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Bhairav-Ashni: इस बार पाकिस्तान ने की कोई हिमाकत तो ‘काल’ बनेंगी भैरव बटालियन और अश्नि प्लाटून, ऑपरेशनल हुईं भारतीय इन्फैंट्री की नई स्ट्राइक और ड्रोन यूनिट्स

Indian Army Ashni Platoon

Bhairav-Ashni: भारतीय सेना ने अपनी नई दो फॉरमेशंस भैरव बटालियन और अश्नि प्लाटून को ऑपरेशनल कर दिया है। ये दोनों यूनिट्स मॉडर्न बैटलफील्ड की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं। सेना अब तक 5 भैरव बटालियनें खड़ी कर चुकी है, जिन्हें अलग-अलग फॉरवर्ड एरिया में तैनात किया जा चुका है। ये बटालियनें ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना के आधुनिकीकरण और “फ्यूचर रेडी फोर्स” विजन का हिस्सा हैं।

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डायरेक्टर जनरल इन्फैंट्री लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने बातचीत में बताया कि “भैरव बटालियन को पारंपरिक इन्फैंट्री और स्पेशल फोर्सेज के बीच की खाई को भरने के लिए तैयार किया गया है। ये बटालियनें छोटे स्तर पर लेकिन अत्यधिक प्रशिक्षित सैनिकों से बनी हैं, जो तेजी से और निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम हैं।”

Bhairav-Ashni: 25 बटालियन तैयार करने की योजना

जनरल कुमार ने बताया कि पहले चरण में पांच भैरव बटालियन तैयार की गई हैं, जिनकी ट्रेनिंग 1 अक्टूबर से शुरू हो चुकी है और 30 अक्टूबर तक चलेगी। छह महीने के भीतर इनकी संख्या बढ़ाकर 25 बटालियन करने की योजना है। उन्होंने बताया कि इन इकाइयों को पहले ही “इंटेंडेड एरिया ऑफ आपरेशंस” में तैनात कर दिया गया है और “ओन-द-जॉब ट्रेनिंग” के बाद ये यूनिट्स रियल मिशंस के लिए तैयार होंगी।

Bhairav-Ashni: डिस्पोजेबल हथियार सिस्टम से लैस

भैरव बटालियनें लगभग 250 सैनिकों की यूनिट होती हैं, जो पारंपरिक इन्फैंट्री बटालियन (800-900 सैनिकों) की तुलना में छोटी हैं। इनमें आर्टिलरी, सिग्नल और एयर डिफेंस के प्रशिक्षित जवानों को भी शामिल किया गया है। इन इकाइयों को पर्सनल एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल्स, लॉइटरिंग म्यूनिशन्स और विभिन्न प्रकार के ड्रोन से लैस किया गया है। इनके पास डिस्पोजेबल हथियार सिस्टम होंगे जिन्हें फायर करने के बाद तुरंत छोड़ा जा सकता है, जिससे सैनिक तेजी से आगे बढ़ सकें।

ये लाइट कमांडो बटालियनें तुरंत हमले, सीमा सुरक्षा, काउंटर-इंसर्जेंसी और दुश्मन की गतिविधियों में बाधा डालने के लिए डिजाइन की गई हैं। इन्हें “सेव एंड रेज” मॉडल के तहत बिना कोई नई भर्ती किए मौजूदा इन्फैंट्री बटालियनों से सैनिकों को रीलोकेट करके बनाया जा रहा है। यह पहल ऑपरेशन सिंदूर के बाद थलसेना की आधुनिकीकरण योजना का हिस्सा है।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने कहा, “भैरव बटालियन दुश्मन की संवेदनशील और हाई-वैल्यू टारगेट्स पर तेज, असरदार कार्रवाई करने के लिए तैयार की गई हैं। यह यूनिट्स लीन एंड मीन होंगी- यानी कम संख्या में अधिक प्रभावशाली मारक क्षमता। ये छोटे आकार की लेकिन अत्यंत प्रभावी यूनिट्स हैं, जो अपने सीमित आकार के बावजूद अनुपात से अधिक परिणाम देने में सक्षम होंगी।”

उन्होंने बताया कि ये बटालियनें सेना के आधुनिकीकरण अभियान के तहत डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन का हिस्सा हैं। भैरव यूनिट्स को ऐसे इलाकों में तैनात किया जा रहा है जहां तुरंत जवाबी कार्रवाई, सटीक वार और सीमित समय में निर्णायक कार्रवाई की जरूरत होती है।

यहां हुईं तैनात

सूत्रों के अनुसार सेना की पांच भैरव बटालियनों को में से पहली बटालियन लद्दाख में नॉर्दर्न कमांड के तहत रेकॉनिसेंस और क्रॉस-बॉर्डर ऑपरेशंस के लिए तैनात है। दूसरी और तीसरी बटालियनें श्रीनगर और नगरोटा 15वीं 16वीं कोर के तहत एलओसी पर काउंटर-टेरर मिशनों के लिए तैयार हैं। चौथी बटालियन पश्चिमी कमांड के तहत राजस्थान/पंजाब के रेगिस्तानी इलाके में और पांचवीं बटालियन पूर्वी कमांड के तहत अरुणाचल प्रदेश में चीन सीमा पर तैनात है।

Bhairav-Ashni: अश्नि प्लाटून: बैटलफील्ड में ड्रोन की ताकत

इन्फैंट्री के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार के मुताबिक भैरव बटालियन के समानांतर, भारतीय सेना ने प्रत्येक इन्फैंट्री बटालियन में एक ‘अश्नि प्लाटून’ बनाई है। अश्नि” का अर्थ है ‘अग्नि’ या ‘ऊर्जा’, जिसके तहत बैटलफील्ड में ड्रोन आधारित युद्धक क्षमता को इन्फैंट्री की ताकत में शामिल करना है।

डीजी इन्फैंट्री ने बताया कि “380 से अधिक इन्फैंट्री बटालियनों में अश्नि प्लाटून तैयार की गई हैं। ये प्लाटून दो कैटेगरी में काम करती हैं, पहली सर्विलांस और दूसरी लॉइटर म्युनिशन।” अश्नि प्लाटून को “ईगल ऑन आर्म्स” कॉन्सेप्ट के तहत बनाया गया है, जिसमें हर सैनिक अपने प्लेटफॉर्म के साथ ड्रोन ऑपरेट करने में कैपेबल होगा। पहले प्रकार की प्लाटून ड्रोन दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी करते हैं, जबकि दूसरे प्रकार की प्लाटून ड्रोन से सटीक हमले करेगी।

Bhairav-Ashni: एफपीवी ड्रोन की ट्रेनिंग

लेफ्टिनेंट जनरल कुमार के मुताबिक अश्नि यूनिट्स को भारतीय उद्योगों द्वारा निर्मित उपकरणों से लैस करने के लिए 9 कैटेगरी के ड्रोन का ट्रायल चल रहा है। इनमें इन्फॉर्मेशन, सर्वेलेंस, रिकॉनिसेंस (आईएसआर) और कामीकाजी ड्रोन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि अश्नि प्लाटून के सैनिकों को फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन ऑपरेशन की विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है, जिससे वे रियल टाइम इमेजरी, लक्ष्य निर्धारण और सटीक हमला करने में सक्षम बन सकें।

काउंटर-यूएएस सिस्टम तैनात

प्रत्येक इन्फैंट्री बटालियन में 16 ड्रोन प्लाटून होंगी, जिनमें से कुछ लंबी दूरी की और कुछ नजदीकी मिशनों के लिए सक्षम होंगी। सेना के अनुसार, ये यूनिट्स दुश्मन के इलाके में अंदर तक जाकर सटीक प्रहार करने की क्षमता रखती हैं।

उन्होंने बताया कि ड्रोन के साथ-साथ, सेना ने काउंटर-यूएएस सिस्टम (काउंटर-अनमैनड एरियल सिस्टम्स) भी तैनात किए हैं ताकि दुश्मन के ड्रोन हमलों से सैनिकों की रक्षा की जा सके।

आत्मनिर्भर भारत पहल का हिस्सा

सेना की ये दोनों नई इकाइयां भैरव और अश्नि ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल का हिस्सा हैं। इनके लिए जरूरी हथियार और उपकरण घरेलू रक्षा उद्योग और डीपीएसयू (डिफेंस पब्लिक सेक्टर यूनिट्स) के सहयोग से तैयार किए जा रहे हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने कहा, “भारतीय इन्फैंट्री अब भविष्य के युद्धक्षेत्र के लिए तैयार है। ड्रोन, स्मार्ट हथियार और विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक हमारी रणनीतिक क्षमताओं को नए स्तर पर ले जा रहे हैं।”

Jaish Online Jihadi Course: पाकिस्तान में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने महिलाओं के लिए शुरू किया ऑनलाइन जिहादी कोर्स, देना होगा 500 रुपये ‘चंदा’

Jaish Online Jihadi Course

Jaish Online Jihadi Course: पाकिस्तान में स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने एक नया ऑनलाइन जिहादी कोर्स ‘तुफत अल-मूमिनात शुरू किया है। यह कोर्स संगठन की महिला शाखा ‘जमात उल-मूमिनात के तहत चलाया जा रहा है। जैश का मकसद महिलाओं को अपने आतंकवादी नेटवर्क में शामिल किया जाए और आर्थिक सहयोग जुटाया जाए।

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इस कोर्स की शुरुआत 8 नवंबर से होगी। इस कोर्स में शामिल होने के लिए हर प्रतिभागी महिला से 500 पाकिस्तानी रुपये का दान देना जरूरी होगा। यह राशि कथित रूप से संगठन की “धार्मिक शिक्षा गतिविधियों” के नाम पर ली जा रही है। इस कोर्स की खासियत यह है कि सभी सेशन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर 40-40 मिनट के होंगे, जिन्हें जैश के टॉप लीडर की महिलाएं चलाएंगी।

‘तुफत अल-मूमिनात’ नामक यह ऑनलाइन कोर्स धर्म और जिहाद के दृष्टिकोण से महिलाओं के कर्तव्यों की शिक्षा देने के नाम पर तैयार किया गया है। लेकिन खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इस कार्यक्रम का वास्तविक मकसद कट्टरपंथी विचारधारा फैलाना और महिला आतंकियों की भर्ती करना है।

पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क में यह पहली बार है जब किसी संगठन ने महिलाओं को जोड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया है। इस कोर्स के जरिए जैश ऐसी महिलाओं तक पहुंच बना रहा है जो धार्मिक शिक्षा के बहाने इसके नेटवर्क का हिस्सा बन सकती हैं।

Jaish Online Jihadi Course: अजहर के परिवार की महिलाएं संभालेंगी कमान

इस कोर्स की कमान खुद मसूद अजहर के परिवार की महिलाओं को सौंपी गई है। मसूद अजहर की बहनों सादिया अजहर और समीरा अजहर को ट्रेनिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनके अलावा पुलवामा हमले (2019) के मास्टरमाइंड उमर फारूक की पत्नी अफरीरा फारूक को भी अहम भूमिका दी गई है।

सादिया अजहर का पति यूसुफ अजहर ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना की कार्रवाई में मारा गया था। जैश ने इस घटना के बाद महिलाओं को “जिहाद में योगदान” के लिए प्रेरित करने का नया अभियान शुरू किया है।

Jaish Online Jihadi Course

धन जुटाने का नया तरीका

जैश-ए-मोहम्मद का यह ऑनलाइन कोर्स न केवल भर्ती का माध्यम है, बल्कि यह संगठन के लिए चंटा जुटाने का नया रास्ता भी बन गया है। प्रत्येक महिला से ली जा रही 500 रुपये की राशि को “दान” कहा जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह रकम आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल की जाएगी।

27 सितंबर को बहावलपुर के मार्कज उस्मान-ओ-अली में अपने भाषण में मसूद अजहर ने धन जुटाने की अपील की थी। अब वही अभियान इस ऑनलाइन कोर्स के रूप में आगे बढ़ाया गया है।

महिला विंग ‘जमात उल-मूमिनात’

8 अक्टूबर को जैश-ए-मोहम्मद ने अपनी महिला विंग ‘जमात उल-मूमिनात’ का एलान किया था। इसके बाद 19 अक्टूबर को पीओके के रावलकोट में दुख्तरान-ए-इस्लाम नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें महिलाओं को संगठन से जुड़ने का आह्वान किया गया।

यह नया ऑनलाइन कोर्स उसी रणनीति का विस्तार है, जिसके तहत महिलाओं को जिहादी मानसिकता की ट्रेनिंग दे कर प्रचार, फंडिंग और फिदायीन मिशनों में इस्तेमाल करने की योजना है।

आईएसआई का है सपोर्ट

खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के मुताबिक जैश का यह कदम पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के इशारे पर चलाया जा रहा है। चूंकि पाकिस्तान में महिलाओं का अकेले सार्वजनिक स्थानों पर जाना सामाजिक रूप से अनुचित माना जाता है, इसलिए जैश ने अब ऑनलाइन भर्ती मॉडल अपनाया है।

यह रणनीति आईएसआईएस, हमास और लिट्टे जैसे संगठन भी अपना चुके हैं, जहां महिलाएं प्रचारक, फंडरेजर और आत्मघाती हमलावरों की भूमिका निभाती हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह कोर्स केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। इसके प्रचार में ऐसे सोशल मीडिया चैनलों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो भारत के जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों में सक्रिय हैं।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक, जैश अब डिजिटल कट्टरपंथ के जरिए महिलाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। एजेंसियों ने इस कोर्स से जुड़ी वेबसाइट्स और मैसेजिंग चैनलों की निगरानी शुरू कर दी है।

वहीं, इस कदम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पाकिस्तान किस तरह से एफएटीएफ के नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है। पाकिस्तान दावा करता है कि वह आतंकी फंडिंग पर कंट्रोल रखता है, लेकिन जैश जैसे प्रतिबंधित संगठन खुले तौर पर ऑनलाइन दान जुटा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र पहले ही जैश को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुका है। भारत ने 2001 संसद हमले, 2016 पठानकोट एयरबेस हमले और 2019 पुलवामा हमले में इसकी भूमिका को सबूतों साथ दुनिया के सामने उजागर किया था।

Explainer: क्या हैं भारतीय नौसेना के R11 और R33? जानें इंडियन नेवी का डुअल कैरियर बैटल ग्रुप, जिससे कांपते हैं चीन और पाकिस्तान!

Explainer Indian Navy Aircraft Carriers R11 and R33: INS Vikrant and INS Vikramaditya Power India’s Maritime Strength

Explainer Indian Navy Aircraft Carriers: भारतीय नौसेना के दो विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य भारत की समुद्री शक्ति की पहचान हैं। 20 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली का त्यौहार भारतीय नौसेना के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर जवानों के साथ मनाया। उस समय विक्रांत गोवा-करवार तट पर तैनात था। यह दौरा सैनिकों के साथ दीवाली मनाने की उनकी 12 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा था। उनके इस दौरे के बाद आईएनएस विक्रांत की चर्चा चारों तरफ होने लगी। वहीं आईएनएस विक्रांत को R11 भी कहा जाता है।

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Explainer Indian Navy Aircraft Carriers: आईएनएस विक्रांत- स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर

आईएनएस विक्रांत भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर यानी विमानवाहक पोत है, जो पूर्वी तट (बे ऑफ बंगाल) पर तैनात है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने डिजाइन और मैन्युफैक्चर किया है और इसे 2 सितंबर 2022 को कमीशन किया गया था। लगभग 45,000 टन वजन वाले इस युद्धपोत की लंबाई 262 मीटर है। इसमें चार जीई एलएम2500+ गैस टर्बाइन इंजन लगे हैं, जो इसे 28 नॉट्स (52 किमी/घंटा) की रफ्तार देते हैं।

यह वॉरशिप स्टोबर यानी शॉर्ट टेक-ओफ बट अरेस्टेड रिकवरी सिस्टम पर आधारित है और इस पर 26 से 30 विमान तैनात किए जा सकते हैं। इनमें मिग-29के लड़ाकू विमान, एचएएल ध्रुव, एडवांस मल्टी-रोल मैरीटाइम हेलीकॉप्टर रोमियो यानी एमएच-60आर सीहॉक शामिल हैं। साथ ही नौसेना में भविष्य में शामिल होने वाले राफेल-एम भी इसी एयरक्राफ्ट पर तैनात किए जाएंगे। इसके हथियारों की बात करें तो इनमें बराक-8 मिसाइल सिस्टम, एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल हैं।

Explainer Indian Navy Aircraft Carriers

आईएनएस विक्रांत में लगभग 76 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, जिसमें बीईएल, बीएचईएल, एल एंड टी, और जीआरएसई जैसी भारतीय कंपनियों का बड़ा योगदान रहा। यह जहाज भारत की मैरिटाइम सिक्योरिटी, आत्मनिर्भरता और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक है।

क्या है पेनेंट नंबर

वहीं, आईएनएस विक्रांत को भी एक पेनेंट नंबर मिला है। पेनेंट नंबर की बात करें, तो यह एक खास तरह का कोड होता है, जो नौसेना के जहाजों (विशेष रूप से युद्धपोतों, विमानवाहकों, पनडुब्बियों आदि) को पहचानने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे हल नंबर या फ्लैग नंबर भी कहते हैं। यह नौसेना में जहाजों को अलग-अलग करने और उनकी क्लास (जैसे विमानवाहक, डिस्ट्रॉयर) को दर्शाने का तरीका है। पेनेंट नंबर में आमतौर पर एक अक्षर और संख्या होती है।

जैसे आर का मतलब विमानवाहक या एयरक्राफ्ट कैरियर होता है। वहीं, डी का मतलब डिस्ट्रॉयर और एफ का मतलब फ्रिगेट होता है।

आईएनएस विक्रांत का पेनेंट नंबर है R11

यहां “आर” का मतलब कॉमनवेल्थ नौसेनाओं में एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए इस्तेमाल होता है। जबकि “11” इसकी पहचान संख्या है। यह नंबर पुराने आईएनएस विक्रांत (1961-1997) से प्रेरित है, जिसने 1971 के भारत-पाक युद्ध में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। जिसकी वजह से इसे R11 भी कहा जाता है।

रूस से खरीदा था आईएनएस विक्रमादित्य

आईएनएस विक्रमादित्य को भारतीय नौसेना का दूसरा एक्टिव एयरक्राफ्ट कैरियर है। यह रूस के कीव-क्लास युद्धपोत एडमिरल गोर्शकोव का अपग्रेडेड वर्जन है, जिसे भारत ने 2013 में कमीशन किया था। इसका वजन भी लगभग 45,400 टन है और यह भी स्टोबार सिस्टम पर काम करता है।

इस वॉरशिप पर भी मिग-29के लड़ाकू विमान और रूसी कोअक्सियल-रोटर हेलीकॉप्टर कामोव केए-31 एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल हेलीकॉप्टर तैनात हैं। इस शिप पर बराक-8 मिसाइल सिस्टम, एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम, और आधुनिक नेविगेशन एवं रडार सिस्टम लगाए गए हैं। इसकी अधिकतम गति 30 नॉट्स (55 किमी/घंटा) है।

आईएनएस विक्रमादित्य का पेनेंट नंबर है R33

वहीं आईएनएस विक्रमादित्य का पेनेंट नंबर R33 है। यह पश्चिमी नौसैनिक कमान (अरब सागर) का हिस्सा है और अरब सागर में भारत की सामरिक मौजूदी को मजबूत बनाता है। अप्रैल 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान यह पाकिस्तान की नौसेना पर रणनीतिक दबाव बनाए रखने के लिए अरब सागर में सक्रिय तैनाती पर था।

डुअल कैरियर बैटल ग्रुप का हिस्सा

आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य भारतीय नौसेना के डुअल कैरियर बैटल ग्रुप का हिस्सा हैं। दुनिया के केवल कुछ चुनिंदा देशों जैसे अमेरिका, चीन और ब्रिटेन के पास यह क्षमता है। इन्ही दोनों कैरियर्स की वजह से हिंद महासागर क्षेत्र में चौबीस घंटें भारत की मौजूदगी रहती है। 2024 में इन दोनों ने मिलकर पहली बार क्रॉस-डेक फ्लाइट आपरेशंस किए, जिसमें मिग-29के विमानों ने एक से दूसरे कैरियर पर उड़ान भरी और लैंडिंग की। इन जहाजों की संयुक्त तैनाती से भारतीय नौसेना अब इंडो-पैसिफिक कमांड स्ट्रक्चर में एक निर्णायक भूमिका निभा रही है।

पीएम मोदी ने देखी मिग-29के फाइटर जेट्स की सॉर्टी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएस विक्रांत पर दौरे के दौरान नौसेना की ताकत को नजदीक से देखा। इस दौरान उन्होंने न केवल मिग-29के फाइटर जेट्स की सॉर्टी देखी, बल्कि, बराक-8 मिसाइल लॉन्च और पनडुब्बी ऑपरेशंस का प्रदर्शन देखा। उन्होंने नौसैनिकों और अधिकारियों से मुलाकात कर उनकी तैयारियों की सराहना की। इस दौरान वे नौसैनिकों के साथ पारंपरिक ‘बड़ा खाना’ में भी शरीक हुए।

उन्होंने नौसेना कर्मियों से बातचीत करते हुए कहा कि यह जहाज “21वीं सदी के भारत की शक्ति, मेहनत और आत्मविश्वास का प्रतीक” है। पीएम ने यह भी कहा, “आईएनएस विक्रांत पर कल रात बिताई गई रात शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। मैंने आप सभी में जो अपार ऊर्जा और उत्साह देखा, वह अद्भुत था। जब मैंने आपका देशभक्ति गीत सुना, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर का वर्णन था, तो कोई शब्द जवान के युद्धक्षेत्र के अनुभव को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। मेरा दीवाली आपके बीच बिताना विशेष रहा।”

पाकिस्तान को “नींद हराम” की थी आईएनएस विक्रांत ने

उन्होंने कहा कि आईएनएस विक्रांत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को “नींद हराम” कर दी थी। और कुछ दिनों में उसे घुटनों पर ला दिया। ब्रह्मोस मिसाइल अकेले ही कुछ देशों को घबराहट में डाल देती है। उन्होंने आगे कहा, जिसका नाम ही दुश्मन के साहस का अंत कर दे, वह है आईएनएस विक्रांत। यह न केवल एक वॉरशिप है, बल्कि भारत की सेना की क्षमता का प्रतीक है। यह 21वीं सदी के भारत की मेहनत, प्रतिभा, प्रभाव और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि 2022 में कमीशनिंग के दिन हमने औपनिवेशिक प्रतीक को अलविदा कहा था। हमारा लक्ष्य भारत को दुनिया के शीर्ष रक्षा निर्यातकों में शामिल करना है। 2014 से हर साल औसतन 40 नए युद्धपोत या पनडुब्बियां जुड़ी हैं।

स्ट्रीमपास्ट का हुआ आयोजन

वहीं, 20 अक्टूबर को पीएम नरेंद्र मोदी के आईएनएस विक्रांत के दौरे के दौरान स्ट्रीमपास्ट का आयोजन भी हुआ। जिसमें लगभग 10 जहाजों ने हिस्सा लिया। स्ट्रीमपास्ट एक नौसैनिक परंपरा है, जिसमें नौसेना के जहाज एक विशेष क्रम में, आमतौर पर एक सीधी रेखा में, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के सामने से गुजरते हैं। इसे नौसेना की ताकत, अनुशासन और समन्वय का प्रदर्शन करने के लिए आयोजित किया जाता है। यह एक तरह का औपचारिक ‘सैल्यूट’ या सम्मान है, जो समुद्री परेड की तरह होता है।

पीएम मोदी के सामने हुए स्ट्रीमपास्ट में इसमें आईएनएस विक्रमादित्य, डिस्ट्रॉयर्स आईएनएस कोलकाता, आईएनएस शिवालिक और पनडुब्बियां शामिल थीं। साथ ही मिग-29के और एमएच-60आर सीहॉक ने भी फ्लाईपास्ट किया।

Rafale 114 Fighter Deal: सरकार बोली- नए राफेल में हो 75 फीसदी तक स्वदेशी कंटेंट! जबकि तेजस में है केवल 65 फीसदी, क्या डील पर लगेगा ब्रेक?

Rafale 114 Fighter Deal
Rafale 114 Fighter Deal May Face Delay Over 75% Indigenous Content Demand; Tejas LCA Currently at 65%

Rafale 114 Fighter Deal: भारत और फ्रांस के बीच प्रस्तावित 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्ताव पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के इस प्रस्ताव पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के प्रस्ताव को “अधूरा” बताया है। सूत्रों ने बताया कि इस अहम डील को आगे बढ़ाने से पहले और गहन चर्चा की जरूरत है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वायुसेना अपनी स्क्वाड्रन क्षमता को बनाए रखने के लिए नए फाइटर जेट्स की मांग कर रही है।

Made in India Rafale Jets: वायुसेना को चाहिए 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल जेट्स, रक्षा मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव, 2 लाख करोड़ रुपये की है डील

सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने दसा एविएशन के साथ बातचीत बढ़ाने के निर्देश दिए हैं ताकि डील को आत्मनिर्भर भारत की नीति के मुताबिक बनाया जा सके। मंत्रालय का मानना है कि इस सौदे में स्वदेशी उत्पादन का हिस्सा 70 से 75 फीसदी तक होना चाहिए, जबकि वर्तमान प्रस्ताव में यह केवल 10 से 15 फीसदी बताया गया है।

वहीं इस मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत में बन रहे स्वदेशी तेजस फाइटर जेट में लगभग 59.7 फीसदी से 65 फीसदी तक ही स्वदेशी कंटेंट है, तो राफेल में इसे 70 से 75 फीसदी तक बढ़ाना समझ से परे है।

Rafale 114 Fighter Deal: तेजस में केवल 65 फीसदी तक ही स्वदेशी कंटेंट

सैन्य मामलों के जानकार और पूर्व सैन्य अधिकारी रोहित वत्स का कहना है कि सरकार को रक्षा सौदों के साथ “म्यूजिकल चेयर” खेलना बंद कर देना चाहिए। अगर उसे लगता है कि राफेल बहुत महंगा सौदा है, तो साफ-साफ कह दे, लेकिन इस मामले पर बेवजह की खींचतान न करे। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

वह आगे कहते हैं कि रक्षा मंत्रालय में कुछ अधिकारी 75 फीसदी स्वदेशी कंटेंट की मांग कर रहे हैं, जबकि हमारे अपने तेजस विमान में भी अब तक हम 75 फीसदी स्वदेशी कंटेंट भी हासिल नहीं कर पाए हैं। न तो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और न ही डीआरडीओ समय पर कोई डिलीवरी कर पा रहे हैं, और न ही विदेशी आयात समय पर आ रहे हैं।

बता दें कि एचएएल और डीआरडीओ की 2023-24 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक तेजस एमके1 में करीब 59.7 फीसदी स्वदेशी सामग्री है। इसमें एयरफ्रेम, एवियोनिक्स, और कुछ सिस्टम्स जैसे उत्तम एईएसए रडार शामिल हैं। वहीं, इसके एडवांस वर्जन तेजस एमके1ए में स्वदेशी कंटेंट को 65 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इसमें उत्तम एईएसए रडार, स्वदेशी अस्त्र, रुद्रम मिसाइल्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल हैं।

Rafale 114 Fighter Deal: अधूरा है “स्टेटमेंट ऑफ केस”

सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायुसेना का 114 राफेल की खरीद को लेकर “स्टेटमेंट ऑफ केस” प्रस्ताव मंत्रालय को अधूरा लगा है। इसमें उत्पादन जिम्मेदारी, लागत मूल्य और लोकल कंटेंट की स्पष्ट रूपरेखा नहीं दी गई थी। सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय की प्राथमिकता अब केवल विमान खरीदने की नहीं, बल्कि भारत में रक्षा उद्योग की आत्मनिर्भरता बढ़ाने की है।

सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि 114 विमानों में से अधिकतर का निर्माण भारत में होना चाहिए। कुछ विमान फ्रांस से फ्लाई-अवे कंडीशन में आएंगे, लेकिन बाकी का निर्माण भारत में एक साझेदारी मॉडल के तहत किया जाएगा। इस मॉडल के लिए दसा को किसी भारतीय डिफेंस कंपनी के साथ संयुक्त रूप से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करनी होगी।

Rafale 114 Fighter Deal: एमआरओ फैसिलिटी लगाना चाहती है दसा

अधिकारियों के मुताबिक, यह सौदा लगभग 2 लाख करोड़ रुपये (करीब 25 अरब डॉलर) का हो सकता है। सरकार चाहती है कि इसका अधिकांश भाग भारत में तैयार हो, जिससे देश के रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिले। इससे सरकारी और निजी दोनों रक्षा कंपनियों को काम मिलेगा।

वहीं, दसा एविएशन भी भारत में बड़े निवेश के लिए तैयार है और उसने संकेत दिए हैं कि वह हैदराबाद में राफेल कंपोनेंट्स के प्रोडक्शन के लिए साझेदारी करने की इच्छुक है। इस सौदे के तहत दसा एविएशन ने हैदराबाद में एक मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सेंटर स्थापित करने की भी पेशकश की है। इस सेंटर न केवल राफेल के रखरखाव में मदद मिलेगा बल्कि आने वाले समय में अन्य फाइटर प्लेटफॉर्म्स की सर्विसिंग भी कर सकेगा।

डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड में भेजा जाएगा प्रस्ताव

वहीं, रक्षा मंत्रालय की आपत्तियों के बाद यह प्रस्ताव अब डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड को भेजा जाएगा। वहां दसा और भारतीय वायुसेना के प्रतिनिधि विस्तृत रिपोर्ट पेश करेंगे। यह बोर्ड डिफेंस सेक्रेटरी की अध्यक्षता में काम करता है और उसकी सिफारिशें आगे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) को भेजी जाएंगी।

माना जा रहा है कि चर्चाओं के बाद डील को फिर से संशोधित प्रारूप में मंजूरी मिल सकती है। शुरुआती अनुमान है कि 2026 तक इस डील को अंतिम रूप दिया जा सकता है, और पहले 18 विमान उसी साल भारत को मिल सकते हैं।

Rafale 114 Fighter Deal: 28-29 एक्टिव फाइटर स्क्वाड्रन

बता दें कि वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास लगभग 28-29 एक्टिव फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जो 1965 से भी कम है। जबकि जरूरत लगभग 42 स्क्वाड्रन की है। हाल ही में 26 सितंबर को मिग-21 बाइसन के दो स्क्वाड्रन भी रिटायर हुए हैं। पुराने जैगुआर, मिराज-2000 और मिग-29 फाइटर जेट्स भी अपनी उम्र की समाप्ति तक पहुंच चुके हैं और ये विमान धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिए मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी एमआरएफए प्रोग्राम शुरू किया गया था।

36 राफेल अंबाला और हाशीमारा में तैनात

हालांकि भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही 36 राफेल फाइटर जेट्स हैं, जो अंबाला और हाशीमारा में तैनात हैं। अंबाला पश्चिमी मोर्चे (पाकिस्तान सीमा) और हाशीमारा पूर्वी मोर्चे (चीन सीमा) के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। हरियाणा स्थित अंबाला में 17वीं स्क्वाड्रन है, जिसे “गोल्डन एरो” के नाम से जाना जाता है, यह स्क्वाड्रन 1 सितंबर 2020 को शुरू हुई थी। वहीं, पश्चिमी बंगाल के हाशीमारा में 101वीं स्क्वाड्रन है, जिसे “फाल्कन्स ऑफ चंब एंड अखनूर” कहा जाता है। यह स्क्वाड्रन 29 जुलाई 2021 को शुरू की गई थी।

भारत को मिलेंगे एफ4.1-एफ5 स्टैंडर्ड वैरिएंट

ये 36 राफेल जेट 2016 में हुई गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील का हिस्सा थे। अब जो 114 राफेल की खरीद होनी है है, वह एक अलग कॉन्ट्रैक्ट होगा। इसमें सभी विमानों को एफ4.1 स्टैंडर्ड में अपग्रेडेड एवियोनिक्स और इंडिया स्पेसिफिक एनहेंसमेंट यानी आईएसई फीचर्स के साथ लाया जाएगा। 2016 में हुई गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील में एफ3-आर वैरिएंट खरीदे गए थे। वहीं, एफ4.1 स्टैंडर्ड में नेट-सेंट्रिक वारफेयर, एआई-सपोर्टेड डिसीजन मेकिंग और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस के लिए ऑप्टिमाइज्ड किया जाएगा।

एफ4.1 के तहत शुरुआती 18 विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में 2026 से मिल सकते हैं, जबकि बाकी भारत में बनेंगे। वहीं, कहा जा रहा है कि आईएसई इंटीग्रेशन में अभी देरी हो सकती है, उसके भी 2026 तक फाइनल होने की उम्मीद जताई रही है। सूत्रों ने बताया कि एफ4.1 में कई फीचर एफ5 वर्जन वाले होंगे। इसमें छठी पीढ़ी के लेजर वेपंस भी होंगे। जिनमें से कुल 114 में 70 से ज्यादा फाइटर जेट एफ5 वर्जन हो सकते हैं।

एफ4.1 वैरिएंट में क्या होगा खास

राफेल एफ4.1 स्टैंडर्ड के तहत राफेल को आरबीई2 एईएसए रडार से लैस किया जाएगा, जिससे लंबी रेंज पर टार्गेट डिटेक्शन, बेहतर जैम-रेजिलिएंस और माइका एनजी जैसी नई मिसाइलों को लगाया जाएगा। साथ ही इसमें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सुइट स्पेक्ट्रा को और अधिक एआई-ड्रिवन सेंसर और काउंटरमेजर्स मिलेंगे ताकि स्टेल्थ-लाइक सुरक्षा और इमर्जिंग थ्रेट्स से सुरक्षा बेहतर हो। कॉकपिट और कम्युनिकेशन सिस्टम में एआई एल्गोरिद्म, सैटेलाइट लिंक और सॉफ्टवेयर-डिफाइन्ड रेडियो शामिल होंगे, जिससे रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग और फ्लाइट-टू-फ्लाइट कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

वहीं, इंडिया स्पेसिफिक एनहेंसमेंट्स में राफेल को अस्त्र एमके1 और एमके2 से लैस किया जाना है। साथ ही स्वदेशी वियोंड विजुअल रेंज वाली मिसाइलों, ब्रह्मोस एनजी और रूद्रम जैसी एंटी-रेडिएशन मिसाइलों को भी लगाया जा सकेगा। इसके अलावा थैलेस स्कॉर्पियन स्टाइल हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले का भारतीय वेरिएंट, और जीसैट-7ए सैटेलाइट को भी जोड़ा जाएगा।

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डीआरडीओ ने नाग एमके II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) का सफल परीक्षण स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक से किया है। राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में हुए इस ट्रायल ने यह साबित कर दिया कि भारत अब पहाड़ी इलाकों में भी अपने हल्के लेकिन घातक टैंकों से दुश्मन के भारी कवच वाले टैंकों को 10 किलोमीटर की दूरी से नष्ट कर सकता है। इस मिसाइल सिस्टम के आने से भारत अब ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (बीवीआर)’ टैंक वारफेयर में भी कैपेबल हो गया है। इसका मतलब है कि अब भारतीय टैंक दुश्मन को देखे बिना भी उसके टैंकों पर हमला कर सकते हैं।

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जोरावर पर यह ट्रायल 17 अक्टूबर को किया गया था और इसमें मिसाइल ने सभी निर्धारित मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह मिसाइल ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक पर आधारित है, यानी एक बार लॉन्च होने के बाद यह खुद लक्ष्य की पहचान कर उसे भेद सकती है। यह मिसाइल अपने ‘टॉप-अटैक’ या टॉप-अटैक मैजिक मोड के जरिए दुश्मन के टैंक को ऊपर से निशाना बनाती है, जहां उनका कवच सबसे कमजोर होता है।

जोरावर टैंक को डीआरडीओ के कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने डिजाइन किया है और इसे लार्सन एंड टुब्रो ने तैयार किया है। यह भारत का पहला स्वदेशी लाइटवेट टैंक है, जिसे खास तौर पर लद्दाख, अरुणाचल और सिक्किम जैसे ऊंचे इलाकों के लिए बनाया गया है।

इस टैंक का वजन मात्र 25 टन है, जो पारंपरिक टैंकों जैसे टी-72 या टी-90 से लगभग आधा है। हल्का होने के बावजूद इसकी मारक क्षमता बेहद घातक है। इसमें 105 मिमी की कोकरिल गन लगी है, जो फायर एंड फॉरगेट शेल्स दाग सकती है। इसके अलावा इस पर 8 नाग एमके II मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं।

जोरावर की रफ्तार 70 किलोमीटर प्रति घंटा तक है और यह पानी में भी चल सकता है। इसके इंजन की शक्ति 1000 हॉर्सपावर है और यह ऊंचाई वाले इलाकों में भी ऑपरेशन कर सकता है। जोरावर में आधुनिक एआई-बेस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम, नाइट विजन और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी लगा है जो दुश्मन की मिसाइलों को बीच में ही नष्ट कर देता है।

नाग एमके II को क्यों कहा जा रहा दुश्मन के टैंकों का शिकारी

नाग एमके II मिसाइल डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा है। यह नाग मिसाइल सीरीज का अपग्रेडेड वर्जन है। पहले वर्जन की तुलना में नाग एमके II की रेंज और सटीकता दोनों ही ज्यादा हैं।

यह मिसाइल 4 से 10 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट के निशाना बना सकती है। इसकी रफ्तार 250 मीटर प्रति सेकंड (लगभग 900 किमी/घंटा) है। इसमें लगा इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर टारगेट की हीट को पहचान कर निशाना बनाता है, जिससे यह धुंध, रात और खराब मौसम में भी कारगर है।

“टॉप-अटैक मोड” फीचर है सबसे घातक

नाग एमके II की सबसे बड़ी खूबी है इसका “टॉप-अटैक मोड” फीचर, जो इसे और घातक बनाता है। मिसाइल पहले ऊंचाई पर जाती है और फिर गोता लगाते हुए टैंक की छत यानी टॉप पर वार करती है। आमतौर पर टैंकों का ऊपरी हिस्सा सबसे कमजोर होता है, जिससे टैंक का इंजन और क्रू दोनों निशाना बन जाते हैं।

भारतीय सेना के पास इस समय लगभग 3,500 से अधिक टैंक हैं, जिनमें से अधिकांश भारीभरकम हैं और पहाड़ी इलाकों में तैनात करने में मुश्किल होती है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद यह महसूस किया गया कि चीन के हल्के टैंकों के मुकाबले भारत को भी हल्के, मोबाइल और आधुनिक टैंक चाहिए। इसी के चलते “जोरावर प्रोजेक्ट” की शुरुआत हुई।

जोरावर टैंक में नाग एमके II मिसाइल के इंटीग्रेशन के बाद यह चीन के टाइप-15 और पाकिस्तान के वीटी-4 जैसे टैंकों के लिए काल बन गया है।

वहीं, जोरावर टैंक में नाग एमके II का इंटीग्रेशन भारत के ‘मेक-1’ कैटेगरी प्रोजेक्ट्स में आता है, यानी इसमें किसी विदेशी तकनीक या ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की जरूरत नहीं। इसके अलावा यह सिस्टम भविष्य में भारत के मित्र देशों को निर्यात भी किया जा सकता है। डीआरडीओ ने पहले ही इस मिसाइल की एक्सपोर्ट कैटेगरी क्लियरेंस के लिए रक्षा मंत्रालय से अनुमति मांगी है।

नहीं बच पाएंगे चीन और पाकिस्तान के टैंक

नाग एमके II मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह किसी भी आधुनिक टैंक के टॉप आर्मर (ऊपरी कवच) को आसानी से भेद सके। मिसाइल का वॉरहेड 8 किलोग्राम हाई-एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (हीट) है, जो 800 मिमी तक के आर्मर या कवच को भेदने में सक्षम है। जो चीन के टाइप-99 और पाकिस्तान के अल-खालिद टैंकों को एक ही वार में नष्ट करने के लिए काफी है। आधुनिक टैंकों में सबसे मोटा कवच आगे की तरफ (फ्रंट हल और टरेट) होता है, जो 600–800 मिमी तक होता है, जबकि ऊपर की छत पर यह सबसे कमजोर रहती है आमतौर पर सिर्फ 100–200 मिमी तक होती है।

चीन और पाकिस्तान के टैंकों की स्थिति इस लिहाज से कमजोर है। चीन का टाइप-99 टैंक में 700–750 मिमी का फ्रंट कवच है, लेकिन इसका टॉप आर्मर केवल 120–150 मिमी का है। वहीं, पाकिस्तान के अल-खालिद-1 और वीटी-4 (हैदर) टैंकों का फ्रंट कवच 650–700 मिमी और टॉप सिर्फ 100–130 मिमी मोटा है। पुराने टैंक जैसे अल-जरार या टाइप-85IIएपी में यह केवल 50–80 मिमी ही है।

जैवलिन और स्पाइक से भी पावरफुल है नाग एमके II

भारत की स्वदेशी नाग एमके II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल अब अमेरिका की जैवलिन, इजराइल की स्पाइक, रूस की कॉर्नेट और चीन की एचजे-12/एचजे-10 जैसी आधुनिक मिसाइलों की कैटेगरी में आ गई है। यह मिसाइल इंफ्रारेड इमेजिंग गाइडेंस से लैस है और इसका वॉरहेड 800 मिलीमीटर तक के आर्मर को भेद सकता है। जबकि अमेरिकी जेवलिन और इजराइल की स्पाइक की रेंज क्रमशः 4 से 8 किलोमीटर तक है। नाग एमके II की रेंज सबसे ज्यादा है और यह मौसम या जामिंग की स्थिति में भी सटीक वार करती है।

अमेरिका की एफजीएम-148 जैवेलिन एक हल्की, पोर्टेबल मिसाइल है जिसका यूक्रेन युद्ध में सक्सेस रेट 95 फीसदी तक है। लेकिन इसकी रेंज मात्र 4 किमी है। वहीं, इजराइल की स्पाइक ईआर मिसाइल मल्टी-प्लेटफॉर्म है और 8 किमी तक काम करती है, लेकिन नाग एमके II इसे भी रेंज और पावर में पीछे छोड़ती है। चीन की एचजे-12 को “जेवलिन कॉपी” कहा जाता है, जिसकी रेंज 4 किमी है और यह इंफ्रारेड गाइडेड है, पर इसकी सटीकता नाग एमके II के मुकाबले कम है। चीन की दूसरी मिसाइल एचजे-10 की रेंज भले ही 10 किमी है, पर यह पुरानी सैकलॉस (वायर-गाइडेड) सिस्टम पर काम करती है, यानी यह फायर-एंड-फॉरगेट नहीं है।

रूस की कॉर्नेट मिसाइल की पेनेट्रेशन क्षमता भले 1,200 मिमी हो, लेकिन यह लेजर बीम-राइडिंग गाइडेंस पर आधारित है, जिससे ऑपरेटर खतरे में रहता है। इसके मुकाबले नाग एमके II लॉन्च के बाद खुद टारगेट को ट्रैक करती है, जिससे टैंक क्रू सुरक्षित रहता है।

नाग एमके II कीमत में भी है किफायती

वहीं, पाकिस्तान की बात करें तो उसके पास अब भी पुरानी बक्तर-शिकन मिसाइल है, जो चीन की एचजे-8 की कॉपी है। इसकी रेंज केवल 4 किलोमीटर है और यह वायर-गाइडेड है। उसका फायर-एंड-फॉरगेट वर्जन अभी सीमित मात्रा में है और भारतीय नाग नाग एमके II से कई साल पीछे है।

नाग एमके II मिसाइल कीमत के मामले में भी काफी किफायती है। इसकी प्रति यूनिट लागत लगभग 8 करोड़ रुपये (करीब 1 मिलियन डॉलर) आंकी गई है। इसके मुकाबले, अमेरिकी जैवलिन मिसाइल की कीमत करीब 15 करोड़ प्रति यूनिट है। इजराइल की स्पाइक मिसाइल की कीमत 10–12 करोड़ रुपये तक जाती है, जबकि रूस की कॉर्नेट मिसाइल लगभग 12 करोड़ रुपये में आती है। वहीं, चीन की एचजे-12 मिसाइल सस्ती है, जिसकी अनुमानित लागत 5–7 करोड़ प्रति यूनिट है, लेकिन उसकी रेंज केवल 4 किलोमीटर है और वह जैम-प्रूफ नहीं है।

HAL Tejas MK-1A: तेजस की पहली उड़ान पर बोले रक्षा मंत्री- “अब हम खुद बना रहे हैं वो फाइटर जिन्हें कभी विदेश से खरीदते थे”

HAL Tejas MK-1A: Rajnath Singh
Defence Minister Rajnath Singh

HAL Tejas MK-1A: शुक्रवार का दिन भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए बेहद खास रहा। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक प्लांट से भारत में निर्मित एलसीए तेजस एमके-1ए ने अपनी पहली सार्वजनिक उड़ान भरी। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह स्वयं मौजूद रहे। उन्होंने तेजस की उड़ान को “भारत की आत्मा और आत्मविश्वास की उड़ान” बताया। उन्होंने कहा, “आज नासिक की यह धरती केवल विमान की उड़ान नहीं देख रही, बल्कि भारत की नई सोच, नई तकनीक और नए आत्मगौरव की उड़ान देख रही है।”

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HAL Tejas MK-1A: तीसरी तेजस उत्पादन लाइन का उद्घाटन

कार्यक्रम की शुरुआत में रक्षा मंत्री ने तीसरी तेजस उत्पादन लाइन और दूसरी एचटीटी-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट उत्पादन लाइन का उद्घाटन किया। रक्षा मंत्री ने कहा कि छह दशक पहले यही नासिक प्लांट विदेशी लड़ाकू विमानों जैसे मिग-21, मिग-27 और सुखोई-30 के निर्माण के लिए जाना जाता था। लेकिन आज यही भूमि पूरी तरह भारतीय डिजाइन और तकनीक से निर्मित विमानों का केंद्र बन चुकी है। उन्होंने कहा, “यह परिवर्तन केवल औद्योगिक बदलाव नहीं, बल्कि भारत की मानसिकता में आए आत्मनिर्भरता के परिवर्तन का प्रतीक है।”

HAL Tejas MK-1A:

HAL Tejas MK-1A: 65 प्रतिशत रक्षा उपकरण खुद बना रहा भारत

राजनाथ सिंह ने कहा कि 2014 में जब केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत की यात्रा शुरू की थी, तब भारत 70 फीसदी रक्षा उपकरण विदेशों से आयात करता था। “लेकिन आज भारत अपने 65 प्रतिशत रक्षा उपकरण खुद बना रहा है, और हमारा लक्ष्य है कि आने वाले समय में यह 100 प्रतिशत हो।” उन्होंने कहा कि भारत का रक्षा उत्पादन 2014-15 में 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ से बढ़कर 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

रक्षा मंत्री ने बताया कि 2029 तक भारत का लक्ष्य 3 लाख करोड़ रुपये रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये रक्षा निर्यात तक पहुंचने का है। उन्होंने कहा कि यह केवल सरकारी संस्थानों की नहीं, बल्कि भारतीय युवाओं, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की मेहनत का परिणाम है। उन्होंने कहा, “तेजस और एचटीटी-40 इन सबका संयुक्त सपना हैं, जिन्हें भारत की तकनीकी ताकत ने साकार किया है।”

HAL Tejas MK-1A: 10 तेजस बनाए जा सकेंगे नासिक में

एचएएल की नासिक डिवीजन को लगभग 500 करोड़ रुपये के निवेश से अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह आधुनिक बनाया गया है। अब यहां सालाना आठ तेजस एमके-1ए विमान बनाए जा सकते हैं, जिसे आगे बढ़ाकर दस विमान प्रति वर्ष तक किया जा सकेगा। एएचएल ने अब तक दस तेजस एमके-1ए विमान बनाए हैं, जिनमें जीई एफ404 इंजन लगाए गए हैं। दूसरा विमान दिसंबर 2025 तक और तीसरा जनवरी 2026 तक तैयार हो जाएगा। बेंगलुरु और अन्य यूनिट्स को मिलाकर एचएएल की कुल वार्षिक उत्पादन क्षमता 24 विमान तक होगी।

तेजस एमके-1ए के साथ ही नासिक प्लांट में एचटीटी-40 (HTT-40) ट्रेनर विमान की नई उत्पादन लाइन भी शुरू की गई। यह विमान भारतीय वायुसेना के प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा बनेगा और पुराने पिलाटस पीसी-7 एमके II विमानों की जगह लेगा।

ऑपरेशन सिंदूर में एचएएल की भूमिका को सराहा

राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस मिशन ने यह साबित किया कि भारतीय सशस्त्र बलों को अब विदेशी हथियारों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एएचएल की टीम ने 24 घंटे फाइटर जेट्स जैसे सुखोई, जैगुआर, मिराज और तेजस को ऑपरेशनल बनाए रखा। यह उस भरोसे का प्रमाण है जो हमारे सैनिकों को भारतीय तकनीक पर है।”

HAL Tejas MK-1A:

नासिक में अब सिविल और मिलिट्री एविएशन के लिए MRO

उन्होंने कहा कि नासिक में अब सिविल और मिलिट्री एविएशन के लिए संयुक्त मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधाएं भी स्थापित की गई हैं, जिससे हजारों लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। उन्होंने कहा, “यह केवल विमानों का उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और आसपास के राज्यों के लिए रोजगार और औद्योगिक विकास का नया केंद्र बन जाएगा।”

रक्षा मंत्री ने कहा कि एचएएल अब इंडस्ट्री 4.0 और क्वालिटी 4.0 तकनीकों को अपनाकर पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। उन्होंने कहा, “आज एचएएल केवल एक पब्लिक सेक्टर नहीं, बल्कि वैश्विक मानकों के साथ काम करने वाला आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है।”

तेजस एमके-1ए की पहली सार्वजनिक उड़ान भारतीय वायुसेना के अनुभवी टेस्ट पायलट ग्रुप कैप्टन ए. भट्टाचार्य (नाम प्रतीकात्मक) ने संचालित की। उड़ान के बाद उन्होंने कहा, “जब मैंने रनवे पर स्पीड बढ़ाई और तेजस को आसमान में उठते देखा, तो मुझे ऐसा लगा जैसे पूरा भारत मेरे साथ उड़ान भर रहा है। यह सिर्फ एक मशीन नहीं, यह एक भावना है — देश की क्षमता और आत्मविश्वास की प्रतीक।”

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उड़ान के बाद सुखोई-20, तेजस एमके1ए और एचटीटी-40 उड़ाने वाले सभी पायलटों ग्रुप कैप्टन केके वेणुगोपाल, ग्रुप कैप्टन प्रत्यूष अवस्थी और विंग कमांडर एमके रथ औऱ विंग कमांडर संजय वर्मा को मंच से बधाई दी और कहा, “आज आपने न केवल भारत के स्वदेशी विमान को उड़ाया है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों को भी आसमान तक पहुंचाया है। आपके हाथों में आज भारत का गर्व उड़ान भर रहा था।”

कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहे हैं योद्धा

रक्षा मंत्री ने कहा, फाइटर एयरक्राफ्ट्स, मिसाइल, इंजन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम… भारत ने इन सभी क्षेत्रों में जबरदस्त प्रगति की है। जब हम उच्च रक्षा प्रौद्योगिकी की बात करते हैं, तो यह केवल मशीन या हथियार की बात नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच, हमारे सामर्थ्य और हमारे आत्मविश्वास की एक नई कहानी है।

उन्होंने कहा, आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वारफेयर, ड्रोन सिस्टम्स और नेक्स्ट जनरेशन एयरक्राफ्ट्स भी भविष्य की दिशा तय कर रहे हैं। अब योद्धा केवल जमीन या आसमान में नहीं, बल्कि कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहे हैं। इस नई दौड़ में भारत को हमेशा आगे रहना है।

रक्षा मंत्री ने आगे कहा कि एलसीए तेजस और एचटीटी-40 विमानों का निर्माण हमारे विभिन्न औद्योगिक साझेदारों के सहयोग का भी परिणाम है। यह सहयोग इस बात का प्रमाण है कि जब सरकार, उद्योग और शिक्षाविद मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी चुनौती अनुत्तरित नहीं रहती।

सुखोई-30 पर ब्रह्मोस मिसाइल का इंटीग्रेशन

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कुछ दिन पहले हमने मिग-21 की प्री-कमीशनिंग की। मिग-21 ने लंबे समय तक इस देश की सेवा की, और इसकी ऑपरेशनल ज़रूरतों को पूरा करने में एचएएल का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

उन्होने कहा, “मैं यह देखकर बहुत खुश हूं कि नासिक टीम ने सुखोई-30 पर ब्रह्मोस मिसाइल का इंटीग्रेशन करके महत्वपूर्ण काम किया है। और अब इस नई उत्पादन लाइन के उद्घाटन के साथ, ‘मेड इन इंडिया’ फाइटर और ट्रेनर के उत्पादन का एक नया युग भी शुरू हो रहा है।

HAL Tejas MK-1A: पायलट माइंडसेट: सफलता का सूत्र

रभा मंत्री ने इस दौरान छात्रों को भी प्रेरणा दी। उन्होंने कहा, “आप सभी एवियोनिक्स के विशेषज्ञ हैं, इसलिए मैं अधिक तकनीकी बातें नहीं करूंगा। मैं भी एक फिजिक्स का छात्र रहा हूं। जब भी एविएशन की बात आती है, तो मुझे इसमें केवल मशीनें ही नहीं, बल्कि जीवन के गहरे संदेश भी दिखाई देते हैं।”

उन्होंने कहा, “किसी भी विमान के लिए उसका नेविगेशन सिस्टम बहुत महत्वपूर्ण है। ठीक वैसे ही, हमें अपने जीवन में भी एक मोरल कम्पास रखना चाहिए।”

रक्षा मंत्री ने कहा, “मैं एक वरिष्ठ पायलट का कथन याद करता हूं कि ‘टेक-ऑफ आईएस आप्शनल, बट लैंडिंग इज मैंडेटरी.’ यानी किसी भी काम को शुरू करना बहुत आसान है, लेकिन उसे सफलता पूर्वक अंत तक पूरा करना एक जिम्मेदार काम है। हमें हर परियोजना को एक उड़ान की तरह प्रबंधित करना चाहिए: उत्साह के साथ शुरू करें, बीच में संतुलन बनाए रखें, और अंत में सुरक्षित रूप से पूरा करें।”

“हमारा हर प्रोजेक्ट, हर कार्य ऐसा ही होना चाहिए, जिसकी दिशा स्पष्ट हो, कम्युनिकेशन मजबूत हो, आदतें अनुशासित हों, मन हमेशा सतर्क रहे, और सकारात्मकता बनी रहे। इसी पायलट माइंडसेट से हम 2047 के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।”

कार्यक्रम के अंत में रक्षा मंत्री ने कहा कि तेजस केवल एक विमान नहीं, बल्कि भारत की सोच, आत्मविश्वास और क्षमताओं का प्रतीक है। उन्होंने कहा, “यह भारत की नई तकनीकी उड़ान है, एक ऐसी उड़ान जो ‘मेक इन इंडिया’ से ‘फ्लाई विद इंडिया’ की दिशा में आगे बढ़ रही है।”

उन्होंने सभी एएचएल इंजीनियरों, एडीए, डीजीएक्यूए और औद्योगिक साझेदारों को बधाई देते हुए कहा कि तेजस और एचटीटी-40 भारतीय वायुसेना को नई शक्ति, नई आधुनिकता और नया आत्मविश्वास देंगे।

Pakistan-IS-Khorasan: तालिबान का खुलासा, आईएसआई और पाक सेना चला रही है आईएसआईएस-खोरासान नेटवर्क, ईरान-रूस बम धमाकों में भी हाथ

Pakistan IS Khorasan: Taliban exposes ISI and Pak Army’s control over ISIS-K network, links to Iran and Russia bombings revealed
Taliban Spokesperson Zabihullah Mujahid

Pakistan-IS-Khorasan: तालिबान ने पहली बार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की भूमिका को लेकर बड़ा खुलासा किया है। तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने दावा किया है कि पाकिस्तान की जमीन से आईएसआईएस-खोरासान (आईएस-के) को ऑपरेट किया जा रहा है और ईरान तथा रूस में हुए बड़े आतंकी हमले इन्हीं पाकिस्तानी नेटवर्क से योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे।

Lashkar-e-Taiba in KPK: ऑपरेशन सिंदूर के बाद लश्कर ने बदला आतंकी ठिकाना, ISI की मदद से खैबर पख्तूनख्वा से ऑपरेट करेगा जान-ए-फिदाई

मुजाहिद के इस बयान को क्षेत्रीय राजनीति में हलचल पैदा करने वाला माना जा रहा है। भारत की खुफिया एजेंसियों ने भी उन रिपोर्टों की भी पुष्टि की है, जिनमें पहले ही चेतावनी दी गई थी कि पाकिस्तान की आईएसआई और सेना के कुछ अधिकारी आईएसआईएस-खोरासान मॉड्यूल्स को चला रहे हैं और इन्हें अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा से ऑपरेट किया जा रहा है।

Pakistan-IS-Khorasan: पाकिस्तान की धरती से रची गई थी साजिश

जबीहुल्ला मुजाहिद ने हाल ही में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ईरान के केरमान शहर में जनवरी 2024 में हुए आत्मघाती हमले और मार्च 2024 में रूस के मॉस्को क्रोकस सिटी हॉल में हुए बम धमाकों की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी।

उन्होंने कहा, “ये दोनों हमले पाकिस्तान की जमीन पर बैठे आईएसआईएस-खोरासान के नेटवर्क ने आईएसआई की मदद से किए थे। आईएसआईएस-खोरासान का नेतृत्व पाकिस्तान में मौजूद है, और इन्हें वहां की सैन्य खुफिया एजेंसी से मदद मिल रही है।”

तालिबान के अनुसार, इन हमलों की प्लानिंग और ऑपरेशन पाकिस्तान के केंद्रों से हुआ था। मुजाहिद ने कहा कि “पाकिस्तान की सेना और आईएसआई के कुछ लोग इलाके में शांति नहीं चाहते और वे अफगानिस्तान को अस्थिर बनाए रखना चाहते हैं।”

ईरान और रूस में हुए हमले के पीछे आईएसआईएस-खोरासान

ईरान के केरमान में हुआ धमाका जनरल कासिम सुलेमानी की बरसी के मौके पर किया गया था। इस हमले में करीब 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। ईरानी जांच में पाया गया कि मुख्य आरोपी अब्दुल्ला ताजिकी पाकिस्तान से ईरान में दाखिल हुआ था।

रूस के मॉस्को क्रोकस सिटी हॉल में मार्च 2024 में हुआ हमला भी आईएसआईएस-खोरासान ने किया था, जिसे बाद में उसने स्वीकारा भी था, जिसमें 145 लोगों की मौत हुई थी। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे “आईएसआईएस-खोरासान का रूस में पहला सफल हमला” बताया था।

हालांकि, मॉस्को ने उस समय “किसी दुश्मन देश की गुप्त एजेंसियों” पर संदेह जताया था, जिसका इशारा यूक्रेन की ओर था। अब तालिबान के बयान से यह साफ हुआ कि यह हमला पाकिस्तान से चल रहे नेटवर्क के जरिए हुआ था।

Pakistan-IS-Khorasan: भारतीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट सही साबित

भारत की खुफिया एजेंसियां पहले से ही इस संभावना पर काम कर रही थीं कि आईएसआईएस-खोरासान का नेटवर्क पाकिस्तान में आईएसआई के निर्देशों के तहत काम कर रहा है।

दिल्ली, रांची, हैदराबाद और अन्य शहरों में जिन आईएस-प्रेरित मॉड्यूल्स का भंडाफोड़ हुआ था, उनकी जांच में पाया गया था कि ऑनलाइन हैंडलर पाकिस्तान में बैठे आईएसआई ऑपरेटिव्स थे। तकनीकी जांच में इनके आईपी एड्रेस पाकिस्तान के रावलपिंडी, पेशावर और कराची से जुड़े पाए गए थे।

भारतीय एजेंसियों के एक अधिकारी के अनुसार, “तालिबान का बयान हमारे उस विश्लेषण को सही साबित करता है कि पाकिस्तान न केवल आतंकवाद का पनाहगाह है बल्कि वह आईएसआईएस-खोरासान जैसे संगठनों का ऑपरेशनल सेंटर भी बन चुका है।”

Pakistan-IS-Khorasan: तालिबान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव

तालिबान प्रवक्ता ने पाकिस्तान पर यह भी आरोप लगाया कि वह अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलाने और आतंकी समूहों को समर्थन देने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि आईएसआईएस-खोरासान के कई ठिकाने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के इलाकों में सक्रिय हैं।

तालिबान के अनुसार, पाकिस्तान ने आतंकियों को सुरक्षित पनाह दी हुई है, जो अफगानिस्तान की सीमा पर हमले करने की योजना बनाते हैं। मुजाहिद ने कहा कि “पाकिस्तान के कुछ सैन्य अधिकारी आईएसआईएस-खोरासान की गतिविधियों को अनदेखा कर रहे हैं। वे क्षेत्र में अराजकता बनाए रखना चाहते हैं ताकि अफगानिस्तान पर राजनीतिक दबाव डाला जा सके।”

तालिबान के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। ईरान और रूस दोनों पहले से आईएसआईएस-खोरासान के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे, लेकिन अब जब तालिबान ने सीधे पाकिस्तान की ओर इशारा किया है, तो इससे दक्षिण एशिया में राजनयिक समीकरण बदलने के संकेत मिल रहे हैं।

मुजाहिद ने कहा, “ईरान और रूस इस साजिश से वाकिफ हैं।” उनका कहना था कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत से आईएसआईएस-खोरासान ने पाकिस्तान से पश्चिमी देशों तक धन और संसाधनों का नेटवर्क तैयार किया था।

आईएसआईएस-खोरासान (इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत) की स्थापना 2015 में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में हुई थी। यह संगठन आईएसआईएस का क्षेत्रीय रूप है, जो मध्य एशिया और दक्षिण एशिया में अपना नेटवर्क फैलाने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान और आईएसआईएस-खोरासान के बीच लंबे समय से टकराव रहा है। तालिबान अफगानिस्तान में खुद को “इस्लामी अमीरात” के वैध शासक के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि आईएसआईएस-खोरासान उसे “पश्चिमी समझौते” का हिस्सा बताकर विरोध करता रहा है।

अब जब तालिबान खुद आईएसआई पर आईएसआईएस-खोरासान को सहयोग देने का आरोप लगा रहा है, तो यह अफगान-पाक संबंधों में पैदा होती नई खाई को दर्शाता है।

Pakistan-IS-Khorasan: भारत के लिए क्या हैं मायने

भारत ने हमेशा से कहा है कि पाकिस्तान अपने भूभाग का इस्तेमाल आतंक फैलाने के लिए करता है। तालिबान का यह बयान भारत की सुरक्षा एजेंसियों की विश्वसनीयता को और मजबूत करता है।

भारत के लिए यह एक संकेत है कि Pakistan-IS-Khorasan आईएसआईएस-खोरासान का नेटवर्क केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं बल्कि पाकिस्तान की सैन्य संरचना से जुड़ा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही आईएसआईएस और उससे जु़ड़े संगठनों के खिलाफ व्यापक निगरानी अभियान चला रही हैं।

Explainer: भारतीय सेनाओं को क्यों चाहिए ब्रिटेन की Martlet LLM मिसाइलें? भारत के एयर डिफेंस सिस्टम को कैसे मिलेगा बूस्ट?

Martlet LLM-missile

Martlet LLM: हाल ही में भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच 468 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 3,900 करोड़ रुपये) की एक बड़ी डिफेंस डील हुई है, जिसके तहत भारतीय सेना को ब्रिटेन में बनी थेल्स कंपनी की मार्टलेट मल्टीरोल मिसाइलें मिलेंगी। यह समझौता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान मुंबई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक के बाद हुआ।

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ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक, यह कॉन्ट्रैक्ट बेलफास्ट स्थित थेल्स एयर डिफेंस द्वारा बनाई जा रही लाइटवेट मल्टीरोल मिसाइल (एलएलएम) (Martlet LLM) की सप्लाई के लिए है। ब्रिटेन के रक्षा मंत्री जॉन हीली ने इस समझौते को भारत और ब्रिटेन के रक्षा उद्योगों के बीच गहरे सहयोग का प्रतीक बताया है। उन्होंने बताया कि इससे न केवल भारत की रक्षा क्षमता में वृद्धि होगी बल्कि उत्तरी आयरलैंड में करीब 700 नौकरियां भी पैदा होंगी। ब्रिटिश सरकार के अनुसार, भारत को भेजी जाने वाली मिसाइलें वही हैं, जो वर्तमान में यूक्रेन के लिए बनाई जा रही हैं।

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Martlet LLM Missile positioned on Humvee

Martlet LLM: क्या है थेल्स मार्टलेट मिसाइल?

थेल्स एयर डिफेंस द्वारा विकसित मार्टलेट मिसाइल को लाइटवेट मल्टीरोल मिसाइल (एलएलएम) (Martlet LLM) के नाम से भी जाना जाता है। यह एक मल्टीरोल मिसाइल है जो हवा और जमीन दोनों प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है।

इस मिसाइल का वजन केवल 13 किलोग्राम है, लेकिन यह ध्वनि की गति से 1.5 गुना अधिक रफ्तार से उड़ान भर सकती है। इसकी मारक क्षमता 6 किलोमीटर तक है, यानी यह नजदीक के एयर डिफेंस अटैक (शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस) में बेहद प्रभावी साबित होती है।

यह मिसाइल पहले ब्रिटिश रॉयल नेवी के लिए बनाई गई थी, ताकि उनकी फ्यूचर एयर-टू-सरफेस गाइडेड वेपन (लाइट) की जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसका “मार्टलेट” नाम एक पौराणिक पक्षी के नाम पर रखा गया है, जो कभी रुकता नहीं।

Martlet LLM-missile
Ukraine Army using British LMM Martlet type laser-guided man-portable air-defense missiles (warhead mass 3kg) with an 8km range

Martlet LLM: कहां-कहां इस्तेमाल होती है मार्टलेट मिसाइल

मार्टलेट मिसाइल का इस्तेमाल ब्रिटेन की सेना और नौसेना दोनों कर रही हैं। इसे वाइल्डकैट हेलिकॉप्टर से दागा जा सकता है और यह समुद्री सतह पर छोटे वॉरशिप्स या ड्रोन जैसे टारगेट्स को निशाना बना सकती है।

2021 में रॉयल नेवी ने इसे बंगाल की खाड़ी में एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप ने एख एक्सरसाइज के दौरान सफलतापूर्वक टेस्ट किया था। इसके बाद यह यूक्रेन युद्ध में भी तैनात की गई, जहां इसने रूसी ड्रोन और मिसाइलों को निशाना बनाया।

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह मिसाइल (Martlet LLM) सिस्टम ऑपरेशन प्रॉस्परिटी गार्डियन जैसे अभियानों में भी काम आ चुका है, जिसमें कॉमर्शियल जहाजों को हूथी विद्रोहियों के हमलों से बचाया गया था।

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British AW159 Wildcat attack chopper with 20 Thales ‘Martlet’ Lightweight Multirole Missiles (LMM)

Martlet LLM: भारत के लिए क्या होगा फायदा

भारतीय सेना के लिए यह डील कई मायनों में अहम है। सबसे पहले, यह मिसाइल भारत की शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस (SHORAD) क्षमता को बढ़ाएगी, जिससे ड्रोन, हेलिकॉप्टर और अन्य हवाई खतरों का मुकाबला किया जा सकेगा।

दूसरे, यह मिसाइलें हल्की होने के कारण इन्हें हेलिकॉप्टर, व्हीकल्स और समुद्री प्लेटफॉर्म से भी लॉन्च किया जा सकता है। इससे भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना तीनों को इसका फायदा मिलेगा।

तीसरे, यह डील भारत के आत्मनिर्भर भारत मिशन को भी आगे बढ़ाएगी। दोनों देशों के बीच इस साझेदारी के तहत भविष्य में संयुक्त उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी काम किया जा सकता है।

बेलफास्ट में बनेंगी मिसाइलें

थेल्स एयर डिफेंस कंपनी की बात करें, तो यह एक ब्रिटिश डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी है, जो बेलफास्ट (उत्तरी आयरलैंड) में स्थित है। कंपनी की एडवांस विपेंस सिस्टम, रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स के निर्माण में महारत हाासिल है। थेल्स की मिसाइलें ब्रिटिश सेना, रॉयल नेवी और कई विदेशी सेनाओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही हैं, जिनमें यूक्रेन, मलेशिया और कतर शामिल हैं।

Martlet LLM-missile

थेल्स की एक और प्रसिद्ध मिसाइल स्टारस्ट्रीक है, जो तेज रफ्तार मैक-3 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम है। यह मिसाइल तीन तेज रफ्तार वाले “डार्ट्स” लॉन्च करती है जो लक्ष्य को सटीकता से भेदती हैं। स्टारस्ट्रीक और मार्टलेट (Martlet LLM) दोनों मिसाइलें तकनीकी रूप से आपस में जुड़ी हुई हैं, और थेल्स इन्हें एक ही जगह बनाती है। हाल ही में, ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने थेल्स को 176 मिलियन पॉउंड का एक और कॉन्ट्रैक्ट दिया है, जिसमें ब्रिटिश सेना के लिए नई मिसाइलें और लॉन्चर बनाए जा रहे हैं।

ब्रिटेन और भारत के बीच यह डील सिर्फ मिसाइल (Martlet LLM) सप्लाई तक सीमित नहीं है। दोनों देशों ने नेवल शिप्स के लिए इलेक्ट्रिक इंजन डेवलप करने पर भी सहमति जताई है। इस सहयोग के तहत, भारत और ब्रिटेन मिलकर नौसैनिक जहाजों के लिए नए एनर्जी एफिशिएंट इंजन बनाएंगे। यह प्रोजेक्ट लगभग 2,600 करोड़ रुपये की लागत का है।

FM Amir Khan Muttaqi Presser: अफगान विदेश मंत्री बोले- पाकिस्तान के कुछ तत्व चाहते हैं दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव, झंडे पर कही ये बात

FM Amir Khan Muttaqi Presser: Some elements in Pakistan want tension, our flag symbolizes Jihad, says Afghan Foreign Minister
FM Amir Khan Muttaqi Presser: Some elements in Pakistan want tension, our flag symbolizes Jihad, says Afghan Foreign Minister

FM Amir Khan Muttaqi Presser: भारत दौरे पर आए अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मावलवी आमिर खान मुत्ताकी ने रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ते तनाव, महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध, भारत के साथ संबंधों और मीडिया विवादों पर विस्तार से अपनी बात रखी। मुत्ताकी ने कहा कि पाकिस्तान की आम जनता शांति चाहती है और अफगानिस्तान भी अच्छे संबंधों का पक्षधर है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान अपनी सीमाओं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा, भले ही इसके लिए सैन्य कार्रवाई क्यों न करनी पड़े।

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FM Amir Khan Muttaqi Presser: पाकिस्तान से तनाव पर बोले मुत्ताकी 

मुत्ताकी ने पाकिस्तान के साथ हालिया सीमा झड़पों पर कहा कि अफगानिस्तान ने सिर्फ अपनी संप्रभुता की रक्षा की है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान की जनता अधिकांश रूप से शांति चाहती है और अफगानिस्तान से अच्छे संबंध बनाना चाहती है। हमें पाकिस्तानी नागरिकों से कोई समस्या नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के कुछ तत्व ऐसे हैं जो दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाने का काम कर रहे हैं।”

उन्होंने दावा किया कि अफगानिस्तान ने सीमा पर हुई बढ़ोतरी का तुरंत जवाब दिया और “अपना सैन्य लक्ष्य हासिल किया।” मुत्ताकी ने कहा कि यह कार्रवाई सीमित समय के लिए की गई थी, करीब चार घंटे तक चली और इसमें नागरिकों को कोई नुकसान नहीं हुआ।

मुत्ताकी ने बताया कि कतर और सऊदी अरब ने संघर्ष रोकने की अपील की, जिसके बाद अफगानिस्तान ने कार्रवाई रोक दी। उन्होंने कहा कि अब स्थिति नियंत्रण में है और उनका देश शांति चाहता है, लेकिन यदि पाकिस्तान ने अपने रवैये में सुधार नहीं किया, तो अफगानिस्तान के पास “अन्य विकल्प” भी मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि “हमने अपने देश की रक्षा के लिए जिहाद लड़ा और अब जब अफगानिस्तान स्वतंत्र है, तो कोई भी देश हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।”

“ड्यूरंड लाइन को कोई नहीं रोक पाया, पाकिस्तान अपने घर को संभाले”

मुत्ताकी ने पाकिस्तान के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अफगानिस्तान की धरती पर टीटीपी के आतंकी मौजूद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सेना के अभियानों के कारण कई लोग विस्थापित हुए, जिन्हें अफगानिस्तान ने शरणार्थी के रूप में जगह दी।

उन्होंने कहा, “ड्यूरंड लाइन लगभग 2,400 किलोमीटर लंबी है। इसे न तो ब्रिटिश, न सोवियत और न ही अमेरिकी सेनाएं पूरी तरह नियंत्रित कर सकीं। अगर पाकिस्तान चाहता है कि सीमा पर शांति बनी रहे, तो उसे अपनी सीमाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। यह संघर्ष पाकिस्तान के अंदरूनी हालात का नतीजा है।”

मुत्ताकी ने कहा कि यदि समस्या अफगानिस्तान की होती, तो चीन, ईरान और उज्बेकिस्तान जैसे अन्य पड़ोसी देश भी शिकायत करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की नीति साफ है, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन अपने देश की सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे।”

महिलाओं की शिक्षा पर बोले ‘हमने शिक्षा को हराम नहीं कहा’

अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं के बीच मुत्ताकी ने महिलाओं की शिक्षा पर लगाए गए प्रतिबंध पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में वर्तमान में 10 मिलियन (एक करोड़) छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें से 2.8 मिलियन (28 लाख) छात्राएं हैं।

मुत्ताकी बोले, “अफगानिस्तान के उलेमा और मदरसों से हमारे गहरे संबंध हैं, जिनमें दारुल उलूम देवबंद भी शामिल है। धार्मिक संस्थानों में शिक्षा ग्रेजुएशन स्तर तक दी जा रही है। कुछ स्थानों पर सीमाएं हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम शिक्षा के विरोधी हैं। हमने शिक्षा को धार्मिक रूप से ‘हराम’ नहीं घोषित किया है। केवल कुछ हिस्सों में इसे अस्थायी रूप से रोका गया है।”

उन्होंने कहा कि तालिबान सरकार महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, “इस्लामी शासन में सभी के अधिकार पुरुषों के भी और महिलाओं के भी सुरक्षित हैं।”

FM Amir Khan Muttaqi Presser: महिला पत्रकारों को नहीं बुलाने पर दी सफाई

दो दिन पहले हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाए जाने पर पूछे गए सवाल पर मुत्ताकी ने कहा कि यह जानबूझकर नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम को बहुत कम समय में आयोजित किया गया था और मीडिया सूची पहले से तय थी। उन्होंने कहा, “प्रेस कॉन्फ्रेंस में भागीदारी की सूची बहुत सीमित थी और इसे तकनीकी कारणों से कम किया गया था। इसमें किसी को जानबूझकर बाहर नहीं रखा गया। यह केवल प्रक्रिया की वजह से हुआ।”

FM Amir Khan Muttaqi Presser: ‘चाबहार, व्यापार और निवेश पर बात हुई’

मुत्ताकी ने बताया कि उनकी मुलाकात भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से हुई, जिसमें व्यापार, अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी पर चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि भारत ने काबुल में अपनी टेक्निकल मिशन को एम्बेसी में अपग्रेड करने का निर्णय लिया है और अफगान राजनयिक जल्द ही नई दिल्ली पहुंचेंगे।

उन्होंने कहा, “भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि भारत अफगानिस्तान में विकास कार्य फिर से शुरू करेगा और लंबित परियोजनाओं को पूरा करेगा। हमने भारत को खनिज, कृषि और खेल के क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित किया है।”

मुत्ताकी ने यह भी बताया कि बैठक में चाबहार पोर्ट (और वाघा बॉर्डर को लेकर भी चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि वाघा सीमा सबसे नजदीकी और तेज व्यापारिक मार्ग है, इसलिए भारत-अफगान व्यापार के लिए इसे खोला जाना चाहिए।

‘हमारा झंडा जिहाद का प्रतीक है, अब दूतावास पर हमारा नियंत्रण है’

प्रेस कॉन्फ्रेंस में दूतावास परिसर में लगाए गए इस्लामी अमीरात के झंडे पर सवाल पूछे जाने पर मुत्ताकी ने कहा कि यह वही झंडा है जिसके नीचे “जिहाद” लड़ा गया और जीत हासिल की गई। उन्होंने कहा, “हमने इस झंडे के नीचे लड़ाई लड़ी और जीते। इसलिए यह झंडा आज हमारे साथ है। यही हमारे संघर्ष और स्वतंत्रता का प्रतीक है।”

उन्होंने दावा किया कि नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास अब पूरी तरह तालिबान सरकार के नियंत्रण में है। उन्होंने कहा, “जो हमारे खिलाफ लड़े थे, वे भी अब हमारे साथ काम कर रहे हैं।” (हालांकि, वर्तमान में दूतावास में अफगान रिपब्लिक का झंडा बाहर लहरा रहा है, और स्टाफ अब भी पूर्व प्रशासन से जुड़ा है।)

‘हमने खून के लिए खून नहीं बहाया, माफी दी’

मुत्ताकी ने अपने बयान में कहा कि तालिबान सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपने विरोधियों को भी माफ कर दिया। उन्होंने कहा, “हमने जब शासन संभाला, तब पिछले 40 वर्षों के संघर्ष को समाप्त करने का फैसला किया। हमने उन सभी को माफ कर दिया जो हमारे खिलाफ लड़े। यहां तक कि जो लोग हमारे नागरिकों के खिलाफ थे, वे भी अब काबुल में स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं। हमारा उद्देश्य था कि लोग समझें, कि हमने खून के लिए खून नहीं बहाया।”

उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में अब अमन और सुरक्षा है। अगर किसी को अब भी अत्याचार का सामना करना पड़ता है, तो उसके लिए हमारे पास कानून हैं। हमारे राज्यपाल और अन्य लोगों के पास सुरक्षा नहीं है। खुद मुत्ताकी ने कहा कि वे बिना किसी सुरक्षा के मोटरसाइकिल पर काबुल की सड़कों पर घूमते हैं।

‘हम शांति चाहते हैं, लेकिन ताकत से अपनी रक्षा करेंगे’

मुत्ताकी ने अपने संबोधन में कहा कि अफगानिस्तान एक शांति-प्रिय देश है, लेकिन अगर किसी ने उसकी सीमाओं या संप्रभुता को चुनौती दी, तो वह जवाब देने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को चाहिए कि वह अपने आंतरिक मामलों को संभाले और अफगानिस्तान को दोष देना बंद करे।

उन्होंने कहा, “हमारे पास दिल बड़ा है, हमें किसी से डर नहीं। लेकिन अगर कोई हमारी सीमाओं में हस्तक्षेप करता है, तो हम जवाब देंगे। हमने अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा किया और किसी नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचाया।”

Jaishankar-Muttaqi meeting: भारत ने फिर खोला काबुल में दूतावास, तालिबान सरकार के साथ पूर्ण राजनयिक रिश्ते बहाल

Jaishankar-Muttaqi meeting: India reopens Kabul Embassy, restores full diplomatic ties with Taliban-led Afghanistan

Jaishankar-Muttaqi meeting: भारत और अफगानिस्तान के बीच राजनयिक संबंधों में शुक्रवार को जबरदस्त पुश देखने को मिला। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने घोषणा की कि भारत ने काबुल में अपने तकनीकी मिशन को अपग्रेड कर अब उसे पूर्ण दूतावास का दर्जा दे दिया है। यह फैसला तालिबान सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के साथ हुई मुलाकात के बाद लिया गया।

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यह पहली बार है जब अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद किसी वरिष्ठ अफगान नेता ने भारत की यात्रा की और दोनों देशों के बीच आधिकारिक स्तर पर उच्चस्तरीय वार्ता हुई।

Jaishankar-Muttaqi meeting: दोनों के बीच रिश्तों की नई शुरुआत

नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने विकास, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय सहयोग जैसे विषयों पर बातचीत की। जयशंकर ने कहा, “भारत अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता का पूर्ण सम्मान करता है। हमें यह घोषणा करते हुए खुशी है कि अब भारत का तकनीकी मिशन काबुल में ‘भारत के दूतावास’ के रूप में कार्य करेगा।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत एक पड़ोसी और अफगान जनता का शुभचिंतक होने के नाते अफगानिस्तान के विकास और स्थिरता में गहरी रुचि रखता है।

जयशंकर ने मुलाकात में छह नए विकास परियोजनाओं की भी घोषणा की और कहा कि भारत स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी प्रबंधन और मानवीय सहायता के क्षेत्रों में अफगानिस्तान का सहयोग जारी रखेगा।

Jaishankar-Muttaqi meeting: India reopens Kabul Embassy, restores full diplomatic ties with Taliban-led Afghanistan

जयशंकर ने मुत्ताकी को जानकारी दी कि भारत अफगानिस्तान में छह नई परियोजनाएं शुरू करेगा, जिनका विवरण दोनों देशों के बीच तकनीकी चर्चाओं के बाद जारी किया जाएगा। इसके अलावा भारत ने अफगानिस्तान को 20 एम्बुलेंसें उपहार में देने की घोषणा की, जिनमें से पांच एम्बुलेंसें जयशंकर ने प्रतीकात्मक रूप से मुत्ताकी को सौंपीं।

भारत जल्द ही एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनें भी अफगान अस्पतालों को उपलब्ध कराएगा। साथ ही, भारत अफगानिस्तान को कैंसर दवाएं और वैक्सीन भी भेजेगा ताकि स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूती मिल सके। जयशंकर ने बताया कि भारत ने हाल ही में यूनाइटेड नेशंस आफिस ओन ड्रग्स एंड क्राइम के माध्यम से ड्रग पुनर्वास सामग्री भेजी थी और आगे भी ऐसा करना जारी रखेगा।

Jaishankar-Muttaqi meeting: शरणार्थियों और आपदा पीड़ितों के लिए भारत की मदद

जयशंकर ने बताया कि भारत अफगानिस्तान में हाल ही में आए भूकंप के बाद राहत सामग्री लेकर “फर्स्ट रेस्पॉन्डर” के रूप में सबसे पहले पहुंचा था। भारत अब भूकंप प्रभावित इलाकों में घरों के पुनर्निर्माण में मदद करेगा।

इसके साथ ही, पाकिस्तान से जबरन निकाले गए अफगान शरणार्थियों की स्थिति पर चिंता जताते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत उनकी आवास और पुनर्वास के लिए भी सहयोग देगा।

Jaishankar-Muttaqi meeting: India reopens Kabul Embassy, restores full diplomatic ties with Taliban-led Afghanistan
India handed over 5 Ambulances to FM Muttaqi

उन्होंने कहा, “अफगान शरणार्थियों की गरिमा और आजीविका हमारे लिए महत्वपूर्ण है। भारत उनकी मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है।” जयशंकर ने बैठक में कहा, “हमारा विकास सहयोग कभी भी किसी सरकार से नहीं, बल्कि अफगान जनता से जुड़ा रहा है।”

भारत पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान का सबसे बड़ा विकास सहयोगी रहा है। भारत ने सलमा डैम, अफगान संसद भवन, दिल्ली-काबुल बस सेवा, और चाबहार-कंधार कॉरिडोर जैसी कई परियोजनाएं पूरी की हैं। तालिबान के आने के बाद भी भारत ने अफगान जनता के लिए खाद्यान्न, दवाइयां, और राहत सामग्री भेजना जारी रखा। 2022 से अब तक भारत ने अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं और 200 टन दवाइयां भेजी हैं।

Jaishankar-Muttaqi meeting: पानी और व्यापार पर सहयोग

भारत और अफगानिस्तान के बीच पानी प्रबंधन और सिंचाई के क्षेत्र में पहले से सहयोग रहा है। जयशंकर ने कहा कि भारत अफगानिस्तान के सस्टेनेबल वाटर मैनेजमेंट में मदद करने के लिए तैयार है।

मुत्ताकी ने भी भारतीय कंपनियों को अफगानिस्तान में खनन क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित किया। दोनों देशों ने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने पर भी सहमति जताई। जयशंकर ने बताया कि भारत और अफगानिस्तान के बीच नई हवाई सेवाएं भी शुरू की जा रही हैं ताकि लोगों के बीच संपर्क बढ़े।

काबुल में भारत की वापसी: चार साल बाद दूतावास फिर खुला

अगस्त 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में आने के बाद भारत ने काबुल में अपना दूतावास और सभी वाणिज्य दूतावास बंद कर दिए थे। भारत ने तब अपने राजनयिकों को सुरक्षित निकाल लिया था। 2022 में भारत ने काबुल में एक तकनीकी मिशन शुरू किया था, जो मानवीय सहायता और विकास परियोजनाओं की निगरानी करता था।

अब, काबुल में भारतीय दूतावास का पुनः उद्घाटन इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों को सामान्य कर रहा है, भले ही उसने तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है।

आमिर खान मुत्ताकी की पहली भारत यात्रा

तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की यह यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक रही। वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बाद अस्थायी यात्रा छूट मिलने पर भारत पहुंचे हैं। मुत्ताकी ने इससे पहले रूस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय अफगानिस्तान सम्मेलन में हिस्सा लिया था, जिसमें भारत, चीन, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के प्रतिनिधि शामिल थे।

भारत की यह पहल ऐसे समय में आई है जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं। इस्लामाबाद द्वारा हजारों अफगान शरणार्थियों को जबरन निष्कासित करने के बाद दोनों देशों के बीच विवाद बढ़ गया है। भारत का यह कदम उस क्षेत्रीय परिदृश्य में अहम माना जा रहा है, जहाँ नई दिल्ली तालिबान के साथ सीमित सहयोग बढ़ाकर पाकिस्तान और चीन के प्रभाव को संतुलित करना चाहती है।

भारत की नई अफगान नीति

भारत की अफगान नीति में यह बदलाव धीरे-धीरे 2022 से शुरू हुआ था, जब नई दिल्ली ने तालिबान के साथ “प्रायोगिक संपर्क” की नीति अपनाई। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने जनवरी 2025 में मुत्ताकी से दुबई में मुलाकात की थी, जबकि भारत के विशेष दूत ने अप्रैल में काबुल का दौरा किया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत अब तालिबान के साथ सीमित संवाद रखकर अफगानिस्तान में अपनी राजनयिक मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। इसका उद्देश्य चीन और पाकिस्तान के प्रभाव को सीमित रखना है।

भारत और तालिबान का रिश्ता हमेशा जटिल रहा है। 1990 के दशक में जब तालिबान पहली बार सत्ता में आया, तब भारत ने उसे मान्यता नहीं दी थी। 1999 में कंधार विमान अपहरण के दौरान भारतीय यात्रियों की रिहाई के लिए तालिबान की मध्यस्थता हुई थी। उस घटना ने भारत की सुरक्षा नीति को गहराई से प्रभावित किया था। लेकिन अब, जब क्षेत्रीय हालात बदल रहे हैं, भारत ने तालिबान से बातचीत शुरू की है ताकि वह किसी भी संभावित सुरक्षा खतरे से पहले ही निपट सके।

भारत की (Jaishankar-Muttaqi meeting) इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस कदम पर हैं। चीन, रूस और यूएई पहले ही तालिबान से राजनयिक संपर्क रख रहे हैं। रूस ने जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता भी दी थी। भारत का यह कदम तालिबान के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ा संकेत माना जा रहा है, हालांकि नई दिल्ली ने यह स्पष्ट किया है कि यह मान्यता नहीं बल्कि “साझेदारी का विस्तार” है।