हटाईं और 1.5 मिलियन अनएक्सप्लोडेड आर्डनेंस (UXO) नष्ट किए। इससे माइन हादसों में 99% कमी आई है, वहीं 2002 में 252 मौतों से घटकर 2024 में सिर्फ 3 तक रह गया। (Landmine crisis)

Landmine crisis- H.E. Ms. Mahishini Colonne, Sri Lankan High Commissioner
H.E. Ms. Mahishini Colonne, Sri Lankan High Commissioner

उन्होंने कहा कि इतने बड़े ऑपरेशन ने 9.17 लाख से ज्यादा लोगों को उनके घर लौटने, खेती शुरू करने और जीवन को फिर से पटरी पर लाने में मदद की। श्रीलंका ने 2017 में एंटी-पर्सनल माइन बैन कन्वेंशन को अपनाकर अपनी मानवीय प्रतिबद्धता मजबूत की।

लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि 2024 के बाद से अंतरराष्ट्रीय सहायता 45 फीसदी गिर गई है, जिससे डी-माइनिंग कार्य बाधित हो रहा है। अभी भी 23 वर्ग किलोमीटर संदिग्ध क्षेत्र साफ होना बाकी है।

भारत में IEDs का बदलता खतरा- डिप्टी एनएसए पंकज सिंह की बड़ी चेतावनी

रिटायर्ड आईपीएस और वर्तमान में डिप्टी एनएसए पंकज सिंह ने बताया कि भारत में आईईडी यानी इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस समय के साथ बहुत खतरनाक और चालाक तरीके से बदलते गए हैं। शुरुआत 1985 में दिल्ली में बने साधारण ट्रांजिस्टर बम से शुरू हुई, लेकिन ये तकनीक अब प्रेशर कुकर, साइकिल, खिलौने, डॉल और कई सामान्य चीजों में छिपाई जाने लगी। जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद में ऐसे बमों से भारी तबाही मचाई हुई। (Landmine crisis)

Landmine crisis- Deputy NSA Pankaj Singh
Deputy NSA Pankaj Singh

उन्होंने कहा कि आईईडी बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान जैसे कमर्शियल एक्सप्लोसिव, फर्टिलाइजर, जेलटिन स्टिक्स और डेटोनेटर अक्सर खनन क्षेत्रों, पुलिस या रक्षा डिपो से चोरी किए जाते हैं। कुछ सामान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पर उपलब्ध है।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने मृत सीआरपीएफ जवानों के शरीर के अंदर विस्फोटक भरकर सिल दिया था, ताकि पोस्ट-मॉर्टम के दौरान धमाका हो सके। अब तो ड्रोन से भी मैग्नेटिक आईईडी गिराए जा रहे हैं, जैसा जम्मू एयरपोर्ट पर देखने को मिला थ। पुलवामा हमला और कोच्चि व बेंगलुरु के ब्लास्ट भी इसी तरह की घटनाएं थीं। वहीं, ड्रोन अब 100 किलो तक का वजन ले जाकर हथियार पहुंचा सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ड्रोन और एआई से जुड़ी नई तकनीकें भविष्य में इस खतरे को और बढ़ा सकती हैं। (Landmine crisis)

बड़ी चुनौती: बजट घटा रहे देश

मेजर जनरल अजय सेठ का कहना है कि कि इस काम में सबसे बड़ी चुनौती है फंडिंग, यानी पैसों की कमी। पहले अमेरिका, जापान, जर्मनी और कई यूरोपीय देश इस काम के लिए बहुत मदद करते थे। लेकिन अब लगभग सभी देशों ने इस क्षेत्र में अपना बजट घटा दिया है। इस वजह से डिमाइनिंग प्रोजेक्ट प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी चुनौती है मैनपावर, यानी लोगों की कमी। लैंडमाइन हटाने का काम बहुत मेहनत और बड़ी टीमों की जरूरत वाला काम है। इसके लिए विशेष ट्रेनिंग वाली टीमों का होना जरूरी है। जबकि तीसरी चुनौती है तकनीक। जिस तरह बारूदी सुरंगों की तकनीक लगातार बदल रही है, उसी तरह उन्हें खोजने और हटाने की तकनीक भी आधुनिक होनी चाहिए। नई मशीनों, सेंसर्स और सिस्टम की जरूरत बढ़ती जा रही है। (Landmine crisis)

भारत सरकार से की यह अपील

उन्होंने भारत सरकार से तीन महत्वपूर्ण अपीलें रखीं। जिसमें भारत को मानवीय लैंडमाइन एक्शन को अपनी ग्लोबल डिप्लोमैटिक पहल बनाना चाहिए। इस काम के लिए बजट और प्रबंधन को स्कूल, सड़क, और स्वास्थ्य सेवाओं की तरह महत्वपूर्ण मानकर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही, भारत को यूएन से मान्यता प्राप्त ट्रेनिंग, उपकरण ट्रांसफर, और क्षेत्रीय क्षमता निर्माण केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रभावित देश स्वयं यह काम सुरक्षित तरीके से कर सकें। (Landmine crisis)

Galwan War Memorial: चीन का नाम लिए बिना रक्षा मंत्री ने राष्ट्र को समर्पित किया गलवान वॉर मेमोरियल, श्योक टनल से 125 प्रोजेक्ट का उद्घाटन

Galwan War Memorial

Galwan War Memorial: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज लद्दाख से वीडियो लिंक के माध्यम से देश को 125 सामरिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं समर्पित कीं। इसके साथ ही एक बार भी चीन का नाम लिए बिना बहुप्रतिक्षित गलवान वॉर मेमोरियल का भी आज उद्घाटन कर दिया गया। समारोह श्योक टनल के नजदीक रखा गया था, जहां से रक्षा मंत्री ने ऑनलाइन संबोधन कर इन परियोजनाओं और स्मारक को राष्ट्र को समर्पित किया। उद्घाटन के मौके पर रक्षा मंत्री ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि यह इंफ्रास्ट्रक्चर उनके बलिदान को नमन है।

Galwan War Memorial: चीन का नहीं किया जिक्र

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में एक बार भी चीन का जिक्र किए बिना ऑनलाइन ही गलवान वॉर मेमोरियल देश को समर्पित कर दिया। उद्घाटन कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने कहा कि आज का दिन देश के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह 20 शहीदों के शौर्य को याद करने का दिन भी है। उन्होंने शहीदों को नमन करते हुए कहा कि यह स्मारक उनके बलिदान को हमेशा लोगों के सामने रखेगा।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

समरोह में भारतीय सेना की 14 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने गलवान की पावन वीर भूमि से लाए गए पत्थर से बने मूमेंटो को भी रक्षा मंत्री को भेंट किया। (Galwan War Memorial)

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Galwan War Memorial: 920 मीटर लंबी शियोक टनल का भी उद्घाटन

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज एक साथ 125 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का राष्ट्र को समर्पण होना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह केवल विकसित भारत के संकल्प का प्रमाण नहीं, बल्कि बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का भी उदाहरण है। उन्होंने लद्दाख की दारबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड पर बनी 920 मीटर लंबी शियोक टनल का भी उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि यह टनल पूरे साल भरोसेमंद कनेक्टिविटी देगी और सेना की तुरंत तैनाती क्षमता को कई गुना बढ़ाएगी। यह टनल बर्फबारी, भूस्खलन और एवलांच से प्रभावित होने वाले मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए विकसित किया गया है। सर्दियों के महीनों में तापमान कई बार –30°C तक चला जाता है, लेकिन यह टनल अब साल-भर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगी। (Galwan War Memorial)

रक्षा मंत्री ने कहा कि कनेक्टिविटी केवल सड़क या पुल का निर्माण नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, लॉजिस्टिक्स, व्यापार और नागरिक जीवन की धुरी है। बॉर्डर इलाकों में सड़कें सैनिकों की तेज मूवमेंट, रसद पहुंचाने, पर्यटन बढ़ाने और स्थानीय युवाओं के रोजगार के नए अवसर तैयार करती हैं। उन्होंने कहा कि मजबूत कनेक्टिविटी ही किसी भी आधुनिक राष्ट्र की रीढ़ है।

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ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर का भी विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहलगाम के आतंकी हमले के बाद हमारी सशस्त्र सेनाओं ने धैर्य, पराक्रम और पेशेवर क्षमता का परिचय देते हुए ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। यह ऑपरेशन इसलिए भी सफल रहा क्योंकि हमारी कनेक्टिविटी मजबूत थी। सड़कों की उपलब्धता, रियल टाइम कम्युनिकेशन नेटवर्क, सैटेलाइट सपोर्ट और समय पर लॉजिस्टिक सपोर्ट ने सेना को त्वरित और प्रभावी कार्रवाई में सक्षम बनाया। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन सिंदूर” ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत अपने नागरिकों और जवानों की सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। (Galwan War Memorial)

उन्होंने कहा कि आज भारतीय सेना कठिन पहाड़ी इलाकों में मजबूती से इसलिए खड़ी है क्योंकि हमारे पास आधुनिक सड़कें, ब्रिज, टनल, स्मार्ट फेंसिंग, निगरानी प्रणालियां और लॉजिस्टिक नेटवर्क उपलब्ध हैं। कनेक्टिविटी अब सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और भारत लगातार इसे मजबूत कर रहा है।

घरेलू रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये

रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले दस वर्षों में देश में रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। घरेलू रक्षा उत्पादन 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर आज 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। रक्षा निर्यात भी 1,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 25,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया है। यह भारत की क्षमता और विश्वसनीयता का प्रमाण है।

रक्षा मंत्री ने बीआरओ की कार्यशैली की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि जिस गति और दक्षता से बीआरओ ने पिछले वर्षों में बॉर्डर क्षेत्रों में सड़कें, पुल और टनल बनाए हैं, उसने राष्ट्रीय विकास को नई दिशा दी है। बीआरओ न केवल निर्माण कार्य में बल्कि आपदा के समय मानवीय सहायता में भी उत्कृष्ट भूमिका निभाता रहा है।

आज समर्पित की गई परियोजनाओं में कुल 28 रोड़्स, 93 ब्रिज और चार अन्य रणनीतिक कार्य शामिल हैं। इन परियोजनाओं का कार्य भारत के सात राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा हुआ है जिनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मिजोरम प्रमुख हैं।

उद्घाटन के मौके पर श्योक टनल के अलावा चंडीगढ़ में बनाये गये 3D-प्रिंटेड एचएडी कॉम्प्लेक्स को भी राष्ट्र को समर्पित किया गया। रक्षा मंत्री ने कहा कि 3D-प्रिंटेड तकनीक से तैयार यह सुविधा आधुनिक रक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही पूर्वोत्तर में बनाये गये प्रमुख मार्गों का उल्लेख किया गया जिनमें सेला-चाब्रेला-बीजे गोम्पा रोड और शंगेस्तर-सुलुला रोड भी हैं। इन मार्गों से अग्रिम इलाकों की पहुंच बेहतर होगी और स्थानीय लोगों को दैनिक जीवन व आर्थिक गतिविधियों में लाभ मिलेगा। (Galwan War Memorial)

वहीं, समारोह में बीआरओ के निदेशक जनरल लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा कि कठिन मौसम और विषम भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद इन प्रोजेक्ट्स का समापन टीम वर्क व स्वदेशी तकनीक के चलते संभव हुआ। उन्होंने बताया कि बीआरओ ने पिछले कुछ वर्षों में सीमावर्ती इलाकों में सड़कों, पुलों और टनलों के निर्माण पर तेजी से काम किया है और इन परियोजनाओं से न केवल सुरक्षा बल्कि स्थानीय विकास को भी बल मिला है।

Galwan War Memorial

विश्व का सबसे ऊंचा स्मारक- गलवान वॉर मेमोरियल

हिमालय की 14,500 फीट ऊंचाई पर स्थित यह स्मारक बेहद कठिन परिस्थितियों में बनाया गया। यह विश्व का सबसे ऊंचा स्मारक भी है। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे गिर जाता है और ऑक्सीजन का स्तर सामान्य इलाकों से बहुत कम होता है। ऐसे माहौल में निर्माण कार्य आसान नहीं था, लेकिन सेना और बीआरओ की टीमों ने समय पर यह कार्य पूरा किया। (Galwan War Memorial)

स्मारक में त्रिशूल और डमरू के आकार का मुख्य स्तंभ बनाया गया है, जो वीरता, ऊर्जा और सुरक्षा का प्रतीक है। स्मारक परिसर में शहीदों की कांस्य प्रतिमाएं, डिजिटल गैलरी, संग्रहालय और एक ऑडिटोरियम भी बनाया गया है। यहां गलवान की घटना से जुड़ी सामग्रियां और उन 20 शहीदों की वीरगाथाएं संजोई गई हैं। (Galwan War Memorial)

इस युद्ध स्मारक के साथ-साथ क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यात्रियों की सुविधा का भी खास ध्यान रखा गया है। इसके तहत दुर्बुक और गलवान के बीच किलोमीटर 23 पर ‘टाइल्स एंड व्यू कैफे’, किलोमीटर 56 पर एक और कैफे, और युद्ध स्मारक स्थल पर एक सुंदर ‘ब्रेवहार्ट्स डिस्प्ले’ बनाया गया है, जहां लोग शहीद जवानों की वीरता के बारे में जान सकेंगे।

इसके अलावा, यहां एक सोविनियर शॉप, सेल्फी प्वाइंट और युद्ध स्मारक का एक मॉडल डिजाइन भी तैयार किया गया है, ताकि आने वाले पर्यटक इस जगह की यादें अपने साथ ले जा सकें। इसके अलावा पर्यटकों को एलएसी के नजदीकी इलाकों तक भी ले जाया जाए, ताकि वे इस क्षेत्र के महत्व को समझ सकें। (Galwan War Memorial)

India-Russia Strategic Partnership: नई चुनौतियों में भी काम आएगी पुरानी दोस्ती, अब सिर्फ खरीदारी नहीं, साथ मिलकर बनाएंगे हथियार

India-Russia Strategic Partnership

India-Russia Strategic Partnership: भारत और रूस के छह दशक पुराने रक्षा संबंधों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 23वीं वार्षिक शिखर बैठक के बाद एक संयुक्त बयान जारी किया। दोनों देशों ने तय किया है कि अब रक्षा सहयोग का नया आधार को-रिसर्च, को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन होगा। यह कदम भारत के ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भरता पहल को मजबूती देने के लिए उठाया गया है। दोनों पक्षों ने “स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत करने पर सहमति जताई है।

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संयुक्त बयान में कहा गया कि साल 2000 में घोषित स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को इस साल 25 वर्ष पूरे हो गए हैं और दोनों नेताओं ने पारस्परिक विश्वास व राष्ट्रीय हितों के सम्मान का फिर से उल्लेख किया। बयान में दोनों पक्षों ने बताया कि द्विपक्षीय संबंध समय की कसौटी पर खरे रहे हैं और जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के बावजूद यह रिश्ता मजबूत बना हुआ है। बयान में दोनों देशों ने सभी स्तरों पर बढ़ते संपर्कों और उच्चस्तरीय दौरों को संतोषजनक बताया। (India-Russia Strategic Partnership)

India-Russia Strategic Partnership: फोकस जॉइंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर

भारत और रूस का रक्षा सहयोग दशकों पुराना है। पहले भारत रूस से हथियार खरीदता था। लेकिन अब यह रिश्ता बदल रहा है। जॉइंट स्टेटमेंट में साफ लिखा है कि भारत की आत्मनिर्भर पहल को देखते हुए अब फोकस जॉइंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट (साथ मिलकर नई टेक्नोलॉजी बनाना), को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन यानी साथ मिलकर हथियार बनाने पर है। (India-Russia Strategic Partnership)

जॉइंट स्टेटमेंट में दोनों देशों के बीच हुई 22वीं इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमिशन ऑन मिलिटरी एंड मिलिटरी-टेक्निकल को-ऑपरेशन (RIGC-M&MTC) बैठक का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत में रूसी हथियारों के स्पेयर पार्ट्स, कंपोनेंट्स और मेंटेनेंस का प्रोडक्शन होगा। मेक इन इंडिया के तहत यह किया जाएगा। साथ ही, भारतीय सेनाओं की जरूरत पूरी करने के साथ-साथ तीसरे देशों को एक्सपोर्ट भी किया जाएगा। इसके साथ ही जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज इंद्रा जारी रखने पर भी सहमति जताई गई। (India-Russia Strategic Partnership)

अब सिर्फ खरीदारी नहीं, साथ मिलकर बनाएंगे हथियार

दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि भारत की आत्मनिर्भरता जरूरतों को देखते हुए रक्षा साझेदारी को इस दिशा में बढ़ायाजा रहा है, ताकि एडवांस टेक्नोलॉजी और मॉडर्न डिफेंस सिस्टम्स भारत में ही डेवलप और मैन्युफैक्चर किए जा सकें।

यह बदलाव भविष्य की कई डिफेंस प्रोजेक्ट्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, एयरो-इंजन, समुद्री इंजन, रडार और मिसाइल सिस्टम्स शामिल हैं, जिनकी जरूरत आने वाले सालों में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को होगी। रूस के पास इन सेक्टर्स में पहले से ही एडवांस टेक्नोलॉजी है जिनमें एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम और पांचवीं पीढ़ी का सुखोई-57 लड़ाकू विमान शामिल हैं। (India-Russia Strategic Partnership)

फिलहाल ब्रह्मोस मिसाइल ही भारत-रूस की सबसे प्रमुख संयुक्त परियोजना है। हालांकि, इसका मूल डिजाइन सोवियत काल के याखोंट मिसाइल से लिया गया था, जिसे भारत ने अपनाकर आगे डेवलप किया है।

करीब दस साल पहले भारत ने रूस के साथ पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को संयुक्त रूप से डेवलप करने की परियोजना से खुद को अलग कर लिया था। दो वर्ष पहले दोनों देशों ने भारत में एके-203 राइफल बनाने के लिए जॉइंट प्रोडक्शन शुरू किया, हालांकि इसका डिजाइन रूस में ही डेवलप हुआ था।

भारत में कई रूसी प्लेटफॉर्म जैसे सुखोई-30 एमकेआई, टी-90 टैंक और मिग-21 लाइसेंस के तहत बनाए जाते हैं, लेकिन उनके डिजाइन और महत्वपूर्ण तकनीक अब भी रूस के पास ही है।

मोदी-पुतिन वार्ता में दोनों देशों ने सैन्य सहयोग को और बढ़ाने का फैसला किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते रूसी हथियारों के स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता को हल करने के लिए अब भारत में ही इनके जॉइंट प्रोडक्शन पर सहमति बनी है। (India-Russia Strategic Partnership)

संयुक्त बयान के अनुसार, “दोनों पक्षों ने सहमति जताई कि रूस में बने हथियारों और उपकरणों के मेंटेनेंस के लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स, कंपोनेंट्स और अन्य मैटेरियल्स का उत्पादन भारत में संयुक्त रूप से किया जाएगा।”

यह उत्पादन ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जॉइंट वेंचर्स के जरिए किया जाएगा। इसके साथ ही, ऐसे उपकरणों को दोस्ताना देशों को निर्यात करने की भी संभावना रहेगी।

वार्ता में भारत–रूस इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन ऑन मिलिटरी एंड मिलिटरी टेक्निकल कोऑपरेशन की 22वीं बैठक के नतीजों का भी स्वागत किया गया, जिसमें कई महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। (India-Russia Strategic Partnership)

India-Russia Strategic Partnership: यूएनएससी में भारत को सपोर्ट

बयान में आतंकवाद विरोधी सहयोग पर दोनों पक्षों ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों देशों ने हालिया आतंकवादी घटनाओं की कड़ी निंदा की और संयुक्त रूप से यूएन में सूचिबद्ध आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सहयोग बढ़ाने तथा टेररिज्म फाइनेंसिंग और पारंपरिक तथा डिजिटल माध्यमों से रेडिकलाइजेशन को रोकने पर सहमति व्यक्त की।

बहु-पक्षीय मंचों में भी सहयोग पर दोनों ने विचार साझा किया। संयुक्त बयान में जी20, ब्रिक्स, एससीओ और संयुक्त राष्ट्र के तहत सहयोग को आगे बढ़ाने का संकल्प है। दोनों पक्ष यूएनएससी में सुधार, बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता पर भी सहमत दिखे। रूस ने भारत के यूएनएससी के नियमित सदस्य के रूप में शामिल होने के समर्थन की बात दोहराई। (India-Russia Strategic Partnership)

क्यों है यह समिट इतनी महत्वपूर्ण?

दुनिया में दो खेमे बन रहे हैं– एक अमेरिका का, दूसरा रूस-चीन का। भारत दोनों से अच्छे संबंध रखता है। यह समिट दिखाता है कि भारत अपनी राह खुद बनाता है। डिफेंस में नई पार्टनरशिप से भारत मजबूत बनेगा, रूस को भी सपोर्ट मिलेगा। जियोपॉलिटिक्स में यह संदेश है कि पुरानी दोस्ती नई चुनौतियों में भी काम आएगी। (India-Russia Strategic Partnership)

India Russia RELOS agreement: भारत ने किया रूस के साथ यह खास सैन्य समझौता, आर्कटिक तक मिलेगी पहुंच, चीन पर लगाम कसने की तैयारी

India Russia RELOS agreement

India Russia RELOS agreement: इस साल की शुरुआत में भारत और रूस के बीच एक अहम सैन्य समझौते RELOS पर दस्तखत हुए थे। वहीं रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान रूस की संसद ड्यूमा ने इस समझौते को हरी झंडी दे दी है। इस समझौते का नाम रिकॉप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट है, जो एक विशेष सैन्य समझौता है। यह समझौता फरवरी 2025 में मॉस्को में किया गया था। वहीं ड्यूमा की मंजूरी के बाद यह समझौता आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी खास बात यह है कि भारत और रूस एक-दूसरे के मिलिट्री बेस और लॉजिस्टिक फैसिलिटीज का इस्तेमाल कर सकेंगे।

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यह समझौता भारत को आर्कटिक क्षेत्र में रूस के सैन्य ठिकानों तक पहुंच देता है, जबकि रूस को भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण इंडियन ओशन रीजन यानी IOR में एंट्री और सपोर्ट की सुविधा मिलेगी। यह सहयोग दोनों देशों की रणनीतिक पहुंच को बड़ा विस्तार देता है।

क्या है India Russia RELOS agreement?

समझौते के मुताबिक, भारत और रूस एक समय में 5 वॉरशिप, 10 विमान और 3000 सैनिक तक एक-दूसरे के इलाकों में तैनात कर सकते हैं। यह समझौता 5 सालों के लिए होगा, जिसे आपसी सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है। यह पहली बार है कि किसी सैन्य समझौते में विदेशी धरती पर सैनिकों की इतनी बड़ी संख्या तैनाती करने सुविधा मिलेगी।

इस समझौते के बाद भारतीय नौसेना को रूस के उत्तरी क्षेत्र, विशेषकर आर्कटिक के पास स्थित मुरमान्स्क और सेवेरोमॉर्स्क जैसे अत्यंत रणनीतिक बंदरगाहों तक पहुंच मिल सकेगी। आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक बनने की दिशा की ओर अग्रसर है, जहां रूस और चीन दोनों अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं।

रूस की ओर से भी इस समझौते से बड़ा लाभ होगा। अब रूसी नौसेना को भारतीय क्षेत्र में ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, राशन और अन्य जरूरी सपोर्ट आसानी से मिल सकेगा। इससे रूस हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को बेहतर तरीके से बनाए रख सकेगा। भारतीय नौसेना की लॉजिस्टिक सुविधाओं के इस्तेमाल से रूस को इस इलाके में मदद मिलेगी।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं और ड्यूमा द्वारा इस समझौते को मंजूरी देना दोनों देशों के बीच मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का संकेत माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रूस के रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोउसॉव नई दिल्ली में होने वाली अंतर-सरकारी बैठक में इस समझौते की आधिकारिक रूप से समीक्षा करेंगे।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, राजनाथ सिंह और आंद्रेई बेलोउसव दिल्ली में 22वें इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन फॉर मिलिट्री एंड मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन की सह-अध्यक्षता करने वाले हैं। दोनों मंत्री सीमाओं, सैनिक सहयोग और चल रहे मिलिटरी-टेक्निकल प्रोजेक्टों को लेकर विस्तृत समीक्षा करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि बेलोउसव राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए पुष्पचक्र अर्पित करेंगे।

रेलोस समझौते की खास बात यह है कि यह समझौता युद्धकाल और सामान्य समय दोनों में लागू होगा। इसके तहत सैन्य जहाजों और विमानों को ईंधन भरने, भोजन, स्पेयर पार्ट्स, रिप्लेनिशमेंट और बेस में रुकने की सुविधा मिलेगी। यह भारत और रूस दोनों की सेनाओं को लंबी दूरी तक मिशन करने में मदद करेगा।

भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी दावेदारी बढ़ा रहा है। ऐसे समय में भारत को रूस के आर्कटिक मिलिट्री स्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से उसे वैश्विक स्तर पर नई रणनीतिक शक्ति मिलती है। इसी तरह रूस के लिए हिंद महासागर में भारत एक मजबूत और विश्वसनीय साझेदार बनकर उभर रहा है।

लेमोआ और रेलोस दोनों में क्या है अंतर

भारत इससे पहले अमेरिका के साथ लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट) कर चुका है, जिसके तहत भारत अमेरिकी मिलिट्री बेसों का लॉजिस्टिक इस्तेमाल कर सकता है। लेमोआ में सैनिक तैनाती की संख्या तय नहीं की जाती, जबकि रूस के साथ रेलोस में संख्या का स्पष्ट प्रावधान है। दोनों समझौतों का उद्देश्य लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ाकर सैन्य ऑपरेशनों को आसान बनाना है।

हालांकि लेमोआ की तरह रेलोस भी कॉस्ट-रीइम्बर्सेबल यानी भुगतान आधारित व्यवस्था है, लेकिन रेलोस में कई बार गुड्स-एक्सचेंज या बार्टर की सुविधा भी संभव है। भारतीय नौसेना लंबे समय से उत्तरी समुद्री मार्ग की निगरानी और व्यावहारिक पहुंच चाहती थी, जो अब संभव हो सकेगी।

भारतीय नौसेना के सूत्रों का कहना है, यह समझौता भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” पॉलिसी का मजबूत उदाहरण है। भारत अब दोनों महाशक्तियों अमेरिका और रूस के साथ लॉजिस्टिक समझौते रखता है, जिससे उसकी समुद्री पहुंच दुनिया के हर दिशा में बढ़ जाती है।

भारत और रूस की सेनाएं पहले से संयुक्त अभ्यास और तकनीकी सहयोग करती रही हैं। अब रेलोस के तहत यह सहयोग और सरल हो जाएगा, क्योंकि जहाजों और विमानों को मेंटेनेंस, ईंधन और अन्य सपोर्ट तुरंत मिल सकेगा। विशेष रूप से समुद्री मिशनों, आपदा राहत अभियानों में इसका बड़ा फायदा मिलेगा।

रूस के साथ यह समझौता बढ़ते वैश्विक तनावों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इक्विपमेंट्स, बेस और सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर पाएंगी, जिससे उनकी ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ जाएगी। भारतीय नौसेना का कहना है कि इससे मिशन की लागत भी कम होगी और समय भी बचेगा।

रूस के विदेश मामलों की समिति के उपाध्यक्ष व्याचेस्लाव निकोनोव ने पुष्टि की कि समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के लॉजिस्टिक नेटवर्क का आसानी से इस्तेमाल कर पाएंगे।

Rafale M India Navy: 2029 से नौसेना को मिलेंगे पहले चार राफेल-एम, एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर होंगे तैनात

Rafale M India Navy

Rafale M India Navy: भारतीय नौसेना के लिए आने वाले साल बेहद अहम साबित होने वाले हैं। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने बताया कि भारत को राफेल-एम (Rafale-Marine) फाइटर जेट की पहली खेप साल 2029 से मिलने लगेगी। उन्होंने यह बाात नौसेना दिवस 2025 से पहले आयोजित सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही। इस घोषणा के बाद भारत की कैरियर-बेस्ड एयर पावर को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं, क्योंकि नौसेना लंबे समय से एक आधुनिक मल्टी-रोल नेवी फाइटर जेट का इंतजार कर रही थी।

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एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि फ्रांस के साथ हुई इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत नौसेना को कुल 26 राफेल-एम मिलेंगे। इनमें 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर शामिल हैं। यह सौदा लगभग 64,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें ट्रेनिंग, सिम्युलेटर, एडवांस्ड वेपंस पैकेज, मेंटेनेंस सपोर्ट और परफॉर्मेंस-बेस्ड लॉजिस्टिक्स जैसी सुविधाएं जोड़ी गई हैं। नौसेना प्रमुख ने कहा कि “हम उम्मीद करते हैं कि 2029 तक चार राफेल-एम हमारे बेड़े का हिस्सा बन जाएंगे।” (Rafale M India Navy)

राफेल-एम के आने से भारत के दोनों एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर अब पूरी क्षमता के साथ आधुनिक फाइटर तैनात किए जा सकेंगे। नौसेना वर्तमान में मिग-29के फाइटर का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह बेड़ा धीरे-धीरे अपनी उम्र और तकनीकी सीमाओं को पार कर चुका है। मिग-29के की तुलना में राफेल-एम अधिक आधुनिक, भरोसेमंद और मल्टीफंक्शनल कैपेबिलिटीज वाला जेट है। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम को बोइंग F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट के विकल्प के तौर पर चुना गया था, जो मल्टी-रोल कैरियर बॉर्न फाइटर्स (MRCBF) प्रोग्राम के तहत इवैल्यूएशन के बाद फाइनल किया गया था। राफेल-एम नेवल वेरिएंट में मजबूत अंडरकैरिज और एक्सटेंडेड नोज है, जो कैरियर ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायुसेना में पहले से ही 36 राफेल जेट्स इस्तेमाल हो रहे हैं औऱ राफेल मरीन में 80 फीसदी से अधिक समानताएं हैं, जिससे इसके मेंटेनेंस में आसानी होगी। (Rafale M India Navy)

एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि राफेल-एम इसलिए भी खरीदे गए हैं क्योंकि स्वदेशी ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) अभी डेवलपमेंट के चरण में है। उम्मीद है कि यह विमान 2032 या 2033 तक सेवा में आएगा। इसलिए TEDBF आने तक राफेल-एम नौसेना के फाइटर डेक को मजबूत बनाए रखेगा और समुद्री अभियानों में निरंतर मारक क्षमता को सुनिश्चित करेगा। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम एक ऐसा फाइटर जेट है, जिसे विशेष रूप से समुद्री परिस्थितियों में ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, बियोंड विजुअल रेंज मिसाइलें, कैरियर-लैंडिंग हुक सिस्टम, और हाई-थ्रस्ट इंजन जैसी क्षमताएं हैं। इससे यह विमान लंबी दूरी तक टारगेट पर हमला कर सकता है और खराब मौसम में भी बेहतर काम करता है। फ्रांस की नौसेना इसका इस्तेमाल लंबे समय से कर रही है। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम के आने से नौसेना की स्ट्राइक कैपेबिलिटी, सर्वाइवेबिलिटी, और रिएक्शन टाइम में बड़ा सुधार होगा। दो एयरक्राफ्ट कैरियर पर राफेल-एम की तैनाती से भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी चुनौती का तेजी से सामना कर सकेगी। चीन के बढ़ते नौसैनिक प्रभाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Rafale M India Navy)

India SSBN Aridhaman: भारतीय नौसेना में जल्द शामिल होगी तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन, एडवांस लॉन्ग रेंज मिसाइलों से होगी लैस

India SSBN Aridhaman
CNS Admiral Dinesh K Tripathi on Navy Day 2025 Presser

India SSBN Aridhaman: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने पुष्टि की है कि भारत की नई न्यूक्लियर बैलिस्टिक सबमरीन आईएनएस अरिधमन बहुत जल्द नौसेना में शामिल की जाएगी। उन्होंने यह एलान भारतीय नौसेना दिवस 2025 से ठीक दो दिन पहले किया।

India SSBN Aridhaman: अरिधमन इस सीरीज की तीसरी पनडुब्बी

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि स्वदेश में बनाई गई यह पनडुब्बी देश की न्यूक्लियर डिटरेंस यानी प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूती देगी। उन्होंने इसे भारत के रणनीतिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इससे पहले 29 अगस्त 2024 में स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड ने दूसरी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) आईएनएस अरिघात को विशाखापट्टनम में कमीशन किया था। अब अरिधमन इस सीरीज की तीसरी पनडुब्बी होगी।

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आईएनएस अरिधमन को भारत की तीसरी एसएसबीएन है, जो आईएनएस अरिहंत और आीएनएस अरिघात की की तुलना में आकार में बड़ी और क्षमता में अधिक ताकतवर है। इसके बड़े आकार की वजह से इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली न्यूक्लियर-टिप्ड मिसाइलें ले जाने की क्षमता और बढ़ जाती है। इससे भारत की समुद्र आधारित न्यूक्लियर स्ट्राइक क्षमता पहले से कहीं अधिक ताकतवर हो जाएगी।

अरिधमन में एडवांस मिसाइलें लगाने की तैयारी

आईएनएस अरिघात में के-4 मिसाइलें लगाई जा सकती हैं, जिनकी रेंज लगभग 3,000 किलोमीटर है। आईएनएस अरिहंत के पास के-15 मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज 750 किलोमीटर मानी जाती है। अरिधमन में और भी एडवांस मिसाइलें लगाने की तैयारी है, जिससे यह पनडुब्बी गहरे समुद्र से लंबी दूरी तक वार करने में सक्षम होगी। सूत्रों के मुताबिक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के साथ जारी तनाव के बीच अरिधमन भारत के लिए एक भरोसेमंद रणनीतिक प्रतिरोधक भूमिका निभाएगी।

नो फर्स्ट यूज नीति

भारत की एसएसबीएन सीरीज देश की नो फर्स्ट यूज नीति का एक प्रमुख स्तंभ है। एनएफयू का मतलब है कि भारत पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेगा, लेकिन यदि कोई देश भारत पर हमला करता है तो भारत मजबूत सेकंड-स्ट्राइक यानी जवाबी न्यूक्लियर हमला करने में सक्षम रहेगा। ऐसी स्थिति में एसएसबीएन की भूमिका सबसे अहम होती है, क्योंकि ये पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र में छिपी रह सकती हैं और किसी भी हमले के बाद सुरक्षित रहकर जवाबी स्ट्राइक कर सकती हैं।

यह पनडुब्बियां समुद्र की सतह से सैकड़ों मीटर नीचे, बिना किसी बाहरी संपर्क के, कई दिनों तक छिपी रह सकती हैं। इसी कारण इन्हें किसी देश के न्यूक्लियर ट्रायड (लैंड-एयर-सी क्षमता) का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। अरिहंत-क्लास की ये एसएसबीएन भारत को यह भरोसा देती हैं कि किसी भी संकट की स्थिति में देश की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर नहीं पड़ेगी।

चीन के पास छह जिन-क्लास एसएसबीएन

भारत की एसएसबीएन क्षमता की तुलना अगर चीन से की जाए तो चीन के पास अभी छह जिन-क्लास एसएसबीएन हैं, जिनमें जेएल-3 मिसाइलें लगाई जाती हैं। इन जेएल-3 मिसाइलों की रेंज करीब 10,000 किलोमीटर मानी जाती है। चीन के पास छह न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (एसएसएन) भी हैं। वहीं अमेरिका के पास 14 ओहियो-क्लास एसएसबीएन और 53 एसएसएन हैं। भारत अभी एसएसबीएन निर्माण के शुरुआती लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में है।

आईएनएस अरिधमन का निर्माण भारत की स्वदेशी क्षमता का प्रतीक है। यह पनडुब्बी विशाखापट्टनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में तैयार की गई है। इसमें न्यूक्लियर पावर प्लांट, एडवांस्ड सोनार सिस्टम, नेविगेशन टेक्नोलॉजी और स्टील्थ फीचर्स शामिल हैं, जो इसे किसी भी दुश्मन की निगरानी से लगभग अदृश्य बना देती हैं। नौसेना अधिकारियों के अनुसार, इस पनडुब्बी का पूरा फोकस भारत की समुद्री सुरक्षा को और मजबूत करना है।

एसएसबीएन प्रोजेक्ट से मिलीं कई सीखें

भारत के एसएसबीएन प्रोजेक्ट का उद्देश्य समंदर से न्यूक्लियर स्ट्राइक क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित करना है। आईएनएस अरिहंत की पहली ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट से लेकर अरिघात तक भारत ने कई तकनीकी सीखें हासिल कीं। अरिधमन में इन सभी अनुभवों को और बेहतर स्तर पर लागू किया गया है। यह एसएसबीएन लंबी दूरी, ज्यादा हथियार ले जाने की क्षमता और हाई लेवल के स्टील्थ के साथ समुद्र में एक मजबूत सैन्य उपस्थिति देगी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कदम ईस्ट चाइना सी, साउथ चाइना सी और इंडियन ओशन रीजन में बनने वाले सुरक्षा दबावों के बीच बेहद महत्वपूर्ण है। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों और उसकी एसएसबीएन क्षमता को देखते हुए भारत का यह कदम रणनीतिक रूप से बहुत मायने रखता है।

आईएनएस वाघशीर सबमरीन इस साल साल हुई शामिल

भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश ने बताया कि पिछले एक साल में नौसेना ने अपनी ताकत में काफी बढ़ोतरी की है। उन्होंने बताया कि नौसेना ने कई अहम युद्धपोतों को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिससे भारत की समुद्री निगरानी, सुरक्षा और स्ट्राइक क्षमता पहले से अधिक मजबूत हुई है। एडमिरल त्रिपाठी के अनुसार, जनवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएस वाघशीर को कमीशन किया था। यह पनडुब्बी स्कॉर्पीन क्लास का हिस्सा है और आधुनिक हथियारों तथा एडवांस तकनीक से लैस है।

एक साल में एक पनडुब्बी समेत 13 नए युद्धपोत नौसेना का हिस्सा

इसके साथ ही नौसेना ने आईएनएस उदयगिरी को भी बेड़े में शामिल किया। यह खास जहाज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया 100वां स्वदेशी युद्धपोत है। नौसेना के अनुसार, इस उपलब्धि ने भारत की स्वदेशी युद्धपोत निर्माण क्षमता को एक नई पहचान दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि पिछले एक साल में एक पनडुब्बी समेत कुल 13 नए युद्धपोत नौसेना का हिस्सा बने हैं। इन नए जहाजों के शामिल होने से समुद्र में भारत की मौजूदगी और मॉनिटरिंग क्षमता काफी बढ़ गई है। नौसेना के अधिकारी मानते हैं कि इनसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में लगातार निगरानी रखना आसान होगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।

पनडुब्बियों में महिलाओं को जगह

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का भी जिक्र किया गया। एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि नौसेना अब पनडुब्बियों में महिलाओं को शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पहले भारत में महिला अधिकारियों को पनडुब्बियों में जगह नहीं दी जाती थी, लेकिन अब यह नीति बदली जा रही है। नौसेना चीफ ने कहा कि जल्द ही महिलाएं भी पनडुब्बी अधिकारी के रूप में सेवा दे सकेंगी। इसे नौसेना में एक बड़ा सामाजिक और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे युवा महिलाओं के लिए समुद्री रक्षा क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे और नौसेना में विविधता व प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

साइबर हमलों, ड्रोन-आधारित खतरों से निपटने की तैयारी

एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना बदलते वैश्विक माहौल में हर चुनौती का सामना करने के लिए खुद को लगातार तैयार कर रही है। उन्होंने बताया कि नौसेना साइबर हमलों, ड्रोन-आधारित खतरों और समुद्री घुसपैठ जैसे नए खतरों से निपटने के लिए अपनी ऑपरेशनल रेडिनेस को और बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, मजबूत प्रशिक्षण और नए प्लेटफॉर्म नौसेना की क्षमता को और ऊंचाई दे रहे हैं।

Tejas Mk1 Crash: तेजस में लगी थी मार्टिन बेकर की जीरो इजेक्शन सीट, फिर भी पायलट क्यों नहीं कर पाया इजेक्ट?

Tejas Mk1 Crash- why the pilots were unable to eject and how all previous ejections were successful

Tejas Mk1 Crash: दुबई एयरशो 2025 में भारतीय वायुसेना का तेजस एमके-1 फाइटर जेट शुक्रवार दोपहर 3:40 बजे क्रैश हो गया। यह हादसा उस समय हुआ जब विमान एयरशो में लो-लेवल एयर डिस्प्ले कर रहा था। इस दुर्घटना में भारतीय वायुसेना के अनुभवी पायलट विंग कमांडर नमांश स्याल की मौत हो गई। यह घटना न सिर्फ भारतीय वायुसेना के लिए, बल्कि भारत के स्वदेशी तेजस प्रोग्राम के लिए भी एक गहरी क्षति मानी जा रही है। वहीं, अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जब उसमें जीरो इजेक्शन सीट लगी थी, तो पायलट क्यों नहीं इजेक्ट कर पाया।

Tejas Mk1 Crash: मैन्यूवर करने की कोशिश

यह हादसा दोपहर के समय हुआ जब तेजस एमके-1 अपने तय फ्लाइंग प्रोफाइल के तहत लो-लेवल मैन्यूवर दिखा रहा था। एयरशो के दौरान तेजस ने जैसे ही नीचे की ओर मुड़कर एक तेज मैन्यूवर करने की कोशिश की, तो विमान की पावर अचानक कम होती दिखाई दी। सोशल मीडिया (Tejas Mk1 Crash) पर आए वीडियो में देखा गया कि तेजस नोजडाउन पोजिशन में लगभग सीधी लाइन में नीचे गिरने लगा। इसकी ऊंचाई बहुत कम थी और विमान कुछ ही सेकंड में जमीन से टकरा गया और आग का गोला बन गया।

Tejas Mk1 Crash: पिछले साल जैसलमेर में हुआ था पहला तेजस हादसे का शिकार, जानें क्या थी दुर्घटना की वजह

हादसे के तुरंत बाद दुबई एयरशो के अधिकारियों और भारतीय वायुसेना ने पुष्टि की कि विमान में विंग कमांडर नमांश स्याल ही उड़ान भर रहे थे। वे नंबर 45 स्क्वाड्रन फ्लाइंग ड्रैगर के बहादुर और अनुभवी पायलट माने जाते थे। उन्होंने कई बार एरो इंडिया और कई अंतरराष्ट्रीय एयरशो में तेजस उड़ाया था। यह वही स्क्वाड्रन है जिसने तेजस की पहली ऑपरेशनल उड़ानें शुरू की थीं।

वीडियो में कहीं भी विमान से इजेक्शन (Tejas Mk1 Crash) का कोई संकेत नहीं दिखा। न कैनोपी उड़ती दिखी, न पैराशूट। इसका मतलब यह था कि इजेक्शन नहीं हो पाया। सवाल यह उठा कि जब तेजस में दुनिया की सबसे एडवांस्ड जीरो-जीरोo इजेक्शन सीट लगे होने के बावजूद आखिर इजेक्शन क्यों नहीं हुआ?

Tejas Mk1 Crash: क्या है जीरो-जीरो का मतलब

तेजस में लगी इजेक्शन सीट (Tejas Mk1 Crash) मार्टिन बेकर एमके-16एलई दुनिया की सबसे भरोसेमंद जीरो-जीरो सीटों में से गिनी जाती है। जीरो-जीरो का मतलब है कि विमान जमीन पर रुका हो, तब भी सीट पायलट की जान बचा सकती है। यह सीट दो स्टेज में काम करती है, पहले कैनोपी उड़ती है, फिर सीट को रॉकेट मोटर ऊपर और दूर ले जाती है। इसके बाद पायलट से सीट अलग होती है और पैराशूट खुलता है।

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इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 2 से 4 सेकंड का समय लगता है। लेकिन इस प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से पूरा करने के लिए कम से कम 200 से 300 फीट की ऊंचाई की जरूरत होती है। यही कारण है कि लो-लेवल फ्लाइंग में इजेक्शन बेहद मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यही बात इस हादसे में भी लागू हुई।

Tejas Mk1 Crash: शून्य सेकंड की होती है विंडो

रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का कहना है कि लो-लेवल एरोबैटिक्स (Tejas Mk1 Crash) में अगर सिंक रेट यानी गिरने की स्पीड बहुत ज्यादा हो तो इजेक्शन का “विंडो” बहुत छोटा हो जाता है। कभी-कभी यह विंडो शून्य सेकंड की होती है। इस स्थिति में पायलट के पास हैंडल खींचने का समय ही नहीं बचता। वे कहते हैं कि वीडियो में तेजस जिस स्पीड से नीचे जा रहा था, उसमें इजेक्शन के लिए जरूरी समय पायलट को नहीं मिल सका।

Tejas Mk1 Crash: फिजिक्स की सीमा से बाहर कुछ नहीं

वहीं, रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन संजीव कपूर का कहना है कि तेजस की सीट जीरो-जीरो है, लेकिन लॉजिक यही है कि फिजिक्स की सीमा से बाहर कुछ नहीं। अगर विमान (Tejas Mk1 Crash) बहुत तेजी से नीचे गिर रहा हो और ऊंचाई बहुत कम हो, तो सीट को ऊपर उठाने और पायलट को पैराशूट पर लाने का समय नहीं मिलता। उनकी राय में, यह भी संभव है कि पायलट आखिरी पल तक विमान को रिकवर करने की कोशिश कर रहे हों, क्योंकि एयरशो में पायलट हमेशा दर्शकों और ग्राउंड क्रू को सुरक्षित रखने को प्राथमिकता देते हैं।

Tejas Mk1 Crash: रिकवरी में लगा टाइम

कई अंतरराष्ट्रीय एविएशन विश्लेषकों (Tejas Mk1 Crash) ने भी यही कहा है कि लो-लेवल डिस्प्ले में पायलट जितना समय रिकवरी में लगाते हैं, उतना ही समय इजेक्शन का मौका कम कर देता है। वीडियो देखकर यही लगता है कि विमान का नियंत्रण अचानक खो गया और नीचे आते-आते इजेक्शन की संभावना खत्म हो गई। उनका कहना है कि इसके साथ-साथ फिर से यह सवाल खड़ा हो गया कि लो-लेवल एरोबैटिक्स में सुरक्षा को कैसे और मजबूत किया जा सकता है।

अब सवाल यह है कि तेजस का कुल सुरक्षा रिकॉर्ड कैसा है? तेजस प्रोग्राम 24 साल पुराना है और इस दौरान इसके सभी इजेक्शन पूरी तरह सफल रहे हैं। यह तेजस की क्षमता और उसकी इजेक्शन सीट की विश्वसनीयता दोनों को सिद्ध करता है।

Tejas Mk1 Crash: तेजस में अब तक चार बार इजेक्शन

तेजस के परीक्षण और ऑपरेशनल उड़ानों के दौरान अब तक चार बार इजेक्शन हुआ है। पहला इजेक्शन 2001 में हुआ था, जब इसके टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर की टेस्ट फ्लाइट के दौरान पायलट ने सुरक्षित निकलकर अपनी जान बचाई। दूसरा इजेक्शन 2006 में राजस्थान में हुआ। वह भी पूरी तरह सफल रहा। तीसरा केस 2014 में हुआ जब नेवल प्रोटोटाइप एनपी-2 गोवा के समुद्र में टेस्ट फ्लाइट के दौरान क्रैश हो गया। उस समय भी पायलट सुरक्षित रहे। वहीं, चौथा इजेक्शन मार्च 2024 में हुआ जब एक ट्रेनर वैरिएंट जैसलमेर के पास उड़ान भरते समय तकनीकी दिक्कत के चलते क्रैश हुआ। लेकिन पायलट पूरी तरह सुरक्षित ईजेक्ट जो गया।

इन सभी मामलों में मार्टिन बेकर एमके-16एलई सीट ने 100 फीसदी सफलता के साथ पायलट की जान बचाई। आज तक तेजस के किसी भी उड़ान मामले में इजेक्शन सीट ने फेल नहीं किया था। लेकिन यह पहली बार है जब पायलट को सीट का इस्तेमाल करने का मौका ही नहीं मिल पाया।

दुबई एयरशो हादसे (Tejas Mk1 Crash) के बाद भारतीय वायुसेना ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी नियुक्त कर दी है। जांच टीम ब्लैक बॉक्स, वीडियो फुटेज, राडार डेटा और विमान के अवशेषों की मदद से दुर्घटना के वास्तविक कारणों पता करेगी। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह इंजन फेल्यर था, कंट्रोल लॉस था या फ्लाइट प्रोफाइल का मिसमैनेजमेंट।

तेजस प्रोग्राम से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि हादसे से सीख जरूर मिलेगी, लेकिन यह विमान की तकनीकी योग्यता पर सवाल नहीं उठाता। तेजस ने दुनिया भर में कई एयरशो में अपनी क्षमता दिखाई है और भारतीय वायुसेना के बेड़े में यह एक भरोसेमंद लड़ाकू माना जाता है।

Tejas Mk1 Crash: पिछले साल जैसलमेर में हुआ था पहला तेजस हादसे का शिकार, जानें क्या थी दुर्घटना की वजह

Tejas Mk1 Crash- Wg Cdr Namansh Syal
Tejas Mk1 Crash- Wg Cdr Namansh Syal

Tejas Mk1 Crash: दुबई एयर शो में डिस्प्ले एरोबैटिक्स के दौरान भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस एमके1 हादसे का शिकार हो गया। यह हादसा उस समय हुआ, जब तेजस एरोबैटिक डिस्प्ले के दौरान बेहद लो-लेवल पर एक तेज मैन्यूवर कर रहा था। कुछ ही सेकंड के अंदर विमान का संतुलन बिगड़ गया और वह तेजी से जमीन की ओर गिर गया। टक्कर के साथ ही विमान आग की एक बड़ी लपट में बदल गया। इस दुखद हादसे में भारतीय वायुसेना के अनुभवी पायलट विंग कमांडर नमन स्याल की मौत हो गई।

Tejas Mk1 Crash: बेहद अनुभवी पायलट थे विंग कमांडर नमन स्याल

हिमाचल प्रदेश के रहने वाले विंग कमांडर नमन स्याल तमिलनाडु स्थित सुलुर एयरबेस की नंबर 45 स्कवॉड्रन फ्लाइंग ड्रैगर्स का हिस्सा थे। यह वही स्क्वाड्रन है, जिससे तेजस की पहली ऑपरेशनल उड़ानें शुरू हुई थीं। नमन स्याल कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एयरशो में तेजस उड़ाकर अपने स्किल्स दिखा चुके थे और वे बेहद अनुभवी पायलट थे। लेकिन शुक्रवार को हुए हादसे में विमान की ऊंचाई इतनी कम थी कि ईजेक्शन की संभावना ही नहीं बची।

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भारतीय वायुसेना ने बयान जारी कर बताया कि हादसे की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का गठन किया गया है। वीडियो से यह साफ दिख रहा है कि विमान ने अचानक नियंत्रण खो दिया और पायलट ने आखिरी क्षण तक उसे आबादी वाले क्षेत्र से दूर ले जाने की कोशिश की।

तेजस विमान का यह क्रैश कई कारणों से गंभीर माना जा रहा है। तेजस कार्यक्रम भारत का सबसे महत्वाकांक्षी स्वदेशी फाइटर जेट प्रोजेक्ट है, जिस पर देश को दशकों से गर्व रहा है। एचएएल ने तेजस को डिजाइन और डेवलप किया है। विमान में जनरल इलेक्ट्रिक एफ404-इन20 इंजन लगा है।

Tejas Mk1 Crash- Wg Cdr Namansh Syal
Wg Cdr Namansh Syal

Tejas Mk1 Crash: 12 मार्च 2024 को पहला तेजस हुआ था हादसे का शिकार

लेकिन तेजस के साथ यह पहला हादसा नहीं है। अपनी 24 साल की ऑपरेशनल हिस्ट्री में 2001 में अपनी पहली उड़ान के बाद से यह तेजस के साथ दूसरा हादसा है। दुबई एयर शो से ठीक एक साल पहले, 12 मार्च 2024 में राजस्थान के जैसलमेर-पोखरण में भी एक तेजस एमके1 विमान क्रैश हुआ था। हालांकि उस घटना में पायलट सुरक्षित ईजेक्ट कर गया था। टेल नंबर एलए-5033 तेजस एमके1 को विंग कमांडर विभव पांडे उड़ा रहे थे। वे उस समय सुलुर स्थित नंबर 18 स्क्वाड्रन फ्लाइंग बुलेट्स का हिस्सा थे। एक ट्रेनिंग मिशन के दौरान इंजन फेल्यर हुआ। हालांकि उन्होंने बहुत कम ऊंचाई पर भी सफलतापूर्वक ईजेक्ट किया और पूरी तरह सुरक्षित बच गए ।

इंजन सीजर थी वजह

उस क्रैश की जांच में सामने आया कि दुर्घटना की वजह इंजन सीजर थी, जो ऑयल पंप फेल्यर की वजह से हुआ था। हालांकि उस क्रैश की एयरफोर्स ने इंटरनल इन्क्वॉयरी की थी। लेकिन उसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। हादसे से पहले इंजन को लुब्रिकेशन नहीं मिला और वह अचानक बंद हो गया। उस घटना के बाद वायुसेना ने तेजस फ्लीट की पूरी इंजन हेल्थ मॉनिटरिंग कराई। जीई एफ404 इंजन की चेकलिस्ट अपडेट की गई, लेकिन कोई बड़ी तकनीकी कमी नहीं पाई गई।

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अब दुबई एयर शो में हुए क्रैश ने फिर से तेजस की सुरक्षा और भरोसे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर इसलिए क्योंकि यह हादसा अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुआ है। भारत पिछले कुछ वर्षों से तेजस को विदेशी देशों में बेचने की कोशिश कर रहा है। कई देशों जैसे मलेशिया, अर्जेंटीना और ब्राजील ने तेजस में रुचि दिखाई थी। इस क्रैश से भारत के रक्षा निर्यात अभियान को भी झटका लग सकता है।

4 जनवरी 2001 को तेजस की पहली उड़ान

4 जनवरी 2001 को इंडियन एयर फोर्स के विंग कमांडर राजीव कोठियाल ने टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर टीडी-1 की पहली उड़ान सफलतापूर्वक भरी थी। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बाद में इस एयरक्राफ्ट का नाम लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट “तेजस” रखा, जिसका मतलब संस्कृत में “चमक” होता है।

इसके बाद भारतीय वायुसेना ने 20 एलसीए एमके1 आईओसी और 20 एलसीए एमके1 एफओसी मानक के विमान खरीदने का आदेश दिया। 2025 तक इनमें से 38 विमान वायुसेना को मिल चुके हैं। 2021 में सरकार ने 48,000 करोड़ रुपये में 83 एमके1ए विमानों का बड़ा ऑर्डर दिया। सितंबर 2025 में वायुसेना ने 97 अतिरिक्त एमके1ए का और ऑर्डर एचएएल को दिया।

तेजस एमके1ए की बड़े पैमाने पर डिलीवरी 2026-2030 के बीच होने की योजना है। इसके अलावा तेजस एमके2 जैसे एडवांस वर्जन पर भी काम चल रहा है।

दुबई एयर शो में तेजस की मौजूदगी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। तेजस ने पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय अभ्यासों जैसे यूके में कोबरा वारियर, यूएई में डेजर्ट फ्लैग और 2016 के बहरीन एयरशो में अपनी क्षमता दिखाई थी। तरंग शक्ति 2024 के दौरान तेजस ने यूरोफाइटर टायफून को सिमुलेटेड कॉम्बैट में इंटरसेप्ट किया था, जो बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन दुबई एयर शो 2025 की यह दुर्घटना तेजस प्रोग्राम के लिए वाकई चुनौती लेकर आई है। हादसा ऐसे समय पर हुआ है जब भारत दुनिया को अपने स्वदेशी फाइटर जेट की क्षमता दिखाना चाहता है और रक्षा निर्यात को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

हादसे का शिकार हुए तेजस विमान का टेल नंबर एलए-5025 था। यह 2021-22 के आसपास एचएएल नासिक में बना था। यह वही विमान था जिसने एरो इंडिया 2023 और 2025 में शानदार एरोबैटिक्स दिखाए थे।

दुर्घटना की सटीक वजह कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के बाद ही साफ हो पाएगी, लेकिन वीडियो से शुरुआती संकेत लो-एल्टीट्यूड कंट्रोल लॉस की ओर इशारा करते हैं। पायलट ने आखिरी पलों तक विमान को आबादी वाले क्षेत्र से दूर ले जाने की कोशिश की। हादसे के बाद क्रैश साइट को सुरक्षा बलों ने घेर लिया। दुबई अथॉरिटीज ने संयुक्त जांच का प्रस्ताव दिया है। भारतीय वायुसेना ने अपनी तरफ से तकनीकी डेटा और ब्लैक बॉक्स की जांच का काम शुरू कर दिया है।

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Tejas Crash Dubai:: Tejas Mk1 crash Court of Inquiry India
Tejas Mk1 crash

Tejas Mk1 crash: दुबई एयर शो 2025 में शुक्रवार दोपहर 3.40 बजे (भारतीय समयानुसार) एक दुखद हादसा हो गया, जब भारतीय वायुसेना का हल्का स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1 फ्लाइंग डिस्प्ले के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस घटना से दुनिया भर के एविएशन एक्सपर्ट्स भी हैरान हैं।

तेजस विमान भारतीय वायुसेना का स्वदेशी रूप से विकसित हल्का लड़ाकू विमान है, जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाया है। इस विमान का पिछले कई सालों में बेहतरीन उड़ान रिकॉर्ड रहा है और कई अंतरराष्ट्रीय शो में हिस्सा लिया है। लेकिन दुबई में हुई यह दुर्घटना पूरे तेजस कार्यक्रम के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है। ये तेजस प्रोग्राम का दूसरा क्रैश है। इससे पहला क्रैश मार्च 2024 में जैसलमेर, राजस्थान में हुआ था, जहां पायलट सेफ ईजेक्ट कर गया था।

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Tejas Mk1 crash: क्या पायलट डिसऑरिएंटेशन है हादसे की वजह?

दुर्घटना के शुरुआती वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं। वीडियो में साफ दिखता है कि तेजस ऊंचाई से बहुत तेज नोज डाउन एंगल (नाक नीचे झुकाकर गोता) में उतरता दिखाई देता है। यह गोता इतना तेज था कि विमान जमीन से टकराते ही तेज धमाके के साथ आग के गोले में बदल गया। पास में मौजूद सुरक्षा कर्मचारियों ने तुरंत आग बुझाने की कोशिश की और जगह को घेर लिया। अभी तक अनुमान लगाए जा रहे हैं कि यह हादसा पायलट डिसऑरिएंटेशन के चलते हुआ है।

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Tejas Mk1 crash: वायुसेना ने जारी किया बयान

भारतीय वायुसेना ने हादसे पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि यह घटना बेहद दुखद है। भारतीय वायुसेना ने बताया, “भारतीय वायुसेना इस हादसे पर गहरा दुख व्यक्त करती है। दुर्घटना में जान जाने की खबर दुखद है। घटना के कारणों का पता लगाने के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी गठित की जा रही है।”

वीडियो फुटेज के आधार पर कई शुरुआती संकेत मिले हैं, लेकिन जब तक फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर, कॉकपिट रिकॉर्डर, और सभी तकनीकी पैरामीटरों की जांच नहीं होती, तब तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी शुरुआती वीडियो देखकर कुछ बातें सामने आई हैं।

Tejas Mk1 crash: क्या है पहली संभावना

वीडियो में यह साफ दिखता है कि विमान तेजी से नीचे आते समय शायद किसी हाई-एनर्जी टर्न (तेज मोड़) या हाई-जी मैनुवर मैन्यूवर (तेज जी-फोर्स वाले करतब) के दौरान कंट्रोल खो बैठा। तेजस जैसे फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम वाले विमान में कंट्रोल कंप्यूटर हैंडल करता है। यदि किसी वजह से सेंसर डेटा गड़बड़ हो जाए या कंट्रोल सरफेस सही काम न करें, तो विमान अचानक तेज गोता लगा सकता है।

तकनीकी गड़बड़ी या इंजन बंद

दूसरी संभावना यह भी मानी जा रही है कि विमान के इंजन या किसी अन्य सिस्टम में अचानक कोई तकनीकी गड़बड़ी आ गई हो। हालांकि हादसे से ठीक पहले के वीडियो में इंजन की आवाज सामान्य सुनाई दे रही है, जिससे इंजन बंद होने यानी फ्लेमआउट की संभावना कम ही मानी जा रही है।

जी-फोर्स के चलते पायलट जी-लॉक?

सूत्रों का कहना है कि तेज जी-फोर्स के चलते पायलट को जी-लॉक (जी-फोर्स इंड्यूस्ड लॉस ऑफ कॉन्शियसनेस) हो सकता है। ऐसे मामलों में पायलट कुछ सेकंड के लिए बेहोश या भ्रमित हो जाता है, और यदि विमान जमीन के बहुत करीब हो तो बचने का समय ही नहीं मिलता।

क्या गर्म मौसम है वजह

दुबई के गर्म और सूखे मौसम में भी उड़ान के दौरान हवा में धूल या गर्म हवा की वजह से विमान के प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौसम वजह था या नहीं।

दुर्घटना के तुरंत बाद एयर शो के आयोजकों ने फ्लाइंग प्रोग्राम को अस्थाई रूप से रोक दिया। सुरक्षा टीमें और फायर यूनिट मौके पर पहुंचीं और आग को पूरी तरह काबू में किया। हादसे की जगह को सील कर तकनीकी जांच शुरू कर दी गई है। दुबई प्रशासन और भारतीय वायुसेना मिलकर संयुक्त जांच करेंगे।

तेजस एमके-1 का अब तक रिकॉर्ड बहुत सुरक्षित रहा है। यह विमान कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उड़ान प्रदर्शन कर चुका है और इसे दुनिया के हल्के लड़ाकू विमानों में यह भरोसेमंद नाम है।

भारतीय वायुसेना ने यह भी स्पष्ट किया कि हादसे के कारणों पर केवल अनुमान नहीं लगाया जा सकता और सभी तथ्य सामने आने के बाद ही आधिकारिक रिपोर्ट जारी की जाएगी।

दुबई एयर शो में तेजस की भागीदारी भारत की डिफेंस डिप्लोमेसी के लिए महत्वपूर्ण थी। तेजस के कई संभावित विदेशी ग्राहक इस शो में मौजूद थे, और इसका लाइव डिस्प्ले भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा था।