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Indian Navy on Chinese Vessel: हिंद महासागर में मौजूद चीनी जहाज पर बोली भारतीय नौसेना- शिप की हर गतिविधि पर है हमारी नजर, पाकिस्तान को सीधी चेतावनी

Indian Navy on Chinese Veseel
Navy Vice Admiral Sanjay Vatsayan (Background Photo: Damien Symon)

Indian Navy on Chinese Vessel: भारतीय नौसेना ने साफ किया है कि वह भारतीय महासागर क्षेत्र में आने वाले हर जहाज पर कड़ी नजर रख रही है, चाहे वह किसी भी देश का हो। खास तौर पर चीन के जहाजों की हर गतिविधि पर बारीकी से निगरानी की जा रही है। नौसेना उप प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय नौसेना वर्तमान में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पूरी तरह तैनात है और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

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उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना के इस समय लगभग 40 जहाज हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात हैं और जल्द ही इनकी संख्या 50 से ऊपर कर दी जाएगी। उन्होंने यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू की तैयारियों के दौरान दी, जो फरवरी 2026 में विशाखापट्टनम में आयोजित होगा।

Indian Navy on Chinese Vessel: हिंद महासागर क्षेत्र में एक्स्ट्रा-रीजनल पावर्स की मौजूदगी

वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार एक्स्ट्रा-रीजनल पावर्स की मौजूदगी बढ़ रही है। उन्होंने बताया, “किसी भी समय कम से कम 40 जहाज हिंद महासागर में एक्टिव रहते हैं, और यह संख्या अब 50 से भी अधिक होने जा रही है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि नौसेना क्षेत्र में मौजूद हर विदेशी जहाज की गतिविधि को ट्रैक कर रही है, कि वह कब आता है, कब जाता है, क्या कर रहा है और उसका उद्देश्य क्या है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में तेल और माल परिवहन का सबसे बड़ा रास्ता हिंद महासागर से होकर गुजरता है, इसलिए इस क्षेत्र की निगरानी बहुत जरूरी है।

चीन का शोध जहाज शेन हाई यी हाओ भारतीय महासागर में

भारतीय नौसेना की बढ़ी सतर्कता के बीच, चीन का डीप-सी रिसर्च जहाज शेन हाई यी हाओ हिंद महासागर में प्रवेश कर चुका है। यह जहाज वर्तमान में मालदीव की राजधानी माले की ओर बढ़ रहा है और 30 अक्टूबर 2025 को इसे मलक्का जलडमरूमध्य में ट्रैक किया गया था।

यह जहाज एक मानव-संचालित गहरे समुद्र वाला सबमर्सिबल ‘जियाओलोंग’ लेकर चल रहा है, जो 7000 मीटर से अधिक गहराई तक गोता लगाने में सक्षम है। यह चीन के समुद्र-तल सर्वेक्षण और गहरे समुद्र की खोज के मिशनों में इस्तेमाल होता है।

चीन की गतिविधियों पर कड़ी नजर

वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि भारतीय नौसेना हिंद महासागर में आने वाले हर चीनी युद्धपोत और रिसर्च वेसल पर नजर रख रही है। उन्होंने कहा, “हम हर जहाज को मॉनिटर कर रहे हैं, चाहे वह नेवल शिप हो या रिसर्च वेसल। हमें उनकी हर गतिविधि की जानकारी रहती है।”

ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है

वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है और इसके तहत नौसेना किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा, “हमारे सभी ऑपरेशनल प्लान्स तैयार हैं। हम पूरी तरह तैनात हैं और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, ऑपरेशन सिंदूर जारी है और आगे भी जारी रहेगा।”

उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के साथ-साथ भारतीय नौसेना अपनी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और अभ्यासों को भी जारी रखे हुए है। उन्होंने कहा, “हम विदेशी नौसेनाओं के साथ अपनी जॉइंट एक्सरसाइजेज और योजनाओं को बिना किसी रुकावट के जारी रख रहे हैं।”

अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026

भारतीय नौसेना फरवरी 2026 में विशाखापट्टनम में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू आयोजित करेगी। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नौसेना बेड़े का निरीक्षण करेंगी। यह कार्यक्रम 18 फरवरी को होगा। पहला फ्लीट रिव्यू 2001 में आयोजित हुआ था, जबकि दूसरा फ्लीट रिव्यू 2016 में विशाखापट्टनम में आयोजित किया गया था।

इस बार के फ्लीट रिव्यू में स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत और कलवरी क्लास पनडुब्बियां भी हिस्सा लेंगी। यह पहली बार होगा जब भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन का हिस्सा बनेगा। साथ ही, विशाखापट्टनम क्लास डेस्ट्रॉयर, नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स, और अर्नाला क्लास एंटी-सबमरीन युद्धपोत भी प्रदर्शित किए जाएंगे। इसके साथ ही दोस्त राष्ट्रों की नौसेनाओं, कोस्ट गार्ड और मर्चेंट मरीन जहाजों की भी भागीदारी रहेगी।

वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि भारत के सभी योजनाबद्ध रक्षा और कूटनीतिक कार्यक्रम पहले की तरह जारी रहेंगे। उन्होंने कहा, “हम ऑपरेशन सिंदूर के तहत पूरी तरह तैनात हैं और साथ ही अपनी वैश्विक गतिविधियां और अभ्यास भी जारी रखे हुए हैं।”

वाइस एडमिरल के अनुसार, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके रक्षा कार्यक्रम और सैन्य तैयारियां किसी भी तरह की ज्योपॉलिटिकल परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होंगी। भारतीय नौसेना अपनी सभी योजनाओं को समानांतर रूप से चला रही है, चाहे वह ऑपरेशन सिंदूर के तहत की जाने वाली तैनाती हो या फिर अंतरराष्ट्रीय अभ्यासों की योजना। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना हमेशा तैयार रहती है और किसी भी संभावित चुनौती या आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

पहली बार एक साथ तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की मेजबानी

भारत फरवरी 2026 में एक ऐतिहासिक समुद्री आयोजन की मेजबानी करने जा रहा है। देश पहली बार एक साथ तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम आयोजित करेगा, जिनमें इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026, अभ्यास मिलन 2026 और आईओएनएस कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स शामिल हैं। ये सभी आयोजन 15 से 25 फरवरी 2026 के बीच विशाखापट्टनम में होंगे।

यह आयोजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए समुद्री विजन ‘महासागर’ को साकार करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यह विजन भारत की मौजूदा नीति ‘सागर’ (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) का विस्तार है, जो अब पूरे क्षेत्र में सुरक्षा, विकास, स्थिरता और सहयोग पर केंद्रित है।

इन आयोजनों का मकसद भारत की नौसैनिक ताकत, स्वदेशी तकनीकी क्षमता और वैश्विक साझेदारी को प्रदर्शित करना है। इस ऐतिहासिक समुद्री सम्मेलन में दुनिया भर की नौसेनाओं को आमंत्रित किया गया है। विशाखापट्टनम इन तीनों आयोजनों की मेजबानी करेगा।

कार्यक्रम के दौरान भारत एक विश्वसनीय सुरक्षा सहयोगी के रूप में अपनी भूमिका दिखाएगा। आयोजन में भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी, महासागर और इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव जैसे स्ट्रेटेजिक फ्रेमवर्क्स की झलक भी देखने को मिलेगी।

एक्सरसाइज मिलन 2026 का सी फेज

एक्सरसाइज मिलन 2026 का सी फेज और हार्बर फेज दोनों ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर केंद्रित होंगे। इसमें विभिन्न देशों की नौसेनाएं एंटी-सबमरीन वारफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू, और मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस जैसे अभियानों में हिस्सा लेंगी।

इस दौरान आरके बीच पर एक भव्य इंटरनेशनल सिटी परेड भी आयोजित होगी, जिसमें भारतीय नौसेना, थल सेना, वायु सेना और अन्य देशों की टुकड़ियां हिस्सा लेंगी। इस परेड में आम नागरिकों को मैरीटाइम डिप्लोमेसी की झलक देखने को मिलेगी।

आईओएनएस कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स 2026

आईओएनएस (इंडियन ओशन नवल सिम्पोजियम) के दौरान भारतीय नौसेना दूसरी बार (2025-2027) के लिए इसकी अध्यक्षता करेगी। इस बैठक में 25 सदस्य देशों, 9 पर्यवेक्षक देशों और कई विशेष आमंत्रित देशों के नौसेना प्रमुख शामिल होंगे। वे समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता, सूचना और साझेदारी जैसे विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे।

भारत ने पहली बार 2001 में मुंबई में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की मेजबानी की थी, जिसमें 20 देशों की नौसेनाएं शामिल हुई थीं। इसके बाद 2016 में विशाखापट्टनम में यह आयोजन और बड़ा हुआ। इसी तरह अभ्यास मिलन की शुरुआत 1995 में पोर्ट ब्लेयर से हुई थी, जिसमें सिर्फ चार नौसेनाएँ शामिल थीं। अब यह दुनिया का प्रमुख बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास बन चुका है।

Exercise Milan 2026: भारतीय नौसेना के लिए 2026 है बेहद खास, होने जा रहे हैं तीन मेगा इवेंट, अमेरिका और रूस समेत 55 देशों की नौसेनाएं होंगी शामिल

Exercise Milan 2026
Vice Chief of the Navy Vice Admiral Sanjay Vatsayan

Exercise Milan 2026: साल 2026 भारतीय नौसेना के लिए बेहद खास रहने वाला है। इस साल की शुरुआत में भारतीय नौसेना तीन बड़े इवेंट करने जा रही है, जो अपने आप में रिकॉर्ड होगा। भारतीय नौसेना इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, एक्सरसाइज मिलन 2026 और इंडियन ओसियन नेवल सिंपोजियम कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन करने जा रही है। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन 2026 में दुनिया के कई देश शामिल होंगे। खास बात यह होगी कि इन इवेंट्स में अमेरिका और रूस भी शामिल होंगे। रूस-यूक्रेन वॉर के बाद यह पहली बार होगा जिसमें दोनों देश किसी एक्सरसाइज में हिस्सा लेंगे। हालांकि चीन, पाकिस्तान और तुर्किए इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं।

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Exercise Milan 2026: 55 से अधिक देशों की नौसेनाएं लेंगी हिस्सा

भारतीय नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने शुक्रवार को बताया कि भारत फरवरी 2026 में एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय समुद्री एक्सरसाइज की मेजबानी करने जा रहा है, जिसमें दुनिया के 55 से अधिक देशों की नौसेनाएं हिस्सा लेंगी। इस एक्सरसाइज का नाम ‘मिलन 2026’ रखा गया है। इस कार्यक्रम का आयोजन विशाखापट्टनम में 19 से 26 फरवरी तक होगा। उन्होंने बताया कि इस एक्सरसाइज में अमेरिका और रूस दोनों अपने वॉरशिप भेजेंगे। वहीं, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी इसमें हिस्सा लेंगे।

Exercise Milan 2026: क्वॉड देश होंगे शामिल

वाइस एडमिरल वात्सायन के मुताबिक यह एक्सरसाइज अब तक की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय समुद्री एक्सरसाइज होगी। उन्होंने कहा कि “अमेरिका और रूस दोनों ने इसमें शामिल होने की सहमति दे दी है और वे अपने जहाज भेजेंगे।” जबकि जापान और आस्ट्रेलिया भी इसमें शामिल होंगे। बता दें कि अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया क्वॉड का हिस्सा हैं। वाइस एडमिरल ने बताया कि अब तक हमें 55 देशों से सकारात्मक जवाब मिला है, जो अपने जहाजों या उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजेंगे।”

इस आयोजन से पहले 18 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू आयोजित किया जाएगा। यह भारतीय नौसेना द्वारा तीसरी बार आयोजित किया जा रहा है। इससे पहले यह फ्लीट रिव्यू साल 2001 और 2016 में आयोजित हुआ था।

दो चरणों में होगी ‘मिलन 2026’

‘मिलन 2026’ के तहत यह समुद्री एक्सरसाइज दो चरणों में होगी। पहले दो दिन यानी 19 और 20 फरवरी को हार्बर फेज आयोजित होगा, जिसमें हिस्सा लेने वाली नौसेनाओं के बीच बैठकें, योजना और औपचारिक कार्यक्रम होंगे। इसके बाद 21 से 25 फरवरी तक सी फेज चलेगा, जिसमें रीयल टाइम नेवल ऑपरेशन की एक्सरसाइज की जाएगी।

सी फेज के दौरान एंटी-सबमरीन ड्रिल्स, एयर ऑपरेशंस और अन्य समुद्री अभियानों की एक्सरसाइज होगी। उन्होंने बताया कि यह फेज बेहद कॉम्प्लेक्स और डायनेमिक होगा, जिसमें विभिन्न देशों की नौसेनाएं संयुक्त रूप से अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करेंगी।

भारतीय महासागर में हर गतिविधि पर नजर

मीडिया से बातचीत में वाइस एडमिरल वात्सायन ने कहा कि भारतीय नौसेना लगातार भारतीय महासागर क्षेत्र में मौजूद सभी विदेशी नौसेनिक जहाजों पर नजर रखती है। उन्होंने बताया कि किसी भी समय इस क्षेत्र में 40 से 50 विदेशी जहाज सक्रिय रहते हैं।

उन्होंने कहा, “हम हर जहाज की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं, वे क्या कर रहे हैं, कब आए, कब गए, सबकुछ मॉनिटर किया जाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह क्षेत्र विश्व व्यापार और तेल परिवहन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए इससे जुड़ी चुनौतियां हमेशा बनी रहती हैं।

वाइस एडमिरल ने बताया कि भारतीय नौसेना पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों जैसे पाइरेसी, मानव तस्करी और ड्रग्स की तस्करी जैसी समस्याओं से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

2026 में शामिल होंगे नए शिप

वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि इस साल 2025 में भारतीय नौसेना ने अब तक 10 नए जहाज और एक पनडुब्बी को अपने बेड़े में शामिल किया है। साल के आखिर तक चार और जहाज शामिल होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अगले साल नौसेना में 19 नए जहाज शामिल किए जाएंगे, जिनमें से अधिकतर दिसंबर तक कमीशन कर दिए जाएंगे। इसके बाद अगले वर्ष लगभग 13 और जहाज नौसेना में शामिल होंगे।

ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी

वाइस एडमिरल वात्सायन ने यह भी कहा कि भारत की रणनीतिक गतिविधियां किसी भी हाल में रुकी नहीं हैं। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है, लेकिन इसके बावजूद हमारी विदेशी साझेदारी, योजनाएं और एक्सरसाइज प्रभावित नहीं हुए हैं। हमारी तैयारियों में कोई रुकावट नहीं है।”

उन्होंने कहा कि भारत का यह स्पष्ट संदेश है कि देश अपनी रक्षा गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग दोनों को साथ लेकर चल रहा है।

मैरीटाइम डिप्लोमेसी का उदाहरण है मिलन 2026

‘मिलन 2026’ एक्सरसाइज भारत की मैरीटाइम डिप्लोमेसी का एक बड़ा उदाहरण है। इस आयोजन से भारत एक ऐसे मंच के रूप में उभर रहा है, जो दुनिया की बड़ी नौसेनाओं जैसे अमेरिका, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य 50 से अधिक देशों को एक साथ ला रहा है। इस एक्सरसाइज का मकसद समुद्री सहयोग को बढ़ाना और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है।

Exercise Trishul: 12 दिन तक चैन की नींद नहीं सो पाएगा पाकिस्तान, भारत ने सर क्रीक के पास शुरू की ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज

Exercise Trishul
File Photo

Exercise Trishul: भारत ने गुरुवार से पाकिस्तान सीमा के पास बड़े पैमाने पर ‘एक्सरसाइज त्रिशूल’ शुरु की है। 12 दिन तक चलने वाली इस जॉइंट वॉर एक्सरसाइज में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना हिस्सा ले रहे हैं। यह एक्सरसाइज ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद आयोजित की जा रही है।

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रक्षा सूत्रों के मुताबिक, यह एक्सरसाइज 30 अक्टूबर से शुरू हो गई है, जो 12 नवंबर तक चलेगी। यह एक्सरसाइज गुजरात और राजस्थान में सटे पश्चिमी मोर्चे पर आयोजित की जा रही है। जिसमें विशेष फोकस कच्छ का इलाका है, जिसे लेकर हाल के दिनों में भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी थी कि भारत की सीमा पर किसी भी अवैध कब्जे या उकसावे की कोशिश का जवाब “इतिहास और भूगोल बदल देने वाला” होगा। उन्होंने खासतौर पर सर क्रीक का जिक्र किया था, जो भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित जलीय इलाका है।

सर क्रीक लगभग 96 किलोमीटर लंबा ज्वारीय मुहाना है जो गुजरात के रण ऑफ कच्छ और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच स्थित है। इस इलाके में हाल के महीनों में पाकिस्तान ने बंकर, रडार सिस्टम और फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बनाए हैं, जिन्हें भारत ने गंभीरता से लिया है।

सूत्रों ने बताया कि एक्सरसाइज त्रिशूल पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश देने के लिए आयोजित की गई है कि भारत अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर ऑपरेशन सिंदूर 2.0 शुरू कर सकता है।

Exercise Trishul: युद्धाभ्यास में क्या होगा

भारतीय सेना ने इस अभ्यास के लिए अपने टी-90 युद्धक टैंक, ब्रहमोस मिसाइल यूनिट, और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती की है। यही सिस्टम्स ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल हुए थे।

इसके अलावा, देश में निर्मित ‘प्रचंड’ अटैक हेलीकॉप्टर और पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर भी अभ्यास का हिस्सा हैं।

भारतीय वायुसेना ने अपने सबसे शक्तिशाली लड़ाकू विमान राफेल और सुखोई-30 को अभ्यास में शामिल किया है। इनके साथ ही सी गार्जियन और हेरॉन ड्रोन भी निगरानी और टोही मिशनों के लिए उड़ान भर रहे हैं।

भारतीय नौसेना की तरफ से कोलकाता-क्लास डेस्ट्रॉयर, निलगिरी-क्लास फ्रिगेट, और कई तेज हमले करने वाले शिप तैनात किए गए हैं। ये जहाज सौराष्ट्र तट और अरब सागर क्षेत्र में संयुक्त ऑपरेशन कर रहे हैं।

अभ्यास में तीनों सेनाओं की विशेष टुकड़ियां भी हिस्सा ले रही हैं, इनमें पैरा स्पेशल फोर्स, मरीन कमांडो यूनिट मार्कोस, और वायुसेना की गरुड़ कमांडो यूनिट भी शामिल हैं। ये दल थल, जल और वायु तीनों माध्यमों में एक साथ ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं।

Exercise Trishul: पाकिस्तानी ने बंद किया एयरस्पेस

भारत के इस सैन्य अभ्यास से पाकिस्तान में खलबली मच गई है। अभ्यास शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही इस्लामाबाद ने अपने हवाई क्षेत्र के कई हिस्सों को बंद कर दिया। पाकिस्तान के सिविल एविएशन डिपार्टमेंट ने एक नोटाम (नोटिस टू एयरमेन) जारी कर देश के कई हवाई मार्गों को 48 घंटे के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। बाद में इस बैन को और बढ़ा दिया गया, जिससे पाकिस्तान के अधिकांश हवाई क्षेत्र को बंद कर दिया गया।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान ने यह कदम भारतीय अभ्यास से चिंतित होकर उठाया है। खबरों के मुताबिक, पाकिस्तानी वायुसेना और नौसेना को हाई अलर्ट पर रखा है। पाक नौसेना प्रमुख एडमिरल नवेद अशरफ ने पिछले सप्ताह सर क्रीक क्षेत्र में अपने अग्रिम ठिकानों का दौरा किया था और जवानों को “हर इंच की रक्षा करने” का आदेश दिया था।

Exercise Trishul: जॉइंट ऑपरेशन कैपेबिलिटी है मकसद

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ‘त्रिशूल’ अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं की जॉइंट ऑपरेशन कैपेबिलिटी, आत्मनिर्भरता और नए टेक्नोलॉजिकल इनोवेशंस को प्रदर्शित करना है। मंत्रालय के बयान के अनुसार, सदर्न कमान के सैनिक इस अभ्यास में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान सेना मरुस्थल, तटीय इलाकों और सर क्रीक इलाके में ऑफेंसिव और डिफेंसिव एक्सरसाइज करेगी। नौसेना सौराष्ट्र तट पर एंफीबियस अभियानों का अभ्यास कर रही है, जबकि वायुसेना हवाई हमलों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का अभ्यास कर रही है।

वहीं, वायुसेना इस अभ्यास में “महागुजराज” नामक ऑपरेशन चला रही है, जिसमें मिड-एयर रीफ्यूलिंग, एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, और ड्रोन नेटवर्क इंटीग्रेशन शामिल है। सूत्रों ने बताया कि यह अभ्यास “मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस” पर फोकस है, जिसमें थल, वायु, समुद्र, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सभी पहलू शामिल हैं।

विशेष रूप से, इस अभ्यास में इंटेलिजेंस, सर्वेलेंस एंड रिकॉनिसेंस और इलेक्ट्रोनिक वारफेयर सिस्टम की रियल टाइम जांच की जा रही है।

सर क्रीक पर बढ़ाई निगरानी

सूत्रों के अनुसार, सर क्रीक और कच्छ तटीय क्षेत्र में भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल ने निगरानी बढ़ा दी है। यह वही इलाका है जहां पाकिस्तान ने हाल में नए बंकर, एंटी-ड्रोन सिस्टम और रडार स्टेशन बनाए हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 22 अक्टूबर को भुज एयरबेस पर सैनिकों से कहा था कि “सर क्रीक में पाकिस्तान की किसी भी हरकत का जवाब भारत मुंहतोड़ तरीके से देगा।”

Trump-Xi meeting: अमेरिका और चीन की यह बैठक भारत के लिए बड़ा सबक, एक्सपर्ट बोले- आखिर हम क्यों बनना चाहते हैं सुपरपावर?

Trump Xi meeting

Trump-Xi meeting: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच गुरुवार को दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई बैठक में दोनों देशों ने व्यापार, ऊर्जा और फेंटानिल जैसे अहम मुद्दों पर कई समझौतों पर सहमति जताई। ट्रंप ने बैठक को “ट्रूली ग्रेट मीटिंग” बताते हुए कहा कि यह बातचीत दोनों देशों के बीच “आपसी सम्मान और भरोसे” को और मजबूत करेगी। वहीं, इस बैठक पर विशेषज्ञों का कहना है कि जी2 यानी अमेरिका और चीन का यह द्विपक्षीय शक्ति-समीकरण भारत के लिए एक बड़ा सबक है। चीन ने चुपचाप अपनी ताकत बढ़ाई और अब वह अमेरिका को उसी के स्तर पर चुनौती दे रहा है।

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हालांकि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह बैठक करीब 1 घंटे 40 मिनट तक चली। बैठक का आयोजन गिम्हे इंटरनेशनल एयरपोर्ट के एक विशेष हॉल में हुआ। दोनों नेताओं के बीच बातचीत का मुख्य विषय टैरिफ, ऊर्जा व्यापार और अवैध ड्रग फेंटानिल की तस्करी था।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर लिखा, “मेरी राष्ट्रपति शी के साथ बहुत शानदार मुलाकात हुई। हमारे देशों के बीच गहरा सम्मान है और यह मुलाकात उसे और मजबूत करेगी। हमने कई मुद्दों पर सहमति बनाई है और कुछ बाकी मुद्दों पर जल्द प्रगति होगी।”

उन्होंने बताया कि चीन अब अमेरिका से “बड़े पैमाने पर कृषि उत्पाद” खरीदेगा, जिसमें सोयाबीन और ज्वार शामिल हैं। ट्रंप ने इसे अमेरिकी किसानों के लिए बहुत बड़ी राहत बताया। उन्होंने कहा, “हमारे किसान बहुत खुश होंगे। मैंने पहले भी कहा था, उन्हें अब और जमीन और ट्रैक्टर खरीदने चाहिए।”

Trump-Xi meeting: चीन पर लगे टैरिफ में की कमी

ट्रंप ने एलान किया कि अमेरिका और चीन के बीच एक साल का नया व्यापार समझौता हुआ है, जिसके तहत चीनी वस्तुओं पर लगने वाले टैरिफ को 57 फीसदी से घटाकर 45 फीसदी किया जाएगा (जो कि भारत पर लगे 50 फीसदी ट्रैरिफ से कम है)। उन्होंने कहा कि हर साल यह समझौता फिर से समीक्षा के लिए लाया जाएगा, लेकिन उम्मीद है कि यह लंबे समय तक चलेगा।

Trump Xi meeting

उन्होंने बताया कि यह टैरिफ कटौती चीन की तरफ से फेंटानिल की अवैध तस्करी पर कड़े कदम उठाने के वादे के बदले में दी गई है। ट्रंप ने कहा, “चीन ने फेंटानिल पर सख्त कार्रवाई शुरू की है, इसी वजह से हमने शुल्क घटाने का फैसला लिया। हमें इस दिशा में पहले से कार्रवाई दिख रही है।” फेंटानिल नामक सिंथेटिक ड्रग अमेरिका में एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जिससे हर साल हजारों लोगों की जान जाती है। ट्रंप ने कहा कि चीन अब इस ड्रग के केमिकल इंग्रीडिएंट्स के अवैध निर्यात को रोकने के लिए ठोस कदम उठा रहा है।

चीन ने साथ ही यह भी सहमति जताई कि वह अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों तेल और गैस की बड़ी मात्रा में खरीद करेगा। ट्रंप ने बताया कि अलास्का सहित कई अमेरिकी राज्यों से तेल और प्राकृतिक गैस की बिक्री पर काम शुरू हो गया है।

क्या कहा चीन के राष्ट्रपति ने

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, “आंधी, लहरों और चुनौतियों के बीच भी, चीन-अमेरिका संबंधों की नाव को हमें सही दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए। आप और मैं, इन संबंधों के स्टीयरिंग पर हैं, इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह विशाल जहाज स्थिरता और समझदारी के साथ आगे बढ़ता रहे।

उन्होंने कहा, मैं हमेशा मानता हूं कि चीन का विकास आपकी ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की सोच के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकता है। हमारे दोनों देश एक-दूसरे की मदद करके एक साथ सफलता और समृद्धि प्राप्त करने की पूरी क्षमता रखते हैं। शी जिनपिंग ने कहा कि सालों से मैं सार्वजनिक मंचों पर बार-बार यह बात कहता आया हूं कि चीन और अमेरिका को साझेदार और मित्र बनकर रहना चाहिए। यही इतिहास ने हमें सिखाया है…।”

रेयर अर्थ मिनरल्स पर सहमति

बैठक में दोनों नेताओं ने रेयर अर्थ मिनरल्स के मुद्दे पर भी समाधान निकाल लिया। व्हाइट हाउस के अनुसार, यह मुद्दा अब “पूरी तरह सुलझा लिया गया” है। ये मिनरल्स मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस इक्विपमेंट्स और एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी होते हैं।

ट्रंप ने कहा, “रेयर अर्थ मिनरल्स पर सालभर का समझौता हुआ है और यह हर साल रिन्यू किया जाएगा। यह पूरी दुनिया के लिए अहम कदम है।”

बैठक में एक-दूसरे की तारीफ

ट्रंप और शी के बीच मुलाकात बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। शुरुआत में ट्रंप ने शी को अपना “पुराना दोस्त” बताया और कहा, “यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं इतने समय बाद अपने एक दोस्त से मिल रहा हूं। हमें कई मुद्दों पर पहले से ही सहमति है और बाकी बातों पर अभी प्रगति करेंगे।”

शी जिनपिंग ने भी ट्रंप की तारीफ करते हुए कहा कि “आपसे दोबारा मिलकर बहुत खुशी हुई। हमने आपके दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद कई बार फोन पर बात की। चीन और अमेरिका को सहयोगी और मित्र बने रहना चाहिए।”

दोनों नेताओं ने माना कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद जारी रहना चाहिए। शी ने कहा कि चीन और अमेरिका दोनों देशों का एक साथ आगे बढ़ना “विकास और समृद्धि” के लिए जरूरी है।

यूक्रेन और गाजा संघर्ष पर बातचीत

इसके अलावा, ट्रंप ने बताया कि दोनों देशों के बीच एक बड़ा ऊर्जा समझौता होने वाला है। इसमें अमेरिकी कंपनियों द्वारा चीन को तेल, गैस और रेयर मटेरियल्स की आपूर्ति शामिल है। ऊर्जा क्षेत्र के अधिकारी दोनों देशों में जल्द बैठक करेंगे।

ट्रंप ने बताया कि दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में संघर्ष विराम पर भी चर्चा हुई। यूक्रेन पर हमने लंबी बातचीत की। हम दोनों चाहते हैं कि इस संघर्ष को खत्म करने के रास्ते तलाशे जाएं। चीन इसमें मदद करने के लिए तैयार है। शी जिनपिंग ने ट्रंप के गाजा युद्धविराम समझौते में भूमिका की सराहना की और कहा कि चीन भी “अपने तरीके से” कंबोडिया-थाईलैंड सीमा विवाद सुलझाने में मदद कर रहा है।

ट्रंप-शी बैठक को 10 में से 12 अंक

बातचीत के बाद ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि यह बैठक “असाधारण रूप से सफल” रही। उन्होंने इसे 10 में से 12 अंक दिए और कहा, “यह हमारी दोनों देशों के बीच नए अध्याय की शुरुआत है। हमने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रगति की है और भविष्य में इसे और आगे बढ़ाएंगे।” ट्रंप ने यह भी एलान किया कि वह अगले साल अप्रैल में चीन का दौरा करेंगे, जबकि शी जिनपिंग उसके बाद अमेरिका आएंगे।

भारत क्यों ‘सुपरपावर’ बनना चाहता है

वहीं, इस मामले में अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार सुशांत सरीन का कहना है, “जी2 यानी अमेरिका और चीन का मिलना भारत के लिए एक बड़ा सबक है। चीन ने चुपचाप अपनी ताकत बढ़ाई और अब वह अमेरिका को उसी के स्तर पर चुनौती दे रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि चीन अब भी खुद को एक ‘विकासशील देश’ कहता है। दूसरी ओर हम हैं, जो एक ‘मिडल पावर’ होने के बावजूद खुद को ‘सुपरपावर’ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हमारे पास न तो उतनी आर्थिक क्षमता है, न ही सैन्य ताकत, जो किसी ‘महाशक्ति’ के पास होती है।”

सरीन ने सवाल उठाया, “आखिर हम सुपरपावर बनना क्यों चाहते हैं? अगर मान भी लें कि हम सुपरपावर बन जाएं, तो हमारी ‘ग्रैंड स्ट्रैटेजी’ क्या होगी? उस ताकत के साथ हम क्या करेंगे? जब हम आज अपनी मौजूदा ताकत का उपयोग ही नहीं कर पा रहे, तो सुपरपावर बनने की बातें करना सिर्फ सेल्फ-डिसेप्शन है।”

हकीकत स्वीकार करे भारत

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत को अब हकीकत स्वीकार करनी चाहिए, “सच का सामना करो। शांत रहो। डींगे हांकना बंद करो। पहले अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत को मजबूत करो। दूसरों से टेक्नोलॉजी मांगना बंद करो, कोई तुम्हें मुफ्त में नहीं देगा। या तो पुरानी तकनीक खरीदो, या अपनी खुद की तकनीक विकसित करो, या फिर दूसरों की तरह ‘सीखो और कॉपी करो’। दुनिया में किसी को भी टेक्नोलॉजी चांदी की थाली में नहीं मिली है।”

अंत में उन्होंने भारत की नीतिगत व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कहा, “अर्थव्यवस्था में सुधार करो। गवर्नेंस में सुधार लाओ। नौकरशाही के शिकंजे को तोड़ो। वरना तुम पीछे रह जाओगे।”

कमजोरों पर दबाव डालते हैं ट्रंप

अंतराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी कहते हैं कि ट्रंप और शी जिनपिंग ने आपसी सहमति से ट्रेड वॉर में एक साल की राहत मिली है। लेकिन उनकी इस मुलाकात से अमेरिका और चीन के बीच चल रहे गहरे तनावों में कोई खास राहत नहीं मिली। इसके बावजूद ट्रंप ने तुरंत अधिकांश चीनी सामानों पर लगने वाले टैरिफ को घटाकर 45 प्रतिशत कर दिया, जो भारत और ब्राजील पर लगाए गए 50 फीसदी शुल्क से कम है।

डॉ. चेल्लानी कहते हैं कि ट्रंप का अब तक का कार्यकाल एक बात साफ करता है कि वह ताकत और आक्रामकता का सम्मान करते हैं, लेकिन कमजोरों पर दबाव डालते हैं। शी जिनपिंग के साथ तथाकथित जी2 बैठक का उनका उल्लेख भी इसी पैटर्न को दर्शाता है, जैसे कि वे अक्सर नरम और झुकने वाले नेताओं से बड़े समझौते या रियायतें हासिल करने की कोशिश करते हैं।

ट्रंप ने चीन के साथ व्यापार युद्ध में विराम की कोशिश की, लेकिन दूसरी ओर उन्होंने भारत जैसे रणनीतिक सहयोगी देश पर सख्त आर्थिक दबाव बनाए रखा। चीन के प्रति उनका “कभी नरम, कभी कठोर” रवैया और भारत पर आर्थिक दबाव यह दिखाता है कि उनकी विदेश नीति दीर्घकालिक रणनीति के बजाय अल्पकालिक आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं से प्रेरित है।

India-China Talks: 23वीं कोर कमांडर बैठक को लेकर भारत-चीन की तरफ से जारी बयानों के क्या हैं मायने, क्या है ड्रैगन का गेम प्लान?

India-China Talks

India-China Talks: भारत और चीन के बीच 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक 25 अक्टूबर 2025 को लद्दाख के चुशुल-मोल्डो बॉर्डर पॉइंट पर आयोजित की गई। इस बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने एक बार फिर एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने को लेकर बातचीत की। बैठक के चार दिन बाद, 29 अक्टूबर को भारत और चीन दोनों ने अपने-अपने आधिकारिक बयान जारी किए। दोनों ही देशों ने यह कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति बनी हुई है और बातचीत की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।

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India-China Talks: क्या कहा भारतीय विदेश मंत्रालय ने

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में बताया कि यह बैठक “मित्रवत और सौहार्दपूर्ण माहौल” में हुई। मंत्रालय ने कहा कि यह पश्चिमी सेक्टर में जनरल लेवल मैकेनिज्म की पहली बैठक थी, जो 19 अगस्त 2025 को हुई 24वीं स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव बातचीत के बाद आयोजित की गई। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह बैठक भारतीय पक्ष के चुशुल-मोल्डो बॉर्डर पॉइंट पर हुई थी।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, बातचीत में अक्टूबर 2024 में हुई 22वीं कोर कमांडर बैठक के बाद हुई प्रगति की समीक्षा की गई। मंत्रालय ने कहा कि पिछले एक वर्ष में एलएसी पर शांति और स्थिरता बनी रही है। भारत ने आगे भी मौजूदा मैकेनिज्म जैसे वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन और कोर कमांडर स्तर की बैठकों के जरिए किसी भी स्थानीय मुद्दे को सुलझाने पर जोर दिया।

बयान में भारत का रुख स्पष्ट था कि शांति और स्थिरता के लिए स्ट्रक्चर्ड तरीके से वार्ता प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। विदेश मंत्रालय ने बताया कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से सीमा क्षेत्रों में बातचीत के मौजूदा तरीकों का पालन करने पर जोर दिया।

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India-China Talks: क्या कहा गया चीन की तरफ से

वहीं चीन की ओर से जारी बयान चाइना मिलिट्री ऑनलाइन और चीनी रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता यू जिंग के जरिए आया। चीन ने बैठक को “मोल्डो-चुशुल” कहते हुए लिखा कि यह वार्ता भारत की तरफ हुई यानी चुशुल में हुई। चीन ने बैठक को “सक्रिय और गहन बातचीत” बताया और कहा कि दोनों देशों ने बॉर्डर मैनेजमेंट के पश्चिमी हिस्से (वेस्टर्न सेक्शन) पर विचार-विमर्श किया।

चीन के बयान में यह भी कहा गया कि बैठक दोनों देशों के नेताओं के बीच बनी “महत्वपूर्ण आम सहमति” के तहत हुई। चीन ने यह जोड़ा कि भविष्य में सैन्य और कूटनीतिक चैनलों के जरिए बातचीत जारी रखी जाएगी ताकि सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे।

India-China Talks: क्या नहीं कहा चीन ने

दिलचस्प बात यह रही कि चीन ने अपने बयान में न तो 22वीं बैठक का जिक्र किया और न ही 24वीं स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव बातचीत के बाारे में कुछ लिखा। भारत ने जहां बातचीत की निरंतरता पर जोर दिया, वहीं चीन ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात का अप्रत्यक्ष संदर्भ देते हुए नेतृत्व स्तर की सहमति को प्राथमिकता दी।

India-China Talks: क्या है दोनों देशों के संदेशों का मतलब

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बयान लगभग एक जैसे संदेश देते हैं, यानी “शांति बनी रहे, बातचीत जारी रहे”। लेकिन उनके शब्दों और प्राथमिकताओं में अंतर है। भारत का रुख पूरी तरह से प्रक्रिया-केंद्रित है, यानी भारत एक तय प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रहा है, जबकि चीन नेतृत्व-केंद्रित दृष्टिकोण अपना रहा है।

भारत यह दिखाना चाहता है कि गलवान घाटी संघर्ष (2020) के बाद जो बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई है, उससे दोनों देशों के बीच रिश्तों में काफी प्रगति हुई है। डिसएंगेजमेंट, बफर जोन और नियमित बातचीत जैसे उठाए गए कदमों ने हालात को स्थिर बनाए रखा है। वहीं चीन यह संकेत दे रहा है कि उसकी टॉप लीडरशिप की “समझदारी” से सीमा पर शांति बनी हुई है।

India-China Talks: क्यों अहम है यह बैठक

यह बैठक इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि सर्दियों के मौसम की शुरुआत के बावजूद दोनों देशों के लगभग 50 हजार जवान की सेनाएं अभी भी एलएसी पर तैनात हैं। हालांकि, इस बैठक में सैनिकों की संख्या घटाने या नए डिसएंगेजमेंट पॉइंट्स पर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई।

अगस्त 2025 की स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता के बाद यह पहली बार था जब दोनों देशों ने सैन्य स्तर पर इतनी व्यापक चर्चा की। उस बैठक में एक नए वर्किंग ग्रुप के गठन पर सहमति बनी थी, जो सीमा प्रबंधन और पेट्रोलिंग बहाली जैसे मुद्दों पर काम करेगा।

विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, भारत और चीन दोनों ही एलएसी पर शांति को सबसे बड़ी प्राथमिकता मानते हैं। भारत का कहना है कि सीमाओं पर कोई नई गतिविधि नहीं होनी चाहिए जो हालात को बिगाड़े। चीन ने भी कहा कि “दोनों देशों के बीच सहमति के अनुसार, सीमा क्षेत्रों में टकराव से बचा जाएगा और शांति को बरकरार रखा जाएगा।”

यह बैठक 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से जारी बातचीत प्रक्रिया का हिस्सा है। उस संघर्ष के बाद से दोनों देशों के कॉर्प्स कमांडरों के बीच कुल 23 बैठकें हो चुकी हैं, जिनका उद्देश्य एलएसी पर तनाव कम करना और पारस्परिक विश्वास बहाली करना है।

भविष्य में बढ़ सकता है सैन्य गतिरोध

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मा चेलाने कहते हैं, “दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अभी भी कुछ महत्वपूर्ण अनसुलझे इलाकों पर बातचीत होनी है। पूर्वी लद्दाख में दोनों तरफ लगभग 50,000 से 60,000 सैनिक तैनात हैं, जो बताते हैं, हालात अभी भी नाजुक हैं। वहीं, चीन पूरे हिमालयी मोर्चे पर नए परमानेंट स्ट्रक्चर बना कर, और अग्रिम मोर्चों पर तैनाती करके सिस्टेमेटिक तरीके से मिलिटराइजेशन कर रहा है, जिससे भविष्य में सैन्य गतिरोध और बढ़ने की संभावना है।”

फिलहाल, 23वीं बैठक से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत और चीन दोनों शांति और आपकी बातचीत को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। जबकि कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा स्थिति को स्थिर रखना दोनों की प्राथमिकता बनी हुई है।

Tejas MK1A Delivery Delay: बिना तेजस की डिलीवरी के सूनी रही IAF की दीपावली, HAL ने फिर तोड़ा वादा, ये है वजह

Tejas MK1A Delivery Delay

Tejas MK1A Delivery Delay: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड एक बार फिर अपने वादे से चूक गई है। देश का पहला स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस बना रही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल को इस अक्टूबर तक वायुसेना को पहले दो तेजस एमके1ए एयरक्राफ्ट की डिलीवरी करनी थी। लेकिन अक्टूबर महीना भी बीतने वाला है और पहले 83 ऑर्डर में से एक भी तेजस एमके 1ए की डिलीवरी सुनिश्चित नहीं हो पाई है। ये हालात तब हैं कि जब एचएएल को जीई से अभी तक चार एफ-404 इंजनों की डिलीवरी हो चुकी है।

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सूत्रों का कहना है कि तेजस एमके1ए की डिलीवरी में अभी और देरी हो सकती है, और भारतीय वायुसेना को अगले साल तक ही यह एयरक्राफ्ट सौंपे जा सकते हैं। उनका कहना है कि यह हाल तब है कि जब वायुसेना अपनी स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को लेकर सबसे न्यूनतम स्तर पर है और पश्चिमी मोर्चे पर तनाव अभी भी जारी है।

Tejas MK1A Delivery Delay: ‘दीपावली’ पर नहीं मिली खुशखबरी

एचएएल बार-बार अपने किए वादे पर खरा नहीं उतर रहा है। सितंबर महीने की शुरुआत में एक मुलाकात के दौरान एचएएल के चेयरमैन डीके सुनील ने खुद रक्षा समाचार डॉट कॉम को ‘दीपावली’ पर खुशखबरी देने की बात कही थी। उन्होंने पूरे भरोसे के साथ कहा था कि अक्टूबर महीने में पहले दो तेजस एमके 1ए भारतीय वायुसेना को डिलीवर कर दिए जाएंगे। उन्होंने बताया था कि सितंबर से तेजस एमके 1ए पर फायरिंग टेस्ट शुरू हो जाएंगे, जो अक्तूबर तक चलेंगे, जिसके बाद अक्टूबर के आखिर तक सौंप दिए जाएंगे। इन फायरिंग टेस्ट में देश में बने बियोन्ड विजुअल रेंज मिसाइल अस्त्र, शॉर्ट रेंज एयर टू एयर मिसाइल, ब्रह्मोस एनजी और लेजर-गाइडेड बम का फायरिंग टेस्ट किया जाना था।

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Tejas MK1A Delivery Delay: आ चुके हैं चार इंजन

हालांकि अमेरिकी कंपनी जीई की तरफ से एफ-404 इंजन की सप्लाई में एक साल से ज्यादा की देरी हुई है। लेकिन अभी तक एचएएल को जीई की तरफ से चार इंजन सौंपे जा चुके हैं। पहला इंजन अप्रैल में, दूसरा इंजन जुलाई में, तीसरा इंजन सितंबर में और चौथा इंजन पहली अक्टूबर को भारत पहुंच गया था। एचएएल का कहना है कि चालू वित्त वर्ष के आखिर तक उसे 12 इंजन मिल जाएंगे। इसके बाद अगले वित्त वर्ष में सप्लाई सुचारू हो जाएगी। 2026–27 तक एचएएल का लक्ष्य हर साल 30 तेजस एमके1ए विमान तैयार करना है। इसमें निजी और सरकारी साझेदार कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा।

एयरक्राफ्ट में इंजन फिटिंग में लगने वाले समय को लेकर एचएएल का कहना था कि इसमें दो दिन से लेकर एक हफ्ते तक का समय लगता है। जब फ्यूजलेज तैयार होते हैं तो इंजन फिटिंग में ज्यादा समय नहीं लगता। लेकिन इसके बावजूद पहले दो इंजन आए हुए 5-6 महीने का वक्त बीत चुका है।

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एचएएल ने बताया था कि पहले दो तेजस एमके1ए विमान भारतीय वायुसेना को सौंपने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा कम से कम 10 अतिरिक्त यूनिट्स भी एचएएल ने असेंबल कर ली हैं और वे सिर्फ इंजनों का इंतजार कर रही हैं।

17 अक्टूबर को पहले एमके1ए प्रोटोटाइप की उड़ान

हालांकि इस महीने 17 अक्टूबर को एचएएल की नासिक फैसिलिटी में पहले तेजस एमके1ए प्रोटोटाइप (LA-5043) ने अपनी पहली सफल उड़ान भरी थी। खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी उस समारोह में मौजूद थे। उन्होंने नासिक में एचएएल की तीसरी उत्पादन लाइन का उद्घाटन भी किया था। जिसके बाद एचएएल का दावा है कि तेजस की कुल उत्पादन क्षमता प्रतिवर्ष अब 24 विमान तक पहुंच गई है।

विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि तेजस एमके 1ए की फाइनल डिलीवरी से पहले अभी बहुत से काम किए जाने बाकी हैं। मूल कॉन्ट्रैक्ट के तहत 83 विमानों की डिलीवरी 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अब लगता है कि अब यह अगले साल तक शिफ्ट हो गई है। इन 83 विमानों का ऑर्डर फरवरी 2021 में जारी किया गया था, जिनमें 73 एमके 1ए सिंगल-सीट फाइटर्स और 10 एमके 1ए ट्रेनर्स जेट शामिल हैं।

Tejas MK1A Delivery Delay: तेजस एमके 1 के ऑर्डर भी पेंडिंग

सूत्रों का कहना है कि तेजस एमके 1ए के अलावा पुराने तेजस एमके 1 का ऑर्डर भी अभी पेंडिंग है। उनका कहना है कि जनवरी 2006 और मार्च 2010 में कुल 40 एमके 1 के ऑर्डर जारी किए थे, जिनमें से केवल 38 ही डिलीवर हुए हैं, बाकी दो डबल सीट ट्रेनर एयरक्राफ्ट की डिलीवरी भी अभी बाकी है।

वहीं, एचएएल डिलीवरी की नई तारीखों को लेकर चुप्पी साधे हुए है और उनकी तरफ से कोई आधिकारी बयान भी जारी नहीं किया गया है।

Tejas MK1A Delivery Delay: उत्तम रडार की जगह इजरायली रडार

सूत्रों का कहना है कि एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स (ASQR) में भी बदलाव किए गए हैं। भारतीय वायुसेना द्वारा निर्धारित न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड (ASQR) में पहले तेजस एमके1ए में उत्तम एईएसए रडार लगाया जाना था, लेकिन अब उसकी जगह इजरायली ELTA कंपनी का बना EL/M-2052 रडार लगाया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि इससे तेजस में इंडिजिनियस कंटेंट कम हुआ है। उत्तम रडार को न लगाने की वजह सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन (CEMILAC) में देरी है। अप्रैल 2025 में CEMILAC सर्टिफिकेशन के लिए A2A, A2G मोड्स में चार फ्लाइट ट्रायल भी हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद अभी तक सर्टिफिकेशन नहीं मिल पाया है। बता दें कि उत्तम एईएसए रडार को डीआरडीओ और एलआरडीई ने मिल कर बनाया है, जिसकी परफॉरमेंस रेंज और ट्रैकिंग में EL/M-2052 के मुकाबले 25 फीसदी बेहतर है।

वहीं, सर्टिफिकेशन में देरी के चलते एचएएल एमके 1ए के शुरुआती बैच (पहले 73-83 विमान) बिना उत्तम एईएसए रडार के डिलीवर किए जाएंगे। बाद के बैचों (41वें विमान से) या 2028 के बाद अपग्रेड में उत्तम को इंटीग्रेट किया जाएगा। बता दें कि उत्तम ने 250+ घंटे फ्लाइट टेस्टिंग पूरी की है।

Tejas MK1A Delivery Delay: स्वदेशी स्वयं रक्षा कवच का इंटीग्रेशन नहीं

सूत्रों का कहना है कि उत्तम रडार के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट स्वयं रक्षा कवच भी देरी की वजह बन रहा है। यह रडार वार्निंग रिसीवर और एडवांस्ड सेल्फ-प्रोटेक्शन जैमर पॉड से बना है। यह 360 डिग्री कवरेज, डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी (DRFM) टेक्नोलॉजी और 1 मिलियन पल्स/सेकंड प्रोसेसिंग देता है। डीआरएफएम इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक है जो दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी, मॉडिफाई और दोबारा भेजती है। इससे दुश्मन रडार को फर्जी टारगेट
दिखते हैं और विमान ट्रेक होने से बच जाता है।

सूत्रों का कहना है कि ईडब्ल्यू सूट के सर्टिफिकेशन और इंटीग्रेशन में देरी के चलते पहले 83 एमके 1ए विमानों में इजरायली स्कॉर्पियस-एसपीजे (ईएल/एल-8222एसबी) लगाया जा रहा है। वहीं दूसरे बैच में (97 विमान) में 2028 से स्वयं रक्षा कवच का इंटीग्रेशन किया जाएगा।

सूत्रों ने बताया कि तेजस एमके 1ए के रडार-इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट इंटरफेस और अस्त्र एमके 1 मिसाइल इंटीग्रेशन में सॉफ्टवेयर ग्लिच है, जिसके चलते सर्टिफिकेशन में देरी हो रही है। अस्त्र मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और मिसाइल गाइडेंस का सॉफ्टवेयर इंटरफेस टेस्टिंग अभी भी पेंडिंग है। हालांकि रडार 100 टारगेट ट्रैक कर सकता है, लेकिन रीयल-टाइम इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर अटैक में वैलिडेशन अभी भी बाकी है।

मार्च 2026 तक ही डिलीवरी

उनका कहना है कि अगर एयरक्राप्ट पूरी तरह से तैयार भी हो जाए तो भी इंटीग्रेशन की चुनौतियां काफी ज्यादा है। अकेले सर्टिफिकेशन में ही 3 से 6 महीने का लग सकता है। उनका कहना है कि अगर सब कुछ ठीकठाक रहा तो भारतीय वायुसेना को तेजस की डिलीवरी अगले साल मार्च 2026 तक ही संभव हो सकती है।

हर साल 30 से 40 विमान चाहिए

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह कई बार सार्वजनिक तौर पर तेजस की डिलीवरी को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने कहा था, “भूखे मुंह तैयार हैं, हम सिर्फ भोजन का इंतजार कर रहे हैं।” उनका इशारा तेजस विमानों के जल्दी प्रोडक्शन और डिलीवरी की तरफ था। उन्होंने कहा था कि वायुसेना की क्षमता बनाए रखने के लिए हर साल 30 से 40 विमान तैयार होने चाहिए, यानी दो स्क्वाड्रन हर साल तैयार होनी चाहिए।

भारतीय वायुसेना प्रमुख ने 3 अक्टूबर को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कहा था कि तेजस एमके-1ए के मामले में वायुसेना की उम्मीदें वही हैं जो पहले दी गई क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स में तय की गई थीं। उन्होंने कहा कि ये जरूरतें कुछ साल पहले तय हुई थीं और आज भी वही बनी हुई हैं।

वायुसेना प्रमुख ने कहा, “हमें जानकारी मिली है कि इंजन डिलीवरी शुरू हो चुकी है और कुछ प्रगति भी हो रही है। लेकिन अभी कुछ रिसर्च एंड डेवलपमेंट से जुड़ा काम बाकी है, जिस पर काम जारी है। जैसे ही यह विमान तय मानकों के अनुसार सर्टिफाई हो जाएगा, वायुसेना उसे शामिल करने के लिए तैयार है।”

“आधा-अधूरा, दिखावे का विमान मत दो”

इस साल फरवरी 2025 में एरो इंडिया और मई 2025 में सीआईआई समिट में उन्होंने एचएएल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था, “टाइमलाइन बड़ा मुद्दा है”। उन्होंने कहा था, विमान सिर्फ़ उड़ने लायक नहीं, लड़ने लायक होना चाहिए।” हमें “आधा-अधूरा, दिखावे का विमान मत दो। पूरा, युद्ध के लिए तैयार विमान दो, जिसे हम तुरंत बॉर्डर पर तैनात कर सकें।”

एरो इंडिया में उनकी एचएएल सीएमडी के साथ एक बातचीत बड़ी वायरल हुई थी, जिसमें वे कहते सुने गए थे कि जिस विमान को आप एमके1ए कहकर उड़ा रहे हैं, वो एमके1ए नहीं है। सिर्फ सॉफ्टवेयर बदलने या दिखावे से एमके1ए नहीं बन जाता। जब हथियार और क्षमताएं आएंगी, तभी ये एमके1ए होगा।”

Software Defined Radios: भारतीय सेना अब करेगी इस खास एंटी-जैमिंग प्रूफ रेडियो सिस्टम का इस्तेमाल, बिना टॉवर के होगा कनेक्ट, बातचीत रहेगी सुरक्षित

Software Defined Radios
Software Defined Radios (representation Image)

Software Defined Radios: भारतीय सेना ने देश में बने अपने पहले सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो सिस्टम की खरीद के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया है। यह रेडियो पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और मैन्युफैक्चर किया गया है। जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने तैयार किया है। नए एसडीआर सिस्टम से सेना की सुरक्षित, हाई-स्पीड और रीयल-टाइम कम्युनिकेशन क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

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Software Defined Radios: साझेदारी में तैयार हुआ हाई-टेक एसडीआर सिस्टम

सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो पारंपरिक रेडियो की तुलना में कई गुना एडवांस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। पुराने रेडियो उपकरणों में फ्रीक्वेंसी और चैनल बदलने के लिए हार्डवेयर बदलना पड़ता था, जबकि एसडीआर में यह सब सॉफ्टवेयर से ही किया जा सकता है। इस सिस्टम को डीआरडीओ की तीन प्रमुख लैब्स ने मिलकर विकसित किया है। वहीं इसका प्रोडक्शन बीईएल बेंगलुरु करेगा।

The Indian Army procures its first indigenously designed Software Defined Radios
The Indian Army procures its first indigenously designed Software Defined Radios

सेना ने इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत एसडीआर-टैक्टिकल सिस्टम खरीदा है, जिसे मैदान में, वाहनों में और एयरबोर्न प्लेटफॉर्म पर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। बीईएल का कहना है कि यह सिस्टम 95 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और भारत की संचार सुरक्षा नीति के तहत पूरी तरह सर्टिफाइड है।

कैसे करेगा काम एसडीआर सिस्टम

यह एसडीआर सिस्टम भारतीय सेना को नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए तैयार करेगा। इसमें हाई डेटा रेट और मोबाइल एड-हॉक नेटवर्क (MANET) जैसी खूबियां हैं। यानी यह सिस्टम अपने आप नेटवर्क बनाता है, और जवानों को किसी फिक्स्ड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती।

इसके जरिए सैनिक, टैंक और ड्रोन बिना किसी टावर के एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और वीडियो, वॉइस और डेटा को रीयल टाइम में ट्रांसमिट कर सकते हैं। इसका डेटा रेट 100 एमबीपीएस से अधिक है और इसमें एईएस-256 लेवल एन्क्रिप्शन का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह पूरी तरह सुरक्षित और एंटी-जैमिंग बना रहता है।

सेना के लिए क्या बदलेगा

भारतीय सेना ने पिछले कुछ सालों में अपने पुराने रेडियो सिस्टम्स, जैसे कि टीआरसी-3110 को बदलने का फैसला किया था। क्योंकि इनके सिस्टम जामिंग और इंटरसेप्शन का खतरा रहता था। वहीं, एसडीआर सिस्टम की तैनाती के बाद, एलएसी और एलओसी जैसे इलाकों में सैनिकों को लगातार सुरक्षित कनेक्शन मिलेगा।

एसडीआर की मदद से अब एक सैनिक फील्ड में रहते हुए ही कमांड सेंटर से सीधे बात कर सकेगा, ड्रोन से मिली तस्वीरें भेज सकेगा और मिशन डेटा साझा कर सकेगा। पहले जहां सिग्नल टूट जाते थे, अब मोबाइल एड-हॉक नेटवर्क तकनीक से नेटवर्क अपने आप री-कॉन्फिगर हो जाएगा।

सेना के लिए तीन तरह के सिस्टम

एसडीआर सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 24 घंटे लगातार काम कर सकता है और इसका पावर मैनेजमेंट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित है।

सेना के लिए एसडीआर सिस्टम तीन तरह के वर्जन में तैयार किया गया है। पहला, मैनपैक वर्जन, जिसे सैनिक पीठ पर ले जा सकते हैं और जिसकी रेंज लगभग 10 किलोमीटर है। वहीं, दूसरा, हैंडहेल्ड वर्जन है, जो हल्का है और नजदीकी संचार के लिए इस्तेमाल होता है। जबकि तीसरा, व्हीकल-माउंटेड वर्जन है, जिसे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों में लगाया जाता है।

इनके अलावा, नौसेना और वायुसेना के लिए भी एयरबोर्न और शिप-बोर्ड वेरिएंट डेवलप किए जा रहे हैं। इससे सभी सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित की जाएगी। वहीं भविष्य में इसके अपदग्रेडेड वर्जन भी आएंगे। 2027 में एआई फीचर वाला एसडीआर, 2028 में सैटेलाइट लिंक, और 2030 तक 5जी मिलिट्री नेटवर्क तैयार हो जाएगा।

सिक्योरिटी और एन्क्रिप्शन फीचर

एसडीआर सिस्टम में एन्क्रिप्शन और एंटी-जैमिंग प्रूफ बनाया गया है। अगर दुश्मन किसी फ्रीक्वेंसी को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो एसडीआर अपने आप फ्रीक्वेंसी बदल लेता है। इसके अलावा, यह सिस्टम “फ्रेंडली यूनिट्स” को अपने आप पहचान लेता है, जिससे किसी प्रकार का गलत सिग्नल इंटरसेप्शन नहीं होता। इसमें डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी तकनीक का भी इस्तेमाल हुआ है, जो दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी कर उसे कन्फ्यूज कर देती है।

पाकिस्तान के पास तुर्की, चीन और फ्रांस के एसडीआर

जहां भारत का एसडीआर पूरी तरह स्वदेशी है, तो पाकिस्तान अब भी विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर है। पाकिस्तान के एसडीआर तुर्की, चीन और फ्रांस जैसे देशों से खरीदे गए हैं। पाकिस्तानी सेना के पास एसडीआर सिस्टम तुर्की की असेलसान कंपनी, चीन की हुवावे/जेडटीई कंपनियों और फ्रांस की थेल्स कंपनी से खरीदे गए हैं। पाकिस्तान की असेलसान एसडीआर सीरीज तुर्की पर निर्भर है। 2022 में हुए तुर्की-पाक समझौते के बाद लगभग 500 एसडीआर यूनिट्स डिलीवर की गईं। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन से वी/यूएचएफ बैंड वाले एसडीआर खरीदे हैं, जो सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल होते हैं। लेकिन इनकी एन्क्रिप्शन सिक्योरिटी पर कई बार सवाल उठ चुके हैं।

पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेज के पास फ्रांस की थेल्स MBITR रेडियो सीरीज है, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। पाकिस्तान की हैली इंडस्ट्रीज तक्षिला एसडीआर प्रोटोटाइप पर काम कर रही है, लेकिन यह भी चीनी तकनीक पर आधारित है और अभी ट्रायल फेज में है।

BrahMos Missile Export: ब्रह्मोस मिसाइल बेचने के लिए इन दो आसियान देशों से चल रही बातचीत, इस साल के आखिर तक फाइनल हो सकती है डील

BrahMos Missile 800 km
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BrahMos Missile Export: भारत अपनी सबसे ताकतवर ब्रह्मोस सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल को दो आसियान देशों को बेचने की तैयारी कर रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो और देशों, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ कुल 455 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 3,800 करोड़ रुपये) के दो बड़े सौदों पर इस साल दिसंबर तक दस्तखत होने की उम्मीद है। रक्षा और सुरक्षा के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है।

BrahMos missiles: ऑपरेशन सिंदूर 2.0 में पाकिस्तान में तहलका मचाएंगी 800 किमी रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइलें!

यह भारत के रक्षा निर्यात इतिहास के सबसे बड़े सौदों में से एक होगा। इससे न केवल भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को मजबूती मिलेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी भी और मजबूत होगी।

ब्रह्मोस मिसाइल को भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त सहयोग के साथ डेवलप किया था। यह मिसाइल मैक 3 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है और 400 किलोमीटर से अधिक दूरी पर भी सटीक निशाना साध सकती है। इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है।

फिलीपींस के साथ 2022 में हुआ सौदा सफल रहा था। भारत ने फिलिपींस को 375 मिलियन डॉलर की डील के तहत ब्रह्मोस का कोस्टल डिफेंस सिस्टम दिया था। जिसके बाद आसियान देशों का भारत पर भरोसा और बढ़ा है। फिलिपींस में ब्रह्मोस की सफलता के बाद अब वियतनाम और इंडोनेशिया भी इसे अपने नेवल एंड कोस्टल सिक्युरिटी सिस्टम्स का हिस्सा बनाना चाहते हैं। रक्षा सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के साथ बातचीत अंतिम चरण में है और कॉन्ट्रैक्ट दिसंबर तक साइन हो जाएंगे।

BrahMos Missile Export: आसियान देशों में क्यों बढ़ रही है ब्रह्मोस की मांग

दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश इन दिनों में समुद्री विवादों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री दावों के बीच इन देशों को एक ऐसी मिसाइल सिस्टम की जरूरत थी जो तेज, भरोसेमंद और सटीक हो। ब्रह्मोस इस जरूरत को हर तरह से पूरा करती है।

यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ती है, इसे ट्रैक करना कठिन है और यह भारी पेलोड ले जा सकती है। इसके रखरखाव की लागत भी पश्चिमी देशों के वेपन सिस्टम की तुलना में कम है। साथ ही, भारत इन देशों को ट्रेनिंग, तकनीकी मदद और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी दे रहा है।

भारत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। इस कारण वह बिना किसी राजनीतिक शर्त या दबाव के हथियारों की सप्लाई करता है। यही वजह है कि आसियान देशों में भारत के डिफेंस इक्विपमेंट्स पर भरोसा बढ़ा है।

ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया भी इच्छुक

सूत्रों ने बताया कि ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया के साथ भी ब्रह्मोस को लेकर बात चल रही है। दो अरब डॉलर से ज्यादा के सौदे संभव हैं। ग्रीस सिटी टाइम्स का कहना है कि ईस्टर्न एजियन द्वीपों पर ब्रह्मोस लगाने से तुर्की नौसेना को रोकना आसान होगा। पेंता पोस्टाग्मा भी ब्रह्मोस को तुर्की के खिलाफ समुद्री वर्चस्व के लिए जरूरी बता चुका है। वहीं, ब्राजील अटलांटिक में अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए ब्रह्मोस पर विचार कर रहा है।

लगातार बढ़ रहा डिफेंस एक्सपोर्ट

वहीं, ब्रह्मोस एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट मिलने से भारत के रक्षा उद्योग को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा। लखनऊ स्थित ब्रह्मोस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी में हर साल करीब 100 मिसाइलें बनाने की क्षमता है। इससे भारत की न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ेगी बल्कि रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोतरी होगी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार नहीं है, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और इनोवेशन की पहचान है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि दुनिया अब भारत की डिफेंस तकनीक पर भरोसा करती है और यह हमारे आत्मनिर्भर भारत मिशन के लिए बड़ी उपलब्धि है।

भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने 2.76 बिलियन डॉलर का डिफेंस एक्सपोर्ट किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 फीसदी अधिक है। अब भारत के रक्षा उत्पाद 100 से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं।

BrahMos Missile Export: 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार

इसके अलावा भारत ब्रह्मोस का 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार कर रहा है। हाल ही में बंगाल की खाड़ी में ब्रह्मोस का सफल परीक्षण भी किया गया था। यह परीक्षण अक्टूबर महीने में हुआ। मिसाइल में नया रामजेट इंजन और हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम लगाया गया, जो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और जीएनएसएस का कंपोजिशन है। इससे जैमिंग से बचाव होता है। वहीं इसकी सटीकता एक मीटर से भी कम रही। ब्रह्मोस पहले 290 किलोमीटर तक मार कर सकती थी। एमटीसीआर नियमों के बाद 2017 में इसे 450-500 किलोमीटर तक बढ़ाया गया। अब 800 किलोमीटर रेंज के लिए ईंधन टैंक बढ़ाया गया है। सॉफ्टवेयर में बदलाव किया गया है। साथ ही कंपोजिट मैटेरियल का इस्तेमाल हुआ है। इससे यह ईंधन ज्यादा ले जा सकती है। डीआरडीओ सूत्रों ने बताया कि 800 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन 2027 के आखिर तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा।

Nag ATGM: भारतीय सेना खरीदेगी ‘नाग मार्क-2’ एंटी-टैंक मिसाइलें, आज डीएसी की बैठक में मिल सकती है मंजूरी

Nag ATGM
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Nag ATGM: भारतीय सेना जल्द ही 2,408 नाग मार्क-2 एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें और 107 नामिका ट्रैक्ड व्हीकल्स की खरीद करने जा रही है। रक्षा मंत्रालय इस प्रस्ताव पर आज होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की बैठक में मंजूरी दे सकता है।

Explainer: जोरावर टैंक के नाग की फुफकार दुश्मन के टैंकों पर पड़ेगी भारी, इसका मैजिक मोड बैटलग्राउंड में बनेगा गेम चेंजर!

नाग मार्क-2 मिसाइल का निर्माण भारत डायनेमिक्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है, जबकि इसके विकास में डीआरडीओ की अहम भूमिका रही है। यह मिसाइल तीसरी पीढ़ी की ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक पर बेस्ड है, जो अपने टारगेट को लॉक कर स्वतः नष्ट करने में सक्षम है।

जनवरी 2025 में राजस्थान के पोखरण फील्ड रेंज में नाग मार्क-2 मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया था। इन फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल्स के दौरान मिसाइल ने न्यूनतम और अधिकतम रेंज पर सभी लक्ष्यों को बेहद सटीकता से नष्ट किया। इस परीक्षण में भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

इन ट्रायल्स के बाद डीआरडीओ और उत्पादन एजेंसियों ने पूरे वेपन सिस्टम को सेना में शामिल करने के लिए तैयार कर दिया है। नामिका-2 वाहन (नाग मिसाइल कैरियर वर्जन 2) का भी ट्रायल किया गया था, जो नाग मिसाइलों के लॉन्च प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करेगा।

भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल (इन्फैंट्री) लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने कहा कि कई स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल प्रोजेक्ट प्रगति पर हैं। उन्होंने बताया, “12 लॉन्चर्स और 104 जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें आपात खरीद प्रक्रिया के तहत पहले से ही पाइपलाइन में हैं। इसके अलावा डीआरडीओ का एमपी-एटीजीएम प्रोग्राम और ‘मेक-2’ प्रक्रिया में भी कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। हम चौथी पीढ़ी की एटीजीएम प्रणाली के लिए आरएफपी को अंतिम रूप दे रहे हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लगातार स्वदेशी हथियार प्रणालियों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। नाग मार्क-2 मिसाइल इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो न केवल भारत की टेक्नोलॉजिकल क्षमता को दर्शाती है बल्कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता को कम करती है।

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी बार-बार कहा है कि भविष्य के युद्धों में भारत को अपने दम पर तैयार रहना होगा और इसके लिए स्वदेशी हथियारों की भूमिका अहम है। नाग मार्क-2 और नामिका वाहन इसी दिशा में बड़ा कदम साबित होंगे।

Close Quarter Battle Carbine: भारतीय सेना को मिलेंगी लेटेस्ट सीक्यूबी कार्बाइन्स, 4.25 लाख राइफलें होंगी सप्लाई

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Close Quarter Battle Carbine

Close Quarter Battle Carbine: भारतीय सेना की इन्फैंट्री को अब आधुनिक और स्वदेशी तकनीक से बनी क्लोज क्वार्टर बैटल (सीक्यूबी) कार्बाइन्स मिलने जा रही हैं। रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में 4.25 लाख कार्बाइन राइफलें खरीदने के लिए दो भारतीय कंपनियों भारत फोर्ज लिमिटेड और पीएलआर सिस्टम्स के साथ एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। इस डील की कुल लागत लगभग 2770 करोड़ रुपये बताई गई है।

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वहीं, इन कार्बाइन्स की डिलीवरी आने वाले महीनों में शुरू होगी, जिससे सैनिकों की नजदीकी युद्ध क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। यह डील भारतीय सेना की ‘बाय (इंडियन)’ कैटेगरी के तहत की गई है, जिसमें कम-से-कम 50 से 60 फीसदी तक इंडीजिनियस कंटेंट होना जरूरी है। जिसका उद्देश्य है, भारतीय रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना और विदेशों पर निर्भरता को घटाना है।

Close Quarter Battle Carbine: दो भारतीय कंपनियां बनाएंगी नई कार्बाइन

कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक, भारत फोर्ज की यूनिट ‘कल्यााणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड’ कुल उत्पादन का 60 फीसदी हिस्सा संभालेगी, जबकि बाकी 40 फीसदी हिस्से की सप्लाई पीएलआर सिस्टम्स करेगी, जो अदाणी ग्रुप और इजराइल वेपन इंडस्ट्री मिल कर बनाएंगी। यह तावोर राइफल फैमिली का हिस्सा है और विशेष रूप से क्लोज क्वार्टर बैटल ऑपरेशंस के लिए डिजाइन की गई है।

Close Quarter Battle Carbine: दो साल के भीतर सप्लाई

डायरेक्टर जनरल इन्फैंट्री लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने बताया, “भारतीय इन्फैंट्री अब ‘शूट टू किल’ फिलॉसफी की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। पुराने हथियारों की जगह अब 7.62 मिमी कैलिबर वाले एडवांस्ड राइफल और सीक्यूबी कार्बाइन लाई जा रही हैं, जो अधिक घातक, सटीक और भरोसेमंद हैं।”

उन्होंने बताया, “कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक कंपनियों को दो साल के भीतर पूरी कार्बाइन खेप की सप्लाई करनी होगी। यह सेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम का एक प्रमुख हिस्सा है।” जनरल कुमार ने कहा कि नई सीक्यूबी कार्बाइनें नजदीकी युद्ध यानी क्योज कॉम्बैट, काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस, और शहरी मिशनों में इन्फैंट्री की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देंगी।

Close Quarter Battle Carbine: क्या हैं नई सीक्यूबी की खूबियां

सेना द्वारा खरीदी जा रही सीक्यूबी कार्बाइनें 5.56×45 मिमी कैलिबर की हैं। इनका वजन तीन किलोग्राम से अधिक नहीं होगा। इन हथियारों की इफेक्टिव रेंज 200 मीटर से अधिक होगी, और इन्हें बेयॉनेट के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिसके ब्लेड लंबाई कम से कम 120 मिमी होगी।

इन कार्बाइन राइफलों में शॉर्ट बर्स्ट फायरिंग, फुल ऑटो फायर मोड, नाइट विजन साइट्स, हाइब्रिड टैक्टिकल ग्रिप और साइलेंसर कम्पैटिबिलिटी जैसी सुविधाएं मिलेंगी। ये हथियार पुराने स्टर्लिंग सबमशीन गन को रिप्लेस करेंगे, जो पिछले दो दशकों से सेना में सेवा में थीं।

इंसास और स्टर्लिंग को किया जाएगा चरणबद्ध तरीके से रिप्लेस

इंसास राइफल और 9×19 मिमी स्टर्लिंग कार्बाइन 1990 के दशक से सेवा में थीं, लेकिन अब तकनीकी रूप से पुरानी हो चुकी हैं। स्टर्लिंग गन मूल रूप से 1940 के दशक की डिजाइन पर आधारित है और आज के शहरी व आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए नाकाफी है। लेकिन समय के साथ बदलती तकनीक और नए युद्धक्षेत्र की चुनौतियों को देखते हुए सेना ने छोटे, तेज और सटीक हथियारों की जरूरत महसूस की। सीक्यूबी कार्बाइन इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार की गई है। यह उन हालात में सबसे ज्यादा प्रभावी है जहां लड़ाई शहरी इलाकों, इमारतों या सीमित दूरी पर होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने बताया कि “इंसास राइफलें अपने समय में काफी प्रभावी थीं, लेकिन अब आधुनिक मेटलर्जी और निर्माण तकनीकों के चलते कम वजनी, अधिक टिकाऊ और घातक हथियारों की आवश्यकता है।”

डिलीवरी का पहला चरण सितंबर 2026 से

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए 2022 में स्वीकृति (एक्सेप्टेंस ओएफ नेसेसिटी – एओएन) दी थी, जिसमें 4,25,213 सीक्यूबी कार्बाइन खरीदने का प्रावधान था। यह सभी हथियार ‘बॉय (इंडियन)’ कैटेगरी में शामिल हैं, जिसका अर्थ है कि इन्हें या तो भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया हो या इनमें 60 प्रतिशत से अधिक भारतीय सामग्री हो। सेना के अधिकारियों के अनुसार, डिलीवरी का पहला चरण सितंबर 2026 में शुरू होगा और पूरा बैच दो वर्षों में सेना को सौंप दिया जाएगा।

आधुनिक युद्ध के लिए तैयार सैनिक

सेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत इन्फैंट्री को नई सीक्यबूी कार्बाइन के अलावा एके-203 राइफलें, .338 स्नाइपर राइफलें, और चौथी पीढ़ी के एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम भी मिल रहे हैं। डीजी इन्फैंट्री ने बताया कि “सभी स्तरों पर सैनिकों और अधिकारियों को नई तकनीकों की ट्रेनिंग दी जा रही है।” उन्होंने जोड़ा कि हर साल प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की समीक्षा की जाती है ताकि सैनिक नई हथियार प्रणालियों को संभालने और ऑपरेट करने में सक्षम रहें।

भारतीय उद्योग से जुड़ा आत्मनिर्भरता मिशन

लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने कहा कि सीक्यूबी कार्बाइन प्रोजेक्ट (Close Quarter Battle Carbine) पूरी तरह से मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “हम घरेलू उद्योगों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि भविष्य में सभी वेपन सिस्टम भारत में ही बनाए जा सकें।”

इन्फैंट्री के आधुनिकीकरण में निजी कंपनियों और रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (डीपीएसयू) की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसके तहत सेना सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो, थर्मल इमेजिंग साइट्स, और ड्रोन सर्विलांस सिस्टम्स जैसे कई सिस्टम भी देश में डेवलप करवा रही है।