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Rudra Brigade Vs IBG: रूद्र ब्रिगेड के बाद भारतीय सेना का अगला कदम, पूर्वी भारत में बनाए जाएंगे चार इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप

Rudra Brigade Vs IBG

Rudra Brigade Vs IBG: भारतीय सेना पूर्वी सीमा पर एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर लगातार बनी तनातनी के बीच अब सेना अपने सबसे अहम स्ट्राइक कोर में चार इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी आईबीजी बनाने की तैयारी कर रही है। यह बदलाव केवल आर्गेनाइजेशनल नहीं है, बल्कि युद्ध लड़ने के तरीके में भी एक बड़ा शिफ्ट माना जा रहा है। वहीं भारतीय सेना ने रूद्र ब्रिगेड भी खड़ी की हैं। आइए जानते हैं दोनों में क्या है अंतर…

सेना के वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के पनागढ़ में स्थित 17वीं माउंटेन स्ट्राइक कोर से इन चार आईबीजी को खड़ा किया जाएगा। यह कोर भारत का पहला माउंटेन स्ट्राइक कोर है, जिसका सीधा फोकस चीन सीमा पर है। सरकार से अंतिम मंजूरी मिलते ही इस योजना को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। (Rudra Brigade Vs IBG)

Rudra Brigade Vs IBG: क्यों जरूरी हो गए हैं आईबीजी

पिछले एक दशक में चीन ने अपनी सेना की पूरी तरह से रिस्ट्रक्चिरिंग कर दी है। उसने बड़े और भारी डिवीजन सिस्टम को छोड़कर छोटे, तेज और ज्यादा घातक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड अपनाए हैं। इन यूनिट्स में टैंक, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, ड्रोन और सपोर्ट सिस्टम एक साथ होते हैं, जिससे वे बहुत कम समय में कार्रवाई कर सकते हैं।

भारतीय सेना भी अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। सेना का मानना है कि आज के दौर में पूरे कोर या डिवीजन को मूव करने में बहुत समय लगता है। एक कोर में करीब एक लाख सैनिक होते हैं और उसे पूरी तरह तैनात करने में कई दिन या हफ्ते लग सकते हैं। इसके उलट आईबीजी जैसे छोटे फॉर्मेशन कुछ ही घंटों में तैयार हो सकते हैं। (Rudra Brigade Vs IBG)

Rudra Brigade Vs IBG: 17वीं माउंटेन स्ट्राइक कोर क्यों है अहम

17वीं माउंटेन स्ट्राइक कोर भारतीय सेना के चार स्ट्राइक कोरों में से एक है। बाकी तीन स्ट्राइक कोर मथुरा, अंबाला और भोपाल में स्थित हैं, जिनका मुख्य फोकस पश्चिमी मोर्चा यानी पाकिस्तान है। 17वीं कोर इकलौती ऐसी कोर है जिसे पूरी तरह चीन सीमा को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

शुरुआत में इस कोर के पास केवल एक डिवीजन थी, लेकिन 2021 के बाद इसे और मजबूत किया गया। अब इसके पास दो डिवीजन हैं – 59 डिवीजन और 23 डिवीजन। इन्हीं दोनों डिवीजनों से चार आईबीजी बनाने की योजना पर काम चल रहा है। (Rudra Brigade Vs IBG)

चार आईबीजी कैसे बनाए जाएंगे

सूत्रों के मुताबिक, हर आईबीजी में पांच हजार से ज्यादा सैनिक होंगे। इनका नेतृत्व मेजर जनरल रैंक का अधिकारी करेगा। खास बात यह है कि इन आईबीजी में पारंपरिक ब्रिगेड कमांडर नहीं होंगे। यानी कमांड स्ट्रक्चर को और ज्यादा सरल और तेज बनाया जा रहा है।

हर आईबीजी में पैदल सेना की बटालियनें, आर्टिलरी रेजिमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर, कॉम्बैट इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर और फील्ड हॉस्पिटल जैसी यूनिट्स शामिल होंगी। इसका मतलब यह है कि आईबीजी पूरी तरह आत्मनिर्भर होंगी और उन्हें लड़ाई के दौरान बाहर से ज्यादा मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Rudra Brigade Vs IBG)

सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था

आईबीजी को पूरी तरह अलग-थलग यूनिट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। जरूरत पड़ने पर ये कोर मुख्यालय के तहत मौजूद दूसरी यूनिट्स से लॉजिस्टिक्स और फायर सपोर्ट ले सकेंगी। इसके अलावा, कोर मुख्यालय के तहत एक अलग ग्रुप भी बनाया जा सकता है, जो आईबीजी को अतिरिक्त आर्टिलरी और फायर सपोर्ट देगा।

सेना के अंदर अभी इन व्यवस्थाओं पर चर्चा चल रही है और अंतिम ढांचा लागू होने से पहले इसमें कुछ बदलाव भी हो सकते हैं। (Rudra Brigade Vs IBG)

सेना के बड़े रिस्ट्रक्चरिंग प्लान का हिस्सा हैं आईबीजी

इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी आईबीजी का विचार पहली बार 2019 के आसपास सामने आया था। उस समय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि सेना को ऐसे फॉर्मेशन चाहिए, जो कम समय में मूव कर सकें और दुश्मन को चौंकाते हुए जवाब दे सकें। चार आईबीजी बनाने की यह योजना सेना के बड़े रिस्ट्रक्चिरिंग प्लान का हिस्सा है। पिछले कुछ सालों में सेना ने भैरव लाइट कमांडो बटालियन, रूद्र ब्रिगेड, दिव्यास्त्र बैटरी और शक्तिबाण यूनिट जैसी कई नए स्ट्रक्चर खड़े किए हैं। (Rudra Brigade Vs IBG)

रूद्र ब्रिगेड को भी आईबीजी जैसी ही सोच पर बनाया गया है, लेकिन वह आकार में छोटी और ज्यादा टेक्नोलॉजी-ड्रिवन मानी जाती है। आईबीजी डिवीजन से छोटी लेकिन ब्रिगेड से बड़ी होगी। यानी आईबीजी और रूद्र ब्रिगेड एक-दूसरे के पैरेलल हैं।

लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि रूद्र ब्रिगेड और आईबीजी क्या अलग-अलग हैं या एक ही सिस्टम के अलग नाम हैं। सच्चाई यह है कि दोनों ही एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन उनकी भूमिका, आकार और इस्तेमाल में फर्क है। रूद्र ब्रिगेड को आईबीजी कॉन्सेप्ट का विकसित और जमीनी रूप माना जा रहा है। (Rudra Brigade Vs IBG)

Rudra Brigade Vs IBG: रूद्र ब्रिगेड क्या है

रूद्र ब्रिगेड को भारतीय सेना का नया और ज्यादा आधुनिक रूप माना जा रहा है। इसका नाम भगवान रुद्र से लिया गया है, जो विनाश और पुनर्निर्माण के प्रतीक माने जाते हैं। सेना के मुताबिक, यह ब्रिगेड भविष्य की जंग को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

रूद्र ब्रिगेड असल में आईबीजी की सोच को और आगे ले जाती है। इसे ज्यादा कॉम्पैक्ट, ज्यादा तेज और ज्यादा टेक्नोलॉजी-ड्रिवन बनाया गया है।

एक रूद्र ब्रिगेड में लगभग तीन हजार सैनिक होते हैं और इसका नेतृत्व ब्रिगेडियर रैंक का अफसर करता है। यानी यह आईबीजी से छोटी यूनिट है, लेकिन मारक क्षमता के मामले में बेहद खतरनाक मानी जा रही है। (Rudra Brigade Vs IBG)

रूद्र ब्रिगेड की बनावट

रूद्र ब्रिगेड को पूरी तरह इंटीग्रेटेड यूनिट के तौर पर तैयार किया गया है। इसमें पैदल सेना, मैकेनाइज्ड इंफेंट्री, टैंक, तोपखाना, एयर डिफेंस, इंजीनियर्स, सिग्नल्स और लॉजिस्टिक्स सब कुछ एक साथ शामिल है।

इसके साथ ही रूद्र ब्रिगेड में ड्रोन यूनिट्स, इंटेलिजेंस-सर्विलांस-रिकॉनिसेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और साइबर सपोर्ट भी दिया गया है। यानी यह सिर्फ जमीन पर लड़ने वाली यूनिट नहीं, बल्कि मल्टी-डोमेन वॉरफेयर के लिए तैयार फॉर्मेशन है।

रूद्र ब्रिगेड की खास बात यह है कि इसकी बनावट इलाके के हिसाब से बदली जा सकती है। पहाड़ी इलाकों में ज्यादा इंफेंट्री और हल्का आर्टिलरी सिस्टम, जबकि मैदानी इलाकों में टैंक और सेल्फ-प्रोपेल्ड गन्स को ज्यादा महत्व दिया जाता है। (Rudra Brigade Vs IBG)

रूद्र ब्रिगेड क्यों लाई गई

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना को यह साफ महसूस हुआ कि भविष्य की लड़ाई में तेजी से फैसले और तेज मूवमेंट सबसे अहम होंगे। ऑपरेशन सिंदूर में प्रिसीजन स्ट्राइक, ड्रोन और रियल टाइम इंटेलिजेंस की भूमिका ने सेना की सोच को और मजबूत किया।

इसके बाद 26 जुलाई 2025 को कारगिल विजय दिवस के मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रूद्र ब्रिगेड की घोषणा की। उन्होंने कहा कि यह ब्रिगेड सेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करेगी। (Rudra Brigade Vs IBG)

Rudra Brigade Vs IBG: रूद्र ब्रिगेड और आईबीजी में समानताएं

दोनों ही कॉन्सेप्ट का मकसद सेना को तेज़ और असरदार बनाना है। दोनों में अलग-अलग हथियार और यूनिट्स को एक ही कमांड के तहत लाया जाता है। दोनों ही सीमित समय में दुश्मन को जवाब देने की रणनीति पर आधारित हैं।

आईबीजी और रूद्र ब्रिगेड दोनों ही पुराने डिवीजन-केंद्रित सिस्टम से हटकर छोटे लेकिन ज्यादा ताकतवर ढांचे की सोच को आगे बढ़ाते हैं। (Rudra Brigade Vs IBG)

Rudra Brigade Vs IBG: दोनों में बड़ा फर्क क्या है

सबसे बड़ा फर्क इनके आकार और नेतृत्व में है। आईबीजी एक बड़ा फॉर्मेशन है, जिसमें पांच हजार से ज्यादा सैनिक होते हैं और इसका नेतृत्व मेजर जनरल करता है। वहीं रूद्र ब्रिगेड छोटी, ज्यादा फुर्तीली यूनिट है, जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर करता है।

दूसरा बड़ा फर्क टेक्नोलॉजी का है। रूद्र ब्रिगेड को ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और साइबर क्षमताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। दोनों कोल्ड स्टार्ट/स्ट्राइक डॉक्ट्रिन से जुड़ी हैं, जो रैपिड ऑफेंसिव्स और बॉर्डर थ्रेट्स (चीन-पाकिस्तान) पर फोकस करती हैं। साथ ही दोनों मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स को सपोर्ट करते हैं। देका जाए तो रूद्र ब्रिगेड आईबीजी कॉन्सेप्ट से निकली है। और आईबीजी की सोच को रूद्र में आगे बढ़ाया गया है।

तीसरा फर्क यह है कि आईबीजी अभी भी बड़े स्तर पर लागू होने की प्रक्रिया में है, जबकि रूद्र ब्रिगेड को मौजूदा ब्रिगेड्स को बदलकर जमीन पर उतारा जा रहा है। (Rudra Brigade Vs IBG)

Exclusive: मोदी-मर्ज मुलाकात से पहले भारत-जर्मनी का बड़ा फैसला, देश में तैनात होगा जर्मन लायजन ऑफिसर

India Germany defence cooperation

India Germany defence cooperation: भारत और जर्मनी के बीच सैन्य और रणनीतिक रिश्ते एक नए दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज दो दिन की भारत यात्रा पर हैं और उनके इस दौरे के दौरान पीएम मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। वहीं उनके इस अहम दौरे के बीच दोनों देशों ने एक बड़ा फैसला लिया है। जल्द ही जर्मनी से एक लायजन ऑफिसर इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी–आईओआर) में तैनात किया जाएगा।

India Germany defence cooperation: 12 और 13 जनवरी को भारत यात्रा पर हैं जर्मन चांसलर

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज 12 और 13 जनवरी को भारत यात्रा पर हैं। जर्मनी के चांसलर का पदभार संभालने के आठ महीने बाद यह भारत उनकी पहली आधिकारिक यात्रा है। उनके इस दौरे को भारत-जर्मनी संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (India Germany defence cooperation)

India Germany defence cooperation: जून 2026 से पहले हो सकती है जॉइनिंग

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, जर्मन संपर्क अधिकारी को आईएफसी-आईओआर में तैनात करने का फैसला ले लिया गया है। यह अधिकारी जून 2026 से पहले भारत में अपनी पोस्टिंग जॉइन कर सकता है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और जर्मनी के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग और मजबूत होगा।

आईएफसी-आईओआर की स्थापना दिसंबर 2018 में भारतीय नौसेना ने की थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, शिपिंग की निगरानी, समुद्री अपराधों पर नजर और आपसी सूचना साझा करने को मजबूत करना है। आज यह सेंटर एक अंतरराष्ट्रीय मंच बन चुका है, जहां 15 देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर तैनात हैं। इसके अलावा यह 57 मैरीटाइम सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन और 25 पार्टनर देशों के साथ मिलकर काम करता है। जर्मनी का इस नेटवर्क में शामिल होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। (India Germany defence cooperation)

India Germany defence cooperation: सैन्य संबंधों में लगातार बढ़ोतरी

भारत और जर्मनी के बीच सैन्य सहयोग कोई नई बात नहीं है। दोनों देशों के रिश्ते साल 2000 से स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप के स्तर पर हैं। साल 2011 से दोनों देशों के बीच सरकार प्रमुखों के स्तर पर इंटर-गवर्नमेंटल कंसल्टेशन की शुरुआत हुई, जिससे रक्षा, सुरक्षा और इंडस्ट्रियल सहयोग को नई दिशा मिली।

बीते कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। ट्रेनिंग में दोनों की साझेदारी बढ़ रही है। समुद्री क्षेत्र में दोनों देशों की नौसेनाएं पैसेज एक्सरसाइज यानी पैसेक्स में हिस्सा ले चुकी हैं। इसके अलावा भारतीय नौसेना पहले से ही जर्मन टेक्नोलॉजी से बनी शिशुमार क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन ऑपरेट कर रही है। ये सबमरीन जर्मनी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भारत में बनाई गई थीं। (India Germany defence cooperation)

तरंग शक्ति में पहली बार भारत आया था यूरोफाइटर

वहीं, अगस्त 2024 में जर्मनी ने पहली बार भारत की जमीन पर किसी सैन्य हवाई अभ्यास में हिस्सा लिया था। जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून फाइटर जेट्स ने भारतीय वायुसेना के पहले बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास तरंग शक्ति 2024 में हिस्सा लिया था। यह भारत-जर्मनी सैन्य रिश्तों के लिहाज से ऐतिहासिक कदम माना गया।

वहीं दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूती तब मिली जब जून 2023 में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के बीच नई दिल्ली में चार दिनों तक द्विपक्षीय बैठकें हुईं। इन बैठकों में दोनों देशों ने मौजूदा रक्षा सहयोग की समीक्षा की और रक्षा औद्योगिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की।

नवंबर 2025 में भारत-जर्मनी हाई डिफेंस कमिटी की बैठक नई दिल्ली में हुई, जिसकी सह-अध्यक्षता रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और जर्मन रक्षा मंत्रालय के स्टेट सेक्रेटरी येंस प्लॉटनर ने की। इस बैठक में मिलिट्री टू मिलिट्री रिलेशंस को स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का अहम हिस्सा बनाने पर सहमति बनी। (India Germany defence cooperation)

31 मार्च से पहले साइन हो सकती है पी-75आई सबमरीन डील

वहीं, प्रोजेक्ट 75 इंडिया (पी-75आई) भारत और जर्मनी के सैन्य रिश्तों में सबसे बड़ा और अहम बदलाव साबित होने वाला है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना के लिए छह एडवांस्ड पारंपरिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी, जिसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) टेक्नोलॉजी शामिल होगी। जनवरी 2026 में जर्मनी की कंपनी थायसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) को मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के साथ विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर पार्टनर के रूप में चुना जा चुका है। (India Germany defence cooperation)

यह रक्षा मंत्रालय के स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत पहला बड़ा अधिग्रहण कार्यक्रम है। इसके तहत पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा और जर्मनी भारत को डिजाइन और तकनीक ट्रांसफर करेगा। इस डील पर 31 मार्च 2026 से पहले साइन होने की उम्मीद है।

एआईपी टेक्नोलॉजी से लैस पनडुब्बियां लंबे समय तक बिना सतह पर आए पानी के नीचे रह सकती हैं। आम पारंपरिक पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आना पड़ता है, जिससे उनकी लोकेशन पता लगने का खतरा बढ़ जाता है। एआईपी तकनीक दुनिया के कुछ ही देशों के पास है और भारत का डीआरडीओ भी इसे स्वदेशी तौर पर डेवलप कर रहा है। (India Germany defence cooperation)

पनडुब्बियों को नेवल वारफेयर की सबसे गुप्त और घातक मशीनें माना जाता है। ये वहां ऑपरेट कर सकती हैं, जहां युद्धपोत नहीं पहुंच पाते। दुश्मन पर अचानक हमला कर ये समुद्र में गायब हो जाती हैं। ऐसे में पी-75आई प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की ताकत कई गुना बढ़ाने वाला साबित होगा।

कुल मिलाकर, भारत और जर्मनी के बीच सैन्य रिश्ते अब केवल एक्सरसाइज और डॉयलॉग तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग और हिंद महासागर क्षेत्र में साझा सुरक्षा की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। (India Germany defence cooperation)

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को काउंटर करने की तैयारी! 73 साल बाद भारतीय नौसेना को चाहिए एम्फीबियस एयरक्राफ्ट, जारी की RFI

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI
Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: ShinMaywa US-2

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर में चीन से मिल रही चुनौती को देखते हुए अहम फैसला लिया है। नौसेना की ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्रालय ने फिक्स्ड-विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। नौसेना को ऐसे चार एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की जरूरत है। इन विमानों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि ये समुद्र, झील जैसी जल सतहों और तैयार रनवे दोनों से टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकेंगे। बता दें कि 1953 के बााद पहली बार नौसेना एम्फीबियस एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल करेगी।

नौसेना का यह कदम ऐसे समय में आया है जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ रही है और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की जिम्मेदारियां पहले से कहीं ज्यादा हो गई हैं। प्राकृतिक आपदाओं, खोज-बचाव अभियानों और दूरदराज वाले द्वीपों तक तुरंत पहुंचने के लिए ऐसे विमानों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: कितने विमान और कितने समय के लिए

7 जनवरी को भारतीय नौसेना की तरफ से जारी आरएफआई के अनुसार, भारतीय नौसेना चार एम्फीबियस एयरक्राफ्ट को लगभग चार सालों के लिए लीज पर लेना चाहती है। यह लीज वेट लीज कैटेगरी में होगी, यानी विमान के साथ-साथ क्रू, मेंटेनेंस और इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।

इस सिस्टम का फायदा यह होता है कि नौसेना को तुरंत ऑपरेशनल क्षमता मिल जाती है और लंबे समय तक इंफ्रास्ट्रक्चर या ट्रेनिंग का इंतजार नहीं करना पड़ता। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

अंडमान-निकोबार क्यों है सबसे अहम

हालांकि आरएफआई में यह स्पष्ट नहीं है कि इन जहाजों का इस्तेमाल कहां किया जाएगा, लेकिन भारतीय नौसेना के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह हैं। हाल ही में भारत सरकार का पूरा फोकस एएनआई यानी अंडमान-निकोबार आईलैंड्स पर है। यह द्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से करीब 1200 किलोमीटर दूर स्थित है और इसे रणनीतिक रूप से भारत का “अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर” भी कहा जाता है।

खास बात यह है कि अंडमान-निकोबार मलक्का स्ट्रेट के बेहद पास है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार करता है। वहीं, यहां से चीन का 80 फीसदी ऑयल इम्पोर्ट्स और 40 फीसदी ग्लोबल ट्रेड गुजरता है। यह मलक्का स्ट्रेट से 90-160 किमी दूर है, जो चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” स्ट्रैटेजी को काउंटर करता है।

पोर्ट ब्लेयर में भारत का एकमात्र ट्राई-सर्विस कमांड का मुख्यालय है, जो आर्मी, नेवी और एयर फोर्स को इंटीग्रेट करता है। यह 2001 में बनाया भारत का पहला थिएटर कमांड है। जहां नेवल बेस और एयरबेस दोनों मौजूद हैं। यहां से मैरीटाइम पैट्रोल, सबमरीन ट्रैकिंग, और जॉइंट ऑपरेशंस होते हैं। हाल के सालों में भारत सरकार ने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड किया है, ताकि चीन की बढ़ती चुनौती का सामना किया जा सके। यहां हाल में रनवे अपग्रेड, पोर्ट्स, और एयरफील्ड्स को डेवलप किया जा रहा है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट निकोबार के साथ-साथ अंडमान-निकोबार में पहले से मौजूद सैन्य ढांचे को भी मजबूत किया जा रहा है। कैंपबेल बे में स्थित आईएनएस बाज नेवल एयर स्टेशन मलक्का स्ट्रेट की साउदर्न एंट्री पर नजर रखता है। इसके अलावा कार निकोबार, पोर्ट ब्लेयर, शिबपुर और कैंपबेल बे सहित कुल चार प्रमुख एयरबेस को अपग्रेड किया जा चुका है, जिससे पूरे द्वीपसमूह की सैन्य क्षमता कई गुना बढ़ गई है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

सीडीएस ने किया अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन

पोर्ट ब्लेयर यानी श्री विजया पुरम से 535 किमी दक्षिण में कार निकोबार एयर फोर्स बेस में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 2 जनवरी को ही अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन किया है। जिसमें 2.7 किमी लंबा और 43 मीटर चौड़ा रनवे बनाया गया है जो हेवी एयरक्राफ्ट जैसे फाइटर्स, ट्रांसपोर्टर्स को सपोर्ट करता है। साथ ही, कई एयरक्राफ्ट एक साथ पार्क, रिफ्यूल और टर्नअराउंड हो सकें इसके लिए रनवे को एक्सपेंड भी किया गया है। साथ ही, नया टैक्सी ट्रैक भी बनाया है, जो इमरजेंसी रनवे के रूप में यूज हो सकता है। इसके अलावा फ्यूल स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स फैसिलिटी, और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बढ़ाया गया। यहां से मलक्का स्ट्रेट के साउदर्न एप्रोच पर नजर रखी जा सकती है। मैरीटाइम सर्विलांस, डिटरेंस, और रैपिड रिस्पॉन्स बढ़ाती है।

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक डीप-सी इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भी बनाया जा रहा है, जहां बड़े कंटेनर शिप सीधे आकर कार्गो उतार सकेंगे। अभी भारत का करीब 75 फीसदी ट्रांसशिप्ड कार्गो सिंगापुर, कोलंबो और दूसरे विदेशी पोर्ट्स पर हैंडल होता है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार पोर्ट के चालू होने के बाद यह कार्गो भारत में ही हैंडल किया जा सकेगा, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होगी और भारत को बड़ा आर्थिक फायदा मिलेगा।

प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जिसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वहां वाइड-बॉडी एयरक्राफ्ट, यहां तक कि ए-380 जैसे बड़े विमान भी उतर सकें। यह एयरपोर्ट न सिर्फ सिविल एविएशन के लिए बल्कि जरूरत पड़ने पर मिलिट्री ऑपरेशंस में भी अहम भूमिका निभा सकेगा। इसके अलावा यहां एक आधुनिक टाउनशिप, पावर प्लांट और इकोनॉमिक जोन भी डेवलप किया जा रहा है, ताकि लंबी अवधि में यह इलाका आत्मनिर्भर बन सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का एक बेहद अहम पहलू इसका मिलिट्री और स्ट्रैटेजिक रोल है। इस द्वीप पर नया एयरफील्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने से भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की सुविधा मिलेगी। खासकर म्यांमार के कोको आइलैंड जैसे ठिकानों पर चीन की गतिविधियों पर नजर रखने में ग्रेट निकोबार की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी। इसके जरिए भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की क्षमता मिलेगी। ऐसे में यहां भारत की मजबूत मौजूदगी समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कई द्वीपों पर नहीं है रनवे

इन द्वीपों पर कई जगहों पर रनवे या एयरस्ट्रिप नहीं है। जहाज़ों के ज़रिये रसद पहुंचाने में कई बार दिन लग जाते हैं। ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सीधे समुद्र पर उतरकर सैनिक, मेडिकल टीम, राहत सामग्री और उपकरण पहुंचा सकते हैं। अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह में कुल मिलाकर करीब 500 से लेकर 836 द्वीप और छोटे-छोटे आइलेट्स शामिल हैं। इसमें कई निर्जन, चट्टानी और छोटे टापू भी गिने जाते हैं। इन सैकड़ों द्वीपों में से केवल 31 से 38 द्वीप ऐसे हैं, जहां स्थायी आबादी रहती है। इसके बावजूद, इतने बड़े द्वीपसमूह में वास्तविक रूप से काम करने लायक रनवे या एयरस्ट्रिप्स की संख्या बेहद कम है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

पूरे अंडमान-निकोबार में केवल चार रनवे

पूरे अंडमान–निकोबार क्षेत्र में केवल चार मुख्य एयरफील्ड ऐसे हैं, जहां से नियमित या रणनीतिक उड़ानें संभव हैं। इनमें पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे अहम है, जो सिविल और सैन्य दोनों जरूरतों को पूरा करता है। इसके अलावा कार निकोबार में एयरफोर्स स्टेशन है, जो मुख्य रूप से मिलिट्री इस्तेमाल के लिए है। ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में आईएनएस बाज नेवी एयर स्टेशन है, जो भारत का सबसे दक्षिणी एयरफील्ड माना जाता है, लेकिन इसका रनवे छोटा है और एक्सपेंड करने की प्रक्रिया चल रही है। उत्तरी अंडमान में शिबपुर के पास आईएनएस कोहासा एक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस है, जहां सीमित लंबाई का रनवे मौजूद है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

रनवे न होने से लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है असर

वहीं, रनवे की इस कमी का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। अंडमान–निकोबार में ज्यादातर सप्लाई जहाजों के जरिए होती है। पोर्ट ब्लेयर से ग्रेट निकोबार जैसे दूरस्थ इलाकों तक जहाज से पहुंचने में दो से तीन दिन तक लग जाते हैं। मानसून, तूफान या खराब समुद्री हालात में यही सफर और लंबा हो जाता है या पूरी तरह रुक भी जाता है। ऐसे में जरूरी सामान, ईंधन, मेडिकल सप्लाई या स्पेयर पार्ट्स समय पर नहीं पहुंच पाते।

स्पेशल ऑपरेशंस के लिहाज से भी रनवे की कमी एक बड़ी बाधा है। मरीन कमांडो यानी मार्कोस या अन्य स्पेशल फोर्सेज को दूरस्थ द्वीपों पर तेजी से भेजना या वहां से निकालना आसान नहीं होता। इसी तरह मैरीटाइम पैट्रोल और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशंस में भी यह कमी साफ नजर आती है, क्योंकि कई इलाकों में कोई हवाई बेस ही मौजूद नहीं है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

इसलिए जरूरत है एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की

ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की जरूरत सामने आती है। फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो समुद्र या झील के पानी से भी उतर सकते हैं और सामान्य रनवे से भी ऑपरेट कर सकते हैं। ये रनवे की कमी को लगभग पूरी तरह कवर कर लेते हैं। ऐसे विमान सीधे समुद्र की सतह पर उतरकर सैनिकों, मेडिकल टीम, राहत सामग्री या जरूरी उपकरणों को पहुंचा सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

किस तरह के ऑपरेशन होंगे

आरएफआई में साफ तौर पर बताया गया है कि इन विमानों का इस्तेमाल किन-किन कामों के लिए किया जाएगा। इनमें सबसे अहम भूमिका लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू (एलआर-एसएआर) की होगी। इसके अलावा इन विमानों का इस्तेमाल ऑपरेशनल लॉजिस्टिक सपोर्ट, स्पेशल ऑपरेशन, ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ और कैजुअल्टी इवैक्यूएशन में किया जाएगा।

अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे इलाकों में किसी समुद्री हादसे, जहाज दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के समय यह विमान तुरंत मदद पहुंचाने में अहम साबित हो सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

समुद्र और जमीन दोनों से ऑपरेशन की क्षमता

एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वह समुद्र, झील और रनवे, तीनों जगह से ऑपरेट कर सकता है। नौसेना ने साफ किया है कि विमान को दिन और रात, दोनों समय उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए और उसे इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स (आईएफआर) सर्टिफिकेशन प्राप्त होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि विमान खराब मौसम और कम विजिबिलिटी में भी सुरक्षित उड़ान भर सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन जरूरी

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि विमान को समुद्री माहौल के अनुरूप बनाया गया होना चाहिए। समुद्र की नमक भरी हवा और नमी विमानों पर जल्दी असर डालती है, इसलिए कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन अनिवार्य रखा गया है। इसके अलावा, विमान में आधुनिक नेविगेशन, कम्युनिकेशन और सुरक्षा सिस्टम होने चाहिए ताकि लंबी दूरी के ऑपरेशन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

इसके साथ ही, विमान में एडवांस एवियोनिक्स, सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम, सैटेलाइट-आधारित नेविगेशन और सर्वाइवल इक्विपमेंट होना जरूरी बताया गया है। लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू के लिए सेंसर और विजुअल एड्स की भी जरूरत रखी गई है, ताकि समुद्र में फंसे लोगों या दुर्घटनाग्रस्त जहाजों की पहचान तेजी से की जा सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

अंडमान में आपदा प्रबंधन के लिए अहम

अंडमान-निकोबार क्षेत्र भूकंप और सुनामी जोन में आता है। 2004 की सुनामी के दौरान यह महसूस किया गया था कि अगर ऐसे विमान उपलब्ध होते, तो राहत और बचाव कार्य और तेज हो सकता था। एम्फीबियस एयरक्राफ्ट समुद्र पर उतरकर सीधे प्रभावित इलाकों के पास पहुंच सकते हैं। जहां जहाजों से पहुंचने में दो-तीन दिन लगते हैं, वहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट कुछ घंटों में ही काम पूरा कर सकते हैं। ग्रेट निकोबार, लिटिल अंडमान या हैवलॉक जैसे द्वीपों पर, जहां रनवे नहीं है, वहां यह क्षमता बेहद अहम हो जाती है। ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ ऑपरेशंस में ये विमान पानी पर उतरकर सीधे बचाव और मेडिकल इवैक्यूएशन कर सकते हैं।

लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू में भी इनकी भूमिका अहम होती है। ये दिन-रात, इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स के तहत उड़ान भर सकते हैं और हजारों किलोमीटर तक ऑपरेट कर सकते हैं। स्पेशल ऑपरेशंस में मार्कोस जैसे यूनिट्स को चुपचाप ड्रॉप या पिकअप करना भी इनके जरिए संभव होता है। एंटी-पाइरेसी और एंटी-नार्कोटिक्स ऑपरेशंस में ये विमान समुद्र पर उतरकर संदिग्ध गतिविधियों की जांच कर सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

नेवी के पास नहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट

मिली जानकारी मुताबिक फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कोई भी फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सर्विस में नहीं है। पिछले कई सालों से जापान के शिनमायवा यूएस-2 विमान को लेकर बातचीत चलती रही, लेकिन कीमत और अन्य शर्तों के कारण समझौता आगे नहीं बढ़ सका। इसी वजह से अब नौसेना ने लीज के रास्ते से तत्काल क्षमता हासिल करने का फैसला किया है।

भारतीय नौसेना का नेवल एविएशन, जिसकी औपचारिक शुरुआत 11 मई, 1953 को कोच्चि में हुई थी, उसने अपने पहले भारतीय नौसैनिक विमान के तौर पर शॉर्ट्स सीलैंड एम्फीबियस एयरक्राफ्ट को ऑपरेट किया थ। हालांकि, 1960 में इनका ऑपरेशन बंद कर दिया गया।

वहीं, इस आरएफआई को नौसेना की लॉन्ग टर्म एविएशन रोडमैप का हिस्सा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि लीज पर लिए गए विमानों के ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर भविष्य में स्थायी खरीद या स्वदेशी विकास का रास्ता भी खुलेगा। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस आरएफआई का जवाब केवल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स या अधिकृत लेसर ही दे सकते हैं। लेसर का भारतीय यूनिट होना और विमान का मालिक होना आवश्यक है। आरएफआई के साथ ही लेसर से बजटरी अनुमान, दायित्व और बीमा विवरण, तथा डीएपी-2020 के प्रावधानों के अनुपालन की पुष्टि भी मांगी गई है। आरएफआई का जवाब मिलने के बाद नौसेना और रक्षा मंत्रालय इन प्रस्तावों का अध्ययन करेंगे। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि किन विकल्पों को अगले चरण में ले जाया जाए। इसके बाद ही रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) या अन्य औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

Explainer: हाइपरसोनिक रेस में भारत की बड़ी छलांग, DRDO का 12 मिनट वाला स्क्रैमजेट टेस्ट क्यों है गेमचेंजर?

Explainer DRDO Scramjet Engine Test
DRDO Scramjet Engine Test Marks Major Leap in India’s Hypersonic Missile Programme

DRDO Scramjet Engine Test: भारत ने हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग लगाई है। डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल) ने पहली बार फुल स्केल एक्टिवली कूल्ड लॉन्ग ड्यूरेशन स्क्रैमजेट इंजन कम्बस्टर का सफल ग्राउंड टेस्ट किया है। यह टेस्ट 12 मिनट से अधिक समय तक चला और पूरी तरह सफल रहा। यह टेस्ट स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट (एससीपीटी) फैसिलिटी में किया गया, जिसे पूरी तरह भारत में ही डिजाइन और डेवलप किया गया है।

DRDO Scramjet Engine Test: क्या है यह उपलब्धि और क्यों है इतनी खास

हाइपरसोनिक तकनीक को आज के समय में डिफेंस सेक्टर की सबसे जटिल और एडवांस तकनीकों में गिना जाता है। हाइपरसोनिक मिसाइल वह होती है जो मैक-5 यानी ध्वनि की रफ्तार से पांच गुना या उससे ज्यादा रफ्तार से उड़ान भर सकती है। यह रफ्तार करीब 6,100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे भी अधिक होती है।

डीआरडीओ का यह टेस्ट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें लॉन्ग ड्यूरेशन, यानी लंबे समय तक इंजन को स्थिर और सुरक्षित रूप से चलाकर दिखाया गया है। हाइपरसोनिक उड़ान में सबसे बड़ी चुनौती होती है बेहद ज्यादा तापमान, तेज हवा का दबाव और ईंधन के स्थिर दहन को बनाए रखना। (DRDO Scramjet Engine Test)

स्क्रैमजेट इंजन क्या होता है, आसान भाषा में समझिए

इस पूरी तकनीक का सबसे अहम हिस्सा है स्क्रैमजेट इंजन। स्क्रैमजेट का पूरा नाम है सुपरसोनिक कंबशन रैमजेट। यह एक ऐसा एयर-ब्रीदिंग इंजन है, जो वातावरण से ऑक्सीजन लेता है और उसी के जरिए ईंधन जलाकर थ्रस्ट पैदा करता है। सामान्य रॉकेट इंजन को अपने साथ ऑक्सीजन ले जानी पड़ती है, जिससे उसका वजन बढ़ जाता है और रेंज सीमित हो जाती है। स्क्रैमजेट इंजन इस समस्या को खत्म कर देता है, क्योंकि यह हवा से ही ऑक्सीजन लेता है। इससे मिसाइल हल्की होती है और ज्यादा दूरी तक उड़ान भर सकती है। (DRDO Scramjet Engine Test)

2,000 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तापमान

स्क्रैमजेट इंजन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें इंजन के अंदर भी हवा सुपरसोनिक गति से बहती रहती है। यानी हवा को धीमा नहीं किया जाता, बल्कि उसी तेज रफ्तार में ईंधन मिलाकर दहन कराया जाता है। यही चीज इस इंजन को जटिल बना देती है। इतनी तेज हवा में आग को स्थिर बनाए रखना अपने आप में एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है।

DRDO Scramjet Engine Test: एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट क्यों जरूरी है

इसके साथ ही दूसरी बड़ी समस्या होती है तापमान। हाइपरसोनिक स्पीड पर इंजन के अंदर का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा हो सकता है। यह तापमान स्टील के पिघलने के तापमान से कहीं अधिक होता है। अगर इंजन को सही तरीके से ठंडा न किया जाए, तो वह कुछ सेकंड में ही खराब हो सकता है। (DRDO Scramjet Engine Test)

इसी वजह से डीआरडीओ ने एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन विकसित किया है। इसमें कूलिंग के लिए किसी अलग सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि खुद ईंधन को ही कूलेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। ईंधन को इंजन की दीवारों के पास से गुजारा जाता है, जहां वह अत्यधिक गर्मी को सोख लेता है। इसके बाद वही ईंधन कंबशन के लिए इस्तेमाल होता है। इस तकनीक को एंडोथर्मिक फ्यूल सिस्टम कहा जाता है। (DRDO Scramjet Engine Test)

हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल क्यों है गेम चेंजर

इस टेस्ट को सिर्फ एक तकनीकी सफलता के तौर पर देखना इसकी अहमियत को कम करके आंकना होगा। असल में यह भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल प्रोग्राम के लिए वह आधार तैयार करता है, जिस पर भविष्य की सबसे तेज और सबसे घातक मिसाइलें बनाई जा सकेंगी। हाइपरसोनिक तकनीक आने के बाद भारत भी दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के क्लब में मजबूती से खड़ा हो सकता है।

अब तक दुनिया में दो तरह की मिसाइलें प्रमुख रही हैं। एक हैं बैलिस्टिक मिसाइलें, जो बहुत तेज होती हैं लेकिन उनके रास्ते का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी हैं क्रूज मिसाइलें, जो रास्ता बदल सकती हैं लेकिन उनकी स्पीड अपेक्षाकृत कम होती है। हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल इन दोनों के बीच की दूरी को खत्म कर देती है। यह बेहद तेज भी होती है और जरूरत पड़ने पर रास्ता भी बदल सकती है। यही वजह है कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि अमेरिका, रूस और चीन इस तकनीक को लेकर बेहद गंभीर हैं। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: ग्राउंड टेस्ट का मतलब क्या है

9 जनवरी को हुआ यह टेस्ट इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि इसमें पहली बार भारत ने फुल स्केल एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन को लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया। इससे पहले अप्रैल 2025 में सब-स्केल इंजन का लंबी अवधि का टेस्ट किया गया था। अब फुल स्केल इंजन का 12 मिनट से ज्यादा चलना यह दिखाता है कि तकनीक अब प्रयोगशाला से निकलकर ऑपरेशनल स्टेज के बेहद करीब पहुंच चुकी है।

यह ग्राउंड टेस्ट भले ही जमीन पर किया गया हो, लेकिन इसका महत्व किसी फ्लाइट टेस्ट से कम नहीं है। हाइपरसोनिक तकनीक में पहले जमीन पर इंजन की स्थिरता और सुरक्षा साबित की जाती है, उसके बाद ही उड़ान परीक्षण किए जाते हैं। डीआरडीओ पहले ही 2020 में हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन व्हीकल (एचएसटीडीवी) का सफल फ्लाइट टेस्ट कर चुका है। अब स्क्रैमजेट इंजन का यह लंबी अवधि वाला टेस्ट उस दिशा में अगला बड़ा कदम है। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: भारत ने पहले भी किए हैं टेस्ट

भारत की हाइपरसोनिक यात्रा अचानक शुरू नहीं हुई है। पिछले दो दशकों से डीआरडीओ, इसरो, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग मिलकर इस तकनीक पर काम कर रहे हैं। 2016 में इसरो ने स्क्रैमजेट इंजन का पहला एक्सपेरिमेंटल फ्लाइट टेस्ट किया था। 2020 में डीआरडीओ ने ओडिशा तट से एचएसटीडीवी उड़ाकर दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद हैदराबाद में एडवांस्ड हाइपरसोनिक विंड टनल और आईआईटी कानपुर में हाइपरवेलोसिटी टेस्ट फैसिलिटी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित की गईं। (DRDO Scramjet Engine Test)

DRDO Scramjet Engine Test: रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि को भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रोग्राम के लिए मजबूत आधार बताया है। वहीं डीआरडीओ के प्रमुख डॉ. समीर वी कामत ने इसे वैज्ञानिकों, उद्योग और शिक्षण संस्थानों की साझा मेहनत का परिणाम कहा है। यह संदेश भी साफ है कि भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि अत्याधुनिक हथियार बनाने वाला देश बन चुका है।

इस टेस्ट का एक बड़ा पहलू आत्मनिर्भर भारत से भी जुड़ा है। स्क्रैमजेट इंजन का डिजाइन, उसकी कूलिंग तकनीक, इस्तेमाल होने वाला ईंधन और टेस्ट फैसिलिटी सब कुछ भारत में ही डेवलप किया गया है। इसका मतलब है कि भविष्य में बनने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों के लिए भारत को किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। (DRDO Scramjet Engine Test)

LUH पर नेवी चीफ के बयान का यह है पूरा सच, जानिए किस हेलिकॉप्टर पर दांव लगा रही नौसेना

Indian Navy UH-M Helicopter

Indian Navy UH-M Helicopter: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी के एक बयान के बाद रक्षा जगत में हलचल तेज हो गई थी। यह चर्चा शुरू हो गई थी कि भारतीय नौसेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बनाए लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एलयूएच) को खारिज कर दिया है। हालांकि, अब नौसेना से जुड़े सूत्रों ने इस पूरे मामले पर स्थिति साफ करते हुए कहा है कि नौसेना प्रमुख के बयान को गलत तरीके से समझा गया।

नौसेना सूत्रों के अनुसार, सच्चाई यह है कि एलयूएच कभी भी नौसेना के लिए बनाया ही नहीं गया था, इसलिए उसके नौसेना में शामिल होने या न होने का सवाल ही नहीं उठता। नौसेना की जरूरतें एलयूएच से बिल्कुल अलग हैं और नेवी चीफ के जवाब को गलत तरीके से पेश किया गया। (Indian Navy UH-M Helicopter)

Indian Navy UH-M Helicopter: एलयूएच क्यों नहीं है नौसेना के लिए उपयुक्त

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय नौसेना को जिस यूटिलिटी हेलिकॉप्टर की जरूरत है, वह ट्विन-इंजन यानी दो इंजन वाला होना जरूरी है। समुद्र के ऊपर उड़ान के दौरान सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा होता है। अगर सिंगल इंजन हेलिकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ जाए, तो समुद्र में ऑपरेशन बेहद जोखिम भरा हो जाता है।

एचएएल का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर एक सिंगल-इंजन प्लेटफॉर्म है। इसे खास तौर पर थल सेना और वायु सेना के लिए डिजाइन किया गया है, ताकि वह ऊंचाई वाले इलाकों, जैसे सियाचिन और पहाड़ी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर सके। यही वजह है कि एलयूएच नौसेना की क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स पर खरा नहीं उतरता। (Indian Navy UH-M Helicopter)

नौसेना सूत्रों ने साफ किया कि एलयूएच को लेकर कोई औपचारिक नेवल इवैल्यूएशन हुआ ही नहीं था। कारण साफ था कि जब प्लेटफॉर्म की बुनियादी बनावट ही नौसेना की जरूरतों से मेल नहीं खाती, तो उसके ट्रायल या मूल्यांकन का कोई मतलब नहीं बनता। (Indian Navy UH-M Helicopter)

Indian Navy UH-M Helicopter: नेवी चीफ के बयान को गलत समझा

हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा था कि एलयूएच नौसेना की जरूरतों को पूरा नहीं करता। इसी बयान को कुछ जगहों पर इस तरह पेश किया गया कि मानों नौसेना ने एलयूएच को टेस्ट करने के बाद रिजेक्ट कर दिया हो।

लेकिन नौसेना सूत्रों का कहना है कि यह बयान तकनीकी संदर्भ में था, न कि किसी औपचारिक रिजेक्शन के तौर पर। एलयूएच नौसेना की डिमांड लिस्ट में कभी रहा ही नहीं, इसलिए उसके खारिज होने की बात भी गलत है। (Indian Navy UH-M Helicopter)

चेतक हेलिकॉप्टर की जगह क्या आएगा

भारतीय नौसेना इस समय करीब 51 चेतक हेलिकॉप्टर ऑपरेट कर रही है, जिनमें से लगभग 45 अभी सर्विस कंडीशन में हैं। ये हेलिकॉप्टर कई दशक पुराने हैं और अब धीरे-धीरे अपनी टेक्निकल उम्र पूरी कर चुके हैं।

चेतक हेलिकॉप्टरों की जगह नौसेना को जिस नए प्लेटफॉर्म की जरूरत है, वह पूरी तरह मैरिटाइम ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया होना चाहिए। इसमें समुद्र में लैंडिंग, जहाज के डेक पर ऑपरेशन, साल्टी एटमोस्फियर से सुरक्षा और खराब मौसम में उड़ान जैसी क्षमताएं जरूरी हैं। (Indian Navy UH-M Helicopter)

एचएएल का नया प्लेटफॉर्म: यूएच-एम

नौसेना अब एचएएल द्वारा डेवलप किए जा रहे यूटिलिटी हेलिकॉप्टर– मरीन पर फोकस कर रही है। यह हेलिकॉप्टर खास तौर पर नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, यूएच-एम एक डिजाइन एंड डेवलपमेंट केस है, क्योंकि इसकी जरूरतें एलयूएच से बिल्कुल अलग हैं। इसमें कई ऐसे फीचर्स शामिल किए जा रहे हैं, जो नौसेना के लिए जरूरी माने जाते हैं।

यूएच-एम में ट्विन-इंजन कॉन्फिगरेशन, बेहतर लैंडिंग गियर, एंटी-कोरोजन कोटिंग, फ्लोटेशन गियर, नेवी सेंसर्स/वेपंस इंटीग्रेशन, रोटर और टेल फोल्डिंग सिस्टम और मरीन एन्वायर्नमेंट को देखते हुए खास बदलाव किए जा रहे हैं। इसका मकसद यह है कि हेलिकॉप्टर आसानी से वॉरशिप्स के हैंगर में फिट हो सके और खुले समुद्र में सुरक्षित ऑपरेशन कर सके।

Indian Navy UH-M Helicopter: क्या होंगे UH-M में फीचर

सूत्रों ने बताया कि एलयूएच इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह वॉरशिप्स, जैसे फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर और एयरक्राफ्ट कैरियर से आसानी से उड़ान भर सके और वहां सुरक्षित तरीके से लैंड कर सके। समुद्र में उड़ान जमीन की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है, इसलिए इस हेलिकॉप्टर में कई खास बदलाव किए गए हैं, जो इसे सामान्य हेलिकॉप्टरों से अलग बनाते हैं। (Indian Navy UH-M Helicopter)

यूएच-एम में दो इंजन इसलिए जरूरी हैं कि समुद्र के ऊपर उड़ान के दौरान अगर एक इंजन में दिक्कत आ जाए, तो दूसरा इंजन हेलिकॉप्टर को सुरक्षित रख सकता है। यही वजह है कि नौसेना हमेशा ट्विन-इंजन हेलिकॉप्टर को प्राथमिकता देती है।

इस हेलिकॉप्टर का रोटर और टेल फोल्ड होने वाला है। इसका मतलब यह है कि उड़ान के बाद इसे मोड़कर जहाज के छोटे हैंगर में रखा जा सकता है। वॉरशिप्स पर जगह सीमित होती है, इसलिए यह सुविधा बेहद अहम मानी जाती है। फोल्ड होने के बाद इसकी चौड़ाई काफी कम हो जाती है, जिससे इसे स्टोर करना आसान हो जाता है। (Indian Navy UH-M Helicopter)

सथ ही, यूएच-एम को समुद्री माहौल को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें एंटी-कोरोजन कोटिंग दी गई है, ताकि नमक भरी हवा और समुद्र की नमी से हेलिकॉप्टर में जंग न लगे। इसके अलावा, इसका लैंडिंग गियर भी मजबूत बनाया गया है, ताकि जहाज के हिलते-डुलते डेक पर सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके।

इस हेलिकॉप्टर में आगे की तरफ नोज-माउंटेड रडार लगाया गया है, जो समुद्र की निगरानी, टारगेट की पहचान, सर्च एंड रेस्क्यू और मौसम की जानकारी देने में मदद करेगा। यह रडार डीआरडीओ के सहयोग से डेवलप किया जा रहा है। यूएच-एम का इस्तेमाल सैनिकों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने, घायल जवानों को निकालने, खोज-बचाव अभियान और जरूरत पड़ने पर लिमिटेड कॉम्बैट रोल्स के लिए भी किया जा सकेगा। (Indian Navy UH-M Helicopter)

कब आएगा UH-M का पहला प्रोटोटाइप

नवंबर 2025 में एचएएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील कहा था कि यूएच-एम का पहला प्रोटोटाइप तैयार हो चुका है। उन्होंने बताया कि इस हेलिकॉप्टर की पहली उड़ान 2025-26 वित्तीय वर्ष में होने की योजना है। इसके बाद सर्टिफिकेशन, नौसेना के यूजर ट्रायल और कड़े परीक्षण किए जाएंगे, ताकि यह पूरी तरह ऑपरेशनल जरूरतों पर खरा उतर सके। (Indian Navy UH-M Helicopter)

एचएएल की योजना के मुताबिक, यूएच-एम की पहली डिलीवरी 2027 से शुरू हो सकती है। सभी ट्रायल्स पूरे होने और उत्पादन की रफ्तार बढ़ने के बाद 2027 से 2030 के बीच इसे बड़ी संख्या में नौसेना में शामिल किया जाएगा। भारतीय नौसेना पहले चरण में करीब 60 यूएच-एम हेलिकॉप्टर लेने की योजना बना रही है। यह खरीद बाय-इंडियन आईडीडीएम श्रेणी के तहत होगी। (Indian Navy UH-M Helicopter)

हालांकि नौसेना के पास एमएच-60आर जैसे बड़े और ताकतवर हेलिकॉप्टर भी हैं, लेकिन वे भारी और खास लड़ाकू भूमिकाओं के लिए हैं। जबकि यूएच-एमका रोल उनसे अलग होगा। यह रोजमर्रा के नौसैनिक कामों, लॉजिस्टिक सपोर्ट और तेज मिशनों में अहम भूमिका निभाएगा।

ध्रुव का मैरिटाइम वर्जन बनेगा नौसेना की रीढ़!

यूएच-एम को कई जानकार एएलएच ध्रुव का मैरिटाइम वर्जन भी मानते हैं। एचएएल पहले से ही ध्रुव हेलिकॉप्टर के अलग-अलग वेरिएंट बना चुका है और अब उसी अनुभव के आधार पर नौसेना के लिए नया प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि यूएच-एम का इस्तेमाल चेतक हेलिकॉप्टरों की जगह किया जाएगा और यह पूरी तरह मेक इन इंडिया सोच के अनुरूप होगा। इससे नौसेना को इंपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। (Indian Navy UH-M Helicopter)

Pinaka Vs PULS: इजरायली “सूर्या” के आने बाद क्या होगा पिनाका का? भारतीय सेना को क्यों चाहिए यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर?

Pinaka Vs PULS
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Pinaka Vs PULS: हाल ही में भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी ताकत को यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम के लिए पुणे की डिफेंस कंपनी निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड को करीब 292.69 करोड़ रुपये का इमरजेंसी ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत दिया गया है, इसके तहत निबे कंपनी भारतीय सेना को एक ऐसा रॉकेट लॉन्चर प्लेटफॉर्म देगी, जिसमें अलग-अलग रेंज और कैलिबर के रॉकेट्स को एक ही सिस्टम से दागा जा सकेगा। हालांकि भारत के पास पहले से ही पिनाका मल्टी बैरल लॉन्चर सिस्टम है, लेकिन उसकी रेंज सीमित है, जबकि निबे से मिलने वाले यूनिवर्सल रॉकेट लांचर की रेंज 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक होगी। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यूनिवर्सल रॉकेट लांचर सिस्टम पिनाका को रिप्लेस करेगा।

पुणे की प्राइवेट डिफेंस कंपनी निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड यह मल्टी रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इजरायल की दिग्गज रक्षा कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के साथ साझेदारी कर भारत में बनएगी। यह सिस्टम इजरायल का प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम (पीयूएलएस) है। इस साझेदारी का मकसद इजरायली तकनीक को भारत में ही डेवलप करना है, ताकि भारतीय सेना को लंबी दूरी तक सटीक मार करने वाला आधुनिक रॉकेट सिस्टम मिल सके। अगर सेना इसे अपनाती है, तो यह भारत का पहला यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS: निबे और एल्बिट का समझौता

निबे डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड ने जुलाई 2025 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में बताया था कि उसने एल्बिट सिस्टम्स के साथ एक अहम समझौता किया है। इस समझौते के तहत पीयूएलएस (PULS) सिस्टम को भारत में बनाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर इसे भारतीय सेना को सप्लाई किया जाएगा।

इस डील की सबसे खास बात यह है कि इसमें ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) भी शामिल है। यानी सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि तकनीक भी भारत को मिलेगी। इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारत को भविष्य में आर्टिलरी सिस्टम का निर्यातक देश बनाने की दिशा में यह एक मजबूत कदम माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)

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रखा जा सकता है “सूर्या” नाम

रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारत में बनने वाले इस यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को “सूर्या” नाम दिया जा सकता है। यह सिस्टम 300 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद टारगेट को बेहद अचूक तरीके से निशाना बना सकता है।

निबे लिमिटेड ने पहले अपने बयान में कहा था कि यह यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर मॉडर्न वॉरफेयर की तस्वीर बदल सकता है और इससे कंपनी ग्लोबल डिफेंस मार्केट में एक अहम खिलाड़ी बन सकती है।

इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत निबे लिमिटेड भारतीय सेना को यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, उससे जुड़े लॉन्चर, ग्राउंड इक्विपमेंट, एक्सेसरीज, एडवांस्ड प्रोजेक्टाइल्स और एम्युनिशन की सप्लाई करेगी। पूरी डिलीवरी 12 महीनों कई स्टेजेज में पूरी की जाएगी। (Pinaka Vs PULS)

क्या है यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम

यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम दरअसल एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो अलग-अलग कैलिबर और अलग-अलग रेंज के रॉकेट्स और मिसाइलों को एक ही लॉन्चर से दाग सकता है। यही वजह है कि इसे यूनिवर्सल कहा जाता है। अभी तक सेना के पास मौजूद पिनाका में यह खूबी मौजूद नहीं है।

पीयूएलएस सिस्टम से 122 एमएम, 160 एमएम और 306 एमएम जैसे रॉकेट फायर किए जा सकते हैं। इसके अलावा 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों को भी इसमें इंटीग्रेट किया जा सकता है। इससे सेना को हर दूरी के लिए अलग-अलग लॉन्चर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रॉकेट पॉड्स की संख्या और कॉन्फिगरेशन इस बात पर निर्भर करेगी कि किस तरह का रॉकेट इस्तेमाल किया जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)

PULS हर इलाके के लिए तैयार

यह लॉन्चर सिस्टम 6×6 या 8×8 व्हील्ड व्हीकल चैसिस पर लगाया जा सकता है। इससे इसे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों और मैदानी इलाकों में आसानी से तैनात किया जा सकता है।

भारतीय सेना के लिए यह खास तौर पर इसलिए अहम है, क्योंकि उसे अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं। लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान और पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों तक, हर जगह यह सिस्टम इस्तेमाल किया जा सकेगा। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS: “शूट एंड स्कूट” क्षमता का क्या है फायदा

मॉडर्न वॉरफेयर में सबसे जरूरी है “शूट एंड स्कूट”। यानी फायर करने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल लेना, ताकि दुश्मन की काउंटर फायर से बचा जा सके। यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इसीलिए डिजाइन किया गया है। फायरिंग के बाद यह सिस्टम तुरंत मूव कर सकता है। लॉन्चर के पीछे एक रिमोटली कंट्रोल्ड और पावर्ड यूनिट लगी होती है। ऑटोमेटेड रीलोडिंग सिस्टम की मदद से यह लॉन्चर एक मिनट से भी कम समय में अपना मिशन पूरा कर सकता है। यह सिस्टम आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क से भी जुड़ सकता है और ड्रोन, रडार या फॉरवर्ड ऑब्जर्वर से सीधे टारगेटिंग डेटा ले सकता है। इसमें जीपीएस आधारित नेविगेशन सिस्टम है, जिससे गाइडेड रॉकेट्स की सटीकता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। यही वजह है कि इसे आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए बेहद उपयुक्त माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)

PULS
Pinaka MBRL

Pinaka Vs PULS: पिनाका है भारत का भरोसेमंद रॉकेट सिस्टम

भारत फिलहाल अपने स्वदेशी पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पर भरोसा करता है। पिनाका का नाम भगवान शिव के धनुष पर रखा गया है और इस सिस्टम ने 1999 के करगिल युद्ध में पहली बार अपनी ताकत दिखाई थी। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की चौकियों को तब पिनाका ने भारी नुकसान पहुंचाया था।

एक पिनाका लॉन्चर 44 सेकंड में 12 रॉकेट दाग सकता है, जबकि एक पूरी बैटरी 72 रॉकेट फायर कर सकती है। पिनाका एमके-1 की रेंज करीब 37.5 किलोमीटर है, जबकि पिनाका एमके-2 की रेंज 60 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके अलावा पिनाका एक्सटेंडेड रेंज वर्जन 60 से 90 किलोमीटर तक मार कर सकता है। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS

हालांकि पिनाका एक मजबूत और भरोसेमंद सिस्टम है, लेकिन इसमें यूनिवर्सल लॉन्च क्षमता नहीं है। पिनाका मुख्य रूप से एरिया बॉम्बार्डमेंट के लिए डिजाइन किया गया है, यानी यह बड़े इलाके में एक साथ भारी मात्रा में रॉकेट गिरा कर उसे तबाह कर सकता है।

वहीं पीयूएलएस एक मल्टी-कैलिबर और मल्टी-रेंज सिस्टम है, जो अचूक हमलों के लिए बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी 300 किलोमीटर तक की मारक दूरी और अलग-अलग तरह के हथियार दागने की क्षमता है। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS: क्या पिनाका को मिलेगी चुनौती?

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पिनाका का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सप्लीमेंट बनेगा। पिनाका अभी भी सेना की रॉकेट आर्टिलरी का अहम हिस्सा रहेगा, खास तौर पर मध्यम दूरी और एरिया फायर के लिए।

वहीं यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम लंबी दूरी और प्रिसिजन स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस तरह सेना के पास एक लेयर्ड आर्टिलरी कैपेबिलिटी होगी, जिसमें अलग-अलग रेंज और रोल के सिस्टम शामिल होंगे। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS: पीयूएलएस को कई देशों ने चुना

एल्बिट सिस्टम्स का पीयूएलएस सिस्टम दुनिया के कई देशों का ध्यान खींच चुका है। नीदरलैंड और जर्मनी जैसे देशों ने भी इसे चुना है, क्योंकि यह अमेरिकी हिमार्स सिस्टम की तुलना में जल्दी उपलब्ध हुआ और लागत के लिहाज से भी ज्यादा किफायती साबित हुआ।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पीयूएलएस भविष्य में और ज्यादा एडवांस मिसाइलों के साथ भी काम कर सकता है। यही वजह है कि इसे भविष्य के लिए तैयार प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। (Pinaka Vs PULS)

Pinaka Vs PULS: भारतीय सेना को क्या होगा फायदा

पीयूएलएस या सूर्या सिस्टम के आने से भारतीय सेना की लंबी दूरी की मारक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही सेना के लिए यह सिस्टम बेहद अहम माना जा रहा है। 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट और मिसाइलें सेना को दुश्मन के इलाके में गहराई तक मौजूद ठिकानों पर हमला करने का मौका देंगी। इससे सेना की रणनीतिक पकड़ और मजबूत होगी।जब अगले एक साल में यह सिस्टम पूरी तरह सेना में शामिल हो जाएगा, तो भारतीय सेना की फायर पावर और ऑपरेशनल तैयारी में इसका असर साफ तौर पर देखा जा सकेगा। (Pinaka Vs PULS)

रूस ने शाहेद ड्रोन पर लगा दी यह घातक मिसाइल, इस नए इनोवेशन से उड़ गए यूक्रेन के होश

Russia Shahed Drone MANPADS
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters

Russia Shahed drone MANPADS: रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरू हुए 3 साल 10 महीने हो चुके हैं। लेकिन जंग है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वहीं जंग में ड्रोन सबसे अहम हथियार बन चुके हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया की सैन्य सोच को ही बदल दिया है। लंबे समय से चल रही ड्रोन वॉर में रोजाना नए नए इनोवेशन भी देखने को मिल रहे हैं। जंग में एक नया और खतरनाक इनोवेशन देखने को मिला है। पहली बार यह पुष्टि हुई है कि रूस ने अपने ड्रोन को मैनपैड्स से लैस किया है। जिसके बाद ये ड्रोन अब और घातक हो गया है।

पहली बार यह पुष्टि हुई है कि रूस ने अपने शाहेद कामिकाजे ड्रोन को मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) से लैस कर दिया है। वहीं अब ये ड्रोन केवल जमीन पर नहीं, बल्कि हवा में उड़ रहे हेलीकॉप्टर और लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट के लिए भी खतरा बन सकते हैं। यूक्रेनी रेडियो टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट सेरही ब्रेस्ट्रेनोव ने इस नई तकनीक की पहचान की। यह ऐसा पहला मामला है, जब किसी शाहेद ड्रोन पर इग्ला या वर्बा जैसे मैनपैड्स जैसे मिसाइल सिस्टम को लगाया गया है। (Russia Shahed drone MANPADS)

Russia Shahed drone MANPADS: क्या है शाहेद ड्रोन और क्यों है खतरनाक?

शाहेद-136 ड्रोन मूल रूप से ईरान का बनाया एक वन-वे अटैक ड्रोन है, जिसे रूस बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। रूस ने इन्हें गेरान-2 नाम दिया है। इन ड्रोन की खूबी यह है कि ये सस्ते होते हैं, लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और सीधे टारगेट से टकराकर ब्लास्ट करते हैं।

अब तक इनका इस्तेमाल यूक्रेन के बिजली घरों, शहरों, सैन्य ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के लिए होता रहा है। लेकिन अब इस ड्रोन को रूस ने केवल “उड़ता हुआ बम” न रखकर, एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। (Russia Shahed drone MANPADS)

Russia Shahed drone MANPADS: कैसे किया अपग्रेड

इस अपग्रेडेड शाहेद ड्रोन में एक कैमरा और रेडियो मॉडेम लगाया गया था। यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोमैटिक नहीं था, बल्कि इसे रिमोट तरीके से कंट्रोल किया जा रहा था। मिसाइल को ड्रोन ऑपरेटर रिमोट से लॉन्च कर सकता है। यह ऑपरेटर रूसी इलाके से ड्रोन को कंट्रोल करता है। कैमरे से मिलने वाली लाइव वीडियो फीड के जरिए वह यह तय करता है कि कब और किस दिशा में मिसाइल दागनी है।

Russia Shahed Drone MANPADS
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters

रूस ने समय-समय पर शाहेद ड्रोन में कई छोटे-छोटे बदलाव किए हैं। इनमें नए गाइडेंस सिस्टम, बेहतर कम्युनिकेशन लिंक और इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स शामिल हैं। इन बदलावों का मकसद यूक्रेनी एयर डिफेंस को चकमा देना और ड्रोन को ज्यादा असरदार बनाना रहा है। (Russia Shahed drone MANPADS)

Russia Shahed drone MANPADS: क्या है ड्रोन पर लगा मैनपैड्स?

MANPADS यानी मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम एक ऐसा मिसाइल सिस्टम होता है, जिसे आमतौर पर एक सैनिक कंधे पर रखकर हेलीकॉप्टर या लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट पर दागता है। रूस के पास दो तरह के मैनपैड्स सिस्टम हैं, इनमें 9के38 इग्ला और 9के333 वर्बा (इग्ला का एडवांस वर्जन) है।

मैनपैड्स सिस्टम आमतौर पर इन्फैंट्री के लिए बनाए जाते हैं। इग्ला और वर्बा जैसी मिसाइलें इंफ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती हैं, यानी ये टारगेट की गर्मी को पकड़कर उसे ट्रैक करती हैं। इनकी मारक दूरी करीब 5 से 6 किलोमीटर तक होती है और ये हेलीकॉप्टर या कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमानों के लिए खतरनाक मानी जाती हैं। इन्हें ड्रोन पर लगाना तकनीकी रूप से आसान नहीं होता, लेकिन अब पहली बार इन्हीं मिसाइलों को एक ड्रोन के ऊपर फिट किया गया है। रूस ने यह प्रयोग करके यह दिखा दिया है कि वह नए-नए तरीकों से यूक्रेन के डिफेंस सिस्टम को चुनौती देना चाहता है। (Russia Shahed drone MANPADS)

Russia Shahed Drone MANPADS
Russia Arms Shahed Drones With MANPADS, Creating New Threat for Ukrainian Helicopters

ये मिसाइलें इन्फ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती हैं, यानी ये हेलीकॉप्टर या विमान की गर्मी को पकड़कर लक्ष्य तक पहुंचती हैं। आमतौर पर इनकी मारक दूरी 5 से 6 किलोमीटर तक होती है।

इस नए सेटअप का मुख्य मकसद यूक्रेनी हेलीकॉप्टरों और विमानों को डराना और उनके इंटरसेप्शन मिशन को मुश्किल बनाना है। अब तक यूक्रेनी फोर्सेस शाहेद ड्रोन को खासकर रात के समय जमीन से एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और फाइटर जेट या हेलीकॉप्टरों की मदद से गिराती रही हैं। (Russia Shahed drone MANPADS)

Russia Shahed drone MANPADS: यूक्रेन ने जारी की चेतावनी

यूक्रेन ने इस नए खतरे को लेकर यूक्रेनी आर्मी एविएशन के पायलटों को सीधे तौर पर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि शाहेद ड्रोन के सामने से सीधे उड़ान भरते हुए उसे इंटरसेप्ट करने की कोशिश अब ज्यादा खतरनाक हो सकती है। खास तौर पर उन हेलीकॉप्टरों और लो-फ्लाइंग एयरक्राफ्ट के लिए जोखिम बढ़ गया है, जो इन ड्रोन को गिराने का काम करते हैं। वहीं, इसे देखते हुए यूक्रेन अपने इंटरसेप्शन तरीकों में भी बदलाव कर रहा है। (Russia Shahed drone MANPADS)

कोई बड़ा “गेम-चेंजर” नहीं

हालांकि, कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यह फिलहाल कोई बड़ा “गेम-चेंजर” नहीं है। शाहेद ड्रोन की स्पीड (150-200 किमी/घंटा) कम होती है, उसकी मैन्युवर करने की क्षमता सीमित है और मिसाइल को सही समय पर टारगेट पर लॉक कराना आसान नहीं होता। हेलीकॉप्टर फ्लेयर्स छोड़कर, दिशा बदलकर या जमीन की आड़ लेकर ऐसे हमलों से बच सकते हैं। यह आर-60 एयर-टू-एयर मिसाइल के पिछले प्रयोगों का ही नया रूप है।

Russia Shahed drone MANPADS: लागत है बेहद ज्यादा

इसके अलावा, लागत भी अहम है। एक साधारण शाहेद ड्रोन की कीमत अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जबकि इग्ला या वर्बा मिसाइल उससे कहीं ज्यादा महंगी होती है। एक शाहेद की कीमत लगभग 20 हजार डॉलर होती है, जबकि एक इग्ला की कीमत 80 हजार डॉलर के लगभग पड़ती है, जो रूस के लिए महंगा सौदा है, क्योंकि रूस रोजाना 100 से ज्यादा ड्रोन्स लॉन्च करता है।

यूक्रेनी सेना की अनमैन्ड सिस्टम फोर्सेस ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे ही एक अपग्रेडेड शाहेद ड्रोन को इंटरसेप्ट कर गिरा दिया है। बताया गया है कि 412वीं नेमेसिस ब्रिगेड के डार्कनोड बटालियन ने इस ड्रोन को गिराया था। ड्रोन को गिराने के बाद उसके मलबे में मैनपैड्स सिस्टम और उससे जुड़े अतिरिक्त उपकरण पाए गए थे। (Russia Shahed drone MANPADS)

नेबरहुड फर्स्ट से वेस्ट एशिया तक; सेना प्रमुख देंगे रक्षा सहयोग को नई धार, इस देश से आकाश सिस्टम को लेकर हो सकती है चर्चा

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 5 से 8 जनवरी 2026 तक संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत अपने मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग, सैन्य संपर्क और रणनीतिक समझ को और मजबूत करने पर लगातार काम कर रहा है।

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit: 5 और 6 जनवरी को यूएई में सेना प्रमुख

पीआईबी की तरफ से जारी प्रेस सूचना के मुताबिक सेना प्रमुख की यात्रा की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात से होगी, जहां वे 5 और 6 जनवरी को विभिन्न सैन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। यूएई पहुंचने पर उन्हें वहां की लैंड फोर्सेज की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद वे यूएई सिक्योरिटी फॉर्सेस के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे और सेना के स्ट्रक्चर, भूमिका और क्षमताओं पर विस्तार से चर्चा होगी।

यूएई दौरे के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी कई अहम सैन्य ठिकानों का दौरा करेंगे और अधिकारियों व जवानों से बातचीत करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इन मुलाकातों का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच भरोसे और समझ को और मजबूत करना है। भारत और यूएई के बीच पहले से ही संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग के कई कार्यक्रम चल रहे हैं। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit: यूएई के साथ डेजर्ट साइक्लोन एक्सरसाइज

हाल ही में भारत और यूएई के बीच मिलिट्री एक्सरसाइज डेजर्ट साइक्लोन का दूसरा संस्करण भी खत्म हुआ है, जो 18 से 30 दिसंबर 2025 तक अबू धाबी के अल-हमरा ट्रेनिंग सिटी में हुआ था। इसमें भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट से 45 जवान और यूएई की ओर से 53 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री बटालियन ने हिस्सा लिया था। इस एक्सरसाइज में दोनों सेनाओं ने बिल्डिंग क्लियरिंग, हेलीबॉर्न ऑपरेशंस, आईईडी अवेयरनेस, कैजुअल्टी इवैक्यूएशन, ड्रोन/काउंटर-ड्रोन टेक्नीक्स, जॉइंट असॉल्ट आदि का अभ्यास किया गया था। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

आकाश एयर डिफेंस पर हो सकती है चर्चा

वहीं, इस यात्रा के दौरान भारत के स्वदेशी डिफेंस इक्विपमेंट्स और सिस्टम्स में यूएई की बढ़ती रुचि पर भी चर्चा होने की संभावना है। खास तौर पर आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम को लेकर बीते एक साल से दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। अप्रैल 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भारत ने यूएई को आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम ऑफर किया था, जिसके बाद यूएई ने इसमें रुचि दिखाते हुए जुलाई 2025 में एलओआर यानी लेटर ऑफ रिक्वेस्ट जारी किया था। बता दें कि डिफेंस प्रोक्योरमेंट में एलओआर एक आधिकारिक दस्तावेज होता है, जिसे कोई देश दूसरे देश की सरकार को तब भेजता है, जब वह किसी रक्षा उपकरण, हथियार सिस्टम या मिलिट्री टेक्नोलॉजी को खरीदने में गंभीर रुचि दिखाता है। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

दरअसल इस समय यूएई हूती रिबेल्स से मिल रहे ड्रोन और मिसाइल खतरों से परेशान है। यूएई ड्रोन और मिसाइल खतरों से निपटने के लिए अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को मजबूत करना चाहता है। ऐसे में आकाश सिस्टम को एक भरोसेमंद और किफायती विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। वहीं आकाश सिस्टम ने जिस तरह से ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराया था, इससे यूएई का भरोसा बढ़ा है। माना जा रहा है कि सेना प्रमुख की इस यात्रा के दौरान आकाश पर चर्चा हो सकती है।

आकाश एयर डिफेंस सिस्टम भारत का स्वदेशी मध्यम दूरी का सतह-से-हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है, जो फाइटर एयरक्राफ्ट, हेलिकॉप्टर, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे खतरों को मार गिराने में सक्षम है। भारतीय सेना और वायुसेना में यह सिस्टम पहले से तैनात है। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

यूएई दौरे का एक अहम कार्यक्रम यूएई नेशनल डिफेंस कॉलेज की यात्रा है। यहां जनरल उपेंद्र द्विवेदी कॉलेज के अधिकारियों को संबोधित करेंगे। इस दौरान सैन्य रणनीति, आधुनिक युद्ध की चुनौतियों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर विचार साझा किए जाएंगे। यह कार्यक्रम दोनों देशों के बीच सैन्य शिक्षा और सोच के आदान-प्रदान को आगे बढ़ाने का प्रयास है।

बता दें कि यूएई लैंड फोर्सेस के कमांडर मेजर जनरल यूसुफ मायूफ सईद अल हल्लामी का भारत दौरा इसी कड़ी का हिस्सा था। वे 27 और 28 अक्टूबर तक दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर भारत आए थे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग, सैन्य संवाद और आपसी समझ को आगे बढ़ाना था। दौरे के दौरान यूएई लैंड फोर्सेस के कमांडर को भारतीय सेना की ओर से ऑपरेशन सिंदूर पर विस्तृत ब्रीफिंग भी दी गई थी। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit: 7 और 8 जनवरी को श्रीलंका दौरे पर

यूएई यात्रा के बाद सेना प्रमुख 7 और 8 जनवरी को श्रीलंका का दौरा करेंगे। श्रीलंका पहुंचने पर उन्हें श्रीलंका सेना की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद वे श्रीलंका की सीनियर मिलिट्री और सिविल लीडरशिप से मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में श्रीलंका सेना के कमांडर, रक्षा उप मंत्री और रक्षा सचिव शामिल होंगे। इन बैठकों में श्रीलंका सेना के कमांडर, रक्षा उप मंत्री और रक्षा सचिव शामिल होंगे। बातचीत के दौरान प्रशिक्षण सहयोग, क्षमता निर्माण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

Army Chief UAE-Sri Lanka Visit: आईपीकेएफ वॉर मेमोरियल जाएंगे चीफ

अपने श्रीलंका दौरे के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी डिफेंस सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज में अधिकारियों को संबोधित करेंगे। इसके अलावा वे बुट्टाला स्थित आर्मी वॉर कॉलेज भी जाएंगे, जहां वे ट्रेनी अफसरों और जवानों से बातचीत करेंगे। इसके अलावा सेना प्रमुख श्रीलंका में इंडियन पीस कीपिंग फोर्स के शहीद जवानों की याद में बने आईपीकेएफ वॉर मेमोरियल पर भी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से डिफेंस ट्रेनिंग और मिलिट्री एजुकेशन को लेकर सहयोग जारी है। जहां श्रीलंका के कैडेट्स यहां एनडीए, आईएमए और ओटीए में ट्रेनिंग करते हैं। श्रीलंकाई आर्मी के कैडेट्स यहां प्री-कमीशनिंग ट्रेनिंग करते हैं।

खुद श्रीलंका सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल लसांथा रोद्रिगो खुद आईएमए के पूर्व कैडेट रहे हैं और 1990 में कमीशन हुए थे। वहीं पिछले साल वे पासिंग आउट परेड में रिव्यूइंग ऑफिसर भी बने थे। बता दें कि श्रीलंका सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बीकेजीएम लसांथा रोद्रिगो पिछले साल 11 से 14 जून तक भारत दौरे पर रहे थे। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

पिछले साल हुई थी एक्सरसाइज मित्र शक्ति

पिछले साल 10 से 23 नवंबर 2025 तक कर्नाटक के बेलगावी स्थित फॉरेन ट्रेनिंग नोड में भारत और श्रीलंका की सेनाओं के बीच मित्र शक्ति एक्सरसाइज हुई थी। यह इस अभ्यास का 11वां संस्करण था। इस संस्करण में भारतीय सेना की ओर से करीब 170 जवान शामिल हुए, जिनमें मुख्य रूप से राजपूत रेजिमेंट के सैनिक थे, जबकि भारतीय वायुसेना के 20 पर्सनल भी अभ्यास का हिस्सा बने। वहीं श्रीलंका की ओर से गजबा रेजिमेंट के 135 जवान और श्रीलंका एयर फोर्स के 10 पर्सनल ने इसमें भाग लिया। यह भारत और श्रीलंका की थल सेनाओं के बीच होने वाली प्रमुख द्विपक्षीय आर्मी एक्सरसाइज है, जो साल 2012 से लगातार हो रही है। इसका मकसद दोनों सेनाओं के बीच आपसी समझ बढ़ाना और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की साझा तैयारी को मजबूत करना है। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

मित्र शक्ति अभ्यास का फोकस काउंटर टेररिज्म, सब-कन्वेंशनल ऑपरेशंस, संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग मिशन, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन ऑपरेशंस, और हेलीकॉप्टर ऑपरेशंस जैसे अहम क्षेत्रों पर रहता है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह यात्रा भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति व स्थिरता बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। भारत लगातार मित्र देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

यूएई और श्रीलंका दोनों ही भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम हैं। यूएई पश्चिम एशिया में भारत का बड़ा रक्षा और रणनीतिक साझेदार है, जबकि श्रीलंका हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सुरक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इन दोनों देशों के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जाता है। (Army Chief UAE-Sri Lanka Visit)

खालिदा जिया के निधन के बाद भारत ने कैसे साधा बांग्लादेश, बदली ढाका की सियासत

India Bangladesh Relations

India Bangladesh Relations: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की चेयरपर्सन बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद भारत सरकार ने जिस तेजी के साथ कदम उठाए, उन्हें भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। भारत सरकार के उठाए कदमों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में खास संदेश दिया है। भारत ने शोक व्यक्त करने के साथ-साथ ऐसे कदम उठाए, जिनसे यह साफ हुआ कि नए हालात में भारत बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को सक्रिय और व्यापक तरीके से आगे बढ़ाना चाहता है।

India Bangladesh Relations: पीएम मोदी ने खालिदा जिया को किया याद

खालिदा जिया का निधन 30 दिसंबर 2025 को ढाका में लंबी बीमारी के बाद हुआ। उनके निधन की खबर सामने आते ही भारत की ओर से आधिकारिक स्तर पर प्रतिक्रिया दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शोक संदेश जारी किया और बांग्लादेश के लोगों तथा खालिदा जिया के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में खालिदा जिया को बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बताते हुए उनके योगदान को याद किया। (India Bangladesh Relations)

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में यह भी कहा कि 2015 में ढाका यात्रा के दौरान उनकी खालिदा जिया से मुलाकात हुई थी और उस बातचीत को वे याद करते हैं। उन्होंने खालिदा जिया को बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बताते हुए उनके योगदान को याद किया और भारत-बांग्लादेश संबंधों में उनकी भूमिका का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में यह भी कहा कि खालिदा जिया की सोच और विरासत दोनों देशों के रिश्तों को दिशा देती रहेंगी।

India Bangladesh Relations: सीनियर मंत्री गए ढाका

वहीं, खालिदा जिया के निधन के बाद भारत सरकार ने यह तय किया कि अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व उच्च स्तर पर किया जाएगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर को ढाका भेजा गया। विदेश मंत्रालय की ओर से बताया गया कि जयशंकर भारत सरकार और भारत की जनता की ओर से शोक संदेश लेकर ढाका पहुंचे। (India Bangladesh Relations)

India Bangladesh Relations: जयशंकर की तारिक रहमान से मुलाकात

विदेश मंत्री एस. जयशंकर 31 दिसंबर 2025 को ढाका पहुंचे और खालिदा जिया के जनाजे में भारत सरकार और भारत की जनता का प्रतिनिधित्व किया। यह दौरा ऐसे समय में हुआ, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव की खबरें लगातार सामने आ रही थीं।

ढाका में जयशंकर ने बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष और खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान जयशंकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत शोक पत्र तारिक रहमान को सौंपा। पत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने खालिदा जिया के साथ 2015 में ढाका में हुई अपनी मुलाकात को याद किया और उन्हें दृढ़ संकल्प वाली नेता बताया।

विदेश मंत्री ने इस मुलाकात में यह भी कहा कि भारत को भरोसा है कि खालिदा जिया के विचार और मूल्य भारत-बांग्लादेश संबंधों को आगे बढ़ाने में मार्गदर्शक बने रहेंगे। भारत सरकार की ओर से यह बात स्पष्ट रूप से रखी गई कि भारत बांग्लादेश के साथ भविष्य में भी साझेदारी को मजबूत करना चाहता है।

जयशंकर ने ढाका यात्रा के दौरान बांग्लादेश के विदेश मामलों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों से भी संक्षिप्त मुलाकात की। इनमें बांग्लादेश के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शामिल थे। इन बैठकों में द्विपक्षीय रिश्तों को साझा हितों, व्यावहारिकता और आपसी निर्भरता के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही गई।

खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के दौरान जयशंकर की मुलाकात अन्य देशों के प्रतिनिधियों से भी हुई। इस दौरान पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर से उनका औपचारिक अभिवादन भी हुआ। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कार्यालय ने इस मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, हालांकि भारत सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि इसे किसी विशेष राजनीतिक संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। (India Bangladesh Relations)

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहुंचे बांग्लादेश हाई कमीशन

उधर, नई दिल्ली में भी भारत सरकार की ओर से शोक प्रकट करने के कदम उठाए गए। भारत सरकार की प्रतिक्रिया केवल विदेश मंत्रालय तक सीमित नहीं रही। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह दिल्ली स्थित बांग्लादेश उच्चायोग पहुंचे और वहां शोक पुस्तिका में हस्ताक्षर कर संवेदना व्यक्त की। रक्षा मंत्री ने खालिदा जिया के निधन पर दुख जताते हुए बांग्लादेश के लोगों के प्रति सहानुभूति जताई।

भारत सरकार के इन कदमों को केवल औपचारिक शोक नहीं माना गया, बल्कि इसे बांग्लादेश के प्रति भारत के व्यापक रुख के रूप में देखा गया। खास तौर पर ऐसे समय में, जब बांग्लादेश में राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं और वहां फरवरी 2026 में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। (India Bangladesh Relations)

बांग्लादेश की राजनीति में बीएनपी बन रही ताकत

मौजूदा समय में बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखा गया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इस समय भारत में रह रही हैं। उनकी पार्टी अवामी लीग पर देश में राजनीतिक प्रतिबंध लगाए गए हैं और वह आगामी चुनावों में हिस्सा नहीं ले पा रही है। ऐसे में बांग्लादेश की राजनीति में बीएनपी एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रही है।

खालिदा जिया के निधन के बाद उनके पुत्र तारिक रहमान की भूमिका और अधिक अहम हो गई है। बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे। तारिक रहमान ने अपने शुरुआती बयानों और सार्वजनिक गतिविधियों में जिस तरह की भाषा और तेवर अपनाए हैं, उसे राजनीतिक हलकों में “सॉफ्ट नीति” के तौर पर देखा जा रहा है। (India Bangladesh Relations)

India Bangladesh Relations: तारीक ने भी दिए सकारात्मक संकेत

बांग्लादेश की धरती पर कदम रखते ही तारीक ने जिस तरह के संकेत दिए उसे बंग्लादेश की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। जैसे ही तारिक रहमान ढाका के हजरत शाहजलाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे, उन्होंने एक भावुक और सिंबॉलिक जेस्चर किया। उन्होंने अपने जूते उतारे और बांग्लादेश की मिट्टी को हाथ में उठाया।

रहमान ने ढाका में एक बड़ी रैली में अपनी पहली स्पीच में उन्होंने अमेरिकी नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर का जिक्र किया, जिन्होंने 1963 में कहा था “आई हैव ए ड्रीम”। तारिक ने कहा, “आज मैं कहना चाहता हूं कि मेरे पास मेरे देश के लिए एक योजना है… एक सुरक्षित राज्य जिसकी लोगों ने लंबे समय से उम्मीद की है।” इस भाषण में उन्होंने बांग्लादेश के भविष्य पर विस्तार से बात की और शांति और सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने तीन बार दोहराया, “हम देश में शांति चाहते हैं।” साथ ही कहा, “शांति और सुरक्षा हर व्यक्ति के लिए सुनिश्चित की जानी चाहिए, हर उम्र, पेशे और विश्वास के लोगों के लिए।” (India Bangladesh Relations)

उन्होंने हिंसा या उकसावे को अस्वीकार करने की अपील की, चाहे वह किसी भी राजनीतिक या धार्मिक पहचान से हो। तारीक ने कहा, “यह देश पहाड़ों और मैदानों में रहने वाले लोगों का है, मुसलमानों, बौद्धों, ईसाइयों और हिंदुओं का है।” उन्होंने कहा कि देश में हर महिला, पुरुष या बच्चा सुरक्षित रूप से घर से निकल सके और वापस लौट सके। उन्होंने लोगों की आवाज और लोकतांत्रिक अधिकारों को वापस लाने की बात की। और सभी से सहयोग की अपील करते हुए कहा, “यदि इस योजना और इन कार्यों को लागू करना है, तो मुझे यहां मौजूद हर व्यक्ति के सहयोग की आवश्यकता होगी, और पूरे बांग्लादेश में लोकतांत्रिक ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों की। यदि आप हमारे साथ खड़े होंगे और हमें समर्थन देंगे, तो हम इस योजना को लागू कर सकेंगे।” (India Bangladesh Relations)

India Bangladesh Relations: नहीं की भारत विरोधी बात

वहीं खास बात यह थी कि उन्होंने अपने इस भाषण के दौरान एक बार भी भारत विरोधी बात नहीं कही। सूत्रों का कहना है कि तारीक का भाषण पूरी तरह बांग्लादेश के आंतरिक मुद्दों पर केंद्रित था, जिसमें शांति, सुरक्षा, सभी धर्मों (मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध, ईसाई) की एकता शामिल थे। तारीक ने भारत या विदेश नीति का जिक्र न करके खुद को समावेशी, शांतिप्रिय और विकास-केंद्रित नेता के रूप में पेश किया। यह बीएनपी की पुरानी इमेज (2001-2006 के जमाने में भारत-विरोधी मानी जाने वाली) से दूरी बनाने का कोशिश है। सूत्रों का कहना है कि मां खालिदा जिया की मौत के बाद यह फरवरी में होने वाले चुनाव से पहले सहानुभूति और वोट बैंक बढ़ाने की रणनीति है। (India Bangladesh Relations)

सूत्रों के मुतााबिक, तारीक भाषण में भारत-विरोध की बात न कहकर वे भारत को आश्वासन दे रहे हैं कि बीएनपी के सत्ता में आने पर पुराने तनाव नहीं दोहराएगी। वहीं, भारत ने भी इसका जवाब दिया, जो जयशंकर के दौरे के दौरान पीएम मोदी का पत्र देना, यह दोनों तरफ से रिश्ते सुधारने की कोशिश दिखाता है। इसके अलावा भारत-विरोधी जमात-ए-इस्लामी से दूरी बनाकर तारिक खुद को ज्यादा उदारवादी भी दिखा रहे हैं। (India Bangladesh Relations)

सूत्रों यह भी कहते हैं कि तारिक रहमान जानबूझकर भारत-विरोधी नैरेटिव से दूर रह रहे हैं, ताकि बीएनपी को सत्ता के लिए ज्यादा स्वीकार्य बनाया जा सके। अगर वे सत्ता में आते हैं, तो रिश्ते “ट्रांजेक्शनल” हो सकते हैं जो न तो बहुत करीबी, न ही विरोधी। वहीं, भारत के लिए यह राहत की बात है, क्योंकि जमात जैसी ताकतों से ज्यादा खतरा बड़ा खतरा था। सूत्र हादी की हत्या को राजनीति में तारीक की सेफ एंट्री से भी जोड़ रहे हैं। (India Bangladesh Relations)

लोकतांत्रिक ताकतों के साथ खड़ी है नई दिल्ली

भारत सरकार की ओर से तारिक रहमान से सीधे संपर्क को यह संकेत माना गया कि भारत बांग्लादेश में सभी लोकतांत्रिक ताकतों के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है। भारत की यह नीति रही है कि वह पड़ोसी देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और स्थिरता का समर्थन करे। भारत ने पहले भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह बांग्लादेश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है। (India Bangladesh Relations)

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बीते वर्षों में कई स्तरों पर विकसित हुए हैं। व्यापार, ऊर्जा, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लगातार संवाद बना रहा है। हालांकि, हाल के महीनों में अल्पसंख्यकों पर हमलों और राजनीतिक अस्थिरता को लेकर भारत ने अपनी चिंताएं भी व्यक्त की हैं।

भारत के पूर्व राजनयिकों और नीति विशेषज्ञों ने भी इन घटनाओं पर अपनी राय रखी है। पूर्व उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा कि खालिदा जिया के कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में कई बार तनाव देखने को मिला था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उस दौर में भारत को उत्तर-पूर्वी राज्यों में सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। (India Bangladesh Relations)

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसके बावजूद भारत ने हमेशा बांग्लादेश के साथ संवाद बनाए रखा और खालिदा जिया को भारत आने का निमंत्रण भी दिया गया था। उनके अनुसार, भारत अब फरवरी 2026 के चुनावों के बाद बनने वाली लोकतांत्रिक सरकार के साथ रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन करेगा।

पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि खालिदा जिया के अंतिम वर्षों में भारत के साथ संवाद में धीरे-धीरे बदलाव देखा गया था। उनकी 2015 की भारत-बांग्लादेश बातचीत को इसका उदाहरण माना जाता है।

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्राह्मा चेल्लानी का कहना है कि भारत इस समय बांग्लादेश से जुड़े दूसरे मुद्दों की तुलना में क्षेत्रीय स्थिरता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है। उनके मुताबिक, खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री का ढाका जाना इसी सोच को साफ दिखाता है।

उन्होंने कहा कि बीएनपी नेतृत्व से सीधे संपर्क करके भारत यह संकेत दे रहा है कि वह बांग्लादेश की राजनीति में मौजूद अलग-अलग लोकतांत्रिक ताकतों के साथ काम करने के लिए तैयार है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बांग्लादेश में हालात और ज्यादा बिगड़ें नहीं और वहां धार्मिक कट्टरपंथी हिंसा को बढ़ने से रोका जा सके। (India Bangladesh Relations)

India Bangladesh Relations: क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता

भारत सरकार के सूत्रों के अनुसार, खालिदा जिया के निधन के बाद उठाए गए कदम यह दिखाते हैं कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है। भारत की नीति यह रही है कि बांग्लादेश में किसी भी तरह की अस्थिरता या कट्टरपंथी प्रभाव क्षेत्रीय शांति के लिए चुनौती बन सकता है।

इन सभी घटनाओं के बीच यह भी साफ है कि भारत बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों को किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रखना चाहता। भारत की कोशिश है कि वह बांग्लादेश की जनता, राजनीतिक दलों और संस्थाओं के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाए रखे। (India Bangladesh Relations)

NCC की बड़ी तैयारी, कैडेट्स को ड्रोन और एंटी-ड्रोन ट्रेनिंग देने के लिए बनेंगे रीजनल सेंटर, 10,000 साइबर वॉरियर्स होंगे तैयार

NCC Drone Training Initiative

NCC Drone Training Initiative: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेनाएं ड्रोन पर फोकस कर रही हैं। जहां सेना ने हर बटालियन में ड्रोन से लैस अश्नि ड्रोन प्लाटून बनाई हैं, तो वहीं राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी एनसीसी भी ड्रोन को लेकर बड़ी तैयारी कर रही है। एनसीसी का फोकस बड़ी स्तर पर कैडेट्स को ड्रोन की ट्रेनिंग देने का है। इसके लिए एनसीसी ने देश में चार से पांच रीजनल ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर बनाने का टारगेट रखा है, जहां कैडेट्स को ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम की ट्रेनिंग दी जाएगी।

NCC Drone Training Initiative: रीजनल ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर बनएगी एनसीसी

राजधानी दिल्ली में एनसीसी रिपब्लिक डे कैंप-2026 के आयोजन के मौके पर एनसीसी के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीरेंद्र वत्स ने बताया कि ड्रोन ट्रेनिंग एनसीसी के मुख्य फोकस क्षेत्रों में से एक है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन के ड्रोन के बारे में खबरें आई थीं, और ड्रोन वॉरफेयर को एक उभरते हुए क्षेत्र के तौर पर देखा जा रहा है।

उन्होंने बताया कि एनसीसी देश में चार से पांच रीजनल ड्रोन ट्रेनिंग बनाएगी, जहां कैडेट्स को ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम की ट्रेनिंग दी जाएगी। लेफ्टिनेंट जनरल वत्स के मुताबिक यह ट्रेनिंग सेना के साथ मिल कर दी जाएगी, ताकि जरूरत पड़ने पर कैडेट ड्रोन ऑपरेटरों और एंटी-ड्रोन के इस्तेमाल में सेना की मदद कर सकें।

दुनियाभर में ड्रोन को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, इसलिए, एनसीसी ड्रोन, साइबर और इनफॉरमेशन वॉरफेयर पर फोकस कर रही है। लेफ्टिनेंट जनरल वीरेंद्र वत्स ने बताया कि एनसीसी कैडेट्स को बेसिक मिलिट्री स्किल्स दे रहा है, जिसमें खास तौर पर ड्रोन और साइबर मुद्दों से जुड़ी ट्रेनिंग शामिल है। यह फोकस ड्रोन को हथियार बनाने के ग्लोबल ट्रेंड और साइबर डिफेंस की आम अहमियत की वजह से है, जैसा कि दूसरी टेक्नोलॉजी के साथ होता है। (NCC Drone Training Initiative)

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DG NCC Lt Gen Virendra Vats

NCC Drone Training Initiative: ड्रोन टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव के तहत ट्रेनिंग

ड्रोन टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव का मकसद कैडेट्स को ड्रोन से जुड़ी आधुनिक स्किल्स सिखाना है, ताकि वे भविष्य की जरूरतों के लिए तैयार हो सकें। इसके तहत कैडेट्स को ड्रोन उड़ाने के साथ-साथ उसकी असेंबली, देखभाल और अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोग की ट्रेनिंग दी जा रही है। इस ट्रेनिंग में कैडेट्स को सबसे पहले ड्रोन और यूएवी की बुनियादी जानकारी दी जाती है। इसके बाद उन्हें ड्रोन के अलग-अलग पार्ट्स, उनकी कार्यप्रणाली और असेंबली के बारे में सिखाया जाता है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ड्रोन उड़ाने से जुड़े नियम, सेफ्टी प्रोसीजर और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स भी समझाए जाते हैं। कैडेट्स को उड़ान के सिद्धांत और एयरोडायनामिक्स की बेसिक जानकारी दी जाती है, ताकि वे ड्रोन की उड़ान को बेहतर तरीके से समझ सकें। (NCC Drone Training Initiative)

ट्रेनिंग के दौरान पहले सिमुलेटर के जरिए अभ्यास कराया जाता है और फिर असली ड्रोन उड़ाने का मौका दिया जाता है। इसके साथ ही ड्रोन की मेंटेनेंस और तकनीकी दिक्कतों को दूर करने की ट्रेनिंग भी शामिल है। कैडेट्स को अलग-अलग प्रतियोगिताओं और प्रैक्टिकल एक्टिविटीज में भाग लेने का अवसर मिलेगा, जिससे उनका आत्मविश्वास और स्किल्स दोनों बढ़ेंगे।

एनसीसी ने कैडेट्स को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जोड़ने की भी व्यवस्था की है, ताकि वे ड्रोन से जुड़े नियमों, रजिस्ट्रेशन और सर्टिफिकेशन की सही जानकारी हासिल कर सकें। इस पहल का उद्देश्य ड्रोन को आपदा प्रबंधन, खोज-बचाव, निगरानी, कृषि और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में उपयोगी बनाना है।

एनसीसी का मानना है कि इस इनिशिएटिव से कैडेट्स को नए करियर विकल्प मिलेंगे और वे स्टार्टअप, सरकारी और तकनीकी क्षेत्रों में आगे बढ़ सकेंगे। यह पहल युवाओं को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने और भविष्य के भारत के लिए तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। (NCC Drone Training Initiative)

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NCC Drone Training Initiative: 10,000 साइबर वॉरियर्स तैयार होंगे

डीजी एनसीसी ने बताया कि ड्रोन के अलावा एनसीसी साइबर पर फोकस कर रही है। उन्होंने बताया कि सभी 20 लाख कैडेट्स को साइबर मुद्दों की ट्रेनिंग दी जाएगी। इस ट्रेनिंग में देश भर में लैब स्थापित करना शामिल है।
उन्होंने बताया, एनसीसी कैडेट्स को साइबर ट्रेनिंग का मकसद उन्हें साइबर खतरों के खिलाफ “पहली डिफेंस लाइन” के तौर पर तैयार करना है। इसके लिए पहले साल में 10,000 साइबर वॉरियर्स तैयार किए जाएंगे। ये वॉरियर्स साइबर नेटवर्क की सुरक्षा में मदद करेंगे। एक से चार हफ्तों की विशेष साइबर ट्रेनिंग के बाद, इन साइबर वॉरियर्स को एक राष्ट्रीय डेटाबेस से जोड़ा जाएगा ताकि अगर हमारे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को कोई खतरा होता है, जरूरत पड़ने पर वे देश के साइबर नेटवर्क की सुरक्षा कर सकें। (NCC Drone Training Initiative)

NCC Drone Training Initiative: सोशल मीडिया पर अफवाहें रोकेगी एनसीसी

इनफॉरमेशन वॉरफेयर पर बोलते हुए डीजी एनसीसी ने यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा, “हर चीज को हथियार बनाया जा रहा है,” इसमें इनफॉरमेशन भी शामिल हैं। इसमें सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें और बांटने वाले एजेंडा फैलाना शामिल है, जिसका किसी देश पर बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर अफवाहें रोकने में भी अब एनसीसी अपना रोल अदा करेगी। (NCC Drone Training Initiative)