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114 राफेल के बाद भी क्यों रूस से Su-57 खरीदना चाहती है भारतीय वायुसेना? ये है पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

IAF Su-57 after Rafale
Why Indian Air Force Is Considering Russia’s Su-57 Even After 114 Rafale Deal

IAF Su-57 after Rafale: भारतीय वायुसेना इस समय एक बेहद अहम और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक तरफ चीन और पाकिस्तान से लगातार हवाई खतरा बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ वायुसेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की भारी कमी बनी हुई है। इसी बीच भारत 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदने की भी तैयारी कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद एक सवाल लगातार उठ रहा है भारत अगर मल्टीरोल फाइटर जेट राफेल खरीद रहा है, तो फिर भारतीय वायुसेना को रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर सु-57 Su-57 की जरूरत क्यों महसूस हो रही है।

IAF Su-57 after Rafale: स्क्वाड्रन की हो रही कमी: सबसे बड़ी मजबूरी

आज की तारीख में भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 से 31 ऑपरेशनल स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है। यानी वायुसेना लगभग 11–13 स्क्वाड्रन की भारी कमी से जूझ रही है। लेकिन यह कमी अचानक नहीं आई। पिछले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, पुराने जगुआर रिटायर हो चुके हैं, जबकि मिराज-2000 जैसे फाइटर जेट भी 2030 तक सेवा से बाहर कर दिए जाएंगे।

दूसरी तरफ, चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स के पास 2030–35 तक 70 से ज्यादा स्क्वाड्रन होने का अनुमान है। चीन पहले ही जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर बड़ी संख्या में तैनात कर चुका है। वहीं पाकिस्तान भी भविष्य में चीन से जे-35 जैसे स्टील्थ विमान खरीदने की तैयारी में है। ऐसे में भारत के सामने दो मोर्चों पर हवाई चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। (IAF Su-57 after Rafale)

ऐसे में भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) आने तक इस खतरनाक गैप को कैसे भरा जाए।

IAF Su-57 after Rafale: AMCA में अभी लगेगा वक्त

भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर विमान AMCA भारतीय वायुसेना के लिए उम्मीद की किरण जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविकता यह है कि इसके बड़े पैमाने पर वायुसेना में शामिल होने में अभी काफी समय लगेगा। पहली उड़ान, इंजन डेवलपमेंट, स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सेंसर और प्रोडक्शन- इन सभी चरणों को पूरा करने में कम से कम एक दशक का समय लग सकता है। खुद वायुसेना के पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अगर AMCA 2035 से पहले आ भी जाए, तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगले 10 से 12 साल तक भारत के पास कोई स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विकल्प नहीं होगा। वहीं, चीन और पाकिस्तान के स्टील्थ विमानों के सामने संतुलन बनाए रखना रणनीतिक मजबूरी है। (IAF Su-57 after Rafale)

केवल राफेल क्यों काफी नहीं है?

इस बात में कोई शक नहीं कि राफेल दुनिया के सबसे बेहतरीन 4.5 जनरेशन फाइटर विमानों में से एक है। इसमें मिटिओर बीवीआर मिसाइल, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और बेहतरीन एवियोनिक्स हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में इसकी क्षमता साबित भी हो चुकी है। लेकिन राफेल पूरी तरह स्टील्थ विमान नहीं है। इसकी रडार क्रॉस सेक्शन सीमित रूप से कम की गई है और यह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग पर निर्भर करता है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन लगभग 0.3–1 m² है। वहीं हाई-थ्रेट एयरस्पेस, जहां एस-400 या एचक्यू-9 जैसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हों, वहां राफेल के लिए डीप स्ट्राइक करना ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है। यही वह जगह है जहां पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की जरूरत महसूस होती है। (IAF Su-57 after Rafale)

Su-57 है डीप स्ट्राइक के लिए

इसके उलट सु-57 को शुरुआत से ही स्टील्थ पेनेट्रेशन और डीप स्ट्राइक के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी स्टील्थ शेपिंग, रडार-एब्जॉर्बिंग मटीरियल और इंटरनल वेपन बे इसे दुश्मन के रडार से काफी हद तक छिपाकर अंदर तक जाने की क्षमता देते हैं। वहीं इसका रडार क्रॉस सेक्शन 0.1–0.5 m² है, जो राफेल से बेहतर है। वहीं, इंटरनल वेपन बे होने से रडार क्रॉस सेक्शन कम होता है। जबकि राफेल में एक्सटर्नल वेपन बे है। हालांकि सु-57 की यह कमजोरी भी है, क्योंकि इंटरनल वेपन बे होने से यह ज्यादा बड़े हथियार नहीं सकता। लेकिन सु-57 की लंबी रेंज, ज्यादा पेलोड और भविष्य में हाइपरसोनिक हथियार ले जाने की क्षमता इसे एक खास तरह का स्ट्राइक प्लेटफॉर्म बनाती है। (IAF Su-57 after Rafale)

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना सु-57 को राफेल के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके कॉम्प्लीमेंटरी के तौर पर देख रही है। वायुसेना की सोच यह है कि राफेल एयर सुपीरियरिटी, मल्टी-रोल और रोजमर्रा के अभियानों में मुख्य भूमिका निभाएगा, जबकि सु-57 जैसे स्टील्थ विमान का इस्तेमाल डे-वन मिशन, डीप स्ट्राइक और हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। यह विमान दुश्मन के इलाके में रडार से बचते हुए अंदर घुसकर, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और एयरबेस जैसे हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बना सकता है। वहीं, 2035 तक AMCA आने तक सु-57 इंटरिम फिफ्थ जनरेशन ब्रिज का काम करेगा। अगर डील फाइनल होती है, तो यह राफेल की तरह ही सफल कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है। (IAF Su-57 after Rafale)

रूस का क्या है ऑफर

इस पूरे समीकरण में रूस का ऑफर भी एक अहम भूमिका निभा रहा है। रूस भारत को सु-57 के लिए लगभग पूरा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड एक्सेस और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन का प्रस्ताव दे रहा है। यह वही मॉडल है, जिस पर पहले सु-30एमकेआई भारत में बनाया गया था। इसके अलावा कीमत भी पश्चिमी स्टील्थ विमानों की तुलना में काफी कम बताई जा रही है। इससे भारत को न सिर्फ लागत में फायदा होगा, बल्कि स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी भी मिलेगी, यानी किसी एक देश या सैंक्शन पर पूरी तरह निर्भरता नहीं रहेगी। वहीं, इसमें ब्रह्मोस-एनजी को भी इंटीग्रट किया जा सकेगा। (IAF Su-57 after Rafale)

इंजन और सैंक्शन की चिंता

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सु-57 का नया इंजन AL-51 अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं माना जाता और रूस पर लगे पश्चिमी सैंक्शन भी एक बड़ा जोखिम हैं। इसके अलावा यह भी चिंता है कि कहीं विदेशी डील्स की वजह से स्वदेशी तेजस और AMCA प्रोग्राम पर असर न पड़े। इस मुद्दे पर एक्सपर्ट्स की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि ज्यादा विदेशी खरीद से स्वदेशी प्रोजेक्ट्स में देरी होगी, जबकि दूसरे कहते हैं कि यह इंटरिम समाधान है, जो AMCA को बिना दबाव के डेवलप होने का समय देगा।

असल में भारतीय वायुसेना अब “या तो यह, या वह” वाली सोच से आगे निकल चुकी है। उसकी रणनीति लेयर्ड और बैलेंस्ड फ्लीट बनाने की है, जिसमें सु-30एमकेआई हैवी फायरपावर देगा, तो राफेल हाई-टेक मल्टी-रोल भूमिका निभाएगा, वहीं, तेजस बड़ी संख्या में स्वदेशी ताकत बनेगा और भविष्य में AMCA पांचवीं पीढ़ी की रीढ़ बनेगा। अगर सु-57 आता भी है, तो वह इसी स्ट्रक्चर में एक खास भूमिका निभाएगा। (IAF Su-57 after Rafale)

मुख्य फाइटर एयरक्राफ्ट और उनके रोल्स

दरअसल वायुसेना ने अपनी फ्लीट को परतदार यानी लेयर्ड तरीके से तैयार किया है, जिसमें हर तरह के लड़ाकू विमान की अपनी अलग जिम्मेदारी तय है।

सुखोई-30

इस पूरी फ्लीट की रीढ़ माने जाते हैं सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान। संख्या के लिहाज से भी यही विमान सबसे ज्यादा हैं और भूमिका के लिहाज से भी इन्हें वायुसेना का हेवीवेट फाइटर माना जाता है। सु-30 का इस्तेमाल एयर सुपीरियरिटी हासिल करने, लंबी दूरी से दुश्मन के विमानों को इंटरसेप्ट करने और भारी ग्राउंड अटैक व डीप स्ट्राइक मिशनों में किया जाता है। इसके अलावा यह एयर डिफेंस सिस्टम को दबाने वाले मिशनों में भी अहम भूमिका निभाता है। ब्रह्मोस जैसी लंबी दूरी की मिसाइल ले जाने की क्षमता और सुपरक्रूज जैसी खूबियों की वजह से यह दो मोर्चों की जंग की स्थिति में वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। फिलहाल इसे और ज्यादा सक्षम बनाने के लिए ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेड पर भी काम चल रहा है। (IAF Su-57 after Rafale)

राफेल

इसके बाद आता है राफेल लड़ाकू विमान, जिसे वायुसेना का हाई-एंड मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म माना जाता है। अभी वायुसेना के पास राफेल के 36 विमान हैं, जिनकी तैनाती अंबाला और हाशिमारा में की जा चुकी है। राफेल की भूमिका एयर सुपीरियरिटी से लेकर सटीक प्रिसिजन स्ट्राइक, न्यूक्लियर डिलीवरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए दुश्मन के एयरस्पेस में घुसपैठ तक फैली हुई है। मिटिओर बीवीआर मिसाइल और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट इसे बेहद खतरनाक बनाते हैं। यही वजह है कि सरकार ने 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी है, ताकि मीडियम वेट सेगमेंट में वायुसेना की ताकत को तेजी से बढ़ाया जा सके। (IAF Su-57 after Rafale)

एचएएल तेजस  

स्वदेशी मोर्चे पर एचएएल का बनाायाा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस वायुसेना की भविष्य की संख्या आधारित ताकत के रूप में उभर रहा है। तेजस मार्क-1 और मार्क-1A को लाइट मल्टी-रोल फाइटर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इन्हें दरअसल मिग-21 विमानों की पुरानी होती फ्लीट को रिप्लेस करने के लिए बनाया गया था। लेकिन 1980 से शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज भी वायुसेना की जरूरत को पूरा नहीं कर पाया है। तेजस विमानों की भूमिका मुख्य रूप से एयर डिफेंस, क्लोज एयर सपोर्ट, हल्के ग्राउंड अटैक और पायलटों के ट्रांजिशन व ट्रेनिंग से जुड़ी है। तेजस पूरी तरह स्वदेशी प्लेटफॉर्म है और आने वाले वर्षों में इसकी संख्या तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। मार्क-1ए के बड़े ऑर्डर के बाद वायुसेना को भरोसा है कि तेजस भविष्य में उसकी रीढ़ बनेगा, जबकि मार्क-2 को मीडियम वेट कैटेगरी में 2030 के बाद लाने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिराज-2000

वायुसेना की फ्लीट में कुछ पुराने लेकिन भरोसेमंद विमान भी अभी अहम भूमिका निभा रहे हैं। मिराज-2000 ऐसा ही एक विमान है, जिसने कारगिल जैसे अभियानों में अपनी क्षमता साबित की थी। अपग्रेड के बाद यह अभी भी मल्टी-रोल और प्रिसिजन स्ट्राइक मिशनों में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, 2030 के आसपास इसे धीरे-धीरे फेज-आउट करने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिग-29

इसी तरह मिग-29 अपग्रेडेड संस्करण भी अभी एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन की भूमिका में तैनात हैं। हालांकि ये विमान अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां अगले एक-दो दशक में इन्हें भी सेवा से हटाना तय माना जा रहा है। जगुआर जैसे विमान, जो कभी डीप पेनेट्रेशन और टैक्टिकल बॉम्बिंग के लिए जाने जाते थे, अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। दारिन-3 जैसे अपग्रेड के बावजूद इन्हें भी 2030 तक चरणबद्ध तरीके से रिटायर करने की तैयारी है। (IAF Su-57 after Rafale)

105 मिनट में कूटनीति का बड़ा खेल; यूएई राष्ट्रपति की ‘शॉर्ट विजिट’ में छुपा है बड़ा रणनीतिक संकेत

UAE President India visit

UAE President India visit: संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हालिया भारत यात्रा देखने में भले ही बहुत छोटी थी, लेकिन इसके संकेत काफी बड़े हैं। राष्ट्रपति का विमान शाम करीब 4 बजकर 20 मिनट पर नई दिल्ली में उतरा। ठीक 25 मिनट बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात हुई और फिर करीब 6 बजकर 5 मिनट पर वे वापस रवाना हो गए। यानी जमीन पर कुल मिलाकर सिर्फ 105 मिनट। आम तौर पर इतने कम समय की यात्रा को औपचारिक दौरा नहीं कहा जाता, लेकिन कूटनीति की दुनिया में ऐसी संक्षिप्त यात्राएं कई बार लंबे शिखर सम्मेलनों से ज्यादा संदेश देती हैं।

UAE President India visit: लैंडिंग से टेकऑफ तक कुल समय सिर्फ 105 मिनट

राष्ट्राध्यक्ष यूं ही किसी देश में उतरते नहीं हैं। इसके लिए सुरक्षा, प्रोटोकॉल और राजनीतिक तैयारी की जरूरत होती है। अगर बात सिर्फ व्यापार, निवेश या सामान्य द्विपक्षीय मुद्दों की होती, तो यह काम मंत्रियों या वरिष्ठ अधिकारियों के जरिए भी हो सकता था। लेकिन खुद राष्ट्रपति का आना और प्रधानमंत्री से आमने-सामने मिलना यह बताता है कि मामला कुछ ज्यादा ही अहम था। इसीलिए इस स्टॉपओवर को सामान्य शिष्टाचार मुलाकात मानना ठीक नहीं होगा।

सरकारी बयान में हमेशा की तरह भारत-यूएई आर्थिक साझेदारी, नॉन-ऑयल ट्रेड को 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सहयोग जैसे विषयों का जिक्र किया गया। ये सभी मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे विषयों पर बातचीत महीनों चलती है। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए 105 मिनट की राष्ट्रपति यात्रा की जरूरत नहीं होती। यहीं से साफ होता है कि बातचीत का असली फोकस कुछ और रहा होगा। (UAE President India visit)

अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र को बनाया अस्थिर

इस पूरी यात्रा को पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात से जोड़कर देखना जरूरी है। गाजा संकट, ईरान से जुड़े तनाव, लाल सागर और अरब सागर में शिपिंग रूट्स पर बढ़ते खतरे और अमेरिका की बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं ने खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। लंबे समय तक खाड़ी की सुरक्षा अमेरिकी छतरी के नीचे रही, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। ऐसे में यूएई जैसे देश अपनी रणनीति को नए सिरे से संतुलित कर रहे हैं। (UAE President India visit)

UAE President India visit

यूएई और सऊदी अरब के बीच रिश्ते बिगड़े

इसके अलावा खाड़ी के भीतर भी समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। यूएई और सऊदी अरब के बीच रिश्ते अब पूरी तरह समान दिशा में नहीं चलते। आर्थिक नेतृत्व, क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक स्वतंत्रता को लेकर दोनों के रास्ते अलग-अलग दिखने लगे हैं। ऐसे माहौल में यूएई उन देशों से रिश्ते मजबूत करना चाहता है जो भरोसेमंद हों, तेजी से फैसले ले सकें और जिनके साथ किसी तरह की वैचारिक या राजनीतिक शर्तें न जुड़ी हों। (UAE President India visit)

भारत बना रणनीतिक साझेदार

यहीं पर भारत यूएई के लिए सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बनकर उभरता है। भारत की इंडियन ओशन में मजबूत मौजूदगी है, उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और उसकी विदेश नीति संतुलित और व्यावहारिक मानी जाती है। भारत किसी देश पर विचारधारा थोपने या शासन बदलने की बात नहीं करता। यही वजह है कि अस्थिर हालात में भारत यूएई के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प नजर आता है।

जानकारों का मानना है कि इस छोटी लेकिन अहम मुलाकात का असली एजेंडा सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय से जुड़ा था। पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के बीच काउंटर-टेररिज्म, खुफिया जानकारी साझा करने और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग काफी बढ़ा है। इन मुद्दों पर ज्यादातर बातचीत सार्वजनिक नहीं होती, क्योंकि सुरक्षा सहयोग आम तौर पर शांत कूटनीति के तहत चलता है।

ऐसे संवेदनशील मामलों पर चर्चा के लिए लंबी बैठकों या बड़ी घोषणाओं की जरूरत नहीं होती। कई बार सीधी, आमने-सामने बातचीत ही सबसे असरदार होती है। यही कारण है कि राष्ट्रपति का खुद दिल्ली आना और कम समय में लौट जाना एक मजबूत संकेत देता है कि दोनों देशों के बीच संवाद का स्तर काफी ऊंचा है। (UAE President India visit)

खाड़ी के दूसरे देशों के लिए संकेत है यह यात्रा

यह यात्रा सिर्फ भारत के लिए संदेश नहीं थी। इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। खाड़ी के दूसरे देशों, वैश्विक ताकतों और उन सभी पक्षों के लिए यह संकेत था कि भारत और यूएई के रिश्ते सक्रिय हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत उच्च स्तर पर संपर्क किया जा सकता है। आज की कूटनीति में हर चीज संधियों और समझौतों से तय नहीं होती। कई बार एक छोटी सी यात्रा भी बहुत बड़ा संदेश दे देती है।

इस मुलाकात से किसी बड़े समझौते या नई घोषणा की उम्मीद करना सही नहीं होगा। यह यात्रा घोषणाओं के लिए नहीं थी। इसका मकसद था तेजी से बदलते हालात में आपसी समझ बनाए रखना और रणनीतिक तालमेल को मजबूत करना। कूटनीति में कई बार रिश्ते बनाने से ज्यादा जरूरी होता है, बने हुए रिश्तों का सही समय पर इस्तेमाल करना।

यूएई राष्ट्रपति की यह 105 मिनट की स्टॉपओवर यात्रा यही बताती है कि भारत-यूएई संबंध अब उस स्तर पर पहुंच चुके हैं, जहां संकट या अनिश्चितता के समय सीधा और त्वरित संवाद सबसे अहम हथियार बन जाता है। शायद इसी वजह से यह छोटी-सी यात्रा कई लंबे शिखर सम्मेलनों से ज्यादा मायने रखती है। (UAE President India visit)

मिलिट्री ड्रोन बनाने के लिए कड़े होंगे नियम, चीनी पार्ट्स पर लगेगा पूरा ब्रेक, नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

Chinese Parts in Military Drones

Chinese Parts in Military Drones: सेना के लिए बनाए जाने वाले मिलिट्री ड्रोनों में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल को लेकर गंभीर रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ऐसा सिक्योर्ड मिलिट्री ड्रोन फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसका मकसद भारतीय ड्रोन सिस्टम्स में किसी भी तरह के चीनी मूल के अवैध या अनकंट्रोल्ड कंपोनेंट्स के इस्तेमाल को पूरी तरह रोकना है। यह फ्रेमवर्क अब अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही ड्रोन इंडस्ट्री के लिए एक बाइंडिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर लागू किया जा सकता है।

यह फ्रेमवर्क भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (एडीबी) ने तैयार किया है। इसकी जरूरत तब महसूस हुई, जब पिछले कुछ सालों में सामने आया कि कई घरेलू कंपनियां अपने ड्रोन को “मेक इन इंडिया” बताकर बेच रही थीं, लेकिन उनके अंदर इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर, कोड और हार्डवेयर चीनी मूल के थे। यह मामला सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, क्योंकि ऐसे कंपोनेंट्स में बैकडोर या रिमोट एक्सेस का खतरा रहता है। (Chinese Parts in Military Drones)

Chinese Parts in Military Drones: किस स्टेज पर है मंजूरी प्रक्रिया

सूत्रों के मुताबिक, इस फ्रेमवर्क को डायरेक्टर जनरल (एक्विजिशन) की मंजूरी मिल चुकी है। अब फाइल डिफेंस सेक्रेटरी आरके सिंह के पास है। डिफेंस सेक्रेटरी को इस मुद्दे पर पहले भी प्रेजेंटेशन दिया जा चुका है। उनकी मंजूरी के बाद यह फाइल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास जाएगी, जहां से अंतिम हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

एक बार रक्षा मंत्री की मंजूरी मिलते ही यह फ्रेमवर्क पब्लिक कर दिया जाएगा और सभी ड्रोन मैन्युफैक्चरर्स को इसका पालन करना होगा। यानी जो कंपनी भारतीय सेना, नौसेना या वायु सेना को ड्रोन सप्लाई करना चाहती है, उसे इस नए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के सभी नियम पूरे करने होंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

क्यों जरूरी हो गया नया ड्रोन फ्रेमवर्क

पिछले कुछ सालों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सर्विलांस, टारगेटिंग, लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक और लॉजिस्टिक्स जैसे अहम रोल निभा रहे हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम अनसेफ हुआ, तो वह दुश्मन के लिए हथियार बन सकता है।

2020 में गलवान झड़प के दौरान यह सामने आया था कि कई भारतीय ड्रोन हैक हो गए थे और उनकी फीड दुश्मन तक पहुंचने का खतरा बना था। इसके बाद पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन हैकिंग की घटनाओं की रिपोर्ट आईं। यही वजह है कि ड्रोन आर्किटेक्चर को मजबूत करने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात साफ हो गई कि ड्रोन सिक्योरिटी सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ऑपरेशनल सर्वाइवल से जुड़ा विषय है। (Chinese Parts in Military Drones)

क्या है इस नए फ्रेमवर्क में

यह नया फ्रेमवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ओडब्ल्यूएएसपी 4.0 (ओपन वेब एप्लिकेशन सिक्योरिटी प्रोजेक्ट) स्टैंडर्ड पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय जरूरतों के हिसाब से और ज्यादा सख्त बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि अब ड्रोन सिर्फ उड़ने और काम करने भर से पास नहीं होगा, बल्कि उसकी साइबर और हार्डवेयर सिक्योरिटी की भी गहराई से जांच होगी।

फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन सिस्टम को 30 से ज्यादा अलग-अलग टेस्ट्स से गुजरना होगा। ये टेस्ट्स सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त लैब्स जैसे एसटीक्यूसी आईटी सर्विसेज, ईटीडीसी बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं में किए जाएंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

किन चीजों की होगी जांच

नए फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन के हर महत्वपूर्ण हिस्से की जांच की जाएगी। इसमें सबसे पहले सॉफ्टवेयर और कोड लेवल पर टेस्ट होंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ड्रोन किसी अनधिकृत सर्वर या इकाई को डेटा न भेज रहा हो।

इसके अलावा ड्रोन के ऑटोपायलट मॉड्यूल, चिप, सिम्युलेटर, फील्ड प्रोग्रामर, पावर इंटरफेस और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन की भी गहनता से जांच होगी। खास बात यह है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले विंडोज वर्कस्टेशन और स्मार्टफोन तक को टेस्टिंग के दायरे में लाया गया है।

ड्रोन में इस्तेमाल होने वाला अपडेट सिस्टम भी जांच के दायरे में होगा। यानी अब यह देखा जाएगा कि ड्रोन में सॉफ्टवेयर अपडेट कैसे होता है, क्या अपडेट सुरक्षित है और कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी डाउनग्रेड अटैक के जरिए सिस्टम को कमजोर किया जा सके। (Chinese Parts in Military Drones)

हार्डवेयर पर भी सख्त नजर

अब तक ड्रोन सुरक्षा चर्चा ज्यादातर सॉफ्टवेयर तक सीमित रहती थी, लेकिन नया फ्रेमवर्क हार्डवेयर को भी उतनी ही अहमियत देता है। हर ड्रोन के बिल ऑफ मटीरियल की जांच होगी। इसका मतलब यह कि कौन-सा पार्ट कहां से आया है, किस देश में बना है और उसकी सप्लाई चेन क्या है, यह सब साफ-साफ बताना होगा।

सूत्रों ने बताया कि कई मामले ऐसे भी सामने आए थे, जिनमें देखा गया था ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स चीन से खरीदे गए, लेकिन कई रूट्स और कई देशों से होकर इन कंपनियों के पास पहुंचे। अब इसकी भी गहनता से जांच होगी और पार्ट्स पर लगी बारीक से बारीक मार्किंग को भी ध्यान से जांचा जाएगा।

सरकार का साफ संदेश है कि इनिमिकल देशों, खासकर चीन से जुड़े कंपोनेंट्स के लिए जीरो टॉलरेंस नीति होगी। अगर किसी ड्रोन में ऐसे कंपोनेंट्स पाए गए, तो उसे सेना में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलेगी। (Chinese Parts in Military Drones)

खरीद प्रक्रिया के हर स्टेज में लागू होगा नियम

इस फ्रेमवर्क की सबसे अहम बात यह है कि यह सिर्फ फाइनल डिलीवरी तक सीमित नहीं रहेगा। यह आरएफआई (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन) से लेकर आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) और फिर कॉन्ट्रैक्ट के बाद की पूरी प्रक्रिया पर लागू होगा।

यानी ड्रोन कंपनी को शुरुआत से ही यह साबित करना होगा कि उसका सिस्टम सुरक्षित है। बाद में अगर किसी स्टेज पर गड़बड़ी पाई जाती है, तो कॉन्ट्रैक्ट पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि इस फ्रेमवर्क से ड्रोन इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, क्योंकि अब कंपनियों को ज्यादा टेस्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन करना होगा। लेकिन लंबे समय में इसका फायदा उन्हीं कंपनियों को मिलेगा, जो असल में स्वदेशी और सुरक्षित टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं।

इससे फर्जी “मेक इन इंडिया” के दावे अपने आप बाहर हो जाएंगे और भारतीय ड्रोन इंडस्ट्री की साख मजबूत होगी। साथ ही यह भारत को भविष्य में ड्रोन एक्सपोर्ट के लिए भी ज्यादा भरोसेमंद बनाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह कदम

आज की जंग सिर्फ बॉर्डर पर नहीं लड़ी जाती। साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन वारफेयर अब उतने ही अहम हो चुके हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम सुरक्षित नहीं होगा, तो वह दुश्मन के लिए भारत की कमजोरी बन सकता है।

यह नया फ्रेमवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर देगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भारतीय सैनिक जिस ड्रोन पर भरोसा कर रहे हैं, वह सिर्फ उड़ने में नहीं, बल्कि डेटा और कंट्रोल के मामले में भी पूरी तरह सुरक्षित है।

वहीं, डिफेंस सेक्रेटरी और रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद यह फ्रेमवर्क आधिकारिक रूप से लागू हो जाएगा। इसके बाद ड्रोन इंडस्ट्री को नए नियमों के मुताबिक खुद को ढालना होगा। कुल मिलाकर, यह फ्रेमवर्क भारत की ड्रोन स्ट्रैटेजी में एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। यह कदम भारत को सिर्फ ड्रोन यूजर नहीं, बल्कि सिक्योर और भरोसेमंद ड्रोन पावर बनाने की दिशा में आगे ले जाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

क्या नाग चिन्ह वाले भैरव कमांडोज ले रहे हैं पैरा स्पेशल फोर्सेस की जगह? जानिए दोनों में असली फर्क

Bhairav Battalion vs Para SF

Bhairav Battalion vs Para SF: इस साल जयपुर में हुई आर्मी डे पर कई नए हथियारों के साथ भैरव लाइट कमांडो बटालियन के जवान भी कदमताल करते दिखे। परेड में राजपूताना राइफल्स और सिख लाइट इन्फैंट्री से जुड़े इन विशेष कंटिंजेंट्स ने पहली बार परेड में हिस्सा लिया। वहीं गणतंत्र दिवस परेड में भी ये लोगों का ध्यान आकर्षित करेंगे। उनकी वर्दी, चाल और सबसे ज्यादा चर्चा में रहा उनका इनसिग्निया, जिसमें नाग वासुकी और कमांडो डैगर बना हुआ है। यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि क्या ये नई यूनिट पैरा स्पेशल फोर्सेस जैसी है? क्या भैरव बटालियन पैरा एसएफ की जगह ले रही है या दोनों की भूमिका अलग है?

असलियत यह है कि पैरा एसएफ और भैरव बटालियन दोनों अलग-अलग जरूरतों के लिए बनाई गई यूनिट्स हैं। दोनों की ट्रेनिंग, काम करने का तरीका और ऑपरेशनल रोल अलग है। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा और देखना होगा कि भारतीय सेना ने यह बदलाव क्यों किए। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: भारतीय सेना की सबसे पुरानी और खतरनाक स्पेशल यूनिट

पैरा स्पेशल फोर्सेस, जिन्हें आमतौर पर पैरा एसएफ कहा जाता है, भारतीय सेना की सबसे अनुभवी और घातक यूनिट मानी जाती है। इसकी जड़ें दूसरे विश्व युद्ध तक जाती हैं। आजादी के बाद इसे पैराशूट रेजिमेंट के तहत संगठित किया गया।

पैरा एसएफ का मुख्य काम होता है दुश्मन की जमीन में घुसकर डीप स्ट्राइक, क्रॉस बॉर्डर रेड, काउंटर टेररिज्म, सर्जिकल स्ट्राइक, होस्टेज रेस्क्यू और स्पेशल रिकॉनिसेंस जैसे मिशन करना। ये वही यूनिट है जिसने म्यांमार में उग्रवादी ठिकानों पर कार्रवाई की, एलओसी के पार सर्जिकल स्ट्राइक की और कई गुप्त ऑपरेशन अंजाम दिए।

पैरा एसएफ के बारे में कहा जाता है कि उन्हें मौत से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि उसका सामना करना सिखाया जाता है। पैरा एसएफ के जवान खुद को “फैंटम” या “घोस्ट ऑपरेटर्स” कहते हैं क्योंकि वो बिना ट्रेस के आते-जाते हैं। उन्हें शत्रुजीत यानी “शत्रुओं का विजेता” भी कहा जाता है, जो दर्शाता है कि दुश्मन को हर हाल में जीतना है।

पैरा एसएफ की पहचान उसकी मैरून बेरेट और बलिदान बैज से होती है, जो हर किसी को नहीं मिलती। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ की ट्रेनिंग: सबसे मुश्किल चयन प्रक्रिया

पैरा एसएफ में जाना आसान नहीं होता। सेना के किसी भी हिस्से से जवान इसके लिए वॉलंटियर कर सकता है, लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू होती है। सबसे पहले होता है प्रोबेशन पीरियड, जो करीब 90 दिन का होता है। इसमें जवानों को बेहद कठिन फिजिकल और मेंटल टेस्ट से गुजरना पड़ता है। नींद की कमी, कम खाना, लंबी दौड़, भारी वजन के साथ मार्च, पहाड़, जंगल और रेगिस्तान सब कुछ झेलना पड़ता है। इस दौरान 80 से 85 फीसदी जवान हिम्मत हार कर बाहर हो जाते हैं।

जो जवान इस चरण को पार करता है, उसे आगे जंगल वॉरफेयर, माउंटेन वॉरफेयर, डेजर्ट ऑपरेशंस, कॉम्बैट फ्री फॉल, डाइविंग, हेलिबोर्न ऑपरेशन जैसी एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है। पूरी ट्रेनिंग को पूरा होने में 9 से 12 महीने तक लगते हैं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव बटालियन: आधुनिक युद्ध के लिए नई सोच

अब बात करते हैं भैरव लाइट कमांडो बटालियन की। यह करीब 250 सैनिकों की टीम है। यह यूनिट 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद शुरू हुई भारतीय सेना की ट्रांसफॉर्मेशन योजना का हिस्सा है। पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध और ड्रोन वारफेयर से सेना ने सीखा कि हर काम के लिए स्पेशल फोर्स भेजना जरूरी नहीं।

कुख सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि ये घातक प्लाटून और पैरा कमांडोज के बीच एक गैप था, जिसे भरना जरूरी था। जिसके बाद भैरव कमांडोज अस्तित्व में आए।

भारतीय सेना को सीमा पर ऐसे यूनिट्स चाहिए थे जो बहुत तेज हों, टेक्नोलॉजी से लैस हों, कम समय में हमला कर सकें, साथ ही ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हाइब्रिड थ्रेट से भी निपट सकें। इसी जरूरत को देखते भैरव बटालियन का जन्म हुआ। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव नाम और नाग वासुकी का महत्व

भैरव भगवान शिव का ही एक रूप है, जो निर्भीकता और अजेयता का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के गले में हमेशा नाग वासुकी रहता है। यही वजह है कि भैरव बटालियन के इनसिग्निया में नाग वासुकी और कमांडो डैगर को शामिल किया गया है। इस यूनिट का मोटो है- “अदृश्य और अदम्य”, यानी जो दिखे नहीं और जिसे रोका न जा सके।

भैरव बटालियन का स्ट्रक्चर

भैरव बटालियन पैरा एसएफ से साइज में छोटी होती है। एक बटालियन में करीब 200 से 250 जवान, 7 से 8 अधिकारी होते हैं। इनका मकसद है लीन और मोबाइल यूनिट बनाना, जो जल्दी मूव कर सके। इनकी तैनाती ज्यादातर एलएसी, एलओसी और संवेदनशील बॉर्डर सेक्टरों में की जा रही है।

भैरव बटालियन के लिए जवानों का चयन बेहद सोच-समझकर किया जाता है। सेना की अलग-अलग शाखाओं जैसे इन्फैंट्री, आर्टिलरी, एयर डिफेंस और सिग्नल्स से हैंडपिक्ड जवान चुने जाते हैं। चयन के दौरान फिजिकल फिटनेस के साथ-साथ मानसिक मजबूती पर भी खास ध्यान दिया जाता है। ऐसे जवानों को प्राथमिकता दी जाती है जिन्होंने पहले घाटक प्लाटून, कमांडो कोर्स, माउंटेन वॉरफेयर या जंगल वॉरफेयर जैसी कठिन ट्रेनिंग में अच्छा प्रदर्शन किया हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

“सन्स ऑफ द सॉइल” कॉन्सेप्ट

भैरव बटालियन की एक खास बात है लोकल रिक्रूटमेंट। इसे सेना ने “सन्स ऑफ द सॉइल” पॉलिसी कहा है। जैसे राजस्थान सेक्टर में तैनात यूनिट में रेगिस्तान से परिचित जवान, और नॉर्थ ईस्ट में वहां के इलाके को समझने वाले सैनिक। खास बात ये है कि इसे अलग-अलग इलाक़े की ज़रूरतों के लिए कई तरह से तैयार किया गया है। रेगिस्तानी इलाके के लिये अलग भैरव बटालियन है तो जम्मू कश्मीर के लिये अलग और लद्दाख जैसे एरिया के लिये अलग। इससे जवानों को मौसम, जमीन और स्थानीय हालात समझने में फायदा मिलता है। ताकि स्थानीय इलाके से जुड़े जवानों को उसी क्षेत्र में तैनात किया जा सके।

भैरव बटालियन मॉडर्न वॉरफेयर में मल्टी डोमेन ऑपरेंशन करना वाली फोर्स है। जिसे पांच महीने पहले ही तैयार किया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव बटालियन की ट्रेनिंग: स्पीड और टेक्नोलॉजी पर फोकस

भैरव लाइट कमांडो बटालियन की ट्रेनिंग भारतीय सेना की अब तक की सबसे आधुनिक और तेजी से तैयार की जाने वाली स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग मानी जा रही है। इस यूनिट की ट्रेनिंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि जवान बहुत कम समय में पूरी तरह ऑपरेशनल बन जाएं। आमतौर पर इसकी ट्रेनिंग तीन से चार महीने में पूरी कराई जाती है। शुरुआती दो से तीन महीने जवानों को इन्फैंट्री स्कूल महू, हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल और काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफेयर स्कूल जैसे संस्थानों में रखा जाता है, जहां उन्हें बेसिक स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद करीब एक महीने के लिए इन जवानों को पैरा स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स के साथ अटैच किया जाता है, ताकि उन्हें रियल ऑपरेशनल माहौल में काम करने का अनुभव मिल सके। (Bhairav Battalion vs Para SF)

इनकी ट्रेनिंग का फोकस

ऑपरेशनल ट्रेनिंग के दौरान भैरव बटालियन को क्रॉस बॉर्डर रेड, क्विक हिट एंड रन ऑपरेशन, काउंटर टेररिज्म और रैपिड इंसर्शन जैसे मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। हेलिकॉप्टर के जरिए तेजी से उतारना, जमीन या पानी के रास्ते घुसपैठ करना और सीमित समय में मिशन पूरा कर वापस लौटना इस यूनिट की खास पहचान है। इन सभी क्षमताओं को एक्सरसाइज अखंड प्रहार जैसी सैन्य कवायदों में परखा भी जा चुका है, जहां रियल टाइम ऑपरेशनल वैलिडेशन किया गया। (Bhairav Battalion vs Para SF)

शेर, ड्रैगुनोव जैसे हथियारों से लैस

फिजिकल और मेंटल ट्रेनिंग के स्तर पर भैरव कमांडोज को बेहद कठिन परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों, घने जंगलों और रात के अंधेरे में ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी जाती है। स्मोक कवर के बीच मूवमेंट, स्टेल्थ तरीके से आगे बढ़ना और अचानक हमला करना इनकी ट्रेनिंग का अहम हिस्सा है। जवानों को आधुनिक हथियारों जैसे क्लोज कॉम्बेट के लिये एके-203 राइफल, 1500 मीटर तक मार करने वाले ड्रैगुनोव स्नाइपर, लंबी दूरी तक दुश्मन के बड़े हथियारों को बर्बाकरने द वाले रॉकेट लांचर कार्ल गुस्ताफ रीकॉइललेस गन, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल और मॉर्टार सिस्टम के इस्तेमाल में भी पारंगत बनाया जाता है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

ड्रोन वारफेयर: भैरव की सबसे बड़ी ताकत

भैरव कमांडोज की ट्रेनिंग का सबसे बड़ा फोकस ड्रोन वॉरफेयर पर है। इसीलिए इसे पूरी तरह से ड्रोन-इंटीग्रेटेड यूनिट बनाया गया है। यहां हर जवान को ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग दी जाती है। सेना पहले ही 1 लाख से ज्यादा ड्रोन ऑपरेटर्स तैयार कर चुकी है।

सेना का नया सिद्धांत यह है कि ड्रोन किसी एक स्पेशलिस्ट तक सीमित न रहें, बल्कि हर सैनिक उन्हें इस्तेमाल कर सके। सर्विलांस ड्रोन, एफपीवी ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और ड्रोन स्वार्म जैसी तकनीकों को ट्रेनिंग का हिस्सा बनाया गया है। जवानों को यह सिखाया जाता है कि कैसे ड्रोन के जरिए दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जाए, टारगेट की पहचान की जाए और जरूरत पड़ने पर तुरंत स्ट्राइक की जाए।

जवानों को न केवल सर्विलांस बल्कि काउंटर ड्रोन ऑपरेशन की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक जामिंग, ड्रोन को निष्क्रिय करना और दुश्मन के यूएएस सिस्टम को बेअसर करना शामिल है। इसके अलावा ड्रोन से मिले इनपुट को सीधे ग्राउंड ऑपरेशन से जोड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि टारगेट मिलने के बाद कार्रवाई में देरी न हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ और भैरव बटालियन में असली फर्क

पैरा एसएफ जहां स्ट्रैटेजिक और डीप ऑपरेशन करती है, वहीं भैरव बटालियन टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर काम करती है। पैरा स्पेशल फोर्सेस और भैरव बटालियन के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। पैरा एसएफ जहां रणनीतिक स्तर के, अंदर तक जाकर किए जाने वाले ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है, वहीं भैरव बटालियन को टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर तेजी से जवाब देने के लिए खड़ा किया गया है। भैरव कमांडोज का मकसद है सीमा पर उभरते खतरे को तुरंत दबाना, ताकि हालात बड़े टकराव में न बदलें और पैरा एसएफ जैसी यूनिट्स को बड़े और संवेदनशील मिशनों के लिए फ्री रखा जा सके।

कुल मिला कर पैरा एसएफ को तभी भेजा जाता है जब मिशन बहुत बड़ा और संवेदनशील हो। वहीं, भैरव बटालियन का काम है सीमा पर तुरंत जवाब, जिससे हालात बिगड़ने से पहले काबू में आ जाएं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: क्यों जरूरी थी भैरव बटालियन?

पिछले कुछ सालों में देखा गया कि हर छोटी घुसपैठ या रेड के लिए पैरा एसएफ भेजना सही नहीं। इससे उनकी स्ट्रैटेजिक क्षमता पर असर पड़ता है।

भैरव बटालियन इस गैप को भरती है। ये यूनिट्स “फाइट टुनाइट” कॉन्सेप्ट पर काम करती हैं, यानी आदेश मिला और तुरंत कार्रवाई। जहां स्पीड, सरप्राइज, टेक्नोलॉजी और स्थानीय समझ को एक साथ जोड़कर दुश्मन पर बढ़त हासिल की जा सकती है।

2026 तक करीब 15 से ज्यादा भैरव बटालियन ऑपरेशनल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर 23 से 25 बटालियन बनाने की योजना है। ये यूनिट्स रुद्र ब्रिगेड जैसे नए स्ट्रक्चर का हिस्सा होंगी, जहां इन्फैंट्री, ड्रोन और सपोर्ट यूनिट्स एक साथ काम करेंगी। भैरव की क्षमता देखते हुए इसे फिलहाल उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर तैनात कर दिया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

गणतंत्र दिवस परेड 2026 में VIP एन्क्लोजर खत्म! नदियों के नाम से पहचानी जाएंगी दर्शक दीर्घाएं

Republic Day Parade 2026

Republic Day Parade 2026: गणतंत्र दिवस परेड 2026 इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रही है। देश की आजादी के बाद पहली बार गणतंत्र दिवस परेड के दौरान कर्तव्य पथ पर बने दर्शक दीर्घाओं यानी व्यूइंग गैलरीज को सिर्फ नंबरों से नहीं, बल्कि भारत की प्रमुख नदियों के नाम से पहचाना जाएगा।

अब तक गणतंत्र दिवस परेड में दर्शकों के बैठने की जगहों को ब्लॉक नंबर या वीआईपी एन्क्लोजर के नाम से जाना जाता था। लेकिन 2026 में इस परंपरा को तोड़ते हुए सरकार ने इन सभी दीर्घाओं को भारत की जीवनरेखाओं कही जाने वाली नदियों के नाम पर रखा है। इसका मकसद देश की सांस्कृतिक विरासत, सभ्यता और आम नागरिकों से जुड़े प्रतीकों को सामने लाना है। (Republic Day Parade 2026)

Republic Day Parade 2026: नदियों के नाम पर रखी गईं दर्शक दीर्घाएं

सूत्रों के मुताबिक, कर्तव्य पथ पर बनी दर्शक दीर्घाओं के नाम अब यमुना, ब्यास, ब्रह्मपुत्र, गंगा, तीस्ता, चंबल, सतलुज, सोन, रावी, वैगई, पेरियार, गंडक, पेनार, नर्मदा, घाघरा, गोदावरी, कृष्णा, महानदी, सिंधु, कोसी, झेलम और कावेरी जैसे नामों पर रखे गए हैं। ये नदियां देश के अलग-अलग हिस्सों से होकर बहती हैं और सदियों से वहां के लोगों की जीवनरेखा बनी हुई हैं।

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इन नदियों ने न सिर्फ भारत की भौगोलिक संरचना को आकार दिया है, बल्कि देश की सभ्यता, संस्कृति, कृषि, व्यापार और अर्थव्यवस्था को भी मजबूत आधार दिया है। इसी सोच के तहत गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर नदियों को सम्मान देने का फैसला लिया गया है। (Republic Day Parade 2026)

राष्ट्रपति के पास गंगा और घाघरा गैलरी

कर्तव्य पथ पर जिस स्थान से राष्ट्रपति और भारतीय सेनाओं की सुप्रीम कमांडर द्रौपदी मुर्मू परेड की सलामी लेंगी, उसके पास बनी दर्शक दीर्घाओं को गंगा और घाघरा नाम दिया गया है। गंगा को भारत में आस्था और संस्कृति की सबसे पवित्र नदी माना जाता है, जबकि घाघरा उत्तर भारत के बड़े हिस्से को जीवन देती है। (Republic Day Parade 2026)

ज्यादा दर्शकों के लिए बड़ी गैलरी

सूत्रों के मुताबिक, सभी दीर्घाएं एक जैसी नहीं हैं। तीस्ता और चंबल नाम की दर्शक दीर्घाएं आकार में बड़ी हैं, ताकि ज्यादा संख्या में लोग परेड को देख सकें। इससे आम नागरिकों को बेहतर सुविधा मिलेगी और गणतंत्र दिवस को जनभागीदारी का उत्सव बनाने की सोच को बल मिलेगा।

पहले इन जगहों को सिर्फ “ब्लॉक” या “वीआईपी एन्क्लोजर” कहा जाता था, जिससे आम और खास के बीच फर्क साफ दिखाई देता था। अब नदियों के नाम रखने से यह दूरी खत्म करने की कोशिश की गई है। (Republic Day Parade 2026)

वीआईपी संस्कृति खत्म करने का संदेश

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने साफ शब्दों में कहा है कि इस बार गणतंत्र दिवस समारोह के जरिए वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने का संदेश दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि न सिर्फ परेड के दौरान दर्शक दीर्घाओं को नदियों के नाम पर रखा गया है, बल्कि बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी के दौरान एन्क्लोजर्स को भारतीय संगीत वाद्य यंत्रों के नाम पर रखा जाएगा।

उनका कहना है कि गणतंत्र दिवस सिर्फ किसी खास वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे देश का पर्व है, और इसे आम नागरिकों से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है। (Republic Day Parade 2026)

परेड की अवधि 90 मिनट

रक्षा सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि परेड की अवधि में कोई बदलाव नहीं किया गया है। गणतंत्र दिवस परेड करीब 90 मिनट की ही होगी, जैसा कि पिछले वर्षों में होती रही है। हालांकि इस दौरान दर्शकों को नए अनुभव और नए दृश्य देखने को मिलेंगे।

2,000 कलाकार करेंगे प्रस्तुति

इस बार गणतंत्र दिवस परेड में करीब 2,000 कलाकार हिस्सा लेंगे। ये कलाकार देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से आए होंगे और कर्तव्य पथ पर अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। इनके जरिए भारत की विविध संस्कृति, लोक परंपराएं और कलात्मक विरासत को दिखाया जाएगा।

पिछले साल यानी 2025 में गणतंत्र दिवस समारोह में करीब 5,000 कलाकारों ने हिस्सा लिया था, जिसे इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया था। इस बार संख्या थोड़ी कम जरूर है, लेकिन प्रस्तुति का स्तर और विविधता बनाए रखने पर जोर दिया गया है। (Republic Day Parade 2026)

वीर गाथा पुरस्कार विजेता बच्चे भी होंगे शामिल

पिछले वर्षों की तरह इस बार भी सरकार ने विशेष मेहमानों और वीर गाथा पुरस्कार से सम्मानित बच्चों को गणतंत्र दिवस परेड देखने के लिए आमंत्रित किया है। ये बच्चे देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं और इन्होंने छोटी उम्र में साहस और बहादुरी की मिसाल पेश की है।

77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि

भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह के लिए इस बार यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेताओं को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। इनमें यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डर लेयेन शामिल हैं।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच 2004 से रणनीतिक साझेदारी है। दोनों पक्षों के बीच सहयोग समय के साथ और मजबूत हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, फरवरी 2025 में यूरोपीय संघ के कमिश्नरों के भारत दौरे के बाद द्विपक्षीय संबंधों को नई गति मिली है। (Republic Day Parade 2026)

वंदे मातरम के 150 साल पर थीम

इस साल गणतंत्र दिवस समारोह की थीम “वंदे मातरम के 150 वर्ष” रखी गई है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने बताया कि इस थीम को पूरे आयोजन में खास तौर पर दिखाया जाएगा। परेड के समापन पर वंदे मातरम बैनर के साथ गुब्बारे छोड़े जाएंगे।

गणतंत्र दिवस के निमंत्रण पत्र और टिकट भी इसी देशभक्ति थीम पर आधारित होंगे। इसके अलावा, कर्तव्य पथ पर 30 झांकियां निकाली जाएंगी, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता, इतिहास और परंपराओं को दर्शाएंगी। (Republic Day Parade 2026)

जोरावर टैंक को लेकर आर्मी चीफ ने दी अहम जानकारी, बताया कब होगा सेना में शामिल

Zorawar Light Tank Trials
COAS General Upendra Dwivedi addressing Indian Army Annual Press Conference 2026

Zorawar Light Tank Trials: भारतीय सेना के स्वदेशी लाइट वेट टैंक जोरावर को लेकर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अहम जानकारी साझा की है। उन्होंने साफ किया कि जोरावर टैंक अभी ट्रायल और सुधार के चरण में है। सेना प्रमुख ने बताया कि जोरावर टैंक का पहला प्रोटोटाइप पहले ही हाई एल्टीट्यूड इलाके में तैनात किया जा चुका है, जहां इसके शुरुआती परीक्षण किए गए थे। वहीं सेना में यह 2029 तक ही शामिल हो सकता है।

Zorawar Light Tank Trials: टैंक में अभी भी हैं कई खामियां

रक्षा समाचार के पूछे गए सवाल के जवाब में सेना प्रमुख ने बताया कि यह पहली बार था जब किसी स्वदेशी लाइट टैंक को इतने अधिक ऊंचाई वाले इलाके में सीधे तैनात किया गया। हाई एल्टीट्यूड में तैनाती के दौरान कुछ तकनीकी कमियां सामने आईं, क्योंकि ऊंचाई पर मौसम, ऑक्सीजन की कमी और तापमान जैसे नए फैक्टर्स काम करते हैं। इन तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए टैंक को नीचे लाना जरूरी होता है, लेकिन फिलहाल पहला प्रोटोटाइप नीचे लाना संभव नहीं है। (Zorawar Light Tank Trials)

इसी वजह से सेना और डीआरडीओ ने मिलकर जोरावर टैंक का दूसरा प्रोटोटाइप तैयार किया है। यह दूसरा प्रोटोटाइप गुजरात के हजीरा में बनाया गया है और इसे अब पश्चिमी सीमा की ओर ट्रायल के लिए भेजा जा रहा है। सेना प्रमुख ने कहा कि जोरावर टैंक का बेसिक प्रोटोटाइप काफी हद तक तैयार हो चुका है, लेकिन इसकी मेजर असेंबली से जुड़ी कुछ कमियों को ठीक करने में अभी समय लगेगा। (Zorawar Light Tank Trials)

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस वजह से जोरावर टैंक के लिए किसी सटीक टाइमलाइन को तय करना आसान नहीं है। हालांकि, सेना प्रमुख ने बताया कि अब तक जो प्रगति हुई है, वह संतोषजनक है और इस प्रोजेक्ट पर लगातार काम चल रहा है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने उम्मीद जताई कि 2029 के आसपास टैंक को भारतीय सेना में शामिल किया जा सकता है। (Zorawar Light Tank Trials)

डीआरडीओ चीफ डॉ. समीर वी. कामत ने हाल ही में कहा था कि 2026 में इंडियन आर्मी के यूजर ट्रायल्स शुरू होंगे। ये ट्रायल्स 12-18 महीने तक चल सकते हैं, जिसमें समर, विंटर, हाई-एल्टीट्यूड और विभिन्न टेरेंस में टैंक की परफॉर्मेंस टेस्ट की जाएगी। डीआरडीओ का टारगेट है कि अगर यूजर ट्रायल्स सफल रहे, तो टैंक का इंडक्शन 2027 तक शुरू हो जाएगा। शुरुआती बैच में 59 टैंक्स बनाए जाएंगे। सेना को कुल जरूरत 354 टैंक्स की है, जिसमें बाकी 295 टैंक्स बाद में मेक-1 कैटेगरी के तहत कॉम्पिटिटिव टेंडर से बनाए जाएंगे। (Zorawar Light Tank Trials)

जोरावर टैंक को खासतौर पर हाई एल्टीट्यूड और पहाड़ी इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। यह टैंक उन इलाकों में तैनाती के लिए बनाया गया है, जहां भारी टैंक जैसे टी-72 और टी-90 को पहुंचाना मुश्किल होता है। इसका हल्का वजन और मजबूत सस्पेंशन सिस्टम इसे ऊंचे पहाड़ों, बर्फीले इलाकों और संकरे रास्तों पर काम करने में सक्षम बनाता है। (Zorawar Light Tank Trials)

जोरावर टैंक को डीआरडीओ और लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने मिलकर बनाया है। इसमें 105 मिलीमीटर की तोप, आधुनिक सेंसर, नाइट विजन सिस्टम और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं। यह टैंक ड्रोन कनेक्टिविटी के साथ भी काम कर सकता है, जिससे इसे दुश्मन की गतिविधियों की रियल-टाइम जानकारी मिलती है। (Zorawar Light Tank Trials)

सेना प्रमुख ने कहा कि जोरावर टैंक के विकास में जो भी तकनीकी चुनौतियां सामने आ रही हैं, उन्हें चरणबद्ध तरीके से दूर किया जा रहा है। टैंक के दूसरे प्रोटोटाइप में इंजन, सस्पेंशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से जुड़े कई सुधार किए गए हैं, ताकि यह अलग-अलग मौसम और इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर सके।

भारतीय सेना के लिए जोरावर टैंक एक अहम स्वदेशी प्लेटफॉर्म है, जिसे देश की भौगोलिक जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जा रहा है। (Zorawar Light Tank Trials)

अब लंबी दूरी तक गोला दागेंगी सेना की तोपें, पिनाका में भी लगेगा रैमजेट इंजन, 2026 में मिल सकती है गुड न्यूज

Pinaka rocket ramjet engine
Pinaka rocket ramjet engine

Pinaka Rocket Ramjet Engine: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि भारतीय सेना रैमजेट टेक्नोलॉजी को सिर्फ आर्टिलरी गन्स तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे पिनाका रॉकेट सिस्टम में भी लगाने की संभावना पर काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि रैमजेट टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से हथियारों की रेंज में बड़ा इजाफा हो सकता है।

सेना प्रमुख ने यह बात रक्षा समाचार के पूछे सवाल के जवाब में कही। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि रैमजेट टेक्नोलॉजी पर भारतीय संस्थान और डीआरडीओ लगातार काम कर रहे हैं और इसमें अब तक काफी प्रोग्रेस देखने को मिली है।

Pinaka Rocket Ramjet Engine: सेना को मिलेंगे ज्यादा रेंज वाले हथियार

सेना प्रमुख ने कहा कि उन्होंने खुद आईआईटी मद्रास जाकर वहां चल रहे रैमजेट प्रोजेक्ट की प्रगति देखी है। उनके मुताबिक, फीडबैक काफी सकारात्मक रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी भी नई टेक्नोलॉजी की सटीक टाइमलाइन बताना आसान नहीं होता, क्योंकि यह कई परीक्षणों और तकनीकी मानकों पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा कि जैसे ही रैमजेट टेक्नोलॉजी पूरी तरह परिपक्व होगी, भारतीय सेना को हथियारों की ज्यादा रेंज मिलने लगेगी और इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सिर्फ आर्टिलरी गंस तक सीमित नहीं रखा जाएगा। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

पिनाका रॉकेट सिस्टम में रैमजेट लगाने की योजना

सेना प्रमुख ने पिनाका रॉकेट सिस्टम का जिक्र करते हुए कहा कि अगर रैमजेट टेक्नोलॉजी को पिनाका रॉकेट में लगाया जाता है, तो इससे इसकी रेंज और ज्यादा बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी रेंज बढ़ाने वाली टेक्नोलॉजी है, जिसका इस्तेमाल आगे भी अलग-अलग हथियार प्रणालियों में किया जा सकता है।

पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर पहले ही भारतीय सेना का एक अहम हथियार है और इसके अलग-अलग वर्जन सेवा में हैं। रैमजेट टेक्नोलॉजी के जुड़ने से इसकी मारक क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

डीआरडीओ भी कर रहा है रैमजेट टेक्नोलॉजी पर काम

सेना प्रमुख ने बताया कि इस दिशा में डीआरडीओ भी लगातार काम कर रहा है। डीआरडीओ और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग के जरिए इस टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनका व्यक्तिगत आकलन है कि 2026 के दूसरे हिस्से तक इस टेक्नोलॉजी में अच्छी सफलता मिल सकती है। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

आईआईटी मद्रास का बड़ा तकनीकी ब्रेकथ्रू

इस बीच, आईआईटी मद्रास ने रैमजेट-असिस्टेड आर्टिलरी शेल्स डेवलप कर एक बड़ा तकनीकी ब्रेकथ्रू हासिल किया है। इस टेक्नोलॉजी के जरिए मौजूदा तोपों की रेंज में करीब 50 फीसदी तक इजाफा किया गया है, वो भी बिना किसी नई गन सिस्टम को शामिल किए।

आईआईटी मद्रास के अनुसार, 155 एमएम आर्टिलरी शेल के अंदर रैमजेट इंजन लगाने से एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम की रेंज 40 किलोमीटर से बढ़कर 70 किलोमीटर तक पहुंच गई है। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

अलग-अलग तोपों में बढ़ी रेंज

इस टेक्नोलॉजी के परीक्षण अलग-अलग आर्टिलरी प्लेटफॉर्म पर किए गए। के-9 वज्र सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्जर की रेंज 36 किलोमीटर से बढ़कर 62 किलोमीटर हो गई, जबकि धनुष आर्टिलरी गन की रेंज 30 किलोमीटर से बढ़कर 55 किलोमीटर तक पहुंच गई।

आईआईटी मद्रास के अधिकारियों के मुताबिक, यह टेक्नोलॉजी रॉकेट-असिस्टेड प्रोजेक्टाइल से अलग है। इसमें शेल के गन बैरल से बाहर निकलने के बाद भी लगातार प्रोपल्शन मिलता रहता है, जिससे रेंज काफी बढ़ जाती है। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

क्या है रैमजेट टेक्नोलॉजी

रैमजेट एक ऐसा इंजन होता है जिसमें किसी टरबाइन या घूमने वाले हिस्से की जरूरत नहीं होती। यह शेल की तेज रफ्तार का इस्तेमाल करके हवा को कंप्रेस करता है और फ्यूल के साथ जलाकर थ्रस्ट पैदा करता है। आर्टिलरी सिस्टम में इसका मतलब है कि शेल ज्यादा दूर तक जा सकता है, बिना गन को बदले। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

देवलाली और पोखरण में सफल परीक्षण

इस प्रोजेक्ट के तहत देवलाली और पोखरण में कई गन और फील्ड ट्रायल किए गए हैं। इन परीक्षणों में क्लीन गन एग्जिट, स्टेबल फ्लाइट और भरोसेमंद रैमजेट इग्निशन को सफलतापूर्वक वैलिडेट किया गया है। आईआईटी मद्रास के अनुसार, यही टेक्नोलॉजी भविष्य में रॉकेट सिस्टम में अपनाई जा सकती है, जिससे उनकी रेंज में भी बड़ा इजाफा संभव होगा। (Pinaka Rocket Ramjet Engine)

रूद्र ब्रिगेड और IBG पर सेना प्रमुख का बड़ा बयान, क्या है पूर्वी सीमा पर आर्मी का नया वार प्लान

Indian Army Rudra Brigade Vs IBG

Indian Army Rudra Brigade Vs IBG: भारतीय सेना पूर्वी सीमा पर अपनी युद्ध क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर अब सेना चार इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप यानी आईबीजी बनाने की तैयारी में है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस योजना को लेकर बड़ा बयान दिया है और साफ किया है कि आईबीजी को अब मंजूरी मिल चुकी है और इसे चरणबद्ध तरीके से जमीन पर उतारा जाएगा।

Indian Army Rudra Brigade Vs IBG: चार आईबीजी बनाए जाने की तैयारी

आर्मी डे पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय सेना भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव कर रही है। उन्होंने बताया कि इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप पर पिछले कई वर्षों से काम चल रहा था और अब यह योजना औपचारिक रूप से स्वीकृत हो चुकी है। पूर्वी मोर्चे पर चीन की गतिविधियों को देखते हुए यह बदलाव काफी अहम माना जा रहा है। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

पानागढ़ स्थित 17वीं माउंटेन स्ट्राइक कोर, जो सीधे तौर पर चीन सीमा की जिम्मेदारी संभालती है, इस योजना का अहम हिस्सा होगी। क्योंकि इसी कोर के तहत चार आईबीजी बनाए जाने की तैयारी है। ये आईबीजी 59 डिवीजन और 23 डिवीजन से मिलकर गठित किए जाएंगे। हर आईबीजी में करीब पांच हजार से अधिक सैनिक होंगे और इसका नेतृत्व मेजर जनरल रैंक का अधिकारी करेगा। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

सेना प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि आईबीजी में पारंपरिक ब्रिगेड कमांडर नहीं होंगे। कमांड स्ट्रक्चर को सरल और तेज बनाया जा रहा है ताकि फैसले लेने में देरी न हो। प्रत्येक आईबीजी के साथ एक अलग सपोर्ट ग्रुप भी होगा, जिसका नेतृत्व भी मेजर जनरल स्तर का अधिकारी करेगा। इससे ऑपरेशन के दौरान फायर सपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और मेडिकल सहायता तुरंत उपलब्ध हो सकेगी।

आईबीजी को पूरी तरह आत्मनिर्भर यूनिट के तौर पर तैयार किया जा रहा है। इनमें इन्फैंट्री बटालियनें, आर्टिलरी रेजिमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स, कॉम्बैट इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर और फील्ड हॉस्पिटल शामिल होंगे। जरूरत पड़ने पर ये यूनिट्स कोर मुख्यालय से अतिरिक्त सपोर्ट भी ले सकेंगी। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

सेना के सूत्रों के मुताबिक, आईबीजी की सबसे बड़ी ताकत उनकी फुर्ती और तुरंत तैनाती है। पारंपरिक कोर या डिवीजन को तैनात करने में जहां काफी समय लगता है, वहीं आईबीजी कुछ ही घंटों में ऑपरेशनल हो सकती हैं। पहाड़ी इलाकों में यह क्षमता और भी ज्यादा अहम हो जाती है, जहां तेजी से बदलती स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना जरूरी होता है। वहीं आईबीजी को ऑफेंसिव ऑपरेशंस के लिए तैयार किया गया है।

आईबीजी बनाने का प्लान पहली बार वर्ष 2019 के आसपास सामने आया था। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने इसे सेना के पुनर्गठन का अहम हिस्सा बताया था। पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान सीमा के पास 9 कोर में इसे प्रयोग के तौर पर आजमाया गया था। इसके अलावा पूर्वी थिएटर में ‘हिम विजय’ जैसे अभ्यासों में भी आईबीजी को शामिल किया गया। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

सेना प्रमुख ने बताया कि आईबीजी के साथ-साथ रूद्र ब्रिगेड पर भी तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि दो रूद्र ब्रिगेड पहले ही लागू की जा चुकी हैं और सात और रूद्र ब्रिगेड की योजना है। दूसरे चरण में चार नई रूद्र ब्रिगेड को खड़ा किए जाने की संभावना है।

रूद्र ब्रिगेड को हाई टेम्पो मल्टी डोमेन ऑपरेशंस के लिए तैयार किया गया है। इनमें ड्रोन, सर्विलांस सिस्टम, रियल टाइम टारगेटिंग और तेज स्ट्राइक क्षमता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई आर्टिलरी संरचनाएं भी बनाई जा रही हैं, जिससे सेना की मारक क्षमता और बढ़े। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

सेना प्रमुख ने बताया कि इन सभी नए स्ट्रक्चर को संभालने और तेजी से लागू करने के लिए सेना ने एक फ्यूचर ट्रांसफॉर्मेशन सेल भी बनाया है, जिसका नेतृत्व टू स्टार अधिकारी कर रहे हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि संगठनात्मक बदलाव, तकनीक और ऑपरेशनल जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल रहे।

सेना का यह कदम उस समय आया है जब चीन ने पिछले एक दशक में अपनी सेना को बड़े डिवीजन सिस्टम से हटाकर छोटे और ज्यादा घातक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड में बदला है। भारतीय सेना भी इसी तरह के फ्लेक्सिबल एंड फास्ट फ्रेमवर्क की ओर बढ़ रही है ताकि किसी भी स्थिति में प्रभावी जवाब दिया जा सके। (Indian Army Rudra Brigade Vs IBG)

शक्सगाम घाटी पर चीन को सेना प्रमुख का करारा जवाब, 1963 के समझौते को बताया अवैध

Shaksgam Valley Dispute
COAS General Upendra Dwivedi in Indian Army Annual Press Conference 2026

Shaksgam Valley Dispute: शक्सगाम घाटी को लेकर भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चीन के दावे को सिरे से खारिज करते हुए साफ कहा है कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और पाकिस्तान तथा चीन के बीच साल 1963 में हुआ सीमा समझौता पूरी तरह गलत और अवैध है। सेना प्रमुख ने कहा कि भारत इस क्षेत्र में चीन या पाकिस्तान की किसी भी गतिविधि को स्वीकार नहीं करता है।

सेना प्रमुख का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब चीन ने सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया है कि शक्सगाम घाटी उसकी जमीन है और वहां सड़क, पुल और अन्य निर्माण परियोजनाएं पूरी तरह वैध हैं। भारत ने चीन के इस दावे को सीधे तौर पर चुनौती दी है। (Shaksgam Valley Dispute)

Shaksgam Valley Dispute: क्या कहा सेना प्रमुख ने

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट है। शक्सगाम घाटी भारत की संप्रभु भूमि है और वहां किसी भी तरह की बाहरी गतिविधि को मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने दोहराया कि 1963 में पाकिस्तान और चीन के बीच हुआ सीमा समझौता भारत के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं रहा है।

सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी और उसका नया चरण सीपीईसी 2.0 भी भारत की नजर में अवैध है। भारत इस परियोजना को इसलिए नहीं मानता क्योंकि इसका एक हिस्सा भारत की उस जमीन से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है। (Shaksgam Valley Dispute)

चीन जताता है अपना दावा

इससे पहले चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा था कि शक्सगाम घाटी चीन का हिस्सा है और वहां इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण करना चीन का अधिकार है। चीन का कहना है कि यह इलाका उसे पाकिस्तान के साथ 1960 के दशक में हुए सीमा समझौते के तहत मिला था।

चीन ने भारत की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि यह दो संप्रभु देशों के बीच किया गया समझौता है। साथ ही चीन ने सीपीईसी परियोजना का भी बचाव किया और कहा कि इसका उद्देश्य क्षेत्र में विकास और कनेक्टिविटी बढ़ाना है।

भारत ने चीन के इन सभी दावों को स्पष्ट रूप से नकार दिया है। (Shaksgam Valley Dispute)

शक्सगाम घाटी को लेकर ये है भारत का कहना

भारत का कहना है कि साल 1947 में जम्मू-कश्मीर कानूनी रूप से भारत में शामिल हुआ था। इसके बाद पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर जबरन कब्जा कर लिया। शक्सगाम घाटी उसी क्षेत्र का हिस्सा है।

भारत के अनुसार पाकिस्तान को इस क्षेत्र पर कोई कानूनी अधिकार नहीं था, इसलिए वह इसे किसी तीसरे देश को सौंप ही नहीं सकता था। इसी वजह से भारत ने 1963 के तथाकथित पाकिस्तान-चीन सीमा समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया।

भारत आज भी शक्सगाम घाटी को अपने क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा मानता है और वहां चीन या पाकिस्तान द्वारा की जा रही किसी भी गतिविधि का लगातार विरोध करता रहा है। (Shaksgam Valley Dispute)

विदेश मंत्रालय ने भी दोहराया रुख

इस विवाद पर भारत के विदेश मंत्रालय ने भी सख्त रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और भारत ने 1963 के तथाकथित सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है।

उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सभी क्षेत्र भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं। यह बात चीन और पाकिस्तान को कई बार आधिकारिक रूप से बताई जा चुकी है।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत शक्सगाम घाटी में ज़मीनी हालात बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध करता है और अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है।

शक्सगाम घाटी एक संवेदनशील इलाका है। इसके उत्तर में चीन का शिनजियांग क्षेत्र है, दक्षिण और पश्चिम में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पूर्व में सियाचिन ग्लेशियर का क्षेत्र पड़ता है। यह इलाका सामरिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है।

भारत का कहना है कि इस इलाके में किसी भी तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण या सैन्य गतिविधि सीधे तौर पर उसकी सुरक्षा से जुड़ा मामला है। यही कारण है कि भारत सीपीईसी और उससे जुड़ी परियोजनाओं का लगातार विरोध करता रहा है। (Shaksgam Valley Dispute)

सीपीईसी को लेकर भारत की आपत्ति

भारत ने पहले भी साफ कहा है कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर एक अवैध परियोजना है। भारत का तर्क है कि यह परियोजना भारत की उस जमीन से होकर गुजरती है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।

भारत ने 9 जनवरी को भी शक्सगाम घाटी में सीपीईसी के तहत हो रहे निर्माण कार्यों को अवैध और अमान्य करार दिया था। (Shaksgam Valley Dispute)

Explainer: DRDO की MPATGM मिसाइल ने चलते टैंक पर किया ऊपर से अटैक, जानें पहले के ट्रायल्स से यह टेस्ट क्यों है अलग?

Explainer MPATGM Missile Test
MPATGM Missile Test: DRDO Successfully Tests Indigenous Man Portable Anti-Tank Missile Against Moving Target

Explainer MPATGM Missile Test: डीआरडीओ ने आज मैन पोर्टेबल एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी एमपीएटीजीएम का सफल फ्लाइट ट्रायल किया। यह टेस्ट महाराष्ट्र के अहिल्यानगर स्थित केके रेंज में किया गया। इस दौरान मिसाइल ने मूविंग टारगेट पर टॉप अटैक मोड में सीधा और सटीक हमला किया।

यह मिसाइल तीसरी पीढ़ी की फायर एंड फॉरगेट श्रेणी की है, यानी इसे एक बार टारगेट पर लॉक करने के बाद दोबारा गाइडेंस की जरूरत नहीं होती। मिसाइल अपने आप टारगेट तक पहुंचकर उसे नष्ट कर देती है। (Explainer MPATGM Missile Test)

Explainer MPATGM Missile Test: चलती टैंक यूनिट पर किया टॉप अटैक

नए टेस्ट की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि एमपीएटीजीएम मिसाइल ने पहली बार मूविंग टारगेट को निशाना बनाया। यह टारगेट थर्मल टारगेट सिस्टम के जरिए तैयार किया गया था, जिससे यह बिल्कुल असली टैंक की तरह दिखाई देता है। मिसाइल ने ऊंचाई पर जाकर टैंक की छत पर सीधा वार किया। इसे टॉप अटैक कहा जाता है, क्योंकि टैंक की छत उसकी सबसे कमजोर जगह मानी जाती है।

डीआरडीओ अधिकारियों के मुताबिक यह टेस्ट बिल्कुल युद्ध जैसे हालात में किया गया था, ताकि मिसाइल की क्षमता को पूरी तरह परखा जा सके। (Explainer MPATGM Missile Test)

पहले के परीक्षणों से यह टेस्ट क्यों है अलग

इससे पहले डीआरडीओ ने एमपीएटीजीएम के कई टेस्ट किए थे, लेकिन वे सभी मिसाइल के डेवलपमेंट और टेक्निकल वैलिडेशन से जुड़े थे। लेकिन नए टेस्ट में पहली बार यह साबित हुआ कि मिसाइल पूरी तरह ऑपरेशनल रोल निभाने के लिए तैयार है।

पिछले कुछ सालों में किए गए शुरुआती परीक्षणों में एमपीएटीजीएम को मुख्य रूप से स्टेशनरी यानी रुके हुए टारगेट्स पर किया गया था। इन परीक्षणों का मकसद मिसाइल की बुनियादी क्षमताओं को परखना था। जैसे कि मिसाइल सही दिशा में उड़ान भर रही है या नहीं, गाइडेंस सिस्टम टारगेट को पहचान पा रहा है या नहीं, वॉरहेड सही समय पर फट रहा है या नहीं, और टॉप अटैक प्रोफाइल तकनीकी रूप से काम कर रही है या नहीं। (Explainer MPATGM Missile Test)

इन शुरुआती परीक्षणों में मिसाइल को अलग-अलग दूरी पर फायर किया गया। कहीं कम दूरी से तो कहीं अधिकतम रेंज के पास से लॉन्च किया गया। इन टेस्ट में यह देखा गया कि मिसाइल ऊपर की ओर चढ़कर कैसे टारगेट की छत पर वार करती है। हालांकि ये सभी अपनी जगह पर खड़े टैंक जैसे मॉडल थे। (Explainer MPATGM Missile Test)

मिसाइल में फायर एंड फॉरगेट फीचर

इसके बाद के चरण में डीआरडीओ ने मिसाइल के फायर एंड फॉरगेट फीचर पर काम किया। इन ट्रायल्स में यह साबित हुआ कि एक बार टारगेट को लॉक करने के बाद मिसाइल को किसी बाहरी कंट्रोल या गाइडेंस की जरूरत नहीं पड़ती। सैनिक मिसाइल दागने के बाद तुरंत अपनी पोजीशन बदल सकता है, जो युद्ध के दौरान उसकी सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होता है।

पुराने ट्रायल्स में इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर की क्षमता को भी परखा गया था। दिन और रात दोनों परिस्थितियों में यह देखा गया कि मिसाइल हीट सेंसिंग के जरिए टागरेट को कितनी सटीकता से पहचानती है। इन टेस्टों में थर्मल सिग्नेचर वाले टारगेट का इस्तेमाल किया गया, लेकिन वे भी अपनी जगहों पर स्थिर थे। (Explainer MPATGM Missile Test)

चलते टारगेट को निशाना बनाना होता है मुश्किल

जनवरी 2026 का परीक्षण इन सभी पुराने टेस्टों से इसलिए अलग है, क्योंकि इसमें पहली बार मूविंग टारगेट को निशाना बनाया गया। युद्ध के हालात में टैंक कभी भी एक जगह खड़े नहीं रहते। वे लगातार स्पीड में रहते हैं, दिशा बदलते हैं और कई बार स्पीड भी बढ़ाते या घटाते हैं। ऐसे में किसी मिसाइल के लिए चलते टारगेट को पहचानना, उसका पीछा करना और फिर सटीक हमला करना सबसे कठिन चुनौती होती है।

हालिया टेस्ट में डीआरडीओ ने एक थर्मल टारगेट सिस्टम का इस्तेमाल किया, जो बिल्कुल असली टैंक जैसा व्यवहार करता है। यह टारगेट न केवल गर्मी उत्सर्जित कर रहा था, बल्कि तय रफ्तार से आगे बढ़ भी रहा था। एमपीएटीजीएम मिसाइल ने पहले टारगेट को लॉक किया, फिर ऊंचाई पर जाते हुए अपनी उड़ान प्रोफाइल बदली और आखिर में टॉप अटैक मोड में सीधे टारगेट की छत पर हमला किया। चलते हुए टारगेट पर टॉप अटैक करना तकनीकी रूप से मुश्किल होता है, क्योंकि मिसाइल को उड़ान के दौरान लगातार यह एनालिसिस करना पड़ता है कि टारगेट किस दिशा में और किस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। (Explainer MPATGM Missile Test)

यह ट्रायल इस बात का सबूत है कि मिसाइल का सीकर सिस्टम, गाइडेंस एल्गोरिद्म और कंट्रोल सिस्टम सभी एक साथ सही तरीके से काम कर रहे हैं।

पुराने परीक्षणों में मिसाइल की मारक क्षमता और पेनिट्रेशन को जरूर साबित किया गया था, लेकिन इस नए टेस्ट में यह साबित हुआ कि मिसाइल असली युद्ध जैसे हालात में भी उतनी ही सटीक और भरोसेमंद है। यही वजह है कि इस परीक्षण को डेवलपमेंट टेस्ट से आगे बढ़कर यूजर ट्रायल्स और इंडक्शन की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। (Explainer MPATGM Missile Test)

टर्निंग पॉइंट है आज का टेस्ट

डीआरडीओ के अधिकारियों के अनुसार, यह परीक्षण भारतीय सेना की जरूरतों के सबसे करीब है, जिसमें पैदल सैनिक को दुश्मन के आधुनिक टैंकों से निपटने के लिए हल्का, भरोसेमंद और अत्यधिक घातक हथियार चाहिए। यही कारण है कि जनवरी 2026 का यह ट्रायल एमपीएटीजीएम के पूरे विकास कार्यक्रम में एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है और इसे पहले के सभी परीक्षणों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। (Explainer MPATGM Missile Test)

पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनी मिसाइल

एमपीएटीजीएम पूरी तरह भारत में विकसित की गई मिसाइल है। इसमें इमेजिंग इंफ्रारेड होमिंग सीकर, ऑल इलेक्ट्रिक कंट्रोल सिस्टम, फायर कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वॉरहेड और आधुनिक प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है।

इस मिसाइल के डेवलपमेंट में डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने मिलकर काम किया है। इनमें हैदराबाद, चंडीगढ़, पुणे और देहरादून की प्रयोगशालाएं शामिल हैं। लक्ष्य को असली टैंक जैसा दिखाने के लिए थर्मल टारगेट सिस्टम जोधपुर स्थित डिफेंस लैबोरेटरी ने तैयार किया।

इस मिसाइल सिस्टम के डेवलपमेंट और प्रोडक्शन में भारत डायनामिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये दोनों कंपनियां डीआरडीओ के डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर हैं। (Explainer MPATGM Missile Test)

दिन और रात दोनों में हमला करने में सक्षम

एमपीएटीजीएम मिसाइल का इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर दिन और रात दोनों समय काम करने में सक्षम है। मिसाइल में लगा टैंडम वॉरहेड आधुनिक मेन बैटल टैंकों की सुरक्षा को भी भेदने में सक्षम है, जिसमें रिएक्टिव आर्मर शामिल होता है। (Explainer MPATGM Missile Test)

ट्राइपॉड और मिलिटरी व्हीकल से लॉन्च की सुविधा

एमपीएटीजीएम को ट्राइपॉड से भी लॉन्च किया जा सकता है और सैन्य वाहन से भी। इससे इसे अलग-अलग तरह के ऑपरेशन में इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। पैदल सैनिक इसे अपने साथ ले जा सकते हैं, जिससे एंटी-टैंक क्षमता सीधे फ्रंटलाइन तक पहुंच जाती है। (Explainer MPATGM Missile Test)

रक्षा मंत्री और डीआरडीओ चीफ ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण के लिए डीआरडीओ, उद्योग साझेदारों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

वहीं रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन डॉक्टर समीर वी कामत ने कहा कि यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा और सभी टारगेट हासिल किए गए। उन्होंने बताया कि यह मिसाइल सिस्टम अब भारतीय सेना में शामिल किए जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। (Explainer MPATGM Missile Test)