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GPS Spoofing Delhi Blast Link: क्या एक ही साजिश से जुड़े हैं दिल्ली ब्लास्ट और जीपीएस स्पूफिंग के तार? क्या भारत पर हुआ हाइब्रिड टेररिज्म अटैक?

GPS Spoofing Delhi Blast Connection

GPS Spoofing Delhi Blast Link: दिल्ली के लाल किला ब्लास्ट, एयरपोर्ट पर हुई जीपीएस स्पूफिंग और फरीदाबाद में बरामद हुए 2900 किलो विस्फोटक के बीच अब एक गहरी कड़ी सामने आ रही है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह तीनों घटनाएं “हाइब्रिड टेररिज्म” का हिस्सा हो सकती हैं, यानी ऐसा आतंकवाद जिसमें फिजिकल और साइबर दोनों तरह के हमले एक साथ किए जाते हैं।

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दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए भीषण ब्लास्ट और पिछले हफ्ते एयरपोर्ट पर हुई जीपीएस स्पूफिंग की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। दोनों घटनाएं एक हफ्ते के अंदर हुई हैं और अब जांच एजेंसियां यह जानने में जुटी हैं कि क्या इन दोनों का आपस में कोई सीधा आतंकी कनेक्शन है।

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सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, फरीदाबाद और दिल्ली में हुए ऑपरेशन के बाद आतंकियों के कई नेटवर्क को “रोल-अप” किया गया था। हालांकि, कुछ “रेमनेंट्स” यानी बचे हुए लोग सक्रिय हो गए और उन्होंने योजना को अंजाम दे दिया। फरीदाबाद में गिरफ्तार डॉक्टरों और दिल्ली में मिले ब्लास्ट एविडेंस से पता चला कि पाकिस्तानी हैंडलर्स से जुड़ा एक टेलीग्राम चैनल इस्तेमाल किया जा रहा था। इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह चैनल जैश-ए-मोहम्मद और आईएसआईएस के प्रॉक्सी अकाउंट्स से जुड़ा है।

दिल्ली एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग का अलर्ट

पिछले हफ्ते दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास विमानों के नेविगेशन सिस्टम में गड़बड़ी देखी गई थी। पायलटों ने बताया कि उन्हें गलत लोकेशन डेटा और टेरेन वार्निंग मिल रही थी। यह सब दिल्ली से करीब 60 नौटिकल मील के दायरे में हुआ।

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जीपीएस स्पूफिंग दरअसल एक ऐसा साइबर अटैक होता है जिसमें नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजकर नेविगेशन सिस्टम को धोखा दिया जाता है। यानी विमान का सिस्टम यह समझता है कि वह सही रास्ते पर है, जबकि असल में वह गलत दिशा में जा रहा होता है।

यह घटना तब हुई जब एयरपोर्ट का इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम अपग्रेड के लिए बंद था और विमान पूरी तरह जीपीएस पर निर्भर थे। इस दौरान नकली सिग्नल भेजे जाने से कई उड़ानों की दिशा गड़बड़ा गई और एयर ट्रैफिक कंट्रोल को मैनुअल नेविगेशन जीपीएस पर स्विच करना पड़ा।

एनएसए दफ्तर ने जांच शुरू की

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के दफ्तर ने दिल्ली एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग के मामले में जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों को शक है कि यह सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि किसी संगठित साइबर अटैक का हिस्सा हो सकता है, जो लाल किला ब्लास्ट से पहले या उसके साथ जुड़ा हो। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के अधीन काम करने वाले नेशनल साइबर सिक्योरिटी कोऑर्डिनेटर नवीन कुमार सिंह इस पूरे मामले की जांच का नेतृत्व कर रहे हैं। सर्ट-इन, डीजीसीए और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया भी इस जांच में शामिल हैं।

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अधिकारियों के अनुसार, यह जांच इस बात पर केंद्रित है कि कहीं यह स्पूफिंग किसी आतंकी नेटवर्क या विदेशी एजेंसी जैसे आईएसआई की कोशिश तो नहीं थी।

फरीदाबाद में डॉक्टरों की गिरफ्तारी से बढ़ा शक

जीपीएस स्पूफिंग की घटना के दो दिन बाद फरीदाबाद में पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने 2900 किलो विस्फोटक बरामद किया। इस कार्रवाई में तीन डॉक्टरों डॉ. आदिल अहमद राथर, डॉ. सादिया और डॉ. मुजम्मिल गनी को गिरफ्तार किया गया, जिनके संबंध जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद जैसे आतंकी संगठनों से पाए गए।

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जांच में यह भी सामने आया कि फरीदाबाद में गिरफ्तार आतंकी नेटवर्क दिल्ली में बड़े ब्लास्ट की साजिश रच रहा था, जो बाद में लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुआ।

लाल किला ब्लास्ट में आतंकी मंशा हुई साफ

10 नवंबर की शाम लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास खड़ी एक ह्युंडई आई-20 कार में जोरदार धमाका हुआ।
इसमें अब तक 13 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। सूत्रों के अनुसार, यह फिदायीन हमला था, जिसे जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने अंजाम दिया था।

जांच अधिकारियों का कहना है कि लाल किला को इसलिए चुना गया क्योंकि यह दिल्ली के दिल में स्थित है और इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है। आतंकियों का मकसद यह दिखाना था कि वे भारत की राजधानी के केंद्र तक पहुंच सकते हैं।

GPS Spoofing Delhi Blast Link: हाइब्रिड टेररिज्म का नया चेहरा?

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला केवल ब्लास्ट तक सीमित नहीं है। यह मल्टी-लेयर अटैक था, जिसमें एक साथ साइबर हमला, फिजिकल ब्लास्ट और मनोवैज्ञानिक दहशत फैलाने की कोशिश की गई। इसका उद्देश्य भारत की इकोनॉमी, सिक्योरिटी सिस्टम और जनता के भरोसे को एक साथ झटका देना था।

जानकारों के अनुसार, दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई जीपीएस स्पूफिंग ने उड़ानों की दिशा बदल दी थी। करीब 800 फ्लाइट्स डिले हुईं और 20 से ज्यादा उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इससे करीब 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, जो सीधे तौर पर ट्रेड और टूरिज्म को प्रभावित करता है।

क्या जीपीएस स्पूफिंग इसी साजिश का हिस्सा थी?

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आने वाले हैं। दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां मोसाद और एफएसबी भारत के साथ मिलकर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर रही हैं।

सूत्रों का कहना है कि जीपीएस स्पूफिंग एक सिग्नल जैमिंग रिहर्सल भी हो सकता है, ताकि इन हाई प्रोफाइल दौरों से पहले भारत के एयर डिफेंस सिस्टम की क्षमता परखा जा सके। कुछ सूत्रों का कहना है कि जीपीएस स्पूफिंग और ब्लास्ट दोनों एक ही मास्टर प्लान का हिस्सा थे, जिनका उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देना था।

क्या जीपीएस स्पूफिंग ऑपरेशन सिंदूर का काउंटर-मूव

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के जरिए पाकिस्तान की एयर डिफेंस ग्रिड को कुछ घंटों के लिए डिएक्टिवेट कर दिया था। यह भारत की बड़ी रणनीतिक सफलता मानी जा रही थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अब जीपीएस स्पूफिंग उसी का काउंटर-मूव हो सकता है, यानी भारत को दिखाना कि पाकिस्तान भी उसके एयर नेटवर्क को “ब्लाइंड” कर सकता है। अगर यह सच है, तो यह एक नए तरह का वॉरफेयर है, जहां सैटेलाइट, साइबर और सिग्नल इंटरफेरेंस अब मिसाइलों जितने खतरनाक हथियार बन चुके हैं।

साइलेंस में लड़ी जा रही जंग: साइबर और साइकोलॉजिकल वार

सुरक्षा विशेषज्ञ इसे वॉर फॉट इन साइलेंस कह रहे हैं। जिसमें तीन स्तरों पर हमला किया गया। साइबर अटैक के जरिए भ्रम फैलाना, साइकोलॉजिकल वार के जरिए डर पैदा करना, और फिजिकल ब्लास्ट के जरिए दहशत और नुकसान पहुंचाना।

यह रणनीति भारत की रिस्पॉन्स कैपेसिटी को टेस्ट करने के लिए भी बनाई गई है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह हमला डिस्ट्रक्शन के लिए नहीं बल्कि डिसऑर्डर के लिए किया गया।

एनएसए अजीत डोभाल के नेतृत्व में अब देशभर में एक “डीप क्लीन ऑपरेशन” चलाया जा रहा है। एनआईए, आईबी और रॉ मिलकर उन नेटवर्क्स को ट्रैक कर रहे हैं, जो आईएसआई या विदेशी एजेंसियों से संपर्क में थे। साथ ही इसका असली मास्टरमाइंड कौन है, इसकी की पहचान की जा रही है।

कूटनीतिक दौरों से पहले बढ़ी साजिशें

GPS Spoofing Delhi Blast Link इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद अहम है। जल्द ही भारत में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे तय हैं। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इन दौरों से पहले भारत में अस्थिरता फैलाने की यह कोशिश की गई है। इसके अलावा भारत ने हाल ही में अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक कई नोटाम जारी किए हैं। आधिकारिक तौर पर यह मिसाइल परीक्षणों के लिए हैं, लेकिन सूत्रों के अनुसार, यह कदम भारत के काउंटर-ऑपरेशंस का हिस्सा भी हो सकते हैं।

Guwahati Air display: गुवाहटी में ब्रह्मपुत्र के किनारे ब्रह्मोस के साथ सुखोई-30 ने दिखाए जलवे, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार चिकन नेक कॉरिडोर के पास वायुसेना ने दिखाई ताकत

Guwahati Air display: Su-30MKI BrahMos Rafale SCALP - Indian Air Force’s first flying display in Northeast dazzles Guwahati skies
Guwahati Air display: Su-30MKI BrahMos Rafale SCALP - Indian Air Force’s first flying display in Northeast dazzles Guwahati skies

Guwahati Air display: रविवार को गुवाहटी की सड़कें एयर फोर्स के पोस्टरों से पटी पड़ी थीं। शहर में अलग ही उत्साह नजर आ रहा था। सभी को राफेल की गूंज सुनने का इंजतार था। आखिर पूर्वोत्तर के इस शहर में पहली बार वायुसेना अपने एयरक्राफ्ट का डिस्प्ले जो करने वाली थी। 10 तक तक हम लचित घाट पहुंच गए, जो ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है। लोग सुबह से ही लचित घाट के पुल पर इस एयर शो को देखने के लिए पहुंच चुके थे। हर कोई आतुर था कि कब उन्हें सुखोई-30, तेजस, राफेल के हवाई करतब देखने को मिलेंगे। ब्रहमपुत्र नदी के किनारे एयर शो करने का इरादा केवल जनता की भीड़ जुटाना नहीं था, बल्कि दो पड़ोसी देशों के लिए भी एक साफ संदेश था, कि पूर्वोत्तर में अगर कोई एंडवेंचर करने की सोची भी तो भारतीय वायुसेना मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार है।

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Guwahati Air display: खचाखच भरा था लचित घाट

93वें वायुसेना दिवस समारोह के तहत हुए इस डिस्प्ले शो ने पूर्वोत्तर के आसमान को देशभक्ति और रोमांच से भर दिया। साढ़े 12 बजे एयर शो शुरू हुआ। भीड़ के उत्साह का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लचित घाट खचाखच भरा हुआ था और जो लोग अंदर एंट्री नहीं ले पाए, वे आसपास के मकानों की छत पर खड़े हो कर इस एयर शो के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। हजारों की संख्या में लोग भारतीय वायुसेना की ताकत, अनुशासन और तकनीकी क्षमता को करीब से देखने के लिए बेताब थे।

 

Guwahati Air display: ध्वज फॉर्मेशन से हुई शुरुआत

सुबह से ही लोग गुवाहाटी के लचित घाट और ब्रह्मपुत्र नदी के किनारों पर जमा होने लगे थे। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर कोई आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा था। शुरुआत तीन एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की ध्वज निर्माण (ध्वज फॉर्मेशन) उड़ान से हुई। इसके बाद स्वदेशी तेजस फाइटर जेट ने “लाचित” कॉल साइन के साथ उड़ान भरी।
जैसे ही वायुसेना के विमानों ने उड़ान भरी, आसमान इंजन की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हर बार जब कोई विमान करतब दिखाता, पूरा इलाका तालियों और जयकारों से भर उठता।

Guwahati Air display: 25 से ज्यादा फॉर्मेशन

यह पहली बार था जब पूर्वोत्तर भारत में इतने बड़े पैमाने पर भारतीय वायुसेना ने सार्वजनिक तौर पर अपने लड़ाकू विमानों का प्रदर्शन किया। इस आयोजन में सुखोई-30 एमकेआई, राफेल, तेजस, सी-17 ग्लोबमास्टर, सी-130 हरक्यूलिस, अपाचे हेलीकॉप्टर और सारंग टीम के हेलीकॉप्टर शामिल हुए। इस एयर शो में 25 से ज्यादा फॉर्मेशन हुईं।

ब्रह्मपुत्र के किनारे ब्रह्मोस

इस फ्लाईपास्ट का मुख्य आकर्षण रहा सुखोई-30 एमकेआई की उड़ान, जिसमें उसने ब्रहमपुत्र के घाट पर ब्रह्मोस मिसाइल के साथ उड़ान भरी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार सुखोई-30 सार्वजनिक तौर पर ब्रह्मोस से लैस नजर आया। यह वही ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जिसने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के सैन्य और आतंकी ठिकानों का तबाह कर दिया था। पहली बार इसे किसी सार्वजनिक फ्लाइंग डिस्प्ले में दिखाया गया।

स्कैल्प मिसाइल के साथ दिखा राफेल

इसके साथ ही इसके साथ ही राफेल विमान ने स्कैल्प मिसाइल के साथ शानदार उड़ान भरी। यह लंबी दूरी की और बेहद सटीक वार करने वाली मिसाइल है। स्कैल्प मिसाइल को स्टॉर्म शैडो भी कहा जाता है। ऑपरेशन सिंदूर में राफेल लड़ाकू विमानों ने इस मिसाइल से पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर बेहद सटीक हमले किए और 100 से ज्यादा आतंकियों को ढेर कर दिया। यह फ्रांस से खरीदी लंबी दूरी की स्टेल्थ क्रूज मिसाइल है, जो कम ऊंचाई पर उड़कर रडार से बचती है और डीप स्ट्राइक मिशन, किलेबंद बंकरों, कमांड सेंटरों को भेदने में सक्षम है।

Guwahati Air display दोनों फाइटर जेट्स की कोआर्डिनेटेड फ्लाइट ने संदेश दिया कि भारतीय वायुसेना आधुनिक तकनीक, आत्मनिर्भरता और समन्वय के क्षेत्र में विश्वस्तरीय स्तर पर पहुंच चुकी है।

पहली बराक फॉर्मेशन

वहीं कार्यक्रम में बराक फॉर्मेशन देख कर लोग खुशी से ताली बजाने लगे। बराक फॉर्मेशन भारतीय वायुसेना की एक विशेष एरियल फॉर्मेशन है, जो पहली बार गुवाहाटी के लाचित घाट पर ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर आयोजित 93वें वायुसेना दिवस के भव्य फ्लाइंग डिस्प्ले में शोकेस की गई। बराक को संस्कृत में बिजली या तेज रफ्तार बी कहा जाता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार इस फॉर्मेशन में सुखोई-30, राफेल, मिराज-2000 और स्वदेशी तेजस ने हिस्सा लिया। ये सभी विमान ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल हुए थे, जहां भारतीय वायुसेना ने ने दुश्मन के 12 एयरबेस को निशाना बनाया। यह फॉर्मेशन इनकी एकजुट ताकत को दर्शाती है। जो विमानों की रफ्तार, ताकत और आकस्मिक हमले की क्षमता का प्रतीक है और यह पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक धरोहर से भी जुड़ा है।

महान योद्धा लचित बरफुकन को श्रद्धांजलि

हर फॉर्मेशन का नाम असम और पूर्वोत्तर की संस्कृति से जोड़ा गया था, जैसे होलोंग, काजीरंगा, कंचनजंगा, हाथी और बराक। वायुसेना की टीमों ने लचित, मानस, जैसी फॉर्मेशन में उड़ान भरी। इनमें से लचित फॉर्मेशन एलसीए तेजस विमान ने बनाई थी, जो असम के महान योद्धा लचित बरफुकन को श्रद्धांजलि थी। वहीं अपाचे हेलीकॉप्टरों ने राइनो कॉलसाइन के साथ उड़ान भरी, जो असम के गैंडे की शक्ति का प्रतीक था।

डिस्प्ले के आखिर में सुर्यकिरण एरोबैटिक टीम और सारंग हेलीकॉप्टर टीम ने उड़ान और करतब दिखाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। गुवाहाटी, तेजपुर, हासीमारा और बागडोगरा सहित सात एयरबेसों को हाई अलर्ट पर रखा गया था।

वायुसेना प्रमुख ने बोला थैंक्स

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र वायुसेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहां इस तरह का आयोजन करना लंबे समय से उनकी योजना का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि “हम पिछले दो-तीन सालों से पूर्वोत्तर में फ्लाइंग डिस्प्ले आयोजित करने की तैयारी कर रहे थे। इस बार हमने मौसम को ध्यान में रखते हुए नवंबर का समय चुना ताकि कार्यक्रम सुचारू रूप से हो सके।”

एयर चीफ ने यह भी कहा कि पूर्वोत्तर अब देश का दूरस्थ इलाका नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक शक्ति का अहम केंद्र है। उन्होंने आगे कहा, “यह देखकर दिल खुश हो गया कि गुवाहाटी और आसपास के इलाकों से लाखों लोग पहुंचे। मैं उम्मीद करता हूं कि यहां के युवा बड़ी संख्या में वायुसेना और एविएशन सेक्टर से जुड़ेंगे और देश की सेवा करेंगे।”

भारत हर मोर्चे पर तैयार- हिमंता बिस्वा सरमा

वहीं, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि यह फ्लाइंग डिस्प्ले न केवल पूर्वोत्तर बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा, “चिकन नेक कॉरिडोर के पास इस तरह का एयर शो दुश्मनों के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारत हर मोर्चे पर तैयार है।” उन्होंने जनता का उत्साह देखकर कहा कि “गुवाहाटी ने जिस तरह वायुसेना के साथ एकजुटता दिखाई है, वह असम के गौरव और देशभक्ति की मिसाल है।”

पूर्वोत्तर से जुड़ाव और सुरक्षा पर फोकस

इस कार्यक्रम के आयोजन में अहम भूमिका निभाने वाले ईस्टर्न एयर कमांड के एयर मार्शल सुरत सिंह ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्वोत्तर के लोगों से जुड़ाव बढ़ाना है। उन्होंने बताया कि अरुणाचल प्रदेश में आठ एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड पूरी तरह ऑपरेशनल हैं और वायुसेना नियमित रूप से यहां अभ्यास करती है।

उन्होंने कहा, “पूर्वी सीमा क्षेत्र में हमारी तैयारी पूरी है। चाहे दिन हो या रात, हमारे फाइटर, ट्रांसपोर्ट और हेलीकॉप्टर मिशन लगातार चलते रहते हैं। हाल ही में हमने सेना के साथ मिलकर बड़ी सफलता से संयुक्त अभ्यास भी किया है।”

युवाओं में दिखा खास जोश

फ्लाइंग डिस्प्ले के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर वीडियो और तस्वीरें साझा कीं। कई लोगों ने लिखा कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार वायुसेना का ऐसा शानदार प्रदर्शन देखा। युवाओं में खास जोश देखा गया और कई ने भारतीय वायुसेना में करियर बनाने की इच्छा जाहिर की।

यह दिन गुवाहाटी और पूरे उत्तर-पूर्व के लिए यादगार बन गया। भारतीय वायुसेना का यह फ्लाइंग डिस्प्ले सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारत की ताकत, आत्मनिर्भरता और एकता का प्रतीक बन गया। ब्रह्मपुत्र के किनारे आसमान में फाइटर जेट के इंजनों की गड़गड़ाहट ने साबित किया कि भारतीय वायुसेना हर परिस्थिति में देश की सुरक्षा के लिए तैयार है।

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Pakistan Commander of Defence Forces

Pakistan Commander of Defence Forces: पाकिस्तान ने अपने सैन्य ढांचे में बड़ा सुधार करने की योजना बनाई है, जिसमें एक नया पद कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) बनाया जाएगा। यह पद भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की तरह होगा, जिसका मकसद तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल और इंटीग्रेटेड कमान बनाना है।

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यह प्रस्ताव 27वें संविधान संशोधन के तहत संसद में पेश किया जाएगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह बदलाव “आधुनिक युद्ध की जरूरतों और हाल के भारत-पाक संघर्ष से मिले सबक” के आधार पर किया जा रहा है।

Pakistan Commander of Defence Forces: भारत से प्रेरित पाकिस्तान का नया सैन्य मॉडल

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस्लामाबाद ने यह तय किया कि उसकी तीनों सेनाओं को इंटीग्रेटेड कमांड के तहत काम करने की जरूरत है। यह वही रणनीतिक सोच है, जिसने भारत को 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद बनाने के लिए प्रेरित किया था। पाकिस्तान के अखबार द न्यूज के अनुसार, नया कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस पद उसी तर्ज पर तैयार किया जा रहा है।

Pakistan Commander of Defence Forces: पाकिस्तान के संविधान में बड़ा बदलाव

यह नया पद पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 243 में संशोधन करके लाया जाएगा। अभी तक यह अनुच्छेद कहता है कि सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति के पास है और नियंत्रण संघीय सरकार के हाथों में। लेकिन अब इस कमान स्ट्रक्चर को बदलने की योजना है ताकि सीडीएफ को केंद्रीय भूमिका मिल सके।

Pakistan Commander of Defence Forces: रक्षा मंत्री ने की पुष्टि

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मीडिया से बात करते हुए पुष्टि की कि सरकार आर्टिकल 243 में बदलाव पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा, “रक्षा जरूरतें बदल गई हैं। इसीलिए कानून में संशोधन की जरूरत महसूस की जा रही है। यह पूरा काम आपसी सलाह-मशवरे से किया जाएगा।” इस बयान के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान अब अपनी सशस्त्र सेनाओं के ढांचे में एक नया शीर्ष पद जोड़ने जा रहा है, जो तीनों सेनाओं को एक छतरी के नीचे लाएगा।

संसद में आएगा 27वां संशोधन

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने घोषणा की कि सरकार जल्द ही 27वें संविधान संशोधन को संसद में पेश करेगी। हालांकि अभी इस संशोधन का आधिकारिक ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके प्रमुख बिंदुओं में आर्टिकल 243 में बदलाव का प्रस्ताव शामिल है। मौजूदा आर्टिकल 243 के अनुसार, “संघीय सरकार सशस्त्र बलों की कमान और नियंत्रण रखेगी, और राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च कमान के पद पर होंगे।”

नए संशोधन के जरिये यह तय किया जा सकता है कि कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस इस कमान स्ट्रक्चर में केंद्रीय भूमिका निभाएंगे, जिससे तीनों सेनाओं के बीच तुरंत फैसले और ऑपरेशनल कॉर्डिनेशन बनाया जा सके।

फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के हाथों में और पावर

रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार द्वारा लाया जा रहा यह बदलाव फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका को और मजबूत करेगा। पाकिस्तान में पहले भी यह चर्चा रही है कि सेना प्रमुख ही देश की असली शक्ति केंद्र है, लेकिन अब संवैधानिक संशोधन के जरिये इस भूमिका को कानूनी रूप से वैध बनाने की कोशिश हो रही है।

सेना और सरकार के बीच नई साझी कमान

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के नए प्रस्ताव में भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसे मॉडल की झलक दिखती है। भारत ने इसे 2019 में अपनाया था। इस पद के जरिये पाकिस्तान की तीनों सेनाएं एकीकृत तरीके से काम करेंगी, ताकि संकट की स्थिति में तेजी से सैन्य कार्रवाई हो सके।

सूत्रों के मुताबिक, इस नई प्रणाली के तहत सीडीएफ सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को रिपोर्ट करेगा, लेकिन व्यवहारिक रूप से उसकी शक्ति फील्ड मार्शल के हाथों में ही रहेगी।

अगर यह संशोधन पारित होता है, तो यह पाकिस्तान की सैन्य-संविधान व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा। इससे सेना को संविधान में एक औपचारिक स्थान मिलेगा और नागरिक सरकार की भूमिका सीमित हो सकती है।

विशेषज्ञों ने जताई चिंता

पाकिस्तान में संविधान विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक प्रणाली को कमजोर कर सकता है और सेना की शक्ति को संवैधानिक दर्जा देकर सिविल-मिलिट्री संतुलन को असंतुलित करेगा।

पख्तून नेता मोहन डावर ने इसे “18वें संशोधन को पलटने की कोशिश” बताया है। 18वें संशोधन ने प्रांतों को प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए थे, जिससे सेना का नियंत्रण सीमित हो गया था।

रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि पंजाब, सिंध और के-पी के राजनीतिक समीकरण इस संशोधन को किस तरह देखते हैं, यह भी अहम होगा। 18वें संशोधन के बाद प्रांतों को जो आर्थिक शक्ति मिली थी, उससे मिलिट्री को राष्ट्रीय संसाधन पर सीमित पहुंच होने की शिकायत रही है। अब जो बदलाव सुझाए जा रहे हैं, उनमें एनएफसी से जुड़ी शक्तियों में फेरबदल भी शामिल बताया जा रहा है ताकि रक्षा निवेश और परियोजनाओं पर केंद्रीय नियंत्रण कायम किया जा सके।

27वें संशोधन के प्रमुख बिंदु

हालांकि आधिकारिक मसौदा अभी सामने नहीं आया, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में लीक हुए कुछ अंश बताते हैं कि प्रस्तावित संशोधन में ये बातें शामिल हो सकती हैं। इनमें कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस का नया पद, जो तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान संभालेगा। सेना प्रमुख को फील्ड मार्शल के रूप में पांच साल का निश्चित कार्यकाल दिया जा सकता है। इसके अलावा सेना और खुफिया एजेंसियों की नियुक्ति का अधिकार फील्ड मार्शल को दिए जा सकते हैं। साथ ही आर्टिकल 243 में संशोधन करके सशस्त्र बलों के नियंत्रण की परिभाषा भी बदली जा सकती है।

पाकिस्तान के लिए बदलता शक्ति समीकरण

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 27वां संशोधन पाकिस्तान की पावर स्ट्रक्चर को स्थायी रूप से बदल सकता है। अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पाकिस्तान का सैन्य ढांचा एक नए केंद्रीकृत मॉडल में बदल जाएगा, जहां फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को “कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस” और वास्तविक शक्ति की भूमिका मिलेगी।

इसके अलावा, चर्चा यह भी है कि प्रस्तावित बदलावों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसे पदों और जॉइंट कमान स्ट्रक्चर को नया स्वरूप दिया जा सकता है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ज्वाइंट चीफ्स की भूमिका बदल सकती है और नए उप-सेना प्रमुख या समांतर पद बन सकते हैं जो सीधे फील्ड मार्शल या कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस के अधीन होंगे।

भारत के सीडीएस मॉडल से समानता

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान का नया सीडीएफ पद भारत के सीडीएस मॉडल से काफी मिलता-जुलता है। दोनों देशों में इसका मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस और इंटीग्रेटेड कमांड स्ट्रक्चर को मजबूत करना है।

भारत में सीडीएस को 2019 में कारगिल युद्ध और अन्य अनुभवों से सबक लेकर बनाया गया था। पाकिस्तान ने अब 2025 के संघर्ष के बाद यही रास्ता अपनाने का फैसला किया है। पाकिस्तान में यह पद मौजूदा चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (सीजेसीएससी) की जगह ले सकता है। यह नया पद तीनों सेनाओं का टॉप कॉर्डिनेटर होगा, जैसा भारत में सीडीएस करते हैं।

लेकिन फर्क भी हैं

भारत में सीडीएस चार-सितारा जनरल होता है, जो रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स का सचिव होता है। सीडीएस रक्षा नीति, प्रशिक्षण और संसाधन आवंटन से जुड़े मुद्दों पर प्राथमिकता तय करता है, लेकिन तीनों सेनाओं की ऑपरेशनल कमांड अभी भी उनके-अपने प्रमुखों के पास रहती है।

इसके विपरीत, पाकिस्तान में प्रस्तावित सीडीएफ को संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत कानूनी अधिकार दिए जा सकते हैं, जिससे वह सीधे तीनों सेनाओं की कमान संभाल सकेगा। यह बदलाव सेना प्रमुख को अभूतपूर्व शक्ति देगा और नागरिक सरकार की निगरानी कम कर सकता है।

Sir Creek Indian Army: सर क्रीक में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा भारत, सेना को चाहिए लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट और फास्ट पेट्रोल बोट्स, जारी की RFP

Sir Creek Indian Army

Sir Creek Indian Army: भारत ने अपनी पश्चिमी सीमा, खास तौर पर सर क्रीक इलाके की सुरक्षा को लेकर जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। एक तरफ जहां सर क्रीक इलाके पास तीनों भारतीय सेनाएं 13 नवंर तक ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज त्रिशूल कर रही हैं, तो वहीं रक्षा मंत्रालय ने इस इलाके की संवेदनशीलता को देखते हुए दो अहम रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) भी जारी किए हैं। इनमें से एक आरएफपी भारतीय सेना के लिए लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट (एलसीए) के लिए तो दूसरी फास्ट पेट्रोल बोट के लिए जारी की गई हैं। इनका उद्देश्य सीमा की निगरानी, सैनिकों की आवाजाही और समुद्री गश्त की क्षमता को मजबूत करना है।

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हाल ही में 6 नवंबर को जारी की गई आरएफपी में सेना आठ लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स खरीदेगी। इन नौकाओं को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वे दलदली, उथले और संकरे जलमार्गों में भी ऑपरेशन कर सकें। वहीं, 21 अक्टूबर को जारी की गई आरएफपी के तहत छह फास्ट पेट्रोल बोट खरीदी जाएंगी। ये नौकाएं तेज गश्त, निगरानी और तस्करी या घुसपैठ के मामलों में तुरंत जवाबी कार्रवाई करने में मदद करेंगी।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक ये दोनों प्रोजेक्ट्स ‘बॉय (इंडियन-आईडीडीएम)’ कैटेगरी में रखे गए हैं, यानी दोनों का निर्माण पूरी तरह भारत में होगा। इसमें कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल जरूरी होगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन परियोजनाओं को एमएसएमई उद्योगों के लिए भी खोला गया है, ताकि छोटे और मझोले उद्योग भी रक्षा उत्पादन में सक्रिय भागीदारी कर सकें।

Sir Creek Indian Army: सर क्रीक इलाका है बेहद संवेदनशील

सर क्रीक को अक्सर भारत की “वेस्टर्न नेवल बॉटलनेक” कहा जाता है। यह वही इलाका है जहां से अरब सागर तक पहुंचने वाला रास्ता गुजरता है। इसलिए यह नौसैनिक रणनीति और कोस्टल डिफेंस दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। सर क्रीक इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच फैला लगभग 96 किलोमीटर लंबा दलदली इलाका है, जो गुजरात के कच्छ जिले से अरब सागर तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र दशकों से सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, क्योंकि यहां की मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों के चलते पारंपरिक गश्त और निगरानी बेहद कठिन होती है। इस इलाके में पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ, तस्करी और जासूसी जैसी गतिविधियों की कई बार कोशिश की जा चुकी है। इसलिए, भारतीय सेना ने अब एडवांस तकनीक वाली बोट्स की तैनाती के जरिए इस क्षेत्र को और सुरक्षित करने का फैसला किया है।

लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स की सर क्रीक में तैनाती

सेना के अनुसार, लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स की तैनाती सर क्रीक में लखपत–लक्की नाला (गुजरात) क्षेत्र और असम के गुवाहाटी में की जाएगी। इनमें से चार नौकाएं गुजरात में और चार असम में तैनात होंगी। इनका मुख्य उद्देश्य सीमाई और जलीय इलाकों में सैनिकों, वाहनों और सामग्री की आवाजाही को तेज बनाना है। ये नौकाएं लगभग 25 नॉट्स (46 किमी प्रति घंटे) की गति से चल सकती हैं और लगभग 10 टन तक का भार उठा सकती हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि ये –15°C से +50°C तक तापमान में आसानी से काम कर सकें। आरएफपी के मुताबिक इसे समुंदर के साथ-साथ उथले क्रिक इलाकों, सर क्रीक, ब्रह्मपुत्र नदी, सुंदरबन डेल्टा और पूर्वी लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में काम करने के लिये तैनात किया जाएगा।

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आरएफपी में कहा गया है कि ये लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स कई आधुनिक सिस्टम, जैसे जीपीएस-ग्लोनास आधारित नेविगेशन सिस्टम, ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम, लो-पावर रडार, इको साउंडर, वीएचएफ रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम, और एआईजे लेवल-III बुलेट रेसिस्टेंट प्रोटेक्शन से लैस होनी चाहिए। इनका कंट्रोल एक मल्टी-फंक्शन कंसोल से होगा, जो रडार, जीपीएस और एआईएस डेटा को एक साथ शो करेगा। इन नौकाओं को आईपी66/आईपी67 वाटरप्रूफिंग मानकों का भी पालन करना होगा, ताकि ये हर मौसम में काम कर सकें।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद पहले 9 महीने में पहली प्रोटोटाइप बोट तैयार की जाएगी, जबकि बाकी बोट्स 24 महीने के भीतर सेना को सौंप दी जाएंगी। इन नौकाओं के साथ कंप्यूटर-बेस्ड ट्रेनिंग मॉड्यूल और मेंटेनेंस सिमुलेटर भी दिया जाएगा, ताकि सैनिकों को ऑपरेशन और मेंटेनेंस की भी ट्रेनिंग मिल सके।

क्या हैं लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट?

‘लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट एक ऐसी तेज रफ्तार और मल्टीपर्पज बोट होती है, जिसका इस्तेमाल सैनिकों, हथियारों और हल्के वाहनों को पानी के रास्ते तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल दलदली तटीय क्षेत्र, नदी मार्ग या उथले समुद्री इलकों में किया जाता है, जहां सड़क या पुल से पहुंचना मुश्किल होता है।

इस नाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम गहराई वाले पानी (शैलो वाटर) में भी आसानी से चल सकती है। इसलिए इसे सर क्रीक (गुजरात), ब्रह्मपुत्र नदी (असम) या सुंदरबन डेल्टा (पश्चिम बंगाल) जैसे इलाकों के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है।

इनकी लंबाई लगभग 13–14 मीटर के आसपास होती है। इनकी पेलोड क्षमता 10 टन तक, यानी यह एक प्लाटून को पूरे कॉम्बैट लोड के साथ या हल्के सैन्य वाहनों को ले जा सकती है। ये कंपोजिट फाइबर रिइनफोर्स्ड स्ट्रक्चर की बनी होती हैं, जिससे हल्की और मजबूत बनी रहती हैं। इस नाव में बुलेट-रेसिस्टेंट केबिन भी होता है, जिससे यह दुश्मन की गोलीबारी के बीच भी सुरक्षित रह सकती है।

सेना को चाहिए 6 फास्ट पेट्रोल बोट्स

वहीं, फास्ट पेट्रोल बोट्स को भी सर क्रीक के अलावा कच्छ और लखपत के तटीय इलाकों में तैनात किया जाएगा। ये बोट्स तेज रफ्तार वाली और हल्के वजन वाली होंगी। इनका डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि वे 35 नॉट्स तक की स्पीड से चल सकें और सीमाई इलाकों में तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें। ये नौकाएं मुख्य रूप से निगरानी, घुसपैठ-रोधी मिशन, सर्च एंड रेस्क्यू और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए इस्तेमाल की जाएंगी।

आरएफपी के मुताबिक इन नौकाओं में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक पूरी तरह से स्वदेशी होगी। डिजाइन का स्वामित्व भारतीय कंपनियों के पास होगा और उत्पादन भारतीय शिपयार्ड्स में किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत आने वाली कंपनियों को यह प्रमाणित करना होगा कि उनकी तकनीक और निर्माण पूरी तरह देश के अंदर किया गया है। रक्षा मंत्रालय ने इन नौकाओं के रखरखाव के लिए लाइफ-साइकिल सपोर्ट सिस्टम भी अनिवार्य किया है, ताकि आने वाले वर्षों में मरम्मत और अपग्रेडेशन के लिए विदेशी निर्भरता न रहे।

सर क्रीक में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है पाकिस्तान

60 साल पहले पाकिस्तान के पहले तानाशाह अयूब खान ने कच्छ में फौजी हमला किया था। 1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन डेजर्ट हॉक के तहत इसी इलाके में हमला किया था। लेकिन भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। हाल ही में सर क्रीक इलाके में पाकिस्तान ने तेजी से गतिविधियां बढ़ाई हैं। पाकिस्तान वहां मिनी-कैंटोनमेंट, एयरस्ट्रिप बनाए हैं। सैटेलाइट इमेजरी के मुताबिक पाकिस्तान ने वहां कई छोटे मिनी-कैंटोनमेंट और मिलिट्री कॉम्प्लेक्स बनाए हैं। ये 150 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैले हैं, जहां सिविलियंस का प्रवेश बैन है। पाकिस्तान की मरीन फोर्स ने सर क्रीक के रह-दा-पिर इलाके में एक नई मिलिट्री बैरक भी बनाई है।

इसके अलावा आपातकालीन हवाई पट्टियां बनाईं हैं, जो फाइटर जेट्स या ड्रोन्स के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं। साथ ही दर्जनों कोस्टल डिफेंस बोट्स, मरीन असॉल्ट क्राफ्ट्स, नेवल शिप्स और पैट्रोलिंग स्पीडबोट्स की भी तैनाती की है। इसके अलावा 31वीं और 32वीं क्रीक बटालियन्स के हेडक्वार्टर भी सुझावल और घारो में बनाए हैं। यही नहीं, पाकिस्तान ने वहां तीन ग्रिफॉन 2400टीडी हॉवरक्राफ्ट इंडक्ट किए हैं, जो दलदली इलाके में तेज रफ्तार से चल सकते हैं।

क्या सर क्रीक से मुंबई हमलों जैसी साजिश रच रहा पाकिस्तान

सर क्रीक में पाकिस्तान की गतिविधियां इस कदर बढ़ चुकी हैं कि दशहरा के मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भुज का दौरा किया था। जहां से उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि अगर पाकिस्तान सर क्रीक में कोई हिमाकत करेगा तो हम इतना जोरदार जवाब देंगे कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे। उन्होंने यह बयान उस समय दिया जब भारत की खुफिया रिपोर्टों ने पाकिस्तान की नई सैन्य तैयारियों की पुष्टि की थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों का कहना है कि यह पाकिस्तान का “जमीनी हकीकत बदलने का प्रयास” है ताकि विवादित इलाकों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

वहीं, 25 अक्टूबर को पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख एडमिरल नवेद अशरफ ने सर क्रीक के आगे के ठिकानों का दौरा किया था और कहा था, “सर क्रीक से जिवानी तक, पाकिस्तान अपने हर इंच समुद्री मोर्चे की रक्षा करेगा।” पाकिस्तान ने अपनी नौसेना को “हाई रेडीनेस मोड” में डाल दिया है और समुद्री सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी है।

सरकार के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान यहां से 26-11 जैसे मुंबई हमले जैसे साजिश को अंजाम देने की साजिश रच रहा है और यहां से आतंकियों को भारत में भेजने में की रणनीति बना रहा है, ताकि बड़ा आतंकी वारदातों को अंजाम दिया जा सके।

बता दें कि मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने कच्छ में सरदार पोस्ट और विगोकोट पर गोले बरसाए थे। 10 मई को एक पाकिस्तानी ड्रोन को गांव के पास मार गिराया था।

डायनामिक मैरीटाइम रेडीनेस की नीति

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह परियोजना केवल सुरक्षा बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि भारतीय सीमाएं न केवल सुरक्षित रहें बल्कि हर प्रकार के ऑपरेशन के लिए तैयार भी रहें। यह परियोजना उस दिशा में एक ठोस कदम है।”

सर क्रीक क्षेत्र में इन नौकाओं की तैनाती पाकिस्तान के लिए भी एक स्पष्ट संदेश मानी जा रही है। भारत ने अब इस क्षेत्र में डायनामिक मैरीटाइम रेडीनेस की नीति अपनाई है, जिसमें केवल रक्षा नहीं बल्कि तुरंत जवाबी कार्रवाई और आक्रामक निगरानी को प्राथमिकता दी गई है।

सर क्रीक की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कदम बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह इलाका न केवल पाकिस्तान से सटा हुआ है, बल्कि यहां से अरब सागर तक सीधी पहुंच होने के कारण यह एक महत्वपूर्ण सामरिक गलियारा भी है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन नई नौकाओं की तैनाती से भारत की सीमा पर निगरानी, खुफिया गतिविधियों और रैपिड रेस्पॉन्स क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।

Chicken Neck Corridor: मोहम्मद यूनुस को पाकिस्तानी जनरल शमशाद मिर्जा को किताब गिफ्ट करना पड़ा भारी! भारत ने चिकन नेक पर कसी ‘नकेल’

Chicken Neck Corridor
1. General Sahir Shamshad Mirza, paid a courtesy call on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna late Saturday. 2. Mehmet Akif Yılmaz, Member of the Turkish Parliament and Chairperson of the Türkiye-Bangladesh Parliamentary Friendship Group, called on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna on Monday

Chicken Neck Corridor: हाल ही में भारत ने बांग्लादेश सीमा से सटे कुछ संवेदनशील भारतीय इलाकों में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। ये नए सैन्य ठिकाने बांद्रा-धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोप्रा जिले के पास बनाए गए हैं। इन स्थानों को चुना गया है क्योंकि इन्हें सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माना गया है और ये सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम बोलचाल में “चिकन-नेक” (Chicken Neck Corridor) कहा जाता है, उसके नजदीक स्थित हैं। यह कॉरिडोर ही वह रास्ता है जिसके जरिए भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और सिक्किम से जुड़ा हुआ है।

Chicken Neck Corridor: चिकन नेक के आसपास बढ़ाया ऑपरेशनल कंट्रोल

सरकारी और खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इन तीनों इलाकों को भारत की सीमा सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता था। अब इन इलाकों में सेना की मौजूदगी बढ़ने से भारत की सीमा सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। इस कदम को केवल सामरिक नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। इस कदम के तहत भारतीय सेनाओं ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास लगभग 60 किलोमीटर तक अपना ऑपरेशनल कंट्रोल बढ़ा दिया है।

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सरकारी सूत्रों ने कहा कि इन नए सैन्य ठिकाने का मुख्य मकसद सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाना और जरूरी होने पर तुरंत जवाबी कार्रवाई करना है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर (Chicken Neck Corridor) बेहद ही संकरा कॉरिडोर है, जो भारत को नौ उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ता है। इस कॉरिडोर की चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 22 किलोमीटर है और इसलिए इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील माना जाता है। उसी को ध्यान में रख कर सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जा रहा है।

अगर इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो भारत का पूर्वोत्तर देश के बाकी हिस्से से कट सकता है। इसलिए, भारत ने इस क्षेत्र में सैन्य ढांचे को मजबूत करने और लगातार निगरानी बढ़ाने का फैसला लिया है।

Chicken Neck Corridor: ढाका में विवादास्पद घटना के बाद भारत का कदम

भारत का यह फैसला उस घटना के बाद आया है, जब 25 अक्टूबर को ढाका में एक बैठक के दौरान बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा को एक किताब भेंट की थी। जिसमें भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को “ग्रेटर बांग्लादेश” का हिस्सा दिखाया गया था। यह घटना भारत के लिए एक साफ राजनीतिक संदेश मानी गई और नई दिल्ली ने इसे उकसावे की कार्रवाई बताया।

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सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा “ग्रेटर बांग्लादेश” जैसे विचारों को बढ़ावा देना दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश है। भारत ने इस पर संयम बरतते हुए भी अपने इस नए इंफ्रास्ट्रक्चर (Chicken Neck Corridor) को एक्टिव कर दिया है।

हालांकि केंद्र सरकार का रुख अभी भी संवाद और क्षेत्रीय सहयोग की ओर है, लेकिन उसे यह साफ भी बताया गया है कि देश की संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बांग्लादेश में हुई इस घटना के बाद से भारत में कई वर्गों में निराशा और चिंता है। भारत ने 1971 में बांग्लादेश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी और तब से दोनों देशों के बीच एतिहासिक मित्रता रही है। लेकिन हालिया घटनाओं को इस रिश्ते में दरार डालने वाला माना जा रहा है। भारत में इस बात पर भी नाराजगी है कि पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे विवाद में फिर से उभरकर सामने आई है।

सरकारी और खुफिया सूत्रों ने बताया कि इन तीन नये सैन्य ठिकानों (Chicken Neck Corridor) में रोटेशनल टुकड़ियां, इलाके की निगरानी के आधुनिक संसाधन, कॉन्वॉय मॉनिटरिंग सिस्टम और लोकल लायजन यूनिट्स शामिल होंगी। ये स्थानीय सिविल प्रशासन और सीमा बलों के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि सीमापार गतिविधियों पर सटीक जानकारी मिले और किसी भी असामान्य गतिविधि का समय पर जवाब दिया जा सके।

तीनों नए ठिकानों से भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में रियल-टाइम निगरानी और रैपिड रिस्पॉन्स क्षमता मिलेगी। अब अगर किसी भी सीमा पार गतिविधि का संकेत मिलता है, तो भारतीय बल तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे। इन ठिकानों से ड्रोन नेटवर्क, इंटेलिजेंस यूनिट्स और रडार सिस्टम्स को भी जोड़ा गया है।

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की कम्प्रिहेंसिव बॉर्डर स्ट्रैटेजी (Chicken Neck Corridor) का हिस्सा है। इसके तहत सरकार डिप्लोमेसी, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और मिलिट्री प्रिपेयर्डनेस तीनों को एक साथ जोड़ रही है, ताकि सीमाओं पर हर प्रकार के खतरे का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

Tughril vs Nilgiri Class: पाक नेवी में चीन की ‘स्विस आर्मी नाइफ’ फ्रिगेट्स, तुघरिल के सामने भारत का नीलगिरी, कौन है ज्यादा ताकतवर?

Tughril vs Nilgiri Class
Tughril vs Nilgiri Class

Tughril vs Nilgiri Class: चीन से मिली टाइप 054ए/पी क्लास की जंगी तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स को पाकिस्तान की नौसेना ने अपने बेड़े में शामिल किया है। पाकिस्तान नौसेना के प्रमुख एडमिरल नविद अशरफ ने इसे चीन के साथ रक्षा सहयोग के इतिहास में एक “महत्वपूर्ण उपलब्धि” बताया है। उन्होंने कहा कि इन जहाजों के शामिल होने से पाकिस्तान नौसेना की मल्टी-मिशन क्षमताएं खास तौर पर एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री निगरानी—काफी मजबूत हुई हैं।

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बीजिंग स्थित सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में एडमिरल अशरफ ने कहा कि पाकिस्तान नौसेना को 2026 तक चीन से आठ नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां मिलने वाली हैं। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग सिर्फ जहाजों या पनडुब्बियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में यह संबंध और गहरे होंगे।

Tughril vs Nilgiri Class: पाकिस्तान के लिए रणनीतिक बढ़त

इन फ्रिगेट्स का इस्तेमाल पाकिस्तान नौसेना उत्तर अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में गश्त और निगरानी के लिए कर रही है। पाकिस्तान ने 2017 में चीन से चार ऐसी फ्रिगेट्स का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहली ‘तुघरिल’ फ्रिगेट नवंबर 2021 में पाकिस्तान को मिली। ये सभी जहाज चीन की चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बनाए हैं। अब तक पाकिस्तान को चार तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स मिल चुकी हैं जिनमें पीएनएस तुघरिल, पीएनएस तैमूर, पीएनएस टिप्पू सुल्तान और पीएनएस शाहजहां शामिल हैं।

PNS Tughril Class
PNS Tughril Class

पाकिस्तान नौसेना ने इन जहाजों को “तुघरिल क्लास” नाम दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये फ्रिगेट्स लो-रडार डिजाइन वाली हैं और विशेष रूप से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए कस्टमाइज की गई हैं। अब तक पाकिस्तान को चार जहाज मिल चुके हैं और आने वाले सालों में चार और की डिलीवरी की योजना है।

Tughril vs Nilgiri Class: चीन का भरोसेमंद ‘मल्टी-रोल’ वॉरशिप

चीन की नौसेना ने पहली टाइप 054ए फ्रिगेट वर्ष 2008 में सेवा में शामिल की थी। कहा जाता है कि इसका डिजाइन फ्रांस की ला फयेते-क्लास फ्रिगेट से प्रेरित है। नाटो में इस जहाज को जियांगकाई-II नाम से पहचाना जाता है। 2023 तक चीन की नौसेना के पास ऐसी 30 से ज्यादा फ्रिगेट्स थीं, जिससे साफ है कि इस जहाज पर चीन को काफी भरोसा है।

विशेषज्ञ इसे “स्विस आर्मी नाइफ” जैसी मल्टीपर्पज शिप कहते हैं, क्योंकि यह एक साथ कई मिशन जैसे कि पेट्रोलिंग, एस्कॉर्ट, एंटी पायरेसी और नॉन कॉम्बैट मिशन पूरे कर सकता है। चीन ने पहली बार इसी जहाज का इस्तेमाल 2011 में लीबिया से अपने नागरिकों को निकालने के लिए किया था।

क्या फायदा होगाा पाकिस्तान की नौसेना को

इन टाइप 054ए/पी जहाजों की लंबाई 134 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। ये चार शांक्सी 16पीए6 एटीसी डीजल इंजनों से चलती हैं, जो 5700 किलोवॉट की ताकत देती हैं। जहाज की अधिकतम रफ्तार 27 नॉट्स यानी करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह 8,000 नौटिकल मील तक सफर कर सकता है।

हथियारों की बात करें तो यह फ्रिगेट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है। एयर डिफेंस के लिए इसमें 32-सेल वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) लगा है, जो एलवाई-80एन सरफेस-टू-एयर मिसाइलें दाग सकता है। सतह से सतह पर हमला करने के लिए इसमें सीएम-302 एंटी-शिप मिसाइलें लगी हैं। पनडुब्बियों से निपटने के लिए इसमें टाइप 87 रॉकेट लॉन्चर और यू-7 टॉरपीडो लॉन्चर मौजूद हैं।

करीबी लड़ाई के लिए इस जहाज में 76 मिमी का मरीन कैनन एच/पीजे-26 और दो टाइप 1130 क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगे हैं, जो आने वाली किसी भी मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर सकते हैं। साथ ही इसमें दो टाइप 726-4 डिकॉय लॉन्चर भी हैं जो गाइडेड मिसाइलों को भी कन्फ्यूज कर सकते हैं।

एडमिरल नविद अशरफ ने कहा कि इन आधुनिक जहाजों के आने से पाकिस्तान नौसेना को नई तकनीकी ताकत मिली है। चीन और पाकिस्तान के बीच यह सहयोग रक्षा उत्पादन में गहराई तक पहुंच चुका है। पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में चीन से सिर्फ युद्धपोत ही नहीं, बल्कि ड्रोन, मिसाइल और रडार सिस्टम जैसी तकनीकें भी हासिल की हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान को एक फ्रिगेट की कीमत लगभग 348 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 2,900 करोड़ रुपये पड़ी है। चीन के लिए भी यह उसकी अब तक की सबसे बड़ी मरीन एक्सपोर्ट डील मानी जा रही है।

भारत का नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा रणनीतिक महत्व का विषय रहा है। पाकिस्तान को चीन से मिलने वाले ये जहाज भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती साबित हो सकते हैं। वहीं, भारत ने भी नौसेना के आधुनिकीकरण के तहत प्रोजेक्ट 17ए शुरू किया है, जिसके तहत नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स तैयार की जा रही हैं।

INS Nilgiri Class
INS Nilgiri Class

इनका निर्माण मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स कर रहे हैं। 2025 तक चार जहाज आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस हिमगिरी, आईएनएस उदयगिरी और आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं।

इन जहाजों का वजन लगभग 6,500 टन है, यानी यह पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से करीब 60 फीसदी भारी हैं। इनमें 75 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक का उपयोग किया गया है। निलगिरी क्लास जहाज स्टील्थ डिजाइन पर आधारित हैं, जिससे रडार पर इनका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है।

इनमें बराक-8 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें और वरुणास्त्र टॉरपीडो जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। ये जहाज एमएफ-स्टार रडार सिस्टम से लैस हैं, जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और मिसाइल गाइडेंस देता है।

भारत के पास एमएच-60आर मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर भी हैं, जो समुद्र में पनडुब्बियों की पहचान और उन्हें नष्ट करने में सक्षम हैं। नीलगिरी क्लास की गति लगभग 30 नॉट्स (55 किमी/घंटा) और रेंज 8,000 नौटिकल माइल्स तक है।

Tughril vs Nilgiri Class: तुघरिल Vs नीलगिरी

अगर सीधी तुलना की जाए तो भारत की नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स तकनीक, मारक क्षमता और सेंसर सिस्टम के मामले में पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से कहीं आगे हैं।

तुघरिल क्लास में सीएम-302 मिसाइलें हैं जिनकी रेंज लगभग 250 किलोमीटर है, जबकि नीलगिरी क्लास की ब्रह्मोस मिसाइलें 300 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेद सकती हैं और तीन गुना तेज मैक 3 की रफ्तार से उड़ती हैं।

पाकिस्तान की फ्रिगेट्स में टाइप 382 3डी रडार है, जबकि भारत की निलगिरी क्लास में एमएफ-स्टार एईएसए रडार लगा है, जो ज्यादा सटीक और लंबी दूरी तक टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में भी भारत को बढ़त हासिल है। निलगिरी क्लास में वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस सोनार सिस्टम और एमएच-60आर हेलीकॉप्टर शामिल हैं, जबकि पाकिस्तान की फ्रिगेट्स अभी भी चीन की पारंपरिक तकनीक पर निर्भर हैं।

2025 में भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन

भारत की नौसेना अब “बिल्डर नेवी” बन चुकी है। 2025 में ही भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन किए हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक 175 से अधिक जहाजों का बेड़ा तैयार करना है।

भारत की प्रोजेक्ट 17बी योजना के तहत नई पीढ़ी की स्टील्थ फ्रिगेट्स बनाई जा रही हैं, जिनमें 75 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी तकनीक होगी। इसके अलावा, नौसेना में राफेल-एम लड़ाकू विमान, टेडबीएफ और कलवरी क्लास पनडुब्बियां शामिल हो रही हैं।

IAF World Record: 32,000 फीट की ऊंचाई से जंप कर वायुसेना ने ‘अनजाने’ में बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड! DRDO के मिलिट्री पैराशूट से लगाई थी छलांग

Highest Military Parachute Deployment
Wing Commander Vishal Lakhesh, VM (G) Team Lead, High Altitude Parachute Trials DRDO

IAF World Record: वायुसेना और डीआरडीओ ने पिछले दिनों कुछ ऐसा कारनामा कर दिया जिसकी खुद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। 15 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना ने 32,000 फीट की ऊंचाई से सफलतापूर्वक मिलिट्री पैराशूट से छलांग लगाई थी। इस खास मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ ने स्वदेश में ही तैयार किया गया है। लेकिन जंप के दौरान किसी को अंदाजा नहीं था कि यह वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकता है।

Military Combat Parachute System: डीआरडीओ ने रचा इतिहास, 32,000 फीट से किया स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट का सफल परीक्षण

इस ऐतिहासिक मिशन का नेतृत्व भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर विशाल लखेश, वीएम (जी) ने किया। यह जंप भारत में ही बने स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) का इस्तेमाल करते हुए की गई थी। 32,000 फीट की ऊंचाई से भारतीय वायुसेना के टेस्ट जम्पर्स ने इस पैराशूट के जरिए ऊंचाई से फ्रीफॉल जम्प किया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह जंप वर्ल्ड रिकॉर्ड बनने जा रही है।

जंप के बाद विंग कमांडर विशाल लखेश को अहसास हुआ कि अभी तक किसी भी देश ने 30 हजार फीट की ऊंचाई पर मिलिट्री पैराशूट के जरिए जंप नहीं किया है। यहां तक कि भारतीय सेनाओं में भी इतनी उंचाई से जंप करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

IAF World Record: कैसे बना यह ऐतिहासिक मिशन

इस हाई-ऑल्टिट्यूड जंप को विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया गया था। वायुसेना के एक विशेष विमान से 32,000 फीट की ऊंचाई पर से टीम ने छलांग लगाई। यह जंप किसी “स्काइडाइविंग रिकॉर्ड” के लिए नहीं थी बल्कि यह एक कॉम्बैट फ्रीफॉल मिशन था, जिसे युद्ध जैसी परिस्थितियों में टेस्ट के तौर पर डिजाइन किया गया था। पैराशूट को 30,000 फीट की ऊंचाई पर खोला गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट माना जा रहा है।

Highest Military Parachute Deployment
Data From Altimeters

इस मिशन में तीन अनुभवी टेस्ट जम्पर शामिल थे, विंग कमांडर विशाल लखेश, मास्टर वारंट ऑफिसर आरजे सिंह और विवेक तिवारी। यह कॉम्बैट फ्रीफॉल जंप था, जिसमें 150 किलो लोड (सैनिक+गियर) के साथ 40 किमी ग्लाइड रेंज और जीपीएस/नाविक नेविगेशन था। तीनों ने सुरक्षित लैंडिंग की और मिशन को 100 फीसदी सफलता के साथ पूरा किया।

वहीं अब विंग कमांडर विशाल लखेश ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इस उपलब्धि को वर्ल्ड रिकॉर्ड के तौर पर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि “भारत अब दुनिया का पहला देश है जिसने 30,000 फीट पर लाइव मैनड मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट किया है।” इस रिकॉर्ड की पुष्टि के लिए डीआरडीओ को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड एयर स्पोर्ट्स फेडरेशन (एफएआई) को तकनीकी डेटा, फ्लाइट लॉग और वीडियो सबूत सौंपने होंगे।

क्या है मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम

यह पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ की दो प्रमुख प्रयोगशालाओं आगरा की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लेबोरेटरी ने मिलकर डेवलप किया है।

यह सिस्टम रैम-एयर कैनोपी डिजाइन पर बेस्ड है, जो इसे हवा में बहुत अधिक दूरी तय करने की क्षमता देता है। यह पैराशूट जवान और उसके इक्विपमेंट सहित लगभग 150 किलो वजन संभाल सकता है और लगभग 4 से 6 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे उतरता है।

इसमें ऑक्सीजन सिस्टम, जीपीएस नेविगेशन, और -45°C तक के तापमान में काम करने की क्षमता है। सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह सैनिकों को दुश्मन की सीमा के अंदर 40 किलोमीटर तक ग्लाइड करने की क्षमता देता है, यानी वे बिना दुश्मन के रडार में आए दूर तक प्रवेश कर सकते हैं।

3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खुलते हैं पैराशूट

दुनिया के अधिकांश देशों की सेनाएं हेलो (हाई एल्टीट्यूड लो ओपनिंग) और हाहो (हाई एल्टीट्यूड हाई ओपनिंग) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। आमतौर पर, सैनिक 25,000 से 35,000 फीट की ऊंचाई से जंप करते हैं, लेकिन पैराशूट को केवल 3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खोला जाता है ताकि दुश्मन के रडार से बचा जा सके।

लेकिन भारत का यह मिशन अलग है, इसमें पैराशूट को 30,000 फीट पर खोला गया, जो अब तक किसी भी देश ने नहीं किया। इस ऊंचाई पर हवा बहुत पतली होती है, तापमान -45°C तक गिर जाता है और ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो जाती है। ऐसे में पैराशूट का स्थिर खुलना और सुरक्षित रूप से नीचे आना एक बहुत बड़ी तकनीकी चुनौती थी। डीआरडीओ ने इसके लिए एडवांस ऑक्सीजन प्री-ब्रीदर सिस्टम बनाया है जो 20,000 फीट से ऊपर जंपर को 30 मिनट तक ऑक्सीजन देता है।

साथ ही, एमसीपीएस पैराशूट में एक खास डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी तकनीक लगाई गई है, जो सिग्नल इंटरफेरेंस को कम करती है और हवा में स्थिरता बनाए रखती है। वहीं, बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग ने बायो-सूट्स बनाया है, जो पैरा जंपर को ठंड और “डी-कंप्रेशन” जैसी समस्याओं से बचाते हैं।

IAF World Record: ये हैं रिकॉर्ड

अमेरिकी वायुसेना के जो किटिंगर ने 1960 में 102,800 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई थी, लेकिन उनका पैराशूट लगभग 18,000 फीट पर खुला था। इसी तरह 2014 में एलन यूस्टेस और 2012 में फेलिक्स बॉमगार्टनर ने भी हाई एल्टीट्यूड से छलांग लगाई थी, लेकिन उनकी डिप्लॉयमेंट 8,000 से 18,000 फीट के बीच हुई थी।

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: टू फ्रंट वॉर की तैयारी! पूर्वी मोर्चे पर ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और पश्चिम में ‘त्रिशूल’, दो मोर्चों से भारत ने दिया बड़ा संदेश

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: भारतीय सेनाएं एक बार फिर अपनी जॉइंटनेस का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं। अरुणाचल प्रदेश के मेचुका क्षेत्र में 11 नवंबर से तीनों सेनाओं का एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू हो रहा है। यह अभ्यास 15 नवंबर तक चलेगा और इसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ हिस्सा ले रहे रही हैं।

Exercise Poorvi Prachand Prahar: अरुणाचल प्रदेश में चीन से सटी सीमा पर तीनों सेनाएं करेंगी एक्सरसाइज, मेचुका की पहाड़ियों में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू

यह कवायद ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी सीमा पर राजस्थान और गुजरात के इलाकों में ट्राई सर्विस एक्सरसइज ‘त्रिशूल’ जारी है। इसमें भी तीनों सेनाएं एक साथ हिस्सा ले रही हैं। इन दोनों अभ्यासों का उद्देश्य भारत की मिलिट्री ‘थिएटर कमांड’ के कॉन्सेप्ट को जमीन पर उतारना और दोनों मोर्चों चीन और पाकिस्तान को एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश देना है कि भारत अब किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। ये अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की इंटीग्रेटेड ट्राई सर्विस क्षमताओं को मजबूत करने के लिए उठाए गए हैं।

एक्सरसाइज पूर्वी प्रचंड प्रहार: चीन को ललकार

अरुणाचल प्रदेश का मेचुका इलाका जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से मात्र 30 किलोमीटर दूर है, हमेशा से चीन की नजरों में रहा है। बीजिंग द्वारा ‘दक्षिण तिब्बत’ का दावा करने वाले इस क्षेत्र में आसापिला, लोंगजू, बिसा, मझा, तुलुंग-ला और यांग्त्से जैसे छह विवादित क्षेत्र हैं, जबकि फिशटेल 1 और 2, थाग ला और डिचू जैसे चार बेहद संवेदनशील जोन हैं। 1962 की जंग के बाद से यह इलाका रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। चीन इस पूरे राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना इलाका बताता है और इसे “दक्षिणी तिब्बत यानी जांगनान कहता है।

इस इलाके में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ एक्सरसाइज शुरू होने जा रही है जो 11-15 नवंबर तक चलेगी। इस अभ्यास में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर ऊंचाई वाले इलाकों में लॉजिस्टिक चेन, सिचुएशनल अवेयरनेस और नेटवर्क्ड कमांड एंड कंट्रोल का परीक्षण करेंगे। अभ्यास में लॉन्ग-रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट, आर्म्ड हेलीकॉप्टर, यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स), लॉयटरिंग म्यूनिशंस और स्पेस-बेस्ड एसेट्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह अभ्यास 2023 के ‘भाला प्रहार’ और 2024 के ‘पूर्वी प्रहार’ का विस्तार है।

ईस्टर्न कमांड के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत के अनुसार, यह अभ्यास भारत की तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल तालमेल, मल्टी-डोमेन वॉरफेयर और इंटीग्रेटेड ज्वॉइंट ऑपरेशन की क्षमता को परखने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस अभ्यास का मुख्य फोकस जमीन, हवा और समुद्र तीनों क्षेत्रों में एक साथ काम करने की तैयारियों को जांचना है।

रावत के अनुसार, इस अभ्यास में स्पेशल फोर्सेज, मार्कोस, अनमैन्ड प्लेटफॉर्म्स, प्रिसिजन वेपन्स और नेटवर्क्ड ऑपरेशन सेंटर्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह सब कुछ हाई एल्टीट्यूड वाले कठिन इलाकों में किया जाएगा, ताकि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेनाओं की क्षमता की परख हो सके।

चीन सीमा पर भारत की तैयारी

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत चीन सीमा पर सर्विलांस, मोबिलिटी और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

हाल के महीनों में चीन ने एलएसी के पार ल्हुंजे एयरबेस में 36 एयरक्राफ्ट शेल्टर्स, नए प्रशासनिक ब्लॉक्स और रनवे डेवलप किए हैं, जो भारत के लिए चिंता का विषय हैं। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ (सेवानिवृत्त) ने कहा था कि इन निर्माणों से साफ है कि चीन भविष्य के किसी भी टकराव में अपने लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर वहीं से ऑपरेट करेगा।

एक्सरसाइज त्रिशूल: पाकिस्तान को चेतावनी

पूर्वी मोर्चे के साथ-साथ, भारतीय सेनाओं ने पश्चिमी सीमा पर ‘त्रिशूल’ सैन्य अभ्यास की शुरुआत की है। ‘त्रिशूल 2025’ अभ्यास 30 अक्टूबर से 10 नवंबर तक राजस्थान और गुजरात की सीमाओं पर चल रहा है। नौसेना की अगुवाई में थलसेना और वायुसेना के साथ मिलकर यह अभ्यास सर क्रीक क्षेत्र के पास हो रहा है, जहां पाकिस्तान ने हाल ही में तेल-गैस भंडारों की खोज के दावों के साथ गतिविधियां बढ़ाई हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में सर क्रीक में किसी भी साहसिक कदम के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी, और यह अभ्यास उसी का परिणाम है।

Exercise Trishul: 12 दिन तक चैन की नींद नहीं सो पाएगा पाकिस्तान, भारत ने सर क्रीक के पास शुरू की ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज

इस अभ्यास में टी-90 बैटल टैंक्स, ब्रह्मोस और आकाश मिसाइल सिस्टम्स, प्रचंड अटैक हेलीकॉप्टर, राफेल जेट्स, सुखोई-30 एमकेआई, मिग-29के और आर्टिलरी यूनिट्स शामिल हैं। 28,000 फीट ऊंचे कॉरिडोर में ‘शूट-एंड-स्कूट’ स्ट्राइक्स का अभ्यास हो रहा है, जो पाकिस्तानी रडार की नजर में है।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि यह अभ्यास तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल प्रोसीजर, कमांड एंड कंट्रोल, और नेटवर्क इंटीग्रेशन को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। इस दौरान सेनाएं लाइव फायरिंग ड्रिल्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स और संयुक्त संचार प्रणालियों का परीक्षण कर रही हैं।

नौसेना संचालन महानिदेशक वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने बताया कि त्रिशूल अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑर्डिनेशन और टेक्नोलॉजिकल इंटीग्रेशन को मजबूत करना है। उन्होंने इसे एक मल्टी-डोमेन ऑपरेशन बताया, जिसमें साइबर और स्पेस वारफेयर भी शामिल है।

वहीं, पाकिस्तान ने भी अरब सागर में फायरिंग ड्रिल्स के लिए नोटाम और नेवेरिया चेतावनियां जारी की हैं, जो आंशिक रूप से ‘त्रिशूल’ से ओवरलैप करती हैं।

थिएटर कमांड का ट्रायल!

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ थिएटर कमांड व्यवस्था को लागू करने की दिशा में एक अहम अभ्यास माना जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत, एक ही कमांड के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के यूनिट्स एक साथ किसी विशेष क्षेत्र या ऑपरेशन में काम करेंगे।

इस अभ्यास के जरिए यह जांचा जा रहा है कि तीनों सेनाएं एक साथ कितनी सहजता और सटीकता से संयुक्त कार्रवाई कर सकती हैं। इसमें कमांड और कंट्रोल स्ट्रक्चर, कम्युनिकेशन नेटवर्क, और हथियार प्रणालियों की कार्यक्षमता की भी समीक्षा होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभ्यास भारत की सेनाओं की ‘जॉइंटनेस’ और इंटरऑपरेबिलिटी को और मजबूत करेगा।

दो मोर्चों पर रणनीतिक संदेश

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और ‘त्रिशूल’ दोनों ही अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद आयोजित किए जा रहे हैं। इस साल मई में भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पीओके में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए थे। उस ऑपरेशन ने भारतीय सेनाओं ने दुनिया के सामने साबित किया और यह दिखाया कि भारत किसी भी खतरे का जवाब देने के लिए अब देर नहीं करता। अब ये दोनों अभ्यास उस तैयारी का विस्तार हैं, एक पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान के खिलाफ और दूसरा पूर्वी मोर्चे पर चीन के खिलाफ।

भारत के इन दोनों सैन्य अभ्यासों ‘त्रिशूल’ और ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को एक साथ आयोजित करने का साफ मतलब है कि भारत अब दो फ्रंट वॉर की स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। पूर्व में चीन के बढ़ते सैन्य निर्माण और पश्चिम में पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए यह तैयारी भारत की रणनीतिक सोच का हिस्सा है। भारतीय सेनाओं का यह संयुक्त अभ्यास न केवल पड़ोसी देशों को संदेश देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत की सैन्य नीति अब “रिएक्टिव” नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” हो चुकी है।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

Trump Pakistan Nuclear Bluff

Trump Pakistan Nuclear Bluff: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीबीएस (CBS) इंटरव्यू में किए गए दावों से फिर एक बार यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन अभी भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान मई 2025 में एक परमाणु युद्ध के बहुत करीब पहुंच गए थे और उन्होंने खुद हस्तक्षेप करके इसे टाल दिया था। उनका कहना था कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी कि अगर वे तुरंत नहीं रुके तो अमेरिका उनके साथ व्यापार संबंधों को खत्म कर देगा।

Pakistan Nuclear Test: ट्रंप का दावा- पाकिस्तान और चीन कर रहे गुप्त परमाणु परीक्षण, भारत में चिंता बढ़ी

लेकिन इस दावे ने भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्योंकि वे इसे पाकिस्तान के परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रंप ने उस रणनीति को वैधता दे दी है, जिसे भारत पहले ही कई बार उजागर कर चुका है।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: क्या कहा ट्रंप ने इंटरव्यू में

इंटरव्यू दौरान ट्रंप ने एक कागज की शीट पढ़ते हुए अपनी उपलब्धियों का जिक्र किया, जिसमें पाकिस्तान और भारत को आठवां पॉइंट बताया। उन्होंने कहा, “मैंने आठ युद्धों को रोका। भारत और पाकिस्तान वाला तो ‘ब्यूटी’ था। वे न्यूक्लियर युद्ध के कगार पर थे। हवाई जहाजों को इधर-उधर गिराया जा रहा था। मैंने दोनों को फोन किया– नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ को और कहा, ‘अगर आप नहीं रुके, तो अमेरिका के साथ कोई व्यापार नहीं होगा।'” ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शरीफ का हवाला देते हुए जोड़ा, “उन्होंने कहा कि अगर डोनाल्ड ट्रंप न शामिल होते, तो लाखों लोग मर चुके होते।”

ट्रंप ने दावा करते हुए कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान गुप्त रूप से अंडरग्राउंड परमाणु टेस्ट कर रहे हैं। “हम इकलौते देश हैं जो टेस्ट नहीं करते। पाकिस्तान टेस्ट कर रहा है, लेकिन कोई बात नहीं करता।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: पाकिस्तान की परमाणु ‘डर’ की रणनीति

लंबे समय से पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों की धमकी का इस्तेमाल राजनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता रहा है। इस रणनीति के तहत हर बार जब भारत सीमा क्षेत्र में कार्रवाई करता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चेतावनी देता है। इस तरह के बयान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को समर्थन दिलाते हैं और अमेरिका जैसे देशों को दखल देने के लिए प्रेरित करते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इस तरह के परमाणु डराने वाले बयान से कई बार फंसा है और संतुलन बनाने की कोशिश में रहा है। वह भारत को नियंत्रित रखना चाहता है और पाकिस्तान को किसी बड़े संघर्ष में नहीं पड़ने देना चाहता है। ट्रंप का हालिया बयान उसी सोच को दर्शाता है जिसमें अमेरिका ने भारत को “आक्रामक” और पाकिस्तान को “संवेदनशील परमाणु शक्ति” बताया है।

पीएम मोदी ने पहले ही पाकिस्तानी ब्लफ को किया बेनकाब

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान का परमाणु खतरा असल में खोखली बयानबाजी है। कारगिल युभारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक 2016, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 और ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी परमाणु चेतावनियों को आगे बढ़ाने का साहस नहीं दिखाया। वहीं, भारत अब पाकिस्तान की “न्यूक्लियर ब्लैकमेल डिप्लोमेसी” से बाहर निकल चुका है।

इस तरह भारत ने यह संदेश दिया कि वह डर या धमकी के आधार पर पीछे नहीं हटेगा। इसके उलट, पाकिस्तान की रणनीति नियमित रूप से परमाणु हथियारों को राजनीतिक बयानबाजी के तौर पर इस्तेमाल करती आई है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद 12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में कहा था, “भारत किसी भी परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा। हम आतंकवाद और उसके संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करते हुए किसी धमकी से नहीं डरेंगे।”

इसके बाद इसके बाद 15 अगस्त 2025 को लाल किला से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी ने कहा, “भारत ने तय कर लिया है कि अब परमाणु धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। हमारी सेनाओं ने आतंक के आकाओं को ऐसी सजा दी है जो वे कभी सोच भी नहीं सकते थे। खून और पानी साथ नहीं बह सकते।”

वहीं, 29 जुलाई को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने फिर दोहराया, “पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान ने परमाणु धमकियां शुरू कीं, लेकिन अब कोई ब्लैकमेल काम नहीं करेगा। हम आतंक समर्थक सरकारों और उनके नेताओं में भेद नहीं करेंगे।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: आज भी पुरानी सोच में उलझा हुआ है अमेरिका

भारत ने हमेशा से स्पष्ट किया है कि वह सैन्य कार्रवाई पर भरोसा करता है और आतंकवाद तथा सीमावर्ती चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है, अमेरिका की नीति आज भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित नजर आती है। अमेरिकी रणनीति में अब भी यह धारणा है कि पाकिस्तान “एक अस्थिर परमाणु शक्ति” है और उसे संतुलित रखना दक्षिण एशिया की शांति के लिए जरूरी है।

ट्रंप ने इस धारणा को अपने बयान में दोहराया, उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण नहीं किया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इस तरह का कथन यह संकेत देता है कि अमेरिका आज भी पाकिस्तान द्वारा पेश की जाने वाली परमाणु धमकी को गंभीरता से ले रहा है और उसकी नीति उसी जोखिम का सामना नहीं कर पा रही है जिसे भारत ने बेहतर तरह से मैनेज किया है।

भारत के रक्षा विश्लेषक एवं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने ट्रंप के इस बयान को “राजनीतिक प्रदर्शन” कहा है। उनका मानना है कि अमेरिका बार-बार पाकिस्तान की परमाणु बयानबाजी में फंस जाता रहा है, जबकि भारत ने उस बयानबाजी को सफलता पूर्वक चुनौती दी है।

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान न सिर्फ भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है बल्कि पाकिस्तान को राजनीतिक लाभ भी देता है क्योंकि वह फिर से अपनी परमाणु रणनीति को वैश्विक मंच पर हावी कर पाता है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्था सीटीबी के रिकॉर्ड ट्रंप के इस दावे का समर्थन नहीं करते। सीटीबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 1996 में इस संधि के लागू होने के बाद से दुनिया में दस से भी कम आधिकारिक परमाणु परीक्षण हुए हैं। इनमें केवल उत्तर कोरिया को छोड़कर किसी अन्य देश रूस, चीन या पाकिस्तान ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है।

सीटीबीटी का मुख्यालय वियना में है और यह संस्था दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी के लिए बनाई गई है। इसका इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है। इस सिस्टम में 337 मॉनिटरिंग स्टेशन और 16 विशेष प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जो धरती के हर कोने में स्थापित हैं। यह नेटवर्क परमाणु विस्फोटों के बेहद छोटे संकेतों को भी पकड़ सकता है।

कैसे काम करता है इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम

इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम में कई तकनीकी सेंसर और डिटेक्टर शामिल हैं। इसका एयर-टेस्टिंग स्टेशन, जो वातावरण में रेडियोएक्टिव तत्वों की मामूली मात्रा का पता लगाते हैं। जबकि अंडरवॉटर हाइड्रो-अकॉस्टिक स्टेशन, समुद्र के नीचे हुए विस्फोटों की ध्वनि तरंगें पकड़ते हैं। वहीं, इंफ्रासाउंड डिटेक्टर, जो वायुमंडल में हुए बड़े धमाकों की कम आवृत्ति वाली गूंज को भी रिकॉर्ड करते हैं। सीस्मोमीटर भूमिगत परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न झटकों को मापते हैं। ये सभी उपकरण मिलकर धरती पर कहीं भी होने वाले परमाणु विस्फोटों के संकेत पहचान सकते हैं।

हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, जब किसी परमाणु विस्फोट के कंपन किसी भूकंप की तरंगों से मिल जाते हैं, तो उन्हें पहचानना कठिन हो जाता है। 1.7 टन के भूमिगत विस्फोट को 97 फीसदी सटीकता से पहचाना जा सकता है, लेकिन यदि यह किसी भूकंप की तरंगों के भीतर छिप जाए, तो सफलता दर घटकर 37 फीसदी रह जाती है।

इसके बावजूद, सीटीबीटी का कहना है कि उनका निगरानी सिस्टम इतना संवेदनशील है कि वह किसी भी “गंभीर” परमाणु विस्फोट को पहचान सकती है, और हाल के सालों में पाकिस्तान या चीन से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है।

चीन ने किया खंडन, पाकिस्तान खामोश

ट्रंप के दावे के बाद चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और इन आरोपों को बेसलेस और इररेस्पॉन्सिबल बताया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “चीन ने हमेशा परमाणु परीक्षणों पर रोक का पालन किया है और वैश्विक प्रतिबंधों का सख्ती से समर्थन करता है।”

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। केवल विदेश मंत्रालय की  वेबसाइट पर एक बयान डाला है, “पाकिस्तान, भले ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है, लेकिन वह इस संधि के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करता है। वह दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने परीक्षणों पर मोराटोरियम घोषित किया है और यह प्रतिबद्धता जारी रहेगी। हम क्षेत्र में परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने वाले पहले देश नहीं होंगे।”

हालांकि इस्लामाबाद की इस चुप्पी को लेकर रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस विषय पर सीधे जवाब देने से बच रहा है, क्योंकि उसके पास ऐसे परीक्षणों के किसी भी प्रमाण का अभाव है। इसलिए वह जानबूझ कर खामोश है क्योंकि उसके बोलते ही न्यूक्लियर ब्लफ वाला पिटारा खुल जाएगा।

ISI in Bangladesh: आसिम मुनीर की अगुवाई में भारत के दो मोर्चों पर हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा पाकिस्तान! अलर्ट पर एजेंसियां

ISI in Bangladesh
General Sahir Shamshad Mirza with Chief Adviser Professor Muhammad Yunus

ISI in Bangladesh: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अब बांग्लादेश में अपना नेटवर्क तेजी से फैला रही है। इसका उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल की खाड़ी पर नजर रखना है। हाल ही में जनरल शमशाद मिर्जा के नेतृत्व में पाकिस्तान के कुछ मिलिट्री अफसर ढाका पहुंचे थे, जिसमें आईएसआई के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

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सूत्रों के अनुसार, इस टीम ने बांग्लादेश की नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस के टॉप अफसरों के साथ कई दौर की मुलाकातें कीं। इन बैठकों में भारत के पूर्वोत्तर इलाकों और सीमाई इलाकों की गतिविधियों की निगरानी के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संयुक्त खुफिया तंत्र बनाने पर चर्चा हुई।

ISI in Bangladesh: इन इलाकों पर पकड़ बढ़ाने की तैयारी

रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई कॉक्स बाजार, उखिया, टेकनाफ, मौलवीबाजार, हबिगंज और शेरपुर जैसे रणनीतिक इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की योजना बना रही है। ये सभी इलाके भारत-बांग्लादेश सीमा और बंगाल की खाड़ी के नजदीक हैं, जो खुफिया गतिविधियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

सूत्रों के अनुसार, शेख हसीना के शासनकाल (2009 से 2024) के दौरान आईएसआई को बांग्लादेश में काम करने में दिक्कत हो रही थी। उस दौरान बांग्लादेश सरकार के साथ भारत के मजबूत संबंध थे, जिसके चलते आईएसआई की गतिविधियों पर अंकुश लगा रहा।

हालांकि, अगस्त 2024 में आईएसआई ने बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े छात्र संगठनों का इस्तेमाल कर शेख हसीना सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। रिपोर्टों में कहा गया है कि आईएसआई अब उन पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करना चाहती है, जो पाकिस्तान की आजादी से पहले पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मौजूद थे।

इस साल जनवरी में आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारियों का एक और दल ढाका गया था। उस दौरे के दौरान बांग्लादेश की सेना के कुछ अधिकारियों के साथ भी चर्चा हुई थी, जिसमें आईएसआई नेटवर्क को भारत की पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सीमा के नजदीक बढ़ाने की योजना पर बात हुई।

जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश में आईएसआई की बढ़ती सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इसका सीधा असर पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में पहले से ही उग्रवादी गतिविधियां और सीमा पार तस्करी की समस्या मौजूद है।

ISI in Bangladesh: साजिश का हिस्सा हैं प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस

सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश के अंतरिम प्रमुख प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस भी इस साजिश का हिस्सा हैं। पाकिस्तान के जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के दौरे के दौरान यूनुस ने उन्हें एक ऐसी किताब उपहार में दी, जिसके कवर पर बने नक्शे जैसी आकृति में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया है। बताया गया है कि यह किताब ‘आर्ट ऑफ ट्रायम्फ: बांग्लादेश्स न्यू डॉन 2024 में जुलाई शहीद स्मृति फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित की गई थी। इसमें जुलाई 2024 में हुए उस छात्र आंदोलन की ग्रैफिटी शामिल हैं, जिसके बाद शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटना पड़ा था।

यूनुस ने इस किताब को पहले भी सितंबर 2024 में जस्टिन ट्रूडो और जेन गुडॉल को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान उपहार में दिया था। लेकिन पाकिस्तान के जनरल मिर्जा के साथ मुलाकात की उनकी एक्स (X) पोस्ट ने विवाद को हवा दे दी। इस पोस्ट में यूनुस को किताब देते हुए देखा जा सकता है, जिसके कवर पर यह विवादित नक्शा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

कूटनीतिक हलकों में यह घटना इसलिए भी संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि यूनुस ने पिछले कुछ महीनों में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को लेकर कई बार विवादास्पद बयान दिए हैं। अप्रैल में चीन दौरे के दौरान यूनुस ने कहा था कि बांग्लादेश “महासागर का एकमात्र संरक्षक” है और भारत का पूर्वोत्तर “लैंडलॉक्ड” इलाका है, जो समुद्री पहुंच के लिए ढाका पर निर्भर है। उन्होंने नेपाल, भूटान और भारत के सात उत्तरपूर्वी राज्यों को जोड़ने की बात कही थी।

बता दें कि इंटरिम गवर्नमेंट के चीफ एडवाइजर मुहम्मद यूनुस ने 16 अक्टूबर को घोषणा की कि चुनाव 2026 के अप्रैल के पहले हाफ (1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच) किसी भी दिन होंगे।

ISI in Bangladesh: लगातार भारत के खिलाफ बोल रहे हैं जनरल मिर्जा

इसी महीने की शुरुआत में इस्लामाबाद में हुए सिंपोजियम 2025 में जनरल मिर्जा ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा था कि “भारत की सेना राजनीति में शामिल है और भारत की राजनीति सैन्यीकरण की ओर बढ़ रही है।” उन्होंने यह भी कहा था कि इससे दक्षिण एशिया में परमाणु जोखिम बढ़ गया है।

मिर्जा ने इससे पहले शांगरी-ला डायलॉग में भी भारत के खिलाफ बयान दिया था और कश्मीर मुद्दे पर “तीसरे पक्ष की मध्यस्थता” की मांग की थी, जो भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति के खिलाफ है।

पिछले साल दिसंबर में यूनुस के सलाहकार महफूज आलम ने फेसबुक पर लिखा था कि “हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक का इलाका सांस्कृतिक रूप से एक है और एक ‘कटे-फटे बंगाल’ से असली आजादी अधूरी है।” इस बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद पोस्ट हटा दिया गया।

ISI in Bangladesh: भारत के पूर्वी मोर्चे पर नया खतरा

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का फोकस इस बार कश्मीर नहीं, बल्कि भारत का पूर्वी इलाका और बांग्लादेश के जरिए नया मोर्चा खोलने पर है। कुछ समय पहले ब्रिटिश मैगजीन द इकॉनॉमिस्ट को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा था, “अगर भविष्य में संघर्ष हुआ तो हम पूर्व से शुरू करेंगे।” यह बयान साफ संकेत देता है कि पाकिस्तान भारत के पूर्वोत्तर को लेकर नई रणनीति बना रहा है।

कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान अब बांग्लादेश को “ईस्टर्न फ्रंट” के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है, ताकि भारत को दो मोर्चों पश्चिम में कश्मीर और पूर्व में पूर्वोत्तर भारत पर उलझाया जा सके। रिपोर्टों के अनुसार, चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स और भारत की सीमा से सटे इलाकों में हथियार तस्करी, कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियां और ऑपरेटिव्स की आवाजाही बढ़ी है।

सूत्रों का कहना है कि मुनीर का प्लान यह है कि बांग्लादेश या उसकी सीमा का इस्तेमाल कर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में अस्थिरता पैदा की जाए। इन इलाकों की भौगोलिक और सांस्कृतिक समानताएं, सीमित सुरक्षा तंत्र और खुले बॉर्डर पाकिस्तान को फायदा पहुंचा सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि यह सिर्फ एक सैन्य योजना नहीं, बल्कि एक हाइब्रिड वॉरफेयर रणनीति है, जिसमें साइबर ऑपरेशन्स, दुष्प्रचार, और स्थानीय असंतोष को भड़काने जैसे तरीके शामिल हैं।

वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस संभावित पूर्वी खतरे को गंभीरता से लिया है। असम, मेघालय और त्रिपुरा में निगरानी बढ़ा दी गई है। सैन्य खुफिया और सीमा सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। साथ ही भारत ने आसियान और खाड़ी देशों के साथ राजनयिक बातचीत तेज कर दी है ताकि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समर्थन न मिल सके।

विशेषज्ञों के मुताबिक, मुनीर की यह नीति पाकिस्तान के लिए जोखिम भरी हो सकती है, लेकिन यह संकेत भी देती है कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है।