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Theatre Commands India: जोर-शोर से चल रही है नए थिएटर कमांड बनाने की तैयारी, सरकार को जल्द सौंपा जाएगा ब्लूप्रिंट

Theatre Commands India

Theatre Commands India: रक्षा मंत्रालय ने देश में नये थिएटर कमांड बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। मंत्रालय का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध ऐसे तरीके से लड़े जाएंगे, जिनमें तीनों सेनाओं आर्मी, नेवी और एयरफोर्स का एक साथ और बेहद समन्वित तरीके से काम करना जरूरी होगा। इसी उद्देश्य से थिएटर कमांड का स्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है। यह काम डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए की देखरेख में चल रहा है और इसका नेतृत्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान कर रहे हैं।

Theatre Commands India: ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीखें भी शामिल

डीएमए ने तीनों सेनाओं के बीच इंटीग्रेशन बढ़ाने की तैयारी पहले ही शुरू कर दी थी। अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस प्रक्रिया ने और रफ्तार पकड़ ली है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं की संयुक्त कार्रवाई ने यह दिखाया था कि इंटीग्रेटेड कमान स्ट्रक्चर कितना जरूरी है। इसी के चलते कारण इस ऑपरेशन से मिली कई सीखों को सीधे थिएटर कमांड (Theatre Commands India) के स्ट्रक्चर में शामिल किया जा रहा है।

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सूत्रों के अनुसार, डीएमए और तीनों सेनाओं के बीच होने वाली बैठकों की संख्या बढ़ा दी गई है ताकि हर बिंदु पर विस्तार से चर्चा की जा सके। मंत्रालय की कोशिश है कि कमान स्ट्रक्चर पर तैयार प्रस्ताव जल्द ही कैबिनेट स्तर तक पहुंचे और आगे की स्वीकृति पूरी हो सके। इसके लिए काम लगभग 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है। और मॉडल में उन बदलावों को जोड़ा रहा है जो सिंदूर के अनुभवों से सामने आए।

पहले ही इस बात पर सहमति बन चुकी है कि देश में तीन बड़े थिएटर कमांड (Theatre Commands India) बनेंगे। पहली कमांड तिरुवनंतपुरम में होगी, जो समुद्र और महासागरीय इलाकों से आने वाले खतरों से निपटेगी। यह भारत का मैरिटाइम थिएटर कमांड कहलाएगा। दूसरी कमांड जयपुर में बनेगी, जिसे पश्चिमी सीमाओं से जुड़े संभावित खतरों की जिम्मेदारी दी जाएगी। जबकि तीसरी कमांड लखनऊ में बनेगी, जिसका फोकस उत्तरी सीमाओं खासकर चीन के साथ लगती सीमा पर होगा।

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रक्षा सूत्रों के मुताबिक, तीनों सेनाएं जल्द ही इस विषय पर अपनी अंतिम चर्चा पूरी कर लेंगी। इसके बाद यह प्रस्ताव रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के सामने पेश किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और अब आखिरी स्टेज पर है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी इस साल अक्टूबर में कहा था कि थिएटर कमांड्स (Theatre Commands India) का फॉर्मल प्रपोजल “मैच्योर स्टेज” पर है और सरकार को भेजने को तैयार है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर में कोलकाता 15 सितंबर को हुई कम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में थिएटर कमांड (Theatre Commands India) पर विस्तार से चर्चा की थी। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं के जॉइंट ऑपरेशन की सराहना भी की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सशस्त्र बलों के टॉप कमांडर्स को संबोधित करते हुए अपना मंत्र JAI दिया था। जिसका मतलब जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन था। पीएम मोदी ने कहा था कि 2025 को रक्षा सुधारों का वर्ष घोषित किया गया है, और JAI ही भारतीय सशस्त्र बलों की सफलता का मंत्र है। उन्होंने कहा था कि जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन से हम हर चुनौती का मुकाबला करेंगे। उन्होंने रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया था कि ग्रेटर जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन के लिए ठोस और तेज कदम उठाए जाएं, ताकि बदलते युद्धक्षेत्र में हम हर स्थिति में विजयी रहें।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एयरफोर्स ने पाकिस्तान एयरफोर्स के कई ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया था, जिससे पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए मजबूर होना पड़ा। माना जा रहा है कि इस ऑपरेशन ने ही जॉइंट कमांड की जरूरत को और मजबूत किया।

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ऑपरेशंस रूम में मौजूद सभी सर्विस चीफ के साथ मिलकर सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कई अहम फैसले लिए। वही मॉडल भविष्य की थिएटर कमांड (Theatre Commands India) स्ट्रक्चर का बेस माना जा रहा है। बता दें कि 2025 की शुरुआत से ही तीनों सर्विस चीफ्स और सीडीएस के बीच थिएटर कमांड को लेकर पूर्ण सहमति बन चुकी है। जनवरी 2025 से चीफ्स ने एक-दूसरे की सर्विस से एडीसी (एड-दे-कैंप) रखना भी शुरू कर दिया था।

डीएमए तीनों सेनाओं के नेटवर्क को जोड़ने का एक और बड़ा प्रोजेक्ट भी चला रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि किसी भी ऑपरेशन के दौरान तीनों सेनाएं एक-दूसरे से बिना किसी तकनीकी रुकावट के जुड़ी रहें। यह नेटवर्क युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि शांति काल में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे जानकारी का आदान-प्रदान तेज होगा और जॉइंट ऑपरेशन की क्षमता और बढ़ेगी।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि थिएटर कमांड (Theatre Commands India) देश को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करेंगे। आधुनिक युद्ध कई डोमेन जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस में फैले होते हैं । ऐसे में अलग-अलग सेनाओं के बीच की दूरी कम करना और इंटीग्रेटेड स्ट्रक्चर बनाना अब एक जरूरत बन चुका है। डीएमए की यही कोशिश है कि इस स्ट्रक्चर में हर सर्विस की ताकत शामिल हो और तीनों सेनाएं एक टीम की तरह काम कर सकें।

तीन नए थिएटर कमांड्स (Theatre Commands India) को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा चल रही थी, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर ने इसे रफ्तार दी है। अब मंत्रालय जल्द से जल्द इन स्ट्रक्चर को अंतिम रूप देने के प्रयास में है। सूत्रों का कहना है कि 2025 आखिर या 2026 की शुरुआत में ब्लूप्रिंट सरकार को सौंप दिया जाएगा। वहीं, कैबिनेट कमेटी ऑव सिक्योरिटी के अप्रूवल के बाद रोलआउट कर दिया जाएगा। वहीं ग्राउंड पर पूरी तरह लागू होने में 12-18 महीने का वक्त लगेगा।

ऑपरेशन सिंदूर से मिले ये सबक 

ऑपरेशन सिंदूर का पहला बड़ा सबक यह था कि सर्विस चीफ्स को सिर्फ ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक जिम्मेदारियों तक सीमित रखना काफी नहीं है। सिंदूर के दौरान तीनों सेवाओं के चीफ्स ने सीडीएस के साथ मिलकर वॉर रूम में रियल टाइम ऑपरेशनल फैसले लिए थे। यह बात अब थिएटर कमांड (Theatre Commands India) के डिजाइन में शामिल की जा रही है। नए मॉडल में सर्विस चीफ्स की ऑपरेशनल भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक होगी और उनकी जिम्मेदारियां थिएटर कमांडर के साथ संतुलित की जाएंगी।

इस ऑपरेशन ने यह भी साफ किया कि एयर पावर ही निर्णायक भूमिका निभाती है। वायुसेना की प्रिसिजन-स्ट्राइक क्षमता और ड्रोन-मिसाइल कॉम्बिनेशन ने पाकिस्तान के कई महत्वपूर्ण एयरबेस और सैन्य पोस्ट एक ही रात में नष्ट कर दिए। इसलिए थिएटर कमांड्स में एयर एसेट्स को अलग-अलग कमांड्स (Theatre Commands India) में बांटने के बजाय उन्हें सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल में रखा जाएगा, ताकि महत्वपूर्ण एयर ऑपरेशनों में तेजी बनी रहे।

सिंदूर के समय तीनों सेवाओं के डिजिटल नेटवर्क को जोड़कर एक संयुक्त तस्वीर बनाई गई थी, जिसने ऑपरेशन को सफल बनाया, लेकिन इस दौरान यह भी महसूस हुआ कि इस नेटवर्क को और मजबूत करना जरूरी है। इसी वजह से डीएमए अब तीनों सेवाओं के कम्युनिकेशन सिस्टम को पूरी तरह जोड़ने वाले प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, ताकि युद्ध के दौरान ही नहीं, बल्कि पीस टाइम में भी सेनाओं के बीच रियल-टाइम सूचनाओं का आदान-प्रदान हो।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक और अहम जरूरत दिखी, वह थी दुश्मन के अंदर तक जाकर इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रेकॉन्सांस और स्ट्राइक क्षमता का पता लगाना। पाकिस्तान की सीमा के पीछे मौजूद मोबाइल टारगेट्स, ईंधन डिपो, कमांड-सेंटर (Theatre Commands India) और एयरबेस पर सटीक हमलों ने दिखाया कि भविष्य के थिएटर कमांड्स को सिर्फ सीमा सुरक्षा नहीं, बल्कि दुश्मन की पूरी डेप्थ में एक्शन के लिए तैयार रहना होगा।

इस ऑपरेशन का एक और बड़ा सबक था 24×7 ऑपरेशनल रेडीनेस। पूरे ऑपरेशन के दौरान तेजी से लिए गए फैसले, लगातार निगरानी, और सेना-नौसेना-वायुसेना के बीच बिना रुके कॉर्डिनेशन ने दिखाया कि थिएटर कमांड्स (Theatre Commands India) में निरंतर रेडीनेस और तुरंत प्रतिक्रिया क्षमता सबसे जरूरी है। इसी कारण नए स्ट्रक्चर में एयर-डिफेंस, काउंटर-ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक-वारफेयर और साइबर डोमेन पर अधिक फोकस रखा जा रहा है।

सबसे अहम भूमिका जॉइंट डिसीजन-मेकिंग की रही। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीडीएस और तीनों सेवाओं के चीफ्स एक ही ऑपरेशंस रूम में बैठकर मिनट-दर-मिनट रणनीति बना रहे थे। इससे जो तालमेल बना, वह पहले कभी नहीं देखा गया था। इसलिए थिएटर कमांड (Theatre Commands India) मॉडल में भी यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि तीनों सर्विसेज इंटीग्रेटेड तरीके से ही फैसले लें और कमान-कंट्रोल की प्रक्रिया तेज और स्पष्ट हो।

Indian Navy Modernisation: समंदर में ‘गर्दा’ उड़ाने वाली है भारतीय नौसेना, 69 नए जहाज और 6 घातक पनडुब्बियां कतार में, क्या 2026 तोड़ेगा 2025 का रिकॉर्ड?

Indian Navy Modernisation

Indian Navy Modernisation: भारतीय नौसेना के जहाजों के बेड़े में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। नौसेना के मुताबिक इस समय देश में 52 युद्धपोत बन रहे हैं। वहीं, यह साल खत्म होते-होते नौसेना के बेड़े में चार और जहाज शामिल होने वाले हैं। जबकि अगले साल भी जहाजों का एक पूरा बेड़ा नौसेना में शामिल होने के इंतजार में हैं। नौसेना का कहना है कि आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा और समुद्री युद्ध के नए रूप को ध्यान में रखते हुए पूरी तैयारी की जा रही है।

Indian Navy Modernisation: 69 नए जहाजों और 6 पनडुब्बियों को मंजूरी

राजधानी में आयोजित नौसेना के स्वावलंबन 2025 कार्यक्रम के लिए आयोजित प्रेस इवेंट में वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने बताया, इस समय देश में 52 युद्धपोत बन रहे हैं और आने वाले दो से तीन साल में ये सभी नौसेना में शामिल हो जाएंगे। इसके साथ ही 69 नए जहाजों और 6 पनडुब्बियों के लिए एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) यानी मंजूरी मिल चुकी है, जिससे समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत की क्षमता और मजबूत होगी। जिसकी लागत लगभग 2.35 लाख करोड़ रुपये है। आने वाले सालों में इन्हें नौसेना में धीरे-धीरे कमीशन किया जाएगा। नौसेना का कहना है कि वह तेजी से बदलते सुरक्षा माहौल को देखते हुए अपनी ताकत बढ़ा रही है और युद्धक तकनीक के हर नए क्षेत्र में तैयारियां की जा रही हैं।

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वाइस एडमिरल वात्सायन के मुताबिक अगले साल 19 और जहाज, और उसके अगले साल करीब 13-14 जहाज नौसेना में कमीशन होंगे। नौसेना के अनुसार, यह इंडक्शन प्लान पहले से तय समय के हिसाब से ही आगे बढ़ रहा है। वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि इस साल के आखिर तक लगभग चार और वॉरशिप नौसेना में कमीशन किए जा सकते हैं। यह संख्या बताती है कि भारतीय शिपयार्ड लगातार प्रोडक्शन बढ़ा रहे हैं और यह इंडक्शन प्लान निर्धारित समय के मुताबिक आगे बढ़ रहा है। आने वाले सालों में इन जहाजों और पनडुब्बियों से नौसेना की समुद्री क्षमता और ऑपरेशनल ताकत में बड़ा इजाफा होगा।

Indian Navy Modernisation: 2025 रहा नौसेना के लिए लकी

नौसेना के लिए साल 2025 अब तक का सबसे व्यस्त और सफल वर्षों में से एक है। 1 जनवरी से 20 नवंबर तक भारतीय नौसेना में कुल 11 जहाज कमीशन किए गए हैं। ये सभी ज्यादातर स्वदेश में ही बने हैं, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम है। पिछले 10 सालों का आंकड़ा देखें, तो आधिकारिक तौर पर 33 जहाज और 7 सबमरीन शामिल किए गए। जबकि साल 2025 में ही अकेले 10 जहाज और एक सबमरीन 20 नवंबर तक शामिल हुए हैं। इनमें एक स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन भी शामिल है। वहीं, इस साल के आखिर तक यह संख्या 15 तक पहुंच सकती है। 2025 में भारतीय नौसेना में शामिल होने वाला आखिरी विदेश में बना जहाज आईएनएस तमाल था।

MQ-9B ड्रोन पर नेवी ने कही ये बात

वहीं, अमेरिका से MQ-9B हाई-एंड ड्रोन को लेकर वाइस एडमिरल वात्सायन ने साफ कहा कि इन ड्रोन का कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो चुका है और उनकी डिलीवरी तय समय पर होगी। वहीं, उन्होंने बताया कि एमएच-60आर रोमियो हेलिकॉप्टर का अंतिम बैच मिलने का इंतजार है। जबकि पी-8आई निगरानी विमान को लेकर अमेरिका से बातचीत जारी है। नौसेना के अनुसार प्रक्रिया का हर चरण समय लेता है, लेकिन सभी प्रोजेक्ट आगे बढ़ रहे हैं। साथ ही नौसेना लगातार इस लक्ष्य पर भी काम कर रही है कि जितना संभव हो, उतनी अधिक तकनीकें और प्लेटफॉर्म भारत में ही बनाए जाएं।

Indian Navy Modernisation: उद्योगों और स्टार्टअप्स को दिए 450 करोड़ रुपये

नौसेना 25-26 नवंबर को स्वदेशीकरण कार्यक्रम ‘स्वावलंबन 2025’ का आयोजन कर रही है। इस कार्यक्रम में एमएसएमई, स्टार्टअप्स और उद्योग जगत को वह सभी चुनौतियां बताई जाएंगी जिनका सामना नौसेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया था। नौसेना के वाइस चीफ ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से जो सीख मिली, उन सभी को उद्योग जगत के सामने “चैलेंज” के रूप में रखा जा रहा है ताकि भविष्य के युद्धक माहौल के लिए सॉल्यूशन तैयार किए जा सकें।

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वाइस चीफ एडमिरल वात्सायन के अनुसार अब तक 198 तकनीकी चुनौतियां स्वीकृत की जा चुकी हैं। डिफेंस इनोवेशन ऑर्गनाइजेशन ने 2000 करोड़ रुपये की फाइनेंशियल कमिटमेंट जताई है, जिनमें से 450 करोड़ रुपये पहले ही उद्योगों और स्टार्टअप्स को दे दिए गए हैं। अब तक 1500 करोड़ रुपये के 16 बड़े कॉन्ट्रैक्ट भी किए जा चुके हैं। यह दिखाता है कि नौसेना स्वदेशी प्रणालियों को तेजी से अपना रही है और रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योग का योगदान बढ़ रहा है।

Indian Navy Modernisation: इन तकनीकों पर काम कर रही है सेना

वहीं, नौसेना ने भविष्य की तकनीकी दिशा भी साफ कर दी है। वाइस चीफ एडमिरल वात्सायन का कहना है कि आने वाला युद्ध मल्टी-डोमेन होगा, जिसमें समुद्र, हवा, पानी के नीचे, अंतरिक्ष, साइबर और डेटा सब एक साथ जुड़ेंगे। उन्होंने कहा कि वह इस दिशा में पहले से काम कर रही है और कई उभरती तकनीकों को एक्चुअल कॉम्बैट कैपेबिलिटी में बदला जा रहा है।

इनमें प्रमुख तकनीकें हैं, इनमें अनमैन्ड सिस्टम, हाई पावर कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लार्ज लैग्वेज मॉडल (एलएलएम), प्रिसिजन स्ट्राइक वेपंस और उनके बचाव के सिस्टम, अंतरिक्ष आधारित तकनीकें, साइबर वॉरफेयर, कॉग्निटिव वॉरफेयर, नॉन-आरएफ कम्युनिकेशन यानी लेजर और आईआर बेस्ड कॉन्टैक्ट सिस्टम, और नई कैमोफ्लेज टेक्नोलॉजी शामिल है। नौसेना का कहना है कि दुनिया में जो भी आधुनिक तकनीक सामने आएगी, भारतीय नौसेना उसे अपने ऑपरेशनल ढांचे का हिस्सा बनाएगी।

नौसेना ने दो टूक कहा कि “भविष्य का युद्ध उतना ही तकनीकी होगा, जितना सामरिक। इसलिए हर तकनीक को युद्धक क्षमता में बदलना ही हमारी प्राथमिकता है।” नौसेना के अनुसार भारत के शिपयार्ड तेजी से निर्माण कर रहे हैं, उद्योग जगत स्वदेशीकरण को गति दे रहा है और तकनीकी तैयारी युद्ध के हर नए आयाम के लिए आगे बढ़ रही है।

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Indian Navy Swavlamban 2025: Navy to Convert Operation Sindoor Lessons Into Challenges, Keeps Close Watch on China-Built Submarines for Pakistan
Indian Navy Swavlamban 2025: Navy to Convert Operation Sindoor Lessons Into Challenges, Keeps Close Watch on China-Built Submarines for Pakistan

Indian Navy Swavlamban 2025: भारतीय नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कहा कि नौसेना इस समय चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक रक्षा साझेदारी पर लगातार नजर रख रही है। उन्होंने कहा कि चीन-पाकिस्तान को सबमरीन और वॉरशिप दे रहा है और भारतीय नौसेना हर गतिविधि को ध्यान से मॉनिटर कर रही है, ताकि भारत की समुद्री सुरक्षा पूरी तरह मजबूत रहे।

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राजधानी में आयोजित नौसेना के बड़े कार्यक्रम स्वावलंबन 2025 के लिए आयोजित प्रेस इवेंट में वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि भारतीय नौसेना को पूरी जानकारी है कि चीन पाकिस्तान को सबमरीन दे रहा है और पाकिस्तान जल्द ही इन्हें अपनी नौसेना में शामिल करना शुरू करेगा। उन्होंने कहा कि भारत भी सभी हालात पर बारीकी से नजर रख रहा है और जरूरत के अनुसार अपनी तैयारी को भी मजबूत कर रहा है। स्वावलंबन 2025 का आयोजन नई दिल्ली में 25–26 नवंबर को होने वाला है।

Indian Navy Swavlamban 2025: पाकिस्तान को मिल रही हैं चीनी हंगोर क्लास सबमरीन

पाकिस्तान ने चीन के साथ 5 बिलियन डॉलर के समझौते के तहत हंगोर क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन खरीदी हैं। कुल 8 सबमरीन इस समझौते में शामिल हैं। इनमें से चार चीन में और चार कराची में बनाई जा रही हैं। अगले साल से इनकी डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

पहली सबमरीन अप्रैल 2024 में लॉन्च हुई, जबकि दो और सबमरीन इसी साल लॉन्च की गईं। सभी 8 सबमरीन 2028 तक डिलीवर हो जाएंगी। पाकिस्तान नौसेना प्रमुख एडमिरल नवीन अशरफ ने हाल ही में कहा कि यह प्रोजेक्ट 2026 तक तय समय पर आगे बढ़ रहा है।

पाकिस्तान इन सबमरीन को अपनी समुद्री ताकत बढ़ाने के लिए ला रहा है, विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद, जब उसकी नौसेना की तैयारी पर काफी सवाल उठे थे।

Indian Navy Swavlamban 2025: भारत ने कहा- हर स्थिति पर नजर, तैयारी है पूरी

वाइस एडमिरल वात्सायन ने साफ कहा कि भारत स्थिति को हल्के में नहीं ले रहा। उनका कहना था कि भारतीय नौसेना लगातार हर हरकत को देख रही है और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए जरूरत के हिसाब से क्षमता बढ़ा रही है।

उन्होंने कहा, “हम हर स्थिति को मॉनिटर कर रहे हैं। हमें पता है पाकिस्तान की सबमरीन इंडक्शन शुरू होने वाली है। हम जानते हैं कि एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए हमें क्या क्षमताएं चाहिए। भारतीय नौसेना पूरी तरह तैयार है।”

वाइस एडमिरल वात्सायन ने यह भी बताया कि चीन अपनी नौसेना को बहुत तेजी से बढ़ा रहा है। चीन ने हाल ही में अपना तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर फुजियान शामिल किया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि भारत को भी नए जहाज और प्लेटफॉर्म जल्द मिलेंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना के कई जहाज निर्माणाधीन हैं और अगले दो सालों में नौसेना को कई महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म मिल जाएंगे।

वाइस चीफ ने बताया कि भारतीय नौसेना इंडियन ओशन रीजन में हमेशा नजर रखती है और किसी भी समय 40–50 विदेशी जहाज इस क्षेत्र में मौजूद रहते हैं। नौसेना लगातार इनकी गतिविधियों पर निगरानी रखती है। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना किसी भी कंटिंजेंसी से निपटने के लिए तैयार है।

Indian Navy Swavlamban 2025: भारत के पास इतनी हैं सबमरीन

भारत के पास तीन स्वदेशी न्यूक्लियर-पावर्ड सबमरीन और कई डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन हैं, जो फ्रांस, जर्मनी और रूस के साथ साझेदारी में बनाए गए हैं। नौसेना इन क्षमताओं को और बढ़ाने में लगी है। वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि भारत आने वाले वर्षों में और एडवांस सिप और सबमरीन शामिल करेगा।

 

“ऑपरेशन सिंदूर की सीखों को हमने चुनौतियों में बदला”

वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में सामने आए कई महत्वपूर्ण पाठ आज नौसेना की प्राथमिकता हैं। इन्हें अब सीधे एमएसएमई, स्टार्ट-अप्स और इनोवेशन इकोसिस्टम के सामने रखा जा रहा है, ताकि इनके लिए स्वदेशी समाधान तैयार किए जा सकें।

उन्होंने साफ कहा, “जो हमने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा और जो सीख मिलीं, हमने उनमें से कई को चुनौतियों में बदला है। ये सभी चुनौतियां स्वावलंबन में प्रस्तुत की जाएंगी।”

नौसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जो मई में हुआ था, उसके पहले और बाद की सभी ऑपरेशनल जरूरतों की पहचान की है। अब इन्हें तकनीकी चैलेंज के रूप में इंडस्ट्री से समाधान विकसित करने के लिए कहा जाएगा।

उन्होंने कहा कि कुछ चुनौतियां पहले से पहचानी गई थीं और कुछ ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आईं। दोनों ही तरह की जरूरतें अब इस इवेंट का हिस्सा होंगी।

Indian Navy Swavlamban 2025: मातंगी बनी नौसेना की बड़ी सफलता

वाइस एडमिरल वात्सायन ने ऑटोनॉमस सरफेस वेसल मातंगी को नौसेना की बड़ी सफलता बताया। उन्होंने कहा कि मातंगी को पिछले स्वावलंबन इवेंट में आजमाया गया था और यह नौसेना की सभी ऑपरेशनल जरूरतों पर खरी उतरी।

उन्होंने बताया, “मातंगी पिछले स्वावलंबन में ट्रायल हुई और यह हमारी सभी आवश्यकताओं पर खरा उतरी। इसी सफलता के आधार पर हमने इसके 10 और बोट्स का ऑर्डर दिया है।”

मातंगी को सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने विकसित किया है, एक फास्ट इंटरसेप्टर बोट है जो बिना ड्राइवर के समुद्री निगरानी, सुरक्षा और तेज जवाबी कार्रवाई के लिए बनाई गई है। इसे स्वावलंबन 2024 दौरान रक्षा मंत्री ने हरी झंडी दिखाई थी।

Indian Navy Swavlamban 2025: स्वदेशी तकनीक और एमएसएमई पर जोर

उन्होंने बताया कि इस साल के स्वावलंबन 2025 कार्यक्रम में नई तकनीकों, स्वदेशी समाधान और आत्मनिर्भर भारत पर खास फोकस रहेगा। नौसेना इस समय स्वदेशी हथियार और तकनीक अपनाने पर जोर दे रही है।

नौसेना ने हाल ही में स्वॉर्मिंग बोट्स के 12 सेट का ऑर्डर दिया है और लगभग 1,400 करोड़ रुपये के अन्य ऑर्डर भी दिए गए हैं। साथ ही, देश में हाई-पावर माइक्रोवेव, डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, और लेजर वेपंस डेवलप किए जा रहे हैं।

यह कार्यक्रम नौसेना, उद्योग, स्टार्ट-अप और रक्षा क्षेत्र को एक मंच पर लाने का बड़ा अवसर माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी कार्यक्रम में शामिल होंगे।

नौसेना ने बताया कि स्वावलंबन 2025 में 80 से अधिक स्टॉल लगेंगे, जिनमें विभिन्न स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई अपनी तकनीक दिखाएंगे। नौसेना ने कई श्रेणियों में चुनौतियां रखी हैं, जिनमें साइबर डोमेन, कॉग्निटिव वॉरफेयर,
इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम शामिल हैं। हाल ही में हुई ट्राई सर्विस एक्सरसाइज त्रिशूल में भी इन्हें आजमाया गया था।

Chanakya Defence Dialogue: आर्मी चीफ बोले- 88 घंटे का ट्रेलर था ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान मौका देगा तो फिर सिखाएंगे सबक

Army Chief Chanakya Defence Dialogue- Operation Sindoor, Border Talks and Theatreization
Army Chief General Updendra Dwivedi in Chanakya Defence Dialogue

Chanakya Defence Dialogue: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर एक ट्रेलर की तरह था, जो 88 घंटे में खत्म हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी तरह के स्टेट-स्पॉन्सर्ड आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और आतंकियों को सहयोग देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

Chanakya Defence Dialogue: बातचीत और आतंक साथ नहीं चल सकते

नई दिल्ली में आयोजित चाणक्य डिफेंस डायलॉग के फायरसाइड चैट में सेना प्रमुख ने कहा कि जब कोई देश किसी तरह के आतंकवाद को बढ़ावा देता है तो यह भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत विकास की राह पर है और यदि कोई हमारे रास्ते में बाधा खड़ी करता है तो कार्रवाई करना पड़ेगी। जनरल द्विवेदी ने दोहराया कि बातचीत और आतंक साथ नहीं चल सकते और शांतिपूर्ण प्रक्रिया अपनाने तक आतंकवादियों और उनके समर्थन करने वालों को समान रूप से देखा जाएगा। उनके शब्दों में, आज भारत इतना सशक्त है कि किसी भी तरह की ब्लैकमेल की कोशिश से डरता नहीं है।

Army Chief on Op Sindoor: आर्मी चीफ का बड़ा बयान, कहा- ऑपरेशन सिंदूर चार दिन का टेस्ट मैच, लेकिन सबक मिले लंबे युद्ध के

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन 88 घंटे में खत्म हुआ और इस अवधि में जरूरी कार्रवाई पूरी की गई। उन्होंने कहा कि मूवी शुरू भी नहीं हुई थी। सिर्फ एक ट्रेलर दिखाया गया था और ट्रेलर के बाद 88 घंटे में वो ट्रेलर खत्म हो गया था। उन्होंने कहा कि सेना किसी भी परिस्थितियों के लिए हमेशा तैयार रहती है और यदि पाकिस्तान ने दोबारा कोई मौका दिया तो उसे यह सिखाया जाएगा कि पड़ोसी देशों के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। जनरल द्विवेदी ने यह बात स्पष्ट की कि सीमापार हिंसा और अशांति का जवाब देना जरूरी हुआ तो वह दिया जाएगा।

भारत-चीन के बीच 1,100 बार बातचीत

सीमा पर भारत-चीन संबंधों पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि अक्टूबर 2024 के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार दिखा है। उन्होंने जिक्र किया कि 21 अक्टूबर को पूर्वी लद्दाख में हुए समझौते और 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक ने माहौल सामान्य बनाने में मदद की। जनरल द्विवेदी ने बताया कि पिछले एक साल में जमीन-स्तर पर करीब 1,100 बातचीत हुई हैं, यानी औसतन रोज तीन इंटरैक्शन हुए हैं। उनके अनुसार यह बातचीत अब कोर कमांडर स्तर से नीचे आकर बटालियन और कंपनी कमांडर स्तर तक पहुंच गई है, जिससे छोटे विवाद वहीं हल होने लगे हैं और मामले फाइलों में फंसकर नहीं रुकते।

Army Chief Chanakya Defence Dialogue- Operation Sindoor, Border Talks and Theatreization
Army Chief General Updendra Dwivedi in Chanakya Defence Dialogue

डिफेंस डिप्लोमेसी को लेकर कही ये बात

डिफेंस डिप्लोमेसी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हार्ड पावर और सॉफ्ट पावर के मेल से जो ‘स्मार्ट पावर’ बनती है, वही असली कूटनीति और भरोसा जगाती है। जब सैन्य और कूटनीतिक संपर्क बढ़ते हैं तो ट्रेनिंग, तकनीकी आदान-प्रदान और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में सहयोग संभव होता है। जनरल द्विवेदी ने यह भी कहा कि संगीत और सेना दोनों भाषा की बाधा को पार कर देते हैं और इसी तरह सैन्य संपर्क से भी पारस्परिक भरोसा बढ़ता है।

बताया थियेटराइजेशन क्यों है जरूरी

थियेटराइजेशन पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भौगोलिक आधार पर है और हमारी दो तरफ सीमाएं हैं। और उसके ऊपर हमारी आंतरिक चुनौतियां हैं, उनसे डील करता है। उन्होंने कहा कि अब युद्ध केवल जमीन-हवा-समुद्र तक सीमित नहीं रह गया। साइबर, स्पेस, इन्फोर्मेशन वॉरफेयर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम जैसे नए डोमेन भी युद्ध के हिस्से बन गए हैं। इसलिए सेना ने अपनी स्ट्रक्चर में बदलाव किए हैं और रुद्र ब्रिगेड जैसे इंटीग्रेटेड सभी हथियारों वाले ब्रिगेड बनाए जा रहे हैं। जनरल द्विवेदी ने बताया कि रुद्र ब्रिगेड में इंफैंट्री, मेकैनाइज्ड यूनिट, टैंक्स, आर्टिलरी, एयर-डिफेंस, इंजीनियर्स और ड्रोन यूनिट सब एक साथ हैं ताकि संयुक्त तौर पर तेज और प्रभावी कार्रवाई हो सके।

उन्होंने कहा कि इंटीग्रेशन का मतलब है कि आर्मी, नेवी, एयरफोर्स, सीएपीएफ, साइबर, स्पेस। जितनी जल्दी इंटीग्रेशन करेंगे उतना हम इस लड़ाई को बड़े साझे ढंग से लड़ सकेंगे क्योंकि आज की लड़ाई जो है वह मल्टी डोमेन है। अगर मैं बोलूं सिर्फ आर्मी अकेले लड़ सकती है, तो नहीं, बल्कि हम सबको मिलकर लड़ना पड़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की लड़ाई में समय की अहमियत बढ़ गई है और यदि कोई अभियान 88 घंटे के भीतर पूरा करना हो, तो देश की सारी ताकत उस थिएटर कमांडर के पास होगी। जनरल द्विवेदी ने बताया कि थिएटर कमांडरों को पूरा दायित्व और संसाधन दिए जाएंगे ताकि निर्णय-निर्माण और क्रियान्वयन में देरी न हो। उनका कहना था कि पहले ऐसे फैसले दिन-रात के बाद लिए जाते थे, अब समय कम है और हर स्तर पर स्वतन्त्रता व जवाबदेही जरूरी है।

मणिपुर में लौट रहा लोगों का भरोसा

मणिपुर की स्थिति पर बात करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि वहां स्थिति में सुधार हुआ है और लोगों का भरोसा लौट रहा है। जो 2023 में जो मापदंड थे, जो आज के मापदंड हैं बिल्कुल बदले हो गए हैं। उन्होंने बताया कि 2023 के मुकाबले घटनाओं की संख्या कम हुई है, हथियारों की रिकवरी बढ़ी है और स्थानीय उत्सवों तथा खेल आयोजनों के माध्यम से सामान्य जीवन लौट रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि रेल संपर्क और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि मणिपुर में जो हिंसा के मामले लगातार घटते हुए सात से आठ इंसिडेंट पर माह रह गए हैं। उन्होंने कहा बदलाव अभी और भी आएंगे जब आप देखेंगे जब हमारी ट्रेन इंफाल तक आएगी तो वह बदलाव धीरे-धीरे और बढ़ते जाएंगे। उन्होंने कहा, मुझे लग रहा है कि आगे आने वाले दिनों में अगर वहां पर समुदाय के लोग आपस में बैठे और खुद एक सॉल्यूशन निकालना चाहेंगे तो बदलाव जल्दी आएगा।

नेटवर्किंग और डेटा-सेंट्रिसिटी पर काम जारी

जनरल द्विवेदी ने बताया कि सेना ने ‘टेक्नोलॉजी एब्जॉर्प्शन’ का वर्ष घोषित किया और अब नेटवर्किंग व डेटा-सेंट्रिसिटी की ओर काम जारी है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम, ड्रोन व इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी और मानव संसाधन को साथ जोड़ना प्राथमिकता है। इसके साथ ही आपातकालीन खरीद-प्रक्रियाओं के जरिये जरूरी तकनीक जल्दी लाई जा रही है ताकि ऑपरेशनल गैप्स भरे जा सकें।

Explainer DRDO MP-AUV: समझें कैसे समंदर के नीचे बारूदी सुरंगे ढूंढेगा यह स्वदेशी रोबोट, नेवी को मिलेगी बड़ी ताकत

Explainer DRDO MP-AUV

Explainer DRDO MP-AUV: भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO ने भारतीय नौसेना के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक डेवलप की है। यह तकनीक समुद्र के नीचे छिपी बारूदी सुरंगों यानी माइन को तेजी से ढूंढ सकती है और उनकी पहचान कर सकती है। इसे एमपी-एयूवी, यानी मैन-पोर्टेबल ऑटोनोमस अंडरवॉटर व्हीकल कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक छोटा, स्मार्ट और बेहद हल्का पानी के अंदर चलने वाला रोबोट है, जिसे एक या दो लोग आसानी से उठा सकते हैं और किसी भी जगह समुद्र में उतार सकते हैं।

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Explainer DRDO MP-AUV: डीआरडीओ की लैब ने किया तैयार

इस सिस्टम को डीआरडीओ की विशाखापट्टनम स्थित लैब नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी ने बनाया है। डीआरडीओ के मुताबिक यह तकनीक भारत की नौसेना को माइन वारफेयर यानी समुद्र में बिछाई गई माइन से निपटने की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी देगी। समुद्री माइन जहाजों, पनडुब्बियों और बंदरगाहों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं, इसलिए उन्हें ढूंढना और पहचानना नौसेना की सबसे जरूरी जरूरतों में शामिल है।

Explainer DRDO MP-AUV: लगा है साइड-स्कैन सोनार

डीआरडीओ का यह नया एमपी-एयूवी आधुनिक तकनीकों से लैस है। इसमें साइड-स्कैन सोनार लगा है, जो पानी के भीतर समुद्र की सतह की डिटेल्ड तस्वीरें बनाता है। सोनार का काम “ध्वनि तरंगों” की मदद से आसपास की चीजों की पहचान करना होता है। इसके साथ ही इसमें अंडरवॉटर कैमरा लगा है, जो पानी के नीचे की साफ तस्वीरें भेज सकता है। इन दोनों सेंसरों की मदद से यह रोबोट उन वस्तुओं को खोज लेता है जो समुद्री माइन जैसी दिखती हैं।

 

डीप लर्निंग बेस्ड एआई एल्गोरिदम से लैस

लेकिन इसकी सबसे खास बात है इसमें मौजूद डीप लर्निंग आधारित एआई एल्गोरिदम। ये एल्गोरिदम यानी कंप्यूटर दिमाग रोबोट को यह समझने में सक्षम बनाते हैं कि सामने मिली वस्तु वास्तव में माइन है या नहीं। पहले यह काम नौसेना के ऑपरेटरों को खुद करना पड़ता था, जिसमें काफी समय लगता था। लेकिन अब यह सिस्टम खुद-ब-खुद सही पहचान कर लेता है, जिससे मिशन का समय काफी कम हो जाता है और मानवीय गलती की संभावना भी घट जाती है।

एक टीम की तरह काम कर सकते हैं कई एयूवी – Explainer DRDO MP-AUV

डीआरडीओ ने इस सिस्टम में अंडरवॉटर एकॉस्टिक कम्युनिकेशन यानी पानी के अंदर ध्वनि के जरिए एक-दूसरे से बात करने की क्षमता भी शामिल की है। इससे कई एयूवी एक टीम की तरह काम कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर एक रोबोट को कोई माइन जैसी वस्तु मिलती है, तो वह तुरंत बाकी रोबोट्स को सूचना भेज सकता है। इससे पूरा मिशन सुरक्षित हो जाता है।

पूरी तरह मैन-पोर्टेबल

हाल ही में इस एमपी-एयूवी के साथ किए गए ट्रायल्स डीआरडीओ के विशाखापट्टनम हार्बर में पूरे हुए, जहां सिस्टम को असली समुद्री परिस्थितियों में टेस्ट किया गया। डीआरडीओ ने बताया कि सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर सफलतापूर्वक पूरे हुए और सिस्टम ने उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन किया।

इस रोबोट की खासियतों में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे पूरी तरह मैन-पोर्टेबल बनाया गया है। यानि यह भारी नहीं है और इसे आसानी से ले जाया जा सकता है। जबकि विदेशी सिस्टम महंगे भी हैं और आकार में बड़े भी। डीआरडीओ का यह सिस्टम इस मामले में भारत के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि यह स्वदेशी है, हल्का है और कम लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती

है।

डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस सिस्टम की तारीफ करते हुए कहा कि यह के लिए “एक बड़ा माइलस्टोन” है। उनके मुताबिक, यह सिस्टम नौसेना को कम समय में ज्यादा क्षेत्र में खोजबीन करने की क्षमता देगा और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा।

भारत की समुद्री चुनौतियां पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी हैं। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां, भारतीय जलसीमा के पास विदेशी ड्रोन और सबमरीन की मूवमेंट, तथा बढ़ती समुद्री तस्करी, इन सब परिस्थितियों में समुद्र के नीचे छिपे खतरों को पहचानने वाला यह सिस्टम भारतीय नौसेना के लिए बहुत उपयोगी होगा।

डीआरडीओ ने बताया कि एमपी-एयूवी आने वाले महीनों में उत्पादन के लिए तैयार हो जाएगा। कई इंडस्ट्री पार्टनर्स पहले से ही इसमें शामिल हैं। इसका मतलब है कि यह तकनीक केवल लैब में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार है।

Gajraj Corps: 16,000 फीट पर भारतीय सेना का अनोखा कारनामा, जवानों को रसद की सप्लाई के लिए बनाई हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल

Gajraj Corps high High Altitude Mono Rail System India

Gajraj Corps: अरुणाचल प्रदेश के कई दुर्गम इलाकों में भारतीय सेना तैनात है। कई इलाके तो ऐसे हैं जहां तक रसद पहुंचा बेहद मुश्किल होता है। लेकिन एक कहावत है, “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।” भारतीय सेना ने कुछ ऐसा ही किया। 16,000 फीट की अत्यंत कठिन ऊंचाई पर कामेंग हिमालय में रसद सप्लाई के लिए भारतीय सेना ने एक ऐसा ही कारगर तरीका निकला।

भारतीय सेना की गजराज कोर ने इस इलाके में एक स्वदेशी हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम को सफलतापूर्वक डेवलप किया औऱ उसे तैनात भी किया। यहां मौसम, भूगोल और कटे हुए रास्ते सेना की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

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Gajraj Corps: पहाड़ियां बेहद खड़ी और पथरीली

कामेंग सेक्टर भारत-चीन सीमा के पास स्थित एक ऐसा इलाका है, जहां मौसम अचानक बदल जाता है, सर्दियों में तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और बर्फीले तूफान कई दिनों तक रास्तों को बंद कर देते हैं। यहां की पहाड़ियां बेहद खड़ी और पथरीली हैं, जिन पर सामान ढोना या बड़ी संख्या में जवानों तक जरूरी सामान की सप्लाई करना अक्सर असंभव हो जाता है। सेना की फॉरवर्ड पोस्टें कई बार लंबे समय तक बाहरी संपर्क से कट जाती हैं और जिससे सप्लाई लाइन पर असर पड़ता है। ऐसे कठिन माहौल में गजराज कोर ने एक ऐसा उपाय खोज निकाला है, जो न सिर्फ तकनीकी रूप से बेहद कुशल है, बल्कि बेहद व्यावहारिक भी है।

Gajraj Corps: खराब मौसम में हेलिकॉप्टर नहीं भर पाते उड़ान

Gajraj Corps ,सेना द्वारा निर्मित यह हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम पूरी तरह भारतीय इंजीनियरिंग और स्थानीय संसाधनों के सहयोग से विकसित किया गया है। सेना के इंजीनियरों ने लंबे समय तक इलाके का अध्ययन किया और पाया कि इस ऊंचाई पर पारंपरिक सप्लाई तरीके कारागर नहीं हैं। जब मौसम खराब होता है, तब हेलिकॉप्टर उड़ान नहीं भर पाते और बर्फ जमने या भूस्खलन की वजह से रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं। कई बार सैनिकों को कंधों पर भारी वजन उठाकर घंटों चलना पड़ता है, जिससे न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि जोखिम भी बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए सेना ने ऐसा समाधान खोजा, जिसे किसी भी मौसम में, दिन और रात दोनों समय इस्तेमाल किया जा सके।

Gajraj Corps: ढो सकता है 300 किलो तक वजन

यह मोनो रेल सिस्टम एक मजबूत स्टील ट्रैक पर आधारित है, जिसके सहारे एक विशेष रूप से डिजाइन की गई ट्रॉली खड़ी चट्टानों और ढलानों के बीच ऊपर-नीचे चलती है। इसे इतनी मजबूती से तैयार किया गया है कि यह बर्फ, तूफान और तेज हवाओं में भी बिना रुके काम कर सके। यह सिस्टम एक बार में 300 किलो से अधिक वजन ले जाने में सक्षम है। इसका मतलब है कि गोला-बारूद, राशन, पानी, ईंधन, इंजीनियरिंग उपकरण, वायरलेस सेट, मेडिकल सप्लाई और अन्य भारी सामान अब बिना किसी देरी के दुर्गम पोस्टों तक पहुंचाई जा सकती है। यह वही सामान है, जिसकी कमी के कारण कई बार फॉरवर्ड पोस्टों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब सप्लाई लाइन हर मौसम में चालू रहती है। जब सड़कें बंद होती हैं, तब भी मोनो रेल बिना रुके अपना काम करती रहती है। तत्काल जरूरत की वस्तुओं जैसे दवाइयां या गोला-बारूद को तेजी से पहुंचाना संभव हो गया है। मोनो रेल के शुरू होने के बाद सप्लाई संबंधी समस्याएं काफी हद तक खत्म हो गई हैं।

Gajraj Corps: मोनो रेल सिस्टम स्ट्रेचर का भी करता है काम

वहीं, अगर किसी जवान को चोट लग जाए, तो पहाड़ों में उसे नीचे तक लाना बेहद कठिन काम होता है। हेलिकॉप्टर कई बार लैंड नहीं कर पाते और पथरीले रास्तों पर स्ट्रेचर लेकर चलना भी जोखिम भरा होता है। अब मोनो रेल सिस्टम पर स्ट्रेचर रखकर घायल सैनिक को सुरक्षित और तेजी से नीचे लाया जा सकता है। इससे जान बचाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है और यह सुविधा पहाड़ों में संचालित होने वाले अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

इन-हाउस किया तैयार

गजराज कोर ने इसे पूरी तरह इन-हाउस तैयार किया है। इसमें किसी निजी कंपनी द्वारा न कोई मशीन दी गई और न ही कोई विदेशी उपकरण इस्तेमाल किए गए। स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और इलाके की प्राकृतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए इस सिस्टम को इंजीनियरों ने खुद डिजाइन किया, तैयार किया और इसे फिट किया। सिस्टम को जगह पर लगाने के बाद कई स्तरों पर इसका परीक्षण किया गया और यह पाया गया कि यह बिना किसी कठिनाई के 24 घंटे काम कर सकता है। इसके बाद सेना ने इसे पूरी तरह ऑपरेशनल घोषित कर दिया।

कामेंग सेक्टर LAC के पास होने के कारण सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां किसी भी समय आपात स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में जरूरी सामान का समय पर पहुंचना बेहद आवश्यक होता है। मोनो रेल सिस्टम ने इस चिंता को बहुत हद तक दूर कर दिया है। इस सिस्टम के कारण सैनिकों पर शारीरिक बोझ कम हुआ है और खतरनाक रास्तों पर आने-जाने की जरूरत कम हो गई है।

16,000 फीट की ऊंचाई पर ऐसा Gajraj Corps प्रोजेक्ट लगाना अपने-आप में एक इंजीनियरिंग चुनौती है। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होती है, तापमान अत्यंत कम होता है और मशीनें जल्दी खराब होती हैं। लेकिन सेना ने इन सभी बाधाओं को पार करके इसे सफलतापूर्वक पूरा किया।

Su-30MKI ASPJ: सुखोई-30 को मिलेगा नया “अदृश्य कवच”, छू भी नहीं पाएंगी दुश्मन की मिसाइलें, स्वदेशी जैमर पॉड के लिए जारी की RFI

Su-30MKI ASPJ

Su-30MKI ASPJ: भारतीय वायुसेना अपने सबसे भरोसेमंद सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमानों के बेड़े को और एडवांस बनाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में एयरक्राफ्ट सेल्फ-प्रोटेक्शन जैमर (एएसपीजे) सिस्टम की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। यह सिस्टम विमान को दुश्मन के रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेगा।

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यह खरीद प्रक्रिया पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम से जुड़ी है। अक्टूबर के आखिर में जारी आरएफआई के तहत वायुसेना चाहती है कि इन जैमर पॉड्स में कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री हो। इस खरीद के तहत सभी 100 एएसपीजे पॉड और उससे जुड़े उपकरणों की डिलीवरी 36 महीनों के भीतर पूरी की जानी है।

Su-30MKI ASPJ: सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा

यह पहल भारतीय वायुसेना के महत्वाकांक्षी सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसके तहत 260 से ज्यादा सुखोई-30 विमानों को 4.5 जनरेशन के स्तर तक अपग्रेड किया जा रहा है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 65,000 करोड़ रुपये है और इसमें नया AESA रडार, नया ग्लास कॉकपिट, आधुनिक सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और नई मिसाइलें शामिल होंगी।

सुखोई-30 भारतीय वायुसेना की रीढ़ है और फिलहाल वायुसेना के लगभग 60 फीसदी फाइटर जेट्स इसी कैटेगरी के हैं। यह विमान 2002 से सेवा में है और इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है। इस विमान में पहले से ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल जैसे एडवांस वेपंस लगे हुए हैं। अब इन नए एएसपीजे पॉड के आने से विमान की सर्वाइवल क्षमता और बढ़ जाएगी।

Su-30MKI ASPJ: क्या है एएसपीजे

वायुसेना ने आरएफआई में एएसपीजे के लिए कई तकनीकी शर्तें तय की हैं। इसमें AESA आधारित जामिंग तकनीक,डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमरी (डीआरएफएम), 360-डिग्री कवरेज, गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड ट्रांसमीटर और रियल-टाइम थ्रेट अडप्टेशन जैसी क्षमताएं शामिल हैं। डीआरएफएम तकनीक दुश्मन के रडार को भ्रमित करने और फॉल्स टारगेट बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। इसका इस्तेमाल कई आधुनिक लड़ाकू विमानों में किया जाता है।

यह पूरा सिस्टम सुखोई-30 के मौजूदा एवियोनिक्स, जैसे रडार वार्निंग रिसीवर (आरडब्ल्यूआर), मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और डेटा लिंक के साथ पूरी तरह इंटीग्रेट किया जाएगा। एएसपीजे पॉड विमान के अंडर-विंग पाइलॉन पर लगाया जाएगा और इससे विमान की उड़ान क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Su-30MKI ASPJ: इन कंपनियों ने बनाए एएसपीजे

भारत के कई स्वदेशी रक्षा उद्योग इस परियोजना में भाग लेने के लिए तैयार हैं। चेन्नई की कंपनी डेटा पैटर्न ने पहले ही अपने टैलोन शील्ड एएसपीजे पॉड का डेमो पेश किया है जो गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड एईएसए का इस्तेमाल करता है। इस सिस्टम ने सुखोई-30 पर ग्राउंड टेस्ट पूरा कर लिया है और फ्लाइट टेस्ट जारी हैं। यह सिस्टम विदेश से काफी सस्ता है और लगभग 70 फीसदी तक स्वदेशी है।

इसके अलवा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड भी डीआरडीओ की डेवलपमेंट एजेंसी डीएआरई के साथ मिलकर इस पॉड को बना रही है। बीईएल इजराइल की एल्टा कंपनी के साथ तकनीकी सहयोग कर सकती है, क्योंकि एल्टा का स्कॉर्पस सिस्टम दुनिया का सबसे आधुनिक स्टैंड-ऑफ जैमर माना जाता है।

इसके अलावा एलएंटी डिफेंस भी डीआरएफएम तकनीक पर काम कर रही है। इस परियोजना में कई एमएसएमई भी शामिल होंगी जो पावर एम्प्लीफायर, आरएफ मॉड्यूल, डिजिटल प्रोसेसर और अन्य सब-इक्विपमेंट बनाएंगी। इस तरह यह परियोजना भारत में एक बड़ा डिफेंस सप्लाई चेन नेटवर्क तैयार करेगी।

Su-30MKI ASPJ: स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर आर्किटेक्चर

वायुसेना ने आरएफआई में यह भी उल्लेख किया है कि यह परियोजना न केवल सुखोई-30 के लिए, बल्कि भविष्य के कई लड़ाकू विमानों जैसे तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और एमएससीए के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम के डेवलपमेंट में भी मदद करेगी। एएसपीजे पॉड को “स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिकक वारफेयर आर्किटेक्चर” के तौर पर देखा जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महसूस हुई थी जरूरत

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सुखोई-30 में एएसपीजे की काफी जरूरत महसूस की गई थी। उस समय पाकिस्तान के साथ सीमा पर हुए संघर्ष में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमताए बेहद अहम साबित हुई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सुखोई-30 विमानों को कई बार दुश्मन के रडार और मिसाइल लॉक से बचने के लिए आक्रामक और रक्षात्मक इलेक्ट्रॉनिक उपायों का सहारा लेना पड़ा था। एएसपीजे पॉड की कमी महसूस की गई थी क्योंकि पुराने सैप-518 और ईएल/एल-8222 पॉड अब मॉडर्न वारफेयर की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे थे।

इसी के चलते https://indianairforce.nic.in/ ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को प्राथमिकता दी और एएसपीजे के लिए आरएफआई जारी कर दी। एएसपीजे पॉड के आने के बाद सुखोई-30 की इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा 30 से 40 फीसदी तक बढ़ने की संभावना है। क्योंकि जामिंग सिस्टम दुश्मन के फायर-कंट्रोल रडार को जैम कर सकता है, बल्कि जीपीएस सिग्नल को प्रभावित कर सकता है और विमान के आसपास एक ‘इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा घेरा’ तैयार कर सकता है।

सूत्रों का कहना है कि अगले साल की शुरुआत तक चयनित कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाएगा। अनुमान है कि 2027 तक प्रोटोटाइप तैयार हो सकते हैं और 36 महीनों में सभी 100 एएसपीजे पॉड वायुसेना को मिल जाएंगे।

LAC geo-tagging: लद्दाख में सेना ने पूरी की जियो-टैगिंग, चीन के दावों को गलत बताने के लिए बड़ी तैयारी

LAC geo-tagging
File Photo

LAC geo-tagging: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर जारी गतिरोध के बीच भारतीय सेना ने सर्दियों की तैयारी तेज कर दी है। यह लगातार छठवां साल है जब भारतीय सैनिक कठोर ठंड, बर्फबारी और दुर्गम इलाकों में तैनात रहेंगे। हालांकि 2024 में भारत और चीन के बीच डिसएंगेजमेंट तो जरूर हो गया था, लेकिन डी-एस्केलेशन अभी तक नहीं हुआ है। दोनों देशों के सैनिक अभी भी बड़े पैमाने पर एलएसी के दोनों तरफ तैनात हैं।

ALG On LaC: भारत-चीन सीमा पर सरकार करने जा रही बड़ी तैयारी, ड्रैगन से बढ़ते खतरे को देखते हुए दो पुराने एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड फिर होंगे एक्टिव!

सेना के अधिकारियों ने बताया कि इस बार की सर्दियों के लिए सेना का फोकस दो अहम बातों पर है जियो-टैगिंग का पूरा होना और सर्विलांस नेटवर्क को मजबूत करना। इन दोनों कदमों को सर्दियों में तैनाती और पेट्रोलिंग की चुनौती को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

LAC geo-tagging लगभग पूरी, प्रमुख जगहें डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज

LAC geo-tagging सूत्रों के मुताबिक, सेना ने इस साल एलएसी की कई महत्वपूर्ण जगहों, पेट्रोलिंग पॉइंट्स, चोटियों और लैंडमार्क्स का जियो-टैगिंग पूरा कर लिया है। जियो-टैगिंग के तहत हर स्थान को डिजिटल मैप में उसके सटीक लोकेशन डेटा के साथ दर्ज किया जाता है।

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स्थानीय कमांडर सर्दियों के बाद इन स्थानों का फील्ड-वेरिफिकेशन करेंगे। यह प्रक्रिया एलएसी की स्पष्ट पहचान, विवादित जगहों को समझने और भविष्य की सैन्य स्तर की बातचीत में मदद करने के लिए जरूरी है। अधिकारियों का कहना है कि इससे पेट्रोलिंग और निगरानी और अधिक व्यवस्थित ढंग से की जा सकेगी।

LAC geo-tagging: सर्दियों के लिए सैनिकों की पुनःतैनाती

कठिन सर्दियों में कई ऊंचे पोस्ट बर्फ से पूरी तरह कट जाते हैं। ऐसे में सेना कुछ फॉरवर्ड पोस्ट से अस्थायी रूप से सैनिकों को नीचे के प्लाटून और कंपनी स्तर के ठिकानों पर तैनात करती है। यह प्रक्रिया इस साल भी अपनाई जाएगी।

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सूत्रों ने बताया कि कुछ यूनिट्स में छुट्टियों के प्रतिशत में भी बदलाव किया जाएगा ताकि गर्मियों के समय अधिक सैनिक उपलब्ध रहें। इसका उद्देश्य है कि बर्फ गलने के बाद ऑपरेशनल डेंसिटी बढ़ाई जा सके।

निगरानी नेटवर्क और मजबूत 

भारतीय सेना ने इस साल एलएसी पर 24×7 निगरानी नेटवर्क को बढ़ाया जा रहा है। इसमें लॉन्ग-रेंज कैमरे, हाई-रिजॉल्यूशन सेंसर, ड्रोन और हाई-एल्टीट्यूड यूएवी, हेलीकॉप्टर आधारित विंटर सर्विलांस सॉर्टीज शामिल हैं। इन सिस्टम्स का उद्देश्य एलएसी के बड़े हिस्से पर नजर रखना है, ताकि अतिरिक्त पेट्रोलिंग की जरूरत कम हो और निगरानी लगातार जारी रहे।

सेना के एक अधिकारी ने बताया कि सर्दियों में भी यह निगरानी जारी रहेगी, और जब जरूरी होगा तभी सीमित संख्या में कोऑर्डिनेटेड पेट्रोलिंग की जाएगी।

एलएसी पर शांति, लेकिन भरोसे की कमी बरकरार

पिछले एक साल में एलएसी पर हालात शांत रहे हैं। 2024 में रूस के कजान शहर में हुई मोदी और शी की बातचीत के बाद देपसांग और देमचोक में डिसएंगेजमेंट पूरा हुआ और पेट्रोलिंग भी बहाल हुई। इसके बावजूद भरोसे की कमी बनी हुई है और दोनों ओर सैनिकों की तैनाती कम नहीं हुई है।

पूर्वी लद्दाख के सेक्टर में सेना की एक डिविजन तैनात है, जिसमें से दो ब्रिगेड रिजर्व रखी गई हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिट्स भी इस क्षेत्र में तैनात हैं ताकि किसी आपात स्थिति पर तेजी से कार्रवाई की जा सके।

23वें दौर की भारत-चीन सैन्य वार्ता में सहमति

LAC geo-tagging पिछले दिनों चुशूल-मोल्डो में भारत और चीन के बीच 23वें दौर की सैन्य वार्ता हुई। दोनों पक्षों ने कहा कि मौजूदा मैकेनिज्म के माध्यम से किसी भी स्थिति का समाधान किया जाएगा और सीमा पर स्थिरता बनाए रखी जाएगी।

T-90 Tank INVAR missile: सेना के मुख्य बैटल टैंक टी-90 को मिलेंगी घातक एंटी टैंक गाइडेंस मिसाइलें, बीडीएल के साथ हुआ 2,095.70 करोड़ रुपये का सौदा

T-90 Tank INVAR missile

T-90 Tank INVAR missile: रक्षा मंत्रालय और भारत डायनामिक्स लिमिटेड के बीच आज साउथ ब्लॉक में INVAR एंटी-टैंक मिसाइलों के लिए 2,095.70 करोड़ रुपये के सौदे पर दस्तखत हुए। यह खरीद ‘बाय (इंडियन)’ कैटेगरी में की गई है, यानी आत्मनिर्भर पहल के तहत ये मिसाइलें भारत में ही बनेंगी।

यह कॉन्ट्रैक्ट टी-90 भीष्म टैंकों की फायरपावर और घातकता बढ़ाने के लिए किया गया है। INVAR मिसाइल को रूस की 9M119M रिफ्लेक्स के नाम से भी जाना जाता है, वहीं अब टेक्नॉलजी ट्रांसफर के तहत बीडीएल इन्हें भारत में ही बनाएगा।

T-90 Tank INVAR missile: क्या है INVAR मिसाइल

INVAR मिसाइल को इनर्शियल वैरिएंट कहा जाता है, यानी एक ऐसी मिसाइल जो इनर्शिया और लेजर गाइडेंस दोनों का इस्तेमाल करती है। INVAR मिसाइल 125एमएम टैंक गन से दागी जाने वाली लेजर-गाइडेड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है। इस मिसाइल की प्रभावी रेंज लगभग 5 किलोमीटर तक है और यह दिन और रात दोनों में काम कर सकती है। मिसाइल में टैंडम हीट वारहेड होता है, जो रिएक्टिव आर्मर को भेद कर अंदर तक हमला कर सकता है। इसमें गाइडेंस सिस्टम सेमी-ऑटोमैटिक लेजर बीम राइडिंग (SACLOS) है, यानी टारगेट पर लेजर बीम रखने पर मिसाइल खुद ही टारगेट तक पहुंच जाती है।

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T-90 Tank INVAR missile: अलग से लॉन्चर चलाने की जरूरत नहीं

भारतीय आर्मर्ड रेजिमेंट्स में टी-90 मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) प्लेटफार्म हैं और इनकी घातकता बढ़ने से मैकेनाइज्ड ऑपरेशन में बढ़ोतरी मिलेगी। INVAR मिसाइल सीधे टी-90 के 125 एमएम गन से फायर होती है, जिसके चलते अलग से लॉन्चर चलाने की जरूरत नहीं रहती और चलते-फिरते भी यह इस्तेमाल की जा सकती है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस खरीद से सीमा पर तैनात टैंक यूनिट्स की मारक क्षमता और रेस्पॉन्स टाइम पर भी असर पड़ेगा।

T-90 Tank INVAR missile: टी-90 टैंकों पर फिलहाल कोनकोर्स-एम

भारतीय सेना के पास अभी तक टी-90 टैंकों पर कोनकोर्स-एम मुख्य एंटी-टैंक मिसाइल लगी हुई थी। लेकिन यह सोवियत मूल की पुरानी मिसाइल है और इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 4 किलोमीटर से भी कम है। इसके अलावा यह रिएक्टिव आर्मर (ERA) से लैस आधुनिक टैंकों को भेदने में नाकाफी है। चीन का टाइप-99ए
और पाकिस्तान का अल-खालिद टैंक दोनों ही रिएक्टिव आर्मर से लैस हैं। दोनों में ERA प्लस और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम लगा है। वहीं, 2022 में डीआरडीओ के टेस्ट में INVAR ने ERA से लैस टी-72 टैंक मॉडल को 4.8 किमी से नष्ट किया था, जबकि कोनकोर्स फेल हो गई थी।

सेना की आंतरिक रिपोर्टों और पिछले ऑपरेशंस के अनुभवों में यह कमी सामने आई कि कोनकोर्स की रेंज और वारहेड क्षमता मॉडर्न बैटलफील्ड की जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रही थी। इसी कमी को दूर करने के लिए टी-90 टैंकों के लिए लंबी रेंज, ज्यादा सटीकता और रिएक्टिव आर्मर भेदने वाली INVAR मिसाइल की खरीद को प्राथमिकता दी गई।

T-90 Tank INVAR missile: 2,300 से 2,600 INVAR मिसाइलें बनेंगी

इस सौदे की लागत 2,095.70 करोड़ रुपये हैं। जिसके तहत भारतीय सेना को लगभग 2,300 से 2,600 INVAR मिसाइलें मिलेंगी। सूत्रों के मुताबिक बीडीएल की एक मिसाइल की अनुमानित कीमत 80-90 लाख रुपये के बीच है। इतनी मिसाइलें मिलने से 250 से 300 T-90 टैंकों को हर एक पर 8 से 10 मिसाइलों के हिसाब से पूरी तरह लैस किया जा सकेगा। यह खरीद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इजराइली स्पाइक एंटी टैंक गाइडेंस मिसाइल की कीमत करीब 2.5 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल है, जबकि INVAR न केवल तीन गुना सस्ती होगी, बल्कि स्वदेशी भी होगी।

T-90 Tank INVAR missile: बी़डीएल पहले से बना रहा है कई मिसाइलें

बीडीएल के बयान में कहा गया है कि INVAR का निर्माण लाइसेंस प्रोडक्शन के जरिए देश में किया जा रहा है और इस परियोजना में छोटे तथा मध्यम उद्योग भी हिस्सेदारी कर रहे हैं। बीडीएल के पास मिसाइल बनाने का पहले से ही अनुभव है और वह आकाश, नाग तथा अन्य मिसाइलों को भी बनाता है। INVAR का प्रोडक्शन और सप्लाई का काम 2026 से शुरू होने की संभावना है। साथ ही इसकी ट्रेनिंग और इंटीग्रेशन के लिए भी प्रोटोकॉल तय किये जायेंगे।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह खरीद डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स और घरेलू उद्योग की क्षमताओं को मजबूत करेगी और तकनीकी हस्तांतरण से स्थानीय सप्लाई चेन को बढ़ावा मिलेगा। कॉन्ट्रैक्ट में शामिल प्रावधानों के तहत बीडीएल और उसकी सप्लाई चेन मेक-अपोनेंट्स तक टेक्नॉलजी तथा गुणवत्ता मानकों के मुताबिक काम करेंगे।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कॉन्ट्रैक्ट की आवश्यकता और स्वदेशी उत्पादन पर जोर देते हुए कहा कि यह कदम सेना की जरूरतों को पूरा करेगा और रक्षा निर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ाएगा।

T-90 Tank INVAR missile: मैकेनाइज्ड टुकड़ियों के लिए भी उपयोगी

सैन्य सूत्रों का कहना है कि टी-90 टैंकों में INVAR लगाए जाने के बाद उनकी मारक क्षमता में सुधार होगा और यह टैंक-बेस्ड वैश्विक स्तर की चुनौतियों का सामना करने में मदद करेगा। सूत्रों ने बताया कि INVAR में टॉप-अटैक मोड और रिएक्टिव आर्मर को भेदने की क्षमता है, जिससे यह एडवांस इन्फैंट्री कॉम्बैट तथा मैकेनाइज्ड टुकड़ियों के लिए भी उपयोगी है।

Exercise Trishul 2025: थार से अरब सागर तक गरजा भारत का ‘त्रिशूल’, सबसे बड़े संयुक्त अभ्यास में तीनों सेनाओं ने की कई सब-एक्सरसाइज

Exercise Trishul 2025
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Exercise Trishul 2025: भारत की तीनों सेनाएं थलसेना, नौसेना और वायुसेना इन दिनों देश के पाकिस्तान से सटे पश्चिमी सीमावर्ती इलाकों में एक साथ बड़े पैमाने पर एक्सरसाइज त्रिशूल 2025 में हिस्सा ले रही हैं। इसे अब तक की सबसे बड़ी ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज माना जा रहा है। एक्सरसाइज त्रिशूल की विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अकेले सेना की तरफ से इसकी 7 सब-एक्सरसाइज भी हो रही हैं। इस एक्सरसाइज में सेना की तरफ से 20,000 जवान, नौसेना से 20-25 जहाज, वायुसेना से 40+ विमान जैसे राफेल, सुखोई-30 शामिल हो रहे हैं। वहीं जवानों के अलावा सेना की तरफ से मेन बैटल टैंक्स, हॉवित्जर्स, हेलीकॉप्टर्स, और मिसाइल सिस्टम भी शामिल हैं।

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Exercise Trishul 2025: भारतीय कोस्टगार्ड और बीएसएफ भी शामिल

यह अभ्यास भारतीय सेना के दक्षिणी कमांड के नेतृत्व में 30 अक्टूबर से 13 नवंबर 2025 तक राजस्थान के थार रेगिस्तान, गुजरात के कच्छ क्षेत्र, सौराष्ट्र तट और उत्तरी अरब सागर में चलाया जा रहा है। यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में तीनों सेनाओं के साथ भारतीय कोस्टगार्ड और बीएसएफ ने सीमावर्ती इलाकों में एक साथ अपनी सामरिक क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।

Exercise Trishul: भारतीय सेना की दक्षिणी कमान ने दिखाई ‘फ्यूचर-रेडी फोर्स’ की ताकत, एक्सरसाइज त्रिशूल में जमीन से लेकर समंदर तक में दिखा तीनों सेनाओं का जबरदस्त तालमेल

Exercise Trishul 2025: JAI यानी जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन

एक्सरसाइज त्रिशूल का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच समन्वय को बढ़ाना और मल्टी-डोमेन युद्ध परिस्थितियों में आपसी तालमेल की क्षमता का परीक्षण करना है। इस अभ्यास का मूल सिद्धांत प्रधानमंत्री मोदी के विजन JAI यानी जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन पर आधारित है।

इस कॉम्प्रीहेंसिव फ्रेमवर्क के तहत कई उप-अभ्यास भी आयोजित किए गए, जिनमें मरूज्वाला, अखंड प्रहार, ब्रहमशिरा, महागुजराज, वायु समन्वय-2, सुदर्शन क्षमता, त्रिनेत्र और एम्फीबियस एक्सरसाइज शामिल हैं।

Exercise Trishul 2025
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Exercise Trishul 2025: मरूज्वाला और अखंड प्रहार अभ्यास

थार रेगिस्तान में भारतीय सेना की 21 कॉर्प्स यानी सुदर्शन चक्र कॉर्प्स और 12 कॉर्प्स यानी कोणार्क कॉर्प्स की तरफ से आयोजित मरूज्वाला और अखंड प्रहार अभ्यासों में थलसेना और वायुसेना ने संयुक्त हथियार चलाने की क्षमता के साथ, मोबिनलिटी, और ड्रोन-आधारित निगरानी तकनीकों का प्रदर्शन किया। दक्षिणी कमांड की सुदर्शन चक्र कोर और शाहबाज डिवीजन ने इन अभ्यासों में मुख्य भूमिका निभाई। वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई और राफेल विमानों ने हवाई समर्थन और एयर-लैंड इंटीग्रेशन की क्षमता को परखा।

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Exercise Trishul 2025: कच्छ में ब्रहमशिरा अभ्यास

इसके अलावा गुजरात के कच्छ क्षेत्र और सर क्रीक सेक्टर में ब्रहमशिरा अभ्यास किया गया, जिसमें थलसेना, नौसेना, वायुसेना, तटरक्षक बल और बीएसएफ ने भाग लिया। इस अभ्यास में भूमि, समुद्र और वायु की संयुक्त रणनीति पर विशेष फोकस रहा। इस क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद सेनाओं ने सटीक समन्वय और ऑपरेशनल तैयारी का प्रदर्शन किया।

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Exercise Trishul 2025: एम्फीबियस एक्सरसाइज का आयोजन

सौराष्ट्र तट पर 12 नवंबर को पोरबंदर के तट पर एम्फीबियस एक्सरसाइज आयोजित की जाएगी। जिसमें भारतीय नौसेना के आईएनएस जलश्वा, मर्कोस कमांडो और अन्य लैंडिंग क्राफ्ट यूटिलिटी जहाज हिस्सा लेंगे। इसमें तटीय इलाकों पर उतरने और मल्टी-डोमेन पावर प्रोजेक्शन की रणनीति का अभ्यास किया गया।

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Exercise Trishul 2025: महागुजराज-25 अभ्यास

वहीं, महागुजराज-25 अभ्यास में वायुसेना की प्रमुख भूमिका रही, जिसमें इंटिग्रेटेड एयर ऑपरेशंस और एयर डिफेंस मिशनों का अभ्यास किया गया। इस दौरान लड़ाकू विमानों ने पहली बार नागरिक हवाई अड्डों से ऑपरेशन कर सिविल-मिलिट्री कोआर्डिनेशन की मिसाल पेश की।

Exercise Trishul 2025: Exercise MahaGujRaj-25
Exercise MahaGujRaj-25

Exercise Trishul 2025: एक्सरसाइज वायु समन्वय-2

थार के रेगिस्तानी इलाके में दो दिन तक नेक्स्ट-जनरेशन वारफेयर एक्सरसाइज वायु समन्वय-2 का भी आयोजन किया गया। एक्सरसाइज त्रिशूल 2025 के तहत दक्षिणी कमांड की तरफ से आयोजित इस अभ्यास में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन ऑपरेशंस चलाए गए। इसमें उभरते हवाई खतरों जैसे स्वार्म अटैक्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से निपटने की रणनीतियों का अभ्यास किया गया।

Exercise Trishul 2025
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Exercise Trishul 2025: त्रिनेत्र ड्रिल

इसके अलावा त्रिशूल 2025 के प्रारंभिक चरण में सुदर्शन चक्र कॉर्प्स (21 कॉर्प्स) द्वारा डेजर्ट सेक्टर में 21 अक्टूबर को दो-दिवसीय ड्रिल त्रिनेत्र का भी आयोजन किया गया। इसमें भारतीय वायुसेना, भारतीय नौसेना के साथ सेना के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर यूनिट्स, ड्रोन, जेमर्स और सिग्नल कोर ने इसमें भाग लिया। इसमें स्पेक्ट्रम डोमिनेंस और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का अभ्यास किया गया। यह अभ्यास आधुनिक युद्ध की तकनीकों जैसे लेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम ऑपरेशंस, काउंटर-ड्रोन किल चेन, और मल्टी-डोमेन कोऑर्डिनेशन पर फोकस था।

Exercise Trishul 2025
Exercise Trishul 2025

लॉजिस्टिक्स एक्सरसाइज सुदर्शन क्षमता

इसके अलावा एक्सरसाइज त्रिशूल में भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स क्षमता को परखने के लिए दक्षिण कमांड ने एक्सरसाइज सुदर्शन क्षमता का भी आयोजन किया। इसका उद्देश्य लंबी अवधि तक चलने वाले ऑपरेशंस में सेना की लॉजिस्टिक्स स्टेमिना यानी ईंधन, गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और मेडिकल सपोर्ट की निरंतर सप्लाई सुनिश्चित करना था। 72+ घंटे तक चले इस अभ्यास में ड्रोन, एविएशन रिफ्यूलर, इन्वेंटरी मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर, एरियल रीप्लेनिशमेंट और नेटवर्क-इन-अ-बॉक्स सिस्टम जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।

इस अभ्यास में ड्रोन, “नेटवर्क-इन-अ-बॉक्स” सिस्टम, एआई-बेस्ड ट्रैकिंग और 3D प्रिंटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। इसमें गोला-बारूद और ईंधन ट्रांसपोर्ट के लिए 50+ वैगन, चिनूक हेलीकॉप्टर से एयर ड्रॉप,
स्पेयर पार्ट्स और भोजन की सप्लाई के लिए 100 से ज्यादा सिविल ट्रक, और रियल टाइम लोकेशन ट्रेकिंग के लिए एआई ट्रैकिंग एप का इस्तेमाल किया गया।

सेना के साथ भारतीय वायुसेना और नौसेना ने भी भाग लिया, जबकि सिविल एडमिनिस्ट्रेशन ने सड़क, रेल और हवाई मार्ग से सप्लाई में सहयोग किया। इस अभ्यास ने दिखाया कि भारतीय सेना अब आत्मनिर्भर और टेक्नोलॉजी-ड्राइवन सैन्य लॉजिस्टिक्स की दिशा में आगे बढ़ रही है।

एक्सरसाइज त्रिशूल के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, साइबर सुरक्षा, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस जैसी आधुनिक तकनीकों का भी व्यापक इस्तेमाल हुआ। यह अभ्यास भारत की रक्षा तैयारियों में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस अभ्यास में करीब 30,000 से अधिक सैनिक, 40 से ज्यादा विमान और 20 से अधिक नौसैनिक जहाज शामिल हुए। भारतीय तटरक्षक और अन्य केंद्रीय एजेंसियों की भी सक्रिय भागीदारी रही, जिसने अभ्यास को और अधिक रियल एंड होलिस्टिक बनाया।

भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि त्रिशूल 2025 ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबसे बड़ा ट्राई सर्विस एक्सरसाइज है। पाकिस्तान की सीमा के नजदीक हो रहे इस अभ्यास का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता और तत्परता को दिखाना है।